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Full text of "Alamkara Sarvasva Of Sri Rajanaka Ruyyaka & Mankha Dr. Rewa Prasada Dwivedi"

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री काशी सस्त मन्थमाला २०६ 


जदि भिति 


अरड्ञरसवेख 


4. जयरथकरत “विमरशिनी' सहित ) < 


नाका + = + 


{^ 


9 व्याख्याकार 


डो० रेवाप्रसाद द्विवेदी 


ओ 
४ 


| 
|. 
| 


 वाश्रीः॥ 
काशी संस्कृत ग्रन्थमाला 
९०६ | 


ददप 
 राजानक-रुय्यक-सङ्कफषिरचितं 
| >। | 
अरङ्ारसवंखम्‌ 
जयरथछृत “विमरिनी' समुपेतम्‌ 
एतदुभय-टिन्दीमाष्याज्वादभ्बूषितं च 


हिन्दीभाष्यानुवादकारः 
ई०्रेवाप्रसाद्‌ ह्िवेदो 
एम. ए., पी-एच. डी., साहित्यराखाचायः 
 काशीहिन्दूविडवविद्यालयस्य 
प्राच्यविद्याधमविन्ञानसंकाये साहित्यविभागाध्यक्षः 


९६.७१ 


भ्रकाडक : 


मद्रक 
संस्करण 


मूल्य 


म 


चौखम्बा संस्कत सीरीज याफिस, वाराणसी 


: विद्याविलास त्रेस, वाराणसी 


; प्रथम, वि० संवत्‌ 4 | 
9 नि: 


©) चौखम्बा संस्छृत सीरीज आष 
गोपाल मन्दिर तेन 
पो बा० ठ, वाराणसी-१ ( भारतवषे) 
फोन :-82१५४५ 


प्रधानत शाखा 
चौखम्बा विधाभवन 
चोक, पो० बा० ६६, वाराणसी-? 
फोन : ६३०७६ 


प 


८॥5ा ऽ॥ ऽपरा 575 


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च । 
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भिका 


अरुंकारोऽस्िति सवेस्वसिदं यस्य महेशितुः । 
शक्ति विमरिनीं तस्य वन्दे रत्नाकरोउञ्वखास्‌ ॥ 


'अलंकारसवस्व' संस्कृत कौ साहित्यविद्या के प्रमुख अंग अलंकार पर आधित 
एक प्रतिनिधि प्रन्थ है। भरत से जगन्नाथ तक हुए अलंकार चिन्तन की यह्‌ तामिह, 
सिद्धान्तभूत प्राचीन चिन्तन तो इसमे अपने स्वस्थ तथा वेज्ञानिक रूप में निहितः है ही, 
परवर्ती अनुवीक्षा ओर समीक्षाके लिए भी यहु मेरुदण्ड रहाहै। इसप्रकार इख ग्रन्थ 
के अनुज्ीलन के बिना भारतीय अलकार-बोध सुप्रतिष्ठ नहीं माना जा सकता, 


$ 


१ ] ग्रन्थ स्वरूप 
अलंकारसवंस्व ठीकवेसा हीनामदहै जेसा "वक्तोक्तिजीदित' या मुक्तावली" । 
कन्तक का मुलग्रन्थ कारिकाबद्धदहै ओर उसका नाम काव्याल्ङ्कार' है। वक्रोक्ति 
जीवित संज्ञा उसको व्याख्या को दी गईहै। विह्वनाथका न्यायम्रन्थ भी सूरतः 
कारिकात्मक है ओर उसका नाम कारिकावलि' है। मुक्तावलि उसकी वृत्तिका नाम 
है । किन्तु ग्रन्धप्रसिद्धि वृत्तिकेनामसेहीरहै। अलंकारसवंस्व कीभी यही स्थिति है। 
इसके तीन भाग हे सूत्र, वृत्ति ओर उदाहरण \ इनमे सूत्र भागकानाम है अलङ्कार 
सूत्र' ओर शेष दोनों भागों का नाम है अलंकारसवेस्व'। किन्तु स्थिति यहहैकि 
रोताल्दियों पहले से हम केवल (अलंकारसवस्व' नामसे ही जानते आ रहै है।ः 
२ ] श्रन्थ सस्करण 
अलंकारसवंस्व अनेक बार प्रकाशितो चुकाहै। इसके संस्करणोंकी तालिका 
यह दे- 
१. देखिए इसी भूमिका मे दिया अलेकारों का इतिहास । रस्त आदिकेचक्एिभी 
यह्‌ म्रन्थ उत्तम सामभ्री प्रस्तुत करतादहे। 
२. जयरथ, विद्याधर, विद्यानाथ, विदवनाथ, भटुगोपाल, मल्लिनाथ, कुमारस्वामी, 


अप्पयदीक्षित, वीरराघव आदिने सूत्र ओर वृत्ति दोनोंको अलंकारसवंस्व नामे 
वुकारा है । विश्लेष विवरण के च्िए 


दरषव्य म० म० काणे तथा ° सुशील्कुमारडे के प्रऽ०ा$ 2 381ता1 
706८8 तथा ० रामचन्द्र द्विवेदी कौ अलंकारमीमांसा । 


(9. 


प्रकाडक संस्करण सन्‌ स्वरूप संपादक । संशोधक 
१. निणंयसागर, बम्बर प्रथमः १८९३ विमटिनीसहित म.म. दुर्गाप्रसाद द्विवेदी 
द्वितीय १९३६ च पं०्गिरिजाप्रसाद द्विवेदी 
२. अनन्तशयन प्रमा. प्रथम १९१५ समृद्रवंधी टी.स. के. साम्बरिव शास्त्री 
त्रिबरेन्द्रम केरल 
द्वितीय १९२६ ए 5 
३. शारदा प्रंथमाला, कारी प्रथम १९२६९ मूलमात्र पं० गौरीनाथ पाठक 
४. मोतीलाल बनारसीदास, प्रथम १९६५ हिन्दी अनुवाद डो. रामचन्द्रे द्विवेदी 
कारी तथा संजीवनी 
५. मेहरचन्द्र ठक्ष्मणदास, प्रथम १९६५ संजीवनी संपा० डा० कु° जानकी 
दिल्ली संरो० डा. वे. राघवन्‌ 


[ २३ ] ग्रन्थकार 
इन सभी संस्करणों में च्रिवेन्द्रमसंस्करण को छोड अन्य किसी संस्करण में ग्रन्थकार 
का नाम नहीं मिक्ता । चरिवेन्द्रम संस्करणमे इसे मंखकी कृति बतलाया गया है। 
मंखपरम्परा--त्रिवेन््रम के इस संस्करणमें छपी टीका में आरम्भके मंगल 
पयो मे- 
कदाचिन्मडखुको पक्त काञ्यारकारटन्तणम्‌ । 
प्रद्श्यं रविवर्माणं प्राथंयन्त विपरश्चितः॥ 


गम्भीरं नस्तितीषृंणां मङ्खुकमन्थसागरम्‌ । 
नौरस्तु भवतः प्रज्ञा स्थेयसी यदुनन्दन ॥ 


इस प्रकार मंखको ही ग्रन्थकार कहा गया दहै । प्रन्थ के अन्तमं भी वृत्ति की पुप्पिका 
 ॥ 
इति मंघुको वितेने कश्मीरक्तितिपसान्धिविग्रहिकः। 
सुकविञ्युखालङ्कारं तदिद्मलंकारसवंस्वम्‌ ॥ 
दस प्रकार मंखकोही सवंस्वकार बतलाया गया है, भौर समूद्रबन्ध की अपनी व्याख्या 
के अन्तम भी- 
'मडखुकनिवन्धविबृतौ विहितायामिह समुद्र बन्धेन । 
गुणलेक्रमात्रमित्रेभविषीष्टादोषदर्दिभिः सद्धिः॥' 


इस प्रकार । 
इस संस्करण मे वृच्यनूप्रास के लिए उदाहृत (आटोषेन' पद्य [ प° ६२] के पहुले 
मदीये श्चरीकण्डचरिते" भी छखिखा मिलता है। श्रीकण्डचरित के रचयिता मंखहीरै ओर 
उनके इस काव्य में यह्‌ पद्य है [ द्र° सगं २ पद्य ४९|| 
१. इस संस्करण के आधार पर १९०८ ई० मेँ एच. जेकोवी ने अटंकारसवंस्व का 
जमंनी भाषा में अनुवाद भी किया था। 


५.9 


ग्रन्थारम्भे-मंगल-पद्य (नमस्कृत्य ०" के उत्तराध में इस संस्करण मे "गुवंरंकार ०” पाठ 
ही अपनाया गया है, यद्यपि टीकामें गुरुशब्द की व्याख्या नहीं को गई है। 
स्मरणीय है जयरथ आदि ने यहाँ गुवंलंकार' के स्थान पर निजालंकार० पाठ माना 
है । इस प्रकार केरलीय पाठ के अनुसार अकुंकारसवंस्व के रचयिता मंदुक या मंख है| 


खय्यक-स्चकृ-परम्परा--जयरथ ने विमर्शिनी में गुवंलंकार' के स्थान पर 
निजालंकार' पाठ माना है । उन्होने काव्यप्रकाशसंकेतं [ प° ३७२ ] ओर अलंकारा- 
नुसरिणी ( ११८, १९२, १९९ ) को ग्रन्थकार की अन्य कृति कहा है । काव्यप्रका- 
संकेत के आरम्भमे- 
“ज्ञात्वा श्रीतिखकात्‌ सवांरूकारो पनिषद्रसम्‌ । 
काव्यग्रकासंकेतो स्चकेनेह लिख्यते ॥ 
इस प्रकार सुचक को उसका कर्ता माना गयादहै ओर स्तुतिकूसुमांजलि ८।१९ पद्य की 
टीका में रत्नकण्ठ ने अटंकारानुखारिणी को रुचक की कृति कहा है । रुचक र्प्यक का 
ही दुसरानाम हे। । 
श्रीविद्या चक्रवर्ती ने अलंकारसर्वंस्व पर जो संजीविनी टीका लिखी है उसमे- 
“सूचकाचार्यो पञ्चे सेयमरूंकारसर्वंस्वे 1 
संजीविनीति रोका श्री विद्याचक्रवत्तिना क्रियते ॥ ` [ संजीविनीसंगर | 
(इत्थं भूम्ना सचकवचसां विस्तरः ककशोऽयस्‌' [ अन्त-मंगरू | 
इस प्रकार रुचक या रष्यक को ही अलंकारसवंस्व का रचयिता मानाहै। 


पिनेल द्वारा संपादित सहूदयलीलाः मे उसके रचयिता को-- 
क्तिः श्री विपद्‌ वर्‌-राजानक-तिरूकात्मज-श्री मदारकारिकःसखमाजा्रगण्य- 
श्री राजानक-रुय्यकस्य राजानक-ख्चकापरनाम्नोऽलङ्कार सवं स्वक्रतः । 
इस प्रकार रुग्यक, स्चक ओर अरंकारसवस्वकार कहा गया है । 
उभयपरम्पशा- अप्पयदीक्षित ने चित्रमीमांसा के उपमाप्रकरणमे इटेष को 
अन्यअरंकारों का बाधक बतराते हुए-- 


(उपमाप्रतिमानेऽपि तस्प्रतिभोत्पत्तिहेतः श्टेष एव, नोपमेति मङ्खकादिभिरभ्युषेयते ॥ ` 
इस प्रकार इस मत का उपस्थापक संखको मानादहै। यह्‌ मत अलंकारसवंस्व की 


वृत्तिम आताभीदहि। इसीके साथ अपह्ुति ओर व्याजोक्ति के अन्तर पर प्राचीन 
आचार्यो के मत उपस्थितं करते हृए- । 


१. काव्यप्रकाश संकेत कै किए द्रष्टव्य--डं० रामचन्द्र द्विवेदी का काव्यप्रकाश 
अंग्रेजी अनुवाद--न1७ ?०७१० 1. भाग-२ परििषट-डी° । 

२. संजीविनी : डा °रामचन्द्रहविवेदी तथा डँरजानकोदा रा पृथक्‌ पृथक्‌ संपादित । 

३. सहदयलीला नि° सा० पाठके लिए देखिए इसी म्रन्थ का परिशिष्ट-१। 

४. चिच्रमीमांसा सं° प° कालिकाप्रसाद शुक्छं पृ० ५६। 


^+ = 


अत्रेदमपह्वतिकथनं व्याजोक्त्यरूंकारं पएथगनङ्गीकवंताम्‌ उद्धगदीनां मतमनु्धव्य । 
ये त॒-“उद्धि्नवस्त॒निगृहनं ्याजोक्तिरिति ` व्याजोक््यरंकारं प्रथगिच्छन्ति तेषा- 
मिहापि ग्याजोक्तिरेव नापद्‌चुतिरिति इचकाद्यः ।` 
इस प्रकार वे मलंकारसवंस्वकार को रुचक भी कहते हैँ । 
स्पष्टही अटंकारसवंस्व के कत्रंत्व के;विषयमें रुय्यक ओर मंखको छोड अन्य 
के नामकी परम्परा नहींदै। आगे अने वले विवरणसेस्पष्टटहै कि रुथ्यक आर मंख 
दोनों ही कदमीर के निवासीर्है। 
प्रन उव्ताहै कि सवंस्व का टेक इन दोनों मेंसे किसे स्वीकार किया 
जाए । उत्तरम विचारो केदो द बन जाते है। एक उनका जौ केवल 
रुयक को सूत्र ओर वृत्ति दोनों का रचयिता मानते ह ओर दूखरा उनका जो मंख 
को । इन दोनों में प्रथम का प्रवत्तन निणयस्ागरीय संस्करणसे होता है ओर द्वितीय 
का त्रिवेन्द्रमसंस्करणसे।* ० काणे, डंडे, रं राघवन्‌, सेठ कन्हैयालाल 
पोहार, ० रामचन्द्र द्विवेदी, ० जानकी तथा अन्य अनेक विदान्‌ स्य्यक कै 
पक्षमेरहैँ। मंख का पक्ष च्रिवेन्द्रमसंस्करण के परचात्‌ कदाचितु पहली वार हमने 
ही च्या है अपने व्यक्तिविवेक ओर उसके व्याख्यान के हिन्दीभाष्य की भूमिका 
मे । इस प्रकार विद्वानों का बहुमत रय्यक के पक्षमेदहे। 
रु्यकवादी उक्त विद्वानों के भिन्न-भिच्न तर्को का मुरु आधार जयरथ है ओर 
सार यह- | 
स्थापना--कड्मीरी गौर दक्षिणी परम्परा में करमीरी-परम्परा ही मान्य है 
क्योकि 


क तिः ~ च त + 0 ~ ए अ छ पणि णि ५ 


१. अङंकारसवस्व व्याजोक्ति सूत्र--७७ ० ६५२ । 

२. चित्रमीमांसा- प° २४२। 

आगे इस सूत्र पर कुछ ओर भी निष्कर्णां की कल्पना की गई है। 

३. "काणे" तथा ड" 15107 ॐ 91. ०९68. डँ ० राघवन्‌ 'कु० जानकी के 
भलंकारसवंस्व का पए०ए०त, पहार जी--संस्छतसाहित्य का इतिहास भाग-१ पृ 
१७९१, ° रामचन्द्र द्विवेदी अलंकारमीमांसा-परिचयखण्ड तथा संजीविनी सहित स्पे 
उनके अक्कारखवस्व की भ्रुमिका, डं० कु° जानकी-- संजीविनी सहित छपे उनके 
अल्कारसवंस्व की भूमिका पृ० ३। 

इनमें से ग्रन्थकार कै नाम की इ समस्याको पोहारजी ने वडीही सफाईके 
साथ उपस्थित किया है किन्तु उन्होने यह भी लिखि दिया है कि पण्डितयाज जगन्नाथ 
भो श्यककानामच्ते है, जबकि तथ्य यह्‌दहैकि पण्डितराज केवल ग्रन्थ कानाम्‌ 
ठेते हैँ सवस्वछ्ृतु" अथवा “अलंकारघरवंस्वज्ृत्‌" भादि । 


7 


४ & ५ 


तक-( १ ) करमीरी परम्परा करमीर की है जहाँ ग्रन्थ लिखा गया 

(२) करमीरी) परम्परा पुववर्ती है क्योकि जयरथ समुद्रबन्ध से 

पूववर्ती हैं । 

(३) क्मीरी परम्परामें मतभेदनहींहै, जबकि दक्षिणी परम्परा में 
मतभेदं । दक्षिणके ही विद्यानाथ, कुमारस्वामी, मल्लिनाथ 
आदि सवंस्वकार के रूप में रुय्यक या रुचक का नाम उद्धृत करते हैँ । 
इस प्रकार दक्षिणी विद्वानों मे भी बहुमत रय्यक काही है । 

करमीरी परम्परा मे सम्यक ही ग्रन्थकार के रूप मे प्रसिद्ध है, 

अतः सुग्यक को ही अलकारसवस्व का रचयिता माना जाना चाहिए । 
इन्हीं तकोंके समथेनमें इन विद्वानों ने सहदयलीला कौ पूर्वोदधत पुष्पिका को 

भी उद्धृत किया है। इषमेस्पष्टही स्य्यकको अलंकारसवेस्व का रचयिता माना 

गया ह्‌ ॥ 

| ~ अलंकारसवेस्व कै कतृत्व के विषय में मुख्य प्रदन यह नहीं है कि रु्यक 


इसके कर्ता हैँ या नहीं, क्योकि उनके कृत्व में विवाद नहीं है । मुख्य प्रन यह्‌ है कि 
इसके साथ मंखका नाम व्यो जुड़ा । सेठ कन्हैयालालजी, पोदहार, डं० काणे ओर 
डां० द्विवेदी ने मंख के समथन में केवल इतना ल्खाहै कि मंखने रु्य्यकके बाद 
उनकी वृत्तिका परिष्कार किया होगा ओौर उसमे अपने श्रीकण्ठचरित कै पद्यभी 
मिला दिए होगे । इसी आधार पर उनकी प्रसिद्धिहो गई होगी । प्रसिद्धि भी केवल 
कोलम्बोके राजघरनेमें हूर, क्योकि मंख भी राजमन्त्री ये ओर समुद्रबन्ध भी। 
अवद्यही करमीर के राजपरिवार का दक्षिणी राजपरिवारोंसे संबन्ध रहा होगा । 
हमारा त- 

वस्तुतः सूत्र के रचयिता रुय्यक हँ ओर वृत्ति के मख । इसमें प्रमाण हैँ अप्पयदीक्षित 
केवे दोनों वाक्य जिनमेंसे एक में उन्होने रुचक का उल्लेख किया ओर दूसरे 
मे मंखका। ध्यानदेने कीबात यहुदहैकि जिससंदभभमें रुय्यककानामल्ादहै 
उसमें सूत्रभी दिया हुभाहै ओौर जिस संदभंमें केवल मंखका नाम जिया है उसमे 


सिद्धान्त 


सूत्र का उद्धरण नहीं है" ! "उद्धिच्चवस्तुनिगहनं व्याजोक्तिः यह अल्कारसवंस्वमेंही 


१. छपी चित्रमीमांसा में ^चकादयः' पद नापन्लुतिरिति सुचकादयः' इस प्रकार 
अन्तमे छपा दहै) 

इस प्रकारके पाठसे एसा लगने लगता रै कि 'उद्धिच्ववस्तु' सूत्र श्चक कानहींहै 
जब कि यह सूत्र सवेस्वकारही। इसकी टीकासुधा सूत्रको रय्यककी ही कृति 
वतलाती है। प्रसंग भीएेसा है जिसमें पहर उद्धटकामतदिया है शौर बाद में दण्डी 
का सत । तदनुसारयथेतु रुचकादयः' पाठ ही जमताहै । यदि “रुचकादयः' अन्त मे आए 
तन भी यह तो उससे सिद्धहो ही जाता है कि अप्पयदीक्षित सुत्रकार को वृत्तिकारसे 
भिन्न मानते है । 


न (1 = 
१/1 


(4 


आया सूत्र है। अतः दीक्षित जी को सूत्र का उल्लेख करते समय रुचक कानामलेना, {~ 
जो आवश्यक दिखता है उखका रहस्य, ओर हो क्या सकता टै इसके अतिरिक्त कि सूत्र ` 
के कतूत्वमे संदेह नहो । वेष का विचार केवल वृत्तिमें हुदै भौर उसीमेंइटेष को | 
अन्य अलंकारो का बाधक माना गयादहै। दूसरे स्थल में इटेष की यह्‌ स्थिति उपस्थित 
करते समय दीक्षित जीने मंख का नाम लिया इसका भी एकमात्र यही अथं हौ सकता | 
टै कि वे वृत्ति का निर्माता मंख को मानते 1 | 

| 


डों० ० ओर म० म० काणेने दक्षिण भारत के कुछ पाण्डुग्रन्थों का भी संदर्भ 
दिया है, जिनमें वृत्ति के मंगटपद्य के उत्तराधं के निजालंकारसूत्राणां' पाठके स्थान पर ` 
'गुवंलंकारसूत्राणां' पाठ ही मिलता है, जैसा कि त्रिवेन्द्रमसंस्करण में समूद्रवन्धने | 
माना हि। 


श्रीविद्याचक्रवर्ती नेभी पुनरुक्तवदाभास के उदाहरणोंको मंखका मानादै। | 
वृत्ति में मख के निम्नलिखित पद्यभी उद्धत हँ २।४९, ५।२३, ६।१६,७०, १०।१० 

मद्रास राजकीय संस्छृतपाण्ड्म्रन्थागार मे भमंखुकसूत्रोदाहरणः नाम का एक 
स्वतन्त्र ग्रन्थ भी रक्षित है । 

तुगभद्रने भी संखकोही सवस्वकार स्वीकार किया दहै ।" 

इस प्रकार मंखके पक्षमें भी दक्षिणी विद्वानों का मत अत्पमत नहींदहै। 

अलंकारसवंस्व के जो सूत्र है उन्हें अवदय ही ग्रन्थकार ने पहले ही बना लिया है) 
वृत्ति लिखने कै पूवं उनको भी ग्रन्थकार ने अवश्य ही कोई नाम दिया होगा । यह्‌ नाम 
अटंकारसूव्र ही होगा, क्योकि वृत्तिके मंगपद्य में अलंकारसूत्र ही नाम आता है 
ओर स्वयं सूत्रकार अन्तिम सूत्रम अलंकाराः संक्षेपतः सूत्रिताः इस प्रकार “अरकार- 
सूत्र" नाम कासंकेत देते हँ । समुद्रवन्ध कीजो टीका मंघयुक कानाम लेकर चलतीहे 
वहु भी पाठान्तरम “समाप्तं चेदमलंकारसवंस्वम्‌, कृती राजानकश्चीरुचक्रस्य । श्‌ । 
इति मुः" इस प्रकार मंघुक के साथ रुचक काभीनाम प्रस्तुत करतीदै। अवश्य ही 
इसमें सूत्रकार रुथ्यक को ओर वृत्तिकार मंखको मानने का अभिप्राय निहति है। 


~ ------~ --~-- - --- ---~~~--~ 


१. येतु उद्धि° स्चकादयः' का “चकादयः' शब्द ये तु स्चकादयः' होना चाहिए । 
किपिकार से यह शब्द चुट गया होगा ओर उसे इसे पाण्डप्रति मे पादवंभागमें लिख 
रला होगा । संपादकने इसे यथास्थान नहीं रा । यदि इसे स्वयं अप्पयने हौ इसी 
प्रकार छिखाहोतो उससे भीस्पष्टहैकिवे वृत्तिकार को सूत्रकार से भिन्न मानते है। 

२. देखिए इलोक सूची, बथवा पृ ६२, ३१७, ३२७, ३२७, ३२७ । 

३. पाण्डरप्रति ऋ० २९७० द्र० कु० जानकी अलकारसवस्व भूमिका प° २। 

४. द्र° संजीविनी सं° डँ° हिवेदी प° २४ भूमिका) 


( -१९ श्र 


जहां तक समुद्रवन्ध के समयकाप्रस्नरहैवेभी उसी शती के है जिसके जयरथ । 
दोनों में जयरथ १३ वींशतीके आरम्भ केँ ओर समुद्रबन्ध उसके मध्यके। अतः 
समय का भी अन्तर बहुत नहीं पडता । 

जहां तक कडमीर का सम्बन्ध है करमीरी ग्रन्थों के विषयमे उसी देश की परम्परा 
को महत्व देना अवश्य हौ तकसंगत है, किन्तु यह्‌ तब संभव है जब करमीर के विद्वान्‌ 
निष्पक्ष हों । उनमें परस्पर में अत्यन्त कलह है । जयरथ के पहले शोभाकरनते, जो 
करमीर के ही है, अपने अलकार-रत्नाकर मे अलंकारसर्वस्व को उसके सूत्र ओर वृत्ति 
दोनों रूपों. में {पदे पदे उद्धृत किया, किन्तु ग्रन्थकार कानाम एक बारभूरसेभी नहीं 
लिया । स्वयं जयरथ ने रत्नाकर को पर्याप्त मात्रा में उद्धृत करिया, किन्तु शोभाकर का 
या उनके ग्रन्थ रत्नाकर का नाम नहींलिया। न केवल नाम का उल्लेख नहीं क्रिया, 
आक्षेप भी क्रियादहै। कदाचित्‌ उसी की छाप पण्डितराज पर पडीरहै ओर वे 
अप्पयदीक्षित पर वरसते दिखाई देते ह। 


इन सवके परमगुर्‌ अभिनव भी गाली देकर बात करते ओौर पूव पक्षके साथही 
नही, मूलग्रन्थ के साथ भी अन्याय करते हैँ । कहीं उनकी बुद्धि उल्ट भी जाती है ।१ 

करमीरी परम्परा से अधिक दाक्षिणात्य परपरा ही मान्य है, क्योकि दक्षिण में यह्‌ 
देष नहीं था। क्या कारण है किं महिमभेदट्र का व्यक्तिविवेक कश्मीर में नहीं 
मिला ओर दक्षिणमेंही मिला । क्याकारण है कि साहित्यमीमांसा की पाण्डुप्र्ि भी 
दक्षिण भारतमदही मिलो । क्याकारण है कि कडमीर भटुनायक के ध्वनिविरोधी मन्थो 
की रक्षा नहीं सका । हुदयदपंण, ध्वनिनिणंय अवव्यही नष्ट करा दिए गए । हृदय- 
दपण तो महिमभटूकोभी नहींमिलाथा, जौ मम्मट के पहलेकेह। स्वयं मम्मट 
ने यहच्ष्टाकीदहै कि यह समज्ञमेंन आए कि उनने कन्तक ओर महिमभटुसे भी कुछ 
लिया है । जब कि उनका सप्तम उत्कास महिमभदुकी हीदेन है। क्या यह्‌ क्रम 
स्वस्थ क्रम हे । अवश्य ही करमीर में महिमभटुके व्यक्तिविवेक के द्वितीय विम्ंको 
मम्मटने दफनादियाथा। उसकीरक्षाका श्रेय दक्षिण को हीदहै। यह्‌ भी सोचने 
कीवातदहैकि अलंकारो पर सवंस्व, रत्नाकर ओौर विमशिनी में बिखरी सामम्रीको 
लेकर क्या कोई कायं करमीर मे नहीं हो सकता था, जिसे दक्षिणी आचाय अप्पयदीक्षित 
ने पूरा किया जिनकी मृलविद्या मीमांसा थी । करमीरी शेवशाख्र की शुद्धपरम्परा भी 
दक्षिण में ही रक्षित मिलती है । श्रीविद्याचक्रवर्ती, च्रिपुरारहस्य के [टीकाकार दीक्षित 
श्रोनिवासब्ुध दक्षिणकेहीरहैं। इसप्रकार परम्पराकी टषटिसे कदमौीर की अपेक्षा 
दक्षिण ही अधिक मान्य दहै । 

यहु भी एक महत्व की बात है किं अप्पयदीक्षित की परम्परा केवर दक्षिणी 
परम्परा नहींदहै। वे काशी मेभीरहेधे। अतः उनके संस्कारों में अन्तर्वेदी की 


१. हमने अपने ग्रन्थ आनन्दवधन' मे इन सब दोषों का प्रतिपादन किया है। 


~  _ षि नि ~ "= = === । ` भो 


1. 


मध्यदेलीय परम्पराके संस्कार भी मिधित हैँ । फलतः अप्पयदीक्षित के उल्लेख को 
मध्यदेश वे टेकर दक्षिण भारत तक का प्रतिनिधि माना जा सकता दै । 


उधर कदमीरी परम्परा में सर्वाधिक महच्च जयरथ को दिया जारहाहै, किन्तु 
उन्हं स्वस्व की पुस्तक बहुत ही मव्यवस्थितः रूपमे प्राप्त हूर्ईदथी। वे स्वयं लिखते 
द कि "उन्हें सिटी प्रति बहुत अन्यवस्थित है" । क्या अव्यवस्थित आधार पर कोई निणय 
च्या जा सकता है। 

यह्‌ भी ध्यान देनेकीबातदहै कि निणयसागरसंस्करण से टेकर ० रामचन्द्र द्िविदी 
जीर ० जानकी के युखमीक्षित संस्करणों तक रुग्यक्परम्पर। के किसीभी संस्करण की 
पुष्पिका में रुय्यक कानामक्यों नहींहै। अवश्य ही इन विह्ानोंको सुय्यक केनामकी 
पुष्पिका बहुत ही कम पाण्ड्रप्रतिमें मिटीदै ओर वह भी अव्यवस्थित । पूना कौ 
शारदा छ्िपि की जिन दो प्रतियोमें स्चकके नामसे पुष्पिका भिक्ती है उन दोनो में 
भी पाठभेद है। वे दोनों पुष्पिकाएें येर्है-- 

१-- समापितमिदमलंकारसवस्वमिति श्रेयः । 
करतिस्तत्र भगवद्‌ राजानकस्स्य कस्येति । 
२- सम्पूणमिदमरंकारसर्वस्वमिति श्रेयो भवतु । 
रेखकपाठकयोः । कृती -राजानकर्य्यकस्थेति । 

दवितीय पाठ्की प्रति भूजंपत्रप्रति दै ओर प्राचीनदहै। उसमे स््यककानाम 
अवद्य ही प्रतिकिपिकार ने जोडा है । एक महच्व की बात यह भी है कि प्रथम पुष्पिका 
वारी प्रति मे अकंकारस्वंस्वके सूत्रोंको अल्गसेभी लिखा गया है ओर उनको 
नाम दिया गया है 'स्द॑स्वाटंकारसूव्राणि" 1 अवश्य ही लेलक ने सवंस्व को सूत्रग्रन्थ से 
भिन्न ग्रन्थ माना है । इससे भी सूत्रग्रन्थ के (अलंकारसूत्रण नाम से प्रसिद्ध होने का संकेत 
मिलता है । एकमात्र श्ारदाल्पिकी प्रतियोँपरदही हम पूणं निभेर नहीं रह सक्ते, 
वर्योकि दक्षिण भारतमें जोप्रति्यां बनी होगी उनका मुरु भधार भी अवव्यही 
कदमीरी ल्पिकीदही पुस्तके रही होगी क्योकि कश्मीर में वना मु ग्रन्थ कदमौर की 
ल्पिमेंहीट्िखा गया होगा। 

जहां तक सहृदयलीला की पुष्पिका का सम्बन्ध टै उसमे अवद्य ही रुय्यक को 
अठक।रसर्वस्वं का प्रणेता कहा गया है परन्तु उसपे यह तो धिद्धनहींहोता करि मंख 
सवंस्व के प्रणेता नहीं हैँ । श्यक अंकारसवस्व के आधारभूत सूर्वों कै प्रणेता होने से 
अङंकारसवस्व कै प्रणेता माने ही जा सकते है वयोकि यहा अलंकारषवस्व शब्द का अथं 
है वह पूरी ग्रन्थसंहिता जो सूत्र, वृत्ति जीर उदाहरण से बनतीदै। कहाजा चुका दै 
किं वक्रोक्तिजीवित नाम केवल वृत्ति काटै, किन्तु वहु प्रयुक्त होता दै उसके काग्या- 
ककार नामक भूक कारिकाग्रन्थके लिए भी। जरह सूत्र ओर वृत्तिम मतभेद नहीं होता 
वरहा सिद्धान्त को सूव्रकारके नाम पर दही व्यवहूत किया जाता दै। 


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१. द्र प° २२४, ३८९; ४६४ । २-३. डा० द्विवेदी कौ संजीविनीभूमिका । 


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यह भी विचार करने की बात है कि पिशेकसंपादित सहदयलीला की पुष्पिका में 
रुय्यक्‌ को जो ^रुचकापरनामा' ओर अरंकारसवस्वकृत्‌" विशेषण दिए गएहै, ये स्वयं 
ग्रन्थकार ने दिए याक्पिकारने जोडेहैँ। नि्णयसागरसंस्करण तें विशेषणर हित 
पुध्पिका भी [काव्यमा० ५|। इसे स्पष्ठ है कि इसमें प्रतिकिपिकारने भी कुछ अन्तर 
कियादै। यह अन्तर पुष्पिका की प्रामाणिकता को सदेह मे डाल्देताहै। वृत्तिकार 
ने साहित्यमीमांसा ओर व्यक्तिविवेकव्याख्यान को अपनी कति कहा, उनमें भी किसी 
ग्रन्थकार का नाम नहींहै। रेसा क्यों? 


ये सव तकं अपने स्थान परदहं। इनसे जोभी सिद हो । परन्तु स्वयं ग्रन्थ के 
अनुशीक्नसे प्रतीत होता दै क्ति सूत्रकार भिन्न हँ ओर वृत्तिकार भिन्च। जो वृत्ति 
अभी प्राप्त टै वह सूत्रकार की नहीं कही जा सकती । प्रमाणार्थं 'पुनसक्तवदाभास' 
प्रकरण को रीजिए। यहु शब्दालंकार प्रकरण मे पठित है, किन्तु वृत्तिकारने इसे 
अर्थाल्कार मानादै। जव करि स्वयं वृत्तिकार, संजीविनीकार भौर सभी संस्क्ताभोंने 
अर्थाक्कारो का आरम्भ उपमा से माना है, क्योकि प्रत्येक संस्करण मे उपमा के आरम्भ 
मे अ्थालङ्धुारप्रकरणमिदम्‌' लिखा मिलता है । वृत्तिकार को यह्‌ भ्रम इसलिए हो गया 
कि सूत्रम इस अलंकार को अथंपौनस्क्त्य पर आश्रित बतलाया गया है। वस्तुतः 
सूत्रकार का कहना यहे करंप्रतीततो अथंदही होता है पुनः कथित रूपमे, किन्तु 
उसका कारण है शब्द, अतः उत्ते माना जाना चाहिए शब्दारंकार ही, जैसा क्रि उसके 
प्रवत्तक उद्धट ओर उनके अनुयायी मम्मट ने माना है । पुनरुक्तवदाभास की इस स्थिति 
पर ध्यान देने से यहु भी प्रतीत होता है करि आश्रयाश्रयिभाव ओर अन्वयव्यतिरेक के 
दन्द मे सूत्रकार अवद्य ही अन्वयन्यतिरेक पक्ष के है। आश्रयाश्रयिभाव केवल 
वृत्तिकार कापक्षहै। यदि सूत्रकार भीइस पक्षके होते तो पुनरुक्तवदाभास को 
अर्थाल्ङ्कारोंमें ही गिनते शन्दाल्कारोंमे नही, क्योकि पौनस्क्त्य का आध्रय तो 
वस्तुतः अथही है, शब्द तो उसमे कारण है । इस प्रकार तो लाटानुप्रास को भी उभया- 
कंकार मानकर किसी पृथक्‌ प्रकरण मे रखना चाहिए था क्योकि वहु उभयाधित है । 


पुनरुक्तवदाभास शाब्द को सूत्रकार ने नपुंसकलिगि में रखा है। वृत्तिकार उखका 
भाशय नहीं समन्ञ पाए) वेजो हतु देते दँ वह बहुत ही अवेज्ञानिक है। उनका 
कहना है कि इसे नएसकल्गि में इसकिए रखा है कि उससे लौकिक अलंकारो से काव्या- 
खकारो का अन्तर सिद्धहो जाए । क्या काव्यगत पदार्थो को लौकिक पदार्थोसे 
भिन्न दिखने $ लिए नपुंसक बनाते हए राम, युधिष्ठिर ओर अपने आश्रयदाता 
जयसिंह को मंख नपुंसक छ्खि सकते हँ? यह भी कोई तकं? वस्तुतः सुधकार ने 
न पद कोटष्टिमें रखकर उसके अनुसार इस शब्द को बहुव्रीहि समास के 
दारा नपुंसकिगान्त बनायादहै। एेसाहीउद्धटने भी कियादहै। उन्होने उसे पद 
का विशेषण माना है। पद शब्द नपुंसकल्गि ही है। 


( 2 ) 


सूत्रकारने ध्वनिया गुणीभूतन्यंग्य के लिए कोई सूत्र नहीं लिखा, जव कि 
पौनसर्क्त्य के अनेक सूत्र लिखि भूमिकालूपमेही । वृत्तिकार वड़ी कम्वी भूमिका रचते 
जर वह भी सभी अलंकारो को चित्रकाव्य वगंमेंरखनेके लिए । वस्तुतः वे मम्मट 
के चरमेसे भूत्रोंको देख रहे हैँ । सच यह्‌ टै कि चित्रकाव्य नाम का कोई कान्य होता 
ही नहीं । ध्वनिकारने यहीकहाहै। वे केवल ध्वनि को काव्य कहते ओर उसके 
नीचे अप्रधान व्यंग्य वाली उति कोभी काव्यकोटिमें गिनलेते है गुणीभूतव्येग्य 
नामसे। उसके बादजो उक्ति्यां वच जाती हँ उवे अकाव्य कहते ओर उनमें 
काव्य जेसी स्थिति मानते है, काव्यत्व नहीं । समी अलङ्कारो को उन्होने गुणीभूत- 
व्यंग्य वगेमें ही अन्तभ्रंत दिखाया है। सूत्रकार अवश्य ही ध्वनिकार के इस पक्ष 
को जानते होगे, इसलिए उन्होने इस प्रकार के कोर भूमिका-सूत्र नहीं लिखि 
सूत्रकार के समक्ष आनन्दवधन ओर मम्मटके मतभेद उपस्थितये। वे मम्मट से 
आनन्दवर्धन को अधिक महत्व देते रहे होगे, वयोकि उन्होने काव्यप्रकाश पर बहुत 
वड़ी टीका नहीं लखी अरजो किती उसमे भी मम्मटका खण्डन क्रिया । यहा सूत्रों 
मँ भी मम्मटके काव्यप्रकाश के साथ सिद्धान्तभेद है। इकर विरुद्ध वृत्तिकार मम्मट 
के हौ भक्त प्रतीत होते हैँ । ८३ तथार्यवें सूत्रों कामुलरूपभी वे समञ्च नहीं पाए । 
इस प्रकार सूत्रकार अवश्य ही इस वृत्ति के रचयिता से भिन्न । 


कदाचित्‌ इसीलिए अप्पयदीक्षित ने वृत्ति को स्थ्यक के नाम से प्रस्तुत नहीं किया। 
पण्डितराज जगन्नाथ "अलङ्कारसवस्व' की अपेक्षा ^रुग्यक' या .रचक' लिखना अधिक 
सुकर समक्त, यदि उन्हें ग्रन्थकार के नाम का निश्चय होता । गोभाकर तो ग्रन्थ का 
भी नाम नहीं सेते । कदाचित्‌ उन्हँ उसमे भी संदेह था । इस प्रकार कदमीर से दक्षिण- 
भारत तक एक परम्परासंदेह कीभी दिखाई देती है। इपे सरलता क साथ र्यक 
के विरोधमे साधक प्रमाणमानाजा सकता ह । 


हमे लगता है रु्यक्‌ ने भी कोई अत्यन्त संक्षिप्त वृत्ति अपने सूतौ पर लिखी होगी 
जिक्चक मंगल पद्य निजालंकार० पाठ होगा। बादर मंते ओर विस्तृत वृत्ति 
लिली होगी भौर उसमे गुवंछंकार० के पाठान्तर के साथ रुष्यक का ही पद्य अपना 
ख्या होगा । प्रदीपकार ते काव्यप्रकाश पर नई वृत्ति छिली ही है। इधर ध्वन्यालोक 
पर भौ दीधिति नामक नई वृत्ति लिखी ग ठे। इप प्रकार भख दारा नईं वृत्ति का 
लिला जाना अस्वाभाविक नहीं । इस दिशा में मगल पद्य का "तात्प" शब्द हमारी 
सहायता करता है। संप्रति जो वृत्ति प्राप्त ठे उसमे सूत्रोंका तात्प ही नहींदै, 
उनके प्रतिपाद्यो पर विशद विवेचन भी है ओर उदाहूरणों द्वारा उनका समर्थन भी । 
यह तो वस्तुतः व्याख्या हं ॥ जिस वृत्ति मे तात्पथंमात्र दिया गया होगा उसेथातो 
मंल ने भपनी वृत्ति मँ अन्तभत कर छलिया होगा या उसका प्रचार मं कौ वृत्ति के बाद 


| 
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(९१४ , 


समाप्त हौ गया होगा । जयरथ को मिलो प्रतिमे कुछ अंश स्य्यक की वृत्तिका ओर 
कुछ अंश मंख का मिला होगा, क्योकि उनकी मुल प्रति अत्यन्त अव्यवस्थित थी। 

दस प्रकार संप्रति प्राप्त वृत्िके रचयिता मंखही दै मौर सूत्र कै रचयिता 
उनके गुरु रुय्यक् । त्रिवेन्द्रम्‌ संस्करण में भीरसूव्रों को अलकारसूत्र' ही कहा गया 
है ओर उनका रस्चयिता स्यककोही बतलाया गया है। तृच्यनुप्रास के उदाहरण 
आटोपेन पटीयसा ०' पद्य के पूवं इसीक्ए मदीये प्रीकण्ठचरिते" पाठ त्रिवेनद्रम्‌ की प्रति 
मे मिल्तादहै। इसीलिए मंख की कृति श्रीकण्ठ्चरित के ओौरभी ४पद्य वृत्तिम 
उद्धृत है। श्रीकण्ठस्तव के जो पद्य पुनरुक्तवदाभास मे उदाहूत है उनके पह भी 
मदीये श्रीकण्डस्तवे' यह्‌ अवतरणिका इस संस्करण मं है । संभवतः श्नीकण्डस्तव भी स्वयं 
मख की कृति रही हो। 

शिष्य ओर गुरु दोनों मिलकर कोई एक ग्रन्थ लिखते तो लेखक केरूपमें 
नाम गुरु काही चलता दै। पाणिनि का तद्विषयता का सिद्धान्त इसके लिए प्रमाण 
दै । डं ° इ्यामसुन्दरदास ओर आचाय पद्यनारायण जी ने मिककर भाषारहुस्य लिखा, 
किन्तु नाम ङ० श्यामसुन्दरदासजीकाही चल रहाहै। हमने स्वयं कालिदास- 
राब्दानुक्रम ॐं० वासुदेवशरणजी अग्रवाल के निदेशमें बनाया तो उसकी प्रसिद्धि 
अभी भौ अग्रवार जीकेही नाम सेहै। शताब्दियों तक बनते रहने वाञे भरत- 
नाघ्यशाल्न, महाभारत ओर पुराण क्या किसी एक व्यक्ति की कृति है, किन्तु प्रसिद्ध 
केवल भरत ओर व्यास के तामसे है। प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्तिः इसीकिए्‌ कहा 
गया है । इसलिए भी मंख की कृति सुग्यक के नाम स प्रसिद्धिपा सक्ती हे। 


| ७ | भरन्थकारपरस्विय 

सूजकार का परिकय- 

सूत्रकार रुय्यक को श्रीकठचरितमें मंख ते अपना गुरु ओर सभी विद्याओं रे निष्णात 
कहा ह [सगं २५] । साहित्यशासत्र रुय्यक ने अपने पिता राजानक तिलक से ही पदा था,१ 
जिनने उद्वट के कान्यकंकारसार पर विवरणं नामक कोई व्याख्या लिखी थी, जिसका उज्ञेख 
जयरथ कदं बार करते हैँ । मंख के अनुसार रुय्यक ने अनेक ग्रन्थ छ्िखिये। इनमें से 
केवर काव्य प्रकारासंकेतः तथा सह्‌दयलीलाः ही इस समय इनके नामसे प्राप्त है । 

रुय्यक रुचक नाम से भी प्रसिद्ध हैँ । सहदयलीला मे इसे इनका दूसरा नाम माना 
गया दे । चक संस्छृतशब्द है ओर श््यक देशी । रुचक का अर्थं अशरफ होता हे । 
रुय्यक के व्यक्तिगत जीवन के विषय में इससे अधिक विवरण प्राप्त नहीं होता । 


अप्राप्त ग्रन्थों मे अलंकारानुखारिणी [ १० ११८, १९२, १९२, १९९ पर 


वि. 
१-२. काव्यप्रकाशसंकेत : काव्यप्रकाश के डं ° रामचन्द्र द्विवेदी कृत अंग्रेजी अनुवाद 
106 20616 [हा भाग-२ परिशिष्ट में पुनः प्रकाशित । 
३. काव्यमाला ग्रन्थमाला में गुच्छक-५ तथा इसी ग्रन्थ परिशि० १ में। 


( १६ ) 


विमहिनी में उदुधृत | जह्लण के सोमपाठविलास की टीका मानी जाती है । रत्नकण्ठने 
स्तुतिकुसुमान्जलि की टीका मेँ इसे स्यक की कृति कहा है । 

अरकारमन्जरी ( वृत्ति में प° ३७ ) तथा अलकारवातिक" (विम० मेँ प° २३८) 
भी सवंस्वकार की कृति मने गए हैँ । दोनों अप्राप्त हैँ । पता नहीं यह्‌ सूत्रकार की 
कृति हया वृत्तिकार की। 
चरु्तिकार का परिचिय- 

वृत्तिकार मंख (१) मंख (२) मंखक तथा (३) मंलुक नाम से पुक्रारे जाति 
दँ । अपने श्रीकण्ठचरित में इन्हूनि स्वयं को मंखक ( ३।६३, ७२, ७८, २५ सर्गं ) 
अधिक वार ओर यत्र तत्र संख ( २५।११२,१५२ } भी कहा है । मंघुक नाम॒ कदाचित्‌ 
दक्षिण के मृदुताप्रिय उच्चारण की देन दहै, क्योकि यह सिमृद्रवन्ध' की दीकामेंही 
मिलतादहै। 

श्रीकण्ठचरित, के अनुसार ये ख्यक के शिष्य तथा कदमीरनरेश जयसिंह के आधित 
धे । राजतरंगिणी' इन्द जयसिंह का सान्धिविग्रहिक भी कहती है । जयसिंह का समय 
ई० सं° ११२८-११४८ है, अतः मंख ओर रय्यक दोनों का समथ १२ वींश्चती सिद्ध 
होता दै । 

गृद्धा, भद्ध ओर लकार ( टंकक ) इनक्रे बडे भाई थे। पिता थे श्रीविरवावर््त' 
तथा पितामह श्रीमन्मथ~। सभी परम विद्वान्‌ थे। 


कृतियां-- 
मल की कृतियो में श्रीकण्डचरित २५ सर्गोकाएकर प्रातिभ महाकाव्य है जो काव्य- 
मालासेठप चुका है । व्यक्तिविवेकभ्याख्यान ( विमशिनी में प° ३५ पर उद्धृत ) 


का तीसरा संस्करण हमारे हिन्दी अनुवाद के साथ १९६४ चौलम्भासे छप चुका 
ठं । इघकं पहले भी यह्‌ चौखम्भा तथा व्रिवेद्धम्‌ से छपा था । साहित्यमीमांसाः, 


नाटकमरमासा बरती, हष॑चरितवात्तिक ^ अन्य ग्रन्थ ह जो अप्राप्य है । 

१. श्रीकण्ठचरित ३।६६ तथा सगं २५। 

२. सन्धिविग्रहिको मंखकाख्योऽलंकारसोदरः । 

स मठस्याभवत्‌ प्रष्ठः श्रीकण्छस्य प्रतिष्ठया ॥८।३३५४ राज ० । 

३.५. श्रीकण्ठचरित सगं-३, सभी भ्यो में मं ने अलंकार की वड़ी प्ररंसाकी है । 

६. त्रिवेन्द्रमूसंस्कृतय्न्थमाका सेचछपी साहित्यमीमांसा मे "अंगङेलवा० पद्य पर 
वहं विवेचन नहीं मिता जिषके ठिएु सवंस्व पृ० २०१ वह्‌ उर्किखित है, अतः 
ड° राघवन्‌ आदिदसे मंल की कृति से भिन्न मानते हँ । विमशिनी-४६७ मेंभी 
साहित्यमीर्मासा का उल्टेव है मौर व्यक्तिविवेकव्यास्यान त भी। 

७.८. व्यक्तिविवकन्याख्यान मेँ उद्धृत । 

९. व्यक्तिविवेकव्याख्यान तथा सर्वस्व में उदुधृत पृ० २०१। 


( १७ , 


त्रिवेन्द्रमसंस्करण मे धीकण्ठस्तव" कोभी मदीय ओर मंखीय कहा गया है। 
यह प्रथमवृत्तिकार रुष्यक कीभी कति हो सकतीरहै। विरुद्ध प्रमाण मिलने पर इन 
ग्रन्थो के निर्माता पर पुनविचार किया जा सकता दहै। 


मभ्मर से पर्वती- 


काव्य प्रदीपकार गोविन्द ठवकुर ओर वामन ज्ललकीकर आदिकी यह्‌ धारणा 
हैकि काव्यप्रकाशे रटेष सम्बन्धी जो शाल्रार्थं नवम उल्लास में मिता है उसमें 
खण्डन सवस्व के मत का है । वस्तुतः सवेस्व में काव्यप्रकाश की "अलङ्कारोऽथ वस्त्वेव ०' 
कारिका द्टेष प्रकरणमें उद्धृत है, साथ ही विभावना तथा संसृष्टि प्रकरण में 
मम्मट कीओर संकेत किया गया है। इस कारण मम्मट ही पूर्व॑वर्ती है । पण्डितराज 
के प्रत्यनीकालंकारसे भीसंकेत मिल्ताहै किवे सवंस्वकारको मम्मट के बाद 
का मानते हँ । 


| ५ | खीका तथा खीकाकार 


अभी तक सवस्व की तीन टीकाएँ ही प्रकाम आई हँ विमर्शिनी, समुद्रबन्धी 
तथा संजीविनी, यद्यपि इसकी ओर भी कुक टीकाएँ थीं । इनमें 


( १ ) संजीविनी- 


श्रोविद्या-चक्रवरत्ती कीटीकाहै 1 कहाजा चुका है कि इपङ़े १९९५ मे दो संस्करण 
हए हं । श्रीविद्याचक्रवत्तीं का पुरा नाम श्रीविद्याचक्रवर्ती ही है। ध्ीचक्रवर्ती ने स्वयं 
को महान्‌ विद्वान्‌, साधक भौर हासेल नरेश वल्लाल-३ का सभापण्डित कहा है । 
वट्लाल-३ का राज्यकाल १२९१-१३४२ ई० है । अतः श्रीचक्रवरत्ती १४बीं शती 
के मध्यवर्ती सिद्ध होते है । श्रीचक्रवर्ती ने प्रत्येक अलङ्कार पर अन्त मे संग्रहुकारिका 
भी बनाई है । ये निष्टृष्टाथंकारिका' नाम से अक्ग भी संगृहीत मिरुती है । 
(२) समुद्रवबन्धी- 

समूद्रबन्ध केरल प्रदेश के यदुवंशी महाराज रविवर्मा के खभाषण्डित थे। रविवर्मा 
का समय १२६५ ई० है । अततः श्री समुद्रनन्ध को १३वीं शती कै उत्तराधं कामाना 
जाता हे । ये उत्तम कवि थे । अपनी टीका, जिसका नाम कदाचित्‌ विवरण है, के आरम्भ 
मे इन्ोने जो मंगल पद्य दिए है उनसे लगता है कि इन्हे अभिव्यक्ति कौ उत्तम सूक्ष्मता, 
उत्तम सटीकता ओर उत्तम प्राल्जलता कगभग श्िग भूपाल के ही समान प्राप्त थी । 
(३) अटक-- 

रत्नकण्ठ ने स्तुतिकुसुमांजलि की टीका मे स्वस्व के टीकाकारके रूप मे अलकभदटु 
का भी उत्लेल क्रिया है । यहु टीका प्राप्त नहीं होती अतः इसके रचयिता अलक के 
परिचय के विषयमे इतनाही कहा जा सक्तादहै करिये काव्यप्रकाश के दशम 

२अ० भू 


॥ ‰.. 


उल्लास के पूरतिकर्तां अलक से भिन्न है, क्योकि इन्होने काव्यप्रकाश्च पर टीका लिखने 
वा रुय्यक के इस ग्रन्थ पर टीका छ्खीहै। 
(४ ) विमरिनी- 

इसके रचयिता जयरथ दहैँ। विमशिनी के अन्तमं जयरथ ने अपना संक्षिप्त 
परिचय दिया है। ये सतीसर के समीपवर्ती कदमीरतरेश राजराज के मन्त्री श्युद्धार 
के पृत्रथे। श्युगार का पूरा नाम श्ुंगाररथ था । श्रीतन््राछोक की स्वरचित टीका के 
अन्त में जयरथ ने अपनी वंशावली इस प्रकार दी है- 

=पुणंमनोरथ [ ९३० ई० के कदमीरनरेश यशस्कर के मन्त्री | 

२-उत्पलरथः प्रथम 

३-प्रकाडरथः 

४-सुयरथः [ भाई धमंरथ, उत्तमरथ, मनोरथ | 

*५-उत्पलरथ” द्वितीय [ भाई अमृतरथ अन्य दो भाई अनु्ञिखितनामा, 

१०२८-१०६३ ई० तक के करमीरनरेश अनन्त के आचित | 

६-सम्मरथः | भाई शिवरथ, शक्ररथ, नन्दिरथ, इनमें से शिवरथ विरक्त हुए | 

७-गुणरथ* | भाई देवरथ | 

८- राजानक गुङ्गरथ- | भाई लद्धुरथ पत्नी सत्वदाी | 

९-्णृद्धाररथ [शृङ्गार के जन्मकेवादगुँगरथका शरीर यौवनम ही द्ूट गया] 

१०-जयरथः?- |[ भाई जयद्रथ | 

राजतरगिणी में प्राप्त करमीरी राजाओं की सुची मे राजराज नाम का कोई राजा 
नहीं मिक्ता, अतः विद्वानों ते उसे राजदेव नामक राजा से अभिन्न माना है, जिसका 
समय १२०३-१२२६ ई० है। उधर जयरथने पृथिवीराजविजय का | प० २११ | 
उल्लेख किया है जो ११९३ ई० में दिवंगत अन्तिम भारतीय हिन्दू सम्राट्‌ पृथिवीराज 
पर लिखा गया संस्कत महाकाग्य है । फलतः जयथ का समय २वीं शती के अन्त 
से लेकर १३वींशतीके मध्य तक स्थिर होता है। 


१. तन्त्रालोक आर्कं ३७ उपसंहार--5 
२-३. वही पद्य ९, 

वही पद्य १०, 

वही पद्य ११, 

वही पद्य १९. 

वही पद्य २६३, 

वही पद्य २५, ३६, 

वही पद्य २६, 

१०. वही पद्य ३८, 


० 9 = ~ ^= 


( १६ ) 


जयरथ के विद्यागुरुथे श्री शंखधर [ तन्त्रालोक प्रथमाह्लिक अन्तिम पद्य | तथा 
ध्रीसंगरथ ' ओर दीक्षागुर श्री सुभटरल, जो" त्रिभ्रुवनदत्त के पुत्र तथा श्री विशवदत्त के 
पौत्र थे । सुभटरत्न इनके पिता श्रीष्युङ्काररथ केभी दीक्षागुरु" थे । जयरथ ने बहत 
कुछ अपने पिता से पठा था । शेवागम, रमदरेन तथा कुलदर्शन के ये अद्वितीय विषान्‌ 
ओर विशेषज्ञ थे, अन्य शाच््ो में तो निष्णातये ही । इन्होने अभिनवगुप्त के आकरग्रन्थ 
श्री तन्त्रालोक की व्याख्या लिखी है ओर अन्त में अपने परिचय में लिखा है- ` 
“पदे वाक्ये माने निखिरुशिवश्चाखोपनिषदि 
प्रतिष्ठां यातोऽहं यदपि निरवद्यं जयरथः। 
तथाप्यस्यामङ्ग क्वचन सुवि नास्ति त्रिकटशि, 
क्रमार्थ वा मत्तः सपदि कुशकः करिचदपरः ॥?° 
यद्यपि जयरथ, व्याकरण, मीमांसा ओर तकंशास्र के साथ संपूणं शेवशाखर से 
प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुका हू तथापि त्रिकट ओर करमदशेन में मृज्ञ से अधिक कुशल प्री 
पृथिवी मे कोई नहीं दहै ।' क्या ही प्रगाढ आत्मविश्वास प्रकट किया हि इस विद्वान्‌ ने 
अपने वेदप्य के प्रति । कभी कभी यह घातक भी बन जाता है । विद्वानों की राय है कि 
तन्त्रालोक की व्याख्यामें भी जयरथ ने अनेक स्थानों पर परौहिवादसे काम लिया है 
ओर मुलविरुदध निष्कषं निकाले हैं । विमश्िनीमेभीवे इसी प्रकार कहीं से कहीं पर्ुचते 
दिलाई देते हँ । किन्तु इसमे संदेह नहीं कि जयरथ एक महान्‌ विद्वान्‌ ओर परिश्रमो 
लेखक हैँ । 
जयरथ की दरूसरी आलंकारिकं कृति है अल्कासेद्‌ाहरण । इसका पाण्डुरनय पूना 
मे सुरक्षित है ओर उसके आधार पर इघका विवरण डां ० रामचन्धर हविवेरी ने अरुंकार- 
मीमांसा में प्रस्तुत करदियाहै। इस विवरणसे स्पष्टदहै करि जयरथ ते सवंस्वकार 
ओर शोभाकर के ्षगडे को निपटाते-निपटाते ठीक उसी प्रकार स्वयं भो एक अलकार- 
रास्रीय ग्रन्थ लिख डाला जिस प्रकार काव्यप्रकादाकी टीका लिखते-किखते रुय्यक्‌ ने 
अकुंकारमूत्र, विश्वनाथ ने साहित्यदपेण ओर पण्डितराज ने रसगंगाधर । जयरथ ते इख 
ग्रन्थ मं शोभाकर के अनेक अलंकार स्वीकारकर ल्एि है क्रियातिपत्ति, ।वितकं, 
विपयय, उदाहरण, निडचय, आदर, श््कला, प्रसंग, समता, तुल्य, वेधम्यं, परभाग, 
उद्रेक, विधि, प्रतिप्रसव, तन्त्र, प्रत्यूह, विवेक--इनमे उत्लेखनीय हैं । कुछ अलंकासें 
की कल्पना जयरथ ने स्वयं कौ है । तात्पथं, अंग, अनंग, अप्रत्यनीक, अभ्यास, अभीष्ठ, 
एसे हीदं, 
विमशिनी का पूणं नाम अलकारविमशिनी है । इसे टीका न कहकर भाष्य कहना 
चाहिए । सैकड़ों नवीन ललित ओर उपयुक्त काव्य-पयो को उद्धृत करते हृए ग्रन्थ कै 


१. तन्त्रालोक ३७ आल्लिक के अन्त के परिचयपद्य-४१ 
२-३. वही पद्य ३५ 
४. वही पद्य ४७ 


[र 


( २० ) 


संकेताव्मना निर्दिष्ट अंशो को सोदाहरणं विशद करना कम प्ररिश्रम का कं यं नहींदटे। 
विमश्चिनीकार इस दृष्टि से एक आद्चय॑कारिणी मेधा के धनी ह । ग्रन्थ के उदाहरण मे 
जहां न्ट अक्षमता दिखाई देती है वे तुरन्त अपनी ओर से कोई उदाहरण पद्य उपस्थित 
कर देते ह । उन्हें साहित्य संप्रदाय का ज्ञान है, अतः वे मम्मट पर किए कटाक्षो को 
समद्चते ओर स्पष्ठीकरण के किए मम्मट कानाम्‌ प्रस्तुत करते है। विपश्शिनीकार को 
अपने व्याख्येय मूलग्रन्थ के प्रति आदरवृद्धि हे [ अतिशयोक्ति २२४-५ | वे उसे प्रतिपक्ष 
क आक्रमर्णो से बचाते ओर अपने तकौ से प्रतिपक्ष का उत्तर देने मे पूरे संरम्भके साथ 
जुट्ते टं। 
विम्चिनी का चिन्तन ही वह्‌ मूल दै जिसे अप्पयदीक्षित को चित्रमीमांसा ओर 
कुवल्यानन्द लिखने कीप्रेरणा ओर उ्योवि दोनों. मिटी तथा पण्डितराज जगन्नाथ को 
अपना अति प्रौढ, रसगंगाधर । ये दोनों महान्‌ विद्टान्‌ सवस्व, विमर्शिनी ओर रत्नाकर 
को पदे-पदे उदरुधृत करते चके द| 
साहित्यशास्र बडा भाग्यशाली शासन दै जिसे इतने बडे विद्रानो ने अपनी चतुरस 
विता के निमंक चतुष्पथ पर चहूंओोर दृष्ट ललाकर अवधानपूरव॑क बडे परिश्रम से सचा । 
उद्धट, वामन, आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त, कन्तक, महिमभट्र भोज, मम्मट, रुध्यक 
दोभाकर, जयरथ, अप्पयदीक्षित, पण्डितराज जगन्नाथ- सभी शास्त्र के अप्रतिम विद्वान्‌ 
ये । विदव के अन्य किसी वाट्मय मे काव्यशास् को कदाचित्‌ ही इतने बडे विद्वानों का 
इतनी बडी संख्या में इतने लम्बे समय तक्र योगदान प्राप्त हुजा होगा ) 
विमश्चिनी रेसी प्रासादिक रचना हे कि अकेटी यही अभ्यस्त हो जाए तो पाठक 
चतुर पाण्डित्य का धनी बन सकता हे । इसमे मआएु गम्भीर विवेचन यहाँ उद्धरण कौ 
अपेक्षा नहीं रखते । जहां कही पुस्तक खोटी जाएगी यह्‌ विशेषता प्रकट हो जाएगी । 
अलंकारविमश्शिनी मे जयरथ ने अलंकारभाष्य [ ११८, १५३ | ओर अलंकारसार, 
| २६१, ७३७ ] नामक णेस दो ग्रन्थों कोभी उद्धृत किया है जिनमें अलंकारो 
का ओर भी विशद विवेचन धा, किन्तु जो इस समय प्राप्त नहीं है । इनके अतिरिक्त 
कुछ एेसी कारिकां भी उद्धृत की दै ।¶० २ र| जो ध्वनिविरोधी तथ्य प्रस्तुत करती दह । 
ये जिन ग्रन्थो की है वे अवद्य ही अतीव महत्व के ग्रन्थ रहे । दुर्भाग्यदैकि हमारे 
पूर्वजो ने, विशेषतः ध्वनिवादी आचार्य ओर उनके अनुयायियों ने अपने विरोध को 
पनपने नहींदिया। जो उदारतावादी 7 उन्दरँ मर्यादावादी चिन्तको नै उत्पथगामी माना 
ओर अपने श्रद्धेय के विरुद आदर देना उचित नहीं समस्चा । 
अस्य सीका-- 
जयरथ ने अन्यैः" [ १० ६०३ ] कहकर किसी बदरणीय या मन्व किन्हीं 
सम्मान्य विद्रानों की ओर भी संकेत किया दहे । अवश्य ही जयरथ के समय तक वे सवस्व 
पर अनेक कार्यंहो चुक्रे होगे । | 


(. २१ ) 


हमार! संस्करण 

हमारा यह संस्करण मुख्यतः निणयसागरोय संस्करण पर भात है! हमने 
इसमे मूर सवंस्व | सूत्र तथा वृत्ति ] तथा उसकी टीका विमशिनी दोनो का हिन्दी 
अनुवाद भीक्रियाहै। मूल का हिन्दी अनुबाद ड० रामचन्द्र दिवेदी भी कर चूके 
ये, किन्तु विमशिनी का अनुवाद अभी तक नही हृंजाधा। टीका का अनुवाद मुल 
के अनुवाद के बिना आधारहीन प्रतीत होता अतः हमने मूक का भी हिन्दी अनुवाद 
करना आवश्यक समज्ञा । यह्‌ भी सरल कायं न था । अनेक स्थलों मे संदिग्बता थी 1 
हमने वहां पं० रामचन्द्र द्विवेदी का अनुवाद देखा । उससे कहीं हमें सहायता मिली, 


कहीं उनके संदेह दूर हृए । 


अनुवाद के पहले विषय के अनुसार मूलपाठे का निर्धारण आवश्यक था । हमने 
यथासाध्य वह्‌ किया दहै ओर पाठक यहु जानकर प्रसत्त होगे कि उक्त पाचों संस्करणों 
मे जो संशोधन द्ूट गये थे उन्हे हमने च्टने नहीं दिया है । उदाहुरणाथं चौथे सूत्रको 
लीजिए । इसे निर्णयसागरीय, त्रिवेन्द्रमीय ओौर वाराणसेय संस्करणों में वृत्तिरूप मे छापा 
गयाथा। १९६५ कै दोनों नए संस्करणोंमें भी बह वृत्तिल्पमें ही छपा रहं गया । 
हमने उसे सूत्र रूपमे ही छपवाया है, जब कि संजीविनी ने भी इसे सूत्र .ही साना । 
ग्रन्थसंगति भी उसके विना संभव न थी। ५ तथा ६ सूरो मे शब्दपौनरुक्तय के प्रथम 
मेद की चर्चा है। यदि उक्त सूत्रकोसूत्रनमानाजाएु तो श्रथम' का अथं नहीं लगाया 
जा सकेगा । इसी प्रकार पर्यायालंकार के लिए निणंयसागर तथा मोतीलालबनारसी- 
दास दोनोंके संस्करणोंमे दो-दो सूत्र छपे 1 वस्तुतः उनमे से द्वितीय सूत्र, सूत्र 
नहीं, वृत्ति दै । हमने उसे वृत्तिरूप मेही छपवाया हे। उसे डं राघवन्‌ ने 
भी वृत्तिही मानाहै, किन्तु चतुथं सूत्रको भी वृत्ति मान ङ्न से उनकी सूत्र संख्या 
दही रहगर्ईटै। ० द्विवेदी के संस्करण में सत्र संख्या ८७ ही है,जो सही हे, 
किन्तु वह संख्या पर्यय के लिए दो सूत्र मानने से आई है । अपने संस्करण मे हमने 
ट्स ठीक कर दिया है। निणंयसागरीय संस्करणमे व्याघात के द्वितीय सूत्र के 
अगे व्याघातः सूत्रम हीचषा हु है। वस्तुतः वह वृत्ति है ओर उसके आगे 
अनुवृत्तिसूचक “इत्येव' अन्य संस्करणों म प्राप्त है। हमने उसे वृत्तिहीमानाहे। 
सारालकार के सूत्र में सार के स्थान पर उदार पाठ निणंयसागरीय संस्करण 
मे छपा हुआ दै। पाठान्तरमे वहांखार हीपाठथा। अन्य संस्करणों के ही समान 
हमने भी इसे सारदहीमानादै। 
यत्ति में भी पर्याप्त संशोधन करना पड़ा हे। निम्नलिखित तालिका से संशोधन 

का आभास मिल सकेग।-- 

पष्ठ निणेयसागर संस्करण प्रस्तुत संस्करण पृष्ठ 
८ द्विविधमपि | त्रिविधमपि ६ 

९ प्राधान्यं च काव्यस्य प्राधान्यं च [काव्यस्य] २१ 


पृष्ठ निणेयसागर संस्करण 
१३ स्वरूपेण विदितत्वात्‌ 
११५ क्िद्धितया 
१९ शब्दस्याप्रतीता° 
इहेति शब्दप्रस्तावे 
२४ श्लब्दपीनस्क्त्यं--इत्यादि वृत्ति 
इति ट्ैविध्यमेव स्वरव्यन्जनसमुदायपौन सत्यं च 


२८: त्रूमः-इत्यवेहि अत्राउजपत्रनयने नयने निमील्येव्यादो ब्रमः-इत्यवे-इत्यादौ ७१ 


४२ आतुरस्य 
६० यदत्र वस्तुतस्तद्रूपतायाः 
६१ पुथुरुरसि 


७५ इत्यादावुदाहू तस्य 
८० लोक्यमानास्ता 
2८ अत्र चातिश्या 
९१ ०विवत्तित्वादु° 
९४ वस्तुतः शाब्दस्य 
१०६ भावोऽलोभनत्वम्‌ 


„, च तदन्यनिवृत्ती 
१०९ ततरच 
„ भावात्‌ त्रिधा 


नायकनायिकाख्यधमंविशिषयोः 
११० केशपाशालिवृन्देव 

१११ लिव किल 

११६ व्यापारविषयतो 

११७ नायकत्वं स्वरूपेण 

१३४ कि मामाल्प 

१४८ सातिदायात्‌ कोपजनकत्वादिः 
१७६ श्रीहुष प्रस्थापने 

२२३ अभिमानेन सा योक्तिर्ञान 


प्रस्तुत संस्करण पृष्ठ 
स्वरूपेण विचार्यत्वा २७ 
लिगतया 4 
राठ्दस्य प्रतीतो ४४ 
इहशब्दः प्रस्थाने ४४ 
'राब्दपौनस्वत्यं सूत्र ६० 
इति द विध्यमेव । ६० 
आतरस्य १२३६ 
यत्र वस्तुत० १५८ 
गुरवंचसि पृशथरुरसि १५९ 
इत्यत्रोदहूते १९७ 
लोप्यमानानज्ञा २०६ 
अतरचा ९९ 
निव वितत्वादु २४३ 
व स्तुशब्दस्य २५१५ 
भावः शोभन ३०६ 
चान्यनिवृत्तौ २०६ 
तच्च २१५९ 
भवत्‌ त्रिधा ३१५ 
नायकताख्यधसंविशिषयोः ३१५ 
केशपाशालिवृन्देन ३१७ 
विचिकल ३१७ 


व्यापारवि षयीक्रतो २२८ 
नायकः स्वस्वरूपेण 


किमां नाल्प 2; 
सातिशयो मरणशङ्कोप० ४३० 
श्रीहूर्षाप्रस्थाने ५१८ 


अभिमाने चसा योज्या ६७४ 


प्रायः यही स्थिति विमशिनीकी रहीदहै। उसमे भी पर्याप्त संशोधन करना 


पड़ा । इसके भो कुछ स्थल-- 
प० पृष्ठ निणंयसागर 
नीचेमे ५ २ विमर्षिणीकारः 


प्रस्तुत संस्करण पष्ठ 


> > 


पं० पृष्ठ 
नीचेसे१ २ 

द. १४ 

१० १४ 

३ २१ 

२ २३ 

७ 2) 

नीचेसे १ + 

२२ 

नीचेसे १० ३६ 

' ऋ 

३२ ४२ 

१० ४४ 

१६ . +, 

-६ ५६ 

द नए 

६ ५९ 

३ ६१ 

नीचेसे १ ६३ 

१. £&७ 

नीचेसे ए ,, 
# ‰ ` "४ 

र 29 

नीचे से १.4 
4) ८ )) 


(५, 


निणंयसागर 
तात्पयमुच्छत इति । अस्या- 
भिप्रायः-तथा च 


इत्युपचारवक्रतादीनां 


त्रिविधस्तथापि तेन ०० 
मुख्यत्वेन 

कार्याथने 
उपमितार्थादिवादि 
तथात्वानुपपत्तेः 
वारण-रणरणिका० 
तत्साहश्यत्व 
उपमानत्वेनोपात्ता 
कल्पितेनेव 
स्मतुदशायामनीतत्वाकत° 


युक्तम्‌ 

अपद्ूवे 

भ्रान्तिसद्धाव 

सारर्यनि मित्त 
स्वातन्त्येण 
विभावस्य 
नापहतेहि 

चन्द्रादेवृं्यभावो 
नयनुद 
लक्ष्मीसीन्दर्या 
स्फुटत्वे तत्कान्ता 
° विशेषात्तत्सामान्यतर्कोऽपि 


पक्षान्तर-सं स्पशं 


प्रस्तुत संस्करण पृष्ठ 
१तात्पयमूच्यत 
इत्यस्या-भिप्रायः । 

तथा च २ 
इत्युपचारवक्रता आदि- 

पदेन क्रिया-वक्रता- 

दीनां २३ 
त्रिविधस्तथापि [तेन ००] 
मुख्यत्वेन ३२ 
कायाथेन १५२ 
उपमितार्थादिवाचि. ५६ 
तथात्वोपपत्तेः 9 
वारण-रण-रणरणिका ५८ 
सहरत्व 2९ 
उपमानत्वेन नोपा ९२ 
कल्पितेन तेनेव १०० 
स्मत्रदरायमतीतत्वात्‌ 

कतं ` ११० | 
युक्तत्वम्‌ ११६ 
अनपद्ुवे ११८ 
श्रान्तिमिच्छब्द १५९ 
साहरयनिमित्तकत्वमेव १५३ 
आखण्ञ्येन १६१ 
विभागस्य ‰ 
अपहतेहि १७१ 
चन्द्रादेवृच्यभावाद्‌ १७१५ 
ननु यद १७८ 
लक्ष्मीसीदर्या १७९ 
स्फुटं त्वेतत्कान्ता १७९ 
०विशेषात्‌सं रायप्रकार- 

स्तक १८४ 
पक्षान्तरासंस्पशं ११८४ 


( २४ ) 


# 1 
~ क ॥ मटक क 


नीचेसे पं० पृष्ठ निणंयसागर संस्करण प्रस्तुत संस्करण पृष्ठ 
"£ # संशयो ह्य ति्यितोभया ° संरायो ह्यनियतोभया क 
१३ ६९ निमित्तसामर्थ्यात्‌ निमित्तं तत्सा ° १८६ 
0, विषयप्रतीतेः विषयिप्रतीतेः ५ 
५ -8 विषये प्रतीति विषयिप्रती° )) 
१२ ७० विषय दार्घ्येन विषय दार्घ्येन # 
नीचेसे ३ ८६ लडहत्वादीनामित्यादि- लडहत्वा दीनामिति । 
शब्दाद्िवत्तनोच्छाया एव आदिशब्दाद्‌ वत्तनच्छाया 
॥५। २२७ 
क ०नाथंमिति । एतत्प्र° ०नाधंमित्येततप्र° , 
४ 4 प्रस्तुतस्य विनान्येन प्रस्तुतस्य तु नान्येन २४४ 
५ ९५ विरोषाभिदित््या 
पाठान्तर-विह्ेषानभिधित्स्या विशेषाभिधित्सया २५६ 
ष ९4 पाठान्तरवक्तृप्रतिवक्त्रोः वक्तृ प्रतिपत्त्रोः २५७ 
वक्तृप्रतिपत्योः 
ष. ६ तस्यापीति तस्यापीति | सामान्य- 
| धमंस्यापीत्यथः | २६४ 
नीचेसे ३ रल प्रतिपाद्येन, प्रतिपाद्य तेन प्रातिपयेन २७१ 
( पाठान्तर ) 
४-५ १०४ कार्यकारणयोः प्रति नियमस्य कायकारणयोः प्रति- 
विपयंयस्तुल्यकालत्वादिनोक्तेः नियमस्य क्रमस्य 
( अथ च कायंकारणवत्प्रति- विपयंयस्तुल्यकाल- 
नियमस्य क्रमस्य विपयंयस्तु- त्वादिनोक्तः । २९९ 
ल्यकाटत्वादिनोक्तः । 
६ , तत्रेति निर्धारणे । अस्यामनु० तत्रेति निर्धारणे । 
| कायकारणप्रतिनियम- 
विपयंयरूपेति | अस्यामनु २९९ 
१२ ,;, विशेषणपरिहारेण विशेषपरिहारेण ३०२ 
नीचेसे ८ ११२ समासोक्तावुपमायां समासोक्तायामूपमायां ३२० 
१२६९ उत्थापनमिति उत्थानमिति ३६१ 
, , दुबंखत्वादा ( भावान्नान्य }) दुवंटत्वादा- 
वाध्यत्व° वाध्यत्व9 ३६१ 
„ ततु सर्वंजनविरुद्ध° तत्‌ स्ववचनविषशद० ३६२ 


( २९ ) 


पं० पष्ठ निणंयसागर संस्करण प्रस्तुत संस्करण पृष्ट 
नीचेसे ५ १२७ वाधोत्पत्तावपि नाधोत्पत्तिः, अ।पतु ३६७ 
नीचेसे ४ , पडचादुविरोधधीः परचादवि रोधधीः 
५ १२९ असम्बद्धत्वा° सम्बद्धत्वा० ३७२ 
नीचेसे २ , नायिकाडशशिनोः नायिकानिशयोः ५ 
४ १३१ साहश्यपयवसायापह्भुव साहद्यापयंवसाय्यपल्ुव 
नीचेसे ३ , व्याजोक्तौ चत्वारः प्रकारा व्याजोक्तौ चोत्तरः 
विद्यन्ते प्रकारो विद्यते ३७४ 
नीचेसे २ १३४ अप्रस्तुतात्‌ कारणात्‌ प्रस्तुतस्य अप्रस्तुतात्‌ कार्यातु 
कायस्य प्रस्तुतस्य कारणस्य ३८५ 
२ १३५ कायं प्रस्तुते कारणस्या९ कारणे प्रस्तुते कायस्य ३८६ 
१-२ १३७ सारूप्येण साधर्म्योदाह्‌- साधर्म्येण सारूप्यो- 
रणानां दाहूरण।नां ९ 
२ , वाक्येनेति निरिचनुमः वाक्येन [ अतिदेश | 
इति निरिचनुमः ३८९ 
नीचेसे २ १४० संपद्धरण संपद्वरण ४०९१ 
८5 १४९ निषेधस्येव भाषनात्‌ निषेधस्यावभासनात्‌ ४३५ 
३ १७६ तत्र रूपाय विशेषविवक्षा तत्र पुनरुपायविशेष ५१९ 
७ , प्रस्थापन प्रस्थान ५९९ 
नीचेसे १ ,, विभावादीनां विभावनादीनां ५२१५ 
९ १७७ कारणमारानां कारणानां ५२५ 
४ १८१ आधिक्यमुक्तम्‌ आधिक्यमिति 
वधमानमुक्तम्‌ 
६९ ,, तस्मादस्मिश्च वधमाने तस्माद्‌-अस्मिस्च 
सारोपान्तर्भावमेति न पुनरिदमन्त- वधमाने सारोऽन्नभाव- 
भूतं सारे परिमितविषये महाविषय मेति न पूनरिदमन्त- 
मित्यायक्तमेवोक्तम्‌ भृतं सारे परिमितविषये 
५ महाविषयमित्या- 
ययुक्तमेवौक्तम्‌ ५३१ 
१ १८२ हक्त्वाभासेव क्‌ स्वाभासेव ५.४० 
नीचेसे ६ १८२ तच्छन्दस्यापि तच्छाब्दस्यापि १४० 
नौचेसे १ १८३ वैचित्यावहत्वाच्छन्दस्यापि वे चित्यावहत्वाच्छा- 
| ब्दस्यापि ५४१ 


छ १८६४ त्रिरूपस्य साध्यस्य नरिरूपस्य साधनस्य ५५२ 


प० पृषु 
३ १८६ 
पि १ 
१९१ 
नीचेसे १ १९१ 
द. ६९ 
२-३ १९३ 
२ १९५ 
1 9) 
४ २००५ 
२०४ 
२०६ 
२९ २९०८ 
४ २११ 
*¶. (३ 
नीचे से ३-१ २१४ 
नीचेसे ४ २१९ 
नीचेये २ „+, 
९. ~ 40 
तीचेसे ६ 
नोीचेसे ५ २२९१ 
क, ^ -4 


( २६ ) 


निणंयसागर संस्करण प्रस्तुत संस्करण पृ 
समथतया समथ्यतया ५५३ 
मृतेर्दारात्मजा० मतेर्दारात्मजा० ५५८ 
सुचितं तस्येव समुचितम्‌ । तस्यैव ५६७ 
रब्दोपात्तदधति(?) शब्दोपात्तमेतदूभर्वति ५७२ 
तदिति नियमस्य तदिति विनिमयस्य ५७२ 
रकतासमत्वयोविम्बप्रति° मतत्वासमत्वयोबिम्बप्रति० ,, 
कविप्रतिभानिवंत्तितत्वा- कवि प्रतिभानिवेत्तितत्वा- 
भावाज्ञोको० ल्लोको 9 ५७९ 
नियमविधिः । नियमविधिः । न 

पुनरज्ञातज्ञा ° पुनरन्नातनज्ञा ° ५१ 
तेन नियमे ब्रीह्०० यित्वमेव तेन नियमे त्रीही०० 

दरनादे° यित्वमेव न, दलनादे वि 
विकल्पोऽपि न भवति विकल्पोऽपि भवति ५९४ 
तत्कथं नववयःप्रभू° तत्कथं न नववयःप्रभु० ६०३ 
निरासमानराकरणं निरायासमाननिराकरणं ६०९ 
प्रतीपाख्यमलकारद्रयं पुन. प्रतोपाख्यमलकारदयम्‌, 

न पुनः | ९१८ 

घटपटवदूभेदो न घटप्वद्‌ भेदेन ६२८ 
यत्‌ सूमनोगुणत्वे यत्‌ समानगुणत्वे र 
अननुदाह्रणीय ०, अननुदा- अननुहर०, अननुहुर०, 

हरणा ०, अतिरिक्तत्व° अतिरिक्त ० ६३८ 
लोकात्म चोलात्म ६५३ 
तस्य हि यथायोजनमा्रं लक्षणम्‌ तस्य हि अन्यथायोजं० ६५३ 
वाक्याभिधेयमानेऽथ व वक्येऽभिधीयमानोऽर्थो ६५८ 
प्रस्थानविरेषतया प्रस्थाननिषेधकतया ६५९ 
मल्याथमूपादनमिति भेदान्तरमप्य- मुख्यार्थापादनमिति भेदा- 
वसानवाच्यम्‌ न्तरमप्यस्या न वाच्यम्‌ ,, 
इह हि केचिदर्थाः कविवचसि इह हि वाच्यवाचकयोः ६७२ 


सुस्पष्ठमधिरूढाः वाच्यवाचकयोः 


१. यहां मूल में समुचितं तस्येव" एेसा ही छपा रह्‌ गया है । 
२. मुल में अतिरिक्त हीचछपगयाहै। 
३. मुरु में यथायोजनमात्रं ही छप गया है । 


नीचेसे 


नीचेसे 


नीचेसे 
नीचे से 
नीचे से 
नीचेसे 


नीचेसे 


नीचे से 


नीचे से 


+< © ४ ० 


४ २५ 


निणंयसागर संस्करणं 
भाविना 

आदरदच 

योगविदभूत ° 

प्रत्यक्षतयेव तदभावभासनं 


परमाटैतज्ञान 

जानामीति समानाधि 
सौषेषु नीतं 

स्वप्ने मोदित 
कविसमपितधमत्वं 

अ द्धभूतस्य 

तत्र नायमङ्कारः 

रत्यात्मभावः 

गणीभावात्‌ 

पुष्णन्मुरारेः 

रतेरभूत ° 

शङ्ासूयाधृतिस्मृत्यौत्सुक्य- 
दैन्यौत्सुक्यानां 

प्रकृतत्वाच्चारु° 

सामग्रादेः 

बोधन्यायेन मानस्बोधन्यायेन 


जिनाहंसमरयाँस्तथा 
व्यक्तमेवं विधीयते 
इवेक्ष्यते 

तस्मादेषां विषयत्वं 

पूवं हा राच्चारुत्वाभावाच्च 


संसृष्टिसंकथने चकिते 

रसताम्‌ 

निमित्तानि मित्तभावेन 

अङ्धत्वे पुनरेषां संकरादी- 
नामङ्धा° 


प्रस्तुत संस्करण 
भावना 
आदराच्च 

यो गिवद्भूत ° 


६७५ 


प्रत्यक्षतयेव [ प्रतीतिस्तथापि | 


तदभाव |सं| भावनं 
परमाद्रेतिन्ञान 
जानामीत्यसामा° 
सौधेषु गीतं 
स्वप्नान्तोदित 
कविसमपितधर्माणां 
अद्किभूतस्य 
तदत्र नायमलरुकारः 
रत्यात्मा भावः 
गुणीभावाभावात्‌ 
९ऽणतु पुरारेः 
रतेरद्धभूत 
शद्ध सूयाधृतिस्मृति- 
देन्योत्सुक्यानां 
प्रकृताच्चार्‌० 
सामग्रयादेः 
बोधन्यायेन [ मानसबो- 
न्यायेन | 
जिनान्‌ हेममर्याँस्तथा 
व्यक्तमेवं विधोऽपि ते 
इवेक्षिते 
तस्मादेषामविषयत्वे 
ूरवंहानाच्चारुत्वा- 
भावाच्च 
संसृषटिसंकरयुगे दलिते 
रमताम्‌ 
निमित्तनिमित्तिभावेन 
अद्धत्वे पुनरेषां 
संकरधीर्ना° 


६७१५. 
८७१ 
६.७६ 
६५७८ 
६८२ 
६८९ 
६९३ 
८९१५. 
७०२. 


७२० 
७९० 


3१... 


६ २४६ 


नीचेसे १ 


<¬) 


1) 


२७ 


4, 


५ चः । 


निणंययार संस्करण 
यमकानुप्रास्योनिमित्तनि- 
मित्तिभावः 

शब्दव दुपकार्योपका रकत्व- 
भावात्‌ 

इयमेव हि संयुष्टद्रंयो- 
दरादादिमाडिवाक्यवचनयोः 
योरपि समृद्धत्वात्‌ 


न चात्रायमाट० 

न संकरो नापि 

राक्तियोगात्‌ 

अत्र चयथा 
दावाप्ति(?)प्रदश्न 

समासां 

संकरे 
रूपकोपक्रमेणोपमानिर्वाह दृष्ट 
इति साम्यलाघवेन 

उपमाया बाधकत्वं प्रतिगम्भी 


हेतुत्वेनेव गता 

तस्या अनुत्थानात्‌ 

हतुः 

वदने 
शब्दाथवत्यलङ्कारवाक्य 


०भयालङ्कारत्वे 

व णिता 

ष्ठिः इटेषाणामेवो० 
तत्कायंमेव 


प्रस्तुत संस्करण पृष्ठ 
यमकरानुप्रा्योनं 

निमित्त ° ७२७ 
राव्दवदुपकार्यापिकारक- 
त्वाभावात्‌ ७९७ 


इयमेव हि संमृष्ियंद्दयोः ,, 
दशदाडिमादिवाक्यवदनयो ,, 
योरपि संबद्धत्वात्‌ 


22 
न चात्रोभयमन्य 
न संकरोऽन्यापि 


दादिभङद्धात्‌ ५) 
अच्रचन यथा ७२३४ 
तावद्‌ व्याप्तिप्रदशंन० „+, 
समासानां ७३८ 
रांकरे ७४१ 


रूपको ०० वाहुः । दुष्ट 
इति साम्यस्य लछाघ० ७४९१ 
उपमाया बाधकत्वम्‌ 


अतिगण ७४१ 
हेतृत्वेनेवागता ७४३ 
तस्यानुत्थानात्‌ ७४३ 
९्त. ११ 
वचने ५9 
शब्दाथवच्यंलद्कारा 

वाक्य ७४४ 
०भयालङ्कुारत्वं ७५२ 
वणिक = 
°!षएिरिटेषाणामेव भ 
तत्करायंत्वमेव 


20 


इस ताक्कासे स्पष्टहैकरि निणंयसागरीय संस्करण में भावात्मक वक्तव्य को 
अभावात्मक, अभावात्मक को भावात्मक, भावपूणं निर्देश को द्रव्यात्पक निर्दे कितनी 
ही बार छापा गया है । न्याय के स्थान पर (कालः ओर भभरणशंकोपजनकत्वः के स्थान 
पर कोपजनकत्व' का पाठ विपर्यय दुस्समाधेय विपर्यय है । पाठान्तर भी एेसी जगह 


1 
¶ 
> ~~~ -~- "न 


` क ~ अ क 1 स ^ रररे 


( २६ ) 


नहीं मिलते । (लतासमत्व' से भतत्वासमत्व' कौ कल्पना खरल नहीं । विराम, 
विरामाभाव, अनुच्छेद, प्रघटुकपरिवत्तन ओर एेसे ही लेखधम भी कहीं-कहीं भ्रामक 
स्थिति मे मिले ओर उनको विषयसंगति के आधार पर ठीक किया गया । 
संशोधन में हमने कल्पना को सबके बादमे स्थान दिया है, पहले रत्नाकर ओर 
रसगंगाधर कै उद्धरणं को जो उद्धरण विमरिनी ने रत्नाकर से लिए हैँ उन्हे रत्नाकर 
से मिलाकर ठीक किया, यद्यपि कहीं-कहीं स्वयं रत्नाकर मेँ भी इस तुलना से 
संशोधन हुआ, ओर विमशिनीके जो उद्धरण पण्डितराजने रसगंगाधरमे दे रखें 
उन्हं रसगंगाधर से मिलाकर । मू का संशोधन भी पहले उद्धरणों के ही आधार पर 
किया हि! १०९घु० का नायकताख्यधमं पाठ रसगेगाधरसे ही लिया गयाहे। ये 
सव निर्देश विम्ल.नामक टिप्पणी मे पाठान्तर-शीषक देकर कर॒ द्यि गये हं यद्यपि 
कहीं 'पाठान्तर'-शीर्ष॑क दुट भी गया है 1 
विमश्चिनी की प्राकृत गाथाओं की संस्कृतच्छाया अपने संशोधन के साथ रत्नाकर 
सेली गहै यद्यपिएकदो स्थल विना छायाके छोडदिए गएरहै। वे समश्च मे 
नहीं आए । 
विमश्शिनी के अनुवाद मे पूवपक्ष को समने हेतु रत्नाकर के संबद्ध सभी उरण 
हमने आगे या पी प्रस्तत कर दिए हैँ ओर पूनासे छपे संस्करणकेसंदभभी दे दिए 
है । येसंदभं भी कव्निाईसे तैयार किए जा सके क्योकि कुछ उदरणरेसेदहैजो निस 
अल्कारमें दिए गए हैँ उसमें न होकर रत्नाकर में किसी अन्य अरुकारके प्रकरणमें 
रहे है । इनमें भी कुछ कारिका गद्याद्मक रूप मे छपी है, अतः उन्ह खोजना कठिन 
रहा है । 
विमशशिनी मे प्रत्यक्षाद्‌ विरलकरांगुरिप्रतीति' इत्यादि | ५४० पृ०] एेसे भी 
कुछ स्थल हैँ जिनके मूर संदभं खोजे नही जा स्के. ओर इसीलिए जिनके अथंज्ञान 
मे संदेह रह गया है । दिण्डिकारागः [ प° ५३], बाहकेलि [ १८४ प° |, वाह्याली 
[ १८४ पृ° ] भीरेसे ही शब्द है । वाह्याली का प्रयोग राजतरंगिणी में बाहरी बरामदे 
के लिए हुभा है । प्रस्तुत प्रसंग मे इसका यह अथं नहीं जमता था मतः हमने घुडसवारी 
का मैदान अर्थं किया। इसका एक प्रयोग घुडसवारी के लिएभी काव्यादशं के पूना 
संस्करण्‌ [ पु० १८ की | टिप्पणी में मिल गया । राजगंज | रेन पृ० | भीरएेाही 
शब्द है । | 
परतेक अलंकार के अन्तम हमने भामह से लेकर विश्वेश्वर तक चरी परम्परा 
उद्धूत करदीहै ओौरंप्रव्येक अलंकार का इतिहास दे व्याह दण्डी को यत्रतत्र 
ही मपनाया गया ह । कश्मीरी अलंकार परम्परा उद्धूट की परम्परा है ओर उद्भट 
भामहसेही प्रभावित दैँ। उन्होने भामह के काव्यालकार पर टीकाभी ज्खी थीं 
जिसका उल्टेव जयरथ ने असशृत्‌ किया है । उस कारण भामह को ही हमने प्राधान्य 
दिया है यद्यपि हमे यहु निश्चयहो गयाहै किं भामह दण्डीके बाद के रँ तथापि 


( ३० ) 


हो सकता है हमने भी संस्कारवशात्‌ कहीं भामह को पूवंवरत्ती किख दिया हो । भोज 
के सरस्वतीकण्ठाभरण को भी हमने अधिक महत्त्व नहीं दिया है, क्योकि उसका प्रभाव 
भी कडमीरी परम्परा पर कम टे यद्यपि जयरथ ने भोजदेव का भी [ पृष्ठ ४८४३, ७२० | 
उल्टेव कर दियारहै। इस प्रकार दण्डी से विहवैदवर तक की आवश्यक ओर 
एतिहासिक सामग्री प्रत्येक अलंकार के अन्त में इस ग्रन्थ में सुभ है। आक्षेप, काव्य 
लिग ओर संसृष्टि संकर के इतिहास पर गवेषक विद्वान्‌ ध्यान दे सकते हं इतिहाष 
के अन्त में श्रीविद्याचक्रवर्ती की निष्छृष्ठाथं कारिकां भी अनुवादकेषाथदेदीहैं। 


4 

अल्ङ्कारों का क्रमिक विकास स्पष्ट समक्षम आ सफरे इसलिए हम दण्डीसे 

सवंस्व तक के अल्द्धुारों के इतिव्ृत्त पर दष्ट गठे-- 
अङ्काय का इतिघरत्त 

(अलका र'-शब्द का पूवपद अलम्‌" ऋक्संहितामे अरम्‌'के रूपमे मिलता हैष । 
अरम्‌ (ऋ-धातु से निष्पन्न शब्द है। क का अथं दहै गति । गति"-शब्द बोध, मुक्ति 
ओर गमनन्यापारका भी बोधक चब्दहै। अथं यहु कि न्नान, इच्छा ओर क्रिया 
इन तीन चक्तियों से बने विद्व की दो तिहाई तक व्याप्त है गति शब्द की दाक्ति। वेद- 
विज्ञान गति'-तच्व को प्राण" ओर "अर्थि" कहता? तथा उसे “इन्द्र से अभिन्न मानता 
हैः । ऋक्संहिता के ऋषि वसिष्ठ इन्द्रसे ही पचते हैँ काते अस्त्यरङ्कृतिः सूक्तैः” 
हे इन्द्र, सूक्तं मे एेसी कौन सी अलंकृति, कौन सी प्राणवत्ता, कौन षी आपूत्ति, कौन 
सी उपलन्धि रहती है जो उनसे तुम्दँ प्राप्त होतीहै। अवद्यही इस वाक्य में 
सुक्तात्मक उक्ति के अन्तगंत रहने वाले अतिरय-तत्तव की जिज्ञासा प्रकट होरहीहै। 
मानों ऋषि यानी कवि, अलंकायं से उसके उक्तिलभ्य अलंकार के विषय में प्रडन कर 
रहा हैं । इस प्रकार 


7 7 नि मि नी नी मी भीम क ऋ क क क 


१. द्रष्टव्य 27101018] 10६6 ०) {€ फठात्‌ = शाद्ा2 ए 


17. @. (~. (11081 710 (11610168 ०9 [लावा $ (1161570 10 88151118: 
६4. 27. 7. २. €. फाला, एततएषाः ताश. 
२-३.द्र० ( १) वेदिकविज्ञान ओर भारतीय संस्कृति: म० म° 


प० गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी । 
( २ ) आत्मविज्ञानोपनिषद्‌ आदि : १० मोतीलाल शास्र । 


( ३ ) सहखाक्षरा वाक्‌ : ० वासुदेवशरण अग्रवाल । 

( ४ ) विज्ञानविदयुत्‌ : म० म० पं° मधुश्रुदनओक्षा। 
= 

( ५) वेदिकवाक्यकोष : श्रीभगवत शास्री । 


४. ऋ० ७।२९।३। 


( ३१ ) 


तऋकसंहिता मे अथात्‌ मानव -इतिहास के प्रथम ग्रन्थ या आदिकाव्य मे हम 
परवर्ती अक्कारके लिए अरङृति" शब्द पातेर, किन्तु यहाँ यह शाब्द उपमा 
आदि के किए प्रयुक्त नहीं वतालाया जाता । दूखरी ओर 


यास्क के निकर्क्तमे हम उपमा शब्द ओर उसकी वही व्याख्या पाते हँजो हमे 
परवर्ता आलकारिकों में मिल्तीहै। गाग्येका मत उद्धूत करते हुए यास्क लिखते 
ह-- उपमा अतत्‌ तत्सहक्म्‌"› । यहीं उपमाओं को न्याख्या करते हए वे लिखते है-- 


"तदासां कमं उयायसा वा गुणेन प्रख्याततमेन वा कनीयांसं वा 
प्रख्यातं वा उपमिमीते अथापि कनीयसा उयायांसम्‌ । 


दु्गाचायं इसकी व्याख्या करते ओर लिखते है- 


` यायसा उल्कृष्टेन गुणेन यो यस्मिन्‌ द्रव्ये उल्छृष्टो गुणस्तेन, कनीयांसम्‌ अनुकृष्ट 
गुणम्‌ उपमीयते, तद्यथा सिंहो माणवकः इति । सिहे शौ्थसु्छृष्टम्‌, माणवकमेतेन 
उपमिमीते सिह इव माणवको विक्रान्त इति । प्रस्याततमेन वा अप्रख्यातसुपमीयते । 
प्रल्यातश्चन्दमा, अभ्रस्यातो माणवकःतं तेनो पमिमीते “चन्द्र इव कान्तो माणवकः इति । 
अथापि क्वचित्‌, कनीयसा गुणेन ज्यायांसमपि सन्तसुपमिमीते ।' 
अर्थात्‌-'अनुक्छृष् की उक्ष के साथ तुलना ही उपमादहै' । 

यास्क एसी उपमाओं के १२ स्थलः प्रस्तुत करते ओर उनमें से कृ स्थलों को 

कर्मोपमा,° भूतोपमा,"* रूपोपमा~ सिद्धोपमा,€ टृप्तोपमा,७ अर्थोपमा< भी कहते हें । 
किन्तु इन्दं अलंकार नहीं कहते, यद्यपि इनमे भूतोपमा, रूपोपमा, सिद्धोपमा ओर 
टुप्तोपमा जिसका दूसरा नाम अर्थोपमा है एसी उपमां है जिन अलंकार कहा जा 
सकता हे । 


पाणिनि जी उपमा, साहश्य, सामान्य, उपमान, सहश, प्रतिरूप, उपमित शब्दों का 
1 2 क 9.9 


१. ( १) पांगरा ऽवा एण्नलऽ 8४. 27. 9. २. 726 2426. 3. 
(२ ) निरुक्त : नै षष्टुककाण्ड पाद-३ भारम्भ, मोरसंस्करण भाग-२ प° २८३ । 
२. निरुक्त प्रथम भाग पृष्ठ ३३४ मोरसंस्करण. 
२-७. निरुक्त भाग-२ प्र° २९१-२०८ मोरसंस्कररण. 
८. उपमा ( १) तुल्याथैरतुलोपमाभ्यां [ २।३।७२ ], 
( २ ) चिदित्युपमाथं प्रयुज्यमाने | ८।२।१० | 
ओप्य ( १) जीविकोपनिषदावौपम्ये :[ १।४।७९ |, (२) ऊरत्तरपदा- 
दौपम्ये | ४।१।६९ | ( ३ ) सं्ञौपम्ययोरच [ ६।२।११३ | 


सादश्य ( १) जन्ययं विभक्ति° [२।१।६] ( २ ) यथाऽसादृश्ये [ २।१।७ | 
( ३ ) सहशचप्रतिरूपयोच सादृश्ये [ ६।२।११ ] 


( ३२ ) 


असरत्‌ प्रयोग करते तथा ुरुषन्याघ्र' मादि एसे स्थलों पर दृष्टि रखते हैँ जिनमें आई ४ 
उपमा स्पष्ठरूपसे अलंकार है, तथापि वे इन्दं उपमालंकार नहीं कहते, यद्यपि उन 
अपते रासन में वैसा कह्ने का कोई अवसर भी नहीं था । 
पतञ्जलि “उपमान शब्द का निवंचन करते ओर कटते दँ 
मानं हि नाम अनिर्ततक्तानाथम्‌ , 
उप आदीयते अनिर््ञातमथं क्तास्यामीति, 
तत्समीपे यज्नाव्यन्ताय मिमीतं तदू उपमानम्‌ । 
अर्थात्‌--उप यानी पाच में अर्थातु अज्ञात वस्तु के, ठे जाने वाला अथं उपमान । 
किन्तु वे इसे अलंकारत्व से अस्पृष्ट रखते भौर इसके स्पष्टीकरण के लिए उदाहरण 
भावय गो जैसा इस लोकवाक्य का देते हैँ जिघमें उ्मातोटै किन्तु चमत्कार नही, 
अतः जो अखकार नहींदहै। 
किन्तु पतन्जलि के समय में ही "अरंकारत्व' ओर उपमा! आदि दोनों समानान्तर 
गंगा यमुना को मिला दिया नाता है । यह कायं भरतमुनि करते हे । वे उपमा, रूपक, | 
दीपक अर यमक को अकार मानते ओर छक्षण नामक तत्व के रूपमे अन्य ३६ गुणो | 
कारी निहूपण्‌ करते हँ जिनसे अलंकारो की दिशा में चिन्तन को व्िचयुदुगति प्राप्त हो | 
जाती है ओर दण्डी तक के अनेक मनीषी उ दशाम लगभग सात सौ वर्षा तक 
निरन्तर चिन्तन करते हैँ । इस महान्‌ अन्तराल के पश्चात्‌ हम दण्डी तक परहुचते 
ओर उनमें अकारो की संख्या ३७ पाते हँ । ये निम्नलिखित है-- 


[ 


सामान्य-( १ ) उपमानानि सामान्यवचनैः [ २।१।५५ ] | 
( २ ) उपमितं व्याघ्रादिभिः सामान्याप्रयोगे [ २।१।५६ | | 
( २३ ) नामन्त्रिते समानाधिकरणे सामान्यवचनम्‌ | ८।१।७३ | 


उपमित-उपमितं व्याघ्रादिभिः० [ २।१।५६ | 


उपथ्मान-( १) उपमानानि सा० |२।१।५५| (२) उपमानादाचारे | 
[३।१।१० ] ( ३ ) कक्तयुपमाने [ ३।२।७९ | ( ४ ) उपमाने कमणि च [ ३।४।४५ ], 
(५) उपमानादप्राणिषु [ ५।४।९७ | ( ६ ) उपमानाच्च | ५;४।१३७ |, ( ७) 
संज्ञायासुपमानम्‌ [ ६।१।२०४ |, ( ८ ) तत्पुरुषे तुत्याथकतृतीयासप्तम्युपमाना० | 
[ ६।२।२ ], ( ९ ) गोबिडारसिहसेन्धवेषूुपमाने [ ६।२।७२ ], ( १० ) उपमानं शब्दार्थ- | 
प्रकृतावेव [ ६।२।८० | ( ११ ) चीरमुपमानम्‌ [ ६।२।१२७ ], ( १२) सूपमानात्‌ | 
क्तः [ ६।२।१४५ | ( १३ ) निष्ठोपमानादन्यतरस्याम्‌ [ ६।२।१६९ | 

१. [97. 9. +. 26. ब्रिाऽला$ रा 9]. 2061165. 

२. “उपमः रूपकं चेव दीपकं यमकं तथा । 

अखंकारास्तु विज्ञिेयाश्चत्वारो नाटकाश्रयाः ॥--भरतनाव्वञाख १७।४३ 


¢ कि 


१दृण्डी | ६६ ०-६८० ई० | 

१. स्वभावोक्ति २. उपमा ३. रूपक ४. दीपक ५. आवृत्ति ६. आक्षेप 
७. अर्थान्तरन्यास ८. व्यतिरेक ९. विभावना १०. समासोक्ति ११. अतिशयोक्ति 
१२. उत्प्रेक्षा १३. ठैतु १४. सूक्ष्म १५. ठ्शा १६. करम १७, प्रेयः १८ रसवद्‌ 
१९. ऊजंस्वि २०. पर्यायोक्ति २१. समाहित २२. उदात्त २३. अपहुति २४. रटेष 
२५. विशेषोक्ति २६. तुल्ययोगिता २७. विरोध २८. अप्रस्तुतप्रशंसा २९. व्याजस्तुति 
२०. निदशेना ३१. सहोक्तिं ३२. परिवृत्ति ३३. आशौः ३४. संसृष्टि ३५. भाविक 
३६. यमक तथा ३७. चित्र । 

दण्डीने दक्षिणभारतमें जो अलंकारदशन प्रस्तुत क्रिया वहु उत्तर भारत के 
भामह को बहत ही शोधघ्रसुल्भहोगया। भ्लेही वह दण्डीके अपने म्रन्थकेद्रारा 
सुभ हुआ हौ अथवा साक्षात्‌ उसो माध्यम से जिससेये त्व दण्डी तक पहुचे हों । 
स्वयं दण्डीके ग्रन्थसे ही भामह को अलंकार प्रेरणा का पक्ष अधिक स्वस्थ प्रतीत 
होता दै। एेसा क्गतः हैकि भामह किसी पक्ष को पूवं पक्त बना रहै है अौर उसे उसी 
की मूल पदावली मे उदुधृत कर रहे हैँ । यह्‌ पदावली दण्डी से अक्षरः मिलती है । 
ेसी स्थिति में दण्डी को पूवेवर्तीहोनेकाश्चेय न देना तकंविरुद्ध है२। 


१. ( १ ) यहां आचार्यो के समय का आधार हैँ डं० काणे 
(२) म०म० काणे आदि कहते है करि दण्डी के पूवं भद्विकाव्यमे अलंकारो 
का विवेचन हुंजा है । वस्तुतः उसमे अलङ्कारो के प्रयोगमाच्र है । अलङ्कारो के नामं 
नहीं । नामों को कल्पना जयमंगलाकारनेकीहै, जो बहुत अंश मे अशुद्ध है । "वार्ताः 
को भामह के अनुसार अलङ्कार बतलाना उसका प्रमाण है । देखिए यहीं अआगे-- 

२. एसे अनेक स्थ डों० ३०, म० म० काणे, श्रीपोदार जी आदि ने उद्धृत किए 
हँ । इनमें प्रसिद्ध है हेतु सूक्ष्म आदि अलंकारो से सम्बद्ध स्थल । दण्डी कहते हँ- 
तुर्व सूष्ष्मडेशौ च वाचामुकत्तमभरुषणम्‌" ओर इनका निरूपण ६७ कारिकां मे करते है । 
वहं वे--“गतोऽस्तमकों भातीन्दुर्यान्ति वासाय पक्तिणः। 

इतीदमपि साध्वेव कारावस्थानिवेदने ॥*-- यह उदाहरण देते है । 

भामह कहते दै--हितुश्च सूचमो छेशोऽथ नाटंकारतया मतः 

ससुदायाभिधानस्य वक्रोक्त्यनभिधानतः॥ 

गतोऽस्तमकों भातीन्दुर्यान्ति वासाय पक्तिणः 

इत्येवमादि कि कान्य वार्तामितां प्रचक्षते ॥' २८६-८७ ॥ 
जो इन कारिकाओंको भाषाकी दृष्टि से पठेगा वह्‌ समक्न जाएगा कि अव्य ही दण्डीकी 
कारिका पहले कीटहै। दण्डीनामल्ते है तीन अलङ्कारो का किन्तु उनके किए प्रयोग 
करते है भूषणम्‌" इस प्रकार एकवचन का । चाहिए था भूषणानिः। भामह इसका सुधार | 
करते ओर मतः" मे एकवचन ही रखते हुए यह्‌ बतलति हँ कि यदि भुषणम्‌ ही 
लिखना हे तो सूक्ष्मलेशौ न॒ लिखकर सुक्ष्म ठेशोऽथ' इस प्रकार अलग अलग छिखना 

३अ० भू | 


( 2£ , 


भामह [ ७००-७२५ ई० | 
भामह ने अपने काव्यालद्धारमें दण्डी के कुछ अलद्भारोको साना, कुछ को नहीं 
ओर कुछ अल्ङ्कारोको अपनो ओरसे नवीन अलङ्कारोंके ख्पमें प्रस्तुत किया । 
इनका विवरण-- 


( १ ) अमान्य अद्ङ्ार--आवृत्ति, हेतु, सूक्ष्म, ठेश तथा चित्र । 

( २) मान्य अटद्ार- स्वभावोक्ति, उपमा, रूपक्र, दीपक, आक्षेप, अर्थान्तर- 
न्यास, व्यतिरेक, विभावना, समासोक्ति, अतिशयोक्ति, 
उत्प्रेक्षा, क्रम (यथासंख्य नाम से) प्रेय, रसवत्‌, ऊजंस्वि, 
पर्यायोक्त, समाहित, उदात्त, अपह्लुति, इटेष, विशेषोक्ति, 
तुल्ययोगिता, विरोध, प्रस्तुतप्रशंसा, व्याजस्तुति, 
निदशना, खहोक्ति, परिवृत्ति, आीः, संसृष्टि, भाविक 

- तथा यमक ।' 
(३ ) स्वकट्पित-( १) अनुप्रास (२) उपमारूपकं (३) उत्प्रक्षावयव 
( ४ ) उपमेयोपमा (५) सन्देह (६ ) अनन्वय । 
इस प्रकार भामह तक कुरु अकारो की संख्या ४३ हो जाती है । उनमेसे भामह 
दण्डीके ३२ तथा अपने ६ इसप्रकार कठ २३८ अलकार स्वीकार करते दैँ। हेतु, 


चाहिए । यदि भामह स्वयं इसे छिखते तो हितुः सृक्ष्मस्च टेशरच'-एेसा क्िखते । 


€हेतुरचः- लिखना भी दण्डी की ही उक्ति को उद्धृत करना है । यर्हा- 

यह्‌ कहना कि दोनों ने किसी एक अन्यस्रोतसेये अंश अपनाए ह-- संस्कृतभाषा 
की अभिव्यक्ति से अनथिन्ञता प्रकट करना है । आनन्दवधन ओर महिमभदट्रु कौ नोँकक्चोक 
पर उनका ध्यान जाना चाहिए । इतने पर भी डं० ३, पोहार, डँ° रामचन्द्र ह्िविदी 
आदि भामह को ही पूर्ववर्ती मानते है। म०म०काणेने हमारे इस भाषा सम्बन्धी 
तक प्रतो ध्यान नहीं दिया है, परन्तु माना दण्डी को ही पूवंवर्ती है [ द° प्राण 
ग 3. ए०लठ5 थ. 4. ६876, ए. 124, 1951. | 

दण्डी का अलङ्कारविवेचन भी बतलाताहै किवे उस समयके आचाय दै जव 
अलङ्कारो के विवेचन में अधिक सूष्ष्मता नहीं थी । भामह इसके विरुद अधिक सूक्ष्मता के 
साथ अलङ्कारो का निरूपण करते दिखाई देते हें । क्या सूक्ष्मता स्थूलता को जन्म देती हं 
जो दण्डी को परवर्ती माना जाता है? अवश्यही भामहदण्डीके ऋणी हैभलेहीवे 
दण्डीकानामन ले मलद्कारविमशिनी में क्या रत्नाकर का नाम विमशिनीकार ने एक 
बार भी लिया? तो क्या यह्‌ कह दिया जाए कि विम्चिनी रत्नाकर से पहले की है ओर 
रत्नाकर ने ही विमशशिनीसे प्रेरणा पार है? 

१. ( * ) 9. 1. 06. प्राभनङ़रजा ऽक्ाशता६ ००४०8, ए. 49-50 

( २) ९.४. ६916. 1951. ?. 124 


47 3) 


( २५ ) 


सुक्ष्म ओर कातो भामह ने खण्डन भी किया है । उनके संदेह ओर उपमेयोपमा 

दण्डी कौ संशयोपमा तथा अन्योन्योपमा की ही पीठिका पर आधुत है। दण्डीने इन्है 

उपमासे पृथक्‌ नहीं माना था। भामह ने इनमें पृथक्‌ अलंकारत्व देखा । उत्परेक्षावयव . 

उत्प्रेक्षा तथा उपमारूपक रूपक के चिन्तन का ही आंशिक परिवत्तन है, जो पृथगरकारत्व 

के लिए अपयय्प्ति है ओर इसीलिए जिसे परवर्ती आचार्यो ते मान्यता नहीं दी । 
उद्धर | ७५०-८०० ई० | 
उद्वट ने अपने कान्याकारसंग्रहमे दण्डी की अपेक्षा भामह को अधिक महत्त्व 
दिया यद्यपि उन्होने स्वतन्त्र चिन्तन से काम लिया । उन्होने दण्डी ओौर भामह दोनो के 

\छ अलकारोंको अलंकार न मानते हुए अपनी ओर से भी कुछ अलंकारो की कल्पना 

कौ । उनके अनुसार अलंकारो का विवरण- 

( १ ) अमान्य (क ) दण्डी के--आवृत्ति, हेतु, सुक्ष्म, टेश, आक्ली, यमक तथा चित्र । 

(ख ) भामह के-उपमारूपक तथा उत्प्रेक्षावयव । 

(२) मान्य (क) दण्डी के--उपमा, रूपक, दीपक, आक्षेप, अर्थान्तरन्यास, 
व्यतिरेक, विभावना, समासोक्ति, अतिशयोक्ति, यथासंख्य, ॑ 
उप्क्षा, स्वभावोक्ति, प्रेय, रसवत्‌, ऊज॑स्वि, पययोक्त, समा- 
हित, उदात्त, रिलष्र, अपहुति, विशेषोक्ति, विरोध, तुल्ययोगिता, 
अ्रसतुत्रशसा, व्याजस्तुति, निदशेना [ विदर्ना नाम से |, 
सहोक्ति, परिवृत्ति, संसृष्टि, तथा भाविक 

( ख ) भामह्‌ के-अनुप्रास, उपमेयोपमा, सन्देह तथा अनन्वय 

(३ ) स्वकरट्पित ( १ ) पुनरुक्तवदाभास ( २) छेकानुप्रास (३) लाटानुप्रास 
(४) प्रतिवस्तुपमा { ५) काव्यर्गि (६) दृष्टान्त तथा ( ७ ) संकर । 
इन स्वकल्पित अलंकारो में से उद्धट की अत्यन्त मौलिकता केवल पुनशक्तवदाभास 
मेटे। अनुप्रासो मे लाटानुप्रास भामह ने अनुप्रास के अन्ताग॑त मान लिया था, उद्धट 
ने उसे केवल स्वतन्त्र अलंकार के रूपमे गिन दियाहै। छेकानुप्रास उनकी भामह 
के प्राम्यानुप्रास कौ कल्पना पर एक विरोधी कल्पना है । याम्य के विरु सेक का 
अथं विदग्ध कियाजाताहै। प्रतिवस्तूपमा को दण्डी उपमा के अन्तगतं भिना चुके 
थे । काव्यल्गिभीहैतु केदो भेदो में से एक का स्वतन्त्रीकरण है, किन्तु यह्‌ अनुमान 

क अधिक समीप है । दृष्टान्त प्रतिवस्तूपमा की छाया पर एक स्वतन्त्र कल्पना है ओर 

संकर संमृष्टिकी छया पर । तीनों अनुप्रासो को एक अनुप्रास के तीनभेदन मानकर 

तीन स्वतन्त्र अलंकार मानता हुआ उद्धट को इसलिए माना जाता है कि उन्होने 
रत्येकं अलंकार के भेद उस अलंकार के लक्षणके बाद दिए ह, वर्ग के आरम्भ मे सबके 
नाम को तालिका मे नहीं । अनुप्रास के भेद नाम-ताछ्किामे ही दे दिये है ।. 

इस प्रकार दण्डो से लेकर उद्धट के समय तक अलङ्कारो की संख्या ५० हो नाती 


( ३६ ) 
है 19 इनमें वे दण्डीके ३७ अरंकारोंमेंसे केवल ३०, भामह के अलङ्कारो स्वकल्पित 
६्मेंसे केवल ४ अपना कर केवल ३४ अरुंकार प्राचीन आचार्यो से अपनाते हँ तथा 
७ अलंकारो की कल्पना अपनी ओर से करते हैँ । फलतः वे कुल ४१ अलंकार मानते 
है । वस्तुतः तीनों अनुप्रासो को एक अलङ्कार मान लेने पर उद्धटको मान्य अलङ्कारो 
की संख्या केवल ३९ रहती टै । 
वामन | ८०० ई० | 
उद्धट के समकाटीन चायं वामन ने.भी अपनी "कान्यलद्धुरसूत्रवृत्ति' मे भामह 
को अधिक महत्व दिया । उनके अनुसार अलङ्कारो का विवरण-- 
( १ ) अमान्य ( क ) दण्डी के-- स्वभावोक्ति, आवृत्ति, हेतु, सृक्ष्प, लेश, रसवत्‌, प्रेय, 
अजस्वि, पर्ययोक्ति, उदात्त, भाविक, आशीः, चित्र 
(ख ) भामह के-उपमार्पक तथा उत्प्रेक्षावयव 
(२) मान्य (क) दण्डी के--उपमा, समासोक्ति, अप्रस्तुतप्रशंसा, अपहति, 
रूपक, इटेष, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, विरोध, विभावना, परिवृत्ति, 
क्रम, दीपक, निदशना, अर्थान्तरम्यास, व्यतिरेक, विशेषोक्ति, 
व्याजस्तुति, तुल्ययोगिता, आक्षेप, सहोक्ति, समाहित, संघृष्ट 
तथा यमक्र। 
( ख ) भामह के- सन्देह, अनन्वय, अनुप्रास तथा उपमेयोपमा । 
(३ ) स्वकट्पित ( १ ) वक्रोक्ति ( २) व्याजोक्ति (३) प्रतिवस्तुपमा 
इस प्रकार वामन तक अल््कारोंकी संख्या ५२ दहो जाती हैः । इनमे से वामन 
स्वयं २ अल्ङ्कुारोंकी कल्पना करते ह! वे ५ अलंकार भामहके तथा २४ अलङ्कार 
दण्डी के अपनाते ओर इस प्रकार कुल मिलाकर ३१ अलच्कार स्वीकार करते हैँ । अथं 
यह हुआ करि दण्डीसे वामन तक २१ अलद्धार विवादास्पद थे। यदि उद्धट की 
स्वकल्पित वक्रोक्ति ओर व्याजोक्ति को नवीन सानकर इन विवादास्पद अलङ्कारो मे 
अभी न गिन तो उनकी संख्या १९ वचती 


सद्र [ ८२५-८७५ ई० | 
उद्धट ओौर वामन के पश्चातु अलङ्कारचिन्तन में अधिक स्वस्थता ओौर अधिक 
वेज्ञानिकता आई । चिन्तकों ने अल््धायें का वर्गकरणं सजातीयता तथा विजातीयता 
व 1 2 ५. 


१. डा० राममूति त्रिपाठी ने "चित्रः को गणनादछोडदी दहै अतः वे दण्डी से उदुभट 
तक अल्द्धारों की संख्या ४९ बतलाते है । द्रष्टव्य डंशत्रिपाठी की काव्यालङ्कार 
सारसंग्रह्‌ की भूमिका प° २८-२९ 

२. प्रतिवस्तूपमा की कल्पना उद्धटने की है, अतः वामन तक कुल अलंकारो कौ 
सख्या ५२ हौ होती हे, ५३ नहीं । यद्यपि डं० रामचन्द्र द्विवेदी ने ५५ संख्या लिललदी 
ह । देखिए-- भलद्कुारमीमांसा पृ० १५५ ॥ 


(हि या-द == नयी --- =-= ~ ॥ ऋ 


( ३७ ) 


के आधार पर ठीक उसी प्रकार करना आरम्भ किया जिस प्रकार वैशेषिक सूत्रों में 
पदार्थो का वर्गाकिरण महर्षि कणादने कियाथा। यहु वर्गीकरण खबसे पहले स्द्रट के 
काव्यालङ्कार" मे मिलतादहै। 

रुद्रट ने अलङ्कारो को पहले तो “शाब्द' ओर अ्थं'के दो खण्डों मे विभाजिते किया, 
फिर अर्थाल्द्भारो को ( १) वास्तव (२) आओौपम्य (३) अतिशय तथा (४ ) उष 
नामक चार वर्गोमें। 

इन दोनों खण्डों ओर वर्गोमे श््रटने ६२ अल्ङ्धारोंका निरूपण किया । इनमे 
से खपरट ने पुववर्ती आचार्यो के केवल २७ अलङ्कार ही लिए, शेष ३५ अलङ्कारो की 
कल्पना स्वतन्त्र अल्द्धुारके रूपमे उन्होने स्वयंकीहै। इनमें से ५ अलङ्कारो को एक 
हीनामसे दो-दो बार गिनाया अतः कुछ विद्वानों ने उनके द्वारा निरूपित अलङ्कारो 
की संख्या सत्तावन सानी है । इनका विवरण इस प्रकार है-- 


( १ ) अमान्य ( क ) दण्डी के--आवृत्ति, आद्यीः, अतिशयोक्ति, तुल्ययोगिता, रसवत्‌, 
प्रेय, ऊजंस्वि, भाविक, पर्यायोक्त, समाहित, विशेषोक्ति, हेतु, 
संसृष्टि । 

( ख ) भामह के--उपमेयोपमा, अनन्वय, उपमारूक, उत्प्र्षावयव । 

( ग ) उद्धट के पुनरुक्तवदाभास, येकानूप्रास, लाटानुप्रास, प्रति- 
वस्तूपमा, काव्यक्ग, संकरः | पृथगलङ्कार के रूप में ] 

(घ ) वामन को--वक्रोक्तिर, व्याजोक्ति 


(२) मान्य (क) दण्डी के--स्वभावोक्ति[ जाति नामसे |, उपमा, रूपक, दीपक, 
आक्षेप, अर्थान्तरन्यास, व्यतिरेक, विभावना, समासोक्ति, उत्प्रेक्षा, 
सुक्ष्म, केश, क्रम [ यथासंख्य. नाम से ], उदात्त [ अवसर नाम 
से | भपहुति, रलेष, विरोध, अग्रस्तुतप्र्ंसा [ अन्योक्ति नाम 
से |, व्याजस्तुति, निदशना, सहोक्ति, परिवृत्ति, यमक, चित्र 

( ख ) भामह के-- अनुप्रास, सन्देह | संशय नाम से | 
(ग ) उद्धट के--टष्टान्त, 
| वामन से कुछ नहीं | 


ज 


-_-___--- 


१. भतिशयोक्ति नाम से सद्रटने कोई स्वतन्त्र अलङ्कार नहीं माना । उसके प्रायः 
वे सभीभेदजोदण्डीने माने थे रुद्रटः ने अतिशय-वगं के अलङ्कारो मे गिन किए है । 

२. शुद्रटने संकर पर विचार किया दहै, किन्तु उनके प्रतिपादनसे यह स्पष्ट नहीं 
हैकिवे उसे पृथक्‌ अलङ्कार मानते है । 

३. सुद्रट ने वक्रोक्ति नामक एक अलङ्कार मानादै, किन्तु वह्‌ स्वरूपतः वामन 
को वक्रोक्ति से भिन्न दहै। 


( ३८ 


(३ ) स्वकदिपत १-२. समुच्चय, २. भाव, ४. पर्याय, ५. विषम, ६. अनुमान, 

७. परिकर, =. परिसंख्या, ९. टतु [नवीन १०. कारणमाला, 
११. अन्योन्य, १२-१३. उत्तर, १४. सार, १५. मीलित, 
१६. एकावली, १७. मत, १८. प्रतीप, १९. उभयन्या्च, 
२०. श्रान्तिमान्‌, २९१. प्रत्यनीक, २२-२३. पठे, २४. साम्य, 
२५. स्मरण, २६. विदोष, २७. तद्गुण, २८. पिहित, 
२९. असंगति, ३०. व्याघात, ३१. अहेतु, ३२. अधिक, 
३३. वक्रोक्ति २४. सहोक्ति, ३५. दटेष [ तीनों नवीन | । 

इस प्रकार रुद्रट ने अलङ्कारो की संल्या ६२ मानीदहैः। 

इन सव अलारं का वर्गीकरण स्द्रट ते इस प्रकारसे किया दै- 


| कं | दाब्द्‌ाटह्कार 
१. वक्रोक्ति, २. अनुप्रा्, २३. यमक, ४. रडेष, ५. चित्र । 
[ ख ] अर्थाललकार 
१. वास्तववगं १. सहोक्ति, २. समुच्चय, ३. जाति [ स्वभावोक्ति | 
+, यथासंख्य, ५. भाव, ६. पर्याय, ७. विषम, ८. अनुमान, 
९. दीपक, १०. परिकर, १९१. परिवृत्ति, १२. परिसंख्या, 
१३. हेतु, १४. कारणमाला, १५. व्यतिरेक, १६. अन्योन्य, 
१७. उत्तर, १८. सार, १९. सूक्ष्म, २०. टेश, २१. अवसर, 
२२. मीलित, २३. एकावली । 
२. ओपम्यवग १. उपमा, २. उत्प्रेक्षा, ३. रूपक, ४. अपहति, ५. संशय, 
| ६. समासोक्ति, ७. मत, ८. उत्तर, . ९. अन्योक्ति, १०. प्रतीप, 
११. अर्थान्तरन्यास, १२. उभयन्यास, १३. श्रान्तिमान्‌, 
१४. आक्षेप, १५ प्रत्यनीक, १६. दृष्टान्त, १७. पूर्व, 
१८. सहोक्ति, १९ समुच्चय, २० साम्य, २१ स्मरण। 
२. अतिशयदगं 40 पूव, २. विशेष, ३. उत्प्रेक्षा, ४. विभावना, ५. तद्गुणः 
९. अधिक, ७. विरोध, ८. विषम, ९. असंगति, १०. पिहित, 
११. व्याघात, १२. अहेतु । 
४. रटेषवगं उडेष 


(काना 


१. पोदारजीने शद्रटके अलंकारो की संख्या ५५ बतलाईहै। वे अहेतु तथा 
वक्रोक्ति की गणना करना भूक गए है । इन्होनि रदरट मे उदात्त का भी अभाव मानाहै, 
वस्तुतः श्द्रटने इसे 'जवसर' नामसे अपना लियाहै। पोहारजी ने भवस्र की 
गणना कर रीहै। द्रष्टव्य स्व० कर्हैयाकल जी पोहार का 'संस्कृतसाहित्य का 
इतहाय' पर ९३. | 


कृण 


( ३६ ) 


उक्त विवरणं से स्पष्ठहै किशुद्रट ने सहोक्ति, समुच्चय, पुव, इलेष तथा उत्तर इन्‌ 
पाच की गणना दो-दो बारकीदहै। उद्धटमें अनुप्रासभेदों को स्वतंत्र अल्द्धार माना 
गया है, अतः स्द्रट के अनुखार अलंकारो की संख्या ६२ ही मानी जानी चाहिए । 

उक्त विदलेषण से यह भी स्पष्ट है कि अलङ्कारो कौ संख्या दण्डी से रुद्रट तक ८७ 
( सत्तासी ) तक पर्ुच जाती हे । 

रुदरट का महत्व हमे तब विदित होता है जब हम भोजके सरस्वतीकण्ठाभरण 
ओर मम्मट कै कान्यप्रकाञ्च पर ध्यान देते र । 


भोज [ १०००-१०५० ई० | 
भोज ने अपने सरस्वतीकण्ठाभरण मे अल्कारों का विभाजन शब्दालङ्कार, अर्था, 
लङ्कार तथा उभयाल्कारके रूप मे किया । उन्होने प्रत्येक वगं के २४, २४ अरु्ार 
माने फलतः उनके गलङ्धारों को संख्या ७२ हो जाती है । विवरण्‌-- 

(१) अमान्य (क) दण्डो कै--आवृत्ति, प्रेय, रखवत्‌, ऊजंस्वि, पर्यायोक्त, उदात्त, 
व्याजस्तुति, आशीः, 

(ख) भामह के--उपमारूपक, उत्प्क्षावयव, उपमेयोपमा (उपमा मे, 
अनन्वय ( उपमामेदही), 

(ग) उद्धट के-- पुनरुक्तवदाभास, छेकानुप्रास, काटानुप्रास, प्रतिवस्तूपमा 
( उपमा में ), दृष्टान्त ( उपमा मे ), संकर ( संभृष्टि में ) 

(घ) वामन के-- वक्रोक्ति, व्याजोक्ति, 

(ड) रुदरट के--उभयन्यास, प्रतीप (साम्य मे), प्रत्यनीक, पूव, [दोनो] 
पिहित, मत, विषम, व्याघात, विशेष, सार, अधिक, असंगति, 
एकावली, कारणमाला, हेतु, तदहुण, परिसंख्या, सहोक्ति, ( १), 
उत्तर ( १), समुच्चय (१) 

(र) मान्य (क) दण्डी के--यमक, इलेष, चित्र, जाति, विभावना, हेतु (काग्य- 
लिग सहित), सूष्ष्म, विरोध, परिवृत्ति, निदशना, व्यतिरेक (भेद 
नाम से); समाहित, उपमा, रूपक, अपहुति, समासोक्ति, उत्प्रक्ता, 
अप्रस्तुतप्रशंसा, तुल्ययोगिता, लेश, खहोर्वित, आक्षेप, अर्थान्तर- 
न्यास, विशेषोक्ति, दीपक, करम, अतिशयोक्ति, भाविक, संसृष्टि, 

(ख) भामह के--अनुप्रास, सन्देह (संशय नाम से), 

(ग) उद्धट का--काव्यल्गि [ हेतु मे| 

(घ) रद्रट के --अहेतु, उत्तर (१), अन्योन्य, भ्रान्ति, मीलित, भाव, 
स्मृति [ स्मरण ], शब्ददलेष, अनुमान, साम्य, समुच्चय, परिकर, 
पर्याय, वक्रोक्ति | वाकोवाक्य मे | 

(२) स्वकर्पित १. जाति ( शब्दालङ्कार }, २. गति, ३. रीति, ४. वृत्ति, 


( ० 


५. छाया, ६. मुद्रा, ७. उक्ति, ८. युक्ति, ९. भणिति, १०. गृम्फना 
११. शय्या, १२. पटिति, १३. वाकोवाक्य, १४ प्रहेलिका, 
१५. गूढ, १६ प्रदनोत्तर, १७. अध्येय, १८. श्रव्य, ९१. त्रह्य, 
२०. अभिनीति, २९१. संभव, २२. वितकं, ¬ २. प्रत्यक्ष, २४. आगम 
२५. उपमान, २६. अर्थापत्ति, २७. अभाव, २८. समाधि । 
इन अलङ्कारो का वर्गीकरण शब्द, अथं तथा शब्दार्थयुगम दोनों के तीन वर्गोमें 
भोजराज ने इस प्रकार किया है-- 

(१) छाब्द्वगं जाति, गति, रीति, वृत्ति, छाया, मुद्रा, उक्ति, युक्ति, भणिति, 
गुम्फना, शय्या, पटिति, यमक, उटेष, अनुप्रा्, चित्र, वाकोवाक्य, 

| ्रहेलिका, गढ, प्ररनोत्तर, अध्येय, श्चव्य, प्रक्ष्य, अभिनीति । 

(२) अथंवगं जाति, विभावना, ठत, अहेतु, सूक्ष्म, उत्तर, विरोध, संभव 
अन्योन्य, परिवृत्ति, निदशंना, भेद ( व्यतिरेक ), समाहित, भ्रान्ति 
वितकं, मीलित, स्मृति, भाव, प्रत्यक्ष, अनुमान, भागम, उपमान, 
अर्थापत्ति, अभाव । 

(३) उभयवगं उपमा, रूपक, साम्य, संशय, अपहुति, समाधि, समासोक्ति 
उत्प्रेक्षा, अप्रस्तुतप्रशंसा, तुल्ययोगिता, केश, सहोक्ति, समुच्चय 
आक्षेप, अर्थान्तरन्यास, विशेषोक्ति, परिकर, दीपक, करम पर्याय 
अतिशयोक्ति, इडेव, भाविक, संसृष्टि । 

इनमे जाति ओर इ्टेष दो-दो बार आए है । इनमेसेव्छेषतो दो रूपों मे रद्रट 
न भी माना था, जाति का अर्थालङ्कारगत हप स्वभावोक्तिसे अभिन्न दै। इसप्रकार 
केवल चब्दजाति की कल्पना भोज की अभिनव कल्पना ठहर्ती हे । 

इस प्रकार भोजराज तक्र बलङ्कासें की संख्या ११५ हो जाती है अर्थात्‌ ८७ प्राचीन 
तथा २८ भोज के स्वोपन्ञ नवीन । इनमें से भोज ने दण्डी के पश्चात्‌ रद्रट से ही सबसे 
अधिक ापूत्तिकीहै। शुद्रटके कान्याकंकारसे भोजने १६ उदाहरणपच भी" लिए हैं। 


1 


१. (१) सरस्वतीकण्ठाभरण उदाहुरण्‌ २।८; काव्यारंकार उदाहरण ४१९, 
(२) स. क. उ. ३।६६, का. ७।५५, (३) स. क. उ. ३।१५२, का. ७।५७, 
( 


४) स. क. उ. ३।१५९१, का. ७।६०) (५) स. कं उ. ३।९३, . का. ७।८७, 

(६) स. क, उ ३।५७, का ७।९७, (७) स. क. उ. ४।२०४, का. ७।१५० 

(८) स. क.उ. ४९, का. ८।६, (९) स. क. उ. ४१, का. ८।१८. 
(१०) स. क. उ. ४।४, का. ८।२०, (११) स. क. उ. ४1१७, का. ८।२०, 
(१२) स. क. उ. ४।१८, का. ८।३१, (१३) स क. उ. ५५३०, का. ८।९०) 
(१४) स. क. उ. ४।५८, का. ८'७८, (१५) स. क. उ. ४।६३, का. ८।१००' 
(१६) स. क. उ. १।५९, का. ११।१३. 


( ४१ ) 


यद्यपि भोजराज का अलंकारविवेचन अपने आप मे एक विशार विषय है तथापि 
उनकी स्थापनाणं अपनी मीलिकतामे इतनी स्पष्ट कि विचार केवल उनके दारा 
अमान्य अलंकारो के अन्तर्भाव या सर्वथा प्रत्याख्यान के अनुसंधान में करना होता हे । 
हमने यर्हां जो विवरण द्या है उससे इस अनुसंधान मं प्यपप्त सहायता मिक 
सकती है । 


मभ्मट | १०५०-११०० ई० | 

मम्मट ने पूववरत्ती सभी आचार्यो से मधुकरी टो ओर काव्यप्रकाश मे उन सबका 
समन्वय करना चाहा । यद्यपि यह भी सत्यहैकि मम्मट अलद्कारचिन्तन में उतनी 
व्यवस्था नही का सके है जितनी व्यवस्था वे रस, ध्वनि ओर दोषों के चिन्तन मेँ काते 
दिखाई देते है । अलंकारं मे वे लडखडाते दिखाई देते है, विशेषत अलंकारो मे। 
इसका कारण उनका वार्धंक्य या अस्वास्थ्य हो सक्ता है । यह तो प्रसिद्ध रहैकिवे 
"परिकरालंकारः" के आगे अर्थाकुकासो का विवेचन नहीं कर पाए थे। अवरिष्ट अंशको 
पूति किसी अलक, अल्टया अल्लट ने की है । 


मम्मटने अलंकारो को भोजकीही नाद्व शब्द, अथं ओर दोनों के तीन वगो 
मे विभक्त किया । विवरण- 


१. अमान्य ( क ) दण्डी के--आवृत्ति, आशीः, प्रेय, ऊज॑स्वि, रसवत्‌, हेतु, लेश, 
( ख ) भामह के--उपमारूपक [ भोज द्वारा खण्डित | उतपरक्षावयव 
[ भोज द्वारा खण्डित | 


( ग ) उद्धट के चकानुप्रास, काटानुप्रास [ पृथक्‌ अलंकार के रूपमे | 

( च ) वामन-- वक्रोक्ति 

( ङ ) रुद्रट के--भाव, हेतु, मत, उभयन्यास | भोज दारा खण्डित |, 
पूरं [ दोनों भेद अतिशयोक्ति मे |, साम्य, अहेतु, सहोक्ति ( १ ) 
समुच्चय ( १) | दीपकमें | 

( च ) भोज के--जाति [ शाब्दगत ], गति, रीति, वृत्ति, छाया, सुद्र, 
उक्त, युक्ति, भणिति, गुम्फना, शाग्या, पटिति, वाकोवाक्य, प्रहेलिका, 
गढ, प्रदनोत्तर, अध्येय, श्रव्य, प्रक्ष्य, अभिनीति, संभव, वितकं, 
प्रत्यक्ष, आगम, उपमान, अर्थापत्ति, अभाव, समाधिः 


१. इस पर सागरिका ९।२ मे देखिए हूमारा-'मम्मटाभिमतं लक्षणायाः षडिवधत्वं 
हेत्वलंकारश्च' लेख, इसमे हमने बतलाया है कि हेत्वल्कार ओर काव्यल्गाटकार सें 
से हेत्‌ ही अलंकार दै तथा का्यलिग ही अलंकार नहीं है । 

२. पम्मट ने जिसे समाधि कहा है वहु भोज के अनुसार समाहित है! भोज की 
समाधि मम्मट के सामान्य से मिल्तीदहै। 


( २ ) 


२. मान्य (क) दण्डी के--स्वभावोक्ति, उपमा, रूपक, दीपक, आक्षेप, अर्थान्तर- 
न्यास, व्यतिरेक, विभावना, समासोक्ति, अतिशयोक्ति, उत्प्रेक्षा, 
सूक्ष्म, यथासंख्य, पर्यायोक्त, समाहित [ समाधि नाम से |, उदात्त, 
अपहुति, इटेष, विशेषोक्ति, तुल्ययोगिता, विरोध, अप्रस्तुतप्रशंसा, 
व्याजस्तुति, निदशना, सहोक्तिं परित्रत्ति, भाविक, संसृष्टि, 
यमक, चित्र । 

(ख ) भामह के-अनुप्रास [ किन्तु उद्‌भटके ढंग पर |, अनन्वय, 
उपमेयोपमा, सन्देह । 

( ग ) उदुभट के--[ येकरानूप्रास किन्तु अप्रेथक्‌ | पुनरुक्तवदाभास, प्रति- 
वस्तूपमा, काव्यलिग, दृष्ान्त, संकर । 

( घ ) वामन को--व्याजोक्ति। 

( डः } रद्रट के-- वक्रोक्ति, दटेष [ शब्दगत |, समुच्चय, पर्याय, विषय, 
अनुमान, परिकर, परिसंख्या, कारणमाला, अन्योन्य, उत्तर [दोनों |, 
सार, मीलित, एकावली, प्रतीप, भ्रान्तिमान्‌, प्रत्यनीक, स्मरण, 
विशेष, तद्गुण, पिहित [ सामान्य नाम से |, असंगति, 
व्याघात, अधिक । 

(च ) भाज का-मारादीपक [ दीपक से अलग कर | 


३. स्वकटिपत १. विनोक्ति (२) सम (३) अतद्गुण" । 

य प्रकार मम्मट तक अक्करारो कौ संख्या ११८ हो जाती है अर्थात्‌ ११५ भोज 
तक के तथा ३ स्वयं मम्मटके । इनमे से मम्मटने केवर ६८ अलंकारो को अटंकाररूप 
में स्वीकार किया, दोष ५० को नहीं 

मार्मिक तथ्य यहहै क्रि मम्मटने भोज को सवथा अमान्य कर दिया, जबकि शुद्र 

उन्होने २४ अरकार अपनाए । इन २४ अक्कारोंका अनुक्रमभी प्रायः वहीहै 
जो सद्रव्यें पाया जाता दहै। अनेक उदाहरण भी उन्होने ज्योंके त्यों अपना किए है । 
शब्दव्डेष तो रदरट की पूणं प्रतिचपि है। 

स्पष्ठही मम्मटने दण्डी ओर रुद्रट को अधिक महर्व दिया ओर उनके अलंकारों 
को विपुल माच्रा में अपनाया । बीचके आवचार्योसे भौ उन्होने ग्राह्य विच्छित्तियों का 
चयन किया । किन्तु यहां यह्‌ तथ्य स्पष्टल्पसे समक्षलेना होगाकि मम्मटनेजो 


~~~ ----------ड 


१. अतदुगुण नामस एकमभेद भोजने भी प्रस्तुत क्ियादै, किन्तु उसे उन्होने 
मीलित कै अन्तगंत गिना दै मौर उसका जो लक्षण दिया है वह्‌ मम्मटके अतदुगुणसे 
सवंथा भिन्न है । 


( ४३ ) 


अलंकार दण्डी से लिए हैँ उनके लक्षणल्पी उस जल को उन्होने अपने प्रातिभ पटसे 

छान कर अपनाया है, जिसे भामह ओर उद्‌भट अपनी बुद्धिचालनी से छान चुके थे? । 

मम्मटने इन अलंकारोंको निम्नलिखित वर्गोमे निम्नलिखित क्रमसे विभक्त 
किथा-- 

१. शब्द्‌ाटंकारवगं वक्रोक्ति, अनुप्रास, यमक, सटेष, चित्र, पुनरुक्तवदाभास । 

२. अर्थालंकारवगे उपमा, अनन्वय, उपमेयोपमा, उत्प्रेक्षा, संदेह्‌, रूपक, अपहुति, 
उटेष, समासोक्ति, निदशना, अप्रस्तुतप्रशंसा, अतिशयोक्ति, प्रति- 
वस्तूपमा, दृष्टान्त, दीपक, मालादीपक, तुल्ययोगिता, व्यतिरेक, 
आक्षेप, विभावना, विशेषोक्ति, यथासंख्य, अर्थान्तरन्यास, विरोध, 
स्वभावोक्ति, व्याजस्तुति, सहोक्ति, विनोक्ति, परिवृत्ति, भाविक, 
कान्यलिग, पर्यायोक्त, उदात्त, समुच्चय, पर्याय, अनुमान, परिकर, 
व्याजोक्ति, परिसंख्या, कारणमाला, अन्योन्य, उत्तर, सक्षम, सार, 
असंगति, समाधि, सम, विषम, अधिक, प्रत्यनीक, मोलित, 
एकावली, स्मरण, ओ्रान्तिमान्‌, प्रतीप, सामान्य, विशेष, तद्गुण, 
अतद्गुण, व्याघात, संसृष्टि, संकर । 

३. उभयालकार पुनरुक्तवदाभासः 


मम्मट के इस वर्गीकरणसे स्पष्टहै कि उन्होने रुद्रट के वास्तव, ओौपम्थ, अतिशय 

मौर इङेष इन वर्गों ओर उनके उक्त क्रम को महत्व नहीं दिया। केवल साहदयमुरक 
अलंकारो को भी एक साथ नहीं गिनाया । उनमें गिने जाने योग्य स्मरण ओर भान्ति 
मात्‌ को उल्लास समाप्त करते-करते याद करिया । यदि उन्होने परिकर तक ही दशम 
उल्लास का निर्माण किया हो, तब भी साहर्यमूलक अलंकारोंके बादवे १८ अलंकारो 
का निवेचन करने का अवसर पाए हृए हैँ । इतना अवसर स्मरण को स्मरण करने ओर 
भ्रान्तिमान्‌ के प्रति भ्रान्तिमान्‌ न बनने के किए पर्याप्त था। साहश्यमुलक अकंकारों 
मे मम्मट ने साह्येतर-सम्बन्धमुलक विच्छित्तियों को मिधित कर दिया, इसलिए अत्ति- 
रयोक्ति मे कायेकारणभाव के पौर्वापयं के विपर्यय से होने वाली अतिशयोक्ति कोभी 
गिन जिया ओर प्रस्तुतान्यता तथा यदर्थोक्ति से होने वाटी अतिशयोक्तिकोभी। र्द्रट 
ने पूवनाम केदो अलंकार मानकर इस दिशा मे सावधानी बरतो थी, परन्तु मम्मटं को 


न क, 


------ ~ - 


१. यद्यपि कहीं-कहीं मम्मट की बुद्धि चालनी सिद्ध हर है ओर भामह तथा उद्भट 
की प्रतिभार्ही पट। 

९. मभ्मट ने श्द्रट ओर भोज की यह स्थापना स्वीकार की है कि अन्य अकंकार भी 
उभयार्कार हो सक्ते हैँ । उनने इन्ह उभयाकंकारो मे यह्‌ कहकर नहीं गिनाया कि 
प्राचीन आचार [ भामह, उदुभेट ] ने वैखा नहीं किया है । 


( ४४ ) 


दोनों अतिशय अभिन्न ही समञ्च मे आए, गोघृत जीर वनस्पति मे उन्हं कोई फर 
नहीं छगा । 9 


ख्य्यक [ ११००-११५० ई० | 

र्य्यक या रुचक को यह भौर ठेस ही अन्य कमिर्यां खटकीं। इनके परिहार के 
लिए उन्होने प्रस्तुत ग्रन्थके सूत्रों का अंकारसूत्रः नाम से निर्माण क्रिया । इनमें 
उन्होने अलंकारो को उनकी सजातीयता के आधार पर यथाश्चक्य वर्गङ्कित किया । 
पठले उन्होनि मम्मट के ही अनुसार अकंकारों को मुख्यतः शब्द ओर अर्थके दो भागोंमें 
वाटा, फिर उनमें से प्रत्येक भाग के अलंकासोंका वर्गीकरण किया । दण्डी से मम्मट 
तक ११०८ अल्कारोमें से रुग्यकर ने ७५ अलंकार अपनाए ओर ७ अलंकारोंकी कल्पना 
अपनी ओरसे को । इनका विवरण यह्‌ है-- 


(१) अमान्य ( क ) दण्डी के--आवृत्ति, हेत, जेष, आशीः । 
( ख ) भामह के--उत्प्रक्षावयव, उपमारूपक । 
(म ) वामन की-वक्रोक्ति। 
( घ ) भोज के--अर्थापत्ति जीर समाहित को छोडकर शेष २५ सो । 
(ङः ) खद्रट के--भाव, हेतु, मत, उभन्यास, पूवं [ दोनों |, अहेतु, 
सहोक्ति (१), उत्तर (१) समुच्चय (१) अथंरटेष 
(२) मान्य (क ) दण्डी के--स्वभावोक्ति, उपमा, रूपक, दीपक, आक्षेप अर्थान्तर 
न्यास, व्यतिरेक, विभावना, सखमासोवित, अतिशयोकित ( १) 
अतिशयोक्ति (२), उत्प्रक्षा, सूक्ष्म, क्रम (यथासंख्य), रसवत्‌, प्रय, 
ऊजंस्वी, समाहित (समाधि), पर्यायोक्त, उदात्त, अपति, इटेष, 
विशेषोक्ति, तुल्ययोगिता, विरोध, अप्रस्तुतप्रशंसा, व्याजस्तुति, 
निद शना, सहोक्ति, परिवृत्ति, संसृष्ट, भाविक, यमक, चित्र । 
( ख ) भामह के--अनुप्रास, उपमेयोपमा, अनन्वय, संदेह । 
( ग ) उद्धट के--पुनरुक्तवदाभास, लेकानुप्रास, काटानुप्रास, प्रति- 
वस्तूपमा, कान्यकिग, दृष्ठान्त, संकर । 
( घ ) वामन को-- व्याजोक्ति । 


\ डः ) शुद्रट के- समुच्चय, पर्याय, विषम, अनुमान, परिकर, परिसंख्या, 
कारणमाला, अन्योन्य, उत्तर, खार, मीलित, एकावली, प्रतीप, 
भ्रान्तिमान्‌, प्रत्यनीक, स्मरण, विशेष, तद्गुण, पिहित [खामान्य], 


असंगति, व्याघात, अधिक, वक्रोक्ति । 


| १. हम य्ह मम्मट के केवल उन्हीं दोषों का उल्लेख कर रहै टै जिनका परिहार 


अलंकारसर्वंस्वकारने कर दिया है। 


( ४५८ ) 


( च ) भोज को-मर्थापत्ति । 


( छ ) मम्मट के--विनोक्ति, सम, अतद्गुण, मालादीपक, समाहित 
| भावचान्त्य ्खतात्मक |) 


(३) स्वकस्पित १. परिणाम, २. उल्लेख, ३. विचित्र, ४. विकल्प, ५. भावोदय, 
६. भावसन्धि, ७. भावशबलता । 

इस प्रकार रुय्यक तक अकारो की संख्या १२५ हो जातीरहै। इनमे से ५३ 
अलंकार छोडकर शेष ८२ अकंकार रुग्यकने स्वीकार किए । इनमेसे रुद्रट के पूर्व॑ 
नामक अरुंकार को यदि अतिशयोक्ति में गिन ल, जो उचितहै, तो कुल अलंकारं की 
संख्या १२४ रहंगी ओर यदि र््यक की दोनों अतिशयोक्तियों को मम्मट के समान 
एक अलंकार मान ल्या जाए तो रु्यकके द्वारा स्वीकृत अलंकारो की संख्या ८१ रह 
जाएगी । इनमें यदि भावोदय आदि तीन अकंकारोंको घटा दिया जाए तो रुथ्यक 
दारा स्‌चित अलंकारो की संख्या ७८ रहेगी । | 

वस्तुतः सुय्यक को भौ भावोदय आदि अकार रूप से अभीष्ट नहीं हैँ । अतएव 
उनके लक्षण सम्यक ने नहीं दिए ओर उन धथगलंकार' कहा अर्थात्‌ इनमें अरुंकारत्व 
रहता अवश्य ह, किन्तु वह ओरहीदटंग का अलंकारत्व रहता है। वस्तुतः रसवत्‌, 
प्रेय, ऊजेस्वी ओर समाहित को भी श्य्यक अलंकार रूप से मानते प्रतीत नहीं होते । 
हमे लगता टै कि अन्त अजन्तमेंजो ८३ ओर त्४सृत्र आए हैँ उन्हँ इस प्रकार पटना 
चाहिए-- 

[ सू ८३ | रसभावतदाभासतः्प्रशमानां निबन्धनेन रसवपरेयऊजंस्विसमाहितानि, 
भावोदयो भावसन्धिभांवशवलख्ता च ॥ 
[ सू° ८४ | एते प्रथगलरुंकाराः ॥ 

इसका अभिप्राय यह हुआ कि पुनरुक्तवदाभास से उदात्त तक जो अलंकार बतलाए 
गए वे एसे अरंकार थे जो अपने आपमें परिपूणंये। अगे जो संसृष्टि ओर संकर आने 
वालेहेवेपेसेन हौकर अन्यसावक्ष है, अर्थात्‌ उनका स्वरूप अपने आप सें कुछ नही 
है।वे जो कुछ हैँ अन्य अलंकारो कौ चिन्धियो के जोड़ से बनी कथडी है । सू्रोंकाजो 
पाठ काशी ओर त्रिवेन्दरम्‌ के संस्करणों मे मिलता है उसमें "एते" शब्द है भी । निर्णय- 
सागर, मोतीलाल तथा मेहरचन्द वले संस्करणों मे इसे किसी कारण छोड दिया गया 
है । हमारी भी रृषटि इस ओर अब जाकर गई हे। 

स प्रकार के सूत्रपाठ से स्पष्ट होगा कि रय्यक ने रसवत्‌ से लेकर भावशबलता तक 
के ७ अलकारोंको अलंकार रूपसे प्रसिद्धि के कारण गिना भर दियारहै, उन्हे वे 
उपमा आदि जेसे अकार मानने को तैयार नहीं ह । वृत्तिकार की बुद्धि पर आचर्य 
होताहैकिवेग्रन्थारम्भ की भूमिकामें ध्वनि ओर गुणीभूतव्यंग्य को पृथक्‌ कर केवल 
चित्रकाव्य के लिए सूत्रों का निर्माण बतलाते हैँ ओौर अन्त मे रसवदादि को भी अलंकार 
मान बेठते है । ये भी सब गुणीभूतव्यंग्य ही है। अवश्य ही सू्नकार से चुत्तिकार 
भिन्न दै । 


( ४६ , 


उस प्रकार वस्तुतः रुग्यक के मत ने ७५ अठंकार ही अलंकार सरूपसे मान्य 2। 
उनसेसेवे ७१ प्राचीन आचार्या से ठेते ओर ४ अपनी ओर से उपस्थित कुरते हं। 
सूत्रकार रूप्यक ने इन अलंकारो को जिन (ण्डो) वर्गो ओर अनुच्छेदं म वि भाजित 


किया है उन्हं इस प्रकार स्पष्ट किया जाता टै-- 


५ कनक्क 


१. शुद्ध खण्ड 


वर्मं (१) दाब्दालंकारवगे या पौनरूक्त्यवगं 


पौनरुक्तयविच्छित्ति (१) अथपौनरुक्त्य 
(२) व्यल्जनः पौनरुक्त्य 
(३) स्वरव्यज्जनसमुदायपी° 
(८) शब्दार्थोभियपीन° 


(५) स्थान विज्ेषदिरष्टवणंपौीन ° 


वर्म ( २ ) अथाटंकारवगं 
(१) साहस्यविच्छित्ति 
(क) भेदाभेदतुल्यतामूकक 
(ख) अभेदप्राधान्यमूलक 
(अ) आरोपाश्रित 


(आ) अध्यवसखायाध्रित 
(ग) गम्यौपम्यमूलक 


(घ) भेदप्राध्यान्यमूलक 


(२) विशेषणविच्छित्ति 
(क) केव विशेषणविच्छिति 
(ख) सविरेष्य विशोषणविच्छित्ति 


(३) गम्यार्थताविच्छिति ` 


(४) विरोधविच्छिति 
(क) शुदधवि रोध 
(ख) कार्यकारणभावाशध्रित 
वि रोधमूलक 


पुनरुक्तव दाभाख 
छेकानुप्रास, वुच्यनुप्रास 
यमक 

लाटानुप्रास 

चित्र 


उपमा, अनन्वय, उपमे- 
योपमा, स्मरण 

पक, परिणाम, सन्देह, 
श्रान्तिमान, उल्डेख, अपहति 
उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति (१) 
तुल्ययोगिता, दीपक, प्रति- 
वस्तुपमा, दृष्टान्त, निदशना 
व्यतिरेक, सहोकित 


समासोक्ति, परिकर 
रेष 


पर्यायोक्त, व्याजस्तुति, 
आक्षेप | 


विरोध 
विभावना, अतिश्ञयोक्ति(२) 
असंगति, विषम, वि चिन्न, 
व्याघात 


( ४७ ) 


(ग) आश्रयाश्रयित्वमू ° 
(घ) व्यतिहारमूलक 
(५) श्यु द्कुला वि च्छित्ति 


(६) न्यायविच्छत्ति 


(क) तकन्यायमुलक 
(ख) वाक्यन्यायमुलक 
(ग) लोकन्यायमूलक 


अधिक, विशेष 

अन्योन्य 

कारणमाला, एकावली, 
मालदीपक, सार 

काव्यलिग, अनुमान 
यथासंख्य, पर्याय, परिवृत्ति, 
परिसंख्या, स्रापिति, विकल्प 
समुच्चय, समाधि 

प्रत्यनीक, प्रतीप, मीलित, 


तद्गुण, अतद्गुण, उत्तर 
(७) गुढाथपरताविच्छित्ति 


(क) शुद्ध सुक्ष्म, व्याजोक्ति, वक्रोक्ति, 
| स्वभावोक्ति 

(ख) स्फुटाथता भाविक 

(ग) उदात्तता उदात्त 


(घ) चित्तवत्याधित रसवत्‌, प्रेय, ऊज॑स्वि, समा- 
हित, भावोदय, भावसन्धि, 
भावशबलता 
२. मिश्र खण्ड 
(१) संसृष्टि (क) राब्दालकार संसृष्ट 
(ख) अर्थालकार संसृष्ट 


(ग) उभयाकुकार संसृष्टि 
(२) संकर. 


शेष पाच में चार अलकारों को वृत्तिकार ने इनमें से कुछ अलंकारो के वैपरीत्य के 
आधार पर तत्‌ तत्‌ संदर्भ मे प्रस्तुत बतलाया है। ये निम्नलिखित है-- 


(१) विनोक्ति सहोक्ति-विपरोत 
(२) अप्रस्तुतप्रशंसा समासोक्ति-विपरीत 
(३) विशेषोक्ति विभावना-विपरीत 


(४) सम विषम-विपरीत 
शेष बचता है अर्थान्तरन्यास । इसको अप्रस्तुतप्रशंसा के सम्दभमे रखने का 
कारण वृत्तिकारने सामान्यविशेषभाव ओर उस पर आध्रित समथ्यंसमथंकभाव 
मानादहे। 
ट्स प्रकार सु्यक ने अर्कारोका विभाजन केवर दो खण्डो मे किया ( १ ) राब्द 
खण्ड ओर (२) अथं खण्ड । उन्होने शब्दार्थोभय-खण्ड की कल्पना को उन्मेष तो 


( ४८ ) 


दिया हे परन्तु उसे मम्मट के ही समान अंकुरमात्रता तक सीमित रखा दै, भोज के 
समान पल्लवित नहीं किया । | 

ठेखा लगता है कि-- 

जिन पत्रिकां पर अलंकार सूत्र लिति गयेये उनमेसे तुल्ययोगिता से लेकर 
निदंना तक की पत्रिका व्यतिरेक जीर सहोक्तिकी पत्रिका के पहले रख दी गई । 
अन्यथा अभेदप्राधान्य के वाद यदभ्राधान्य को स्थान दिए विना गम्यौपम्य को स्थान 
न दिया जाता । | 

उक्त वर्गीकरण मे समासोक्ति, प्रतीप, सामान्य मौर मीलित भी साहश्यमूकक 
अलंकार है जिन्हे गम्यौपम्य मे गिना जा सकता था, परन्तु सम [सोक्ति को परिकर ओर 
दटेष के साथ गिन दिया गया हे, जिनमे इटेष तो सार्य मूलक मानाजा सकता 
परन्तु परिकर नहीं । विकल्पारंकार भी साद्य की विच्छित्ति अपने गभे मे चिपाए 
है ! अतिशयोक्ति के समान अप्रस्त॒तप्रशंसा को दो भागों मे विभक्तं कर उसके 
सदृद्यमूलक भेद को भी रग्यकराचा्ं पृथक्‌ रख सकतेध, अन्योक्ति नाससे, जेसा कि 
ूर्वाचार्यो ते किया धा, परन्तु उन्होने उस पर कृपा नदी की ।› 


५ 


अल्लंकारतच्व 

भारतीय चिन्तन नें काव्ये को अकाल्य से पृथक्‌ करने वाले जिन तच्वों का 
अनुखन्धान करिया, संस्कत के कान्यशास्त ते उनके नामकरणं का राताव्दियों व्यापी 
एक रोचक इतिहास प्रस्तुत किया ६ । यह्‌ इतिहास वैज्ञानिक भी टै) 

“चित्रे निराटम्बनमेव मन्ये ग्रमेयसिद्ध प्रथमावतारम्‌ ॥' 

कहने वाके अभिनवगुप्त ते साक्षात्कार कौ मानस प्रक्रिया में वस्तु के प्रथम प्रतिविम्वं 
को जो पार्ववरत्ती अन्य पदार्थो के प्रतिबिम्बो से अस्पृष्ट जौर स्व~मात्र सीमित किन्तु 
परिपूणं या समग्र मानाधाः उसका ठीक उदाहरण हमारा उपर्युक्त कान्य-चिन्तन 
हे । हमने सवसे पहले भरतमुनि के तब्दों मे कहा "रषः काव्याथेः' 1 काव्य की मूलभूत 
वष्र है! इषे रनद म काय पती चछ ^ _ -------- रस है। दुखरे शब्दों मे कान्य ठेसी वस्तुओं को प्रस्तुत करता है जिनमें हमारा 


१. जरंकासें के वर्गीकरण पर द्रष्टव्य ग्रन्थ-पण मधुसूदनजी का साहित्य - शासनीय 
तत्वों का आधुनिक समाखोचनात्मक अध्ययन" प° १२५२८ डां० रामचन्द्र द्विवेदी 
की “अंकारमीमांसाः प° १८०-९६, श्रीकन्हैयालालपोहा रकृत 'सेस्कतसाहित्य का 
इतिहास' भाग २, पृ० १०३, पर पुरुषोत्तमशमां चतुर्वेदी का (अलंकारो का क्रमिक 
विकास' प° १०९- ११६ । इन सवमें महत्व रुग्यकसूत्रों को ही दिया गया टे । 


( ४६ ) 


चित्त रमतारहै, जो हमे प्रिय हैँ ओर उनके दारा वह हमारे संवेदन कोजगादेता है, 
हम हमारी प्रिय वस्तुओं का मानख ओर अभौतिक संभोग करने रगते हँ । कामशाखर 
के प्रणेता वात्स्यायन भीरसकी बात करते है, किन्तु उनका रस कान्यरसमसे भिन्न 
हे! उनका रस॒ रति-परिणति मे प्राप्त होने वाली वेदनामुक्ति है, जिसका अधिकां 
परित्यागात्पक है । कान्यरस परिणति नहीं, उसके पहले की चवणा है । ताम्बूर्वीटिका 
रसिक के मख मेँ छिपी बैठी रहती ओौर क्रिसो रस की पृष्ट करती रहती है । एेसा 
नहीं कि उसका रस उसकी परिसमाप्त की प्रतीक्षा करता हो । वस्तुप्रतिबिम्ब हमारी 
चेतना पर अंकित होता ओर विम्बगत असाधारण्य से मूक्त हो वह हमारे लिए एकमात्र 
प्रेयोविषय ही बनकर उपस्थित होता है । इस प्रियोविषयीभूत प्रतिबिम्ब-घन के सुदीघं 
अंकन को काव्य प्रस्तुत करता ओर हमें इन प्रतिबिम्बो क) गोपिकाओं से रास करते 
रहने का उत्तम अवसर देता है । बस, इसी रास-रस के कारण वह्‌ अकाव्य से भिन्नहै। 

यह रस अपने भीतर उन भावों को भी समेटे रहता ह जिन्हे खोक मे रति, शोक, 
हास आदि कहा जाता है 1 अन्य समस्त सामग्री में इन भावोंकी सामग्री वरिष्ठ ओर 
शरेष्ठ होती है । बाद मे रसशब्द केवर इसी सामभ्री तक सीमित हो जाता है । 

सौन्दयंवाद्-- वामन “रस "शब्द को छोड़ते ओर सौन्दयं*-शब्द को अपनाते 
है। वे कान्यको अकाव्यसे भिन्न करने वाङ तत्त्व को 'सोन्द्यंः की संज्ञा देते है । 
अवश्य ही सौन्दयं रसकी अपेक्षा एक व्यापक संज्ञा है। सौन्दयं प्रमातुखापेक्ष होने 
की अपेक्षा प्रमेयसापेक्ष अधिकहै। रस इसके विपरीत प्रमातृसापेक्ष अधिक था। इस 
प्रकार रसवाद कै प्रमाठरेतट से काव्यचिन्तन की धारा सौन्दय तक आते-आते प्रमेय- 
तट की ओर अधिक ्षुक गई! फलतः कलाके स्व" की मीमांसा ने जोर पकड़ा ओर 
उसका ग्रहीतृपक्ष इब हो गया । इस प्रकार रस ओर सौन्दयं दोनों की उपरन्धिरयाँ 
एकाद्खी रहीं । 

चाश्त्धवाद्‌-आनन्दव्धंन ने रस ओर सौन्दयं दोनों की अन्विति ओर उसके 
किए एकर मध्यम मागंकी खोज की। उन्होने “चारुत्व' को स्वीकार किया । चारुत्वं 
प्रमातृपक्ष ओर प्रमेयपक्षके मध्यका बिन्दुदहै। वह जितना व्यक्तिसापेक्ष है उतना 
ही वस्तुसापेक्षभी। न वहु मायावाददहै, न भूतवाद। वह्‌ परमरशिववाद है । उसमें 
जितना सत्य शिव है उतना ही यह संसारात्मक भैरव भी। दोनों एक ही हँ । चाहे 
इस छोर से देखा जाए चाहे उसकछ्छोरसे। तथ्यएकहीदहै। "चारुत्व' की इस समन्वय 
भूमिकामें कलाके स्व'का भी महत्व रक्षित था ओर प्रमाताके संवेदन काभी। 
दसम रसकी रक्षाभी थी भौर सौन्दयं की भी। इसे कहा जाए तो 'सौन्दूर्य-रसः 
या 'स्वसंवेदन' कहा जा सकता है । 


आनन्दवर्धन तक आते-आते काम्यरूपी पुष्पवीथिका के विषय मेँ यह स्थिर हो गयां 
कि उसका सर्वस्व चारुत्वरूपी सौरभ! है । अब केवल पृष्पो की गवेषणा शेष रह्‌ गई । 


< अ० भू 


( ५० ) 


यह सी कोई नई बातन थी । यह शी भरतमृनिसे ही होती आ रही थी । परवर्ततां 
आचार्यो ने उसी पर कुछ नए परिवेष सें विचार किया ) 
अल्तङ्नर--भरतमूनि ने अनुभविता को प्रभावित करने वाञे तत्वों केखूप मे लक्षण 
ओर अलङ्कारो के नाम से पुकारी जाने वारी कुछ विरेषताओं की खोज की । इन विशेष- 
ताओं मे अलङ्कारो को धिक महत्व दिया गया । दण्डी ओर भामह ने इख दिशामं 
पर्याप्त चिन्तन किया 1 उन्होने अलच्कारों कौ अनेक विच्छित्तियोंको खोजा । अलङ्कारो के 
ही साथ इन आचार्यो ने गुणनामक तत्तव की ओी खोज की भौर कुछ काव्यशलियो की 
ओरभी ध्यान आकृष्ट किया। वामनने इन ज्नेलियों को खवधिक महच्व दिया ओर 
इन्हे "रीति के नाम से पुकारकर काव्यात्मा स्वीकार किया) वामननेदो कायं ओर 
किए। एक तो गुणों को रीतिगत विशेष धर्म स्वीकार किया भीर दूसरे अलङ्कार-संज्ञा 
करी शत्यविकित्षा वैसे ही की जसे परवर्ती आचाय आनन्दवर्धन ने जथं'संजञाकी। 
आनन्दवर्धन ने काव्यगत बर्थ को वाच्य ओर प्रतीयमान नामक दो भागों मं विभक्त 
माना। वामनने भी अलङ्कार तत्त्व कौ सौन्दर्यं मौर उपमा आदि की विच्छित्ति के 
हय में प्रविभक्त बतलाया । इन दोनों भागो में भी वामन ते सीन्दयं' भाग को प्रधान 
माना । वस्तुतः इन्द दो भागन कहकर व्यङ्य भौर व्यन्जक कहना चाहिए ओर 
मानना चाहिए कि आनन्दवर्धन को व्यल्जना कर त्रेरणा वामनसे ही मिली । वासन 
भी वैयाकरणयेदही। | 
तौन्द्थं कौ इख व्याप्ति ओर सीमा को वामन क समकालीन आचायं उद्वट ने 
नहीं पहचाना 1 उन्होने केवल विच्छित्तिपक्च को महत्व दिया ओर काव्यालद्खारसार- 
संग्रह नामक ग्रन्थ में रूपक आदि के रूप न ही मलङ्कार को स्वीकार किया । 


शवनि--आनन्दवर्धन ने इन दोनों धाराओं मे उर्धट की धारा को अतीव स्थुल 
ओर अक्रिचन घोषित किया। वामन की लोन्दरथ-धारा को स्वीकार करके भी उन्होनि 
उसके लिए उपादानके रूपमे विविध प्रकार की खामभ्री उपस्थित की । व्यल्जना की 
विदयच्छक्तिका माधय ले उन्होने एक नवीन लोक कीही सृष्टिकर डाली, जिसमे न 
रूपक आदि अलङ्कारोंकादही पहच्व था, न गुणो का ओरन रीतिया वृत्ति का 1 उसभ 
महत्व केवल चारत्वनिष्पत्ति का था ञौरथा उसके लिए अपेक्षित उन सम्पूणं काम्य 
घटकों का जो, गुण ओर अलद्कार, रीति ओर वृत्ति भी थे ओर उनसे परे भी । आनन्द- 
वर्धन ने गुण आदि से परे व्यंग्यनामक एक प्रतीयमान अर्थं का अन्वेषण किया ओर 
प्रधानता के आधार पर उसे ध्वनिसंज्ञा दे काव्यात्मा स्वीकार किया । उन्होनि अरुद्कारादि 
को वाग्विकल्प कहा ओर उन गुणीभूतन्यंग्यनामक काव्यभेद के अन्तगंत अन्तभूत 
माना 1 अलंकारो को आनन्दवर्धन ने बहुत ही उपेक्षापूणं दृष्टि से देखा । अभिनवगुप्त 
ओर मम्मट ने आनन्दवर्धन के दस पक्ष को तूल दिया भीर उद कान्यत्व क निष्पत्ति 
के लिए वैकल्पिक महत्व का तत्तव स्वीकार किया । इन आचार्यो ने अङंकार के साथ 


( ५१ ) 


ही अलंकाय की भी कल्पना की ओर अलंकायंके रूपमे रस आदिको ही स्वीकार 
किया इनने यह भी स्वीकार क्रिया कि अकंकार कभी-कभी रसविरोधी भी बन 
वेठता है । 
वक्रोक्ति--इसी बीच एक ओर समर्थं आचायं हृए- कृम्तक । इनने अलंकार 
पक्ष को व्यापक परिवेष में देखा ओौर उसे वक्रोक्ति के अतीव विस्तृत क्षेत्र तक फैलाया । 
इस भगिमा भें उन्होने ध्वनि, अलंकार, गणो मौर रीतियों को वैसे ही समाविष्ट साना 
जेसे महोदधि म भिन्न तरगों को अथवा सधुमास मे पुष्पों को समाविष्ट साना जातां 
ठे। इस चिन्तनने काव्य की उन अनेक विधाओंको भी अपनाने का अवसर दे 
दिया जो अन्य चिन्तनों मे अपनाई नहीं गई थीं । कथन के उस प्रत्येकं प्रकार को इसं 
भागने अपने परिवेष मे समेटा जिससे चमत्कार का अनुभव होता था ओर उक्तिमें 
विच्छित्ति आती थी । वक्रोक्ति अपने आपे एक अल्कारहीहै। 
इस विवरणसेस्पष्टहैकि उपादानमीमांसा में भी अलंकार को अधिक आचार्यो 
ने महत्व दिया । उसके उपर काग्यात्ममी्मासामे तो सौन्दर्यं के रूपमे अरेकार 
कोस्थान भिलही चुकाथा। इस प्रकार काव्यशालके चुनावी सैदान मे जीत 
किसीकीभी हो परन्तु इतना निदिचत है कि चिन्तन का वास्तविक *बहुमत अरुकार'- 
तत्त्व पर अधिक टिकाथा। 
अलकाररोब्दको रूढिसे बाहर निकालकर ओर केवल उपमा-रूपक आदि तक्‌ 
निरुद्ध न मानकर यदि अपने विराट्‌ खूप मे देवा जाए तो लगेगा करि गवेषकों के अन्तमेनं 
मे उसके प्रति जो एक समादर छिपा हुभा है, वह तथ्याधित ओर आदरणीय है । 
वस्तुतः जो अतिशय तत्त्व है वही अलं-तत्तव है । अतिशय-शन्दआकारबृहुर्व 
का अभिलापक न होकर भविरोषता' का अभिलापक है । सामान्य को विशिष्ट बनानेवाला 
तत्तव ही (अतिय'-तत्तव है। जो वाङ्मय रोक-साधारण ओौर वक्तव्यमाच तक, 
सुचनामात्र तकं सौमित रहता है वही अतिशय के आते ही रसनीयता, आस्वाद्यत 
ओर स्पृहणीयता तक पहुंच जाता है । रसनीयता, आस्वाचता या स्पृहुणीयता ही 
हँ वे "विशेष" जिनसे उक्ति में कान्यत्व का आधान होता है! इस प्रकार अतिशय 
तत्व या विशेष तत्व काव्यत्व के उत्प हैँ ओौरये ही है अल'-तन्तव । अलंभाव या 
भल्त्व' ही है अलंकार । हम इसे संक्षिप्त के विस्तार ओर विस्तृत के संक्षेपे देख 
सकते हे । बीजका रातशत राखाओं वे वृक्ष के रूप में परिणत होना यदि उसका 
अलुंभाव दहै तो विशार वनश्रीका फोहुया चित्र मे प्रतिदिम्बनद्रारा संक्षेपीकरण्‌ भी 
अरंभाव है । सतिशय दोनोमेहै। [ द्र° हमारा ङेख सा हित्यतत््वविमरेः | 
इस प्रकार के अकुभाव को अरुकार मानकर व्या हम उसे काव्य का सर्वातिराथी 
तत्व नहीं कहू सकते ? 


जहां तक उपमा-रूपक आदि विच्छित्तिओं का सम्बन्ध है मौर सम्बन्ध है तदितर 


समस्त काव्यत्वाधायक्‌ तत्वों का वे इस (अतिराय'-तरष-रूपी परिमल के किए 


व सि 


(.43 ) 


विविध पुष्प माने जा सक्ते हैँ । वाक्यमें अतिशयका नधान य दि उपमा आदिके 
दारा होतादहै तो विभावादि की रससामग्रीके दवारा मी होता ही दहै। वस्तुतः 
रससामश्री का संयोजन भी एक उक्तिधमं टै। काव्यजास्रीय चिन्तको मे भोज आदि 
का मस्तिष्क इस ओर भी पहंचा। वे विभावादि योजना को “रसोक्तिः कहते, 
गुणयोजना को स्वभावोक्ति जर उपमा जदि की योजना को वक्रोक्ति। यानी उक्ति 
विशेष ही है काव्य, जीर उक्तिगत जो "विशेष है थात्‌ रस, गण ओर स्वभावपद- 
वाच्य तदतिरिक्त शेष सवब,वे अलंकार हीदँ, क्योकि वे ही कान्यलोभा के जनक 
धमं है । 

इस प्रकार वस्तुवादी दृष्टिकोण से या प्रमेय निष्ठ चिन्तन से स्स ओरगुणभी 
अलभाव के जनक तच्वही दहै ओर दूरे शब्दोमें अर्कार हीदँ भरत के बाद 
दण्डी ही काव्यास्रके प्रथम आचार्यं है । उन्होने इसी दृष्टिकोण को अपनाया हे ओर 
रसोको अलंकारो मेही सच्चिविष्टकियादहै। क्या कला का कोई स्वगत धमं नहीं माना 
जा खकता ? 

कला एक संरचनाभी तो है, माना कि वह स्वयं के अन्तिमि रूपमे विज्ञानघन 
ओर “अनद्ध" है। क्या अनङ्ख अङ्गना | उत्तम अद्धो वाटी नारी मुत्ति | कौ अपेक्षा 
नहीं रखता । अन्ध का स्थूल अङ्ग यानी शरीर भलेहीन हो, स्वयं मे वह्‌ अत्यन्त 
नीरूप हो तथापि क्या उसका कोई मानस रूप नहीं होता । यदि होत्तादै तौ क्या 
उसे सर्वथा अनद्ध कहा जा सकता है? क्यामन अद्ध नहींटै? आखिर सूक्ष्म शारीर 
भीतोदरीरहीदहै। अवद्यही जो तत्तव मनोभव दै, जो आत्मभू है वह्‌ अनङ्ख 
होते हए भी अद्ध दै, शरीरी है भीर दारीरसापेक्न है। उसका एक पक्ष शरीरपक्ष 
भी है! कला का विज्ञान विषयनिरपेक्ष नहीं । विषय का अस्तित्व भी यह केवल 
प्रतिभास नहीं । उसका बहुलां यहाँ अपने आपमे भले ही प्रतिविम्बात्मक्‌ ओर 
इसीलिए प्रतिभासात्मक हो, वह लोकगत विम्ब कौ अवेक्षा अवश्य ही रखता दहै । देत- 
कला का तद्‌ दाम्पत्य ही यहाँ खवंस्व है; मौर एेक्य नही, साहित्य ही यहाँ की प्रधान 
विभूति है । साहित्य क्या किसी एक छोर के असत्य होने पर सम्भव है । निर्चित ही 
कला का कोई स्व" भी दहै ओर उस स्व मे रहनेवाली उसकी अद्ुश्रुत विशेषताये भी है । 
इन समस्त विशेषतां की एक ही संज्ञा है अलंकार । 

खजुराहो की अप्सरोमूतियां अङ्धप्रत्यद्धो मे जो संतुक्िति मासक्ता या उभार लिए 
हए है, क्या वह॒ उनका कोई "अलंकार" नहीं है ? क्या वह उभार कोई प्रातिभासिकं 
धमं है? क्या उससे उत्थापित मानस श्यृद्खही सब कुट? इसक्एु क्या उस 
उभारको प्रमातृनिष्ठ रस-मात्र कहकर चिन्तक स्वयं को कृतकृत्य मान सकता है ? 
यदि उसे रसजनक कहा जाए तो रस कै लिए उसकी उपादेयता स्वतः सिद्ध है । तब 
यह सोचना होगा कि यह सामग्री जहाँ नहीं रहती वहाँ रसनीयता क्यों नहीं आती ? 


कध त 7 = । च | ~~~ = 1 ^ म छ 


यक्ना 


क त ककः क 
। 
। 


। §8 )) 


यदि वहाँ रसनीयता नहीं आ पाती ओर इससामग्रीके रहते ही वह आती हैतो 
अवरस्य ही यह सामम्री रखके प्रति कोई असाधारणता है ओर यदि असाधारणता दहै 
तो क्यों न उसे उखके आश्रय का अत्तिराय' माना जाए, उसे उसकी विशेषता स्वीकार 
किया जाए, ओर अन्ततः उसेक्योंन अल्भाव का जनक अरकारतत्त्व स्वीकार 
किया जाए । 

सांकेतिक, प्रतीयमान, अप्राकरणिक या अन्य अथं की विभूति, उसका इन्द्रजाल 
ध्वनि-शब्द से पुकार भले ही लिया जाए, किन्तु वस्तुपक्ष की दृष्टि से अवश्य ही वह्‌ 
भी कला की सस्व'-गत विशेषता भी है ओर इसलिए अन्वय तथा व्यतिरेक के आधार 
पर वह्‌ भी अतिशय ओर अकंभावकी सीमाके भीतर है। इसीलिए उसकी संज्ञा 
अलंकार की जासकतीटहै। आखिर अनेकाथक शब्दों के प्रयोग मे ध्वनि को शब्द 
शक्तिके खुटेसे बंधा च्च वत्स मानाही जाता है। क्यों? शाब्दशक्ति से उसे 
क्यो बांधाजा रहाहै? इसीलिएन, कि वहा शाब्द का “अतिशय मेटा नहीं जा 
सकता । उसे स्वीकार करने हेतु चिन्तक बाध्यटहै। आखिर ध्वनि का बृहत्‌ क्रुष्माण्ड 
उस शब्दशक्ति की तन्वी तामे हीन अटका हुभाहै, भके ही प्रमातृचेतना की 
छत भी उसे सधे हुएहो। कहनान होगा कि ध्वनि का घटोत्कच कितना ही 
विशाल क्यो न बन जाए वह है किसी हिडिम्बा का प्रसाद । वह उस माता का स्तनंधय 
वत्स हं, उसके आंचल में संह र्गाकर चुस्की दाबता उसके उत्संग का मांगलिक अलंकार 
दै। निरिचत ही ध्वनिभूमिका भी कला-क्षे्र से आत्यन्तिक परथक्ता नही रखती । 
वह उसमे अत्व का निष्पादन करती ओर इसीलिए उसका अलंकार बनती है । 

शओचित्य--कला जिन प्रतिनिर्म्बो को हमारी चेतना पर अंकित करती दहै, हम 
उन्हं अपनी रुचि ओर अपने संस्कारों के अनुरूप सजा हभ देखना चाहते है । उनको 
इस सजावट के साथ प्रस्तुत करनेकाजो ओचित्य है वह॒ भीकलाके सस्व का, 
उसके "आपे" का अतिशय है । अवश्य ही वहु वैसानदहोतो हमें सुचेगा नहीं ओर यहं 
उसका दोष होगा । इस दोष की मुक्ति यदि दोषाभाव है अथवा परित्य ्त-परित्याग 
है तो ओचित्य नामक तत्त्व दोषाभाव से अधिक क नहीं है। इसे हम उपादेयतां 
मं कारण मानेगेही, ओर अनुपादेयता मे इसके अभावको कारण मान इसे एक 
अस्तित्वसंपन्च वस्तु भी मानेंगे, मौर उस रूप में यह कला के स्वगत धर्मोमे ही गिना 
जाएगा तथा अलकार'-सीमा का उल्टंघन न कर सकेगा । 

इस प्रकार रस, अलेकार, रीति, ध्वनि, वक्रोक्ति गौर ओचित्य के परिकषेत्रों में 
विभक्त काव्यचिन्तन मुर्तः एक ही धुरी पर घूमता दिखाई देता है। वह है 
अतिशय की धुरी, अरुंभाव की धुरी, अतएव अलकृतितत्तव की धुरो । एवं, अकंकृतितत्व 
एक सामान्य ओर व्यापक तत्व है काव्यात्मा का! काव्य एक कला है ओौर 
क्योकि वह्‌ स्वायम्भवी सृष्टि टै, संकत्पयोनि, मनोभवा या प्रज्ञानघनीय सृष्टि है, 
प्रतिनिम्बात्मिका है अतः वहु उसकी समग्रता में वसी है, आंलिकता मे नहीं । अभिप्राय 


( ५& ) 


यह्‌ करि विम्बमें लगा तिलक भलेही बाह्यहो, विम्ब से भिन्न हो, किन्तु प्रतिविम्ब 
मे रगा तिलक निस प्रकार प्रतिविम्बात्माकी सृष्टि, निमिति, अभिव्यक्ति, प्रतिभा 
या प्रज्ञप्ति के साथ ही कणं के साथ उसके कवचकुण्डल के समान निष्पन्न होता है उसी 
प्रकार लोकभरूमि पर वस्तु गीर वस्तु के अतिकयाधायक तच्च भलेही भिन्न हों किन्तु 
कृलाभुमि पर वस्तु ओर उसके अतिच्याधायक तत्त॒ वैसे नहीं होते! एेसा 
नहीं कि दपणमें वनमालाविभूषित श्रीकृष्ण [ परमात्मा | प्रतिबिम्बित हों तो उस 
प्रतिविम्बमेवे स्वयंही प्रतिबिम्बित होकर रह जा, उनकी वनमाला प्रतिविम्बित 
नहो ओर वह्‌ उनके प्रतिविम्ब में अलग से संयोजित की जाय } श्रीकृष्ण का श्रीविग्रह 
जौर उनका अकरण वनमारा, दोनों एकं सखाथ प्रतिबिम्बित होते ह । कला मे, प्रति- 
विम्ब, चिच्रमें, अलंकाय ओर अरुंकृति दोनों सहजात होते हँ, कऋमोत्पन्न नहीं । 
इस स्थिति में यह केसे कहा जा सकता है कि अलंकार अलंकायं से भिन्न ओर उसकी 
घटकृता से रहति रहते है। 


अलंकार की बाह्यताकी भ्रान्ति शरीर कै टृष्टान्त के कारण हूर्ईहै। कटक 
कुण्डल आदि श्रीरसे अवश्य ही भिन्न रहते ओर आहायं हुआ करते है । शरीरम 
वे अवद्य ही उपरी वस्तु, ल्रीर स्वयं नही, उसकी आत्मा भी नहीं । किन्तु यह्‌ 
साट्टय एक विकलांग साहद्य है । सोचना यह होगाकि भटेही सामान्य शरीरके 
घटके न हों अकार, क्िन्तुक्या सुन्दर शरीर कैभी वे घटक नही होते ? सौन्दयं 
अपने उपादानों के बिनाक्या शरीरमें आ सकेगा? यदि नहीं तो उसके उपादानोंको 
उसकी निष्पत्ति के पूवं दारीरमें मानदहीचेना होगा । कान्य केवल शरीर नही, सुन्दर 
शरीर है। केवर शब्दाथंयुगम कान्य नहीं, अपितु रमणीय शब्दार्थं काव्य है, सुन्दर 
रब्दाथं काव्य है। निदिचत ही शब्दाथं की आत्मा यदि सौन्दयं के बिना काव्यत्वशुम्य 
है ओर सौन्दयं कैवल शरीर से निष्पन्न नही, तो उसके उपादान काव्यत्वं कौ निष्पत्ति 
के पह्ङे से शब्दाथं के रोम-रोम में संनिविष्ट हैँ । यौवन के साथ शरीर, किसी के सौभाग्य 
का पात्र वनताहि। एेसा नही कि सौभाग्य पहठे आकर बेठ जाए, यौवन बाद में 
माए । क्रया सिन्दूरदान बादमें होता ओर वधर कोहवर में पहले ही प्च जाती हे? 
जरंकार गीर अटंका्ंके बीचलोक मेँ भटेही संयोगसम्बन्ध हो, कलाभूमिका पर्‌ 
तो उनके बीच एकही संबन्ध संभव होगा--समवाय। इस प्रकार कला ओर काव्य 
का अलंकार, एक आन्तर, अबाह्य ओर आत्मीभरूत धमं है । धर्मी से उस्षका अभेद है । 
उसमे भेद ही एक प्रातिभासिक तथ्य है । ठीक ही कहा गया है साल्कारस्य काव्यता, 
न पूनः काव्यस्याकंकारयोगः' [ कुन्तक १।६ || 


उक्त आधार पर अरुकार अपने उपमा आदिकेरूपमेंभी काव्य की आत्मादहै, 
कान्य है, काव्यनिष्ठ अन्यूनानतिरिक्त धमं है, इसीलिए जौर काव्यनिष्ठ अलकायता का 
अवच्छेदक भी है यानी काव्यत्वरूप ही है । 


क्कः (4 0 ज 0 9 क क न्न ~+ ~ +. बि 1 (य 


( ५५ ) 


हम अदोक का अथं कर ङे केवल वृक्ष ओौर फिर कहँ कि उसकी आत्मा सौरभ है 
तो कह ही सकते हैँ, किन्तु यहहमारा दोष होगा । वस्तुतः अगोक एेसे एक समग्र व्यक्तित्व 
कौ संज्ञा है जिसका एक घटक सौरभ भी है । सौरभ उस व्यक्तित्व की विभषा है, उसका 
अकार दै, यद्यपि अशक कासारा व्यक्तित्व उसी के किए उपादेय है। हमने 
काव्यात्मक अशोक को सीरभसे पृथक्‌ कर देखा केसे ? हम मनुष्य का अथं सद्योजात 
वच्चा करलं ओरकरँंकि वहतो अरुंकारमाव्रहै, अलंकायं है सुवासिनी ओर 
सौभाग्यवती माँ का उत्संग जिसमे वह्‌ समाया रहता है तो ेसा कहू हौ सकते हैँ । किन्तु 
क्या सद्योजात शिशु मनुष्य नहीं होता । शो का अथं गोचित्र कृर हुम उघके यथार्थं 
को समञ्ति हए शगोमाता' के दैवत विग्रह को भी गो-पद का अर्थं कट ओर कहं कि 
यह्‌ हमारी नई सूञ्लहै, त्रुतन स्थापनाहै तो हमारा संह कोई नहीं पकड़गा ओर 
एसा हम कह ही सकेगे, परन्तु इन कथन पे सुतनता की डींग कोरा दम्भ होगी । 
प्रथम हृष्टि गोमाता पर ही जानी चाहिए थी । हमने गोचि्र को गोमाताः समञ्च कैसे 
ज्या? यह हमारी दष्टिका दोष है; न अशोक का, न मनुष्य का ओर न गोराब्द 
का । 'अलकार'के विषयमे भी हमारे चिन्तन ओर व्यपदेश-विधान कौ यहो स्थिति 
है। हमने अलद्धुार-शब्द को उपमा आदि तक सीमित समन्षा ही क्यों? यदि समन्ला, 
तो यह भी समज्लना चाहिए था करि अलद्धारशब्द से अभिधेय समस्त तत्त्वों मे कदाचित्‌ 
उपमा आदि अधिक प्रभावी ओौर अधिक चमत्कारी हें । फिर हमे अन्य तत्त्वों की ओर 
उन्मुख न होनाथा। भीर यदि स्चिभेदके कारण हम उन्मुख हुए भी तोहमें 
अपने चिन्तन की स्वस्थता नही खोनी चाहिए थो, उसमे संतुलन बनाए रखना चाहिए 
था। इतिहास साक्षी है--"हमने वेसा नदीं किया। प्रमातृनिष्ठ चिन्तन की प्रधानता 
ने हमें व्यक्तिवादी बना दिया, हमने वस्तुपक्ष से अपनी आंख बहुत दुर तक फेर लीं 
ओर हम मसंतुलन के उपारुप्भ मे आ पडे । आनन्दवर्धन का था यह्‌ प्रसाद । 
इस प्रकार हमने देखा कि काव्य को आत्मा अर्थात्‌ काव्य को अकाव्य से पृथक्‌ 
करने वाला तत्त्व या काव्य की उपादेयता, प्राह्यता का बीज, एक ही है ओर उसका 
एक ही नाम है अलङ्कारः । 
काव्यालङ्कार" नाम से जिनने ग्रन्थ लिखि उनमें भामह, उद्धट, वामन ओर 
ण््रटने अलङ्कारो का विवेचन अवश्य प्रचुर मात्रा में किया परन्तु उनमेंसेकिसीने 
अलङ्कार को काव्यकी आत्मा भी कहा हो एेसी बात नहीं है । उक्त चारों आचार्यौ 
मे एसः कोड उल्छेख नहीं मिलता । परवर्ती कन्तक ने पने ग्रन्थ की कारिकाओं को 
काव्यालद्धार कहा ओर उनम वक्रोक्ति को कान्यजीवातु स्वीकार किया, किन्तु यह्‌ 
स्वीकृति आनन्दवधन के बादकी थी ओौर इसके आधार पर अकंकार को कान्यात्मा 
कहने का पक्ष समथन नहीं पाता, क्योकि कुम्तक ने वक्रोक्ति को काव्यात्मा स्वीकार 
किया, जो एक पृथक्‌ संप्रदाय है, जिसकी कान्यास्मवाद मे अलंकार संप्रदाय से अलग 
गणना कौ जाती है । ; 


( ५६ ) 


इस प्रकार ( १) रसः काव्याथेः ( २ ) रीतिरात्मा काव्यस्य 
( २ ) काव्यस्यात्मा ध्वनिः ( 1 ) वक्रोक्तिः काव्यजीवितम्‌ तथा 
( ५) ओचित्यं रससिद्धस्य स्थिरं कान्यस्य जीवितम्‌ 

के समान कोई वाक्य अलंकार" से सम्बन्धित नहीं मिता, जिसमें अरुंकार को कान्या- 
तमाया कान्यजीवातु कहा गया हो। वामन रीतिवादी आचायं हं । उन्होने काव्यं 
ग्राह्यमककारात्‌, खौन्दयंमरुंकारः' कहकर जिस “अकंकारतच्व' को कुछ महत्व दिया 
है उससे भी उपमा आदि की कान्यात्मता का कोई पश्च सामने नहीं आता, क्योकि 
यहां जिसे अलंकार कहा गया वहु उपमादि नहीं अपितु सौन्दयं है । फिर वामन स्वयं 
ही रीतिरात्मा काव्यस्य कहकर अलंकार-पक्ष से अलग हट जाते हैँ । इस प्रकार यह्‌ 
जो प्रसिद्धिटहै कि साहित्यशास्रके ६ संप्रदाय हैँ ओर उनमें एक संप्रदाय अलकारः 
को काव्य की आत्मा मानने वाला न जने इसका क्या आधार है । इसका 
आधार कदाचित्‌ "काव्यारुकार' इस प्रकार अख्ंकार के नाम पर ग्रन्थोँका नामकरण 
है । वस्तुतः अकार को काव्यात्मा मानने कौ प्रसिद्धि अलंकार की उस छाप 
पर आधितहि जो भालोचक या काव्यकलाविद्‌ के अचेतन मन पर पड़ी हुई थी 
ओर जिकर अनुसार अलंकार परिभोगयोग्य परिधान नही, अपितु प्रणम्य देवतरूपांकित 
रत्न था । उदयन के अवरोध मे अज्ञातवासं कर रहीया अग्निमिच्र के अन्तःपुर मे 
रापसेविका क क्षण व्यतीत कर रही दिन्यकन्या सागरिका ओर मालविका के समान 
अटंकृतितच्व का अतिश्यय भी द्रष्टा कोप्रभावित क्िएहृए था भौर वह्‌ मन ही 
मन सोच रहा थाकि यहु कोई असाधारण महत्वं कौ वस्तु है, जिसे काव्यात्मा 
भी कहा जाए तो अनुचित नहीं । वस्तुस्थिति स्पष्ट होने पर अन्ततः सागरिका ओर 
मारविका उदयन ओर अग्निमित्र की राजरानी वन ही जाती दहं, 

चिच्रकाव्य--यही कारण है कि गानन्दवधनने वाक्य के रस आदि से रहित 
ओर एकमात्र उक्तिवेचिव्य से युक्त स्वरूप को काव्य न मानकर कान्यानुकार, काव्याभास 
याकान्यकी नकल यानी काव्यचित्र मानाथा ओर कहा थाक्रि वस्तुतः कोई 
अलंकार सा नहीं होता जो गणीभूतव्यंग्य वगम न गिना जा सकै अथवा जिसे 
व्यग्यांश का अनुग्रह प्रप्तनहो। ये दोनों एसे वक्तव्यथेजो परस्पर विरोधीन 
होकर समन्वयसूत्र से सम्बद्धयथे। किन्तु परवर्ती मम्मटने ध्वनि का पाठ दुहुराते 
खमय इस समन्वयसूच्र को तौड दिया ओर अलङ्कार कौ प्रधानता से युक्त काव्य को चित्र 
नामक काव्य मान लिया तथा व्यंग्यप्रधान या व्यङ्ग्यबहुक कान्यको मलग वगं में 
` गिना दिया । यह्‌ क्या हुआ ? यह वस्तुतः अलद्धुार कौ प्रतिष्ठा हुई । अलंकार नामप्ते 
पुकारे गए उपमा आदि को भी स्वतन्त्र महत्त्वं दिया गया ओर उनमें भी व्यंग्य के विना 
भी काव्यत्वं का उत्व स्वीकारा गया। यह अपने आपमेजो भीदहो, अकार के 
महत्व की अभिस्वीकृति मे एक महत्वपूरण प्रमाण है, परिपृष्ट साक्ष्य है ओर 
उसके दारा दिया गया सष्षय है जो अलङ्कारो को काव्यश्शरीर का अनिवाय 


क@ ~ . ० ० 9 = जक क किक = क = -- 


ज + = + 


( ५७ 


नही, वैकल्पिक धमं कहने की धृष्टता करता आ रहा धा। अन्तम मस्मटते 

भी ध्वनिकार आनन्दवधन की अनुभूति को आदर दिया गौर कहा कि अलंकार भी बिना 

रस आदि व्यंग्यांशके निर्जोव होते हैँ । अभिप्राय यहु कि अलंकार का उपमा आदि 

स्वरूप भी वह्नि से धुम के समान रस आदि व्यंग्यविभूति से कान्तिकं ओर अव्यभि- 

चरित सम्बन्ध रखता हं । यानौ इन्दे मिरी ओौर पानी की नाई पृथक्‌ करके नहीं देखा 

जा सकता । जो जल अत्यन्त स्वच्छ है, अधामच्छद या पारदर्जी हे, वह भी किसी 

छुप, तडाग, नदौ या निज्लर के एसे सख्ोतका एकांशहै जो मिदी-मां का आँचल 

पक्डे हुए हे । क्या उक्ते अपाथिव मानाजा सकताहै? क्या केवल बरसाती पानी 

ठी पार्थिव कणोंसे मिश्रित कहाजा सकता है? केवल बरसाती जलको मारीत 

मिश्रित द्रव कहना हमारी दृष्टि की स्थूलता होगी, दोष होगा । वस्तुतः उसद्रवमें 

भी मिद चपी हुई है जिसे हम सर्वथा स्वच्छ कहु रहे है, अत्यन्त निर्मल समन्च रहं 

है । दाशनिकों का पञ्चीकरण ओर ओपनिषदो का त्रिवृत्करण्‌ तो निमंल जल के 

भरूतपिण्ड की बरीकीमे भी जलेतर तत्त्वो क अष्टमांश का वैज्ञानिक मिश्रण मानता 

ठे । अलङ्कार का निमंल जल भी व्यंग्य की मिह का सौगन्ध्य छिपाए हए है । व्यंग्य 
को सरस मिह्री तो जक के स्थूल स्पदं की तरलता स्वथं हौ स्वीकार करती आ रही 

ठं । मम्मट का यह मानना करि अर्द्कार को कान्यसेयदि हटायाजा सकताहैतो 

उसके व्यक्त रूपमे ही हटाया जा सकता है, अव्यक्त रूपमे नही, उस रूपमे वह 
काव्य का अविभाज्य, अयुतसिद्ध ओर समवायी धमै, इस दिलामे सटीकता की 
सुचना देताहै। यहीन वह्‌ विवशता ठे जिसे अलङ्कारो की संख्या उत्तरोत्तर बढती 
ही गई ओर पूवेवर्ती आलोचक जहा कोई अलङ्कार नहीं देखता था परवर्ती ने वहां 
नैक नवीन. अलङ्कारो की स्वस्थ खोज कर डाली भौर जिन स्थलों जे पूवेवत्तीं आचाय 
ने कोई एक अलङ्कार माना था, परवत्ता आचार्योने उन्हीं स्थलों का विकलन 
कर उनम अनेक अजद्कारौ की प्रच्छन्न संसृष्टि ओर अव्यक्त संकोणंता प्रमाणित की। 
आनन्दवधन ने अछकारों को वाग्विकल्प कहकर अनन्त बतलाते हए उनकी उपेक्षा 
काजो शापवाक्यबोखा था वह॒ दशरथ के किए श्रवण्‌-पिता के शापवाक्य के समान 
दह मन्न बन गया ओर उयेक्षाके भीतरस्े आदर की समुद्रगा स्रोतस्विनी को 
जन्म मिल गया । अलंकार तन्तव कौ गवेषणा परिपूर्ति तक न पर्हुव सकी, उत्तयेत्तर 
वृतौ ही गई । स्वयं पण्डितराज ने ल्खातो ग्रन्थ प्रसके नाम पर--रसगंगाधर; 
किन्तु उसका प्रधान अंश वन गया अंकारं ही। वही अपुणेदहीरहा। वे उ 
पूणं ष हौ कर पाए । ठीकहीहै। भला सभ्य भाषा अलंकार से रहितहोदही कैसे 
सकत। ?२। 


इ प्रकार अलकार काव्य का अयुतसिद्ध, अपृथिस्यत ओर वैषा ही धमं है जैसा 


पृथिवी का गन्ध, जलका रस, अग्निका रूप, वायु का स्पक्षंजओर आका का | 


॥ 


( ५८ 


दाव्द ! कान्यरूपी पञ्चभूत का तन्मात्र अलंकारही दहै जीर अलंकार हीह कान्यरूपी 
अन्त्य ओर महान्‌ वट वृक्ष का अणिष्ठं बीज । 

कहा जाता है अलंकार को शब्दों मे समन्ञाजा सकतादहै, यानी वह वाच्यहो 
सकता है ओर रस किसी भी स्थिति में वाच्य नहीं हो सकता, क्योकि "रस" या श्युद्धारः 
आदि कहने से स्सात्मक आस्वाद अनुभवमें नहीं आता। वहु तभी अनुभवमें 
आता है जव विभावादि सामग्री का समुचित, कलित ओर चार संनिवेश उपस्थित हो । 
ठीक ह । रख मवाच्य हीह, केवल व्यंग्यहै, ध्वनिदहै। परन्तु अलंकार को वाच्य 
केसे कहा जाता है ? क्या केवल शव" या नेसे शब्द का प्रयोग करनेसे उपमाका 
अटंकारत्व या चमत्कार अनुभवमें आ सकतादै? क्या उपमाको अल्कारभाव 
तक पर्ुचाने के लिए उपमान आदिकी सामग्री अपेक्षित नहीं । उपमान, उपमेय 
ओर साधारण धमके साथ क्या !इव' आदि उपमाप्रतिपादक शब्दों का प्रयोग रहता 
ही दहै? तव दुप्तोपमाके भेदोंकी संख्या १९ क्यों मानी जातीदहै? क्या अभेद' या 
आरोपः कहने से रूपकाल्कार या भसंभावना'या संशय" कहु देनेसे उत्प्रेक्षाया 
सदेहाटंकार का अनुभव संभव दहै । अवश्य ही अलंकार भी शब्दोंमें नहीं जकडाजा 
सकता । फिर रस भी तो ऊपर किए विवेचन के अनुसार अलंकारहीहै। क्था जरूरी 
है कि अलंकारत्व केवर उपमादि विच्छित्तियों की चितकवरी बकरियोँंके गलेकी 
घण्टी रहे । उस रसरूपी दिव्य रथ की सुवणं-क्रक्रिणी भी क्यों न माना जाए ? 


इस प्रकार यह्‌ सिद्ध होता है कि-अलंकार-तच्व काव्य का असाधारण तत्त्व है 
वही काव्य कौ वास्तविक आत्मादहै। "तस्येव मात्रामुपजीवन्ति सर्वेः उसी के किसी 
अंशसेवे सव तत्त्व निष्पन्न हैँ जिन्हँंरस आदि नामोंसे पुकारा जाताहै। “एकं 
सदु विप्रा बहुधा वदन्ति उस एक तत्वको ही अनुक्लीटयिता जन अनेक रूपों में 
विभक्त देखते ओर भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते हैँ । यदि यह विद्व किसी असीम 
ब्रह्मन्‌, मायातीत भूमन्‌ भीर अनन्त विराट्‌ पर अंकितटैतो इख विश्व का चित्रभी, 
इसका प्रतिविम्ब भी किसी तत्त्वं पर यदि अंकित हो खकता है तो एकमात्र "अलंकार" 
तच्वपरही। षृष्टिमेजो ब्रह्मतच्व दहै काव्य में वही अटं-तच्वहै। इस अतिशयित, 
जनन्त, भूमा ओर विराट्‌ रसको जो अपनी-भपनी कटोरियोंमे हमने समेटा वह 
हमारे यानी भमिति" के भीतर ही अपनी संम्णं इयत्ता के द्रष्टा जीवोँ के अनुरूप ही है 


श्यो यो यं यमवाप्नुयादवयवो हें स्प्रशच्‌ पाणिना 
तत्तन्मात्रकमेव तत्र ख सते रूपं परं मन्यते। 
तञ्जास्यन्धपुरे ह हा करिपते नीतोऽसि दुर्वेधसा 
को नामात्र भवेद्‌ बताखिरभवन्माहारभ्यवेदी जनः ॥' 


के अनुसार अरंभाव' को अनुवीक्षकके एकांगी दृष्टिकोण ने या कहना चाहिए कि 


स्थूल चिन्तन ने जिस-जिस लूपमं बाधा, निस-जिस रूपमे आंका वह्‌ अवश्य ही 


>+ अ 


( ५६ ) 


आंरिक तथ्यता छिए ह एथा, किन्तु उख तत्व की समग्रता ओर उसको परिपूत्ति उनमें 
से किसी हषटिकोण ओर किसी चिन्तनमेनथो। 


बरह्म से मायामे उतरने पर वैषम्य ओौरमेदका जो प्रतिभाष होता है तदनुसार 
रस आदि से अलङ्कार को भिन्न केवल उपमा आदि को लेकर किया जाएगा, किन्तु 
अलङ्कार की महत्ता इतने पर भी घटेगी नहीं । क्योकि रख यदि कहीं, रहता दहैतो 
दोनों केवल सामाजिक या प्रमाता में रहता है, काव्य में नहीं । क्या कान्य ओर प्रमाता 
एकह? काम्यम यदि कुछ रह खकताहैतो उपमादि अलङ्कार ही रह सक्ताहै। 
गुण भी रसवाद के अनुसार रसधमं है, अतः वे भी प्रमातुगत सिद्ध होते है, कानव्यगत 
नहीं । दोषाभाव कोई 08511४11 नहीं है । रसवादी के यहाँ रीति ओर वृत्ति का 
कोई पृथक्‌ अस्तित्व होता नहीं। इनके अतिरिक्त किसी काव्यधमं की कल्पना रसवादियों 
नेकीही नहींहै। उनका काव्यलक्षणतो इतनापंगु है, विशेषतः मम्मट का, कि 
वह उन्हींके अनुसार वस्तुसे वस्तुकी ध्वनि वारी उक्तिमे लगुही नहीं होता, 
वर्योकि न वहा अलङ्कार रहता, न गुण । यदि कहा जाए कि सम्मट के अनुसार वहु 
भौ अस्फुट अल्ड्कारतो रहता ही दहै, तो उस ध्वनि को अल्कारमुखक कहना होगा । 
फिर मम्मटके द्वाराही स्वतः संभवी वस्तुसे वस्तुकी ध्वनिके किए उदाहृत 
अलसशिरोमणिः०' इत्यादि गाथा का व्यल्जक वाच्य अथं किस प्रकारके अलङ्कार से 
युक्त है ? क्या उसमे अस्फुट भी अलङ्कार है? स्फुटकीतो वात ही अल्गरहै 
तब केसे जाएगा इस स्थल में काव्य लक्षण, यानी मम्मट द्वारा अभिमत कान्यलक्षण । 
हन्त । 


हेतदष्टि गौर रसवाद के अनुसार काव्य का सस्व" उसका अपना रूप यानी प्रमाता 
से पृथक्‌ उसका प्रमेयरूप अवश्य ही रसहीन, गुणहीन, ध्वनिहीन ओर एकमात्र 
अलंकार-युक्त ह 1 ओर कुं उसमे माना जाए तो केवल दोषाभाव माना जा सकताषहै, 
जिसे कान्यत्व को उत्थान-भूमि कहा जाना चाहिए । दूध यदि शुद्ध होमा तो उसकी 
खीर मं इलायची की सुगन्ध तथा केसर-वणं भी खिल्गे। इन दो विशेषताओं के 
अतिरिक्त द्वैतवादी दृष्टि से काव्य की अपनी काया मे अन्य कोई धमं कदापि नहीं स्वीकार 
किया जा सकता । इनमे भी दोषाभाव अभावात्मक ही है, वास्तविक केवल अलंकार 
ठहरता है । फलतः कान्यशरीर का वास्तविक धमं ओर उसमे उपादेयता कने वाटी 
चारुता, सुन्दरता, रमणीयता, चमत्कारिता या असाधारणता का उत्स अलंकार ही 
ठ्हरता है। जहां कहीं अलंकार का उपमा आदि स्थूल रूप नहीं दिखाई देता ओर 
काव्यत्वं माना जाता है वहाँ ध्वनिवादी याये दतवादी आलोचक दोषाभाव कै अतिरिक्त 
कव्य शरीर में कोई धमं सिदढ नहीं कर सकते, फलतः वे अकाव्य से उस काव्य कौ 
अनुभवसिद्ध भिन्नता का कोई कारण नहीं बतला सकते, विशेषतः काव्यप्रकाश के 
रचयिता मम्मट। 


( ६० , 


निष्क यह कि अदैत दृष्टि से काव्यश्रीर के भीतर रस॒ आदि भी अंकार है ओर 
दित दषिसे भी काव्यशरीर का एकमात्र धर्मं अलंकार ही है, निदान कान्य को अकाञ्च्‌ 
से पृथक्‌ करने वाला त्व एकमात्र अलंकार है, इसलिए “अलंकार ह कान्य की 
उपादेयतां का प्रथम ओर चरम निदान टे, अलंकार दी काव्य की अत्मा 
हे । प्रमातृपक्च मे हम काव्य के परिणाम पर विचार करते ह, जिसे काव्य से सम्बन्धित 
वस्तुओं का विचार कहा जा सकता है, स्वयं कान्य का विचार नहीं । 


काव्यस्वरूप- 
प्रच: काव्य को अक्ताव्य से भिन्न करने वाला स्वगत धमं तो ' अलंकार' हुज । 
यहु जो काव्य नामक धर्मी है यानी अकुकार का जो आश्रय है, माने अलंकार जिसमे 
रहता है, वह क्या? 
न्तर : कहा जाता है वह शाब्द" ओर अर्थः का जोडादहै। ठीक है, किन्तु 
प्ररन उपस्थित होता है कि शब्द ओौर अर्थं काव्यल्प में परिणत होते समय क्या उसी 
रूप में रहते हैँ जिस रूपें वे संसार मे दिखाई देते हैया उससे भिन्न किसी अन्यसरूप 
मे; प्रथम विकल्प स्वीकार करने पर एक बहुत हौ भीषण्‌ आपत्ति सामने सुरसा बनकर 
खडी दिलाई देगी । वह्‌ अपत्ति होगी अर्थ॑के विषयमे! कालिदासने कुमारसंभव 
के प्रथम पद्य ये "हिमालय" कहा । क्या यह वही हिमाल्य टे निसक्रे शिखर पर हम 
आज भी चदढने का अभियान कर रहै ह मौर जिसे बहकर गंगा आज भी भरलोक का 
ब्ह्मद्रव बनी हई है। हिमाख्य का वह स्थावर इष जियमे शिका, वृक्ष जौर जल के 
वन ओर तरल रूपों का संघात दै, जो पूरं दिशा से पञ्चिन दिशा तक उत्तर दि 
मे एक निचित स्थान में लेटा हुजा है, यदि कुमारसंभव काव्यकत हिमालय यही हिमाख्य 
हे तो उसे हम अन्यतर सर्व कैसे प्राप्त करते दै । कुमारसंभव तो विद्व केहरकोनि मे पा 
जा रहा है। क्या उसमे अ्थरूप से गृहीत हिमालय वही दै जो किसी एक भूखण्ड ओर 
किसी एक दिशा का चिलोच्चय है, शिलाभित्ति है, उन्नत प्राचीर हे, सीमा प्रहरी है, 
दुगं है। यदि वही, तो वह्‌ यहाँ काल्ञी मे ओर इसी समय जिन अनेक स्थानों पर 
कुमारसंभव पदा जा रहा होगा ` उन सभी स्थानों पर कैसे पहुंच रहा है ? यदि पटच 
रहा है तो क्यों नहीं हम उससे दब जाते ओर क्यों नहीं वह्‌ अपने मूलस्थान पर 
अनुपस्थित मिलता । वह्‌ अपने स्थान पर उपस्थित रहता ओर एक ही रहता ट किन्तु 
हम काव्य में उसे सर्वत्र अनेक स्थानों पर उपस्थित पाते है। क्या है यहं बातत १ 
निरिचत ही वह्‌ हिमालय कान्य का हिमालय नहींहै जौ उत्तर दिश्या में भित्ति बन 
कर पडा हुआ है । 
यही प्रन क्चब्द के विषयमे उपस्थित होता है । कालिदास ने लिन शब्दों का 
उच्चारणं किया होगा वे तो उच्चारण समाप्त होते ही समन्त हो चक्रे होगि । फिर हमे 
उनके शतानल्दियों प्राचीन शब्द अज तक क्से उपलब्धं ह ? "कपि या अनुक्ररप के द्वारा 


( &१ ) 


हम उन्हें जिलए हृए हैँ मौर वे खकेतिक रूपमे हमें प्राप्त होते जा रहै है यह्‌ उत्तर 
ठीक है, किन्तु प्ररन उपस्थित होता है उन शब्दों की बोधकताका। वे हमे अथंका 
ञान कराते हें । यदिवे शब्द अपने मुलरू्पमें हीकाव्यहैँतो हमे किसी भी अन्नात 
भाषा का कान्य अविदित प्रतीत नहीं होना चाहिए, क्योकि शब्द तो किसीभी भाषा 
मे बदलते नहीं । वणंमाला ओर ध्वनियां प्राकृतिक वस्तुएं हँ । उनका उपयोग ओर 
विनियोग हम जेसा चाह कर सकते है किन्तु उतने से उनके भौतिक ओर प्राकृतिक 
स्वरूप को हानि नहीं होती । शब्द यदि वहीहैजो लोक में प्राप्त है तो एक ही वाक्य 
के अनेक ओर विविध अर्थं नहीं होने चाहिए, क्योकि सुय किसी को भिन्न प्रतीत नही 
होता । चन्द्र ओर अग्निया समस्त प्रपन्च प्रत्येक बोद्धा को एक ही स्वरूप में प्रतीत 
होते ह । कोई भी व्यक्ति एेसा नहीं जो चन्द्र को अंधकार समन्चता होया अंधकारको 
वस्र रात सव के लिए रातह ओौर दिन सबकेक्िए दिन ही । फिर एक ही वाक्य 
का अथं बोद्धाके भेदसे भिन्न वक्योंहो जाता है? | 

ब्द ओर अथं के जोड़े" की बात भी अस्वाभाविक-सीहै। शब्द हमारे मुखाकाड 
या श्चोत्राकाशमे है ओर अथैयदिहै तो सैकड़ों कोस दूर । फिर एेसे कितने अ्थ॑हैजो 
वत्तमानकालिक हैँ ? युधिष्ठिर आदि अब कहां ? कलि्पितोपमा में चन्द्र से सपं के लटकने 
की कल्पना में चन्द्र॒ ओर सपं के सम्बन्धकी बात तो आत्यन्तिकं रूप से असत्य है । 
उसका तदुवाचक शाब्दो से सम्बन्ध केसे होगा ? सम्बन्ध के किए अस्तित्व तोकम्‌ से 
कम, अपेक्षित होता ही है! बरध्यापूत्र, शशषणुङ्ध, खपुष्प, केच्छपीपय ओर अन्धकार 
आदि जो त्रिकालबाधित तथ्य, क्या इनके साथ सम्बन्ध बन सकेगा ? जब विद्यमान 
अर्थो के साथमभी ब्द का सम्बन्धं संभव नही, तब अविद्यमान ओर कल्पित अर्थो 
के साथ शब्द का सम्बन्ध संभव कैसे ? 

इस प्रकार शब्द, अथं अौर उनका सम्बन्ध तीनों अपने भौतिक ओर वैज्ञानिक 
रूप में अनुपपन्न भौर असिद्ध सिद्ध होते है । क्या इसी उल्टवांसी का नाम है काव्य? 
यदि असंगति ही काव्यदहै, तो दोष किसे कहा जाएगा ? यदि उसी असंगति क पीले 
शिष्ट ओर विशिष्ट सभीद्टे हृए्‌ है, समपित रहै, व्यामुग्धरहै तो उनका ओर सिरफिरे 
व्यक्ति का अन्तर किस बातमें है? तव असम्बद्ध प्रलाप ओर रामायण, गाङी ओर 
महाभारतम फरकहीक्या? क्योंवेदको ही पूजा जाए, अवेद को भी क्यों नहीं । 


वस्तुतः न शब्द काव्य है, न अथं ओौरन इन दोनों का युग्म । काव्य है शाब्द के 
माध्यम सेहोने वाला अथंज्ञान । अथज्ञान के लिए शब्द स्वरूपमात्रे कारण नही 
होता, उसके साथ अथं का एक बौद्ध संबन्ध अपेक्षित होता है । यह सम्बन्ध संकेतात्मक 
होता है । संकेत व्यक्तिसापेक्ष है, अतः उसमे अन्तर भी रहता है ओर भाषां बदलती 
रहती है । शब्द भी अथंही है अपने मूल ओर प्राकृतिक रूप में । मस्तिष्क किसी 
कोनेमे हम शब्द का संस्कार विठाए रहते है ओर किसी कोने मे तदितर वस्तुओं 


( क्र , 

न्धसूत्र भी वर्ना ठेते है, व्यवहार के लिए तय 
हो गीर चन्द्र कह्ने से अमुक वस्तु 
तथा अ्थंके ज्ञानोंमे एक ज्ञान 


करा। हम इन दोनों संस्कारों का एक संब 
कर छेते है कि सूर्यं कहने से अमुक वस्तुकाज्ञान 
का। अर्थात्‌ हम लब्दस्वरूप या ध्वनिसमुदाय कै ज्ञान 
ही गाँठर्बाँध ठेते है । यह्‌ गांठ ही राक्तितत्त्व है, यही वृत्ति है, यही व्यापार रदहै, यही 
संकेत है ओर यही सम्बन्ध 1 अव हमारे मस्तिष्क के खम्बद्ध तन्तुओंमे से कोई एक 
संकरत होतादै तो दूरा भीञ्कृत हौ उक्ता हे। इम!री बोधशकटी चरं चं करती 
आगे बढ़ने लगती दहै । बाद मे उसमें गति आ जाती है ओर वह्‌ शकटी हेमपर्णा 
हंसिनी बनकर हमे न जाने किन~क्िन लोकों कीसैर कराती रहती दै। सारा खेल, 
सारी टीला, सारा इन्द्रजाल हमारी बुद्धिकाटं । यही बुद्धि कान्य भौ बन जातीदहे। 
ज्य ओर अर्थं उसमे सहायक ही बनतेहैँ। येतो दो अरणिर्या हैँ जो अपने संघषं से 
काव्याग्नि को जमाती ओर उसे अभिव्यक्त करती ८ । इसीलिए हमने कला को संकल्प. 
योनि अर अनङ्ध कहा है । 
इस भूमिका पर आरूढ चिन्तन अवश्य हौ 
दिशा पा चेता है! उत्तर देने की आवश्यकता नहीं रहती । श्रुमारसंभव' का (हृमाल्य' 
अपने भौतिक खूप में जहां कातर्हाहै, वह अपने ज्ञानल्प को शब्द के गरूड पर 
बिठा देता है ओर वह देश तथा काल की परिधि को अतिक्रान्त कर संख्यातीत 
रूपमे एक लीलालोक में प्रविष्ट हो जाता ठे । शीशमहल सा यह्‌ रीलाल।क, यह 
भावलोक, यह कल्पनालोक या बुद्धिलोक एक को अनेक मूतियोंमें अंकित ओर 
प्रकारित करता रहता रहै । कोई असंगति उपस्थित नहीं होती । क्योनरेसाहो? 
असंगति जिन स्थ प्रतिमानों की इयत्ताओं पर निर्भरह वे प्रतिमान अपनी स्थूकता 
से मुक्तं हो इयत्तातीत जो हो जाते है, मिति ओर माया की सीमा से ऊपर उठ ब्रहमीभूत 
जो हो जाते है ।पूर्वादधं की सीमा हट जाती है शौर पराध की निस्सीमता छ जात है । 
मानो हमारे चन्द्र की सोलह्वीं कला लिव के मस्तिष्क पर जा बैठती है । 


अव अर्थं ही नहीं अर्थान्तर भी कान्यस्षीमा में चले अति हं ओर अथे का आयाम दीघं 
से दीर्घतर ओर दीर्घतर से दीर्घ॑तम बनता जाता है । किन्तु “स्ख' इन अर्थो का परिणाम 
ही रहता है, अथं नहीं । अलंकार इस कल्पनालोक ओर संवित्तिके इस परमधाम 
मे अथैका ही धर्म॑ रहता है । अलंकार ज्ञानात्मक होता है जब कि इस संवेदनात्मकः, 
च्वंणाप्रसृत रसनात्मक । किन्तु हमे यह सब कहते हए यह नहीं भूलना है करि रघ 
# यह्‌ स्थिति, उसका अलंकार के साथ अन्तर प्रमाता के अन्तमन मं बेठकर किया 
। चिन्तन है। प्रमेय के वस्तुपक्ष की दृष्टि से स्थिति भिन्न होगी । किन्तु स्थिति 
रस कही भिन्न होगी, अलंकार की नहीं। अलंकार दोनों भूमिकाओं मे यथावत्‌ 


अना रहैगा । अरुकार यानी उपमारि > 
पमादि । सौन्दर्यात्मक अकुकार कौ रि 
त थति तो ओर 


पूर्वोक्तं समस्याओं के समाधान कौ 


¢ चर + 


उक्त परिकल्पना से हमने यह देखा कि काव्य एक ज्ञान है ओर इसलिए वह्‌ केवर 
प्रमेय नही, प्रमातृगत, प्रमातृचेतना में प्रतिबिम्बित प्रमेय है यानी प्रमित दै, बुद्धहै, 
प्रतिपन्न है । फलतः हमने वस्तु ओर व्यक्ति के दोनों पक्षों मे समन्वय ओर सापेक्षता 
का अनुभव किया। किन्तु यह एक वस्तुस्थिति है। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि 
परमेयपक्ष' कुछ हेही नहीं। कारण कि ज्ञान-जगत्‌ भी देतमुक्त नहीं रहता ओर उसमे 
भी दन, भ्रपन्च, अवयव, खण्ड, अदा रहते है । हम उन्हीं अवयवो ओर अंशोंका 
स्वगत वेशि आंकते ओर तदनुरूप प्रमेयव्यवस्था करते ह । फलतः कान्य प्रमातु- 
व्योम के बीच उडने वाला सुपणं होकर भी उस व्योम से अभिन्न नही, ओौर "उसके 
प्रत्येकं पणं, उन पर्णो के प्रत्येक लोम उनमें से प्रत्येक की चित्रता" यह्‌ जो सव है यह्‌ 
भी स्वयं उसकी ही विभति है व्योम की नहीं । कविता तो प्रमात्ुरूप दाशरथि के महुल 
कीसीतारहै। वह वहाँ आरै, पैदा नहीं हुई । जब चाहती है पुनः निकल जाती ओर 
अपनी मूल-भरूमिकामें विलीनहो जातीहै। उसे कभी रावणभी चुराङ़्ेजाताहै 
किन्तु वहभी उसे प्रतिष्ठित करता अशोकवाटी' मेही है ओर वरहा प्रतिष्ठित करके 
भी अपने दौरात्म्य से उसे तनिकमभी प्रभावित नहीं करपाता। वस्तुतः रावणको 
अपने यहां को अशोक-भूमिका कौ वास्तविकताका ज्ञान ही नहीं, किन्तु कदिताकी 
सीता उस भूमिका से अलग कहीं रह्‌ खकती ही नहीं । वह तो ेसी शकटी है जो केवल 
चके नही, माग-भूमि भी अपने साथ किए रहती दहै ओर चलती है तो केवर उसी सां 
पर, नहीं तो चलती ही नहीं । 


अव हमे अपने चिन्तन के धरातल काध्यान रखनाहै जौर प्रमाताया प्रमेय, 
किसी कै भी धरातल से विचार करते समय अपने धरातल को छोडना या उससे भटकना 
नहीं है । 


इस प्रकार अलङ्काररूपी जो धमं है उसका धर्मी है ज्ञान । अर्थात्‌ अलङ्कार ज्ञान 
मेँ रहता है । वह स्वयंभी ज्ञानात्मकहै। इन दोनों ज्ञानोंका धमंध्मिभाव ज्ञान 
ओर अनुव्यवसाय के धमधमिभाव सा माना जा सकता है। अनुव्यवसाय में विषयभूत 
ज्ञान धममरूप से निविष्ठ रहता है अतः अनुव्यवसाय धर्मी होता है। इनमें सम्बन्ध 
विषयविषपिभावात्मक ही हो खकतादहै, यातो हो सकता है (स्वरूपात्मक' । लौकिक 
अलङ्कारो के समान इनका अपने धर्मी से संयोग सम्बन्ध मानना कृविताके स्वप कै 
विषय मेँ अपना व्यामोह प्रकट करना है । कान्यात्मक ज्ञान को अनलकरति कहना भी 
राव को विवाहयोग्य दुकह कहना है अथवा कालिदास के शब्दों सें रमरानशल को 
यज्ञमुप बनाना है। कान्य में अलङ्कार का अस्तित्व उतना ही अनिवार्य है जितना 
किसी श्रोत्रिय के कन्धे पर यज्ञोपवीत का अस्तित्व या किसी सुहागिन की र्मागमें 
सिन्दुर का । 


( ६& , 
| 


इन विचारो के साथ हमारा अटंकारसवंस्व साहित्यजगत्‌ कौ सेवा मे प्रस्तुत ट्‌) 
इसके मुद्रण में अनेक दोष रह गणु । कुछ स्थलोकेनिदद हमने पीले की संशोधन- 
तालिका में किए रहै) अन्य कुछयेदं-- 


पृष्ठ पक्ति अशुद्ध सुद्ध 
३ ५ कथनानव कथनेऽनव | 
१४ भीम ० इत्यादि इ्टोक कायस्य कामस्य | 
१७ (महिका इत्यादि इलोक अन्तीमा अमान्ती | 
१७ विमरशिनीको अन्तिम पं० सचमत्कार सचमत्कारं | 
२० विम० की प्रथम पंक्ति १८ पृष्टकी विमदिनी कै | 
'वामनेनतु-वामनेनेत्यादि साथ पठं | 
५१ नतीचेसे ८ उत्तर अन्तर 
५९ नीचेसे ९ नहीं वही 
५८ विम० ८ कवाटविश्रममू° कवाटविश्रमममु | 
= रण रग | 
७० ११ नहीं मिक्ता द्र° २।१४७ | 
७५ शीर्षक पञ्चालद्कार लाटानुप्रासः 
१५७ हीषक उत्टेालङ्कार भ्रान्तिमदल्कारः 
३६७ शीषक समासोक्त्यल्ड्ार सलेषालङ्कार 
४४ १४ मन्यते मन्वते | 
| । ५२९ हीषक ` विशेषोक्ट्य 9 एकावल्य° | 
| ५३१ रीषक समालङ्धार मालादीपका० | 
| ५४० नीचेसे २ क्ण्ठागञअ कण्ठागत० 
| ६१५३ नीचेसे३. तस्य यथा तस्यान्यथा० 
५ ६ चन्द्रपादपानु जन्मपादपान्‌ 


३०६, ३४४, ५३२ पर छपी सूत्रसं ० २८, २३१५० को मशः २१ ,३३,५७ माने । 


च 
[य + ^ 
[11 


1 आविद दो द निजो कनकः १. [न 


`: १. तुल्यश्रुतीनां भिन्नानामभिषेयेः परस्परम्‌ । व्र्णानां यः पुनर्वादो यमकं तचचिगद्ते । 
|काव्यारकार २।१७] खद्रट ने इसी लक्षण को अपने लक्षण का आधार बनाया हे । 


( &५ ) 


अपक्षाप्‌-विम्िनी तथा सव॑स्व मं प्राप्त नवीन स्थापनाओं पर भूमिका में 
विचार करना आवश्यक है, किन्तु हम उसे छोड रहै दै, कारण कि वह्‌ प्रायः मृल्मेदही 
अपने स्थान पर किया जा चुका है । कुछ अवरिष्ट भ है । जेसे- 
(क) वृत्तिकार का भटुनायक्‌ के विषयमे यह कहना कि वे ही व्यापार- 
प्राधान्यवादी है, जब कि व्यम्जनावादी भी उस क्षेत्र मे गिना जा सकता है । जेसे- 
( ख ) व्यठ्जनानामक अतिरिक्त शब्दन्यापार स्वीकार किया जाए या नहीं। 
लक्षणा को भी क्यों स्वीकार किया जाए । केवल अभिधा से ठी पूणं बोध क्योंन मान- 


लिया जाए । अभिधा भो क्यो मानी जा ए, क्योकि शब्द तो मुरुतः जड है भौर व्यापार 
चेतन मे रहा करता है। 


( ग ) (स्वसिद्धये पराक्षेपः आदि वाक्यो के जो प्रयोग मम्मट आदि में प्राप्त 
सन्दर्भ से हटकर भिन्न सन्दर्भ मे यहां मिलते हैँ उनके स्रोतों की गवेषणा । आदि | 

इनमे से शब्द की जडता का परिहार हम इसी भूमिका मे कर चुके है । व्यज्जना- 
खण्डन के लिए हमने सहित्यदरशने तात्पयस्वरूपम्‌" नामक एक स्वतन्त्र ग्रन्थ छिख दिया 
दै । स्वसिद्धये" आदि वाक्यों के सन्दर्भ रत्नाकर से खोजकर यथास्थान मुलमेंहीदे 
दिए हैँ । व्यापार-प्राधान्यवाद कौ भहनायक तक सीमित मानना या केवल उन्हीं के 
सिर पर योपना भटनायक की स्थापनाओं मे व्यापारो की बहुलता पर निर्भरहै। 
भावकत्वं ओर भोजकत्व दो ठेस व्यापार ठँ जिनकी कल्पना शब्दव्यापार कै रूप न की 
गद है शौर कदाचित्‌ केवल भटुनायक द्वारा ही की गई हे। अधिक विचार स्वतन््र- 
ख्पसे क्ियाजा सकता है। 


विमशिनी के पाठ-संशोधन मे हमने पाण्डुग्रन्थों की सहायता छेनी चाही तो उसमें 
महूत विवाद पाया । उदाहरणाथ काक्लीहिन्द्विश्वविद्यालय मेँ विमश्णिनी की दो शारदा 
प्रतिर्यां हैँ । उनमें ओर ड० रामचन्द्रद्िवेदी दाया देखी प्रतियों में तृत्तिके श्रणम्य °? 
इत्यादि मंगल पद की विमशिनी “निजेतिः प्रतीक से आरम्भ होती है । उसके पह 
को जो व्याख्या निण॑यसागरसंस्करण म चछ्पी हे वह उन्हँं किसी एक प्रतिमेंही 
प्राप्त हुई है, किन्तु है मूल ही, क्योकि फेसा संभव नहीं कि टीकाकार मंगल्पय की 
-वाख्या उसके उत्तरार्धं से आरम्भ करे, वह भी तब जब ूर्वाधमे परा वाणी' ओर 
उसकै त्रिविध विग्रह्‌" की गढ ग्रम्थि उपस्थित हो । फिर परावाणी तो कारमीरियों की 
सोमलता है । उसीके रसम विभोर रह वे अपना चिन्तन स्थिर रखते हैँ । जयरथ 
उसे कंसे छोड सकते है ? तत्रापि इसकी जो व्याख्या य हां दी गई है उसकी गंभीरता, 
उसका पदावली, उसकी प्रमाणसंपत्ति का छठागत वैदुष्य की अपेक्षा रखती है, वह 
जयरय जेसे सर्व॑शास्त्रवेत्ता के ही अनुरूप है । इसके अतिरिक्त "देवी" शब्द की एेसी ही 
व्याख्या जयरथ ने तन्त्रालोक भादिकीटीकामेभीकी दै । फलतः एक प्रति में मिलने 
पर भी उत प्रामाणिक मु मानकर अपनाना उचित हे । हमने अपनाल्याभीहै। 


५ अ० भू° 


.(. ६६ ) 


सूत्रों का पाठ विमशिनी की काशौ दिन्दूविरवविद्याल्य मे प्राप्त एक शारदा 
प्रतिमे भी अरुंकारसूत्रः नाम से पृथक्‌ दिया मिल्तादहै, मतः हम भी उसे यहा 
प्रथक्‌ दे रहे है । जो चतुर्थ सूत्र वृत्ति मान लिया गया था इस प्रति मेव ह॒ भी सूत्रों 
मे ही पठित है, किन्तु उसमे आगे पठित सूत्रपाठ के ८३, ८४ तथा ८५ सूत्रों को एक 
टी सूत्र माना गया है । उसमें 'एते' चाब्द नहीं है। 
मूटपाठ अधिकतः विमर्शिनी के अनुकल्प दही द्या दै, किन्तु जहां उचित लगा है 
उसके विपरीत नवीन पाठ भी अपनाया गया है । 
यहु काय मध्यप्रदेगचासनसेवामें रहते हुए क्ियागयाद्टै। म उस लासन के 
प्रति आभारीह। 412; 
~ मन्तमें म काङी के विश्वविश्रुत प्रकारनसंस्थान चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस 
` तथा, चौखम्बा विद्याभवन के अधिकारी श्रीमान्‌ मोहनदास जी गृप्त तथा श्रीमान्‌ विदुलदास 
जी. गृप्त को धन्यव।द देता जिन्होने इस बड़े कार्यको बङद्धीकार किया भौर 
साहित्यसेवियो के लिए सुलभं बनाया । मञ्चेदुःवहै करि इस ग्रन्थ की पूर्तिक पूवही 
इष महान्‌ सस्थान के कणधार श्रीमान्‌ सेठ जयक्रष्णदास जी गृप्त तथा श्रीमान्‌ सेठ 
श्रीकृष्णदासजी गृप्त कुछ ही दिनों के अन्तर से असमय में गोलोक सिधार गए । 


यदाकदा मनि संदिग्ध अंशो पर अपने परमगृर का्ञी-सुमेरुपीठाधीडवर रङ्ुराचाय 
नन्तश्री विभूषित ध्रीमहृदव रानन्द जी सरस्वती, उसी भूमिका के विदेहराज महामाहेशवर 
भाचाय.प० रामेश्वर जी ज्ञा तथा अपने पित्तृतुल्य गुरु प० रामकरुवरजी मालवीय 
से परामश किया है । उनको प्रणापांजलि अपित करता हूं । तद ^ 4 4 
मै इस दिश्ामें काय करने वाले अपने पूर्वं सुरियोंके प्रति भी ऊतज्ञता अर्पित 
करता हः जिनसे मेरे चिन्तन को बल भिका | 
इय ग्रन्थ क वृत्तिगत उदाहरणों तथा विपरशिनीपो की ` सूची विद्रद्र श्री सातकडि 
भूखोपाध्याय वद्धीयने बनाई ह । वे एतदथ शतशः साधुवाद के पात्र हैँ । किमधिकेनं। 
| नमः सुमेधसे तस्म सृखेवाय च कोटिशः। | 
बोधः शोधः प्रवन्धदच सरपरधा यत्र जाग्रति ॥ 


` श्रीगुसपूणिमा, | -- रेव प्रसाद दिवेदी 
 सं° २०२८, वाराणसी 4. १/५ ०४ ४ 


९. 


रजानक-धीरुय्यकस्य फरतिः 


अट्ह्ारदूघ्म्‌' 


पहाथपीनरक्त्यं॑चब्द्परनस्वत्यं चब्दारथपोनसक्त्यं चेति त्रयः 
पानर्क्त्यप्रकाराः। | 

तत्राथपौनलक्त्यं -गर्ढं दोषः | 

आघखावमासनं पुनः पुनरुक्तवपामासम्‌ | 

त्ब्दपोनसक्त्यं व्यज्जनमा्रपौ नरद स्वरव्यरजनतसमुदाय--पौन- 
सक्त्य च | 


 संस्यानियमे प्रवे छेकानुप्रासः | 
` अन्यथा तु वर्यनुग्रा्ः | 


स्वरव्यञ्जनस्मुदायपोरृक्तयं यमकम्‌ | 
रब्दाथपानरक्तयं प्ररूढं दोषः | 

तात्पयभद्वत्त॒ टायानुप्रासः 

तदेवं पौनस्क्त्ये प््चाटंकारः | 

वर्णानां सक्ता्याकतिहेतुत्वे चित्रम्‌ । 
उपमानोपमेययोः साधम्य मेदामेद्तुल्यतरे उपमा । ` 
एकस्यैवोपमानोपमेयत्वेऽनन्वयः | 

दरयोः पर्यायेण तस्सिन्नपमेयोपमा । 

सदस्रायुभवाद्‌ वस्तन्तरस्पतिः स्मरणम्‌ । 
अभेदप्राधान्ये आरोपे मारोपविषयानपहुवे रूपकम्‌ | 
आरोप्यमाणस्य ग्रकतोपरयोगित्वे परिणामः | ` 


` विषयस्य सन्दिद्यमानत्वे सन्देहः । 


जलङ्कारसत्रमिति वृत्तिरदितो रय्यकैकरचितः सूत्रमाव्रात्मा स्वतन्त्रो न्थः । 


२. ददेति पदं प्रतिसूत्रम्‌ आग्रन्धमनुवत्तेनीयम्‌ । 


( ष्ठं ) 


९ सादस्याद्‌ वस्त्वन्तरप्रतीतिम्रान्तिमान्‌ । 

२० एकस्यापि निमित्तवन्नादनकधा ग्रहणमुल्टखः | 

२९ विषयस्यापहूुवेऽपहुतिः | 

२२ अध्यवसाये व्यापारप्राधान्य उदक्षा | 

रर अध्यवसितप्राधान्य लतिश्ययोक्तिः | 

२४ ओपम्यस्य गम्यत्वे पदार्धगततवेन प्रस्तुतानामग्रसतुतानां वा समान- 
ध्मामिसम्बन्धे तुल्ययोगिता | 


ष॒ ब्रस्तुतप्रस्तुतानां तु दीपकम्‌ | 
8 वाक्याथगतत्वन सामान्यस्य वाक्यद्वये पृथडूनिरद्े प्रतिवस्तूपमा । 


२७ तस्यापि विम्वप्रतिविम्बभावतया निर्दे दण्टन्तः 

२८ संभवताऽ्तमवता वा वस्तु्म्बन्धेन गम्यमानं प्रतिनिम्बकरणं 
निद््रना । 

२९ भेद्प्राधान्ये उपमानादुपमेयस्याधिक्ये पिपर्यये वा व्यतिरेकः | 

२० उपमानोपसेययोरेकस्य प्रधान्यनिदगेऽपरस्य सहार्थसम्बन्े 
सटाक्तिः | 

२४ विना किचिदन्यस्य सदस्च्वाभावो विनोक्तिः | 

२२ विदेषणानां साभ्यादग्रस्तुतस्य गम्यत्वे समातोक्तिः। 

रेरे वविन्नेपणततामिप्रायत्वं प्ररिकरः। 

२४ विरेष्यस्यापि साम्ये द्रयोर्घापादाने स्टेषः 

२५ अप्रस्तुतात्‌ प्रस्तुतस्य सामान्यवि्ेषमावे कार्यकरारणमातरे वां 
सारूप्ये च प्रसतुतग्रतीतावप्रसतुतप्रश्र॑सा | 

र¢ सामान्यविरेपकार्यकारणमावाभ्यां निर्िष्पकृतसमर्थनमर्थान्तर- 
न्याप्तः | 

२७ गम्यस्यापि मडग्यन्तरेणामिधानं पर्यायोक्तम्‌ । ` 

९८ स्तुतिनिन्दाभ्यां निन्दास्तुत्योर्गम्यते व्याजस्तुतिः | 

र९ उक्तवक्ष्यमाणयोः प्राकरणिकयोर्ित्ेषप्रतिपच्य्ध निपेधामासं 
अ्षेपः | 

धि 1 1. 


१.२. सूत्रयीरनयोः संख्ये मूलग्न्ये क्रमेण २८,२३ इति मुद्भते । संशाधयन्तु सक्रपम्‌ । 


४५ 


` १, सूत्रेऽ् मूलग्रन्थे ५० इति संख्या मुद्रिता । कृपया शोधयन्तु । 


( ६६ ) 


अनिष्टविभ्यामासरच । 

विरृदामासत्वं विरोधः| 

कारणाभात्रे कायस्योत्यत्तिर्िभावना | 

कारणसाममये कायानिदत्तिर्गि्ेषोक्तिः | 

कार्यकारणयोः समकालते पोवापिर्थनिपर्ये चाति्चयोक्तिः | 
तयोस्तु भित्रदेश्रत्वेऽपक्गतिः | 
विरूपकाय।नथयोष्तपत्ितरिल्यसंघटना च विषमम्‌ । 
तद्विपययः समम्‌ । 

स्वनिपरातफ़लनिप्पततय प्रयत्नो विचित्रम्‌ । 
आात्रयाश्रयिणोरनानुरूप्यम्‌ अधिकम्‌ | 

परस्परं क्रियाजननेऽन्योन्यम्‌ | 
अनाधारमापेयमेकमनेकगोवरमरक्य्रस्तन्तरक्षरणं विशेष; | 
यथा साधितस्य तथैवान्यथाक्रणं व्याघातः । 

सौकर्येण कार्यविरुदक्रिया च | 


क॑स्य पूवस्योत्तरोत्तरहेतुतवे कारणमाला | 


यथाप्र् ए्रस्य विङ्ेषणतया स्थापनापोहने एकत्रटौ । 


वस्व पवस्योत्तरोत्तरयुणाबहते मालादीपकम्‌ । 
'उत्तरोत्तरम॒त्कर्षः स/रः । 

हेतोवक्थिपदार्थता काव्यलिङ्गम्‌ | 
साभ्यसाधननिदं ग्रोऽनुमानम्‌ | 
उरिष्टानासर्थानां करमेणानुनिर्दशरो यथासंस्यम्‌ । 
एकमनेकस्मिकनेकमेकस्मिन्‌ क्रमेण पयायः | 
समन्यूनाधिकानां समाधिकन्येर्विनिमयः परिवत्तिः। 
एकस्यानेकगरप्तविकत्र नियमनं परिसंख्या | 
दण्डापूपिकयाऽथन्तिरापतनमथपि्तिः | 
पुल्यबटविरोधो विकल्पः | 

गुणक्रिया-योगपद्यं समृचयः। 


मनिनि ज 


य ण 


( ७5 ) 
6७ एकस्य सिद्धिहेतुवेऽन्यस्य तक्करतं च | 
5८ कारणान्तरयौगात्‌ कायस्य सुकरत्वं समाधिः | 
९९ ब्रतिपक्षतिरस्काराश्क्तौ तदीयस्य तिरस्कारः प्रत्नीकमू । 
४० उपमानस्याक्षेप उपधेयताकत्पनं का प्रतीपम्‌ | 
92 ' वस्तुना वस्वन्तरनिगृहनं मीटितम्‌ | 
५ ग्रसतुतस्यान्य॑न गुणल्वाम्यादेल्यं सामान्यम्‌ | - ` : 
७ स्वगुणत्यागदत्यु््रगुणस्तीकारस्तदयुणः | 
‰% सति हेतौ त इयुणाननह्यरोऽतद्गुणः। 
४५ उत्तरात्‌ ्रदनोक्यनमसछदलम्माव्यत्तरं चोत्तरम्‌ । 
७१ संलक्षितयूक््माध्रकालनं सृक्ष्नम्‌ | 
५७ उदधिकवस्तुनिगहनं व्याजोक्तिः | 
७८. अन्यथौकस्यं वायस्य काङुर्टेषाभ्यामन्यथा योजनं वक्रोक्तिः । 
७९ चूषयवसुस्मावयथधद्व्णनं स्वमावोक्तिः। ` 
८० अतीतानायतय); ्त्यक्षायमाणलवं भाविकम्‌ | 
८2 सश्रदिमद्‌-वस्तु-वणनयदात्तम्‌ | 
८२ अङ्गभूतमहापृरुपचरितं च ] 
८२ रत्तमात-तदाभा्-तलन्नमानां निवन्धेन रसपत्येय-उजंस्िसमाहि- 
तानि। 
<® मव्रादयौ मपतसन्धिसविद्नवटता च । 
८५ शते पथगटङ्ाराः | 
८ एषां तिटतण्डटन्यायेन सिश्रलं चंिः | 
८७ क्षीरनीरन्यायेन तृ सद्र | 
८८ एवमेते शरब्दाधभियाटङ्कातः संपत: सूत्रिताः । 
॥। छ{तिः श्रौ संजानकदश्य्यकस्य ॥ 


-----*>0-<€> 


१. रव्त्तिपूलयरन्य सूत्रसिदः पूर्ैवततिनि सुत्रेऽन्त्क्ततया मुद्रितम्‌ , तदानीमप्रति 
भात्‌ । काङ्गदिन्दूविश्चवियालयद्चारदापाण्डुम्रन्थे ८२-८५ सूतराण्येकसूत्रत्वे नव 
लिखितानि | | 


शब्द्रालकार-प्रकरणारम्भ 
९ पनरुक्तव्रदाधास -. 
५; > चेकानुप्रास 
२ वृत्त्यनुप्रास. 
> . + यमक 
९; ५ लाटानुप्रास 
०६ चित्र 
अुधोलंकार-पकरण रम्भ 
१४४ उकम 
८ अनन्वय 
९ उपमेयोपमा 
१० स्मरण 
११ रूपक 
१२ परिणाम 
१३ सन्देह 
१४ भ्रान्तिमान्‌ 
१५ उत्रेख 
१६ अपहृति 
१७ उप्प्रक्षा 
१८ अतिशयोक्ति ( १) 
१९ तुल्ययोगिता 
२० दीपक 
२१ प्रतिवस्तुपमा 
२९ हान्त 
२३ निदशना 


(4 11111 


२४ व्यतिरेकं 


२५ सहोक्ति 


२६ विनोक्ति 
२७ समासोक्ति 


२८ परिकर 


२९ इलेष 
२० अप्रस्तुतप्रशंसा 


३१ अर्थान्तरन्यास 


३२ पयायोक्त 


३२ व्याजस्तुति 


३४ आक्षेप 


३५ विरोध 


२९ विभावना 

३७ विरोषोक्ति 

२३५ अतिशयोक्ति (.२ ) 

३९ असङ्खति 

४० विषम 

४१ सप 

४२ विचि 

४२ अधिक 

४४ अन्योन्य 

४५ विकेष 

४६ व्याघात (१) 
व्याघात (२) 

४७ कारणमाला 

४८ एकावसी 


४९ माखादीपक 
५० सार 

५१ काव्यलिद्धु 
५२ अनुमान 
३ यथासंख्य 
५४ पर्याय 

५५ परिवृत्ति 
५६ परिसंख्या 
५७ अर्थापत्ति 
५८ विकल्प 
५९ समुच्चय 
६० समाधि 
६१ प्रत्यनीक 
६२ प्रतीप 

६३ मीलित 
६४ सामान्य 
६५ तद्गुण 


( ७२ ) 


9 
२० 
३३ 
२८ 
५.४९ 
५६ 
३. 
५.७१ 
५७७ 
१८१ 
९१ 
९६ 
६०८ 


६१२ 


६६ अतद्गुण 
६७ उत्तर 
६८ सूक्ष्म 
६९ व्याजोक्ति 
७० वक्रोक्ति 
७१ स्वभावोक्ति 
७२ भाविक 
७३ उदात्त (१) 
उदात्त (२) 
७४-७७ रसवत्‌, प्रेय, ऊर्जस्वी, 
समाहित 
७८-८० भावोदय, भावक्षन्धि, 
भावशबलता 
८१ संसृष्टि 
८२ संकर 
उपसंहारसूत्र 
परिरिष्ट १ : सहदयलीला 
„ २: इलोकानुक्रमणी 


ष्‌ © 
६३७ 
६४१ 
६४७ 
६५२ 
६५६. 
६६४ 
६७१ 
६८६७ 
६धद् 


६९२ 


७१४ 
७१७ 
७६२ 
७५१ 
७५७ 
७६१ 


| | श्रीः ॥ 


हि अट्ङ्ारसवंस्वम्‌ 


नमस्कृत्य परां बाच देवीं त्रिविधविग्रहाम्‌ । 
गुवेटंकारघ््राणां वरस्या तात्पयंसुच्यते ॥ 


सविमरं अवाद्‌ 


श्रद्धां मन्ये मातरं लोकमागै सा वै स्वां ओषधीः संप्रसूते। 
आन्वीक्षिक्यां किन्तमे भाववन्धः सा ता एता निस्तुषाः सविधत्त॥ 
आद्य गुर पितरमेव पुरा नतोऽहमायां च लेखजननीं जननीं मयि स्वाम्‌ । 
एक तयोस्तदनु विय्रहमद्वितीयं कादयां महेदवरयतीन्द्रकवि भ्रितोऽस्मि ॥ 
यन्नाम तत्त्वयुरुभिरुरुमिगरायो ज्योतिमेयि प्रतिनवं ` प्रकटीकृतं तत्‌ । 
कल्याणकोदायुपजीव्य मया सरटीक-सवस्व-दरोधन-विधो क्रियते प्रयत्नः ॥ 
रुय्यकसुत्र, मङ्खः सवस्वाख्या च तत्र या वृत्तिः । 
रोधयते रत्नाकरो; विमरिनी तमपि ॥ 
एतत्विकक्रतमने दत्तधिया दीक्षितेन य॒द्‌ वत्मं । 
क्वण्ण, क्षोदयते तत्‌ पण्डितराजो महारम्भः ॥ 
विदवेदवर इति नामा विद्वन्मान्यः पराक्रमते । 
नव्यन्यायनदीष्णः पण्डितराजं निराक्ुवन्‌ ॥ 
सवामेतां विदुषां, परम्परां वौक्ष्य,वीक्ष्य दण्ड्यादीन्‌ । 
जरतः कान्याल्करृतिकत न्‌ रेवाप्रसादनामाहम्‌ ॥ 
अनुवादेन सम्नद्धा व्याख्यां कुवे यथायथ विादाम्‌ । 
रुय्यकमङ्खुकजयरथकान्याक्डकतिसुनित्रयौकृतिषु ॥ 


(तीन प्रकार के हरीर से युक्त भगवती परा वाणी को प्रणाम कर युरुकरत अल्कारसूत्रं का 
तात्पय वृत्ति दारा बतलाया जा रहा है ॥' 


श्रीजयरथक्कताटङ्ारविमद्दिनी 


(न ग्र्थक्रन्निजेष्टदेवताप्रणामपुरःसरमभिधेयं तास्पयं॑चेकेनैव वाक्येन 
परागद्राति-नमस्छृत्येति । परां वाङ्मयाधिदेव तां पराख्यां शाब्दब्रह्मणोऽपथग्भूतां शक्ति 
परां वाच देवीं त्रि।वधविग्रहां बहिरज्ञिराखयिषया पश्यन्तीमभ्यमावेखरीरूपेण प्रकारत्रयेणा- 
धिष्ितश्चरीरं नमस्कृत्य निविघ्चिकी षितम्रन्थसमाक्चये तां प्रति कायवाङमनोभिः प्रहीभरय 


। 
| 
| 
| 


थ 
२ अल्डनरसवेस्वमम्‌ 


निजाल्कारसूव्राणां वृत्या तात्पययुच्यत इति मङ्गलन्वययोजना 1 तथा चाच्रोक्तरूच्णाथ- 
विस्तरः- 

ध्येयं विमर्शङूपेव परमार्थचमर्छरेतिः । सेव सारं पदार्थानां परा वागमिधीयते ॥ 
नादाख्या सर्वभूतेषु जीवरूपेण संस्थिता । अनादिनिधना सैव सूचमा वागनपायिनी ॥ 
अनादिनिधनं द्य छब्द्‌तच्वं यदृक्तरम्‌ । विवतंतेऽथंभावेन प्रक्रिया जगतो यतः॥ 
वैखरी शब्दनिप्पत्तिमध्यमा स्दतिगो चरा । चो तिकार्थस्य पश्यन्ती सुचमा ब्रद्येव केवलम्‌ 1 
इस्यादिल्ञाखोक्तिक्रमेण सवत्र सदोदितायाः सूच्मायाः परायाः शन्दव्रह्यगः चा्धर्वहि- 
रुन्मिषन्त्याः प्रथमो विवतंः पश्यन्ती नाम । तथा चोक्तम्‌- 

“अविभागा ठु पश्यन्ती सखवंतः संहृतक्रमा 1 स्वरूप्ञ्योतिरेवान्तःसूचमा वागनपायिनी (° 
इति । अस्याथेः-अविभागा स्थानकरणप्रयलम्रकारेण वर्णानां विभागहीना अत एवं 
संहतक्रमा तथ्रेवान्तःस्व रूपञ्योतिः स्वयं प्रकाशा स्वस्यात्मनो रूपं ज्योतिश्च सर्वत्र हि 
सवंविधायिनी शाक्तिरेवेति वान्तःसू च्मबीजादङ्करमिव वदहिरन्मिषन्ती किचिढुच्टरुना 
पराया सध्यमायाश्चावस्थां तस्था पश्यतीति पश्यन्तीव्युंच्यते । ततः परं तु- 
अन्तःखंकल्परूपा या क्रमरूपाञुपात्तिनी । प्राणच्रत्तिमतिक्रम्य मध्यमा वाक्‌ भ्रव तंते ॥? 


एतव्कथयामीति विमशंरूपा अन्तःसखंकल्पखूपा प्राणव्र्तिमतिक्रम्य श्रोन्र्राद्यवर्णा- 
भिन्यक्तिरहिता कमरूपाजु पातिनी मानलिकवर्णोचारणक्रमेण द्वितीयो विवतो मध्यमारूपो 
जायते । मध्यमा किल द्वयोर्वाग्विवतंयोः पर्यन्तीवंखरीसं्तयो्मध्ये वतंनान्मध्यसे- 
द्युच्यते । तद नन्तरं च- 
“स्थानेषु विन्ते वायौ छतवर्णपरि्रहा । वंखरी वाद्‌ प्रथोकतृणां प्राणरत्तिनिवन्धना ॥ 
इति कन्ञणार्स्थानकरणम्रयलक्रमव्यञ्यमानः श्रोच्रग्राह्यटुन्टुभिवीणादि नाद परिचयो गद्ध- 
दाग्यक्तगकारादिविखाससस्ुचयपद्वाक्यात्मकस्ठृतीयो विवर्तो वेंखरीव्युच्यते। विशि 
खमाकारं सुखरूपं राति गृह्णातीति विखरः प्राणवायुसंचारवि्िष्टो वणो चारस्तेनासिव्यन्ता 
वैखरीति ¦ विखरे शरीरे भवा वेखरीति वा केचित्‌ । सिद्धो मङ्गलार्थः । तथा चाच पूर्वाधं 
एव पुनराच्रस्यायिधेयपदार्थांन्वययोजना-यथा परां वाचयुत्तसकाव्यरूपतया का्यासम- 
धवनिखंन्ताम्र्‌ अभिधाताप्पर्यलत्तणोत्तीर्णामुत्छृष्टाम्‌ । दैवीम्‌ "दिद कीडावि जिगीषादतिस्त॒- 
तिन्यवहारमोदमदकान्तिस्वप्नगतिषु" दवि यथायथं धात्वथांनामनुस्मरणाव्‌ शक्तिमता 
कवीनां श्रोतृणां च स्वभावास्स्वेच्छुया ससुच्छलन्तीं ऋीडन्तीस्‌ । तथा दैवीं विजिगीषु 
खाब्द्‌ तत्सकीर्तितं चाथंश्रुपसजं नीडस्य वतंमानाम्‌ । तथा देवीं चयोतसानां योतनध्वननयोः 
पर्यायत्वाद्‌ ध्वनिसंज्ञाम्‌ । तथा दैवीं स्तस्या सर्वेः कान्यारमर्वादभिवन्याम्‌ । तथा देवीं 
व्यवहरन्ती सर्व॑न्र प्रचरितां न ठुक्ापि स्खलिताम्‌ । तथा दैवीं मोदमानां श्चुततिमातरेणेव 
परमानन्ददायिनीसर्‌ । तथा देवीं माद्न्तीं कवेः सद्द यस्य च यथायथं करणावबोधाभ्यां 
कमप्यडंकारं जनयम्तीस्र्‌ । तथा देवीं कमनीयां सवेंरभिरुषणीयाभू्‌ । च्रिविध विग्रहां 
न्रिविधच्िप्रकारो विग्रहो व्यतिरेकेण अहो ग्यतिरेकभूलः प्रमाकरणम्रकारो यस्यास्ताम्‌ । 
तथा दहि गङ्गायां घोषः इत्यादिवाक्येषु घोषस्य यच्छेस्य पावनत्वादिकं प्रतीयते तच 
नाभिधा । गङ्गादिशब्दानां शौत्यार्थस्यावाचकस्वात्‌। न तास्पर्यास्मा । तास्पर्यलकसया 
दयाक्षाराधयभावावगमा्थं परस्परमन्वयमाच्र एव च्तीणस्वात्‌। न रुक्तणा 1 सुख्याथंबाधा- 
दिदेतुत्रितयाभावात्‌ । तस्माद मिधातापर्यलन्तणाग्यतिरिक्तचतु्थंकचयानि्तिसो व्यज्ञन- 
भ्यापार्‌ इस्यादि सोऽयमेवा्ेविष्ष्यति । अथ च व्यङ्गयस्य शब्दार्थोभयमूकस्वेन प्रसि- 


भूमिका र 


द्खिविधो विग्रहो विशेषमानां सेदानां ग्रहो यस्या इति वा} एतादृशीं तां नमस्छरस्य 
मङ्लाचरणरूपत्वेन सनागुदिश्य न तु सूचच्रत्तिभ्यां तात्पयंकथनादिङक्तणपरीच्ताविस्तारेण 
निर्णीय निजालूकारसूत्राणां वरच्या तात्पयंस्ुच्यत इति । अस्याभिप्रायः- तथा च ध्वनेमं- 
नागडेशमाच्रसेव करोति “इद हि ताबद्धामद- इद्यादिना । तदेतत्तावदास्ताम्‌ । निजेति । 
परकीयाणां सुत्राणां तात्पयंकथनानववोधोऽपि स्यादिति भावः। तथा न कश्चिदपि 
परेरीद्शि सूत्राणि कतानीव्यपि ध्वनितम्‌ । तात्पयमिति। सं्लिक्तार्थग्रकाशनसिव्य्थः । 
अन्यथा हि कथनमेषां वहूुनापि अन्धेन पारं न यायात्‌ । नज्ु- 

'आदिवाक्ये प्रयोक्तव्यमसिधेय प्रयोजने । प्रतिपाद यितु श्रोतृप्रवाहोस्साहसिद्धये ॥१ 

इति नीत्या श्रोतृम्रव्रच्यथं सवंत्रेवादिवाक्येऽभिधेयप्रयोजनाद्यभिधीयते ॥ तच्चेह 
नोक्तसिति कथमन्न श्रोतणां प्रवर्ति; स्यात्‌! मेवम्‌ । अकारा द्यच्राभिधेयाः । तेषासन्र 
सात्तादेवाभिधानात्‌ । तद्‌ सिधायकं चेदमलकारसवस्वाख्यं म्रकरणमिव्यभिधानामिधेययोनि- 
यमगमभींकारेणा्थाज्ञिप्नो वाच्यवाचकभावलत्तणः संबन्धः। नद्येवविधमेतद्‌ भिधायक 
प्रकरणान्तरसस्ति । तस्यान्विष्यमाणस्याप्युपरम्भयोग्यस्यानुपरुम्भात्‌1 अत एवात्रान्या- 
रकार ग्रन्थवंरत्तण्योद्धोषणाय (तात्पयस्रुच्यतेः इव्यायक्तम्‌ । अभिधेयाश्चात्रारुकाराः कान्या- 
कारा न खोकिका इत्येतेषां काव्यो पस्कृतिद्धारेण पारस्पयंण- 
कान्य यशसेऽथकरते व्यवहार विदे शिवेतरक्ततये। सद्यः परनिदैतये कान्तासंमिततयो पदेशयुजे॥ 

दत्यायुक्तनीत्या तद्‌ विनाभावस्व भावत्वादर्था्तिप्तसवपुरुषाथंसिद्धिरूपा चतुवंगां वासिः 
ग्रयोजनम्‌ । तयोश्च साध्यसाधनभावरत्तणः संबन्धः । इति स्थितमेवादिवाक्यस्य श्रोत्‌- 
श्रवणश्रद्धाविभावनिवन्धनत्वस्‌ । 


सविमदं अवाद्‌ 


न्थकार मगल करने कौ इच्छा से अपनी इष्टदेवीको प्रणाम करते हुए [ अन्धके | 
प्रतिपाद्य विषय का परामदोभी एक ही वाक्य में करते हए कहते है-नमस्करव्य०। "परा अर्थात्‌ 
वाक्मयमात्र की अधिष्ठात्री देवी ओर शब्दब्रह्म की उपसे अपृथक्‌ परानामक क्ति, जो बाहर 
उल्लसित होने की इच्छा से पदयन्ती, मध्यमा ओर वैखरी इन तीन दारी मे अधिष्ठित होती 
हे, उसको नमस्कार कर॒ चिकीषित यन्थ की निविन्न परिसमाभि के लिए उसके प्रति काय, वचन 
ओर मनसे नच्र होकर अपने [ युर रुग्यकाचायं के ] अलंकार सूरो का तात्पय इत्ति ख्ख 
कर [ सञ्च मद्खुके द्वारा ] वत्तखया जा रहा हे" यह हरं संगल्घ्राक्य की पदाथयोजना । 
उक्त मंगल पथमे आए पदार्थो का लक्षणसहित विस्तृत अथं इस प्रकार है- “यह जो विमो 
रूप से ही वि्यमान परम अथं का चमत्कार है वही सभी पद्र्थौ कासार दहे) उसी को परा वाणी 


कहा जाता हे 1 


उसी ( परा वाणी ) का नाम नाद हे । वही सभी भूतो मे जीव रूप से अवस्थित हं । न उसका 
आदि दै ओर न अन्त । वह अत्यन्त सुक्ष्म ओर अनश्वर हे 1” 
“आदि ओर अन्त से परे जो ब्रह्म है वह शब्दतच््व है। उसी का नाम अक्षर है 1 अथ॑तत्व इसी 
अक्षर तत्व का विवत्ते हे । यही संसार कौ विचित्र रचना की जड है ॥ 
निष्पन्न शब्द ( कायाग्नि दारा प्रेरित प्राणवायु का मूर्धा से स्कराकर कण्ठदवारा शब्दरूप से 
निकल जाना , वैखरी वाणी है [ जो कर्णगोचर होती है ], मध्यमा ( कान से नदीं सनाई देकर 


कवल ) स्ति का विषय बनती है । पद्यन्ती अर्थं को चोतित करती दै ओर जो अत्यन्त सूक्ष्म पर 
-वाक्‌ दै वह तो केवर ब्रह्मरूप ही है 1 | 


अलङ्ारसवंस्वम्‌ 


इत्यादि दाखवचनों के अनुसार सवत्र ओर सदा उदित ( कथित अधवा उदय को प्राप्त ) 
जो राव्दव्रह्म की सूक्ष्म परा वाणी नामक शक्ति ह उसका वाहर उन्मिषित होति समय जो प्रथम 
विवक्तं होता है उसे पद्यन्ती कहा जाता है। जेसा किं कहा गया ह~ “पदयन्ती अविभागा = 
विभागरदित होती दे, उसमे क्रम विल्कुल नहीं रहता । वह ( पयन्ती ) आत्मजञ्याति रूपही 
हे अन्तःसुक्ष्मा ओर अनपायिनी ( अविनद्वर ) हे 1'' ~ इसका अथं दे- अविभागा = अधात्‌ 
( कण्ठ ताल आदि ) स्थान तथा इन्द्रियो के ( आभ्यन्तर ओर वाद्य ) प्रयत्नोसे व्णोमेंजोस्द 
आ जाता है उससे रहित, ओर इसीरकिए क्रमरदित, अन्तज्योंतिःस्वरूप अर्धात्‌ स्वय॑प्रकादा, 
स्वरूप = अपना अर्थात्‌ आत्मा का जो रूप वही ज्योति अथवा सवत्र सवं विधायिनी दाक्ति, जिसका 
अन्तराल अत्यन्त सूक्ष्म रहता है ठेस वीज से अंकुर के समान बाहर उन्मिषित दोती अधात्‌ कु 
कुछ व्यक्तता की ओर उन्मुख होती तथा एक ओर परा ओर दूसरी ओर मध्यमा की स्थिति का 
तटस्थरूप से दर्घ॑न करती इई जो वाणी है वदी पद्यन्ती कही जाती हे 1 इस पयन्ती के वाद्‌ 
( आती है मध्यमा, उसक। ङक्षण है ) “जो वाणी अन्तःसंकल्प रूप हे, जिसमे क्रम ओर रूप 
( अर्थात्‌ वर्णं भेद्‌ › रहते है किन्त जो प्राणवृत्ति से परे रहतीदंउसे मध्यमा वाणी कदा जाता 
है 1” इसका अथं है--“म यह वर्ह" ेसा जो मानस-विचार तत्स्वरूप ओर इसीलिए अन्तः- 
संकल्पस्वरूप, प्राणवृक्ति से परे अर्थात्‌ कानों से खनाई पड़ने वाले वर्णो की अभिव्यक्ति सो रदित, 
क्रमरूपानुपातिनी = मानसिक जो वर्णोच्चारण उसके अनुसार विवत्तित होने वाटी वाणी मध्यमां 
कटी जाती है । यह हआ राब्द वह्यका द्वितीय विवत्तं। इसका नाम मध्यमा इसकिए हे किं यह्‌, 
वाणी केजो दोष दो विवर्तं वैखरी ओर पदयन्ती हे इनके वीच रहती हे । -इसके पर्चात्‌-- 
“स्थानों में वायु के वितरत होने पर वर्णरूप से व्यक्त वाणी वैखरी वाणी होती दै । यह उच्चार 
यिता के प्राणव्यापार पर निर्भर रहती दै । -इस लक्षण कै अनुसार स्थान ओर उद्यो वे 
प्रयत्न द्वारा क्रमपूर्वक व्यक्त होने वाटी वाणी वैखरी वाणी होती है। यह कानों से सुनने योग्य 
दुन्दुभि, वीणा आदि के नाद कै समान दोती द । इसमे गद्गदादि कम्पन रहते हे ओर गकारादि 
वर्णो के द्वारा वनने वाले वण, पद तथा वाक्य भी। यह वाग्ब्रह्मका तीसरा विवतं होता हे। 
इस वाणी के किए प्रयुक्त होने वाले धवे खरी” शब्द कौ निरुक्ति कु विद्वानों के अनुसार इस 
प्रकार है--'वि = विचिष्ट, ख = मुखरूप आका को र = ग्रहण करने वाला हृमा--धविखर' अर्थात्‌ 
दारीर, उसमे उत्पन्न होने वारी हृर्ईद--वेखरी' । यह हआ मंगल पद्य का स्तुतिपरक अथं । 
दसी मगल्पद्य के पूर्वाध के पदों कौ आवृत्ति करने पर॒ वह तथ्यभौ व्यक्त होता है 
जो प्रस्तुत ग्रन्थ मे प्रतिपाद्य है । यथा-परावाणी = उत्तम॒काव्य की आत्मा ध्वनि 
जो अभिधा, लक्षणा मौर तात्पर्यं वृत्ति से परे रहती है । देवी = </ दिव्‌ धातुका अथं हे क्रीडा, 
विजयेच्छा, युति, स्तुति, व्यवहार, मोद, मदः कान्तिः स्वप्न तथा गत्ति । देवी शब्द मँ इन सभी 
अर्था की योजना यथासंभव की जा सकती हं। क्रोडा अथेमे देवी = राक्तिमान्‌ कवियो तथां 
ओ्रोताओं मे स्वमाव से स्वैच्छया ससुच्छकित होती हृद जात्‌ करडा करती हुई, विजिगीषा अथ मे 
देवी = विजयेच्छा रखती हुई अर्थात्‌ शाब्द ओर उससे प्रकट अथको गौण बनाकर अवस्थित । 
खति अथं मे देवी = चोतित अर्थात्‌ ध्वनित होती हृद, चयोतन जर ध्वनन दोनो के पयायवाचक 
हाने से चोतमान का अथं हुआ ध्वनिसंज्ञक । स्ति अथं मे देवी = स्तुत्य, ( ध्वनि रूपतत ) 
काव्यात्मा होने कै कारण सभी सहृदयं दवारा अभिवन्दित । न्यवहार अथ मे देवी = सभी क्षेत्र मे 
ॐ वाका, कहीं भौ स्खित न होने वारी । मोद अथ॑ मं देवी = सुनने मात्रसे परम आनन्द 
देने वाटी । मद अर्थं मं देवी = कवि ओर सद्दय म॑ करम से निर्माण ओर अनुद्ीलन द्वारा एकं 
विचित्र अहंकार पैदा करने वाढी, कान्ति अथं मेँ देवी = सभी व्यक्तियों दवारा अभिलषणीय 


भूमिका ५ 


‹ कान्ति = इच्छा) त्रिविधविय्महा = चिविध अथात्‌ तीन प्रकार काहे विग्रह अर्थात्‌ व्यतिरेकी 
ग्रह यानी व्यतिरेकद्वारा प्रमात्मकं ज्ञान करते का प्रकार जिसमे; जसे “गंगा पर घोष है" इत्यादि 
वाक्यों में घोषम जो रओेत्यपावनत्वादि धमो काज्ञान होता है उसमे अभिधा कारण नहीं होती 
क्योकि रात्य आदि अथोमं गगादाब्द कम वाचकता ( सकेतयमह ) नहीं रहती, न तात्पयराक्ति दही 
क्योकि तात्पयद्क्ति गगा आर घोप आदि मं आधाराधेयभाव आदि संबन्धमा्रका ज्ञान कराकर 
नष्ट हो जाती हे, न लक्षणा ही, क्य।कि लक्षणा कै हेतु मुख्यथेवाध आदि यों नहीं रहते । फलतः 
अमिधा, तात्पर्य ओर लक्षणा से भिन्न चतुथं कक्षामे निहित व्यजनान्यापार से रोत्यपावनत्वादि 
करा ज्ञान हो पाता दे। [ इससे स्वयं विमरिनीकार ही आगे विचार करेगे ]। दूसरे प्रकार से 
( त्रिविधविय्रहा ) चब्दमूलक, अथमूल्क ओर उभयमूलक, अतः तीन प्रकारका ह विग्रह अर्थात्‌ 
वरि = विशेषणा मेदो का यह~ज्ञान जिसमे । ेसी उस उत्तम काग्यरूपा परा ( दाक्ति ) को नमस्कार 
रने का अथ ह मंगलाचरण के साध्यम से सूत्रात्मकल्गसे कु निदश्च करनाःनकि सूतद्रारा 
तात्पये कथन अर ब्रत्ति द्वारा लक्षणपरोक्षा आदि के विस्तार के साथ । अपने अक्कारसूत्रका 
त।त्पय॑ वृत्ति द्वार! वतलाने का अभिप्राये कि यहं ध्वनि कातो केवर थोड़ा सा नामकथन 
मात्र रहेगा, अधात्‌ “इद हि तावद्‌ भामह ० इत्यादि द्वारा [ इस पर अधिक विचार नदीं होगा ] 
डस विषय की चचां इतने मे ही समाप्त हो जावेगी । 


निज = निज इसरिए कहा कि किसौ को यह ज्ञान नदो किं किसी अन्य के बनाए सूर्नोका 
तात्पयं बतलाया जा रहा हे । इससे यह भौ ध्वनित हआ किं अन्य आचार्यो ने रेसे सूत्र नहीं 
वनाए हे । तात्पयंम्‌ = तात्पयै=संक्षिप्न अथे का अका्चन । अन्यथा यदि इन अलकार सूरो का तात्पर्यं 
विस्तार पूवक स्पष्ट किया जाए तो बहुत वड़ा यन्थ रचकर भी उसका पार पाना संमवन होगा । 
राका होती है कि-“आदि वाक्य का प्रयोग अभिधेय ओर प्रयोजन का प्रतिपादन करने कै लिए 
किया जाना चाहिए जिससे श्रोताओ मं उत्साह बना रहे--इस नियम के अनुसार ओता की 
प्रवृत्ति के लिए सभी अन्धो मे प्रथम वाक्य मे अभिघेय तथा प्रयोजन आदिका प्रतिपादन किया 
जता हे । यदह वह नहीं बतलाया गया । फलतः इसकी ओर श्रोताओं [या पाठकों ] की प्रवृत्ति 
नसे होगी । [ उत्तर ] णेसा नहीं है । यदहो अभिधेय है अल्कार, क्योकि यहाँ उन्हीं का 
साक्षात्‌ न।मोव्छेख है । उनका अभिधायक हे मन्धनाम--'अलंकारसवंस्वः । अभिधान ओर 
असिपेय क्रा वाच्यवाचकभाव संबन्ध रहता ही हे, अतः उसका ज्ञान अपने आपहो जाता है। 
दन [ अलंकारो ] का अभिधायक इस प्रकारका कोई ओर न्थ नहींहै क्योकि वह मिक्ता 
नहींहे। यदि [णेसा कोड यन्थ] होता तो खोजने पर मिर्तादही। इसीलिए अन्य अर्कार 
गन्धो से इसके अन्तर की घोषणा करने के किए कहा--'ताःपयंम्रुच्यतेः । अभिघेय हैँ यहोँ 
अलंकार अर्थात्‌ काव्य के अल्कार न कि रोक अल्कार । इस प्रकार अल्कार रोमा बदाते हें 
काव्य की ओर-"काव्य य्प्राप्त करातादहै, धन दिलातादे, व्यवहार काज्ञान कराता है, 
अर्मगल का दामन करता दे, तत्काल परा शान्ति देता हं तथा कान्तासम्मित [ माधुर्य-मूमिका 
दवारा ] उपदेद्य भी देता हे ।› [ काव्यप्रकाश के ] इस वचन के अर्थ शब्द से गृह्यत [ ध्म, अथं 
काम ओर मोक्ष, इन ] चारौ पुरुषार्थो की जौ प्राचि तद्रूपी प्रयोजन सिद्ध करते है, क्योकि 
अल्कार काव्य से पृथक्‌ नदीं होते । इन दोनो [ पुरुषां रूपी प्रयोजन तथा अलंकार ] का संबन्ध है 
साध्यसाधनमभवात्मक । [ अलंकार साधन है जोर पुरुषां साध्य ] इस प्रकार आदि वाक्य मं श्रोता 
म श्रवण कै प्रति श्रद्धा उत्पन्न करने की क्षमता सिद्ध ही है। 


द  अदङ्कारखवस्वम्‌ 
विमरिनी 


ननु यदीहारुंकारा अभिधेयास्त्िं तदरुकयोंऽप्य-मिघेयः। “अलंकारा अरंकायापेच्ठाः' 
इति नीत्या स एववा को नाम यद्पस्कारकव्वेनतरस्वरूपमसिधीयत इत्याशङ्कय तदवत- 
रणिकामेव वक्तघयुपक्रमते--इदेत्यादिना । 
दोंका होती द कि यदि इस न्थ में अलका का प्रतिपादन करना दे तो उनसे जो तक्र अच्छ्रत 
होते दें उन अकूकार्या का भी प्रतिपादन होना चाहिए । अथं यह्‌ कि (अलंकार अल्कायसापेश्च दात 
दे--इस नियम के अनुसार प्रदन इस तच्च के विषय में है जिसका उपर्कार करने वि तत्व कं 
रूप मं अरुकार का निरूपण किया जा रदा है । इसे उत्तर मे कहते दै- 
[ सवेस्व ] 
इह दहि तावद्‌ भामदोद्धटयप्रभ्तयश्िरतनाटंकारकासः अरतीयमानमथ 
वाच्योपस्कारकतयाटकारपश्चनिष्िक्तं मन्यन्ते । तथाहि- पययोक्ताघ्रस्तत- 
 प्रदंसाखमासोक्त्याश्चेपव्याजस्तुच्यु पमेयोपमानन्वयादौ वस्तुमाचं गम्यमानं 
वाच्योपस्कारकत्वेन “स्वसिद्धये पराश्धेपः पराथ स्वसखमपंणप्‌ इति यथायोगं 
द्विविधया भङ्गया प्रतिपादितं तैः | 
रुद्रटेनापि भावालंकायो द्विधोक्तः । रूपकदीपकापहति तस्ययीभिताद्‌ा- 
बुपमायलकासे वाच्योपस्कारकत्वेनोक्तः । उत्प्रे तु स्वयमेव पतीयमाना 
कथिता । रखवत्परेयः्रथृती तव रसभावादिवौच्यर्येमादेठस्वेनोक्तः। तदित्थै 
चिविघमपि प्रतीयमानमदंकार्तया ख्यापितमेच । 
इस ( अल्कारश्ाख ) में ( ध्वनिवादी आचार्यो से ) प्राचीन आचाय मायह आर उद्धट आदि 
के जो आरम्भिक सिद्धान्त है ` उनमें ( ध्वनिवादी द्वारा प्रधानरूप से स्थापित ) प्रतीयमान अधेको 
` वाच्य अथं का सोभाधायक अतएव ८ अप्रधान ) अल्कार स्वरूप माना गया है । इन आचार्यो कै 
अनुसार पर्यायोक्त, अप्रस्तुतप्रदोंसा, समासोक्ति) आक्षेप, व्याजस्तुति, उपभयोपम। -ओर्‌ अनन्वय 
आदि अल्कारो में वस्त की ८ व्यंजना या अनुमान से) प्रतीति होती हे किन्तु वह वाच्यार्थं क 
 द्रोभाधायक होती है इस नथ्य को उन्दने दो प्रकार से स्पष्ट किया इ (१) “अपनी सिद्धि वै लिप 
( वाच्याथ द्वारा ) दूसरे अथं का याक्षेपः, (२) “दूसरे कं प्रति ( व।च्याथं दारा ) अपना समपंणःः 
क ने भी ८ वस्तुध्वनि को वाच्य की शोमा बद़ाने वाखा जतलाने वाखा) मावनामक अल्कार मानां 
दै ओर उसके दो मेद वतकाए हैँ । 
८ इस वग के आचार्यो ने ) रूपक अपहुति, तस्ययोगिता आदि में उपमादि अलंकारो को 
वाच्यार्थं का उपस्कारक कदा दै । ( उद्धट ने तो ) उप्प्रक्षा ( के एकमेद्‌ ) को प्रतीयमान हौ कहा हे । 
( भामह ओर उद्धटने ) रसवत्‌ ओर प्रय॒ आदि अल्कार।म रस ञर भाव आदिक वाच्याथं 
का योभाेतु वतलाया है । इस प्रकार ८ वस्तु, अल्कार ओर रसय) तीनोंदही प्रकार कै प्रतीय- 
मान अथं को इन आचार्यों ने अल्कारस्वरूप ही वत्तटाया ह । 
विम्िनी 
म्रष्तिना दण्ड्यादयः। तावच्छब्दो विग्रतिपच्यभावद्योत्तकः । चिरंतनेत्यादि । ध्वनि- 
कारमतमेभिर्न दृष्टमिति मावः । प्रतीयमानमिति । वाच्यव्यतिरिक्तवेन स्वसंवेद नसिद्धमपी- 
त्यर्थः । अर्थमिति । विश्रानितस्थानतया परमो पादेयतारत्तणम्‌ । वाच्योपस्कारकतयेत्ति । वाच्यो- 


(~ 


पस्कारकत्वं द्यरंकाराणामात्मभूतम्‌ । अल्कारपक्षनिक्षिप्तमिति । समग्राख्कारान्तश्रतं न 


~ 6 न वाका च 


भूमिका ७ 


पुनस्तद्वथतिरिक्तमिस्यथः । मन्यन्त इति । तथात्वेन मन्यन्ते न पुनस्तथा संमवतीव्यर्थः\ 
नद्यसिमननमात्रेणेव भावानामन्यथामावो सचतीति मावः एतदेव दश्ंय ति-तथादत्या- 
दिना! तवेस्तुमाच्रं गम्यमानं वाच्योपस्कारकस्वेन प्रतिपादितमिति संबन्धः । वस्तुमात्रं न 
पुनरलंकारा रसश्च । स्वसिद्धय इति । "न्ताः प्रचिज्न्तिः इत्यादौ ऊुन्तेरात्मनः अवेख- 
सिद्धयथ स्वसंयोगिनः पुरूषा ॐ्तिप्यन्ते । तेवि ना तेषां प्रवेशासिद्धेः । गङ्गायां घोषः 
इत्यादौ ठ ग ज्ाशब्द्‌ः परत्र तटे घोषाधिकरणतासिद्धये स्वारमानस्प॑यति। स्वयं तस्य घोषा- 
धिकरणत्वासंमवात्‌ । यथायोगमिति 1 कचिद्धि वाच्योऽर्थः स्व सिद्धये परं प्रतीयमानमथ- 
माक्तिपति । चिच स्वयमनुपपदमानः सन्प्रतीयमान एवार्थे स्वं समपंयति । तेन यच्च 
यादक्तत्र तादगेव योज्य मिव्यर्थः। 
म्र्ठति राब्दसे दण्डी आदि की ओर संकेत है। तावत्‌ = आरम्भिक--शब्द द्वारा उन 
सिद्धान्ता मे विप्रतिपत्ति न दोना संकेतित किया गया । चिरंतन = प्राचीन कहकर यह बतलाया 
गया कि इन आचायां ने ध्वनिकार का मत नहींदेखा दह प्रतीयमान = वाच्यसे सिन्नरूपसे 
सवको अनुभव मे आने वाला । अथ =उसीमे तात्पयंकी विश्रान्ति रहती हे अतः वही परमो 
पदेय होता दे। वाच्योपस्कारक =वाच्यकी सोभा वड्ाने वाला होना ही अकारो की 
अट्कारता हे । अरूकारपत्त निज्तिक्च = पूरे कँ पूरे को अलंकार के अन्तयंत मानना, उससे भिन्न 
नदीं । मन्यन्ते = ठेसी उनकी मान्यता है, परन्तु टेसा होता नह्ये है । अथे यह चि किसीकी 
धारणामात्र से किसी वस्तु का बदर जाना संमव नां । वस्तुमान्र = केवर वस्तु, अल्कार ओर 
रस नदीं । स्वसिद्धये = अपनी सिद्धि के किटि । “भाक भीतर जा रहे है ८ ऊन्ताः प्रविरदान्ति ) 
इत्यादि वाक्या सं भार आदि शब्द्‌ मीतर जाने रूपी क्रिया मेँ (जड होने के कारण असंभव) 
अपना कठैत्व सिद्ध करने के छि स्वयं का धारण करने वाके ( चेतन ) पुरुषं का आक्षेप कर छेते 
दे । क्योकि उन ( पुरुषा ) के विना उन (मालं ) का भीतर जाना संभव नदीं । ( यह इं 
अपनी सिद्धि के किए अपना अथे विना छोड दूसरे अर्थौ का ग्रहण ) शंगा जी पर घोषः इत्यादि 
उदाहरणों में ( स्थिति भिन्न हे, यह ) गंगा का अथं हे विष्ट जलप्रवाहः, वह घोष का आश्रय॒ नहीं 
वन सकता, अतः उस--( आश्रयता ) कौ सिद्धिकेरिएि गगा दाब्दं प्रवाहरूपी अथं को सर्व॑धां 
छोड़ देता दै ओर तटरूपं अथं क अपना लेता है क्योकि वहुधोषका आश्रय वन सकता है। 
यही उसका स्वसमप॑ंण कहटाता हे । यथायोगम्‌ अर्थात्‌ वाच्च अथै कदी तो दूसरे प्रतीयमान 
अथं का आक्षेप अपनी सिद्धि के क्एिकरता हे ओर कीं अपने आप असिद्ध रहने के कारण अपने 
आपका प्रतीयमान अथं को समप॑ण कर देता हे । अतः वाक्य अथे कौ जहां जेसी स्थिति हो वह 
वैसी ही स्थिति समञ्च लेनी चाहिए । 
विमरिनी 
तच्र पर्यायोक्तं यथा- 
अधा्तीन्नो लङ्कामयमयसुदन्वन्तसतरद्िस्यं सौमित्रेरयञ्ुपनिनायोषधिवनात्‌ । 
इति स्मारं स्मारं सद्‌ रेवरूमोचित्रङिखितं हनूमन्तं दन्ते दश ति पितो राकखगणः ॥° 
अच्र राक्तसगणच्त्तान्तो . वाच्यः सन्‌ स्वसिद्धये परं कारणरूपमरिपखायनाया्तिपति ) 
तत्पराय नायन्तरेण राक्तसघ्रत्तान्तस्यासंगतेः । अप्रस्तुतअ्ंसा यथा- 
श्राणा येन समर्पितास्तव बरायेन स्वञ्ुस्थापितः 
स्कन्धे यस्य चिरं स्थितोऽचि विदे यस्ते सप्यांसपि। 


तस्यास्य स्मितमात्रकेण जनयन्प्राणापहारच्छियां 
 श्रातः प्रत्युपकारिणां धुरि परं बेतारुलीखायसे ॥° . 


< अलङ्ारसखवंस्वम्‌ 


अच्र वेताख्चरितमगप्रस्तुतं प्रकरणादिवदरोन स्वयसनुपपयमानं सत्‌ मस्तुते कृतध्न्रत्तान्ते 
स्वं समपंयति । समासोक्छियंथा- 
दन्तन्ततानि करजेश्च विपारितानि मरोद्धिन्नसान्द्रएख्के भवतः शारीरे । 
दत्तानि रक्तमनसा शग राजवध्वा जातस्ष्रहै म्यं निभिरमप्यव रो क्ितानि ॥? 
अच्र वोधिसखसे नायकव्यवहारो न संभवतीति स्वसिद्धयथ नायकत्वमाक्तिपति । 
आक्तेयो यथा- 
कि भणिमो जण्णद्ध कित्ति अध किंवा इमेण सणिएण। 
मण्णिहिसि तहवि अहवा अगामि कि जाण मनिसि ॥ 
अत्र वद्यमाणविषयो भणननिषेधो वाच्यः सन्‌ ववतुमेवो पक्रान्तस्य निषेधानुपपत्तेः 
स्वयमविश्रास्यन्‌ स्वात्मसमपंणेन स्वा प्रति सरिष्यामि अथवा च्रिये यद्वा इता याव- 
दहसिति विधित्रयमर्थान्तरमाक्तिपति । यच्वत्रान्येः श्वाच्योऽथः स्वसिद्धयेऽर्थान्तरमात्ति- 
पति? इव्युक्तं तद युक्तमेव । तथात्वे हि निवेध एव पयंवसितः स्यान्न निषेधाभास इस्या- 
स्तेपाककार एव न स्यात्‌ । “आ्युखावभासमानो दहि निषेधः आाक्तेपरुच्षणम्‌ 1 न च विधि- 
निषेधयोविरोधास्साभ्यसाधन भावो युक्तः । व्याजस्तुतियथा- 
(द हिणं पदुणो पुणो पटू त्तणं कि चिरंतन पहूण । 
गुणदोसा दोसगुणा एहि का णहु क तेहि ॥' 
अत्र चिर्तनानां निन्दा वाच्या सतती स्वयमनुपपद्यमाना स्तृतावात्मानमपंयति। 
तद्रतव्वेन वस्तद्िताया निन्दाया असंभवात्‌ । एवमदययतनानासपि स्त॒तिनिन्दायामा- 
व्मानमर्पयति। तस्था अपि विपरीततया तद्दतव्वेनासंभवात्‌ । यद्पुनरत्रान्येः स्वसिद्धये 
पराक्तेपो उ्याख्यात्‌स्तदुपेचयमेव । यतोऽत्र चिरंतनानां स्युस्याक्तेपेग निषिद्धा निन्देव 
प्रतीयेत, अयतनानां च निन्दाक्तेपेण निविद्धा स्तुतिरेवेति वाक्याथविग्रखोप एव पयव सितः 
स्यादिति नंतदयक्छम्‌ । कि च छत्तषणायासपि स्वसिद्धये परत्तेपो न युक्तः । तथात्वे हि 
छच्तषणायाः स्वरूपहानिः स्यात्‌। वाच्यलक्ञणस्येव स्वस्य सिद्धत्वान्मुख्या्थं बाधाभावात्‌ । 
न चंकद्‌ा एकस्य वाधः सिद्धिश्चेति वक्तं युक्तम्‌ । विप्रतिषिद्धं ह्येतत्‌ । वाच्यस्येव यद्त्रसि- 
द्धिस्तदभिषेव स्यान्न रक्षणा । तस्या हि भुख्याथवाध एव जीवितम्‌ । न्ताः प्रविज्चन्तिः 
इत्यादौ च ऊन्तानां स्वयं प्रवे्टमसंभवान्मुख्यार्धवाध एवेति परस्य ऊुन्तवद्र पस्य ख्चयस्यै- 
वाथंस्य प्राधान्यम्‌ । अतश्च छक्षणायां बाधितः सन्सुख्योऽथः प्रत्र च्य एव स्वं समर्प- 
य तीस्येव युक्तम्‌ । ननु ययेवं त्पर्यायोक्तादौ वाच्यलिध्यथ परस्य रच्यस्याक्तेपः प्रतीयत 
इति तत्र कि प्रतिपत्तव्यम्‌ । इदं प्रतिपत्तन्यसमर--अनच्र हि लक्षणाया एव॒ नाव. 
काडाः । तत्र हि कथमहं स्यासिति वाच्यं सत्‌ काय तद्‌विनाभावात्परं कारणमाक्तिपती- 
स्याक्तेपेणेव सिद्धेस्तस्या अनुपयोगः। "गौरयुबन्ध्यः' इत्यत्र यथा कथं मे श्रुतिचोदितम- 
चुवन्धन स्यादिति जत्या व्य व्द्यवि नाभावाद्वयक्तिराज्ञिप्यते न॒ ठ ङच्यते तथवाच्रापि 
कार्यकारणयोर्घंयम्‌ । एवं समासोक्तावपि नायकच्यवदारस्तद वि नाभाविस्वादेव नायक- 
स्वमाक्तिपतीत्यत्रापि लन्तणामूख्त्वं नाशङ्कनीयम्‌ । मन्थता पुनरेतचिरंतनमतानुबादपर- 
तयोक्तम्‌ । अस्माभिस्तु प्रसङ्गद्रस्तु पयांखो चितमिव्यर बहुना । 
पयायाक्त्यल्कार्‌ जसे [ कोड्‌ कवि अपने आश्रयदाता का स्वुतिम कह रहाहे कि “हे देव ] इसने 
हमारी ल्काकोजला डाला, इसने समुद्रकोभी पार कर ख्या, इसने ओपधिके वनमेंसे 
विद्चल्या नामक ओषधि लक्ष्मण के किए टा पहचाई--ण्सा स्मरण कर करके कुपित हर राक्षस खग 
आपके राजओं कौ वलमी ( चन्द्रशाला ) मँ चित्रङिखित हनूमान्‌ को दतां से डंसने र्गते है 1 


6 क | 


हि त कक 9 = अ वा आ + ऋ ०9 रा > 


भूमिका २, 


यह अभिधावृत्ति से तो कथित हे राक्षसो का व्यवहार, पर वह व्यंजना से प्रतीत “राजा के राद्खओं 
का मागना आदि” अथं के विना समव नहीं हे, अतः वह ( वाच्य राक्षस वृत्तान्त ) उस ( प्रतीय- 
मान खद्धपलायन आदि ) का आक्षेप करल्ेतादहे। उस ८ प्रतीयमान ) का आक्षेप इसर्िए संभव 
भी दे किं वह उस ( वाच्य )का कारण हे ( अथात्‌ स्तूयमान राजा के शद्धुराजाओं के भवनों में 
राक्षसो क, रहना जर चित्ररिखत हनूमान्‌ जी कोद।तांसे डंसना तब संभव दैजव वे राजा 
भवन छोड़ कर भाग गए ह्‌। ) । विना राजाओं के भागे राक्षसो का चिचित हनुमान्‌ को उंसना 
आदि व्यापार संभव नहं । 

अप्रस्तुत प्रसा ज॑ से--““हे भाई वेता [ जगाया हुआ शाव ] केवल तुम्हीं प्रत्युपकारी व्यक्तियों 
म वरिष्ठ हो, क्योकि तुमने उस व्यक्तिको भी केवल मुसकुरादट भर मे निष्प्राण कर दिया जिसने 
अपने उदोग से तुम्हारे भीतर बलात्‌ प्राण डले, [ सृत पड़े ] तुम्हे [ जगाकार ] खडा किया, 
जिसके कन्थे पर भी ठुम काफी समय तक चदे रहे ओर न कैव इतना ही, जिसने तम्दारी 
पूजा मी कौ ।'' यह वेताल का चरित [ किसी भी व्यक्तिद्वारा वेतारु को रेसा उपालन्भ देना] 
अपने आपमें अनुपपन्न हे, फलतः वह॒ किसी कृतघ्न कै वृत्तान्त के रूप में पय॑वसित हो जाता है 
ओर प्रतीतदहोतादहे कि वक्ता का लक्ष्य कोड कृतघ्न व्यक्ति है। 

[ अप्रस्तुत प्रदोसा मे अभिधा दारा अप्रस्तुत ओर प्रस्तुत व्यजना दारा प्रतिपादित होता है। 
यदह कृतव्न प्रस्तुत या वण्ये है किन्तु शब्दों दारा वर्णन किया जा रहा है तत्सदृश वेताल का । अतः 
यद्‌ साटरद्यमूल्क अमप्रस्तुतप्रदोसा है । 

वेतार्‌ को उपालम्भ देना इसलिए अव्यवहार्य है किं वेताल उपालम्भकतां को भी चट कर 
सकता हे । ] | 

“रक्तचित्त ( सिही = खून कौ इच्छा, नायिका = अनुरागयुक्त . चित्त से) सिहिनी ने 
८ दे बोधिसत्व ) पयांप्तमात्रा ओर सघनता के साथ उभरे पुलक से युक्त आपके शसीर मे जो दन्तक्षत 
आर नखक्षत किए हे उन्हं निःस्पृह सुनिय। ने भी सस्पृह होकर देखा ।› इस पच मे ८ दो व्यवहार 
प्रतीत हो रहे हं एकं नायिका द्वारा अनुरक्तचित्त से नायक के साच्िकभाव रोमांचादि से युक्त 
रारीर मं दन्तनखक्षत कौ प्रणयरीला ओर दूसरा-रक्तपनेच्छु सिद्यद्वारा वोधिसच् के वेदना 
से रोमांचित दारीर पर दोत तथा नखों से धाव करना । इनमे से जो › नायिका नायकं व्यवहार है 
वह ( वीतराग ) बोधिसत्व मे संभव नदीं अतः उसका आक्षेप करना पडता हे । 

[ समासोक्ति के विषय मं सामान्य मत यह है कि उसमे वाच्यार्थं के अनुपपन्न हए विना व्यंग्यार्थं 
की प्रतीति होती हे। यहां यह नवीन तथ्य स्वीकार किया जा रहा है कि “वाच्यां की अनुपपत्ति 
कै कारण व्यग्याथे कौ प्रतीति हो रहौ हे!" जो वोधिसक् है उसमे रत्ति के साच्िक अनुभाव रोमांच 
अदि सचसुच संभव नहीं अतः उसमे नायकत्व का आक्षेप विवदा होकर करना है । ] 

आक्षेप जेे-“किं मणामो मण्यते कियदिवाथ किं वानेन भणितेन 1 

भणिष्यते तथाप्यथवा भणासि किंवा न भणितोऽसि ॥ 


क्या क १ कहा भी कितना जाय ? कहने से भीलाम क्या? तवी कहा तो जाएगा 
हो । तव भी अन्ततः कर्हूगी क्या, ओर [ तुमसे] कुछ कहा नहो गया है क्या १। यद्य 
उपस वक्तव्य के कथन का निषेध अभिधादारा बतलाया जा रहादै जो अभी कहा जाने वाला, 
कट। गया नह्‌। ह । परन्तु यह एक असभव वात हे किं जिसका अस्तित्व ही नहीं उसका अभाव 
वतलाया जाए अतः यह्‌ निषेध संभव नहीं होता, फरतः वह॒ अपने आपको-तुम्हारे चिणि मर 
जाऊ्गी, मर रही हू अथवा यह्‌ मरी-इन तीन प्रकार के विध्यर्थो कै रूपमे ढाङ्कर इन अर्थौ 


१० अच्छङ्ारखवंस्वम्‌ 


का आक्षेप करता है । अन्य [ आचाये | का यह कहना अमान्य हे कि यहाँ [ निषेधरूपी ] वाच्य 
अथं अपनी सिद्धि के किटि दूसरे अथं का आक्षेप करता दैः, क्योकि रेसा मानने पर 
वाच्याधरूप निवेध ही प्रधान रहता ड, उसका आमास नदीं । फर्तः आक्षेप अलरुकारता को ही प्राप्त 
नहीं होता, क्योकि आक्षिपाक्कारका क्षण दै-आरम्भम मात्र में भासित होने वाला निधेध 
( सवं० ) ।› विधि ओर निषेध परस्पर विरोधी होते हैँ अतः यह समव नदीं है किं इनं परस्पर 


साध्यसाधनभाव हो । 


| विम्दिनीकार का यह मत यँ अमान्य है कि विधिनिषेध मेँ साध्यसाधनभाव नदीं दोता । 
श्रम वासक.” आदि उदाहरणा मँ विधि से निषेध ओर “गतासि न पुनस्तस्याधमस्यान्तिके'ः 


आदि उदाहरणा में निषेधसे विधिका ज्ञान साहित्यं वहत॒ चाचत हदं । जहो साध्यसाधनभाव 
लाप्वन्चापकमवरूप होता हे वहाँ पिधिनिषेध का परस्पर विरोध उसका विरोधी नदीं दोता । ] 
याजस्वुति जंसे--“अध्रुना प्रभवः प्रभवः प्रयुत्वं किं चिरतनगप्रभूणाम्‌ । 
गुणदोषा दोषयुणा एभिः क्रेता न खटः क्रृतास्तेः ॥ °" 
“आजकेजो प्रमुहे वे ही वस्तुतः प्रभु कहने योग्य हेः प्राचीन प्रयुजां में प्रभुत्व कादेका। 
युणाको दोप ओर दोर्पोको युणये ( नवीन प्रभु) ही जो वना रके है, प्राचीन नहीं। 
यदा प्राचीनो कौ निन्दा अभिधा से कथित है चिन्तु वह अपने आपमे अनुपपन्नदहै ओर 
सतुत्निं के रूप में वदरू जाती है । क्योकि प्राचीनां मे यणो को दोष ओर दोपांको गुणन करने की 
` जो वात कदी गहं ह उसे उनकी निन्दा निन्दा नदीं रह पाती । इसी प्रकार आधुनिक या नवीनं 
कौ अभिधा से कथित स्तुति निन्दा के रूपमेँ परिणत दयो जाती है च्यक युणोँको दोप ओर दोषौ 
कौ युण सिद्ध करने क वात स्तुति के विपरीत हे। यद अमिधेयाथं का न बदलना ओर अपनी 
सिद्धिकेङ्टि दूसरे अर्थं को अपनामर लेना जिन्दं मान्य है वे [ अल्काररत्नाकरकार आदि | 
उपेक्षणीय ह क्योकि वैसा मानने पर चिरतन। कै प्रति स्तुति से आक्षिप्त निन्दादी प्रतीत होती 
ओर नवीनो के मरत्ति निन्दा से आक्षिप्त स्तृत्ि दी । ओर ेसा हने पर काव्यवाक्य का ताः ए्पयभूत 
अथ ( प्राचीन) की स्त॒ति ओर नवीनां की निन्दा ) निष्पन्न नदीं होता । अतः “स्वसिद्धये प रक्षुपः 
गत अह। जमान्य हा ह । एक यह भीं आपत्ति हं किं यहा लक्षणा दारा स्वसिद्धिके लिटि दृसरेका 
आक्षेप होता हं क्योकि वेसा मानने पर लक्षणा कौ नदीं वनती । क्योकि वाच्यार्थं कै वाच्या रूपं 
मह्‌ वने रहने से उस्रं कोडं आपत्ति नदीं उठती जिससे लक्षणा हौ ( अथात्‌ नवीनो की स्तुति 
अर्‌ अआचान। कौ निन्दा मं कोदं आपत्तिन होने पर उन्हें वदल्ने ओर तद्धिपरोताथं का आक्षेप 
करन का प्रन हा नर्हा उठ सकेगा ।) यहु मी नहीं कहा जा सकता कि वाच्य की सिद्धि होती 
अन्तमं आर वाध होता हं आरम्भ में जतः वाध मी असंमव नहीं फलतः लक्षणा होनाभी संभव 
द” क्याकिं यहु मानना परस्पर विरुद्ध हे क्योंकि यदि अन्ततोगत्वा वाच्यकी ही सिद्धिकरनी 
तो उसका वाध आरम्भमें म उवेक्षणीय ही होगा ओर तव अभिधा दही वाच्यम मानी जाएगी 
ङ्गा नहा । जह तक लक्षणा का सम्बन्ध है उसका वीज वाध ही है। “माङ मीतर जतत ह"? 
आद्‌ वक्त्वा म॑ ( अचेतन ) मले आदि का भीतर जाना संभव नहीं यतः मुख्य या अर भधेय 
अर्थ वातत इ रहता हे मौर “भालेवले युरूष--रूपी अथं रष्य ओर प्रधान रहता है । इसछिण 
( व्याजस्छति कौ ) लक्षणा में सख्य अथं वाधित होकर अपने से भिन्न लक्षय अथ सँ अपने आपको 
सखा देता हं यही मानना उचित है । 


दन उठता हं यदि ( व्याजस्तुति में) ेसा है तो पयांयोक्त आदिमे भी जहो वाच्याथकी 


सदधि कै लिए उससे भिन्न लक्ष्य अथं का आक्षप होता इया ब्रतात होता 2 वहा क्या मानना 
गगा । यह मानना दोगा = पर्यायोक्त मे लक्षणा का कोदं अवसर नदीं है। क्योकि वहा वाच्य ओर 


[ज 


| भूमिका ९९ 


व्यंग्य मेँ कायंकारणभाव रहता हे अतः वाच्य “भँ वैसे निष्पन्न हो" देसा सोचकर अपने कारण 
व्यंग्य का आक्षेप या अनुमान कर लेता दहे ओर उसी से उस ८ वाच्य ) की निष्पत्ति हो जाती ह, 
फलतः ( यह पयायोक्त मं ) रक्षणा का कोई उपयोग ही नहो रहता। जैसे «वैर का अनुबन्धन किया 
जायः' इस ति वाक्य मे ( गोत्व जातिस्वरूप ) अर्थ का वाचकं वैर राब्द जातिरूप अपने अथं 
का अनुवन्धन सभव हो इसकिए उससे नित्य सम्बद्ध व्यक्तरूप ( रारीररूप ) अथं का आक्षेप कर 
लेता हे वैसे ही यद्य ( पर्यायोक्त के ) कायंकारणमाव रूपी संवन्ध मँ भी संभव जानना चाहिए । 
सौ प्रकार समासोक्ति म भी नायक का व्यवहार नायवं से कदापि अल्गन होने वाले नायकेत्व 
का आक्षेप कर ठेता है, अतः वहम भी लक्षणा से वह अथं प्रतीत होता दै" ेसी राका नदीं की जा 
सकता । अन्धकार ने ( स्वसिद्धये पराक्षेप ) यदह वात प्राचीन के मत का अनुवाद करने के किष 
काह दी ओर हमने भी अवसर पाकर उसका आवदयक पर्याखोचन कर दिया, अत्तः अधिक विस्तार 
आवरयक नहीं । अन्धकार ने प्यायोक्तादि मे वस्तुध्वनि को वाच्य का उपस्कारक वतलाकर अन्त 
मे “स्वसिद्ये पराक्षेपः मौर “परार्थं स्वसम्षणम्‌"ये दो सूत्र दे दिएदहैजो क्रमशः उपादान 
लक्षणा ओर लक्षणलक्षणा के लक्षण वतलाए गद ह । इससे सामान्यतः यह धारणा बनती है किं 
मन्थकार पर्यायोक्त आदिं समी अलका मे लक्षणा मानते है परन्तु वस्तुतः वात एसी नहीं हं । 
यन्धकार ने वे सूनर केवर प्राचीन मत प्रस्तुत करने के छिद दे दिए है । उन समी अरुकासो मे 
रक्षणा मान्य नहीं ह्‌ । 

| एसा जगता हे कि “स्वसिद्धये० इत्यादि वाक्य प्राचीन आरुकारिकों मे रक्षणारक्षण 
यो रूप मं प्रचलित नहीं थे। केवल मम्मट्ने काव्यप्रकादासे इन्द लक्षणालक्षणके स्पमें दे 
दियाहं। मूर ग्रन्थ ओर दीका दोनो के रचयिता मम्भट कं वाद हए हे अतः यहां लक्षणा का 
विवेचन प्रस्तुत करना आवद्यक धा | व्याजस्तुति से भी टीकाकार के अनुसार अन्धकार को लक्षणा 
मन्व नदा ह । सूत्र अल्कारो मे लक्षणा कौ सी प्त्रिया प्रतीत होती है जतः लक्षणा का भ्रम नहीं 
होना चाहिए । इन अलंकारो मै अन्यः शाब्द से जिस आचाय का खण्डन किया गवा है वे कदाचित्‌ 
अल्काररत्नाकरकार ्ोभाकारभित्र है । उदघृत अल्कारौ के अगि आ रहे प्रकरण मे उनके मत 
देख जा सकते ह । | 

८1. विमरिनी 
उपमेयोपमा यथा-- | 


रजोभिः स्यन्द नोदुतेगंजेश्च वनसंनि्ैः । शुवस्तरूमिव व्योम कुर्बज्ब्योमेव अूतखम्‌ ॥' 
अत्र द्वयोः परस्परञ्पमानो पमेयव्वं वाच्यं सत्‌ स्वयमनुपपद्यमानसुपमानान्तरविरह- 

रक्तणे परत्र वस्स्वन्तरे स्वं समपंयति । अनन्वयो यथा-- 

भवानिव भवानेव भवेद्‌ यदि परं मघ । स्वशक्तिग्यूहसंग्यूढत्रैरोक्यारम्भसंहतिः ॥' 
अब्रेकस्यैवोपसानोपमेयभावो वाच्यः सन्द्ितीयसबद्यचार्यभावे परत्र वस्त्वन्तरे स्वं 

समपंयति 1 आदिशब्दः प्रकारे । तेनानिष्टविध्याभासाक्ेपादेर्रहणम्‌ । यथा-- 

भवत विदितं व्यर्थारपिररं प्रिय गम्यतां तनुरपि न से दौषोऽस्माकं विधिस्तु पराङ्खुखः । 

तव अदि तथा रूढ प्रेम प्रपन्नमिमां दशां म्रकृतितरङे का नो बीडा गते इतजी विते ॥' 
अन्न कान्तम्रस्थानविधिवाच्यः सन्निषेद्धमेवो पक्रान्तस्य दिधानानुपपत्तेः स्वयम- 

विश्रान्तः स्वसमर्पणेन निपेधमाक्तिपति । एवं द्विविधया भङ्गया गम्यमानं वस्तुमान 

वाच्यो पस्कारकमेवेस्युक्तस्‌ । | | 
एवमपि प्रतीयमानस्यार्थस्य विविक्तविषयान्तरोपारभ्मादलंकारान्त्भावो न सिध्य- 

तीस्याशद्धयाह--रद्रटेने त्यादि । द्विधेति । गुणीभूतागुणीभूतवस्त विषयस्वैनेस्यथः। यदाह-- 


९२ अल्ङ्ारसवेस्वम्‌ 


'्यस्य विकारः प्रभवन्नप्रतिवद्धेन देतुना येन । 
गमयति तदभिप्रायं तस्प्रतिवन्धं च भावोऽसौ ॥ 
गामतरूण तरण्या नव वज्रुमञ्जरीसनाथकरस्न्‌ । 
पश्यन्त्या भवति सुद्धनितरां मछिना सखच्छाया ॥ 
अभिघेयमसिदघान तदेव तदखदकागुणदौषम््‌ । 
अर्थान्तरमवगसयति यद्राक्य सोऽपरो मावः ॥ 

एकाकिनी यदबला तद्गी तथाहमस्मद्‌ गृहे ग्रह पतिः ख गतो विदेशम्‌ 

कं याचसे तदिह वाख्मियं वराकी श्वश्रसंमान्धवधिरा नु रूढ पान्थ ॥' इति । 

यद्वा द्विधेति पूववदेव लक्षणाद्याश्रयेण व्याख्येयसर्‌ । तेनाये स्वसिद्धये पराक्तेपः, 
परत्र छ अपराथं स्वससमपणम्‌ 1 यच्चच्रान्यं भावं निवदादिभिस्परल्तितो वाच्यप्रतीयमान- 
स्वेन द्विविधा भावारूकारो व्याख्यातस्तदुर्सूत्रमेव । सद्रटेन तथास्वेन तस्याग्रतिपाद्‌ नात्‌ । 
तन्नापि च वस्त॒मात्रस्य वाच्योपस्कारकस्वाभिधानसमये वक्तुस्ुचितस्वात्‌ । तदेवं गुणीभू- 
ताराणीभूतस्वेन द्विप्रकारं वस्तु तावद्वाच्योपस्कारकव्वेन प्रतिपादितस्न्‌ 1 

उपमेयोपमा ज से--“रथों से उडाई धृ ओर भैधोपम हाथिर्यो से भूतल को आकादा अर 
आकडा को मूतर सा वनता हुमा ( रघु दिगिजय के लिए चला)” यरद दोना (भूतल ओर 
कादा) कौ एक दूसरे के साथकौी गड उपमा अभिधावृत्ति से प्रतिपादित दहं किन्तु यह अपने 
आपे चमत्वारकारक नहीं वन पाती फलतः तीसरे किसी अन्य उपमान कै अभाव या निपेधं- 
रूपी अर्थं मे अपना समर्पण कर देती हं) 

[ उपमेयोपमा मे चमत्कार माना जाता हे तृतीयसद् चव्यवच्छेद्‌ अथात्‌ किसी तृतीय समान 
वस्तु के निराकरणमें । प्रस्तुत पमे भूतल अ।र्‌ आकादा की करस्पर उपमा अपने आपमं नहीं 
बनती रेसी वात नदीं है केवर परस्परोपमा में कोद चमत्कार नहीं है, चमत्कार तृतीयसदृदाव्य- 
वच्छेद्‌ मेँ है । अतः हमने अनुपपद्यमान का अथं ““अचमत्कारकः" किया हे । | 

अनन्वय जसे = ८ हे भगवन्‌ ) अपनी दाक्तिके व्यृहसे तीनों रोक) का निमांण ओर संहार 
का चक्र चलाने वाले आप यदि किसी के समान हो सकते डं तो केवर आपके ही समान 1 यँ 
एक ही पदार्थं का उपमेय ओर उपमान हौना वाच्य दे किन्तु वह पय॑वसितदौतादै किसी दूसरे 
समान पदाथ के अमावमें। 

[ अनन्वय मेँ चमत्कार का कारण किसी द्वितीय अन्य पदाथ के अभावकी प्रतीति द । 
उपमानोपमेयभावरूपी अन्वय ८( संवन्ध ) का ( उपमान ओर उपमेय दोन एक ही पदाथ वेः रहने 
से ) निष्यन्न न होना ( अनन्वय) इत प्रतीति को जन्म देता है। यदहो भौ वाच्यार्थं कै 
व्युग्या्थं ८ द्वितीयसदु व्यवच्छेद ) मे पर्यवसित होने का अथं ह चमत्कार के लिए उसका 
जक्षेप करना । | 

आदि दाबव्द्‌ का अथं है प्रक्र । उसे अनिष्ट विध्याभासरात्मकः [ ह्वितीय ] आक्षेप आदि लिए 
जा सकते हे । यथा--ध्टो जाय तो हो जाय विदितः दे परिय, व्यथं कौ वकवास छोडो ओर जाओ, 
इसमे आपका जरा मी दोप नहीं, विधातातो हमारा हीन पराहमुखदहं। यदि तुम्हारा प्ररूढ 
प्रस इसदद्याको प्राप्तो गयादै तो अच्छादे, यदि हमारेये स्वभाव से चच ( अस्थिर ) दुष्ट 
प्राण निकट मी जाएतो काज क्या 1 

यहो अनचाही “प्रियगमन"-रूपरी वस्त॒ का विधान “जामो” इस प्रकार किया गयादहै जौ 
चस्त॒तः आभासात्मक ही हे, पारमायथिक नदो; अतः वहु निषेध्य का विधान संमवन होनेके कारण. 


भ्रूमिका १२ 


अपने आपे उखडा हज सा ल्गतादहे, ओर इसकिए अपना पर्य॑वसान निषेध मे कर उसका 
आक्षेप कराता हे । इस प्रकार दोनो हयी प्रकार से गम्यमान वस्तु वाच्य कै प्रति उपरकारकं दही होती 
ठे रेसा कदा । 

"देस मानने पर प्रतीयमान अथं के लिए अल्कारवाले स्थलों से भिन्न स्वतन्त्र स्थर भी मिल 
जाते है, अतः उसका अलंकार मे अन्तर्भाव सिड नहीं होता-- रेसी राका कर उत्तर देते दै- 
रुद्रटेन इत्यादि । 

द्विधा = दो प्रकारका, एक वह जिसमें वस्तु अप्रधान [ गुणीभूत ] रहती है ओर दूसरा वह 
जिसमें वह्‌ प्रधान रहती हे । जेसा कि [ रुद्रट नै काव्यालकार ५।३८ में -] कहा दै - “किसी व्यक्ति में 
कोड विकार [ भाव या चित्तवृत्तिरूप कायं ] किसी रेस कारण से उत्पन्न हो जिसके साथ उस 
[ कार्य ] का [ कायंकारणमावरूप ] संबन्ध निश्चित न हो [ अतः जो कारण, काये के साथ अप्रतिवड्‌ 
या अनैकान्तिक हो ], फिर वह विकार एक ओर उससे युक्त व्यक्ति का कोई अभिप्राय व्यक्त करे 
ओर दूसरी ओर अपने कारण के साथ अपना [ कायेकारणभाव | संबन्ध निश्चित करदे तो एक 
प्रकार का भावालकार होता है । उदाहरणाथ--“तरुणी जब अामतरुण [ गोव के सवसे सन्दर ओर 
अपने प्रेमी युवक ] को मोल्सिरीकी ताजी मंजरी हाथमे लिए देखतीदहै तो उसकी उसकी 
मुखकान्ति अत्यन्त मलिन हो जाती हे ।' 

[ दूसरा भावारुंकार ] कोई वाक्य अपने राब्दों का अभिधेयाथं वतरने कै पश्चात्‌ अभिधेय 
से भिन्न प्रकारका दूसरा अथे [ अथात्‌ अभिधेय यदि पिधिरूपदहो तो निषेधादिरूप | व्यक्त 
करता है तो वह भी भावाल्कार माना जाता हे। उदाहरणाथै-[कोडं प्रोषितपतिका द्वारा- 
गत निवासार्थी तरुण पथिक से कह रही] सरमे मै अकेखी ह ओौर अवलाहूु। इस 
धरका जो स्वामीहै व्ह परदेश गयादहै। यह जो मेस सासदहै उसे भीन ओंखो से 
सद्चता ओर न कानां से सुनाता । इसलिए हे पान्थ तुम वास कौ याचना कर दही क्यो रहेहो। 
तम सचमुच मौके ओर नासमञ्च हो ।' 

अथवा ( रुद्रट ने भावालंकार दो प्रकार का माना है-इस वाक्यमे) दो प्रकारका 
अथं उपादानलक्षणा ओर लक्षणलक्षणा नामक ८ स्वसिद्धये° इस प्रकार ) पूवेचचित दो रक्षणाओं के 
आधार पर दो प्रकार का किया जाना चाहिए । इससे प्रथम उदाहरण मे स्वसिद्धिके खिएि पराक्षेप 
८ उपादान लक्षणा ) मानना होगा ओर दूसरे उदादरण मे (पराथं स्वसमपैण ( रक्षणलक्षणा ) 1 

कुछ लोगो ने भावाल्कार मे भावद्यब्द का अर्थं निववेदादि कियादहै ओर दो दों में एक 
म वाच्य को निवदादि संचारी भावों से उपलक्षित मानादहे ओर दूसरेमे प्रतीयमान को। किन्त 
व्याख्या मूकविरुद्ध दै, क्याकि स्वयं रुद्रट ने भावाककार का प्रतिपादन इस प्रकार से नहीं किया । 
रुद्रट यदि ठेसा प्रतिपादन करना भी चाहते तो उन्हे इसे वरहो प्रतिपादित करना चाहिए था जहां 
उरन्होनि केवल वस्तु का वाच्य के प्रति उपस्कारकत्व प्रतिपादित किया था। इसङ्िए वस्तुतः 
भावाल्कारमें देविध्य का मानदण्ड व्यङ्ग्य की गुणीभूतता तथ प्रधानता ही मानौ जानी 
चाहिए । इन दोनों भेदौ मे अप्रधान ओर प्रधान दो प्रकार की वस्तु व्यभ्य 
होकर भी वाच्य का सौन्दयं वधन करती हई वतलाई गईं है ` 

विमर्छ-यहों भावारूकार के प्रथम उदाहरण मे नायिका मे मुखमालिन्यरूपी चिकार उत्पन्न 
हआ । उसका कारण है मोलसिरी कौ मंजरी को देखना उस देखने के साथ उस माछिन्य का कोई 
निश्चित कायकारणभावरूपी सम्बन्ध नहींहै, क्योकिउस मंजरीको देखने से सदा हयी मुख- 
मािन्य नदीं होता । यह सुखमाछिन्य नायिका का भाव व्यक्त कर देता है। यह बतला देता है 
कि निशित ही नायिका ने तरुण को मोलसिरी के वगीचे में मिर्ने बुलाया था किन्तु अन्य कायै में 


२३ अटङ्ारसवेस्वम्‌ 


खग जने ते यह स्वय वहां नदीं पर्टुच सकी किन्तु मोलिसिरी की नवीन मजरो हाधनं लख्कर्‌ 
आनेसे तरुण के विषय में उसे यद विदित दहो गया किं वह्‌ माल्सिरीके वगाचेजाकर आरा 
हे फलतः नायिका को यह सोचकर दुःख हआ कि “में यख से वचित रह गडः: । एेसा भाव मन 
मं आते दी जो मुखमालिन्यं हआ उसका ओर मंजरीददोन का कायकारणभाव मी निश्चित 
गया क्योकि यद्धि वह॒ सजरीनदहदोती तो कदाचित्‌ नायिका का तर्णके सोलसिरी उपवन जानं 
का निश्चय न होता । यहां वाच्य अय व्यग्याधे कौ अपेक्षा अधिक चमत्कारी ह अतः काव्यप्रकार- 
कार ने इसे युणीभूत वाङ्मय या मध्यमकाव्य का उदाहरण मानादे 

द्वितीय पद्य मं वास की याचना क्यों करते होः इस प्रकार के प्रदनकाकु से वतलाया जा रहा 
हे किं “याचना नहीं करनी चाहिए? परन्तु पूरे वक्तव्य मे स्थिति ठेसी वतठद्जा रहीदहेकि 
पान्थ को वासर करने कै ङिए याचना मी अन(वदयक दै, उेतो सिथितिं समञ्चकर विना पृषे ठहर 


जाना चाहिए । यह द वाच्य ओर व्यंग्य का भिन्न प्रकार कादहौना। इसीलिए यह भावाल्कार 


टे, क्योकि व्यग्याथं नायिका के हृदय का माव दहे । यौ निषेधरूपी वाच्यार्थंसे जो विधानरूपी 
व्यग्यार्थं निकलता ह वही अधिक चमत्कवारकारी हो तो इस कान्य को उन्तम काव्य माना जा सकता 
हे ! विमददिनीकारने माना भीदै। हमं यर्दा व्यग्या्थगत वेचिच्य की अवेक्षा उक्तिवेचित्य मं 
अधिक चमत्कार प्रतीत होता हे अतः वस्तुतः वह्‌ उदाहरणम गुणीभूत व्यंग्यका ही उदाहरण 
दोना चाहिए । पिमर्रनौकारका मन्तव्य केवल इतना ही हे कि प्रथम उदाहरण गुणीभूतव्यंम्य कै 
उदाहरण के रूपमे कान्यप्रकाद्र आदिमं प्रसिद्ध दहं द्वितीय उदाहरण का उससे अन्तर करने वे 
लिए उप्ते ध्वनिकाव्य का उदाहरण मानना चाहिए । यदि “एकाकिनी” यहु उदाहरण ध्वनिकाव्य 
नमी निददहो तो कोदं दूसरा उदाहरण अपना लेना चाददिए। स्वधा विमरिनीकार का 
कृहना है अल्कार सवेस्वकार के मत में रद्रट गुणीमूतव्यंग्य ओर ध्वनि दोनो को भावाल्कार रूप 
मानते हें ।. 
विमद्धिनी 


इद्‌ानीमलंकारस्यापि प्रतीयमानस्य वाच्यो पस्कारकस्वं ग्रतिपादयति--रूपकेत्यादिना । 
तत्र पक यथा- 
सीमश्रङुरिपन्नगीष्ठणसणिः कायस्य चण्डं चिता- 
छुण्डं ऊण्डलिवेन्दनाख्वट्यपत्रञ्रंहि रक्तोतपटस्‌ । 
घ्राणस्फारिकमल्लिकापरिचिते मालायश्ाटानिरे 
| दग्रा दीपशिखा हिवस्य नयनं कार्छानवं पातु नः ॥' 
अत्र नयनादीनां मणिग्रष्ठतीनां चोपमा वाच्योपस्कारायावगम्यते। तां विना सादश्या- 
ग्र्तिपत्तः 
[ अमी प्रतीयमान वस्तु कौ वाच्यौपस्कारकता वततलादं ] अव प्रतीयमान अल्कार कीमीं 
वाच्योपस्कारकता वतलाते हए कदते हँ -- “रूपक ० । इसमे रूपक का उदाहरण नेसे -“ भगवान्‌ 
शिव का तृतीय आग्नेयनेव्रहम सवकी रक्षा करे जो श्रु्टिरूपी भयंकर नागिन की फणमणि है, काम 
का प्रचण्ड चिताकरुण्ड दे, चन्द्ररूपी [ कमर ] नाठनिमित गोल वख्य मेँ गिरा हुमा ङाख्कमङ पुष्प 
देः [ या | नासिकारूपी दीयट से युक्त लाटरूपी गन नँ चमकती दीपरिखा है । ययौ 
नेत्रादि ओर मणि आदि की उपमा ्यजनासे प्रतीत होती दै ओौर उससे वाच्य (रूपक) का 
उपस्कार होता हृजा विदित होता हे । वर्योवि ( रूपक साद्रद्यमूल्क अल्कार है ओर ) साष्ट 
का ज्ञान उस ( उपमा ,) के बिना संभव नदीं. ~: 44; 


भूमिका १५ 
विमश्च- यहाँ उपमा तो व्यक्त होती हे विन्तु वह उवमामाव्र है। अल्कार नहीं । वह अलकार 
तव होती जव उसमे चमत्कार होता। चमत्कार यदौ रूपकमेंदही है अतः वही यौ अलक र हें । 
विम द्िनौकार यह जौ उपमाक्कार को वाच्योपस्कारक बतलाना चाहते है उसके पीछे नाह्यणश्चमण- 
न्याय छपरा मानना चा।ईट । ब्राह्मग जव तक शिखासूत्रादि से युक्त बाद्यण था जव तक वह शिखा- 
सूत्रादि विहीन श्रमण (जन या बोद्ध भिक्षु) नहो धा ओर जव िखासूत्रादि को तोडताड़कर वह श्रमण 
वन गया तव वह्‌ ब्राह्मण नहा रहता, इतने पर भी क्योकि वह पहले ब्राह्मण था इसरिए धमण 
वने अन्य अब्राह्मण व्यक्तिय। से उसका अन्तर वतरने के लिए उसे (व्राह्यणश्नरमणः कह दिया 
जाता हे टाक इसी प्रकार उपमा रूपक आदि जव व्यग्य होतेह तव अलंकार नदीं रहते क्योकि 
उनसे किसी अन्य को ोभा नदीं वदती फलर्तः वे अलकां हौ जाते हैः ओर जव अलंकार रहते 
तव व्यग्य नहीं रहते, तथापि वाच्यावस्था मं उपमादि अल्कार रहते हे तत्सट्दा कोड उपमादि 
व्यग्य हो जाती हं तो व्यंग्योपमादि कोभी अल्कार न रहने पर भी अ्टकारभूत वाच्योपमादि 
कौ नई उपमाल्कारादि कह दिया जाता हे । रुद्रट ने उससे वाच्य का उपस्कार मानां 
विमरिनीं 
दीपकं यथा- 
पाउअवंध पटिङं वधेउ हअ ऊुजनङकसुमाईइ । पोडमहिरं अ रसिउं विररचिअ के वि जाणन्ति॥ 


अत्र प्राक्कतवन्धपाटादेरपसमा वाच्यो पस्कारायावगस्यते । म्रक्रतस्य मोडमहिलारमणादे 


सादश्यो पादानायवोभयोरूपनिवन्धनात्‌ । जपहति्यथा- 
अवाप्तः प्रागलभ्यं परिणतरूचः शेरूतनये करटको नेवायं विलसति शशाङ्कस्य वपुषि । 
अमुष्येयं मन्ये विगख्दश्छतस्यन्द शिशिरे रतिश्रान्ता रेते रजनिरमणी गाढञ्ुरसिः ॥ 
अन्न कलङ्कस्य रजनिसादश्यग्रतीतेरपमा वबाच्योपस्कारायावगम्यतं एव । तुर्य- 
योगिता यथा- 


देगुणितादुपधानमुजाच्छिरः पुरुकितादुरसः स्तनमणग्डङस््‌ । 
अधरमधंसमर्पिंतमाननाद्‌ व्यघटयन्त कथंचन योषितः 
अच्र॒ अजादीनां सादश्यावगमादुपमा वाच्योपस्कारायावगस्यते तुस्ययो गिता- 
दाविव्यादिशाब्दान्निदशंनादेमहणमसर। उपमादीव्यादिश्ञब्दादुपसेयोपमादी नाम्‌ । तत्त यथा-- 
ग्रवातनीरोत्पखनिविंशेषमधीर विप्रक्तितमायताच्या । 
तया गहीतं चु खगाङ्गनाभ्यस्ततो गहीतं चु खगाङ्गनासिः ॥ 
अच्र वाच्याया निदशनाया उपस्कारस्वेनोपमेयोपसा गम्यते । तासन्तरेणासंभवद्वस्तु- 
संबन्धस्वेन वाच्यस्याविश्रान्तेः । अतश्चान्नालंकारो गम्यमानः स्थितो न वस्तुमात्रम्‌ । 
तेन पूवन्न यदादिग्रहणं सखफरयिदुमन्यरेतदु दातं तदयुक्तमेव । तत्र॒ वस्तुमाच्चस्य 


वाच्यो पर्कारकस्वेन प्रतिपिपाद्‌ यि षितव्वात्‌। वाच्यो पर्कारकत्वेनोरप्र्ता कथितेति समन्वयः। 
सा तु- 


9 


महिलासहस्सभरिए तुय हिअए सुहअ सा असमायन्ती । 
दिअहं अणण्णञम्मा अङ्गं तणुं पि तणुएइ ॥* इति । 


तदित्थमरंकारोऽपि प्रतीयमानो वाच्यशोभाेतसवेनोक्तः 
दीपक यथा = 


म्राक्रतवन्धं पठतु बदघुं तथां कुब्जकुसुमानि 
मोढमदहिखां च रन्तुं विरला एव केऽपि जानन्ति ॥? 


“प्राक्त वन्ध पढ़ना, कुब्ज (१) कुसुमो को गूधना तथा प्रोढमदिलाओं को भोगना विरले 
डी कोड जानते हं ।” यां मी मराकृतवन्य आदि की उपमा प्रतीत होती है ओर उसे वाक्य का 


कक 
यो, 73 


९६ अलङ्ारसवंस्वम्‌ 


उपस्वारक होता है. क्योकि इस वाक्य मे वणनौयत्वेन प्रकेत हे प्रौटमदिला उसके अतिरिक्त 
प्राक्रतवन्धादि अप्रस्तुत पदार्थौ का जो उपादान किया गया दहै वह श्रोटमददिला' के साथ उनका 
साद्द्य वतलाने के छिए 1 

[ दीपक मेँ प्रक्रत ओर अप्रक्र्ता का किसी एक धमंया किसी एक क्रिया में संवन्ध दिखलाय्‌ 
जाता है जिससे सदृद्य व्यक्त होता दे । | 

अपहुति जेसे-[ भगवान्‌ दिव पावंतीजी से कह रहे हें ] “हे पावती ! पर्याप्त मत्रामे खिलो 
कान्ति के इस चन्द्रमाके दारीरमे [ पिताकीगोद मं चिद्युके समान] प्रगल्भतावे साथ यह 
जोट सो कलंक विसित नहीं हो रहा हे, अपितु में समञ्तारहकि इसके रती अम्रतधारामे 
अत्यन्त दीतल वक्षःस्थल पर इसकी प्रिया रात रति से श्रान्त होकर गहरी नीदमेंसोरदीदहं > 
य्ह कल्क का रात कै साथ साद्य प्रतीत दोता हे वदी उपमाल्कार है ओर उससे वाच्या 
अपहृति का उपस्कार प्रतीत होतादहीहे। 

[ अपहृति का अर्थं होता दै छिपाना । इस अलंकार म॑ चमत्कारकारी तत्व यदौ छिपाना हे । 
प्रस्तुत पच मँ कलंक का कल्कत्व “यह कलंक नदीं दै" इस निपेधोक्ति से छिपाया जा रहा दहै । यह्‌ 
छिपाया जाना सादृद्य कै आधार पर ही संमंव दै अतएव याँ सादृद्य की व्यंजना होती हे ओर्‌ 
साद्रदय ही है उपमाल्कार 1 उसके द्वारा वाच्य ( राब्दतः कथित ) अपहुति अल्कार का उपस्कार 
या पोपण होता दै । ] 

त॒स्ययोभिता यथा = 

“खयं ने द्विय॒णित उपधानभूत भुजा से सिरको; पुकित वक्षःस्थल से स्तनौ को, सुख से 
अर्धसमर्धित अधर को विंसी प्रकार विघटित किया ? य्ह चुजा आदि का सादृर्य प्रतीत दहोताहे 
इससे उपमालकार प्रतीत होता दै ओर उससे वाच्य ( तुल्ययोगिता ) का उपस्कार होता हे । 

[ जर्य एक ही धर्म मँ अनेक रेमे पदार्थो का अन्वय हो जिनमें प्रत्येक प्रस्त॒तदहदीदहौोया 
प्रत्येका अप्रस्त॒त ही वँ तुल्ययोगिता होती हे । प्रस्त॒त पद्मं नायिका के समी अग प्रस्तृत हे ओर्‌ 
एवा विवरन क्रिया मेँ अन्वित होते है । एकधमान्वयित्वरूपी साधम्यं के आधार पर उन सभी अंगो 
> साद्य कौ प्रतीति योती है । सार्य उपमालकाररूप द अतः यहो उपमाल्कार की व्यंजना मानी 
जाएगी ओर क्योकि उससे वाच्य ठस्ययोगिता का उपस्कार होता है अतः वह॒ भी अलंकार ही है । ] 

मूक म जो “तुल्ययोगिता आदि मे" इस प्रकार आदि शब्द का प्रयोग किया गया दै उससे 
निदर्लनाटकार आदि किएजा सकते दहे ओर इसी प्रकार “उपमा आदि का" इस प्रकार जो 

आदि पद्‌ का ग्रहण किया गया ह उससे उपमेयोपमा आदि । उदाहरणार्थं ( निदर्शना मेँ उपमे- 
योपमा का उपस्कारकत्व ) यथा-“पर्यांप्त पवन वाले स्थान ( प्रवात ) मँ लगे हुए ( अतएव हवा 
की द्चंकोर मे द्चूरते हए ) नील कम में तनिक भी अन्तर न रखने वाली अधौर चितवनयातो 
उस विद्चालनेत्रा ( पार्वती ) ने दिरनियो से खी होगी या ( वे्ती ही विदाना ) दहिरनियों 
ने उस ८ पार्वती ) से 1” यँ ( पदार्थं ) निदशेना वाच्य हे, उसका उपस्वारक के रूप मे यों 
उपमेयोपमा प्रतीयमान है, क्योकि यदि उपमैयोपमा प्रतीत न दो तो वाच्यः जिसमे याँ पदार्थौ 
का संबन्ध नदीं बनता, असंगत ही रहा आएगा । इसलिए इस पद्य में मी अल्कार ही प्रतीयमान 
हे, वस्त॒ नीं । निदा मे वाच्यार्थं रेसा रहता हे जिसमे पदार्थो का संबन्ध संमव नदीं होता, वाद 
ते उपमा द्वारा उसमे संगति लगाई जाती हें । प्रस्तुत पमं सृगांगनाओं की चितवन उन्हीं 
भ्रगांगनाओं के पास है उते-पार्वती नहीं ठे सकतीं ओर पावेतौजी की चितवन पारवेतीजीकेही 
पास हे उसे मृगांगनाटे' नदीं ठे सकतीं, फलतः घ्वी दूसरे वगो चितवन का एकं दूसरे हारा कहा 
जा राह आदान संमव नहीं । बाद मँ ये दोनों ही इन दोनो के समान हें । एेसी साटृदयप्रतौति होती 


भूमिका | १७ 


टं ता उत्त वाच्याथं सगत प्रतीत होता है । उपमेयोपमा इसकिए व्यंग्य है किं यहाँ यह भी प्रतीति 
दोती हे कि इन दो चितवनों के समान कोई तीसरी चितवन नहीं है फलतः इस प्रकार के पूवे 
'उपमेयोपमानन्वयाद्‌ः इस पद मं जो आदि शब्द आया है उसके उदाहरण के रूपमे लगने जो 
डस “प्रवातनीलो०ः आदि पद्य को उद्त किया वह ठीक नहीं, क्योकि उस प्रकरण में तो केवल 
वस्तुमात्र को व्यंजना का प्रतिपादन करना अभीष्ट रहादहै, अल्कार की व्यंजना का नहीं, 
“वाच्यो पस्कारकत्व- इस विदेपण को अगे भी जोड़ना चाहिए । एेसा करने पर इस प्रकार क, 
अथे निकटेगा-““उस्प्रक्षा को जो वाच्योपरकारक कहा गया हैः इत्यादि । 
वाच्योपस्कारक उत्प्रेक्षा का उदाहरण है- 
“महि लासहलभरिते तव हृदये सुभग ! सा अन्तीमा । 
दिवसमनन्यकमां अगं तनुकमपि तनूकरोति” ॥ 
अधात्‌ “हे सुभग ८ जिते कामिनियों चाहती हो ) तम्हारा हृदय सदस महिलाओं से भरा 
दे अतः वह वेचारी उसमें वन नहीं पाती, फलतः दिन भर अन्य कोड कायं नहीं करती, केवर 
पहले ते ही दुबे अपने ओंग को ओर दुवंल बनाती जा रही । यदहो काव्यल्गाल्कार वाच्य 
दे क्याकिं हदय में नायिका के न वनने का कारण यहाँ उक्तदहै। वह दहे हदय का सहस्र मदहिराओं 
से धिराहाना। उससे उ्प्रक्षाकी व्यंजनादहोतीदहे। वह इस प्रकार किं नायिका के नायक के 
चित्त मन वन पानेका मूल्कारणतो हे नायिका के प्रति नायक की राग्युन्यता, किन्तु उससे 
भिन्न ““मदिकासहस्रभरित्व' रूपी अन्य कारण वेसा होता बतलाया जा रहा है । यह इई हेतूत्प्रेक्षा । 
इससे वाच्य काव्यङ्िगि का उपस्कार होता हे। इसप्रकार अल्कार भी प्रतीयमान होकर वाच्य 
का उपस्कारक ( वाच्यदोभाधायक ) स्वीकार फिया गया हें । 


विमरिनी 


अधुना रसस्यापि वाच्यो पस्कारकत्व दशेयितुमाह-रसवदित्यादि । गश्ठतिशब्दादूजं- 
स्व्यादयः। आदिशब्दाच तदाभासादयः । तच्र रसवदरुकारो यथा- 
रच्छ णो युगं व्यतीत्य सुचिरं श्रान्त्वा नितम्बस्थरे 
सध्येऽस्याखिवरीतरङ्गविषमे निस्पन्दतासागता । 
मद्‌ दष्टिस्तृषितेव संप्रति हडानैरारुह्य तुङ्गो स्तनौ 
साकाङ्न्त॒ सुह रीत्तते जलरूलवप्रस्यन्द्नि रोचने ॥' 
अत्र वत्सराजस्य परस्परास्थावन्धरूपो रव्याख्यः स्थायिभावो विभावाजुभावव्यभि- 
चारिसंयोगाद्‌ रसीभूतः सन्‌ वाच्यो पस्कारकः । तस्संव छितत्वेन वाच्यस्य सचमत्कार 
म्रतिपत्तेः । 
अव रस को भी वाच्यां का शोभावधेक वतलाने कै किए लिखते हे-रसवदित्यादि । प्रमृति | 
राब्द से उजस्वी आदि का ग्रहण अभिप्रेत है ओर आदि शब्द से उनफे आभास आदि । उनमें से 
रसवदल्कार का उदाहरण है-“मेरी दृष्टि बड़ी कठिनाई से दोनो ऊरु पार कर॒ ओर नितम्ब- 
स्व म चक्कर खाकर ज्या इस ( सन्दर वासवदत्ता ) के त्रिवरतरग से उवड़ खाबड मध्यभागं 
मं पहुची तो निस्पन्द हो गई । फिर जिस किसी प्रकार वह धीरे-धीरे करके उत्त ग॒ स्तना पर 
चदा ता जव माना पियास होकर जललव वहा रही ओंखं वार-वार देख रह है ।› यहाँ वत्स- 
राज का परस्परम प्रेमरूपी रति नामक स्थायी भाव विमावानुभावव्यभिचासे के संयोग से 
रसरूपता को प्राप्त होकर वाच्य की शोभा वदाता है, क्योकि उससे युक्त होकर प्रतीत होने पर 
ही वाच्य मं चमत्कार प्रतीत होता है। {3 


> अ० ख 


१८ अलङ्कारसवस्वम्‌ 
विमरिनी 


म्रेयोककारो यथा-- 
°तिष्टेस्को पव श्ात्म्रभावपिहिता दीवन सा कुप्यति 
स्वगांयोर्पतिता भवेन्मयि पुनर्मावाद्र॑मस्या मनः। 
तां हतं विद्ुधद्विषोऽपि न चसे शक्ताः पुरोवर्तिनीं 
सखा चाव्यन्तमगोचरं नख्नयोयार्ते कोऽयं विधिः ॥' 
अत्र वितर्काख्यो व्यभिचारिभावो वाच्यश्लोभाधायक एव) 
्रेयोऽकंकार जेसे-( उवंशी के र्तारूप से परिणत हो जाने पर पुरूरवा वितकँ करता है) हो 
सकता हं वह॒ ( उकेरी अपने ) प्रभाव ( देवी होने के कारण तिरस्करिणी विद्या) से कहीं दिपी दहो, 
विन्तु वह अधिक देर तक तो कुपित रहती नहीं । संभव दं वह ( अपने मूलस्थान ) स्वरी कै लिए 
उड़ गईं हो, किन्तु उसका मन तो सानुराग दे युद पर । मेरे देखते-देखते उसे राक्षस क्ोग भी 
नहीं हर सकते । इतने पर भी वह आंखो से एकदम ओञ्चल दो गईं दं । आखिर यह घटना क्या हे ।? 
यदा वितर्कनामक संचारी भाव व्यंजित होकर वाच्य की योभा वढातादै। 
विमरिनी 
उज॑र्यलंकारो यथा- ्‌ 
"टग्टीरासु सकौतुकं यदि मनस्तन्मे दशां विंशति. 
्निःसंधो परिरम्भणे रतिरथो दोमण्डटी दृश्यताम्‌ । 
म्रीतिश्वेत्परिचम्बने दशयुखी वदेहि ! खजा पुर 
पौलस्स्यस्य च राघवस्य च महः्पश्यो पचारान्तरम्‌ ॥° 
अत्र. सीतां प्रति रावणस्य रतिरनोचिव्येन प्रवृत्तेति रसाभासो वाच्यो पस्कारकः। 
यत्त स्वयसभ्यूद्यम्‌ । 
ऊजैस्वी अटंकार जंसे--( रावण कौ भगवती सीता के प्रतिं दुषटोक्ति )--“हे सीता, यदि 
तेरा मन ओंखां की चेष्टाएं पसन्द करता हं तो मैरे पास बीस ओंखं हं, यदि तुञ्चे गाढ आखिगन 
पसन्द दै तो देख भैरी वीस भुजाएं हं आर यदि तञ्च चुम्बन पसन्ददहोतो उसकेकिएमीसे र 
पास दस सुखँ । इस प्रकार परे उपचारकी इष्टिसे भी मैरे जर रासे वीच, देख, 
कितना मारी अन्तर दे ।” यँ ( अननुरक्त परख्ी ) सीता कै प्रति रावण का रतिनामक स्थायी 
भाव व्यंजित होता है फलतः यह ॒रसामास हजा ओर ( क्योकि ) यह यद्यं वाच्यार्थं की रोमां 
` वदा रहा है इसटिए ऊज॑स्वी अरुकार हआ । अन्य ( समाहितादि अल्कार ) के उदाहरण ८ काव्य 
प्रकाद्चा आदि मेँ ) स्वयं खोजे जा सकते हं । | 


विमरिनी 


एतदेवोपसंहरति--तदित्थमित्यादिना । त्रिविषमिति । पयायोक्तादौ वस्तु, रूपकाद्‌ाव- 
रकारः, रसव दादौ रसः । तदेवं चिरंतनः प्रतीयमान स्यारंकारान्तर्भाव एव तावटुक्तः 
तदुपस्का्यः पुनरादमा कैश्चिद्‌ पि नाभ्युपगतः । 
| ^तदिस्थम्‌ = तो इस प्रकार?” इत्यादि दारा इस प्रकरण का उपसंहार करते है । तीनो 


प्रकार का अर्थात्‌ ( प्राचीनं ने ) पर्यायोक्तादि मे वस्तु, रूपकादि मे अट्कार ओौर रसवदादि 
अलंकारो मे रस (वाच्योपस्च्छारक्छ स्वीव्छार च्छियि\ दे ) इस प्रकार ( वस्तु अल्कार ओर रस तीनां 


भूमिका | १९ 


प्रकार का प्रतीयमान अथं ) प्राचीनां ने अल्कार के ही वीच अन्तभूंत बतलाया है क्योकि उनके 
मत में तीनों ही प्रकार का वद अथं ( रूपक, उपमादि कै ही समान ) वाच्य का शोभाधायक 
होता दे । ( ध्वनिवादी आचार्यो के समान ) इन प्राचौन आचार्यो मंसे किसीने भी वाच्यको 
उपस्कारक ओर प्रतीयमान को प्रधान ( आत्मभूत ) स्वीकार नदीं किया हे । 

[ अच्छा होता कि विमरिनौकार रसवत्‌ आदि कैवे ही उदाहरण प्रस्तत करते जो रद्रट आदि 
ने दिए दैः जेसा कि उन्होने भावालकार के प्रकरण में किया है। श्री रामचन्द्र दिवेदयी ने “रुद्रटेन 
तु" इस प्रसंग पर एक रिप्पणी देते हए लिखा हे--“प्रतीयमान अथै वस्तु अल्कार तथा रसरूप से 
तीन प्रकार का होता हे । प्रतीयमान वस्तु-रूप अथे कीं गुणीभूत होता है ओर कहीं प्रधान । इन 
दोनों प्रकार के अर्था का भावार्कार मे, उपमा आदि प्रतीयमान अकुकार का रूपक दीपक आदि 
अल्कारों मे तथा रस, भाव आदि का रसवत्‌ प्रेय आदि मे अन्तभाव रुद्रट ने किया हे 1 

इसमे “रुद्रटः? के स्थान पर “रुद्रगादिः पद्‌ चाहिए । रुद्रटने केवर भावाल्कारकेदो भेद 
अवदय प्रस्त॒त किए हें विन्तु रस, भाव का रसवत्‌ प्रेय आदि में अन्तभाव नहीं दिखाया । भामह 
ओर उद्भट ने अवदय इनका प्रतिपादन किया हे । 

वस्तुतः “इह हि० से लेकर ‹शच्रिविधमपि प्रतीयमानतया ( ख्यापितमेव ) यहं तक वक्तव्य 
ओर प्रधटरक एक हीदहे। श्री द्विवेदी ने शुद्रटेनः से उसमे अन्तर कर दिया है । उन्होने पाठ मी 
इसलिए स्वतन्त्र वाक्य के ही अनुरूप “रुद्रटेन तु द्िषैवोक्तः टसा स्वीकार किया है । ] 

वामन [ पूर्वोक्तं आचार्यो से कुछ अगे हे उन्दोने ] प्रतीयमान को अल्कार मे अन्तत 
दिखाते हए भी उससे उपस्कायं ( अल्कायं ) भूत एक आत्मा भी स्वीकार की है” इस तथ्य कौ 
स्पष्ट करते हये आगे कहते हे-- 'वामनेनेत्यादि ~ | 


[ सवसव | 


वामनेन तु सादश्यनिवन्धनाया लश्चणाया वक्रोक्त्यटंकारत्वं जवता 
कश्िद््‌ध्वनिमेदोऽटेकारतयेवोक्तः। केवट गुणविशिएटपदस्चनात्मिका रीतिः 
कान्यात्मकत्वेनोक्ता । 

उद्भ खादिभिस्त गुणालंकाराणां पायशः साम्यमेव सूचितम्‌ विषय- 
माचेण भेदप्रतिपादनात्‌ । संघटनाधमत्वेन चेष्टः । तदेवमलकारा एव काव्ये 
प्रधानमिति प्राच्यानां मतम्‌ । 


८ काव्याल्कारसूत्रदृत्तिकार ›) वामन ने तो [ साददयाच्लक्षणा वक्रोक्तिः" इस प्रकार । साटृरय- 
मूलक लक्षणा को वक्रोक्तिनामक अलंकार कहते इए ध्वनि का एक [ अविवक्षितवाच्य | भेद 
[ स्वीकार किया है किन्तु उसे भी उन्होने ] अरुकाररूप ही बतलाया हे [ क्योकि वक्रोक्ति एक 
अलकार ही हे ] काव्यकौी आत्मा उन्होने गुणविरिष्ट-पदरचनास्वरूप रीति को ही कहा हे । 

, उद्भट ने गुण ओर अलंकारो का प्रायः साम्य ही बतलाया है [ उनके मत में दोनों ही, काव्य मे 
समवायसम्बन्ध से ही रहते है, अलंकार संयोगसंबंध से ओर केवर गुण समवाय संबन्ध से नहो, वह तो 
रोकिक पदार्थौ की स्थिति है द्रष्टव्य = कान्यप्रकाशउर्लास ८ ] भेद उनम केवर इसङ्ए माना गया है 
कि दोनों के विषय मे भेद है ओर गुण संघटना का धर्म माना गया है । इस प्रकार प्राचीन आचार्यौ 
के मत मे कान्य में अल्कार ही प्रधान है। 


= फ ह ` ` का चा "क नि -- 


२० अलटद्कारसवंस्वम्‌ 
विमदिनी 
वामनेन प्रतीयमानस्यारंकारान्तर्भावमभिदधतापि तदु पस्कायं आत्मा कश्चिदुक्तः 
इत्याह--वामने नेत्यादि । तुशब्दः पूर भ्यो व्यतिरेकद्योतकः ! आत्मनोऽपि ग्रतिपाद्‌ कस्वात्‌ । 
व्रवतेति । यदह--"सादश्याच्चत्तणा वक्रोक्तिः इति । एतदेवोद्‌ाजदहार च "“उन्सिसील- 
कमर सरसीनां कंरवं च निमिमील सुहूतम्‌' इति । कथिदध्वनिभेद इति । (अवि वक्सित- 
वाच्यादिःः । केवलमिति यदि परमिव्यथंः। गुणेति । यदाह-विरिष्टा पद्‌- 
रचना रीतिःः इति । काव्यात्मकत्वेनेति । यदाह- रीतिरात्मा काव्यस्येति काव्यव्वे- 
भयुपगताया रीतेः “तद्‌ तिश्यदहेतवस्व्वरंकाराःः इत्यायक्त्यान्तभावितध्वनयोऽलंकार! 
उपस्कारका इत्येतन्मतम्‌ । | 
यँ तु ( तो ) चाब्द पूर्वोक्त आचार्यो से अन्तर का चयोतक दहे । क्योकि वामन ने काव्यात्मा 
क्ाभी ग्रतिपादन कियाद कहते इ ष्ट ज साक कटा दह ““सद्र्यसे दाने वाटी लक्षणा वक्रोक्ति ह । 
इसी पर उदाहरण भी दिया दै--“तलेयो के कमल उन्मीलित दो गए ओर कुसुद निमीलित 
[ यदह उन्मीकन ओर निमीलन लाक्षणिक हं | ध्वनि का एक कोड अद्‌ = अविवक्षितवाच्यरूप । 
केवर का अर्थं है यदि परम्‌=किन्तु । गुण इत्यादि जेसा कि कहा दे--“विरिष्ट पद्‌ रचना रौति दै" । 
काव्यात्मकव्वेन-जेसा किं कदा दै-- “रीति काव्य कौ आत्मा इस प्रकार वामनकामत 
हे कि “विदिष्ट पदर चनारूप रीति काव्य को आत्मा हः ओर [गुर्णो से उत्पन्न | काव्यदोभा मे अति 
राय लाने वाले तच्च अलकार कहलाते हं" इस प्रकार से छक्षित अल्कार्‌ उस (रोति) कै उपस्कारकं 


( योभावधक ) होते हं"? । 


विमरिनी 
अन्यैः पुनरेतदपि प्र्युक्तमिव्याह--उद्धटादिभिरित्यादिना । प्रायद्ा इदि । बाहुल्येने. 
व्यर्थः । विषयमात्रेणेति । भिन्नकच्याणां द्य पस्कायो पस्कारकत्वस्यानुपपत्तेः । तथाव्वे 


चारंकाराणामपि गुणो पस्कायंस्वं प्रसज्यते । समानन्यायव्वात्‌ । तद्गुणारुकाराणां तुस्य- 
त्ववादिन एवौद्धटाः। इत्थमनेन वाच्याश्रयाणामरूकाराणां मध्य एव ध्वनेरन्तर्भावा- 
दसिधाग्यापारगोचर एव ध्वनिः, न पुनस्तद्वयतिरिक्तः कश्चिद्‌ ध्वनिर्नामेति चिरंतनानां 
मतसिव्युक्छम्‌ । 

ददानीं यदुप्यन्यैरस्य भक्त्यन्तभूतस्वमुक्तं॑तदपि दंशंयितुमाह--वक्रोक्तीत्यादि । 

द्सरों ने तो इतना भी स्वीकार नदीं किया इस वातकोौ वतलने के ङि छिखते है-- “उद्धर? 
आदि । प्रायः अर्थात्‌ वहुधा । विषयमेदमात्रेण विपयमात्र कामद्‌ [ गुणों का विषय है श्लोभा- 
जनकता ओर अलंकारो का दोभावर्धकताः, किन्त इन दाना को प्रतीति एकदही साथ होती है] 
अलग-अलग समय मं प्रतीति होने पर [ युण हा उपस्काय ओर्‌ अल्कार्‌ हा उपस्कारक्‌ एेसा | 
उपस्काया पस्कारकभाव सम्बन्ध नदीं बनेगा; वसा मान्न पर्‌ | गुण मा उल्कारों के उपस्कारक ओर ॥ 
अल्कार भी गुणो कै उपस्कार्यं माने जा सकेये । क्य।कि स्थिति दोनो म समान है [ अर्थात्‌ 
पूववन्तीं जसे परवत्ता का उपस्कारक माना जाता हे वेते ही परवत्ती मी पूववत्ती का । उदाहरण यथा 
गुणीमूतव्यंग्य मेँ प्रतीयमान का वाच्याथं कै प्रति उपस्कारक होना] इस कारण उद्धटनुयायी 
गुण आंर अल्कारां मं समानता ही मानते दह । 

दस प्रकार यों तक के मन्थ द्वारा यह प्रस्त किया गया किं प्राचीन आङंकारिक प्रतीयमान 


# 


भूमिका २९ 


अथं को अभिधावृत्ति का विषय ही मान ठेते हे, उससे भिन्न नदी, क्योंकि उनके अनुसार उपमादि 
अन्य अल्कारो के दही समान ध्वनि भी अर्थ॑का ही एक अलंकार हे। 

अव वक्रोक्तिः इत्यादि अथिम यन्धमं आचार्योँने जो प्रतीयमाना को भक्ति ( उपचार- 
वक्रता ) में अन्तभूत माना हे उसे बतलाते है-- 

| सवंस्व ] 

वक्रोक्तिजीवितकारः पुनवेद्ग्ध्यभङ्गीभणितिस्वभावां बहुविधां वक्रोक्ति 
मेव प्राधान्यात्काव्यजोीवितसु क्तवान्‌ । व्यापारस्य प्राघान्यं च | काव्यस्य | 
प्रतिपेदे । अभिधानय्रकारविरोषा प्व चाटकाराः । सत्यपि जिभेदे पभरतीय- 
माने व्यापाररूपा भणितिरेव कवि संरम्भगोचरः । उपचारवक्रतादिभिः 
समस्तो ध्वनिप्रपञ्चः स्वीरृतः । केवलसुक्तिवेचिच्यजीवितं काव्यं, न 
व्यङ्ग्याथेजीवितमिति तदीयं देनं व्यवस्थितम्‌ । 

वक्रोक्तिजीवितकार ८ कुन्तक ) ने वक्रोक्ति को काव्य का जीवित मानादहै। वक्रोक्ति को 
उन्दने “वेदग्ध्यमङ्गीभणितिः-- स्वरूप कहा है ओर उसके अनेक सेद वतलाए है । ८ वक्रोक्ति को 
काव्य का प्रधानतच्व मानने के लिए ) उन्होने यह भी प्रतिपादित कियादहेकि काव्यम व्यापार 
तत्तव भी प्रधानतत्व हं । ( उनके मत मं ) अरुंकार अभिधान ( कथन, उक्ति) के ही विरिष्ट-विरिष्ट 
भेद हं ( साथ ही ) काव्य मे ( वस्तु, अलंकार ओर रस ) ये तीनों प्रकार के प्रतीयमान अथं रहते 

अवद्य हं किन्तु कवि का संरम्भ ( जोर, अधिक ध्यान ) व्यापारस्वरूप भणिति ( उक्ति) पर ही 
रहता हं । ध्वनि के अन्य अवान्तर मेदो को भी [ उन्होने ] उपचारवक्रता के अन्तरगत स्वीकार 
कर चखियादहं। [ इस प्रकार संक्षेप मे ] उन [ वक्रोक्तिजीवितकार ] का सिद्धान्त केवल इतना ही है 
कि “काव्य का प्राण ( प्रधानताव ) उक्तिवेचित्रय ही है, व्यंग्यार्थं नदीं । 


विभरिनी 


वैदग्ध्येस्यनेन वक्रोक्तेः स्वरूपसुक्तस्‌ । य दाह-“वक्रोक्तिरेव पैदश्ध्यभङ्गीभणितिरूच्यतेः 
इति । एवकारोऽन्यस्य काभ्यजीवितस्वग्यवच्छेद्कः । काञ्यजीवितमिति काव्यस्यानु 
प्राणकमस्‌ । तां विना काव्यमेव न स्यादित्यर्थः । यदाह--विचिन्नो यन्न वक्तोक्तितचिन्यं 
जीवितायतेः इति । व्यापारस्येति कविप्रतिभोल्ञिखितस्य कर्मणः । कविप्रतिभानिर्वति- 
तत्वमन्तरेण हि वकरोक्तिरेव न स्यादिति कस्य जीवितत्वं घटत इति तद्‌ षक्तमेवान्वा- 
स्यात्र प्राधास्यं विवक्षितम्‌ । अतश्च द्वयोः प्राधान्यस्य दुर्योजव्वमच्र नाशङ्कनीयम्‌ । 
“वदर्ध्यभङ्गीभणितिः यह वक्रोक्ति का लक्षण हे, जेसा कि ( कुन्तक ने कारिका में ) कहा दै- 
उभावेतावल्कायोँ तयोः पुनर ल्करतिः । 

वक्रोक्तिरेव वेदग्ध्यभंगीभणितिरुच्यते ॥” १।१० कारिका ॥ 
ओर अर्थं अलंकाय है, ओर उन दोनों का अलंकार है कैवल वक्रोक्ति जिसका स्वरूपं है 
“व दरध्यभङ्गीमणितिः' = अर्थात्‌ वैदग्ध्य के कारण भंगिमा ८ बोँकपन ) के साथ बोलना । (कैव 
वक्रोक्ति” इस प्रकार केवर खाब्द कै प्रयोग का अथ है कि अन्य कोई तत्व कान्य का जीवातु नदीं 
हो सकता । काव्यजीवित शाब्द का अर्थं है वह तत्त्व जो काव्य को ८ अकाव्य से सिन्न कर ) 
काव्यत्व प्रदान करे । फलतः आद्य यदह हुआ कि वक्रौक्तिके विना काव्य कान्य ही नहीं हो 
सकैगा । जसा किं ( कारिका मेँ कुन्तक ने ) कहा भी है-“बिचित्र [मागं] वह है जिसमे वक्रोक्ति की 


कुया 


२२ अलङ्ारसवस्वम्‌ 


विचित्रता जीवन (या मप्राण) का काम करती दै ॥ [ कारिका १।४२ | व्यापार अथात्‌ कवि- 
प्रतिभा से उल्लिखित क्म । वक्रोक्ति तब तक वक्रोक्ति दी नदीं हो सकती जव तक वद्‌ कविप्रतिभा 
से निष्पन्न न हो ओर जव वह वक्रोक्ति दी सिद्ध नदीं हो सकेगी तव उसमें कान्यजीवितत्व केसे 
संभव होगा ! इसकल्टि यहां जो व्यापार की प्रधानताकी वातकी जा रीदे वह वक्रोक्तिकी 
प्रधानता की वात को ध्यान में रखकर दी की गदं दे, “इसलिए एक दी काव्यम दो कौ प्रधानता 
कखिन दै" ेसी डंका नदीं करनी चादिए । 
विमज्लैः-निणेयसागर ओर ॒मोतौकाल्वनारसीदाससंसकरण मे यद्‌ मूल छपा हे ¢व्यापारस्य 
प्राधान्य च काव्यस्य प्रतिपेदे” । इसमे या तो “व्यापारप्राधान्यं च काव्यस्य प्रतिपेदे” णेसा पाठ 
दोना चादिट जसा कि संजीविंनीकार ने स्वीकार कियादहै, या फिर “न्यापारस्य प्राधान्यं च 
प्रतिपेदेःः ेसा । अथात्‌ या तो व्यापार शब्द से षष्ठीविभक्ति दटादं जानी चाहिए या “काव्यस्य? 
यदह पद । विमर्दनी में “न्यापारस्येतिःः रेसा प्रतीक दिया हृ दै अतः उसके अनुसार “कान्यस्य 
दाब्द दी अधिक है 1 दसकिएं हमने उसे कोष्ठक में डा दिया दें । 
वक्रोक्तिजीवितकार ने एक वार वक्रोक्ति को प्रधान बतलाया ओर एक वार व्यापार को। इसकी 
संगति र्गाते हए विमरदिनीकार ने छ्खिा किदे व्यापार का अथं कविप्रतिमागत व्यापार है। यदि 
वह न दहो तो वक्रोक्ति मेँ वक्रोक्तित्व दी निष्पन्न न हो क्योकि कविप्रतिभा जिसमें नदीं रहती उसकी 
उक्ति में वक्रता नहीं आती । फलतः साध्यसाधनमाव होने ते दोनो कौ प्रधानता मानी जा सकती 
है, वस्तुतः रहती तो प्रधानता केवल वक्रोक्तिकीदहीहे। 
हमारी समञ्च मेँ टीकाकार की एेसी संगति निरापद नदीं । वक्रोक्ति उक्तिःरूप हे ओर उक्ति 
कृथन व्यापार हे, फलतः कान्य मे यदि वक्रोक्ति प्रधान हेतो इसका निषेध नहीं किया जा सकता 
कि व्यापार मी प्रधान है। व्यक्तिविवेककार आदि कै अनुसार कन्तक को व्यापार का 
अथं अभिधादृत्ति जेसी वृत्ति दी यदा मान्य है । समुद्रवन्ध ने भी भटनायक ओर वक्रोक्तिजीवितकार 
को व्यापारप्राधान्यवादी आचाय माना 1, यददो व्यापार को अभिधादिरूप व्यापार स्वीकार 
करने पर ही उसका खण्डन मी कियाजा सक्ता दे क्योकि "कविप्रतिमाव्यापारः की प्रधानता 
काव्य में अस्वीकार नदीं कौ जा सकती । आनन्दवदनाचायं इसीलिए प्रतीयमान अथं की व्यंजकं 
पदावखी ( सरस्वती ) मं अलौकिक ओर विदिष्ट प्रतिभा का परिसरण स्वीकार करते है-- 
सरस्वती स्वादु तद्वस्तु निष्यन्दमाना महतां कवीनाम्‌ । 
अखोकसामान्यममिन्यनक्ति परिस्फुरन्तं प्रतिभाविदशेषम्‌ ॥ उ्योत १। 
“प्रतिमा का उन्मेष ही विश्व का उन्मैष है" एेसा अभिनव गप्र भी मानते है-- 
“यदुन्मीलनदकत्येव विरवसुन्मीरुति क्षणात्‌ । 


प्रत्येक आचार्यं ने काव्य कै प्रति प्रतिमा कौ प्रधान कारण मानादीदहे। 
विमदिनीकार के मत मै व्यापार चरव्द का अभिधा अर्थं करने मजो आपत्ति है वह यही है 


कि कथनव्यापार कण्ठताल्वादि के अभिघात से होने वाखा उच्चारणरूपी व्यापार है ओर वक्रोक्ति 


अङरुकाररूप है । अरंकार उच्चारणरूप नदीं दे, फलतः कथनव्यापार या उक्ति भी उन्हे नहीं कहा 
जा सकता । किन्तु अन्धकार अलंकार को व्यापारस्वरूप ओर उक्तिरूपव्यापारस्वरूप ह बतला 
सटा है, फलतः उन्दने व्यापार को कविप्रतिभान्यापारपरक माना ओर शंका को निम किया । 
परन्तु एसा करते इए वे यह्‌ भूर गये किं उन्टें पूव॑पक्च पर विचार करना है जो खण्डनीय है । 


यहाँ यह भी विचारणीय है कि कुन्तक ने अलंकार के। अभिधाव्यापार स्वरूप माना हैया 
नदीं । इमे वक्रोक्तिजीवित मे एक भी णेसा स्थर नहीं मिला जहां अलंकार को अभिधात्मक कहा 


भूमिका २ 


गया हौ । उन्हें असिधेय अवदय कहा गया है । किन्तु व्यक्तिविवेककार ने ध्वनिरक्षण का खण्डन 
करते इए ध्वनिकारिका मे शब्द ओर अथ॑के दही समान अभिधा को भी शब्दतः उपादेय बतलाया 
दं ओर लिखा दे- 

"किच यथा अभिधेयोऽथेः तद्विशेषण चोपात्त तदवदमिधाप्युपादानमहंत्येव, अन्यथा य॒त्र 
दी पकादेरल्कारादल्कारान्तरस्योपमादेः प्रतीतिस्तत्र ध्वनित्वमिष्टं न स्यात्‌ , तल्लक्षणेनाव्यासेः । 
अटकारार्णा चाभिधात्मत्वसुपगत तेषां भङ्गोमणिति-भेद रूपत्वात्‌ [ हिन्दीव्यक्तिविवेक पृष्ठ २२ |] 

व्य॒क्तिविवेक के टीकाकार जो अलंकारसवंस्वकार से अभिन्न हें नेइस प्रकरण.पर भी अल्कारोंकी 
अभिधात्मकता पर उयंजनावादी कौ ओर से आक्षेप किया है। हमने चौखंभा से प्रकारित अपने 
हिन्दीव्यक्तिविवेक में यह अंडा भटीभोति स्पष्ट कर दिया हं उसे वहीं से देख लेना चाहिए 


विमरिनी 


अलंकारा इति । तेनोक्त इति दोषः । एव कारश्िरं तनोक्तभ्व निग्रकार विशेषव्यवच्छदकः ¦ 
सत्यपीति । सदपि प्रतीयमानमनाद्व्येत्यथेः । व्यापाररूपेति वक्रस्वभावेव्यथंः । भणिति- 
रिव्युक्तिः । कवीति । तत्रेव कविः संरब्ध इत्यर्थः । तत्संरम्भसन्तरेण हि वक्रोक्तिरेव न 
स्यात्‌ । नु च प्रतीयमानस्यानादरः किमभावस्रुखेनान्यथा वा करत इत्याशाङ्कयाह-उप- 
चारेत्यादि । उपचारवक्रतादी नामेव मध्ये ध्वनिरन्तभूत इति तातप्यार्थः । यदाह- 

“यत्र दूरान्तरेऽन्यस्मात्सामान्यसुपचर्यते । खेदो नापि भवेत्करहु किचिदुदिक्तद्तितास्‌ ॥ 
यन्मूखा सरसोल्रेखा रूपकादिररंङ्ृतिः । उपचारग्रधानासौ वक्रता काचिदिष्यते ॥› इति । 


एतासेबोदाजहार च- 
गअणं च मत्तसेहं धाराटङ्ि जज्जुणाइं अ वणाद । 
निरहकारमिअङ्को हरन्ति नीलखाओ अ गिसाो ॥' 


अत्र मद्निरहंकारस्वे ओपचारिके इप्युपचारवक्रता । आदिपदेन क्रियावक्रतादीनामपि 
हणम्‌ । एवं सर्वोऽपि भ्वनिग्रपञ्चो चक्रोक्तिभिरेव स्वरतः सखन्स्थत एव । यदि परं 
तस्य प्राधान्यमेव नास्तीव्याह - केवलमित्यादि । तदीयमिति । वक्रोक्तिजीवितकारसं बन्धी- 
व्यथः । तदित्थं छत्तणामूरूवक्रोक्तिमध्यान्तर्मावाद्‌ध्वनेरेवे त्वं भरतिपादितस्‌ । 
अकार = वक्रोक्तिजीवितकार दारा प्रतिपादित अल्कार। ५अरूकार अभिधारूप ही ह” यद्य 
“ही चान्द द्वारा इसका खण्डन किया गया कि अरुंकार भेदप्रभेदरूप से ध्वनि मे अन्तभूत हो 


सकते हं । सस्य पि अथात्‌ भले हौ तीन) ही प्रकारका प्रतीयमान अथै स्वीकार कर च्या तवमी. 


कवि का आदर उसमे नदीं रहता दै । व्यापाररूपा = वक्रस्वभावा । भणिति = उक्ति । कविसं० = 
अथ यह किं कवि मुख्यतः व्यापाररूप वक्रमणिति में ही प्रयत्नरीरु रहता है! क्योकि कविसंरंम 
यै विना कोड भी उक्ति वक्रोक्ति ही नहीं बन सकती ? | 

प्रन उठता हं कि प्रतीयमान अथै का अनादर वक्रोक्तिकार ने किस प्रकार से किया है १उसका 
अभाव मानकर अथवा ओर किसी प्रकार से ? इस पर उत्तर देते हए छिखते है--उपचार आदि । 
इसका तात्पयं यह कि ध्वनि को उपचारवक्रता जादि मे ही अन्तक्त मान च्याहै। जेसाकि 
वक्रोक्तिकार ने कदा है-“ज्होँ ८ अन्य गुणों के कारण ) अत्यन्त भिन्न ८ प्रस्तुत ) पदार्थं मे किसी 
भिन्न ( अप्रस्तुत ) पदाथ का सामान्य ( साधारण ) धमं भले ही वह बहुत ही छोटा क्यो न हो, 


इसलिए प्रतिपादित किया जातादहै किउस वर्णनीय प्रस्तुत पदाथ मे अतिदरायआ सके, उसे 


५ 


< अचङ्ारसवस्वम्‌ 


उपचारवक्रता कहा जाता दे । अत्यन्त सरस रूपकादि अलंकार का मूर यदी उपचारवक्रता होती 
हे 1? [ १।१२,१४ कारिका वक्रोक्तिजीवित ] ओर उदाहरण मी दिया दै-- 
“गगनं च मत्तमेघं धाराडलिताजं नानि च वनानि । 
निरदंकारम्रगद्का हरन्ति नीलाश्च निदाः ॥ 

अर्थात्‌ मत्त मेरा से युक्त आकाश, [ मैषसुक्त ] जलधाराओं से धुले अजजैन बृक्षवाले वन, तथा 
अहकारन्य चन्द्रमावाली नीटखी निराएटं भी चित्त आक्रष्ट करती हें । [ गउडवह ] यदा मेघा 
मे भद" ओर चन्द्रमा म “अहंकारशयल्यता' उपचरित ( अर्थात्‌ मैव तथा चन्द्र मँ नदो से युक्त 
ओर हतग्रम व्यक्तियों के साष्टद्य के कारण प्रयुक्त ) दै । अतः यदद उपचारवक्रता (है। आदि 
राब्द से क्रियावक्रता) आदि भेद किए जा सकते ( क्रियावक्रतामं भी कुन्तकं ने 'उपचारम- 
नोज्ञता-' नामक मेद वतलाया हे । ( द्रष्टव्य-वक्रोक्तिजीवित पृष्ठ २६६ विश्वेश्वर संस्करण ) इस प्रकार 
ध्वनि का संपूणं प्रपंच सिन्न-सिन्न वक्रोक्तियों के नाम से अपना ख्या गयादहं, परन्तु उसका 
ग्राधान्यमाच्र स्वीकार नदीं किया गया है । इस तथ्य को कदने के किष छिखा = “केवर? इत्यादि । 
तदीय = अर्थात्‌ वक्रोक्तिजीवितकार का । इस प्रकार ङन्तकः ने वतलाया तौ धवनि-तत्वं ही किन्तु 
स्वतन्त्ररूप से नदीं अपितु क्षणामूल्कवक्रोक्ति के मेद नं अन्तभूंत करके । 

विमद -विमरिनी के निगयसागर संस्करण म “मदनिरहकारत्वे आपचा।रक इत्युपचारवक्र- 
तादीनामपि ग्रहणम्‌” एेसी पंक्ति छपी दे। यहां “उपचारवक्रता?ः के पश्चात्‌ “आदिपदेन `` वक्रता- 
दीनामपि ग्रहणम्‌? यह अदा अवदय ही रहा ह । कदाचित्‌ सुद्रणमंद्ृट गया हदं । उपचारवक्रता कै 
वाद कन्तक ने “विदोषणवक्रता का निरूपण किया हं किन्तु उसमं उपचार ( लक्षणा ) काम में नहीं 
आता । अगे क्रियावक्रता क “उपचारमनोज्ञताः आदि मद मेदी वह काम में आती दहे अतः 
दमने थवक्रतादीनाः” की पत्ति फक्रियावक्रतादीनांः इस प्रकार कर दीदे । दस विषयमे संजीविनी 
से कोड प्रकार नदीं मिता । 

विमद्िनी 

कशिदप्यस्य वागविषयव्वाद छन्तणीयत्वजुक्तमिव्याद--भट्नायकेत्यादि । 

“वु आचार्यो ने ध्वनि को वाणी का अविषय = अनिव॑चनीय ओर इसलिए अलक्षुणीय 
कहा हे" उस विषय को प्रस्तुत करते हए कते है यक आदि । 


[ स्वस्व ] 


भट्टनायकेन तु व्यङ्गयव्यापारस्य पोटोकत्याभ्युपगतस्य का्व्यारात्व॑ 
ब्रुवता न्यग्भावितशब्दाथस्वरूपस्य व्यापारस्येव भ्राघान्यसुक्तम्‌ । तत्रा- 
प्यभिघाभावकत्वलक्चषणभ्यापारदयोत्तीणो रसचवणात्मा मोगापरपर्यायो 


व्यापारः प्राघान्येन विश्रान्तिस्यानतयाङ्गीकृतः । 

मट्नायक ने व्यंग्यव्यापार कौ स्वीकार तो किया हे किन्तु उसका लक्षण नहीं किया ओर उत्ते 
( स्वरूपतः स्वीकार करके भी ) काव्यका अद ( ही) वतखाया दे, ( उन्होने) प्राधान्य माना 
हेव्यापारका दी तथा दाब्दं ओर अ्थंदोनों को उस (व्यापार ) की अपेक्षा गुणीभूत ओर 
अप्रधान (दवा हृजा ) बतलाया है। व्यापारो में भी ८ इन्होंने) अमिधा ओर भावकता नामकं 
दो व्यापार से उनके अगे आने वाला भोगनामक रसचव॑णास्वरूप व्यापार ही प्रमुख रूप सै 
हृदयविश्रान्तिकारी माना हे । 


न ह इन क क अ १ क कव क क छ अनि प्कककक ` करचक्रमाकरक  चकता तः वहः 


भूमिका २५ 
विमरिनी 


प्ौटोक्त्येति। न पुनर्छच्णकरणेन । अत एवोक्तेः प्रौढत्वं यज्ञच्तयित॒मशक्येस्तस्याप्यभ्यु- 
पगमः ! काव्यांदत्वसिति न पुनः काव्याव्मव्वम्‌ । यदाह- 
^ध्वनिर्नामापरो योऽपि व्यापारो व्यञ्जनात्मकः । 
तस्य सिद्धेऽपि सदे स्यात्काव्यांात्वं न रूपिता ॥‡ इति । 


व्यापारस्येत्ति। कविकमंणः 1 अन्यथा शब्दम्रधानेभ्यो वेद्‌ादिभ्योऽथंप्रधानेभ्यश्चति- 
हासादिभ्यः काव्यस्य वे रचण्यं न स्यात्‌ । यद्क्तम्‌- 
“शब्द्‌ प्राधान्यमाधित्य तत्र शाख परथणग्विदुः । 
जथंतच्वेन युक्तं तु व दन्त्याख्यानमेतयोः ॥ 
द्वयो गणस्वे व्यापार प्राधान्ये काव्यधी भवेत्‌? ॥ इति । 
तत्रापीति । कविकमंरूपस्य व्यापारस्य प्राधान्ये सव्यपीव्य्थः। अभिधा भावना 
चान्या तद्धोगी कृतिरेव च' इति काव्यं तावत्‌ ज्यश्च तेनोक्तस्‌ । तत्रापि- 
 (असिधाधासतां याते शब्दार्था्क्ती ततः । 
ावनाभाव्य एषोऽपि शङ्ारादिगणो सतः ॥ 
इत्य शद्ुयस्य विषयं प्रतिपाद्य “वद्धो गीङ्कतिरूपेण उयाप्यते सिद्धिमान्नरः' इति तृती. 
योऽरः सहृदयगतस्तदंशद्वय चवेणात्मा ्दश्यमानाथवा सोत्ञे याव्यङ्गत्वमियं स्फुटम्‌? 
इव्युक्त्या परव्रह्यास्वादसविधवतीं विश्रान्तिधामतयाभ्युपगतः । तदेवं यदयपि 
| 'तापयांश्क्तिरभिधा कक्तणाजु मिती, द्विधा ! 
अथापत्तिः कचित्तन्त्रं समासोक्स्याययरुकतिः ॥ 
(रसस्य कायंता भोगो ग्यापारान्तरवबाधनस्‌ । 
द्वादशेष्थ ध्वनेरस्य स्थिता विप्रतिपत्तयः ॥› इति 


नीत्या बहवो विप्रतिपत्तिप्रकाराः संभवन्ति, तथापि 
'काग्यस्याव्मा ध्वनिरिति बुघेर्यः समास्नातपूव- 
स्तस्याभावं जगदुरपरे भाक्तमाहु स्तसन्ये । 
केचिद्वाचां स्थितमविषये तच्वमूचुस्तदीयसम्‌~ ` 
इत्युक्त नीस्येव ध्वनेविंप्रतिपत्तिप्रकारन्रयमिह प्राधान्येनोक्तम्‌ ॥ 
म्रौडोक्तिद्वारा, न्‌ चि लक्षणनिवंचन ये द्वारा। इसि उक्ति को प्रोढ कदा गया क्योकि 
जिसका लक्षण नहीं किया जा सकता उसको मी स्वीकार कियाजा रहा है। काव्यांशस्व, 
कान्यात्मत्व नीं । जसा कि ( मट्रनायकं ने ) कहा भी . है-- “ध्वनि नामक जो एकं ओर 
व्युजनात्मक व्यापार है, उसकी यदि ८ अभिधा भावना, भोग-इन तीन व्यापारो से ) सन्नता ५ 
सिद्ध हो जाय तव भी उसे काव्य का एक अद ही माना जाएगा, आत्मतत्व नदीं ।” व्यापारस्येव 
के व्यापारशयब्द का अर्थं है कविकर्म । नदीं तो दाब्दप्रधान वेद आदि से तथा अथप्रधान पुराणादि 
से काव्य की भिन्नता सिद्ध नदीं हो सकेगी, जैसा किं कहा हे “शाख .( कान्यादि से ) भिन्न 
होता हे क्योकि उसमें राब्दकी प्रधानता रहती हे । ८ पुराण आदि ) आख्यानं मे अथं की प्रधानता 
रहती हे । ये दोनों ८ शाब्द ओर अथं ) काव्य तव कहलाते हे जव ये दोनो अप्रधान रहते हैँ ओर 
व्यापार प्रधान । तन्नापि उसमें भी अथात्‌ व्यापार कीं प्रधानता रहने पर भी । भट्रनायक काव्य 
कै तीन अड मानेदहैं (१) अभिधा ८२) भावना ओर (३) भोग । इनमे मी अभिधा का विषय 


२६ अल्ङ्कारसवंस्वम्‌ 


माना हे शब्द ओर अर्थौ कै अलंकारो को तथा भावना का विषय माना है शृङ्गारादि के साधारणी- 
करण को । इस ८ रस ~) की भोगीक्रति, भोग या मोजकत्व को सिद्धिमान्‌ ( सद्दय ) जन के हृदय 
को व्याप्त कर देने वाका बतखाया है । इस प्रकार यद तृतीय व्यापार सहृदय मेँ रहता दै ओर 
इसमे पूर्वाक्त ( अभिधा अर्थात्‌ उसके विषय अलंकार तथा भावना अर्थात्‌ उसका विषय साधारणी- 
भूत विमावादि सामयी ) दोनों मी प्रतीत होते दै । यद ( भोगीक्रति ) मोक्ष का भी अंग बनती 
देखी जाती है (२ ) 1 इस प्रकार तृतीय व्यापार को ब्रह्यास्वादतुल्य माना गया दै इसलिए किः 
दसम भी वेसा ही विश्राम भिक्ता है जेसा ब्रह्मास्वाद मँ । 

ईस प्रकार यद्यपि ( १ ) तात्पयांदयक्ति (२) अभिधा (३) लक्षणा (४-५) (स्वाथ ओर 
पराधं दो प्रकार की ) अनुमिति ( ६-७ )-( शर॒तार्थापत्ति ओर अर्थापत्ति इस प्रकार ) दो प्रकार 
को अथापत्ति ( < ) तन्त्र ( अनेका्थक राब्द प्रयोग ) (९) समासोक्ति आदि अलंकार ( १० ) 
रस की कार्यता ८११) रस का भोग (१२) ( व्यंजनाख्य) जल्ग व्यापार का वाध इस 
प्रकार ध्वनि पर वारह्‌ विप्रतिपन्नियां हैँ । .दस कथन के अनुसार ओर मी विप्रतिपत्तिं उठाई 
जा सक्ती हैँ तथापि उपर्युक्त प्रसंग में केवल उन्हीं तीन विप्रतिपत्तिं कौ प्रस्त किया गया है 
जो निम्नरिखित ध्वनिकारिका में प्रस्तुत की हे--““काव्यस्यात्मा अर्थात्‌ “जिस ध्वनि को 


` अनेक विद्वान ने मि्कर काव्य की आत्मा ठहराया रक्तक विषय में उछ लोग यद्‌ कदते सुने 


गए हे किवह द्यी नही, कु कोग उसे लश्षणास्वरूप मानते सने जा रहे है ओर यद कि वह्‌ 
कोदं न कोड तत्व दे तो अवदय किन्तु वाणी से परे हे 1" ये ही आपत्तियां वस्तुतः प्रधान हे 

विमशः--८ १) मटरनायक का सिद्धान्त उन्दीं कै चाब्दो ग यर्दौँ जितना प्रस्तुत किया गया है 
उतना खोचन ओर अभिनवभारती में भी नहीं । इस प्रसंग में “द्यमानाधथवा मोक्षिः का अभिप्राय 
पूवेप्रसंग के विना संदिग्ध दहं। मोगीक्रति का देखा जाना ओर तव इसका मोक्ष मं अंग वनाना 
विचित्र सी स्थापना है । लोचन ओर अभिनवभारती म यह अंडा उद्घरत नदं है । संजीविनी टीका 
मे इस परेही प्रसंग पर कोई विस्त विचार नहीं है। “भोगीकृतिः-मी यदि कदमीरिओं के 
परम्चिव कौ या सविद्मट्धारिका की कोद कला है तो उसका ददन स्पदोरूप या परामञरूप होगा 
तव दरयमाना क अपेक्षा स्प्रदयमानाः दाब्द अधिक उपयुक्त दोगा । मोक्ष का अर्थं यदहं विश्वरूप 
असाधारणत्व से छुटकारा नहीं किया जा सकता क्यकि असावारणत्व कै निराकरण अर्थात्‌ 
साधारगीकरण मं अंग अथात्‌ कारण माना गया हे भावनाव्यापार, मोगव्यापार नदीं । अंग राब्द 
का अथ अड कियाजाय तो भावनादी भोगका अंडा मानी गयी दहै, भावना का मोग नदीं। 
मोक्षि का अथं चतुधपुरुषा्थ सुक्ति दी यदहो अभिप्रेत है यह तथ्य ब्रह्मास्वाद की चर्चासे मी पुष्ट 
होता हे । 

( २ ) यहाँ जो वारह आपत्तिय ध्वनि के विपक्च में उट गदं हेये साहित्यञ्चाख मं प्रायः 
मरक्षिद्ध ड । तात्पर्यशक्तिः दशरूपक ४-म्रकादा, काव्यप्रकाश ५-उछ्वास ओर लोचन म चचित 
हे, असिधा ओर क्षणा ध्वन्यालक १,-३ उद्योतः, काव्यप्रकाश -२,५ उल्लास, साहित्यदर्पण 
आदि मेः अनुमिति ओर अर्थपतिः व्यक्तिविवेक, ध्वन्यालोक, काव्यप्रकाद्च आदि म तन्त्र जौर 


अल्कार उद्भट, कुन्तक आदि के ग्रन्थ मै जौर रस की कार्यता लोट कै रसोत्पन्तिवादग्रसंग ` 


परस्त॒त करने वाढे लोचन, असिनवभारती, काव्यप्रकाद्व, सादित्यदपंण आदि यन्धा मे, तथा मोग- 
रसमीमांसा वाङ समी यन्धा मेँ । मटनायक के मत के निरूपण मं व्यजनाका प्रथक्‌ राब्दव्यापार्‌ 
न माना जाना उक्त सभी अपत्तियो का मूल है । यष तन्त्र शब्द से चब्दाल्कार ओर समासोक्ति 
जादि अथालंकार मेँ ध्वनि के अन्तर्भाव का संकेत है । रेष जाँ अनेकार्थक शब्दौ का बदलना 


1 


भूमिका २७ 


भव न हो शब्दालंकार माना जाता हे । शन्दराक्ति मूलकं ध्वनि का उसी मे अन्तभाव दिखाया 
जा सकता हे 
यद्यपि उक्त सभी आपत्तियों सखविदित हें तथापि दादश दोष प्रस्त॒त करने वाली “तात्पयां 
दाक्तिः' इत्यादि कारिका पदिखी वार यदौ विमरिनीमें दही मिली हे अतः यह्‌ किसकी हं यह 
विचारणीय दै। महिमभदट्र ने व्यक्तिविवेक में ध्वनि पर जो दस दोप दिखा हँ उनकी सय्रह- 
कारिकाओं से यह कारिका स्वधा भिन्न हे । लोचन ओर अभिनवभारती मं यह कारिका हमे नदीं 
मिलो । संभवतः यह भी भट्रनायककी ही दहो भटरनायक का हृदयदपेण या उसके अधिकारा 
संभवतः विमडिनीकार को उपरब्ध रहे । 
विमरिनी 
एव मिद नीमेतद्धि भ्रति पत्तिभ्रकारत्रयं निराङ्कवन्‌ ध्वनेरेव काग्यार्मत्वं साधयति-ध्वनि- 
कार इत्यादिना । 
इस प्रकार उक्त तीनों विप्रतिपत्तियो का निराकरण करते हए एं ध्वनि को ही काव्य कौ आत्मा 
सिद्ध करते हए छिखते है--ध्वनिकार इत्यादि - 
(४५4 [ सवेस्व ] 
ध्वनिकारः पुनरभिघातात्पयंलक्षणाख्यग्यापारजरयोक्तीणस्य भध्वनन- 
योतनादि खन्द्ाभिघेयस्य व्यञ्ननव्यापारस्यावश्याभ्युपगम्यत्वाद्‌ व्यापारस्य 
च चाकयाथेत्वाभावाद्‌ वाक्पाथस्येव च व्यज्गयरूपस्य गुणाटकायोपस्कते- 
व्यत्वेन प्राधान्याद्‌ विश्रान्तिधामत्वादात्मत्वं सिद्धान्तितवान्‌ । 
व्यापारस्य विषयमरुखेन स्वरूपपरतिठम्भात्‌ तत्प्राघान्येन प्राघाभ्यात्‌ स्व- 
रूपेण विचार्यत्वाभावाद्‌ विषयस्यैव सम्रभरसदहिष्णत्वम्‌ । तस्माद्‌ विषय 
एव॒ उयज्ञयनामा( जीवितत्वेन वक्तथ्यः, यस्य गुणाटकारङतचारुत्व- 
परिग्रहसास्राज्यम्‌ । रसाद्यस्तु जीषितभूता नारकार्त्वेन वाच्याः। 
अलंकायणासरुपस्कारकत्वाद्‌, रसादीनां च भाधन्येनोपस्कायेत्वात्‌ । तस्माद्‌ 
व्यङ्गय एव वाक्यार्थाभूतः काव्यजीवितमिस्येष एव पक्षो बाक्याथेविदां 
सहदयानामावजेकः । ग्यञ्जनव्यापारस्य सवैरनपह्धतत्वात्‌ तदाश्रयेण च 
पक्षान्तरस्याप्रति्ठानात्‌ । 
इन सव मतो के विरुद्ध ध्वनिकार ( आनन्दवधनाचायं ) ने यह सिद्धान्त स्थापित किया हे 
कि काव्य का वाक्यार्थं (अन्तिम अतः तात्पयंविषयीभूत प्रधान अथं) व्यग्यरूप अथे हौहं 
क्योकि उसी मं विश्रान्ति ८ जिज्ञासा की शान्ति) होती है ओर गुण तथा अलंकार उसी अर्थकी 
रोभा वदाते है अतः वही अथं प्रधान ओर ८ काव्य का ) आत्मभूत अथं होता दे। ( इस अथैको 
उन्होने व्यंग्य इसक्िए कहा है कि इसकी प्रतीति अभिधा, तात्पयं ओर रक्षणा नामक तीनों 
व्यापारो से नदीं हो पाती, उसके किए इन तीनों के बाद काम मे आने वाखा ओर ध्वनन, चोतन 
आदि शब्दौ से पुकारा जाने वाखा व्यंजनानामक शक अतिरिक्त व्यापार मानना पड़ता है, 
क्याकि व्यंजना एक व्यापार है ओर व्यापार वाक्यां नदीं हो सकता ( वह अथप्रतीति का 
साधनमात्र हं ) अतः उसके अथै व्यंग्य को ही वाक्याथ ओर म्रधान माना जाता है । 


6 


२८ अटङ्ारसवंस्वम्‌ 


( ओर यह ठीक भी हे क्योकि) व्यापार कोव्यापारता तमी प्राप्त होती दै जव वह अपने 
विषय को निष्पन्न करता हे अतएव उस (व्यापार) में प्रधानता मी उस (विषय) की प्रधानता 
के कारण ( उपचार द्वारा) आतीदहे।॥ इस प्रकार क्यांकि व्यापार का विचार ( विषयनिर- 
पेक्षतया ) केवर व्यापाररूप से नदीं किया जा सकता ( विषयसापेक्षतया द्यी किया जा सकता 
हे ) अतः ( विचार का ) समस्त भार केवल विषय ही उठा सकता है । इसि ( व्यंजनान्यापार 
नहीं अपितु उसका ) व्यृग्यनामक विषय ही (कान्य का) जीवित ८ प्रधानतच्च ) कहा जाना 
चादि ओर (पूर्वाचार्यो दवारा काव्यात्मरूप से सिद्धान्तित ) गुण तथा अर्कार्‌ जो ्योभा उत्पन्न 
करते दे उसकी प्रापि का एकच्छ्र अधिकार मी उसी ( विषयरूप व्यंग्यार्थं) को हे। व्यंग्यारथं 
रसादिस्वरूप होता हं अतः) जो अर्थं रसादिरूप से ( काव्य की) आत्मा दहै ( वह तो अलकार्य 
हे ) उसे अल्कार नदीं कहा जा सकता । क्योकि अल्कार्‌ का धर्म दै शोमा वदाना ओर रसादि 
का धमं हे रोभित होना, क्योंकि वे प्रधान दै । इसलिए वाक्यार्थको समञ्ने वाले सहृदयो को 
यही पक्ष रुचता दहै किं “( स्वयं व्यंजना नदीं अपितु ) व्यजना द्वारा प्रतिपाद्य (व्यंग्य) अर्थं 
दी ( काव्यवाक्य का) प्रधान प्रतिपा अथै ओर वदी काव्य की आत्मा हे 1 ( व्यज्ना- 
विरोधी ) सवके सव ८ आचार्य ) व्यञ्जनाका खण्डन नहीं कर सके ओर उस (व्यजना) कै 
आधार पर दूसरा कों पक्ष प्रतिष्ठित नहीं हो सकता ( अर्थात्‌ व्यापार का नाम यदि व्य्जना 
तो तत्मरतिपा् अथं को व्यंग्य से भिन्न कुछ नहीं कटा जा सकता ) । 

विमरिनी 

समयपेत्तार्थावगमशक्तिरभिधा । सामान्यानां परस्परान्वितव्वेन विदोषार्थाववोधन- 
शक्तिस्तात्पयंम्‌ । सख्या्थवाधादिसहकार्यपेत्तार्थग्रतिभासनशाक्तिखंक्तणण । एतद्वयापार- 
च्रयादुत्तीणस्य तदतिरिक्तस्थेव्यर्थः। तथा च “गङ्गायां घोषः इत्यत्र गङ्गाशब्दो घोष- 
जब्द्‌श्च सामान्यात्मके जलग्रवाहे ग्रहनिकरम्बे च संकेतितौ । सामान्य एवोद्योगात्‌ 1 
विदोषस्य हि संकेतकरणे आनन्त्यं ज्यभिचारश्च स्यात्‌ । ततश्चामिधया जलकप्रवाहसमात्र 
गरु निकुरम्बनात्रं च प्रतीतमिव्येका कचया। एतस्प्रतिपाद्ान्यप्रतिपादनायाप्यभिधा न 
समथा । "विशेष्यं नाभिधा गच्छत्‌ क्तीणशक्तिर्विंशेषणेः इव्यादयक्तयुक्त्या तस्या चिरस्य 
व्यापारासंभवात्‌ । (लामान्यान्यन्यथासिद्धर्विशेषं गमयन्ति हिः इति न्यायात्तात्पर्य- 
दाक्त्या सामान्यान्याधारघेयमवेनावस्थितं विरिष्टं गङ्काघोवाद्यामूरयन्तीति तारपयण 
परस्परान्वितत्वमात्रमेव प्रतीयत इति द्वितीया । जल्ग्रवाहस्य च घोपाधिकरणत्वमयुक्त- 
मिति प्रमाणान्तरवाधितः सन्‌ गङ्गाशव्दुस्तदधिकरणयोग्यं तटं रच्तयतीति वृतीया । 
तत्र तावत्‌ । 

“मुख्याथंबाधे तदयोगे रूढितोऽथ प्रयोजनात्‌ । 

अन्योऽर्थो चयते यत्‌ सा कत्तणाऽऽरोपिता क्रिया ॥' इति 
नीत्या लन्तणा त्रितयसंनिधावेव भवति । तत्र मुख्यार्थबाधा ।तावस्प्व्यक्तादिप्रमाणा- 
च्तरमूखा । यश्च सामीप्यादिख्ंबन्धः सख च प्रमाणान्तरावगम्य एव । यसपुनरिदं घोषस्य 
रत्य पाव नत्वादिलन्षणं॒ब्रयोजनं प्रतीयते तच्छृब्दान्तरानुक्तं प्रमाणान्तराप्रतिपन्नं च 
ङ्त आगतम्‌ । न तावस्प्व्यन्तादेव तस्प्रतीतिः, अस्मादेव शब्दादवगमासिद्धेः। शब्दार्थ 
च तस्याप्रवृत्तः । नाप्यनुमानात्‌ । सामीप्येऽपि शौस्यपावनव्वादेरसंभवादनेकान्तिक- 


, स्वात्‌ । न स्तिः । तद्‌ नुभवाभावात्‌। सत्यामपि वा तस्यां नियतस्मरणं न स्यात्‌ । 


अस्मादेव च शब्वादेतदेव बुध्यत इति को हेतुः । तस्मादस्यैव शब्दस्येष व्यापारोऽ- 


= क 
म क किक 


भूमिका २९ 


भयुपगन्तव्यः । निर्व्यापारस्या्थप्रतीतिकारिव्वाभावात्‌। स तावन्नामिधात्मा। समया- 
भावात्‌ 1 न तात्पर्यात्मा । तस्यान्वयप्रतीतावेव परिक्तयात्‌। न रत्तणात्मा । सुख्यार्थ- 
वाधाद्यभावात्‌ । तस्मादभिधातातपयंकक्णाग्यक्तिरिक्तश्चतुथ क चयानित्तिक्तो उयङ्यनिष्ठो 
व्यञ्जनाव्यापारोऽभिहितान्वयवादिनावश्याभ्युपगन्तव्यः । अन्विताभिधानवादिनापि 
यत्परः खब्द्ः स शब्दाथं इति रारवद्‌भिधाव्यापारमेव दीघदीघसिच्छुतापि नैसित्ति- 
काथानु सारेण निमित्तानि कल्प्यन्त इति निमित्तपरिकल्पनेऽपि सममग्रेवेयं भ्रक्रियाल्ुसरणी- 
यवेव्युभयथापि सिद्ध एव व्यञ्जनव्यापारः । एतच्च गहनगहनमिति मनगेच सिदधरस- 
न्यायेनेदो त्तम्‌ । 


जो राक्ति[ इस राब्द से यह अथै विदित दहोरेसे] संकेत के सीधे अथेका ज्ञान कराती 
हे उसे अभिवा कदा जाता हे। सामान्य ( स्वस्व- ) रूप से ( अलग-अलग ) उपस्थित अर्थौ का 
( कतृकमंत्वादिरूप से ) परस्पर अन्वित स्थिति में विदेष ( कतेत्वादिं की आश्रयता आदिं रूप ) 
अर्थं का ज्ञान कराने वाली शक्ति तात्पयं कदकलाती हे । रक्षणा वह शक्तिद जो सुख्य अथं के वोध 
आदि सहकारी कारणों के आधार पर अथं का ज्ञान कराती हे! इन तीनों से उत्तीणं अर्थात्‌ तीनों 
से भिन्न । उदाहरणार्थं जसे “गंगा पर घोष यह वाक्य । इसमे गगादाब्द ओर धोषराब्द 
क्रमदाः सामान्य ( असंबद्ध ) जल प्रवाह ओर गहसयुदाय रूपी अर्था में स्केतित हैः क्योंकि 
दाब्द की प्रवृत्ति सामान्य अथैकीदही ओर होती दहे। यदि विश्लेष ( स्बद्ध) अथ॑ में स्केत माना 
जाय तो अनन्त संकेत मानने होगे ८ क्योंकि संवन्ध अनन्त होते हें ) ओर उतने संकेत मानते पर 
भी कु ८ नष्ट, दूरस्थ ओर अनुत्पन्न ) अथं अविदित ही रह जा्वेगे ( क्योकि संकेत केवर सामने 
विमान अथैमेंदही कियाजा सकता हे) इस प्रकार अभिधा केद्वारा केवर जलप्रवाह ओर 
गरहससुदाय का ज्ञान हृञा । यह इहं ज्ञान की प्रथम कक्षा । असिधा इतना अथं बतलाकर ओर कोई 
अर्थं नहीं वतरा सकती । “अभिधा यदि विदेषण काज्ञान करा देतीदे तो फिर वह विष्य का 
ज्ञान नहांकरा पाती क्य।कि ( वह एक व्यापार हं अतः) इसके एक वार रुक जनेके वाद 
उसकी पुनः प्रवृत्ति संभव नहीं । सामान्य विेप से रहित नहीं रहते अतः वे विदेष का ज्ञान 
कराते हौ हं ।› यह एक माना हुआ सिद्धान्त है । इसके आधार पर ८ अमंवद् ओर ›) साधारणरूप 
से उपस्थित गंगा ओर घोष आदि तात्प्य॑राक्ति के दारा परस्पर मे संबद्ध गंगा ओर घोष आदि 
का ज्ञान कराते हं । यह हृडं ( संबद्ध अर्थो के' ज्ञान की ) दूसरी कक्षा, किन्त॒ (गगा का अथ ) जल- 
प्रवाह घोष का आधार बन नहीं सकता, यह प्रत्यक्षप्रमाण से वाभित है, इसलिए गंगाब्द 
( घोष ) के अधिकरण वनने योग्य तटरूपी अथ॑ को लक्षणा द्वारा प्रस्तत कराता हे, यह इडं तीसरी 
कक्षा इनमे जो लक्षणा हे वह 'मुख्याथवाध, सुख्यार्थसंवन्ध तथा रूढि ओर प्रयोजन मेँ से कोहं 
एक, इस प्रकार तीन की सहायतासे जो शक्ति दूसरे अथंका ज्ञान कराती है उसे लक्षणा कहा 
जाता हे वह वस्ततः है तो सुख्याथं का व्यापार किन्तु मानः जाती है सुख्याथैवाचक राब्द मेः 
( काव्यप्रकादा. २उ०)। इस नियम के अनुसार सुख्याथवाधादि तीना के जुरने पर ही 
अधज्ञान करातीदहे। उन तीनोंमे जो मुख्याथवाध हं वह राब्दप्रमाण से भिन्न प्रत्यक्षुप्रमाणसे 
प्राप्त हं। इसी प्रकार ( गंगाप्रवाह ओर तट आदि का सामीप्यादि सवन्ध मी प्रत्यक्षादि प्रमाणा- 
न्तरा संदहोजान लिया जाता हं। किन्त यह जो ८ गंगागत ) रोत्यपावनत्व की घोष में प्रतीति 
होती हे वहन तो किसी राब्द से ही कही जा रही है ओर न किसी अन्य प्रमाणसे ही जानी 
जा सकती, अतः प्रन उठ्तादहै किं उसकी प्रतीतिः केसे होती है। प्रत्यक्षसे ही उसकी प्रतीति 
नहीं मानी जा सकती । व्यक यह नहीं माना जा सकेगा कि[ गंगाआदि)] सेदह्ी उसकी 


1 ग क न न न न क क 


२.० अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


गरतीति हो रही दे [जो करं अनुभव सिद्धे] साथी प्रव्यक्त की प्रवृत्ति राब्द प्रमाण से विदित 

होने वारे अथं मँ नहीं होती ८ क्योकि रखाब्दप्रमाण से तमी अरथज्ञान कराया जातां दे जव वह 

अन्य किसी प्रमाण से संमव नहीं होता = अनन्यक्भ्यो दहि दाब्दाथैः। उसकी प्रतीति अनुमान से 

मी नदी होती क्योकि गंगाप्रवाह कातट्से याधोष से जो संवन्ध है वह सामीप्यरूपी संबन्ध दै 

ओर सामीप्यसंबन्ध से गंगाप्रवाहगत ओेत्यपावनत्वयातटया घोष मं पर्टुचना समव नदी, अतः 

तट, घोष ओर दोत्यपावनत्वादिः मे रेकान्तिकता ( व्या्चिसंबन्ध ) नदीं दे ( फलतः अनुमान से 
दोत्यपावनत्वोदिं की प्रतीति संभव नहीं ) घोष में चेत्यपावनत्वादि का स्मृति रूप ज्ञानमभी नदीं हे 
वर्योकिं ( स्मृति अनुभूतपदाथ की होती है ओर खनने वाले व्यक्तिको घोषम) उस . रत्य 
पावनत्व ) का अनुभव नहीं रहता । यदि रत्यपावनत्वादि का ज्ञान स्ृतिरूप भी होता तो कभी- 
कमी एेसा भी द्योता हे कि गंगादिशब्दो को सुनने से ओत्यपावनत्वादि का ज्ञान कमी नदीं भीदोता 
( क्योकि स्टृति सदा हो ही रेसा नहीं, वह कमी नदीं भी होती, जव कि रोत्यपावनत्वादि की 
म्रतीति नियमतः होती ही है ) फिर यदह क्या वात है कि किसी राब्द से कोड दी अथं विदित दोता 
है ( अर्थात्‌ गंगाद्ाब्द से सैतव्यपावनत्व ही ओर कुन्ताः प्रविद्चन्तिः- मं उन्तदाव्द से पुर्ष में 
तीक्ष्णत्व ही )। इसङिए यदी मानना उचित है कि यत्यपावनत्वादिप्रयोजनौमूत अभ के ज्ञान 
मे गंगादिशब्द ह्वी कारण ह ओर उन्दींके किसी व्यापार सेउस अथंकाज्ञान होता हे क्योंकि 
दाव्द विना व्यापारके अथकाज्ञान नहीं करा पाता। ( जहाँ तक उस व्यापार का संवन्ध हं) 
वह अभिधा नदीं कदा जा सवता क्योकि ( गंगादि ) राव्द का उस ( दौत्यादि ) अथ में संकेत नदीं 
रहता, न वह तात्प्यरूप है क्योकि तात्पर्य केवल पदाथैसन्वन्ध का ज्ञान कराता ओर उतनेमें 
दी समाप्त दो जाता हं (आगे नहीं वदता )। न वह व्यापार लक्षणारूप दही हे.क्याकि इस अर्थं 
ज्ञानमं (क्षणा कै हेतु) सुख्याथेवाधादि नदीं हदोते। इसलिए ( प्रयोजनस्वरूप यह अथ 
व्य॑ग्य होता दे ओर ) अभिधा, तात्प ओर लक्षणा से सिन्न चतुर्थं कक्षा में अवस्थित ( इस ) व्यंग्य 


अथं की प्रतीति कराने वाला व्यज्ञनानामक व्यापार अभिहितान्वयवादी को अवदय दही मानना. 


पड़ता हं [ उक्त क्रम वे अनुसार जो पहटे वाक्य कै प्रत्येक चब्द से अभिधा द्वारा उसके असंबद्ध 
अथं काज्ञान मानतादहं ओरवाद मे तात्पयंद्वारा उन सव अर्थो का संवन्ध ]। जो अन्विता- 
मिधानवादी ह ( अर्थात्‌ पदार्थौ का संबन्ध पहले ओर उनमें से प्रत्येक का अभिधा द्वारा ज्ञान वादमें 
मानता ह अथात्‌ जिसके मन में परस्पर संबद्ध अर्थौ में ही अभिध। होती हं फलतः जो वाक्यमें 
अभिधा मानता ओर वाक्या्थंको वाच्य अर्थं मानता है) उसे भी अभिहितान्वयवादियों के 
खण्डन मं प्रस्तुत सारी आपत्तिर्याँ स्वीकार करनी दोगी, ( उनका उत्तर उसके पास मी नहीं है, 
फलतः उसे मी व्यजनानामक अतिरिक्त खब्दव्यापार मानना पड़गा। क्याकि वह यह सिद्धान्त 
स्वीकार करता है कि अन्तिम अर्थं तक दब्द की ८ असिधा क्षणध्वंसी नदीं, अपितु विवक्षित अथं 
क्म प्रतीति के क्षण तक प्रवृत्त रहती है ओर वह दृष्टान्त देतादै ( किसी वल्वान्‌ व्यक्ति कै 
&।र] राङ्धपर छोड गए उस ) वाणका\ जो अपनी एक ही गति में राञ्च॒ के क्वच का भेद, त्वचा 


का विदारण, हृदय का छेदन ओर प्राणों का हरण, ये सव कायं करता है । उसे उपर्युक्त आपन्निरयँ 


इसिए स्वीकार करनी होगी कि' वह यह मानतादै कि) “नैमित्तिक के अनुसार निमित्त 
कौ कपना की जाती दै" ( यहाँ नैमित्तिक है रैत्यपावनत्वादि का ज्ञान, उसकी प्रतीति निश्चित 
ड गगा शब्द से होती है ओर गंगा खन्द तात्पयं या अभिधा, किसी मी जन्य व्यापार केद्वारा 
उपयुक्त कठिनादयोँ के कारण उस शैत्यादि प्रयोजन का ज्ञानं वहीं करा सकता फलतः उसे तदर्थ 
-यजना ही स्वीक्रार करनी पड़ती है । ) इस प्रकार अभिहितान्वय कौ प्रक्रिया से शब्दबोध 


वकराण्काकाकाकााा कतत तात क क ~ = ४ ौ & 


भूमिका ३९ 


माना जावे या अन्विताभिधान कौ प्रक्रिया से, लक्षणा में प्रयोजनज्ञान कै किए व्यञ्जनाव्यापार 
मानना ही पड़ता है । यह विषय ( अर्थात्‌ व्यजना की सिद्धि ) अत्यन्त ही गहन ओर गंभीर है- 
ठीक वैसे दी जसे ( आयुवंद में पारद आदि को मूच्छित कर उसका ) रस बनाना ( किन्तु जेसे 
कोड किसी अन्य के दारा वना वनाया रस किसी के लिए सुम करदे उसी प्रकार हमने भी यहां 
सरता कं साथ व्य॒ज्ञनासिद्धि कौ प्रक्रिया प्रस्तुत कर दी है, क्योंकि ध्वनिवादी आचायौ (जानन्द- 
वर्धन, अभिनवगुप्त ओर मम्मट ) ने इस विषय को पर्याप्त स्पष्ट कर दिया है । 
विमशेः-इस संपूर्णं प्रकरण के लिए काव्यप्रकादा दे द्वितीय तथा पंचम उछास देख लने 
चाहिए । हमने इन्हीं के आधार पर कोष्ठक में स्पष्टीकरण कर दिया हे । 
विमदिनी 
आ दिशब्दस्प्रव्यायनावगमनादी नामपि महणम्‌ ! अवद्येति । तेन विना व्यङ्गचस्याथ- 
स्यासंग्रहणात्‌ 1 व्यापारस्येति । व्यञ्जनास्मिकायाः क्रियाया इव्यथः । सा खट साध्यसान- 
त्वेन पूर्वापरीभरतावयवत्वान्न स्वरूपेणोपरुभ्यत इति विचारपद्वीमेव स्वयुपारोडं 
नोत्सहत इति कथं नाम तस्या वाक्याथंत्वं स्यादिति भावः । यद्‌ वचयति--्यापारस्य 
विषयसुखेन स्वरूपग्रतिरम्भात्‌ तत्प्राधान्येन प्राघान्यारस्वरूपेण विचायंस्वाभावाद्‌ विपय- 
स्येव समग्रभरसदहिष्णुत्व म्‌ इति । उपर्कतेन्यत्वेनेति । तत्परतयावस्थानेने्यर्थः । यदुक्तस्‌-- 
'वाच्यवाचकचारुत्वहेतूनां विविधारमनाम्‌ । 
रसादिपरता यत्र स ध्वनेषिषयो मतः ॥› इति । 
अत एव ॒विश्रारितधामत्वादिव्युक्तम्‌ । आत्मत्वमिति । सारभूतव्वमिव्यथंः । अतश्च 
तेन विना काग्यं काव्यमेव न स्यादिति तात्पयंस्‌ । नहि निर्जीवं शरीरं काप्युपयुक्छस्‌ । 
ननु ययेवं तदिं "गङ्गायां घोषः" दरत्यत्रापि व्यङ्गयस्य सद्धावात्‌ कान्यसवं प्रसञ्यते । नैतत्‌ । 
दृह यद्वद्‌ास्मनो व्यापकव्वाच्छुरीरे घटादौ वतंमानस्वेऽपि करणादिविशिष्टे शरीर एव 
जीवव्यवहारो न घटादौ, तद्वदस्यापि विविधगुणारंकारौ चिस्यचारुशब्दार्थंशरीरगतस्वेने- 
वात्मत्वव्यवहारो नान्यत्रेति न कश्चिदहोषः। नु च स्व॑र क्रियाया एव प्राधान्यं म्रसिद्धम्‌ , 
इह पुनविषयस्योक्तमिति किसेतदिव्याश्चङ्कयाह--ञ्यापारस्येत्यादि । विषयसुखेनेति । 
यथा द्योद्‌ नादे विद्धिच्याद्ञ्चुखेन पाकादेः क्रियायाः स्वरूपोपरूग्भः । तत्पराधान्येनेति । 
विषय प्रधानव्वेनेव्यथः । तेन व्यापारस्य भ्राधान्यञ्नुपचरितमिति भावः । स्वरूपेणेति । 
स्वरूपं हि तस्य साध्यमानव्वाद्‌ विचारयितुमशक्यम्‌ । सिद्धस्य हि विचारो भवतीति 
भावः । एवकारो व्यज्ननवग्यापारव्यवच्छेदकः । समयेति । समरस्य भरस्याव्मेति 
ज्यवहारादेः सह नश्ीरुदवमिव्य थः । एतदेवो पसंह्‌रति- तस्मादित्यादिना । यस्येति । ञ्यङ्म्य- 
नाग्नो रसाद्यात्मनो विषयस्य । गुणालकारक्रतचारुत्वेति । गुणानां 


धये रसस्याङ्गिनो धर्माः शौर्यादय इवात्मनः । 
उस्कषहेतवस्ते स्युरचस्थितयो गुणाः ॥' [ का० प्र० ८ ] 
इत्यादि नीया सान्तादेव तद्धमंत्वात्‌। अरुकाराणामपि- 
| "उपकुवंन्ति तं सन्तं येऽङ्गद्वारेण जातुचित्‌ । 
हारादिवदृरुकारास्तेऽनुम्रासो पमाद्यः ॥' [ का० प्र० ८ | 
इव्यादिनीव्या शब्दार्थलन्तषणाङ्गातिदयद्वारेण तदु पस्कारकत्वात्‌ । अरुकाराणां च. 
रसादिरूपं ब्यङ्गथम्थमलंकुवंतां सुख्यया वृत्यारकारस्वम्‌ , अलका्यंसद्धावनिबन्धन- 


३२ अलङ्ारसवस्वम्‌ 


स्वात्‌ तस्य, रसाद्यारमन एव च च्यङ्गयस्यारंकायं्वेन प्रतिष्ठानात्‌ । अत एव च यत्र स्फुट- 
उय ङ्गयाथेरदहितत्वं तत्र गुणच्रस्या पुनस्तेषां वर्तिः रब्दाथयोमंता' |कऋ1°प्र०८ | इत्यादि नीव्या 
रब्दाथंमान्ननिवन्धनस्वे नोक्तिवि चिच्यमाच्रप्यंव सितव्वादेषां गौणमटंकारत्वस्‌ । यद्भि. 
आयेणंव च चित्राख्य काव्य मेद्‌ प्रकारत्वमलं काराणां निरूपयिष्यते । अत एवानुम्रासादयो- 
ऽरूकाराश्चित्रसिस्यायन्ये च्छम्‌ 1 सखे च प्रतीयमानोऽ्थों यद्यपि वस्त्वलंकाररसत्वेन च्रिविधः, 
तथापि [ तेन विना काव्यारमव्वाभावात्‌ | सुख्यत्वेन रसस्येवाव्मव्वं युक्तम्‌ । अतश्च 
वस्स्वरंकारयो यं दरुकार पच्तनिक्तिक्षव्वमन्येरक्तं तत्तावद्‌ास्ताम्‌ , काञ्याद्मनो रसस्य 
पुनररुकाररवमस्यन्तमेवावाच्यमित्याह- रसादय इत्यादि । आदिग्रहणाद्‌ भावतदाभासा- 
दीनां महणमस्न्‌ । न वाच्या इति । वक्तुमयुक्ता एवेत्यर्थः । अकाय स्यारंकारस्वाु पपत्तेः । 
तस्य चारकारत्वकथनेऽरकार्यान्तरं प्रसज्यते । तेन विनारुंकाराणामनुपपत्तेः। एतदेवो- 
पंहरति- तस्मादित्यादिना । व्यङ्गय इति रसादिरूपः । तस्येवो पक्रान्तस्वात्‌ । वाक्यार्थीभूत 
इति । अवाक्यार्थीभूतस्तु रखादिररुकारोऽपि स्यात्‌ । यदुक्तम्‌-- 
"प्रधानेऽन्यत्र वाक्यार्थं यत्राङ्गं तु रसादयः। 
काञ्ये तस्मिन्नरंकारो रसादिरिति मे मतिः ॥ इति । 


एतच्च रसवदायलंकारम्रस्ताव एव निर्णेव्यामः । इतिराब्दः प्रमेय परिसमाप्त । 
एतदेव युक्तमिव्याह--एष प्रेव्यादि । सवरेरिति । अवाक्याथविद्धिरसहृद यप्रायरिव्यथः । 
पक्षान्तरस्येति । तत्र तावद्वाच्यवाचकमाव्राश्रयिगामरकाराणां मध्ये व्यङ्गयन्यञ्जकभाव- 
समाश्रयेण व्यवद्थितव्वादस्यान्तभांवो न युक्तः । यदुक्तम्- 

। + व्यङ्गयव्यञ्जकसंबन्धनिवन्धनतया ध्वनेः । 
| वाच्यवाचक चारस्वहेव्वन्तःपतिता कुतः ॥' इति । 
लच्णायामप्यस्यान्तर्भावो न युक्तः । तद्सद्धावेऽस्य खद्धावात्‌ तत्सद्धावे चास्यासद्धा- 
चात्‌ ! यदुक्तम्‌--“अतिग्याेरथाव्याप्तेनं चासौ रुच्यते तया" इति । नाप्यस्यालच्षणीयस्वं 
युक्त 
“यत्रार्थः शब्दो वा तमर्थञ्युपसर्जनीक्ृतस्वा्थो । 
व्यङ्क्तः काव्यविदोषः स ध्वनिरिति सूरिभिः कथितः ॥' इति । 
तदिव्थमेतद्‌ वि प्रतिपत्तित्रयस्याप्रतिष्टानमुपपादि तम्ब । 

८ “वननयोतनादि ०” में आए ) आदि चन्द से प्रत्ययायन, अवगमन आदिनामकिषट जा 
सकते दहै । अवद्य अर्थात्‌ व्यंजनव्यापार कै विना व्यंम्य अथंका ज्ञान सम्भव नहीं। व्यापार 
( व्यापार प्रधान नदीं हो सकता अर्थात्‌ ) व्यंजनारूप जो क्रिया हं ( वह प्रधान नहीं हो सकती ) । 
वर्योकि क्रिया का अर्थं यहां साध्यमान क्रिया है ( पाकरोब्दादिप्रतिपाच सिद्ध क्रिया नदीं) ओर 
साध्यक्रिया एक के वाद एक करके अनेक अवयव हाते हं (जसे पचन क्रियाम(१) आग 
जलाना (२) अन्न चृष्दे प्रर चाना ओर (३) उतारना आदि ) इसङिए इसको अपने 
आपने कु नदीं जा सकता, ८ अन्न पकता है इसलिए उसके आधार पर हुए सारे 
अवयव समुदाय को पचन क्रिया कहना संभव दहै) रेसी स्थिति ( अन्नादि विषयों से 
निरपेक्ष दोकर पाकादि क्रिया) अपने आप मेँ वाक्याथ केसे कदी जा सकती १ इसी 
वात को यदीं करेगे मी कि व्यापार विषय कै द्वारा स्वरूपखाम करता हे, ओर उस 
[ विषय ] के प्रधाद होने पर दही प्रधानता प्राप्ठ करता दहै; अल्गसे उस | व्यापार |] पर विचार - 


त न 
_ क 


भसिका ३३ 


करना रूमव नहीं होता, इसलिए सारा दारमदार विषय प्र ही निभौर रहता है 1 उपस्कर्तव्य = 
( व्यंग्य उपस्कायं होता दै ओर गुण तथा अलंकार उपस्कारक यहां ) उपत्कायं का अर्थ 
दे युण तथा अक्कारो का व्यंग्य के किए होना जैसा किं ( आनन्दवधनाचा्थं ने ध्वन्यालोककारिका 
मे कदा हे )-- “ध्वनि वहां दोती है जहां अथं ओर शाब्द की सुन्दरता के ८ गुण अलंकार आदि ) 
विविध दहेतु इसके किए होतेहें(नकि यह उनके किट) इसी छिएट उस (व्यंग्य) अथैको 
ही विश्रान्तिाम कदा । आत्मत्व = सारभूतत्व, ओर इसङ्िट निष्कं यह निकला कि उस 
( व्यंग्य ) अथ के विना काव्य काव्य ही नहीं ह्यो पाता। ेसा कहीं नहीं देखा गया कि जीवात्मा 
से रहित शारीर का उपयोग (व्यक्तिकेसरूपमें) किया जाताद्यो। प्रदन यदिरेसाहै तो गंगा 
पर घोष” वाक्य भी कान्य होना चाहिए, क्योकि यहां भी रोत्यपावनत्वादि व्य॑ग्यार्थ है । उत्तर = 
जी नहीं । जिस प्रकार षटादिरूप शरीर मे आत्माका अस्तित्व (माना जाता है क्योकि 
आत्मा व्यापक हे तथापि जीव केवर उसी रीर को कहा जाता हे जिसमें आत्मा के अतिरिक्त 
इन्द्रिय प्राण आदि भी हो, घट आदि को नदी, उसी प्रकार व्यंग्य भी ( जीवात्मा के समान काव्य 
कौ ) आत्मा तभी माना जाता हे जव वह चिविध युण ओर अलंकार के ओचित्यपू्ण, अत एव सुन्दर 
राब्दाथरूपी ८ काव्य ) शरीर में प्राप्त दो, अन्यत्र ( गुणादिशल्य "गंगा में घोष आदि लोकिकं 
वाक्या म ) नहीं । इसङिए ( व्य॑ग्याथुक्त लोकिक वाक्य ओर उसके अथं कौ भी काव्य मानने 
का कोड दोष नहीं आता । 
व्यापारस्य विषयसुखेनः इत्यादि = इस राका के उत्तर मेँ कहा जा रहा कि “न्याकरण राख 
आदि में सवत्र व्यापारका ही प्रधान माना जाना प्रसिद्ध है किन्तु यहां विषय की प्रधानता 
वतका जा रही है "यह विषम मान्यता क्यों  विषयसुखेन जैसे पाकादि क्रिया पाकादि शब्द 
से तव पुकारी जाती हे जव वह भात आदि विषय म विकिलत्ति ( वह विक्रति जिसमे चावल भात 
रूप प्राप्त करता हे ) उत्पन्न करता है । तत्प्राधान्य = उसका अर्थात्‌ विषय का प्राधान्य । इससे 
यद सिद्ध होतादै कि व्यापार की प्रधानता मपचारिकं है स्वरूपेण = व्यापार (क्रिया) का 
स्वरूप तो साध्यमान हे, सिद्ध नही, अतः उस पर कोई निनंचन प्रस्तुत नहीं किया जा सकता १ 
क्योकि विचार सिद्ध वस्तु का होता है। 'विपयस्थैव मे “एव शब्द कै द्वारा व्यंजना = व्यापार 
का निराकरण किया गया । समग्रण्=सारा भार अर्थात्‌ आत्मा जीवित, जीवातु आदि सारे व्यवहारो 
को पचाने कौ क्षमता । इसका उपसंहार करते ह कहते है - तस्मात्‌ इत्यादि । यस्य अर्थात्‌ 
व्यग्यनामक-रसादिरूप विषय कां । गुणारकारक्ृतचारुत्व = गुण ( काव्यप्रकाराकारिका ८-)“आत्मा 
के रोय आदि धर्मो के समानजो प्रधानरसके धर्मे जो सदैव (रस मे चमत्कार का) उत्कषे 
ही करते है ओर (रस को छोड़ ) अन्यत्र नहीं रहते वे गुण कहलाते हे” ङस अनुसार साक्षात्‌ 
(न कि परम्परया ) रसधमं हैः । अलंकार भी ( काव्यप्रकारकारिका ८-- ) “रस यदि कान्यवाक्य 
से प्रतीतहो रहादहदो तोजो ( साक्षात्‌ नही अपितु) अंग (वाच्य आदि) केद्वारा उसका 
चमत्कार कदाचित्‌ ( सदा नहीं ) बढ़ाते है वे अनुप्रास उपमा आदि तत्व हार आदि के समान 
अलंकार कहलाते ह के अनुसार खन्द ओर अर्थं रूपी अगो मे विेषता लाकर उनके द्वारा 
( न फि साक्षात्‌ ) रसका उपस्कार कहते है । अलंकार तमी अलंकार कहलाते हे जव वेरस 
आदि व्यंग्य अथै कौ रोभा बढ़ाते है, क्यौकि अलकारौ का अलकारत्छ तभी संभव है 
जव कोई अलकायै हो ओर अलकायै केवल रसादि व्थंग्य अथं ही माने जाते है 
दसीटिए जहां कोहं स्पष्ट व्युष्य अर्थं नदीं रहता वहां अनुप्रास उपमा आदि शब्दं ओर) 
अथं तक सौमित रहते है, इसक्एि उनसे उक्तिमे हयी वैचित्य संपादित हो पाता फरतः 
उनमें अर्कारत्व ठीक उसी प्रकार ओपचारिकं ही रहता है जिस प्रकार ( कान्यप्रकाद्यकारिका 
२ अ० सर 


| 
| 
। 


== ` ज ) र 


क्वो ० = 


पः 


~ 


यदथा ~, _ । 2) ~ ~ ॐ = 


५. अल्ङ्कारसवेस्वम्‌ 


८ 1 ७१ (गुणनव्रस्या-इत्यादि के अनुसार ) रसेकधम युर्णो का नीरस काव्य मेँ गुणत्व । ओर 
इसी अभिप्राय ते अल्कारो को चित्र नामक (अधम) कान्यका भेद वतलाया जावेगा ¦ ओर 
अन्य ८ ध्वनिकार आदि ) आचार्यो ने मी अनुप्रास आदि को “चित्र कडा हे । 
वृह जो प्रतीयमान अर्थं है वह्‌ वस्तु, अरकार ओर रस इस प्रकार ययपि साना तो तीन 
प्रकार का गया है तथापि वस्तुतः रस को ही काव्यात्मा मानना उचित है क्र्योकिरस ही तीनों 
प्रतीयमानो में प्रमुख है। इसकिए वस्तु ओर अ्कारकोजो अल्कार कोरिमे रखने का प्रयास 
अन्य आचार्यौ ने किया है (देतो वह भी अनुचित चिन्तु यदि) उत्ते छोड भी दिया जाय तवमभी 
रस को तो अकार विलकुक दी नहीं कदा जा सकता । इस अभिप्रायसे कहते हे = ““रसादि 
इत्यादि । आदि पद भाव ओर रसभास तथा भावाभास आदि का सम्राहक है न वाच्याः = 
वाच्य कहना अनुचित हे क्योकि अल्कायं अलंकार नदीं हो सकता 1 यदि उसे अलकार कड दिया 
जाय तो अलंकार कोई ओर पदाथं को मानना दोगा, क्योंकि उसके विना अलंकार अलंकार नदीं कहे 
जा स्वगे । इसी का उपसंहार करते कुच कहते हे -- “तस्मात्‌? इत्यादि । व्यंग्य अर्थात्‌ रसादिरूप 
क्योकि विचार उसी काचल रहाहै। वाक्यार्थीभूत अर्थात्‌ जो रस आदि वाक्यार्थभूतं नहीं 
होते वे कदाचित्‌ अल्कार भी हो सकते हैँ जेसा कि ( ध्वनिकारिका २५ ) का दे-जदां प्रधान 
जओौर वाक्यार्थीमूत कोई अन्य तच्च हो ओर रस आदिअंगया अप्रधान 1 हमारे मतम उस 
काव्य मै रसादि को अलंकार मानना उचित दहे 1" इस विषय को हम रसवद्‌. आदि अल्कारौं 
कै प्रसतग मेँ तय करगे । इति-दाव्द है प्रमेय ( सिद्धान्त ) तत्व की पू्णेता का चोतक । यदी पर्ष ठीक 
है ठेसा कहते है--“ष एवः इत्यादि द्वारा । सवे: = सवो ते अर्थात्‌ उन सवने जो वाक्याथ का ज्ञान 
नदीं रखते अतः जो प्रायः सहृदयतादय्य हैँ । पक्षान्तरस्य दूसरे पश्च ( प्रतिष्ठित नहां हो पात्ति 
क्योकि उन पक्षौ ) मं प्रधानता है अल्कार कीजो अर्थं ओर राब्द तक सीमित रहतेहे जव कि 


व्यग्यपक्ष व्यंम्यव्यजकमाव पर निर्भर हं अतः उनमें व्य॑ग्यपक्ष का अन्तभाव सभव नदीं जसा कि 
{ ध्वनिकारिका १ में) कहा है-“्वनि व्य॑म्यव्यंजकरसंवन्ध पर निभेर है! उसका वाच्यावाचर्को 


कै दोभाधायक धर्मं अलंकार आदिमे अन्तभाव हो कैसे सकता दै लक्षणामें मी इसका 
अन्तभांव मानना ठीक नदीं क्योकि (रस आदि विवक्षितान्यपरवाच्यध्वनिमं) लक्षणा नहीं 
रहती किन्तु ध्वनि रहती है ओौर ८ लावण्य आदि रूढिलक्षणावाले जिन स्थल मं) लश्चणा रहती 
है वहां ध्वनि नीं रहती । जैसा कि ८ ध्वनिकारिका १। १४) में कहा हे--श्लक्षणा ध्वनि का 


लक्षणमी नहीं दो सकती व्योकि वैसा मानने पर॒ ( उपयुक्त ढंग सै ) अतिव्यास्नि ओर अव्याश्चि 
दोप आते हैं । किन्तु इसका यह अर्थं नहीं किया जाना चाहिए कि ध्वनिका लक्षण ही नहीं 


किया जा सकता क्योकि ८ ध्वनिकार आनन्दवधन “जिसमें चब्द दारा उसका लक्षण ) उपसजनी- 
कताथ होकर तथा अर्थं उपसर्जनीकरत दोकर उस प्रतीयमान अर्थं का प्रतिपादन व्यंजनापार 
ते करते है उस पिरिष्ट काव्य को विद्राज्जनों ने ध्वनि कहा दै ।?--इस प्रकार (कर्‌ दिया गया 
है)। इस प्रकार इन तीनो ८ अर्थात्‌ ध्वनि का अभाव, उसका लक्षणा आदि मे अन्तभाव ओर 
उसकी अलक्षणीयता ) अनुपपन्तियों का निराकरः प्रस्तुत किया गया हं । 


विमरिनी 


इदानीमन्योऽपि यः कथिद्धिप्रतिपत्तिप्रकारः कश्चिदुक्तः सोऽपि नोपपद्यते इध्याह-- 
यचित्यादि । 


अव ओर भीजो विप्रततिपत्तियां अन्य आलंकारिकों द्वारा प्रस्व॒त की गइदवे भीसिड नहीं 
होती इस तथ्य कै प्रतिपादन के लिए अगला ग्रन्थ “यत्तु” आदि प्रस्तुत करते हं । 


भूमिका ३५ 


| स्वेस्व | 
यत्त॒ उ्यक्तिविवेककारो वाच्यस्य प्रतीयमानं प्रति लिङ्गतया ज्य 
सनस्याल्ुमानान्तभौचमाख्यत्‌ तद्‌ वाच्यस्य प्रतीयमानेन सह तादात्म्य 
तद्ुत्पच्यभावादविचारिताभिधानम्‌ । तदेतत्छुच्ाग्रधिषणेः श्चोदनीय- 
मतिगहनमिति नैह धरतन्यते । 
व्यक्तिविवेककार ( महिमभद्र) नेजो वाच्य अथे कोदेत ओर प्रतीयमान अथ॑ को साध्य 
मानकर व्यजनान्यापार का अन्तभाव अनुमान में बतलाया है वह विचार कर की गई वात नहीं 
है क्योकि वाच्यका प्रतीयमान केसा नतो तादात्म्य संबन्ध ही है ओर उत्पायोत्पादकभाव 
संबन्ध । इस विषय पर॒ अत्यन्त सूक्ष्म प्रज्ञा वाले सहृदयो को विचार करना चादिए क्योंकि यह 
विषय अत्यन्त गहन दहै । इसी छक्िए हम इसका विस्तार यहो ( जहां ध्वनिं ओर उसके विरोध 
की आनुपंगिकमाञहे ) नहीं करते । 
विमरिनी 


ध्वनिकारानन्तरभावी व्यक्तिविवेककार इति वन्मतसिह पश्चान्निदिष्टम्‌ यद्यपि वक्रोक्ति 
जी वि तह्ृदयदुर्पणकारावपि ध्वनिकारान्तरभाविनावेव, तथापि तौ चिरन्तरसतानुयायि- 
नावेति तन्मतं पूवंमेवोदिष्टम्‌ । अनेन पुनरेतर्स्वो पन्तमेवोक्तस्‌ । अनुमानान्तभांवमिति । 
अनुमानरूपत्वमेवेव्यर्थः । आख्यदिति । खद्ाह-- 
'वाच्यस्तदनुमितो वा यच्राथोंऽ्थान्तरं प्रकायति । 
संबर्धतः ऊुतश्ित्‌ सा काञ्यानुमितिरिप्युक्ताः ॥ इति । 
अविचारिताभिधानमित्ि । इह लिङ्गरिङ्किनोस्तादार्यतदुत्पत्तिभ्यामेव तावरप्रतिबन्धो 
निश्चीयते । तन्निश्वयेनेव च साध्यसिद्धिः । अन्यथा हि साध्यसिद्धिनं स्यादव्यभिचारात्‌ । 
तत्र तादार्यं यथा त्तकस्वानिस्यस्वयोः । तदुत्पत्ति्यंथा वद्धिघूसयोः । वाच्यप्रतीय- 
मानयोः षुनस्तादार्म्यतदुत्पत्ती न स्तः ! तथाहि- ८ 


“निःरोषच्युतचन्दनं स्तनतटं निष्छंष्टरागोऽधरो 

नेत्रे दूरमनञ्जने पुरुकिता तन्वी तथेयं तजः । 
मिथ्यावादिनि दूति बान्धवजनस्यान्तातपीडागमा 

वापीं स्नातुमितो गतासि न पुनस्तस्याधमस्यान्तिकस्‌ ॥' 


इत्यत्र विधिना निषेधो निषेधेन वा विधिः प्रतीयते। न तस्य वाच्येन सह तादा- 
सम्यम्‌ । विरद्धत्वात्‌। नद्यभावो भावास्मा भावोऽप्यभावात्मा । नापि तदुर्पत्तिः । 
अभावस्य जन्यजनकत्वानुपपत्तेः । नापि निःदोषच्युतचन्द्‌ नादीनां विशेषणानां तद्न्तिक- 
गमनानुमापकव्वं युक्तम्‌ › तेषां स्नानादावपि सद्धावादनेकान्तिकत्वात्‌ ¦ एतच्च ध्वनि. 
कारेणादूपितत्वाद्‌ मन्थक्रता स्वकण्ठेन दूषितम्‌ । अत एवानेनान्या विप्रतिपत्तयो न 
दूषिताः । एतदिति । वाच्यस्य प्रतीयमानेन तादार्म्यतदुत्पस्यभावादि नेह प्रतन्यत इति 
व्यक्तिविवेकवि चारे हि मथेवैतद्धितस्य निर्णीतमिति भावः। 


न्युक्तिविवेककार ध्वनिकार ( आनन्दवर्धन ) के बाद हृए है इसकिए उनका मत यह ८ ध्वनि- 
कार के मतके ) वाद मे बतलाया जा रहा है। यदपि वक्रोक्तिजीवितकार ( ऊुन्तक ) तथा इदय- 


दद अनछङ्ारसवंस्वम्‌ 


दर्पणकार (भटनायक ) भी ध्वनिकार के वादके ही हैँ तथापि वे प्राचीन आल्कारिकों 
के. मतं के ही अनुयायी हैँ दसलिएट उनके मत ( ध्वनिमत के) पहले दही बतलादिए गष) 
इन्टोने ८ व्यक्तिविवेककार ने ) जो पूर्वोक्त मत प्रस्तुत किया हे वह उनक अपनी ही सुद दे) 
[ यचपि ध्वन्यालोक के तृतीय उचोत में भी अनुमान ओर व्यंजना के अभेद्‌ की चचां ह, तथापि 
स्वतन्त्र अन्ध के रूप में पदिरी वार प्रस्तुत करने कै कारण व्यक्तिविवेककार ही इस मत कै प्रवत्तेकं 
मान छिए जाते हँ ] 
अन॒मानान्ताव = व्यंजना को अनुमानरूप ही, आख्यत्‌--वतलाया दै जेसा कि कहा हं-- 
“वाच्य या उससे अनुमित अथे जहाँ दूसरे अथं का अनुमान किसी भी सवन्धसे कराते हें उसे 
कान्यानुमिति कहते हैँ 1” ( व्यक्तिविवेक- प्र १११; चौखंभा संस्करण-२ )। अविचारिता- 
भिधानम्‌ = विना विचारे कदी गदं वात । हेतु ओर साध्यका जो व्याक्षिसंबन्ध हं वह्‌ केवल्दोदही 
संबन्धो से निर्णीत दोतादै (२) तादात्म्य ओर (२) उत्पाद्योत्पादकत्व। व्याक्षिनिश्वयसे 
ह साध्यकी सिद्धि दोती दै। व्याक्चिनिश्चय के अभाव में साध्य कौ सिद्धि नदीं होती क्योकि 
वरदौ जदो व्यािनिश्चय नदीं रहता देव॒ व्यभिचरित ( साध्य से असवद्धभी ) रहतादै। दोनो 
संबन्धो मे से तादात्म्य जैसे--क्रतकत्व ( निर्मितत्व ) ओर अनित्यत्व का । ( जो बनाया जाता है वह 
निधित द्यी अनित्य होता है जसे घडा )। (८ जौर ) उत्पायोत्पादकत्व जेसे- धूम ओर अग्निम 
८ धूम = उत्पाच, जन्य, कार्यं ओर अग्नि उसका उत्पादकः, जनक, कारण ) । वाच्य ओर प्रतीयमान 
अर्थौ मन तादात्म्य है ओर न उत्पाचोत्पादकमाव । जेसे--दे दूतित्‌ श्चूठ बोलती है। लुञ्च 
अपने की पीर नदीं । तू उस अधम केपस्तथोडे ही गदथी। तू तो यहाँ से वावड़ी नहाने गई 
थी। देख तेरे ओंँचरों के उतार का चन्दन पूरी तरह ड़ गया दै, तेरे अधर कौ गेरू विंलतुल 
पुछ गई है, आखों का काजल आसपास से एकदम मिट गयां ओर तेरा परा-अंग पुलकित 
हो रहा है । यदा इस ८ नायकसंमुक्ता दूती के प्रति खिन्न नायिका की) उक्तिमें८( वापीसल्लान 
के) विधान (रूपी वाच्च अथे) से निषेध ओर (नायकके पास जनेके) निषेध (रूपी 
वाच्य अथं) से विधान ( व्यजनासे) प्रतीत होता हं। उस (व्यग्य निषेध या विधान) का 
वाच्य ( विधान या निषेध ) से तादात्म्य नहीं दे क्योकि दोनो परस्पर विरुद देँ । रेसा थोडे ही 
होता दै कि अमाव भावरूप हो जाय ओर भाव अभावरूप । न तो ( वाच्य से) उस ( व्यंग्य ) 
की उत्पत्ति ही होती ( अतः उनका उत्पाद्योत्पादकत्व संबन्ध ही हे ) परस्पर विरुद्ध ८ अन्योन्याभाव 
वाके ) पदार्थो मे ( उत्पाचोत्पादकत्वरूप ) जन्यजनकत्व नदीं रहता । न तो ननिदशेषच्युत- 
चन्दनत्वादि विशेषणो से “नायकान्तिक गमनः आदि का अनुमान ही हो सकता क्योकि वे विदघोषण- 
पदां ( नायकान्तिकगमनादि से भिन्न) वापीलान आदि सेभी संभव हैं अतः ( नायिकान्तिक- 
गमनादिसाध्योँ से) एेकान्तिकरूप से संबद्ध नही दे । परवन्तौ होने से) इस मत को ध्वनिकार ने स्वयं 
दूषित नहीं एहराया था इसक्िएट अन्धकार ने अपनी ओर से उसे दूषित ठहराया यह इससे 
सिद्ध है कि ग्रन्थकार ने अन्य मतोँ प्रर अपनी ओर से दोष प्रस्तुत नदीं किण । एतद्‌ = वाच्य 
का प्रतीयमान के साथ तादात्म्यतदुत्पच्यादिं संबन्धं पर यदौ कोद विस्तार नही करते क्योकि 
उसे हमने अपनी व्यक्तिविवेकटीका मे विस्तारपुवैक तय कर दिया दे ।' 
विमश्च--व्यक्तिविवेक पर संस्करतरीका श्यक्तिविवेकन्या ख्यानः मिलती है जो अल्कारसर्वस्वकार 

की ही रचना है । चिवेन्द्रम्‌ तथा चौखंभा सेच्पे व्यक्तिविवेकां मे यह दीका दौ हृदं है । हमने व्यक्ति- 
विवेक के साथ इस टीकाका भौ विमरिनी के दी समान हिन्दी अनुवाद कर दियाहे । इससे व्यक्ति 
विवेककार ने ध्वनिकार का मत जर्दौँ-जहाँ सदोष बतलाया हे वहाँ ध्वनिकार कौ ओर से स्पष्टीकरण 


| 
| 


| - ~“ ~ "ना काका चा वा का का का 


च 


भूमिका २७ 


देते हए व्यक्तिविवेककार के मत का खण्डन किया गया है। विन्तु यह टीका अपूणेही कपी है। 
““वाच्यस्तदनमितो वा” इत्यादि जो कारिका ऊपर उद्भध्रत है उस पर यह टीका पराप्त नदीं 
हे । वह प्रथम विमो मे उसके पदि दी खण्डित हो गईं हे । 

विमरिनी 


तदित्थं परपरिकल्पितसमारोपापसारप्रस्याख्यानेन प्राप्तप्रतिष्ठानो भ्वनिरित्याह- 
अस्तीप्यादि । 


इस प्रकार विरोधी आचार्यो दारा उपस्थित आरोपोंका निराकरण होने से ध्वनिसिद्धान्त 
प्रतिष्ठित हो जाता ह" यह वतलाते हए लिखते ह- 


[ सवस्व | 

अस्ति तावद्‌ व्यङ्ग्यनिष्ठो उयञ्जनञ्यापारः । तच व्यङ्गयस्य प्राघान्याप्रा- 
श्रान्याय्यां ध्वनिगुणीभ्रूतव्यङ्गचाख्यो द्धो काव्यभेदौ । अयज्गग्यस्यास्फुटत्वे- 
ऽदटकारवतस्वेन चिचाश्यः काव्ययेदस्ततीयः । तनोत्तमो भ्वनिः। तस्य 
दश्चणाभिघामूकत्वेनाविवक्षित वाच्यविवश्चितान्यपरवाच्याख्यौ द्धौ भेदो । 
आदयो ऽप्यथोन्तरसंक्रमितवाच्यात्यन्ततिरस्कृतवाच्यत्वेन द्विविधः । द्वितीयो 
ऽप्यसं टक्ष्यक्रमसंलक््यक्रमठयज्ञयतया द्विविधः । टठश्चणामूठ्ः शरान्द शक्ति 
मूल्यो वस्तुध्वनिः, असखंद्क्ष्यक्रमव्यज्गयः अथंराक्तिमूत्ो रसादिध्वनिः। 
संठक्ष्यक्रमव्यङ्गयः राब्दार्थोभयशक्तिमूत्छो वस्तुध्वनिर्टं कारभ्वनिश्चेति। तजर 
रखादिध्वनिरठकारमञ्नयं दशितः, काव्यस्य श्ज्गारप्रधानत्वात्‌ । शिष्टस्तु 
यथावसरं तत्रैव विभक्तः । गुणीभूतव्यङ्गधयो वाच्याङ्गत्वादिभेदैयेथासंभवं 
समासोक्त्यादो दर्तः । 


यह मानने मे अव कदं आपत्ति नहो कि व्यंजना (भी कान्य का एक स्वतन्त्र) व्यापार है 
जिसका प्रतिपा विषय हे ( प्रतीयमान ) व्यंग्य अर्थं । यह जो व्यंग्य अथं है वह (उसका चमत्कार 
कहीं ) प्रधान होता हे ओर ( कहीं ) अप्रधान फलतः ८ व्यंग्याथयुक्त ) काव्य केदोभेद हो जाते 
हे ( प्रधान होने पर ) ध्वनि ओर ( अप्रधान होने पर) युणीभूतन्यग्य । जिस काव्यम व्यंग्य 
अस्फुट ८ चमत्कारशुल्य › होता दै वह एक तीसराभेद भीहोताहे। उसे चित्र कहा जाता हे 
क्योकि उसमे अल्कारकी दही छया रहती है । इन तीनों म ध्वनिनामक कान्य उत्तमकाव्य होता 
दे । उसके लक्षण ओर अभिधा के आधार पर क्रमशः दो भेद होते ह ( लक्षणा के 
आधार पर ) अविवश्चितवाच्य ८ जिसमें वाच्य अपने स्वरूप से उपयोगी नहीं रहता ) ओर अभिधा 
यानी अभिधेयाथं के आधार परर ) विवक्षितान्यपरवाच्य ( जिसमे वाच्य अथं बदलता तो नीं 
विन्तु वह प्रधान नही रहता ) । इनमें से दूसरा ( विवक्षितान्यपरवाच्य नामक भेद ) असंरक्ष्य- 
क्रमव्यंग्य ( जिसमे वाच्य ओर व्यग्य की प्रतीति होती तो एक के बाद एक करके हे किन्तु लगती 
वेसी नहीं ) ओर संलक््यक्रयव्यंग्य ( जिसमे वाच्य ओौर व्यंग्य कौ प्रतीति एक के बाद एक होती 
हृदं ही प्रतीत होती है ) इस प्रकार दो प्रकार का होता हे । ( प्रथम ) जो रक्षणामूलक ध्वनि हे वह 
राब्दशाक्तिमूल्क ही होती दै ओर उसमे ध्वनि वस्तुरूपदही रहती है (रसया अल्काररूप 
नहीं )। ( दवितीय का प्रथम ) असंरक्ष्यक्रमन्यग्य ( नामक जो भेद है वह), अथैराक्तिमूलक 


न्क 1 


३८ अलङ्कारसवस्वम्‌ 


दोता ह जौर ( वाँ ध्वन्यमान अथं रस आदि स्वरूप ही होता है, ८ तथा द्वितीय ) संल्यक्रम- 
व्य॒ग्य ( नामक भेद ) दाच्दिराक्तिमूख्क मी होता दै ओर अर्थदाक्तिमूलक भी तथा उसे व्य॑ग्या्थं 
वस्तुरूप भी दोता दै ओर अल्ंकाररूप मी । इनमें से रसादिध्वनि अलकारमञ्जरी में दिखला 
दिया हे क्योकि काव्य में प्रधानता शगार कीदहै। शेष ( वस्तुध्वनि अलंकारध्वनि भी ) जदां-तदहां 
वहीं विभक्त कर दिया दे । ( यद्‌ हृदं ध्वनिनामक उत्तमकाव्य के भेदौ की र्चा, जहां तक ) युणीभू- 

तव्यंग्य (का संबन्ध है उसके) वाच्यांगः आदि (अनेक) मेद ८ होते दै उन्दै) समासोक्ति 
आदि ( अथांलकारोँ ) में ( ध्वनिकार आदि ने ) समासोवित आदि मे यथासंभव दरसा दिया ड 


विमरिनी 
. तावच्छब्दो विग्रतिपत्यभावचोतकः। अस्येव भेद निर्दर करतमाह--तत्रत्यादि । उ्यङ्ग्- 
निष्ठे ्यज्जनग्यापारे सत्यपीत्यर्थः । प्राधान्याप्राधान्येत्ति । यद्ुक्तम्‌-- 
'तरपरावेव शब्दार्थौ यच्र व्यङ्ग्यं भ्रति स्थितौ । 
ध्वनेः स एव विषयो मन्तव्यः संकरोज््ितः ॥` इति । 
तथा- 
“प्रकारोऽन्यो गुणीभूतव्यङ्ग्यः कान्यस्य दश्यते । 
तत्र व्यङ्ग्यान्वये वाच्यचार्व्वं स्यात्‌ प्रकषंवत्‌ ॥' इति । 


अस्फुटत्व इति । उयङ्गस्याविवच्ितत्वे सतीव्यथः । यदुक्तम्‌- 

(रसभावादि विषयविवन्ताविरहे सति । अलखकारनिवन्धो यः स चिन्रविषयो मतः ॥ 

इति । तत्रेति । च्रयनिधरिणे ¦ तस्येति, उत्तमस्य ध्वनेः । आय इति अविवक्तितिवाच्यः । 
न केवर ध्व नि्धिविधः यावत्तत्प्रभेदोऽप्ययं द्विविध इत्यपिशब्दार्थः । यदुक्तम्‌-- 

"अर्थान्तरे संक्रमितमव्यन्त वा तिरस्करतम्‌ । 
अविवच्ितवाच्यस्य ध्वनेर्वाच्यं द्विधा मतम्‌ ॥' इति । 

(तावत्‌' राब्द विप्रतिपत्ति के अभमावकाद्योतकदहे। ध्वनिक ही भेद वतरने के लिए कहते 
हे-^तत्रः अर्थात्‌ व्यंग्यनिष्ठ व्यंजनाव्यापार के रहने पर भी। प्राघान्याग्राधान्य = जहां किं 
( ध्वनिकार ने ) कहा है--“दाब्द ओर अथं जहां व्यंग्य कै प्रति तत्पर होकर ही स्थित दहो उसी 
( काव्य ) को ध्वनि का शुद्ध स्थल माना जाना चाहिए 1 ( ध्वन्यालोक-संयहकारिका उयोत- 
१ १० १३१ चोखभा सस्करण ), तथा “काव्य का एक ओर भेद होता दै जिसमें व्यंग्य (का 
चमत्कार , गुणीभूत रहता है गौर जहां व्यंग्य कै संवन्ध से वाच्य कौ चारुता वद जाया करती 
हं ।' [ ध्वन्यालोक ३।४० कारिका ]। अस्फुटस्व = अधात व्यस्य की विवक्षा का अभाव । जेसा 
किं कदा है-“रस, भाव आदि विषयों की विवक्षा न रख कर जां अलकार का निवेश किया जाय 
वह काव्य चित्रकाव्य कहलाता है । ( ४९७ प° ध्वन्यालोक संम्रहकारिका ) । तच्र यह पद काव्य 
के तीन भेदो के निर्धारण कै किए है। तस्य अर्थात्‌ उत्तम ध्वनि का। आद्य = प्रथम अर्थात्‌ अचिव- 
क्षितवाच्य । अपि (मी) शव्द का अ्थंहै कि केवल ध्वनिद्यी दो प्रकार की नदींहै अपितु उसके 
मभेद (भेद केभेद) भीदो प्रकार कैदं! जैसा किं कहा है--“अविवक्षितवाच्यनामक ध्वनि 
का वाच्यां दो प्रकार का रहता है अर्थान्तरसंक्रमित ८ उपादानलक्षणा द्वारा अपना रूप रकित 
रखते हए दूसरे अथं का परिग्रह करने वाला जैसे कमल तो कमल हीह वाक्य मेँ द्वितीय 
कमल ) ओर अत्यन्त त्िरस्छृत्र ( लक्षणलक्षणा द्वारा अपना स्वरूप बिलकुल छोड़कर दूसरे का 


रूप अपना लेने वाला, जैसे रातु से कथित “तुमने मैरा बहुत उपकार कियाः?-वाक्य में उपकार 


भूमिका ३९. 


जो अपकार अर्थं मे बदल जाता हे । अथवा “निःश्वास से अन्धा दपेणः"-मे दर्पण के ङिए प्रयुक्त 
अन्ध दाब्द का अथेः-ध्वन्यालोक-२।१ ) । 


विमरिनीौ 
द्वितीय इति विवचितान्यपरवाच्यः } यदुक्तम्‌- 
"अद्ंखचयक्रमो द्योतः कसेण द्यो तितः परः ¦ 
विवत्तिताभिधेयस्य ध्वनेरात्मा द्विधा सतः ।\ 
इति 1 अत्रेव वस्तुरसालंकाराणां ध्वन्यमानस्वं दश्ंयितमाह--रलक्षणेत्यादि । रक्तणा- 
मूख इव्यविवङ्तितवाच्यः। शब्द शक्तिम्‌ इति न पुनर्थंशक्तिमूरः। यदपि शब्दशक्ति- 
मूरेऽथंश्ञक्तिरप्य स्ति तथापि तत्र तस्याः सहकारितया व्यच स्थानसिति प्राधान्याच्छब्द्‌- 
शक्तिमररुत्वयुक्तम्‌ । एवमथ शक्तिमरत्वेऽपि ज्तेयस्‌ । वस्तुध्वनिरिति । रसारुकारव्यति- 
रिक्तस्य वस्तुमात्रस्य ध्वन्यमानस्वात्‌ । तच्रार्थान्तरसंक्रमितवाच्यो वरतुध्वनियेथा- 
°स्निग्धश्यामरूका न्तिछिक्चवि यतो वेज्ञद्‌ बराका घना 
वाताः शीकरिणः पयोदसुहृदामानन्दकेकाः कलाः । 
कामं सन्तु च्ठं कठोरहद्यो रामोऽस्मि सवं सहे 
वेदेही तु कथं भविष्यति हहा हा देवि धीरा भव ॥ 
दवितीय अथात्‌ विवक्षितान्यपरवाच्य । जेसा कि कहा है--“विवक्षितवाच्यः” ध्वनि का स्वरूप 
दो प्रकार का दिखाई देता हे एक असंलक्ष्यक्रमव्यग्य ओर दूसरा संलक्ष्यक्रमन्यंग्य 1 ( ध्वन्यारोक 
२।२ ) 1 यहीं वस्तु, रस ओर अलक्रारों की ध्वन्यमानता वतरने के लिए छिखते है-“रन्तणा" 
इत्यादि । कन्तणास्रुख = अथात्‌ अविवक्षितवाच्य । ऋब्दशक्तिमूरुक अर्थात्‌ अथंशक्तिमूरक 
नदीं । य्॒यपि यहां शब्द शक्ति से ध्वनि प्रतीति होती हे वहां अथशक्तिभी रहती ही है तथापि 
वहां उस ( अथं राक्ति) का सहयोगमात्र रहता दे अतः प्रधान होती है शब्द शक्तिही, फलतः 
नाम चन्दरक्तिमूलकः रखा गया हे । यही स्थिति अथद्चब्दराक्तिमूलक ध्वनि के नामकरणमें 
भी हे ( वहां शनब्दशक्ति अप्रधान रहती हे ओर नाम प्रधान के आधार पर दिया जाता हे = 
“प्राधन्येन व्यपदेशा भवन्तिः । ) वस्तुध्वनि अथात्‌ वहां रस ओौर अरुकार की नदीं, केवल 
वस्तु को ही ध्वनि होती हे। उनमें अथाँन्तरसंक्रमितवाच्य वस्तुध्वनि यथा--८ वियुक्त भगवान्‌ 
राम प्रावृट्‌ का मेधाडम्बर देख कर रहे हँ ) “क्िग्ध ओर दयामल कान्ति से आकाडरको लीप रहे 
तथा वकपुक्तियां के नृत्य से युक्त ८ दयामद्येतवर्णयोग से सुहावने ) मेध॒ उमडते आर, फुहार केकर 
( रीतर ¦ पवन वहं ओर मेधो के भित्र मयूरो कौ अआनन्दपूणं ख॒न्दर केका ( ध्वनि ) उठे, उठती 
रहे, भे तो अन्यत्य कठोर हृदय वाला हू, राम जो ठहरा, सव सहता जाऊंगा, सह लेगा, सह 
दो रहा दू; परन्तु इस समय ८ सुकुमारचित्त ) सीता की स्थिति क्यादोगौी। हदहाहा देवि; 
त॒म॒ौरज रखना, ( चल न वसना ' ।” यहां रामशब्द ^राज्यनिवांसन आदि असंख्य दुःख का 
पात्र होना” ध्वनित करतादैजो ८ न रसरूप है ओर न अल्काररूप सामान्य बात ( ३५९० 
€ ) हे अतः ) वस्तुरूप है । 
विमरिनी 
अत्र रामशब्द राज्य निवांसनायसंख्येयदुःखभाजनत्वस्वरूपं वस्तु ध्वनति । अत्यन्त 
तिरस्छृतवाच्योऽपि यथा- 
‹रविसंक्रान्तसो भाश्यस्तुषारावतमण्डलः । 
निःश्वासान्ध इवादजंश्चन्द्रमा न प्रकाशते ॥ 


९० अचङ्कारसवंस्वम्‌ 


सच्रान्धशब्द्‌ः स्वार्थं निमित्तीक्व्यादरशनसखाधारणविच्छायव्वादिधर्मजातं वस्तुरूपं 
ञ्यनक्ति रसादीति । आदिश्ञब्दाद्धावतद्‌ाभाखादयः । तच्र रसध्वनिय॑था- 
ह्वामाछिख्य प्रणयकुपितां धातुरागैः रिखाया- 
५ मात्मानं ते चरणपतितं यावदिच्छामि कतुम्‌ । 
जखेंस्ताचन्ुहुरुपचितेदृ्िराख्प्यते मे ऋरस्त- 
स्मिन्नपि न सहते संगमं नौ तान्तः ॥ 
अत्र विभावानुभावन्यभिचारिभिरभिव्यक्त एव रसः । 
अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य यथा--( देमन्तवणंन ) चन्द्रमा, जिसने अपनी सुहावनी कान्ति सूय 
मेडारुदी है ओर जिसका मण्डल ओससे धिर गयादै, रेसाल्ग रदा है जैसे फरक से अन्धा 
दपण 1 अन्ध डाव्द (का अर्दे द्देख न सकनाः ओर जहां यह रदता है वहां मलिनता भी 
रहती ही है फलतः ) अन्ध दाब्द ८ अपने अथं अदर्घन से लगी मछिनिता ओर रसे दी अन्य धर्मों 
को ध्वनित खरता दहै जो न रसरूप दै ओर न अलक्काररूप अतः ) वस्तुरूप हे । 
रसादि = आदि दाब्दं से भाव; रसाभाक्त भावाभास भावद्यान्ति, भावसन्ि; भावदावर्ता 
ओर भावोदय की ओर संकेत है इनमें से रसध्वनि जेसे--८( यक्ष च्छा मेघदूत में सदेद) भच 
वम्दारी तो प्रणयकुपित सुद्रा गेरू आदि से शिकाखण्ड पर वनालेताद्भ किन्तु जव अपनी स्वयं 
की चरणपतित मुद्रा बनाने चल्ता हतो वार वार उमडते जसू मैरी दृष्टिलीपदेतेदहें। विधाता 
इतना ऋरर हे किं चित्रलेखमें मी वह हम दोनों का समागम नीं सहता? । यहो ( यक् तथा 
भावादहित यक्षी ) विभाव, ( चित्रलेख; अश्रुपात, विलाप ) अनुभाव ( क्ररश्ब्द से विधाता कै प्रति 
व्यक्त अमषे आदि ) व्यभिचारी भावों से रस अभिव्यक्त हुआ ही । 


विमरिनी 


मावध्वनियंथा- 
“जाने कोपपराडमुखी प्रियतमा स्वप्नेऽय दृष्टा मया 
मामां सस्प्रह् पाणिनेति स्दती गन्तुं म्रवरृत्ता ततः। 
नो यावत्‌ परिरभ्य चाटुकशतेराश्वासयामि श्रियां 
आ्आतस्तावदहं शठेन विधिना निद्राद्रिद्रीकरतः॥' 
अत्र विधि प्रव्यसरुयाख्यो व्यभिचारिभावः । रसाभासध्वनियंधा- 
(स्तुमः कं वामाति क्षणमपि विना यंन रमसे 
विरेभे कः प्राणान्‌ रणमखञ्युखे यं शरगयसे । 
सुरूग्ने को जातः शशिञुखि यमाजिङ्गसि वरत्‌ 
तपरः कस्यैषा मद्‌ननगरि ध्यायसि तु यम्‌ ॥' 
अत्रानेककाञ्युकवि षयोऽभिराष इति रसाभासः । 


मवेध्वनि यथा--“भुञ्ञे स्मरण आ रहा मेने सपनेमें प्रियतमाको देखा है वह कौप से 
खंड फेरे हृए थी, वह वार वार सुज्ञ हाथ से रोक कर रोती इदं कह रही थी मुञ्चन दूना, न चछ्रूना 
ओर एसा कती हृदं मेरे सामने से हय्ने लगी थी । उस समय यु उपे मपनी छाती से चिपका कृर 
अनेक मीढठी ओर प्यारी बातों से मनाना था किन्तु वह कर ही नदीं पाया ओर दाठ विधाता ने मेस 
नीद छीन खी, उसमें भी मेँ दरिद्र ही रहा ।' यहाँ विध।ता के प्रति असूया नामक संचारी ८ रार- 
दराब्द से ) व्यक्त हो रहाहै। 


र केः क क ` क न 


भूमिका ७१ 


रसाभासध्वनि, यथा--( किसी पुश्चली से कों विट कह रहा है ) हे सुन्दराक्षि ! हम किसकी 
प्रयसा करं जिसके विना तेरा चित्त क्षण भर॒ नदीं लगता, युद्धरूपी यज्ञ मे किसने प्राण दिए 
( जो यज्ञ मेँ प्राणाति देता द वही इतना वड्भागौ होता कि उसे दुलंम सौन्दयं खलम रहता 
है ) जिसे तू खोजती रहती दै । अच्छी र्न में किसका जन्म हुआ है जिसका आक्गिन हे 
चन्द्रसखि ! तू वलात्‌ करती हं । हे कामनगरि ! किसको इतनी तपोमदहिमा है कित्‌ उसका ध्यान 
किया करती दे ।”› यदा एक नायिका का अनेक नायकं के प्रति अनुराग व्यक्तं हो रहा है अत 
यहां ( शगार फ रसाभास इ ( क्याकि यदो ङ्गार शृङ्गाररस जेसी स्थिति तक ह पहुंचता है, रस 
नदीं वन पाता )। 
भावाभासध्वनि यथा-( परसखरी पर॒ आसक्त कायुक चिन्ता कर रदा हे )-“व्ह ( उसकी खी ) 
कितनी खन्दर हे । उसका चेहरा पूणिमा के चन्द्रकी नांद खुडोर, गौर ओर दमदमाती कान्ति 
किए हे ) उसकी आंखे चचल दे, सुसकुराते योवन के अनेक विश्रम उसके अंग अंग में तरगित ह्यो 
रहे हं । तो क्या करं किस प्रकार उससे मेत्री करू । वह कोन सा उपाय हो सकता है कि वह 
मुञ्चे अपना ले यहं परसखीविषयक चिन्ता अनुचित हदं अतः यहं चिन्तारूपी भावाभास 
ध्वनि हे । 
विमरिनी 
भावाभासध्वनियंधा- 
राकासुधाकरञ्ुखी तराय ताक्ती सा स्मेरयोवनतरङ्धितवि्रमाङ्गी । 
तत्कि करोमि विदधे कथमत्र मेस्तरीं त्स्वीक्ृतिव्यतिकरे क इ वभ्युपायः 1? 
अत्रानौचिव्यप्रवृत्ता चिन्तेति भावाभासः । सावप्ररामो यथा- 
एकस्मिज्डयने पराङ्मुखतया वीतोत्तरं ताम्य- 
तोरन्योन्यं हृद यस्थितेऽप्यनुनये संर ्ततोगोरवम्‌ । 
दंपव्योः शनकरपाङ्गवरनामिश्रीमवचन्ञषा- 
अग्नो मानकः सहासरभसन्यादत्तकण्ठग्रहः ॥° 
>सूयायाः प्रज्ञम इति भावप्रशसध्वनिः। वस्तृध्वनिरलंकारध्वनिदचेति । तत्र दाब्द्‌- 
शक्तिमूको वस्तुध्वनियंथा- 
निवांणवंरदहनाः प्रशमादरीणां नन्दन्तु पाण्डुतनयाः सह माधवेन । 
रक्तप्रसाधितञयुवः त्ततविग्रहाश्च स्वस्था भवन्तु कुरुराजसुताः स्त्यः ॥' 
अच्र कौरवाणां चतशरीरादिकत्वं वस्तुरूपं शब्दशक्त्यैव प्रतीयते । स एवा्थंराक्ति- 
मूरो यथा- 
'अरूससिरोमणि धुत्ताणें अग्गिमो पुत्ति धणससिद्धिमओो । 
इह भणिएण णञंगी प्फुल्ञविरोअणा जा ॥ 
अथा्थंराक्त्या ममेवो पभोग्योऽयमिति वस्तु व्यज्यते । स एवोभयशक्तिमूरो यथा-- 
पथिअ ण एत्थ सस्थरसस्थि मणं पल्थरत्थरे स्गामे । 
उग्गअपओहरं पेक्खिञण जइ वससि ता वससु ॥ 
अत्र यद्‌ युपभोगक्तमोऽसि तदा आस्स्वेति वस्तु वकरोचित्यमाभ्चिस्य क्ञब्दार्थशवस्याभि- 
व्यञ्यत इव्युभयशक्तिमूख्त्वम्‌ । 
भावप्रशम यथा-- “एक हौ राय्या पर एक दूसरे खो ओर पीठ करके सो रहै, एक दूसरे का 
उत्तर देते हुए संह फुकाते जा रहै, साथ हौ चित्तम दूसरे को मनाने की इच्छा रहने पर भी अपना 


७२ अलङ्ारसवंस्वम्‌ 


गौरव रखनेमं ल्गे हए दम्पतीने च्याँ ही ओंख टेड़ी कर धीरे से एक दूसरे को देखना चाहा तो 
दोनो की ओं मिल गई तो तत्का मानक्द हट गया ओर दोनों के तिरछे कण्ठ हंसी के 
साथ पकभर मँ जुड़ गए ।” य असूया नामक संचारी भाव का प्रदाम (अन्त ) ध्वनित हे अतः यह्‌ 
म।वप्रसमध्वनि का उदाहुरणदहं। 
चस्तुध्वनि ओर अरूकारध्वनि । दोनों मं चान्ददयक्तिमूल्क वस्तुध्वनि का उदाहरण 
यथा-“रव्रुओं ( कौरवं ) के चिका से वेराग्नि जिनकी शान्त हो गई टै पेते पाण्डव श्रीक्रष्ण कै 
साथ आनन्द करें तथा कौरव प्रथ्वी को रक्तप्रखाधित वना क्षतविग्रह हो अपने सभी भरत्यो कै 
साथ स्वस्थ हो जावे । (यहां रक्तग्रसाधित्ः क्षतविग्रह आर स्वस्थ याब्द व्यथंक हैँ । [रक्त अर्थात खून 
ते सवारी हं पृथिवी जिन्द।ने तथा अनुरूप आर सजी स्वरौ हं पृथिवी जिनकी, क्षत हे विह 
युद या दारीर जिनका तथा स्वस्थ = स्वगस्थया दारीरसे ठीक) यर्दा शरीर की क्षत्ति आदि 
अथ वस्तुरूपदहाइ अर्व उन्दद्य।क्ती ते दो प्रतीत हीते दहं ( क्याकि यरद शब्द वदले नहो जा 
सकते ) । अ्थ॑दाक्तिमूलक वस्वुध्वान यथा- 
अल्सञ्चिरोमणिरधर्तानामय्रणीधेनसग्रदधिमयः । 
इति भणितेन नतांगी प्रफुल्ख्विलोचना जाता ॥' 
अर्थात्‌ ( उपमाता ने जव ल्ड़्की से कहा किं ) वह ( तुन्दारे छिए निधारित लडका आकसियः प 
द्विरोमणि है, धूर्तो ( ज॒जाडी या धोखवाज)। ) मं अशुजआ हं अ।र धनसग्रद्धि से मरपूर है “तो 
इस कथन से उस नतांगी की आख खिल उटीं 1 यह यह वात ( वस्तु) ध्वनित होतीहै किं 
वह पुरुप एकमात्र उसी नतांगी तक सीमित रहेगा । 
उभयराक्तिमूक्क वस्तुध्वनिं यथा-- 
“पथिक नात्र खस्तरमस्ति मनाक्‌ प्रस्तरस्थले ग्रामे । 
उदगतिपयोधरं प्रेक्ष्य यदि वससि तद्‌ वस ॥* 
अर्थात्‌ ८ स्वयं दूती की उक्ति ) दे पथिक ! यदौ विचछछौना थोडाभी नदींहे ओरगोँवकी 
जमीन भी पथरीटी हे । उठे पयोधरो कौ देखकर ठदरना चादो तो ठहर जाओ” यहां यह वात 
( वस्तु ) ध्वनित होती दं कि ध्यदि तुम ( पथिक ) उपभोगक्षम दातो यदं ठ्दरां “यह ध्वनि 
बोल्ने वाटे कै विषय में यह विदित होने सेदहोती दै कि वह चपले ओर यहाँ नतो (पयोधरः 
दाब्द वदला जा सकता ओर न अन्य सभी अधं अतः यह ध्वनि शाब्दा्थांमयराक्तिमूखक है । 
विमरिनी 
शव्दशक्तिमूखोऽरंकारध्वनिर्यथा-- 
“उन्नतः श्रोज्ञवद्धारः कालागुरूमटीमसः । 
पयोधरभरस्तन्भ्याः कं न चक्रेऽभिखाषिणस्‌ ।+ 
अत्र शब्दक्णक्त्या मेघरुचणमर्थान्तरं प्रतीयते । प्रक्रताप्रक्रुतयोशधाथयोरसंबद्धामिधा- 


चिष्वं मा प्रसाङ्कीदिति तयोरौपम्यं कल्प्यत द्स्यलंकारध्वनिः । स एवार्थ॑शक्तिमूो 
यथा- 


तं ताण सिरिखहोअररअणाहरणम्मि हिअअमेकरसं । 
विंवाहरे पिणं णिवेसिअं कुसुमबाणेन ॥* 
अत्र कौस्तुभविम्बाधरयोः केवखयेवार्थ्ञकत्यौपम्यं गम्यत इव्यर्थलक्तिमरोऽलकार- 
ध्व निः । उभयश्क्तिमूरो यथा-- 
'जणहिअअविद्‌!रणणए धारासलिरुट्धुङिए ण रमद्र तहा । 
तव दिष्टी चिउरभरे पिजाण जह वैरिखश्गम्मि॥+' 


भूमिका द 


अन्नोभयशक्त्या चिङुरभरखडगयोरोौ पस्यं गस्यते । इति शब्द्‌ः प्रमेय परिसमाप्तौ । 
एवं ध्वनेः प्रभेदजातं प्रदश्यं कमग्राक्तं युगीभरूतव्यङ्गयस्याप्यन्यतो योजय ति--युणीभूतेत्या- 
दिना । दरित इति ध्वनिकारेण । यद्‌ाह- 
व्यङ्गस्य यच्नाप्राधान्यं वाच्यसमाच्नराद्ुयायिनः। 
समासोक्त्याद्‌यस्तच्न वाच्यारक्कतयः स्फुटाः ।1 इति ॥ 
एवं गुणी ूतग्यङ्गयस्याप्यन्यतो भेदजातं योजयित्वा चित्रस्यापि प्रभेदजातं दर्शयित- 
माह~-चित्रमित्यादि । 
राब्द शक्तिमूकक अलंकारध्वनि यथा--'उस तन्वी के खूव उमरे पयोधरो ने किसे साभिलाष 
नहीं वना दिया । पयोधर उन्नत, प्रोल्लसद्धार ओर कालागुरुमलखीमस जो है । ८ पयोधर = 
स्तन तथा मेष, ग्रोट्लसद्धार = प्रोद्लसित हो रहे दे हार जिनपर रेसे-स्तन, प्रोट्लसित हो रही है 
धारां जिनमे रेसे = मैव; कालायुर्‌ से कृष्ण = स्तन, कालायुरुवुल्य कृष्ण = मेव । यहाँ स्तन 
प्रस्तुत हें मेध अप्रस्तुत ओर पयोधर आदि राब्द वदल देने पर मेषपक्ष की प्रतीति नदी होती 
अतः यद्य ) चब्दशक्ति से.८ ही ) मेघरूप अप्रस्तुत अथंकी प्रतीति होती है ओर स्तन तथा 
मेधो मेँ उपमानोपमेयभाव मानना पड़ता है अन्यथा दोनों अथे असंबद्ध पड़ रह सकते है जिससे 
वाक्यमेदनामक दोप हो सकता है । वाच्यस्थिति सं अल्कार माना जाने वाटा यह ) उपमानो- 
पमेयभाव व्यंजना द्वारा प्रधानरूप से ध्वनित होता हे अतः यदहो अलंकारध्वनि हे । 
अल्कारध्वनि ही जो अर्थदाक्ति से ध्वनित होती हे यथा-- 
“तत्‌ तेषां श्रीसदहोदररध्नाहरणे हृदयमैकर सम्‌ । 
विम्बाधरे भ्रियाणां निवेशितं कुसुमबाणेन ॥? 
अथात्‌ = “उन ( राक्षसो ) का ( ससुद्रमन्धन से उत्पन्न रत्नों मेँ से) श्रीसहोदर ८ श्री = 
लक्ष्मी के साथ उत्पन्न होने से उसका सोदर ओर सुन्दर होने से भी श्री = शोभामयी लक्ष्मी का 
सहोदर ) रत्न ( कोस्तुम ) किसी भी प्रकार इड़प केने मे सर्वात्मना सन्नद्ध हदय उुखुमबाण ने 
प्रियाओं के विम्वाधर पर लगा दिया ।' यहौँ कौस्वभमणि जौर अधरोष्ठ कः तुल्यता अपरिवत्तनीय 
अधं से प्रकट होती हे अतः यहाँ अथ॑दाक्तिमूर्क ही अल्कारष्वनि है ८ शब्द तो यहं कोड भी 
रखे जा सकते हे ) । 
उभय-( राब्दाथं ) शक्तिमूलक यथा-- 
(जनहदयविदारणके धारासलिल्ललिते न रमते तथा । 
तव॒ दृष्टश्चिकुरमरे ्रियार्णा, यथा वेरिखड्गे |: . 
अधात्‌ तुम्हारी इष्टि जनो के हृदय बिदारित करने वाके तथा धाराजल से लक्िति ( केरा- 
पाररापक्ष मं धारासछिक = नदी आदि कीधाराका जक, खड्गपश्ष मे--उसकी धार का पानी-- 
प्रियाओ के केदापाँ मे उतनी नदीं रमती जितनी वैरि के खड्गो मे! यह ( धारा. 
राव्द अपरिवत्त॑नीय है, शेष वदे जा सकते हैँ अतः ) शब्द ओौर अथं दोनों की राक्तियो से 
खड्ग तथा प्रियाकेडो की तुलना चोतित होती हे । 
दसके वाद जो इति राब्द हे उसका अथ है प्रतिपा् तत्र के प्रतिपादन की समाधि । 
दस भ्रकार ध्वनि कै प्रभेद दिखलाकर उसके वाद्‌ अने वाङ गुणीभूतव्यग्यकेमी भेदो का 
अन्य मन्थो मे संकेत देते हुए छिखिते दै--गुणीभूतव्यंग्य आदि । दशितः दिखला दियादहे 
अथात्‌ ध्वनिकार ने । जेसा कि ( ध्वनिकार ने ) कहा हे-- 


ज 


2 अचज्ञरसवंस्वम्‌ 


। 
। 


“जँ व्यंग्य अप्रधान रहता टै, अर्थात्‌ वह्‌ केवर वाच्य कै पीछे चलता दै वौं समासोक्ति 
आगिदिअर्थालंकार ही होते दै 1 ८ ध्वन्या० संय्रहकारिका उचो त-१ पृष्ठ० १३० चो० सं० १) इस 
प्रकार गुणीभूतव्यग्य वे मेद भी अन्यत्र दिखला दिए । 

अव चित्रकाव्य के भेद भी दिखलाने कै लिए लिखते हे 


| [ सवंस्व ] 
चिं तु रब्दाथीटेकारस्वभावतया वहुतरघ्रमेद्‌म्‌ । तथा दि-- 
[ श्च्म्‌ १ 1 इहाथेपो नरुक्त्यं शब्दपौनरुक्त्यं शब्दाथं पौनरुक्त्यं 
चेति त्रयः पोनस्क्त्यप्रकाराः ॥ १ ॥ 


आदौ पौनरुक्त्यप्रकाश्वचनं वक््यमाणाटंकाराणां कश्चाविभागघटना- 

थेम्‌ । अथीपेक्चया शब्दस्य प्रतीतावन्तरङ्गत्वेऽपि प्रथममथेगतधर्मनिर्देश- 
श्चिर॑तनप्रसिद्धचया पुनरुकवद्‌ाभासस्य पूवं दक्षणाथेः । इटशाब्दः प्रस्थाने । 
इतिराब्दः प्रकारे, जिशब्दादेव सख्यापरिसमात्िसिद्धः । 

चित्रनामक जो काव्यभेद्‌ हे वहु तीन प्रकर काट शब्दाल्कारस्वरूपः;, अधांल्कारस्वरूप तथा 
उभयाटकारस्वरूप । इसके प्रमदां की संख्या वहत अधिक दै । जेसे- 

[ सूत्र ] “यहीं (कज्य मेँ) पौनरूक्त्य क तीन भद्‌ होते दै-(१) अर्थपौ नरकस्य (२) 

दाव्द पौ नङ्क्त्य तथा (३) शब्दार्थं ( उभय >) पौ नक्क्त्य ॥ १ ॥ 

[ वृत्ति ] (अल्कारो कै निरूपण कै) आरम्भ सें पौनरुक्त्य के मेदो के निरूपण का प्रयोजन दै-- 
( इसके ) अगे निरूपित किए जाने वाके ( पुनरुक्तवदाभास आदि पाच पौनरुक्त्यमूरकं ) 
अलंकारो का कक्षाविमाग ८ अथे, रइाब्द ओर उभयगत रूप से विभाजन ) करना हे । 

प्रतीति मेँ शाब्द अथं की अपेक्षा अन्तरंग है ( काव्य में दाब्द काज्ञान पदिक होताटै ओर 
अथंकावाद में) इसलिए चब्दगत पनरुक्त्य का उल्लेख पिले होना चाहिए तथापि ) अथंगत 
धर्म ८ पौनरक्त्य ) का ( पिले ) निर्देश प्राचीन ( उद्धयादि ) जल्कारिक आचार्यौ के समान 
( अ्थंगत पौनरुक्त्य पर निभैर ) पुनरुक्तवदाभास का लक्षण ( रान्दारुकारो की अपेक्षा ) पिके 
करने के किए किया गया हे । 

इह -( य्टाँ- ) शब्द ( कान्य- ) प्रस्थान के किए प्रयुक्त हे ( क्योकि अलंकार कान्य के हयी 
धर्मं हे ) । इति ( इस प्रकार- ) खब्द्‌ ( समा्चिवाचक नदीं ) प्रकार.( मेद्‌- ) वाचक है, क्योकि 
सख्या की समाधि ( पत्ति ) त्रि-( तीन- ) शब्द से ही चटी आती हे 

विमरिनी 

तशब्दः काव्यप्रकारद्वयादस्य वैलक्तण्यद्योतकः । अत एव बहुतरप्रमेद्मि्युक्तम्‌ । 
शाब्दार्थस्येक रोषः । तेनो भयालंकाराणामपि ग्रहणम्‌ । तदेव दशंयितुमाह-तथाहीत्यादि । 
चित्राख्यकाव्यमेदनिरूपणावसरे किं पौनङ्क्स्यग्रकारव चनेनेव्याशङ्कयाह-आदावित्यादि । 
वक्ष्यमाणालंकाराः पुनर्ूक्तव दाभासाद यः पञ्च । शब्दप्रतीतिपुरःसरीकारेणाथेप्रती तिरिति प्रथमं 
छढ्दगत एव धमंनिर्दैशे न्याय्यो नाथंगत इषव्याशङ्कयाह-अथं त्यादि । चिरतन प्रसिद्धे ति । 
न पुनय मानतयेति भावः । 'पुनरुक्तवदामासं छेकानुप्रास एव च इति चिरंतनप्रसिद्धिः । 
अर्थारुकारस्वादुर्थालंकारभ्रकरणे पुनरस्य युञ्यमानत्वम्‌ । नन्वादौ शब्दगतो, धर्म॑निर्दैशः 
कार्यः पश्चादुर्थगत इति कमस्य न किंचिस्प्रयोजनमुत्पश्याम इति किं तेनेति यदन्ये रक्तं 


भूमिका ७८ 


तदयुक्तम्‌ 1 शब्दार्थयोः मेणैव प्रती तावव भासनात्तथास्वेनेव धर्मनिर्देशस्यो पपत्तेः किं च 
'वधंमा नोर्कर्षाणि शाखाणि प्रथन्ते इति नीत्या परिसितचमत्काराणामर्थांङकाराणां 
पश्चान्निदंश्ः कायं इति सप्रयोजन ख्व क्रमः। चिरतनसमतानुल्लङ्गनेन च वयं घ्रच्त्ता 
इष्य युक्तमपि मन्थता तन्मतमाध्चितस्‌ । अग्रेऽप्यनेनाशयेन तन्मताश्रयणं करिभ्यत्येव । 
तेन वयं यच्चिरंतनमताश्रयणं व्याख्यास्यासमस्तद्क्तमेव । 
राब्द ( ध्वनि ओर युणीभूतव्यंग्य इन ) दोनो काव्यप्रकारो से इस ( चित्र काव्यप्रकार ) कौ 
विलक्षणता ( विद्धेपता ) कायोतक दहं इसीलिए कहा कि इस ( चिच्रकाव्य)के मेदो की सख्या 
अधिक हे दाब्दार्थपोनरुक्त्य मे शाब्दाथदाब्द में एकदोष समास है [ अर्थात्‌ इसका विग्रह 
इस प्रकार होगा राब्दश्वाथदचेति राब्दार्थो, राब्दश्च ( तत्सहितः ) अथंदचेति राब्दार्थो, राब्दाथों 
राब्दार्थां चेति रखाब्दार्था, अथात्‌ एकवार अल्ग॒ अलग राब्दाथे का समासमात्रगत जोड़ा = 
दाब्दार्थो, दूसरी वार मिले हए शब्दां का जोड़ा, दोनों जोड के वाचक दो “शब्दाथशब्दोँ”” का 
पुनः समास ओर उसमे एकमात्र का वचना] उस्र ( एकशेष समास) से उभयाल्कारो का 
ग्रहणमभी हो जाता ह उसी को दिखलने के किए ल्खिना आरम्भ करते है “तथा हि = जेसेःः- 
इत्यादि । (सूत्रकारने तीन प्रकारके पौनरुक्त्य का निरूपण पहर किया उस पर प्रन 
उठा कि-) प्रकरण तो था चित्रनामक काव्य के मेदो के निरूपण का, उसमें पौनरुक्त्य कै भेदो कौ 
चचां क्यो १ इस पर उत्तर देते हए लिखते है आदौ = पह, आरम्भमे इत्यादि । वच्यमाण 
अरुकार अथात्‌ पुनरुक्तवदाभास आदि पाँच अलंकार । राकाः-अथं की प्रतीति दाब्द की 
प्रतीति को आगे करके होती है इस किए पहले राब्दगत धर्मौ काही निर्देश उचित था, नकि 
अर्थगत धमो का, उत्तर = अथः इत्यादि । चिरंतनप्रसिद्धि = भाव यह कि प्राचीन आलरकारिकों में 
पुनरुक्तवदाभास काही निरूपण पहले किया जाता रहदाहै इसलिए हम मी यदहोँउसीका 
निरूपण पहले पहल कर रहे हं इसकिए नहीं किं उसी का निरूपण पहले किया जाना उचित 
दे । धिरतनप्रसिद्धि के लिए (उद्धर के कान्यालकार-सारसंग्रह की प्रधम कारिका = ) “पुनरुक्त 
वदाभासं छेकानुप्रास एव च” ˆ की जा सकती हे ) । वस्तुतः पुनरुक्तवदाभास अथं का अलकार है 
इसक्ए इसका निरूपण अथांल्कारप्रकरण में होना उचित था | 
कुछ रोग टेसा कहते हेँकि श्ाब्दके धर्मोकादी निर्दर पहले होना चाहिए, अर्थक 
धर्मा का वाद में, यह जो क्रम है यह निरथैक दहै, उलटा क्रम भी अपनाया जा सकता है, उसमें 
भो कोड दानि नहीं दीखती 1 किन्तु उनका यह कहना तथ्यद्युन्य है । क्योकि राब्द ओर अर्थ॑की 
प्रतीति क्रमसेदही होती हे ( ओर उसमें राब्दकी दही प्रतीति पहले होती है) अतः उसी क्रमसे 
धमनिदंद करना ठीक रहता है । ओर क्रम साधेकभी है वयोंकि “दाख वे प्रसिद्ध होते हेः जिनमें 
उत्कपषे वदता जाय” ( उत्तरोत्तर अधिक महत्व का विवेचन प्रस्तुत करने वाके शाख बढते ओर 
प्रसिद्ध होते हे ) इस व्यवहार के अनुसार अथांल्कारों का ही निरूपण बाद्‌ में किया जाना चाहिए 
कयाकि उन्दौं मे ( अपेश्षाक्रत अधिक ) चमत्कार होता है । जहौ तक हमारा संबन्ध है हम 
( अल्कार सवेस्वकार ) प्राचीन (उद्भटादि) के मत का उल्ल्घन विना किए ही अपना मन्थ बना रहे 
हेः इस भावना से मन्थकार युक्तिविरुदध होने पर भी प्राचीनो काक्रम दी यहाँदेरहेहैं। इसी 
भावनासे प्रेरितदहोवे अगे भी प्राचीनां के मत अपना कर ही चल्गे। इसल्एिञअगेमीहमजो 
प्राचीना के मतके ही अनुसार व्याख्या प्रस्तेत करेगे वह गलत नहीं होगा । 


विमरिनी 


एतदेव यथोद्‌ देशं निणंतुमाह-तत्रेव्यादि । 
अव इसी ८ पौनरुक्त्य ) को नामिदं शक्रम से एक एक करके बतलाना आरम्भ करते है- 


1.4 अल्ङ्ारसवंस्वम्‌ 
| | [ सवेस्व | 
| [० २] तत्राथंषोनरूक्त्यं प्ररूढं दोषः ॥ 


॥ परूढाभरूढत्वेन दैविध्यम्‌ । परथमं देयवचनसरुपादेये विश्चान्त्यर्थम्‌ | 
| तच्चेति चयनिघोरणे । यथावभासनविश्रान्तिः असोः 1 

[सू० २] उन [ तीर्न पौनर्क्स्य | में प्ररूढ अर्थपौनस्क्स्य दोष होता दै ॥ 

[ वृत्ति ] = 4 जथैपौनरक्त्य ) दोःप्रकारका होता दै प्ररूढ ओर अप्ररूढ। [ इनमें से] 
आरम्भ मे त्याज्य [ दोषस्वरूप प्ररूढ पौनरुक्त्य ] का कथन उपादेय [ अलंकारस्वरूप अगप्ररूढ 
पौनरुक्त्य ] से [ निरूपण की ] समाधि करने के किणि किया गया । तत्र-दाव्द तीन [ पौन- 
रुक्त्य | मंसे [ एक प्ररूढ फे ] निधारणके छिणरहै। [ प्ररूढ में] प्ररोदका अर्थं है “आरम्भक 
प्रतीतिं के समान ही अन्तिम प्रतीति का दोना" [ अर्थात्‌ पदाथ ओर वाक्यार्थं दोनों की प्रती- 
तिओं का एकरूप होना ] । 


विमटिनी 

किमलंकारप्रस्तावे दोषकथनेनेव्याल्ञङ्कयाह--प्रथममित्यादि । उपादेय इत्यरंकारस्व- 
ख्पे ! यथेति । यथेव दृष्टस्तथैव पयंवसित इव्यर्थः ! यथा- 
हरिणनयनां खारङ्गात्तीं ङुरङ्गविलखोचनां कमरुवद्‌ नां राजीवास्यां सरोजपसाननाय 1 
विटलल्तिकचां चञ्चत्केश्ीं चरचिकुरोत्करां सुरतविरतौ संभोगान्ते विखोकय कामिनीम्‌ 

अन्र सारङ्गाक्षीमिव्यादिषु पुन्चनं प्ररूढम्‌ । अप्ररूढ पुनररंकारः । 

न चेतावतेव दोषाभावमात्रेणाकंकारव्वमस्याशङ्कयसर्‌ , वच्यमाणनीव्यारंकारस्वो- 
चितस्य विच्ित्तिविरोषस्यापि भावात्‌ ! तदेवाह--आसुचेत्यादि । 

“अल्कार के प्रसंग में दोष ( प्ररूढ अथैपौनरुकरत्य ) का कथन क्यो कियाजा रहा दैः- 
इस दाका का उत्तर देते हुए कहते दै -- प्रथम = आरम्भ में इत्यादि । उपादेय अर्थात्‌ अलंकार । 
यथा! “जेसा लगा वैसा हयी ठहरा" । उदाहरण- 

सुरतपृत्ति ओर संमोगसमा्ि मेँ कामिनी को देखो । उस समय वहं हरिण-नयना, सारगाक्षी 
ओर करगविखोचना, कमल्वदना, राजीवास्या ओर सरोजसमानना तथा विङलितकचा, 
च॑चत्केदी ओर चलच्िक्रुरोत्करा प्रतीत होती है । [ य्ह हरिण, सारंग ओर कुर्ग; नयनः, 
अक्षि ओर विलोचनः; कमल, राजीव ओर्‌ सरोज; वदन, आस्य ओर आनन; विठुकित, चचत्‌ 
ओर चलत्‌ तथा कच, केदा ओर चिकुर राव्द एकार्थक हें ] यहो सारंगाक्षी इत्यादि पदों में 
पोनरक्त्य प्ररूढ [ आरभ से अन्त तक एक सा वना रहता ] दै । जो पौनरुक्त्य अप्ररूढ रहता है 
वह अल्कार्‌ माना जाता दे । 

| किन्तु इनके [ प्ररूढ होने ] मात्र से यह नदीं मानना चाहिए कि यह ( अर्थपौनरुक्त्य ) 
| दोषाभावमात्र है जौर यदी इसका अलंकारत्व है” क्योकि इसमें अलंकारोचित विद्िष्ट सौन्दर्य 
| भी अमी यदीं बतलाया जाने वाला है 1 उसी को वताते दै-- 


[ खवेस्व ] 


[घ ३1 आष्खावभासनं पुनः पुनरुक्तवदाभासम्‌ ॥ 
 आसरुखग्रहणं पयंवसनैऽन्यथात्वग्रति पच्यथेम्‌ । लक्ष्यनिर्देदो नापुंसकः 


पुनरुक्तवदाभासः 8७ 


संस्कारो क्छोकिकाटठंकारवेधर्म्यण काव्यालंकाराणामटंकार्यपारतन्ञ्यध्वन- 
नाथेः । अ्थंपौनरुक्त्यादेवा्थाधितत्वादरथीटंकारन्वं केयम्‌ । । 
परभेद्‌स्तु विस्तरभयानोच्यन्ते । उदाहरणं मदीये श्रीकण्डस्तवे यथा- 
'अदहीनसु जगाघीदाव एुवंयकङ्कणम्‌ । 
दोादिनन्दि चरितं क्षतकंद प॑दपंकम्‌ ॥ 
त्ष पुगवलक्ष्माणं शिखिपावकलोचनम्‌ । 
ससखथेसङ्गले नोमि पावंतीसखमीश्वरम्‌ ।: 
'दाख्णः काछ्तो जातो भस्मभूतिकरः परः । 
रक्तरोणाचि ख्वण्डः पातु वः पावकः डिखी ।१ 
'सुजगङकण्डट्रौ व्यक्तराशिद्ाश्नांद्युशीतशुः। 
जगन्त्यपि सदापायादव्याच्वेतोहरः शिवः ॥\ 

[ सूत्र-२ | किन्तु [ केवर | आरम्भ [ मान्न ] में भासित होने वारे [अर्थ-पौ नस्क्व्य- 

तो पुनस्क्तव दाभास [ अरूकारभूत पुनरुक्त पद | हें । 

[ इत्ति | [ सूत्र मं | आसुख खनब्द का ग्रहण पयेवसान [ अन्त] में भिन्नता [ पुनर।क्त के 
अभाव काज्ञान करानेके किष किया गया । लक्ष्य [ पुनरुक्तवदाभासके नाम] निदेदामें 
| पुनरुक्तवदाभासराब्द के साथ पुलिङ्ग न होकर ] नपुंसकछिग का प्रयोग इस तथ्य को ध्वनित 
करनेकेकिएहेकिकाव्य के अलंकार अलका्यं [ काव्य ] सेवे होते है, लोकिक अलंकार [ हार 
आदि ] के समान [ अलंकायं॑से स्वतन्त्र ] नहो । यह अल्कार अर्थं के पौनरुक्त्य पर निर्भर है 
अतः स्वयं भौ अथं पर्‌ निभरदहैओर इसीलिए इस अल्कार को अर्थालंकार समज्ञना चाहिए । 
[ श्सके | प्रभेद नहीं वतलाएट जा रहे क्याकि [ हमं } विस्तार मं नहीं जाना है। उदाहरण ज्ञेसे 
मैरे श्रीकण्ठस्तव मे- मं भगवान्‌ शकर को प्रणामं करता हं जो अहीन [ अहि-स्प, इन = स्वामी; 
अ-हौन = पुष्ट | अजगाधीड [ वासुकिनाग | कै दारीर के वल्य [ मण्डलीकृत इासीरी का ककण 
पहने हे, जो रोरादिनन्दिचरित [ िकाद पुत्र = शेलादि अर्थात्‌ नन्दी, शैलादि नन्द्य, पुनरुक्त, 
दोलादि को नन्दित प्रहृष्ट करने वारा चरित ] जो क्षतकन्दपं-दर्पक है-[ कन्दपरं ओर दक = 
काम = पुन०, कन्दपंका दप ] जिनका निशान हे द्रष पुंगव [ वृष = वेर नन्द्धी, पुंगव = बैल 
नन्दो, वृषो मे पुंगव श्रेष्ठ] जा रिखिपावक से युक्त नेर वाले है दिखी = जञ्चि ओर असि- 
पुन ०, शिखायुक्त अभि जो ससवे्गर ओर पावतीसहित दं [ सव॑मंगला-पावंती, उनसे युक्त, 
तथा सवके मंगल से युक्त |, | 

"दारुणः काष्ठ से उत्पन्न [ दारुणः = दारुण शब्द का पंचमी एकवचन, अतः दारु से ओर 
काष्ठ से = पुनरुक्ति; दारुण = नर्‌ | भस्मभूतिकर | भस्म ओर भूति = भस्म पेदा कृरनें वाले, 
भस्म कौ मूतति = ठेर पैदा करने वाला ] तथा रक्तरोणाचि [ रक्त = खून, सोण = खून, के समान 
रुपट वाले शोण = लार ] शिखी [ शिखा = रपट वाला असि ] उच्चण्ड पावक [ अचि ओर 
पवित्र करने वाला ] आपकी रक्षा करे । 


--ये स्थर हे सुबन्त [ नाम पदँ | | के पौनरुक्त्य के । तिडन्त [ क्रियापदौ ] का पौनरुक्त्य 
भी उसी प्रकार वहीं [ मैरे श्रीकण्ठस्तव मे |- 


भुजगङुण्डली [ बुण्डली = सप, अण्ड वारे, ] व्यक्तदादिशुभरांश॒रीतगुः [ व्यक्त है, रारी = 
चन्द्रः शभाशुचनद्रशीतयु = चन्द्र जिसमे, शश = खरगोदा से युक्त, युभ्र किरणों वाला चन्द्र॒ जिसमें | 
चेतोहर [ चेतः चित्त को, हरः = शिव, चेतोहरः चित्त को हरण करने वाले ] रकर भगवान्‌ सारे 


७८ अलङ्कारसवंस्वम्‌ 


ब्रह्माण्डे को सदापायात्‌ अन्यात्‌ [ सदा पायात्‌ = रक्षा करे, अव्यात्‌ = रक्षा करे “सद्‌ाऽपायात्‌= 
अपाय हानि से रक्षा करे | 1 [ यहां पायात्‌ ओंर अव्यात्‌ पुनरुक्त से र्गते हं |) 


विसददिनी 


अन्यथात्वेति । यथावभातस्यार्थस्य पर्यवसाने तथालेनेवाविश्रान्तिरिव्यर्थः । अन्यथा 
द्यक्तनीर्या दोषः स्यात्‌ । ननु पुनरूक्तवदाभासखब्दस्यारकारशब्दसामानाधिकरण्यादुप- 
मादिवदजहल्िङ्गस्व योगाच्च पुंलिङ्गस्वे किमितीह नपुंसकः संस्कारः क्रत इत्याशङ्कयाह- 
लक्येत्यादि । कच्यस्य कत्तणीयस्य पुनरुक्तव दा भासस्य पुनःरब्द्‌ पेया निदंशो व चन- 
मिव्यर्थः । अलंकार्यपारतन्त्येति । काव्यसामानाधिकरण्येन निर्देशात्‌ । लोकिका हारादयः । 
एषां दयरूकायेण सह संयोगः सवन्धः। अत एवंषां तत्परतन्त्रतापि न स्यात्‌ । काव्या- 
लकाराणां पुनरलंकार्यग खह समवायः संबन्धः । अत एवे पामयुतसिद्ध स्वाद ककार्य- 
पारतन्न्यमेवेति खौकिकारंकारवेधम्यंमेव न्याय्यम्‌ । आश्रयाश्रयिभावेनारुकार्यारंकरण- 
भावोपपत्तेः किमाश्रयमस्यारंकारववमित्याशङ्कयाह - अयंत्यादि । एवकारः शाब्दपौ नर्‌ 
क्त्यावच्छेदयोतकः । 

अन्यथात्व = भिन्नता अर्थात्‌ अथेका ज्ञान आरभे जेसा हुआ अन्त में उसकावेसादहीन 
ठहरना, रेसा न होने से उपयुक्त ठंग से [ पौनरुक्त्य प्ररूढ होकर |] दोष वन सकता हे । 

प्ररन उठता है कि ुनरुक्तवदाभास- [ मूलतः पुंलिग शाब्द हे ओर वह टीक उसी 
प्रकार ] अलंकार का वाचक दै जिस प्रकार अल्कारदब्द ओर इसलिए “उपमा आदि शब्दो 
मे जेते ल्ग नहीं वदल्ता उसमेभी क्ग नहीं बदल सकता फठ्तः उसमे पुख्गदही रहना 
चाहिए, तव उसके साथ नपुंसकल्गि का प्रयोग क्या किया गया?-इस पर उत्तर देते हए छिखा 
“"लच््य??-आदि । लक्ष्य अर्थात्‌ लक्षणीय यानी पुनरुक्तवदाभास का पुनःरब्दापेक्षया नि्दैरा 
अर्थात्‌ कथन । अलरंकार्यं पारतन््य, अलंकायं = कान्य; उसके छग ( नपुंसक लिगि) के साथ 
निर्दा करने से [ पुनरुक्तवदाभास खन्द मे नपुंसक लिगि का प्रयोग ] लौकिक [ अलंकार ] = 
हार आदि । इनका अलंकायं ( दारीशे ) से संयोग संम्बन्ध रहता दे । इसङ्िएि ये डशारीर के गुणधम 
अपनाने के चकिए विवद नहीं रहते। काव्य के अलंकारो की स्थिति भिन्न दहेः [ उद्धट आदि 
के अनुसर ] इनका अलंका्यं के साथ समवाय संबन्ध रहता दे) इन्दे काव्य से अलग नदीं किया 
जा सकता इसीलिए इन्द काव्य के ( लिग आदि) गुण धमं अपनाने पडते ह। अतः इनका 
लौकिक अलंकारो से वेधम्ये ठीक ही है । अव एक प्रन यह उठता हे कि अलकार ओर अलंका्यं 
मँ आश्रयाश्रयिभाव संबन्ध देखा गया है अतः इन ( उपमादि ) अल्कारोका भी कोई न कोई 
आश्रय होना ही चादिए । वह्‌ कौन त्व है ।' इसका उत्तर देते इए लिखते है-५अथेपौनरुकत्य?? 
आदि । य्ह एव ८ ही ) राब्द से पौनरुक्त्य का ग्रहण नदीं होता । 

विमक्ञः-(१) आभासराब्द संस्कत मे पुंल्किग राब्द हं। “पुनरुक्तवदाभासः-शब्द का अथैहे 
“फिर से कहे गए जैसा लगना? । हस अथं मे आमासश्रब्द स्वतन्तरदाब्द हे किसी के लिए विदोषण 
राब्द नदीं, फलतः यां इसका प्रयोग पुंख्ग में ही होना चाहिए, किन्त सूत्र म उसे नपुंसकलिग 
म रखा गया दे “पुनरुक्तवदाभासम्‌?› इस प्रकार । यह्‌ क्या ? वस्तुतः इस शब्द का नपु सकलिगान्त 
प्रयोगपहली वार उद्भट ने किया है । उनकी कारिका विमरदिनी मे उद्धत ह [ पुनरुक्तवदाभासं छेका- 
नुम्रास एव च ] [ दण्डी, भामह ओर वामन में यह अलंकार नदीं मिलता । | वृत्तिकार ने यहां जो 
उत्तर दिया है उसका भी मूक कदाचित्‌ उद्धर कै काव्यलंकारसारसंग्रह कौ रघुवृत्ति हं । उसमें 
प्रतीहारेन्दुराज ने नपुंसकछिगान्त पुनरुक्तवदाभास शब्द में वहत्रीदि प्रतिपादित किया दहै, ओर 


ण ` क भ क का कक ऋण == ` न्च क 


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पुनङ्क्तवदाभासः | ४९ 


रोब्द को कान्यपरक माना दहे अर्थात उन्दने इस राब्द का अथं किया है रेस्ा काव्य 
जिससे पुनरुक्त ( पुनरुक्ति ›) जेसा आयास हो । पुनरुक्तवदाभास की उद्धट्करत परिभाषा^“पुनरुक्ता- 
भासम्‌ अभिन्नवस्तु इव॒ उदभासि भिन्नरूपं पदम्‌? “उस काव्य को पुनरुक्तवदाभासयुक्त काव्य 
कृहते हे जिसमें स्वरूपतः भिन्न पद अथतः अभिन्न र्गते हों? पर वृत्ति छिखते इए प्रतीदारे- 
न्दुराज ने किखा-“पुनरुक्ताभासम्‌ अत्र काव्यमलकार्यं निदिष्टम्‌ , पुनरुक्तवद्‌ आभासमाने च 
पदे तस्यालकारः । अत्र अलकां यत्‌ काव्य तद्‌धमैत्वेन पुनरुक्तवद्‌ आभासमानयोः पदयोः अल्का- 
रत्वम्‌ उक्तम्‌ , न तु स्वतन्त्रतया । फल चैवमभिधानस्य पुनरुक्तवदाभासमानपदसमन्वयस्य अल्कार- 
ताख्यापनम्‌ । अलंकारस्य खल अल्कायंपर तन्त्रतया निरूपणे क्रियमाणे सष्ठ स्वरूपं निरूपितं भवति, 
स्वात्मन्य॒वस्थितस्य तस्यानल्कारत्वात्‌ ससुद्गकस्थितदार-केयूर-पारिहायांयलकारवत्‌ । अतः ` 
पुनरुक्तवदाभासत्वस्य अल्कारताख्यापनाय काव्यपरतन्त्रतया निदेशो युक्त एव 1 
दस पुरे सन्दभ काकु मिलाकर केवल इतनादही अथं है किं नपुंसकल्गान्त पुनरुक्त 
वदाभास में बहुत्रीहि दै ओर उससे युक्त यह शब्द अल्कार का वाचक न होकर काव्य का वाचक 
हे। ओर काव्यदाब्द नपुंसकलिगान्त होता है । कान्यवाचकरूप से इस राब्द का प्रयोग 
इसलिए किया है कि कान्य मेँ प्रयुक्त होने पर ही पुनरुक्त जेते र्गते पद अलकार वनते हैं । 
यहां अलंकार सवंस्वसूत्र के वृत्तिकार भी इसी वात को दोहरा रहे है । टीकाकार के अनुसार 
वृत्तिकार प्राचीन आचायों की मान्यता का अनुसरण कर रहे हे । उनका खण्डन नहीं 
किन्तु इस तथ्य का इन दोनों वृत्तिकारो के पास उत्तर नहीं है कि उद्धर ने जहां पुनरुक्त 
वदाभास का उस्लेख- 
“"पुनरुक्तवदाभासं छेकानुम्रास एव च । 
अनुप्रासखिधा लाटानुप्रासो रूपक चतुः ॥ 
उपमा दीपकं चैव प्रतिवस्तूपमा तथा । 
इत्येत एवालंकारा वाचां केश्चिदुदाहताः ॥ 


--इस कारिकामे किया दहै, वौ तो केवल अल्कारोंका ही उल्लेख दहै, वहो तो काव्य के 
चिए इस राब्द का प्रयोग नहीं है। यदि "पुनरुक्तवदाभासः राब्द काव्यके लिहे तो छेकालपास 
आदि दाब्दोंकोभी कान्यके किए भी होना धा, ओर इसीलिए उनमें भी नपुंसकल्गि होना 
चाहिए था। । 

यद्धं “पुनरुक्तवदाभासः-शब्द "पदः के किए प्रयुक्त माना जा सकता हे । “दः नपुंसकः 
लिगि उाब्द है । “वह पद जिसका आमास पुनरुक्त सा होः काव्य का अलंकार होता ह एेसा अथे 
करने पर उपर्युक्त कारिका मे भी नपुंसककिगि उचित सिद्ध होता है। अल्काररलाकरकार ने 
सूत्र मे 'आसुखेकार्थपदं पुनसक्तवदामासम्‌ इस प्रकार "पद?-शब्द का प्रयोग किया भी हे । छेका- 
सुम्रास आदि पद्‌ के धर्म नदीं, वृत्ति के धमै है, अतः उन्हे स्वतन्वरूप से उनके अपने-अपने लिगं 
मे ही रखा उद्धट ने पुनरुक्तवदाभास का जो लक्षण किया है उसमे तो “पुनरुक्तामासं `ˆ ""पदम्‌? 
दस प्रकार पदराब्द का प्रयोगे दही । 

वस्तुतः अलंकार सवंस्वकार ने अपने सव मे उद्भट के शव्द को दोहा दिया है । उप्तके अनुसार 
वक यह होगा कि “जो पौनरुक्त्य आरम्ममात्र मे प्रतीत होता हे वह तो वह तत्व है जिसे उद्धर ने 
पुनरुक्तवदाभासम्‌ कहा हे ।” दोनो मे अन्तर यह हे कि उद्धर ने पुनरुक्त जसे लग रहे "पदको अल- 
कार कहा हे ओर अलंकारसवंस्वकार ने पदगत "पौनरुक्त्य को जो अधिक वैज्ञानिक है। पद 


< अर खर 


५० अलङ्कारसवंस्वम्‌ 


तो काव्यरारीर का घटक दै अलंकार नदीं । पदगत पौनरुक्त्य अगगत दार आदि अथवा खृडोल- 
पन आदि के समान योमाधायक अलंकार माना जा सकता दे । 

यह भी संभावना की जा सकती है कि सूत्रम जिस प्रकार उदोदय में “आसुखावभासनंः इस 
प्रकार अवभासन चनब्द दै उसी प्रकार विधेय में मी “पुनरुक्तवदामासनम्‌"” इस प्रकार “अव- 
मासनःः खन्द रहा हो । 'अवभमासनः' शाब्द नपुंसकल्गि दोता ही है। किन्तु ेसा सोचना संभव 
नही, कारण कि वृत्तिकार सूत्रकार के रिष्य ह, उन्दें मूक पाठ में इस प्रकार रम नदीं दो सकता । 
यदि सूत्रकार ओर वृत्तिकार अभिन्न देँ तव तो पाठभेद का प्रन दी नदीं उठता । 

यह भी नहीं माना जा सकता कि सूत्रकार ने ल्घुवृत्तिकार की मान्यता को दोहरा दिया दो; 


क्योकि एक तो प्रतीदारेन्द॒राज सूत्रकार से पहले के हें यह निश्चित नदीं दूसरे प्रतीदारेन्दुराज 


का यह कथन किं “पुनरुक्तवदाभासम्‌? पद काव्यके चकिए दहे, पौनरुक्त्य ओर काव्य में अभेद 
सिद्ध करतादहै, जो निरी माठुकता हे । पौनरुक्त्य काव्य धमं हो सकता है कान्य नदीं । इसीकिष 
इमे यहाँ मी वृत्तिकार ओर सूत्रकार उद्भट ओर प्रतिदारेन्दुराजके दी समान भिन्न ख्ग 
रहे हे। 

यह भी सोचा जा सकता दै कि-“पौनरूक्त्य तीन प्रकार के होते दै--अर्थगत, खाब्दगत, उभय- 

गत; इनमे अथंगत पौनरुक्त्य यदि ग्ररूढ दौ जाय तो दोष माना जाता है; किन्तु यदि वह केवल 
आरम्भमात्र मेँ प्रतीत हो, तो पुनरुक्तवदाभास होता ह अथात्‌ उसमें पद पुनरुक्त जैसे प्रतीत होते 
हं । ईस प्रकार संदर्भ के करम से 'ुनरुक्तवदामासः शब्द पौनरुक्त्य के छि वह्त्रीदि युक्त दै; अतः 
नपुंसकञ्गान्त है ।› विन्ु यद मी अवज्ञानिक है; क्योकि जव प्ररूढ पौनरुक्त्य दोष कदा जा 
रहा है तो अप्रूढ को दोषविरुद्ध मलंकार कदना दी स्वामाविकदे; ओर निरूपण मी अरकारोका ही 
करने जा रहे देँ । 

उद्भट ने पद को “पुनरुक्तवदाभासः कदा ओर पद को दी अलंकार माना । उनकौ यह स्थापना 

स्थूल दै अतः कदाचित्‌ उनके इस दोष पर कटाक्ष करने के किए सूत्रकार ने उनका पद उन्दींके 
अनुसार प्रस्तुत कर दियादो। 

सर्वथा है ययँ उद्धट के 'पुनरक्तवदामास'"दाव्द का अनुवाद । उद्भट के पश्चात्‌ पुनरुक्तवदाभास 

का निरूपण मम्मट मे मिकता है । रुद्रट ने इसे छोड़ दिया हे । मम्मट का पुनरुक्तवदाभास विवे- 
चन इस प्रकार दै- 

[ का० ] पुनरुक्तवदामासो विभिन्नाकारशब्दगा । 

एकरा्थतेव खनब्दस्य तथा श्ब्दा्थयोरयम्‌ ॥ [ ° । ८६ कान्यप्रकार | 

[ वृ० ] भिन्ररूप--(सार्थकानथकराब्दनिष्टमेकाथैतवेन सखे भासनं पुनरुक्तवदाभासः । स च 
राब्दस्य सभङ्गामङ्गरूपकेवलरब्दनिष्ठः 1" अर्थात्‌-भिन्न-सिन्न आकार के सार्थक ओर निरर्थक राब्दों 
का आरम्म म एवार्थक भासित होना पुनरुक्तवदामास होता दै । शब्द मं वह सभङ्ग ओर अभङ्ग 
दोनों प्रकार के दाब्दं म रहता है। 

(र) ब्रत्तिकार सून्रकार से भिन्न दै यद तथ्य इससे भौ प्रमाणित दोता हे कि सूत्रकार ने पुन- 
रुक्तवदामास को अर्थालकार नदीं कहा । पुनरुक्तवदाभास मेँ केवर पौनरुक्त्य को अर्थगत स्वीकार 
करिया है । अर्थात्‌ “अहीन का अथं भी प्सर्पौ का राजाः दोता दै ओर ध्युजगाषीडाःः का मी । 
ष्की पमे दोबार एकी अर्थंका कथन दोषत॒ल्य क्गता हे, किन्दे अहीन? शाब्द का अथं 
"पुष्ट, है णेसा समञ्च मेँ आते ही अथै भिन्न हौ जाते ह । पोनसक्त्य नहीं रहता । इस प्रकार अुरावे 
म गाना एक राब्दच्छर सिद्ध होता दै जो विरोधाभास के समान चमत्कारी है । किन्तु अथेमे 


~ ~ -- > ~~ रक 


न व ता रि न॑ रो) 


पुनरुक्तवदाभासः ५५२्‌ 


पोनरुक्त्य कदापि न आता यदि अदीन" शब्द के स्थान पर पुष्ट शब्द का प्रयोग किया गया 
होता । इसकिए पौनरुक्त्य अथ में भके ही हो किन्तु उसका प्रत्यायक है, पद । फलतः अलंकार पद 
मेही दे । काव्यप्रकादाकार ने इसीकिए अन्वयव्यतिरेक को गुण अलंकार ओर दोषों की राब्दाथ- 
निष्ठता का मानदण्ड बतलाया हे । यहाँ शब्द के रहने पर ही अल्कार रहता है काव्यप्रकाराकार 
की इस स्थापना का पण्डितराज जगन्नाथने खण्डन किया है; किन्तु वह अवैज्ञानिक है । अल्कार- 
सवेस्वकार ने अल्कारनिरूपण का जो क्रम अपनाया है उससे भी यह स्पष्ट हो जाताहै कवे 
पुनरुक्तवदाभास को राब्दाल्कार मानते हं । उन्दने राब्दालकारों के निरूपण के पश्चात्‌ अर्था 
लकारो का निरूपण किया है । फलतः सूत्रकार के अनुसार पुनरुक्तवदाभास राब्दालंकार ह है । 
उद्धर ने जो उपयुक्त कारिकाओं मे अलंकारो का नामोद्लेख किया है उसमे भी प्रतीहारे 
न्दुराज ने पुनरुक्तवदाभास आदि प्रथम चार अल्कारोंको इाब्दालंकार कहाहे ओर शेष चार 
को अथांलंकार । “तत्र॒ चादौ चत्वारः शब्दालंकारा निरूपिताः, रूपकादीनां त॒ चवुरण्णामर्था- 
लकारताः” । यद्यपि मम्मट ने पुनरुक्तवदाभास को शब्दारुकार मानकर उभयाल्कार भी माना 
हे तथापि उन्होने, राब्दारुकारो मेही गिनाया है। कान्यप्रकारा के नवम उल्लास मे शब्दा- 
ल्कारोका दही निरूपण दहे। इसी प्रकार श्िष्टपरम्परितरूपक आदि को भी उभयालुकार मानते 
हे किन्तु गिनाते अधार्कारो मे ही । कारण देते हुए कते है कि उन अलकारां कौ प्रसिद्धि वेसी ही 
हे । उभयालंकार नाम से वे प्रसिद्ध नही है । वस्तुतः पुनरुक्तवदाभास मे अथं की सपेक्षा राब्द का 
अरुकार-निष्पादकत्व प्रधान दहै, ओर श्िष्टपरम्परितरूपक आदि में ब्द की अपेक्षा अ्ंका। 
फलतः उनकी प्रसिद्धि शब्दारुकार ओर अथांलकार के रूपमेंदही है । मम्मट ने इनमें यदि प्क एक 
की प्रधानता न देखी होती तो वे पुनरुक्तवदाभास, परम्परितरूपक आदि के किए एकादा उल्लास 
ङिखते ओर नवम मे शब्दालंकार, दरम मे अथाँलंकार का निरूपण कर उसमे उभयारुकार 
का निरूपण करते । वस्तुतः मम्मट को भौ पुनरुक्तवदाभास में राब्दालंकारत्व ही अधिक मान्य है । 


इस प्रकार यह सत्य है कि पुनरुक्तवदाम।स मे पौनरुक्तय अथंगत ही है; किन्तु यह मी सत्य है 
कि अलकार शब्दगत ही है। यँ अथं में पौनरुक्तय का दोष आता है । उसे उन्मेष भिरुता है 
राब्दसे । किन्तु शब्द का रिल्प उसे आभासात्मक ठहरा देता है। अतः चमत्कार शाब्द क 
शिख में है। फलतः पुनरुक्तवदाभास राब्दका ही अल्कार है। इृत्तिकार ने इसे अर्थाल्कार 
कहा है ओर टीकाकार भी उसका समन करगे । किन्तु यद सब मूविरुद्ध हे । 

( २) मम्मट ने आनन्दवधेन के अनुसार अलंकारो को कान्यांग का धर्म॑ माना है, काव्या- 
त्मा का ध्म नही; ओर उन्होने उसे हार आदि के समान कहा हे । इससे इस भ्रम को जन्म मिलता 
हैकिवे अलंकार ओर काव्य में सम्बन्ध भी नहीं स्वीकार करते है जो हार ओर शरीर में 
स्वीकार किया जाता है अर्थात्‌ संयोग सम्बन्ध । विन्तु मम्मट ने ेसा कीं नहीं कहा । उन्होने 
संयोग ओर समवाय के आधार पर गुण ओर अलंकार का उत्तर प्रस्तुत करनेवाले उद्धटादि के मत का 
खण्डन अवदय किया है विन्तु उनका वह॒ खण्डन यह्‌ सिद्ध करने के किए नहींहे कि अल्कासें 
का संबन्ध काव्य मे संयोगरूप ही है, ओर गुणां का समवायरूप ही । उनका खण्डन इस- 
किणे किंवे गुण ओर अल्कारों मँ संयोग भौर समवाय को भेदक नहीं मानना चाहते । वे 
उनके साक्षात्‌ ओर परम्परया उपस्कारकत्व को ही भेदक मानना चाहते हैः । यह भी इसछिए कि 
संयोग ओर समवाय दानिक राब्द हैः ओर वे विवादास्पद हैँ । समवाय के लिए सम्बन्ध का एकं 
छोर (अनुयोगी) अवद्य ही भोत्तिक होना चाहिए । संयोग तो केव भोतिक पदार्थौ में हयी होता है । 
काव्य इसवे विरुद्ध सवेथा अमोतिक है । उसमें संयोगादि की चचां प्ररूढ नदीं हो सकती । 


५५२ अच्छङ्ारसवस्वम्‌ 


यद सिद्धान्त विरकुर मान्य ह कि जिस प्रकार काव्ययुण काव्य से अल्ग करवै नदीं पष जा 
सकते उसी मकार कान्याटंकार भी काव्य से अख्ग करके नहीं पाएटजा सकते; जव किदार 
आदि पाए जा सकते है । निष्कर्षं यद कि युणोंकोजो रोयें आदि के समान का वह जितना 
संगत हे उतना अल्कार्यो कोजो हार आदि के समान कदा वह नदीं । उद्धटादिं की सयोग ओर 
समवाय आदि की चचां का यदी सार ह । टीकाकार ने जो “काव्यालंकाराणां पुनः अल्कायंण सद 
समवायः संबन्धः? कहा उसमे समवाय का अथं “मयुतसिद्धत्वः ही दै । अयुत शब्द में यु धातु 
का अथं मिश्रण नदीं अमिश्रण है, अभिश्रण यानी पाथेक्य 1 फलतः उसका अथं हे अपृथक्‌ 1 जौ 
वस्तुर्णे एक दूसरे से प्रथक्‌ नदीं रह सकतीं उन्द जयुतसिद्ध कहा जाता दे । जैसे युण जौर द्रव्य । 
-यहां अल्कार भी काव्य से प्रथक्‌ नदीं मिते । न्यायदाख्र समवाय संवन्ध को द्रव्यमे दी मानता 
है ओर काव्य द्रव्य नदीं है । अतः समवाय का अथै वदी नदींखिया जा सकता जो न्यायद्ाख् में 
ल्या जाता हे । 

८४ ) रीका में यहां एक पंक्ति टे “लक्ष्यस्य लक्षणीयस्य पुनरक्तवदाभासस्य पुनःदाब्दापेक्षया 
निर्दयो वचनमित्यर्थः । इसमें निर्णयसागर संरकरण के अनुसार “पुनः राब्दा०?› टेसा, ओर 
“निर्देशे एेसा पाठ दै । पुनःशब्दापेक्षया का संकेत कदाचित्‌ सूत्रस्थ प्पुनः पुनरुक्त० 
इस प्रकार आए प्रथम पुनः शब्द की ओर है । निणेयसागर संस्करण में यद सूत्र 
केवल “आमुखावभासनं पुनरुक्तवदाभासम्‌? इतना ही हं । इसमे प्रथम “पुनः-दाब्द 
नदीं दै। इसमे हमने टीका कौ इसी ण्क्ति के आधार पर पुनः राब्द जोड़ दिया है यद्यपि 
संजीविनीकार ने यहां "तुः दाब्द दिया है। प्ररूढ पौनरुक्त्य से अगप्ररूढ का अन्तर वताते समय 
व्यावत्तकया वेलक्षण्य्ोतक रेस किसी राब्द का सूत्र मे दोना आवदयक था । “नि्दृशे" यह सप्तमौ 
अवदय ही सुद्रादोष हं । 

संगति = अगे आरही विमद्धिनी जिन विकस्पों का खण्डन कर रहीदै वे अल्काररत्ना- 
करकार द्वारा प्रस्तुत किए गए दं । एतदथ अल्काररत्नाकर क प्रथम सूत्रकी दृत्तिदेख छेनी 
नचादिएट । यदहो थोड़ा सा अद आगे उदघरत कर दिया गया है । 

विमदिनी 

तेन॒ ब्दस्यापौनरक्त्यान्न चाब्दाटंकारो नाप्युभयारुकारोऽयमिव्यर्थः । पर्य 
वसाने वस्तुतोऽर्थस्यासचात्‌ धम्यभवे च धर्मस्य निविषयस्वारपौनसक्स्यं कस्य 
धमः स्यादिति न वाच्यम्‌ । आञ्युखेऽ्थंस्यावभ)समानस्वेन सच्वाद्धर्मिधमेभावस्य 
नैवानिष्टरर्थगतयोः सच्वासचव योरनुपयोगात्‌। आम्ुखावगतैव च प्रतीतिरटंकारवीजं न 
पा्यवसानिकी । तथास्वे द्य पमारूपकादी नामप्यविरोषः स्यात्‌ । पयंवसानेऽप्यर्थ॑स्य 

दारणः कातो जातः, इव्यादाविन्धनाथस्य सस्वाद ने कार्तिकस्वाभावाच्छशश्छङ्गवद्‌ भावो 
न वाच्यः । पयंव सानेऽप्यत्रेन्धनाथेः सन्नपि नारुकारत्व प्रयोजक इति 'अरिवधदेहङारीरः' 


| काव्य प्रकाश ९।३८९ | इव्याद्‌ावप्यसता कायाथनाविरोषा्समानः 1 किं च इतो न पये- 


च सानेऽथस्यासच्वम्‌ 1 इह दहि प्रती तिमानच्रसारव्वाव्काव्यस्य ययैव प्रतीयते तत्तथैव 
भवतीस्यविवाद्‌ः । तद्वाधोत्पत्तावपि तैमिरिकद्विचन्द्रप्रतीतिवत्‌ पुनस्क्ततयावभातस्यार्थ- 
स्यावभासमानव्वारखच्वमेव । नहि शकातशोपि ऋरादयथों परूस्मे काष्टादेरथंस्यापुन रक्तया 
मानमस्ति 1 बाधोत्पत्तेः पुनरद्विचन्द्रप्रती तिवत्पौ नरूकस्यप्रतीतेरनुपपद्यमानत्वं भवति, नतु 
शक्तिकायामिव रजतप्रव्ययस्य स्वरूपत एवाभावः 1 अत एवाभातपौनर्क्त्यापि प्रतीतिरः- 
पौनदक्स्यपय्य॑व सायिन्यस्य स्वरूपम्‌ । एवमपि वस्तुतः कायाचर्थाभावस्तदवस्थ इति चेत्‌ , 


| 
॑ 
| 
्‌ 
| 


पुनरुक्तवदाभासः ५५२ 


सव्यम्‌ । किं तु तथा वस्तुतो बहिरसंभवन्नपि द्वितीयश्चन्दः प्रतीतौ कच्चन विशेषमाधातुं 
नोरसहते तथेहापि वस्तुचत्तेन कायादेरर्थस्यासंभवेऽपि प्रतीतौ न कश्चिद्धिशेष इति दिण्डि- 
काराग एव वास्तवव्वान्वेषणस्र्‌ । तस्माद्‌त्रावभाखमानस्वसेवार्थस्य सच्वप्रतिष्टापकं 
ममाणस्‌ । 

क्योकि [ पुनरुक्तवदामास में ] पौनरुक्त्य [ अथे में रहता हे ] खन्द मे नदीं रहता, इसलिए 
न तो यद्‌ शब्दालंकार है ओर न उभयाल्कार । ( शंका ) “जिस अथं मे पौनरुक्त्य रहता है 
वह मिथ्या दे क्योकि वह अन्त मतो रहता नहीं हे अतः पौनरुक्त्य किसमे रहेगा १ 
दसि कि धमे विना धमौँ के नहीं रह सकता? यह इका नहीं करनी चाहिए; क्योकि वह 
अथं आरम्भमेंतो रहता ही दहै। अतः धर्मध्मिमाव का कुक नहीं विगडता [ यदौ वस्तुतः 
^तनेवेष्टः? पाठ होना चाहिए } अर्थगत वास्तविकता ओर अवास्तविकता का यदो प्रतीतिपर- 
माथे काव्य में कोड उपयोग नदीं । यहाँ पुनपुनरुक्तवदाभास में आरम्भक प्रतीति दही अल- 
कार का वीज दहे, अन्तिम नहीं! यदि वेसादहोता [ अन्तिम प्रतीति को अल्कार-बीज माना 
जाता ] तो उपमा ओर रूपक आदि में कोई अन्तर न होता [ क्योकि अन्तमं तो दोनों ही साटद्य 
म पर्यवसित होते दै ]। 

[ सच तो यह है कि ] अर्थं पयैवसानमे भी रहता ही हे [ उदाहरणार्थं ] “दारुणः काष्ठतो 
जातः?” में इन्यनरूपी अथं अन्तम मी ( व्यंजना द्वारा) प्रतीत होता ही है। अतः जव उसकी 
सत्ता मे संदेह नदीं ( अनेकान्तिकत्वाभाव ) है तब उसका रादयाश्ङ्ग ( खरगोदा के सींग ) के समान 
अत्यन्ताभाव नहीं माना जा सकता । इतना है कि यहो इन्धनरूपी अथं पयेवसान मे भी प्रतीत तो 
दोता दै किन्तु वहु अरुकारत्व का कारण नहीं वन पाता ( उसमें आरम्भ के समान चमत्कार नहीं 
रहता ) इसकिए ५अरिवधदेह रारीर”” [ रान्रुको वध देनेवाखी अरिवधदा इहा है जिनकी रेसे 
दारी = वाण वाले वीरो को शरः = प्ररित करने वाला, काव्यप्रकाद मे पुनरुक्तवदाभास का उदा- 
दरण ] इत्यादि मे [ देह ओर शरीर दोनों का अधं] कायरूपी अथे ओर इस ( इन्धनरूपी ) 
अथं की स्थिति एक सीदे, दोनों मे कोई भेद नदीं हे। ८ यहो निणेयसागर संस्करण मे कायः की 
जगह कार्यैः छप गया है ) । वस्तुतः इन सव हैतुओं से भी पुनरुक्तवदाभास मे अथं असत्य 
( अवास्तविक ) नहीं रहता । काव्य मे सारा खेर प्रतीति का है अतः इसमें जो जेसा प्रतीत होता 
है वह निर्विवाद रूपसे वैसा ही मान ख्या जातादहै। वाद में उसका बाधभीदहो जाता है तव 
भी जैसे तेमिरिकरोगसे पीडितको एक कौ जगह दो चन्द्र दिखलाई देते, ओर उनमेंसे 
एक के बाधित होने पर मी दोनों का दिखाई देना बन्द नहीं होता उसी प्रकार पुनरुक्त अथं 
प्रतीत दहो जातादहै तो फिर प्रतीत होता हयी रहता हे। फलतः द्वितीय असत्य अथं भौ प्रतीतिमें 
सत्य ही रहता ह । ेसा नहीं है किं ( दारुणः काष्टतः ) मे दारुण का अथं क्रूर प्रतीत हो जाने 
पर काष्टरूपी अथं की प्रतीति बन्द हो जाती हो या उसमें पौनरुक्त्य की प्रतीतिन होती हो, 
वाध हुने से द्विचन्द्र प्रतीति के समान पुनरुक्तप्रतीति में केवर अनुपपचमानता असमथनौयता- 
मात्र की प्रतीति होतीदहे, नकि सीपी म रजतज्ञान के समान उसका स्वरूपतः अभाव प्रतीत 
होता है । इसीकिए पुनरुक्तवदाभास का स्वरूप अपौनरुक्त्य मे पयवसित दोनेवाली वह प्रतीति है 
जिसमे आरम्भ मेँ पौनरुक्त्य आमासित होता हो । ( शका ) “विन्त एेसा मानने पर भी ( “अरि- 
वधदेहदारीर?› इत्यादि मे ) काय आदि अथे का अभाव वना ही रहता है, काय आदि वास्तविक तो 
हो नदीं जाते १ एेसा कहना ठीक है किन्तु यहाँ वास्तविकता का अन्वेषण दिण्डिकाराग ही है, 
क्यु कि जिस प्रकार द्वितीय चन्द्रमा भोतिक रूप से बाहर उपर्न्ध नहं रहता तथापि उसके इस 


। 
| 
। 


२. अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


अमाव से दिचन्द्रपमतीति मे कोई फरक नदीं पड़ता, उसी प्रकार यदहोँ काय आदिं अथं के भौतिक 
रूप से वस्तुतः न रहने प्रर भी पुनरुक्तत्वेन इदं उनकी प्रतीति में कोडं फरक नदीं पड़ता । इस- 
किए यह ( कान्यक्षेत्र मे ) पदाथ की सत्ता का प्रमापक उसकी प्रतीति या उसका अवभास ददी दै 
( अथात्‌ जिसका आभास हो रहा हो वह काव्यम सत्य ही है, लोकमें भलेहीन दहो) । 


विमरिनी 


ननु अवभासमानववं प्रमावृघमं इति कथं तदृश्रयो धर्मः काव्यारकार इति चेत्‌ , 
असदेतत्‌ । अवभासमानत्वस्यावभास्यनिष्टतया प्रतीतेरर्थधर्मव्वात्‌ । तथा हि केषांचन 
ग्रतीतिवादिनां- 


८ ~ = 
तथाहि वेद्यता नाम भावस्यव निज वपुः । 
चेतरेण वेद्यं वेश्यीति किं द्यत्र प्रतिभासते ॥ 


इत्यादयक्तयुक्स्या कौमारिकरूवन्नीरुताया इव वेद्यताया अप्यर्थधर्मर्वमेवेष्टम्‌ । इह च 
तदुपक्रम एवेति न वस्तुवाद संस्पर्शो न्याय्यः । आसुखतस्यार्थव्वस्य च शब्द्‌धर्मव्वेन 
ङ्ाब्द्‌ाश्रयत्वात्‌ शब्दारु कारव्वं यद्यस्योच्यते तथापि पय वसाने वस्तुतस्त॒ल्याथव्वस्यासभ- 
वात्‌ शशश्ङ्गवद्वमधमिभावो दुष्टः स्यात्‌ । सचेऽपि दोष एवेव्यस्मत्पन्तोक्तसमयचोयाव- 
काडः। अत्रापि यद्ा्ुख एवे काथैस्वेनाव भासनं समाधिस्तदास्मत्पत्तेण किमपराद्धम्‌ । एवं 
च विरोधेऽपि वस्तुतो विरूढ स्याथंस्यासंभवाद्विरद्धार्थव्वस्य च दाञ्दधर्मव्वात्‌ शब्दां कारत्वं 
प्रसज्यते । अचर विरुद्धस्यार्थस्यासंभवेऽपि कर््ादिभिर्वाच्यतयाध्यवसायः, इह तु पौनर्‌- 
क्त्याश्रयस्यानन्वि तत्वेन न वाच्यतेति चेत्‌ , नंतत्‌ , यतः ष्दारुणः काषटतो जातः इव्यादौ 
तावत्पौनद्क्याश्रयस्य काष्टादेरर्थस्य जातस्वादिना सहान्वितव्वावगमाद्स्त्येव सुख्यया 
बृत्या वाच्यखम्‌ । (अरिवधदेहरीरः' इत्यादौ तु वस्तुतः कायादेरवाच्येऽप्यव भातपौ- 
नङ्क्त्याश्रयतस्वादक्रत्रिमाथद्ोभापयंवसायिखेन वाच्यतयास्त्येव विवक्सितत्वम्‌ । अन्न 
द्यक्रत्रिमोऽथोंऽखक्रतक्कत्रिमाथो पस्करृतो यथा चमव्कारक्रत्‌ न तथा तदु पस्कृततयोच्यमानः 
स्यात्‌ । शीणां हि कण्ठडाभरणानि हाराः पयोधरानप्यभिभूषपयन्तिः इव्यादिररा च 
हारस्य कण्ठारंकारस्वेऽपि सामीप्यात्तावतिशोभातिङ्याधायकत्वाद्यथा पयोधराद्‌ावप्य- 
ठकारत्वं तथेव कत्रिमार्थाश्रयव्वेऽप्यव भासमानस्य पौ नरु्तथस्याद्रत्रिमार्थोपस्कारक- 
स्वमपि प्रतीयत एवेति नानुभवापह्ववः कार्यः 1 एवं च पौनरूक्स्याश्रयस्याथंस्य यत्रे 
वाच्यत्वेन विवच्जितत्वं तत्रेवास्यारुकारस्वं नान्यत्र । 

(अक्ष्ण पततेन्दुसुखी वन्धुजीवाधरद्यतिः । 
हयं विासिनी कस्य न नेत्रोत्सवकारिणी ॥ 


अत्राकरष्णेद्य्थंपौ नडक्त्यस्य संभवेऽपि वाच्यव्वेनाविवक्षितत्वान्नायमरूकारः । एवं 
व दयमाणानामप्यलकाराणां कवि विवच्तव स्वरूपप्रतिष्टापक प्रमाणं ज्तेयम्‌ । कि बहना, 
सवषामप्यरुकाराणाञ्चुपमिता्थंस्वादेः शब्द धमंत्वाच्छुब्दारुकारत्वं स्यात्‌ । तदथांरुकार- 
त्वमस्य ज्यायः, यावता द्यर्थस्याञ्ुख एव पुनस्क्तयाव भासोऽस्य जीवितम्‌ । अत एव 
घुनङ्क्तव दाभाखभिस्यन्वर्थसंन्ता। अर्थस्य च पौनस्क्त्यप्रतीतौ न कस्यचिद्धिवादः, तामे 
घाभित्य शब्दाटंकारस्य भवद्धिदक्तत्वात्‌। एवं च म्रव्यासत्तेस्तद्‌ाश्रयत्वमेवास्यारुकारस्वं 
युक्तम्‌ । अन्यथा तुस्याथंशब्दतापि वाक्यधमं इति तदाश्रयोऽपि स्यादिस्यनवस्थाप्रसङ्गः । 


पुनरुक्तवदाभाखः ५८५ 


रोका होती हें किं अवभासमानता तो वस्तुतः प्रमाता = अनुभविता ८ सहृदय सामाजिक ) का 
धमं हे अतः उस ( अनुभविता ) मे रहने वाङ धरम को काव्य का धमे अलंकार कैसे कह सकते है ¢ 
उन्तरः--यह कथन गर्त हे । अवभासमानता धमं है अवभास्य वस्तु का, अतः प्रतीति भी वस्तुतः 
अथेकादही धमं दे। जेसी कि ङु प्रतीतिवादियों की “वेता ज्ञेयता)जोदहैसो पदार्थकादही 
अपनारूपहे, में जानतादहूंकि चैत्रकोक्या विदित है इस उक्ति में क्या भासित होता है 
[ अथात यहां वक्ता के ज्ञानमेंचेत्रका ज्ञान ही विषय है, अतः वह यहाँ वस्तुरूप है । ] इत्यादि 
युक्तिय। से वेयता भी रीक उसरी प्रकार अथंधमं है जिस प्रकार कोमारिल संप्रदाय ( भद्र मत, 
पूवंमौनांसा ) में नीलता ( भट्मत मेँ नीलादि वस्तुओं मे जिस प्रकार नीलता आदि रहती है 
उसी प्रकार वेयता = ज्ञातता मी ) । यहो ( पुनरुक्तवदाभास में ) वह ८ अवभासमानत्व = वेयत्व ) 
आरम्भमात्रमें रहता हे ( अन्त मे नदीं ) इसलिए यहं वस्तुवाद ८ वास्तविकता की च्चा ) का 
संस्पदो भी करना उचित नहीं हे । 

( शाका ) “यह जो आरम्भ-आरम्भमें तुल्य (एक से दो ) अर्थौ की प्रतीति दै इससे आसुख- 
वस्याथ॑त्व ( आसुख = आरम्भ में है ठल्य = एक सा अर्थं जिसका = ठेसा चान्द, तद्धमै, इस प्रकार 
से ) धमं शाब्द में रहेगा ओर जव वह राब्दमें रहेगा तव इस ( पुनरुक्तवदाभास ) को शब्दा- 
लकार माना जाना चाहिए, रेसी डका उठाई जा सकती है ( किन्तु क्योकि यह शंका धम॑धमि- 
भाव ( आञुखतुल्याथत्व धर्म, शब्द धर्मी ) कै आधार पर कीजा रही है ओर धर्मधर्मिभाव 
आरम्भमात्र म बनता हं अन्त मे नदीः क्योकि अन्त मे अर्थं नहीं रहता, अतः ) इस शका के धर्म- 
धाभाव म शशश्ग के समान दोष आ जावेगा । ( पूव॑पक्ष ) यह ओर एसे समी दोष तो आपके 
उस पश्च म मी आवेगे जिसमे अथं का प्रातिमासिक्र या प्रातीतिक अस्तित्व माना गयाहै। मर 
यदि अपने पक्ष के उत्तर मे आप यह तकं प्रस्तुत करते हों कि पुनरुक्तवदाभास मे शब्द आरम्भ 
मे एकाथक भासित होते हे, तो हमारे पक्षने क्या अपराध कियाहैएरेसेतो विरोध मे भी विरुद 
अथे वास्तविक नदीं होता ओर विरुदधाथता धर्म॑होता है शाब्द का, अतः उसमे भी शब्दालंकारत्व 
को प्रापि दोती दे। यह्‌ भी नहीं कहा जा सकता कि विरोध में विरुद अर्थं मिथ्या होते इए भी 
कतां आदि से अन्वित रहने के कारण वाच्यरूप से स्वीकार किया जाता है ( यद्यपि मिथ्या होने 
के कारण उसका वाच्यत्व मी रहता स्लूठा ही है ( इसके विपरीत पुनरुक्तवदाभास मेँ पौनरुक्त्य 
का आश्रयाभूत अं अन्वित नहीं रहता अतः वह वाच्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि (दारुण 
काष्टतो जातः इत्यादि स्थलों मँ पौनरुक्त्य फे आश्य काष्ठ आदि अर्थं का जातत्व आदि के साथ 
अन्वय प्रतीत होता हे फलतः वहु ( पुनरुक्त अथं ) भी याँ सच्चे अर्थौ मे वाच्य है । यदपि 
“अरिवधदेहशरीरः” आदि मेँ जहोँ पुनरुक्त्यार्थकः ब्द भंगदलेष द्वारा वना रहता है ( यथा शरीर- 
राब्द "रारिणः इईरयतिः इस प्रकार कौ ध्युत्पत्ति से बना है ) वहाँ ( पौनरुक्त्याश्रय शरीर आदि 
राब्द। के ) काय आदि अं वाच्य नहीं ह्येते ( क्योकि वहो वाचकशब्द का ही अस्तित्व वास्तविकं 
होता हे ) विन्त पौनरुक्त्य के आश्रयरूप से प्रतीत यह वनावरी अर्थं स्वाभाविक ओर मूलभूत 
अथ को शोभा वढाता है अगः वह वाच्यरूप से अवरय ही विवक्षिन है । यहाँ जितना चमकार 
अलक्त ओर वनाव अथ कै द्वारा स्वाभाविक अथं के उपस्कार से होता है उतना उस ( कृति 
माथ) द्वारा उपस्कृत रूप से इसके अभिधा द्वारा कथन से नदीं होता ¦ “सखियो के कण्ठाभरण 
हार स्तना कोभी भूषित करते है" इम उक्ति के अनुसार जैसे हार आभरण नो कण्ठके होते 
हे तव भी शोभा समीपवतीं ( होने के कारण ) स्तनो की भी बढा दिया करते है वैसे हयी पौन- 
रुक्त्य रहता तो कृतिम अथं मेही है किन्तु वह अक्रन्निम ( स्वाभाविक ) अर्थं की भी दोभा 


९५ अलङ्ारसवंस्वम्‌ 


बदाता ही है 1 यह अनुभवसिद्ध भी दै अतः इसको चधिपाया नदीं जा सकता \ इस प्रकार पोन- 
रूक्त्य का आश्रय अर्थं जहौ वाच्यरूप से विवक्षित होता है वहीं यह अल्कार होता दै, अन्यत्र नदीं । 
“अक्रष्णपक्षन्दुसुखी, बन्धुजीव के समान अधरकान्ति वाटी यह विलासिनी किसकी आख करो 
आनन्द नहीं देती? । 
यहा ( “अकारो वाखदेवे स्यात्‌, “अक्षराणामकारो-स्मिः इत्यादि वचनं कै अनुसार अकरा 
अथं हे विष्णु ओर वही क्ष्ण का भी फलतः ) “अङ्ृष्णःः शाब्द मँ पौनरुक्तं दो सकता टै तथापि 
वह वाच्यत्वेन विवक्षित नदीं हे ( कवि उसको वतलाना नदीं चाहता ) अतः उसे ८ पुनरक्तवदा- 
भास ) अल्कार नहीं कदा जा सकता । इसी प्रकार आगे के जाने वाके अल्कार भीतमी 
अल्कार होगे जववे कविंको अल्काररूप से विष्षित दोगे। अधिकसे क्या? ( रूपक दीपकं 
आदि साटद्यमूलक ) सभी अल्कार रखान्दालकार कदे जा सकते हे क्योंकि उनके दाब्दं मे उप- 
मिताथंत्वः रहता है । इसलिए इस पुनरुक्तवदाभास ) को अथांककार मानना दी अधिकः अच्छा है, 
क्योकि वह अथी दहै जिसकी आरम्भ में पुनरुक्तरूप से प्रतीति होने के कारण इस अल्कारमें 
ग्राण अति हेँ। इसीलिए “पुनरुक्तवदाभासम्‌? यह अधांनुरूप नाम साधक सिद्ध होता दै, 
अथ में जो पुनरुक्ति की प्रतीति है उस्मेतो किसीको विवाद दै नदीं क्योकिउसी वै आधार पर 
आपने भी रस अल्कार को राब्दाल्कार मानादह। प्रतीति का निकटवत्ती है अथं ही अतःउसी को 
अल्कार का आश्रय मानना ठीक दहे। यदि दूरस्थ ( राब्दाकोभी आप अलंकाराश्रय मानना 
चाहं तो फिर वाक्यको मी अल्काराश्रय मानिए क्योकि वाक्यमें भी तुल्याथैकदाव्द युक्तता 
रहती ही है । इस प्रकार यदि दूरस्थ स्वन्ध के आधार पर मी अलंकार कौ आश्रयता का निश्चय 
किया जाने ख्गेगा तो अनवस्था दोष आएगा । 


विमरिनी 


अथाच्र शब्दस्वरूपवेश्चिष्टयनिवन्धने चमत्कारकारित्वमिति तदटंकारस्वमिति चेत्‌ , 
कि नाम शब्दस्य स्वरूपे वेशिष्टयम्‌ । किं पौ नङ्क्त्यम्‌ , उत पुनर्क्छार्थवाचिव्वस्न्‌ , उत 
सखभङ्गामङ्गपदेन शिष्टत्वम्‌ । तत्र न ताव दादयः पत्तः । शाब्दस्य द्विख्च्चारणाभावात्तथाव्वा- 
ग्रतिभाखनात्‌। नापि द्वितीयः। बाच्यवाचकभवेनारकार्यांरुकरणभावात्तस्याश्रयाश्र यि भावे 
नोपपत्तेः। अत एव सवषामेवार्थारूकाराणाञ्ुपमिताथां दि वाचित्वाच्छुब्दस्य तद्‌ ंकारस्वं 
स्यादिव्युक्तम्‌ । नापि तृतीयः । पुनरूक्तवदाभासमिव्यन्वथंसंन्ताश्रयणात्‌ । पौ नस्क्त्याख्य- 
धर्म॑प्रयोजकी कारेणा कारस्यो पक्रान्तत्वात्‌ श्ि्टव्वस्येहानौपयिकव्वात्‌ 1 तत्‌ पुनरा. 
थपौ नरक्त्यावगमे निमित्तमात्रम्‌ । निमित्तनिमित्तभावश्च नारंकारस्व प्रयोजक इव्यवि- 
चादः । तस्मादूर्थाश्रयव्वादपौनस्कस्यस्य तदृ कारत्वमेवेति युक्तम । एवं वक्त्रलकारतापि 
निरस्ता । सर्वेषामपि वक्त्रतिक्ञयरूप्वात्‌ तथात्वोपपत्तेः । 


यदि यह कँ वि; “शब्द कै स्वरूप में वह्‌ वैदिष्टय द जिससे चमत्कार होता हे अतः अल्कार 
को शब्दाधित ही मानना ठीक है “तो हम पृर्ते हे शाब्द कै स्वरूपम क्या वदिष्टय दहै ? क्या वह 
व॑िष्टय॒ पौनरुक्त्यस्वरूप है, अथवा पुनरुक्तार्थवाचक-स्वरूप, अथवा सभंग ओर अभंग उरेष से 
युक्त होना । इनमें से प्रथम पक्ष अमान्य है क्योकि ८ पौनरुक्त्य में शब्द का दूसरी बार उच्चारण 
आवद्यक होता है जोर शब्द का) दूसरी वार उच्चारण यदय होता नदींहै। दूसरा पक्षमी 
मान्य नही, क्योकि ( यहाँ पुनरुक्तवदाभासमें ) एक की अरूकारता ओर दूसरे कौ अल्कायैता 
वाच्यवाचकभाव पर निर्भर हे आश्रयाश्रयिभाव पर नदीं । { यदि पुनरुक्तवदामास शब्दस्वरूपनिष्ठ 


पुनसक्तवदाभासः ५७ 


माना जाय तो उसमें वाच्याथक्ञानके विना भी अल्कारत्व मानना पडेगा जो अनुभवविरुड 
दोगा । वस्तुतः जव अथांका ज्ञान होता है तव उनमें पौनरुक्त्यका ज्ञान होताटहै ओर तव 
चमत्कार इसीकिएट स्वयं पूवेपक्षी ने भी 'पुनरक्तार्थवाचित्व' इस प्रकार वाच्यवाचकभाव को 
अपने पक्ष में प्रस्तुत किया ह । इसीकिए, जेसा कि हमने पहले कहा है, अथं के ( उपमा, रूपक, 
उत्प्रक्षा आदि ) सभी अल्कार रान्दा्कार माने जा सकते है क्योकि उपसमितार्थवाचित्व ८ आरो- 
पिताथवाचित्व, उत्प्रेक्षिताथैवाचित्व ) इत्यादि धमं रखाब्द मेँ रहते ही हैँ । | 

तीसरा पक्ष भी अमान्य हे क्योकि पुनरुक्तवदाभासः यदह संज्ञा अन्वथं संज्ञा है (इसमे स्वयं 
दाब्द ही अपना प्रतिपा अर्थं प्रतिपादित कर देतादै क्योकि वह यौगिक शब्द है) इसके 
अतिरिक्त यहाँ जो अलंकारो का विवेचन कियाजा रहा है वे पौनरुक्त्य-जनित अल्कार ही हैँ 
अतः यहाँ आगे आने वाले देष कौ चचां अप्रासंगिक ओर अनुपयुक्त है । वह ( रेष ) तो यों 
एक निमित्त भर है जिससे अथपोनरुक्त्य प्रतीत हो सके । ओर निमित्तनिमिन्तिभाव तो अल्कारत्व 
का प्रयोजक होता हे नदीं । इस प्रकार ( तीनों पक्ष अमान्य ब्दरते है ओर पुनरुक्तवदाभास से 
(शब्दस्वरूपाध्रितत्व या शब्दारुकारत्व का ) कों विवाद देष नहीं रहता । 

उक्त देतुओं से यदी मानना उचित हे कि पुनरुक्तवदाभास अर्थाल्कार ही दहै क्योकि यँ 
पोनरुक्त्य का आश्रय अथी है। 

इसी प्रकार ( पुनरुक्तवदाभास ) कौ वक्त्रलंकारता ८ वक्ता = कवि; तद्गत अकलंकारता १) 
भौ निरस्त हौ जाती दहे क्योकि वक्त्रल्कार तो सभी अल्कारोको कहाजा सकता दै क्योकि 
वे सव ॒वक्त्रतिशयस्वरूप होते हं । [ वक्त्रलकार से संबन्धित यह पंक्ति रत्नाकर के पुनरूक्त- 
वदाभास प्रकरण कौ परिकर कारिकाके वादक पक्ति पर निर्भर प्रतीत ह्योती है जिसमें 
अकार को कविप्रतीतिरूप धमे माना हे ] 

विमश्च॑--अलंकारसवंस्वकार के विरुद्ध रत्नाकरकार ने पुनरुक्तवदामास को शब्दालंकार माना 
हे । उन्होने इसके समथैन में तवा प्रस्तुत करते हए कहा है कि यौ जो अधं पुनरुक्त 
प्रतीत होता है वह अपने आप मे असत्‌ है ओर उसका ओ आमास होता है वह भी उसका धमं 
न होकर प्रमाता का धमं हे जवकि अलंकार प्रमाताका धमं नहींहो सकता । स्क्षेप मे उनका 
मूरविवेचन इस प्रकार है- 

सू° आसुखेकाथपदं पुनरुक्तवदामासम्‌ ॥ १ ॥ 

वर" " "" " "आयुखतुल्या्त्वस्य च खब्दधम॑त्वेन शब्दाश्रयत्वाच्छब्दालंकारोऽयम्‌। न त्वथधभैःपौन- 
रुक्त्यमखंकार इत्यर्थालंकारता वाच्या, अधंस्याविचमानत्वात्‌ ।** "न च वाच्यं पारमाधिकत्वम्थैस्या- 
लुपयोगि;, प्रतीत्तिमाव्रसारत्वात्‌ काव्यस्येति, अवभासमानत्वमपि न शब्दस्यार्थस्य वा धमः, 
किन्तु प्रमातुः, तस्य तथा संविदुत्पत्तेः ।*“*न च प्रमात्राश्रयो धमः काव्यस्यालंकारः। न च छृत्रिम 
स्यास्य पौनरुक्त्यादेंम॑स्यार्थोपस्कारकत्वं युक्तम्‌; असत उपस्कारहेतुत्वासंमवात्‌ । न चावभास- 
मानपो नरुक्त्यालङ्कृतेन कृत्रि मेणाथंनाङृतनि मस्य अरिवधदेहशरीर' इत्यादौ रिपुस्द्युप्रदचेष्टदेर- 
ति्यः कश्चित्‌ प्रतीयते, येन तदुपस्कारकता स्यात्‌ । चमत्कारित्वं त॒ ब्दस्य रूपयेरिष्टय- 
निबन्धनम्‌ ।› 

| अनन्वितत्वात्‌ कायादेवांच्यत्वं न प्रकल्प्यते । 

मुख्याथवाधसंबन्धफराभावान्न रक्ष्यता । 
असंबन्धाभिधायित्वप्रसंगाद्‌ व्यंग्यतापि वा। 
अक्त्रिमस्य चाभ्स्य न धर्मः पुनरुक्तता । 


५५८ अलङ्कारसवस्वम्‌ 


पुनरुक्तोऽपि वा तच्वे स एव स्याद लकरृतिः 1 
पौनरुक्त्यमलंकारस्तेनाथैस्य न कस्यचित्‌ ॥ 
इति परिकरदलोकाः । 
तस्यात्‌ सवत्र काव्यस्य वस्तुतः, कविप्रतिपादनया वा, संभवी कथित्‌ तत्प्रतीतिरूपो धर्मविदोषः 
दाब्दागतोध्ंगतो वाऽरुकारतया वाच्यः । इद त्व्थाुकारत्वे पूर्वोक्तनीत्या विरोधादिवत्‌ कवि- 
म्रतिपादनया वान संभवी कथ्िदर्थगतोऽपि धर्मविद्दोषः, इति “अरिवधदेहदारीरेः-त्यादौ कायादि- 
वाचक्देहद्यारीरादिशनब्दसाधारणं विरिष्टं रूपमेकाथैत्वेनावभासमानं तदधमंत्वेऽलद्कार इति साघु । 
पदमत्र अथेप्रतीतिक्रत्‌ , न त॒ सु्िडन्तमेव । शस प्रकार रत्नाकरकारने सभी प्रकार की पद 
सम्वन्धीशभ्मान्यता कामी खण्डन कियादहे। पद का अथं केव अथं प्रतीति कराने वाला राब्द 
करते हं जव कि सवेस्वकार ने पद को सुबन्त ओर तिडन्त राब्द में विमक्त किया धा । 


विमरिनी 


विस्तरभयादिति । न तु चिच्रत्वाभावात्‌ । नोच्यन्त इति । वस्तुतस्तु सभवन्व्येवेव्यथः \ 
अतश्चायं प्रायो वाक्याथंपदार्थाश्रयव्वास्प्रथम द्विधाभवन्‌ समस्तासमस्तपदस्वेन चतुविधः । 
क्रमेण यथा- 
तदिनक्तितिश्छद्यष्मान्पाताव्सवंन्न[- | सवं दा[- | ख्यातः । 
हिमवानवतु सद्‌ा वो विश्वत्र समागतः ख्यातिञ्न्‌ ॥ 
'नदीभ्रकरञु्लिङ्गितवन्तं मनोहरदहस्तमव्यजन्तं च, सपर्याणां रुचि वहन्तं सवं पूज- 
नीयं च, सङम्मं सकरशं चरन्तं च, सद्‌ानदन्तं मद्‌ पयांविखूद शनं च, करटं कमपि विश्चतं 
कवाटविश्रमञयुञ्चन्तं च, कुञ्रराजिवधितरुच वारणरणरणरणिकाकुलितं च, राजमानवि- 
सखंधायिनं विराजमानं च, शारीभूतं मदसच्टिनि श्वरीभूतं च, इति पुनस्क्ताश्रयम्‌ः 
इस्य नङ्गखेखायां हस्तिव णने । 


'वतहन्तासितः कालो गोविभावसुदीधितीः। 
ज्तिपास्य रत्ताव सितश्वेतराजयदोभय ॥' 
असमस्तपदं तु अन्थक्रतेवोदाहृतम्‌ । 
विस्तरभयादिति = विस्तार केभयसे;, न कि चित्रत्व के अभाव से। नोच्यन्त इति = नदीं 
वतलाए जा रहे यदपि हो सक्ते हें भेद कीदृष्टि से इस पुनरुक्तवदाभासरुकार को पहलेदो 
भागों में वार्य जा सकता दै वाक्या्थैगत ओर पदार्थगत । तदनन्तर प्रत्येक के समस्तपदगत ओर 
असमस्तपदगत इस प्रकार दो दो भेद करके चार प्रकार कामाना जा सकता दहे । इनमें से एक. 
एकं कै करमदयाः उदाहरण ( वाक्याथगत समस्तपद्‌ाश्चित पुनरुक्तवदाभास ) 


[ इसमे पुनरुक्तार्थं इस प्रकार दै- 

सर्वदा ओर खदा, सर्वत्र ओर विश्वच्र ( विदवदाब्द भी सववाचक है) ख्यातः ओर 
ख्याति को समागत प्राप्त, तुहिनक्षितिश्ठद्‌ = वफीी स्थली से युक्त ओर हिमवान्‌ दहिमसे 
युक्तं ८ पवंतराज हिमालय ) युष्मान्‌ तुम्हारी ओर वः = तुम्हारी पातात्‌-रक्षा करे ओर 
अवतु = रक्षा क्रे । 

परिहार = तुहिन = वफे तथा क्षिति = प्रध्वी को धारण करने वाखा; सवेत्र सव॑दा ख्यात = 
सवं = सवकी त्र = रक्षा करने वाला, सवं = सव कुक द = देने वाखा आख्यात = कहा जाने वाखा 


काकाः = च कि जो कि प नि + (म 


पुनरुक्तवदाभासः ५५९. 


वः = ( नाम प्रथमाक्षर यहण करके ) विष्णु स्वरूप; विश्वत्र = विश्व भर में सर्वत्र, सदा = सव कालों 
मे ख्याति को प्राप्र समागत हिमवान्‌ ) = पवेतराज हिमाचल युष्मान्‌ = तुम सवको पातात्‌ = अधः. 
पतन से अवतु = वचवि । यदहोँ पूवांद्धं ओर उत्तरं के वाक्याथ प्रथम पक्षम एकाथं हे ओर 
(सवत्र सव॑दा ख्यात में समास है अतः यह उदाहरण वाक्याथगत समस्त पदाभ्चित पुनरुक्तवदा- 
भास का हआ । 

वाक्याथैगत असमस्त पद्‌ त्रित पुनरुक्तवदाभास यथा अनंगङ्खा मे “नदी प्रकरमुलिग- 
तवन्तम्‌” इत्यादि हर्तिवणेन । 


इस मे पुनरुक्ताथं = 

दीभ्र = चमकने हए कर = ुण्डादण्ड को न उर्किगितवन्तम्‌ = न छोड़ते इट मनोहर = 
सन्दर इत = शुण्डादण्ड को अत्यजन्तम्‌ = न छोड़ते हए ( तो ) स्पर्यांणां = सपर्यांओं = पूजाओं 
की रुचि शोभा को धारण किए हए तथा सवत्र पूजा पा रहे, सङुम्भनछुम्भ (मस्तक) से युक्त तथा सक- 
कद = ङुम्भ के साथ चरन्तं = चख्ने वाले सदान = दान = मदजल से युक्त दोँत वाले तथा 
मद्‌ = मदजल से पर्याविल = भगे इए है ददन दांत जिसके कमपि किसी एक करट = कौर को 
धारण किए हृष ओर कवाटवि = कव = ऊुस्ितद्रन्य = मल आदि पर अट = घूमने वाला वि = 
पक्तौ = को, उसके ज्म = घूमने को असुंचन्तम्‌ = न छोडता हृञा ( १), कुंजर = हाथी उसके 
साथ आजि = युद्ध उसमें वदी दे रुचि = इच्छा जिसकी ओर वारण = हाथी उसके साथ जो रण = 
युद्ध उसके किष रणरणिका = इच्छा, रसे आङ्गुरिति, राजा के मान के विसंधायी = दूर करने 
वाला वि = विगत दे दूर दै राज = राजकीय मान जिससे मदजल से शारीभूतः अनेक वर्णमय, 
ओर रावटीभूत = अनेक वणेमय इस प्रकार पुनरुक्त के आश्रय हाथी को `-- । 

परिहार = नदी प्रकर = नदौ समुदाय को उछिगितवन्तम्‌ = पार करते हुए सकर व्यक्तियों का 
रं = कर्याण, चरन्तं करते एए ( दाथी का दरोन शुभ माना जाता है) । सपर्याणां पर्याण = ङुध 
पालकी या हौदे से युक्तः सदानदन्त = सदा नदन्तम्‌ = चिधाङते, करटं = गण्ड को, कुजाराजि = 
कुजो कौ राजि रपत, विराजमान = शोभित हो रहे, इव ( दलेष म स-श-के अभेद से ) = 
सवर = वल्दाली । 

[ यहाँ पूरे वाक्य मे पुनरुक्ताथैता हे किन्तु वैसे अधं प्रतिपादक पदों मँ समास नदीं है अतः यह 
वाक्याथंगत असमस्त पदाश्ित पुरुक्तवदाभासः का उदाहरण हआ । | 

पदा्थगत समस्त पदाश्चित पुनरुक्तवदाभास यथा- “वतहन्तादि" पद्याथे । 

पुनरुक्ता = वत = खेद, हन्त = खद, असितः = कृष्ण वणे का कालः = छृष्ण वणै का, गो = 
किरण, विभा = किरण, वसु = किरण, दीधित = किरण; क्षिप = फेंको अस्य = फको; रक = रस्ता 
करो; सित = सफेद, इवेत = सफेद; राजय = विराजित होओ, शोभय = विराजित हो । 


परिहार = दुःख की वात है कि असित काल कृष्ण पक्ष गो = चन्द्रमा ( गौः स्वँ वृषभे रमौ 
वक्त्रे चन्द्रमसि स्पतिः = विव प्रकारा ) ओर असित काल = वां ऋतु अथवा दक्षिणानय सूयं = 
( विमावखुदिनमणो हारमेदे च पावके = पिखप्रकाश ) कौ दीधिति = किरणों को हन्ता = सूयं 
समाप्त करता । हे अभय ओर रक्षा मे अवित = रुगे उवेतराज अस्य = इसके यद्ध को क्षिप = 
हटाओं 1? 

य्ह पदाथैमात्र मे पुनरुक्ति है । ओर जिन पदार्थौ मे वह है उनके वाचक पदों मँ समास है अतः 
यर्दो पदाथेगत समस्तपदाशित पुनरुक्तवदाभास है । 


ॐ रि 2 (न , 1111 मकाः । 
~~ ।। 4 
# 14 


द° अलङ्ारसवंस्वम्‌ 


पदा्थगत असमस्तपदाधरित पुनरुक्तवदाभास के उदाहरण स्वयं गनन्धकारने दही प्रस्तुत कर 


दिएहें। । 
यहाँ तक अर्थगत पौनरुक्त्य का विचार कर अव दाब्दगत पौनरुक्त्य पर विचार करते दे- 


[ सवंस्व | 
[8०४] शब्दपौनशूक्चयं व्यञ्जनमात्रपौनरुकस्यं स्वरब्यञ्जनसम्‌- 
दायपोनस्कस्यं च ॥ 
१ अटंकारभ्रस्तावे केवलं स्वरपौनख्क्त्यमचारख्त्वान्न गण्यते इति देचिध्य- 
मव । 
[ सू०° ४ | शब्दपौ नरूक्व्य | केवर दो प्रकार का होता ] व्यंजनमाच्र का पोनरक्स्य 
तथा स्वरग्यंजन दोनों के सुदाय का पौ नरकस्य ।1" 


० 


[ ब्र° | अरकारप्रकरण मेँ केवल स्वर का पौनरुक्त्य चमत्कारकारी नदीं होता इसलिए 


दोही मेद वतलाए । 
| विमरिनी 
केवरस्वरपौनद्क्त्यं किं न गणितमिव्याशङ्कयाह-अल्कारेत्यादि । यथा- 
इंदीवरम्मि दंदम्मि इंदआलम्मि दं दिअगणम्मि । 
इंदिदिरम्मि इदमि जोदृण्णो सरिखसंकप्पो ॥° 
अत्र स्वरपौनस्वस्यस्य चारूवाभावान्नाटंकारस्वम्‌ । 
तत्र केवरुव्यज्ञनस्वरव्यज्जञनससुदायाश्रितमलूकारद्यं कच्तयति-संख्येत्यादिना । 
“केवर स्वर्‌ का पौनरुक्त्य [ एक तीसरा मेद दो सकता था उसे ] जयां नहीं मिना इस दाका 
प॒र उत्तर देते हट छिखा “अलंकार” इत्यादि 1 [ केवर स्वर के पोनरक्त्य का उदाहरण ] यथा- 
ददीवरम्मि" " “2 इत्यादि प्य । यदौ स्वर ८ इकार ) का पौनरुक्त्य तो है किन्तु उससे कोड चम- 
त्कार नहीं हो रहा अतः उसे अल्कार नहीं कदा जा सकता [ अल्कार्‌ हे यर्दा तुल्ययोगिता या 
दीपक |। 
-उक्त दोनों चब्दपौ नरुक्त्योँ में से केवर व्यंजनगत पौनरुक्त्य ओर्‌ स्वरव्यज्ञनगत पौनरुक्त्य, 
| इन दोनो में जो जो अलंकार होते हैँ उनका लक्षण करते ह- 
[ सवंस्व | 
। [ 9 ५1 [क छ ५.५ ५२१ 
म्र° ५। सख्यानियमे पूवं छेकानुप्रासः ॥ 
द्योध्ये्ननसम्रुदाययोः परस्परमनेकधा साददयं संख्यानियमः । पूर्व 
व्यञ्जनसस्युदायाधितं यथा-- 
कि नाम ददर दुरध्यवसाय सायं 
कायं निपीञ्य निनद्‌ कुरुषे रुषेव । 
| पतानि केकिरसितानि सितच्छदाना- 
| माकण्यं कणंमधुराणि न ठज्ितोऽसि ॥' | 
॑ अश्र सायंशब्देनास्याटकारस्य यकास्मा्रसादश्यापेश्चया चच्यलु प्रासेन 
सदेकाभिघानटक्षणः संकरः । ऊेका विदग्धाः । 


केकाचुप्रासः दश 


[ सू० ५ ] “संख्या यदि नियत हो तो प्रथम [ व्यंजनपौनस्क्रय | डेकानुभ्रास [ कह- 

लाता | ॥ 

[ चर० ] व्यजनो के दो समुदायो मे एकाधिक वार साट्द्य का होना संख्यानियम [ या संख्या 
का नियत दोना ] हे । प्रथम अथात्‌ व्यंजनसमुदायाधित [ पौनरुक्त्य, उसका उदाहरण ] यथा- 
कि नाम ददुर० इत्यादि संस्कृेतपय । [ इसका अथं इस प्रकार हं ] “अरे नासमञ्च मेदक ९ 
गुस्सा सा होकर इस समय शामको पुरा रारीर कपा कर इतनी उर-टरक्यो कर रहादहे 
इन उञ्ञ्वठ पंख वाले हंसोंकी श्रतिञखद क्रीडामयी सरस वाणी सुनकर तञ्चे रुष्ना नहीं 
आती ?" यदह [ द्र दुर ओर साय सायः" इस प्रकार दो दो व्यजनं की नियत संख्या मे आवृत्ति 
है अतः दछेकानुप्रास ह, ओर सायं कायं इन दो पदां मे केवर ] यकार की आवृत्ति है अतः [ यह 
वृत्यनुप्रास दै फलतः ] सायं राब्द मे [ दुरध्यवसाय के साथ चछेकानुमास ओर काय के 
साथ बृत्यनुम्रास होने से ] वृत्यनप्रास के साथ [ छेकानुप्रास का] एकवचनानुम्रवेद् संकर है । 
च्व का अर्थं दे विदग्ध | 

विमर्श-प्रतीदारेन्द्राजने छेक को घोसलों में रहने वाके पक्षओं का भी वाचक माना है- 
छेकदाब्देन कुलायाभिरतानां पक्षिणाममिधानम्‌ , तदुक्तम्‌-छेकान्‌ गहेष्वसिर तानुरान्ति सखगपक्षिणः? 
इति । जो पक्षी घोसलों में रहते हें वे दूसरों से सताए नदीं जाते, अतः उनकी बोली इसी अनुप्रास 
के समान स्वभावतः मधुर होती दै-^तेषां कुलायाभिरतत्वादन्येन केनचित्‌ अनायास्यमानत्वमने- 
नातुप्रासेन सदी मधुरा वायुच्चरति 1 

विमरिनी 
एकवचनस्य जाया बहुस्व प्रसङ्गादहइव चनस्य च जयादीनां स्वयमेव वहुव्वात्संख्या- 
नियमो द्धिव्व एव संभवतीति द्वयो रिव्युक्तम्‌ । दइयोरप्येकधा सादृश्यं वृच्यनुप्राख एवे- 
व्याश्ङ्कयाह- अनेकेति । यकारमात्रेव्यनेन इयोरेव सादश्यमस्य जीवितमिति ध्वनितम्‌ 1 
यद्यपि चायं व्यञ्जनमान्रपौनर्क्व्याख्यस्य सामान्यलकणस्य संभवादूनुप्रास एवान्ये 
रन्तभां वितः तथाप्यस्य मन्थता उद्धटमतानुरोधादिह रुक्तणं कृतम्‌--अन्यथेत्यादि । 

दयोः इस प्रकार जो द्विवचन का प्रयोग किया गया उसका अथै यह है कि संख्यानियम 
केवर द्विवचन मे ही संभव हे, जहाँ तकृ एक वचन का संवन्ध है उसे जाति परक मानकर बहुत्व- 
प्रक मानना होगा ओर बहुवचन में बहुत्व के कारण संख्यानियम हो नदीं सकेगा । दो व्यज्न- 
सम॒दायां का साद्रद्य भी यदि केवर एक वार ही धरित हो तो वह इत्त्यनुप्रास होतादहे। इसी 
लिए छेकानप्राप्त मे “अनेकधा” शाब्द का प्रयोग किया गया। यकारमात्र कहने का अभिप्राय यह 
हे किं चेकानुप्रास विनादो व्यज्ञनों के सादय के संभव नहीं ( यदहं केवर एक ही व्यजन का 
साष्स्य हे ) 

य्यपि यदह छेकानुप्रास अन्य आचार्यो द्वारा सामान्य अनुप्रासमेंदहदी गिन च्या गयाहे 
नयोकि इसमे सामान्य लक्षण व्यजनमात्र पौनरुक्त्य समन्वित हो जाता है, तथापि अन्धकार ने 
उद्भट के अनुसार यहां [ छेकाुप्रास्र का ] लक्षण अलग किया [इस तथ्य का निदेश करते हुए 
अगला सूत्र प्रस्तुत कर रहे है--] प 
| सवस्व | 

[सर्‌०६] अन्यथा तु बृत्यतुप्रास्रः ॥ 

करवरव्यसनमाचसादद्यमेकधा समुदायसादश्यं उयाद्‌ीनां च परस्परः 

सादश्यमन्यथाभावः । चत्तिस्तु रसविषयो व्यापारः । तद्वती पुनवेणेरचनेद- 


२ अच्छङ्कारसवस्वम्‌ 


चृत्तिः। सच पर्षकोमटमध्यमव्णारन्धत्वात्िधा । तदुपलक्षितो ऽयम- 
नुप्रासः। यथा- 


'आयोपेन परीयसा यद्पि सा वाणी कवेरामुखे 
खेटन्ती परथते तथापि कुरुते नो सन्मनोरञ्नम्‌ । 

न स्यायावदमन्द खन्दरगुणाटकारद्यांकारितः 
खपरस्यन्दिठसद्रसायनरसासाराल्रसारी रसः ॥ 


यथावा- 


स्याः पन्नगपूत्कृतानठरशिखा नाराच पाल्योऽपि चा 
राकेन्दोः किरणा विषद्रवस्ुचो वषसखु वा वायवः । 

न त्वेताः सरलाः सितासित ख्चः साचीकताः सालसाः 
साक्रूताः समदाः करङ्गकट रां मानालुविद्धा दशाः ॥? 


[ सू० ६] ओर नहीं [ यदि संख्यानियम नहो] तो | व्यञ्जन पौ नरूक्स्य ] 
वृत्यनुप्रास [ कहटाता हे ] 


[ बृ० |( १) केवर [ एक | व्यज्जनमत्र का साद्रदय; (२) केवर एकव(र सय॒दायसाट़दय 
तथा (३) तीन [ चार ] आदि [ संख्या वाटे व्यजनं का ] परस्पर साद्य य है अन्यथाभाव 
[ अथात्‌ छेकानुप्रास कौ स्थिति से दृत्यनुप्रास कौ स्थिति का जन्तर ][ बत्त्यनुप्रास शब्द में ] 
इत्ति का [ मूलमूत ] अर्थं॑तो दै रसविषयक व्यापार विन्त यां इत्ति है उस [ रस विपयच्‌ 
व्यापार ] से युक्त वर्णरचना । वह्‌ [ रचना ] परुष, कोमर ओर मध्यम इन ती प्रकार के वर्णो 
से युक्त होने के कारण तीन प्रकार की द्ोती दै। यद अनुप्रास उससे उपलक्षित त 
उदाहरण है--“आटोपेन पटीयसा०' इत्यादि [ संसरते पद्य | । [ इसका अथं है ] (दृ 


आयोप से यद्यपि वह वाणी ८ वाग्देवी ओर कविता ) कवि के आमुख ८( आरम्भ ओर घल भ) 
खेती रहती है ओौर विस्तार को भौ प्राप होती दै किन्तु उतने पर भौ भरे चिन्तको वह॑तेव तक 


खदा नहीं कर पाती जव तक उज्ज्वल ओर सुन्दर गुणो स भारो से इत, प -छच्स्ति 
रसायनरस की बौष्ार जेसा वह रस न हो 1 अथवा जंसे-““सद्याः पन्नगपत्कृता ०? इत्यादि 
संस्कृतपय । [ इसका अथं हे--] 

८5(/ की फुफकार से उत्पन्न अग्निरिखा हो या वार्ण की पति, पूणचन्द्र की तरर गरल आती 
किरणं हँ या पवन के [ विषठुल्य ] पानी की णहार [ विद्रव | किण हए वरसाती लोके, सब 
सद्य है । विन्तु ये जो ृगनयनिर्यो ॐ मानभरी सर दवेतरयाम, तिरी, अलसाई, भावसरी, 
ओर मदमाती चितवनें हैँ ये कथमपि सद्य नदीं ।'! 


विम-संजीविनीकार के अनुसार दोनों उदादरणोंँ मंसे प्रथमके चारो चरणो मे कवल 
व्यज्नसाम्य है । उसमे भी “अलकारस्चांकारितः' इसमे एकवार सस॒दायसाद्ररय ह ओर “रसायन- 
रसासारानसारी रस" मे तीन व्यज्जन समुदाया का साद्ररथ हे । इसी प्रकार “आटोपेन पटीयसा" 
सं गौडी रीति है, अमन्दखन्दरः इत्यादि में वैदी रौति ओर “गुणाल्कारघ्चांकारितः” में पांचाली 
रीति दै । इसका निणैय उन-उन पदों से निकलने वले अर्थो से होता हे । 


कनन - 


पिः जि रेः + + न 


चृत्ययुप्रासः ६३ 


इसी प्रकार दितीय पच में संजीविनीकार के अनुसार केवर व्यज्नपौनरुक्त्य है । वृत्ति परुषा 
दे क्योंकि यहां रोष का वणैन है । स्ंजीविनीकार ने ही 'सारुस' ओर (मानानुविद्ध पर इस प्रकार 
रिप्पणी की दै- 

सास = पदचात्तापपूवंक रोरती इदं चितवने, जैसा किं भावप्रकाश मे [ दारदातनय ] ने कहा 
दै-“आलस्य वह भाव हे जिसमे ल्ञ्नादि अमीष्ट विषयों से विमुखता आवे" = आलस्यं तदमी- 
छटाथाद्‌ ब्रीडादेयेन्निवत्तंनम्‌ ।› 

मानालुविद्ध = रोषारुण, मान अथात्‌ देखे या खने किसी अपराध से उत्पन्न रोष, उससे जलती 
दईं चितवन । “दृष्टश्चुतापराधजन्मा रोपो मानः, तेन समुचिताः ज्वलत्कस्पा इत्यथैः 1? 

इन दोनों भेदौ को संजीविनीकार ने वणांरूकार कहा है ओर आगे अने वाले यमक को 
हाब्दारुकार । 


विमरिनी 
एतदेव मेद निर्देशं कुव॑न्ग्याचष्टे केवरेत्यादि । सखञ्ुदायः पारिशेष्याद्‌ व्यञ्जनद्वयरूपः। 
एकेति चात्रेव संबद्धब्यम्‌ । केवरस्य च्यादीनां चानेकधापि सादश्यस्यानेन व्याप्त 
स्वात्‌ । एतच्च समस्तासमस्तान्षरत्वेन संभव तीत्यस्य प्रायः षट्‌ प्रकाराः । कमेण यथा-- 


यया यायास्यया यूययो यो यं येययायया । 
ययुयायि ययेयाय ययेयायाय याययुक्‌ ॥' 


असमस्ताक्तरं त॒ अन्थकृतेवोदाहृतम्‌ । 


ष्ठी नादीनां ददो दानं निननाद्‌ दिने दिने। 

निदिन्द्‌ नन्द्‌नानन्दानदुनोदिननन्दनम्‌ ॥' 

रुच्याभिः प्रचुराभिस्तरश्िखरापाचिताभिरुचिताभिः। 
अचिररुचिरुचिररुचिभिश्चिराचिराभिश्चमरक्रतं चेतः ॥° 
(ततः सोमसिते मासि सतत संमतं सताम्‌ । 
अतामसोत्तममतिः सती सुतमसूत सा ॥ 

कमलरदश्ः कमरामलकोमलकमनी यकार्तिवपुरमलम्‌ । 
कमरङ्करुते तावच्कमलापतितोऽपि यो विमलः ॥ 


आदिशब्दाचतुरत्तरादेगरंहणम्‌ । यथा- 
स ददातु वासवादिदेवतासंस्तवस्तुतः। 
सदा सद्वसति देवः सविता विततां सताम्‌ ॥ 
वणर चनेह वृत्तिरिति । उपचारादिति भावः । त्रिेति । यदुक्तम्‌- 
'कशाषाभ्यां रेफसंयोगेष्टवर्गेण च योजिता । 
परुषा नाम वर्तिः स्याद्ह्ृहद्याचेश्च संयुता ॥ 
सरूपसंयोगयुतां मूधेवर्गान्त्ययो गिभिः। 
स्पशंयुंतां च मन्यन्ते उपनागरिका बुधाः ॥ 
ोषवणे यथायोगं रचितां कोमराख्यया । 
ग्राम्यां रत्ति प्रशसन्ति कान्येष्वादतवबुद्धयः ॥ [ उद्धट काञ्या. सं. $ ।४-६ | 


= ~~ -क -- 


। 
, 
। ५ 


^ 


६8 अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


यथा- 
निर्वि निर्गर्द्र ख्गुकाकरकेगंरेरमी तडिति ताडितोङ्मरडिण्डिमो ङामराः । 
मदाचमनचच्ुरग्रचुर चच्चरी कोचयाः पणः परिणति क्तणन्तततटान्तरा दन्तिनः ॥ 

अत्र कुकारादयाव्रच्या मभ्यमत्वमिति व्रत्तित्रे विध्यस्‌ । 

[ छेकानुम्रासक से वृत्त्यनुप्रास के ] इसी [ अन्तर ] की व्याख्या भेदका निर्दा करते इए 
कहते दे-केवरु इत्यादि । समुदाय-अथांत्‌ दो व्यञ्जनं का, क्योंकि वही शेष वचता है [ एक 
ओर तीन व्यजनो का सादृदय यहीं आगे ओर पीछे वतला दिया गया द] "एकधा = एकवार ` 
दसका भी संबन्ध इसी [ दो व्यजनो के समुदाय से करना चादिए । एक ओर तीन चार आदि 
[ अर्थात्‌ दो से अधिक सव ] व्यञ्जनां छा अनेकवार हुए साद्रदय भी इसी [ वृत्यनुप्रास ] मेंआ 
जाते हे) यह अनुप्रास समस्त ( समी ) अक्षरा मे ओर असमस्त ८ कत्तिपयमात्र ) अक्षरोमेंदो 
सकता हे इसलिए इसके [ एकन्यजनगतानेकसादृदयः, द्र यधिकव्यजनगतानेकसादु खय तथा व्यज्जन- 
दयगतेकसादुदरय इन तीन भदा को समस्ताक्षर ओर ओर असमस्ताक्षर इस प्रकार दो-दो प्रभेदो 
मे विभक्त करने से ] प्रायः छ भेद होते हे । एकणकका क्रमद्याः उदाहरण यथा 

( 4 ) एकव्यज्ञन समस्तात्तर-“यया यायाय्यया ०? इत्यादि पृणे पद्य । 

(२ ) इसी के असमस्ताक्षर का उदाहरण स्वयं मन्धकार द्वारा प्रस्तुत है 1 

(३ ) व्यञ्जनससयुदायद्वय समस्तात्तर-“दीदादीनां ददौ दानम्‌" इत्यादि पय । 

[ अर्थं है-उसके ] दीन आदि को ( संप्रदान में षष्ठी ) दान दिया, प्रतिदिन निनाद किया, 
नन्दन ८ स्वगों्ान ) के आनन्दो की निन्दा की ओर इन-नन्दन = सूयंपुत्र = यम॒ को 
दुखी किया? । 

( ट ) उसी में असमस्ताक्षर = “रुच्याभिः प्रचुराभिः'' इत्यादिषचरत्न । [ अर्थं है-- रुचिर 
मात्रा मे प्रचुरः, डाक की पकी, छंक छककर खाई इड ओर रण मं बिजली के समान चिरा [ निर्णय- 
सागर संस्करण कौ टिप्पणी . के अनुसार कदमीर के खानि ] नामक फं से चित्त बहुत दिनों 
सेच्कादे) 

( ५ ) अनेकव्यजनगत० समस्ताक्षर = “ततः सोमसिते मास्ि०”” इत्यादि पृद्य । ६ 
“उसके पश्चात्‌ तामसीवृत्ति से रहित ओर उन्तम मति वाली उस सती ने शुक्ल पक्षे 
समादरत सुत को जन्म दिया ।°› | 

(६) उसी का असमस्ताक्षर = ' कमलशब्द ध्र इत्यादि पच । [अर्थं है--्चिष्णु सेमी 
अधिक छन्दर मा भाग्यश्चारी रेरा कोन सौभाग्य शाली पुरुष द -जितै कमटनयंतां 
का निमल ओर कमला | [ लक्ष्मी ] या कमल क समान ८५. ओर कमनीय कान्ति वा 
अल्करृत करता हे ? यहां केवर कमलः इन तीन न्य्नां का र सद्द है | 

आदि राब्दसे चतुरक्षर आदि का भी अहण क्रिया जा सकता हे उदाहरण यथा-स 
ददातु०” पद्य [ अ्थ--“इन्द्र आदि देवताओं द्वारा संस्तवा मे जिसकी सतुत्ति की गई है, वह 
सुयदेव सत्पुरुषो को सदा सद्वसति प्रदान करं ।'' यहांष्दः स, वतः इन वर्णौकी न 
आवृत्ति है ] 

वणंरचनेह वृत्तिः रव्दालंकारप्रकरण में वृत्ति का अर्थ वर्णरचना है अधात = उप २ 
[ लक्षणा | से । त्रिधा तीन प्रकार कौ, जैसा कि [ उद्धः ने ] का है--प्दा, ष, रेफ संयोग, रवर 
तथाः ह ह्य आदि सै, युक्त [ जो वणं विन्यास होता हे उस ] को परुषा वृत्ति कहा जाता हे 
काव्याल० सा० सं १।४]| 


सत्पुरुषो में 


चुत्यचुप्रासः ६4 


[क्क्‌,प्‌प्‌ आदि ] सरूपवर्णाके सयाग से युक्त, तथा स्प [क' से केकर “मः तकके] 
वर्णौ मसे प्रथम वणे के माथे पर अन्तिमि वणे के संयोग से युक्त वृत्ति को विद्रञजन उपनागरिका 
कहते हं 1 [ काव्याक०; सा० स० १९1५ 

[ उपर्युक्त दोनों वृत्तियां मे उपयुक्त वर्णो से ] शेष [ र्कार आदि ] वर्णो से यथायोय रचित 
ग्राम्या नामक वृत्ति को काञ्यप्रेमी जन कोमलादृत्ति कहते हें ` [ काव्यालं० सा० सं० १।६ ] 

[ इस तृतीय वृत्ति का उदाहरण ] यथा “निरगंर-विनिर्गल्द्‌ ० इत्यादि पद । 

[ इसका अथं ह--"“अबव, वेरुकावर पड़ रहे ओर गड़्-गड़ आवाज कर रहे गड के दारः तडा- 
तड्‌ ताडित वहत से विद्याक डिड्मों के कारण हड्वडाए, मदजलू के आचमन में निरत द्ुण्ड क 
दण्ड भोर) से धिरे तथा परिणति [ तियग्दन्तप्रहार ] कै क्षण [ उदास ] मे पवैत-तयौ को टूक- 
हरक करने वाठेये हाथी हे पण [ दत पर चदा धन ] 1 यहां लकार आदिः वेणौ की आदृृन्ति हे 
अतः यहां की वृत्ति मध्यम हं--इस प्रकार वृत्तियां तीन होतो हे । 

विमरो--वत््यनुप्रास के ल्िएिइन तीनों वृत्तियों के उदाहरण उद्धरने इस प्रकारदिणदैः- 

८ १ ) परुषा = “तत्र तोयादयाशेषव्याको दितकुरोदराया । 

चकारे कारा-कदारु-क परादासुखा रारत्‌ ॥? 

८ २ ) [ उपनागरिका मध्यमा |] = “सन्द्रारविन्ददृन्दोत्थमकर न्दम्बुबिन्दुसिः । 

स्यन्दिभिः उन्दरस्यन्दं नन्दितेन्दिन्दिरा केचिद्‌ ॥ 

( ३ ) कोमखा = “केलिलोखालिमाखानां ककः कोला रेः क्वचित्‌ । | 

| कुवती कननारूढश्रीनूपुर-रव-भ्मम्‌ > 

सजीषिनीकार ने अनुप्रास वे उक्त विवेचन पर निम्नङिखित संग्रहकारिका्ं बनाई हे-~ ` 

१--प्रकरष्टो वणैविन्यासो रसाच्नुगतस्तु यः । सोध्नुम्रासः स च च्छेकवृत्युपाधिवद्ाद्‌ द्विधा ॥> ` 

२-“सस॒दायद्वयं य॒त्र विविधं साम्यगरृच्छति । स च्डेकलालनात्‌ प्राज्ैः छेकानुप्रास इरितः ॥ 
३--“व्यजनन्यापृतिवृन्तिव॑ंणानां रसगोचरा । तत्संयोगदियं वर्णैर्‌ चना वृत्तिरिष्यते ॥ 

४--^सा वैदर्भ्यादिभेदेन तरिधा पूर्वेनिरूपिता । तयोपरक्षितत्वाच वृत्त्यनुप्रास इष्यते ॥° 

दण्डी-ने अनुप्रास का विवेचन माधुयेयुणके प्रसंगमें किया हे। उन्होने अनुप्रास को 
विवेचन अत्यन्त मनोवेज्ञानिक पद्धति से इस प्रकार किया है- 

वर्णावृत्तिरनुप्रासः पादेषु च पदेषु च। 
पुवानुमवसंस्कारवाधिनी यदयदूरता ॥ १ । ५५ ॥ ॑ 
अर्थात्‌ पादो ओर पदोँमे वर्णौ की ेसी पुनरुक्ति जिससे प्रथमोक्त वणे का संस्कार जाग 
सके अनुग्रासत कहकाती है । यह तव होती है जव पादो या पदों से अदूरतारहती है । शस तथ्य का 
दण्डी ने एकव।र पुनः दुहराते इए िखा-'अनुग्रासमिच्छन्ति नातिदूरान्तरश्चतिम्‌ ।' इनके पाद्‌- 
यमकः स लयानुप्रास का अन्तर्भाव हो सकता हे । 

भासह--ने अनुग्रास का सामान्य . लक्षण इस प्रकार किया है-.सरूपवणैविन्यासमनुप्रासं , 
प्रचक्षते ।› मेदो को उन्दने दो नाम दिए है-ग्रामालुप्रास तथा लरानुप्रास । भआमानुप्रस वदीहं । 
जिते लकितानुप्रास्त या कोमलानुप्रास कहा जाता है । इनके रक्षण भामह ने नहीं बनाए केव 
नामोव्टेख कर॒ उदाद्रणमात्र दिए ह । वामन ने अनुप्रास को वण-साम्यरूप माना दै-शशेष 
संङूपोऽ्लप्रासः? । शेष का अथं उन्दोनि इस प्रकार किया है-- 

'रदमैकाथेमनेकाथं च स्थानाजियतं तद्धमक्षरं च शेषः सरूपोऽन्येन प्रयुक्तेन तुस्यरूपोऽयुम्रासः!' ; 


९५ अ० सम 


द& अलङ्ारसवेस्वम्‌ 


सारूप्य को यावृत से भिन्न बतकाते हृ भी उन्दने छिखा दै-कात्स्न्यं नेवाृ्तिः, कात्लन्य॑नेकदेदाभ्यां 
तु सारूप्यम्‌" अथात आान्रत्ति में पूरे के पूरे पद को पुनः कडना पड़ता है जव कि सारूप्य मे इसके 
साथ उस पदक अंश्कामी पुनः कथन रहता दै । अनुप्रास के विषय में अत्यन्त रचिपूृण 
रिप्पणी देते इए वामन छिखते दै-“अनुल्वणो वणांन॒प्रासः श्रेयान्‌" वणानुप्रास वह अच्छा ददोतादैजो 
अधिक उत्कट नदीं होता । जो उत्कट होता है वह अच्छा नहीं 'उस्वणस्तु न प्रेयान्‌? । काटनुप्रास 
का उच्छेख वामन में नदीं मिलता, किन्तु उसका स्वरूप उन स्पष्ट दे । वे उसे पादानुप्रास कदते 
है । छेक ओर वृत्ति नाम भी वामन में नदीं मिर्ते । 
उद्धट-अनुप्रास का छेक, वृत्ति तथा काट नामक अनुच्छेद में प्रचरित वर्गोकरण प्रथमतः उद्धर 
मे मिता है । इसीलिए वृत्तिकार ने लिखा कि--छेकानुग्रास प्राचीन आल्कारिकों दारा सामान्य 
अनुप्रास मँ गिन छिया गया है ।› उद्धट का विवेचन इस प्रकार दे-- 
“छकानुप्रासस्त द्वयोदयोः ससद्रदोक्तिक्रतौ 1? यथा “गरिष्टगोष्ठी ०? । उनका वृत्यनुप्रास का 
विवेचन पिचले पृष्ठ पर दिया जा चुका दै । लाटानुप्रास पर उनका विवेचन इस प्रकार हे - 
“स्वरूपार्थाविद्ोषेऽपि पुनरुक्तिः फलान्तरात्‌ । 
राब्दानां वा पदानां वा ल्टानुम्रास्र इष्यते ॥' 
अर्थात्‌-श्वाब्द अथवा पदोँ मे, स्वरूप ओर अथं मेँ अन्तर न रहने पर भी तात्पयं मेँ अन्तर 
होने मात्र से की गईं पुनरक्ति लागनुप्रास मानी जाती है इसकेभेद पाच मने (१९) 
स्वतन्तरपदाव्रन्नि, ( २ ) परतन्त्रपदावृत्ति, ८ ३ ) स्वतन्त्रपदाव्रत्ति, ( ४ ) परतन्त्रप(दावृत्ति तथा (५) 
स्वतन्च-परतन्त्रोभयात्मकपदानब्र्ति। उद्धट ने इनमें से प्रत्येक के उदाहरण भी दिए हें । सवैस्वकार ने 
(काराः कादा इवः पच उद्भट सेदी ख्या है। उन्होंने इते स्वतन्तरपदादृत्ति के उदाहरणकेरूप में 
दिया था । सर्व॑स्वकार के सभी उदाहरण इसी एक मेद्‌ तक सीमित ह । 
र्द्रट-ने अनुप्रास कौ केवल वृत्त्यनुप्रास तक सौमित रखा है । उन्दने छेकानुप्रास तथा 
लाटानुप्रास को अपने काव्याक्कार में स्थान नदीं दिया । अनुप्राससामान्य का लक्षण उन्दने इस 
ग्रकार दिया दै- 
एकद्वित्रान्तरितं व्यज्जन मविवक्षितस्वरं वहाः । 
आवव्यंते निरन्तरमथवा यदसावनुप्रासःः ॥ २।१८ ॥ 
यदां अनुप्रास का नाम तो व्च्यनुप्रास नदीं मिता, परन्तु इस सदभस रद्र द्वारा किए 
गए पांच वृत्तियों कै निरूपण से यह अमान्य नहीं रह जाता कवे अनुप्रास को वृत्त्यनुप्रासात्मक 
हयी मानते हैँ । पांच वृत्तयो के नाम उन्दने इस प्रकार दिणर्दै-- 
"मधुरा, प्रौढा परुषा, कलिता, मद्रेति वृत्तयः पच्च । 
वर्णानां नानात्वादस्येति यथार्थनामफलाःः ॥ ३।१९ ॥ 


इन सवके पथक्‌ पृथक्‌ लक्षण बनाकर रुद्रट ने इनके उदाहरण भी दिए हं । 
मम्मट-ने उद्भट के ही अनुसार छेकः, वृत्ति ओर काटः इन भेदो में अनुप्रास का विभाजन 
करते हृए वृत्ति को व्यज्ञनारूप माना है । उनका विवेचन इस प्रकार दै-- 
व्ण॑साम्यमनपरासः, छेकव्ृत्तिगतो द्विधा । 
सोऽनेकस्य सछ्रतपूवं एकस्याप्यसक्रत्‌ परः । 
चाब्दस्त॒ कादानुप्रासो भेदे तात्पयैमात्रतः ॥ 
अथीत्‌ "णसाम्य हे अनुप्रासः । वह छेक ओर वृ्ति'-इसं प्रकार दो भेदो में केवर व्भैगत 
रहता दै । इनमें छेकालुप्रासं मँ यनेक वर्णो की एकवार आवृत्ति होती दे ओर वृत्यनुप्रास मे एक 


४ = * " चक्क 


पाता क 


यमकम्‌ ६७ 


या अनेक वर्णो कौ अनेक्व।र । जो अनुप्रास चब्द्रगत होता है वह कारनुप्रास् कहलाता है । इसके 
पांच मेद होते ह-- 
"पदानां स पदस्यापि वृत्तावन्यत्र तत्र वां | 
नाम्नः स कृत्तटृत्योश्च तदेतं पंचध। स्मरतः ॥ 
प्रथमतः यह दो भागो में विभक्त रहता दै पदगत तथा नामगत या प्रातिपदिकगत। इनमे पद- 
गत दो प्रकार का होता हे अनेकपदगत ओर एकपदगत । नामगत तीन प्रकार काल्योता है एक- 
समासगत, अनेकसमासगत ओर एकानेकसम।सगत । इस प्रकार क भेद पांच होते है । 
परवती आचायां नं रत्नाकरकार शोमाकरसित्र ने अनुप्रास का विवेचन उक्त मेदोमे ही इस 
प्रकार किया है-- 
१--्रयोद योः ससुदाययोः स।म्यं छेकानुप्रासः । ३ । 
२--अन्यथा तु वृत्त्यनुप्रासः । ४। 
२-तुल्याभिधेय-भिन्नतात्पयेशब्दावृत्तिलंानुप्रासः ॥ ५ ॥ 
तीन। अनुप्रासो तथा यमक का अन्तर बवतखाते हए उन्दौने लिखा है-शव्यंजनमात्रससुदाय- 
मध्यगतं स्वरव्यजनसमुदायसाम्यमेकाक्षरव्यापि छेकानुप्रासः । शुद्धं बहक्षरमल्पाक्षरं वा नियतस्थानं 
यमकम्‌ । अनेकद्विकाभावे नियतस्थानगतमपि वृत्त्यनुप्रास इति मेदः ।2 
अप्पयदीक्षितः पण्डितराज तथा विद्वेश्वर ने राब्दारुकारों का निरूपण नहीं किया । 


विमरिनी 
एवं व्यज्जनमात्राश्रयमल्कारद्वयं रत्तयित्वा स्वरबव्यञ्जनाश्रयं यसकं रूक्यति- 
स्वरेत्यादि । 
इस प्रकार व्यंजनमात्र पर निभैर दोनों अलकारां के लक्षण निश्चित किए । अव स्वरव्यज्ञना- 
श्रित यमक का लक्षण करते है-- 


| सवेस्व | 


[ख्‌ ७] स्वरव्यज्जनसमयुदायपोनरूक्त्यं यमकम्‌ ॥ 
अच कचिद्धिच्ाथत्वं कचिद्भिन्नाथेत्वं कचिदेकस्यान्थंकत्वमपरस्य 
साथेकत्वमिति संश्चेपतः प्रकारञजयम्‌ । यथा-- 
यो यः प्यति तन्नेञे रुचिरे वनजायते । 
तस्य तस्यन्यनेतेषु रुचिरेव न जायते ॥' 
इद्‌ साथेकत्वे । एवमन्यञ्ज्ञेयस्‌ । 
[ सू° ७ | %स्वर [ ओर ] व्यंयजन [ दोनो का ] पौनर्क्व्य यमक [कहलाता हे] ।* 
[ इत्ति ] इसमें [ पुनरुक्त पदां के ] अथं कहीं भिन्न-भिन्न होते है, कीं अभिन्न ओर कीं 
एक [ पद | अथैरहित रहता है तथा दूसरा सार्थक, इस प्रकार सक्षेपमे तीन भेद होते हैः। 
उद्राहरण जंसे--“यो यः पर्यति० इत्यादि पद्य ! [ अथः--जो जो व्यक्ति तुम्हारे वनज 
(कमल ) के समान विद्या ओर रुचिर नेत्र देखता है उस प्रत्येक मे अन्य ८ मृग आदि अथवा 
अन्य नायिका) के नेवं पर कोड रुचि ही नहीं जागती ] यद [ रुचिरे वनजायतेः पदो की 
राद्धं ओर उत्तराद्धं म आवृत्ति हे ओर दोनों जगह प्रत्येक पद साथैक है अतः यमक हमा ] साक ` 
पदोँ म । इसी प्रकार अन्य [ यमक भी ] जान केने चाहिए । 


द८. | अलह्भारसवंस्वम्‌ 
विमरिनी 


एकस्येव्याद्यपल्दणपरम्‌ । अतो वदह्रनां यमकानां कचित्साथकत्वं निरथेकत्व च स्थितं 
संगरहीतमेव 1 (कछचित्साथंकस्वं कचिन्निरथकत्वम््‌' इति तु पाठे प्रथमसेव मेद द्वयञ्युक्तं स्यान्न 
तृतीयः प्रकारः । अतश्च भेद निर्दंशयन्थो यथास्थित एव उयायान्‌ । संक्षेपत इति । एतच 
कान्यादमभूतरसचवंणाप्रस्यूह कारिव्वास्प्रपञ्चयितुं न योग्यमिति चिरंतनारुंकारवन्न विमञ्य 
रुक्तितमिति मावः । एवं चित्रेऽपि सेयम्‌ । अन्यदिति ¦ ्रकारद्वयम्‌ । तत्रालथैकं यथा-- 
'सरसमन्थरतामरसादरभ्रमरसननल्या निनी मधो । 
जलूधिदेवतया सद्दीं धियं स्फुटतरागतरागरुचिदंधो 1" 
अत्र तरागेदयनर्थकम्‌ । अनर्धकव्वसार्थकव्वयो्यथा- 
'साहारं साहारं सादरं णद्‌ सजसादारम्‌ । 
सं ताण संताण संताणं मोहसखंताणस्‌ 1 
अत्र सजसादहारमिस्यनर्थकमस्‌ । अन्यानि तु साथंकानीति न कश्चिददोषः॥ 

: इद्‌ च स्थाननियममन्तरेण न भवति 1 यदुक्तम्‌--“पद मनेकाथेमत्तरं चादत्त स्थान- 
नियमे यमकम्‌ इति । अत एव स्थाननियमादययमकमित्यस्यान्वथेमभिधानस्‌ । स च 
स्थाननियमो वैवक्तिको न वास्तवः । यथा- 

'मघ्ुपराजिपराजितमानिनीजनमनःसुमनःसुरमि च्रियस्‌ । 
अशत वारितवारिजविप्ठवां स्फुटितताम्नततास्रवणं जगत्‌ ॥' 
अच्राक्तरद्रयानन्तरं यमक विन्यासाव्स्थानस्य नियतत्वम्‌ । यथा वा-- 
'दिन्याद्धयार्विं तव कछातिंकेयः शशी जितो येन स कातिके यः 
उव्खातदन्तो गणनायकस्य स्वामी यदन्यो गणनाय कस्य ॥ 
अत्र चाथंद्रये यमकद्वयमिति स्थाननियमो द्िघेवेति नास्यालंकारस्य इतिः काचित्‌ ! 
अतश्च- 
श्च 'तरसिकलितर्कतरसिककितरजारूहरि जाखहरिणतसः। 
हरिणतमश्च ततस्तव ततस्तवः स्यायरोरा्चिः ॥' 
दव्यत्र सत्वेऽपि स्वरव्यञ्जनसञ्रुदाय पौ नर्वस्यस्य स्थाननियमाभावाद्यमकाभासोऽयं 
वुत्युप्रासः। 
एक की अथैरदितता उपलशक्चणमाच् हे । उससे बहत से यमकोमे जो किसी की सार्थकता 
ओर किसी की अर्थरहितता मिती है उसका मी उपादान हो जाता दै । (्वचित्‌ सार्थक ओर 
क्वचित्‌ निरथंक [ यमक ] इस पामे प्रारम्भके दोही भैद कदेजा सक्ते [ क्योकि तव 
साथकता ओर निरथक्ताये दो येद उन्हीं के प्रभेद सिद्ध दोगे ] तीसरा नदी, अतः भेदनिदेश 
प्रस्त॒त करने वाले अन्धां काजेसाका तंसा मानना ही अधिक अच्छा हे। सक्तेप--संकषिप्त- 
रूप से, अभिप्राय यह कि यमक काव्यात्मा रस कौ चवेणा मं विध्न उत्पन्न करतादहै इसचिए 
इसका' अधिके विस्तार करना उचित नदीं है इसलिए इसको प्राचीन अन्य अल्कासों के समान 
भद-प्रभेद करके नहीं बताया । चित्र ( खडगवन्धादि ) के विषयमं मी यही जानना चाहिए । 
अन्यत्‌ अथात्‌ हेष दो प्रकार 1 इनमें से अथैरहित का उदाहरण यथा--^सरसमन्धर० इत्यादि 
पय में (तराग तराग' शब्द । वह अथैरहित हे [ प्रथम तराग शब्द स्फुरतर के (तरः ओर आगत 


कै आगः कै मिध्रणप्ते वना है तथा द्वितीय तराग दाब्दं आगतके (तः तथा °रागः. चाब्दं के 


१. पाठान्तर तर सिक तरसिकलितं तरुकङ्ितितरुजाक्दरिणतमः [ नि. सा. सं. ] 


“ र ध क 


यमकम्‌ षर 


मिलने से। वे सव उब्दांदा हैँ उनमें अभिधा नहो, अतः उनका कोई अथै नदीं ] 1 [ इस पथ का 
अथे दे--“मधुमास मे कमलिनी ने जरधिदेवता--समुद्र की देवी के समान दोभाधारणकी। वे 
दोनो सरसमन्धरतामरसादर्रमरसज्जक्या ओर स्फुटतरागतर।गरुचि थीं । जरूधिदेवता = 
सरस-मन्थ-रत-अमर-सादर-न्नम-रसज्‌-जला (तृतीया एकव चन में ० ०जल्याः) थी अर्थात्‌ सरस= 
सस॒द्र का मन्थ = मन्थ अथवा सरस = प्रखोभन मे पड़ तथा मन्थ = सथन म रत अमर=देवता, 
उनके दवारा सादर = आदरपुवेक ( व्यक्तिविवेक मेँ पाठ है सोदर उसका अथ॑ होगा देवताओं के 
भाईं = असुर ) जो भ्रम = घ्ुमाना उससे रसत्‌ = आवाज करता हभ है जल जिसका उसकी 
तृतीया का एकवचन }; नङिनी = सरस-मन्धर-तामरस-आदर-भ्रमर-सज्ज-ल्या अर्थात्‌ 
सरस = मकरन्द युक्तः मन्थर = डुछ-कुछ दिर रहे, तामरस = कमर पर है आदर जिसका रेसे 
भ्रमरः से, सज्ज = आया हुञा है, ल्य = राग जिसमे सधवा भ्रमो मेँ सज्ज हैः ल्य जिसके दारा । 
( सोदरपाठ होने पर अथे होगा तामरस के उदर में) । स्फुरतरागतरागरुचि [ दाब्द यद्य ओर 
मूर हरविजय मे प्रथमान्त दे ओर व्यक्तिविवेक म द्वितीयान्त । द्वितीयान्त होने पर यह श्रीका 
विरोषण वनता है तथापि चिभक्तिविपर्यय द्वारा नलिनी तथा जरूधिदेवता म भी अन्वित हो सकता 
दै ] नलिनी पक्त नें स्फुटतर आगत दै रागरुचि ८ कोई ) जिसमे जरुधिदेवतापक् मे स्फुरतर 
आगत है राग (पद्यराग) रुचि जिनमें श्री पक्त में स्फुटतर आगत है राग (अनुराग, काररग कौ) रुचि 
जिसने । अथरहित ओर सार्थक यमकोँके योग का उदाहरण यथा-्साहारं साहारम्‌०? 
इत्यादि प्राक्तगाथा । [ इसकी संस्कृतच्छाया निणैयसागरीय संस्करण मे मी नही है । गाधा 
अव्यक्त है ] 


9 


यद 'सञ्जस्राहारः यह निरथंक = अथरहित है ओर रेष सव सार्थक है अतः कोई दोष नदीं । 

यह स्थाननियम के विना नहीं होता । जेसा कि [वामन ने] कदा है -'अनेकार्थक [भिन्नाथक] 
पदो या केवर अक्षरो की आवृत्ति यमक कहल।ती है, यदि स्थ(ननियम हो-- [का० सू° ४।१।१] । 
दसीलिए इस अलंकार का नाम भी यमक दै क्योकि इसमे स्थान ( चरणो के आदि, मध्य, अन्त 
भाग ] का नियम रहता हे, यह अन्वथं संज्ञा है । स्थान का यह नियम वास्तयिकं नहो, विवक्षाधोन 
दोता दं  उदाहरणाथ--[ हरविजय का ३।२ ] मधुपराजि० इत्यादि पद्य । [ इसका अं है-- 
मधुपा कौ राजि ( पत) ) दारा पराजित कर दिष्ट है मानिनौ नाथिकाओं के मन जिन्होने देते 
पुष्पो से खरमि = गन्धि ओर खिके तथा ाल्वणं कौ विस्तृत अमराइओं से युक्त जगत्‌ ने कमक- 
विप्लवं ते मुक्त ोभाको धारण किया । ] यों प्रत्येक चरणमें प्रथम दो अक्षरोके बाद ही 
यमक रखा गया हं । इस प्रकार यहाँ उसका स्थान निश्चित हे । दूसरा उदाहरण जेते छिन्वाद्‌ 
भयात्ति०? इत्यादि पद्य [ इसका अथैः--तुम्दारी भयात्ति ( संभवतः भवात्ति ) को वे कात्तिकेय भग- 


वान्‌ नष्ट करं जिन्न कात्तिक का चन्द्रमा जीत छिया है ओर जिससे भिश्न एेसा स्वामी किसको 


गणना मं आएगा जिसने गणनायक ( गणेश ) का दौत उखाड़ छिथा हो । ] इस प्म दो यमक 


है (१ कात्तिकेयः कात्तिकेयः तथा २ गणनायुकस्य गणनायकस्य) दोनों मे स्थाननियम भिन्न है [प्रथम 


सात वर्णा के वाद अने वारा है ओर द्वितीय पौँच वर्णो के वाद] अतः [यह्‌ समञ्चकर कि इस परय मेँ 
एक ही यमक हे ] यह नदीं सोचना चाहिए कि यहौँ [ द्ितीय यमक मे प्रथमसेदो ] अक्षरां कौ 
कमी दै । इसीलिए श्वुतरक्षि० इत्यादि प में स्वरव्यननसयुदायपौनरुक्त्य [ श्रु-तरसिकलित- 
रक-तर सिककितिर, जारदरि-जारूहरि, हरिणतम-हरिणतम, ततस्तव- ततस्तव" इस म्रकार 
प्रथम यमक एक अक्षर वे बाद आता है किन्तु अन्य सव विना व्यवधान के स्थित है । प्रथम 


ततस्तव के पहिले एक च" अवदय हे किन्तु वेसा कोई वणे दितीय ततस्तव" के पदि नहं है । 


~~" 


७०. अद्ड्ारसवंस्वम्‌ 


इस श्रकार यहाँ [ आवृत्ति मेँ ] स्थाननियम नदीं दै यह यमक जसा प्रतीत होने वाला वस्तुतः 
वृत्त्यनुप्रास हे । [ इस पद्य म पा क्रा अथे स्पष्ट दे, उत्तराधे का अथं = इस कारण हे तत = 
विस्तरत, स्तव = स्पुतिवाले, जिसकी स्तुति पुष्कल्मत्रामंदहो रदी हे, आपका यद्ोरादि तात्रगामी 
हरिण हौ) | 

विम्ल--यमक दण्डी, भामह, वामन, उद्‌ूभट, रुद्रटः ओर मम्मट इन समी आचार्यौ मे चिवि. 
धता के साथ मिक्ता ह । इसका विस्तार भटिर्काव्य आदिमं भी द्रष्टव्य हं । यह्‌ इतना व्यापक हे 


कि इसके किए उक्त आचार्यो के मूर मन्थ ही देखना चाहिए । 


उक्त आचार्यौ कै यमक सामान्य लक्षण ये है-- 
दण्डी ~ चवृज्निमैव संघातगोचरां यमकं विद्धः । 
भामह-के काव्याट्कार मं यमकसामान्य का ठक्षण नहीं मिक्ता । 
वामन-पदमनेकाथमक्षरं वाञ्ञ्ृत्तं स्थाननियमे यमकम्‌ ॥ ३।६।१। 
उदट-उदमट ने यमक नामक किसी भी अलंकार का निरूपण नहीं किया । कदाचित्‌ वै 
यमक को खारानुप्रास से अभिन्न मान वेठेहें। 
रद्रट-तुट्यश्वतिक्रमाणामन्या्थानां मिथस्तु वर्णानाम्‌ । पुनरावृत्तियमकम्‌ । [३1 १) 
काव्याट्कार्‌ ]। 
मस्मट-अथं सत्यथंमिन्नानां वर्णनां सा पुनः श्रतिः, यमकम्‌ । 
» [ स्वेस्व | 
[ घ ८ ] “क्ब्दाथंपौनर्क्त्यं प्रदं दोषः ॥” 
ग्न ₹ द दिः ।| 
प्रूढग्रदणं वक्ष्यमाणप्रमेदवेलक्षण्यार्थंम्‌ ¦ यदाहः--'खन्दाथेयोः पुनवं- 
चन पुनरुक्तमन्यत्ाचु वादात्‌ ।' इति । 
न सू० ८ ] शब्द [ ओर ] अर्थ [ दोर्नो ] का प्ररूढ पौनरुक्त्य दोष होता दहै) 


[ वृ० ] प्ररूढ दाब्द आगे कथित प्रभेद से [ इस पनरक्त्य करा | अन्तर्‌ वत्नलाने दौ [लए 
अपनाया गया । जंसा कि [ महामुनि अक्षपाद के संप्रदाय में | कदा जाता ह-शब्द ओर्‌ अर्थं 


का पुनः कथन पुनरुक्ताख्य दोप होता है अनुवाद को छोडकर ।' 


| विमरिनी 
प्ररूढमिति । यथाभासनं विश्रान्तेः । यथा-- 
दृन्वये शद्धमति प्रसूतः श॒द्धिमत्तमः 
दिलीप इति राजेन्दुरिन्दुः ीरनिधाविव ॥` 
नदुरिति । अच्रिनेत्रह्षीरोदजन्मव्वादिन्दो द्िव्वानने ततप्ररूढमिति न कार्यम्‌, कवि- 
समये तथात्वस्याप्रतीतेः । आहूरिप्याक्चपाद्‌ाः। अन्यत्रानुवादादिति । अनुवादे हि शब्दार्थयो 


पुनवचनं क्रियमाणं न दोषाय । अक्रियमाणं पुनदृषाय मवतीति मावः । यथा- 


(उदेति रक्तः सविता रक्त एवास्तमेति च । 
संपत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता ॥ 
अत्र रक्त इति । 
 शङ्ञिरः शावं स्वगौरपश्पतिशिरस्तः क्षितिधरं महीधाढुत्तङ्गादवनिमवनेश्वापि जरषिस्‌ । 
अधोधो गङ्गावद्वयञ्चुपगता नूनमथवा विवेकञ्चष्टानां भवति विनिपातः शतमुखः ॥° 


लायापासः ७९ 


~ अत्रार्थपौ नस्वत्येऽपि श॒ब्दस्यापएुनर्व चनं प्रतीत्यन्तरजनकस्वादोषः । 
तदेवाप्ररूढमरुकार इतव्याह~-तात्पयंत्यादि । 
ग्रड्ढ अथात्‌ जेसा आरम्भसे प्रतीतो वेसादही अन्तमं भी। उदाहरण [ काछ्दिास का 
पद्य |] उस ( वेवस्वत मनु ) के डुद्धियुक्तं वंश में अत्यन्त शुद्धियुक्त दिलीप नामक राजेन्दु हआ जेसे 
क्षीरसमुद्र मं इन्द्‌ । [ रघु ° १ ] । यद्य न्दुः [ शब्द ओर उसका अर्थं दोनों ही पुनरुक्त हे क्यो- 
कि उनमें आरम्भ से अन्त तक एकरूपता वनी रहती है ] इसे य कहकर अप्ररूढ नहीं बतलाया जा 
सकता कि चन्द्रमादो हे, एक अत्रिसुनि के नेत्र से उत्पन्न ओर दूसरा क्षीरसागर से उत्पन्न, 
क्योंकि कविसमय मे चन्द्रमा प्क ही प्रसिधः है दो नदीं । आहुः = कहा है अथात्‌ अक्षपाद सनि 
“~ ने । अन्यत्रा्वाद्‌ात्‌ = अनुवाद को छोडकर; अर्थात्‌ अनुवाद मे यदि शाब्द ओर अथं पुनः 
| कटे जाप तो उसमें दोष नहीं; वहाँ पुनःन कना दही दोष होता है। उदाहरणाथ--'उदेति 
| सविता०? इत्यादि प्य मँ रक्तराब्द [पद्य का अथैः-- सयं रक्त ही उदित दहोतादै ओर रक्त ही इवता 
हे । जो महान्‌ होते हैँ वे संपत्ति ओर विपत्ति दोनों मे एक से रहते हे। ] स्वगे से भगवान्‌ शंकर के 
सिर पर, पञ्युपति के सिर से पव॑त (हिमाचर) पर, उन्तङ्ग सेरु ८ हिमालय ) से पृथिवी पर, प्रथिवी 
से जक्यि में, इस प्रकार नीचे ही नीचे गंगा के समान हम पर्हुंचते गए, कारण यद्‌ कि जो विवेक 
र्ट होते हें उनका रोकड प्रकार से पतन होता ` हे यहं अथं तो अवदय दुबारा ( एक ही दिव 
आदि अर्थं मूर मे दावं ओर पञ्युपतति आदि तथा अनुवाद मे शंकर ओर पञ्ुपति आदि इन शब्दो 
से ) कदे गए हं विन्तु दाब्दं दुवारा नहीं कहे गए, उन्हे बदरू दिया गया । इसे आरम्भमे णेसा 
कुछ गता हे कि जैसे कोई दूसरा अथं बतलाया जा रहा है फलतः यदह दोष है । [ अनुवाद का 
उददेरय अथतोदहेदही किसी के राब्दोका अक्षरद्यः उच्चारणया अनुकरण भी है, किन्तु टीका- 
कार का उस ओर ध्यान नदीं गया । व्यक्तिविवेककार ने इस पर अच्छा विवेचन किया है, एतदथं 
देखिए हमारे हिन्दी अनुवाद के साथ व्यक्तिविवेक पृष्ठ. १६; चौ खम्बा संस्करण । ] 
 [ शब्दाथं पौनसुक्तय ही ] यदि अप्ररूढ होता है तो अलंकार बन जाता हैः इसीका 
प्रतिपादन करते हे- 


[ सवसव ] 
[ घ ९ ] नतात्पयेभेदवक्त लाटानुप्रासः ॥' 
तात्पयेमन्यपरत्वम्‌ । तदेव भिद्यते, न दाब्दाथे-स्वरूपम्‌ । यथा- 
ताला जाअंति गुणा जाखा दे सहिअएहिं चेष्पंति । 
रदकिरणाणुगाहिमाईं होति कमठादं कमला ॥' 
कियन्नय कथंचन काठमस्प- 
मन्राज्जपञ्चनयनै नयने निमील्य । 
हेमाम्बुजं तरुणि तत्तरसापहत्य 
देघदविषोञयमहसागत इत्यवेहि ॥* 
द्व्यादौ विभक्षत्यादेरपौनसख्कव्येऽपि वहुतरशब्दाथेपीनरुक्व्याहछायायु 
| प्रासत्वमेव । 


१. हिन्दी का यह्‌ वाक्य भूल संस्कृत वाक्य की छाया है अतः इसमे वे सब दोष है जो मूरूमें 
प्रतीत होते हे । 


७२ अल्छङ्ारसवंस्वम्‌ 


'कादाः काचा इवाभान्ति सरांसीव सरांसि च । 
चेर्तास्याचिष्छिपुयूनां निन्लगा निञ्लगा इव ॥' 


इत्यादावनन्वयेन सदस्येकाभिधानखक्षणो न संकरः । अन्योन्यायेश्चय। 
४ £ 
शाब्दाथेगतत्वेनाथेमाचरगतत्वेन च उ्यवस्थितेरभि्विषपयत्वात्‌ । 
“अनन्वये च दाब्दैकयमौचित्याद्‌ाञ्चषद्धिकम्‌ । 
 अस्मिस्तु ठकायाचुषासे खाश्चष्देव घयोजकम्‌ ।+' 
ॐ @ श्रे) 9 
[ घ १० |] तदेषं पोनङ्क्त्ये पञ्चारुकाराः ॥ 
निगदन्याख्यातमेतत्‌ । 

[ सु० ९ ] “किन्तु तास्पर्य क मेद से युक्त [ राब्दार्थं पौनरुक्त्य | काटाचुघासर [नामक 

अरुकार होता डे ]। 

[ ० ] तात्पर्य का अर्थ दै  अन्यपरता [ य्य ] मेद केवल उसी में रहता है, शब्दा्थ-स्वरूप 
मे नदीं । यथा-- 

(तदा जायन्ते गुणा यदा ते सहृदयेगह्यन्ते । 
रविकिरणानुग्रहीतानि भवन्ति कमलानि कमलानि ॥° 

4 गुण ] युण तव होते हैँ जव वे सदयो द्वारा माने जाते ह । कमल कमल तव वन पाते है 
जव वे सूय-किरणो से अवुगृदीत होते हे ।' ॥ 

“कितना कर्द, हे कमल्पत्रतुल्य नयन-वाखी ! त॒म अपने नयन मींच कर यही थोड़ा समयं 
विताओ जर यद समन्लो वि-दे तरुणि ! देवा का दद्व मैं उस हेमाम्बुज को वकात्‌ छिनाकर यह्‌ 
ञाया ए | 

इत्यादि मेँ [ ००नयने नयने जादि स्थल मेँ ] विभक्ति अदि कातो पौनरुक्त्य नहँ हे [ कर्यो- 


कि प्रथम नयन ब्रीहि के रारण खील्गिनेंदहै ओर संबोधन कै कारण प्रथमा के एकवचन में 
जव किं द्वितीय नयन नपुंसकर्गि द्वितीया के दविक्चन में ह | तथापि शब्द [ विभक्ति आदिकी 
मूर म्रकृतति नयन ] तथा उनके अर्थो का अधिकांडा पुनरुक्त दी दै अतः यद खारानुप्रासत्व 
ही [ मान्य ] हं। | | 

[ दरत्‌ मे ] काद्य कासे दही च्रे जौर सरोवर सरोवरसे। [वषामं निम्नगा 
[ नदियां ] निम्नगा [ नीचो से क्गी यो] के [ दी] पमान युवकों के चित्त विगाङ्‌ 
रही थीं। | | 

इत्यादि मँ लागनुप्रास का अनन्वय के साथ एकवाचकानुप्रवेद संकर नदीं हे वर्योकि दोनों 
के क्षत्र मिन्नः । कायनुप्रास का क्षेत्र है अन्योन्यापेक्षी दाब्दाथेयुग्म ओर अनन्वय का क्षित है 
केव अथं | 
अनन्वय म जो शब्द कौ पुनरुक्ति होती दै वद इसङिएट कि उसके विना अनन्व्रय संभव नदीं, 
अतः वदां शब्दपुनरुक्ति [ अल्च्छारत्वप्रयोजक, चमत्कारकारी नदीं ] आनुषगिक दे । जा तक राटा- 
सप्रासका संबन्ध है इसमे राब्दपुनरुक्ति ही अलंकारत्व-प्रयोजक है ।! 

[ सू° १० | इस प्रकार पौनस्क्त्य मे पोच अटंकार होते है| 

[ व° ] छननेमात्र से इस सूत्र का अर्थं स्पष्ट हे। 


पञ्ाटङ्ाराः ७२ 
विमरिनी 


अन्यपरत्वमिति । एकस्य वाच्य विश्रान्तव्वेऽन्यस्य रुचये व्यङ्ग्ये वाथ वाच्य. 
विश्राग्तिरिव्य्भः ¦ भिद्यत इति पर्यखाने ! आञ्गुखे हि शाब्द बदर्थस्याप्येकस्ेनेवाव- 
मासः। अत एवाह-- न चाब्दाथेस्वरूपमित्ति । एवं च नायं द्वयो वाच्यविश्रान्तव्वेऽनुवाद्‌- 
माच्रमलंकारः । नहि दोषाभावमान्रमलरकारस्वरूपम्‌ । एवं हि सव्य पशब्दादययभावस्याप्य- 
ठंकारव्वप्रसङ्ः। यत्परमाद्‌ावुक्तं तत्परमेद पुन्नांच्यते इत्येव सामान्येन यन्य परस्व- 
मुच्यते तद्विरोधादिदत्‌ “उदेति रक्तः सविता- इत्यादौ दोपाभावमात्र्वेप्यलंकारत्गो- 
चितस्यान्यपरव्वाख्यस्यातिङयस्यापि भावारुकारस्वप्रसङ्गः । न चेतावतेव कथिदतिशय 
प्रतीयत इति यथोक्तमेव युक्तम्‌ । एकः कमलछब्दो च्य प्यदसितः अन्यश्च सौर भवन्धु- 
रस्वाद्यनेकधमंनिषट इति तात्प्यमेदः । 

अन्य परस्व = अर्थात्‌ एक शाब्द के अथं की वाच्यरूपमें ही विश्रान्ति ओर दूसरे के अथैकी 
लक्ष्य य। व्यंग्य अथं मे । भिद्यते = भिन्न होता हे अथात्‌ पयेवसान ( अन्त )में। आरम्भमेतो 

दाब्द्‌ के समान अर्थमीणएकसे दही प्रतीत होते है। इसीलिए कदा "न शब्दा्थंस्वरूपम्‌ः 1 इस 

प्रकार निष्कं यह निकला कि यदि दोनो वाच्याथेमें दही ठहर जां तो वहु अनुवादमात्र ( उददे- 
 उ्यमात्र या पुनःकथनमात्र ) होता है अलकार नहीं । [ वहम पुनः कथन न करना दोष होताहे 
अतः पुनः कथन दोषाभावस्वरूप ओर] दोषाभावमात्र को अलकार नहीं माना जा सकता । यदि 
दोषाभाव को ही अल्कार माना जाय तो अपदयब्द आदि के अभाव को भी अल्कार मानना पड़गा । 
जो दाब्दं जिस अथ॑ के ल्एिएकवार बोला जाताहे वह दूसरी वार भी उसी अथैके 
 .लिषए नहीं बोला जाता" इसी को यदि सामान्यतः .अन्यपरता कहा जातादहे तो विरोध आदि 
अटंकारों गै समान उदेति रक्तः सविताः इत्यादि स्थलों मँ पुनरुक्ति को दोषामावमाच 
मानने पर भी ओर उसमे अलंकारत्वनिष्पादक अन्यपरत्वरूप विशिष्ट तत्व का अस्तित्व मानने 
पर भी मावनामक अलकार होगा, जयानुप्रास नदीं [ अतः कारनुप्रासर मे अन्यपरत्वके साथ 
राब्दाथेस्वरूप मे अभेद भी रहना आवदयक हे ]। केवर इतने [ अन्यपरत्वसात्र ] से ही कों 
अत्तिद्य ( वैदिष्टय ) प्रतीत नदीं होता अतः [ मन्थकारने] जो कहा है [ अन्यपरत्वं मौर 
दाब्दाथस्वरूपामेद ये दो विशेषता्पं लाटानुप्रास के छिएट आवदयक वतलाईं हे ] वह [ उसी रूप 
मे ] ठीक हे। कमलनि कमलानि में ] एक [ प्रथम ] कमलशब्द वाच्यरूप मे ही पर्यवसित 
होता ह आर्‌ द्लर्ा [ द्वितीय | सोरभ, सोन्दयं या खिली पुडिया को उतार-चटावदार रोभा 
आदि अनेक धर्मौ का प्रतिपादन करता हे । अतः यहाँ दोनों कमलशब्दो के तात्पयेमात्र मे भेद हे । 
[ इसीको ध्वनिवादियो ने अथान्तर संक्रसितवाच्यध्वनि कहा हे | 

विमज्ञ-इस प्ररखूरणमे ध्रूसमः कियत्‌० इत्यादि पूणे पय मूक न मानकर ° रामचन्द्र द्विवेदी 
ने अनेक पाण्डुग्रन्थो के आधार पर इसके केवर द्वितीय चरण “अत्रान्ज० इत्यादि को ही मूर 
माना ह । निणेयसागरीय संस्करण मं पूणे पद्य के साथ अन्त मे यह दहितीयचरण भी (्रमः-हुम्‌ःअत्रा 
व्जपत्रनयने नयने निमील्य इत्यादो -इस प्रकार दिया हआ है । ० दिवेदी ने काराः काड्चा इव ० 
इत्यादि पद्य का भी काडाः कारा इव' इतना ही अदा मूल माना हं । निणेयसागरीय संस्करण में वह 
मी पूणे हे किन्तु वहो मी पादटिप्पणी म एक प्रति मँ "काराः काशा इवः इतना ही भिल्ने का उल्लेख 
हे । विमदिनीकार ने च्रूम०' इत्यादि पच के चारौ चरण नहीं तो कम से कम प्रथम दो. चरण 
तो मूल अवद्य माने हें क््याकि उन्दने प्रतीक दिया है प्रथम चरणका ध्रमः कियदितिः इस 
प्रकार । हमने इसी दीका के अनुसार मू रखकर निणेयसागरीय संस्करण म पुनः आए द्वितीय 
चरण को हट दिया हे । वहं आवदयक था । 


ॐ अङ्ारखवस्वम्‌ 


यद्यपि लाटानुप्रास के लिए द्वितीय ओर तृतीय प्यके उपादेय अद्र केवल (अव्जपत्रनयने 
नयने भौर काराः काडा इव" ये ही है ओर अन्धकार को भी केवल इतना ही प्रतिपादित करना 
देः माना जाय या नही, वििष्टस्थिति मेँ लाटानुप्रास तदथं उतने से अधिकं पूणै इलोकँ की 
अवदयकता नहा हं, तथापि काव्य के मीतर लाटानुम्रास कितना चमत्कार लाता यह जानते वैः 
ए यह पूणं पद्य हौ उपदेय हं । रीकाकार यदि उनकी व्याख्यान करं तो उससे मूरूमं पूरणं 
पद्य का अभाव नदीं माना ना सकता । ठीकाकार रलोक की व्याख्या भी करे यह्‌ आवदयक नदं 
है । संजीविनी ओर विमर्दिनी दोनों मे दलोकों की व्याख्या नदीं के बरावर द । 


वृत्तिकार ने अनन्वय ओर लारानुप्रास कै क्षे्रमेद पर जो प्रदन प्रस्तुत किया है उसका 
समाधान इतना ही है कि अनन्वय मे पदों की आवृत्तिमात्र आवदयक दै, यह नहीं किं दोनों 
पद एक साथ रखे जावे । कादा भान्ति यथा काद्याः रेसा कहने पर॒ भी अनन्वय की निष्पत्ति 
संमव हं । लाटानुप्रास केवल तमी हो सकेगा जव दोनों काडपदों को एक साधरखा जाय । 
अनन्वय म यह आवदर्यक नहीं है कि धनः कथित पद मे अतिङयमी प्रतीत टानुप्रास्र में 
वही प्रधान हे । उसके विना रकारनुग्रास ने अल्कारत्व नदीं आता । अनन्वय मे चमत्कार का 
कारण हं द्वितीयसदृशव्यवच्छेद । “अमुक के समान अमुक दही दैः कदनेसे प्रतीत होता है कि 
उसके समान दूसरा कोदं नींद यही दे द्वितीयसदट्‌राव्यवच्छेद । इसी को लेकर अनन्वय 
उपमा ओर उपमेयोपमा से अल्ग होतादहे। लाटानुप्रास म तात्पयभेदानुगत पदपुनरुक्ति दी 
चमत्कारकारक होता हे । काडराः काद्या इव०ः पद्यमें ठकाटानुप्रास् मानना चादिएया अनन्वय 
इस प्रदन का समाधान केवल यह देखकर करना उचितदहैकि क्या यहा द्वितीय काद्यादि राब्द 
उसी प्रकार अतिदाययुक्त काशादि अथ के वाचक दै जिस प्रकार कमलानि कमरानिः मे द्वितीय 
कमर । यदि नदीं तो यहां अनन्वयदहीदहं। दोदो काञ्च आदि पदां के एकसाथ प्रयुक्तो 
जाने माच्र से यददो खायानुप्रास संभव नदीं है । 


विमरिनी 


नमः कियदिति । अन्न अन्जकब्दस्याप्यपौ नस्वस्यात कागानुप्रासस्वमेवेति चिन्त्यम्‌ । 
अत्र हि द्वयोरपि नयनशब्द्यो्वांच्यविश्रान्तत्वादन्यपरस्वाभावान्नारिति तात्पर्यसेद्‌ 
सख एव द्यस्य जीवितम्‌ । अन्यथा द्ययुप्रास्मात्रस्वं स्यान्नाटंकारस्वस्‌ । अथापि केवलन- 
यनराब्दस्य स्वाथंविश्रान्तिः संसखगपद्‌ा -तगंतस्य पुनः स्वाथसुपसजनीक्रत्य संक्िनम- 
मिदधतश्च स्वाथव्यागात्पराथं च च्रृत्तिरस्व्येव ख्च्यनिष्टस्वमिति चेत , नंतत्‌ । लच्षणा- 
सामग्रयभावात्‌। अत्र ह्यन्यपदाथप्रधानस्वान्नयनरब्दस्य गुणीभावः, न मुख्यार्थबाधः । 
स्वाथं एव विश्रान्तेः। न च गुणीभावसुख्याथवबाधयोरेकत्वम्‌ । सतो हि मुख्यार्थस्य 
कंचिद्पेचय गुणीभावः । वाधः पुनः स्वस्मिन्नेवाविश्रान्तिरिव्यनयोमंहान्‌ भेदः । नाप्यच्र 
किचित्प्रयोजनं न वा रूडिरियमिव्येतस्पौ नश्कत्यमात्रम्‌ । एवम्‌ , 


'सितकरकररचिरविभा विभाकराकार धरणिधर कीति: । 
पौरषकमला कमखा सापि तवेवारित नान्यस्य ॥° 
दस्यादावपि ज्ञेयम्‌ । चमत्कारस्स्वत्राुभ्रासकरतीऽवसेयः । नन्वनन्वयेऽपि शब्दपौन- 
स्वस्यं दश्यत इति तत्रापि किमयमेवारंकारः किञ्यु स॒ एवेव्याशङ्कयाह-- अनन्वय इत्यादि । 
आनुषङ्िकमिति । न पुनः साक्ञारप्रयोजकमिव्यर्थः। जब्देकयं वि नाप्यनन्वयस्य प्रतिपाद नात्‌ । 
अत्र हि शन्डेक्यं छचिदुक्रियमाणमनौो चिव्यमावहति कचिन्नेति भावः । तन्त यथा- 


~~न 


पञ्चाख्ङ्ाराः ७५ 


'यचन्धुजगतां खहसखरकरवद्‌ धाम्नां च धामाकंव- 
न्मोक्द्वारमपावृतं च रविवद्‌ ध्वान्तान्तद्धत्‌ सूयंव॑त्‌ । 
आत्मा सवंशारीरिणं सवितृवत्‌ तिग्मांश्वत्‌ कालङ्कत्‌ 
साध्वीं नः स गिरं ददातु दिनकृद्‌ योन्येरतुर्यो पमः ॥° 
अत्र खहसखरकरादयोऽन्य इवाभासमानाः अनन्वयप्रतीति विष्नयन्तीति शब्दैक्या- 
भावोऽनौचिव्यमावहति, न पुनरनन्वयस्याभावम्‌ । 
स्थे याद्‌ भरूव्यापकव्वाद्‌ वियद्दिख्जगत्म्राणभावान्नभस्वान्‌ 
भास्वान्‌ विश्चग्रकादाद्‌युगपदपि सुधासूतिराह्वाद्‌ नास्च। 
वद्धिः संहारकत्वाउजर्मखिक्जनाप्याय ना पसानं 
सत्यास्मव्वेऽपि यस्य त्रभवतु भदत सोऽषटटमूतिः शिवाय ॥ 

अन्न निर्विभ्नमेवानन्वयस्य प्रतीतेः शाब्दैक्यभावो नानोचिव्यावहः। तुशब्दो ग्यति- 
रेके । साश्चादिति । शब्दे क्यं विनास्यानुत्थानात्‌ । 

एतदेवोपसंहरति- तदेवमित्यादि । पुन रुक्तवदामासमर्थपौ नर्क्स्याध्िते, दैकानुघ्रासा- 
दयस्रयः शब्द्‌ पो नस्क्स्याश्रयाः । खारानुप्रासस्त्‌भयाभध्रित इति पञ्च पौनरूक्च्याश्रिता अर- 
काराः । यद्यप्यु्तेः शब्दाथंगतस्वेनोखरणासि धानतया यदात्‌ सामान्याभावात्‌ कस्य पञ्च- 
ग्रकारस्वं तथापि ठदस्या द्योरम्य नुग्मादेकत्वेन प्रतीतेरुक्तिसामान्यनिवन्धनसेव परकारि- 
ग्रकारमाववचनस्‌ । यचा्थसेदेन राब्दस्यापि सिन्नव्वं तद्‌ वास्तवम्‌ । प्रतीतावेकतयेवा- 
व मासाव्‌ 1 अत एवानेकार्थवर्गादिष्वपि तथात्वेनेव व्यवहारः । 

ˆ ब्रुमः कियतः इस [ पद्य | मे (अन्न शब्द भी पुनरुक्त नहीं हे अतः यहीं अलकारमें) 
काटानुप्रासत्व ही है यह विचारणीय है । यौ दोनों हयी नयन राब्द अन्ततक वाच्याथंमाच्न तक 
ही सीमित रहते हैँ । उनमें तात्पयेमेद नहीं हे । ओर वही [ तात्पयै भेद ] तो ागनुप्रास का 
प्राण है । उसके विना यह ८ लाटानुप्रास ) अनुप्रासमात्र होगा, अल्कार नदीं । इतने पर भी यह्‌ 
कदा जा सकता हे कि यहाँ जो नयनशञब्द स्वतन्त्ररूप से ( समास से अलग ) प्रयुक्त है वह अपने 
वाच्य अथे तकं ही सीमितरहता है, किन्तु जो नयनराब्द “अब्जनयनेः इस प्रकार बहुत्रीहि समास 
मे आए पद्‌ के साथ हे उसमे उसका वाच्यां अप्रधान दहै ओर प्रधान है ८ वह्ुन्रीहि का अन्य 
पुरुष ) नायिकारूपी अथे । इस प्रकार यह नयनराब्द अपना अथै छोडकर दूसरे नायिकारूपी 
अथं मे पयंवसित होता, फलतः श्स नयनदाब्द मे तो [ वाच्येतर ] लक्ष्य अथं के प्रति परायणता 
दिखलाहं देती है । किन्त यह कहना ठीक नहीं क्योकि यहो लक्षणा के लिए अपेक्षित ( सुख्या्थ- 
वाध आदि कारण-- ) सामयी नहींहै। यां बहुव्रीहि मे अन्यपुरुष की प्रधानता रहती है 
इसक्िए नयनराब्द अप्रधान अवदय है किन्तु उसके वाच्य अथ॑का वाध नहीं इसि वह 
( नयनदाब्द ) अपने ( वाच्य ) अथैमें दही पर॑वसित होताहै। ेसा थोडेदही दहे कि अप्रधानता 
ओर मुख्यार्थबाध अभिन्न हां । जो मुख्य अथं बदलता नदीं उसमें किसी अन्य अथे कौ अपेक्षा 
अप्रधानता आती है । बाध कहलाता है उसका अपने अथ॑ में पयंवसित न होना ८ अपने अंका 
वाक्यार्थबोध तक अपरिवतित न रह सकना ) इस प्रकार्‌ अप्रधानतां ओर बाध मे बहुत अन्तर्‌ है । 
फिर यहां न तो लक्षणा कै किए अपेक्षित प्रयोजन ही हे थर न रूढि ही । अतः (नयने नयने" यह 
पौ नरुक्त्यमात्र हे ( अलकार नहीं ) । यही बातत हे विभाकर [ सूये | कै समान, हे धरणिधर 
सितकर-कर-रुचिर-विभा ( सित्तकर = चन्द्र॒ उसके कर = किरण उनके समान रुचिर = खन्दर 
विभाकान्तिवाौ ] कीत्ति तथा परुषकमखा ( पौरष हौ है कमर = वासस्थान जिस कै टिएप्सी) 


क > अ --=------ तिकि == 


-७द अलङ्ारसवंस्वम्‌ 


कमला ( लक्ष्मी ) मी व॒म्दारे दी पास है अन्य किसी के पासन नहीं ।' इत्यादि स्थरलमे मी दहै। 
यहां जो चमत्कार ह उसका कारण अनुप्रास हौ मानना चाहिए । 
म्ररन उठता कि श्ाव्दपौनरक्त्य अनन्वय मेँ भी रहता है, वदँ कायानुप्रास मानना चादिण 
या अनन्वय इसन पर उत्तर देते इट कटा अनन्वय इत्यादिः आनुषंगिक अथात्‌ साक्षात्‌ प्रयोजक 
नहीं । क्यो करि अनन्वय दाव्दैक्य के षिनामी प्रतिपादित किया गयादहे। इस (अनन्वय) मँ 
कीं तो राव्देक्य न रखने से दोपओआ जातादै कहीं नहीं। यथा वह दिनच्रत सूये हमें साघु- 
वाणी प्रदान करे जो सहस्रकर ( सूयं ) के समान जगत्‌ का चष्चु है, अकु ( सूये ) चै समान 
थाम ( प्रका, तेज ) का धाम हैः रवि ( सूर्य ) के समान खुला हआ मोक्षद्वार है, सूय कै समान 
ध्वान्त ( अन्धकार, अज्ञान ) का अन्त करने वाला है, सविता ( सूयं ) क समान सभी सरधारियो 
कै ङि जत्माहं[ र] तिग्मां्यु[ तीक्षण किरर्णो वा सूयं ] के समान काल [ समय ] का 
निमाता द" । व्हा [ एक ही सूरय फे किट ] जो सदलकर्‌ आदि ( भिन-भिन्न ) दाब्दं का प्रयोग 
करिया गया है, उस सा प्रतीत होता कि कदाचित्‌ उपमान ओर उपमेय मिन्न-भिन्न ह फलतः 
वे अनन्वय के चमत्कार मं विघ्न वन जाते है, इसि यद्यं चब्दरैक्य के अभाव ते अनौचित्यभात् 
आता हं अनन्वय का अमाव नहीं । 
वे भगवान्‌ चष्टमूत्त [ पंच महाभूत, सूरय, चन्द्र तथा चैतन्य ] आपका कल्याण कं र जिनवै; छिए 
स्वयं उन्हीं कौ सातां मूत्तियां एकसाथ उपमान है, स्यैयं ठै कारण षृथिवी (उनका उपमान है), व्यापकता 
के कारण आकाश, निखिल जगत्‌ कै प्राण होने कै कारण वायु, विश्वमाच्र को प्रकारित करने 
कारण सूयं [ विश्वमात्र को ] गह्ादित करने कै कारण चन्द्रमा ( खधासूति ) संहारक द्योने कै 
कारण वहि ओर अखिल जगत्‌ को आप्यायित करने के कारण जल ।› यहाँ अनन्वय की प्रतीति 
विना विश्च के दी जाती ह अतः यहा रब्देव्य का जमाव दोषावह नद्ध है । 
वु-ब्द सदमत्वायक द । साश्वात्‌ जात्‌ इस [ छाानुप्रास ] का अलंकारत्व ही दव्यैकय के 
विना संमव नदीं होता । 
इसीका उपसंहार करते &-- तदेवम्‌ पुनरुक्तवदाभास अर्धपौनरवत्य पर नि्मर है ओर चछ्का- 
युप्रास्त आदि तीन [ आदि पद से वत्यनुप्रास ओर यमक ] शव्दपौनरुक्त्य प्रर । खारानुप्रास 


जोदटै सो दोनो ( 2 व्दाथ।भय फ) के पौनरुक्त्य प्र निर रहता हे । इस प्रकार पौनरुक्त्य पर 
निमैर रहने वाटे पांच अकार हुए । 


यथयि [ पुनरुक्ति म जो | उक्ति तत्व [ है वह ] शव्द मँ उच्चारणस्वरूप दोता है ओर 


अर्थं मे जभिधान-| अभिवादृत्ति ६।९॥ मरततिपादन ]-स्वरूप, इसख्िए दोनो में मेद रहता है, एकरूपता 
नी, इसि पाँच स्वतन्त्र जल्कार दो सकते हं [ किसी एक कै पच मेद नदीं ह्यो स्वत्ति ] तथापि 
उक्ति उक्तित्वेन दोनों प्रकार कौ उक्तिओं में समान है जतःउन दोना उक्तिय।यं प्रतीति अभेदकीदही 
होती है फलतः यह ॥ 2१ रिभाव [ प्रकार-मेद्‌, प्रकारौ = मेदवाला ] संबन्ध है वह कवर 
सामान्य उक्ति पर निमर दं । यहजोकहा जाताहैकरि जते मेदहोनेसे शब्दम मी भेद 
हो जाता है, अवास्तविक ह च्य।कि मतीति मे तो एकरूपता ही भासित होती हे । इसोकि कोषो 
कै अनेकार्थं वग आदि अं भं ( अथै अनैक होनेपरमभी दाब्दको ) वेसा (एक ओर अभिन्न ) 
दी मानने का प्रचक्न हं । 
विमद्य-स्थैयांद्‌ भू०? इत्यादि प मेँ रीकाकार ने जो अनन्वय माना है वह विचारणीय दहै । 
पद्य मेँ अष्टमूत्ति भगवान्‌ कौ सात मूत्तियों का उनकी अष्टममूतिं के साथ उपमानोपमेयभाव 
वृत्ताया गया हँ । अतः अष्टममूत्तिस्वरूप दिव उपमेय सिद्ध होते है ओर अन्यमूतिस्वरूप दिव 


८ + + 
उपमान । इस प्रकार -अनुहरति सुभग तस्या वामां दक्षिणाधेस्यः = उस खन्दरयी का वामांगं 


उसी कै दक्षिणग का अनुकरण करता है' इस पये जेते नायिकाके णक दही दोने परमौ अंगो मं 


# गिाकानकर "क रामक चह चतक ` ` 


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चित्र ट्र $ स (७.७ 


वामत्व ओर दक्षिणत्व का भेद हो जाने से उपमान ओर उपमेय दोनों मँ अभेद की प्रतीति नहीं 
दोती ओर उससे अनन्वय सिदध नहीं हो पाता उसी प्रकार यद्य भी हिव कै अभिन्न होने पर मी 
उनकी मूत्तियां मे परस्पर भेद होने से उपमान ओर उपमेय सै अभेद की प्रतीति नदीं होती, फलतः 
यहाँ मी अनन्वय सिद्ध नदीं होता । 
यदि यह कहा जाय कि यहां अष्टम यजमान या चेतन्यमत्ति उपमेय न होकर अष्टसूत्ति ह्ये 
उपमेय हे जर प्रत्येक मूत्ति उसकी ही एक-एक इकाई दै, फलतः उनसे अमेद की प्रतीति ओर 
ततः अनन्वय असंभव नहीं, तव भी निवाद नदीं क्योकि अष्टभूति सामान्यस्वरूप का वाचकं 
राब्द हे ओर भू आदि विदोषस्वरूप .के वाचक । सामान्य ओर विशेष अभिन्न अ वरय होते 
हेः विन्तु उनमें मेदप्रतीति नदीं होती ेसा नही कहा जा सकता । 
यह्‌। अनन्वय कौ ध्वनि कदाचित्‌ संमव हं क्योकि केवल सात मृत्तियों मे अपना-जपना 

ओपम्य वतरने से यह प्रतीति होता हे कि अष्टम आत्ममूत्तिका कोई उपमान नदीं है । | सक्षम 
विवेचन के किए देखिए रप्तगंगाधर का अनन्वय प्रकरण |। सव कुछ के बाद यह यदि अभेद- 
प्रतीति मान मी लीजायतो यह तो नहींमानाजा सकता किं यहं भिन्न शाब्द प्रयोग से 
जनितभेद प्रतीति अनन्वय निष्पत्ति में , वाधा नहीं डाल्ती । .आत्मा होने पर म्‌ आदि ही उपमान 
वन पाते दैः इस प्रकार आत्मत्व के प्रतिपादन से भेदप्रतीति अवदय दुर्बल्हो जाती हे, 
संजीविनीकार ने ाटनुप्रास ओर अनन्वय का भेद इस प्रकार संग्रहीत किया है- 

'यत्र तावेव हाब्दाथां तात्पर्य तु विसियते । 

तत्‌ पौनरुक्त्यमाचायेखछयनुमास इष्यने ॥ 

दोषापन्तिभयादेव शब्देक्यं स्यादनन्वये । 

अस्मिस्तु खाटानुग्रासे साक्षादेव हि रक्षणम्‌ ।।" 


अथात्‌ "जहां शब्द ओर अथैवे ही हों किन्तु तात्पय॑मे मेद हो उस पौनरुक्त्य को आचार्य 
गण लाटानुप्रास मानते हँ । अनन्वय में इन्द कौ एकता दोषापत्तिके भयसे होती है, जवकिं 
लाटानुप्रास में वह लक्षणदहीदहे। 
सजीविनौकार ने 'अन्जपत्रनयने नयने" मे प्रथम नयनराव्द को बहुव्रीहि के कारण अन्य 
पदा्थपरक मानकर राटानुप्रास् मान लिया है, 
[ सस्व ] 
4 ~ नेक ,( क 
[ छ्र० ११ ] वणानां सद्धा्याटरतिेतुसवे चित्रम्‌ ॥ 
पौनरकयप्रस्तावे स्थानविरेषशिठष्टवणंपोनरक्त्यात्मकं चि्रवचनम्‌ । 
यद्यपि छिप्यक्चषराणां खद्धादिसंनिवेश्विलिष्त्वं तथापि शओओोजाकाड्समवेत- 
वणोत्पकशब्दाभेदेन वेषां खोके प्रतीतेवचकजाब्दाटकारोऽयम्‌ । आदि. 
ग्रहणाद्‌ यथाब्युत्पत्तिसभवं पद्यवबन्धादि परिग्रहः । यथा-- 
"भासते प्रतिमासार रसाभाता हताविभा । 
` भावितात्माद्ाभावादे देवाभा बत ते सभा ॥' 


 पएषोऽष्टद्कपद्यवन्धः। अन्न दिग्दलेषु निगेमप्वेशाभ्यां शिलष्राश्चर- 
त्वम्‌ । विदिग्वटेषु त्वन्यथा । कर्णिकाक्चरं तु दिलष्टमेव । | 


क 
` "=" = "क्क ककक 


८ अलङ्कारसखवंस्वम्‌ 


कहते हे ।› 

[ वृ० ] पौनरुक्त्य के प्रसंग मे [ उसके तुरंत वाद ] चित्रालकार का निरूपण इसङक्िए किया 
जारहादटैकि इसपर मी [ गज्जन; कपालिका, कुण्डिका आदि ] विचिष्ट-विरिष्ट स्थानों मे दिष्ट 
वर्णौ का पौनरुक्त्य रहता है । 

यद्यपि खङ्ग आदिं के आकार से युक्त केवर छ्पििमं च्वि अक्षर होतेह तथापि इस अल्कार 
को वाचक दाब्दं का अकार मान छ्य जातादहे कारण कि दिप्यक्षरोंका घ्रोत्राकादा मे समवेत 
[ समवाय संबन्ध से विंचमान | वणात्मक दाब्दं से अभेद प्रतीत होता हे । 

आदि दाव्द के महण से व्युत्पत्ति के अनुसार यथासंमव पञ्मव^्थादि का संग्रह ह्यो जाताद। 
यथा--^भासते प्रतिभासार ०? इत्यादि पच उष्टदरूपद्यवन्य का उदाहरण हे । 


[ सू० ११ ] “जहौ वर्णं खड्ग आदि के आकार को जन्म दं उसे चित्र | अलंकार | । 


[ इलोकाथ ] [ प्रतिभासार ] प्रतिमा दी है सार = वल जिसका रेते ह राजन्‌ [ ते ] आपकी 
समा [ बत ] भली भोति [ मासते ] भासित हो रही हे । वह [ रसाभाता शगार अदि रसौसे 
सुशोभित है, उसने [ हताऽविमा ] अविमा = व्यामोह कौ [ इत - दूर कर दिया है, [ भावितात्मा | 
उसका स्वरूप परिस्छृत है, वह [ वादे शुमा ] वादो मं शम हे अतः [ देवाभा ] देव [ सभा] 
तस्य है 1 | 
यँ दिग्दलो मे प्रवेश तथा निर्गम के क्रम से अक्षर दिल हे। विदिग्दर्छ मँ स्थित्निउ तते 
उल्टी है । कर्णिकाक्षर दिल ही दे । | | 


वचिन्राटङ्लारः ७२. 
विमरिनी 


वणांनामित्यादि 1 उच्चारणकारे स्थानविशोषरिरृष्टव णाद्मकखङ्गादिसं निवेश स्या ्रावात्‌- 
पो नर्क्त्य प्रतीतिनत्रिति किमाश्रयोऽयमलंकार इत्याख््याह--यवपीत्यादि । छिप्यक्तराणां 
मषीचिन्दुरूपाणां श्रयमाणतासतच्च वणेज्ञव्दामेप्रतिपस्या ओ पचारिकोऽयं शब्दालंकार 
इति तास्पयथिः । आदिग्रहणं सफख्यितुं पद्यवन्धेनो दाहरति-भासतेत्यादि । खङ्वन्धः 
यु नयथा- 


'स पात्री भविता मोडत्तणलच्म्या भवारसः। 
समस्तजनतायासससुदासिन्नताभिद्‌ः ॥° 
रिल्टमेवेति । अष्टदिक्छमपि निगंसगप्रवेक्योः। 
उच्चारण के समय विशिष्ट स्थानोंमे रिकष्टजो वणै तत्स्वरूप खङ्ग आदि के आकार का 
अभाव रहता हे अतः यहाँ पौनरुक्त्य की प्रतीति नदीं होती अतः यह्‌ जिज्ञासा होती है कि यह 
अरुकार किसके आसरे रहता है! [ इस जिज्ञासा ओर ] इस [के उत्तर] के क्षि ङ्खिा 'यद्यपि०' 
इत्या।द । तात्पये यह्‌ कि लिपि के अक्षर स्याही की वृद होते है । उनके साथ सनाई देने वाञे 
वर्णां से अभिन्न दाब्दों कौ अभेदग्रतीति होती ३, उसी के आधार पर इस [ चित्र ] को लाक्षणिक 
रूप से राब्दालंकार कहा जाता हे । आदिशब्द को सफर करने के छ्एि [ नीचे के] उदाहरण 
के रूप में पद्मबन्ध प्रस्तुत करते हैँ “भासते०' इत्यादि । खज्गबन्ध का उदाहरण यह है स 
यपात्रीभविता० ॥ 


[ इलोकाथैः = ] { भवारस ] भव = [ संसार, उत्त के रससे रदित [ अरस ] वह समस्त 
जनता के आयासरूपी ससुद्र कौ अभिन्नता तोड़ने वारी मोक्षक्षण की लक्ष्मी का पात्र बनेगा । 


दिष्टमेव अथात्र आलो दिदाओं में प्रवेद करते ओर निकल्ते समय भी । 


। 
त 
॥ 
| 
। 
। 
॥ 


८० अलल्खारसवंस्वम्‌ 


चिमर्- श्रीवियाचक्रवत्तीं ने संजीविनी म पद्मबन्ध ओर खज्ञवन्धों का निष्क इस प्रकार 
दिया है- 
'अच्रायं निव्कषः- 
(कृणिकायां लिखिदेकं हौ द्वौ दिषु विदिष्चच। 
म्रवेद्धनिर्गमो दिषु पद्यवन्धो मवेदयम्‌ ॥ 
आरोप्य छिपिवणानां साम्याद्‌ वाचक्वणैताम्‌ । 
खन्ञवन्धादिकं चित्रं काव्याल्कार इष्यते 1 इति । 


अर्थात्‌ = कणिका मेँ प्रथम एक अक्षर लिखकर दिदाओं ओर विदिचार्ओमें दो-दो अक्षर 
खिति जाय ओर प्रवेद तथा निर्गम केव दिद्चार्ओं मे रहै तो उससे पद्मवन्ध वनता दं । 

(साम्य के आधार पर किपिवर्णौ के ऊपर वाचक्वणां का आरोप करने से काव्य मं 
खङ्गवन्ध आदि [ चित्र ] कौ अलंकार मान ख्या जाता दं) 

संजीविनीकार ने यद्य तक के समी अरुकारो को राब्दाल्कार कदाहं । इस प्रकरणे अन्त 
नं उन्दोनि इस प्रकार की पुष्पिका दी दै--इति श्रीविद्याचक्रवन्तिनिः कृतो अलुकारसर्वस्वसंजीविन्यां 
दरानब्दाङ्कार प्रकरणम्‌ ॥" “ 

अगले प्रकरण का आरम्भ उन्दने इन राब्दां से किया हे “अथ अर्थालंकाराः 12 इससे स्पष्ट 
हे कि संजीविनीकार पुनरक्तवदामास को भी शब्दालंकार दही मानते दें । वृत्तिकार से पुनरुक्तवदा- 
भास को जद अर्थालंकार कहा है वहो संजीविनीकार ने उसपर कों विचार नदीं वियादहै। 
कदाचित्‌ ते उत्ते उपेक्षणीय मानते ह । 

इतिदास--चिव्रवन्ध का संग्रह प्रथमतः दण्डीने कियादहं। इनके पश्चात्‌ चित्रवन्ध रुद्र 
ओर मम्मय मे ही मिते हँ । मध्यवती भामह, वामन ओर उद्धर के काव्यालंकारा मे इनका 
अमाव हे । 

[ खवंस्व | 


[० १२] उपमानोपमेययोः साधम्यं भेदाभेदतुस्यत्वे उपमा। 


अर्थाटकारपरकरणनिद्‌म्‌ । उपमानोपमेययोरित्यभरतीतोषमानोपमेयनि- 


वेधा्थम्‌ । साधम्य घयः भकारः । भेद्भाधान्यं ज्यतिरेकादिवत्‌ । नि 
धान्यं रूपकादिवव्‌ । दयोस्वल्यत्वं यथास्याम्‌ । यदाहुः य त्सा- 
मान्यं कथ्िच्च विरोषः स विषयः सदखतायाः इति । उपमेवानैकश्रकार- 
वेचिव्येणानकालंकारवीजभूतेति प्रथमं निर्दिष्टा । अस्याश्च पूणौुघात्व- 
मेदाच्चिरतनेरवहविधत्वभ्रुक्तम्‌ । त्रापि स्वाधारणधमस्य ऊचिद्नुणः मिलयेकक- 
रष्येण निरदैदाः, कचिद्ठस्वुधरतिवस्तुभावेन परथलानिदेशः । प्रथङनिरदेशो च 


 संबन्धिमेदमान्ं परतिवस्तूपमावत्‌ बिम्बध्रतिबिम्बभावो वा दष्टान्तचत्‌ । 


क्रमेणोद्‌ाहरणम्‌-- (4 
श्रमामहत्या शिखयेव दीपल्िमागयेव चिदिवस्य मागेः । 
` संस्कारवत्येव गिरा मनीषी तया स पूतश्च विभ्रूषितश्च 11" 


5 
4 1 


। 4 । 
{ 4 


पाता ता. .ु.ु.ु.ुौुौू 5.४3.  ्क^४. 1. प्यक 


"णयं 


उपमाटृङ्कारः ८र्‌ 


ध्यान्त्या अह केलितकधरमाननं तदाच्त्तच्न्तछ्तपञज्निभं वहन्त्या । 
दिण्धोऽस्खतेन च विषेण च पक्ष्मठाक्ष्या गाढं निखात इव मे हदये कराश्च; ॥) 
अच वछितत्वाच्रत्तत्वे संवन्धिभेदाद्धिने। घम्यभिप्रायेण त॒ बविम्बप्रति- 
विम्बत्वमेव । 
"पाण्ड्यो ऽयमंसापिंतटम्बहारः कलः प्राङ्गसगो हरिचन्दनेन । 
आभाति बालातपरक्तसानुः सनिद्यरोद्वार इवाद्वियाजः ॥' 
अच हाराङ्गरागयोर्निद्येरवाखातपो भतिविम्बत्येन निर्दि । 
[सू० १२] (उपमान ओर उपमेय का समानधमं के साथ एेखा संबन्ध जिखमे सेद्‌ जर 
जभेद्‌ [ प्रधान या अप्रधान न होकर | समान हां उपमा | नामक जकूकार | 
कहराता हे 1 
[ बरृ० ] यह्‌ प्रकरण अथाल्कार का है। [ साधम्य केव उपमानोपमेय का ही होता है 
कायकारण आदि का नहीं तथापि सूत्रम उपमानोपमेय का राब्दतः कथन अप्रतीत उपमान जर 


वैसे ही उपमेय के निषेध कै छिए किया गयाहै। सावम्य॑मे तीन भेद होते हे [ एक वह ] जिसमें 


मेद की प्रधानता रहती हे जैसे व्यतिरेक आदि मे, [ दूसरा वह ] जिसमे अभेद की प्रधानता रहती 
हे जंसे रूपकादि में [तीसरा वह] जिसमें दोनों की समानता रहती है जेसे इसी उपमा मे । जेसा कि 
[ माष्यकार आदि ने | कदा दै--सदटशता = उपमा का विषय [ स्थल ] वह होता है जहां कुछ 
[ सामान्य--] समानता [ साधम्यं अभेद ] ओर कुछ [ विद्धेष--] असमानता [ वैधम्यै- 
मेद ] रहे ` 


[ यचपि प्राचीन आचार्यो मे भामह ओर उदभय ने अ्थारुकार का निरूपण रूपक से आरम्य 
विया हे ओर रुद्रट ने सहोक्ति से तथापि ] ्रंथकार ने ( वामन के समान ) उपमा का ही निरू- 
पण पदक विया यह इसक्िएि कि [ वासन के ही समान उन्होने भी यह मानाहैकि] उपमा हयी 
थोडे थोडे से अन्तर को लेकर अनेक अकलकारो मे बीजका काम करती है। 

[ वामन, उद्भट ओर मम्मट ] ने इसे पूणं ओर लप्ताइनदोभागोँमें वांश ओौर उनके 
भी अनेक [ उद्भट ने १७, मम्मट ने २५ ] मेद बतरये है, [ भामह ओर रुद्रमेंये मेद नहीं 
हैः ] तथापि [ कुछ ओर भी मार्मिक भेद किए जा सकते है यथा ] कदी साधारण धम [ एक दन्द से 
कहे जाने पर भौ ] अगामी ( उपमेय ओर उपमान दोनों में वे-रुकावर लागू होने वाखा ) होताः 
है अतःउपेणकदहीरूपमे [ एक ही चब्द से ] प्रस्तुत किया जाता है विन्तु कहीं ८ वह अनुगामी 
नदीं होता एक चब्द से नहीं कहा जाता ओर ) वस्तुप्रतिवस्तु-स्वरूप ( एक होने पर भी सिन्न- ` 
भिन्न राब्दो से प्रथक्‌ पृथक्‌ प्रतिपादित फ़रतः भिन्न प्रतीत होने वाला ) रहता है अतः भिन्न- 
सिन्न रूपो मे ( पथक्‌ प्रथक्‌ शब्दों से ) प्रस्तुत किया जाता है । जहाँ भिन्न-भिन्न रूपँ मे प्रति 
पादित किया जाता है वँ भेद केवर सम्बन्धियोँ ( उपमानोपमेयो ) मे रहता है ( धमं में नहीं ) 
या तो ( वहां साधारणधमं मं ) बिम्बप्रतिषिम्बभाव (भिन्न होने परभी सारय कै कारण 
( जभेदज्ञान ) रहता हे । ( दोनों के ) एक-एक करके उदाहरण-( साधारण ध्म का उपमान मौर 
उपमेय दोनो के लिए एक ही वार्‌ उपयोग अथात्‌ अनुगामी साधारण धर्मं का उदाहरण )-- 
“वहु पवतराज ( हिमाचल ) उस ( नवजात ) कन्या ( पावती ) से ठीक उसी प्रकार पवित्र मी 
हृ ओर विभूषित भौ जिस प्रकार पर्याप्त प्रकाद्वाली ( अग्नि ) शिखा से दीप, ८ मन्दाकिनी ). 


६ अ० स 


८२ अलङ्ारसवंस्वम्‌ 


गंगा से स्व्ग-मानं ८ अन्तरिक् ) (अथवा ) संस्कृत माषा से विद्वान्‌ ( पवित्र ओर विभूषित दता 
हेः ( कमारसंमव-१ सगं ) । | । 

[ याँ पूतत्व ओर विभूषितत्व दोनो धमं साधारण धमे ह । इन्दं इरोकमे एक ही वार का 
गया है चिन्त ये उपमानमूत दीपक, स्वर्ग॑मागं ओर विद्वानु तथा उपमैयभूत दिमाचल दोनो मं 
समन्वित दो जाते हैँ अतः इन्दे अनुगामी कदा जा सकता है ] 

[ वस्तुप्रतिवस्तुरूप से प्रथक्‌ प्रथक्‌ खाब्दों द्वारा प्रथक्‌ प्रथक्‌ रूप से प्रस्तुत अतः अननुगामी 

साधारणधमं का उदाहरण ]- 

(जव वह [ माख्तीमाधव की नायिका माक्ती ]जारदहीथी तो उसने अपनी यीवा कै साथ 
अपना चेहरा (भैरी ओर ) घुमाया । ८ उस समय ) वद ेसा ख्गरहाथा जे वृन्त ( टल ) 
कै साथ तिरछा किया गया सौ पंड़ी का कमलपुष्पं हौ । उस स्थिति मं घनी वरोनी वाटी आखो 
से जो कटाक्ष किया मैरे ८ माधव कै) हृदय नं बहुत दी गदराद सते गड गयारहै। ठेसा क्गता है 
कि वह अग्रत ओर विष दोनों से वुञ्चाया गयादहै। ( यहां अनुवादम्‌ उपमान ओर उपमेय 
दोनों केरिएिदो वाक्यो ग्द, मरू पयमेंवाक्यषए्कदही हे वही होना भी च दिए, अनुवाद सें 
वेसा करने पर काव्यदिद्प मयियामेट हो जाता ) 

यहां [ वछितत्व ] धुमाव ओर आव्रत्तत्व [ तिरदापन | केवल संबन्धि्यो [ आनन = चेहरा 
ओर शतपत्र = कमल ] के भिन्न होने से भिम्न दै स्वतःतोवे एक हीह] यदि इन धर्मौ से युक्त 

[ आनन ओर भरीवा तथा शतपत्र ओर वृन्त ] वस्तुओं को लेकर उपमा मानी जायतो उनमें तो 
[ यहां भी विम्ब प्रतिविम्बमाव | सादृदय के आधार पर प्रातीतिक अभेद ] ही मानना होगा । 

[ भूरतः भिन्न साधारण धर्म के अरग अक्ग दाब्दौ से अल्ग-जल्ग रूपमे प्रस्तुत किए 
जने पर मी सादृद्य के आधार पर अभेद अथात्‌ विम्बप्रतिविम्वभाव का उदाहरण ]- 

'पाठ्ण्डय देदा का [ विद्चाककाय ] यद रजा कन्धा पर दार चटकाए हृएदहै ओर लाल- 
चन्दन का अंगराग (लेप ) क्गाए इष दं मतः एेसा खद्योभित दो रदा दहे जसे कोद पव तराज हो 
जिसपर क्षरने वह रहे हँ ओर जिसकी चोय पर सवेरे कौ कालौ जाई हो ।- (रघु ह्सर्ग) । 

यँ [ विम्वभूत ] हार ओर राग के छि निञ्घैर वालातप प्रतिविम्वरूप से प्रस्तुत किं गण 
है । [ हार ओर जिक्र मे रम्वायमानत्व तथा शुक्लत्व की समानता है अतः उने अभेद प्रतीत 
होता है । इसी प्रकार अंगराग तथा वातप मेँ विस्वृतत तथा रक्तवण॑त्व की समानता & जिसे 

इनवं मी असेद की प्रतौति होती है। इस प्रकार इतत स्वगत साधार्णधमो के कारण अभिन्नं हु 
हार + नियर अंगराग + वालातप राजा ओर पवेत कौ उपमा मं साधारणवमै का काम कर देते 
अतः यहाँ विम्बप्रतिविंम्बमाव मान्य है ] ¦ 


विमदिनी 


` उपमानेत्यादि । अर्थेति । शब्दाटंकारनिणंयानन्तरमवसरघ्राप्तमिस्यर्थः । ननूपमानोप- 
मेययोरेव साधर्म्यं संभवति न कार्यकारणादिकयोरिति किं तदुपादनेनेत्यााङ्कयाद--उप- 
नित्यादि । तत्रोषमानस्याग्रतीतस्वं िङ्गमेदादिना प्राच्येरुक्तम्‌ । यथा-- 
कटु छणन्तो मलदायकाः खलखास्तुदन्व्यङ वन्वनशस्ङ्धला इव । 
मनस्तु साधुध्वनिभिः पदे पदे हरन्ति सन्तो मणिनूषुरा इव ॥' 
अन्न कणनादेरधमस्योपमानेऽन्यतां करोतीति लिङ्गभेदो दुष्टः । यथ्पि साधारणधर्मस्यो- 
अयसंबन्धक्षंभवेऽपि सिद्धस्वादुपमाने तस्संबन्धस्य स्वयमेवावगमात्‌ तस्य न शान्दता 


उपमाखड्गरः 4 


युच्छस्युपमानपारवतन्त्येण लिङ्गादिवि परिणामो न कायं इति न चिङ्गमेदादेद्टत्व म्‌, तथाप्यु- 
पमानवाक्यस्य साका्ुध्वात्प्रती तिविश्रान्तेः शाब्दस्तत्संबन्ध उपयुक्त एव । नहि प्रभा. 
महतव्याद्‌ादुपमानवाक्ये षूतत्वादिसंबन्धं विना समन्वयचिश्रान्तिः स्यात्‌। केवर समान- 
धमेस्योपमेये विधीयमानस्वस्ुपमाने चानू्यमानत्वमितीयानेव विशेषः । तदुभयच्रापि तत्‌. 
सखंबन्धस्यावश्योपयोगादुप पयत षव समानधमंस्याज्ुगामित्वम्‌ । तज्ञिङ्गभेदादेरपि दुष्टत्वं 
युक्तम्‌ । उपमेयस्याप्रतीतस्वमवणं नीयस्यापि वणंनीयत्वम्‌ । यथा- 


“गोरः सुपीवराभोगो रण्डाया सुण्डितो मगः । 
मेरोरकंटयो ज्ञीड-शबष्प-हेम-तटायते ॥ 


उपमानेव्यादि । जथेति अभिप्राय यह है कि अधांरुकार का निरूपण अब्दालकार निरूपण 


अच्र तन्वङ्गया रूपवर्णने भगवणंनमनौ चित्यावहमिस्युपमेयस्याम्रतीतस्वस्‌ । 
के पश्चात्‌ अवसर प्राप्त है। 
| 


रका = [ मम्मटने उपमा लक्षणम उपमानोपमेय का निवेदान कर कहा है कि] साधम्य 
उपमान उपमेयमे ही रहता है कायकारण आदिमे न्दी [ इसलिए उन्होंने अपने उपमारक्षण 
“साधम्येमुपमा मेदे"? में उपमान उपमेय का निवे नहीं किया ] तव यहो उनका उपादान क्यो 
किया जा रहा हे । “इसके उत्तर मेँ कदते है*--उपमानेच्यादि । यहां जो उपमान का अप्रतीतत्व 
हे उसमे [ वामन आदि ] प्राचीनँ ने छिगभेद आदि को कारण माना है । यथा-- . 
कट्‌ वोरूते ओर काङ्खि रगात्ते खर लोग॒वन्धन खला के समान बहुत अधिक सताते है । 
इसके विरुद्ध सत्पुरुष मीठी वाणी से मणिनूपुर के समान पद पद मँ चित्तको हर क्ते है। 
कादम्बरी आमुख |] ।' 
यहां [ उपमानभूत श्ङ्कला खीलिग है ओर क्वणन्तः पुंटिरग । इस प्रकार विरोषण विदेष्यों 
मे ] छिङ्गभेद ` है ओर वह क्वणन आदि धर्म को उपमान मै अन्वित नहीं होने देता इसकिए 
दोषभी हे। यथपि साधारणधर्म का संबन्ध दोनों से होता है [ अतः उसमे एकमात्र से संवन्ध 
रखने वाका दोष नहीं ह्यना चाददिए ] किन्तु उपमान के साथ उस [साधारण धम्म] का संबन्ध 
स्वतः विदित हो जाता है क्योकि उपमान सें वह्‌ [ धम्म रोकप्रमाण से ] सिदध रहता है [श्ङ्ला 
आदि मे कटक्वणनादि धमै लोकप्रसिद्ध है ] निदान उसे शब्द द्वारा कहना युक्त या आवरयक 
नहीं होता, फलतः उपमैयगत धमं लिगि विपरिणाम द्वारा उपमानमे भौ खग किया जाय यहमी. 
आवद्यक नदीं हे ओर इस स्थिति मेँ रिगभेद दोष नदीं ठदरता, तथापि उपमानवाक्य उसके 
ज्ञान तक साकांक्ष रहता है इसकिए प्रतीति अटकी न रहे, वह्‌ शीघ्र प्य॑वसित हो सके इसलिए 
साधारणधमं का सम्बन्ध उपमान के साथ भी राब्दतः कथित ही दोना चाहिए । ्प्रभामहत्या०” 
इत्यादि पयां म जवतक उपमानवाक्य मँ पृूतत्वादिं के संबन्ध प्रतीत नहीं हौ जाते समन्वय 


क 


१. (स्तम्बेरमा सुखरश्ङ्कलकषिणस्तेः [ रघु० ५] आदि मे श्ङ्लशब्द भी है । अनेकार्थं 
सग्रह में हेमचन्द्र ने इसे लोहरज्जुवाचक माना है ओर नपुंसकरिङ्गान्त । अमरकोष ने इसे पुरुष 
की करधनी का वाचक माना है किन्तु तीनो किगोमे। यथपि रघुवंश के उक्त पदमे हेमाद्धि 
ओर मचिनाथ ने %द्वररब्द को नपुंसकलिङ्गन्त ही माना है तथापि लोहरज्जु के सी अर्थं मे इसका , 
प्रयोग पुंलिङ्गान्त संभव हे तभी बाणभट्र ने विदोषणवाची शब्द मे पुंल्लिगीय शतृप्रत्ययदिया है अतः 
यहां छिगमेद भिगया मी जा सकता हे । | ५ 


८8 अदटङ्ारखवंस्वम्‌ 


[ पदार्थौ का सवन्ध ] तय नहीं हो पाता 1 अन्तर इतना ही रहता हं किं साधारणधर्म उपमेयमें 
विधेय रहता है ओर उपमान मे उदद्वेदय । इस प्रकार उपमान ओर [ उपमेय ] दोना के साथ 
उपयोग आवदयक दने से साधारण धमं का अनुगामी [ उभयान्वयी ] दोना उपयुक्त दी है। 
सीखिए छिगमेद आदि को दष्ट मानना भी टीक हैँ । 

उपमैय तव भी अप्रतीत होता हे जव किसी अवणेनीय का मी वणन कर दिया जाय । यथा-- 
“रोड सखी का गोरा; चोडा चकला ओर सुण्डित भग [ योनिवेदिका ] मेर्‌ फ उस खव्णं तट के 
समान र्गता है जिसकी घास सूयं के थोडा ने चरी हो।' 

या किसी तन्वेगी के रूप का वर्णन करते करते उसके भग का वर्णन करना अनौचित्यकास 
है इसछ्िए यहाँ उपमेय अप्रतीत है । 

[ सूत्रकार ने सूत्र मेँ उपमान ओर उपमैय को स्थान देकर रसे उपमान उपमेय का परिहार 
मावदयक माना है, अतः उनका सूत्रम इन दोनांँ का उपयोग करना उचित है ] 


विमरिनी 


मेदामेदतस्यत्वं व्याख्यातं साघम्यंस्य विषयविभागेण व्यवर्थिति दृरशंयति-- साधम्य 
इत्यादिना । एनेरेव च त्रिभिः प्रकारैः साधर्याश्रयः समग्र एवालंकारवर्गः संगरहीतः । तेन 
भ्यतिरेकवदिस्यनेन सहोक्त्यादयः संगृहीताः -रूपकवदित्यनेन परिणामोसरेत्तादयः । किंतु 
रूपकोत्भे्योरभेद प्राधान्यसद्धावेऽप्यारो पाध्यवसायचछ्रत एव विरोषः । यद्वचयति-- “आरो. 
पाद्मेदेऽध्यवसायः प्रकृष्यते" इति । अतश्चाभध्यवसायगभेभ्वरंकारेषु शद्धाभेदरूपश्चतुर्थः 
प्रकारो न कश्चिदाशङ्कनीयः। तत्राप्यमेद्‌म्राधान्यस्यंव भावात्‌ । अनयाप्युपसमेयो पमादयः 
संगरहीताः । सामान्यमित्यमेदहेतुकम्‌ । विशेष इति भेदहेठकः । एवं च भेदासेदतस्यस्व- 
विषये यः सादृश्यग्रत्ययो जायते तस्यो पमाविषयस्वयुक्तमर्‌ । ननु च सरस्वप्यनेकेष्वथ 
छंकारेषु प्रथममियमेव किं निर्दिष्टेस्याशङ्कयाह--उपमे वेत्यादि । अनेकेऽरंकाराः साधर्म्य 
श्रयाः तन्रैवास्य बीजत्वात्‌ । उक्तमिति । 
(साधर्म्यमुपमा मेदे पूर्णा लक्ता च सा्िमा । 
श्रीव्यार्थीं च भवेद्‌ वाक्ये खमासे तद्धिते तथा ॥ ' इत्यादिना । 

अतश्च किमस्माकं तदाविष्करणेनेति भावः । एवं च तेषां गणने तथा न वै चिच्यं किचि. 
दिति सूचितम्‌ । 

मेदामेदतल्यता क व्याख्या करने के छिएट विषय विभाग दारा साधम्यं की व्यवस्था दिखलतत 
हए छिख रहे दै-- साधम्यं" इत्यादि । इन्दी तीन भेदां मेँ साधन्याभ्नित सभौ अलंकासो का संह 
दो जाता है, इसलिण व्यतिरेक के , समान रेसा कदने से सदोक्ति आदि का संग्रह दहो जाता ह 
जौर रूपक के समान कटने से परिणाम, उप्प्रक्षा आदि का। रूपक ओर उग्यरक्षा ने अभेद 
प्राधान्य रहने पर भी अन्तर आरोप [ रूपक ] ओर अध्यवसाय [ उत्प्रक्षा ] को लेकर होता है| 
जसा कि करटैगे--अमेद भँ आरोप की अपेक्षा अध्यवसाय उ्छृष्ट होता है । इसकिए अभ्यवसायवाछे 
अक्ंकारो मे शुद्ध अभेदः नामक किसी चतर्थं मेद की संभावना नदीं की जानी चाहिए । वहाँ 
भी अभेद की ही प्रधानता रहती है । इस [ उपमा] के दारा उपमेयोपमा आदिका संयह 
किया गया । 

सामान्य अभेद कै आधार पर, विरोष सेद के आधार पर। इस प्रकार जौँ मेद ओर 


अभेद दानो कौ वरावरी रहती है वँ जो सार्य की प्रतीति होती है उसे उपमा का विषय 


उपमालङ्कारः ८५, 


साना गया । [ प्ररन | “अथै के अलकार तो ओर भी अनेक है, अर्थालकारनिरूपण उनसे आरम्भ न 
कर उपमासे ही आरम्भ क्यों किया इसपर उत्तर देते इए छिखा-उपसैव इत्यादि । अनेक 
अकुकार कहने का अथ है वे अरुकार जो साधम्य पर आप है क्योकि उपमा केवर उन्दी मं 
वीजभूत होती हे 


उक्तम्‌ [पूणां लप्ता आदि अनेक भेद कदे है] अर्थाव्‌ “साधम्युपमा भदे पूर्णां लप्ता०? [ काव्य- 
प्रकारा उ० १० |] “भेद रहने पर॒ समानधमका जो सम्बन्ध उसे उपमा कहा जाता है वह दो 
प्रकार की होती हे पूणां ओर लक्ता । इनमें से प्रथम [ पूर्णां] वास्य, समासत तथा तद्धित मे भती 
ओर आर्थी [ इस प्रकार छ प्रकार की] होतीहै। यहाँसे लेकर अगे लुप्ताके १९भेदौ कै 
निरूपण तक । अभिप्राय यह्‌ कि प्राचीन आचार्यौ-द्वारा निरूपण कर दिए जाने से पनः उनका 
निरूपण करना आवदयक नहीं हे । इससे यह भी ध्वनित हआ कि प्राचीनं के इनमेदोंमें 
कोद चमत्कार नहीं हे [ रसगंगाधरकारने भी यही कदा है 'अस्याश्चोपमायाः पराचामतुरोधेन 
केचिद्‌ भेदा उद्‌ाडियन्तेः प° २१३ निणैयसा० सं० £ | 

विमशिनी 

तत्रापीति । चिरंतनोक्ते -पूर्णत्वादिभेदनिदंशे खत्यपोत्य्थः । साधारणधमंस्येत्ति । 
धमः परश्रितः, तस्य च तदृतद्भामिस्वात्‌ साधारणत्वम्‌ । तदेव चोपमाद्यत्थाने 
निमित्तम्‌ । सख च चतुष्टयी शब्दानां म्रवृत्तिः इति महाभाव्यप्रक्रियया जातिगुणक्रिया- 
द्रन्यात्मञषु धर्मिष्वेवंरूप एव भवति । न चेतद्धिरुध्यते 1 धर्मिधर्मभावस्य न वास्तवस्वम्‌ । 
जात्याद्यात्मनो धर्मिणोऽपि कदाचिदन्याधितत्वे धमस्वात्‌ । एवं च तदतिरिक्तं 
धमंमात्रमपि साधारणं न किचिद्वाच्यम्‌ ¦ चतुष्टय्या ९व शब्दानां भ्बरत्तसक्तत्वात्‌ । 

सदय बुुजे महा जः सहसोद्वेगमियं यजेदिति । 
अचिरोपनतां ख मेदिनीं नव पाणिग्रहणं वधूमिव ॥' 

इत्यादा पमानादौ क्रियारूपत्वादे्योजयितुं शक्यत्वात्‌ तस्य एव च समभ्रविषयावगा- 
हनसहिष्णुत्वात्‌ । ननु जातेः सखाघारणधम॑से तजातीयस्वाच तरवं न स्यात्‌ , न सदशत्व- 
मिति कथसुपमाङ्गत्व मस्याः स्यादिति चेत्‌, न! बिम्बभ्रतिबिम्बभावाश्रयेण तथास्वा- 
भावात्‌ । तत्र दयसङ्ननिर्दै शाद्‌ दयो्हारादिकयोजाव्योः श्वैत्यायमेदनि मित्तावरूम्बनेने कत्व. 
माश्रित्य सादश्यनिमित्तं साधारण्यं स्यात्‌ । एतच सविस्तरसुपरि्ाद्‌ व च॑ंयामः । 

` तत्रापि = तव भी अर्थात्‌ प्राचीनं के दारा निदिष्ट पूणां आदि २५ भेदं के रहने पर भी । 

साधारणधर्मस्य = धम का अथंदहैजो दूसरे में रहै । वह जव दो भिन्न-भिन्न [ तद्‌ अतद्‌ ] 
वस्तुओं मे रहता हे तो साधारण कहलाता है । यही साधारण धर्म उपमादि अर्कारों के अलंकारत्व 
का कारणहोता है। धमी चार प्रकार के होते हे जात्ति, गुण, क्रिया ओर द्रव्य जेसा किं 
महाभाष्यकार ने कहा हे “चतुष्टयी चब्दानां प्रवृत्तिः । इन धममियोमे येही चारों साधारण 
धमैरूप भी होते हे । [ यह्‌ धमी का धर्मरूप होना ] कों चिरुद्ध वात नहीं है, क्योकि [ कान्य मे ] 
धमेघमिभाव [ विवक्षाीन अतः काल्पनिक, न फिं सौतिक स्तर पर सत्य ] आश्रयाश्रयिभावरूप 
से रहता दै । इसीलिए धर्मधमिमाव वास्तविक नहीं होता । जाति आदि धमी मी यदि अन्याधित 
[ रूप से प्रतिपादित ] होतेह तो धर्म॑ मान क्िए जाते है। इससे यह बात आती दहै कि इन 
[ चार । के अतिरिक्त अन्य किंस को भौ साधारण धमं नहीं माना जा सकता क्योकि चाब्दौ के 
अथं वेव चार्‌ हौ ( जाति आदि ) बतलाए गए हे” । “उस महाबाहु (अज) ने तुरन्त प्राप्त 


< अलङ्कारखवेस्वम्‌ 


परथिवी का भोग॒ नवोढा वधू के समान यदह सोचकर दया के साथ किया कि कीं यह उदवेजित 
न ददो जाए, यँ उपमान आदि में क्रियारूपत्वादि की योजनाकीजा सकती दै ओर वही 
[ क्रिया दी ] यौ समयविषयावगाहनसदिष्णु हे [ अर्यात्‌ क्रिया दही यदहं उपमार्कार निष्पादक 
हे ] । ८ प्रन ) जाति उपमा का अंग केसे मानी जा सकती दे क्योकिन तो [ उपमानोपमेयगत 
भिन्न-मिच्र ] वे [ जातियों ] अभिन्न दहो सकतीं क्योकि वे अधिक वे अधिक तञ्नातीयदहदी दो 
सकती हे ओर न उनमें परस्पर का साद्रदयय दही रह सकता [ व्याकि दोनो सवथा भिन्ने ह्यँगी ]। 
[ उत्तर ] एेसा नदीं । जातिया के मेद की प्रतीति विम्वप्रतिविम्बभाव से मिट जाती हे 'पाण्डयोऽ- 
प्यामंसापितल्म्बहारः आदि मे, उपमान ओौर उपमेय कै साथ [ वार-वार कथित दारत्वादि 
जातियों का शत्य आदि के आधार पर रेक्य हो जागा नौर उस | शरैत्यादिजनित ] साद्स्य 
के आधार पर उन [ जातियों ] का साधारणत्वं भी , निष्पन्न दो सकेगा । यद विषय जर मी 
अधिक विस्तार में हम आगे बतलावेंगे । 


विमदिनी 


त्र धर्मिणो जाव्यादिरूपता यथा- 
'घनोद्यानच्छःयामिव मरपथाद्‌, दाव दह्‌ नात्‌ 
तुषाराम्भोवापीमिव विषविपाकादिव सुधाम्‌ । 
्रबद्धादुन्माद्‌ाब्‌ श्रक्रतिसिव निस्तायंविरहा- 
ल्लमेय व्वद्धक्ति निरूपसरसां शंकर कडा ॥? 

अत्र च्छायावापीसुधाग्रङ्ृतीनाम्ुपमानानां जातियुणद्रनव्यक्रियाववम्‌ । दायायास्तु जाति. 
रूपत्वाद्‌ गुणत्वं नाज्नादकनीयम्‌ । उपमेयस्य पुनरेतरस्वयमेवभ्यृद्यसर्‌ । 

जात्यादि को धमिरूपता का उदाहरण- 

“मरुपथ से घनोचानदछाया के समान; दावाभ्नि से शौतल्जल्वापी के समानः विषविपाकर से 
खधा के समान, प्रबद्ध उन्माद से प्रकृति [ स्वस्थचित्तता ] के समान दुस्तर विरहसे आपकी 
भक्ति को हे भगवान्‌ शकर में कव पाऊंगा 1" 

यँ छाया, वापी, खथा जौर प्रकृति क्रमशः जाति, यणः दन्य ओर क्रिया सूप है ( १ ) 1 
छाया जातिरूप हे । उसमे णत्व की शंका नहीं करना चादिए । उपमेय मं ये [ जाति आदि | 
स्वयमैव समञ्य टेनी चाहिए | [ इसा छ्मोक म विरह ओं र भक्ति उपमैय हे इनमें विरह जातिवाचक 
शाब्द हो सकता है वर्योकि वह॒ अभाव पदाथ है ओर विरद अनेक हो सकते है, जिनमे चिरदत्व 
जाति रद सकती है; भक्ति रागात्मक भावतत्त्व है जो स्पष्टरूप से युण है । द्रव्य केरूप में यद 
संकर भगवान्‌ को उपमेय माना जा सकता दै । प्राघतरिया यदि छाया आदि प्रत्येक के साथ छागू 


की जाय तो वह भी भक्ति के साथ उपमेय वन सकती है | 


विमरिनी 
धर्माणां तु यथा- . 
#\ वैदेहि पश्या मख्याद्‌ विभक्तं मत्सेतुना फेनिख्मम्बुरारिम्‌ । 
छायापथेनेव दा रत्प्रसन्नमाकाशमाविभ्छुवचाह्तारसर्‌ ॥' 
अच्र विभक्तमिस्यस्य क्रियात्वं रामसेकच्ायापथयो द्रव्यत्वं फेनतारकाणां जात्िव्वं 
ग्रसादस्य च गुणस्वं दन्यात्मकाकाज्ञम्बुरािगतस्वेनो पनिबद्धम्‌ । एवं प्रकृतामेव 


महामाभ्यग्रन्रियामपहाय निनिमित्तमेव प्रक्रियान्तरमश्रिस्य यदन्येद्क्तं तद युक्तमेवे- 


उपमालङ्कारः | ८७ 


त्यं बहुना । एवंविधस्य चास्य समावाभावरूपतया द्वेविध्यस्‌ । एतच न तथा 
वे चिन्यावहसिति अन्ता नोक्तस्‌ । 

धमो की जात्यादिरूपता यथा- 

हे वेदेहि ! देखो फेन से युक्त यद अम्बुरा्ि भरे सेतु से मङ्याचर पर्यन्त दो भागों मेंट 
गया है, ठीक उसी प्रकार जेसे आकाञ्चागंगा से खन्दरतारो भरा शचरत्कालीन निसं आकाञ्च 

यहां विभक्त होना [ वेटना ] क्रियारूप हे, रामसेत॒ ओर छायापथ ( आकादगंगा ) द्रव्यरूप 
हे, फेन ओर तारे जातिरूप हैः तथा प्रसन्नता ( निमंरूता ) गुणरूप । ये सव आकादा ओर अम्बुराचि 
मे विद्यमान वतलाए गद हं जो द्रव्यात्मक हे। इस प्रकार महाभाष्य की प्रकृत [ प्रसिद्ध | प्रक्रिया क्तो 
छोडकर [ उद्भट, मम्मटः, ओर रलाकरकार ] अन्य आचायौ ने अकारण ही [ पूणां लुप्ता आदि कौ | 
जो, दूसरं प्रक्रियां अपनाईं हें वह ठीकं नहींहे। हम इस प्रसंग को यहीं समाप्त करते हे । 
इस प्रकार [ चार प्रकार ] का यह [ साधारण धम ] भावात्मक भी होता है ओर भावात्मकं 
भी किन्त इसमे कोई चमत्कार नहीं है इसकिए अन्धकार ने इसका प्रतिपादन नहीं किया । 


विमरिनी | 
देकरूप्येगेति । सछ्रत्‌ । यद्ध च्यति-- (तत्र सामान्यधर्स॑स्येवाद्यपादाने सञ्खन्निर्दंश उपमा, 
इति । एधङनिर्देदा इति । असक्ृदिव्यथेः । यद्व च्य ति--“वस्तुग्रतिवस्तुभावेनासक्रनिनरद॑रोऽपि 
सेवः इति । साधारणधमंस्येव्यत्रापि संबन्धनौयस्र्‌ । वस्तुप्रतिवस्तुभवेऽपि द्वेविभ्य- 
मिस्याह-प्रथङ्निदंश इस्यादि । सम्बन्धिभेदमात्रमिति । न घुनः स्वरूपभेदः कशिदिव्यथंः । 
यद्व चय ति-असङ्ृन्निदये शद्ध सामान्यरूपत्वं विस्वबप्रतिविम्बभावो वाः इति । एतच सेद- 
त्रयं प्रायः सवेषामेव खादश्याश्रयाणासमरुकाराणां जीवि तभूतत्वेन संभवतीत्यत एव तन्न 
तत्रो द्‌ाहरिष्यामः । क्रमेणेति यथो देशस्‌ । सम्बन्धिभेदादिति । संबन्धिनोः कधरावृन्तयो- 
भेदात्‌ । न तु हारनिक्ल॑रादिवस्स्वरूपतो भद्‌: । वस्तुत एकवा लितस्वावृत्तस्व योरसेदः । 
ननु यदि वकितस्वान्रत्तव्वाख्यो धमं आननकातपत्त्रयोः शुद्धसामान्यरूपतयो पात्तस्तद्धमीं 
कधराघ्रन्तरूपः पुनः किरूपतयेव्याशङ्कयाह-धम्यभिप्रायेणेत्यादि । एवकारः शुद्धसामान्य 
रूपत्व व्यवच्छेद्कः । कधराब्रन्तयोश्च यथोक्ते धमिववेऽप्याननशतपस्त्रापेत्तया धमेत्वमेव 
युत्तम्‌ । आश्रयाश्रयिभावेन ध्मिधमभावस्य भावात्‌ । अत एवास्यावास्तवस्वं पूवंयुक्तस्‌ । 
अतश्चानन्ातपत्त्रापेक्तया इति न व्याख्येयम्‌ । तयोरूपमानो पमेय भाव वाचो युक्तेरेव युक्तः 
स्वात्‌ । एचं च सति कधराव्रन्तयोः स्वरूपमनभिमतं स्यात्‌ । अनेनव च बिम्बम्रतिबिम्ब- 
भावस्य स्वरूपे दर्दितेऽप्यसंकीणभ्रकटनाङयेन पुनः "पाण्डयोऽयम्‌' इ्याद्यदाहृतम्‌ । 
सक्रत्‌ एक वार [ निदेदा ] जेसा कि कैगे-- “उनमें सामान्यधमं का; इवादि शब्दों का 
उपादान होने पर यदि एक दही वार निर्दश्य दहयो तो उसे उपमा कहा जाता हे, पथक्‌ निदेश 
अथात्‌ अनेक बार निदेश, जेसा कि करेगे--वस्तुप्रतिवस्तुभावपृठेक [ साधारणधमं का | एकाधिकं 
वार निदं होने पर भी वही [ उपमा दही] होती हे! इस वाक्यमे “साधारण धमे का इतनां 
ओर जोड़ देना चाहिए [ हमने जोड़ दिया है ]। वस्तुप्रतिवस्तु भाव जहोँ होता है वहांभीदो 
भेद होते ह इस वात को प्रथक्‌ निदेश इत्यादि के द्वारा बतलाया । सखम्बन्धिभेदमान्न न किः 
किसी प्रकार का स्वरूपभेद, जेसा कि करेगे - ^ साधारण के ] अनेकं बार कहे जाने परयाते ` 
वह्‌ शुध सामान्यरूप रहता है या उसमे विच्वप्रतिनिम्बभाव रहता है 1 ये तीन मेद साट्रदयमूरक 
रायः सभा अल्क्यराम प्राणका काम करते इसक्ए इन्ट जह्‌। तहां शुरू शुरूमं ही वत- 
काति रदैगे । क्रमेण = क्रम से अर्थात्‌ जिस क्रम से नामोच्लेख किया गया है । संबन्धिभेद्‌ से 


[गिक == = 
~ जननेन्कनककः 


८८ अलट्ारसवंस्वम्‌ 


संबन्धिर्यो अर्थात्‌ . कन्धरा ओर वरन्त के भेद से। वस्तुतः [ वकितत्व ओर आवृत्तत्व में ] वसा 
स्वरूपभेद नहीं है जैसा हार ओर निञ्चरमेंदै। मूलतः एक दहने से वछितत्व ओर आच्रत्तत्व 
[ चन्दमेद्‌ होने पर भी ] अभिन्न दही दहे । यदि वरितत्व ओर आवृत्तत्व आनन तथा दातपत्रमें 
शुद्धसामान्यरूप से उपात्त दै तो प्रदन उठता किं उनके धर्मी कधरा (मीवा) आर ब्रन्त 
( वेट ) किंस रूप से उपात्ते । इस पर उत्तर देते दै--“धम्यसित्रायेण० एव चन्द यहां चुद्ध- 
सामान्यरूपता का निवत्तंक हे । कन्धरा गौर वृन्त यद्य उपर्युक्त क्रम से धर्मं ही हैं तथापि आनन 
ओर दातपतच्र कौ अपेक्षा वे धर्मरूप मी हो सकते है । क्योकि (काव्यम) धर्मधर्मिभाव आश्रया- 
-श्रयिमावरूप से व्यवस्थित होता है । इसीलिए [ अभी कुछ ही ] पहले इसे अवास्तविक भी कदा 
हं । ध्सीचक्टि. व्याख्या मेँ “जानन ओर दखतपत्र की अपेक्षाः रेसा कहना भी रीक 
नदीं हे [ वस्तुतः यह संशोधन वृत्ति दारा प्रस्तुत “धम्यपेक्षयाः-इस विचार पर हे] उपमानोपमेय- 
भाव कर वाचोयुक्ति दी उन्म उपयुक्त ओर उचित हे । | अर्थात्‌ कन्धरा ओर वृन्त मे उपमानोपमेय- 
भाव ही मानना पयां प्त तथा उचित है, विम्वप्रतिविम्बभाव द्वारा अभेद नदीं ] रेसे | धम॑रूप मान 
छने पर ] तो कन्धरा ओर वृन्त के अपने स्वरूप अनभिमत [ व्यथं ] सिद्धदहो जादैगे। [ इसलिए 


` इनमें विम्बप्रतिविम्बमाव नदौ मानना चाहिए ] ओर इसी अभिप्राय से “पाण्डयोऽयमसा्ितलम्ब- 


हारः” यह पृथक्‌ उदाहरण प्रस्तुत किया गया दे । इसमें केवल विम्वप्रततिविम्बभाव ही है वस्तुप्रति- 
वस्तुमाव नहीं । वस्तुप्रतिवस्तुभाव से संकीणे विम्वप्रपिविम्बभाव तो इसी “यान्त्या सुहु: पद्य 
-से [ कन्धरावृन्त मं उप्यक्त क्रम से विम्वप्रतिविम्वभाव मानने वे कारण ] स्पष्ट हो सकता भा | 
विमरिनी 

दाराङ्गरागयोरिति । स्वरूपयोरिति दोषः । न चात्र विम्बग्रतिविस्बभावस्य विषयान्तरं 
प्रदश्यं वाक्या्थगतामुपमामादङ्कय गुणसाम्यनामा चतुथः प्रकारो वाच्यः। यावता हि 
साधारणधमं निवन्धनञयुपमास्वरूपसर्‌, स चाच्र धर्मो निर्दिं्ानिदिंश्त्वेन द्विविधः । निर्दश- 
पन्ते चास्य त्रै विध्यसुक्तम्‌ । अनिर्देशपन्ते चास्य न वेचिव्यं किंचिदिति न तदाश्रयं मेद्‌- 
जातञ्ुक्तम्‌ । अतश्चात्र निदिष्टः साधारणधसो व्यवस्थित इति का नाम चतुर्थप्रकार- 
कल्पना । वाक्यार्थो पमागन्धोऽप्यनत्र नास्ति । स द्यनेकेषां धर्मिणां परस्परावच्छिन्नानां 
ताद्ञरेव धर्मिभिः साम्ये भवति । यथा- 


'जनयिन्याः कुरखाल्याश्च रच्जिज्या वि दितोऽभवत्‌ । 
रत्नसूतेजंग्याश्च प्रच्छन्न इव शेवधिः ॥* 


भत्र जनयिध्यादीनां रत्नसुस्यादीन्युपमानान्युपात्तानि । एतेषां धर्मित्वं च स्फुटमेव । 


विम्बप्रतिविम्बभावः पुनधर्मिविशोषप्रतिपादनोन्युखानां धर्माणां ` भवृति । परस्परावच्ु- 


च्ररवं यथात्रैव । अच्र हि हाराङ्गरागयोः पाण्ड्यस्य विश्िष्टतापादनायवोपादानस््‌ दन्दु- 
तीं परति तस्य विशिष्टारम्बनवि भावत्वेन विवङ्हितत्वात्‌। अतश्च तयोः परस्परोन्पुख- 
सवारस्वार्मन्येवाविश्रान्तिरिति का कथोपमेयतायाः । एवं पाण्डयस्याद्िराजेन हारनिर्चरा. 
दिधमनिभित्तेवो पमा, तावन्मात्रेणैव सादृश्य पर्यवसानात्‌ । वच्च हारदेः साधारणधर्मस्य 
विम्वग्रतिविम्बस्वाद्‌ दृष्टान्तन्यायस्येतस्सुदाहरणसेव । 

हारांगरागयोः हार ओर अंगराग के अर्थात्‌ उनके स्वरूप के [न कि उनमें विचमान जाति 
कै प्रतिविम्ब |। [ वामन नै पाण्डयोऽयमंसापितत०ः पद्य में वाक्यार्थोपमा मानी ह द्रष्टव्य ५।२।३- 
-काव्यांकारस्‌न्नवृत्ति, टीकाकार इसपर संश्योधन करते हए ङिख रहे है-- ] “यह कहा जा सकता 


उपण्डारः <र 


टे कि यहो विस्वम्रत्तिमिम्बभाव का विचार विषयान्तर है, क्योकि विचार प्रस्तुत है उपमा का, फलतः 
यहोँ वाक्याथ पमा माननी चाहिए ओर उसे उपमा का गुण साम्यमूलक एक चौथा प्रकार स्वीकार 
कृर लेना चाहिए 2: किन्तु यह कहना ठीक नदींहै, कारणकि उपमाका जो स्वरूप दै वह 
निभर है साधारणधर्म के ऊपर, ओर जो साधारणधर्मदहै वहदो प्रकारका होता दै निर्दिष्ट ओर 
अनिर्दिष्ट । निदं पक्ष मे उसके तीन प्रकार बतलाए है! अनिर्देरापक्ष मे उसमे कोड चमत्कार 
नहीं रहता अतः उससे संभव मेदो का निरूपण नदीं किया है। इस प्रकार इस प्रसंगमे क्योकि 
केवल निर्दिष्ट साधारण धमेका दही विचार किया गया है अतः ( अनिर्दिष्ट साधारणधरूप युण- 
साम्यभूलक ) चलुधं भेद का म्रदन ही नदीं उठ्ता। जहां तक वाक्यार्थोपमा का संबन्ध है यहां 
उसकी गन्ध मी नहं हे । वह तो तव होती है जव परस्पर संबद्ध अनेक धर्मियोका वैसे दही धर्मिय 
से साम्य दिखाया जाता है । जेसे-'वह केवल जन्म देने वालीमों ओर रक्षा करने वाटी 
कुलाखी = कुम्हारिन ही जानती थी उसी प्रकार जिसप्रकार चिषे हुए कोष को रत्नगभां परथिवी ओर 


सपिणी [ रत्नसुति = रत्न उपजानेवाली भूमि पर प्रायः सर्पिणी या सपं रहते हें } । यहाँ रमौ 


आदि [ आदि पद से कुलारी ओर सः इस पद्‌ से कथित व्यक्ति के लिए रत्नसृति आदि [ आदिः 
पद से भुजगी ओर डेवधि या कोष ] उपमानरूप से अपनाए गए है । इनका धर्मत्व ओर परस्पर 
मे संबद्धत्व स्पष्ट ही हे । बिम्बम्रतिविम्बत्व जो होता है वद उन धर्मौमें होतादहै जो किसी विरिष्ट 


धर्मी का प्रतिपादन करनेके किए होते दहै जेते इमी [ पाण्डयोभ्यमंसा० ] पय मे ही इसमें 


दार ओर अंगराग का जो उपादान है वह पाण्डयराज में विद्ेषता लने के लि५ हौ । यह भी इस- 
किएुकि कवि उसे इन्दुमती के प्रति विरिष्टं [असामान्य] आलम्बन विभावक रूप में चित्रित करना 
चाहता है । इसीकिए वे [ हार ओर अंगराग ] परस्पर के प्रति उन्सुख हैँ इसखिए वे अपते आप्‌ 
मे विश्रान्त तक नहीं हौ पाते, उनमें उपभमेयता को बात दही केसेकीजा सकती है इस पकार 
पाण्ड्य ओर अद्विराज कौ उपमा हार ओर निद्लर आदि धर्मौ पर हीनिर्भरदहै) उन दोनों सें 
सादय कावोध केवल इन्दो धर्मो ते होताहे। ओर वह [ साटदय ] ज्ञात हौतादहै हार आदि 
धर्मौ के विम्बग्रतिविम्बभाव से अतः इनमे ट ्टान्त जेसी स्थिति का बतलाया जाना उचित ही हे । 


विमरिनी 


नयु हारनिक्चरयोस्तदतद्वामित्वाभावात्कथं साधारणधर्मतेति चेत्‌ , उच्यते- 
* (१ 
अस्यास्तावद्धर्मस्य साधारण्यं जीवितम्‌ 1 तच्च ध्मस्येकस्वे भवति । न च वस्तुतोऽत्र 


प त 6.6. + दौ स्याः * 
धरमेस्यकस्वम्‌ । तहि य एव मुखगतो रावण्यादिधमेः स एव चन्द्रादो, तस्यान्वयासंभ- 


वात्‌। अपि तु तञ्जातीयोऽत्रान्योऽस्ति धमः । एवं धमयोभंदास्साधारणस्वाभावादुपमायाः 
स्वरूपनिष्पत्तिरेव न स्यात्‌ । अथ धमंयोरपि सादृश्यमभ्युपगस्यते तत्तत्रापि सादश्य- 
निमित्तमन्यदन्वेष्यस्‌ । तत्राप्यन्यदिस्यनवस्था स्यात्‌। ततश्च धमम॑योवंस्तुतो भेदेऽपि 
रती तावेकतावसायाद्धेदेऽप्यमेद्‌ इत्येतनिनसित्तसेकतव माश्चयणीयम्‌ । अन्यथा पमाया 
उत्थानमेव न स्यात्‌। एवमिहापि हारनिन्षरादीनां वस्तुप्रतिवस्तुतयो पात्तानां वस्तुतो 
मेदैऽप्यमेदविवनेस्येकस्वं म्राह्यम्‌ । अन्यथा ह्येषां पाण्डयाद्विराजयोरोपभ्यससुस्थाने निमि- 
त्वमेव न स्यात्‌। न चेषासो पञ्यं युक्तमिति समनन्तरमेवोक्तम्‌ । अत एवान्न बिस्ब- 
प्रतिविम्बभावव्यपदेश्षः। रोको हि दपंणादूौ चिग्बाप्परतिविम्बस्य सेदेऽपि सदीयसेवाच्न 
वदनं संक्रान्तमिव्यमेदेनाभिमन्यते । अन्यथा हि प्रतिबिस्बदशंने कृ्लोऽहं स्थुरोऽहमित्या- 


दयभिमानो नोदियात्‌ भूषणविन्यासादौ च नायिका नाद्धियेरन्‌ । प्राच्येरपि- 


९० अलरङ्ारसवंस्वम्‌ 


'स सुनिर्खछान्छितो मोल्ञ्या कृष्णाजिन पटं वहन्‌ । 
व्यराजन्नीख्जीमू तभाग इवां्मान्‌ ॥› इति, 
तथा-स पीतवासाः प्रगहीतश्लाङ्घो मनोक्तभीसं वमुरापं क्ष्णः । 
रशतहदेन्दायुधवान्निसायां संद्ज्यमानः शशिनेव सेवः ॥ 
इव्यत्र मौञ्जीतडितोः शङ्कदशश्िनोश्च वस्तुतो मेदेऽप्यमेद्‌ विवन्तास्ेवाश्िव्य साधारण- 
धमंस्य हीनस्व माधिक्यं चोक्तम्‌ । अत एव चात्र पूर्व अ्नन्धक्कता वस्तुप्र्िवस्तुभाववद्‌ वस्तु- 
द्यस्य भ्राच्योक्तमेव व्यवहारं दुर्शयितं प्रतिवस्तरपमावद्‌ दष्टान्तवच्चेति तदुक्तमेव टष्टान्त- 
दयं दन्तस्‌ । एवं चात्रारेद्‌ विवन्तेव जीवितम्‌ । 
प्रन उठता करि [ जितम ( पाण्ड्यमें) हार दै उसमें निञ्ल॑र नदीं ओर जिसे ८ पर्व॑त 
मं) निज्ञर हं उसमे हार नदीं इस प्रकार ] हार ओर नि््लर दोनो मेँसेकोई भो परस्पर सिन्न 
दोर्ना वस्तयो [ प्राण्डय जौर पव॑त ] में रहने वाला नदीं है [ दोनो ष्की एक मे रहते है ] अतः 
ये साधारण धमै केसे माने जा सकते दै । उत्तर में कदा जातादैकि इस [उपमा] काप्राण है 
धमं का साधारण्य । वह [ साधारण्य ] तमी होता दै जव धमं एक दो [ भिन्न नौं ओर धर्म 
यहा वस्तुतः एक नहीं है । एेखा नदीं कि जो लावण्य जादि धमे सुख [ आदि ] मे रहता हे वही 
चन्द्र आदिं मे रहत हो क्योकि उस [ सुखगत ध्म ] का [ चन्द्रादि से ] सम्बन्ध [ ही ] संभव नहीं । 
चन्द्रादि मे जो धमं रहता ह वह सुखादिगत लवण्यादिकधर्म का सजातीय ओौर उससे कोई भिन्न 
धमं हातादहे। इस प्रकार धर्मो के भिन्नहोने से साधारणता नहीं बनेगी फलतः उपम। कां स्वरूप 
ही निष्पन्न नहीं ह्येगा | 
यदि धर्मां भी अभेद कै लिए साद्धर्य स्वीकार किया जाता हो तो वह साद्य अपनी सिद्धि 
के किए किसी अन्य साद्र्य की अपेक्षा रखेगा ओर वह [ तीसरा साददय ] मी [ अपनी सिद्धि 
के लिटि] अन्य [किसी चौथे] साद्य कौी। इस प्रकार अनवस्था आ पड़गी। इसष्टिए 
धमां मे वस्तुतः मेद रहने पर भी प्रतीति मँ एकता ही भासित दौती दै अतः “अतः भिन्नता होने 
पर सी अभेदः इस तथ्य को निमित्त मानकर [ चन्द्रादिगत जर सुखादिगत ] भिन्न-भिन्न धर्मौ 
म अभेद मान ठेना पड़ता है । एे्ा न मानने पर [ सुख भौर चन्द्र अदि र्मे ] उपमा खड़ी ही 
नहीं दो सकेगी । इसी प्रकार यदौ [ पाण्डयोऽयमंसापित० में ] भी दार गौर निर्लर आदि 
वस्तुप्रतिवस्तुरूप से ( ?) उपात्त है, इनमें वस्तुतः मेद हं तथापि विवक्षा अभेद की हे इसलिए 
एकता मान लेनी चाहिए । नहीं तोये [ हार निद्ख॑र ] पाण्डय तथा पवेत कौ उपमा में निमित्त 


ही नदींवन सकेगे। इनमें उपमा तो वनती ही नदीं [ क्योकि येतो परस्परोन्मुख रहते है 


आत्मविश्रान्त नहीं ] ठेसा अभी कुठ ही पदिले कहा हे । इसीलिए यहां विम्बप्रतिविम्बभाव [ शब्द्‌ ] 
का व्यवहार होतादै। कोदंमी व्यक्ति विम्ब सै [ स्थानभेद आकारभेद आदि कै कारण | 
प्रतिविम्ब का भेद रहने प्रमी (मेरा द्यी मुख दपण मेंसक्रान्त हआ हे इस प्रकार दोनों नें 
अभेद ही मानता है । नहीं तो प्रतिविम्ब देखकर भें दुबला हया मोगा हूः यह भाव उसमें उदित 
नदीं हो सकता भौर शिया भी [ दर्पण मेँ देखकर अंग प्रव्यंग मं ] भूषणो का विन्यास करनेमें 
म्रत्त नदीं दो सक्ती । प्राचीन माल्कारिको ने भी-“मांनी मेखला वधे तथा कृष्णस्रगचर्म पहने 


| वे सुनि नील्मेध क इकडे से धिरे सूयं जेते खग रहै येः इस प्म [ वामन तथा मम्मट ने ] 


तथा-छ्रृष्ण मगवान्‌ पीताम्बर पहने थे ओर द्यङ्गं धनुष जिए इए थे । उनका स्वयं का शरीर 
उयामघुन्दर ओर विद्चाल था। इस प्रकार वे विजली, इन्द्रधनुष ओंर चन्द्रमा से युक्त हो रदे 
रात्रिकरारीन मेध जसे कग रदे थे, इस पद्य मेँ [ मम्मट ने ] मौजी ओर विजली तथा रख ओर 


उपमाटट्कारः ९२ 


चन्द्र का वस्तुतः भेद होने पर भी अभेद की विवक्षा कोह लेकर साधारणधमंत्व माना है ओर 
उसमे हीनता [ प्रथम उपमा मे तडित्‌ की ] ओर अधिकता [ दितीय उपमा मे चन्द्र की ] वतलाईं 
हे ओर इसी कारण यहां यन्थकारनेभी [ उदाहरण देने के] पदहिरे वस्तुतः वस्तुप्रतिवस्तुभाव 
सते यक्त दो वस्तुओं में प्राचीन आचाय द्वारा किया गया व्यवहार दिखलाने के उददेदय सेदो 
उदाहरण दिए, एक प्रतिवस्तूषम। का ओर दूसरा दृष्टान्त का । इस प्रकार यदोँ [ पाण्डयों० इत्यादि 
स्थलों की उपमा मे | अभेद कौ विवक्षा ही प्राणदहे 
विमश्ञ-रीकाकार ने इस मासिक विवेचन के अन्त में यहौँ तो विम्बप्रतिविम्बमाव को प्राची 

सिमत वतलाकर “पाण्ड्ोऽयम०ः इत्यादि स्थलों की उपमा म वस्तुप्रतिवस्तुभाव को 
ही अन्धकारासिमत बतलाया हे, किन्तु पिके उसी प्रकरणम वे इन स्थल मे कन्धरा-बृन्त 
आदि कै वीच उपमा स्वीकार कर आहे ओर अगेभी विम्बग्रतिविम्बभाव ही स्वीकार करेगे । 
उनके इस वौदधिक पलायनम कोई ठोस आधार नहीं है। बिम्बप्रतिविम्बभाव ओर वस्तुम्रति- 
वस्तुभाव दोनों मे एक तथ्य सामान्य हे। वह हैमेद ओर अभेद भी समष्टि। वस्तुप्रतिवस्तुभाव 
मे ज्ञानधारा प्रातिभासिक भेद से पारमाधिक अभेद कीओर बदृती दहे जव कि विम्बम्रतिनिम्बसाव 
मे पारमाथिक भेद से प्रात्तिमासिक अभेद की ओर । इस प्रकार ज्ञानधारा की प्रवृत्ति मी दोनों 
एक दी दै भेद से अमेद की ओर । अन्तर केवर सेद तथा अभेद मे दोनों भावों कौ विपरीत स्थिति 
का है इस प्रकार “यान्त्या सुहुत्रैकित०' में कन्धरा मौर ब्रन्त दोनों "ाण्डयोऽयम्‌०? के दार 
ओर निद्र के समान ही वस्तुतः भिन्र ओर विवक्षया अभिन्न ह्योने से विम्बप्रतिविम्बमावयुक्त ही है । 
चाहे तो टीकाकार प्रथम प मँ आवृत्तत्व ओर वक्तित्व के वस्तुप्रतिवस्तुभाव को प्रधान मान 
सकते हं ओर कन्धराव्रृन्त के विम्बप्रतिविम्बभाव को अप्रधान, किन्तु उसे वे अमान्य नहीं 
ठहरा सकते । परस्परोन्सुखता से उनका अथं नहीं बदर जता जो उन्हं आत्मविन्रान्त न 
माना जा सके । 


विमरिनी 
एषा च चये सुप्रचुरेव । यथा- 
“विद्यत्वन्तं रुङ्ितवनिताः सेन्द्रचापं सचिच्ना 
संगी ताय प्रहतसुरजाः स्निग्धगसम्भीर घोषम्‌ । 
अन्तस्तोय मणिमयञुवस्तुङ्गमभ्रंङिहामाः 
प्रासादास्त्वां तुरुयितुमरं यत्र तेस्तैविशेरेः ॥ 
अत्र चिद्यद्नितादीनां मेघप्रासादयिशचिष्टताधायकतया धमव्वेने वो पादानम्‌ । अत एव 
तेस्तेविंशेषरिव्युक्तस्‌ । तेषां सछ्रन्निदंज्ञासावान्नानुगामिता । एकाथत्वाभावान्न शद्धसा- 
मान्यरूपत्वमिति पारिदोष्याद्धिम्बप्रतिविम्बभाव एव । एतेषां चासेदेनेव प्रतीतेः साधारणः- 
त्वम्‌ । एवं हारादैरपि ज्ञेयम्‌ । अभेदग्रतीतिश्चात्र साद्श्यनिमित्ता। न चेतावतेवे षा 
मानो पसेयव्वं वाच्यम्‌ । तथास्वाविवच्षणात्‌। सादृश्यस्य च सितव्वादिगुणयो गि्वं नाम 
निमित्तम्‌ । एवममेद तीतिसुखेनाच्र हारादेः समानधमरवम्‌ । क्व चलिमित्तान्तरेणाप्य- 
सदप्रती तिभंवति । यथा- 
द्वेष्योऽपि संमतः शिष्टस्तस्यातंस्य यथौषधम्‌ । 
त्याज्यो दुष्टः प्रियोऽप्यासीद्‌ दष्टोऽडगष्ट इवाहिना ॥° 


अत्रोत्तराधं दष्टदुष्टयो दोषकारित्वादिना एककायंकारित्वमभेद्‌कारणमिस्यरं बहुना । 


९२ अल्छङ्ारसवेस्वम्‌ 


[ विम्वग्रतिविम्बमावमूल्क | यह [ उपमा | काव्यो में पर्याप्त मत्रा मेँप्राप्त है। यथा-हे 
मैव ! [ अलका के ] प्रासाद उन उन विदोषताजां से तेम्हासयं समानता भलाभोति कर सकते हे 
तम्दारे पास विद्युत्‌ हे उनमें रुकितवनिता् हे, तुम इन्द्रचाप से युक्त हो उनमें चित्रवने है, 
वममं स्निग्ध ओर गम्भीर घोष दै उनमें संगति कै चट स्रदंग वजते रहते है, तम्दारे भीतर जल 
देवे भी मणिमय भूमिसे युक्त दै, ठम बहुतञ्चे हो ओौर उनके चिर भी गगनचुवी हैः 1 
यहो विचत्‌ अर वनिता आदि का उपादान मेव ओर प्रासाद मे विद्धिष्टता छने वाटे धम करूप 
मही कियागया हे, इसीलिए [ स्वयं कविने ] उन-उन विषो दारा, इस प्रकार उन्हें विद्धेष 
अथात्‌ धमं कहा हं । किन्तु ये अनुगामी धर्म नदीं हैं क्योकि उनका निर्देदा अलग-अलग किया 
गया है। न वे शुद्धसामान्य स्वरूप दै क्योकि उनमें एकाथकता नहीं ह । इसचिए अव उनमें 
विस्वप्रतिविम्बभाव ही शेष वचता द । ईन्ट जा साधारण धम कहा हं वहु केवर इसलिए कि इनकी 
प्रतीति अभिन्नरूपर से होती है। दार आदि कै विषयजं मी यही समञ्चना चाहिए  जौर अभेद 
कीजो प्रतीति हे वह यहाँ साद्रर्यमूलक टै । किन्तु इतने भर से [ साद्रदयमात्र देने से | इनमें 
उपमानोपमेयभाव नदीं माना जा सकता क्कि इनकी उस रूप में यँ विवक्षा नदीं है साद्स्य 
का निमित्त [ हार निकर आदि मेँ |सकेदी रूपी युण से युक्त होना है । इस प्रकार अभेद प्रतीति 
कै द्वारा यहाँ हार आदि साधारण धर्म वन जाति हें । 

कही दूसरे निमित्ता सै मी अभेद प्रतीति होती दहै। यथा-स [दिरीप] को देष्य 
व्यक्ति मी यदि रिष्टहोताथातो मान्यहोताथा जैसे बीमार को ओषधि। इसके विरुद्ध भिय 

व्यक्तिभी यदिदुष्टहोताथातो त्याज्य होताथा जेत सर्पैदष्ट अगृढा।" [ रघुवंद्ा--२, रघुव॑द्य में 
चतुधचरण “अंगी वोरगक्षता? हं । यैकाकार ने यह पाठ कदाचित्‌ उपमानोपमेय में पूर्वां के समान 
ट्गिक्यके लिटि प्रसंद कियाया स्वयं वनाया द्यो] यहां [ सथं ] दष्ट [अंगष्ठ ] गौर दष्ट नमे 
अभ॑द्‌ एक कायकारित्व के आधार पर हे दोषकारित्वादि गुणदोननोँमें दी रहतेहैः। अस्तु, 
अधिक विस्तार से राभ नदीं । 
विमरिनी 
इयं च योरपि प्रज्ृतयोरप्रकृतयोश्चौ प्ये सञ्ुचिता भवति । क्रमेण यथा- 
सद्य बुभुजे महाभुजः' इत्यादि । अच्र वधूमेदिन्योरचिरोपनतस्वात्प्रकृतस्वेन सद्‌- 
यो पभोगे सञ्ुचितत्वम्‌ यथा- । 
(स्वरेण तस्यामश्तसुतेव प्रजलिपतायामसिजातवाचि । 
अप्यन्यपुष्टा प्रतिकखदाब्द्‌ श्रोतुविततन्ड्ीरिव ताडथमाना ॥* 
अत्र भगवव्यपेक्षयान्यपुष्टावितच्त्योरभ्रक्रतयोः प्रतिद्रुशब्दस्वे सञुच्चितव्वस््‌ । 
इयमेकदेक्विवर्तिन्यपि । यथा- 
(कृमख्दरेरधरे रिव द शनैरिव केसर विराजन्ते । 
अलकिविख्येरख्कैर्वि कमर्वंदनेरिव नङिन्यः ॥ 

अच्र नखिनीनां नायिका उपमानव्वेन नोपात्ता दव्येकदेशविवर्तिर्वम्‌ । इयं च साद्य. 

दाटांथ कचि प्रतिभाकलर्पिते साधर्म्ये कल्पिता भवति । तच्च क्वचिद्भुपमेय गतत्वेन क्वचि- 
दुपमानेनापि कल्पितमिति द्विधात्वमस्याः । यदुक्तम्‌-- 

उपमेयस्य वेिष्टयश्चुपमानस्य वा क्वचित्‌? दति । वैधर्म्येणापि साधर्म्यमिति तृतीयः 

प्रकारः पुनरस्या न वाच्यः। अस्योपमायामेव संभवादाढयंश्रतिपादनग्रतीतेश्च । 


उपमाटड्गरः ९६ 


यहं [ उपमा | एेसे दो पदाथ के साधन्यमें भमौ दोती दहै जिनमे से दोनों ही प्रकत होते हे 
या दोना ही अग्रक्ृत । क्रम से उदाहरण यथा [ दोनों प्रक्रत की उपमा ] “सदयं बुभुजे महामुजः० 
इत्यादि [ पूर्वादाहत पय में ] यहो वधू ओर मेदिनी दोनांँ ही अविरोपनत [ तुरन्त यास्त आ 
पराप्त ] हं । अतः दोनो ही प्रकृत है फल्तः सदय उपभोग मेँ दोन का ही समुच्चय है । [ अप्रकृतं 
की दी उपमा | यथा--“उस [ पावती | कौ वाणी बड़ी ही अभिजात थी। जव वह बोलती थी 
तो उसका स्वर अर्त सा वरसाता था । तव कोकिला कौ वूक भी खनने वारे को वैसे ही प्रतिकूल 
ल्गती थी जेते [ वीणाकी] ञ्लनकारी गई कोई उल्टी तन्त्री | तार |] [ कुमार-१ ] । यहाँ 
मगवती पावेतौ [ प्रकृत हे, उन ] कौ अपेक्षा कोयर ओर वितन्त्री दोन ही अप्रक्रत है। इन दोनों 
काक दही प्रतिकूल राब्दत्वरूपी धर्म मे समुच्चय कर दिया गया है । 

यह [ उपमा रूपक के समान ] एकदेशविवत्तिनी भी होती है [ अर्थात्‌ इसमे आरम्भ स्ते 
अन्त तकं उपमानो पमैयभाव का निर्वाह चाब्दतः करते करते किसी एक अरा मे उसे आथं बनाकर 
छोड दिया जाता ह | उदाहरणा - “अधर के समान कमल की पखुडिओं से; दतां के समान 
केसरो से अलकां के समान अल्कवल्य से ओर केसरो के समान कमलपुष्पं से कमकिनी सखशोभित 
हो रही हे 1” इसमें कमलिनी के उपमान कै रूप मेँ [ विवक्षित होने पर भी ] नायिका का उपादान 
न्दतः नहीं किया गया [ उसे वाक्याथ साम्यं से आश्षेप्य रहने दिया इसलिए यह एक्देदा 
विवनत्तिनी हे [ विवत्तं का अथे पण्डितराज जगन्नाथ ने भी अभाव किया है । उसका स्रोत कदाचित्‌ 
विमर्दिनी का यही स्थल हे । काव्यम्रकादाकार की 'एकदेदा मे विशेषरूपं से वर्णन रहन!” इस 
पदावली मे विशेषशब्द कदाचित्‌ अन्तर या भिन्नताः का वाचक है। टीकाकासो ने उसे स्फुटता ` 
का वाचक माना है जो विरुद्ध हे । अन्तर अथं करने पर अभाव अथं चला आता है, अभाव का अर्थं 
दे राब्दानुपादान । यही उपमा तव कल्पित उपमा कहलाती है जव सादय की इदता कै किए 
साधम्यं कपिप्रत्तिमाकदिपत होता ह । वह साधर्म्यं कदी तो उपमेय मे कल्पित किया जाता हे ओर 
कहं उपमान मे, अतः यह [ कदिपतोपमा ] दो प्रकार कीहो जातीहै। जैसा काहे: "कहीं 
उपमेय का ेरिष्टय बतलाया जाता है मौर कीं उपमान का” ॥ १ ॥ 

“धम्यं से साध्यः नामक एक तृतीय सेद सी होता हे एेसा नदीं कहना चादिए क्योकि 
यह भेद केवर सामान्य उपमा मद्य हो सकता है मौर [ कल्पितोपमा में यह मेद 
मानने पर उपयुक्त ] ददता का प्रतिपादन नहीं हो सकता । 


विमरिनी 


क्रमेण यथा- 
त णमह णाहिणदछिन हरिणो गञअणङ्कणाहिरामस्स । 
छष्पद्धम्पिजगन्तो मलो व्व चन्द्म्मि जत्थ विही ॥' 
अत्रोपमेयस्य षट्पद्‌ाच्छदितव्वं कलिपतम्‌ । 
“आवर्जिता किंचिदिव स्तनभ्यां वासो वखानाऽतद्णाकंरागम्‌ । 
संजातपुष्पस्तवबकाभिनञ्ना संचारिणी पल्खछविनी रूतेव ॥ 


अच्रोपमानगतत्वेन संचारिणी कल्पितम्‌ । न चास्याः परथग्कन्तणं वाच्यम्‌ , हयो. 
रैपम्य प्रतीतेः । सामान्यरुणस्यात्राप्यनुगमात्‌। अथात्र कल्पनास्तीति चेव, न । एवं 
हि प्रतिमेदं कन्षणकरणप्रसङ्गः । सञ्ुच्चितव्वादेविंशेषान्तरस्यापि भावात्‌। अथोपमानगुण- 


९ अच्ज्ारसखवंस्वम्‌ 


विदिष्टोपमेयावगसमषरषवेनो पमायाः प्रतिसटभूतदस्स्वन्तरासावप्रयोजनव्वेन चास्याः घथ- 
गरंकारत्वमिति चेत्‌ , न 1 अन्रोपमेयस्योपमानगुणविशिष्टतयेव प्रतीतेः फल्भेदा भावात्‌ । 
तथा हि “आवर्जिता! इव्यादौ मगवव्या कतायाः सादृश्यस्य सं चारिणयीव्वेनाभावो सा 
ग्रखाङत्तीदिति तथोः खाधभ्यमेव द्रढयितुं कविना रुतायाः संवारिणीत्वं कल्पितम्‌ । 
नन्वत्र भगवस्या अन्यदुपमानं नास्तीति प्रतीयते। अनन्वयादिवद्‌पसानान्तरनिपेधस्य 
वाक्याथेरवात्‌ । मेवम्‌ । एवसुपमेयस्यापि वंशिष्टयकल्पने उपमेयान्तरनिपेध फरूत्वं 
वाच्यम्‌ । खमानन्यायस्वात्‌। तद्यथा दढारोपे रूपके विषयविषयिणोरमेदमेव दडयितुं 
स्यचिद्धमंस्य हानिराधिक्यं वा कल्प्यते, तथेहापि सखामान्यद्‌ाच्यां येव क ल्पितस्वं जेयम्‌ । 
अत्राप्यमेदारंकाराख्यारूकारान्तरत्वं न काच्यम्‌ । रूपशृणचास्या बिच्छित्तेः संगरही- 
वात्‌ । विषयविषयिणोरभेदो हि रूपकसलतच्वस्‌ । ख ष्व चात्र दाढथन प्रतीयत इति 
को नामास्य रप्रकास्प्रथग्भावः। असेदमाच्रप्रतीतौ रूपकम्‌ , नियतधर्संहानावन्यत 
सवंतोऽप्यभेद्‌प्रतीतावसेद्‌ इति म्रतीतिभेदोऽप्यस्तीति चेत्‌, न! एवं द्यस्ति तावदमेद- 
प्रतीतिरत्राजुगता । यस्तु विशेषः ख छरथग्मेदव्वे व्यवस्थापकोऽस्तु न षूथगलकारस्वे 1 नहि 

ाबखेयतामात्रेण गोव्वमश्चववव्यपदेश्यं भवति! एवं च- 

“गरही तविग्रहः कामो वसन्तः खावकालिकः । 

जहार हृदय कामी निव्यपूणंः सुधाकरः ॥' 
इत्यादौ गहीतविग्रहच्वादेर्नियतस्य धमंस्याधिक्येऽप्यरुंकारान्तरभ्रसङ्गः । इयं च 

.मालात्वादिनानन्तभेदेति तद्यन्थविस्तरभयान्न प्रपञ्चितम्‌ । 

क्रम से उदाहरण- 
| “तन्नमत नाभिनलिनं हरेणगनांगनाभिरामस्य । 

षट्पदाच्छादितगात्रो मक इव चन्द्र यत्र विधिः ॥' 

-'्गगनांगण कै समान अभिराम भगवान्‌ विष्णु कै उस नाभिकमरुको प्रणाम कीजिए जिसमें 
श्रमरों से ठंके ब्रह्माजी चन्द्र मे कल्क से प्रतीत होते द यहां उपभेय [ विधि व्रह्मा] का अमरो 
सते ठंकना कदटिपित हे । 

स्तनो से थोडी सी की इहं तथा अतरुण [ वारु | सृयंके समन वख धारण की हई 


[ पार्वती जी ] निकले पुष्प कै स्तवक से की पर्वों से टंकी ओर चलती फिरती तासी 


[ दिखलाई दी | याँ उपमान [ र्ता ] ने संचारिणीत्व कल्पित हं । 

ठेसा नदीं वि इसका लक्षण [ सामान्य उपमा से | अख्ग किया जाए क्योकि अन्ततोगत्वा 
इसत मी प्रतीति साद्ररय की ही [ चमत्कारकारिणी ] हती है । अतः सामान्यलक्षण इसमे मी 
लागू होता है; यदि कदा जाय कि यहां कपना | त्व अथिक ] दतो वह भी ठीक नही, क्योकि 
ेसा करने पर प्रत्येक मेद का पृथक पथकः रक्षण करना पड़ जायगा । कवक समुच्चितत्व आदि 
मी नवीन सेद है । यद्वि कहा जाय कि उपमाका फर हं उपमानके युणोंका उपमेय मे ज्ञान 
तथा इस [ कदिपितोपमा ] का फल दै अन्य किसी समान वस्तुके सभाव का ज्ञान । इस प्रकार 
 फलमेद के कारण इस ( कल्पितोपमा ) का लक्षण अलग किया जाना चादिए तो वह भी टीक 
नदी; क्योकि यदौ [ कद्पितोपमा मेँ ] मी उपमानयुणों का उपमेयम ज्ञान नियमतः होता है । 


अतः फल्मेद भी नदीं है । स्पष्टीकरण कै किए “अआवजिता०” इत्यादि पद ही लीजिए) इसमे , 


छता स्थावर है ओर भयवती पार्वती जंगम [ संचारशील ] अतः पावेतीमें ल्ताका साद्रदय 
, { संचारिणीत्व को लेकर ] घटता नहींहै। पेन दो इसके किए उनके साधम्यको इद्‌ करने 
हेतु क्विने च्तवामें भी संचारिणीत्व कौ कर्धना की दंका = य्दा [ कदिपतोपमामें कुता 


क दद ~> ~ ह ~ 


उपमालङ्कारः ९५ 


कौ छोड | अन्य कोड वस्तु भगवती पावती का उपमान नदीं है यह प्रतीत्ति भी होती है, क्योकि 
यँ जो वाक्याथ हे उसका स्वरूप अनन्वय आदि के समान ह्य अन्य उपमान का निषेध हे ! 
किन्त एसा मानना क नही, क्योकि एेसे तो जहाँ उपमेय मे वैदि्टय की कल्पना की जाती है 
वहां भी अन्य उपमेय के निषेध कौ प्रतीति मानी जा सक्ती है, क्योकि वात बरावर है। इसि 
जेते टृढारोप रूपक सें पिषय ओर विषयी के अभेद को ट्ट करनेके लिए किसी धमकी हानि 
या अधिकता कौ कल्पना कौ जातौ है उसी प्रकार यहां [ कदिपितोपमा मे ] मी सामान्य [ साधम्य ] 
कौ दृद्ता के लिए कल्पितत्व को जानना चाहिए । यां [ कल्पित रूपक ने | भी अभेदनामक 
भिन्न काड अल्कार नहीं कहा जा सकता क्योकि इस विच्छित्ति का सरह भी सूपकमें हयीहो 
जता द । ` रूपक का रूपकत्व हे विषय ओर विषयी का अभेद । यहां वह केवर इदता के साथ 
प्रतीत होता है इसकिए इसे रूपक ते पृथक्‌ केसे साना जा सकता है । यदि यह कहा जाय किं 
रूपक वहां माना जाना चाहिए जहां केवल अभेद की प्रतीति दोती हो ओर अभेद वहां जहां 
किसी निश्चित धमे कौ हानि द्योने पर अन्य सवते अभेद, शस प्रकार इन दोनों की प्रतीतिं मे 
भी भेद हेतो वह मी ठीक नहीं, क्योकि टेसा मानने पर॒ भी अमेदप्रतीति तो अभमेदाल्कार मे 
रहेगी ही ओर वही रूपकमें भी रहेगी । अतः वह दोनों मे हयी रहता है । सामान्य रूपक ते 
[ कल्पित रूपक | का जो अन्तर है इसे रूपक का स्वतन्त्र मेद तो माना जा सकता है चिन्त 
पृथगरंकार नदीं, केवर चितकवरेपन से गोत्व को अश्वत्व नाम से थोडे ही पुकारा जाता है । यदि 
ठेसा मानो तो “वह कामी पुरूष शरीरधारी काम है, सव॑दा रहने वाका वसन्त है ओर सदा 
पूणे रहने वाला चन्द्रमा । उसने हृदय हर क्या है 1 इत्यादि मँ नियत धर्म गरही तविग्हुत्व 
आदि कौ अधिकता है । यहां भी भिन्न अलंकार की कल्पना करनी पड़ जायगी । 

यहु ( उपमा ] माल्त्व, करिपतत्व आदि कै क्रम से इतने मेदवाटी हो जा सकती है कि 
जिनका अन्त नही, अतः म्न्थविस्तार के भय से उनका निरूपण विस्तारपूवैक नहीं किया । 

विमजः- करिपतोपमा भरतमुनि ने भी दिखलाई दै । “मतंगजा विराजन्ते जंगमा इव पवता? 
मे जगमपवेत कविकरिपत है अतः उपमान कै कविकर्पित ह्येने से उपमा करपित दे । विमरिनीकार 
कौ कर्पितोपमा का कदाचित्‌ यही मूल हे । वामननेमी मानी है। किन्तु उनकी कल्पितोपमा 
विमरिनीकार कौ कह्िपितोपमा से भिन्न है । विमरिनीकार ने मी इसमे कविकट्पना का अस्तित्व 
स्वीकार विया हे किन्तु इनकी कविव्पना साद्र्य में आ रहे धिघ्नको दूर करने के किए अनिवायं 
हे । वामन ने कल्पना वो प्रसिद्ध उपमानातिरिक्त उपमानकल्पना तक सीमितरखा हे यथा ननारंमी 
केसी हे ? जसे मत्त हण ( पठान ) की तुरत सड दादी? । “शिरीष पुष्प कैसा है ? जैसा तुस्त टा 
ाय्भाग” स्पष्ट ही यहो साद्रदय में कोड विध्न नहीं आरहा जिसका निवारण करने के 
ठिए कविने प्रसिद्ध उपमानं को छोड नवीन उपमानं कौ योजना की है। मृच्छकटिके भी 
“मेषो जलद्रंमहिषोदरभङ्गनीलः?? ‹ मेव पानी से मीगे मसे के पेट ओर्ंगसा नीला हैः' इत्यादि 
अनेक नवीन उपमान मिलते हैँ । काव्यमीमांसा से ‹ 'अभिनववधूरोषस्वादुः करीषतनूनपात्‌"० 
इत्यादि पच इस्तका अच्छा उदाहरण है । इसमें मी कंडे की आग को ठंड के दिनो मे नवोढा के 
कोप को उपमा दौ गद है । नवीन उपमानों की कल्पना सधमभूति, राजशेखर जरं श्रीदं आदि 
परवत्तीं कवियों ने पर्याप्त माघामें की हे। 

उपमा के लक्षण पूर्ववत्ती आचार्यो सें इस प्रकार भिरते है-- 


भामह--धविरुद्धेनो पमानेन देदाकारुक्रियादिभिः । 
उपमैयस्य यत्‌ साम्यं युणलेशेन सोपमा ॥ २ । २० ॥ 


९द  अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


देदा, काल, क्रिया आदि [ अनेक तत्त्वो ] मँ परस्पर असमान रहने पर भी उपमान ओर 
उपेय का जो किसी गुण नै समान दोना वतलाया जाता हे वह उपमान है । [देदकालक्रियादिसिः 
विरुद्धेन असमानेन उपमानेन देद्चका लक्रियादिभिः विरुद्धस्य असमानस्य यत्‌ गुणलेद्ञेन केनचिद्‌ 
गुणेन साम्यं समानत्वं तदेव उपमाः इति मावा्ः ° | 
वामन--“उपमानेनो पमेयस्य गुणलेदतः सान्यसुपमाः ॥ ४।२।१॥ 
५ 'उपमान के साथ गुणलेद्धा में जो उपमेय का साम्य वही उपमाः 
निधित ही यह्‌ भामह के लक्षण का संदोधन हे । 
उद्धर = 'यच्चेतोदारि साधम्यसुपमानौपमेययोः । 
मिथो विभिन्नकालादि चाब्दयोरुपमा तु तत्‌ ॥ १।१।५ 


'विभिन्नकालादिवाचक च््दों द्वारा प्रतिपादित उपमान तथा उपमेय करा परस्पर में जा 
वित्ताकषक साधम्य वही उपमा हे ।' 

रुद्रट = उभयोः समानमेकं युणादि सिद्धं मवेद्‌ यथेकत्र । 

अर्थऽन्यत्र तथा तत्साघ्यत इति सोपमा ॥› <1४॥ 

रुण आदि रेरा कोड धमं जो दो वस्तुओं म समानरूप से प्रसिद्धहोतो [ दोनों वस्त॒ओं 
नसे] ककीदी मति दूसरेमेंभी जो उसकी सिद्धिकी जाती है उसीको उपमा कहते दें ।ः 

मम्मट = शसाधन्यंमुपमा मेदे ।' 

नेद रहते हए जो समानधर्मसंबन्ध उसीको उपमा कहा जाता हे ।' 

शस प्रकार स्पष्ट हैकि अलंकारस्वस्वकार ने उद्भट ओर मम्मटका अनुसरण चिया दहै, 
साधम्यं मौर साटृदय मे प्राचीन जाचार्यौ ने [ मम्मट के समान महिमभट्रने मी ] उतना अन्तर 
नदीं देखा जितना परवत्ता पण्डितराज जादि ने साधम्ये ओर साद्रच्य में, जो समास के कारण 
८ला-दचाब्द के रूप में परिणत समान चाव्दं दै वद इन दौनां का एकमात्र बुद्धिधर्मत्व सिद्ध 
करता है। जो कुछ मी समानता या साम्य दै वद द्रष्टरसपिक्ष दे- वस्तुसापिक्ष नदीं । (समानो धर्मो- 
ययोस्तौ सधम तयोर्भावः साधर्म्यम्‌ ? “समाना दक्‌ [ ददनं ] ययोस्तौ सट्शौ तयोर्भावः 
साद्रदयम्‌ इस प्रकार व्युत्पत्ति करने से दोनों दी प्रतीतितत्व पर निभेर लगते दै । वस्तुतः जो 
साम्य विषयगत दृष्टि से साध्यं है वही भिषयिगत दृष्टि से साद्य हे । प्रतीदारेन्दुराज की इस 
प्ति से यह तथ्य अथिक स्पष्ट है--“उपमानोपयमैययोः यत्‌ साधम्यं समानो धर्मः तेन संबन्धो 
यः सा उपमानोपनेययोः साटृख्यदवारेण सामीप्यपरिच्छ्ददेठ॒त्वादुपमाः "- समानम -संबन्धरूप 
साध्यं वस्तु को साद्य के द्वारा सहृदय के पास पर्ैचता द अधात्‌ साम्ञ्चान भँ वस्तु को 
उपादानरूप से प्रस्तुत करता दै!” यह्‌ विचारमात्र का क्रम हं । चमत्कारानुभव जो अल्कार 
का वीज है प्रतीततिरूप दयी है फलतः मदत साम्यप्रतीति को हौ मिना चादिए । कद्पितोपम। 


काजो रूप धिमरिनीकार ने प्रस्त किया दै ओर जिसका अनुस्ररण पडितराज जगन्नाथने. 


किया है वह इस मान्यता मेँ ओर मी सवल प्रमाण दे । वहां तो उपमान या तद्गत धमं एकमात्र 
प्रातीतिक ही है । ल्ता म संचारिणीत्व धर्मं केवल वोद्धिक या प्रातीत्तिक है । इसीप्रकार 
“स्तनाभोगे पतन्‌ भाति कपोरात्‌ कुटिकोऽलकः । 
दारांकविम्बतो मरौ छम्बमान इवोरगः ॥” रसगंगा० ॥। 
सुन्दरी का उुटि अल्क कपो पर से होता हआ विपुल स्तना पर पड़ता इजा रेस्राल्ग रहा 
हे जसे चन्द्रविम्ब सै मेर पर ख््का हआ कों सपं ।'-- यहं चन्द्रविम्ब में स्पे का अस्तित्व उसके 


` „ अ अक जौ 


उपमाखड्ारः ९७ 


मेरु पर ल्टकेने के ही समान काल्पनिक या प्रातीतिकदहे। इस तथ्य का विदादीकरणका श्रेय 
एकमात्र विमदिनीकार जयरथ को है। व्यक्तिविवेककार महिमभद्र ने लक्षणा के खण्डन में सादृर्य 
ओर साधन्यंशब्द का पयांयदाब्दों के रूप में ही प्रयोग किया है- 

न हि अनुन्मत्तः करिचत्‌ कचित्‌ किंचित्‌ कथचित्‌ साध्यम्‌ अनुत्पद्यन्नेव अकस्मात्‌ तत्वमारो- 
पयति? इति परि शौलितवक्तृस्वरूपः प्रतिपत्ता (तत््वारोपनिभित्तं साट्ख्यमात्रमेव प्रतिपत्त॒महंति । 
[ द्रष्टव्य = इसपर हमार! दिन्दीविंमर पृण ११४-१६ | % 

उपमान आर उपमेय कै लक्षण भी आचार्यो ने दिए है । वामन ने- । 
उपमायते सादृदयमानीयते येनोत्ृष्टयुणेन अन्यत्‌ तदुपमानम्‌ 
यदुपमीयते न्यूनयुणं तदपमैयम्‌? 

अथात्‌--““उत्कृ्ट गुणवाली जित वस्तु से अन्य वस्तु साद्ृद्य को प॑चाया जाता है वह उप- 
मान करता हं आर न्यूनयुणवाली ज वस्तु उपमित होती हे वह उपमेय कहराती हेः 
प्रकार उपमान ओर उपमेय मे गुणगत अधिकता ओर न्यूनता को भी महत्व दिया हे । 

उदमटक्रत काव्यालकारसारसंग्रह कै टीकाकार प्रतीदहारेन्दुराज ने इनका विवेचन इस प्रकार 
क्यादहं 


` साट दयसम्बन्धित्वेनो पादयते यत्‌ प्राकरणिकं तत्‌ उपभेयम्‌ । 

जो प्राकरणिक पदाथ साट्इयसंवन्धीरूप से वाक्य मँ अपनाया जाता है वह उपैय होता हे। 

इसके स्पष्टीकरण मे एक एक॒ विदोषण पर बरु देते हए ॒उर्होने अत्यन्त सहृदयता के साथ 
लिखा दै-- 

न खलु प्राकरणिकस्यापि सादृस्यसम्बन्धित्वेन अनुपादीयमानस्य उपमेयता । यथा “राज्ञः 
पुरुषमानय" इत्यत्र पुरुषस्य । पुरुषो हि अत्र आनीयमानत्वेन चोयमानत्वात्‌ सत्यपि प्राकर णिकन्वे 
साद्रदयसम्बन्धित्वेनानुपादीयमानत्वान्नो पेयः) सत्यपि च सादृर्यसंबन्धित्रेनोपादाने यस्य प्राकरणि- 
कत्वं नास्ति तस्योपमानत्वम्‌ न तूपमेयत्वमितति प्राकरणिकमिल्युक्तम्‌ । तदेवं सादृ र्यसंबन्धित्वेनोपा- 
दौयमान यत्‌ प्राकरणिक तदुपमेयम्‌ । तद्धि उपमनेन सादृ रयप्रतिपादनद्वारेण समीपे क्षिप्यते 
तस्मादपमेयम्‌ । अप्राकरणिकं तु तथाविधमेवोपम नम्‌ ।› 

जो प्राकरणिक भी हो किन्तु सादरद्य सम्बन्धी के रूपसे उपात्त नहो वह॒ उपमेय नहीं 
होता । जंसे “राजा फ आदमी को लाओ में आदमी । आदमी जो है वह यद आनीयमानरूप से 
कथित देन कि सादृदयसम्बन्धिरूप से । अतः प्राकरणिक होने पर भी वह उपमेय नदीं है। इसी 
प्रकार साट्रदयसंवन्धिरूप से उपात्त होने पर जो प्राकरणिक नहीं होता वह उपमान होता है, उपमेय 
नदीं । इसलिए जो प्राकरणिक भी हो ओर सादृद्यसम्बन्पी भी वही उपेय होता है । वह उपमान 
के द्वारा साटश्यप्रतिपाद्रन दारा उप = समीपम फ़ेका जातादहै [ मेय } इसीलिए उपसैय नाम से 
पुकारा जाता हे । जो अप्रकारणिक हो ओर साद्रयसम्बन्धी भी वह उपमान कहकाता है । 

इस प्रकार प्रतीहरेन्दुराज उपमान ओर उपमेय मे युणगत न्यूनाधिकमाव पर निभर न 
रह उनके प्राकरणिकत्व ओर अग्राकरणिकत्व पर बरु देते हैः । 

अथालकार का विवेचन भिन्न भिन्न आचार्यौ ने सिन्न भिन्न अलंकार त्ते आरम्भ किया हे । 
भरत सुनिने उ्पमासे ही आरम्भ करिया है। विष्णुषममोत्तरपुराणने रूपक से। भामह ओर 
उद्धर ने स्पक सो आरम्भ कियाहै। रखद्ररने अर्थालकारोको चार वर्गोमे वय है! इनसे प्रथम ` 
है वास्तवः, द्वितीय है ओंपम्य, तृतीय है अत्तिराय ओर चथ है रलेष । उपमा कौ गणना अपम्य॒ के 
अन्तगत को गड हे । य्यधि अपने शसं वगैमें प्रथम स्थान उपमाको ही दिया गयादहै, तथापि 


«७ अ० खर 


} अल्कारसवंस्वम्‌ 


-अर्थालंकारों का विवेचन वास्तव वगं से कर ओर वास्तव में प्रथम स्थान सहोक्तिको दे उसे वांछित 
गोरवसे दूर रखादहै। दण्डी वामन ञौर मम्मट नै उपमासेदही अर्थालंकार का विवेचन 
॥ - आरम्भ किया हे, किन्तु दण्डी कौ यन्थकार्‌ ने कम अदर दियाद्ै। इस प्रकार अल्कारसयंस्वकार ने 
-मम्मट ओर वामन कै अनुकरण पर उपमाल्कार ते अर्थाल्कारों का विवेचन कियादहे। मम्मट 
ओर अलंकारसवेस्वकार ने उपमा कै विवेचन में वामन का अनुकरण करते इए भी उन्टे आदिक 
महच्च ही दिया दै । वे उद्भट के अठ्कारसारसंग्रह पर अधिक निर रहे दहै, 
पण्डितराज जगन्नाथ ने अल्कारस्ेस्व के उपमा लक्षण को जच्ता छेड़ दिया -- यद आश्रय की 
वात दै । आश्चयं कौ एक वात यह मी देवि वृत्तिओर विमरिनी दोनों के रचयिताओं ने सूत्रम 
उद्िखित “भेदामेदवुल्यत्व' का एक भी उदाहरण नदौ दिया । विम्वप्रतिविन्वमाव ओर्‌ वस्तुम्रति- 
-वस्तुभाव पर उन्हांने अधिकं वल दिया । 
वस्तुतः चमत्कार का कारणदी अकुंकार्यो का विभाजक होता है| उपमा मं वह्‌ साध्ये का साददय 
हे । व्यतिरेक आदि में व्यतिरेक आदि चमत्कार के कारण हं। अतः मेदामेदतुल्यत्वं चिद्धोषण 
 -छोडा जा सकता हे । “उपमानोपयैय' चन्द भी अधिक आवद्यक नहीं । साधम्यं एकमात्र उपमानो 
पूमेयमेंदहीहोताह। इसीकि" मम्मटने उन्ें लक्षणमें स्थान नहीं दिया । अप्रतीति या अवर्णनी- 
` यताका निराकरण साषम्येगत चमत्कारकारित्वसेद्ीदो जातादै। ये द्यप रहते हुए चमत्कार 
(-- निष्पन्न नहीं होगा । “चमत्कारि साधम्य॑सुपमा? चमत्कारकारक साधम्यं उपमा है--इतन। लक्षण 
। -हदी उप्रमा के किट पयांप्त हे 1 उपमाध्वनि में चमत्कार ध्वनिसे होता दहै, अतः पण्डितराज द्रारा 
| प्रदत्त विशेषण वाक्यार्थोपस्कारत्वः मी व्यथं हे । जहाँ केवल राव्दाथं रहते है वद उन्हीं का उप- 
स्कार होता हे । पण्डितराज जगन्नाथ के उपमा लक्षण मरं उपमाल्क्रतिः यह जो अल्क्रति राब्द है 
यह मी अनपेक्षित है, क्योकि प्रकरण अरंकार निरूपण का हं । अतः अरंकारभूत उपराका हो लक्षण 
होने से ोकिक अल्कारमूत उपमा का लक्षण प्राप्त दी नदीं होता । अस्त, यद स्वतन्त्र विवेचन का 
विषय है। 
संजीविनीकार ने उपमा का लक्षण कारिकारूप मै इस प्रकार प्रस्तुत किया दै- 
(भेदाभेद तुलाव्रत्तौ साधरम्युपमोच्यते । 
धर्मविच्छिन्तिवदातचे विष्यसुपयाति सा ॥ 


चद --------- 


नै १8 


^ ऊक क पक चक = ` १ कके कि 


[ स्वस्व | 
[ प्रू १३ ] एकस्येवोपसानोपमे यत्वेऽनन्वयः ॥ 
| वाच्याभिग्रायेण पू्वरूपाचुगमः । णकस्य तु विर्द्धधमंसंसग द्विततीय- 
श्रह्मचारिनिवृच्यर्थः । अत एवानन्वय इति योगोऽप्यत्र संभवति ! यथा(-- 


य॒द्धेऽ्जैनोऽञ्खंन इव पथितश्रतापो 
भीमोऽपि भीम इव वेरितु भीमकमा । 
| न्यग्रोध्वर्तिनम णयिपतिं इरूणा- 
(८01: मुत्प्राखनाथेभिव जग्मतुरादरेण ॥+' 


 [सू० १३ | "एक ही [ पदार्थं] का उपमान [ओर] उपमेय [दोर्नो] होना 
अनन्वय [ कहराता है | । 


[ # ३ 


=+ {9 = 9 । ऋक 2.8, । = तै न. श म्‌ र अक 2 # ८ $ # ^ 4 9 = व~ , च ^ मि 


अनन्वयालङ्ारः ९९ 
विसरिनी 


एकसयेवेत्यादि । नजु सादरयाश्रयाणासमकरूकाराणां ऊक्तयिकं प्रस्तुतत्वात्सादश्यस्योभय- 
निष्टत्वेनेव संभवादेकस्य च तदभावार्कथमिहातदाश्रयस्याप्यस्य व चनसिष्याराङ्कयाह- 
वाच्यासिग्रायेणेत्यादि । 


राका होती हे कि प्रकरण है साद्रदयमूलक अल्कारो के लक्षण का जोर अनन्वय मेँ साद्च्य- 


मूता हे नही, क्योकि साद्य दो भिन्न पदार्थौ मे रहता ओर अनन्वय पदार्थं केवल एकं हीदहोता 


दे, एेसी स्थिति में इसका लक्षण यदय क्यो कियाजा रहा है। इसके उत्तर मे कहते है- 
वाच्याभिप्रायेण आदि | 

| व° | वाच्य को लेकर [ यह ] पूर्वरूप [ साद्श्याश्रयत्व = उपमात्व ] की प्रतीति होती है । 
वस्तुतः तो [ उपमानत्व ओर उपमैयत्व इन परस्पर ] विरुड धर्मौ का एक ह्य [ पदार्थ ] के स्राथ 
सम्बन्ध का प्रयोजन दहे [ व्य॑ग्यके रूपमे} दितीय उपमान की निदृत्ति। इसी [ विरुद्ध धर्मो के 
एक के साथ संवन्ध के ] कारण यह अनन्वय इस दाब्द का ] “अनन्वयः = [ अन्वय = उपनानोपसेय- 
संवन्ध का अभाव ] यह योग [ शक्तिरभ्य अथं ] मी यहो हे। सकता है । उदाहरण- 

युद्ध मे प्रताप फकने मेँ जो अजुन अजुन केही समान है ओर ाञ्चुओं के वीच भय॑करता 
बरतने मं भीम मीमके ही समानदहेः वे दोनों वर्क्ष के नीच वेढे डुरुओं के स्वामी [ धृतराष्ट्‌ ] 
के पाक्ञ उसे मानौ मौर भी अधिक रञ्जित करने के किए आदर पूर्वक पचे 1 


विमरिनी 
पूथरूपेति । सादश्याश्रयत्वस्येव्यर्थः । अस्त्येव द्यत्र शाब्दी सादृश्यप्रतीतिः । सुखं चन्द 
इवेत्यादिवदेवाघ्नो पमानोपमेयस्वस्य वाच्यतयो पनिवन्धनात्‌। अत एवाह-वाच्यासिप्रा- 
= © ४ र * 
येणेति । न पुनवंस्स्वभिप्रायेणेत्यथंः । वस्तुतो द्येकस्येव साध्यसिद्धधर्मरूपर्वासंभवादुप- 


 मानोपमेयस्वेऽपि विरोधः स्यात्‌ । इत्थं शाब्दमेव सादश्यानुगममाश्रिस्येहास्य रत्तणम्‌ । 


ननु यचेवमेकस्योपसानो पमे यत्वं विरुध्यते तक्कि वस्तुविरुद्धेन निप्फञेन चेतनेव्या्- 
इयाह्‌--एकस्येत्यादि । | 

पूवरूप = साद्द्याश्रयत्व = साष्रश्यमूलरूप । यहाँ भी साद्रस्य का ज्ञान दाब्दं से तो होता 
ही हं । क्योकि सुख चन्द्र कै जेसा है" इत्यादि वाक्य के समान यद्य मी उपमानोपमेयभाव वाच्य- 
रूप से उपनिवदध रहता है । इसीलिए कहा “वाच्य को केकर । अर्थं यह कि वास्तविकरूप से 
नहीं । वास्तविक रूप से तो यह सभव नहीं किएक ही वस्तु साध्यमी ह्यो ओर सिद्ध मी। अतः 
`एकं ही वस्तु प उपमानत्व ( साध्य ) भोर उपमेयत्व (सिद्ध) का होना विरुद्ध है! इसलिए 
केवक राल्दिक साष्श्य की प्रतीत देखकर यहाँ (सारय के प्रकरण मे) इस [ अनन्वय ] का रक्षण 
कियाजा रहादहै। 

राका होती हे कि यदि एके ही पदाथ का उपमान ओर उपमेय दोना विरुद्ध है तो वास्तविकं 
रूपे विरुद होने के कारण [ काव्य मेँ ] इस [ प्रकार कै ] निरथक [ च्खिने] से क्यालाम 
इसपर उत्तर देते हुए [ वृत्तिकार ] छिख रहे है--“एकस्य इत्यादि । | 


विमरशिनी 


एवं चास्य द्ितीयलबह्यचारिनिषृत्तिरेवालंकारस्व प्रतिष्टापकं प्रमाणम्‌ । अन्यथा 
सुन नास्यारकारस्वम्‌ । यथा- 


। 


१०९० अखङ्कारसवेस्वम्‌ 


(तस्याज्ञयैव परिपाख्यतः प्रजा मे कर्णो पकण्टपङितंकरिणी जरेयस्‌ । 
यद्धर्मरूपमिव मामनुज्ञास्ति सोऽयमयापि तन्मयि गुरोगुखपन्तपातः ॥" 

अच्र यथैव गर्भरूपं सां गुखरन्वश्ात्तयैवायाप्यनुशास्तीति सच्यसप्येकस्यो पानो पसे. 
यस्ये द्वितीयसब्हचारि निच त्तिप्रतिपत्यभावान्नायमलरुकारः । एकस्येवावस्थासमेदेन च 
विद्ध साध्यधर्थसं भवान्नो पमानो पनेयत्वरूपविरद्धुधर्मसंसर्गः । अत यप्वेति । विरुद्धधम- 
संयोगात्‌ । एकस्यैव विङखाध्यख्पेणो पमानोपमेयव्वेनावियमानोऽन्वयः संबन्धो यन्न 

सख तथोक्तः । अज्॒नादन्यो युद्धे प्रथितप्रत्ापो नास्तीति द्वितीयसव्रह्यचारिनिच्त्तिरच्न 
जीवितमूता प्रतीयत एव । अत एक कातंवीयंहिखक्षच्वयोरूपमानरूपयोरप्रतीतेः शद्ध. 
मेवे तडुदाहरणम्‌ । 

'इत्तिअमेतेम्मि जए सुन्दरमहिरखासदहस्संभरिञअम्मि ¦ 

अणुहरद्र णवरं विस्सा, जमाद्धं दाहि णद्धस्स ॥° 

इत्यादौ चानन्वयोदृाहरणस्वं न वाच्यस्‌ । अत्रान्याधनान्यार्धस्योपमीयमानस्वेनोप- 
माया अभिधीयमा नत्वात्‌ । अस्य द्य पसानान्तरनिवेधपर्यवसाय्यभिधीयमानपेकस्येवोप- 
मानोपमेयव्वं स्वरूपम्‌ ¦ न च तदृत्र राब्देनाभिधीयतेऽपि तु व्यज्यत इति प्रतीयमानरसंव 
युक्तेति न वाच्यत्वमस्येति वाच्यस्‌ ! एवं हरुंकारध्वनेविवयापहारः स्यात्‌ । एवेन 

"गन्धेन चिन्धुरधघुरंधर वकतरमेत्त्रीमेरावणग्र्ुतयोऽपि न लिकितास्ते । 
तच्वं कचत्त्रिनय नाचररद्नभिच्तिस्वीयम्रतिच्छ3षु युथपत्तित्वमेषि ॥ 

इव्यत्राप्य नन्वयो न वाच्यः । स्वीयप्रतिविम्बैरेव सादृश्य प्रतीतेस्तद्वन्धस्याप्य भावात्‌ । 
यदि नाम चतस्प्रतीयेत तदप्यस्य प्रतीयमानय्वं स्यान्न दाच्यव्वस्र । यथोक्तन्यायात्‌ । 
एवं च तदेकदेरोनावचितमेदेन वेव्यपास्य उपमानतया कल्पितेन तेनेव खादश्यमनन्वय 
इत्येव त्वया सूत्रणीयम्‌ । 

. "ग्रसमानमिवौजांसि सदस्यं गोरवेरितम्‌ । 

नाम यस्याभिनन्दन्ति द्विषोऽपि स पुमान्पुमान्‌ ॥ 

इत्यत्र पुंखः पुंस्त्वारोपाद्‌ नन्वयरूपकमिति यदन्यै सक्तं तद्‌ युक्तस्‌ । एकस्येव विध्य- 
नुवादभवेनावध्थानाद्‌ारो पासावात्‌ । 

इस प्रकार द्वितीय समान की निवृत्ति ही इस [ अनन्वय ] का अल्कारत्व प्रतिष्ठापक प्रमाण 
है । इसके विना इसमें अकंकारत्व स्तमव नदीं । यथा-- 

'उसीकी आज्ञा ते" प्रजा का परिपालन करते हए मैरी यदह जरावस्था आ गड जिसने मैरे 
कान के पास के केदा पका दिए दहै । व्योकि आजमी सुने नवजात रिद्यु के समान समञ्चाते हे, 
अतः गुरुजीका मेरे ऊपर वही महान्‌ अनुग्रह है 1” 

इसमे “जिस प्रकार गुरु जी मुञ्चे तव समञ्चाते थे जव मं नवजात शि्यु त॒स्य अवोध था उसी 
प्रकार आज भी मुञ्चे समक्लाते है इस वाक्य मे यचपि उपमान जर उपमेय एक ही तत्व है तथापि 
य॒होँ द्वितीय समान की निवृत्ति नदीं होती, अतः यहाँ यह अलंकार नदीं होता । यदि अवस्थागत 
भेद दो तो एक दी वस्तुमे सिद्धसाध्यमाव वन जाता ह तव -उपमानत्व' ओर “उपमेयत्व' इन 
विरुदधधरमौ का संसम नदीं होता [ दोनों प्रथक्‌ पृथक्‌ रढे अति हैँ । एक दूसरे से मिक नहीं पाते |! 
अतएव = इसीलिए अर्थात्‌ विरुद्ध धम॑संसगं के कारण । एक ही वस्तु % सिद्ध ओर सध्यरूप 
उपमानत्व ओौर उपमेयत्व रूपसे नीं होता ह अन्वय = संबन्ध जिसमं एसा । जज न से चिन्न अन्य 
कोई युद्ध से प्रथितप्रताप नदीं दैः इस प्रकार द्वितीय समान को निव्रत्ति ही यहा प्राणस्वरूपः 


का क # च. न पि कः 


"क कनक ` व्क `" = काका ` ` 


अनन्वयालङ्ारः १०१ 


अतीत ह्योती दे । इसक्एि [ अजुन का अथं ] कातवीयं ओर [ भीम शब्द का अथे] हिसक प्राणी 
उपमानरूप से यहाँ प्रतीत नहीं होते, फलतः यह [अनन्वय का] सवेथा शु [निदोष] उदाहरण है । 


एतावन्मात्रे जगति सुन्दरमदहिलासदख भरि तेऽपि । 
अनुहरति केवर तस्या वामां दक्षिणार्ध॑स्य ॥ 

यह संसार इतना वड़ा हे आर सहस्रो छन्दर महिलाओं से मरा इञ हैः तथापि उसका 
वामांग केवर उसीकै दक्षिणांग को वनावट का है इत्यादि को अनन्वय का उदाहरण नहीं मानना 
चाहिए [ जेसाकि ोभाकर मित्र ने अपने अल्काररत्नाकर में माना है ]। यह इसर्िए कि यहं 
एक अंगसे दूसरे अंगकी उपमादे ओर वह स्वयं अभिधादृत्ति के दारा यहाँ प्रतिष्ठित है [पर्वसान मेँ 
अभावात्मक सिद्ध नदीं होती | । यह जो अनन्वय है इसका स्वरूप है एक ही वस्तु का अभिधा 
हारा प्रतिपादित एेसा उपमानोपमेयसाव जो अन्य उपमान के अभाव में परिणत दयो दंका-वह 
अभाव यहा राब्द से नहीं कहा जाता । उसकी प्रतीतितो व्थजनासे होती है। इसक्िए उसका 
व्यंग्य होना ही उचित हं वाच्य होना नहीं। समाधान-रेसा नदीं कहना चाहिए, क्योकि ेसा 
मानने से तो अलंकारष्वनि के लिए कोड स्थान ही नहीं रह जायेगा । श्सी प्रकार- 

“हे सिन्धुरघुरषर [ गजराज = गणे | तुम्हारे गन्ध कै कारण टेरावत आदिको भी तुम्हारे 
चेहरे की समानता पाने का अभ्यास नहीं है 1 इसखिए तुम कैलारा की दीप्त रत्नभित्तियों पर प्रति 
फलित होती अपनी ही अनेक प्रतिच्छविओं के बीच यूधपत्तिपद प्राप्त करते हो । यहाँ मी 
[ खोभाकरने जो ] अनन्वय [ माना हे वह ] नहीं मानना चाहिए । प्रतिबिम्ब मेही स्वयं के 
ही हं किन्तु उनके साथ साट्र्य प्रगीत होष्टी जाता है। अतः यहां उस [ अनन्वय ] 
की गन्धमी नहीं हे। यदि यह [ अनन्वय ] यदहं प्रतीत भीहतादहोतो ब्यंग्यरूपमें 
दी होता होगा, वाच्यरूप मे नहीं। हेतु ऊपर द्वियाजा चुका हे। इसलिए [ सोभाकर 
मित्रजी ] आपको [ तेनव तदेकदेरेनावसितभेदेन वा उपमानतया कसिपितेन अनन्वय 
टक दही पदाथ या उसका एक्देरा यदि उपमानरूप से कल्पित किया जाय तो वह 
अनन्वय होता है एेसा सूत्न वनाकर कैवरू “उपमानतया कल्पितेन तेनेव साटूदयमनन्वयः 

उपमान रूप से कल्पित उसी ( उपमैयभूत ) पदाथ के साथ सादुरय अनन्वय इतना ही 
सूत्र वनाना चाहिए 

'समासदों द्वारा गोरवपूवंक उच्चारित ओर मानों ओज को पीता हा सा जिसका नाम 
राच द्वारा भी अभिनन्दित हो वही पुरूष है 1” यँ पुरूष पर पुरुषत्वं के आरोप कै कारण जो कुछ 
रोगों ने अनन्वयरूपक माना हे वहु ठीक नदीं है । यहां आरोप नदीं हो सकता, क्यांकि यहां जो 
पदाथ उद्देश्य हे वदरी विधेय हे ।› 

विमश्ञेः-८ १ ) निणयसागरीय संस्करण मे 'वाच्याभिप्रायेणः" इत्यादि वृत््यंश इस प्रकार का 
हे--““वाच्याभिप्रायेण पूर॑रूपावगमः 1 विमश्िनाकार ने “साद्रद्यानुगममाभित्य” छिखा हैअतः 
हमने अवगम को अनुगमं वना दिया है । संजीविनीमे भी यही पाठ है उस से अत्र -दाब्द्‌ भौर 
जुड़ा इआ हे “वाच्याभिप्रायेणात्रः" इस प्रकार । 

संजीविनीकार ने पू्ेरूप का अर्थं किया है, पूवं = पर्व॑तः सिद्ध उपमेय तद्रूप ओौर इसे 
आधार पर उपमान को अपूव कहा है । “पूव रूपसुपमेयत्वम्‌ अगूरवं॑रूपसुपमानत्वम्‌ ।” 

अनुगम का अथं किया है उपमैयत्व का अनुगम । 


( २ ) डो० रामचन्द्र द्विवेदी नेथविरुद्ध धमः का अथं किया है "अपने से विरोधी धर्म । 


१०२ अचड्लारसवंस्वम्‌ 


इन दोनो क अनसार यदह मानना पडेगा कि उपमेय भिन्न उपमान से अन्वित होता देन किं एकः 
| ही पदार्थं [ जजन आदि ] का [ परस्पर विरुड ] उपमानत्व ओर उपमेयत्व से अन्वय दोता द । 
॥ ८ ३ ) निणेयसागरसंस्करण मेँ “एकस्यैव अवस्थाभेदेन च सिद्ध-साध्यधर्मसंभवान्नोपमानोपमे- 
\ वत्वस्य विरुद्धधर्मससगः ेसी पंक्ति है [ यँ पृष्ट १०० पर पंक्ति ४-५ ] । हमने अथै स्वारस्यकी 
दृष्टि से षष्ठी के स्थान पर रूपः शब्द जोड़ दिया हं । 

(४ ) अवस्थाभेद से व्यक्तिभेद होने पर भी शोभाकरमित्रने अल्काररत्नाकर मे अनन्वय 
माना है ओर उसके वे दी उदाहरण दिये दहं जो यदौ विमरदिनीकार ने विमदिनीकार रत्नाकर 
का उपर्युक्त रूप भी उद्धृत करते ओर उसका परिष्कार करते देँ 1 रत्नाकर की इस मान्यता का 
खण्डन पण्डितराज जगन्नाथने भी किया है। वस्तुतः रोभाकर रेसे स्थलों पर॒ अनन्वयध्वनि की | 
ओर केत करते हैः जिसका अपलाप नदीं किया जा सकता । [ 

संजीविनीकार ने इस प्रकरण को इस प्रकार कारिकावद्ध किया दं- 

““विरुद्धधम॑संसगस्तुल्यान्तरनिवृत्तये । 
ततस्तदन्वयाभावाद्‌ भवेदयमनन्वयः ।। 

विरुद्ध धमे संसर्ग का अथै उन्दने भी “एकस्येवोपमानो पमेयक्टृस्षिः" एक ही को उपमान जौर 
उपमेय बनाना, किया दे । 

अन्य आचार्यों ने अनन्वय कै लक्षण इस प्रकार किए दं- 

मरतसनि = भरतञ्ुनि ने अनन्वय को (सदशी उपमाः नामक उपमाका भेद मानादे। 

उनके 
यत्त्वया कृतं कम॑ परिचत्तानुरोषिना । 
सद्द तत्‌ तवव स्यादिति माचुषकमणः ।॥ [ १६।५० नारयरास्र वडादा ष. | 

इस उदाहरण से वह तथ्य स्पष्ट हे । अभिनवगुप्तने इसका सदृशी के स्थान पर ‹ असदृशी) 
नाम भी बतलाया दै । असादृद्य ओर अनन्वय एक ही हैँ । 

मह तथा उद्धट = “यत्र तेनेव तस्य स्यादुपमानोपमरैयता । 

असाद रयविवक्षातस्तमित्याहूरनन्वयम्‌ ।॥ ४।४५ काव्याल० 


सादस्य का अमाव बतलने के किए जर्होजो उपमेय हौ वही उपमान हो तो उसे अनन्वय 


एकस्योपमानोपमेयत्वेऽनन्वयः ।" 
अन्यासादृदयमेतेन प्रतिपचते । 
विरोध कै प्रसंग म भनन्वय दिखलाते हुए लिखते है कि “एक हौ पदाथ यदि उपमान जर 
उपमेय दोना हो तो अनन्वय होता दै ।: इससे अन्य के साथ उसका सदय नहीं है ठेसा प्रतीत 
होता दै । 
| रुद्रट = रद्रट मं अनन्वय नहीं मिलता । 
मम्मट = उपमानोपमेयत्वे एकस्यैते कवाक्यगे । अनन्वयः । 
एक ही पदार्थं यदि एक ह्ये वाक्य म उपमान ओर उपमैय दोना दी दो तो उसे अनन्वय 


। 
। 
1 
| 
कते हेः ।` 
वामन = विरोधप्रसगेनानन्वय दरायितुमाद- 


कते दै । | 
शोभाकर = तनैव तदेकदेशेनावसितमेदेन वोपमानतया कल्पितेन अनन्वयः ।* अथ विमरधिनी 
म कियाजा चुका है, | 


उपमेयोपमाटड्लारः १०२३ 


इसते स्पष्ट है कि अनन्वय मेँ श्दितीयसदश निवृत्तिः पर आचार्यो का ध्यान आरम्भसतेही 
था । वरिरोधमूलक कहकर वामन ने उसपरे विरुड धमंसंसम को भी ओंक लिया था। पण्डितराज 


जगन्नाथने ब्राचान समी अभिप्रायो को चाक्नौन्यायसे बीन वटर कर इस प्रकार प्रस्तुत 


किया दं - 
“षद्धितीय स दाव्यवच्छेद बुद्धिफलकं यदेकोपमानो पमेयके साद्द्यं तदनन्वयः 1 
`एता साद्य अनन्वय होता है जिसमें उग्मान ओर उपमेय दोनों एक ही पदां हो तथा 
जिससे किसी संमावित द्वितीय सद्द का निराकरण फरित हो ।' 
पण्डितिराज जगन्नाथने जयरथके इस मत पर किं “एतन्मात्रे०" तथा गन्धेन ०? इत्यादि 


परयो मं अनन्वय ध्वनि हो सकती है--आक्षेप करते हए लिखा दै कि दित्तीयसद्रव्यवच्छेदमाव्र की 


ध्वनि कौ अनन्वय की ध्वनि नहीं कह सकते, क्योकि वह कल्पितोपमामें भी होती है ओर अति. 
रायोक्ति मे भी  असमाल्कार मे मी उसका अस्तित्व रहता हें । कदिपितोपमा मे विमरिनीकार मीः 
इसे स्वीकार कर चुके दैः। 

वस्तुतः पण्डितराज जगन्नाथने विमरिनीको यीकसे नदींदेखा। पण्डितराज ने उसका 
मत इस प्रकार प्रस्तुत किया है- 


ययपि चाल्कारसवेस्वक्ृता अनन्वयध्वनिव्वमत्र भविष्यति, अन्यथाऽट कारध्वनेिष. 
या पहारः स्यात्‌ इत्युक्तम्‌ › तदपि तुच्छम्‌ ।' 


यह। एक तो उन्हे यह्‌ मिदित नदी हे किं यह मत अलंकारसवेस्वकार का नदीं विमरद्धनीकार 


का दे, जिसका आधार अलंकारसवस्व के वाद वना अलंकाररत्नाकर है । दूसरे न्ह यह विदित 
नदीं कि विमरिनीकार भी दवी जवान से दही यदौ अनन्वयध्वनित्व की बात करते हे । पण्डित- 
राजनेयातो केवर खण्डने क्ष ही इते तूलदेदिया हं या उन्हे पाण्डुलिपियों गलत मिली 
हं । हो सकता हे रसगंगाधरकौ ही पाण्डुप्रतियोमें दोषरहादहो ओर संपादक उसे सुधार न 
पाएदहा। 


[ सवंस्व ] 
[ सू १४ ] हयोः पयोयेण तस्मिन्ुपमेयोपमा ॥ 
तच्छब्देनोपमानोपतेयत्वप्रत्यवमशः । पर्यायो यौगपद्याभावः । अत 
पवार वाक्यभेदः । इयं च धमेस्य खाधारण्ये वस्तुपतिवस्तुनिर्देयो च 
द्विधा । 
आये यथा- 
'लमिव जर जटखमिव खं दंसश्चन्द्र इव दंस इव चन्द्रः । 
नुदाकायास्तारस्ताराकाराणि कुमुदानि ॥' 
दितीये यथा-- 
सचख्छायाम्मोजवदनाः खच्छायवदनाम्बुजा | 
वाप्योऽङ्धना इवाभान्ति यच्च वाप्य इवाङ्गनाः ॥ 


| सू° १४ | दो का वह [ उपमानोपमेयभाव ] यदि क्रम से हो तो उपमेयोपमा 
| कह राता डे ]। 


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। 
। 
| 
। 


१०९ अच्द्धारखवेस्वम्‌ 


` [ वृ० ] [ तस्मिन्‌ कै ] तत्‌ = वह = शब्द से यदं उधमानोपमेयत्व का परामरो किया गया ट 
{ सन्निदित अनन्वय का नदीं ] । पर्यायक्रम का अथं दै एक साथ [ होकरः न कि सिन्न-भिन्न वाक्यां 
नेक के बाद एक इस क्रमे] दोना इसीलिए इसमे वाक्य वद्र जातेर्ह । यह दा प्रकार 
की होती है णक जदो धमै साधारण होता दहै ओर दूसरी जदं वस्तुप्रतिवस्तुनिर्देद दौता हे। 
प्रधम क्रा उदाहरण । 

(अआकादा के समान जर है ओर आकाड् जल कै समान; दंस चन्द्र के समानदे आर चन्द्र 

हंस के समानः तारे कुमुद कै समान है ओर कुमुद तारों के समान ।' 

द्वितीय का उदाहरण- 

'वापियाँ अंगनाओं के समान प्रतीत होती दं ओर अंगना वापियां के समान । एकं [वापियो| 
-मुखवुल्य शओोभायुक्त कमल वाली है ओर दूसरी [ अंगनार्ण ] कमल वुल्य रोभायुक्त 
-सुख वाटी । 

विमिनी 
द्वयोरित्यादि । इयोरित्युपमानोपमेययोः, न पुनद्विसंख्याकयोः । तेन, 
“कान्ताननस्य कमरुस्य सुधाकरस्य पूत परस्परमम्‌ दुपमान भावः । 
सदयो जरातुहिनराइ पराहतानामन्यः परस्परमसावरसः प्रसूतः ॥' 
इव्य त्न त्रयाणामप्युपमानो पमेयस्वं स्थितमस्या एवाङ्गम्र्‌ । तच्छृब्देनेति तस्मिन्निव्य- 


नेन । यौगपद्याभाव इति कऋ्रमङ्पव्वात्‌ । अत इति यौगपचाभावात्‌ । स च वाक्ययद्‌ः 


शाब्द आर्थश्च । तत्र शाब्दो यथा- 
(१. न्द न, ©= ० ^~ भ, 
रजोभिः स्यस्दनोद्धूतेगंजेश्च घनसंनिभः। 
युवस्तरूमिव व्योम छुचन्व्योमेव सरूतलस्‌ ॥' 
अच्र सुवस्तरु व्योमेव ऊुवज्िति वाक्य परिनिष्पत्तिः स्फुट एव शाब्दो चाक्यमेद्‌ः। 
आथो यथा- 
'भवत्पादाश्रयादेव गङ्गा सक्तिश्च शाश्वती । 
इतरे तरसादश्यक्चुभगामेति वन्धताम्‌ ॥' 
अत्र स्फुटेऽपि शाब्दे एकवाक्यत्वे गङ्गा भक्तिवद्धक्तिश्च गङ्गाचद्‌ वन्येस्यरस्येवाथो वाक्य- 


-सेदः । अस्याश्चोपमानान्तरविरस्कार एव फलम्‌ । अत एवोपमेयेनोपमा इत्यस्या 


अन्वर्थाभिधानम्‌ । यत्र पुनर्पमानान्तरतिरस्कारो न प्रतीयते तन्न नायसरकारः ! यथा- 
(सविता विधवति विधुरपि सवितरति तथा दिनन्ति यामिन्यः । 
यामिनयन्ति दिनानि च सुखदुःखवशीक्रते मनसि ॥' 
न द्यत्र विधुखविन्रादीनासुपमानान्तर तिरस्करणं विवक्तितं कि तु सुखढुःखवशीक्रुत- 
-मनसामेवं विपरीतं भवतीति । 
दो का अथं हैः उपमान ओर उपमेय । दो संख्यावाके नहीं । इसते ~ 
कान्ताननः कमल ओर चन्द्र का पहले परस्पर म उपमानभाव संवन्ध था । वहत शीघ्री 
जरावस्था, ओस तथा राहु से आक्रान्त इन सवम फिर मी यह संवन्ध बन पड़ा दहै यद्यपि यह 
[ प्रथम कौ अपेक्षा | नीरस हे । 
यँ जो तीन पदार्थौ म उपमानोपमेयभाव है यह भमी इसी [ उपमेयोपमा ] का अंगदहै। 
-तत्‌ शब्द अर्थात्‌ (तस्मिन्‌? इस पद की प्रकृति के रूप मँ आया तद्‌ शाब्द यौगपद्या-माव 


उपमेयोपमाटङ्नारः २०५ 


साधन होना अर्थात्‌ क्रम के कारण अतः अथात्‌ यौगपद्य कै ही कारण वह वाभ्यभेदं दो 
प्रकार का ह्येता है राब्द ओर आर्थं । इनमें प्रथम शाब्द यथा-- 

"रथों से ऊपर उड़ाई गईं धूली से ओर मेव कै समान हाथियों से आकाद्यको पएथिवोतरु कै 
समान ओर पृथिवीतर को आकादा के समान वनाता इआ [रघु दिग्विजियके लिए पूवे दि 
की ओर वदा ] यहां पथिवीतेङ को आकाद्च के समान बनाता हुजआ--इस प्रकार वाक्य की पत्ति 
हो जाने के कारण शाब्द वाक्यमेद स्पष्ट ही दिखाई देता है । आथ यधा-- 

“गगा ओर शादवत भक्ति आपके चरणों के आश्रयस्ते ही परस्पर सादृश्य से सुभग दन्यता 
को प्राप्त होती हे) | 

यरो इाब्दत्‌ः तो वाक्यम एकता ही प्रतीत होतीरहे, कितु गंगा भक्ति के समान वन्य हे 
ओर भक्ति गगा के समान वन्य है) इस प्रकार यदहः अर्थतः वाक्यभेद हैही। इसन्डा फलहे 
उपमानान्तर [ अन्य किसी उपमान] का निराकरण । इसलिए उपमेय से उपमाः इस्त प्रकार 
इसका नाम मी सार्थक दे । जहां कीं अन्य उपमान का निराकारण प्रतीत नहीं होता वहां यह 
अलंकार नहं माना जाता । यथा- 

“चित्त जव खख ओर दुःख मे इवा रहता है तव सूयय॑चन्द्र॒ सा रुगता जौर चन्द्र सुये सा 
इसी प्रकार रातेभीदिनसी र्गतीदैं ओर दिन भी रातसे)।ः 

यहां कवि की सूये ओर चन्द्र॒ आदि के अन्य उपमानों की संभावना निरस्त करने कौ कोडं 
इच्छा नदीं है । केवर इतना ही वतलाने कौ इच्छा है कि जिसका चित्त सुख ओर दःख से आक्रान्त 
होता दे उन्हें एेसी विपरीत अनुभूति होने र्गती हे । 


विमरिनी 
साधारण्य इति । एतच्च धर्मस्य निद्ानिर्देशरूपपन्तद्यागूर कव्वे नोक्तम्‌ 1 तन्न नि्दैश- 
पक्ेसाघारण्यमस्ति तथाप्यन्न संङ्ृनिनिद॑नञेनेवानुगतस्वात्तदु पलस्मः स्फुट इष्यन्न भावः । 
अनिदंशपन्ते तु वास्तवमेव साधारण्यम्‌ । यद्‌नुसारं खमिव जरूमिव्यायदाहतम्‌ । घस॑स्या- 
नुगासित्वे तु यथा-- 
"कमख्ेव मतिसंतिरिव कमला तजुरिव विभा विसेव तचुः। 
धरणीव छतिष्टंतिरिव धरणी सततं विभाति बत्त यस्य ॥' 
अन्र विभातीति सखङृन्निरदिं्टस्‌ । वस्तुभ्रतिवस्तनि्हश्श्च पूर्ववदिहापि शद्ध खासान्य- 
रूपसव विम्ब प्रतिबिम्बभावाभ्यां द्विधा । तन्न विम्बप्रतिबिभ्बभावो गन्थक्रतेबोदाहतः। 
तत्र छछम्भोजवद नयोर्विम्बप्रतिविम्बभावः । शुद्धसासान्यरूपत्वं यथा- 
(तद्वल्गुना युगपदुन्मिषितेन तावष्सद्यः परस्परतुरखामधिरोहतां दवे 1 
म्रस्पन्द्मानपरूषेतरतार मन्तश्चद्धुस्तव प्ररखुचितभ्रमरं च पद्यम्‌ ॥? 
( अत्र ) प्रस्पन्दमानमप्रच ङित्वेन श॒द्धसामान्यरूपव्वस्‌ । तारकञ्चमरयोस्तु बिम्ब- 
प्रतिविभ्बभावः । उन्मेषाभिप्रायेण चाजुगामितेति भेद च्रयस्याप्येतददाहरणस्‌ । 
साधारण्य इति यह्‌ इस बात को वतरने पै किए छिखाकि साधारण धम| यहाँ ] दो 
प्रकार का होता हे १-निरदिष्ट ओर २-अनिर्दिष्ट। जहाँ साधारण ध्म का निर्दे रहता हे वहां 
की विशेषता यह रहती है किं उसका उल्लेख एक ही वार होत. ह अतः वह अनुगामी रूप से 
ज्ञात दोता है । जहां निदेश नहीं रहता वहाँ साधारण धम वास्तव = वस्तु से आक्षिप्त आं 
होता दै, जिसके अनुस्तार “आकाश के समान जक" इत्यादि उदाहरण दिया । अनुगामी धमं के 
लिए उदाहरण~- 


१०६ अलङ्ारखवंस्वम्‌ 


“जिसको मति लक्ष्मी के समान प्रतीत दोती है गौर लक्ष्मी मत्ति के समान, रारीर कै 
समान कान्ति प्रतीत होती हे ओर कान्ति फे समान शरीर । इसी प्रकार जिसकी धरति धरणी के 
समान ठ्गती हे ओर धरणी धृति के समान 12 

यहा विमाति = लगती या प्रतीत होती दै यद्व धर्म एवं ही वार उटिल्खित & | 

वस्तु प्रतिवस्तु का निर्देश भी पहलेके दी समान यदमी युद्ध सामान्य स्वरूप तथा विन्ब- 
प्रतिविन्वमाव युक्त दस प्रकार दो प्रकार का होता दं। इनमें से विच्वप्रतिविम्बभाव का उदाहरण 
स्वयं अन्धकार ने ही दे दिया दै। व्ल कमल ओौर सुख का विस्वप्रतिविम्वभाव है । शुद्धसामान्य 
स्वरूप का उदाहरण यहु है-- 

ये तुम्हारे नयन जिनमें स्निग्ध कोमल पुत्तखियां चल । 

ये कमल जो कोष मेँ बन्दी वना रमर चंचल । 

साथ ही खुल जारं तो उपमान वन जाट परस्पर ।› | मह देवीजी ] 

तो एक साथ छन्दर उन्मेष से दो वस्त परस्पर वला पर शीघ्र ही चद्‌ जाये; एकतो भीतर 


दो भीतर किंचित घूमती ओर कोमल पुतली से युक्त व्दारा चश्च ओर दूसरा अरमरसंन्।र 
युक्तं पञ्च 12 


&४५^ 


यदा जो प्रस्पन्दमानता अर्थात्‌. धूमना है वदी प्रचङ्तित्व अरा संचरण है । अतः यदं 
वस्ठुप्रतिवस्छुसाव शुदधसामान्वसरूप दे । तारा ओर भ्रमर मे यद्य भी विस्वप्रतिविम्बभाव 
दे ! उधर उन्मेपकी दृष्टि से इसे अनुगामिधमत्व भी हे । इस प्रकार यह पय तीनो भेदो 
उदाहरण हे | 

विमं उपमेयोपमा के प्राचीन लक्षण- 

नामह = उपमानोपमैयत्वं यत्र पर्यायतो भवेत्‌ । 

उपमैयोपमां नाम ब्रुवते तां यथोदिताम्‌ ॥ ३।२७ ॥ 

जर्दाक्रमसे [ वारी वारी स्ते ] उपमानोपमेयत्व हो उसे अपने अथै कैद अनुरूप उपमेयो- 
पमा कहते हे । 

वामन = क्रमेण एकस्येवोपमानोपमेयत्व उपमेयोपमा ।: टक दही पदाथ यदि क्रम से [ एकं 
वक्रि म | उपमान ओर [ एक वाक्य मेँ ] उपमैव वनाकर प्रस्तुत किया जाए तो वम उ पमेयो- 
पमा होती ई। 

उद्धट = अन्योन्यमेव यत्र स्यदुपमानोपमेयता । 

उमयोपमामाहृस्तां पक्षान्तरदानिगाम्‌ ॥ ५. 

जद। एक दूसरे के ही साथ दो कै वीच उपमानोपमेयता हो उप्ते उपमेयोपमा कहते हैः । इसकं 
तात्पय॑ होता है पक्षान्तर [ अन्य के उपमात्व ] का निर।कण ।' 

रद्रृट = मं अप्राप्त । 

मम्मट = विपर्यास उपमेयोपमा तयोः ॥: 

तथोः उपमानोपमेययोः । परिवर्तिः [ विपयांसः ] अर्थात्‌ वाक्यदये । इतरो पमानव्यवच्छेदप्‌ रा । 

उपमेयेन उपमा इति उपमेयोपमा ॥ । 

= भान अर्‌ उपमेय का परस्परमे एक दू्रेके रूपमे जना। यहंदो वक्यं मेही 

तमव हं । तभी इसका नाम है उपमेयोपमा अर्थात उपमेय क दारा [ उसे उपमान वनाकर | 


सपमा | 


१ ५ 
१ ११ 
कै क... ६। र 


न 
+ 


उपमेयोपमालक्ङ्ारः १०७ 


रो भाकर = परस्परसरुपमानोपमेयत्वसुपमेयोपमा !' 

उपमानस्य उपयमैयतापि, उपमेयस्यापि उपमानत्वम्‌ इति उपमेयोपमार्कारः, स चोपमानन्तर- 
निषेधाथैः । 

परस्पर सें उपमानोपमेय माव उपमेयोपमा कहलाता है । यहो उपमान मी ऽपमेय बना 


दिया जाता दें ओर उपमैय मी उपमान । इस अलंकार का प्रयोजन है अन्य किसी उपमान 
का निराकरण । 


दस टेतिदहासिक विवेचन से स्पष्ट है कि उपमेयोपमारुकार के निन्रकिखित चारों तत्त्वो 
पर प्राचीन समी आवचार्योकीदृष्टिथी १= भिन्न भिन्न पद्रार्थों मे परस्पर उपमानोपसैयभावः, 
२ = एतदथ वाक्यमेद, ३ = इसका उदर्य वाक्यो पात्तपदाथांतिरिक्त पदाथ की उपमानता का निरास 
तथा ३ = इसको अन्वथता । 

परवत्ती सोभाकर ओर पृदेवत्तीं वामन ने अलकारसवस्वकार द्वारा उदघ्रत (खमिव जलम्‌०' 
पद्य ही उद्राहरणरूप से प्रस्त॒त किया हे । रोभाकर ने मम्मट द्वारा अन्योन्योपमा के उदाहरण 
के रूप में प्रस्तुत “सविता विधवति? प्य कौ मी उपमेयोपमा का उदाहरण माना दहै। उन्होने 
सूय ओर चन्द्र का परस्पर उपमानोपमेयमाव पिरोध को केकर माना) उखओर दुःख मे 
सूय के विरु चन्द्र दी है ओर चन्द्रके विरुड सूयं । इस प्रकार दोनो मे परस्परविरुढत्वेन उप- 
मानोपमेयमाव माना है । वस्तुतः “यदौ चित्त कै दःखी होने पर सुखकारी चन्द्र भी सूयं सा 
सतापकारी वन जाता हे ओौर खखी होने पर संतापकारी सुय भी चन्द्रमा सा खंखकारौ 
बन जाता हे। इस प्रकार सूयं चन्द्र की उपमा ने एक वार खंखकारित्व ओर दूसरी वार 
दुःखकारित्वे साधारण धम हे) साधारण धमके भिन्न होने पर ततीयसद्दाव्यवच्छेदम्रतीति 
नहीं हो पाती विमरिनीकारने जो विवेचन कियादै बहवड़ाद्ी हृ दहै। पण्डितराजने 
भी उसे मान ल्ियादे। | 

पण्डितराज जगन्नाथ ने अरंकार सवेस्वकार, अलुंकाररत्नाकरकार तथा विमदिनीकार तीनां 
को उपमेयोपमाविषयक समस्त मान्यताओं का अक्षरदाः खण्डन किया है) उनके खण्डन का 
केन्द्र केवर एक ही त्व है । वह्‌ है उपमेयोपमा में वाक्य भिन्न हो जाने पर भी साधारणधमेका 
एक होना । उपमानान्तरनिषेध की प्रतीति साधारणधर्म के दोनों वाक्योंमें एकन होने से नहीं 
हो सकती । उन्दने शरजोभिः० इत्यादि पद्य को ("सविता चिध०ः पय के ही समान अन्योः 


 न्योपमा का उदाहरण माना है। उनका कहना है कि यहो उपमानान्तरनिषेध की प्रतीति नहीं 


होती । कारण कि य्ह दोनो उपमाओ मे साधारण धमं एक नहीं है । “भूतल तुल्य व्योम' इस 
उपमा मे रजोरूप साधारण धर्मं अनुगामी है किन्तु “न्योमतुख्य भूतकः इस उपमा में वह विम्बपरति- 
विम्बात्मक है । वहो हाथी ओर मेधो का रेक्य आकार ओर वण के आधार पर भासित होता हे ।' 
हमारी समञ्च स यदि <रजोगज, ओर (रजोभेधः रेते दो वग वनाकर इनमे निच्वप्रतिविग्व ओर 
वप्तुप्रतिवस्तुभाव मानकर रेक्य मान ख्या जाय तो धमं मे एकत्व हौ सकता हे, किन्तु वृतीय- 
सद्‌ राव्यवच्छेद की प्रतीति तब भी द्योगी या नदीं यह नदीं कहा जा सकता 1 अल्कारकोस्तुभ- 
कार विच्वेदवर पण्डित ने भी इसी प्रकार का तकँ प्रस्तुत किया है । द्र अ० कौ० प° १७९ कान्य- 
माला रखेक ५ ) । 

पण्डितराज जगन्नाथ ने सर्व॑स्वकार के द्वयोः" इस विशेषण पर आक्षेप करते इए कहा कि 
वह्‌ न्यर्थं है । उन्होने कारण यह्‌ बताया है किं वाक््यमेद' दखब्द अपना लेने पर धयोः का 
कायै हो जाता है । ठीक भी है । किन्तु पण्डितराज यह नहीं सोच पाए कि द्वयोः सूत्र कांश. 
है ओर "वाक्यभेदः वृत्ति का । 


१०८ अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


पण्डितराज जगन्नाथ द्वार उपमैयोपमा का लक्षण इस प्रकार किया गया है- 
तृतीयस राव्यवच्छेदवुदधिफलकवणनविषयीमूतं 
परस्परसुपमानोपमेयमावमापन्नयोरथयोः सायं खन्दरसुपसेयोपस। । 

से पदार्था का सन्दर सद्क्य उपमेयोपमा द्योता है जो परस्पर मेँ देसे उपमानोपमेयभाव 

से युक्त दों जिसके वणन का फल त्रतीयसद शाव्यवच्छेद हो ।' 
वृत्ति द्वारा इसी का सष्टीकरण रर्न्टोने इस प्रकार किया दे--“एकेन धर्मेण एकंप्रतियोगिके 

परानुयागिके सादृदये निरूपिते अपरमप्रतियोगिकस्य एकानुयोगिकस्यापि तेन धर्मेण सादृ द्यस्य 
अथतः सिद्धतया शब्देन पुनस्तदुक्तिः स्वनैरथक्यपरिहाराय ठृतीयस्दृदा दाग्यवच्छेद माक्षिपति 

अधात्‌ षक हौ धमं के आधार पर किती एक पदार्थं का किसी दूसरे पदां म सादय 
बतला देने पर उसी धमै के आधार पर दूसरे पदार्थंकरा प्रथम पदाथ मँ सादय भी सवतः ही 
विदित ह्यो जाता है, तथापि उसे जो पुनः शब्दतः कहा जाता है बह अपनी निरर्थकता के परिहार 
के रिष दोनों से न्न वतीय सष्टदा के निराकरण का आक्षेप करता है। 

उपमेयोपमा में पण्डितराज ने जिस साधारणधर्मक्य पर वल दिया है उस्वी ओर पहिली 
वार अप्पयदीक्षित ते ध्यान दिया दे। चित्रमीमांसता मे उनका वाक्य दै--टकथर्माधयेण प र- 
स्परसाम्ये वण्य॑माने द्यनयीररिमिन्‌ विषये तृतीयः सव्रह्मचारी नास्तीति फलत्ति । कस्यचित्‌ 
केनचित्‌ साद्रये वर्णिते तस्याप्यन्येन सादृदयमर्थ॑सिद्धमपि मुखतो वण्य॑मानं तृतीय सड दाव्यव. 
च्छेदार्थं भवतीति दि तत्फलकत्वे बौजम्‌ 1" 

अथ वही हे जो पंडितराज के उपयुक्त वाक्य का है । 
इस प्रकार ठृतीयपद्खव्यवच्छंद कै किटि साधारणधमं कौ एकता भी उपमेयोपमा मे 
अपेक्षित हं । 

यहां एक बात यह ध्यान दैने की हं किं विमर्शिनीकार ने “कान्ताननस्य कमलस्य सुधाकरस्य, 


“यद जो उदाहरण दिया हं इसमरं दौ से अधिक पदार्थो का परस्पर में उपमानोपमयभाव है । 


फक्त: पण्डितराज का ठतीवस् शन्यवच्छेद' यदहं विशेषण लक्षण में अन्या्चि दोप लाता है । 
संजीविनौकार ने उपमेयोपमा का लक्षण कारिका में इस प्रकार प्रस्त॒त किया है- 
उपमानोपभयत्वव्यत्ययो न क्रमं विना । 
| उपमेयोपमा तेन वाक्यमेदैकगोचरा ॥? 
--उपमान ओर उपमेय मे परिवत्तंन हो विन्त उसमे क्रमका अभावन हौ तो वह्‌ उप- 


सेयोपमा होती दै । यह नियमतः भिन्न वाक्यो मेदी होती है। 


संजीविनीकार के अनुसार यदी विम्वप्रतिविम्बभाव नहीं होता । इसका कारण उन्हने वाक्य- 
भेद बतलाया हे । वाक्यभेद होन से विम्वप्रतिविम्बमाव का चमत्कार, उनकी दृष्टि से, पर्तत नहीं 
डो पाता। ‹ 
† ४५. 
| सवेस्व | 
 घ॒० १५ ] सदश्चान्भवाद्‌ वस्त्वन्तरदस्यृतिः स्मरणम्‌ ॥ 
वस्त्वन्तरं सद शमेव । अविन भावाभावात्नाचुमानम्‌ । यथा -- 

अतिद्चयितसुराखुरप्रभावं दिद्युमध्छोक्य तथेव तुस्यरूपम्‌ । 
कृरिकखतमखद्धिवां घमाये ध्रतघनुषं रघुनन्दनं स्मरामि ॥ 


+ ऋ 


स्मरणालङ्कारः १०९. 


सादय विनः त्‌ स्खछतिनोयमलकारः । यथा-- 

'अच्ायुगोदं खगयानिच्चलस्तरङ्गवातेन विनीतखेदः । 

रहस्त्वदुत्खङ्गनिषण्णसूध्ो स्मरामि वानीरगृहेषु ह्वः 11 

अन्न च कलठविद्येषणनां स्मतव्यद्शाभावित्ये स्मतदचाभावित्वम- 
समीखोनम्‌ । 

| सरू० १५ | समान [ वस्तु | के अनुभवसे दूसरी वस्तु की स्ष्टति स्मरण नामक 
अलंकार कहराती हे । 

[ द° ] दूसरी वस्तु अथात्‌ दूसरी सदृश वस्तु हो। यह अनुमान नदीं है क्योकि यहाँ 
व्यानि का अभाव हे । 

[ उत्तररामचरितमं सारथि सुमन्त्र ल्व को रक्षित कर चन्द्रकेतुं के मरति ] देव ओर दानवं 
क प्रभावसे मी अधिक प्रमाव वाले उन्दींसे [रामक ही समान |] रगीर वाले तथा हमारी 
सेना पर धनुष ताने हुए इस चिदु [ ख्व ] को देखकर स॒द्य पिद्वामित्र के यज्ञ के यिनादक राक्षसो 
को नष्ट वरने लिए धनुष खौचेहुर रामकरास्मरणहोरहादहं 

जो स्मरति साट्द्य के विना होती हे वह यह अल्कार नहीं बन पाती । यथा-- 

[ रघुवर मे पुष्पकारूढ राम की मगवती सीता से उक्ति] सुञ्चे स्मरणञआरहाहे कि गोदावरी 
के किनारे इसी पंचवरी में मृगया करके लौरता ओर कतं केवते इनधरों के एकान्त स्थान में 
तुम्हारी गोदमं सिर रखकर के करता था। उस समय गोदावरी की तरगों से शीतल 
पवन द्वारा मरौ थकावट दूर होती थी । 

यह एक [ आनुपरंगिक ] बात यह भी ध्यान देने योग्यदहै कि [मूलम स्मरण क्रिया कै] 
कत्ता वै जों विशेषण हैँ [ मृगयानिवृत्त, विनीतखेद, त्वदुत्संगनिषण्णमू्धा, सुप्त ] उन्हे 
उस ददाका विज्ञेषण बनाना चाहिए जिसका स्मरणकियाजा रहादै। अतः उन्हेजो स्मरण 
कत्ता का विद्ेषण बनाकर प्रस्तुत किया गया वह्‌ ठीक नदीं। 

 विमरिनी 

सद्देति । वस्त्वन्तरमिति स्मयंमाणस्‌ । सद्रामेवेत्ि। सादश्यस्योभयनिष्टत्वाव । 
अतश्च स्मयंमणेनानुभूयसानस्य, अचुभूयमानेन वा स्मयंभाणस्य सादश्यपरिकल्पनमय- 
मलरुकारः। 

यदुक्तम्‌- 
यथा दश्येन जनिता साम्यधीः स्मयंमाणगा । 
स्मर्यमाणकरताप्यस्ति तथेयं दश्यगामिनी ॥ इति । 

तत्रा्यः प्रकारो भन्थक्रदुद्‌ाहरणे । तत्र हि शिशोरेव रघुनन्दनेन सादृश्यं विवक्षितम्‌ \' 
द्वितीयस्तु यथा-- 

तस्यास्तीरे रचितशिखरः पेश्ञररिन्द्रनीरः कीडालेखः कनककदलीवेष्टनप्रक्तणीयः | 
मद्र हिन्याः प्रिय इति सखे चेतसा कातरेण प्रे च्योपान्तस्फुरिततडितं स्वां तमेव स्मरामि ॥ 
अघ्राचुमूयमानेन मेघेन स्मयमाणस्य कीडाशेरस्य सादश्यपरिकुल्पनम्‌ । एवं जाच्न 
सादश्यस्योमयसंबन्धेऽप्यनुभूयमानेनेव पुनः स्मयमाणप्रतीतिमवतीष्यवसेयम्‌ । 

ननु यदेवं तत्परस्मारपरप्रतिपत्तेः कि नेदमनुमानमिव्याश्चङ्कयाह-अविनामावेत्यादि ¦ 

अविनाभावस्तादाख्यानिनिव्यसाह चया द्वा । अचुभूयमानस्मयमाणयोश्च तदसावः। शिश्च- 


ह} 


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१.१० अलङ्ारसवंस्वम्‌ 


-रघुनन्द्‌नयोः खादृश्य परिककपने चातिशयितसुराषुरग्रभावस्वादिधर्मोऽनुगामितया 
निर्दिष्टः 1 वस्तप्रतिवस्तुवेनापि धघर्मस्यायं जवति । त्र शद्ध सामान्यरूपत्वेन यथा- 
सान्द्रां अदं यच्छते नन्दको वः सोङ्लासख्चमी पतिविम्बगर्भं 
कुवेन्नजखं यसयुनाप्रवाहस्रखीलरधास्मरणं सुरारेः ॥° 
अत्र खोर्लासखटीलत्वयोरेकव्वम्‌ ¦ विम्बप्रतिविभ्बभावेनापि यधा - 
"पू्न्दुना मेवल्वाङ्खितेन यां सद्धितां खुन्दरि वीक्तमाणः। 
विवाहहोमानल्धमख्ेखामिख्व्कपोखां भवतीं स्मरामि ॥* 
अत्र मेघर्वधूमरेखादीनां विभ्वप्रतिविश्वभावः 1 एतदे सादश्यनिनित्तव्वं द्यित 
प्रष्युदाहरत्ति-सद्रद्यमित्यादिना । दसददाञुभवामाउात्तस्स्तेनं सादश्यहे्‌ कत्वम्‌ । 
स्मतव्यद शाभावित्वं इति । स्मर्तव्यदद्या मा्रिव्वं वाच्यं सद्‌नादव्येव्यथैः ! अत एव वाच्य- 
स्याव चनम्‌ । स्मर्व॑दश्चाभाविस्वमित्यवाच्यस्य वचनयर। यद्यपि स्मर्वृदश्ायामतीतत्वाव 
कर्ठविशेषणानां द्टृगयानिच्त्तस्वादी नामप्यतीतकाखा वच्छिन्नानां तद्धाविष्ं तथापि 
व्तमानकालावच्छिन्नष्य स्मतुरविंशेषणसरावेनो पनिवन्धात्तपां तद्‌वच्छन्नतैव मतीयत 
इति यथोक्तमेव दूषणहयं युक्तसिति सहृदया एव प्रमाणच्‌ । 

सोति । वस्त्वन्तरम्‌ = दूसरी वसतु अर्था स्मयंमाण वस्तु । सदलमेवेति = सद दय = 
कर्याकि स्रद्य दोनों म रहता दे इसीलिए स्सय॑माण [ याद क्यिजा रहे) से अनुभूयमान का 
अथवा अनुभूयमान से स्मयेमाणका साष्रदय बौध होना यह अल्कार दे। जसा चि कडा डे 
धजिस प्रकार य्य = दिखाई दे रही वस्तु से उत्पन्न साम्यन्नान म स्मयंमाण तस्तु मां वषय वृनतीदह 
उसी प्रकार स्मयंमाण वस्तु से उत्पन्न इस [ साम्यज्ञान | प दद्य वस्तु (९2) इनत से प्रथम 
प्रकार [ इदयसाम्य का स्मर्यमाण तक पर्टुचना ] अन्धकार द्वारा प्रस्ठुत उदाहरण से स्पष्ट ैँ। 
वहा शिश्यु (च्व) काराम से साटृद्य विवक्षित दं। दूसरा प्रकार [ मेषदूत के ] रस पद्य 
मे दे-- 

4 मेर सवन मे बनी ] उस [ वापी | के तट पर छवण्कदटी को वृति [ घेरे ] से अभिक दद्ध 
नीय ओर ल भावने इन्द्रनीर खण्ड। से राचत दिखर का क्रोडा इ । वह मेरी गेहिनी [ =ठेठ 
घरवाली, यक्षी ] को प्रियदहै। इसलिए दहे मित्र [ मैव | आसपास चमकी बिजली से युक्त॒तम्दे 
देखकर कातर चित्त सेमं उसीका स्मरण कर्‌ रहा 

यहाँ अनुभूयमान मेव से स्मर्यमाण क्रीडायीर का साद्य वतलया गया हे । 

यहाँ साद्रदय का सम्बन्ध दोनों के साथ रहने पर भा मानना यृहौ टक हे अनुभूयमान 
से ही स्मर्यमाण का [ सादृद्य ] वोधदहोतादहं। 

य॒दि रेसा दै तो भिन्न पदाथ से भिन्न पदाथैका ज्ञान होने के कारण इसे अनुमान वयौ न 


माना जाय। इस शंका प्र उत्तर देते दै--“जअविनामावः ' = व्याप्ति । अविनाभाव = पृथक्‌ 
वृथक्‌ न रहना, या तो तादात्म्य से दोता दै या निव्यसाहचयं से । अनुभूयमान भौर स्मर्यमाण 


मे ये ( तादात्य या साहचर्यं ) नदीं रहते । ९ 
चिद्य ओर रघुनन्दन मं जो साद्रदय की कपना दे उसमे -अतिश्यितखरारप्रभावत्वः आदि 
धर्म अनुगामी [समानरूप से उभयनिष्ठ] रूप से निर्दिष्ट हे, र्विन्तु यह धम के वस्तुप्रतिवस्तुभावापन्न 


होने पर मी होता है) उससे भी शद सामान्यरूप वस्वप्रतिवस्तुभाव यथा -- 


नन्दक [ भगवान्‌ विष्णु का खडग ] आपको घना आनन्द प्रदान करे, जिसके बीच उछास- 


-युक्त “ लक्ष्मी का प्रतिविभ्ब पडता हँ तो विष्णु भगवान्‌ को यसुना प्रवाह में रीरुक्त राधिकाजी 


[६.२ {9 क ` = 


स्मरणाट्ङ्कारः । १९१९१ 


का मरण आ जाता है। [ विक्रमाकदेव चरित मङ्गलपय ]। यद्य सोल्छासत्व मौर सलीर्त्व 
कं ही हं । विम्वप्रतिविम्बभाव के साथ भमी यह होता है। यथा- ेषखण्ड ते अंवित पर्णेन्द से 
चयो [ अन्तरीक्ष | को मुद्रित देख रहाहुतोहे खन्दरि ! विवाददोमाभ्नि की धूमक्ेखा से स्पृष्ट 
कपा वाखा वुम्हारा स्मरण कारहादह्‌ ¦?) य्ह मेघखण्ड ओर घूमरेखा आदि का विम्ब- 
प्रतिविन्वभाव ठे [ वस्ततः रव ओर लेखा मे वस्तुप्रत्िवस्तुत्व ही है क्योकि दोनों वस्तुतः एकं है ] । 

सा्व्यनिमित्तता को दृढ करने के किट इसी [ स्मरण ] का प्रत्युदाहरण देते है-सादश्यम्‌ 
[ इस अत्रनुगोदं प्य में ] सद्ृशवस्तु का अनुभव नदीं है, अतः उसकी स्यति साददय जनित 
नहीं है । | 

स्मत्तभ्यद शाभावि अथात्‌ ( विशेषणा को ) स्मरण की जा रही दशा कै विदेषणरूप से 
प्रस्तुत करना उचित था । तेसा नहं किया । इसीलिए वाच्यावचन नामक दोष इं | [ वाच्या- 
वचन के किए द्रष्टव्य ग्यक्तिविवेकं विमद्ौ-२, पृष्ठ-३८७ दन्द अनुवाद ] स्मर्ठंदशा ॐ धिरोषण- 
रूप से प्रस्तुत किया इससे अवाच्यवचन दोष हुआ [ अवाच्यवचन के लिए द्रष्टव्य व्यक्तिचिवेक 
वेमद्-२ ए० ४३६ हि. अ- | यथपि स्मरणकन्तां ¡ राम ] की दद्या [ गोद मे सिर रखकर सोना 
आदि । | वीती दां ह अतः [ स्मरण ] कतां के मृगय निघ्रत्तत्व आदि सभी विदोषण भी वीते 
समय अथात्‌ भूतकारू के ही हे, अतः इलोक मेँ भी न्ह वेसा हः बतलाया जाना चाहिए धा, किन्त 
[ उन्हे स्मरणक्त्त कौ दद्या का विरोषण न बनाकर स्मरणकर्तांका ही विरेषण बनाया गया है 
आर |] स्मरणकन्तां अतीतकार का नहीं, वत्तंमानकाल काही है। अतः उसके विदेषणों मै मी 
वत्तेमानकाल्िकिता प्रतीत होती है । फलतः [ हमारी दृष्टि से] वाच्यावचन तथा अवाच्यवचन 
दोनों दोष यहो ठीक ही है । आने इस विषय मे सहृदय ह्य प्रमाण है । 


[ सवस्व ] 


प्रेयोलृंकारस्य तु सादश्यव्यतिरिक्तनिभितोच्थापिता स्स्रतिर्विंषयः। 
यथा अहो कोपेऽपि कान्तं सुखम्‌ इति । तज्ापि विभावादययागूरितत्येन 
स्वरब्द्‌माचप्रतिषपा्यत्वे यथा --“अचायुगोदम्‌' इत्यादि ¦ 
"येर्ट्टोऽ शि तदा छलाडपत्तितभासदार, युधि ५. 
स्फोताखक्ति पारल्ीरूतपुरोभागः परान्‌ पातयन्‌ । 
तेषा दुःसशकमदेहद्‌हनश्रो तस नटः 
ञ्काखाटीभस्मास्वरे स्मररिगाधस्त गतं कौतुकम्‌ ॥' 


इत्यादौ सदच्रवस्त्वन्तरालुभवेऽशक्यवस्त्वन्तरकरणात्मा विशेषाः 
खकारः, करणस्य क्रियासामान्यात्पनो दरनैऽपि संभवात्‌ । मतान्तरे काञ्य- 
छिङ्गमेवत्‌ । तदेते सारश्चयाश्चरयेण भेदपिदवुस्यत्वेनाटंकासय निर्णीतः | 

[ इत्ति | प्रेयोख्कार का मिषय वह्‌ स्खृति ह जो साष्रदय से भिन्न कारण से उत्पन्न होती हे। 
यथा--अहो, कौप म मी मुख कमनीय था। किन्तु [ साद्ृद्येतरनिभित्त से उत्पन्न होने पर | 
उस [ स्यति | म॑ पिमावादि द्वारा व्य्यता रहनी चाहिए । केवर [ स्मरण आदि ] स्व [ वाचक || 
> धमातर से कह देना मात्र नर्दः जसा पि “अत्रालुगोदम्‌” आदि मे कहा गया है ] 


अनच्छः ` ऊ "क कक = कक  - =" ` क ककं क "अ ब्व = = = अ अ शाका 


११२ . अङ्ारसवेस्वम्‌ 


युद्ध नँ आपके भाक पर माले का प्रहार पड़ा । उससे वह पड़े पर्याप्त रक्त प्रवाह से आपका 
अगला भाग राक हो गया । उस समयमी युद्ध में [ एक नहीं ] अनेक दात्रओं को टहाते हृ 
आप जिस किसीकौ भी दिखाई दिए उसका दुःसह कामद्ारीर कौ जलने के लिए भयंकरता कै 
के साथ उद्भूत नैव्राग्नि की ज्वाखादटी सुदाय से जगमगाते कामान्तक भगवान्‌ ङाकर कै 
विषय संजा कौतूहल था वह रान्त हो गया । 

इत्यादि स्थखाम( स्व | भिन्ने [ किन्तु स्वः | समान किसी वस्तु के अनुभव से अन्य अया 
वस्तु काजोनिमाणदहे तद्रप विदेषारुकार ह। क्योकि निमांण = अर्थात्‌ करना [ विज्ञेषालं 
के क्षण मं करना ही उपात्त ] एक सामान्य क्रिया [ जसे भू ओर अस्‌ ] दै अतः वह दशेनस्वरूप 
भी मानाजा सकतादहं। दूसरे मत में यह काव्यलिनि द । 

तो इस प्रकार सा्टरयमूल्क किन्तु भेद ओर अमेद्‌ चनं को वरवरी से दोने वा अलंकार 
करा [ छक्षण ] निणेय किया गया । 

विमदिनी 

परव्युदाहरणान्तरमपि दश्ंयति-प्रेयोकंकारस्येत्यादिना । तुश्छब्दुश्चार्थं ¦ सादरय व्य ति- 
रिक्तं संस्कारादिनिमित्तम्‌ । तत्रापीति । एवं स्थितेऽपि सतीस्यर्थः । विभावाद्यामूरितस्वे 
प्रेयोखंकारस्य सखदश्यञ्यतिरिक्तनिमित्ततोच्थापिता स्डति्विंवयो न स्वाब्दमाच्प्रति- 
पाद्यत्वे स्द्रतिविषय इति संबन्धः । तत्र विभावाचागृरितव्वे स्द्धतियंथा--'अहो कोपेऽपि 
कान्तं सुखम्‌" इति) स्वश्ब्दसात्रप्रतिपाद्यव्वे यथोदृाहृतसम्‌ “अत्राचुगोद्‌म्‌-इव्यादौ | 
अन्रच यथा प्रेयोटंकारो मावध्वनेश्वास्य यथा सिन्नविवयस्वं ठदथाद्र एव वच्यासः। 
एवं च प्रत्युदाहरणद्रयस्यापि प्रयोजनं भिद्नवि बयत्वात्‌ 

कचि सादश्यनिमित्तापि स्यरतिरवाक्यार्थस्वाद्नास्मिन्पं बस्य तीव्याह--- यदृ ष्टोऽसि- 
इत्यादि । वस्त्वत्र जयापीडदशोनम्‌ । वस्त्वन्तरं सु जगवल्लत्तणमर्‌ । अच्र सवदशनमभिरषतां 
जनानां न स्वदशेनावा्षिरेवाभूयावत्तषाससं भाग्यं अगव्द्दशंनमपि जातमित्यश्चक्य- 
वस्त्वन्तरकरणम्‌ । 

विरोषारंकारस्य द्य्क्यवस्स्वन्तरकरणं रूपम्‌, इह पुनरडाक्यवस्त्वन्तरदरंनं स्थित- 
मिति कथमत्र वि्ोबाककार इत्याशङ्कखाह--करणस्येत्यादि । एतच्च गस्यगमकमभाव- 
माश्रिव्यान्यंः काग्यलिङ्गस्वेनाभ्युपगतमिति दरयितुमाह-मतान्तर इत्यादि । एतदिति 
स्मरणम्‌ । मतान्तर इव्योद्धटे । यदटुक्तम्‌- 

श्ुतमेकं यदन्यत्र स्खरतेरचुभवस्य वा। 
ठेततां प्रतिपद्येत कान्यलिङ्ग' तदुच्यते ॥› इति । 

इह पुनग॑म्यगमकभावादनुभूयमानस्मयंमाणन्यवहारोऽपि विज्ञिष्यत इति पथ्गदल- 
कारतयेतदुक्तम्‌ । एतदु पसंहरज्नन्यदवतारयति--तदेत इत्यादि । एत ॒दइर्युपमाद्याश्च- 
स्वारोऽखं शराः । । 

दूसरा प्रव्युदादरण भी वतरते हैँ -- प्रेयोकार इत्यादि । व॒दाब्द श्वः ब्द के अर्थ= 
[ भर या समुच्चय ] मे प्रयुक्त रै । सादय भिन्न अर्थात्‌ संस्कारादि जनित। तन्नापि रेसा 
होने पर भी [ प्रयोलकारस्य ~ स्वदाब्दप्रतिपायत्वे ] इतने ग्रन्थ का अथं इस प्रकार है-- विभावादि 
से व्यंग्य होकर यदि स्मृति साद्रदयातिरिक्त निमित्त से इदंहोतो प्रेयोरुकार बनती है, न कि 
केवलं स्मरामि, स्मरति, स्मरणं आदि स्मृतिवाचक शाब्दा द्वारा उसके उच्लेखमात्र से । इनमें 


स्मरणालङ्गरः ११३ 


से विभावानुभावनव्यभिचारी से व्यंग्य स्छृति का उदाहरण दिया अहो कोपमें भी सुख की कमनी. 
यताः” । स्वब्दमात्रप्रतिषायता का उदाहरण दिया--“अव्रानुगोदम्‌"-- यहां शन [ दोनो मंसे 
प्रथम |] में प्रेयोंकार ओर मावध्वनि जिस प्रकार ह यह आगे चलकर बतलाेगे । इस प्रकार जो दो 
प्रत्युदाहरण दिये उन दोनों के विषय भिन्न भिन्न हे [नदीं तो एक ही मल्युदाहरण पर्याप्त होता ] । 

कीं कहीं स्ति साट रयमूलक होकर भी वाक्या्थरूप न होने के कारण स्मरणारुकार नहीं 
वनती । इसी के किए उदाहरण दिया = येद््टोऽसि । यदहौँ वस्तु है जयापीड का दर्चन, वस्त्वन्तर 
हे भगवान्‌ रिवरूप । यहो, तुम्हारा दन चाहने वारे व्यक्तियों को केवल तम्हारे ही दशेनका 
लाम नदीं हज, अपितु जो सवधा असंमव था वह भगवान्‌ शिव का ददन भी हयो गया। इस 
प्रकार अशाक्यवस्त्वन्तरकरण [ अन्य अराक्य वस्तुकाकर देना=वना देना] यँ इ [जो 
वि्ञेषाल्कार का लक्षण हे । ] 

विशेषपालंकार जो है वह अदाक्यवस्त्वन्तरकरणरूप दै, ओर यदो ( “यैढृ्टोऽसि” पर्य मेँ ) 
हे अराक्यवर्त्वन्तर ददन ॥ अतः यहाँ विशेषालंकार केसे है इस राका पर ङिखिते है- "करणस्य । 
यहां गम्यगमकभाव मानकर कु आचायों ने काव्यङ्गि माना है । इस बात को बतलाने के किए 


` कदा-मतान्तर' इति । एतत्‌ = यह = अथात्‌ स्मरण । मतान्तरे = अर्थात्‌ उद्भट के मत मे, जेसा 


कि का दै एक सनी वस्तु-यदि स्द्ति या अनुभव कादहेतु वने तो उत्ते काव्यङ्गि कहा जाता 
दे" [ उद्भट, कान्या. सा. सं. ६।७ ] 
यहो गम्यगमकमाव से अनुभूयमान ओर स्मयेमाण का व्यवहार सी भिशेषता को प्राप्त होता 
हे, इसङछिए इसे अलग अलुंकाररूप से कहा । | 
अव इसका उपसंहार करते ह अन्व अलंकार की प्रस्तावना करते है तदेतद्‌ इति । एते = 
ये अर्थात्‌ उपमा आदि [ अनन्वय, उपमेयोपमा ओर स्मरण ] चार अलंकार । 
विमश्चेः-- करण ओर दरोन" की अभिन्नता प्र संजीविनीकार ने अपनी प्रयोगदीपिका मं 
निम्नङ्िखित विवेचन किया है- 
"तेऽस्त्यथां धातवो हेया य॒ उदासीनकत्तं काः । 
विकुर्वांणप्रयुजानकतका भूक्रजथकाः ॥ 


“जिनके कतां उदासीन रहते हैः वे धादे अस्ति धातु के अथंकी होती हे, जिनके कन्तां विक्रति 
को प्राप्त होते हं वे भूधात॒ के अधे की ओर जिनके कत्ता पयोग मेँ आते है वे छात के अथं की होती 
दं ।' इराधातु का कत्त प्रयुक्त होता दै अतः यह्‌ कृधातु [ करण रान्द की प्रकृति ] से अभिन्न 
अथवाली है । 

उदासीन = जिसका प्रयोग अनिवाय॑न हो । विकृति को प्राप्त = मवस्थाभेदं को प्राप्त । 
प्रयुजान-- जिसका प्रयोग अवदय हय किया जाय । 

येद्टृष्टोऽसि" पय मे स्मरणालंकार न होने पर संजीविनीकार का स्पष्टीकरण इस प्रकार है- 

अत्र योऽयं सटरवरत्वन्तराल॒भवो ये्ष्ठोऽसीति निर्दिष्टः नासौ स्मररिपुस्मरणजननात्‌ स्मरणा. 
खकारः किन्तु अाक्यस्मररिपुदशनकोव॒कास्तमयरूपा्थान्तरकरणात्मा धिरेषालंकारः । एतदूदद- 
नेन तदपि सिद्धमिति प्रतीतेः । 

यह जो यह ॒सद्ररावस्तवन्तर का निदेश “यैकुष्टोऽक्ि” इस प्रकार किया गया है यह 
स्मरणारंकार नहं हे यचि उससे स्मरणीय ८ रंक ) रूपी वस्त्वन्तर का स्मरण ह्येता है, अपितु 

टका ९ ५ ५ ४ 
यद्‌ विरेषांकररूप है, क्योंकि याँ अदाक्य जो शंकर दन कै वौठक का शमनरूप दूसरी वस्त 


< अ० स० 


१९७ अलङ्कारसवंस्वम्‌ 


हे उसका किया जाना वतलया जा रहा है जो विदषारंकार रूप दे । क्योकि यहां “इसके दीखने मं 
वह भी सिद्ध हो गया देसी प्रतीति होती हं । 
संजीविनीकार ने स्मरणालंकार का विवेचन कारिकारूप में इस प्रकार प्रस्त॒त किया दै- 
“स्मृतिः सा स्मयते यत्र सद्दात्‌ सष्द्ान्तरम्‌ । 
असादृद्यादवाच्यत्वादितः प्रेयान्‌ विभियते ॥"" 
८उते स्मरणालुंकार कहते हैँ जिसमे समान वस्तु से समान वस्तु का स्मरण किया जाय । 
परेयोऽुकार भाव की अप्रधान व्यंजनाका नामदहै। भावम जिस प्रकार रतिनामक भाव 
प्रेयोऽल्कार बनता है उसी प्रकार स्मरतिनामक भाव भी वन सकता हे; फिर स्मरति को प्रेयोऽलंकार 
न मानकर स्मरणाल्कार क्यो माना गया इसका उत्तर भी संजौविनीकार ने उक्त कारिका कै 
उत्तराधं मं इस प्रकार दिया हे- 
इसते प्रेयोककार इसरिए भिन्न दो जातादहै कि व्दनतो स्रदयमूल्क होता ओर न 
वाच्य दही। 
स्मरणालंकार पर पूवैवत्ता आचार्यं मामह, वामनः उद्धर तथा रद्र ने इस अल्कार का 
विवेचन नदीं विया है । इन आचार्यो ने कदाचित्‌ स्मृतिं कोभो भावार्कार मानादहे इसीचिए 
ग्रन्थकार ने उसका पक्ष उठाया ओर अन्तर किया हे । 


मम्भर = “यथानुभवमर्थस्य दृष्टे तत्सदृद्चे स्पतिः स्मरणम्‌? सदर वस्तु के दिखाई देने पर 
अनुमव के अनुरूप सदश वस्तु कौ स्मृति स्मरणालकार । 

उदाहरण = पूर्णेन्दुना मेष ०० इत्यादि प्च जो विमर्िनौ मेँ उद्घरृत है । 

स्मरणांकार, मावध्वनि प्रेयान्‌ नामक भावाकंकार तथा स्णृततिमात्र मं अन्तर दिखलति इए 
पण्डितराज ने छिखा है- 

अयं चाटंकारिकाणां संप्रदायो यत्‌ साढृद्यमूलकत्वे स्मरण निदशोनादिवद ककारः, तस्याभावे 
वयंग्यतायां मावः, तयोरमावे तु वस्तुमात्रम्‌ । भावस्य हि भावादङ्गतायां प्र योऽलङ्कार त्वम्‌ । 

अर्थात्‌ आल्कारिक आचार्यौ का यद सवमान्य सिद्धान्त है कि स्प्त्ति यदि साट्श्यमूलक 
होती है तो निदर्नादि के समान अल्कार होती हेः यदि नदीं [ साद्र्यमूलक नहीं होतीं | 

त॒ यदि व्यम्य होती दै तो वह माव कदलाती हे । यदि साद्द्यमूलक ओर व्यंग्य दोनों नीं 
होती तो वस्तुमात्र कदकातौ दै । प्रेयोलंकार वह माव होता दै जो भावादि का अंग वनकर 
आता हे । 

पण्डितराज जगन्नाथ ने प्रेयोऽलङ्कार ओर स्मरणाऽल्कार पर जो अन्तर अलकारसवस्वकार 
ने प्रस्त कियादहे उसे प्रामाणिक मानादहं ओर अप्पस्यदीक्षित के खण्डन में उसे सक्ष्य- 
रूप से प्रस्तुत किया द। स्मरणाल्कार के रक्षण म उन्दानि न केवर सव॑स्वकार अपितु 
रत्नाकरकार का भी खण्डन किया है । अनका कहना हं कि स्मरणारुकार की 
व्यापि उस स्मृति तक मी है जिसका स्मर स्मयेमाण सदश वस्तु से दोता हे । 


उदाहरण के रूप मेँ उन्होने अपना यह परय प्रस्तुत किया ह-- 
(सन्त्येवास्मिन्‌ जगति वहवः पक्षिणो रम्यरूपा- 
स्तेषां मध्ये मम त महती वास्षना चातकेषु । 
यैरध्यक्षैरथ निजसखं नीरदं स्मारयद्धिः 
स्मृत्यारूढं मवति किमपि बह्म करष्णामिधानम्‌ ॥ 


रूप काटड्ारः १९५ 


-- इस संसार में बहुत से सुन्दर सन्दर पक्षी हे किन्तु चातक उनमें सुञ्चे सर्वाधिक भिय हे, 
अरयोकि उं देखते दी स्मरण आ जाता है उनके मित्र मेधो का ओर उनते स्मृतिमे आजाता 
दे काडं एक कृष्ण नामक ब्रह्म यहाँ [ कृष्ण सड ] चातक इरा सम्बन्धित्वेन स्म्य॑माण है । उससे 
स्वसद्दा श्रीकृष्ण का स्मरण सड्दय द्वारा होता है। पण्डितराज का कहना है कि “सदशानुभवः 
राव्द कै स्थान पर यां 'सट्राज्ञानः--चब्द अधिक उपयुक्त है। इसते उपयुक्त स्थ में मौ रक्षण 
संगत हो सकता है । मेव का अनुभव भलेहीनदहो ज्ञान अवदय हो रहा है। 

पण्डितराज ने स्वयं इसका लक्षण इस प्रकार किया है- 

“साद्‌ रयनज्ञानोदवुदसस्कार प्रयोज्य स्मरणं स्मरणालङ्कारः । 

'सादृस्यज्ञान से जागे सर्कार से जनित स्मरण स्मरणालङ्कार कहराता हे ।* पण्डितराज 
जगन्नाथ के आरोचक विदवेश्वर पण्डित ने अपने अलंकारकोस्तुभ में पण्डितराज के उपयुक्त 
संदोधन को अक्षरशः स्वीकार किया है- 


(सट राज्ञानोदवुद्धसस्कारमवा स्तिः स्मरणम्‌ अनुभवे व्यभिचारवारणाय भवान्तं ॒ज्ञान- 
विदोषणम्‌ । उदूबोधकान्तरसमवधानजन्यस्मरणवारणाय सद्राज्ञानेति । ज्ञानपदं च स्प्रत्यनुभवो- 
भयसाधारणम्‌ । अतः स्मरणस्येवोद्बोधकत्वस्थके नाव्यािः । 


अव अमेदप्राधान्य से होने वाठे अलंकार कहे जा रहे है-- 
[ सवंस्व ] 
[ छ १६] अभेदप्राधान्ये आरोपे आरोपविषयानपहवरे 


रूपकम्‌ । 
अभेदस्य प्राघान्याद्धेदस्य वस्ततः सद्धावः। अन्यत्रान्यावाप आरोपः। 
तस्य विषयविषस्यवष्टन्धत्वाद्धिषयस्यापहवेऽपहुतिः । अन्यथा तु विषयिणा 
विषयस्य रूपवतः करणादपकम्‌ । साधम्यं त्वजुगतमेव । यदाहु :--'उपमेव 
तियोभूतभेदा रूपकमिष्यते इति आरोपादभेदेऽध्यवसायः प्रकृष्यते इति 
पश्ात्तनमूल्ाठकारविभागः । 
[ सू° १६ | अभेद्‌ की प्रधानता होने पर आरोप दो किन्तु आरोपविषय चपा न 
होतो रूपक [ होता हे || 
[ व° | अभेद कौ प्रधानता कहने का अथंहेकि इसत अलंकारमे मेदकामी अस्तित्व रहता 
हे । आरोप कहकराता हे दूसरे पर दूसरे का आवाप [ अध्यास, थोपना ]। वह [ आरोप ] विषय 
ओर विषयौ से वेधा रहता है। तव यद्धि विषय [ जिस पर आरोप करियाजातादै] चषा दिया 
जाय [ शब्दतः न कडा जाय | तो अपहुति अलकार होता है। अन्यथा [ यदि विषय चछिपायान 
जाय उसे शब्दतः कहा जाए तो ] रूपक होता है । क्योकि तव विषय विषयो के द्वारा [ उसके ] 


रूप से युक्त बनाया जाता दे । [ क्योकि यह्‌ अलकार सधम्यमूलक अल्काो के सन्द मे बतलाया 


जा रहा हे इसलिए ] साधम्यं तो [ इस अल्कार मं प्रकरणसे ही ] चला आताहे। जसा कि 
कहा हे-“उपमा दी मेद को छिपाकर रूपक मानो जाती है'"-[ दण्डी काव्यादर्च--२।६६ | 
अभेद मं आरोप कौ अपेक्षा अध्यवसाय अविक उल्कृष्ट होता है, इसछिए तन्मूलक [अध्यवसायः 


मूलक] अल्कारो का विभाजन वाद्‌ में किया जायगा । 


-९१द अचङ्कारसवंस्वम्‌ 


विमरिनी 

संप्रतीति । मदामेदतुस्यत्वाश्रयारुंकारानन्तरममेद प्रधान खत्तयितुस्ुचितव्वाद्‌वसर- 
म्राप्ताविव्यर्थः 1 तच्र तावस्प्रथमं रूपकं रुक्षयति--अभेदप्राधान्य इत्यादि । वस्तृत इति । नु 
भ्रतीतितः। सद्धाव इति । प्रधानाप्रधानयोः संबन्धिराब्दत्वात्‌ । अन्यत्रान्यावाप आरोप 
इति । अन्यत्रेति प्रकृते सुखादौ । अन्यस्येव्यग्रक्ृतस्य चन्द्वादेः । स च सामानाधिकरण्येन 
वेयाधिकरण्येन च निर्दयो भवति। न तु सामानाधिकरण्येन निदेश एव सः। एवं हि- 
ध्याताः कणादतां केचित्‌? इत्यादावारोपसखद्धवेऽपि न सामानाधिकरण्य मस्तीत्यव्याप्षिः 
स्यात्‌ । आथ सामानाधिकरण्यमस्तीति नाव्याप्तिरिति चेत्‌, न 1 भिन्नयोः सामानाधिक- 
रण्येन निदो [ अ० र० सृ० २६ ] द्यारोपरक्तणम्‌ । न च तदुत्र निदिषटमर्‌  वेयधिकरण्येन 


, निर्देशात्तस्यार्थावसेयत्वात्‌। अर्थावसायो निर्दशश्च नेकं रूपम्‌ 1 विप्रतिषेधात्‌ । नीरक- 


मुस्पलमिस्यादाव पि गुणजातिरूपत्वेन भिन्नयो नीरोर्पख्योः सामानाधिकरण्येन निदंशाद्‌ा- 


रोपः प्रसज्यत इव्यतिभ्यास्िः स्यात्‌ 1 न चारोपे भिन्नयोः सामानाधिकरण्येन निर्देश 


उच्यत इत्यसंमवोऽपि । इति न निरवद्यमेतद्‌ारोपकन्तणम्‌ । ययेवं ततक शब्दे राठ्दान्तर- 
मर्थ वार्थान्तरमारोप्यत इति चेद्‌ ब्रमः। त्र न शब्दे शब्दान्तरारोपः । सुखशब्दादेश्चन्द्र- 
शब्दादिरूपस्वेनाग्रतीतेरन्योन्यवि विक्तस्वविश्रान्तरूपो परम्भादिति भवद्धिरेवोक्तस्वात्‌ । 
किं ववर्थेऽर्थान्तरारोपः। स च म्रयोजनपरतया तथा निर्दिश्यते न आान्व्या। अतएव 
शुक्तिकायामिव रजतारोपो न सुखे चन्द्वारोपः। तस्य स्वरसत एवोस्थानेन अ्रमरूप- 
त्वात्‌ । अत एव तत्रारोपविषयस्यारोप्यमाणेनाच्छादि तव्वेन प्रतीतिः । इह पुनर्जानान षटुव 
कश्चिचन्द्विविक्तं खं तन्र प्रयोजनपरतया चन्द्राथंमारोपयति । अत एबोक्तमारोपविषः 
यानपहव इति । भवद्धिरप्यनेनेवाडायेन श्रतिपाद नश्रमोऽगय्रं न आन्ता प्रतिपत्तिरिव्या- 
दय॒क्तम्‌ । तस्येष्यारोपस्य विषयः प्रकृतः विषयी चाग्रक्रृतः । ताभ्यामव््टन्पल्वं युक्तत्व म्‌ । 
यदुक्तम्‌-“सारोपान्या तु यन्नोक्तौ विवयी विषयस्तथा' इति । 

संप्रति अर्थात्‌ मेदामेद की तल्यता वाले अलंकारो के निरूपण के पश्चात्‌ अभेद प्रधान अकंकारं 
का रक्ष्य करना उचित होने के कारण अवसर आ जाने परर । उनमें पहले रूपक का लक्षण करते 
है-- अभेद प्राधान्य इत्यादि । वस्तुतः वास्तविक रूप से न कि केवल प्रतीतिमात्र से। सद्‌भाव 
इसलिए कि प्रधान ओर अप्रधान सम्बन्धिवाचक चाव्द ह । अन्यत्रान्यावाप आरोप अन्यत्र = 
दूसरे मै अधात्‌ सुखे आदि प्रकृत वस्तुओ मे । अन्यस्य = दूसरे का अथात्‌ चन्द्र आदि 
अप्रक्रेत वस्तुओं का । 

यह आरोप दोनों ही प्रकार के निर्दा से दीता है सामनाधिकारण्यपूदक [सामानाधिकरण्य] 
उपमानोपमेय या विषय विषयी के एक ही विभक्ति मे रदने से ओर वेयधिकरण्यपू्वैक [ त्रैयध- 
करण्यं ] = उनवौ भिन्न-भित्न विभक्तियों मे रहने से एेसा नदीं कि केवर सामानाधिकरण्यपूवैक दी 
निर्देश से यद हो [ जैसा कि अलंकाररत्नाकरकार ने माना ]। ठेसा मानने पर [कि केवल 
सामानाधिकरण्य मदी आरोप होता दै] “कुछ लोग कणादता को प्राप्त हए इत्यादि मै आरोप 
रहने पर भी सामानाधिकरण्य न होने सै [ आरोपका लक्षण कामू नहीं होग। फलतः ] अव्याभि 
दोप आवेगा । “अर्थगत सामानाधिकरण्य [ एकोाथकल्व | यदा दे दी अतः अन्याधि नहीं होतीः 
य॒दि टेसा कदै यदह भी टाक नदी, क्योकि [ जपने अल्कारत्नाकर मं] आरोपका रूप ही 
भिन्न-सिन्न अर्थौ का सामानाधिकरण्यपूचक [ एकं विभक्ति के साथ] निरं [ बतखाया ] दे । वरद 
 [ सामानाधिकरण्य ] यह [ कणादतां केचित्‌ = कु कगादता को प्राप्तहएमें ] निदिष्ट नहीं हं। 


वा वा =+) क ऋणो व 


८ ॥ 


१ >+ 
ह ~ क्वे "क अका चाक = कः ` चतः = - ` काः "र कत ` क क" 


(* 


रूपकाट्द्धारः १९७ 


वेययिकरण्यपूवेक निदेश होने पर उपस्त [ सामानाधिकरण्य ] का ज्ञान अथतः होता है! अथतः 


ज्ञान होना गर [ चाब्दतः ] ये दोनों एक नदीं हैः । क्योकि इनमे परस्पर विरोध है । 

[ आपके आरोप लक्षण के अनन्तर ] “नीलर उत्प इत्यादि [ विदशेष्यविशेषणभाव के 
स्थल। | मे भी आरोप मानना होया क्योकि यहाँ एक [ नीक ] गुणरूप है ओर दूसरा [ उत्पर्‌ ] 
जातिरूप ह, अतः दोनों भिन्न हे ओर दोनों का सामानाधिकरण्यपूवंक रब्दतः निर्दे मी है! 
इस प्रकार यहा [ज। किंञआरोापका स्थल नहींहैञरोपका लक्षण रगृ होगा अतः ] अतिन्याक्षि 
दोष होगा। आरोप मे सिन्न-मिन्न वस्तु का [ सामानाधिकरण्य तो राब्दतः कथित रहता हे 
पर उनका | सामानाधिकरण्यपृवेक निदेरा शब्दतः कथित नदीं रहता [ किस्त भी आरोपमें आरोप 
लक्षण लागू नहीं होता | अतः अक्तभव [ नामक दोष] भौ[आरोप लक्षण मेंहोगा]। इस 
प्रकार आरोप का [ अल्काररत्नाकर मे ] उक्त लक्षण निर्दोष नहीं है । 

यदि पेसादहैतो क्याशव्द पर दूसरे शब्द काञआरोप दोताहै या अधं पर दूसरे अथं 
का? यदिरेसा पृते तो छनि हम कहते है--दाब्द पर शब्द का आरोप नदीं होता 
क्या॑कि रूपकः या आरोप एेसी प्रतीति नहीं होती कि सुख आदि चान्द चन्द्र आदि शब्द रूपहें। 
उन [ छब्दा | को प्रतीति एकदम पृथक्‌-पृथक्‌ रूप से होती है ओर वे अपने आप तक्‌ ही सीमित 
ह । यदह आपने ही स्वयं कदा हे । आरोप अथं पर अथं कादोता है। ओर वह फिसी प्रयोजन 
से होता हे जान्ति से नहीं । इसीचिए सुख पर चन्द्र काआरोप सीप पर चोँदीके आसेपजेसा 
नही होता । क्योकि वह सीपपर चोधीका आरोप स्वभावतः होता है अतः उसे कदा भी, 
भ्रम जाताहं। इसीलिए यहो [ सीप ओर चाँदी मे ] आरोपविषयीभूत वस्तु [ सीप ] आरोप्य 
माण [ चांदी | से आच्छादित प्रतीत होता दहै। यहां [ मुखचन्द्र आदि स्थर्लोमें] तो कोईभी 
व्यक्ति जानते हृए कि सुख चन्द्र से भिन्नहे उस [ सुख] पर प्रयोजनविशेष से चन्द्ररूपी अर्थं 
का आरोपकरता हे। इसीकिट कहा कि आरोप विषय का अनपहव = प्रकरत्व, राब्दतः कथन 
रहना चाहिए । आप [ श्ोभाकरमित्र अर्थात्‌ अलंकाररत्नाकरकार] ने भी इसी आय 
से-- “यहं प्रतिपादन काञ्नमहेकि प्रतीति श्रान्तिपूणै है” ठेसा कहा है । 


तस्य = उसका = अथात आरोप का विषय = प्रस्तुत ओर विषयी = अप्रस्तुत वस्तु । उन दोनों 


से अवष्टन्ध होना अर्थात्‌ युक्त होना। जेसा कि [ मम्मट ने ] कदा है--शवह लक्षणा सारोपा 

कहलातौ है जहां विषय ओर विषयौ दोनों कथित हं [ काव्यप्रकाश्च--२ ] । 
विमश्ञेः--अलंकाररत्नाकरकार ने रूपक के विषय मे जो छिखा हैः वह इस प्रकार है- 
आरोपो ₹पकम्‌' । भिन्नयोः सामानाधिकरण्यनिदेश आरोपः । नत्वन्यत्रान्यारोपः 


नह्ययं अथान्तरं वस्तुत आरोप्यते, नापि श्रतीतितः । नद्यनुन्मत्तेन शुखं चन्द्र इत्यादौ. 


खुर्त्या इव रजतन सुखस्य चन्द्रेणाच्छादितत्वं प्रतीयते, मुखस्य परथगुपात्तस्य स्वरूपेणेव भास्मा- 
नत्वम्‌ । नापि दिचन्द्रादिवद्‌ वाध्यमानैव प्रतीतिः, बाधोत्पत्तावपि तत्र तस्या अनिदृत्तेः। इह. 
त्ववगतचन्दरविविक्तिसुखस्वरूपस्य निश्चितश्ुक्तिरूपस्येव प्रमातुश्चन्दोऽयं रजतमितिवच्छतस्चो- 
प्युच्यमाने न तद्रूपतया प्रतिपत्तिः। किन्तु नीमुत्पलमित्यादिवत्‌ सामानाधिकरण्यदश्चनात्‌ प्रति 
पादनञ्रमोऽयं न भ्रान्ता प्रतिपत्तिः दिचन्द्रादिन्द्‌ बाध्यमानाया अपि तस्या अभावात्‌ । नापि शब्दे 
राब्दन्तरारोपः, मुखदेश्चन््रादिरू्पतयाप्रतीते अन्योन्यविविक्तस्वविश्र(न्तरूपो पलम्भात्‌ । 
तस्मात्‌ तद्धमंत्वादिप्रतिपत््यथैः सामानाधिकरण्यनिर्देश्ञ एवारोपः ।--'आरोप रूपकं कहरूता 
है। आरोप हं दौ भिन्न वस्तुं का सामानाधिकरण्यनिर्देश [ शब्दतः सामानाधिकरण्य 
बतलाना || नकिदूसरे पर दूसरेकाआरोप। क्योकि एक पदार्थं पर दृसरे पदार्थं काआसेप 


1 
` -* श जन ` व ह ~ छ, 4. "+. न गद कव ९ ॐ न. 2 ~+ 1.1 1.1 


९१८ अलङ्कारसवंस्वम्‌ 


नं तो वस्तुतः होता ओर न प्रतीतितः ही 1 स्वस्थचित्त वारे किसी भी व्यक्ति को सुख चन्द्रः हे 
इत्यादि मे सख का चन्द्र दारा वैसा बाच्छादन प्रतीत नदीं होता जेसा शुक्तिका का रजत कै 


दवारा मतीत होता है। सुख तो अलग कथित रहता है [जव कि शुक्तिका का बोधकः कोड प्रमाण . 


नदी रहता ] अतः उसका भान अपने रूपमे ही होता [जव कि शुक्तिका का मान सवधा 
र्जतरूप से दी होता दै ] यद प्रतीति “दो चन्द्र --इस प्रतीति के समान [ उत्तरका में भिःने 
वाटी अतः] वाधित भी नदीं है, क्योकि वाध की प्रतीति द्यो जाने पर मी यद्‌ प्रतीति दस्ती 


हो जाती है उससे यदि सौ वार भी कहा जाय कि यद चन्द्रहैतो ताद्रूप्य की प्रतीति नदीं दोती 
ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार शुक्तिका शुक्तित्वेन ज्ञान हो -जने पर उसमं रजत की प्रतीति । 
यह तो (नील उत्पलः इत्यादि के समान सामानाधिकरण्य देखने से हआ प्रतिपादन भ्रमदटे,न कि 
आन्त प्रतिपत्ति । क्योकि “दो चन्द्र आदि के समान वह वाधित नदीं पाई जाती । 

न तोशब्द परद्दी दान्दका आरोप दोता क्योकि सुखादि [ चब्द ] चन्द्रादि [ खब्द 
रूप से प्रतीत नदीं होते! उनका [ दोनों खाब्दो का] स्वरूप परस्पर भिन्नरूपे प्रतीत होता 
हे) वे [ दोनो ] तो अपने तक ही सीमित रहते हें । 

इस छिएट तद्धर्म॑त्वः आदि की प्रतीति कै लिए सामानाभिकरण्यनिददा ही आरोप 
होता हे 1 

स्पष्ट हैकि विमर्दिनीकार ने रत्नाकरकार की उपयुक्त पंक्तियां को अक्षरशः उदघ्रत किया 
हे ओर रत्नाकरकार ने जिस अथं पर अ्थंके आरोपःका खण्डन किया दहैउसे ही उन्दने 
सिद्धान्त वतङाया है। रत्नाकरकार का कहना इतना दही ह कि जव तक दो वस्तुओं को राब्दतः 
कहकर उनमें से एक पर दूसरे को न थोपा जाय, आरोप नदीं दता । 

विमदरिनी 
अन्यथेति । अनपद्धवे । एवमनेनापह्वतिरूपकयोभदोऽप्युक्तः ¦ आहुरिति द्ण्ड्याद्‌यः । 
अतश्च साधम्यंखद्धावात्तदयुयायिमेदन्रयायुप्राणितत्वमध्यस्य ज्ञेयम्‌ । यथा-- 
“कंदुपंद्विपकण॑कम्बुमसितेदा नाम्बुभिर्खाञ्ितं 
संख्ग्नाज्ञनपुञ्जकालिमकरं गण्डो पधानं रतेः । 
व्योमानोकहपुष्पगुच्छमलिभिः खद्धाद्यमानोद्र 
पश्यैतच्छशिनः सुधासखहचरं विम्बं करङ्काङ्कितम्‌ ॥° 
अन्र कर्ङ्कस्य दानाम्ब्वादिभिः प्रतिविम्बनम्‌ । रन्दितववाङ्कितव्वयोः शद्ध सामान्य 
खूपत्वम्‌ । सुधासहचरत्वस्यानुगतसवाद्‌नुगाभितेति मेदत्रयानुप्राणितसत्वसर्‌ । अनेन च॑ 
सादश्यनिमित्त एवारोपो खूपकमिव्युक्तं भवति । केषांचिद्पि ` संबन्धान्तरदेतुरप्यारोपो 
रूषकाङ्गमेवेति मतम्‌ । यदाहारंकारभाष्यकारः-“रुच्तणापरसमाथ यावता रूपकस्वरूपम्‌ः 
इस्युपक्रम्य “सारोपान्या च सादश्याद्वा संबन्धान्तर द्वा" इत्यादि । स तु यथा-- | 
` 'असरतकवलः श्ोभाराशिः प्रमोदरखप्रपा 
सितिमशकटं उयोव्स्नावापी तुषारघरद्टिका । 
। ,  मनयिजच्रसी श्वङ्गारश्चीविमानमहो चु भो 
| निरवधिसुखश्रद्धा च््टेः कृती पगकेतनः ॥ 
अचेन्दुरूपे कारणे कार्यरूपायाः श्रद्धाया आरोपः । अन्थक्ृताप्यर्कार।लुसारिण्या- 


अत्र ्रद्धादेतुत्वाच्ड्धे?स्यमिधाय "विशेषेणेकरिमन्ननेकवस््वारो पान्माखारूपकमित्यभि- ` 


रूपक्राटङ्ञारः १९१९ 


द्‌धतायमेव पत्तः कटाितः। ननु चाध्यवसायगर्भाणामप्यलूकाराणाममेद्भ्राधान्ये सति 
प्रथमारोपगभां जलकाराः किसिति रुङिता इत्यााङ्कयाह--जारोपादित्यादि । 


अन्यथा अर्थात्‌ अपहव होने पर । णेसा कहकर मन्यकार ने अपहुति ओर रूपक का भेद 
भी बतला दिया । आहुः = कहा हे अर्थात्‌ दण्डी आदि ने। [ रूपक में ] साधम्य का सद्भावं 
वतरने से उस [ साधम्य] के साथ चरने वाके [ विम्वप्रतिविम्बभावमूरक वस्तुप्रतिवस्तुभाव, 
शद्ध सामान्य रूप वस्तु प्रतिवस्तुभाव तेथा अनुगामी धम-इनके आधार पर होने वाढ] तीनों 
मेद भी रूपकमें आ जाते हे । यथा- 

देखो यह चन्द्रमा का विम्ब, इसमे सुधासदचरत्व [ खधायुक्त होना तथा सधासदृद्च सफेद 
दोना दोनो काएक दही शब्द सै कथन होने के कारण अभेदे] भी है ओर कल्क भी इसलिए 
यह कामरूपी राज के कान कारंख है जिस पर मटमेले मदजल का धन्वा पड़ गया हे; यह 
रति का गण्डोपधान [ गाल का तकिया ] है जिसमे काजल की कार्िख ल्ग गईं है; यह (आका 
वृक्ष का पुष्पगुच्छ है जिसके वीच भोरे भरगएदहे। ॑ 

यहां [ विम्बभूत ] कर्क फ मदजल, काजल, भोरे प्रतिबिम्ब है । रुछ्छितत्व = धव्वा पड़ना 
ओर अंकित होगा = र्गना शुद्ध सामान्य वस्तु प्रतिवस्तु है ओर सुधासहचरत्व अनुगत धमं 
दे अतः यह अनुगामी साधारण ध्म इञ । 

इससे यह निष्कपं निकला कि साट्दयमूलक आरोप ही रूपक होता है । 

कुछ रोगो का यह भी मतदहैकरि [ साटृस्य से भिन्न] अन्य संबन्ध से होने वाला आरोप 


 भीरूपकका ही अगदहोतादहे। जेस किं अलुंकारभाव्यकार ने कहा है--^रूमक काजो स्वरूप 


दे उसमे सार हे लक्षणा-यदां सेलेकर द्ूसरीजो सारोपा हैवहया तो साद्रद्यसे होती 
दे या दूसरे सम्बन्ध से । यहां तक ।' [ सादृर्यमिन्नसम्बन्धमूल्क ] इस दूसरे रूपक का उदाहरण 
यह दे | 

“यह कृती चन्द्र अग्रतग्रास है, शोभा की रारि है, प्रमोदरस की प्याऊ दहै, सफेदी का छकड़ा 
हे, ज्योत्स्ना कौ वावड़ी हे, तुषार की षट है, काम की आसन है, -शृङ्गारश्री का विमान है, 
ओर कितना कहे, निरवधि सुख की श्रद्धा है ।” [ सोमपारू विलास ] 1 

यहां चन्द्ररूपी कारण पर का्थैरूपी श्रद्धा का अरोप है । यन्थकार ने भी अल्कारानुसारिणी में 
उक्त रोक को टीका में इस इलोक पर श्रद्ाहेतु होने से श्रद्धा एेसा कहकर यह कहते इए कि 
(खासकर एक मे अनेक वस्तुओं के आरोप से यट मालारूपक है इसी पक्ष की ओर संकेत 
किया है । ५18 


वि ५५ ० [३ । 
मश---अल्काररत्नाकरकार ने मी साद्रयातिरिक्तसम्बन्धभूल्क आरोप को रूपक माना 


दै । उन्दने विर्तारपूवेक ङिखा है-- 

इद अन्ये सादृदयनिमित्त एव आरोपो रूपकं न सम्बन्धान्तरनिमिन्तकोऽपि, तेन सम्बन्धान्तर- 
पूवक आरोपो वेचित्यमा> न त्वलङ्कार करिचदिति मन्यन्ते, तन्न नयनिपुणहदयावजैकम्‌ । ` तथाहि 
दृह्‌ द्विविधा रक्षणा ( १ ) प्रयोजनरदिता रूढा, (२ ) तदूयुता च कार्यां । तत्र रूढायां प्रयोजन- 
रूपव्यंग्याथांमावाद्‌ अभिधावद्‌ वैचित्रयचारुताविरदहान्न सहृदय -हृद याह्ादकारितया रसपरिपोष- 
कत्वमिति नालकारता । कायां पुनस्तद्वैक्षण्येन काव्यजीवितायमाना सर्वथा कविभिरादरणीयेति 
सवषां ध्वनिकारादीनामविप्रतिपत्निः । न च तस्याः. साद़रथे सम्बन्धान्तरे वा कश्चिद्‌ विशेषः येनेकत्र 
अ्लकारता अपरत्र तदभाव , इति स्यात्‌ । . न च सम्बन्धान्तरनिमित्त आरोपोऽल्कारतया लक्षितः, 


१२० अलङ्कारसर्वस्वम्‌ 


नापि तद्‌. युज्यते । रूपकसाजाव्येन तदन्तमावस्यवोचितत्वातच्‌ । अत एव (आरोपो रूपकमिति 
समान्येनवेह सूचितम्‌ , न च सादृद्यमित्यनुषक्तम्‌ । 
साद्रयसम्बन्धनिवन्धनाया अलक्ृतिष्वं यदि क्षणाया: । 
साम्येऽपि सवस्य परस्य हेतोः सम्बन्धभेदेऽपि तथेव युक्ता ॥` इति संग्रहः । 


ध्यहां कुछ आचार्यो कौ मान्यता हे कि “ताट्रदयमूल्क आरोप दही रूपक है, सम्बन्धान्तरनि- 
मित्तक नहीं । इसङिए सम्बन्धान्तरमूल्क आरोप वैचित््यमात्र दहै कोदं अर्कार नदी; जेसा कि 
कहते हे-“उपभेव तिरोभूतभेदा रूपकमिष्यते” इत्यादि [ अर्थं अभी आचुका दै ] यह्‌ मत नीति- 
निपुण सञ्जना का हदय आक्रष्ट नहीं कर पाता । क्योकि लक्षुणा दो प्रकार की होती दै-( १) 
प्रयोजनरहित निरूढा गौर (२ ) प्रयोजनसदित कार्यां । दोनों मेँ निरूढा प्रयोजनरूप व्यांयाथं 
से रहित रहती है अतः वह अभिधाजेसी ही होती दै, उसमें वैचिच्य तो रहता दै पर उसकी 
चारुता नहं रहती । इसलिए वह सहृदयहदयाह्ादकारी होकर रसपरिपोषकं नहीं वन पाती 
अतः उसे अल्कार नहीं माना जाता 1 कायां लक्षणा उसते विलक्षण होती ह अतः वह्‌ काव्य का 


 म्राण मानी जाती है । कवियों के छिद वह स्व॑था आदरणीय होती दै। इस तथ्य मे सवके सव 


ध्वनिवादी भी अविरुद्ध हें । वद साद्रर्यमूलक दौ या सम्बन्धान्तरमूलक उसमें कोदं अन्तर नदीं 
आता जिससे एक को अलंकार माना जाए जौर दूसरी को नदीं । सम्बन्धान्तरमूलक आरोप को 
अलंकाररूप से जो लक्षित नदीं किया गया है वह मौ अनुचित दै । जेसा रूपकत्व साद्दयमूलक 
आरोप में रहता है वेसा हयी सम्बन्धान्तर मरक रोप मे, अतः उसका भी रूपक में गिना जाना 
उचित दै। इसीलि९ [ हमने ] “आरोप रूपक कहलाता दहै" इस प्रकार सामान्य आरोपको ही 
रूपक लक्षण में रूपक कहा है । उसमें साद्य कौ अनुवृत्ति नदीं की । निष्कषं यह कि-- 

यदि सादयसम्बन्धमूकक लक्षणा को अकार माना जाता है तो अन्य सव दहेतुओं के समानः 
रूप से विद्यमान रहने पर केवर सम्बन्धमेदमात्र से [ साद्दयेतर-सम्बन्धमूलक आरोप को रूपक न 
मानना अनुचित है उसमें ] मी अल्कारता स्वीकार करना ही उचित है । 

„ रद्रट ने इते देत नामक अल्कार बतलाया है-- 


“हेतुमता सह हेतोरमिधानममेद कृद्‌ भवेद्‌ यत्र । 
सोऽलङ्कारो हेतुः स्यादन्येभ्यः प्रथग्भूतः ॥” ७।८२ ॥ 


जहाँ कायं के साथ कारण का इस प्रकार का कथन हदो जिससे उनमें अभेद दो रहदादो तो 


उस अलंकार को देतुनामक अलंकार माना जाता है । यद अन्य सव अलंकारं से भिन्न होता है 1 
उदाहरण दिया है-- 
| (अविरलकमलविकासः सकलालिमदश्च कोकिखान्दः । 
रम्योऽयमेति संप्रति लोकोत्कण्ठाकरः काठः ॥' 
अव वह रेस रम्य समय आरहादैजो लोगो मे उत्कण्ठा जगाने वाला दे, कमल का 
घना विकास है, सभी भौसो का मद है ओर कोयो का आनन्द । 
रुद्रट के कान्यालंकार के टीकाकार नमिसाधु ने इस उदाहरण को उदाहरणो की दिशा कहा 
हे ओर उदाहरण के रूप मँ अपनी ओर से यह प प्रस्तुत किया हे-- 


आयुधर॑तं नदी पुण्यं भ्यं चौरः खं प्रिया । 
वैरं थतं युर्चानं श्रेयो बाह्मणपूजनम्‌ ॥' 


रूपकालङ्ारः १२९ 


--्वी जायु है, नद पुण्य है, जोर भय चोर दहै, भिया खख है, जु वैर है, युरु ज्ञान है, 
ब्राह्मण पूजन श्रेय हे ।' | 
मम्मरने रुद्रटके इस मत का खण्डन कियादहै ओर तुको काव्यक्गिात्मक स्प से हौ 
मान्य बतलाया है, तद्धिन्न उपयुक्त रूप से उसमें कोई चमत्कार नदीं माना । कहा है कि “अविर?” 
आदि पद्य में काव्यत्व का कारण कोमल अनुप्रास दहै भामहनेमीदहेतु को अलुकारत्व योग्य नदीं 
माना दै ¦ उन्दोनि- 
हेतुश्च सृक्ष्मो केशोऽथ नारुंकारतया मतः । 
ससुदायाभिधानस्य वक्रोक्त्यनभिधानतः ॥ २।८६ ॥ 
अधात्‌ हेतु सूक्ष्म ओर टेश को अल्कार नहं माना कारणं कि इने वाक्याथ ( सस॒दाया 
भिधान ) वक्रोक्तिशन्य होता है । भामह के मत मे वक्रोक्ति ही अलंकारो का मूल हे। 
सेषा सवत्र वक्रोक्तिरनया्थो विभाव्यते । 
यत्नोऽस्यां कविना कायैः कोऽल्कारोऽनया विना ॥' 
यद्यपि सूक्ष्म को मम्मट ने अरंकार मान ल्या दहै। उद्टने भौ हेत्वलंकार की चचां नहीं 
की । आचाये दण्डी ने भामह के विरुद्ध हेतु सूक्ष्म ओर च्डाइन तीनोको वाणी का भूषणह। 
नदीं उत्तम भूषण कहा हे -- | 
हितुख्च सुक्ष्मलेडौ च वाचास॒त्तमभूषणम्‌ [ २।२३५ काव्याश्च ] उसके वहत से भेद 
भी बतलाए हे। किन्तु उनका हेतु रुद्रट के हेतु से सवथा भिन्न है। रोभाकर, अप्पयदीक्षित 
ओर पण्डितराज ने अलकाररलाकर, चितव्रमीमांसा ओर रप्गंगाधर में दहेतु को अरुकार नहीं 
माना 1 यथपि पण्डितराज जगन्नाथ ने 'उघछासः फु ० पय मं हेत्वलङ्कार की संभावना व्यक्त की हे । 
प्रन उठता ह कायैकारणमभावादिसम्बन्धमूलक आरोप को अल्कार माना जाय या नहीं। 
हमारी दृष्टि से अल्काररत्नाकरकार का यह कथन संगत है कि इसे अरुकार न मानना सहृदयता 
के साथ अन्यायदहे। इसमे चमत्कार का अनुभव किमे नहीं होता । केवर ध्यान देने की वात 
इतनी हे कि यह{ चमत्कार का कारणक्यारै। यदि घृत आदि कारण पर आयु आदि कायैका 
आरोप चमत्कारकारी हे तो यदहो अवद्य ही रूपक होगा । किन्तु हमे यहाँ आरोप में नहीं अति- 
खय मे चमत्कारकारणता रगत है । अतिशयोक्ति का एक भेद मम्मरने भी कार्यकारण के वीच 
पोयापये का विपयंय मानादहै ओर उसमे वे साद्य भी स्वीकार नदीं करते । कायंकारणके 
पौवांपथविपयय के समान मम्मट को उनके अमेद ममी अतिरायोक्ति स्वीकार करनी चाहिए । 
कायकारण का अभेद भी वस्तुतः पोर्वापर्यविपर्यय ही है। क्योकि कार्यं ओर करणम कारणको 
पूथेवत्तौ ओर कायं को परवत प्रत्येक दादयेनिकं मानता है । रुद्रटः ने अदहेतुनामक 


अलंकार को अतिशय वं के भीतर गिना हे वस्तुतः हेतु को अतिद्धाय वग म गिनना था । उन्दने 
उसे वास्तव के भीतर भिना यही एक अरुचि का कार्य किया । 


अनुभव के आधार पर कार्यंकारणभावसम्बन्धयुक्त वस्तुओं का अभेद अतिदाय को जन्म देता 
हे ओर साद्ृद्ययुक्त वस्तुओं का अभेद आरोप को अतः दोनो अल्कार मे मेद मानना भी उचित 
दै । रलाकर | के समान अभेद नहो । वस्तुतः काव्यो मेँ प्रयोग साद्‌ रयमूलक अभेद का हीं अधिक 
ह, अतः उसी के आधार पररूपककी व्याख्या सवने कौदहै। इस विषय पर देखि हमारा 
रुख .मम्मराभिमतं लक्षणायाः षडिवधत्वं हेत्वलङकारश्च' । [ उदथपुरविश्वविचाल्य से १९६८ में 


 अकाडित |] 


| | [ सवेस्व ] 
इदं तु निरवयवं सावयवं परम्परितमिति भरिविधम्‌ । आद्यं केवलं 
माठारूपकञ्चेति दविधा । द्वितीयं समस्तवस्तुविषयमेकदेशाविवतिं चेति 


॥ 
} 


१२२ अलङ्ारसवेस्वम्‌ 


द्विवैव ! ततीयं रिलष्टराब्दनिवन्धनत्वेन द्विविधं सलप्रव्येकं केवठमाटारूप- 
कत्वाच्चतुर्विधम्‌ । तदेवमण्रौ रूपकमेदाः। अन्ये तु धच्येकं वाक्योक्तसमा- 
सोक्तादिभेद्‌ाः संभवन्ति तेऽन्यतो द्रष्टव्याः । 

[ वृत्ति |] यह [ रूपक्र | निरवयव, सावयव तथा परपरित इस प्रकार तीन प्रकारका होता दहे) 
से ] प्रथम केवर [ शुद्ध ] तथा माकारूपक इस प्रकार दो प्रकारका हौतादै। द्वितीय [भी] 
समस्त-वस्तुविषय ओर एकदैशविवत्ति इस प्रकार दोही प्रकारका होता दै। तृतीय दिष्ट 
[ इनमे रब्दमूल्क ओर अदिच््ट शव्दमूलक होकर केवर ओर मालारूपक दोने से चार 
प्रकारका होता हे । तौ इम प्रकार रूपक के मेद आठ दते दै । प्रत्येक मे वाक्योक्त 
समासोक्त आदि [ जो ] कुछ ओर भी भेद होते हैः उन्द अन्य अर्थो मे देखा जा सकता है । 

विभरिनी 
 चराब्दोऽन्यालकार पेन्तया भेद सञ्च्चया्थंः। विषययोतकस्तुराब्द्‌ः । अवयवेभ्यो 
निष्कान्त आरोप्यमाणो यत्र तत्तथोक्तम्‌ । सहावयवरारोप्यमाणो वर्त॑ते यत्र तत्तथोक्तम्‌ ! 
परम्प्रयूकस्य माहात्म्यादपरस्यारूपगत्वमायातं यत्र तत्तथोक्तम्‌ । आद्यमिति निरवयवम्‌ । 
माला चकस्यानेकस्य वानेकारोपाद्धवति । एवं परम्परितव्वेन माखारूपकं ज्ञेयम्‌ । 
द्वितीयमिति सावयवम्‌ । ससस्तमारोप्यमागादमकं वस्त्वभिधाया विषयो यत्र तत्तथोक्तम्‌ ! 
एकदेदा आरोपविषयाणाम्‌; अथरतदातमक एवारोप्यमाणप्रयोजनप्रतिपाद नाय तद्रूपतया 
विवतंते परिणमति यत्र तत्तथोक्छम्‌ । वृतीयमिति परम्परितम्‌ । यद्यपि र्ेषनिबन्धनेऽ 
स्मिन्युणक्रियारमकधमनिवन्धनभ्य सादश्यस्यासंभव एव तथापि शब्दमानत्रङकतमेवा- 
मेदाध्यवसायतः सादृश्यं आद्यम्‌ । अन्य इति एतद्धेदाष्टकव्यतिरिक्ताः। संभवन्तीति 
चिरंतनारुंकारय्रन्थेष्वेव । न पुनखंचयन्त इति भावः । तत्र हि तेषां तच्वेऽप्येतद्धेदाष्टक- 
तमेव वेचिव्यं प्रतीयते ! तथा च- | 
“पाद्‌; कूर्मोऽत्र यष्टिभजगपतिरयं भाजनं भूतधात्री 
तेखापूराः समुद्राः कनक गिरिरयं “बृत्तवतिप्ररोहः। 
अर्चिश्वण्डांश्यरुच्चैर्गगनमलिनिमा कञ्ज दद्यमाना 
वैरिश्रेणी पतङ्गा उवरूति नरपते स्वस्प्रतापप्रदीपः ॥' 
हव्यत्र सत्यपि वाक्यार्थोक्कव्वे समस्तव स्तुविषयक्रतमेव वेचिच्यम्‌ । 
धच" [ ओर |--याब्द अन्य अल्कारो के अभेद भेदका ससुच्चायक दै, तुः ब्द विषय 
का योतक है [ निरवयव = ] अवयां से निष्क्रान्त हे आरोप्यमाण जिसमें एेसा [ सावयव ] 
जरह आरोप्यमाण अवयवो सें युक्त दो । । परम्परित = ] परम्परा अधात्‌ एक के प्रभाव से 
दूसरे का आरोपण समव हआ हो जिसमें एेसा । आच = प्रथम = निरवयव । माला एक या अनेक 
के आरोपसेदहोतादहै। इस प्रकारका ओर परम्परितत्वसे युक्त होनेके कारण [ रूपक को] 
मालारूपक माना जा दै । द्वितीय = अथात्‌ सावयव । [ समस्तवस्त॒ विषय = ] समस्त आरोप्य- 
माणात्मक वस्त जहां अभिधा का मिषय [ चब्दतः कथित ] हो वसा । [ एकादेखविवत्ति = ] एक- 
देदा = अथीत्‌ आसरोपविषयों का; जहौ अथं अपने ही रूप में बना रहे ओर आरोप्यमाण का यो- 
जन वतठकने कै क्षि आरोप्यमाण रूप से विवत्तित = अथात्‌ परिणत हो। वृतीय अर्थात 
परम्परित । यथपि जद यहु इल्षमूकक होता है वदाँ गुणक्रियात्मक साट्ररय संभव नहीं होता 


तथापि चब्दमात्रं से जनित अमरेदाध्यवसाय सै वदो सादृदय बन जातादहे। अन्य इन आठ सेदो 


रूपकालङ्कारः १२द 


से भिन्न । संभवन्ति = हो सकते अर्थात्‌ प्राचीन अलंकार अर्थो मेही । हम उसका लक्षण नहीं 
करेगे । वहाँ उन भेदो के रहने पर भी इन आठ भेदो से होने वाखा चमत्कार ही अनुभव में आता 
हे [ अतः चमत्कारकारण भिन्न न होने से उन भेदो से भिन्न नहीं माना जायगा ] । जेसे- 

“हे राजनम्‌ ! आपके प्रताप का प्रदीप जरू रहा है, इसमे पाद कुमे हे, मुजगपति = रेषनाग 
यष्टि है, पृथ्वी पात्र है, सस्र तैल का भराव दै, यह (सोने का शल ) खमेर गोलाकार वत्ती है, 
सूय ऊंची अचि है, आका कौ नीलिमा काजल है, [ तथा ] दह्यमान वेरियां की पांत है पतंग ।” 

यद्यपि यहाँ रूपक वाक्याथ मे व्याप्त है तथापि यदहो चमत्कार समस्तवस्तुविषयत्वङ्ृत ही हे । 

विम समासगत ओर वाक्यगत सेद रुद्रटने बतराए है। दण्डी ओर वाग्भयनेभी 
इसवी चचां की हे । 
[ सवेस्व | 
क्रमेण यथाः- 
दासे कृतागसि भवव्युचितः परभण 
दप्रहार इति खुन्दरि नास्मि इये । 
उद्यत्कटोरपुटकाङ्करकण्डकाग्रे- 
येत्िच्ते तव पदं ननु सा व्यथामे 1 
पीयूषप्रखतिनवा मखसुजां द्‌ चं तसोद्ूनये 
स्वगज्ञाविमनस्ककोकवदनसस्ता सखणाटीकता। 
द्विभौवः स्मरकाप्कस्य किमपि पराणेश्वरीसागसा- 
प्गाह्यातन्तुरुदश्चति प्रतिपदि प्राटेयभानोस्तञुः ॥* 
"विस्तार्लाखिनि नभस्तपत्जपाञे 
कुन्दोज्ज्वटप्रभ-भ संचयभूरिभक्तम्‌ । 
गज्ञातरङ्गघनमादिषदुग्धदिग्धं 
जग्धं मया नरपते कटिकाङकणं ॥° 
(आभाति ते क्षितिभ्रतः श्णद्‌ा प्रमेयं 
निख्िशमांसलतमाटठवनान्तचेखा । 
इन्दुत्विषो युधि हठेन तवारिकीतीं 
रानीय यच रमते तशरूणः प्रतापः ॥ 
क्चितिश्रत इत्यत्र दिलष्टं पदम्‌ । परम्परितम्‌- 
“कि पद्यस्य सुचि न इर्ति नयनानन्दं विधत्तेन वा 
चुद्धि वा स्लषकेतनस्य क्रुरुते नाटोकमात्रेण किम्‌ । 
वक्जेन्दौ तव सत्ययं यदपरः खीतांशुरभ्युद्रतो 
 दृ्पैः स्यादसतेन चेदिह तदप्यस्त्येव विम्बाध्वरे ॥' 
अत्र वक्तेन्दुरूपणदहेतुकमधशस्तस्य पीयूषेण एिठष्टराब्दं - रूपणम्‌ । 
"विद्धनमानस्दस वेरिकिमटासकोचदौ क्ष्यते 
दुर्गामागंणनीललरोहित समिर्स्वीकारवेश्वानर । 


¢, 


२२७ अलङ्कारखवस्वम्‌ 


सत्यप्रीतिविधानदश् विजयध्राग्भावभीम प्रभो 
साम्राज्यं वरवीर वत्सरदातं वेरिमच्चैः क्रियाः ॥ 
अत्र त्वमेव दंस इत्यारोपणपूवेको मानरूमेव मानसभित्यष्यासोप इति 
श्टिष्रचब्दं मालापरम्परितम्‌ । 
"यामि मनोवाक्ायेः चारणं करणात्मकं जगन्नाथम्‌ । 
जन्मजरामरण!णवतरणतरण्डं टराङघियुगम्‌ ॥' 
'पयंङ्को राजलक्ष्म्या हरितमणिमयः पौ रुषान्येसतस्ङ्ो 
मञ्चप्रत्यथिवंरोदवणविजयकरिस्त्यानद्‌ानाम्बुपटः | 
सङ्ग्रामत्रास्तताम्यन्धरुरखपतियशोहं सनी लाम्बुवाहः 
खङ्गः क्ष्मासौविदष्टः समिति विजयते माठवाखण्डट्छस्य ॥' 
अत्र क्ष्मासौविदह्ं इति परम्ररितमप्येकदेदाविवरतिं । एवमादयो ऽन्ये- 
ऽपि भदा टैशतः सूचिता पव । 

[ वृत्ति ] क्रम से उदादरण-- 

[ १ = निरवयव शुद्ध |--“~-अपराध करने पर स्वामी का सेवक पर पादप्रहार उचित द्यी 
होता है इसलिए है उन्दरि ! [ ठम्दारे पादरग्रहार करने पर भी | स॒ुद्चे कोड खद नहीं है, व्यथा 
सुञ्चे सकी है किं (तुम्दारे खकोमल चरण मं मेरा कठोर ^रोमकण्टकः न दरर गया हो ।? 

[ यहाँ पूरे वाक्यार्थं में एक्रमात्र रोम पर एकमात्र कण्टक का आरोप हे अतः उसमें अवयवायय- 
विभाव न होने से निरवयवत्व तथा श्ुडरूपत्व भी दै; || 

[ बृत्ति ] [ २ = निरवयव मालारूप यथा ]-“प्रतिपद्‌ तिथि को खीतकिरण चन्द्रमाका चिम्व 
उदित दो रहा है। यह देवताओं के किए नवीन अमृतभरी पसो ( अंजलि ) है, अन्धकार काटने 
के किए यह दतरा दै, स्वग की गंगा मेँ उदास वेढे चक्रवाककी चोँचसे टपकी सरणा र्ता है, 
काम का दूसरा धनुष है, ओर प्रणिश्वरी के प्रति सापराय व्यक्तियों कै छिद यहु आडाका 
तन्तु हे | | 

[ यहाँ न तो आरोपविषय चन्द्र मँ उसके अंग चन्दिका अदिका वणन है ओर न आरोप्य 
साण पीयूषप्रखति आदि म ही । अतः यह निरवयव है । साथ ही यदा आरोप का विषयणकदहीहै 
चन्द्र । जव किं आरोप्यमाण अनेक हैँ पीयूषप्रसति आदि, अतः यदह मालारूप है । फलतः निरवयव 
माडारूपक यहाँ संगत है ] । अनेक आरोपविषयो मेँ से एक एक पर अनेक के आरोप का उदाहरण 
टीका में देखिए ] 

[ ३ = सावयव समस्तवस्त॒विषय रूपक यथा किसी भूखे विद्वान्‌ कौ सहायता के लिए राजा 
से उक्ति], 

[ वृत्ति ] “हे कलिकालकरणं राजन्‌ , मने पयांप्तविस्वरृत आकाडरूपी पत्तरू मं वादरलकूपी मेसो 
के गंगातरगरूपी दूध मेँ सना उुन्दपुऽ्पतुट्य सफेद क्त नक्षत्रा रूपी काफी भात खाया हे । 

[ य्ह भात, पत्तल, दूध ये सव भात खनि के अगदहें इन पर नक्षत्र, आकादा, गंग(तरंग का 
आरोपदहे।वे भी आकाञ्च संस्था कै अंग दहै । मतः विषय ओौर विषयी ( आरोप्यमाण) दोनो 

सांग है ओर उनके समी अंगों का अमेद वतलाने से यहो समस्तवस्तुविषय सावयव रूपक इआ । ] 
| ४ = सावयव एकदै शविवत्तौ रूपक = ] 


| ^ 
"नन्वव अ वा सि = ~~ क पा + क ह = = ` चः र वि प क हि क क अ 


रूपकालठडारः १२५ 


[ दृति ] (आप क्षितिचत्‌ [ राजा, पकैत ] है । आपकी जो तलवार है वह "रात्रि तुल्य रयाम- 


` कान्ति कौ मांसक ( धनी ) तमालद्रुमराजि है, जहा आपका तरुण प्रताप राञ्ओं कौ चन्द्रतुल्यकान्ति 


वारी कौतिओं को वात्‌ ले आता हे ओर उनफे साथ रमण करता दै। यहाँ “श्ितिथत्‌ः यह 
पद रिष्ट है । 

[ यहां राजा पर पवेत का ओर राजा की तलवार पर परैत कौ तमाल्माल का तो आरोप 
शाब्द हे किन्तु राञ्ज कौ कीति पर अहत सुन्दरियों का आरोप शाब्द नदीं है वह अर्थतः प्रतीत 
होता हे । अतः या एकदे शविवत्ती सावयव रूपक है । वस्तुतः याँ समासोक्ति है सावयव रूपक 
केवर राजा ओर पव॑त तक सीमित दै उसमे एकदे राविवत्तिता नहीं है । जिस कीत्ति मे वह है वह 
समासोक्तिस्थर है । "तरुणः शब्द में दलेष समासोक्ति मँ रिथिर्ता ला देता है । उधर श्षणदा- 
प्रभाः ओर “इन्दुचिषःः मेँ उपमा भी है । अतः यह उद्राहरण संकराल्कार का माना जाना उचित 
हे। विमरिनीकार ने इसीर्एि सावयव एकदेराविवरत्ता रूपक के लिए नवीन उदाहरण दिया 
हे--“भवत्संवित्‌०? | 

[ वृत्ति | [ ५ = | परम्परित = 

८५ तुम्हारा सुखरूपी चन्द्र ] क्या पञ्च कौ कान्ति नष्ट नदीं करता ओर क्या आंखो को आनन्द 
नदीं देता, या आलोक [ दशेन = प्रकाश ] मात्र से कामदेव को नहो वदा देता १ जो तुम्हारे सुख- 
रूपी चन्द्रमा के रहते हए यह दूसरा चन्द्र॒ उदितदहो रहा है, यदि [ इसे ] असृतकादपंदहोतो 
वह॒ भी तो विम्बफलतुस्य अधरयुक्त इस [ सुख | मेंहदी यहाँ सुख पर चन्द्र के रूपण [आरोप] 
के आधार पर अधरागरत पर पीयूषका [ अगरत-रस ] दिष्ट पद द्वारा रूपण किया गया हे । 

[ यहाँ अग्रत शब्द अधर का भौ वाचक है टेसा मानकर इलेष स्वीकार किया गया है, किन्तु, 
कोषो मे असरत का अधर अथं नो मिलता | सुख पर चनद्रकाआरोपन होता तो अधर पर 
अभरत का आरोप न दो सकता, अतः एक रूपक दूसरे का कारण होने से यह दिष्ट परम्परित 
हे किन्तु आरोप्यमाण कौ संख्या अनेक नदीं है अतः यृहोँ केवर रिर्ष्ट प्रंपरित रूपक इआ |] 

[ £ = माला दिर्टपरम्परित = ]- | 

[ व° | “हे प्रभो ! आपव्रह्माकेसो वर्पो तक उच्च साघ्राज्य करें। आप विद्न्मानस के 
हंस हे, वैरिकमलासंकोच कै किए सूये है, दुरगामागंण के किए शंकर है, समित्स्वीकार के छिए अभि 
हे । सत्यप्रीति मे दक्ष हे, विजयप्राग्भाव के किए मीम हैं ओर उत्कृष्ट वीर हैः । 

याँ तुम्ही हंस हो? इत्यादि जो आरोपण [ आरोप, रूपक ] है उन्हीं के आधार पर “मान्त 
ही मानस हे" इत्यादि आरोप होते है, अतः रिष्ट रन्दो से युक्त माला-परम्परित [ रूपक ] है । 

[ मानस =मन तथा मानस सरोवर; कमलासंकोच = श्ुपक्ष म कमला = लक्ष्मी 
का संकोच ओर सूय पक्ष म कमल का असंकोच । दुर्गामार्गण = राजपक्ष मे द्गौ का अमार्मण = न 
खोजना, शिवपक्ष में दुगां = सती का मागण खोजना, समित्‌ = युद्ध भौर समिधा; सत्यप्रीति = राज 
पक्ष मे सत्य पर प्रीति ओर दक्षप्रजापति के पश्च मे सती की अप्रीति; विजयप्राग्माव = राज- 
पक्ष मं = विजय = जीत उसका प्राग्भाव पहले से ही रहना; भीमसेन पक्ष मे विजय = अजन उससे 
पराभाव = प्राक्‌ पहले हज हे भाव = उत्पत्ति जिसकी, भीम अजन से बड़ा था । इस प्रकार विद्धानां 
के चित्तरूपी मानस पर मानक्त-सरोवररूपी मानस का आरोप किया गया, तब राजा पर हंसका 
आरोप हो सका । इसी प्रकार वेरियो कौ कमला का जो संकोच एतत्स्वरूप जो कमलासंकोच उस 
पर कमलो का असंकोचः एतत्स्वरूप कमलासंकोच का आरोप होने पर राजां प्र सूयं का आरोप 
हो सका, दुगं का अमाग॑ण एतत्स्वरूप दुर्गामागंण पर दुगं का मागण एततस्वरूप दुरगामारमण का आरोप 


२२६ अलङ्कारसवंस्वम्‌ 


होनेसे राजा पर दिव का आरोप हआ, युद्धरूपी समित्‌ पर समिधारूपी समित्‌ का आरोप करने 
पर राजा पर अग्निका आरोप हआ, सत्य पर प्रीतिः एतत्स्वरूप सत्यप्रीति पर "सती पर अप्रीतिः 
तत्स्वरूप सत्यप्रोति का आरोप करने पर राजा पर दक्षुप्रजापति काञआरोप हआ तथा जीत 
रूपी विजय के ऊपर अजन रूपी विजय का आरोप होने से राजा पर मीम क्रा आरोप सम्भव 
हआ । इनमे हेतुमत आरोपों मेँ विषय ओर विषयी का साद्दय “एकराव्दवाच्यत्व-रूपी साधारण 
धर्म से हा । एकदाव्दता का अथे दे ख्व्दा कौ व गनुपूवीं का अभिन्न होना । मानस, कमरासंकोच 
-दुर्गामार्गणः, समित , सत्यप्रीति; विजय पेसे ही राव्द हं जिनमे म्‌+-आ+न्‌ +अ स+ 
इस प्रकार वर्णानुपूरवीं एक है ओर जो .चित्त ओर तटावविरेष आदि ऊपर निर्दिष्ट विभिन्न अर्थो 
के वाचकं हे । एक ही शाब्द जिन अनेक अर्थो का ज्ञान कराता दं उनमें एक बृन्तमेंल्गे फलँ कै 
समान अथवा एक आवरणे च्िपीदो दाल के समान अभेद मानाजातादहे। इस रल्ेषको 
एकवरन्तगतफल्द्यन्यायेन हआ दटेष कहते हँ । वस्तुतः एकवबीजगतद रद्वयन्यायेन रटेष कदा जाना 
चाहिए । यदहो आरोप विषय एक ही ह राजा; किन्तु आरोपके विषयी आरोप्यमाण अनेक दहं 
हंस, सयं जादि, अतः यह्‌ रूपक मालास्वरूप हुजा । फलतः इसे माकादिलष्ट परम्परितरूपक कदना 
ठीक दै ] [ ७ = अरिलष्ट = केवर परम्परित = ]- 

[ वृत्ति ] भं मन, वाणी ओर शरीर से भगवान्‌ शंकर के चरण युगरूको दारणमें जातादह 
जो करुणात्मक द्वै, जगत्‌ के प्रयु हैः ओर जन्म, जरा, मृत्यु रूपी समुद्र से पार उतारने वाके 
तरण्ड = नौका हें! | 

[ यद्ध जन्म जरा शरत्यु पर समुद्र का आरोप शिव चरर्णो पर नौकाके आरोप का कारण दै, 
आरोप की सख्या एक ही है ओर यहाँ रटेष नहीं है अतः अरिष्ट कैवल परम्परित हुआ ] 
[ ८ = अदिक्ष्ट माटापरम्परित = |[- 

[ वृत्ति ] “माख्वेन्द्र का खड्ग युद्धस्थल म सर्वल्कष्ट दे 1 वह राजलक्ष्मी का मरकत या इन्द्र 
मणिका वना पलं१ है, पौरुषसमुद्र का तरंग दहै, नष्ट रुकुर पर विजय रूपौ हाथी की [ मद से] 
सरावोर कनपटी [ दानाम्बु पद्ध ] है, युद्धमय से धवराए सुरल्देश के स्वामौ के यरूपी हंस के 
लि नीर्मेष है मौर पथिवीरूपी पट रानी के किए कंचुकी हे ।' 

यँ “शष्मासौविदल्ल” पद्‌ मेँ रूपक परम्परित होते हए मी एकदेशविवति हे [क्ष्मा पर रानी 
का आरोप चाब्द नदीं आदे] रेते ओर भी मेद अंशतः सूचित करी दिएगणएदहें। [यह 
वेधम्य॑ सेमी होता है, उसके उदाहरण अगे दिर जर्टेगे |। | 

विमदिनी 


कमेणेति यथोद्देशाम्‌ । द्विमावः स्मरकासुकस्पेव्यत्र च वाक्य थंपर्यालोचनयेन्दोः 
स्मरका्मुव्वारोपग्रतीतेः ऊटिर्स्वायनेकधमेनिमित्तं सादश्यमेव खंबन्धः । इन्दोश्चेकस्य 
बहव आरोपा इति मालारूपकम्‌र्‌ । अनेकस्य तु यथा-- 
“वाहू वारुद्णालिके कुचतदी मागिक्यहम्य रते- 
मक्छारोरुशिला नितम्बफर्क दासः सुधानिन्नरः । 
वाचः कोकिङद्जितानि चिकुराशेतोभवश्चामर 
तस्याखस्तऊुरङ्कशावकटदाः किं किं न रोकोत्तरम्‌ ॥' 
 अत्रानेकेषामनेकारोपादरुपकमाका । इयं च श्रेषनिबन्धनापि दश्यते । यथा- 
भनेचे पुष्करसोदरे मधुमती वाणी विपाश्या मति 
श्चैतो याति नदीनतां करयते रोणव्वमस्याधरः । , 


क + >, आ + 


रूपकाटङ्ारः १२७ 


चारिन्न नु पापसूदनमहो मामेष तीर्थाश्रयः 
स्नातुं वान्छति भूपतिः परमितीवोष्णोद्‌क वल्गति ॥ 
अत्रानेकेषां रिक्षा अनेक आरोपिता इति रिरुष्टार्थरूपकमाखा । 
जाभातीव्यत्र समासोक्तिमन्ये मन्यन्त इप्युदाहरणान्तरेणोदाहियते । यथा- 
“भवस्संविस्पुष्पन्नियमनुपमामोद मधुरां ससु च्चिन्वन्नानाविषयवनराजीविकसिताम्‌ । 
भवोदयाने भक्व्या तव सह विशेषोज्ञसितया विहत्त व्यः स्यामनुखृतविवेकप्रियसखः ॥' 
भक्तेनांयिकारो पस्याशाब्दृष्वादेकदेराविव तित्वम्‌ । 
पीयूषस्याधराग्छतेन शिरष्टशन्द निरूपणम्‌' इति ठेखककल्पितोऽयमपपाटो ज्ञेयः । 
अघराष्ृतस्य हि पीयूषेण निरूपणसत्र स्थितम्‌ । अतश्च (अधराद्तस्य पीयूषेण शिलष्ट- 
शब्दनिरूपणम्‌ इति पाठो याह्य: । अच्र च पीयूषवदखतशब्दस्याधररसावा चकत्वमन्ये 
मन्यन्त इव्युदाहरणान्तरस्रुदाहियते । यथा- 
अरोक्िकमहारोकप्रकाशितजगव्त्रय । स्तूयते देव सद्वंश शरुक्तारस्नं न के भवान्‌ ॥° 
अत्र सुक्तारत्नमिव्यारो पपूंको वंशा एव वंश्य इव्यारोप इति रश्रष्टशब्दं केवख- 
परम्परितम्‌ । 
विद्भदित्यादो हसरूपगामादास्म्यान्मानसरूपेणेति परस्परितम्‌ । एवमणंवरूपणा 
तरण्डारोपस्य हेतुरिति परम्परितम्‌ । पयंङ्क इव्यत्रेकष्य बहव आरोपा इति मारापरम्परि 
तम्‌ । अनेकस्य तु यथा- 


श्रीः श्रीधरोरःस्थरुखेन्दुरेखा श्रीकण्ठकण्ठाञ्नतडिच्च गौरी । 
राक्राज्लिपद्याकरराजहसी शची च वो यच्छतु मङ्गलानि ॥" 
अत्र बहू नामनेकारोपास्परम्परितमाखा। एवमादय इत्ति । परम्परि तमप्येकदेशविवर्तस्येवं- 
ग्रकाराः। सूचिता इति । एतस्प्रदशं नादेव । ततश्च सावयवं द्विविधमपि रिष्टं दश्यते । 
तत्र समस्तवस्तुविषय यथा- 
'विहढन्तोट्‌ढदक्उडं फुरन्तदन्ताकार बहरुकेसरपअरम्‌ । 
पहटरिसचन्दारोए हसिअं सुरण सुरहिगन्धोग्गारम्‌ ॥' | सेतुबन्धे ७।६ | 
अत्र कुमुदस्य रिरुष्टत्वम्‌ । एकदेशविवतिं यथा- 
व्यत्तारामोक्तिकाघंप्रकरपुरुकितं चन्द्रिका चन्द नाम्भो- 
दिग्ध सक्तषिहस्तस्थितकरकपयोधोतमाकाशलिङ्म्‌ । 
तोयाधारे म्रतीचि च्युतदति दिनङद्विम्बनिर्माल्यपद्मे 
तस्याचां पुण्डरीकं व्यधित हिमकरं सत्वरं मूध्नि कारः ॥ 
अत्र कारविषये पूजकादिरारोप्यमाणो न शाब्द इत्येकदेशविवतित्वम्‌ । तोया- 
धारस्य ससुढनिमास्योद्‌ क भाण्डवाचकस्वाच््रष्टत्वम्‌ । 
क्रमण = क्रम से अथात्‌ जिसक्रमसे नाम छि गरदं उसी क्रम से। द्विर्भावः स्मरका- 
सैकस्य'” = इस स्थल मे वाज्याथं का विचार करने पर चन्द्रमा पर स्मरकार्मुकल्वके आरोपकी 
प्रतीति होती हे । उक्तम कुटिरुता आदि अनेक ध्म प्र आश्रित साटृदय ही संबन्ध है। ओर खं 
इन्दु पर अनेक का आरोप है इसछिए यह्‌ माल रूपक भी है । अनेक [ पर अनेक के आरोप] का 
उदाहरण यथा--हरिणके डरे हृट छने को सो आंखो वारो उस सुन्दरी का क्या लोकोत्तर नीं 
हं --उसका वाहं कामल बाख मणाल हें, कुचस्थल रत्ति का माणिक्यहरम्यं है, नितम्ब सुक्ता्ैलिला 
है, हाथ सुधानिक्चर है, बोलो कौयल की वरूक है ओर के काम कै चवर है । यँ अनेकों का 
अनेका प्र आरोप होने से इसे रूपकमाला कहना चाहिए । यह रूपकमाला कहीं रलेषमृलक भौ 


१२८ अलङ्ारसवेस्वम्‌ 


दोती हे । यथा--्यह भूपति तीर्था [ पुण्यस्थान ओर गुरु, राख, प्राडिववाक आदि ] का आश्रय 
है 1 शसके नेतर पुष्कर [ पुष्करनाम तीथं ओर कमक ] के सहोदर दै, इसकी वाणी मधुमती 
[ संभव है करमीर मेँ इस नाम का कोदं तीथं हो, सामान्य अथै मिठासयुक्त ] है, इसकी मति 
विपाद्चा [ इस नाम की नदी मौर पाश्च = उलञ्ञ या कुण्ठा से रदित ] दै, चित्त नदीनता [ नदी 
का इन स्वामी = समुद्र तद्माव तथा अदीनताको प्राप्त होता है, इसका अधर रोणत्व [ रोणनद 
तद्रूपता ओर कराई ] को धारण करता है, इसका चारित्य पापपृदन [ पापनाड्यक | है । परन्तु 
आद्चये द कि यदह नहाने के किए मैरे पास आरदादै, केवर इसोङिए यह उष्ण जल निकल 
रदा दे 1" इसमें अनेक पर अनेक दिटो का आरोप है इसकिए यह्‌ दिलष्टार्थरूपकमाल। ह । 
आमाति ते' रस पमे दूरे रोग समासोक्ति मानते दै । इसकिट श्सके लिए दूसरा उदा- 
हरण प्रस्तुत किया जाता है -“संसाररूपी उद्यान मे विवेकरूपी प्रियमित्र को साथे में नाना- 


विषयरूपी वनराजि में विकसित ओर अद्वितीय आमोद [ सुगन्ध तथा आनन्द ] से मधुर आपकी 


सविदरूपी पुष्पश्री का चयन करते हए भक्ति के संग विहार करने देतु कव व्यग्र होऊगा ।›› यहाँ 
भक्ति के ऊपर नायिका का आरोप शब्दतः न दो कर अथैतः हुआ है । अतः रूपक मे यहो टक- 
देदराविवत्तित्व हआ । 

[ अत्र वक्त्रन्दु० इत्यादि पक्ति मे ] 'पीयूषस्य अधराग्रतेन रिलष्टशब्दनिरूपणम्‌ः यह पाठ 
[ इस न्थ के ] छ्पिकार ने अपने मनसे गद लिया समञ्लना चाहिए । यहाँ अधरामृत पर 
पीयूष [ रूपी अग्रत | का निरूपण करिया जा रहा है इसलिए “अधरागरतस्य पीयूषेण दिलष्टराव्द- 
निरूपणम्‌" यह पाठ ग्राह्य है। इस पद्य मेँ कुछ खोग॒ अग्रत शब्द को पीयूष अ्थंका वाचक तो 
मानते है, परन्तु अधररस का वाचक नहं । अतः हम दूसरा उदाहरण देते है“ हे देव, आप 
सद्वंश [ कुर ओर बँ ] के स॒क्तामणि हैँ ओर अलोकिक महान्‌ आलौकसे तीर्नो लोकों को 
प्रकाशित करने वाले दै । अतः आपकी स्तुति कोन नहीं करता 1 य्दा राजा पर मुक्तामणिका 
जो आरोप है उससे (कुरुलूपी वद दी बँसिरूपी वंडाः शस प्रकारके वदपर वंाका आरोप संभव 
होता दे, अतः यहाँ रिलष्ट शब्दपूवंक हु केवर [ अमाला | परम्परित रूपक है । 

'विद्रन्मानसदंसः इत्यादि प में हंस के आसेप के माहात्म्य से [ विद्वानों के चित्तरूपी मानस 
पर | मानस का आरोप हआ हे, अतः य्ह भी परम्परितषूपक दे [ वस्तुतः मानसरूपक कारण हे 
ओर हंसरूपक कायं रूपक दै--उदद्ेदयविधेयभाव रेसा मानने पर ही रक्षित रह सकता है ] इसी 
प्रकार { यामि० श्त्यादि पथमे] अणैवका आरोप [ शंकरचरणां पर] तरण्डके आसरोपका 
हेतु दे, इसि वहाँ मी परम्परि तरूपक है । पपयङ्को राजलक्षम्याः०? पर्‌ मे एक पर अनेक आरोप हैँ 
अतः मालापरम्परित हआ ! अनेक पर अनेक के आरोप का उदाहरण यथा--“विष्णु के वक्चरूपी 
आका की चन्द्ररेखा लक्ष्मी, दिव के कण्ठरूपी मैव की तडित्‌ गोरी तथा इन्द्र के नेत्ररूपी पद्य 
सरोवर की राजहंसी रची आपका मंगर करे 1? यदद अनेक पर अनेक के आरोप से परम्परित- 
माला हुईं । 

एवमादयः अर्थात्‌ पररम्परित मी एकदे श-विवत्ती होता है, इस प्रकार के अन्य॒भेद्‌ । 

सूचिता अर्थात्‌ पूर्वोक्त मेदौ को दिखलाते दिखलति ही । इस प्रकार विचार करने पर दोनों 
प्रकार का सावयव रूपक भो दिलष्ट होता है । दोनो मे से समस्तवस्तुविषपय यथा- 

| सेव॒वन्ध मं इसुदवानर का वर्णन २।६ ]-- 


८ विघटमानौष्ठदलधुरं स्फ़रददन्ताकारवहटकैसर प्रकरम्‌ । 
प्रहपचन्द्रालोके हसितं कुसुदैन खरमिगन्धोह्ारम्‌ ॥" 


1, 


रूपकठ्द्ारः १२९ 


प्रहषं कौ ्चोदनी सं कुमुद हंस पड़ा, उसके पंखुडिर्यो रूपी ओठ खलू गए, दन्त के आकार के 
वृत से कैसर ( रशे ) साफ-साफ दिखाई देने लगे तथा खगन्ध पूणं . अल्ला ८ उद्धार ) भी दष्टि- 
गोचर होने लगा ।' यह्‌ खद शाब्द रिल्ष्ट हे [ यदं ङुुदवानर के ऊपर बुखदपुष्प का आरोप 
कियाजा रहा हे ] एक्वेराविवत्तीं में रेष -- 
^तारारूपी सुक्तामय अन्य से पुलकित, चांद नीरूपी चन्दनरस से लिप्त तथा. सक्षषिमण्डल के 
हार्थो मे रखे करक ( कमण्डलं ओर ओके ) के जरू से धौत जो आकाद्यरूपी शिवख्गि है उसपर 
कालः ने चन्द्ररूपी पूजापुण्डरीक चडाया जव ॒सुखहूपी निर्मास्यपद्च परिचम दिया मे स्थित तोया- 
धार ( समुद्र जलपात्र ) मे जा पडा । प | 
यहां कालरूपी विषय के ऊपर पूजा करने वाटे आदि (१) का आरोपः शब्दतः नहीं हुआ 
अतः यह एकदे द्विवत्तीं इञ । तोयाधार शब्द समुद्र ओर निमांस्य के लक्िए निश्चितं जल्पाको 
वाचक होने से रिल्ष्ट हे [ करक राब्द भी दिष्ट है। करको दाडिमे पक्षिभेदे हस्ते कमण्डलौ । 
ुट्वाकरंजयोरंघोपठे चः--अनेकार्थसंगरह के इस वाक्य के अनुसार उसका अथं कमण्डलु भी हे । 
दसी पद में हाथके लिए हस्त शब्दका प्रयोग होने से करका दूसरा अथ वबोपर = अथात 
ओके केना होगा । तव करक चब्दवाच्यत्वेन अभिन्न कमण्ड्लं रूपी ओर के जक से' एसा अथं 
निकाला जावेगा ]। | (1) 1 9 
 : :: ` विमद्िनी नाश 
छ चिच्चाभेदमेव ढयित विषयिणो ` निषेधपूवंमारोप्यमाण्स्वेन तदीयस्य वा मेद्‌- 
इतोर्ध॑मंस्य हानिकरुपनेनाधिक्येन वा दडारो पत्वेनापीद्‌ दश्यते । कमेण यथा-- 
कलिप्रिया शश्वद पालितान्तावनक्तां गुरु्ातिषु द शंयन्ती । 
जाया निजा या नद सेव कव्या कृव्या न कस्या सरकस्य धाः ॥' 
अन्न कृत्या निषेधरपूवं जायायासारो पिता 1 तज्निषेधेन हि जायाया त्यया दाढर्थन 
साभ्यं प्रतीयते । व्या तथा न स्वकर्मणि व्याप्रियते यथेयं तस्कमंणीति द्यत्र वाक्यार्थः । 
अन्न च यदन्ये विशेषारंकारमाहुस्तदमेदारंकारनिराकरणादेव निराकृतमिति न घुनराय- 
स्यते । हान्या यथा-- 
'वने चराणां वनितासखानां दरीगरहोत्सङ्गनिषक्तभासः। 
भवन्ति यत्रौषधयो रजन्यामतेखपूराः सुरतप्रदीपाः ॥° 
अनत्रातैलपृरेण हानिकरपनम्‌ । आधिक्येन यथा-- | 
तुरीयो द्येष मेध्योऽग्निराम्नायः पञ्चमोऽपिं वा ! 
अपि वा जंगमं तीथ धमो वा सूर्विसंचरः ॥' 
अन्न तुरीयस्वादेधंमस्याधिक्यम्‌ । ५ | 
"खट त्तरनिबद्धसुष्टेः कोपनिषण्णस्य सहजमङिनस्य । 
1. ` कृपणस्य करपागस्य च ेवरुमाकारतो भेदः ॥' ह | | 
` इस्यन्नापि दढारो पमेव रूपक सेयम्‌ । अत्र दहि ६ पाणस्येति सखुच्चीयमानस्वेन 
निदेशाच्छाव्दस्यारोपस्यप्रतीतेरप्याकारमान्रेण भेदस्यो केवाक्याथपयाखोचनमाहारम्या 
त्परि शि्टसमस्वधर्मान्तरसद्धावाभ्यनुच्तानास्पयेवसाने. द्‌ढर्थन विषयविषयिणोरभेदभ्रति- 


¦ सै पकसतच्वमिति पूवंमेबोक्तस्‌ । अन्येऽपि मेदाः स्वयमेवभ्यूद्यो दाहायांः । 
पततिः + व बर अभेद बौ ही दृद करने के किए विषयी का आरोप निषेधपूवेकं किया जाता 


हे । ही कहीं उसी विषयी के उस धमं कौ हानि या नि न 


९ अ० स 


मि नी ` पत 


९३० अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


हे जो [ अभेद के विरुद्ध ] मेदक होता है । क्रम से उदाहरण यथा--सौधे ओर धरम॑त्रिय व्यक्तिको 
कलहप्रिय, कमी कमी आज्ञा न पाने वारी, वड़ो कौ सदा अवज्ञा करने वाली अपनी जो खी दहो वही 
वस्तुतः ऊत्या ह, त्या कृत्या नहीं याँ जाया पर्‌ कृत्या का आरोप निपेधपूवक किया गया दै । उसके 
निषेध ते जाया पर छरत्याका अभेद ओर अपिक इटता के साथ प्रतीतददोतादे। इसपदयका 
वाभयार्थं हे किः अपने कार्य मे कृत्या उतनी तत्परता नदं दिखलाती जितनी उसके कायं में ककंडा 
पत्नी । यदौ [शोभाकर आदि] अन्य विद्वानों ने जो एक विद्रोष अलंकार माना है उसका निराकरण दमने 
[ उपमा के प्रकरण म ] अभेदारुकार के निराकरण द्वारा ही कर दिया है, अतः अव पुनः परिश्रम 
नदीं करते । [ मेदक धम की ] हानि के द्वारा [ अभेदपुष्टि का उदाहरण ] यथा--“जिस [ हिम- 
गिरि ] पर युफागरहो कौ गोद में लगी रोदनी वारी ओषधिर्याँ ही सपत्नीक वनेचरों के खिर 
रति मे तैकपेक्षारदहित स॒रतप्रदीप का काम किया करती हैं" यां “अतेलपूरः तेलापेक्षारदित 
कहकर हानि की कट्पना की गईं है । मेदकधर्मं की अधिकता के द्वारा [ अभेदपुष्टि का उदाद्रण | 
यथा--्यह यातो चतुथं यज्ञाग्नि है, यार्पौचवा वेद दै, या फिर जगम तीथे हे अथवा शरीर- 


धारी धर्म 1» यदँ चतुर्थत्व आदि विदोषं की अधिकता वतलाकर अभेद दिखलाया गया हे । 
श्करृपण ओर कृपाण मे केवर आकार [ स्वरूप तथा “आः अक्षर ] मात्र का मेद रदता दँ, दोर्ना 


डी टृढतरनिवद्मुष्टि [ मुष्टि = मूढ, सुद्धी ] होते है, कोषनिषण्ण [ कोष = म्यान, खजाना ] रहते हैँ 
ओर स्वभावतः मछिन [ कृष्णवर्णं का, गन्दा ] होते है "> यर्दा मौ दृटारोप रूपक दही है । यदा 
कृपाण का निदेश समुच्ीयमान पदाथं के रूपमे हआ हे, अतः [ कृपण पर | उसका आरोप शब्दतः 
प्रतीत नदीं होता, इतने पर मेद केवल याकार मात्र को लेकर वतङाया गया है अतः वाक्याथ कौ 
विवेचना करने पर दोनों का शेष समी धर्मौ से युक्त होना प्रतीत होता है । इस प्रकार विषयः 
विषयी का अभेद अन्त मेँ कृढताद्वाराद्ी द्योता दहै। यह अभेद प्रतीति दी वस्तुतः रूपक का 
स्वरूप है यह परे हयी कह दिया गया है । रेते दी अन्य भेद मौ स्वयं आकि जा सकते हँ । 
[ व्यक्तिविवेककार ने इस पद्य मे अभेद को असंमव बतलाया है द्र्टव्य-हिन्दौन्यक्तिविवेक पृष्ठ-४२९१ 
अवाच्यवचन दोष ] । [ वनेचराणां ० तथा दृढत्तरनि०' मे अर० रत्नाकरकार ने अभेद नामक एक 
स्वतन्त्रं अलंकार माना था, ६ 
६. [ सवस्व | 
इदं वैघम्यंणापि दश्यते । यथा - 
[च रेता ५ 
'सोजन्याम्बुमख्स्यल्री खचरिताचेख्ययुभित्तिगण- 
ञ्योत्स्नारष्णच तुदंशी सरकृतायोगश्वपुच्छच्छटा । 
येरेषापि दुराद्याया कलियुगे राजाघऱ्ी सेविता 
तेषां शिनि भक्तिमाधसलमभे सेवा कियत्कौशलम्‌ \.` 
अन्न चारोप्यमाणस्य धर्मित्वादाविष्लिङ्गसंख्यत्वेऽपि कचित्स्वतो ऽसंभ- 
वत्‌संख्यायोगस्यापि विषयसंख्यात्वम्‌ प्रव्येकमारोपात्‌ । यथा --कचिजटा- 
वल्कखावलभ्बिनः कपिला दावाश्नयः इत्यादौ । न हि कपिलमुनेवेहुत्वम्‌ । 
“श्रमिमरतिमलठसददयतां परलयं मुच्छ तमः शरोरसादम्‌ । 
मरणं च जद्‌भुजगजं भरस्य करुते विषं वियोगिनीनाम्‌ ॥ 
इत्यत्र नियतसखंख्याककार्यविरोषोत्थापितो गरलाथेप्र भावितो विषशाब्दै 


अरटेष एव । जलदुजगजमिति रूपक सराधकमिति पूवं सिद्धत्वाभावान्न तन्नि- 


' बन्धनं विषराब्दे शिलष्टशब्दं परम्परितमिति श्टेष पवाबरेत्याहुः । 


रूपकालङ्ारः ९३९ 


[ वृत्ति ] यह [ रूपक ] वेषम्ये से मी देखा जाता है । यथा--जो सौोजन्यरूपी जल वै लिए 
मरुस्थली है, खचरितरूपी चित्र के लिए आच्छााभित्ति है, युणरूपी चन्द्रिका के छिएट अंधेरे पाख की 
चोदस है, [ तथा ] सरता [ सीधेपन ] के छि ऊुत्ते की पूं दै ठेसी इस अत्यन्त दुष्ट चित्तवाली 
राजावली कौ मी कलियुग मं जिन्दोने किसी भी दुरेषणा में पड्कर सेवा कर ली उनके किए केवर 
मक्तिमात्र से सुरुम भगवान्‌ शली ( रिव ) की सेवा कितना वडा कौडाङ है 

इस [ रूपक | मं आरोप्यमाण पदाय धमो होता है इस कारण उसमे [ विषय का] ल्ग 
ओर संख्या अवदय ही रखे जाते ह किन्तु विषय की संख्या भौ जो उसमे कभी-कभी स्वमावतः नहीं 
रहती, उसमें रखी जाती है क्योकि आरोप करते समय प्रत्येक धम का आरोप किया जाता है । 
जसे कहीं जटावल्कल का अवरम्बन करने वाली दावाग्नियोँ कपिल है ।--रत्यादि स्थलों मै । [ य्ह 
कपिलाः”-इस प्रकार ] कपि [ सुनि पक्ष ] मे जो बहुत्व है वह स्वाभाविक नदीं है । [ वह केवल 
विषय दावाग्नि के अनुरोध से लाया गया है ]। 


“जरद्‌ -मुजग से उत्पन्न विष पियोगियोँ मेँ भ्रम [ चङकर ] अरुचि आलस्य, शुन्यता ( प्रख्य ), 


मूच्छ, विषाद, इारीरशेथिल्य तथा मृत्यु वरवद्धा उत्पन्न कर रहा हे ।' 


- यहो उन उन गिने गिनाए कायं [रमि आदि] से कुछ कुछ प्रतीति विषय वनाया गया तथा 


-गरक अथे में अधिक प्रभावपूणं बनाया गया विषशब्द मे जो इठेष है उसे “जरूद-भुजग'-मे रूपकः 


की सिद्धि होती है अतः [ रूपक के देष से ] पहर न रहने के कारण यद उस [ रूपक ] कै 


आधार पर विष शन्द मं रिरष्ट पद परम्परित शूपक नदीं माना जा सकता, अतः यँ इष ह है 
ठेसा कहा गया है । 


विमरिनी 


वेधर्म्यगापीति । न केवर साधम्येगेष्य्थः । अस्य च विचंत्तिविशोषान्तरं दशयित 


माह--अत्ेत्यादि । आविष्टलिङ्गतवेऽपीर्यनेन धर्मि गः स्वरूपमात्रपर्यवचितस्वेऽपि धर्म्यन्त. 


र्षबन्धिनः सख्यास्मनो धर्मान्तरस्यापि स्वीकार इत्यावेदितम्‌ । असंमवत्संख्यायोगस्येति । 
यद्यप्येकादिञ्यवहारहेतुः संख्येति नीत्या एकस्मिन्नपि दग्ये तद्योगः संभवति तथाप्यनेक- 
दभ्यवतित्वा्भिग्रायेणेतदुक्तम्‌ । प्रत्येकमारोपादिति अयमभनिः कपिलोऽयमस्भिः कपि 


इध्येवरूपात्‌ । अतश्वारोप्यमागस्य कपिलमुनेर्बहृस्वायोगा द्विषयसंख्यत्वम । रिरषटतानि- 
| थ कप 
बन्धनस्य परम्परितस्य श्टेषाद्वेरन्तण्यं ययोतयितुमाह-्रमिमित्ति । प्रमावित इति । 


प्रथममेव प्रतीतिगो चरीक्ृत इत्यर्थः । 


वेधम्ये से भौ अर्थात्‌ केवर साधर्म्यं से ही नहीं । इस [ रूपक ] के अन्य प्रकार दिखेलछाने 
के रिद कते दहे अव्र इत्यादि । आविष्टलिङ्ग्वेऽपि ठेसा कहकर मरन्थकार यह वतलाना 
चाहते हं कि [ आरोप्यमाण ] षमी यदपि अपने ही रूप मे रहता है तथापि उसमे दूसरे धमां 
से सम्बन्धित संख्याल्पी धमं मौ जा जाता है। असंभवस्संख्यायोगस्य (संख्या ५क दो आदि 
व्यवहार का हेतु धमं है' इस नियम के अनुसार एक द्रव्य मे भो संख्या रह सकती हे तव मी 
अनेक द्रव्य में रहने आदि के अभिप्राय से यद कहा । प्रस्येकमारो पात्‌ अर्थात्‌ यह अग्नि कपिल 
है च्य अग्नि कपिले इस प्रकारके आरोप से। इसी कारण आरोप्यमाण कपिलसुनि में 
बहुत्व न दने पर भी उसमे विषय ( दवाग्नि ) की संख्या लाकर वहुत्व दिखलाया गया । 

दलेपमूलक परम्परितरूपकं का इकर्षसे भेद दिखनि के लिए कहते है--“्रमिभरतिम्‌ः । 
प्रभावित अथात्‌ पहले ही प्रतीतिपथ मे अवतीर्णं । | 


ङ्क, 
१. > १1 0 २ ११२१ =, ~ ॥ ` » ग्ब 4. क क " ववव्कच ~~ ~. ५* „= ३ ~“ "क +~ कह च्छ र =. ` = नि क ऋ क द 1१ ^ = 4१, *» = ~अ 2 कव 
444 ~> ~. ~ ‡ क च्छ ष्क ३ चकः - 


१३२ अदङ्ारसवंस्वम्‌ 
विमरिनी 


रवं सिद्धत्वाभावादित्ति । रूपकस्य श्छेषहेतुस्वात्‌ 1 तन्निवन्धनमिति रूपकनि बन्धनम्‌ । 
इति शाब्दो हेतौ । अतश्च र्टेष एवान्राख्कारो न परम्परितं रूपकासिव्यन्न तात्पर्यम्‌ । 
चिन्त्यं चैतव 1 यतः श्टेषस्तावद्राच्ययो्रयोः प्रह्कतयोरग्रक्कतयोः प्रक्रताग्रद्तयोश्च भवति ! 
अन्न च न द्वयोः भरद्कतस्वं नाप्यश्रङ्कतस्वम्‌ । वर्घाखमये जलदस्येव जलस्य वणंनीयव्वात्‌ । 
्रह्कताप्रक्तयोश्च विरोषणसाभ्य एव श्टेषपो भवति इह त॒ विशेष्यस्यापि साम्यमिति 
शब्द दावस्युस्थितस्य ध्वनेरयं विषयो न ररूषस्य । अतश्च नात्र श्टेषारुकारः । नापि 
ध्वनिः 1 जलद युजगजमिति रूपक माहार्याच्छुब्ददाकत्या गरलाथस्याभिधानात्‌। षएवसमच्र 
 रिलष्टब्द्निबन्धनं [ रूपकमेवारंकारः ] जलदञ्चुजगजमिति रूपकान्तरेणापि गरलाथों 
यदि प्रतीयते तत्स ध्वनेर्विषयः स्यादिच्युक्तम्‌ । स्थिते तु जरूदथुजगजमिति रूपके 
तन्माहाठ्यादेद विषाब्दे रिलष्टशब्दनिबन्धनं रूपकम्‌ । अन्यथा हि जरद्‌ मुजगजमिति 
रूपकं व्यर्थ स्यात्‌ । तेन विना हि गरकारथः प्रतीयत इस्यरं बुना 1 
पन र्यं सिद्धत्वामावात्‌ = पहले से सिद्ध न होने के कारण अथात्‌ क्योकि यदह्‌। रूपक रलेपमूलकः 
है । तन्निबन्धनमिति रूपकमूटक । इति चन्द यहाँ हेत्वथेक दे 1 इसलिए तात्पये यद्‌ हआ कि यदो 
दलेष ही अलंकार दै, दिलष्टपरपरित रूपक नदीं । 
विन्त यह मान्यता शोचनीय है, क्योकि इलष दोता दै केवट दो वाच्य अर्थौ में चाहें वे केवल 
मक्त हो या केवर अप्रकृत अथवा प्रकृताप्रकृत दोनों । इस [ भ्रमिमरति० ] पय मँ नतो दोनो 
मरकत ह्य हैन अप्रकृत ही, भ्योँकि वषा कामें जैसे बादल का वणन कियाजातादहेमैसे दी पानी 
कामी [अतः यदि ष्क प्रकृत दैतो दूसरा अप्रकृत गौर यदि एक अप्रक्रतदेतो दूसरा प्रकृत 
प्रक्रत ओर अप्रक्रत दोनों का देष केवर वहीं होता है जहां केवल विदोषण भ॑ समानता 
होती है [यथा समासोक्ति में] कित इस पमे चिकेष्यों मे भी समानता हदे । इसलिए यहं 
पद्य चाब्दद्धाक्ति मूलक ध्वनि का स्थल [दो सकताजैसाकवि मम्मटनेभी मानादे] दैः टच्ेषका 
नदीं । इसक्िए यहां दलेषाटंकार नदीं है । [ वस्तुतः ] यर्दा ध्वनि भी नहींहे। इसलिषए कि 
'जलद-म॒जग-जः पद म जो रूपक हआ है उसके वल से गरर-रूपी अथं दउाब्ददाक्ति [ अभिधा | 
सेष्ी प्रतीत दहो जाताहै। इस प्रकार यहां रिलष्ट शाब्दमूकक रूपक ही अलंकार हे । दां यदि 
यहां (जल्द -मुजगजः के रूपक के द्वारा भी गरक रूपी अथे [ असिधाद्वारा कथित न होकर | 
व्यंजना द्वारा हयी प्रतीत होतो उसे ध्वनि का विषय कद जा सकेगा । किन्तु जव यहां 
जलदभुजगज-पद में रूपकदहो रदा दहैतव उसी के आधार पर विषद्ब्द मेभी रिल्ष्टशब्दमूकक 
रूपक ही मान्य होगा । एेसा न मानने पर (जख्दयुजगजः? का रूपक निरथैक ठहरेगा । कर्याकि गरल- 
रूपी अर्थं की प्रतीति उस रूपक के विना भी [ व्यंजन दारा | प्रतीत हो जाती हे । अस्वुः-भधिक 
विवेचन से कोड खाभ नदहीं। | 
विमर्चः- प्रक्रताप्रक्रतनिष्ठ दलेष भी दरेषाल्कार होता है यदि यह मान च्या जायं तौ 
समासोक्ति का उच्छेद हो जाता है उसी में केवल विपणो की उमयाथेकता वे कारण अप्रकृत 
अथं की प्रतीति होती दै। अप्रक्रतार्थं की प्रतीति मी विदेषणश्चब्द व्यंजना द्वारा कराते दै, 
अतः वहु दोनो अथे वाच्य नहीं होते । इस प्रकार दौ वाच्य अर्थम दही र्टेप मानकर प्रक्रताप्रक्र- 
तोभय मे भी एक साथ इरेष मान लेना असमव है, क्योकि अप्रक्रुत अथं वहो कमी मी वाच्य 
नहीं होगा जौँ उसके साथ प्रक्रत अथं रदेगा । वदाँ अभिधा केव प्रकृत अथेमे सीमित रहेगी । 
यदि दोनाँ अर्थ कौ प्रतीति दहो जाने पर ग्रकृतत्व ओर अग्रकृतध्वकी प्रतीति मानी जाय ओर 


प्रकृतत्वे की प्रतीति को अप्रक्ृता्थं की अमिधा में वाधक न माना जाय तो उस प्राथमिक प्रतीति 


रूपकाटड्ारः १२ 


मे उलेष तो माना जा सकेगा, किन्तु उपे अल्कार नहीं कहा जा सकेगा क्योकि वद्य चमत्कार 
समासोक्ति से ही दोगा, अतः उसी में जलंकारत्व माना जायगा । टीकाकार ने प्रकृताप्रक्ृतोभय मेँ 
कदाचित इेपाक्कार स्वीकार न कर केवल इल्ष स्वीकार किया है । यदि टेसा है तो वह मान्व है । 
ददारूपक के टोकाकार धनिक ने “उदामोत्कखिकाम्‌ः इत्यादि उपमापच म समासोक्ति स्वीकार 
की हे ओर -अप्रस्व॒तप्रशंसा के ध्येनास्यभ्युदितेन'” पयसे मम्मट नै मी। व्हा समासोक्तिपदः 
केवर तुल्यविशेषणमात्र के किष प्रयुक्त किया गया माना जाता है। अल्कारत्व उपमा मोर 
अप्रस्तुतप्रशंसा में दी माना-जाता हे । इसी प्रकार समासोक्ति मेँभो रलेष का अथं यहां पृ 
विदरेषित एकन्रन्तगतफलद्रयन्यायेन द्व यथकतामात्र या दो अर्थौ का आपस में चिपटेरहना ही सानना 
होगा । प्राचीन आचायां ने इलेप को मदत दिया है ओर अरुंकारान्तरस्थल वें भीउसी को अलंकार 
माना हे, चिन्तु यद्‌ नहीं कहा जा सकता कि विमरिनोकार उन्दी के अनुसार विवेचन कर रहे है, 
कयाकि प्राचौर्नो के इस मत का मन्म ने नवम उल्लस मै भलीमोंत्ति खण्डन कर दिया है ओर 
पिम डिनीकार उन्दां के अनुयायौ है, किन्तु अगे स्वयं अकंकारसर्वस्वकार ने मौ प्रक्ृतामक्रतो- 
भयगत इलेष स्वीकार किया है । ठीकाकार ने उन्दों के अनुसार यद दरेषविवेचन किया है । 


ख्पक का इतिहास :- 


भरतमुनि = “स्वविकव्पेन रचितं वुल्यावय वरक्षणम्‌ । 
किंचित्सा रयसंपन्नं यद्रूपं रूपो तु तत्‌ ॥ १६ ॥ ५६ ॥ 
जपने | उपमान के | रूप से निकूपित जो उपमेय का रूप वही रूपक होता है । उप्के दो 
मेद होते हैँ सांग [ तुल्यावयव ] जओौर एकदेशविवतीं [ किचित्सादरय ] । <, > 
उदाहरण = “पद्माननास्ताः ङुखदभ्रभासा विकारानीरो त्ङ्चारुनेाः । 
वापीस्त्रियो हंसङ़रेः स्वनद्धिविरेजुरन्योन्यमिवालपन्त्यः ॥' 
भामह = उपमानेन य॒त्‌ तत्वमुपमेयस्य रूप्यते । | 
युगानां समतां दृष्टवा रूपकं नाम तद्विदुः ॥ २ । २९ ॥ ` 
समस्तवस्तुविषयमेकदेरशविवत्ति च । ` ^. 
दषा रूपकमुदिष्टमेतत्‌ “““* "००२ २२८ 


गुणां की समता देखकर उपमेय का जो उपमान के साथ जभेदया ताद्रूप्य बतलाया जाता है 
उते रूपक कदा गया हे । यह दो प्रकार का होता है ९-- समस्त वस्तुविषय ओर र--पकदेञ्- 
विवत्ती । | | (111. 10 17 {1 
-वामन = उपमानेनोपमेयस्य युणसाम्यात्‌ तच्ारोपो रूपकम्‌” । ५ । २ । ६। 
यणा क साम्य से उपमेय का जो उपमान के साय अभेद्‌ वह रूपक ।' 
उद्धर = श्रुत्या सन्वन्भविरहात्‌ यत्‌ पदेन पदान्तरम्‌ । 
यणदृत्तिप्रधानेन युज्यते रूपकं त॒ ततः ॥ १। ११॥ | ्‌ | 
 अभिधादारा सम्बन्ध न हो . सकने पर लक्षणाद्वारा पद का दूसरे पद के जो संबन्धित होता 
ङ वही रूपक हे । भेद = | | | 
“वन्धस्तस्य यतः शरुत्या श्रुत्यर्थाभ्यां च तेन तत्‌ ।. 
समस्तवस्तुविषयमेकदेदाविवत्ति च ॥ १। १२ ॥ ` 
समस्तवस्ठुविषयं मारारूपकमुच्यते ॥ ` 
च 
यद्‌ नकदेाडृत्ति स्यात्‌ पररूपेण रूपणात्‌" ॥ १३ ।+ ` 


१ 


१३४ अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


यह यातो पूराका पूरा शब्द दवारा ही प्रतिपादित रहता टै या तो अंतः शब्द ओर अंशतः 
अर्थं दारा इस कारण इसके क्रमराः दो भेद हो जाते हैँ । समस्तवस्तु विषय तथा एकदे राविवतत्तौ । 
समस्तवस्तुविषय को माङारूपक मी का जाता हे । एकदे शविवत्तीं रूपक केवर एक स्थान मं 
उषमान के स्पष्ट उव्लेख न दोने से दोता है। कारिका में आए “एकदेदाव्त्तिः?-राब्द का विग्रह 
प्रतीदारेन्दुराज ने इस प्रकार किया है--““एकदा अन्यदा ईद्ाः प्रमविष्णुयांऽसो वाक्याथैः तदवृत्तित्वं 
रूपकस्यासिमतम्‌ 1 


अथात्‌ एकदा = एकवार ईडा = प्रभावपृणं जो वाक्याथ उसमे वृत्ति = रहने वाखा रूपक । यद्‌ 
णकं विचित्र व्याख्या है । यहां जो गुणवृत्ति खब्द आया है उसका अथं गोणी सारोपा रक्षणा 
हे । [ द्र° काव्यप्रकाड उल्छास-२ ]। 


रुद्रट = “त्र गुणानां साम्ये सत्युपमानो पमेययोरभिदा 1 
अविवक्षितसामान्या कल्प्यत इति रूपकं प्रथमम्‌ ॥ ८ । ३८ \ 
उपस्जंनो पमेर्य कृत्वा तु समासमैतयोरुभयोः । 
यत्तु प्रयुज्यते तद्‌ रूपकमन्यत्‌ समासक्तम्‌ ॥ ८ । ४० ॥ 
सावयवं निरयव संकौण चेति भिद्यते भूयः । 
यमपि पुनदिपेतत्‌ समस्तविषयेकदेरितया ॥ ४१ ॥ 
जहाँ साम्य हो ओर उसके आधार पर उपमान तथा उपमेय का जातिनिरपेक्ष [ अविवक्षित 
सामान्य ] अभेद वही रूपक कहलाता दै । जाँ उपमान ओर उपमेय दोनो का समास होता है 
ओर उसमे उपमेय अप्रधान रहता वह रूपक समासरूपक कदराता हे । इसके सावयवः, 
निरवयव घौर संकीणये तीन मेद होतेदैँः। यह दोनों प्रकार का रूपक समस्तवस्तुविषयः 
योर एकदेशी इस प्रकार से पुनः दो दो प्रकार कादहोतादहे। 
= (तद्‌ रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः । 
समस्तवस्तुविषयं श्रोता आरोपिता यदा ॥ 
श्रोता आथांश्च ते यरिमन्नेकदेदाविवत्ति तत्‌ । 
साङ्गमेतन्निरगं तु यड माला त॒ पवेवत्‌ ॥ 
नियतारोपणोपयः स्यादारोपः परस्य यत्‌ । 
तत्‌ परम्परितं दिष्टे वाचक मेदभाजि वा ॥ 
उपमान ओर उपमेय का अभेद रूपक होता है । वह तीन प्रकार का होता है साङ्ग ( सावयव); 
निर्ग ( निरवयव ) तथा परम्परित । इनमे सेसांगदो प्रकारका होता है समस्तवस्ते विषय 
अर्थाद्‌ जिसमे समी आरोपित पदार्थं शब्दतः कथित होते हँ ओर एकदेशविवत्ती-- अर्थात्‌ जिसमें 
क्छ आरोपित पदार्थं राब्दतः कथित ओर ऊुछ अथतः प्रतीतिगोचर होते हे । यह निरंग रूपक 
यातो माडारूप होता था केवलया शुद्धं परम्परित मं एक आरोपदूसरे आरोपका कारण 
होता है । इसमे कहीं तो उपमान ओर उपमेय दोनो का कथन किसी एकं दौ दिष्ट पद से होता 
है, कहौ कहीं दोन का परथकः-पृथक उव्टेख रहता है । दोनो प्रकार का यद्या तो मालारूप दता 
है या केवर या शुद्ध । इस प्रकार रूपक आठ प्रकार का होता है । 
शोभाकर का रूपकनिरूपण विमर्दिनी मे आए आरोप के संदभेमे दिया जा चुका हे। 
इस प्रकार मम्मर भौर अलङ्कार सर्व॑स्वकार दोनों का रूपकनिरूपण सिद्धान्तः एक ओर 
अभिन्न है । दण्डी की “उपन्नैव तिरोभूतभेदा रूपकमिष्यते यह एक पक्ति यहो किसी मी प्रकार 
तेआ गई ह। वैसे दण्डी काकोई प्रमाव अलंकरारसवस्व में नदीं दिखता । 


परिणामाखडूनरः १३५ 


संजीविनीकार ने रूपक का विवेचन संग्रहकारिकाओं मे इस प्रकार उपनिवद्ध किया दै- 

“यत्‌ त्वभेदप्रधानं स्यात्‌ साधम्यं तद्‌ द्विधा मतम्‌ । 

आरोपाध्यवस्ानाभ्यामारोपे रूपक भवेत्‌ ।। 

वस्तुतो मेद सद्मावाद्‌ शङ्क्या नातिडायोक्तिता । 

विषयस्यानपहुत्या न चेतत्‌ स्याद पहेत्तिः ॥ 

ततो विषयिषूपेण रूपवान्‌ विषयो यतः । 

आरोपणेन क्रियते तेनेतद्‌ रूपकं मतम्‌ ॥ 

भेदस्तृतीयो यस्त्वत्र परम्परितसज्ञकः। 

साधरम्येणेव तत्सिदधितधम्यैणापि दृश्यते ॥ 

विषय्यारोप्यते येन प्रतिस्वं विषयेषु तत्‌ । 

भवेद्‌ विषयसंख्यात्वं संख्याभेदे विधमिणः ॥। 

रूपकं पुवंसंसिद्धं रेषसुत्थापयेद्‌ यदि । 

तदा रूपकमेव स्यादन्यथा इलेष इष्यते 1“ 

अमेदप्रधान साधम्यं दो प्रकार से होता दै आरोप ओर अध्यवसान से। इनमे से आरोप होने 

प्र रूपक होता है । इसमे भेद वस्तुतः रहता है इसङ्िएट इसे अतिशयोक्ति नदीं कहा जा सकता ओर 
न अपहृति ही, क्योकि इसमे विषय छिपाया नदी जाता । इसङ्िए क्योकि ह्समें विषयी विषय को 
आरोप के द्वारा अपने रूप से रूपित करता है अतः यह रूपक माना जाता है। इसका जो तीसरा 
मेद परम्परितं रूपक है उसकी निष्पत्ति साधम्य कै अतिरिक्त वेधम्येसे भीहोती है। इसमें 
[ विष्यो में से एक-एक करके | प्रत्येक विषय पर विषयी का आरोप होता है अतः उस [ विषयी | 
मे विषय की संख्या चलो आती है ओर भिन्न धमै से युक्त होने पर भी उस [ विषयी ] मे विषय- 
लिङ्गता का समावेश भी कर दिया जातादहै। पहले से निष्पन्न होकर यदि रूपक रलेष की 
उद्भावन को जन्म दे तो वहां अलंकार रूपक दी माना जावे; ईस्तके विपरीत इरेष ही अलङ्कार 
माना जाता है । 


[ सवेस्व ] 
[ सू० १७ ] आरोप्यमाणस्य प्रकृतोपयोभित्वे परिणामः । 


आसेप्यमाणं रूपके प्रङतोपयोगित्वाभावासपरकृतो परञ्जकत्वेनेव केव- 
द्ेनान्वयं भजते परिणामे तु प्रकृतातमतया आसोप्यमाणस्यो पयोग इति 
प्रकृतमायेप्यमाणरूपत्वेन परिणमति । आगमाचुगमविगमख्यात्यभावात्सा- 
ख्यीयपरिणामवेलक्षण्यम्‌ । तस्य सामानाधिकरण्यवेयधिकरण्यप्रयोगाद्‌ 
द्ेविध्यम्‌ । आद्यो यथा-- 


^तोतत्वां भूतेकामोलिल्जममरधुनीमात्मना प्तौ वतीय. 
स्तस्मै सोमिन्निभनेत्नीमयसु पहतवानातरं नाविकाय ¦ 
 व्यामग्राह्यरतनीभिः शवरयुवतिभिः कोतुकोदशओ्चदक्षं 
छच्छरादन्वीयमानस्त्वरितमथं गिरि चि्रक्रूरं प्रतस्थे ॥' 


.१३द अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


अचर सोमिर्तिमेर्यी धकृता आसेप्यमाणसमानाधिकरणातर रूपत्वेन 
परिणता । आतरस्य सेत्जीरूपतया प्रकृते उपयोगात्‌ । तद यथा समा- 
साक्तावारोष्यमाणं प्रक्तोपयोगि तच्चासेपविषयात्सततया तच स्थितम्‌ , 
अत एव तत्र तच्यवहारसमासोपः एवमिहापि ज्ञेयम्‌ › केवटे तज विषयस्यैव 
प्रयोगः, विषयिणो गम्यमानत्वात्‌ ! इह तु इयोरम्यभिधानम्‌ , तादात्म्यात्‌ 
तु तयोः परिणामित्वम्‌ । द्वितीयो यथा- 
अथ पक्घ्रमताभुपेयिवद्धिः लरसेवंक्रपथाधितेवंचोभिः 
क्षितिभतंरखुपायनं चकार प्रथमं तत्परतस्तुर॑गमायेः ॥ ` 
राजसंघटनै तूपायनमुचितम्‌ । तच्चान्न वचोरूपमिति वचसां व्यधि- 
करणो पायनरूपत्वेन परिमामः । 


[ चत्ति ] रूपक मेँ आरोप्यमाण केवल प्रक्रत अथं का उपरंजक [ दोभावधेक ] दोता दै, क्योकि 
वह॒ प्रकृतोपयोगी नदीं होता । परिणाम में आरोप्यमाण का प्रकरेतर्पसे उपयोग मीदहोता है 
इसलि« प्रक्रत यहां आरोप्यमाणरूप से परिणत होता हे। सांख्यद्ाख्र के परिणाम से यद 
[ अलकारभूत ] परिणाम भिन्न होता दहै, इसङिएट कि इसमें आगम, अनुगम तथा विगम की ख्याति 
[ ज्ञान ] का अमाव रहता हं। 

उस { परिणाम ] केदो भेद होते हं । एक वह जिसमें सामानाधिकरण्य का उपयोग किया 
जाता है ओर दूसरा वह जिसमे वेयधिकरण्य का । इनमें प्रथम का उदाहरण-- 

` { एक लक्ष्मण ओर दूसरी सीताजी इनके अतिरिक्त ] तीसरे स्वयं [ सगवान्‌ राम ] ने दंकर- 

जी की मोलिमाखा देवनदी [गंगाजी ] को पार किया तथा नाविक [ निषाद गुह] को लक्ष्मण 
की मैत्री उतरादै के रूप में दी, इसके पश्चात्‌ वे अतिशीघ्र चित्रद्रूट गिरि की ओर चले । उस 
समय उनके पीछे वे कौतूहल्वद्य ओँखे उठाकर द्ावर प्रमदा कठिनाईं से चट र्ट थीं जिनके स्तन 
दोनो मुजाएं फकाने पर पूरी तरह से पकडे जा सकते थे । [ व्याम = व्यामी बाहोः सकरयोस्तत- 
योस्तर्यगन्तरम्‌ = अमरकोषः, पंजोँ सदित बाजू की जोर फटे दार्थ का फोसका व्याम ]। 

यहो लक्ष्मण की मत्री प्रक्रत दै ओर वह ( आतरम्‌ इस प्रकार) उसी की कारकविभक्ति 
[ द्वितीया ] के साथ प्रयुक्त तथा अभिन्नरूप से विवक्षित अतर के स्प मं परिणत दहो 
रही है, क्योकि आतर का प्रक्रत मं. उपयोगं मेत्रीरूप से दी..दो:सकतां हे । इसे प्रकार 
जेते समासोक्ति मेँ आरोप्यमाण [ अप्रकृत ] अरक्रतोपयोगी होता हे ओर वह्‌, वह आरोपविषयरूप 
से ही अवस्थित्‌ रहता है जिस कारण उस्‌ [ आरोप्यमाण अप्रकृत ] . के, केवकं व्यवहार काही 
[-म्रकृत व्यवहार परर ]आसेप होता है यदी स्थिति य्दा भी समञ्चनी चाहिए । [ अन्तर ] केव 
[ इतना ही रहता है किं] वहाँ [ समासोक्ति मे] केवल विषयमात्र शब्दतः [ अभिधादृत्ति से ] 
कथित होता है क्योकि वहां विषयी व्यंग्य [ व्यंजनावृृत्ति से कथित ] रहता है, ओर यरद [ परिणाम 
मं ] दोनो ही अभिधा द्वारादींकदेजातिदहैः। परिणाम इनमे श्सङिएट माना, जाता कि इनतें 
तादात्म्य रहता है! ~ ` 

दूसरा यथा-- ` | 

सके पश्चात्‌ पदे तो परिपाक को प्राप्त तथा सरस किन्तु वक्रोक्तिपूणे वचनो से राजाका 


उपायनं [ उपहार ].क्रिया उसके पश्चात, घोडा आदितसे। ,. , < 


परिणामाटङ्कारः १३७ 


यँ राजा के भिल्ने पर उपायन [ भट ] देना आवदयक [ उचित ] होता हे । यहां वड वचन- 
रूप है शसखिए यहां वचनो का भिन्नविभक्तिक उपायन के रूप से परिणाम हे! 


विमद्दिनी 
आसोप्यमाणस्येत्यादि । आरोप्यारोपविषयभावसाम्येऽपि रूपकाट्रेलक्षण्यं द रायन्नेतदेव 
ञ्याचश-आरोप्यमाणमित्यादिना । म्रकृतोपरजकत्वेनेत्ति । यदुक्तस्‌--विषयिणा विषयस्य 
रूपवतः करणाद्रुपकमिति । प्रकृतात्मतयेति । भ्रक्रताङ्गतयेस्यथः । उपयोग इति । तेन्‌ विना 
ग्रक्ृताथस्या निष्पत्तेः । परिणमतीति । भ्रक्रतसम्रक्ृतव्यवहारवि शिष्टतयाव तिष्ठते 1 म्रक्रत- 
रव रूपमात्रावस्थाने प्रकरणाथानिप्पत्तेः 1 एवसत्र प्रकरणो पयो गिद्वाभावादिव्यारोप्यमाण- 
स्योपयोग इति चान्द यञ्यतिरेकाभ्यां प्रकृतो पयो गिलवस्यासाधारणववं ` दितम्‌ । असा- 
धारणत्वस्य हि धम॑स्य तच्वग्यवस्थापकस्वाज्ञत्तणत्वम्‌ । अतश्च नस्त्येवारुकारान्तरेषु 
भरक्ृुतोपयो गिस्वम्‌ । एवम्‌- े 
आशज्ञास्यमन्यस्पुनसुक्तभूत श्रेयांसि सवाण्यधिजगसुषस्ते 
पुत्रं छुभस्वार्सगुणानुरूपं अवन्तमीडय भवतः पितेव ॥ 
इद्यत्रोपमायाम्‌ , "अत्रान्तरे सरस्वत्यवतरणवार्तामिव कथयितुमवततार मध्यम 
रोकमंशमालीः इव्याद्‌बुत्प्रे्तायाम्‌ , 
(मन्द्‌ रमेहक्खोहिअससिकरूहसपरिअ(मु)कसरिलोच्छृङ्गम्‌ ! 
मरगञसेवारोव रिणिगण्णतु हिक्मीणचक्ाजज्ञजम्‌ ॥ 
इव्यत्र च रूपके तथान्यारुकारेष्वौचित्यमेव नोपयोगः । ओचिव्यं हि सिद्धस्य सखतः 
ग्रकरतार्थो पलस्भकं भवति । उपयोगः पुनः सिद्धावेव प्रङ्ृताथंहेतुतां भजते इत्यनयो 
महान्भेदः 1 तथा हि- 
अनन्वये च शाब्देक्यमो चिप्यादानुषद्गिकम्‌ 1 
अस्मिस्तु काटानुप्रासे साक्तादेव प्रयोजकम्‌ ॥' 
इस्यत्रेकस्ये उ शब्देक्यस्योचित्योपयोगाभ्यां मेद्‌ उक्तः। अतश्चौचित्योपयोगयोभंद- 
मजानद्धिः सवत्रेव प्रक्ृतोपयोगिस्व मन्ये यदुक्तं तदयुक्तम्‌। तस्माद्रपकादन्य एव परिणामः। 
इह पुनः अप्रक्रृताथस्य प्रङ्ृताथारोपमन्तरेण सिद्धिरेव न भवतीति प्रकृतोपयोगितेव 
जीवितम्‌ । 
दाहोऽम्भः प्रदतिपचः प्रचयवान्‌ बाष्पः प्रणारोचितः 
शासाः प्रङ्कितदी प्रदीपरूतिकाः पाण्डिम्नि मग्नं वपुः। 
कि वान्यत्कथयामि रात्रिमखिलां व्वन्मागंवातायने ` 
 हस्तच्छुत्रनिशुढ चन्दमहसस्तस्याः स्थितिवेतंते ॥* 
, अच्र हि च्छस्त्रारोपमन्तरेण चन्द्रातपरोघ एव न भवतीति तश्य म्रकृतोपयोगिस्वम्‌ । 


अतश्च प्रकृतमप्रक्ृततया परिणमतीति परिणामः। ययेवं तहिं सांख्यीयप्रिणामादस्य 
को विरोष इत्याशङ्कयाह-आगसेत्यादि । 


जदद्धमान्तरं पवंमुपादत्ते यद्‌ ह्ययम्‌ । 
तस्वादप्रच्युतो धमीं परिणामः स उच्यते ॥' | 
इति सांख्यीयपरिणामलत्षणमर्‌ । भेत्त्रीरूपतयेति ।¦ मेन्यास्मतयेस्यर्थः । उपयोगादिति । 
आतरमन्तरेण तरणायोगात्‌ । अतश्च प्रकृते यत आतरस्यो पयोगस्ततश्च प्रकृताया एवं 


=+ 


१३८ अलड्ारसवंस्वम्‌ 


मेभ्यास्तत्कायंकारिस्वात्तद्रयवहारारोपः। एतदेव दृष्टान्तमुखेनापि प्रतिपादयति--तदत्र- 
त्यादिना । अत्रेति परिणामे । समासोक्तौ चारोप्यमाणस्य प्रकृतोपयुक्तसवम्‌ । प्रकृत. 
सिद्धयथंमेवाग्रङतस्याक्तेपात्‌ । आरोप्यमाणमपि तत्र प्रङ्रतावच्छेद्‌ कत्वेन स्थितं न पुन- 
राच्छाद्कत्वेनेव्याह - तच्चेत्यादि । अत एवेति । आरोपविषयात्मकस्वादेव । तत्रेति 
समासोक्तौ । एतदेव प्रृते योजयति-- एवमित्यादि । ययेवं तर्हि समासोक्तिपरिणामयोः 
| को विशेष इत्या्ञङ्कथाह-- केवलमित्यादि । तयोरिव्यभिधीयमानयोट्रंयोः। उचितमिति । 
| उपयुक्ततयेति शोषः। 
 आरोप्य-आरोपविषयत्वरूपी सम्बन्ध का साम्य रहने पर मी रूपक से भिन्नता दिखलाते हए 
इसी [ परिणाम ] की व्याख्या करते है = आरोपष्यमाणम्‌० आदि के दारा । 

प्रक्रतोपरञ्जकत्व जेसा कि [ स्वयं मन्थकारने दही] कदा दै- “विषयी के द्वारा विषय का 
अपने रूप से युक्त बनाए जाने के कारण रूपक कदलाता दै ।' 

ग्रकृताद्मतया प्रकृत के अंग के रूप से = उपयोग क्योकि उसके विना प्रकृत अर्थं को निष्पत्ति 
नदीं होती । परिणमति ` प्रक्रत अप्रकरत कै व्यवहार से विदिष्ट होकर प्रस्तुत होता है। यदि 
केवर प्रकरतस्वरूपमात्र से प्रस्तुत दहो तो प्राकरणिक अथं खी निष्पत्तिन हो । शस प्रकार यहां 
्रकरणोपयोगित्वाभावः तथा “आरोप्यमाणोपयोगः दो पर्दो के दारा अन्वयव्यतिरेक दिखलाकर 
[ परिणाम में विषयी के ] प्रकरृतोपयोगित्व की [ अलंकारान्तर से ] असाधारणता दिखलाई । यह 
इसटिए कि जो धर्म असाधारण होता वह वस्तु का मूलभूत रूप [ तत्त ] स्थापित करने वाला 
होता है, अतः उत्ते उस वस्त॒ का लक्षण कहा जाता है । इससे यह सिद्ध हआ कि अन्य अल्कारों 
मे प्रकृतो पयोगित्व नदीं रहता । इस प्रकार-[ कौत्स की रधु के प्रति उक्ति = रघुवदय स्ग-५ | 
समी श्रेय प्राप्त कर चुके आपके छिए अन्य कों चाहने योग्य वस्तु [ उसकी प्रापि का आश्ीवांद ] 
निरथेक दोगा । आप आत्मयुणों [ आपके अपने गुण तथा राजा के व्यक्तित्व के किए (आत्मसम्पत्‌ः 
नाम से राजडार्खो में निर्दिष्ट गुण ] के अनुरूप पुत्र उसी प्रकार पां जिस प्रकार आप के 
पिताने आप जसे स्तुत्य पुत्र कोपाया है) यदां उपमा म; “इस वीच सरस्वती के अवतार की 
वात कहने के किए मानो, सूयं भगवान्‌ मत्य॑ोक में अवतीणे हट ।” इत्यादि उत्प्रेक्षा मे, तथा- 


^“मन्दरमेधक्षोभित-शरि-कलदंसपरि मुक्तसलिखोत्सङ्गम्‌ । 
मरकत-रोवालोपरि-निषण्णमीनचक्रवाकयुगम्‌ ॥ 

(मन्दराचलरूपी मेघ से क्षोभित चन्द्रमारूपी राजहंस छोड चुका हे जलरूपी गोद जिसका 
तेथा मरकत [ हरितमणि ] रूपी शौवार पर बैठे हृए है चुपचाप मीन ओर चक्रवाक के जोड़े 
जिसमें ।--इस रूपक मेँ ओर इसी प्रकार अन्य अलंकारो मे मी ओचित्यमात्र है उपयोग नहीं । 
ओचित्य जो है वह उसी पदार्थंको प्रकृत पदाभैरूप बनाने मे सहायक हदोताहै जो पहलेसे 
सिद्ध रहता है [ जिसे सिद्ध करने की आवद्यकता नदीं पडती ] भौर जो उपयोगं है वहतो 
भ्रकृतपदार्थकूप वनने के किए [ अप्रङृतपदाथं की ] सिद्धि [ प्रकृत क्रियान्वय ] में हेतु बनाता है । 
इस प्रकार इन दोनों मे महान्‌ भेद होतादहैँ। जेसा कि पहले--“अन्वय मे दाब्दं की 
आदृत्ति [ रेक्य ] ओौचित्य के [ अर्थात्‌ होनी ही चाहिए श्स ] कारण होती हे अतः वह आनुषङ्गिक 
दोती है। खरनुप्रास म वह स्वरूप निष्पादिका होती है ।2- इस स्थल में एक ्ी राब्दैक्य में 
भओवित्य तथा उपयोग के आधार पर भेद बतलायां गया है । इस कारण ओचित्य ओर उपयोग का 
भेद न जानने वाठे जिन रोगों ने समी स्थल मे जो प्रक्रतोपयोग बतलाया गया है वह टीक नहीं 
ह । इसक्ए परिणाम रूपक से भिन्न द्य है । यहाँ [परिणाम मे] प्रकृतार्थं पर [अप्रकृतार्थं के] आरोप 


परिणामालङ्ारः १३९ 


के विना अप्रकृत अथै की सिद्धि [सुख्यवाक्याथं मे अन्वय] नदीं होती, अतः यहां प्रकृतोपयोगिता हीं 
सर्वस्व है । 


“दाद्‌ इतना है किं पसो [ अंजलि ] मर पानी तक को खुखा दे, ओं इतने उमड़ रहे हँ किं 
पनाटे से वह्‌ाए जा सके, सांसे डोर रहे ओर टिमरिमाते दिएकी रो बन गईं दे, सारी काया पीडे- 
पन मेँ डव गईं है । ओर क्या कहूं हाथ के छन्ते से चँदनी रोक रोक कर तुम्हारे रास्ते कौ खिड्कौ 
मे वह रात भरवेयादही रह जाती है! - यदं छक आरोपके विना चांदनी का निरोध 
वनता हौ नदीं इसक्ए वह प्रकृतोपयोगी है । इसङिए इसे परिणाम कहा जाता है क्योंकि इसमे 
म्रक्रत अप्रकृत सूप से परिणत दहातादहे। 

“यदि एेसादहैतो सांख्यद्ाख् के परिणाम सेइस परिणाम का क्या अन्तर दे-एेसी 
लंका कर उत्तर देते है- आगम इत्यादि । सांख्यो के परिणाम का लक्षण यह है--“धमीं जरह 
ूरववत्तीं धर्म को छोड़कर दूसरे धम को अपना ले किन्तु उसका स्वरूप [ तत्व ] नष्ट न हो तो जसे 
परिणाम कदा जाता हे 

मेच्रीरूपतया मैत्री रूप से उपयोगात्‌ क्योंकि “अतर ' [ तरण ्युल्क ] के बिना तरना [ पार 
करना संमव नहीं है । इस कारण कर्योकि परकेत मे आतर उपयोग है इसि प्रकृत मत्री पर उसके 
उसके व्यवहार का आरोप दहो रहा कारण कि वह [ मैत्री ] उस [ आतर] का कायं कररहौ 
हे। इसी तथ्यको दृष्टान्त के दवारा मी वतलाते है--तद्‌ अत्र" इत्यादि दारा। अत्र = इसमं 
अर्थात्‌ परिणाम मे समासोक्ति मे भी आरोप्यमाण का प्रक्रत मे उपयोग होता है। क्योंकि अप्रकृत 
का आक्षेष प्रक्रत की सिद्धि केही छ्एि किया जाताहै '"उ्मेमी जो आरोप्यमाण दोतादहे 
वह प्रकृत का अवच्छेदक [ ध्म] होकर ही स्थित रहता है आच्छादक होकर नही” तथ्य को 
प्रतिपादित करते हुए लिखते है--तस्च इत्यादि । अत एव श्सी कारण अथात्‌ आरोप- 
विषयात्मता के कारण । तच्र उसमे अथात्‌ समासोक्ति मे । इसी को प्रकृत प्रसंग में सम्बन्धित करने 
के किए कहा-एवम्‌ इत्यादि । '्यदि ेसा दै तो समासोक्ति ओर परिणाम मे अन्तर क्या दोगाः 
इस राका पर लिखते है--'केवलम्‌? इत्यादि । तयोः = उनका अथात्‌ जो दो अभिधा हारा 
प्रतिपादित होते हे उनका । उचितम्‌ अर्थात्‌ उपयुक्त रूप से । 

विमश्ः-विमरिनीकार ने अन्य अन्य अरुकारो मेँ अप्रकृत के प्रक्रतरूप होने की जो बात 
कही है वही रलाकरकार ने भी कयै है किन्तु उन्दोने इसे दूसरों कामत कहा है । संभव है यह 
मत अरुकारभाष्यकार ने . प्रस्तुत किया हो जो अप्राप्य है । इतिहास-पूतरैवत्ती आचाय मे से मरतः 
आमह, दण्डी, वामन, उद्धट, रुद्रट तथा मम्मट-इन सभी आचार्यौ में परिणाम नामक अल्कार 
नहीं मिता । उसका प्रतिपादन ही नहीं खण्डन भी इनके गन्धो मे नहीं है। स्पष्ट ही यह स्वयं 
मलंकारसगस्दकार की ही सृक्च है । परवत्तीं शोभाकर के दी समान पण्डितराज जगन्नाथने 
रसगंगाधर में परिणाम को अलकार माना दहै, किन्तु उन्हँ ने अल्कारसर्वस्वकार के परिणाम 
निवैचन में वाञ्छित स्पष्टता कौ कमी वतलाई है। उन्होने “आरोप्यमाणस्य भकृतोपयोगित्वे 
परिणामः" इस सूत्र से लेकर “प्रकृतमारोप्यमाणतया परिणमति" इस वृत्ति तकका अंश 
अविष्छलरूप से उद्धत कर छ्िखिा है कि “भारोप्यमाण के प्रञ्रतोपयोगः" का अभिप्राय यदि प्रक्रत 
कायं मे उपयोग हो तो अलंकारसवंस्वकार द्वारा ही उदध्रृत “दासे कृतागसि इस रूपक के 
उदाहरण में खेदरूपी प्रहृत काय॑के कोयं का उपयोग काही स्थर मानना होगा ओर यदि 
श्रकरृत = विपय तद्रूपं से उपयोग" ेसा अभिप्रायदहो तो ग्यधिकरण-परिणाम के उदाहरण 
के रूप में उद्धृत “अथ पक्त्रिमता० इस प्रमे परिणाम नहीं मानाजा सकेगा । क्योकि 
याँ वचन आरोप विषय है ओर उपायन आरोप्यमाण ओर वह आरोप्यमाण उपायन स्वरूप से 


१४० अलङ्कारसवेस्वम्‌ । 


डी राजा से मेट करने रूपी अथ मं उपयुक्त होता दै, वचनकर्प से परिणत होकर नहीं । वल्क 
उलट वचनो का ही उपयोग तव समव हो पातादहे जव वे उपायनरूपसे चिदितदोतेदैः। इस 
किए इस “अथ पक्त्रिमता०'? पच को वस्तुतः व्यधिकरण रूपक का उदाहरण माना जाना 
चाहिए । | 
पण्डितराज जगन्नाथ ने एक तथ्य को गोर आर ध्यान आङ्ृष्ट किय है । वह यह फि परिणाम 
मं यह्‌ मानना वास्तविकता के विरुढ है ओर ससे उल्टे रूपक की सिद्धि होती हे कि “परिणाम में 
भ्रक्रृतपदा्थं अग्रकृतपद्‌ाथं रूप से परिणत होता है 1 उनके अनुसार माना यह जाना चाहिए 
विः परिणाम में अप्रकृत प्रक्ृतरूप से परिणत द्योता है। अलंकारसवैस्वकार आर तिमद्धिनीकार 
दोना ने प्रकरेतकोही अप्रकृत रूप से परिणत होता हज मानादहे। दोनों.के वीच इए अल्कार- 
रलाकरकार्‌ ने “ग्रकरतमप्रकरतरूपतया परिणमतीति परिणामालक्कारः इस प्रकार प्रक्रत कौ दी अप्र 
कतरूप से परिणत होता माना हे । पण्डितराज का दी मत यद्य मान्य है । 
दमारो दृष्ट से परिणाम अलंकार नहीं दोष दै। जिसका उपयोगन दहो सके उसका कान्य- 
प्रयोग निरथक होता है जो अपुष्टा्थैत्व दोष दे । कदाचित्‌ इसी कारण पूदवरत्ताो किसी मी आचाय 
ने परिणाम नामका कोई भो अलंकार नहीं माना। उन्दने किसी अन्य नाम सेभमीशसयारेसे 
अल्कार्‌ का निवंचन नहीं किया । 
सजीविनीकार ने परिणाम का पूण विवेचन संग्रहकारिकाओं मेँ इस प्रकार प्रस्तुत 
किया दै- 
“आरोप्यमाणः म्रक्रते यद्ासावुपयुज्यते । 
परिणामस्तदा तेन रूपकादस्य सिन्रता ॥ 
रूपमात्रसमारोपाद्‌ रूपके व्यज्को द्यसौ । 
व्यहारसमारोपादिह स्यात्‌ प्रकरतान्वयः ॥ 
 , मवेदप्रस्तुतत्वेन रूपके ग्रकरतस्थित्तिः । 
` परिणामस्षमास।क्त्योज्ञातव्योऽस्माद्‌ विपयंयः ॥ 
उपादानानुपादानक्ृतो मेदस्तयोर्भिथः ।' 
आरोप्यमाणका प्रकृत में उपयोगहो तो 4ह परिणामदहदोता दहं । इसोसे परिणाम रूपके 
मित्र होता हे । रूपक में तो रूपमात्र का आरोप [ अभिधा््तिद्वारा | होतादहै जव चिं परिणाममें 
व्यवहार का, ओर वह भी -व्यंजना दारा । रूपकमें प्रक्रत अप्रकृतरूप से रूपित रहता है ओर 
परिणाम में समासोक्ति के समान इसके विपरीत प्रकृत अप्रछतह्प से। उन दोनों [ समासोक्ति 
ओर परिणाम | म परस्पर म मेद यह है किं परिणाम में आरोप्यमाण मौ दान्दतः कथित रहता है 
जव कि समासोक्ति में नहीं । । 


| सवेस्व | 


[ चच० -१८ 1]. विषयस्य घदिद्यमानस्वे संदेहः 


अभेदप्राधान्ये आसेप इव्यव । विषयः प्ररतोऽथः, यद्धित्तित्वेनाप्रङतः 
सदिद्यते । अप्रकृते संदे विषयोऽपि सखंदिद्यत एव । तेन प्रकृताध्रक्ृतगत- 


त्वेन कविप्रतिभोत्थापिते संदे संदेदाटकारः । | 
[ सू° १८ | "विषय यदि संदे्ास्पद्‌ बतरूया जाय तो संदेह [ नामक अर्थारुकार 


होताद्े |). `. "५11 


सन्देदाटङ्ारः १७९ 


[ ब्र° ] आरोप जिसमे अभेद की प्रधानता होः इतना यहो [ रूपकलक्षण से ] प्राक्षहीदहै 
विषय का अथं [ यहां भी | प्रकृत अथं हं जिसको भित्ति वनाकर अप्रकेत अथेका संदेह किया 
जाता हे । अप्रकृत पर संदेह होने पर [ प्रकृत ] विषय भी संदेह का विषय बन ही जाताहें। 
इस प्रकार रूदेदाल्कार [का निष्कृष्ट रक्षण ] है-- प्रहत ओर अप्रकृत. दोनों [ पदार्थौ ] पर 
कविप्रतिभा दारा उद्धावित सदेहः । 


विमरिनी 

विषयस्येत्यादि । विषयदषयिणोः संबन्धिराब्दस्वाद्धिपयस्यो कररविषयि णोऽप्यात्तेपादन्न 
हणम्‌ । तेन विषयस्य विघयिणश्च संदेहप्रतीतिविषयव्वं सूत्राथेः। नु विषयशब्देन 
वि षथिज्ाब्दस्य संवन्धिङब्दत्वादाक्तेपेऽपि विना चचनसात्तेपसान्नाद्धिषयिणः कथं संदिद्य- 
मानता रुभ्यत इति चेत्‌ , न । अनियतोभयांश्ावरुग्विविसशंरूपत्वाद्विपयमात्रगतत्वेना- 
संभवात्सदेहस्यान्यथालुपपर्या विषयिणस्तत्सं बन्धस्य रुभ्यत एवेति यथासूच्चितमेव 
उयायः । एतदेव वि भञउ्य व्याच विषय इत्यादिना । यद्धित्तित्वेनेति । अन्यथा द्यप्रङ््तस्य 
निर्विंषयस्वमप्रश्तुतामिधानल्कणो वा दोषः स्यादिति भावः । तेन विषयभित्तितया 
विषयिणामेव तथाभावो भवतीव्याशङ्कयाह--अप्रकृतेत्यादि । विषयोऽपीति । न केवर विष. 
यिण एव संदिद्यमानस्वं यावद्धिषयस्यापोत्य पिशब्दाथः । तैन कछचिद्धिबयिणामेव संदिद्ध- 
मानस्वे चिच्च विषयविषयिणोरप्यरकारो भवेत्‌ 1 उभयन्नापि सामान्य कन्ञषणादुगमात्‌ । 
अनियतोभयां्ादरुम्बी हि विसश्ः संशायः। सं च विषयिणासेव भवति । विषय- 
विषयिणोरेव सं दिद्यमानस्वात्‌ । अत एव च प्रक्ताग्रकृतगतत्वेनेति यथासंमवं योञ्यस्‌ । 
प्रतिभोत्थापित इति । न पुनः स्वरसोस्थापितः, स्थाणुवां पुरषो वेव्येवमादिरूप इव्यर्थः । 


विषयेस्यादि । विषय ओर विषयी दोनों शब्द परस्पर सम्बन्धित शाब्द हे, अतः 
केवर "विषयः कै कहने से विषयौ का ज्ञान भी यहाँ आक्षेपसे हो जाताहै। इस कारण सूत्रका 
अथै होगा "विषय ओर विषयी दोनो का संदे दात्मक प्रतीति का विषय बनना । यहो इका होती 
हे कि माना करि विषयिश्चब्द सम्बन्षिदाब्द हे, इसक्िए विषयद्ब्द से उसका आक्षेपद्वारा लाम 
संभव हे तथापि विना राब्दतः कहे केवर अआक्षेपमात्र से प्रतीत विषयी का संदेहविषय॒ होना कैसे 
संभव हे 1 किन्तु एेसी चका ठीक नहीं । इसङ्णि कि संदेह सदा हयी दो अनियत अदां पर निम॑र 
ज्ञान का नाम इ । अतः उसका केवर विषयमात्रगत होना समव नहीं । इस कारण अन्यथानु- 
पपन्ति प्रमाण द्वारा विषयी को विषयसंवद्धता विदितदहो ही नाती ह। इस प्रकार अन्धकार ने 
जैसा सूत्र बनाया वेसा ही कहना अधिक उपयुक्त दै । इसी तथ्य को प्रकट करने के हेत सूत्र- 
गत अथे। कौ विवेचना अलग अलग करते दै--विषय इत्यादि । यद्धित्तिस्वेन अर्थात्‌ यदि विषय 
की भित्ति [ आधार ]न दहो त्तो अप्रकृतं अथे निराधार हो जाए अथवा अत्रस्तुताभिधान रूप दोष 
यहां चला जवे । (यदिपेसादै तो विषय कौ भित्ति पर विषयी ही वैसा [संदोहविषय] बनता ह 
ठेसा हौ क्या न मान ल्या जाय -इस शका पर कहते है - अग्रत इत्यादि । विषयोऽपि विषय 
मी, अथात्‌ न केवल विषयी दौ संदेहविषय बनता, विषय मौ संदेदविषय वनता ह यह है पि = 
राब्द मी-दान्द का अभिप्राय, इससे निष्कं वह निकला किं कहीं तो केवल "विषयी" के दये सदेद- 
विषय होने पर भंदेदारंकार होता है ओर कीं विषय ओर विषयी दोनोंके द्य संदोहविषय 
होने पर । कारण कि दोन) दी दशा मे संदेह का सामान्य रक्षण लागू होता है। संशाय जो है 
वह एेसा ्ञान हे जो दो अनिदिवित अंशं पर निभ॑र हो । यह क्ञान केवल निषयी के विषयमे ही 
होता दै क्योकि संदेह विषय विषय ओर विषयौ दोनो ही होते है । ओर इसीकि श्रकृतामक्ृतगतः 

) १ 


९७२ अलङ्कारसवंस्वम्‌ 


च्छा अथं जहाँ जैसा हो वैसा लगा केना चादिये । प्रतिमोत्थापित अर्थात्‌ साधारणरूप से उत्थापित 
नदीं । जैसा किं "यह ठठदैया आदमीःमेंदहोतादे। 

विमर्शः -सूत्र मे केवल विषय का उल्लेख दै । दृष्ति विषयी को भी जोड्ती हे । टीकाकार 
विषय की अपेक्षा विषयी को दही अधिक महत्व दे रहे दहं । वृत्तिकार नेस्देदकां दो दो वार 
“अनियतोभयांराविषयकः विमद्य = ज्ञान कहा दहे। पण्डितराज जगन्नाथ ने इसके आधार पर 
“साट्ृद्यभूला भासमानविरोधका समवला नानाकोटचवगादहिनी धी रमणीया ससंदेदालढकृतिः = 
अथात्‌ साद्र्यमूढ एेसे खन्दर ज्ञान को सस्देहाल्कार माना जाता दहे जिस्म विरोध मासित शे 
रहा हदो, जिसके विषय एकाधिक पद्राथं हो तथा उन सव पदार्थोमें से किसी एक पर अधिक 
द्ुकाव न हो--इस प्रकार ससदेहाल्कार में विषय ओर विषयी को स्थान देकर ज्ञान में एकाधिक 
विषयकतामात्र को . स्थान दिया है। पिचारना यह दहै किं इनमें मान्यक्याहै। हम रेस। सोचते 
हैः कि सदेह मे महत्त्वपूर्णं तत्त्व है अनिश्चय ओर उसका विषय एकमात्र वही होता टै जिसका 
विचार चरता है अर्थात्‌ प्रस्तुत । इस प्रकार वस्तुतः चमत्कार का कारण विषय का अनिश्चय दै । 
-अन्य पदार्थं उसपर विकरिपत रहते हैँ । वे आगमापायौ होते हैः । उनके ज्ञानचक्र की धुरी प्रस्तुत 
-या वणनीय पदाथ ही होता है । अतः अल्कारसवंस्वकार का सूत्रहीश्स दिरा मे अधिक मान्य 
हे । यह तथ्य ओर सत्य दै कि सदेह में ज्ञान नानाविषयक दही क्षेता है ओर उसमेंभी ज्ञाता 
की सवित्तिधारा का मोड़ संमावना के समान किसी एक दिशा में प्रवर्ता से नर्द होता, तथापि 
संदेदाल्कार से चमत्कार का कारण विषय का विषयत्वेन अनिश्चय दही दहोता है। अतः उसी पर 


अधिक बल देना वैज्ञानिक ओर उचित है। 


[ सवस्व ] 
स च जिविधः। शुद्धो निश्चयगर्भो निश्चयान्तश्च । शुद्धो यत्र संशाय 
एव पयेवसानम्‌ । यथा-- 
“किं ताखूण्यतयोस्यिं ससभयेद्धिन्ना नवा वद्करी 
लरीकप्रोच्छचितस्य कि ठदरिका ठकवण्यवारांनिषेः । 
उद्गाटोत्कलिकावतां स्वसमयोपन्यासविस्म्भिणः 
कि साक्षादुपदे्लयष्िर्थवा देवस्य श्छह्गारिणः।' 
निश्चयगभां यः संखयोपक्रमो निश्चय मध्यः संडायान्तश्च । स यथा-- 
अय मातण्डः कि स खद्धुं तुरगेः सपताभरितः 
छृदाचुः किं साक्चाल्प्रसरति दिशो नेष नियतम्‌ । 
क्रतान्तः किं साक्चान्मदहिषवहनोऽसाविति चिरात्‌ 
समाटोक्याजौ त्वां विदधति विकस्पान्प्रतिभराः ॥' 
निश्चयान्तो यत्न संदाय उपक्रमो निश्चये पयवसानम्‌ । यथा -- 
इन्दुः कि क कलङ्कः सरसिजमेतत्किमम्बु कु गतम्‌ । 
ठलितसविद्धासवचनेमं लमिति हरिणाक्षि निश्चितं परतः ॥' 
कचिदासेप्यमाणानां भिन्नाश्रयत्वेन दश्यते । यशथा-- 
“रञ्जिता ज॒ विबिधास्तसरुदोटा नामितं तु गगनं स्थगितं जु । 
पूरिता च विषमेषु घरित्री संहता च ककुभस्तिमिरेण ॥° 


सन्देहालङ्कारः १७२ ` 


अत्रारोपविषये तिमिरे ५५ तवादिभिन्नाध्रयत्वेनारोपितम्‌ । . के- 
चित्वध्यवसायाश्रयत्वेन स्देहप्रकारमाइः। अन्ये तु चशब्दस्य संभा- 
वनायोतकत्वादस्प्र्चाप्रकारमिममाचक्षते। 

[ वृत्ति | वह्‌ [ स्देहालुकार | तीन प्रकारका होता है (१) शुद्ध (२) निश्वयग्भं ओर 


( २ ) निश्वयान्त । [ इनमे से --( १) ड वह होता है जिसका पर्यवसान संदायमेंदहीहो 
जाता हो । यथा- 


'यह क्या तारुण्यतरु कौ पयांप्त रस लेकर खिली नई मजरी है ९ या लीला से उछलते लावण्य- 
जलनिधि को नन्दीं सी लहर या कि [ उत्कण्ठित जनों में ] अपने अनुरूप प्रवृत्ति का आरम्भ 
देखने से आश्वस्त शङ्गारी देव [काम] के दारा देने के किए गाढतम उत्कण्ठा (हक) से भरे [कामि-] 
जनों को उपदेदा देने के किए ग्रहीत डी १ (२) निश्चवयगभं सदेहालकार वह होता हे। जित्में 
आरम्भ ओर अन्त दोनों में संश्चय रहे किन्तु मध्य मे निश्चय दो । उसका उदाहरण-- 

“यह क्या सूयं है, किन्तु वह [ सूय ] तो सदा सात घोड़ों से युक्त रहता है, क्या यह साक्षात्‌ 
अग्नि है, विन्ु वह एक एक करके दिशाओं मे योजनावदरूप से [ सब दिशाओं मे एक ही साथ ] 


नीं ४ फेरताः तो क्या यह साक्षात्‌ यमराज है, ५ तो भसे प्र सवार रहता है--आपको 
युद्ध मे सामने देखते हे तो शाञयोद्धा ठेस विकद्प करते हे ।” 


[ यहाँ सूयं जादि के संशय का निराकरण हो जाता है उतने ही अंशा म यदौ निश्चय है 


अथात्‌ यददो सूयाद के अभाव का निश्चय बीच बौच मे आता गयादै, निश्चयगभं का अर्थ युह 
-नहीं इसमे वीच में विषय का निश्चय हो जाए । ] 


( २ ) निश्वयान्त संदेहार्कार में वहाँ होता है जहो आरम्म में संशय हयो ओर अन्त में निश्चय । 
-उदाहरण- 


चन्द्रमा हे क्या, पर करक कटं गया १ क्या कमल हे परन्तु जर कहाँ गया १ [ रेस करप. 
विकल्प करने के | पश्चात, है मृगाक्षि ! रकिति ओर विासपूणं वचनों से विदित हआ किं यह 
सुख है ।' कहीं कहीं आरोप्यमाण का आश्रय [ आरोप विषय से] भिन्न होने से भी [ यह 
अलङ्कार ] देखा जाता है । यथा-“अन्धकार ने विविध [रंग के] वृक्ष ओर पर्वतौ को स्गसा 
दिया; आ्षमान को ञका-सा या ढंक-सा दिया है, ऊवड़्‌ खाबड़ स्थलों पर प्रथिवी को भरवा दिया 
है [ ओर ] दि [ नीरक्षीरवत ] मिलानसीदी हैः 1 | | 

यहा आरोप का विषय जो अन्धकार है उसपररागञादिका आरोप किया तो गय किन्तु 
उन [राग आदि | को तरु आदि पर आधित बतलाया गया हे। 

कुछ रोग [ इस स्थर में | सदेह का अध्यवसायमूल्क [न कि आ रोपमूलक नवीन ] मेद 
मानते है ओर कुछ रोग इस स्थल को उप्प्ेक्षा का अंग मानते है, वर्योकि : 
राब्द [ उत्प्रेक्षा वीज ] संभावना का योतक होता है। 


विमरिनी 
एतदेव भेद त्रय विव्रण्वन्नुदाहरति-- ड इत्यादि । अत्र प्रङ्ृतायास्तन्ग्याः सदेह प्रती- 
 .तिविषयत्वाभावाद्विषयिणां मज्जयांदीनामेव संदेहः । विषयविषयिणोर्खथा- 
किं पङ्कजं किसु सुधाकर बिम्बमेतत्कि वा सुखं क्लमहरं मदिरेदणायाः ! 
यद्दश्यते मधुकराभङ्रङ्गकान्तिनेन्रह्याचुकृति काष्ण्यंमसुप्य मध्ये ॥ 


ए करूमहरत्वादिः समानो धर्मोऽनुगामिर्वेनोपात्तः । क्वचिद्वस्तुप्रतिवस्तुभवेनापि 
-भवति यथा- 
'किमिदमसिताङ्किलितं कमलं किं वा मुखं सु नीरुकचम्‌ । 


इति संशेते रोकस्ू्वयि सुतनु सरोवतीणायाम्‌ ॥' 


न॒ = "साः या भानोः 


१७७ „+ अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


अच्रसितत्वसुनीर्त्वयोः शद्ध सामनान्यरूपत्वम्‌ । अलिकचानां च विम्बप्रतिवम्ब- 
आवः । एवं चास्य सादृश्य निसित्तत्वात्छमानधमनिकधमनिमित्तव्वेन द्विमेदव्व न उया- 
कायम्‌ । सादश्यनिमित्तत्वेनं दास्य संग्रहसिद्धेः । विप्रतिपच्यादि निसित्तान्तरवचारत्वा- 

ः मावा । भिन्नाश्रयसवेनेति वैयधिकरण्येन । 
इन्हीं तीनो मेदां का अथ स्पष्ट करते हट उदाहरण देते दै-शुदध उत्यादि। यहँ[ युध 
| के उद्‌!हरण--“कि तारण्यतर।: मे] तन्वी प्रकृत है किन्त वह सदेह प्रतीति का 
1 विषय नदी, जतः यहां म्री अदि जो विषयी, दै उन्दींका स्देद दै । विषय ओर 
| विषयी दोनों के सदेह का उदाहरण-दुमखख दूर करने वाला क्या यह कमल दहै, 
र या चन्द्र विस्व हे अथवा किसी मदिरेक्षणा का मुख, जिसमे भौरेसे समान, दरिण के ठस्य 
ओर दो नें का अनुकरण करने वाटी यह कालिमा दिखाई देरी दै! [ यद्य चन्द्रमा रूपी 
विषय आर अन्य सव विषयी हे । इन दोनों का सन्देद किया जा रहा दै । य्दा, जो साधारण धर्म॑ 
दुःख दूर करना है वह अनुगामी धर्म॑ है । कहीं वस्तुप्रतिवस्ुमावात्मक साधारण धमं से म 
[ संदेदाटंकार निष्पन्न . होता हे । यथा-हे सुतनु जव तुम तालावमें उतरती हो तो लोग 
यह सदेह करते हं किं असित भोरो से ठका हआ यह कमल हंयासनीर केदो से धिरा सुख ।' 
यहां मी सुख जो कि विषय है उसका ओर कमलरूपी विषयी का साथ-साथ संदेह हे ] यहाँ “असि- 
तत्वं ओर उनील्त्वः एक ओर अभिन्न है, अतः इनका यद जो साधारण धमं है यह्‌ शुद्ध सामा- 
न्यात्मक वस्तुप्रतिवस्तुभावापन्न साधारणधर्म हे। ओर जो भरं तथा केडों का. साधारणत्वं 
है वह विम्वग्रतिविम्बभाव से निष्पन्न होता है [ भरे तथा कैश. दोनों कृष्णवणै-रूपी साधारण 
। धमं के कारण अभिन्न प्रतीत होने ल्गते दे ] इस प्रकार ईस [संदेदाटंकार] मे समान धमं तथा अनेक 
| धर्म, इस प्रकार ध्म॑के आधार परदो मेद नटीं जाने चाददिए [जसा कि अल्काररलाकरकार 
+ नै बतलाया दै क्योकि यद अलुकार एक साडदयमूलक अलंकार दै इसक्िएटि उक्त 
| दोना मेद सादृद्यनिमिन्तता मे ही अन्तभूंत हौ जायेंगे । दूसरे इसमे चारुत्व भी नहीं रहता 
| जंसं किं [ रत्नाकरकार के दी अनुसार ] विप्रतिपत्ति-आदि अन्य निमित्ती मं चारत्व नदह्‌। रहता । 

"क भिन्नाश्रयस्व का अथं है वैयधिकरण्य । 

| विमश्ः-अलंकाररत्नाकरकार ने संदेदालंकार के भेद वतलाति हट ल्खिा दे-- कमलं वा 
| वदनं वा इति वाऽ्थैसंभिन्ना प्रतीतिः सदेहः । स च यद्यपि समानधमानेकधर्म-विप्रतिपच्युपर्ब्ध्य - 
व्यवस्थात इत्यनेकधोक्तः तथापि निमित्तान्तसेत्थापितस्य तस्य चारुत्व,भावात्‌ समानधमनिकधर्म- 
| निमित्तत्वेन दिविध एव ।' अर्थात्‌ श्या तो कमल है या सुख दै--इस प्रकार वा-( या )-दाब्द 
। के अर्थ॑सेमिध्रित प्रतीति का नाम संदेह दै) वह यद्यपि-समानधभ, अनेकधम, विप्रतिपत्ति, 
| उपरब्धि ओर अव्यवस्था इन त्व के साधार्‌ प्र अनेक प्रकार का वत्तलाया गया दै चिन्तु अन्य 
। तत्व के आधार पर होने वाटे सदेह में चारत्व नदा हाता । अतः केवर उपेदो ही प्रकार का 
| 
। 


मानना चाहिए एक समान धम॑निमित्तक तथा दूसरा जनेकधमनिमित्तक ।' इन दोनों मे स पथम 

के उदाहरण के रूप मँ उन्दने किं पद्कुजम्‌०?› प्य ही प्रस्तुत किया हे तथा द्वितीय के उदाहरण 
कैखू्पमेंकालिद्रास के विक्रमोर्वदीय का “अस्याः सर्गविधौ यह प्रसिद्ध पद्य) प्रथम परमेँ 

सभी कै वीच कलमदुरत्व यह एक ही समान धर्म है । द्वितीय पद मे कान्ति, ङ्गार आदि अने 

011 विमदिनीकार ने कहा दहै कि धमकी संख्या मेँ मेद होने से चमत्कार की अनुभूति नदीं होती 

| अतः उक्त दो मेद मी पूवेवत्तीं आचार्यौ द्वारा प्रतिपादित उपरक्त अन्य भेदो के समान अमान्य 
ह । अल्कार्रत्नाकर द्वारा प्रतिपादित ये दो भेद भरत, भामह, दण्डी, वामन, उद्धर, रुद्रट 

, तथा मम्मट में नहीं मिर्ते । कदाचित्‌ अलंकारभाष्यः मँ ये मेद रदे हो ] 


ध 


सदेदालड्ारः १४५ 


विमटरिनी 
अवे च पच्ान्तरमाह-केचित्यादि । अनेन च संदेहस्याध्यवसा यमूरूत्व मपि अन्थक्ते- 
वोक्तम्‌ । तेनाध्यवसायाश्रयोऽप्ययं स्वरूपहेतुफरानां संदिद्यमानस्वेन त्रिधा भवति । 
तन्न स्वरूपसंदेहो यथा-^रज्ञिताः इत्याद्येव । यथा वा- 
एतत्तकय केरवक्छमहरे श्वङ्गारदी चागुरौ 
दिद्छान्तासुकुरे चकोरसुडदि भौढे तुषारस्विषि । 
कर्परः किमपूरि कि मरूयजेरारेपि किं पारदे. 
रक्तालि स्फटिको परेः किमघटि घावाघथिव्योर्वपुः ॥' 
अत्र कोञ्युदीधवकछिम्नः कपूंरपूरणादि नाध्यवसितघ्वाद्ध्यव सायमूरूत्वस्र्‌ । ेतसदेहो 
यथा- ॑ 
'देवि त्वचरणाम्बुजस्खछतिविधो गाठावधानस्पृशां 
धन्यानां प्रसरन्ति संतततया ये बाष्पधाराभराः । 
कि ते स्युश्िरकारुभावितभवाग्रश्नक्रियावेगतः 
किं वासादितसुक्तिचन्द्रवदनासंद शं नानन्दतः ॥' 
अत्राश्चुहेतोरानन्दस्य संसारवियोगो सुक्तिसां सख्यं चेति हेतुद्वयमधभ्यव सितम्‌ । फर- 
संदेहो यथा-- 
“चृत्तान्ते पारिजात किञ्च विघटयतु स्परष्टुमाकाञ्चगङ्गं 
किस्विद्रा चन्द सूयो किम विदरूयितु श्वेतर क्ताञ्जजुद्धया । 
लडउ्धुं नक्तत्रमालाभरणभरसुत स्वगजं वाभियोद्धु 
दुरो दस्तः समस्तस्तव गणपतिना स्वस्तये सोऽस्तु हस्तः ॥' 


अन्न करिणो निष्पादनस्य विघटनादिफरूमध्यव सितम्‌ । अत्रेवादिशब्दवन्ुशब्दस्यः 


 संभावना्योतकत्वात्पचान्तरमपि दर्चयितुमाह-अन्य इत्यादि । अतश्च रज्ञिता इवेव्यर्थः ।. 
द्ध 


पूवंत्रार्थ त॒ चुशब्दो वितक मात्र एव व्याख्येयः । 

विम्िनी-इसी [ रञ्जिता नु० ] पर दूसरे पक्ष प्रस्तुत करते हए छिखते है--“केचित्‌ः- 
कोड" -इत्यादि । इससे यदह वात आई किं यन्थकार स्वयं संदेह को अध्यवसायमूलक भी मानतेः 
है । इस कारण [ हम इसके भी भेद बतलाए देते हैँ ] अध्यवसायमुरक सदेह मी तीन प्रकार काः 
होता दै-८ १ ) जिसमें स्वरूप का सन्देह होता है (२) जिसमें हेतु का संदेह होता है ओर 
(३ ) जिसमे संदेह होता है फल का । इनमें से प्रथम स्वरूपसंदेह यथा-'रजितानु० इत्यादि 
मूल मे उद्घत पद्य ही । अथवा--कुमुम का क्लम हरने वाके, शङ्गारदीक्षा के गुरु, दिशारूपी 
खन्दरी के दपेण › चकोरौ के मित्र ( इस ) शौतरदिमि [ चन्द्र ] के प्रौढ होने पर, थोड़ा यह तो 


सोचिए कि चावापृथिवी का संपूण शरीर क्या कपूर से मरं गया है, या धवल चन्दन से क्पि गया 


हेः या पारदरस (पारे) सेधोदिया गया हैया स्फटिकमणि से जड दिया गया है! यहां चांदनी 

की धवलता | का स्वरूप ही ] कपुरपूर आदि द्वारा अध्यवसित है [ चांदनी स्वाब्द॑तः अनुक्त. 
है ॥ अतः यहं भेद अध्यवसायमूलक [ स्वरूप संदेह का ] मेद हआ । 

हेवुखन्देह यथा- | 

दे भगवति ! आपके चरणारविन्द का ध्यान करने मे गाढ समाधि तवं पर्हुचे धन्य महात्मार्भ 

मँ जो अविरल सूप से अनेकानेक अशरुधारा्दं वह निककती है वे चिरकाल तक सेवित संसार 

१० अ० स° 


१७द्‌ , अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


का प्रन न रहने के वेग से निकल्ती हैँ अथवा सुक्तिरूपी चन्द्रसुखी के संदर्॑न से प्राप्त 
आनन्द से । | | 

यद अश्रुपात का कारण आनन्द दै । उस [ आनन्द ] कौ उत्पत्तिमं दो देत॒ओं का सदेह 
किया जा रहा है एक संसार से दुद्र ओर दूसरा सुक्ति का आभियुख्य । ये दोनों देतु अध्यवसित 
ड 1 [ देखिएटः-इस प्रकरण के अन्त का विम | 

फरुसंदेह यथा-- 

श्णपति जी का वह हाथ आपके लिए कल्याणकारी हो जिस पूर्णं हाथ को उन्दने यातो 
इसलिय दूरतक पकाया है कि न्द स्वगंका पारिजात उखाड़ छाना है, या इस्ति कि = 
आकाद्च मे गंगा का स्पश्चं करना है, या इस किएिकरि सफेद ओर लाक कमल समञ्च वे चन्द्र ओर 
ओर सूं को ले ठेना चाहते है, या इसि कि वे नक्षत्र माला | इकीस-रलो या गुरिर्यो की माला 
तथा बह नक्षत्रोकी माका] के आमूषण पहना चाहते या तोवे स्वगं के दाथी से 
जूञ्चना चाइते है ।' यदो हाथी का जौ निष्पादन ( गणपति पर आरोप दहै ) उसका फल प्रिवट- 
-नादि गणपतिगत विघट्नादि से अध्यवसित दे । 


यहाँ [ काव्य मँ ] इव-जादि, [ अदिपद से मन्ये, शंके, ध्रुवम्‌ › प्रायः, नूनम्‌ आदि | चान्द 
कै ही समान “नु--चव्द भी [ उप्परेक्षावीज ] संभावना का चोतक होता हे इसङिए [ र॑जिता नु०- 
पद मँ ] एक दूसरा भी पक्ष दिखलाते दै--अन्य इत्यादि दारा । इस [ उत्प्रेक्षा ] पर्ष मं “रिता 
नुः का अर्थं हआ (जिता श्वः [ मानो रंजित = रगे इए ] पहले अथे मे लुः-राब्दको व्याख्या 
केवर वितकं ही कौ जानी चाहिए । | 
विमः--अध्यवसायमूढक प्रस्तुत तीर्नाो भेदो मे से प्रथम के उदाहरण “एतत्‌ तकेय०' मँ तो 
सदेह साद्यमूखक दै, किन्तु दूसरे तथा तीसरे के उदाहरण साद्ृस्यमूलक नदीं हें, इतने पर भी 
इनमे संदेदारंकार माना जा रहा है! यद विचारणीय दै। अल्काररलाकरकार ने साश्येतर- 
मूलक संदेह को मी उसी प्रकार अल्कार माना है जिस प्रकार आयुष्रैतम्‌ = शृत आयु दहै" आदि 
साष्टदयेतर सम्बन्धमूखक रूपक को रूपकालंकार । उनकी पक्ति दं -- 
स्थाणुवां पुरुष। वेति न स्वारसिकः संदेदहोऽल्कारः, अपि त॒ कविप्रतिमोत्थापितः । तेन साधर्म्यं 
विहायापि निभित्तान्तरमवलम्ब्य कविप्रतिभोत्थापितः संदेदोऽर्कार एव । उदाहरणम्‌ -- “देवि त्वच्च- 
रणारविन्द००। अत्राश्वधाराहूपस्य कार्यस्य प्ंसारवियोगो मक्तिसाम्मुख्यं चेति हैतुद्रयं संश्चयितम्‌ 1 
ठ है या आदमी -यह लौकिक [ स्वारसिक | स्देद दे । यद सदेदाक्कार नदीं दो सकता, 
वर्योकि वही संदैहारंक।र होता है जो कविप्रतिमोत्थापित होता दै । यहो तक कि संदेह यदि कवि 
ग्रतिमोत्थापित हौ ओर साटस्यमूलक न हौ तव मी वह अलंकार माना जा सकता हे । ;उदादरण-- 
“देवि त्वच्रणारनिन्द०› पद्य । यद्य जो अश्वुधारारूपी कायै है उसके देतुरूप से दो तथ्यों का 
संदेह किया गया है--एक संसारवियोग० सौर दूसरा युक्ति-साम्भुख्य ।' 
निश्चित ही विमरिनीकार ने असादृस्यनिमित्तक संदेह को भी संदेहाल्कार मान ख्या 
ह जो मूरविरद् हैं । मूककार साष्र्यमूल्क संदेह को ही सदेहालंकार मानते हँ । 
यहाँ यह भी ध्यानदेने की बात दै कि “देवित्वचर०” पचमम अल्काररलाकरकार ने 
“अश्रुधाराह्प कार्य, के प्रति दो कारणों का संदेह बतलाया हे जव कि विमररिनीकार ने “अश्वहेतोः 
आनन्दस्य संसारवियोगो सुक्तिसाम्मुख्यं चेति” इस प्रकार “अशु के कारण आनन्‌ को कायं 
` भान कर उसके प्रति दो दतु का संदेह वतलाया दै 1 वस्तुतः कथन अल्काररलाकरकार का ही 


सदेहाटङ्ारः | १७७ 


वि 


मान्य दै । क्योकि यहाँ “आसादितमक्तिचन्द्रवद नासंददनानन्दतः'' इस प्रकार जिस आनन्द को 
कारण वतलायाजारहा दे वह कायें नीं माना जा सकता है। दूसरे अलंकाररलाकरकार के 
पाठ से “चिरकाक्मावितभवाप्रदनक्रियावेगतःः का अर्थं “चिरकार तक भावित संसार पर विचार न 
करने या उसके छ्रुटने के आवेग सेः करना होगा तभी संसारवियोग में शवियोग--चाब्द का स्वारस्य 
ठीक वैठेगा, नदीं तो संप्ारलत्याग अथं करना पड़ता है । श्सके अतिरिक्त वाक्यार्थं की इष्टि से भी यह 
अथ अधिक रुचिर दै । इसङ्िएि कि णसा मानने परहेतु रूपसे विरुद्ध पदां -गृहीत होते है 
'“जञावेग ओर आनन्द 12 फिर अश्रुपात होता भी आवेग या आनन्द से ही हे, “आवेगः अर्थं 
निकालने मे पाठान्तर से मी सहायता मिलती है । यदहो अर्काररलाकर में “आवेदितः” पाठान्तर 
दिया गया हे । उसे 'आवेङतः' दोना चादि 1 संस्छृतयन्थों मे आवेग ओर आवेशा का यह हेर फेर 
प्रायः सावैन्निक ही हे । 
संदेहारुकार का इतिहास- 

मामहः- | 
“उपमानेन त्वं च मेदं च वदतः पुनः । सक्षन्देहं वचः स्तुत्ये ससन्देहं विदुर्यथा ॥' 
किमयं शशी न स दिवा विराजते कुखमायुधो न धनुरस्य कोसुमम्‌ । 
इति विस्मयाद्‌ विख्रातोऽपि मे मतिस्त्वयि वीक्षिते न रूमतेऽर्थनिश्चयम्‌ ॥' 


--उपमान के साथ उपमेय का अमेद ओर तत्पश्चात्‌ भेद उपमेय कौ प्रसा के किटि जिन 
दाब्दं मे बतलाया जाय वे राब्द ससन्देद शाब्द होते है। उसी को ससन्देदाल्कार कहा जाता 
हे । उदादरण यथा--^तुम्दारे दिखाई देने पर क्या यह चन्द्रमा दहै, पर वह दिन मे शोभित 
नहीं होता, क्या यह कुसुमायुध = काम दहै, विन्तु इसका धनुष कुसुम का नदीं है :-ेसा 
आङ्चयंपूवेक विचार करता रदता हू, किन्तु वास्तविकता का निश्चय नहीं कर पाता !» 

वामन = ““उपमानोपमेयसंशयः सन्देशः) ४।३ ११। 


उपमानोपमेययारतिदायाथं यः क्रियते संशयः स सन्देहः । यथा- 

“इद कर्णोत्पलं चक्चरिंद वेति विकासिनी । न निरिचनोति हृदयं किन्तु दोलायते मनः ॥ 

~ उपमानोपमेय का संशय संदेह होता है । अथात्‌ उपमानोपमेय मँ अत्तिराय जतलने के छि 
जो संदाय किया जाता हे वदु संदेहालकार कहकाता है । यथा “हे विखासिनि । चित्त को करणोत्पङ 
हेया च्च दै" एसा निश्चय नकं हो पाता । चित्त केवर दोलायित ह्य रहा आता है । 

उद्धट :-उद्धरने संदेदाल्कार के दो लक्षण दिए है । प्रथम मेँ उरन्होने भामह की ऊपर उदधतत 
संदेदक्चणकारिका ज्यां कौ स्यं अपना ली है । केव उसमे अन्तिम पद यथा" के स्थान परं शुषा? 
कर दिया है । दूसरा लक्षण इस प्रकार है- 

अरुकारान्तरच्छायां यक्छृत्वा धीषु बन्धनम्‌ । असन्देदेऽपि संदेदरूपं संदेहनाम तत्‌ ॥› 

- दूसरे किसी अलुकार की छाया ( शोमा ) चिन्त म रखकर संदेह होने पर भी जो स्वेद 
क निरूपण उसे सी सदेह कहा जाता है । यथा- 

-नीरब्दः किमयं मेरो धूमोऽथ प्रयाने । इति यः राङ्क्यते दयामः पक्षन्रऽकौर्विषि स्थितः ॥ 


-- भगवान्‌ स्वयं स्याम हं ओर वे जिस पक्षिराज गरुड पर विराजमान है वहु है सूयं 
के समान काक । अतः उन्है देखकर संदेह होता पि क्या यह मेरु पर्व॑त पर्‌ कोड नीर मेष 


हे (५ पर भूम ।' यँ उपमानोपमेयभाव को मन मे रखकर संदेह प्रस्त किया 
गया हे । 11, 


च 


१७८ अलङकारखवंस्वम्‌ 


रुद्रटः :-( १ ) “वस्तुनि यत्रैकस्मिन्ननेकविषयस्तु भवति संदेहः । 
४ | प्रतिपत्तुः सादृख्यादनिश्चयः संशयः स इति ॥? ८।५९ ।) 
उदाहरण = “किमिदं नीलालक कमर किवा सुखं खनौल्कचम्‌ । 
इति संशेते लोकस्त्वयि खतनु सरोऽवत्तीणांयाम्‌ ॥° 
( २ ) उपमेये सदसंमवि विपरीतं वा तथोपमनेऽपि । 
य॒त्र स॒ निश्चयगर्म॑स्ततोऽपरो निश्चयान्तोऽन्यः ॥ 
~ जहौ एक वस्तु मँ अनेक वस्त॒ का संदेद दोता है, इसल्यि कि ज्ञाता सा्रदय के कारण 
` निश्चय नहीं कर पाता उस संदेह को संदेदालंकार कदा जाता है । उदाहरण विमदििनी मं 
उदुधृत “किमिदम्‌०? । 


- जहौ उपमेय मँ संमव वस्तु भी असंभव वतलाई जाए तथा जसंमव मी संमव लोर 


इसी प्रकार उपमान में मी, तो वह भी स्देदाल्कार दोतादै। वह॒ एक तो निश्चयगमं 
होता है भोर दूसरा निश्चयान्त । उदाहरण उसी प्रकार के हँ जिस प्रकार के स्वयं यन्थकार ने 
परस्त॒त किए है ययपि पद्य भिन्न हें । 

मम्मटः = ससन्देदस्त॒ भेदोक्तौ तदनुक्तौ च संशयः ।? 

संदाय का नाम ससंदेदाट्कार दै । वह भेदोक्ति ओर भेदाचुक्तिमें होता दै। भेदोक्ति का 
उदाहरण = अयं मात्तण्डः० तथा भेदानुक्ति का “अस्याः सगंविधोौ ०? । | 

 रलाकरकार = अलंकाररलाकरकार दोभाकरने उक्त उदाहरर्णो के आधार पर सदेहदालकार 
से भिन्न एक वितर्कांकार मी खोज निकाला दै । उनका स्देदालंकार का लक्षण इस प्रकार दै- 

[ सूत्र | “तस्यापि संदिद्यमानत्वे संदेहः । 

[ इत्ति] विषयस्येत्येव तच्छ्व्देनारोप्यमाणप्रत्यवम्चैः । “कमर वा वदनं वा० [ इत्यादि 
पूवोदधूत ] \ 

-- विषय के साथ साथ यदि विषयी मी संदेह का विषय वने तो सदेहाल्कार होता है। 

इसके पश्चात्‌ उन्दने संदे के भेद इस प्रकार किए है। ( १) साद्दयमूल्क तथा सादृदयेतर 
सम्बन्ध मूलक । इनमे से साद्ृश्यमू ल्क के मेद इस प्रकार किए है-- १ = विषय ओर विषयी दोना का 
संदेह २ = केवल विषयी का संदेह । इनमें से प्रथम भारोपगर्मित होता हे ओर दूसरा दो प्रकार का 
१ = जहाँ विषय का न्दतः कथन दहो ओर २=जहाँनदहो। इनमें से प्रथम, जिसमे विषय 
का उपादान रहता दै- 

१ = जिस्म विषय का अपहव ८ छिपाव ) रहता है ओर २ = जिसमें नदीं रहता है । ये दोनों 
ही भेद आरोपगभित ही होते है! दूसरा जहो विषय का शब्दतः उपादान नहीं रइता अध्य 
वसायमूलक संदेह माना जाता है । उदाहरण~- 

१= आरोपगभित उभय संदाय-““कि पंकज विन्नु ०" उदाहृत । 
यां धमं केवर एक है कलमदहरत्व । 
२= भारोपगरभित विषयिसंदाय मेँ विषय का उपादानयपू्वंक अपहव--“जस्याः सगेविधौ ०”? । 
इसमे पुराणसुनि को उवी मदि से दगया गया है यदी उसका जपहव दै । 
 ३= इसी मे अपहवामाव यथा-- १ | 
“चिर चित्तोचाने चरसि च खाज पिबसि च क्षणदेणाक्षी्णा विरह विषवेर्गं हरसि च । 
नृप त्वं मानां दल्यसि च किं कौतुककरः इुरज्गः कि अज्ञो मरकतमणिः किं किमद्वनिः ॥° ` 


ज जः कोक + कोक क भे काकाः ९ | 
[णि क क = 


संदेहाल्ारः ९४९ 


-दे चप | ठम (१) चित्तो्यान मेँ चिरकाल तक विचरण करते हो (८२) खन्दरि्यो क 
खख कमल का पान करते दहो, (३) उन्दरियों के विरहविषवेग को क्षणभरमें दूर करते हो 
ओर मानाद्रिकामभेदन करतेदहो। इसक्ट तुम क्या आाश्वर्यकारी (१) कुर्ग हो (२) क्या 
गदो (२३) क्या मरकतमणिह्ोयाकि (४) वत्र द्यो ?। इन दोनों पर्चो मेँ धर्मं मनेक । 
प्रथमम शगार कान्ति वादि तथा दितीय मेँ उयानचार पान भादि । 

४ = विषय का उपादान करने पर विषयिसदेद - “किं तारुण्यतरोः० । साड्दयेतर सवन्धमूलक 
का उदादरण इस संदभं मं उदुघृत किया जा चुका है “देवि त्वचरणाविन्द०” इत्यादि । 

क्षो भाकर ने इसके पश्चात्‌ वितकालंकार का निरूपण इस प्रकार किया है- 


[ सूत्र | सम्भावितस्तम्माव्यमानापोह्यो वितकः । 

[ दृत्ति | सामान्येन इष्टे वस्तुनि आश्कितस्य आराङ्कयमानस्य वा विशेषस्य वाधङेनोत्पुंसनं 
वितकंः । अतएव ॒वाधकसद्धावात्‌ साधक-वाधक-प्रमाणामावनिमित्तात्‌ संदेहदादस्य भेदः । किच तत्र 
सन्दिद्यमानानां "वा-थंसम्मिन्नेकप्रतीतिविषयीकृतत्वम्‌ , इह॒ पुनः अनेकविकल्पेन सम्भावितस्य 
ाधङेनोप्पुंसितस्य अपरविकल्पोदयसमयेऽनुसन्धानामावाद्‌ भिन्नप्रत्ययगोचरत्वम्‌ । 

--अथांत्‌ संमावित अथवा सम्मान्यमान का निराकरण वितक्षं कहलाता है । अथात्‌ सामान्य 
रूप से प्रतीत वस्तु में यदि विशेषकी संमावना कीजा चुकी दहोयाकी जा रही हो भौर यदि उसका 
किसी वाधक को वीच मे काकर निराकरण कर दिया जाय तो उसे वितकं कदा जाता है । ` इसमे 
वाधक उपस्थित किया जाता हे, इसकिषए इसका संदेहाल्कार से भेद है, क्योकि संदेह मे न तो साधक 
ही उपस्थित किया जाता, न वाधक ही । संदेह मेँ एक विरोषता यह भी रहती है कि वद्य जिन 
जिनका संदेह विया जाता है वे सव षाः अर्थात्‌ “अथवा” खन्द के अथं की प्रतीति से मिभित 
प्रतीति मे साथ साथ विषय वनते है, जवकि वितक॑ मे अनेक विकल्प रहते है ओर इसमे संमावित 
वस्तु का वाधक द्वारा निराकरण कर दिया जाता है । फलतः दूसरे विकल्प मे होने वाङ ज्ञान मे वह 
सम्मिकित नदीं दो पाता, अतः प्रत्येक संभावित पदार्थं का ज्ञान अलग अरग पूर्वापरभाव के साथ 
होता हे । इस पूरे विषय का संक्षेप शोभाकार ने इस प्रकार का दिया है- 

“अ्दयोल्लेखवती मत्तियां स संशयः, केवर्वस्त॒निष्ठा । 
संभावना बाधक्वाधनीया यत्र स्फुटस्तत्र भवेद्‌ वितर्कः ॥?: 


“जिस ज्ञान मे एकाधिक पदार्थं भासित दो वह संशाय, ओर केवर एक पदार्थं की रेक्ती संमावना 
वितकं जो बाधक दारा बाध्यहो ।' | 


उन्होने संदेह के प्रसिद्ध उदाहरण--अयं मातंण्डः किम्‌० को वित क। उदाहरण बतलाया 
हे । इनमे राजा या मातंण्ड की संभावना क जाती है फिर उसका बाध प्रस्तुत कर दिया जाता 
हे यह कह कर कि सूय सात धो से युक्त रदता है जर राजा वैसा नदीं है । इसके पश्वात्‌ दूसरा 
विकल्प किया जाता हे अग्नि कार उसकाभी वाध कर दिया जातादहै। इसी प्रकार तीसरा 
विकल्प यमराज का करिया जाता है मौर उसका भी वाध प्रस्तुत कर दिया जाता है! इस प्रकार 
भग्नि आदि कौ परवती विकर्पबुद्धि म पूव॑वत्तौं संभावित पदाथ मातेण्ड आदि का समावेश्य नीं 
रता अथात्‌ वे पूववत्तौ पदाथे के ज्ञान के विषय नहीं वनते) उनमें परवती ज्ञान की विषयता 
का अभाव रहता है । इसि वितर्क का लक्षण इसमें पूणेरूप से लागू होता है । 


आश्चयं दे कि पण्डितराज जगन्नाथ शस माभिक मीमांसा प्रचुपरहे। नतो उन्होने संदेह 
के प्रकरण मे इसका खण्डन किया हैन इसे स्वीकार ही । (4 


१५० अलङ्कारसवस्वम्‌ 


जहां तक इस अलंकार के नाम का संबन्य दै उदत लक्षणो के अनुसार इसे पूव॑वन्तीं भामष्, 
उद्भट ओर मम्मट ने ससन्देहः नाम दिया है तथा परवन्तीं पण्डितराज जगन्नाथने मी इसका 
अनुकरण किया है । भामह के लक्षण से स्पष्ट है कि ससन्देदपद सन्देहप्रत्तिपादक पदौ के किण 
आया है । वे पदं ही काव्यम अलंकार मानिष जाएँ तो यह नाम अकुकार के लिए भी उपयुक्त 
माना जा सकता है । पण्डितराज ने पद को संदेदयुक्त न मानकर जानः को स्देदयुक्त माना 
ह, ससन्देद जैसा ही पक नाम श्रान्तिमान्‌? मी है । हम सोचते दँ यदि सन्देदयुक्त अथं या 
आन्तियक्त अथं या ज्ञान को अलंकार माना जाता है तो उपमा रूपक आ दि म भी उपमा रूपक 
से युक्त थं या ज्ञान को ही अलंकार मानना चादिं । ओर इसीकिए उन्हे मी (उपमावान्‌? 
“रूपकवान्‌” रेतसे कुछ नाम दिए जाने चादिए । फिर यह एक अत्यन्त थूल तथ्य है किं अथं ओर 
अलंकार मे अंगङ्गिभाव है। अमेद नदीं । पद्‌ को ससन्देद्ादि नाम देने पर अल्कार मं शब्दा- 
टंकारत्व मानना दोगा जवकि हैँ वे अथाल्कार ) ज्ञान को अलुकार मानना कुक समञ्च मं आने 
की वात है विन्त सदेह मौर आन्ति भी अपने जापमेंज्ञान दो हैः । अतः (ज्ञानवान्‌ ज्ञानः कहने 
कै समान ससन्देह या ्रान्तिमान्‌ कथन अन्योन्याश्रयत्व या पौनरुक्त्य दोष से युक्त ठहरता 
है । वस्तुतः विरोधाभास मे जसे विरोधन्ञान कौ आभासात्मकता अथवा प्रातिभासिक विरोधज्ञान 
ही अकार दहै ओर श्सी कारण “विरोधः को "विरोधवान्‌? नाम नहीं दिया जाता वेसेदी 
संदेदात्मक या आान्त्यात्मक ज्ञान ही वस्ततः अलंकार है मतः उनका नाम भी सस्देह या आ्रान्ति- 
मान्‌ न होकर सन्देह तथा भ्रान्ति ही दोना चादिए । सवे अधिक महत्व की वात यद हे कि 
अकार मे नाम का निश्चय चमत्कारकासी तत्के आधार पर दोतादहै। इसीक्ए साट्रर्य 
की चास विङेषतार्ण रहने पर मी अनन्वय उपमेयोपमा ओर प्रतीप को भिन्न अलंकार माना जाता 
है । उत्प्रेक्षा, अपहुति, अतिदयोक्ति जौर रूपक मे अभेद की समानता रने पर भी संभावना, 
अपव, अतिदय तथा आरोप इन चमत्कार देतओं मेँ मेद द्ोने से उन अल्कारों में स्वरूपतः 
तथा नामतः मेद माना गया दै । प्रस्तुत सन्देह में चमत्कार का कारण सन्देहदीदहे। इसी प्रकार 
भ्रान्तिमान्‌ म भी भ्रान्ति दी। अतः इन अलंकारो के नाम भी केवर संदेह ओर ्रान्तिदी 
होने चादिए । 
वृत्ति की अन्तिम पंक्ति मे "नुशब्दस्य संभावना्योतकत्वातः के स्थान पर निर्णयसागरीय प्रति 
म “नुश्चब्दस्य संमावनाचोतकसच्वावः छपा है तथा संजीविनीसदित छपे संस्करण में डा० राम 
चन्र द्विवेदी ने चशब्दस्य चो तकल्वं मच्वा? पाठ दिया है । मारा पाठ विमरिनी पर आधृत दै 


मोर- 
“मन्ये र्कं ध्रुवं प्रायो नूनमित्येवमादिभिः। 


उत्मक्षा व्यज्यते शाब्दैरिवदाब्दोऽपि ताद्रलः ॥”--२।२३४ काव्याद. 
इसे माए आदि पद के अनुसार “नु-खब्द उत्प्रेक्षा का वाचक माना भी जा सकता है। 
इसी प्रमाण के अनुसार (व'--रब्द भी उ्येक्षावाचक दोता हे । सतः निणयसागरीय विमरिनी 
म यत्रैवादि०? वै स्थान पर छपा “अत्रैवादि०--पाठ असंगत द । वहां श्स अंश॒ का पाठान्तर” 
अत्रैव चेवादिः म दिया है । 
संजीविनीकार ने सन्देदालंकार का कारिकावद्ध निरूपण इस प्रकार किया है-- 
| “सन्देदोऽपरकृतद्वारा प्रकतं संस्पृशेद्‌ यदि । 
प्रतिमोत्थापितः सोऽयं सन्देहारच्कृतिमतः ॥' 
संदेह अप्रकृत के दारा यदि प्रकृत का स्थश्च करे ओर यदि वह संदेह प्रतिभोस्थापित दो तो 
वह सन्देहाठंकृति मानाजातादै। ` | 


श्रान्तिमानलटड्नरः १५२ 


। सवंस्व | 
| च्च० १९ | सादृश्याद्‌ वस्त्वन्तरप्रती तिभ्रोन्तिमाच्‌ । 


असम्यग्ज्ञानत्वसाघम्यौतस दे हानन्तरमस्य लक्षणम्‌ । आन्तिश्धिन्त- 
धमः । स विदयते यस्मिन्मणितिप्रकारे स शआान्तिमान्‌। साडद्यभ्रयुक्ता 
च श्चान्तिरस्य विषयः । यथा-- 
ओष्ठे विम्बफलारशयालमलकेषत्पाकजम्बूधिया 
क्णालंकृतिभाजि दाडिमफङश्चान्त्या च शोणे मणौ । 
निष्पच्या खङ्ृदुत्पठच्छददरामात्तक्खमानं मसौ 
राजन्गृजरराजपञ्नर शुकैः सदयस्तृषा मूट्छितम्‌ ।+” 
गाढसमेप्रहायदिना तु आान्तिनीस्यालकारस्य विषयः । यथा-- 
दामोदरकशघातचणितादोषवश्चसा । 
दशं चाणूरमव्टेन रातचन्द्रं नभस्तलम्‌ ॥' 
साद श्यदेतुकापि आ्रान्तिर्विच्छिच्यथं कविप्रतिभोत्थापितैव गृह्यते, यथो- 
दाहतम्‌ , न स्वर्सोत्थापिता शुक्तिकारजतवत्‌। एवं स्थाणुवौ स्यात्पुरुषो 
वा स्यादिति खंरयेऽपि गोद्धभ्यम्‌ । 


| सूत्र १९ | सादृश्य के कारण [ एक वस्तु पर | दूसरी वस्तु की प्रतीति ्रान्तिमान्‌ ` 


[ अलंकार कहराती ह ]। 
[ वृत्ति ] सम्यक्‌ ज्ञान के अमाव की समानता के आधार पर संदेहं के [ तुरन्त ] पश्चात्‌ 
इसका लक्षण दिया जा रहा है । आन्ति चित्त का एक धम हे । वह रहता है जिस उक्ति प्रकार में 


वह होता हे भ्रान्तिमान्‌ । [ किन्तु ] इस आन्तिमान्‌ उक्तिप्रकार = अटकार का क्षेत्र [ केवल ] सादू- 


रयमूलक घ्नान्ति हे । जेसे- 

हे राजन्‌ ! एकाएक ज्यों ही यह विदित इञ [ निष्पत्ति | कि ये नीलकमल की पखुडी से 
नेवं वाटी थकी थकारे खन्दरियांँ है तो [ निराश होकर ] गुजेराज के प्रजरबद्ध शुक मरुस्थरू मं 
पिपासा से तत्काल मूच्छित दहो गण; क्योकि [ इसके पदर ] वे [ उन न्दरियों के] ओग 
को विम्बफर समञ्च वेढे ये, नीले केच पर तो उन्दै परिपक् जासुन का आत्यन्तिकं निश्चय 
ही दो गया था जौर क्ैपूल के काल ( माणिक्यमणि ) को वे मान बेटे थे अनार 

इसके विरुद्ध जो आ्रान्ति [ चकराना ] मर्मस्थान पर गहरी चोट आदि से दोती है वह इस 
अल्कार का क्षेत्र नदीं होती । जेते- 

श्रीकृष्ण की सुट्ढी की चोट से जिसको पूरी छाती चूर चूर हो गधी ठेते चाणुर्‌ नामकः 
पहलवान ने देखा कि आकार मे सेकड़ो चन्द्र निकले हें ।' 

[ साथहौी | जो भ्रान्ति साद्दयमूल्कमभी होती हे वहं भी तभी अरुकार वनती है जव बहु 
कचिकद्पित होती हे, जेसा कि पूवद त्त उदाहरण ['ओष्ठे०ः इत्यादि] से स्पष्ट है न फि छोकिक रान्ति 
यथा छिपनौ मं चाँदी की भान्ति । इसी प्रकार ध्यातो यह दढ दोगा या आदमी होगा-इत्यादिः 
रोकिक संदाय मं भी समञ्चना चादिए [ कि वह कविकखिपत न होने से अलंकार नदीं है ] । 


| 
| 


शर अलङ्ारसवेस्वम्‌ 
विमशिनी 


सादृस्यादित्यादि । असम्यश्ानस्वसाधम्यादिति न पुनरारोपगभेटव साजाव्यान्लक्तित- 
मिति भावः आरोपो हि विषयविषयिणोयुंगपदेकम्रमाच्रविषयीकृतत्वे अवतीति नारोप- 
गर्भो मः कचिदपि संभवति, शचिकादीनां छक्तिकादिरूपतयावगसमे रजतादययभिमाना- 
भावात्‌ । 
नु आन्तिश्चित्तधमंः स यस्यास्ति स आन्तिमानिति वक्तुं न्याय्यं तव्कथमलंकारस्ये- 
तदभिधानमिष्याशङ्कथाह-भ्रान्तिरित्यादि । स इति भणितिगप्रकारः अतश्चारुकारे आन्ति- 
मच्छुब्द्‌ उपचरित इति भावः । साद्ररयम्रयुक्तंति । न तु 
(कामद्चोकभयोन्माद्‌ बौरस्वप्नाद्पप्ट्ताः । 
अभूतानपि पश्यन्ति पुरतोऽवस्थितानिव ॥' 
इत्याघभिहितावान्तरनिमित्तोच्थापितेस्यर्थः । अतश्च सादश्यनिमित्तैव आान्तिररुंकार- 
विषय इति ताष्प्यांथः । एव च-- 
“प्रासादे सा पथि पथि च सा पृष्ठतः सा पुरः सा 
प्यद्धे सा दिश्चि दिशि च सा तद्धियोगातुरस्य । 
हंहो चेतः प्रकृतिरपरा नास्ति ते कापिसखासा 
सास्रासासाजगति सकर कोऽयमद्वैतवाद्‌ः ॥' 
हव्यत्रे्स्या एव परिमिताया अपि योषितो गाढानुरागहेतुकं तन्मय ताञ्चसंधानं 
म्रासादादावनेकृत्र युगपत्प्रतीतौ निमित्तमिति न भ्रान्तिमद्‌लंकारः। स हि प्रालादादेर्बल्ल- 
रूपत्वेन प्रतीतौ स्यात्‌ । अन्यस्यान्यरूपष्वेन खम्यगभिधानाव्मा निश्चयो हि आस्ति- 
मर्कच्चणम्‌ । न च्च प्रासाद्‌ादिवरुरुभाव्वेन प्रतीयत इति स्फुट एवायं विश्ेषार कारस्य 
विषयः । अथ प्रासादादावभूताया अपि वर्रुभाया दं नाद्‌ भ्रान्तिरिति चेत , नेंतत्‌ । एवं 
द्यत्र जान्तिमान्र स्याच्लारुकारः 1 गाढानुरागातमकनिसित्तसाम्यास्स्वरसत एव भासादा- 
दावसस्या अपि युवध्याः प्रतीतिससुङ्छासाः। कविप्रतिभानिवंतित्वाभावाव्‌ । 'देवमपि 
हष पितृश्लोकविहवटीषतं ध्रियं शाप इति महीं महापातकमिति राञ्यं रोग इति भगाय 
भुजगा इति निख्यं निरय दस्यादि मन्यमानभ्‌' इत्यादावपि न आन्तिमदरंकारः । त्र 
हि दिषयथानवगम एष निमित्तसामभ्यास्स्वरसत एव विषयप्रती तिश्ललसेव्‌ । शक्तिकादीनां 
शक्तिकादिरूपतयावगमे रजताद्यभिमानाचुदयादिति समनन्तरमेवोक्छसवात्‌ । इद 
पुनर्विषयदरूपां श्रियमवगम्यापि श्रीहर्षण पिवृश्लोकवि ह्री कृतष्वाच्छापर्वेन भाग्यत इति 
विषमाकारो ज्यायान्‌ । | 
दातुं वान्छति दक्षिणेऽपि नयने वामः करः कजं 
भौजंगं च भुजोऽङ्गदं घटयितुं वामेऽपि वामेतरः 
हत्थं स्वं स्वमशिक्षितं भगवतोरधं वपुः पश्यतो 
साघारस्मितङान्द्ितं दिशतु नो वक्त्र मनोवान्दितम्‌ ॥ 
दस्यत्रापि संस्कार एवाटंकारो न आन्तिमान्‌ । अच्र हि भगवस्या नेत्रद्याञ्जनदान- 
सतताभ्यासाद्वामनेन्राज्जनदानानन्तरं दक्िणनेत्राञ्जनदानवासनानुरोधो जायत इति 
सस्कारस्यव वाक्यार्थत्वम्‌ । अथात्र सखंस्कारम्रबोधं विना तद्‌भावाद्न्जनदान- 
संस्कारदेतुका भगवदधंस्य स्वार्धववेनाभिमानसूपा अगवव्या शन्तिरेवेति उत्‌ - 
नंतत्‌ ।  प्र्युतान्न हि भगवदर्ध॑स्य -तथातवेनबावगमादृन्जनदानसंस्कारो न प्ररोह. 


आ्रान्तिसानलड्नरः १५३ 


सुपागत इति कारणस्यैव स्खरुड तित्वात्तसका य॑स्य असस्योत्पाद्‌ एव न संभवतीति न 
आआर्तिमतोऽवकाश्चः। प्ररूढ एव हि संस्कारो अमः। स्वात्ममात्रावस्थितस्त संस्कारा- 
रकारः । अत एव दां बान्छुतीच्युक्छम्‌ । एवं चात्र नेत्रद यान्जनदानखतताभ्यासहेतुकः 
संस्कार एव प्रतीयते न तु तन्निमित्तकोऽपि रमः परमः। परमेश्वरार्धंस्य तशात्वेनेवाव- 
गसमात्तदधन्धस्याप्यभावात्‌ । अत एवा्िक्तितं स्मितकाच्छितं वेरयुच्छम्‌ । अवान्तर एवा- 
नयोविंशेषोऽलकारमाष्य एवोक्त इति तत एवाुखतंव्य इति । एवं च सादश्यनिमित्तेव 
आआन्तिररुकारविषयो न निमित्तान्तरोव्थापितेति न रत्तणस्याग्यापकस्वं वाच्यम्‌ ! ` 
एवं सादृश्यनिमित्तकत्वादस्य साघधारणधसंस्यापि त्रयी गतिः । तच्राज्गासिता यथा- 
नीरोष्परुमिति आान्व्या विकासितदि रोचनम्‌ । 
अनुधावति सुग्धात्ि पश्य यु्धो मघुतघ्रतः॥' 
अत्र विकास्ीव्यनुगामिष्वेन निदिष्टो धमः । शुद्धसासान्यरूपष्वं ठ यथा-- 
'अयमहिमरचिभेजन्प्रती चीं क पितवलीञुखतुण्डतास्रविम्बः । 
जनिधिमकरे दी च्यते द्वाङ्नवष्थिरारणमांसपिण्डरोभाव्‌ ॥* 


अच्र ताख्रस्वारणत्वयोः शद्ध खामान्यरूपत्वम्‌ । विम्ब प्रतिबिम्बभावो यथा- 
'पुसिञा कण्णाहरणेन्दणीरूकिरणाहआा ससिमञहा । 
माणिणिवजणसम्मि सकजरं सुख्घाए दंइएण ॥? 


अत्र सकजरषवेन्द नीरूक्िरणाह तत्व यो बिम्बभ्रतिबिम्बभावः । सादश्यनिसित्तकस्वमेव 
चास्य दयितं प्रस्युदाहरति--गाठेत्यादिना । खादश्यनिमित्तकतवेऽपि कचविप्रतिमोव्थापि- 
तेव आन्तिरस्येव विष्यो न पुनवास्तवोव्याह-साद्रस्येव्यादि । उदाहतमिति। ओष्ठे 
विग्बफलाशयेव्यादि । एतदेव खदेहेऽपि योजयति- एवमित्यादि । सद्य इति । अ्थाद्‌ा- 
रोपगर्मं एव । त्रैव ह्यस्य सादृश्यं निमित्तम्‌ ! अध्यवसायमूरे हि संदेहे खादश्यारसम्ब- 
न्घाल्तराद्वा विषयविषयिणोः संदिद्यमानत्वं स्यात्‌ यथोदाहृतं प्राक } एवमारोपगभंस्व 
एव सादश्यं विना नायमरूकार इत्यवगन्तव्यम्‌ । तस्माद्विरोषेणेक साधभ्य विहायापि 
निमित्तान्तरमवलरम्ब्य नास्यारकारस्वं वाच्यम्‌ । सादृश्येऽपि कविप्रतिभोव्थापितस्यंवा- 
खंकारत्वं न पुनः स्वारसिकस्येति । 

विम्िनी -असम्यगज्ञानत्व के साधम्यसेन कि आरोपगमत्व के साधम्यं से आन्तिमान्‌ का 
लक्षण संदेह के वाद तुरन्त किया । आरोप जो है तव होता है वह जव विषय ओर विषयौ दोनों 
फिसी एक ही ज्ञाता के ज्ञान का विषय बनें इसङ्िए अरम कमी भी आरोपाथित नहीं हयो सकता क्यों 
कि शुक्ति आदि का ज्ञान यदि शुक्तिआदिके रूपमेंही होता है तो उसमें रजत आदि का विपयै- 
यात्मक ज्ञान नहीं होता । 

रात एक चित्त धम हे अतः भ्रान्तिमान्‌ जिसे आन्ति हो उस व्यक्ति को कदा जाना चादिएः 
भलंकार का भान्तिमान्‌ क्यों कहा जा रदा है'-रेसी रोका कर उसका उत्तर देने हेतु लिखिते है- 
“व्रान्तिः' इत्यादि । सः-'वह' अथात्‌ मणितिप्रकार । इस प्रकार अलंकार के किए श्वान्तिमान्‌? 
शाब्द का प्रयोग राक्षणिक हें [ मूलतः वाचक है वह आन्तियुक्त व्यक्ति का ]। 

सादश्यप्रयुक्तं न कि-' काम, रोक, भय, उन्माद चोर स्वप्न आदि से उद्विग्न व्यक्ति 
असत्य वस्तुओं को भी सामने उपस्थित सा देखते है-› इत्यादि वाक्यो में प्रतिपादित अन्य 
निमित्ता से प्रयुक्त । इसकिए तात्पयं यह निकला कि साट्द्यनिमित्ता आन्ति ही भ्राम्तिमदलंकार 
का विषय होती है । [ अलकाररलाकरकार ने साद्रयेतरकारणमूल्क भ्रान्ति को भी आन्तिमदल्कार 


१५९ अच्छड्ारसवंस्वम्‌ 


माना है ओर रासादे सा०' आदि परय दी उदाहरणरूप से प्रस्तुत कियादहै। इसके खण्डन 
मे विमदिनीकार छिखते हैँ ] इस प्रकार-- 

(उसके वियोग मे आतुर भ॒ञ्चे प्रासाद में वदी दिखाई देती है ओर रास्ते रास्ते में वही, पीछे 
वही, सामने वदी ओर दिद्या दिया में वदी, अरे चित्त तद्ञे कुछ ओर सूक्ता दी नदीं । संपूण 
विश्व मे केवर वह्‌ वह वह वह । आखिर यह कैसा अदवेतवाद दे ९ 

- यहा नायिका एक द्यी है ओर उसकी अवस्थिति भमी कहींण्क ही स्थान पर हं तथापि 
प्रासाद आदि अनेक स्थार्नो मे एक साथ उसकी प्रतीति दो रहीदहै। इस प्रतीति मेंकारण दहं 
गाढ अनुराग से जनित तन्मयता का बोध । अतः यद आन्ति ्रान्तिमदल्कार नहीं दे। वह तव दता 
जव प्रासाद दिका ज्ञान वहमारूप से होता क्योंकि रेसे निश्चयको ही तो आ्रान्तिमान्‌ माना जाता 
हे जिसमे भिन्ने वस्तु का भिन्नरूप से कथन दो किन्तु वक्ता समन्ने कि वह ठीक कद रहा दे। किन्तु 
यहां प्रासाद भादि का वदछभारूप से प्रतीत नदीं हो रहे द इसरिए स्पष्टरूप से यर्दा विदेषाङुंकार 
है । यदि यह कदा जाय कि प्रासाद आदि मेँ अवियमान होने पर भी वमा के दिखाई देने से 
त्रान्ति है तो वद भी निरथैक है । क्योकि टेसा मानने पर यदं ्रान्तिमात्र सिद्ध होगी शआ्रान्ति- 
मदल्कार नदीं। रेसा स्स कि यदो प्रासाद आदि में अविद्यमान होने पर भी वछमा 
कीजो भ्रान्ति ्ोरष्ी है वह कव्रिप्रतिभाप्रसूत नदीं दै। उसकाकारण हे गाढ मनुराग । अतः 
वह लोकिक आन्ति ही है । इसी प्रकार [ रत्नाकरकार ने ] (महाराज हषं भी पिवृदोक से विहर 
होकर श्री को शाप, मही को महापातक, राज्यको रोग भोगों को भुजग, प्रासाद को नरक आदि 
मान रहे थे ।-[ इस स्थल मै मी श्रान्तिमदल्कार माना है किन्तु ] यहो ओर अन्य स्थलों मं 
भी भ्रान्तिमदल्कार नहीं है । क्योकि उस [ भ्रान्ति] के [ वास्तविक ] विषय [ आ्रान्ति के 
आधार ] कौ प्रतीति नदीं दोती [ अपित किसी ] निमित्त [जिसे दोष कशा जाता दै] 
के वरू पर [ अन्य किसी] विषय की प्रतीति हो उठती है। यद अमी अभी कदा गया है कि 

"शक्ति यादि का शुक्ति आदिक रूपसे ज्ञान दो जाने पर उसके ऊपर रजत आदि कीं 
रान्ति नदीं दो पाती । प्रस्तुत [ देवः दर्षः० ] उदाहरणम श्री विषय है ओर श्रीदं को उसकी 
तति भी होती दे । उते वह शाप रूप इस कारण मानता है कि वह पितृद्ोक से विह्वक हे । अतः 
९ [ह पाजकार ही अभिक प्रबल है। [ इसी प्रकार अलंकाररत्नाकरकार भद्द्योमाकर ने-- ] 
बाया हाथ दानी आंख में भी काजल लगाने ल्गता है भौर दाहिना दाथ भी वां हाथ में सर्प 
का केकण पहनाने ल्गता है । इस प्रकार नवीन अभ्यास से रहित अपने-अपने अर्धं माग को देखकर 
भगवान्‌ शिव तथा पावती जी का एक साथ समानरूप [साधार = साधारण = समान] से या सकारण- 
स्मित युक्त हआ मुख कमे हमारा मन चाहा लाम प्रदान करे › यदां मी [ आजान्तिमान्‌ अलंकार 
माना है किन्तु यहां मी | कैव संस्काराल्कार ही है भ्रान्तिमान्‌ अल्कार नदो । यदं भगवती 
पावेती को दोनो नेरौ मे अंजन लख्गानेकाजो सदा का अभ्यास है उसी ते उन्दः बै नेत्रमेमी 
काजल ख्गाने के वाद दाहिने नैत्र्मे भी काजल ख्गाने कौ वासना बाध्य कर देती है । इस 
कारण यहां संस्कार ही वाक्याथ ओर इसछिर प्रधान हे। यदि कहा जाएकरि -संस्कारप्रबोध 
॥ विना वैसा होना संमवन देने से शिवरूप अधेमाग क निजरूप अधं समञ्च वैस्ने 
क अजनद्‌(न।भ्यासमूख्क भ्रान्ति दही भगवती प्रवेती को हदः तो यदह टीक नदीं 
है । वस्तुतः स्थिति उच्छी है । यु मगवती परकैती द्वारा भगवान्‌ शिवरूपी अर्धमाग को हिव- 
रूपी अधंमाग दी समञ्चा ना रा ह । इसीलिए अंजनदानसंरकार पूरा उभर नदीं पाता [ उसके 
उदित होते ही उसका वाध भी ह्यो जाता दै । इसीलिए अंजन लगाने की मिश्रित चेष्टा संपन्न नदीं 
हो पाती अतः उसके आधार परसिद्ध होने वाला रम मी उत्पन्न नदीं हो पाता अतः यहाँ 


> 


आ्न्तिमानलड्लारः १९५८ 


्रआन्तिमान्‌ नामक अलंकार संमव नहीं है । जो संस्कार प्ररूढ हौ जाता है वही रम होता है । 
यद्य तो संस्कार अपने तक ही सीमित है अतः संस्कार नामक ही अरुकार है। इसीलिए स्वयं 
कवि ने मी कहा है-द्देना चाहतादहैः [नकि देता है] इस प्रकार यहं दोनों ओखां में 
अजन लगाने के सतत अव्याससे वना केवर संस्कार ही प्रतीत होतादै, न किं उस संस्कार 
ते होने वालाश्रममी। नतो यह श्रम यदो टेकान्तिकि रूपसे ्रमदही सिद्ध दौ पाता क्योकि 
रिव काअधंारीर यहाँ उसीरूपमे अथात्‌ रिव के अधं शरीर केरूप मेही मासित होता 
है । इस कारण अरम का यदहं गन्ध मी रुमव नहीं है । इसीर्एि इलोक मे भी (अशिक्षितः ओर 
'स्मितलाच्छितः ये विद्ेषण रखे गएदहै। इस प्रकार इनमें थोड़ा सा ही अन्तर है। वह अलकार- 
भाष्य मे बतलाया जा चुका है, अतः उसे वहीं से समञ्च लेना चाहिए । इस प्रकार साद्य 
निमित्ता ्रास्ति ही आन्तिमान्‌ नामक अलंकार का विषय दै, अन्य निमित्त से इई आन्ति नहीं । 
इसकिए [ सर्व॑स्वकार के आन्तिमान्‌ के ]रक्षण मं अव्याप्ति दोष नदीं निकाला जा सकता । 

दसी प्रकार सादृ स्यमूलकं होने से इसमे भी साधारण धम तीन प्रकार काहोता है। उसमें 
अनुगामी साधारण धम का उदाहरण यथा-- 
दे सुग्धाक्षि ! देख, तेरे खिले हए नेत्र को नीरे कमर समञ्लकर भ्रम में पड़ा भोला सघुकर 
उसकी ओर दोड रहा है । 

य्य विकासी = “खिके इए" यह धर्म अनुगामी धमे के रूप मे कथित हे । छद सामान्यरूप 
धम का उदाहरण यथा-- 

पुपित वानर के सुख सा ता्रव्णं का यह प्रतीची में पद्ँचा सूये समुद्र के घड़ियाल दारा 
मांस के रुधिराप्रं नवीन पिण्डके रोम से वडी तत्परता के साथदेखा जा रहा है ।' 


यदय ताघ्रत्व ओर अरुणत्व शुद्धसामान्य धम हे । बिम्बप्रतिबिम्बभाव का उदाहरण यथा-- 
"प्रोञ्छिताः कर्णाभरणेन्द्रनीरकिरणाहताः रारिमयूखाः । 
मानिनीवदने सकञ्जलाश्रुराङ्कया दयितेन ॥° 
(कर नप के नीरुम की किरणो से चन्द्रकिरणो को प्रिय ने मानिनी के चेहरे से यह समक्ष 
कर पछ दिया किये कञ्जरभिश्चित ओंँसु हं" ] 
-- यदहं सकञ्जकत्व [ अर्थात्‌ कञ्ज ] तथा “इन्द्रनीलकिरणाइतत्व [ अर्थात्‌ इन्द्रनीरुमणिः 
किरण ] मे विम्बप्रतिविम्बमाव हे । 
सकी सादुरयनिमित्तकता को ही ओर अधिक दढता से सिद्ध करने के ङ्एि विपरौत 
उदाहरण प्रस्तुत करते है - गाढ श्त्थादि मन्थां दारा । 'साटृद्यनिभित्तक होने पर भी कविकरिपित 
आन्ति ही भान्तिमदलंकार का विषय बनती है, वास्तविक नदी-इस तथ्य को स्पष्ट करते दे-- 
खादृश्य इत्यादि दारा । उदात अर्थाच “गोष्ठे विम्बफलाद्धाया' इत्यादि पथ के रूप मे। यही 
सिद्धान्त सन्देद मे मी लागू करते हुए कहते है-एवस्‌० । संशय = अधात्‌ आरोपगभित संशाय 
ही । वहीं जो संशय का कारण साद्रय वन पातादै। संदेह को यदि अध्यवसायमूलक भी सान 
किया जाए तो उसमे चिषय तथा चिषयी साढ़रय तथा तदितर अन्य सबन्धसे मी संदरेह विषय 
बनने रूगेगे । जेसा कि पहले उदाहरण देकर बताया जा चुका है । इसौ प्रकार यह भी जानना 
चाहिए कि आरोपगमित मी हो विन्तु यदि सादृर्यमूल्क न हो तो संदेह नहीं वनता । अतः इसी 
प्रकार भ्रान्तिमान्‌ को भी साटृर्य छोडकर अन्य कारण से जनित होने पर अलङ्कार नहीं मानना 
चाहिए । साद्रदयमूकक दने पर भी कविकदिपित होने पर ही यह अलंकार अलंकार होता हः 
न कि वास्तविक, रोकरिक या स्वारसिक होने से। 


, २९५६  अलडलारसवंस्वम्‌ 


विमच्चं :-अ टंकाररलाकरकार ने भ्रान्ति को साद्ृद्यमूल्क न होने पर भी अलंकार माना 

है, ओर रासादे सा०” देवमपि हर्ष॑म्‌०' दातुं वन्छति०ये तीनो परय भी प्रस्तुत किदे । 
विमरिनीकार ने उन्द एक एक कर उद्धत किया दै ओर उनका खण्डन कियादै। खण्डनं 
विेषता यह है अलंकाररलाकरकार की पदावली का किंचित्‌ हैर फेर के साथ उसी प्रकार प्रयोग 
किया गया है जिस प्रकार व्यक्तिविवेक में ध्वन्यालोक की पदावली का विमरिनीकार “प्रासादे 
सा० प्य मेँ श्रासादः आदि कौ प्रतीति वमा के अधिकरण के रूप में मानते हैँ ओर कते दें 
करि यदि प्रास्ताद आदि की प्रतीति वछमारूप से दोती तो रान्ति संभव थी । रलाकर प्रासाद आदि 
-मे वछमारूपत्व ही मानते हैँ । उनकी पक्तिं दै--श्रासादे सा०-अत्र गाढरागानुमवदेतुकं तन्मय- 
तानुसंधानं प्रासादादेवंछभारूपत्वेन प्रतीतौ निमित्तम्‌ ।› विमर्दिनीकार ने अनुमव की दुहाई देकर 
इसका खण्डन इसी पदावली मेँ जिस प्रकार किया है वह--शत्यत्रैकस्या ण्व ॒परमिताया अपि 
योषितो गाढानुरागदहेतुकं ˆ“ ` विदेषाककारस्य विवयः?--इस पंक्ति से स्पष्टे! इसी प्रकार रला- 
करकारने 'देवमपि दष॑म्‌" मेँ माना है किं यहां श्रीः-आदिका ज्ञान कविनिष्ठ दै ओर शापः 
आदि का हष॑निष्ठ । अतः प्रमातृमेद होने से यहाँ वे भ्रान्तिमान्‌ स्वीकार करते है । उनकी पंक्ति 
हदै--श्रियम्‌ इत्यादि दहि कवेरुक्तिः शाप-इत्यादिं भ्रान्तस्य श्रीदषैस्य श्रान्तिप्रतीत्यनुकरणमिति 
भिन्नप्रमात््रत्ययविषयीकरृतत्वेनारो पस्तमधादध्यवसयमूक एव॒ श्रमः ।› पृ० ५३ । विमरिनीकार 
इसके विरुद्ध यहाँ श्री ओर शापः दोनों का ज्ञाता केवल दहषको दी मानकर प्रमातृमेदाभाव के 
कारण ्रान्तिमान्‌ को असंभव वतलाते ओर विषमाल्कार का अस्तित्व स्वीकार करते है । पक्ष 
विमरदिनीकारका ही हव हे । 

इसी प्रकार निम्नलिखित पंक्तिओं की पदावली भी विमररिनी पदावली से तनीय दै- 

१ = एकप्रमातृविषयीङृतत्वे विषयविषयिणोरारोपो मतः। न चारोपगभों भ्रमः क्वचिदपि 
स॑मवत्ति । शृक्तिकादीनां शुक्तिक। दिरूपतयाऽ्वगमे रजतायसिमानातुदयात्‌ । 
२= "दातं वान्छत्ति०” = इत्यत्र सतताभ्यासप्रवृद्धक्स्कारदेतुका आ्रान्तिरेव ) संस्कारबोधं 
विना तव्र भ्रान्त्यमावात्‌ । न च संस्कारस्य प्रबरद्धतवे प्रवोधत्वे वा कश्चिद्‌ विषो आ्रान्तौ । तेनेवमादो 
ञ्रान्तिरेव । 
₹ = यदि च “स्र्याद्‌ वस्वन्तरप्रतीतिः भ्रान्तिमान्‌” इत्यव्यापक लक्षणं तदहं लक्षणान्तरं 
विधेयम्‌ । | 
अल्काररत्नाकरकार का यह सिद्धान्त ध्यान देने योग्य दै-- 

"श्रतीतिभेदे हि अल्कारमेदो युक्तो न निमित्तमेदे, अल्कारानन्त्यप्रसंगात्‌ । तद्भेदे त कवि. 
प्रतिमोत्थापितविच्छत्तिसद्धावे अन्तर्भाव एव न्याय्यः 1" 

-अथात अलंकारो मँ मेद माना जाना चादिए बोधम मेदनदह्ोने पर, नकि करारणमें 
भेद होने पर, कारणमेद से अलंकरारमेद मानने पर॒ तो अकार इतने मानने पदगं कि 
उनको गिनती तक संभव न होगी । अतः कारण भेद रहने पररभी उसमे यदि कविप्रतिभो- 
त्थापित विच्छित्ति का सद्धाव हो तो उसको मी षक दही मेद में संगृहीते कर ठेना चाददिए । 

श्रान्तिमान्‌ के विषय मँ उनका कहना ै- 

-स्टद्यव्यतिरिक्तनिमित्तोत्थापितायां च श्रान्तौ विच्छित्तिविेषसंमवे कथं नाम अनरुकारता । 

जो आन्ति स्र्यातिरिक्त निमित्त से जनित दो यदि उसमे मी विचिछन्तिविदोष का सद्धाव 
हो तो उसे अल्कारत्वदीन कैसे कहा जा सकता है । 

संपूण विवेचन का संक्षेपं अलुंकाररत्नाकरकार ने शस प्रकार किया दै- 

“सदेहसंभावनयोयथास्ति प्रतीतिभेदः स्फुट एव, तद्वत्‌ । . 


उद्टैखालङ्ारः १५७ 


साद्ररयदेत्वन्तरयोभ्रैमेषु न दातः कापि विद्धेषबुद्धिः ॥ 
्रतीतिभेदेन विना न वाच्यः कुत्राप्यरुकारगतश्च भेदः । 
निमित्तभेदेन च भिन्नतायां प्रसज्यते सा खट सं्यादो ॥ 
अर्थात्‌ जसे सन्देह ओर संभावना में म्रतीतिगत भेद स्पष्ट रूप से लक्षित होता है साद्रय 
तथा तदधिन्न हेत सेदहदोने वाली श्रान्ति मे वेसा ठेडमात्र भी नदीं । जवतक प्रतीतिमेमेदनदहो 
अलंकार मे मेद नहीं मानना चाहिए । यदि निमित्तभेदसेमी मेद माना जने ल्गे तो फिर 
संशय आदि मे भी अवान्तर भेदौ को भिन्न भिन्न अकार मानने की नौवत आ खडी होगी 1 


आ्न्तिमान्‌ का इतिहासः- 

भामहः + + र 
वामनः- + ११ छ 
उद्धटः- + ~+ + 


रद्रटः-'अथेविदोष परयन्नवगच्छेदन्यमैव तत्सदृशम्‌ 
निःसन्देहं यस्मिन्‌ प्रतिपत्ता आन्तिमान्‌ स इति ॥› ८८७) 
ज्ञाता यदि [ उपमेयरूप ] पदाथ विरोष को देखकर उसके सदृश किसी अन्य ही पदाथं का 
निश्चय कर वेढे तो उसे आन्तिमान्‌ कहते है । उदाहरण-- | 
"पारयति त्वयि वसुधां विविधाष्वरधूममाखिनीः ककुभः । 
परयन्तो दूयन्ते घनसमयाशाक्ष्या हंसाः ॥› ८।८८ 
अपके पृथ्वी कौ रक्षा करते रहते दिश विविध यज्ञ के भूम से युक्त रहती है । उन 
देखकर हंसो का चित्त दुखता हे क्योकि वे उन्है बादर समञ्चकर बरसात अने के भ्रम मे पड 
जाति हें) 
मम्मटः--भ्रान्तिमानन्यसंवित्‌ तत्तुल्यदशेने 
प्राकरणिक ( उपमैय ) के समान [ अप्राकरणिक = उपमानभूत ] वस्तु के दिखाई देने से 
प्राकरणिक ( उपमेय ) मे उसी समान वस्तु की प्रतीति भ्रान्तिमान्‌ । | 
उदाहरण-- कपा मार्जारः पय इति कररर्लेडि शशिनः । = कसोरे म पड़ रदी चन्द्र-किरणां 
को विद्धी दूध समञ्चकर चाने लगती हे ।› 
इस विवरण से स्पष्ट हे कि ्रान्तिमान्‌ के प्रवतक रुद्रट ही है) मम्मट ने भी कदाचित 
्रान्तिमान्‌ को अलंकारो में नहीं गिना, क्योकि यह अलंकार परिकरालंकार के वाद के अलकार्रो 
मे है । रेसी प्रसिद्धि है कि काव्यप्रकाश का निर्माण मम्मरने परिकरतक दी किया हे। शेषांरा 
की पूत्ति हरविजय के टीकाकार अलुक अथवा किसी अल्र्टनामक विद्वान्‌ ने कौ है 1 अन्तरंग 
प्रमाणो से यह तथ्य वास्तविक मी प्रतीत होता है । परिकर के वाद काव्यप्रकाश की पंक्तियां मे 
वैसी कसावट नदीं है। दूसरा प्रमाण यह है कि काव्यप्रकाश मँ जैसा कि उद्धृत प्रमाण से स्पष्ट 
हे, आन्तिमान्‌ को सादृद्यमूरुक अलंकार माना गया है विन्तु उसकी गणना फुटकल अलंकारो में 
बहुत आगे जाकर की गड है 
आचायं दण्डी ने भ्रान्तिमान्‌ को उपमारुकार के अन्तर्गत मोहोपमा नाम से स्वीकार 
किया है-- 
'रारीत्युत्परकष्य तन्वङ्कि त्वन्मुखं, त्वन्मुखादाया । 
इन्दुमप्यनुधावामीव्येषा .मोहोपमा स्मता ॥ २।२५ 
` म ठम्ारे चेहरे को चन्द्रमा समञ्च वैठता हू, अतः तुम्हारे विरह में चन्द्र को तुम्हारा सुख समञ्च 
पकडुने दोडता हू 1 


# 


१५८ ` अचड्नरसवेस्वम्‌ 


अग्निपुराण मेँ मोदोपमा को आ्रान्तिमान्‌ कदा भी दै- 
्र्तियोगिनमारोप्य तदभेदेन कीत्तेनम्‌ । 
उपमेयस्य यन्मोदोपमासो आन्तिमद्‌ वचः ॥ 
र्गमग १२ वीं राती मे ही इए वाग्मट ने भ्रान्तिमान्‌ स्वीकार किया है-- 
'वस्तुन्यन्यत्र॒ कुत्रापि तत्त॒ल्यस्यान्यवस्तुनः । 
निश्चयो यत्र जायेत आ्रान्तिमान्‌ स स्मरतो यथाः ॥ ४।७३॥ 
'हेमकमलरमिति वदने नयने नीलोत्पकमिति प्रखतास्ि । 
कुममिति तवहसिते निपतति अमराणां श्रेणिः ॥ 
जहा अन्य वस्तु म तत्तुल्य अन्य किसी वस्तु का निश्चय दहो जाय उसी को आरान्तिमान्‌ कहा 
जाता हें । यथा--हे आयताश्चि ! भौरोँ कौ पाति तुम्हारे चेदरे पर उपे हेमाम्बोज समद्यकर दूर 
पडती है, नेत्र पर नीककमक समञ्च तथा हँसी पर पुष्प समञ्चकर । संजीविनीकार ने इस 
अठ्कार को संक्चिपतरूप मेँ इस प्रकार प्रस्तुत किया दै-- 
'सादृदयोत्थापिता आान्तियत्र स ्ररितिमान्‌ मतः । 
भथीत्‌ आन्ति जदं साढ़ृदयजनित हो वह॒ आन्तिमान्‌ । 


[ ख्वेस्व | 
[ घ २० ] एकस्पापि निपित्तवशचादनेकधा प्रहणश्चुस्छेखः । 
यत्रैकं वस्त्वनैकधा गद्यते स रूपवाहुल्योट्धेखनादुर्ठेखः । न चेदं 
निनिभित्तशरुस्टे बमत्रम्‌ , अपि तु नानाविधधमेयोगित्वाख्यनिमित्तवरादेत- 
च्कियते । तच ख्च्यर्थिव्वव्युत्पत्तयो यथायोगं पयोजिकाः । तदुक्तम्‌- 


यथाख्चि यथार्थित्वं यथाग्युत्पत्ति भिद्यते । 
आभासोऽप्यथे एकस्मिन्नचुसंघानसाधिते ।' इति ॥ 


 यथा--यस्तपोवनमिति मुनिभिः कामायतनमिति बेदयाभिः संगीवशा- 
दैति च्ासकैः' इत्यादि हषंचरिते शओरीक्ण्डाख्यजनपदव्णने। अज छेक पव 
श्रीकण्डाख्यो जनपदस्तत्तद्गुणयोगत्तपोवनायनैकरूपतय। निरूपितः। ख्च्य- 
धित्ब्युत्पत्तयश्च प्रायश; सखमस्तञ्यस्ता योजयितुं राक््यन्ते । नन्वेतन्मध्ये 
'वज्ञपञ्जप्मेति चारणागतेरस्वरविवरमिति वातिकैः इत्यादो रूपकाटंकार- 
योग इति कथमयमुष्छेलाटंकारविषयः । सत्यम्‌ । अस्ति तावत्‌ (तपोवनम्‌ 
इत्यादौ रूपकविविक्तोऽस्य विषयः । यत्र वस्तुतस्तद्वपतायाः संभवः! यत्र 
तु रूपकं व्यवस्थितं तत्र चखेदियमपि भङ्किः भाविनी तत्संकयेऽस्त । नं 
त्वेतावतास्याभावः शक्यते वक्तम्‌ । ततश्य न दोषः कश्चित्‌ । एवं {द तत्न 
विषये श्रान्तिषदर्ढंकारोऽस्तु अतद्रपश्य तद्रपताध्रतीतिनिवबन्धनत्वात्‌ । नेतत्‌। 
अनैकधाघ्रहणाख्यस्यापूवस्यातिरयस्यामावात्‌ , तद्धेतकत्वाच्चस्यारकारः 
स्य । खंकरप्रतीतिस्त्वज्गीकृतेव । ययेवम्‌, अभेदे मेद इ्येवंरूपातिश्योक्तिरना- 
श्तु। नैष दोषः। चद्ीतृभेदाख्येन विषयविभागेनानेकधात्वोद्ङकनानततस्य च 


उद्टेखाठङ्ारः १८५९ 


विच्छिच्यन्तररूपत्वात्‌ सवेथा नास्वान्तभौवः राच््यक्रिय इति निश्ययः । 
यथा वा-- 
'णाराअणो त्ति परिणञअव हि सिरिवहठहो त्ति तरुणीहिं । 
बालाहिं उण कोदूहलेण पञमे अ सच्चविओ ॥' 


एवम्‌ 'गुखुवंचसि पृथुरूरसि अजनो यराखि' इत्यादाववसेयम्‌ । इयांस्तु 
विदोषः - पूर्वत्र ग्रहीतृमेदेनानैकधात्वोष्टेखः, इह त॒ विषयभेदेन । नन्वने- 
कधात्योर्ङैलने गुवौदिरूपतया शठेष इति कथमटकारान्तरमञज स्थाप्यते । 
सत्यम्‌ । अनैकधाव्वनिमित्त त॒ विच्छ्च्यन्तरमन्न दश्यते इति तत्पतिमो- 
त्पत्तिहेतुः इठेषोऽच्र स्यात्‌ । न तु सवेथा तदभावः ! अतश्चाटंकारान्तरं 
यदेवं विघे विषये श्टेषाभावे ऽपि विच्छित्तिसद्धावः । तस्मादेवमादावुर्टेल 
पव श्रेयान्‌ । पवमटंकासन्तरविचिछच्याश्रयेणाप्ययमटं कासे निद्शोनीयः। 

[ सू० २० ] कारणवशाद्‌ एक ही वस्तु का अनेक प्रकार से ज्ञान उरुरेख । 


[ वृ० ] जौँ एक ही वस्तु अनेक प्रकार से जानी जाती है वह अलङ्कार उच्लेख कदराता 
हे । उव्लेख इसलिए किं उसमे रूपबाहुस्य का उस्टेखन [ अवगम ज्ञान ] रहता है यहयुं ही 
हो जाने वाला सामान्य उन्ेखन नहीं होता, अपितु [ यह्‌ अलकाररूप होता है ओर ] इसका 
[ यत्नपूर्वक ] निष्पादन किया जाता है जिसमे उपाय वनता है [ पदाथं कौ | विविधध मेयुक्तता 
नामकं तत्व । इस [- धिविषधम॑युक्तता ] मे कारण बनते है ( १ ) रुचि? ( २) अथिता तथा (३) 
व्युत्पत्ति, विन्तु योग्यता के अनुसार । जेसा फि [ श्रौमान्‌ उत्पल्देवाचायं ने ] कहा है “पदाथ 
एक ह हो ओर उसका ज्ञान मी यत्न-पूवक ठीक ठग से किया गया हो तथापि वह ज्ञान उसी 
रूपमे बदल जाता हैजेसी ज्ञाता की रुचि रहती है, जसी उसकी गरज रहती है ओर जेसी 
व्युत्पत्ति + जेते - हषैचरित के अन्तमैत श्रीकण्ठ जनपद के वणेन मे | निणेयसागरीय पृष्ठ 
९७ पर ] “जिसे मुनिओं ने तपोवन, वेदयाओं ने कामायतन, नयो ने संगीतशाका [ समज्ञा ]- 
इत्यादि । यहां श्रीकण्ड नामकं एक दही जनपद तपोवन आदि अनेक रूप से निरूपित दै ज्योकिं 
उस [ जनपद ] मे उन [ तपोवन आदि] केखुणये। येजो रुचिः अथित्व ओर व्युत्पत्ति हे 
इनकी योजना एक साथ ओर पृथक्‌-पृथक्‌ भी कौ जा सकती है। इस [ श्रीकण्ठ जनपद स 
वणैन ] सें शरणागत व्यक्तिं ने वच्र का पिजरा, वातिकौ [ भूगभं मे चिपकर साधना करने 
वाँ ] ने असुरविवर [ पाताङ माना ] इत्यादि स्थलं मे रूपकाल्ङ्कार का पुट भी ह तब यह 
उद्केखाल्कार का पिषय कैसे हयो सकता है १ [ उत्तर ] ठीक है [ किन्तु ] तपोवन" इत्यादि. स्थल 
मे उल्लेख रूपक से पृथक्‌ भी विमान दै, जदां वस्ेतः तद्वता इ । हँ ! जहां रूपक होता हे 
वहां यदि इस अलंकार की मी छायाआ जाए तो उसे संकराङ्कार माना ज सकता ह । किन्तु 
इतने [ सांकर्यं ] मर से इस [ उच्छेख ] का अमाव नदीं माना जा सकता । इसलिए यां कों 
दोष नदीं आता रका होती है-कि यहां [ तपोवनम्‌० इत्यादि स्थल मे यदि सकरारुकार 
नदीं है तो ] आ्रान्तिमदलंकार क्यो न माना जाए, क्योकि यहां अर्कारत्व का मूर हे भिन्न मे भिन्न 
वस्तु के अभेद का ज्ञान [ जो भ्रान्तिमान्‌ का जनक है ] [ उत्तर | टेसा नहीं [ अधात्‌ ज्रान्तिमान्‌ 
नदीं माना जा सकता ] क्योकि [ उसमे | “अनेकं प्रकार से ग्रहण ( ज्ञान )-› रूपी नवीन ओर 
विचित्र विशेषता नदीं रहती ओर यह [ उद्लेख ] अल्कार इसौ विरोषता पर निभेर रहता 
हे । जहां तक सकय की प्रतीति का प्ररन है उसे तो स्वीकार कर ही छ्य गया ह । 


१६० अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


[ राका ] यदि ेसा है [ यदो ्रान्तिमान्‌ ओर संकर नहीं माननादै] तो यदहं “अमेद में 
मेद°-नामक अतिरायोक्ति यदा मान ली जाए [ उल्लेख दी क्यों माना जा रहा है] [ उत्तर] 
यह दोष भी नदीं ठदरता क्योकि एक तो यदँ [ अनिवायं रूप से ] ज्ञाता अनेक होते दै [ जव कि 
अतिरदायोक्ति में ज्ञाता की अनेकता अनिवार्यं नदीं रहती । इसर्िए इन दोनो के विषय भिन्न हो जाते 
है, ] दूसरे यहो एक ही वस्तु का ज्ञान [ नियमतः ] अनेक प्रकारसे होता है[ अतिदायोक्ति 
के समान केवर भिन्नरूपमात्र से नदीं ] जो एक स्वतन्त्र ही विच्छित्ति है [ अतः विच्छिन्तिमें मी 
मेद पड़ जाता हे ]। 

सवधा, इस [ उल्लेख ] का अन्तभाव करना संमव नहीं है [ हमारा ] यद्दी निश्चय है । 

[ उल्छेखका ] अन्य उदाहरण यथा-- 

(नारायण इति परिणतवयोभिः श्रीवछभ इति तरुणीभिः । 
वालाभिः पुनः कौतूहलेन एवमेव सत्यापितः ॥ 

-[ शीक्ृष्ण भगवान्‌ को ] वृद्ध मदिंखाओं ने नारायण, युवतियों ने लक्ष्मीपति तथा बचिर्ओं 
ने ऊुतृहलपुवेक एेसा दी समञ्ञा' इसी प्रकार - वाणी मं गुरु [ बृहस्पति तथा गंमीर ] वक्षःस्थक 
मं पृथु, [ पृुनामक राजा तथा विस्तीणे | यदा मेँ .अजुन [ अजंननाम पाण्डव तथा धवल ]' 
इत्यादि मं मी जानना चाषिए । [ इन दोनों मेँ ] मेद इतना ही हैकि प्रथम मे ज्ञातरगत अनेकता 
के कारण ज्ञेयगत अनेकता है ओर दूसरे मेँ [ पृधु तथा अजुन के आरोप के ] विषय [ वक्षः स्थल 
तथा यद | कौ अनेकता के कारण । 

[ शका ] यहां युर [ इृहस्पति तथा गम्मीरता ] आदि सूपसे [ एक ही पुष्यभूति का ] 
अनेक रूप से ज्ञान होने पर [ यों ] इलेष मानना चादिए, यद्य दूसरा अलंकार [ उच्केख ] क्यों 
थोपा जा रहा है । [ उत्तर ] ठीक है [आप की शंका किन्तु ] यद्धं जो [ विषयगत ] अनेकता 
का भाव हे उससे एक नए चमत्कार ॒को जन्म मिक्ता है, अतः [ यदौ एक नय] उल्टेख नामक 
अच्कार्‌ दै, अधिक से अधिक ] देष को यां उस ॒[ उव्टेख ] की ज्षल्क [ ग्रतिभा ] भर शेष 
रहने देने वाला [ उसे दवा देने वाका मात्र ] माना जा सकता हे, यदद उस [ उल्केख ] का सवथा 
अभाव नहीं माना जा सकता । इसङ्एि भौ यह एक भिन्न अल्कार है कि इस प्रकार के 
 उपरिदत्त | स्थलों मे जहो रटेष नहीं मी रहता वहाँ मी यह विरिष्ट चमत्कार अनुभव मे आता 
हे । इस कारण देते स्थल मँ [ दलेष रहने पर मी ] उव्छेख ही मानना अधिक जच्छाहै। इसी 
प्रकार अन्य अल्कारां कौ विच्छित्ति के सहारे मीस अल्करार कौ निष्पत्ति दिखलाई जा 


सकती हे । 
विमरिनी 


एकस्यापीति । अनेकधा ग्रहणमिति । न पुनरनेकधा ककर्पनम्‌ । अहणं हि स्वारसि- 
क्यासुत्पादितायां च प्रतिपत्तौ संमवति न तु स्वारसिक्स्मेव । यदाहु :- 
५ “अतः शब्दानुसंधानवन्ध्यं तदनुबन्धि वा । 

जाध्यादिविषयय्राहि सवं प्रव्यक्मिष्यते ॥ इति । 

करपन पुनरच्छादयं प्रतिपत्येकगामीति स्वारसिक्यां प्रतिपत्तौ न संभवती. 
युभय त्रापि व्यापकख्वाद्यथासुत्रितमेव युक्तम्‌ । रूपवाहव्येति । अत एवाञुखे वस्त्वन्तर- 
प्रतीतिरस्स्येव । अन्यथा द्येकस्यनेकधाग्रहणमेव न स्यात्‌ । अत एव चास्य आ्आान्तिमद्‌- 
नन्तरमेव कक्तणम्‌ । एकस्य च न्‌ स्वातन्व्येणानेकधाग्रहणम्र्‌ , अपि तु तत्ततप्रयोजन- 
वशादिध्याह-न चेदमित्यादि । एतदिति । अनेकधा ्रहणम्‌ एकस्यैव नानाविधधर्मयोगिन 


उल्ठेखाटङ्ारः १६१ 


आखण्डयेन प्रतीतिगोचरीभावात्कथमेकेकधर्मवि षयमनेकधाय्रहणं युक्तमिव्याङ्कयाह-- 
तत्रेत्यादि । तत्नेष्यनेकधाग्रहणे । स्वातन्न्येण विकल्पनं हचिः। अर्थक्छियाभिराषपरत्वमधि- 
स्वस्‌ । च्रृद्धव्य वहार शरणता चयु्पत्तिः। उक्तमिति श्रीप्रस्यमिन्ञायाम्‌ । तत्तद्ृगुणयोगा- 
दिति विविक्तस्वादिनानाविधधमसंबन्धात्‌ } सुनीनां तपोवनविषयमर्थिष्वस्‌ । वेश्यानां 
च कामायतनविषयमथिस्वम्‌ । एवं छाखकानां तु संगीतल्चाराविषया उदयुत्पत्तिरर्थित्वं च । 
प्रायश इति, अनेन इउचिरत्र नास्तीति सूचितम्‌ । नलु योऽयं श्रीकण्डास्यजन पद्‌वणंन- 
अन्थखण्ड उदाहरणस्वेनानी तस्तत्रारुकारान्तर संबन्धोऽप्यस्तीति कथमेतद्धिषय एवेत्याह- 
नन्वित्यादिना । एतदेवाभ्यु पगम्य प्रतिविधत्ते सत्यमित्यादिना । तावच्छब्दो रूपकाभाव- 
विप्रतिपत्तियोतनाथम्‌ । तद्ुपताया इति तपोव नादिरूपतायाः । -अन्नापि यदृन्यैरवयवा- 
वयविभावसंबन्धात्सारोपाया रच्षणायाः सच्वाद्ुपकारंकारमाश्चङ्य विविक्तत्वस्य चिन्त्य- 
त्वसुक्तं तदयुक्तम्‌ । अवयवाव्यत्रि भावसंवन्धाभावाज्ञत्तणाया एवास्खात्‌ । न हि 
श्रीकण्टास्ये जनपदे तपोवनमवयवन्यायेन ऊुत्राप्येकदेरोऽरिति यत्तत्रावयविनि सुनिभिरा- 
रोपितम्‌ । कि तु तत्तद्गुणयोगिनः श्रीकण्ठस्य विविक्तरवादितपोवनादिशुणञ्रुखेन निज- 
निजवासनाचुसारेणायित्वादिना सुनिग्र्डतीनामीदगामासः । अथापि यद्यस्स्यवयवावय- 
विभावविवछा तज्लत्तणमाच्र न रूपकम्‌ । तस्य रुक्तणापरमार्थत्वेऽपि विषयस्य रूपवतः 
केरणादख्कारत्वस्र्‌ । अन्यथा तु कत्तषणामान्रमेव । नहि रुकणापि रूपकपरमार्थां । इह च 
तपोवनाद्यारोपेगारोपविषयस्य नातिश्चयः कश्चित्‌ । वस्तुत एव तद्रपतायाः संभवात्‌ । 
अतश्च स्थित एवात्र रूपक विविक्तोऽस्य विषयः । न केवर्मन्यालंकार वि विक्तोऽयसेवास्य 
विषयो यावद्‌ यत्रापि रूपकालंकारयोगोऽस्ति तश्राण्ययं संभवव्थेवेति दर्शंयित॒माह--यत्रे- 
त्यादि । इयमपि भङ्किरिति एकस्यानेकधाग्रहणरूपा । एतावतेति रूपकप्रयोगमात्रेण 1. 
ततश्चेति रूपकोल्रेखयोः संकरात्‌ । ननु यत्र रूपकय'गो नास्ति तदलंकारान्तरयोगः 
संभवतीव्याह--एवं हीत्यादि । अतद्रपस्येति । अतपोवनरूपस्यापि तपोवनरूपरवोपनिवन्ध- 
नाद । अतरिमस्तदूग्रहो अम इस्येतदेव हि श्रमसतच्वम्‌ । अपूतस्येति आन्तिमदसंभ- 
विनः। तद्धेतुकर्वादिति अनेकधाग्रहणाख्यातिज्ञयनिमितकत्वात्‌ । यदि चात्र आन्ति. 
मानप्यरित तत्तेन सहाश्य संकर एवास्तवित्याह--संकरेत्यादि । यचेवमिति । आन्तिमतो- 
ऽस्य विशेषस्तेन सहास्य संकरो वेच्यर्थः । एष इति अतिशयोक्तिसद्धावः । तस्येति यहयीतर- 
मेदाख्यस्य वि भागस्य । विच्द्र्यन्तरस्वमेत्र हि सवेंषामरंकार।णां मेद्डेतुः । तदेवं तत्त- 
च्छुङ्कानिरासपूवमसुमेव सिद्धान्तीक्ृस्य पुनरप्युदाहरति-णाराअणो न्तीति । अच्र च नारा- 
यणस्वाद्युलरेखने ब्रद्धाप्रष्ठतीनां यथाक्रमं ब्युर्पच्यर्थिस्वरुचयः । एतदेवान्यत्रापि योज- 
यति--एवमित्यादि । विशेष इति पूस्मात्‌ । विषयभेदेनेति वचनादिभिन्नतवेन । अनेकधात्वो- 
रेखे गुवादिरूपतया रलेष इति गुर्वादी नामुभयाथंवाचित्वात्‌ । तत्मतिभोत्पत्तिहेतुरिति । 
श्रेषमन्तरेणाच्रोर्रेखानिष्पत्तेः। तदभाव इति, उल्खेखाभावः। अतश्चेति , श्ेषाभावेऽप्ये- 
तद्िच्छि्तिसं भवात्‌ । एवंविध इति विषययेदरूपे । तत्त यथा-- 
सव्रीडा दयितानने सकर गा सातङ्चर्मास्बरे 
सत्रासा जगे सविस्मयरसा चन्द्रेऽखरतस्यन्दिनि। 
सेष्यां जहसुतावरोकनविधौ दीना कपारोदरे 
पावस्या नवसंगसप्रग्यिनी दृष्टिः शिवायास्तु वः ॥! 
अच्रेकस्या एव दष्टस्तत्तद्विषयभेदेन ना नातवोल्रेखनम्‌ । | | 
एकस्यापि = एक का मी अनेकधा ग्रहण = अनेक प्रकार से महण न कि अनेक प्रकार से 


१६ अ० स 


१६२ अलङ्ारसवेस्वम्‌ 


कल्पना करना [ जैसा कि रत्नाकरकार ने माना दै ] । महण जो है वह तभी संभव दे जव प्रतीति 
स्वारसिक [ = लौकिक सामान्य ] मी हो ओर [केवर कविद्धारा] उत्पादित मी । प्रतीति केव स्वा- 
रसिक = छोकिक हो तो वह संभव नहीं होता। जेैसाकि कदा दै-सभी प्रकार का प्रत्यक्ष 
जाति आदि [ युण, क्रिया, संज्ञा ] कों विषय वनानेवाखा माना जाता दै, भले दी खब्दानुखुधान 
से रदित होया मिश्रित कद्पना पौनरक्त्य आदि रूपदै ओर वह एकमात्र ज्ञानात्मक 
ही दै । इसकिए स्वारसिक = खोकिक ग्रतीति में वह संमव नहीं दे। इसलिए [ उच्टेखका ] 
जेसा रक्षण मृल-[ सवेस्व | कारने कियाहे वेसा ही ठीके क्योकि उसमें [ दण शब्द 
के प्रयोग से स्वारसिक तथा कपना ] दोनों प्रकार के ज्ञानका संग्रह ददो जाता दै । ¦ अतः 
"एकस्यानेकधा कस्पनसुट्लेखः' इस प्रकार रत्नाकरकार द्वारा ग्रहण रब्द को बदल कर कट्पनः- 
राब्द का प्रयोग करना अनुचित दहे || 
| यहाँ यह ज्ञातव्य है किं रलाकरकार ने स्वारसिक तथा उत्पादित दोनों को परस्पर 
निरपेक्षभाव से उल्छेख का कारण बतलाया ह । उन्दने प्रथम का उदाहरण “नारायण 
इति०?2 यह पद्य माना दै ओर द्वितीय का भ्रीङष्ण को महोंने पवंतराज, दूसरी ने चिद्य, 
स॒न्दरिओं ने काम० समञ्ञा-यह ] 
 खूपबाहुस्य इसीरिए आरम्भ में अन्य वस्तुओं की प्रतीति रहतीद्ीदहै। पान दो तो 
एक का अनेक प्रकार से हण दी न हो श्सीकिए इस अर्कार का रक्षण भ्रान्तिमान्‌ अलंकार के 
तुरन्त पश्चात्‌ किया गया हे । “एक वस्तु का अनेक प्रकार से ग्रहण टेसे ही ८ स्वातन्ब्येण ) नदीं अपि 
ठु प्रयोजन के आधार पर होता है--इस तथ्य पर छिखा--न चेदम्‌” इत्यादि । एतद्‌ अर्थात्‌ 
अनेक प्रकार से ज्ञान । एक ही वस्तु मं अनेक प्रकार के धर्मं होगितो केव एक एक धसं लेकर 
अनेक प्रकार से ज्ञान दोना संमव केसे होगा- क्योंकि उस वस्तु का ज्ञान तो अखण्डरूपं से दोगा- 
इस रका पर॒ उत्तर देते हृ छ्िखति हैः = (तत्रः इत्यादि । तत्र = अर्थात्‌ अनेक प्रकार से यहण 
मे 1 रचि नाम द स्वतन्त्रतापूर्वक निकटय करने का, अमीष्ट काम की इच्छा का नाम हे अथित्व तथा 
व्युत्पत्ति नाम हे बृढ व्यवहार का आश्रय होना । उक्तम्‌ = कदा है अर्थात्‌ उत्पल्देव ने श्रीप्रत्यभिज्ञा 
मे. [ द्रष्टव्य = ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविदृत्तिविमदिनी २।२।२ कारिका, यहा रुचि आदि कै अथं अभिः 
नवय की विमरिनी से दी ङ्टिगण हेँ। विमरिनी मे इनका अर्थं है न्लचि स्वातन्त्यं वा, 


अथक्रिया ~ [१ धः # वद्धन्य॒व ४ < 
 अथक्रियार्थित्वं वा हार्‌ वा, अनतिक्रम्य आभासता भियन्त इति सू्रा्थैः \ ] तत्तद्‌ गुण- 


योग॒ विविक्तत्व = एकान्तत्व आदि नाना प्रकार के धर्मो क संबन्ध से। स॒निं मै तपोवन 
विषयक अथित्व है, वेद्याओं को कामायतनविषयक अथित्व है ओर नय को संगीतद्ालाविषयक 


व्युत्पत्ति मी हे जर अधित्व मी । प्रायशः इससे यह सूचित किया कि यद्य रुचि नदीं है । 


| दका | यह जो श्रीकण्ठ जनपद के व्णैन का अंडा यँ उद्धृत कर दिया है इसमें 
दूसरे अकार मी हो सकते है, केवल उट्टेख का ही विषय इसे क्यो माना जा ~रहा है-इस पर 
( उत्तर देते हए ] कते है--ननु० इत्यादि । इसी का स्वीकार कर खण्डन करते हए कहते 
दै सत्यम्‌? इत्यादि । (तावत्‌ -शव्द सूपकामावरूपी अनुपपत्ति का सूचक दै । तद्रूषता का 
का अधात्‌ तपोवनादिरूपता का । इस स्थक मँ भी अन्य विद्ानोने [ योभाकरने नदीं] जो 
अवयवावयविमावसम्बन्ध से सारोपा रक्षणा का अस्तित्व स्वीकार कर रूपकाटकार माना है। 
ओर कहा है कि "यहा कैवक उल्लेख का अस्तित्व मानना सीक नहीं है- वह अमान्यदै। न 
यर्दा अवयवावयिसावसंवन्ध है गौर न लक्षणा ही । श्रीकण्ठजनपद मे तपोवन का अस्तित्व किसी 
एक अंश था अवयव मेँ थोडे ही है ! जिससे सुनिओं ने उत्े अवयवी मानकर उस पर॒ तपोवन का 
भारोप किया हो । यद्यं तो उन-उन युणों से युक्त श्रीकण्ठजनपद मे तपोवन आदि के एगन्तता 


उद्टेखालङ्गारः १६३ 


[विविक्तत्व] आदिगुणों के दारा अपनी-अपनी वासना के अनुसार सुनि आदि को भयोजनवद्यात्‌ टेसा 
आभास हो रदा है । इतने पर भौ यदि अवयवावयविभाव की विवक्षा हो मी तव भी यहं लक्षणा- 
मार दयो सकती है, रूपक नदीं । क्योकि यद्यपि रूपक लक्षणा के विना नहीं हाता; वह्‌ वहीं अल्कार 
दोता है जरह विषयी के द्वारा विषयको अपने रूप से रूपितं किया जाता है । जँ 
ठेसा नदीं होता वहां लक्षणा भर होकर रह जातीदहै। रेसा नदोंहै कि लक्षणा रूपकपरमाथां 
हो अर्थात्‌ उसका स्वारस्य केवर ल्पकमें हो । फिर यहो तपोवन आदि के आरोपस्ते आरोप 
के विषय ( श्रीकण्ठजनपद ) मे कों अतिशय नहीं आता । क्योकि यां तद्रुपता वस्तुतः ही विद्यमान 
है ८ रूपक तो कसित या आहायं तद्रुपता में होता है । ) इसकिएट यहो रूपक से सर्वथा स्वतन्त्र 
ही हे उर्केख । 


इस प्रकार इस ( उल्लेख ) का स्थर केवर वही नहीं होता जहां अन्य किसी अल्कार का 
स्पदे नदीं रदता यथा यह्‌ तपोवनम्‌० इत्यादि, अपि तु उन स्थल मे भी यही अलंकार होता 
दे जौ अन्य अल्कारो का स्पदयौ मी रहता है" ।--इसौी तथ्य के लिए छिखते हे-"एवं हि” इत्यादि । 
अतद्‌ रूपस्य = जो तद्रूप अर्थात्‌ तपोवनरूप नहीं है उसे मी तपोवनरूप से बतराया गया हे 
भिन्न ( अतद्‌ ) में भिन्न (तद्‌) रूपसे बोध भ्रम होता है-ओौर यही भ्रमं का सवेमान्य रूप है। 
अपू = नवीन अथात्‌ जो भ्रान्तिमान्‌ में नहीं होता । तद्‌धेत्तुकसवात्‌ = अनेकधा अ्रहण नामक 
जो अत्तिराय ( विदोषता ) तन्निमित्तक । ध्यदि यहो भ्रान्तिमान्‌ भीदहेतो उसके साथ हए उल्लेख 
का संकर दही माना जायः-इस इका को मन में रखकर स्वीकारात्मक उत्तर देते इट कहते हे- 
“संकरः इत्यादि । ययेवम्‌ = यदि टेसा है अर्थात यदि आन्तिमान्‌ से इसका अन्तर है अथवा 
उसके साथ इसका संकर है तो । एष = यह अर्थात्‌ अतिशयोक्ति का सद्भाव । तस्य = उसका अर्थात्‌ 
ग्रहीता के मेद नामक विभागका। सभी अल्कारां का भेदक विच््छित्तिगतं भेद दही दोताहे। इस 
प्रकार विभिन्न रकाओं का निराकरण करके फिर ॒से उच्छेख का ही उदाहरण प्रस्तुत करते है- 
“णाराअओ = नारायणः इत्यादि । यहां जो (नारायणत्व' आदि का उस्लेख है उसमें वृद्धा आदि का क्रम 
से व्युत्पत्ति, अर्थित्व ओर रुचि निहित है । क्सो को दूसरे स्थलों मे मी लागू करते इए कहते है- 
'एवम्‌० । विशेष = अन्तर अर्थात्‌ पहञे से । विषयमेदेन अर्थात्‌ वाणी आदि कौ सिन्नत। से । 
८अनेकधात्वोच्लेख ०० रङेषःः गुरु आदि के रूप मे अनेक प्रकार से उल्लेख होने पर रटेष होगा = 
कारण कि युर आदि ब्द अध॑द्य कै वाचक है। तसप्रतिभोर्पत्तिहेतुः क्योकि यहां रलेष के 
यिना उल्टेख को निष्पत्ति नदीं होती । तदभाव = उल्लेख का अभाव । अतश्च अथात्‌ इरेष के 
न होने पर मी इस उद्छेख की विच्छिन्ति की निष्पत्ति संमव होने से एवंविध = ठेसे = विषय- 
मेदरूप स्थर्छो में । इसका उदाहरण-(पावंती कौ हिवजी का नवीन समागम चाह रही 
( प्रणयः = याच्जा ) इष्टि आप के शिव =कस्याणकेकिएि हो, जो (दृष्टि) प्रियसख पर सलञ्न, 
गजचमः पर॒ सकरुण, सप पर सभय, अभ्रतवषीं चन्द्र॒ पर सविस्मय, गंगा पर ॒इष्यायुक्त, कपारु 
प्रर दीन दी जाती है [ अथात्‌--वई उन-उन भावा को व्यक्त करने वारी मुद्रा से युक्त हयो जाती 
है ] यहां एक ही दृष्टि का ( प्रिय॒सुख आदि ) विषयों के मेद से अनेकत्व उछिखित हे । 

विमश्ञेः-एवंविषे विषये इस प्रकार के विषय मेँ इस मूक का अथे जयरथ ओर श्रीविचा- 
चक्रवतीं इन दोन। टीकाकारो ने 'विषयमेदरूप विषयः विया है, किन्तु किया जाना चादिए “एक 
वस्तु कै अनेकं प्रकार से ज्ञान वाले स्थलों मेँ" । इस पंक्ति के तुरन्त पुवं विषयभेदरूप उल्लेख 
सेद का दी निरूपण है किन्तु इलेष का अभाव श्हीतमेद से अनेक प्रकार का ज्ञान-' इस भेद 
ममी होता ही है। खण्डन इलेषयुक्त विषयभेद वाके अश्च का चर रहा है अतः "एवंविध" का 


| १७ | अलङ्कारसवंस्वम्‌ 


परामद्यौविषय उसी को मानना चादहिए"-यदह तव मान्य होता जव ^तत्प्रतिभोत्पत्तिदेवुः-००० 
अतश्वाठकारान्तरम्‌?-इतने अन्थ को अख्ग॒ मान कर इसमे साध्यसाधकमाव माना जाता अथात्‌ 
क्योकि रेष उल्लेख की स्चकक भर रदने देता है, उसका यहां अभाव नदीं हो जाता । इस अं को 
॥ हेत मानकर “इसङिण उच्टेख भिन्न ही अलंकार दैः-इसे साध्य माना जाता । किन्तु ठेसा दोना 
| | संभव नदीं है  'जल्कारान्तरम्रतिभोत्पत्तिहेतुत्र को अन्य अलंकार के निराकरण का हैतं माना गया 
1.4 हैन कि सिद्धिका। फिर अतश्च" मे च" = 'ओर'-यह पदां व्यर्थहो जाता) हमने इस 
| ग्न्य की जेसी संगति लगाई हे उसमें एेसा कोइ दोष नहीं रहता । हम (तस्मादेवमाद्‌ ---श्रयान्‌ 
को पूरे विवेचन का उपरसंहारभूत सिद्धान्त वाक्य मानते हैँ । इस्तके पश्चात्‌ जो टवमल्ङ्कारा 
निदरौनीयः कहा गया है वह इसलिए कि ऊपर केवल कुच ही अलंकारा का निराकरण किया 
#: गया हे । | 
५ एक यह तथ्य॒भी यदं ध्यान देने योग्य है कि उल्लेख में न केवल जेयगत अनेकत्व; अपितु 
जञातृगत उनेकत्व मी अपेक्षित होता दे 1 


विभशिनी 


तदय द्विप्रकारोऽपि रूपकाद्याश्रयवदन्याटकाराश्रयोऽपि संभवतीत्याह-एवमटंकारा- 
न्तरेत्यादि । तत्राद्यः प्रकारः संदेहाश्रयो यथा- 
किं भनुः किसु चित्रभानुरिति यं निश्चिन्वते वैरिणः 
किं चिन्तामणिरेष कल्पविटपी कि वेति चा्ागताः। 
किं पुष्पाकर एष पुष्पविश्चिखः किं वेति रामाजन 
| कि रामः किञ्यु जामदग्न्य इति वा यं धन्विनो मन्वते ॥' 
अन्नकस्यव संदिद्यमानव्वेनानेकधाव्वोर्टेखनम्‌ । अतिदायोक्व्याश्र यश्चायसेव यथा-- 
वच्रे खोराञ्यसाक्ती परिकलितमहाः शक्तिमारद्रापराधो 
दण्डं खड्गं रिपुखी प्रसभहरणविस्द्पवाप्यादिदश्वा । 
-- पाश पाणावपश्यन्ध्वजमपि बरूवित्कोषवेदी गदां च 
स्वाच्छुन््यत्तखिश्रूरं छिखति करतल देव चिन्रा्धतेस्ते ॥? 


अत्र त्वमवेनद्र इत्या्यतिशयोक्त्या रऊोकपालाभेदो राज्ञ॒ उपलभ्यते इस्येकश्यानेक- 
धात्वोर्छेखनम्‌ । विषयभेदेन च रूपकाश्रयो यथा- 
मूधनयदरेधातुरागस्तरषु किंसरयं विवुमौघः समुद 
दिडमातङ्गोत्तमाङ्गेष्वभिनव निहितः खान्द्रसिन्दूररेणुः। 
सीभ्नि भ्योग्नश्च हेम्नः सुरशिखरि्ुवो जायते यः प्रकाश्चः 
दो गिम्नासौ खरां श्ोरुषसि दिद्चतु वः शर्म ररिमग्रतानः ॥° 
` अत्रेकस्येव विषयभेदेन रूपकाश्रयं नानात्वम्‌ । “कारकान्तर' इस्यपपाटः। प्रक्रते 
कारकविच्छिर्थाशध्रयस्येवानुक्तस्वात्‌ । अयं स्वरूपटेतुफलोर्टेखनरूपस्वास्त्रिधा । तन्नः 
.  स्वरूपोररेखः समनन्तरमेवोदाहवः। हेतूर्टेखस्तु यथा- 
सगंहेतोः सद्‌ा ध्मः स्थितिहतोरपि प्रजाः 
द्विषः संहारहेतोश्च विदुस्स्वां जातमात्मनः ॥* 
अत्नकस्यव जन्मनो टेतूनामनेकध।व्वोल्टेखनम । फएरोल्टेखस्तु यथा- 
“धर्मायेव विदन्ति पार्थिव यथाचाछ्ं प्रजाः पालिता 
अथायेव च जानतेऽन्तरविदः कोषेकदेक्षस्य ये । 


उस्टेखालङ्ारः १६७५ 


कामायेव कता्थंताय्यु पगता नार्यश्च निधिन्वते 
ज, ४ ए 
मोत्तायेव च वेद्‌ जन्म भवतः कश्चिद्धिपिञ्जनः ॥ 
अत्रेकस्येव जन्मनः एकानांमनेकधात्वोल्रेखनस्‌ । 


"दोनों ही प्रकार का यह उल्लेख जिस प्रकार रूपक आदि उक्त अलंकारो के स्थलों में होता 
ठे उसी प्रकार अन्य अल्कार्‌। के स्थलों मे-यही वतरते है--“एवमलंकारान्तर ० इत्यादि द्वारा 
दोनो प्रकारा म प्रथम प्रकार [ गृहीतगतानेकत्वजनित अनेकविध उल्लेख ] संदेह के स्थल में 
दोता हेः यथा-“जिसके विषय में वैरी रोग सोचते है--"यद्‌ सूये है क्या जओौर यह अभ्निहै ज्या 
आस वोँध कर आएलोग जिसके वारे मे देखते दै--क्या यह चिन्तामणि है ओर क्या यह 
कट्पवृक्च दै १ खन्दरिया सोचती दै--“क्या यह मधुमास्र है या कामदेव ? ओर जिसे धनुषधारी 
रोग समक्ते हें किक्या यह रामदे या परशुराम । यहोँएकही का अनेक प्रकार से संदेह 
विषयरूप से ग्रहण कियाजा रहा है। यही मेद अति्ययोक्ति पर आशित इस उदाहरण में 
देखिए- 


८दे राजन्‌ ! जब अपका चित्र लिखा जाताहेतो आपके राज्ये उखसमृद्धि देखने वाले 
आपकेहथमें वज्रको रेखा वना देते हँ; तेज देखने वाङ राक्ति कौ रेखा; अपराधी दण्डक 
रेखा; रि पुखिय का वलात्‌ हरण देखने वाङे खङ्ग कौ रेखा; करूप, वापी आदि देखने वाङ पाश कौ 
रेखा; बलको जानने वाके ध्वन की रेखा; कोष जानने वाले गदा की रेखा ओर स्वच्छन्दता 
जानने वाले चिद्य कौ रेखा 


-- यहो तुम्दीं इन्द्र हो--इत्यादि क्रम से लोकपालो का अभेद राजा पर प्रतीत होता हे। 
इस प्रकार एक ही व्यक्ति का अनेक प्रकार से उर्लेख हे । 

विषयमेद से होने वाखा रूपकाभ्चित उर्केख यथा- 

'भगवान्‌ सूयं को किरणों का समुदाय सवेरे कौ लल मँ आपको प्रेय प्रदान करे, यह अपनी 
लों से पवेत शिखर पर धातुराग गता है, वृक्षा पर किसल्य, समुद्र मे मृगे का ठेर, दिग्गजों 
के माथे पर तुरत रगाई गई सिन्दूर की धूर ओर क्षितिज मे सुवणं पवत [ देवपव॑त खमेर ] 
की स्थछियां ।' 

--यदहा एक ही ररिमप्रतान रूपी वस्तु पर ( पर्व॑त शग आदि ) विषयसमेद से रूपकाशित 
उर्खख ह । 

यहाँ [ अलकारान्तर विच्छित्ति°ः मेँ आए अककारान्तर शब्द कै स्थान पर ] (कारकान्तरः 
पाठ अशुद्ध पाठ है क्योकि प्रकृत मे कारकक्रत विच्छित्ति का कोई उद्केख नदीं है । 

यद उच्टेख स्वरूपोररेख, हेतूल्रेख तथा फलोच्लेख इस प्रकार से तीन प्रकार का होता है । 
इनमे स्वरूपोर्रख तो अभी-अभी बतला ही दिया गया, दैतूर्लेख का उदाहरण इस प्रकार दै-- 

हे ब्रह्मन्‌ › प्रजां आपको सृष्टि तथा धर्मस्थिति के लिए स्वयं से उत्पन्न मानती है ओर रावुरोग 
संसार के लिए ।' 

यहां जन्म ( उत्पत्ति ) एक ही है विन्त उसके हेतु अनेक वतलाए गण है[ सृष्टि, धर्मरक्षा 
तथा संहार )। 

फलोल्टेख का उदाहरण यथा-- । 
हे रजन्‌ राखानुसार पाल्ति प्रजा आपका जन्म धम्मं कै क्षि हयी मानती 


है, कोद का एक अरा जानने वाङ अथकेही किए, कृताथंताको प्राप्त नारियों केवलकामकेदी 


किए तथा कुछ विद्वान्‌ केवर मोक्ष के ही लिए ।› . 


दद | अलङ्ारसवंस्वम्‌ 


- यहां जन्म एक ही है भौर उसके फल अनेक वतलाए गए हें । 

विमश--इतिदासः--उव्रेख - भामह; वामन, दण्डी, उद्धट, रुद्रट, मम्मटः --उन पूवेवन्तीं 
सभी आल्कारिकों मे. नदीं भिता । प्राप्त मन्थो मे अलंकारसर्वस्व में दी यह पहली वार मिलता है । 
कदाचित इस अल्कार का इद॑प्रथमता के साथ विवेचन अलंकार सवस्वकार ने ही किया हे । 

परवत्ता अप्पय्यदीक्षित ने चित्रमीमांसामें ओर पण्डितराज जगन्नाथ ने रसगंगाधर में 
उल्लेख म यहीतेगत अनेकलत्व पर भी उतना ही वेर दिया है जितना एक ही वस्तु की ्रहणगत 
अनेकंता पर 1 एेसा करने का उददेदय उन्दोँ ने मालारूपक से उल्लेख का अन्तर माना दै । अप्पय्य. 
दीडित का लक्षण इस प्रकार है-- 


“निमित्तमेद देकस्य वस्तुनो यदनेकधा । उल्टेखनमनेकेन तमुर्रेखं प्रचक्षते । 


य॒त्र नानाविधधमैयोगि एकं वस्तु तत्तदधर्मरूपनिमित्तमेदादनेकेन यहीत्रा अनेकधा उच्किख्यते 

स उल्लेखः 1 
की त्तिगगाःदिमक्ष्माभ्रदोजःसू्योदयाचलः । राचुसेनाब्धिमन्धाद्वि युणरत्नैकरोदणः ॥° 

- इति मालारूपके एकस्य राज्ञो यशस्वित्यादिधमेयोगरूपनिमित्तमेदात्‌ वुषाराद्वित्वायनेक- 
प्रकारेणोररेखनमस्तीति तत्रातिन्याप्चिनिरासायानेकेत्युक्तम्‌ । तत्र यही तृभेदनिवन्धनं न मवत्यनेक 
धोद्केखनमिति नातिव्या्धिः › [ चित्रमीमांसा कारी सं° प° २२५ | 

पण्डितराज जगन्नाथक्रत उर्ञेखलक्षण इस प्रकार है- 

(एकस्य वस्तुनो निमित्तवदाद्‌ यद्‌ अनेके ग्रहीतरृभिरनेकम्रकारकं ग्रहण तदु्लेखः ।* धर्मस्यात्मा 
भागधेयं क्षमायाः इत्यादि मालारूपकेऽतिप्रसङ्गवारणायानेकै यही वरभिरि त्यविवक्षितवहत्वकं यहण- 
विद्ञेषणम्‌ । 

विषयमभेदमूलक उच्छेख ओर मारारूपक मँ अन्तर भी विचारणीय है । इसी अन्थ मे मालका- 
रूपक का उदाहरण दिया गया हे “पीयूषप्रखत्तिनैवा मखमुजां दात्रं तमोलूनये०” इत्यादि ओर 
विषयभेदमूलक उच्लेख का--“गुरुवंचसि, पृरथुरुरसि० इत्यादि । इन दोनो उदाहरणा मे कोई 
अन्तर नहीं हे । कारण कि उक्लेख के इस उदाहरण मेँ क्रिया "दिखाई देता धा, प्रतीत होता थाः 
ठेसी कछ न होकर वभूव'-शथाः यह अस्तित्वमात्रवाचक ( क्रिया ) ही है । रेसी स्थिति में 
यहां भी वचनादि" को साधारणधर्म मानकर राजा पर शुरु, आदि का आरोप ही प्रतीत होता दे 
ओर चमत्कार मी उक्ती आरोप मेँ है, अनेक प्रकार से ज्ञान मे नदीं । अर्थ यह कि वहाँ अभेद के 
ज्ञान मं चमत्कार है अनेकत्व के ज्ञान मे नदीं। अनेकलत्व यहाँ केवर मालात्व का जनक है । 
यदि केवर इतना भी कद दिया जाता कि श्रत्यपयत पृथुदटैदयेऽसावज॑नो यद्वासि वाचि गुरुश्च 
यह राजा वक्षःस्थल में प्रथु, यदा मे अजन, वाणी मे गुरु प्रतीत होता थाः तो यहाँ ज्ञानगत 
अनेकत्व द्वारा चमत्कार आ जाता ओौर रूपक न होकर उच्टेख ही होता । यहं ज्ञाता की एकता 
या अनेकता का कोई प्रन नदीं उठता क्योकि वह दाब्दतः कथित नदीं है । ज्ञानगत अनेकत्व ते 
चमत्कार की प्रतीति ही उच्लेखका प्राण दहै। मालारूपक मे आरापक्रतत चमत्कार दही प्रधान 

होता है, अनेकत्वं उसका सहायकमात्र रहता है । इस कारण अन्धकार दारा ध््रहीतृगत अनेकत्वः का 
अनुपादान हानिकर नहीं है । पण्डितराज ओर अप्पय्यदीक्षितद्रारा उसका उपादान करना दही 
अनावदयक है । 4 

अलु कारररनाकरकार ने उद्छेख का लक्षण “एकस्यानेकधा कस्पनसुर्छेखः'-इस प्रकार किया है । 
करपनः का अथं करते हए उन्होने छिखा है--कटपनं “* वे कल्पिकः प्रत्ययः-अर्थांत्‌ चिकद्प प्ण 
इनका नाम "कल्पन" है। इते उन्दने स्वारसिक = खोकिक तथा कद्पित दोनों प्रकारका 


उस्ठटेलालङ्ारः १६७ 


माना है किन्तु स्वारसिक को स्वतन्त्र मान कर करिपित = उत्पा को स्वारसिक मिभित 
मान ख्या हे । | 
विमरिनीकार केवर भित्रित को ही उल्लेख-जनक मानते है । मूर के श्रहणः-राब्द का वे 
यदी अथै करते ह । सचना यह दहैकिक्यावे दोनों विकल्प उर्केख के प्रत्येक स्थर मे वस्तुतः 
मिधित ही रहते हं । उदाहरणसे यद्‌ तथ्य सखष्टहो जाता है। "णाराअगो० उदाहरणम 
अलरुंकारसवेस्वकार के ही समान अरुकाररत्नाकरकार को मौ उल्केख मान्य है , विमरिनीकार को 
मी इस उदाहरण मे कोड आपत्ति नहं दै। इसने वृद्ध, जवान ओर नवेखो खियो दारा एक हयी. 
क्ष्ण का जिन जिन रूपों का ज्ञान किया गय। है वे सव स्वारसिक ही हैँ कल्पित नहो । कृष्ण को 
किसने क्या माना इते कविने सोचा तौ स्वयं ही है, अतः इसमे कल्पना तो अवश्य है किन्तु यह 
कल्पना तो काव्यमत्र का अस्ावारण आधार है। देखना यह्‌ है कि करिपित वस्तु रोविक है या 
केवर कस्पनाप्रसूत । केवर कल्पनाप्रसूत वस्तु श्ुरुवेचसि, प्रथुरुरसि ० है । यहाँ अंगभूत 
दल्षद्वारा राजामे ब्रहस्पति आदिका बोध केवर काल्पनिक दहै, जिसका आधार वाणीः 
आदि का कामहै, 
 अप्पय्यदोक्षित ओर पण्डितराज जगन्नाथ दोना ने उचल्रेखाल्कार के विषय म अल्कार- 
स्वस्व, अरुकाररत्नाकर तथा विमर्दिनी तीनों को समस्त उपस्थापन अधनारी है । उन्होने 
ज्ञातृगत अनेकत्व को महच देकर उसको एकाङ्किता का मी अनुभव किया है। इसीलिए विषय- 
मेदमूलक उल्रख का लक्षण अक्ग करना पड़ा हे- 
“गरही तृभेदामावेऽपि विषयाश्रयभेदतः । 
एकस्यानेकधो र्लेखमप्युर्लेखं प्र चक्षते ॥ चित्रमी० पृ० २३० कारी सं० १९६५ 
श्रकारान्तरेणाप्युल्लेखो दर्यते यत्रासत्यपि यरहीत्रनेकत्वे विषयाघ्रयसामानाधिकरण्यादीनां 
सम्बन्धिनामन्यतमानेकघवप्रयुक्तमेकस्य वस्त॒नोऽनेकप्रकार त्वम्‌ ।" 0 
रसगं० प° ३६१ नि° सा० सं० ६ सं° १९४७ 
किन्तु अलकंकारकोस्तुमक)र विरवेरवर पण्डित उल्लेख को अतिदायोक्तिरूप ही मानते है; 
उसका अरग अस्तित्व नदहीं। संजीविनीकार श्रीविद्याचक्रव्तीं ने अल्कारस्व॑स्व के ऽद्लेखः 
सम्बन्धी संपूणे विवेचन का संक्षेप इस प्रकार किया है-- 
'नानाधम॑वलदेकं यदि नानैव ग्रद्यते। 
नानारूपसयुल्लेखात्‌ स उर्छेख इति स्मरतः ॥ १॥ 
। यदेकं तद्धि नानेति ग्र्यते रूपभेदतः । 
रुच्यादिवडश्चतो लोके नानात्वं चेदक्रतरिमम्‌ ॥ २ ॥ 
अतद्रुपस्य ताद्रूप्यान्न यसौ आ्रान्तिरिष्यते । 
न चाप्यतिरायोक्तिः स्यादमेदे भेदरूपिणी ॥ ३ ॥ 
आये नानेकधात्वं स्याज्‌ ज्ञातृमेदो न चान्तिमे । 
विषयज्ञातरमेदाभ्यां विना नोर्छेखसमवः ॥ ४ ॥ ~ 
यपि दलेषतो बाधो न तथाप्यस्य निहवः । 
अनपेक््यापि यच्छलेषं तत्रैव स्थातुमहंसि ॥ ५ ॥ 
धमगत अनेकता के कारण एक ही वस्तु जो अनेक प्रकार से मासित दह्योती है वही उल्लेखं 
नामक अलंकार दै । यद्यपि एकत्व ओौर अनेकत्वं परस्पर विरोधी है तथापि रूपगत मेद को 
लेकर वे एक ही वस्त॒ मे संभव हें । रूपभेद होता है रुचि आदि के कारण । यही अनेकत्व यदि 
लोकं मे होता है तो अङ्रत्निम अनेकत्वं कहलाता है । 


१६८ अच्ङ्कारसवेस्वम्‌ 


इसमे भिन्न वस्तु कौ भिन्न वस्तु के साथ तादात्म्यप्रतीति रहने मात्र से इसे आन्ति नर्द 
कहा जा सकता ओर न अमेद में मेद प्रतीति की इ्ल्कं से अतिरदायोक्तिदही। क्याकि प्रथम 
८ रान्ति ) मे चमत्कार अनेकधात्व पर निमेर नहं रहता आंर दवितीय में ज्ञाठगत अनेकता पर 
जव कि उल्लेख में चमत्कार विषय या इयत्ता दोना मंसे किसी एक के अनेकत्वं के विना सम्भव 
नहीं होता । 

यचपि यह अलंकार रकष से वाधित हो जता हे । तथापि इसका अमाव नहीं माना जा सकता 


-कर्योकिं विना दरेष के मी यद अलंकार तत्‌ तत्‌ स्थल मे अलुभवगोचर होता दे । 


सूचनाः-इस अल्कार के मूर ओर टीका दोनों को ही अनेक स्थलं मेँ हमने ठीक किया हे । 
मूल में विच्छच्यन्तररूपत्वात्‌ । स्व॑धा' - पंक्ति निणेयसागरीय संस्करण के ही समान मोतीलाङ 


-वनारसीदास सस्करण में मी "विच्छित्यन्तररूपत्वासवेथाः इसी प्रकार छपी रह गदं 


उसी प्रकार उक्त दोनो संस्करणों म शयुरवेचसिः नदीं दै। ो० रा० च० द्विवेदी ने इस 
कमी पर ध्यान दिया है ओर प्ृथुरुरसि' के स्थान पर इसी पाठको स्वीकार कियाद तथापि 
छपा धृथुरुरसि' हयी है “गुरुवंचसिः नदी । हमने इन दोनों को स्वीकार कर च्या कारण कि 
-रत्नाकरकार ने ओर उनके अनुसरण पर अप्पय्यदीक्षित नं भीइन दानोँद्धी को अपनाया हे । 
केवर दो की अपेक्षा तीन का उच्केख अधिक चमत्कारक भी दोता हे । 


[ सवेस्व ] 
| ० २१ ] विषयस्यापहवेऽपहतिः । 
वस्त्वन्तस्परतीतिर्त्यिव । पक्रान्तापहववेघम्यणेद्‌ नुच्यते । आयेपपस्ता- 
बादारोपविषयापहतावासेप्यमाणध्रतीतावपहत्याख्योऽ्टकारः । तस्य च 
ञ्रयी बन्धच्छाया, अपहवप्रुवंक आसेपः, आयोपप्रूवंको ऽपह्ववः। छल्ादि 
शब्दैरसत्यत्वप्रतिपादकेवोपहवनिर्देशः । पूर्बाक्तमेदद्ये वाक्यभेदः । च तीय- 
भेदे त्वेकवाक्यत्वम्‌ । आद्यो यथा-- 
'यदेतच्चन्द्रान्तजलदल्वदटीखां धक्ुशूते 
तदाचष्टे कोकः रादाक इति नो भां प्रति तथा । 
अहं त्विन्दुं मन्ये त्वद्रिविरहाक्रान्ततरुणी- 
कराक्षोल्कापातव्रणकिणकलङ्काङ्किततयम्‌ ॥।' 
अबरेन्दवस्य शदास्या पहवे उपश्चि्ठे राराकप्रतिवस्तुकरिणवत इन्दोरसरोपो 
नान्वयधरनां पुष्यतीति न निरयम्‌ । तत्तु यथा - 
(पूर्णेन्दोः परिपोषकान्तवपुषः स्फारप्रभाभास्वरं 
नैदं मण्डलमभ्युदेति गगनाभोगे जिगीषोजंगत्‌ । 
मारस्योच्छ्रितमातपचमधुना पाण्डुप्रदोषश्चिया 
मानोन्नद्धजनाभिमानदखनोयोगेकटेवाकिनः ॥ 
द्वितीयो यथा-- 
विलस्दमरनारीनैजनीलाग्जषण्डा- | 
न्यधिवसति सदा यः सयमाघःकूतानि । 


| 


अपह्त्यख्ङ्कारः ९६९ 


ज तु ख्चिरककापे वतते यो अयूरे 
वितरत स माये जञ्चचयंश्षिय वः ।+ 
त तीयो यथा-- 


उद्‌ श्रान्तोज्ितगेहगूजेरवध्रूकम्पा$लोच्चैःक्कच- 
पज्खो कामटहार्वष्िबिगलन्मुक्ाफरूटच्छद्यना । 
खाध त्वद्विपुभिस्त्वदीययरासां दाल्ये मरो धावतां 
श्र्ठं राजमसरगाङ् ! कुन्द भुकलटस्थूलेः ्रमाम्भःकणेः ॥' 
अत्र शल्य इत्यस्य स्थने मन्येराब्दधयोगे सापहवोत्पेश्चा इत्यपि स्था- 
पयिष्यते, “अहं त्विन्दुं मन्ये' इति तु वाक्यमेदे मन्येदाब्दपरयोगेनोस्पेक्ेति च 
वक्ष्यते । एतस्मिन्नपि भेदोऽपह्नवारोपयोः पौवापयप्रयोगविपयेये भेद्यं 
सदपि न पूवंवचि्तावहमिति न भेदत्वेन गणितम्‌ । तजापह्वपूवेके आरोपे 
निरन्तर वुदाहतम्‌ । मआसेपपूवके त्वपहवे यथा -- 


(ज्योत्सराभस्मच्छुरणघवल्ा बिशथ्रती तारकास्थी- 
न्यन्तधोनव्यसनरसिका राञ्जिकापालिकीयम्‌ । 
द्वीपाद्द्वीपं स्रमति दधती चन्द्र्ुद्राकपाटे 
न्यस्तं सिद्धाञ्जनपरिमटं काज्छनस्य च्छटेन ॥' 
कचित्पुनरसत्यत्वं वस्त्वन्तररूपताभिघायि-वपुः-शब्दादिनिवन्धनं यथा-- , 
"अमु ष्मि्धावण्यास्त सरसि नून सगदः 
स्मरः रावष्लुष्टः पृथुजघनभागे निपतितः । 
, यद्ङ्गाङ्गायर्णां प्ररामपिश्युना नाभिङ्कहरे 
शिखा धूमस्येयं परिणमति रोमावलिवपुः ॥* इति । 

| सूत्र २१ | विषय का अपह्नव हो तो [ अलंकार ] अपहति [ कहङाता हे | । 

[ बृत्ति ] [ सूत्र मं- ]-भिन्न वस्तु की प्रतीति-इतना [ आन्तिमान्‌ के लक्षण से ही] चला 
आता हे । प्रस्तुत का जो अपहव, तद्रुपी वेधम्बं के कारण यह [ अपहुतिलक्षण उच्केख आन्ति- 
मान्‌ आदि से ष्थकू ] बतलाया जा रहा है । प्रकरण आरोप का दै, अतः ¶विषयः का अथं है आरोप 
का विषय । उसका अपहव [ तिरोधान ] बतलाया जाय ओर आसेप्यमाण अथं का ज्ञान कराया 
जाय तो अरकार का नाम॒ अपहति होता है। उस [ अपहृति ] का वाक्य विन्यास तीन प्रकार 
से होता दै \ । ) जिसँ अपहव पूर्रक ञारोप होता है, ( ॥ ) जिसँ आरोपपूर्वैक अपहव होता है 
ओर (।॥ ) जिसने असत्यत्वपरत्िपादक “छल'-आदि शब्दौ ते अपहव का निशा रहता है । 
प्रथम दो मेदो मे (से प्रत्येक में ] वाक्य वद जाते है [ एक वाक्य नदीं रहता ] किन्तु तृतीय 
भेद मं वाक्य एक ही रहता है । प्रथम का उदाहरण यथा- 

यह जो चन्द्रमा के मध्य मेवखण्ड की लीरा बिखेर रहा है इसे लोग खरगोश कहते दै परन्व॒ 


-युद्े वेसा नही र्गत । में तो चन्द्रमा को आपको राच्रुखियों कै कटाक्ष कौ उल्का से दगा अतः 
एव घ।व वैगे काङ्खि से युक्त मानता हूं ।' 


वि" पयि 


१७० अलङ्कारसवेंस्वम्‌ 


किन्तु यह उदाहरण स्व॑धा निर्दोष नदीं है, क्योकि इसमे अपहवं तो हो रहा है चन्द्र के 
खरगोद् का ओर आक्षेप किया जा रहादहै खरगोद् कै समान कल्क से युक्त चन्द्रमाका 
[ जव कि किया जाना चादिटथा केवल कलठ्ककादी] जतः इस वाक्य में अ्धसंगत्ति भैरती 
नहीं हे । निर्दोष उदाहरण यह दै- 


आकारा मण्डल में पयाप्त मात्रासे विखरती प्रभासे चमवमाता यह परिपोष से कान्त 
दारीर के पूण चन्द्र का विम्ब उदित नदां हो रहा, अपितु मान गवित व्यक्तियों का गवं चुणे करने 
का उयम ही जिसको प्रधान खीला हेते संपूण विश्च को जीतने के इच्छुक कामदेव का 
प्रदोषलक्ष्मी ( सध्याश्री) से पीला पड़ा आतपत्र [ राजचिह = रवेतच्तर ] फेलाया जा 
रहा हे । 

दवितीय का उदाहरण यथा- 

(जो सविरास अप्सराओं के नेत्ररूपी नीलकमल को अपने संयम से नीचा कर सदेव उन्ीं 
पर बैठता है, न कि ख॒न्दर पिच्छ वाके मयूर पर वह कुमार [ कात्तिकेय ] आपको व्रह्मचर्थश्री 
ग्रदान करे ।> 

तृतीय का उदाहरण- 

हे राजेन्द्र! षर छोडकर भागे युजैरदेदाधिपति की धवराई हृदं वधुओं के कोँपते इण 
तथा तहसं नहस उन्नत पयोधरो पर श्रूल्ती विमल हारलताओं से ट्पकते मोतियों के वहने 
आपके रावुओं के साथ शयूल्य मरुस्थल मेँ भाग रहे आपके यँ से उुन्दकखी सी स्थूल, पसीने की 
वृदे टपक रही थी । 


इसी पय मं श्ुल्य'-राब्द के स्थान पर॒ मन्ये-रब्द प्रयोग दो तो .सापहव उत्परे्षा- 
होतौ हे सा तय किया जवेगा, चिन्तु यद भी वतलाया जावेगा कि भटे ही मन्येः-राब्द का 
मरयोग हो किन्तु यदि मैतो चन्द्र को मानता ह --इत्यादि | पूर्वाक्त क्रम से] वाक्य बदल 
जावे तो उश्क्षा नदीं होती । इस [ वृतीय भेद ] मँ मौ दो भेद हो सकते दहै यदि अपहव मौर 
आरोप का पूवेपश्चाद्माव (अगि पीछे रखने) का जो प्रयोग होता 2 उत उल्ट द्विया जाए । 
विन्त श्न भेद भे हरे वतलाए मेदो के समान कोई चमत्कार नहीं रहता अतः इन्दे मेदरूप 
से नदीं गिना । उदाहरणा इन [ दोनों मेदा ] में से अपहवपूैक आरोप का उदाहरण अभी 
यहा दिया गया [ उद््रान्तो० ] प्च । आरोपपूर्वंक अपहव का उदाहरण यद प्य हो 
सकता है-- 

[ काटी इच्च होने पर भी] ध्वोँदनीषूपी भ्तमी पोत सफेद क्क बनी तारकरूपी 
अस्थियो छि हृए [ तथा ] अन्तित शने फी आदत मेंडबी, यह रात्रि रूपी कापाखिकी चन्द्र 
विम्बरूपी सुद्राकपा मे सिद्धाज्जन का ओंजन छान्छन के बहाने धारण कर एक द्वीप से दूसरे 
दीप फिरा करती है ।' 

कीं कहीं असत्यत्व वपुः श्रायैर' आदि शाब्द के आधार पर प्रतिपादित किया जाता दै, 
जो वस्त्वन्तर के वाचक दते हैँ । यथा-- | 

शिवजी ने कामदेव कै शरीर मँ आग लगाई तो निशित दही वह [ श्रगाक्षी ] के इस विशा 
जधन माग [ तरर |-रूपी छावण्यामृत सरोवर मेँ आ दूदा है। नाभिकुदर म उसी के अंग 
रूपी अंगारा के वुञ्चाने की सूचना देने वारी यद ध्रूमरिखा दै जो रोमावली के आकार में 
म परिणत होती जा रही है । . ॥4 


अपहवत्यलङ्कारः १७९१ 
विमरिनी 


विषयस्येत्यादि । वस्त्वन्तरेति । आन्तिमतोऽनुवतंत इति दोषः । अत एव केचन मण्डूक- 
ष्ट्तिन्यायेनाुवतंनस्यानुचितत्वाद्‌ ्रान्तिमिद्‌नन्तरम पहतिर्भन्थक्ृता ऊच्िता उल्रेखश्चा- 
तिशयोक्त्यनन्तरमिति मन्थं विपर्यांसितवन्तः । न चेतत्‌ । यत उल्रेखस्तावदतिङ्योक्त्य- 

नन्तरं अन्थङ्कता न रुक्तितः। यद्च्यति--एवमभ्यवसायाश्रयेणाटकारद्वयसरक्त्वा गस्य- 
मानोपम्याश्रया अलंकारा इदानीसुच्यन्ते । तत्रापि पदार्थवाक्यार्थगतस्वेन तेषां द्वे विध्ये- 
ऽपि पदाथंगतमचंकारद्यं करमेणोच्यतेः इति । तस्माद्वस्त्वन्तरभ्रतीतेभां वाद्‌ ्रान्तिमद्‌- 
नन्तरमेवास्य म्रन्थक्रता रक्तण छतम्‌ । अत एव चोररेखेऽपि तस्संभवाटस्स्वन्तरप्रतीते- 
निरन्तरमेवानुवतंनादिहे वास्या रुच्वणसयुचितमिति यथास्थित एव मन्थः साधुः 1 यदेवं 
तद्यररूखापहत्योरिहैव विपर्ययेण किं न रक्षणं कृतमिस्याशङ्कयाह-प्रक्रान्तेत्यादि । इद्‌- 
मिध्य पहुतिरुषणम्‌ । तदेव भ्याचष्टे--आरोपेत्यादिना । विषयस्या पहवे विषयिणोऽन्यस्य 
विधिरिव्यथः। तेन | 
न विषं विषमिव्याहुर्बद्यस्वं विषसुच्यते । 
विषमेकाकिनं हन्ति बह्यस्वं तु संततिम्‌ ॥* 

इत्यत्र विषस्य निषेधपूवं ब्रह्यस्वविषय आरोप्यमाणत्वाद्‌ दडारोपं रूपक- 
मेव नापहुतिः। अपहुतं निषेध्य विषयसित्तितयेवान्यस्य विषयिणो विधानं रद्णम्‌ । 
अत्र तु निषेध्यस्येव विषस्य ब्रह्मस्वविषये आरोप्यमाणस्वाद्धिधानम्‌ । अथ “अचर सख्यस्य 
विषस्य निषेधे ञारोप्यमाणस्वात्‌ ह्यस्व विषस्य गौणस्य विधानम्‌-[ अरुंकाररत्नाकरे 
प०४२ | इति चेत्‌ , तत्र ब्रह्यस्वविषस्य गौणस्य विधानमिति भणिते; कोऽथः । किं बह्य- 
स्वविषस्य विधान, कि वा दरन्द्रपदा्थंवद्‌ बद्यश्वस्य च विषस्य च, बह्यस्वे वा विषस्येति । 
तन्न नायः पत्तः । विषादिन्यायेन ब्रह्मस्वविषादमनः कस्यचिद्वस्तुनो बहिरसंभवात्‌ 1 तत्ना- 
प्यस्य ब्रह्मस्वं विषं चेति न मेदेनोक्तिः श्यात्‌ । नापि गोणता स्वार्थं एव प्रवत्तेः । अन्य- 
दन्यन्न वतमानं गौणमित्युच्यते । न चात्र बह्मस्वविषमन्यच्न कुत्रचिद्भत॑ते येनास्य गोगता 
स्यात्‌। एवं द्वितीयेऽपि पन्ते न गौणत्वं युक्तम्‌ । नाप्यत्र भय विधिः । ब्रह्मस्व विषये वि षस्येव 
विधीय मानव्वात । तृतीयेऽपि न गौणस्य सतो विषस्य विधानम्‌ । बह्यस्वच्रच्यभावान्मु- 
ख्याथवाधाद्‌ गुणेषु वतनात्‌ विहितस्य तस्य गौणस्वात ! एवं बरद्यस्वस्य दाढर्थेन विषखा- 
ग्य प्रती तिप्रतिपिपादयिषया तच्र निषेधपूवं विषमारोपितमिति चडारो पमेव रूपकं युक्तम्‌ । न 
ब्रह्मस्वं विषमिदमिति पुनरुच्यमानेऽपह तिः स्यात्‌। तस्माद्‌ “सख्यस्य वे'व्यपास्य विषयस्या- 
पह्ववेऽन्यवि धिर पडुतिरिव्येव क्षणं कायंम्‌। 

'वरत्वन्तर ` - इसकी अनुवृत्ति होती है अर्थात्‌ आन्तिमान्‌ अलंकार से। इस प्रकार यदं 
जो अनुदृत्ति है वह बीच के उल्लेखको छोड़कर हुं है त्रेसेद्यी जसे मेदक की कूद होती है । 
ङछ टीकाकार एसी अनुदृत्ति को अनुचित मान टीका करते है किं अपहुति को अन्धकार ने ्ा- 
न्तिमान्‌ के वाद्‌ ओर उद्लेख को जतिदायोक्ति के वाद्‌ बतलाया है । भौर णा मान उन्होने न्थ 
मे उक्ट फेर कर दिया हे । विन्तु यह ठीक नहीं है क्योकि ऽव्लेख को अन्कार ने अतिदोयोक्ति 
के पश्चात्‌ नहं बतराया हे । यह तथ्य उनकी अतिशयोक्ति के इस उपसंहार वाक्य से स्पष्ट है- 
--एवमध्यवसायाश्रयेण --क्रमेणोच्यते- । शसक [ उस्लेख म मौ ] वस्त्वन्तरभ्रतीति कै रहने 
से यदी मानना ठीक है कि मन्थकार ने इसका लक्षणा आन्तिमान्‌ के ही बाद कियाद) इस 
प्रकार उल्केख मं वस्त्वन्तरप्रतीति का सद्भाव सिद्ध हयो जाने पर अनुवत्त॑न मे कोहं व्यवधान नदीं 


१७२ अलद्ारखवंस्वम्‌ 


आता, अतः इसका लक्षण यदो ठीक है ओर इसलिए यन्थ जिस स्थिति में वहाँ है उसी स्थिति में 
उसका रहा माना टीकदहे। (शका) यदि टेसा हं तो याँ मी अपहुत्तिको दही उच्टेख के वाद 
निरूपित क्या पिया, क्यो नदीं [ इसके विपरीत ] उल्छेख को अपहृति के वाद निरूपित किया 
गया-इस पर [ उत्तर देते हए ] कहते दै--श्रक्रा-त० इत्यादि । इद्म्‌ = अर्थात्‌ अपहति का 
क्षण । उसीकी व्याख्या करते दै-आरोप इत्यादि दारा। अथे यह्‌ कि विषय का अपव 
होने पर तद्धिन्न विषयी का विधान! - [ वह अपदहुति का निष्कृष्ट लक्षण हृञा ] । इसकिए-- 
विष को विष नदहींकहा जाता, विष कदा जाता दहै ब्राह्मणधन को। विष कैव अकले एकं 
व्यक्तिको मारता हे किन्तु ब्राह्मणधन व्यक्ति ओर उसकी सन्तान कौ भी । | 
वरदां दृढारोप रूपक ही ह क्योंकि याँ ब्रह्मस्व-[ ब्ाह्मणधन ] पर विषका निपेधपूवंक 
आरोप कियाजा रहा है; अपदहूत्ति नदीं [ जैसा किं अलंकाररत्नाकर ने माना टे ]|। अपह्ति 
वहा होती हं जहां विधान विषयी का होता है ओर वह मी उसी विषय प्र जिसका निपेध किया 
गया हो । यहां जिस विष का निषेध कियाजा रहा है उसीका ब्राह्मणधन पर आरोप किया 
गया हैँ अतः उसीका विधान है [ अर्थात्‌ विष ही निषेध्य विषय दहै ओर विषदी ब्राह्यणधन पर 
आरोपित होने वाला विषयी ]। यदि [ अप = अलंकाररत्नाकरकार रोभाकर ] यह कटं कि- 
वहा निषेष विषशब्द के सुख्य भथ का क्या जा रहा दै जौर विधान उसके गौण अर्थं बाह्मणविष 
का कयाकिं आरोप उसका किया जा रहा है तो [ वतलाद कि आपके] “विषदाब्द्‌ के गौण 
अथं ब्ह्मस्वविष का विधान क्या जा रहा हैः । इस कथन का क्या अर्थ है-- यँ श्रह्मस्वविषः 
इस राब्द्‌ का अथं (१) ब्रह्मस्वरूप विषका विधानः यह है या (-) ब्रह्मस्व का ओर विष का विधान 
जसाकि इन्र समास होने पर होता दै अथवा (३) ब्रह्मस्व पर विष का। इन तीनों मै प्रथम 
प्च अमान्य हे क्योकि विषादि (९) न्याय से ब्रह्मस्वविषरूप किसी वस्तु की [ कल्पना से ] प्रथक्‌ 
उपर्न्धि संमव नहीं । यदि एेसरा दोता मौ व्रह्मस्व विष है" इस प्रकार [ ब्रह्मस्व को विष से ] भिन्न 
करके नहीं कदा जा सकता \ यहा गौणता मी नदीं है, क्योकि ब्रह्मस्वद्ब्द ओर विषदाव्द यद्ध 
अपने भथम अथैके ही वाचक वन रहे द। गौणतो अन्य अर्थं मै प्रयुक्त अन्याथ॑वाचक को 
कृते हें। 
ब्रहमस्व-विष शब्द किसी मी अन्य अथं मे प्रयुक्त नीं है जिसतते उते गौण माना जावे। इस 
भकार्‌ द्वितीय पक्ष मे भी गौणता संभव नहीं है ] यदं [ ब्रह्मस्व = बाह्मण ओर] दोना काही 
विधान हो ठेस्ता भौ नदी, क्योकि ब्रह्मस्व को विषय बनाकर विष का ही यहां विधान किया 
जारहाहं। वतीय पक्षमेंमी यदिविष गौणहै तो उसका विधान संमव नदीं है [ बद्यस्व 
भं विषडब्द की ] वृत्ति [ अभिधा ] नक्ष है, अतः [ वर्ध विषद्ब्द का ] मुख्य अर्थं बाधित दहो 
जाता हे फलतः वह [ पातकलत्व, मारकत्व आदि ] यणं का प्रतिपादक बवन जातादहै। ओर 
श्सलिट उसका अथं विधेय होने पर भी गौण होता है । इस प्रकार ब्रह्मस्व को टृढतापूवेक विष के 
समान प्रतिपादित करने की इच्छा से उस [ विष ] पर निषेधधूवंक विषका ही आरोप किया गया 
दै, इसकिए इते दृढारोप रूपक ही मानना उचित दै । अपह्वति तब दती जव यहु कहा जाता कि 
य ब्रह्मस्व नदी, विष है । शस कारण श्ुख्यस्य वाः = अथवा सुख्य अर्थं का य॒ अदा हटाकर 
केव "विषयस्य = विषय करा अपढव होने पर अर्थं का विधान अपडतिः-वेवल इतना ही लक्षण 
बनाया जाना चाहिए [ न कि अरंकाररत्नाकर के समान--"विषयस्य युख्यस्य वा अपहवे अन्य॒- 
विधिरपहृतिः'-- इतना ] । ४ 
विम :-(१) पण्डितराज जगन्नाथ ने इस विषय मेँ विमर्दिनीकार का अनुमोदन किया 


ड ओर्‌ उन मतको प्रमाणर्ूप से प्रस्तुत करते हए यद इटारोपरूपक दी स्वीकारः किया द । 


अ # 1 रि ति , ,  ,, , वायन 


अपह्त्यच्ड्कारः ९७ 


(२) मू मे श्रक्रान्तापहववेधरम्येण' -के स्थान पर॒ निणैयक्ागसयसंस्करण के पाठान्तर में 
'विषयानपहववे० यह पाठान्तर दिया है। श्रीविचाचक्रवर्ती ने इसीको मूल पाठ माना हे। 
तदनुसार डं रामचन्द्र द्विवेदी ने भी यही स्वीकार किया है । विमर्दिनी मे इसपर कोई विवेचन 
नदीं हे । दमे श्रक्रान्तापह्वव०ः भी ठीक जंचतादे। वैषम्यं प्रकृत अलुकार मे दिखाया जाना 
उचित दे । अपहुति मेँ अपहव से ही रूपक, उच्केख ओर आन्तिमदलंकार का वधस्य आता है । 
अन्य अलंकारं मे अनपहव रहता है, इसक्िए उनमें अपहुति का अथवा अपहुति मै उनका वैधं 
रदता है णसा कटना तव संभव दै जव अपहव का ज्ञान हो जावे; अतः जव अपहव का आश्रयः 
जवद्यक हो ह तव उसी के आधार पर सीधे-सीधे वेधम्यं का प्रतिपादन कहीं अधिक अच्छा है 

(२) “इदयुच्यते--का तात्पयं टीकाकारो ने अलग-अलग वतलाया है । मंजीविनीकार “इदम्‌” 
की क्रियाविेषण मानकर “उच्यतेः से अन्वित करते हे ओर विमरदिनीकार उसे "लक्षणः के जिए 
प्रयुक्तं मानते हं । संजीविनीकार इस पंक्ति का अभिप्राय अपहुतिका आन्तिमान्‌ से पाक्य 
बतलाना मानते हँ ओर विमदििनीकार उच्लेख तथा अपहुति मेँ अपहति का प्रतिपादन उर्छेख के 
 पदिरेन कर वादे करने का कारण प्रत्तिपादन करना । ब्त॒तः संजीविनीकार का यी पश्च 
अभिक सारपूणं हे । उल्टेख ओर जपहुत्ति के पौवापयंमात्र कौ अपेक्षा अन्य अलंकारो से अपहृति का 
स्वतन्त्र अस्तित्व बतलाना अभिक महत्व रखता है । 

( ४) अरूकाररत्नाकरकार ने अपहृति का विवेचन इस प्रकार किया ह-- 

[ सू° | "विषयस्य सुख्यस्य वाऽपहवे अन्यविधिरपहत्तिः 

[ कृ° | “आरोपविषयस्य निषेधे विषयिणो विधानसेका, मुख्यस्य चन्द्रादेरन्यस्य सुखचन्द्रादे- 
गणस्य विधिरपरापहूत्तिः । 


-[ सृ | विषयकरा अथवा सुर्य का अपहव हो ओर अन्य का विधान हो वहां अपति 
होती ह । अथात्‌ 

[ बृ० |- आरोप विषय का निषेध हो ओर विषयौ का पिधान यह एक प्रकार की 
अपहुति होती दै । इसके; अतिरिक्त ुख्य [ अभिवेयाथं ] चन्द्र आदि से भिन्न गोण सुख-- 
चन्द्र॒ जादि का विधानः दूसरी अपहृति । इनमे से प्रथम का उदाहरण तो कान्यपरकाद्च आदि में 
सिद्ध अवाप्तः प्रागरभ्यं॑परिणत० इत्यादि पथ माना है किन्तु दितीय का (न वषं विषम्‌'० 
इत्यादि पथ दी । इसी पर उनकी पंक्ति है- अत्र मुख्यस्य विषस्य निपेषे बह्मस्व-विषस्य 
विधानम्‌” जिसे विमरिनीकार ने उद्धत किया है । यहां परिसंख्या सी प्रतीत होती है । वस्तुतः 
दस पद्य मं इढारोपः जपहवः, परिसंख्या तथा व्यतिरेक का सन्निपात है । 

(५) नि सा संस्करण मे-- अपहुतं निषेध्य ० के स्थान पर ननापदृतेिं निषेष्य०* इसः 
इस प्रकार उल्टा पाठ छपा है। इसी प्रकार भुख्यस्य वेत्य ०? के स्थान पर सुख्यस्थेवेत्य० । 


विमरिनी 

तस्येत्य पदुस्याख्यस्यारंकारस्य । वाक्यभेद इति एकवाक्यमिति चानेन यथासंमवं 
भेदन्रयस्य स्वरूपनिदेशः कृतः । न निरवयमिति । यथोक्तक्रसनिर्वाहाभावात्‌ । 
अत .एवोदाहरणान्तरमाह -पू्ेन्दोरित्यादि । मन्येशब्दस्य प्रयोग इति संभावना- 
योतक्वात्‌ । नोप्परक्षेति । साभ्यवसायाधतप्रेचासामग्रयभावात्‌ । वचयत इति । 
उसप्ररायाम्‌ । तथा चास्या इवादिशब्दव -मन्थेशजञ्दोऽपि प्रतिपादकः । कितूर्परेखा- 
सामभ्रूयमावे मन्येशब्दग्रयोगो वितमेव प्रतिपादयतीति । अतश्चाज अवाप्तः प्राग. 
रभ्य ~ ईप्यादावपहूरुदाहरणत्वमभिदधतः समानेऽपि न्याये नो मां प्रति तथाः 


१७७ अलङ्कारसवंस्वम्‌ 


इत्यनेन शश्चकपन्तस्य निराक्ृतस्वादन्यस्यान्यरूपतया संभावनाया अभावान्‌ मन्य" 
इस्यनेन किंणपक्तस्यैव निश्चितस्वादतिश्ञयोक्तितवमेवेति मन्यन्ते ( अरुंकाररत्नाकर- 
कारादयः )। तेषां पूर्वापरविचारङ्लशलानां किमसिद्ध्मः 1 एवमन्येर तान्यत्र चोदा . 
हरणादौ बहुप्रकारं स्वछितं तत्‌ षुनम्रन्थविस्तरभयाद्‌ , अस्मद्‌ द्‌ शं नद्‌ त्तद षणोद्धरणस्येव 
प्रतिज्ञातत्वात्‌, अस्माभिः प्रातिपश्रेन ने दूषितम्‌ । 


तस्य = उसच्छा = अपहुति-अल्कार का वाक्यमेद्‌ तथा एकवाक्य एेसा कहकर तीनों मेदां 
का स्वरूप यथासंभव बतलाया गया । “न निरवद्यम्‌” = निदाँष नदीं दहै इसलिए कि यथोक्त 
क्रम॒का निवोह नहीं हआ [ निषेधविषय पर॒ आरोपविषयमात्र का आरोप न कर उससे युक्त 
पदाथेका आरोपकरने से एेसा इआ ] इसीलि५ एक अन्य उदाहरण दिया - पृण॑न्दोः" । 
'मन्ये"-शब्दुस्य प्रयोगे" = मन्येराब्द का प्रयोग होने परः क्योकि [ 'मन्येश्ाब्द ] संभावना 
का चोतक होता है। नोत्प्क्षा = उत्प्रेक्षा नदीं दोती क्योकि 'साध्यवसायत्व' आदिः उत्पेक्षा- 
सामग्री का अभाव रहता है। "वच्यते" = कहा जा रहाः अर्थात्‌ उत्परक्षाके प्रकरणे । अर्थं 
यह्‌ हआ किं इव आदि चाब्दं के समान उस [ अपहति ] का वाचक भमन्ये'-राब्द भी--दहोता 
दे । किन्तु यदि उत्प्रक्षासामथी का अमाव हो तो भन्ये-दाव्द काही प्रतिपादकदहोता है। 
इसकिए “अवाप्तः प्रागल्भ्यम्‌"-इत्यादि पर्चो को जो [ अलंकारत्नाकरकार आदि] समीक्षक 
अपहृति का उदाहरण वतलाते है" वे ही थयदेतचन्द्रा"० पद्य मे स्थिति समान रहने पर मी अति. 
रायोक्ति मानते हं ओर कहते हें कि यदां नो मां प्रति तथाः = शुन्चे ेसा नदीं ल्गता?-यह्‌ कहकर 
"शकः का निराकरण कर दिया गया है ओर अन्यपदार्थ की अन्यपदा्थके ल्प से संभावना न 
होने के क।रण “मन्ये = मानता दहः - ेसा ककर किण-पक्ष को हयी निश्चित किया गया है । [ द्र० 
अलकार सव॑स्व | उग्ेक्षा प्रकरण का अन्त ये समीक्षक सचसुच पूर्वापरं विचार मँ वहत कुचल 
हे ( व्यग्योक्ति, ) इनसे दम क्या कटं १ , 
इसी प्रकार अन्य समीक्षकानि मौ यां ओर अन्य अलङ्कारो मेँ मी अनेक प्रकार की गलतियां 
की दें मिनत हम एक-एक करके उन सव में दोष नहीं दिखला रहे हें क्योकि ह्म मन्ध विस्तार 
का भय दह ओर हमने केवल उन्दी पँ पर विवार करने की प्रतिज्ञा कीहेजो हमारे दर्खन 
[ अल्कारसवंस्व ] मेँ भा है| | 
विमश्चः--अलंकाररत्नाकरकार ने शदेतचनद्रान्तगंतः० इस प्रच मे अतिरायोक्ति मानते हट जो 
विवेचन दिया है उसको विमरिनीकार ने-नो मां प्रति तथा इत्यनेन -निध्ितत्वादत्तिदायो- 


्तित्वमेवः-इन र्दा यँ जैसा का तैसा उतार दिया है। निर्णयसागरीय संस्करण मे 'मतिदयो- ` 


क्तित्वमेवेति”-के स्थान पर अतिङ्ञयोक्तिरेवः मूल मै छापा गया दै जौर पाठान्तर मे .अत्तिरा- 
योक्तिम्‌ इस द्वितीयान्त पद का निदं कर दिया गया है । वस्तुतः वह 'अतिरायोक्तित्वम्‌ः का 
ही अशुद्ध लेख दै, क्योकि द्वितीयान्त पद मानने परया तो भगे प्रयुक्त इत्ति" हृटनी पड़ती 
दे क्योकि उसके योग मेँ कर्मं में प्रथमा विभक्ति ही दोती है या अति्चयोक्तिम्‌' की द्वितीया को 
मधमा बनाना पड़ता है, ओर निणंयासागरीय संस्करण के , संपादक उसे वैसा बना दिया लँ- 
अल्काररलाकर्‌ जिसके सामने न हो वह प्रत्येक विद्रान्‌ एेसा ही कर सकता है । 
अवाप्तः प्रारभ्य परिणतर्चः दौलतनये कलङ्को नैवायं विुसत्ति शशांकस्य वपुषि । 
अमुष्येयं मन्ये विगल्दृतस्यन्दरिदिरे रतिश्रान्ता शेते रजनिरमणी गाढसुरसि ॥ 
दे पावति ! परिपक कान्तिवाठे [ इस पूणं ] चन्द्र के शरीर मे यह कलंक नदीं है । 


ञ्चे ख्गता हे कि इसके अग्रतस्रावी अतएव रिरिर वक्ष पर इसकी रतिश्रान्त प्रिया राच्नि गरी 


र नि म षि कः , 


अ उह्ुत्यालङ्कारः १९७५५ 


नीद में सोई इदं हैः ।--इस स्थर मेँ रत्नाकरकार ने अपहुति स्वीकार की है! विमदििनीकार 
का कथन दहे कि इस स्थर मे मी अभिव्यक्ति वह है जो यदेतचन्द्रा०ः स्थल मे है। अर्थात्‌ दोनों 
स्थलं मे कलंक का निषेध किया गया है ओर उस पर तद्धि्न [ रात्रि तथा व्रणकिण ] को 'मन्येः 
राब्द के प्रयोग के साथ प्रतिपादित किया गया है। रत्नाकरकार के अनुसार '्यदेतचन्द्रान्त्म॑तः 
प्य मे संमावना का सवथा निराकरण कर दिया गयादहै शनो मां प्रति तथाः-कहकर । [ उनके 
अनुसार अपहृति मे सौ संभावना कौ पीठिका आवद्यक होती है ] उनके इस कथन का अथं 
केवर इतना ही रूगाया जा सक्ता हे कि जहाँ संभावना का आत्यन्तिक निरास हो वदँ उस्मेक्षा 
तो दोती दी नदीं हे अपहृति मी नहीं शती । 'यदेतच्न्द्रान्तम॑त० पच मे विमर्दिनीकार के 
अनुसार यदि अवाप्तः प्रागल्भ्यम्‌" जसौ ही स्थिति हो तो वहां भी जपहति ही माननी होगी । 
वस्तुतः संभावना कौ आवदयकता अपहति में रहती नदीं हे । यहां निषेध दारा संभावना क 
बाधसे ही चमत्कार होता दहे। निषेध भी संभावना का नही अपितु संभावना के विषय [ सुख 
आदि ] रहता है । 


विमरिनी 


एतस्मिन्निति रादि शब्दप्रतिपा्ये । संभवसमान्रे पुनदंशेयितुमेतदु दाहृतस्‌ । वस्त्वन्तर 
रूपतासभिधायीति । वपुःशब्दस्य शरीरार्थांसिधायिष्वात्‌ । अच्र पुनस्पमानस्योपमेयरूपता- 
परिणतौ परिणाम इति परिणामारुंकारस्वं यदन्येरक्तं तद युक्तम्‌ । तच्वे हि धूमशिखान्य- 
शमावे तत्परिणतिरूपरोमावरीप्राधान्यं स्यात्‌ । इह पुनः शवष्ट्युष्टमद्‌ ननिपतनाचु 
मापकस्वेन रोमावस्यपहवे धूमशिखाया एवं प्राधान्यं विवङितमिति न परिणामः नापि 
रूपकम्‌ । व्याजाथपयंवसायिवपुःशब्द बखाद्‌ारोपविषयापह्‌ तावारोप्यमाणस्य प्रतीतेः । 
आरोपविषथा नपहूवे हि रूपकमिति पूवमेवोक्तस्‌ । अथानत्रापि सिन्नयोः सामानाधिरूरण्या- 
योगादेकतरस्य निषेधग्राक्तावारोप्यमाणस्य च निषेधानुपपत्तेशरोपविषयस्यव पयंवसाने 
निषेधः प्रतीयत इति चेत्‌, नेतत्‌ । अत्र हि अयदौ चन्द्र देषैर्यभावाद्‌ बाधितः संश्वन्द्राथः 
स्वाटमखह चारिणो गुणां ्नत्तयति न तु सुखादेर्धिंषयस्य निषेधः प्रतीयते। अुखशब्दादे 
स्वाथ एव प्रत्रत्तेः। पर्यवखाने छयन्न मुखादि चन्द्रादिगुणविशिष्टं प्रतीयते। न तु सुखादे- 
वाधः । न सुखमिस्ये वमादेः प्रस्यवम शांभावात्‌। नापि निदृश्येना । संबन्धदिघटनाद्यभावात्‌ । 


एतरिमन्‌ < इसमे अर्थात्‌ छलादिशब्द से प्रतिपा [ अपहव निदेश ] में। यह जं 
[ यदेतच्न्द्र०° ] उदाहरण दिया है वह केवल संभवमात्र दिखलाने के किए। "वस्व्वन्तररूप- 
ताभिधायी = 'अन्यवस्तुस्वरूप होने का अभिधायक = इसङ्एि कि वयपुभ्चन्द शरीराथ का 
अभिधायक दै ।: [ अपहति प्र्षगमे अल्काररत्नाकरकार ने “असुष्मिंल्छावण्यारृत०ः पव में 
अपहव नहीं माना है। उन्होने यद्य परिणाम रूपक या निदशेना स्वीकार करने का संकेत 
दिया है। इस पर विमरिनीकार आपत्ति देते ए क्िखिते है-] इस [ अमुभ्मिखवण्यामृत° 
प्य ] में उपमान के उपेयलूपं से परिणत होने के कारण अन्य ऊुछ सस्ननों ने परिणाम माना 
है । वह युक्तियुक्त नहीं है । योषि य॒दि वैसा द्योता [ परिणाम होता ] तो धूमरिखा अप्रधान 
हो जाती ओर तत्परिणति रूप रोमावली ही प्रधान, रहती । किन्त यहो रोमावरो शिवदग्ष 
कामदेव के डूवने का मनुमापक वतङाईं गह है । यह तभी संभव है जव रोमावरी रूप से उसका 
अपहव हो ओर उसमे भूमरिखात्व स्वीकार किया जाय । इस प्रकार यहो भूमदिखा ही प्रधान 
है अतः यहाँ परिणाम नहीं है । | 


१७द अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


यँ रूपक भी नदीं दै । यहाँ वपुः्ब्द व्याज-( बहाना ) रूपी अथं का प्रतिपादक हे । उसके 
आधार पर आरोप विषय [ रोमावली ] का अपहव [ निषेध ] हो जाता है ओर उसपर आरो 
प्यमाण [ धूमदिखा ] की प्रतीति होती दहं । जवकि रूपक आ रोपविषय का अपह्व न होने पर 
ही होता है जैसा कि पिरे वतलाया जा चुका हं। [ अल्काररत्नाकरकार ने रूपक के विषय 
तै जो यद कहा दै कि ]- थयो [ रूपक मे] मी भिन्न भिन्न दो वस्तुओं का रेक्य प्रतिपादित 
तो रहता है परन्तु वास्तविकरूप से वह वनता नदीं दे अतः यहाँ भी किसी एक का निषेध 
आवद्यक होता है ओर क्योकि आरोप्यमाण पदाथ [ विधेय होता है अतः उस ] का निषेध संभव 
नदीं होता फलतः वह आरो पविषय-विषयक ही अन्त मं ठहरता है-[ द्रष्टव्य अ. र. अपरहुति 
प्रकरण प° ४१ ]-यद भी एेसा नदीं दे । य्दा [ सुख चन्द्र ह--इत्यादि रूपक मं | चन्द्र आदि 
द्ब्दां की वृत्ति [ अभिधा ] मुख आदि पदार्थ मे नदीं रहती अतः “चन्द्रः आदि अथे वाभित दहो 
जाते है । बाधित होकर वे अपने साथ के अन्य युणां को लक्षित [ लक्षण द्वारा प्रतिपादित ] करते 
है। वौ मुखादि विषयों का निषेध प्रतीत नदीं होता वेर्योकि वदाँ के [ विषय वाचक ] सुख 
आदि चान्द अपने सुख्य अर्थौ का दी बोध कराते दें । अन्त में वाक्याथ बोध के समय प्रतीति 
होती दै कि-“मुख आदि चन्द्रादि के गुणां से युक ह" । इसमं मुखादि [ भी प्रतीत होते रहते 
हे, उन ] का वाध प्रतीत नीं होता । क्योकि ेसी कोई प्रतीति उस्र समय नहीं होती कि--थ्यह्‌ 
मुख नदीं हैः । 

यहाँ निददना भी नहीं है क्योकि संबन्ध के अभाव आदि यदं नहीं है । 

विमज्ञः-दस पूरे प्रसंग का आधार अलंकाररत्न।कर का निम्नछिखित विवेचन 


“अस्याः सगंविधो०? इत्यादो०० पुराणस्य प्रजापतेर००० निषेधपयैवसानादा्थै एवपह्ववः 1 न 
तु “असष्मिन्‌ कवण्यागरतसरस्ि०? इत्यादो वपुःशब्दसुखेन निपेधप्रतीतेः आर्थोऽपहव इति वाच्यम्‌ 
वपुरादिखब्दतुल्याथ-मयादि ( खब्द ) प्रयोगे "तस्मे सोमिचरिमेत्रीमयसुपहतवानातरं नाविकाय-- 
इत्यादावपहवप्राप्तो परिणामादावप्यपहतिप्रसङ्गात । तेनात्र रूपकं निदशेंना वा । रूपव च सिन्न- 
रूपतया प्रसिद्धयोः सामानाधिकरण्यायोगे एकतरस्य निषेधप्राप्तो अर्थात्‌ आरोपविषयस्य पार्यव- 
सानिकः प्रतीयमानो निषेधोऽभ्युपगन्तव्यः। आरोप्यमाणस्य निषेधे आरोपवेयर्य॑प्रसन्ञात्‌ । तत्‌ 
परतीयमाननिषैधनिमित्त एवमाद्‌ावपहवश्रमः । न च निषेधस्य शाब्दस्वाथत्वक्ृत णएवापह तिरूपक- 
यो्भेदः, अपि त्वस्यां निषेधगभ॑त्वादध्यवसायतुल्यत्वम्‌ 1 [ अलं० रत्ना० अपहुत्ति पृ० ४१ | 
अर्थात्‌- अस्याः सरगविधो०? इत्यादि स्थलों मेँ पुराण प्रजापति निषेध मेँ पर्यवत्तित होता है । 
अतः वहाँ अपहव आथ है । किन्तु अमुष्मिन्‌ ला०' मे अपहव आथ नदीं है क्योकि यों 'वपुभशब्द? 
केद्वारा निषेध काज्ञान करा दिया जाता है [ अत्तः यहां निषेध शाब्द हो जाता है ]। यदि 
यहाँ मी आथ जपहव मान चछिया गया तो “तस्मे सौमिन्निमेत्रीमयसुपहतवानातर नाविकायः = 
उस नाविक को लक्ष्मणैत्रीरूप उतराई दी- इत्यादि स्थलों मेँ भी अपहव माना जाने ख्गेगां 
वर्यो यहाँ सी वपुष्दाब्द का समानाथैक (मय--शब्द प्रयुक्त,दे ओर तव परिणामारंकार कै 
सभी स्थलों मे अपह्‌ ति अलंकार मानने की वात उठ खड़ी होगी । इसकिए यहो [ असुष्मिन्‌° 
प्य में | रूपक यां निदर्दना माननी चाहिए । रूपक जो है वह मी आरोप विषय कां पाय॑वसानिक 
निषेध ही है क्योकि उस्म जो भिन्न भिन्न दो पदार्थौ का सामानाधिकरण्य] अभेदात्मक | निदे 
रहता है वह वस्तुतः वनता नहीं । फलतः [ आरोपविषय मौर आरोप्यमाण दोनौ में से] 
किसी एव का निषेध होता द्वी है। यह निषेध यदि आसरोप्यमाणकादहोतोआंरोप दही व्यथे दहो 
जाए । इस प्रकार प्रतीयमान निषेध कौ केकर ही यर्दा [ असुभ्मिछा० में ] अपह्नव का श्रम दौ 


~ 
। 


[| 


अपह्कत्यलकारः १७ 


गया है । एेसा नदीं ह किं अपहुत्ति ओर रूपक में निषेष के शान्दत्व ओर आर्थत्वमात्र का अन्तर 
हो । यहाँ अपहति मं निषेध गमित रहने से आरोप अध्यवसायतुल्य हो जाता है । 

विमरिनीकार ने रूपक मे आरोप विषय में निषेध प्रतीति स्वीकार नहीं की । उन्होने वँ 
आरोपविषय को सवधा अविकृत स्वीकार किया है। साथी आरोप्यमाण को ही बदलता 
हमा वतलाया । उन्होंने आरोप्यमाण चन्द्र आदि के राब्दां को लाक्षणिक माना जोर उन्हें समान- 
युणपयैवसायी बतलाया । यदा एक अत्यन्त सूक्ष्म तत्तव पर ध्यान देना आवदयक है । विमरिनीकार 
ने च्लि हे किं "चन्द्र॒ आदि आरोप्यमाण पदां बाधित होकर अपने साथ रहने वाङ युणों को 
लक्षित करते हें । यह !लक्षितिः-राब्द का अथं निश्चित ही लक्षणाद्ारा प्रतिपादित करना 
अभिप्रेत हे। फलतः यह अथ निकलता हे कि रक्षणा का जारम्म शब्द से नहीं अर्थं से होता है । 
यह तथ्य मम्मटाचायै को मी मान्य हे। उन्दने भी "लक्षणारोपिता क्रिया कहकर लक्षणा को | 
अथनिष्ठ ही स्वीकार कियादे। कुमारिलमद्ः सुकुलभद तथा परवत्ती मेयाकरणों कामी वही 
सिद्धान्त हे । किन्तु समुख्याथे के साथ रहने वाके गुणों मे लक्षणा मानना विचारणीय है। असा- 
धारण धमे मुखत्व ओर चन्द्रत्व को छोड़ने पर -- 

मुख चन्द्र 
सखुन्दरत्व ख॒न्दरत्व 

--इस प्रकार आरोपविषय ओर आरोप्यमागकेपक्षोमेजोदोदो षट्क है उनमें से आरो- 
प्यमाण चन्द्र को लक्षण का विषय नहीं माना जा सकता, उससे तो लक्षणा का आरम्भ होता है । 
रोष तीनमेंसे एक एकमे लक्षणा मानने प्र तीन दही पश्च प्रस्तुत होते हैं । मम्मट के अनुसार 
इन्दे इस प्रकार कहा जा सकता है-- | 

१= चन्द्र राब्द की लक्षणा अपने चन्द्रत्व के साथ रहने वाले सुन्दरत्व मे अथवा-- 

२ सुख के सुखत्व के साथ रहने वाठ सुन्दरत्व मे, अथवा-- 

२ = स॒न्दरत्वादिं साधारण धर्मौ के आधार पर स्वयं मुख में । यह्‌ तथ्य निम्न चित्र से स्पष्ट है- 


सुं तत 


गुन्दरत्व 


मुएत्व सहन्चारी न्द्रत्न स 


इनमे से प्रथम ओर दवितीय को अमान्य ओर तृतीय को सिद्धान्त रूपमे स्वीकार किया जातः है। 


निदशेना का अथे यहां पदाथेनिदशेना हो सकता है) उपतीमें दूसरे का धमं दूसरेमें 
स्थित बतलाया जाता है । उदाहरणा -रेवतक गिरि गजराज की श्लोभा धारण करता है"-यदह 


१२ अण०्स० 


‹ &७८ ` . अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


स्थल 1 इसमे गजराज की चोमा गजराजमें दही रह सकती है ओर पवेत की केवल पर्व॑त में। 
-कृकतः उक्त कृथन का अथं निकलता दै-गिरि गज की रोभा जेसी रोमा को धारण करता है 1 
-यहाँ पव॑तदोभा का गिरि के साथ संबन्ध संभव न होने पर साद्रश्ययोजना द्वारा उसे संमव 
बनाया जाता है। इसीलिए निदोना का क्षण है--“अमवन्‌ वस्तुत्तवन्ध उपमापरिकल्पकः? । 
प्रस्तुत “रोमावचिविपुः धूमदिखाः मे यद संभव नहीं कि ध्रूमरिखा रोमावखी का दारीर अपना) 
. वह तत्सदृद शरीर दी अपना सकती दे । अतः पदार्थनिदरना संमव हें । विमर्दिनीकार यहाँ 
: निदरौना का अधीद्मात्र स्वीकार करते हं। वे साद्रदय तोमान लेते दें किन्तु रोष अध! 
 (संबन्धीमावः स्वाकार नहीं करते । उन्ं 'असुर््मिावण्यासृत०ः मे एेस्ता अनुभव नदीं होता कि 
यहां प्के केरदरीर का दूसरे मं अस्तिव्व बतलाया जा रहा है । उनका पक्ष कुछ दूर तक रोक | 
मी है । "किसर अलंकार में किन किन तक्वो की प्रतीति संभव है- यह न सोचकर अलंकार निणय 
के किए सोचना यह चादिए किं उन तचो मे चमत्कार का जनक तत्व कौनसा दै । उसी के 
आधार पर अल्कारको नाम दिया जाना चाहिए! हमारी इष्टि से (अमुभ्मिछछावण्यासत०ः पद्य. 
मे अपहव ही चमत्कारकारी है । अतः यदौ अपहुति दी मानी जानी चाहिए । 


विमदिनी 


आदि श्ब्दाख्च तृतीययापि क्विद्‌ घ्त्यव्वं प्रतिपाद्यते । यथा - 
"मद्वाहोग्यं वहारयुञक्षठ रता कण्ठस्थे तावके 
मा कार्षीरितिसखाहस भियतमे दासस्तव प्राणिति । 
नीता ब्रृद्धिममी वयव कुसुमेबाष्पायमाणा दुमा 
गृह्णन्ति छुरिकामिवाल्पटक्व्याजेन पाज्ञच्दिदे ॥ 
अत्र कुसुमेरिति वृतीययापहव निबन्धनम्‌ ¦ आ॑रोपगभ॑स्वाच्चेयं सादश्याद्रा भवति 
 -सबन्धान्तराद्वा । सखादृश्येऽप्यस्याः साधारणधमस्य त्रयी गतिः । तत्रानुगामिता यथा-- 
तदणतमार्कोमरूमलीमसमेतद्य कलयति चन्द्रमाः किक कलङ्कमिति न वते । 
तद्चरतमेव निदयविषरुतुद दन्तपद्व्रणविवरोपदर्ितमिदं हि विभात्ति नथः ॥' 
अत्र तमाल्मटखीमससवमनुगामिव्वेनोपात्तम्‌ । शद्धसामान्यरूपत्वं यथा- 
अयं सुरेन्दोपवनाद्धरित्रीं स पारिजातो हरिणोपनीतः । 
न प्रापितोऽयं सुमनःप्रवहंः कश्मीरदैशेद्धवताभिमानम्‌ ॥ 
अनच्रःपनयनप्रापणयोः शद्‌ सामान्यरूपन्वम्‌ । विम्वप्रतिविम्ब भावो यथा- 
न उयात्स्नाभरण नभो न मिखितच्डूायापथो वाम्नुदो 
नो ताराप्रकरो न चेदमश्तञ्यो विन्तो मण्डलब्र्‌ । 
सीरडोभमयोऽप्यपांनिधिरसौ नेतच्राहिना मन्द्रः 
प्क्तोऽयं मणिपूर एष कलश्चायं सुधानि्चंरः ॥ 
अत्र उ्योर्स्नाभरणव्वस्य जीरत्तोभमयस्वं प्रतिबिम्बत्वेन निदिष्टम्‌ । संवन्धान्तराययथा-- 
“हेरोदञ्चन्मरख्य पव नाडम्बरेणाकुरासं 
्ङ्खाकेलि कमपि मजतां च॒तश्चाखारूतासु । 
वाचारूत्वं ननु यदभवत्‌ कानने कोकिकानां 
मौनिध्वं तत्पथिकहरिणीखोचनानां कवर्ग ॥' 
अच्र कोकिरुवाचारुत्वस्य कारणस्य निषेधे पथिकख)मोनित्वस्य कायस्य विधिः । 
, एवमारोपगर्भयं सप्रपञ्चं दर्दिता । अध्यवखायगर्भा पुनदंश्यंते यथा- 


4 


[- भ यक नकागकाकाापकापातपकााकाकाकाकाककन कहि = तन ण काका व य र क 
' , ५ 
11 


अपहुत्यलङ्ारः ९७९ 


“न रुचमीसौदर्याज्न च सुरशरण्यीङ़तसुरा- 
सुधादिञ्येष्ठव्वान्न सु टम णिस्वाद्धगवतः । 
यदेवं बाखेन्दोदिरि विदिशि वन्यव्वसुदितं 
स्फुटं स्वेततकान्तासुखकमरूदास्यादु पनतम्‌ ॥' 
अनर वन्यत्वस्य प्रभावादिहेतुकत्वे निगीय हेत्वन्तरमध्यवसितम्‌ । यथा वा- 
'करासिस्तृप्त्यथं सुर पितृणां पञ्चदद्यभिः 
सुधासूतिदंवः प्रतिदिनयुदेतीव्यसदिदम्‌ । 
परिश्राभ्यस्येष प्रतिफर्नमासाद् मवती. 
कपोलान्तयुंक्त्या सद्धरसुधासंग्रहपरः ॥' 
अत्रोदयादौ तत्तद्राश्युपभोगरु्चणं निमित्तं निगीयं तत्फलभूतं निसित्तान्तरमध्य- 
सितम्‌ । 
[ "वस्त्वन्तररूपताभिवायिवपुःशब्दादिनिवन्धनम्‌-' पद मे प्रयुक्त] आदि-रब्द से कीं 
तृतीया केद्वारा भी असत्यता का प्रतिपादन होता है। यथा-[ रतापा् से फांसी र्गाकर 
प्राणान्त का प्रयल कर रही नायिका से नायक कह रहा है-] 


हे प्रियतमे ! र्ता तुम्हारे कण्ठस्थल में वह कायं न करे जो मेरी भुजां करती हे, अतिसाहस 
न करो, यह व्दारा दास जीवित हे । पुष्पों से आंसू बहा रहेये ब्रक्ष भी भ्रमरावङी के बहाने 
तम्डारी फांस काटने देवद्री सीचिएहृएदहै। इन्दे तुम्हींने जो बढाया है।' 

यहां ङुखमः- पुष्पां सेः इस वतीया विभक्ति के दारा अपहव-[ निषेध ] का उपनिवन्धन 
किया गया हे । 

यह अल्कार आरोपगमित अल्कार है इसक्एि या तो यह सादृर्यमूल्क होता है या साटय्ये- 
तरसम्बन्धमूलक भी । सादृश्य मे मी इसमे [ पूवचचित ] तीनों प्रकार की स्थिति रहती है। 
तीनां मेसे[ साट्दय की ] अनुगाभिता का उदाहरण यथा- 

"यह चन्द्रमा जरठ तमालपत्र के समान कोमल तथा कृष्णवर्ण की यह जो वस्त लिए हुए 
हे इते रोग कलङ्क" कहते हँ । वह सवधा मिथ्या है। यह तो निर्दय विघुन्द [ राह] कैद 
केधावसे वने विवर मेंसे दिखाई देता आकाश है ।' 

-यहां तमार्मलीमसत्व अनुगामी धमे के रूप में उपयुक्त है । शुद्धसामान्य [ वस्तुप्रति- 
वस्तुभावरूप | साद्र्य का उदाहरण य॒था 

इन्द्र के नन्दनवन से यह पारिजात श्रीकृष्ण द्वारा पृथ्वी पर नहीं र।या गया है, यद तो पुष्प 
का प्रवहं दे जिसे कदमीरदेश में उत्पन्न होने के अभिमान को प्राप्न करा दिया गया हे । 

- यहा कना तथा प्राप्त कराना शुद्ध वस्तुप्रतिवस्तुभाव है। विम्बम्रतिविम्बभाव का 
उदाहरण यथा-- 

न तो यह चौदनी से अलक्त आकाश है, न तो आका्गंगा से स्पृष्ट मेषखण्ड है, न 
नक्षत्रौ का पुज दै ओर न चन्द्रमाका मण्डल । यृह॒तो तरंगित दूष वाला समुद्र है, ओर यहं 
नेती बने सपराज ने मन्दर को ल्पेटरखा है, यह रत्नो का समुदाय है ओर यह अमृतखावौ 
सधाकल्ड हे 

~ यहां ज्योत्स्नाभरणत्व = चांदनी से विभूषित होने के रिष क्षीरक्षोभमयत्व = तरगिद 
दूध वाला होना प्रत्िविम्बरूप से निदिष्ट है। 

दूसरे [ साष्टस्येतर | संबन्ध के आधार पर होने वाला-यथा- 


की 


-१८० अलङ्रखवस्वम्‌ ` 


्रह्ञाकेछि [ श्चुलाञ्चलना ] कर रहे कोकिलं मेँ जो वाचालता आईं वह पथिक-[ पुरुषों की | 
* वनिताओं के लोचनं मे मोन का जागना धा । 
--यद्ां कोकिल्वाचाक्ता कारण है ओर पथिक्वनिताओं का मौन काये । इनमें से कारण 
का निषेध कर कायं का विधान किया गया ह । यदह आरोपगभां अपहति दिखाई गड । 
अव जध्यवसायगमां अपहुति दिखलाते दै -- 
श्रत्येक दिया ओर प्रव्येक विदिदामें जो यह बालेन्दु को प्रणाम किया जाता हे यद्‌ इसलिए 
नदीं कि यह रक्ष्मीजी का सगा भाईं (सोदयं) है, न इसचक्एिकि देव तथा दानवो दारा 
अपनाईं सुरा ओर छधाभादि काव्डा माईंदै ओरन इसल्िएिकि यदह भगवान्‌ दंकर का 
सुढुटमणि दै । स्पष्टरूप से यह वन्यत्व कैव इसलिए है कि यद कान्तासुखकमल की गुलामी 
करता हे ।' 
- यहां वन्यत के वास्तविक हेतु प्रभाव [या प्रभा] आदि का निगरण [ अनुक्ति ] कर उस 
पर अन्य हेतु [ ताृदा दास्य ] का अध्यवसाय किया गया है । दूसरा उदाहरण यथा-- 
सखुधानिधि देव [ चन्द्र ] प्रतिदिन इसि उदित होते दै कि-उन्हं दरवो, पितरो ओर 
मनुष्यो को तृप्त करना होता दै- यह असत्यदहै। येतो तुम्दारे अधरकी सुधा वटोरने के किए 
धूम रहे हँ ओर उसके किए इन्दँने युक्ति सोची है दम्दारे कपोल पर प्रतिविभ्बित दोना 2 
- यहां उदय आदि मेंहेतु है उन-उन [मेष वृष आद्वि] रादियोंका जो उपभोग उसे 
निगल कर॒ [ राव्द्रतः न कहकर ] अन्य निमित्त अध्यवसित किया गया है जो वस्तुतः परवोँक्तः 
कारण का फल है । 
विमश्चः--अपहुति का इतिहास = 
भामह --अपहृतिरभीष्टा च किंचिदन्त्ग॑तोपमा । 
भूताथीपहवाद स्याः क्रियते चाभिधा यथा ॥ 
नेय विरोति भृङ्गाली मदेन सुखरा स॒ह: । 
अयमाकृष्यमाणस्य कन्द पेधनुषो ध्वनिः ॥ ३।२१,२२ \ 


॥ उपमा यदि कुछ-कुछ चछिपाईं जावे तो अपहृति अलंकार मानी जाती है । श्सका 
५ अपहुतिनाम इसङ्णि रखा जाताहै किं इस भूतां = वास्तविक अर्थं क अपहष = छिपाव 
५ रहता दै । उदाहरण = मद ते सुखर यह शृगाली नदीं बोर रही । यह तो काम के खीचिजा 
रहे धनुष की ध्वनि है ।' 


वामन--| सूत्र | समेन वस्ठुनाऽन्यापलापोऽपहुतिः ।४।३।५। | 
[ वत्ति | समेन तुय्येन वस्तुना वाव्यार्थनान्यध्य वाक्याथंस्यापलापो निहो यस्त- 
च्वाध्यारोपणाय असावपहुतिः । यथा 
“न केतकीनां विलसन्ति सूचयः प्रवासिनो हन्त हसः्ययं विधिः । 


अपहृति कदलाता हे । उदाहरण यथा-‹{ वर्षा म ] ये केवड़ के धप्प कौ नोक दिखाई नदींदे रहीं 
यह्‌ तो विधाता प्रवासतिओं पर हंस रहा दै । सामने यदह चंचल बिजली नदीं चमक रदी यद्‌ तो 


तडिछतेयं न चकास्ति चन्चला पुरः स्मरज्योतिरिदं विवर्तते ॥° 

वाक्या्थयोस्तात्प्यात्‌ ताद्रुप्यमिति न रूपकम्‌ ॥ 
| क वस्तु से अन्य का अपटाप~- अपहृति । सम = तुर्य वस्तु = वाक्याथ से अन्य = 
वाक्याथ का जो अपलाप = निहव = छिपाव, जिसका उद्देश्य तच्च का आसेप हो 


ॐ" 


'लीलापूवैक गत्तिशीर मल्यपवन के आडम्बर से आकुलित आन्रज्ञाख ठकत[आं में अतिमनोज्ञ 


मे 


अपह्त्यठङ्कारः १८१. 


काम कौ ज्योति प्रतिफछ्ितिदहो रही हे। यहां रूपक नदीं क्योकि यहाँ दो वाक्यार्थो मे अभेद ` 
वतराया गया है [ रूपक पदार्थो के अभेद में होता है ]। 

उद्धट = अपहुतिरमीष्टा च किंचिदन्तगंतोपमा । 

भूताथांपहवेनास्या निवन्धः क्रियते वुधैः ॥ 

--[ प्रतीहारेन्दुराज कृत लघु विदृति- |-यत्र भूतं विमानम्‌ उपमेयलक्षणम्‌ अर्थ॑म्‌ अपहत्य 
उपमानह्पारोपेण उपमानोपमेयभावो [ ऽवगम्यते सोपहुत्ति- ] तिर लकारः । अत्र च००० अस्फुटेन 
रूपेणोपमानो पमेयभावश्चकास्ति । 

-- जहां भूत = विमान उपमेयस्वरूप वस्तु को छिपाकर उपमानस्वरूप का आरोप करने 
से उपमानोपमैयमाव प्रतिपादित दौ उसे अपहृति अल्कार कहते हें । इसमें ` * * "उपमानोपमेय- 
आव अस्फुट रूपे प्रतीत होता हे ।"- यहं मूलकारिका भामह कीहै। वृत्तिम प्रतिहारेन्दुराज 
ने भूताथै-दाब्द का भथं विद्यमान अर्थं किया है यही एक नवीन तथ्य हे । “भूताथन्याहतिः सा तु 
न स्तुतिः परमेष्ठिनः [ र. १० ] कथयामि ते भूताम्‌ , इन प्रयोगो मे भूताथंदराब्द का अथं 
सत्याथे या वास्तविक अ्थहोतादै। मीमांसामें जो तीन अवाद माते जाते हैः उनमें से एक 
का नाम “भूतार्थवाद ही है। ककिचिदन्तगतोपमाः-शब्द का अर्थं प्रतीहारेन्दुराज ने अपेक्षाकृत 
अच्छा वतलकाया है । 

रद्रट--'अतिसाम्यादुपमेयं यस्यामसदेव कथ्यते सदपि । 

उपमानमेव सदिति च विक्षेपापहतिः सेयम्‌ ॥ ८।५७ 

-- जिसमं अत्यन्त स।म्य के कारण उपमेय का सद्धाव होने पर भी उसे असद्धावात्मक 

चित्रित फिया जवि जौर उपमान को सद्भावात्मक उसे जपहति कहते है । उदाहरण-- 
(नववि सर िंसलयकोमरुसकलावयवा विलासिनी नैषा । 
आनन्दयत्ति जनानां नयनानि सितांुञखेव ॥ ८।५८ ॥ 

--नवीन वि्ांकरुर के समान सपण अवयवो मं कोमल यह्‌ विरासिनी नहीं है जो जनों के 
नेत्रो को आनन्दित कर रही है, यह तो चन्द्रलेखा ही हे निणयसागरीय संस्करण में (नेषा का 
सेषः तथा श्चैव, का शेखेवः छप गया है । 

मम्मट प्रकृतं सन्निषिध्यान्यत्‌ साध्यते सा त्वपहुतिः ।' उपमेयमसत्यं छत्वोपमानं सत्यतया 
यत्‌ स्थाप्यते सा तु जपहुतिः । उदाहरण-अवाप्तः प्रागर्भ्यम्‌० ।› 

-- उपमेय को अस्त्य बतलाकर उपमान का सत्यूप सेजो स्थापन उसी कानाम है 
अपहृति० । उदाहरण --अवाप्तः प्रागरभ्यम्‌० । 

दसते स्पष्ट दै कि समी आचार्यो ने अपहुतिको साटदयमूलक अलंकार माना है ओर 
उमम उपमेय का छिपाया जाना अनिवायं स्वीकार किया हे। वामन ने उसका रूपकसेभेद भी 
वतलाना चाहा है । वस्तुतः भेदकतत्त्व चमत्कार ॒है। अपहुत्ति मँ अपहव का ही चमत्कार 
होतादहे। 

संजीविनौकार श्री श्रीषियाचक्रवत्तौ ने अपहुति के संपूणं निरूपण को इस प्रकार कारिकावद् 
करिया है- 

“प्रकृतं य्निषिध्यान्यत्‌ साध्यते सा त्वपहतिंः । 
नजा छलादिङब्देश्च सा शब्दान्तरतस्िधा ॥ 
स्याद्‌ भेदामेदतुल्या विच्छित्तिरुपमादिका । 
रूपकादिस्त्वमेदांशे मुख्ये त्वारोपसंश्रयात्‌ । 
उत्प्क्षादिरमेदरेन वक्ष्यतेऽध्यवसायमाक्‌ ॥› 


१८२ अलङ्ारसवस्वम्‌ 


प्रकृत का निषेध कर अप्रकृत उपमान का विधान अपहुत्ति कदलाता दे । यह तनं 
म्रकार की होती है ८ १) जो नञ्‌-› दवारा प्रतिपादित दो, (२) जो छलादि शब्दो से प्रतिपादित 
हो ओर ८ ३ ) जो अन्य "वपु" आदि शाब्दो से प्रतिपादित हो । 

--उपमादि वहां होते दँ जहां भेद ओर जभेद दोनों बरावर होते हे । रूपकादि वदां 
होते दे जहां आरोप के आधार पर अभैदांञ् प्रधान हो। उत्प्रेक्षादि वहां होगे जहो अभेद दोगा 
किन्तु उसमे अध्यवसाय रहेगा । | 

श्री भ्रीविच्याचक्रवतीं के इस संग्रह से विदित दै कि उर्दोनि मम्मट के भपहुतिटक्षण को अधिकं 
महच्च दिया है । 

 पण्डितराज जगन्नाथ ने अपहृति का लक्षण इस प्रकार किया दै- 

उप्मैयतावच्छेदकनिषेधसामानाधिकरण्येनारोप्यमाणञुपमानतादात्म्यमपह्ृतिः । 

[ सुखत्व आदि ] उपमेय धमं का निषेध दिखलाते हए उपमान के तादात्म्य का आरोप 
अपहत कडलाता हे । 


विमरिनी 
एतदुपसंहरन्यद्‌वतारयति । एवमित्यादि । 
इस [ अभेदप्रधान अरुकारों के ¦ प्रकरण का उपसंहार करते इट अन्य प्रकरण का आरम्भ 
करते है-- 
९ 
| सदस्व | 
५५ प + ५५८ | १ 
पवमभेद्पराधान्ये आयेपग्भानटंकारंह्क्षयित्वा = अध्यवसायगभौ- 
हक्षयति- 
तत्र 


| छ° २२] अध्यवसाये व्यापारप्राधान्ये उत्तरेक्षा | 


विषयनिगरणेनाभेद पतिपत्तिविंषयिणोऽध्यवसायः । 

[ वृत्ति | इस प्रकार अभेद की प्रधानता होने परर दोने वारे आरोपगसित अलंकासं के 
लक्षण किए, अव अध्यवसायगमित अल्कासो के लक्षण करते है । उनमै- 

[ सूत्र | अध्यवसाय मेँ यदि व्यापार की प्रधानता हो तो उ्प्रे्ठा [ अरंकार 

होतादहे]। 

[ वृत्ति ] [ विषय के] निगरण द्वारा विषय के साथ विषयौ का अभेदवोध अध्यवास 
होता हे । 

विमरिनी | 

आरोपगमानिति । अत्राध्यबसायगभ॑स्वस्यापि विद्ययमानव्वान्मज्ञयाम इव्यादि- 
वद्रोपगभंस्य प्राधान्यादेवं व्यपदेशः । तत्न तावदुसप्रठां च्यति--अध्यवसाय इत्यादि । 

आरोपगमेः- कथन प्रसिद्ध मह कै नाम पर गोँवको म्लगोँव कदने के समान आरोप 
की प्रधानता पर निभैर दै, वस्तुतः अध्यवसाय भी इनमें रदता द । 

अध्यवसायगभित अलंकारो मे उत्मक्षा का लक्षण करते हें अध्यवसाय इति- 

विमश्चेः-अल्कारस्व॑स्व के इस उत्प्रक्षालक्षण को अलंकाररत्नाकरकार शओोभाकरमित्र ने 


#॥ मी कि 


उत्परश्चाठ्ट्कारः १८३ 


सदोष ठहराया है ओर विमरिनीकार जयरथ ने रोभाकर का खण्डन कर उसका समथन किया: ` 
है । रोभाकर का विवेचन इस प्रकार है- 

[ सूत्र | विषयित्वेन संमावनसुत्परक्ता | 

[ बृत्ति ] विषयित्वेन अधांद्‌ विषयस्य सम्भावन=भवितन्यमनेन स्थाणुना? इत्यादि अनिश्चयात्मक-. 
वितकादि-शब्दाभिधेय-सं मावनाप्रत्ययविषयी तत्वम्‌ उत्प्रेक्षा । अतश्चानिश्चयात्मकतया संमवानायाः 
संदे दमूलत्वम्‌ , न त्वध्यवसायगभेता । यत्रापि [धमोत्प्क्षायां धम॑रूपविषयस्य शब्दतोऽनुपादाने “लिम्पतीव 
तमोऽ्वानिः-इत्यादो ] अंडेनाध्यवसायस्ततापि सन्देहानिवृत्तिः। तथाहि सदेदनिश्चयरूपत्वेन प्रत्य- 
यानां द्वेविध्यम्‌ । निश्चयश्च यथारथोऽन्यसिचारी सम्यक्प्रत्ययः, व्यभिचारी त्वसम्यक्‌ । तत्र तावदुत्प्क्षा. 
न सम्यक्त्वम्‌ , अथाग्यभिचाराभावात्‌ । नाप्यस्तम्यक्प्रत्ययरूपो विपयांसः, तस्य निश्चयरूपत्वात्‌ । 
अस्यां च राब्देनापि वृत्तेन आ्रान्तिमदतिदायोक्त्यादिवद्‌ विषयिणो निश्चयाभावात्‌ । अनिश्िते चः 
संदिग्धमेवेत्यविवादः । अत एव॒ नाध्यवसायमुकत्वमस्याः । तस्य विषयनिगरणं विषयिनिश्चयस्च 
स्वरूपन्‌ । न वात्रेकमपि संमवत्ति विषयोपादानात्‌ निश्चयाभावाच्च । तेन “अध्यवसाये व्यापार- 
प्राधान्ये उत्परक्षाः-इति लक्षणमपयांरोचितामिधानमेव । [ उत्प्रेक्षा प° ४७ पूना संस्करण-१९४२ ] 

[ सुन्न ] विषय विषयुीरूप से संभावन उत्प्रेक्षा । 

[ दृत्ति | विषयीषरूप से विषय का संभमावन अथात्‌ “इसे स्थाणु ( ट्ठ ) होना चादहिएः--इत्यादि 
अनिश्चयात्मक तथा वितकं आदि शब्दों से पुकारा जाने वाला जो संभावनात्मक ज्ञान उसका विषय 
वनाया जाना उ्प्क्षा कहलाता हे! ओर इसक्िए अनिश्चयात्मक होने के कारण संभावना सदेह 
मूकं होती हे, अध्यवासगभित नहीं । जहाँ [ धर्मोत्रेक्षा मे विषयभूत धमं का शब्दतः कथन नदीं 
रहता जरौ “अन्धकार अंग-अंग कौ लीपता-सा जा रहा हैया अन्धकार के पौल्ने का 
आदिक अध्यवसायमभी होता है वँ ही संदेह हट नहीं जाता । क्योकि ज्ञान दो प्रकार के होते है 
सदेहात्मक तथा निश्चयात्मक । इनमें ते निश्चय सम्यग्ञान = टीक ज्ञानका नामरहैजो यथार्थं 
अथात्‌ पदाथ के वास्तविक सूपके ही आकारका होतार, तद्विरुड नदही। जो वेसा नदीं 
होता उसे असम्यक्‌ ज्ञान = अयथाथं = गर्त ज्ञान कहा जाता है इनमें से उत्प्रेक्षा सम्यक्‌ ज्ञान 
नहीं हो सकती, क्योकि इसमें ज्ञानस्वरूप वैसा ही नदीं रहता जेसा पदार्थस्वरूप रहता है ।` 
न तो यह असम्यग्ज्ञानस्वरूप विपयंय = विपरीतज्ञान ही है क्योकि यह [ विपसेतज्ञान या 
विपयय | निश्चयरूप होता [रज्जुमें सपंका निश्वयदही आन्तिहै वही विपर्यये] इस 
[ उत्प्रेक्षा ] मे आ्रान्तिमान्‌ अतिशयोक्ति आदि के समान विषयी का निश्चय शब्दतः भी नहीं 
होता [ वास्याथेवोधमें उसके निश्चयकौी बाततो बहुत दूरहै] ओर यह सवंमान्यहैकि 
अनिध्चित पदाथ सदिग्ध ही माना जातादहै। इसीलिए इस [ उत्प्रेक्षा ] को अध्यवसायमूलक 
नहीं मानाजा सकता। क्योकि उस [ अध्यवसाय ] का स्वरूप है विषय का निगला जाना 
ओर विषयी का निश्चय होना । यहाँ [ उत्रक्षा मे ] इन दोनों मे एक मी संभव नहीं है क्योकि यहां 
विषय का राब्दतः कथन रहता है [ शब्दतः अकथनरूप निगल जाना नहीं ] तथा निश्चय नहीं 
रहता । इस कारण अध्यवसाये व्यापारप्राधान्य उत्प्रेक्षा = अध्यवसायमें व्यापार की प्रधानता 
टोने पर “उक्छक्षाः यह [ अर्कारसवेस्वकार द्वारा निमित] लक्षण निपट पर्याोचनदल्यः 
उक्ति दे । विमरिनीकार इसका खण्डन करते हृए छ्खिते है- | 


विमरिनी 


अध्यवसाय इति न पुनः संदेह इति । इह हि निश्चयानिश्वयरूपस्वेन 
परस्ययानां द्वविध्यम्‌ । निश्वयश्चाथांड्यभिचारी सम्यक्‌, अन्यथा त्वसम्यगितिः 


२८७. अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


मदो न आद्यः । प्रतीतिच्वत्तिमात्रस्येवेह विचारयितुमयुपक्रान्तव्वात्‌ । तस्य च 
भ्रामाण्यविचारे उपयोगात्‌ 1 अनिश्चयश्च संशायतकरूपव्वेन द्विविधः । अतश्चानिशितं च 
संदिग्धमेवेति न वाच्यम्‌ 1 तर्कात्मनः संभावनामप्रव्ययस्याप्यनिश्चयाव्मकष्वे सदिग्धत्वा- 
भावात्‌ । उग्प्र्ता संभावनादिशब्दाभिधेयतकग्रतीतिस्रूरति नास्याः सदेहमरूख््वस्‌ । तस्य 
भिन्नरुच्षणत्वात्‌ । अथानवधारणक्तानं संदाय इव्यनवधारणन्तानव्वाविदोषाद्संशायाननाथा- 
न्तराभावस्तकंस्येव्यस्याः संद्ायसूरत्वमिति चेत्‌ , नेंतत्‌। अनवधारणन्तानस्वावि रोषेऽपि 
खंशयतकयोभिन्नरूपस्वात्‌ । तथाहि - स्थाणुर्वा पुरूषो वेति सामान्येन पक्त द्रयोज्ञेखः 
संशयः । पुश्षेणनेन भवितन्य मिस्येकतर पत्तानुदुरकारणद्शनेन पक्तान्तरवाधनमिवं 
तकः । पुरुष एवायमिति पचान्तरासंस्पर्टोनेकतरपक्तनिर्णयो निश्चय इत्यस्ति सद य- 
साधिकं प्रत्ययानां तरे विध्यम्‌ । 
बाढमस्व्येव प्रत्ययानां त्रैविध्यम्‌ , किं सव नवधारणक्तानव्वाविदोषात्‌ संशयप्रकारस्तकं 
इति चेत्‌ , नेंतत्‌। एवं ह्यसम्यग््ानत्वाविशेषाद्‌ भ्रमोऽपि संय प्रकारः स्यात्‌ । अर्थ- 
निश्चयानिश्चयस्वभावत्वादिना अस्त्यनयोविशेष इति चेत्‌ , इह पुनर्नास्व्यत्र कि प्रमाणस््‌ । 
संशयो द्यनियतोभयांज्ावरम्बिवेनोदेति, तकः पुनर॑श्ञान्तर बाधनेनेव वाह क्लिद्‌ दा नायनु- 
-कूरुकारणौचित्यादंान्तरावरम्बनेन वचेव्यस्त्यनयोर्विदोषः। देशान्तरे हि यथा स्पधंमान 
एव स्थाणुपक्न आस्ते न तथा वाहकेलिभूमौ, अपि तु श्िथिखीभवति, संभवस्प्रमादस्वाच 
सवमना न निवतंत इति अत एव निश्चयः साधकप्रमाणामवेऽप्यस्यो पत्तः 1! नहि 
ग्रतिपवाधादेव निश्चयो भवपि । साधकवाधकव्रमाणसद्धावेन तदुरपाद्‌ात्‌ । तेनानियतो- 
भयपन्नावरम्बी किस्विदिति विमन्चः सदेहः । एकतर पक्तावखम्बी तु तकं इति ¦ 
अथ कोऽस्य फर्स्योपायविशेषः' इव्येकतर प्तावरुम्बेनापि संदेहः संभवतीति चेत्‌ , 
नतत्‌ । किमथनानियतपन्तान्तरस्वीकारादेकतरपक्ावरुम्बनस्याप्रतिष्टानात्‌ । वाद्यारी- 
दशनाच्च यथा पुषदिशरोषाः स्मरणपथं समवत्तरन्ति न तथा स्थाणुविशेषा इर्युमभयविशोष- 
स्मरणजन्मनः संदेहादेक तर विशेषस्मरणजन्मा विशिष्यते तकं इत्याद्यवान्तरमतिगहनमन- 
योरस्ति मेदृसाधन तस्पुनः प्रहृतानुपयोगादिह नोक्तम्‌ । तेन संदेहनिश्चयान्तराख्वर्तीं 
तदक्तणः संभावनाग्रव्ययच्िशड्कुरिव म्बमानोऽवश्याभ्युपगन्तम्यः । 
अध्यसाय न कि सदेह । यां, जो है सो, समस्तक्नानदो वर्गौ मं बांटे जातते है (१) निश्चय 
तथा (२) अनिश्चय । इनमे निश्वयज्ञान दो प्रकार का होता है (१) सम्यक्‌ ओर (२) असम्यक्‌ । 
इन दोनां का अन्तर यह है कि सम्यक्‌ निश्चय अथाँन्यभिचारी अथात्‌ पदाथ के स्वरूप के विरुद्ध 
नहीं होता ओर असम्यक्‌ ठीक इसके विपरीत अथैन्यभिचारी अथात पदाथेस्वलूप के विरुद्ध । 
किन्तु यह अन्तर लोकिक अन्तर है। यहां [ काव्यक्षेत्र की अकरूकारमीमांसामं] इसे नहीं 
अपनाया जाना चादिए । क्योकि यददोँतो केवर म्रतीतिद्ृत्ति [ प्रतीति रूप वृत्ति = अन्तःकरण 
उत्ति, जिते करमीरीदर्न संवित्ति कहते दँ ] पर ही विचार कियाजा रहा हे। उपरक्त जो मेद 
बताया गया दै उसका उपयोग केवल प्रामाण्यविचार में होता हे [ जँ वास्तविकता अथवा 
अवास्तविकता का न्याय किया जाता है ]। जदा तक अनिश्वयज्ञान का संबन्धदहै वह दो प्रकार 
का होता हे संशयात्मक ओर तर्कात्मक । इसीसिए 'अनिध्ितजो दै वह संदिग्धदही होता दहै 
एसा नहीं कहना चाहिए । तर्कात्म् जो संभावनाज्ञान होता है उसे मी अनिश्चयात्मक कदा जा 
सकता हे, जव कि वह्‌ संदेहात्मक नदीं होता । उपेक्षा जो दै यह संभावना-आदि शब्दों से कदी 
जाने वाटी तकात्मक प्रतीति पर निर्भर है, अतः इसे संदेहमूलक नहीं कदा जा सकता । उस 


{ संदेह ] का स्वरूप ओरदही प्रकारे काहोता है। 


^) म न, अ 


उत्प्रश्चाटङ्कारः १८५५ 


ओर-.अनिश्चयात्मक ज्ञान संदाय होता है, तथा यह अनिश्चयात्मकता तकमें भी रहती हे 
अतः वह संदाय से भिन्न नदीं है, फलतः उत्प्रेक्षा संदायमूलक मानी जा सकती है--यदि ठेसा कें 


तो यह भी ठीक नहीं है, क्योकि अनिश्चयात्मकता से युक्त होने पर भी तकं ओर संशय में अन्तर दे । 


अन्तर इस प्रकारदहैकिष्टरर्देया पुरुषः इस प्रकार दोनों पक्षों का समानल्प से ज्ञान संदाय 


कहलाता है जव कि तकं कहलाता है--'यह पुरुष होना चाहिए यह, जिसमे विसी एक ही 


पक्ष की ओर दुकाव दिखलाकर दूसरे पक्ष का मोन निराकरण-सा रहता हे । निश्चयज्ञान वह्‌ ज्ञान 
कहकाता है जिसमें '्यह पुरुष ही है--इस प्रकार दूसरे पक्ष का स्प भी नहीं रहता ओर केवल 
एक ही प्रक्ष का निणेय कर ल्या जातादहे। इस प्रकार ज्ञानां के तीन वग होतेहे। इसमे साक्षी 
हे सहृदय जन । 

यदि यह कट कि--्ञान के ये नीनां प्रकार, है तो अनुमवसिद्ध' किन्तु इनमें जो तकं हे वह्‌ 
संराय काही एक भेद है, क्योकि संदाय ओर तक दोनांमेदही ज्ञान की अनिश्चयात्मकता समान 
रूप से रहती हे ।-तो यह मी ठीक नही, तवतो अमकोभौी संरायका मेद कहा जा सकता 
दे क्योकि ज्ञान की असम्यक्ता ( अयथाथेता ) संखय केही समान ्रममेंभी रहतीदहे। यदि 
कटे कि ज्रम में पदां का निश्चय रहता है ओर संशय में अनिश्चय, इस प्रकार दोनों मे अन्तर हं 
तो इसमे क्या प्रमाणदहै किटेसा अन्तर संशय ओर तक में नदीं है। संदाय जो हे उसमें 
विषय वनते हे एसे दो अंश जो दोनों ही अनिश्चित, रहते है जब कितक मेँ एक अंका बाध- 


सा रहता हे ओर वाहकेकि [ संभवतः घुड सवारी का क्षेत्र ९,५५€ & ४०४१ | आदि के दिखाई देते 


आदि अनुनूर (साधक) कारणों के ओचित्य से दूसरे जं का साधन । इस प्रकार अन्तर इन दोनों 
मेमीहेदही। जन्य स्थानो में जिक्त प्रकार स्थाणुपक्षकाज्ञान वरावरी के साथ होता रहतादहे 
उस प्रकार वाहकेलि भूमि [ घुड़सवारी के मेदान ] मे नही, वह वह शिथिल हो जातादहे, 
किन्तु जव तक उसमे प्रमाद कौ संभावना रहती है वह सर्वात्मना हट नहीं जाता इसीकिए 
य॒ह ज्ञान निश्वयस्वरूप है क्योकि यह [निश्चय] साधक-प्रमाण के अभावमें मी माना जा सकता हे। 
| वाहकेलि भूमि आदि एकता पक्ष के समधेक साधन तो है किन्तु उसे सवथा सिदध ही कर देने 
वा नदीं हँ अतः वे साधक-प्रमाण नहीं] । एेसा नहीं कि प्रतिपक्ष ( (0पण॑लणषौ ) 


का सवथा वाध होने पर ही निश्चय माना जाता हो, वह साधक ओर बाधक दोना प्रकारके प्रमाणो 


के रहने परभीमानाजा सकता है। श्सक्ए संदेह दो अनिध्ित पक्षों पर निर्भर ज्ञान का नाम 
हे जिसमे देसा हे या कि एेसाः--इस प्रकार कै विकल्प का बोध होतादहै, मौर तक किसी एक 
पक्ष पर निभेर ज्ञान का, जिसे शिथिर निश्चयात्मक कदा जा सकता है । यथपि रान्ति में निश्चय 
रहता है किन्तु उसमे निश्चय दृट्‌ रहता है क्योकि उसमे पक्षान्तर का ज्ञान नदीं रहता । सदेह में 
टृट्‌या शिथिरु किसी भी प्रकार का निश्चय नदीं रहता इसलिए उते संदेह ही मानाजातादहे 
ओरं इसीलिए तकं उसपे प्रतीतितः भिन्न है । 


यदि यह के कि-- संदेह भी एकतर पक्ष पर निभैर होतादहै जैसे [अनेक कारणो मँ से 


किसी एक कारण को विशिष्ट कारणता का निश्चय कर चुका व्यक्ति कदे-- ] आखिर इस कार्य 
का विदिष्टकारणक्याहेः [इस कथन में विशिष्ट कारणता पर प्रन है अतः हैत वह संदिग्ध 


किन्तु वक्ता किसी एक कारणभूत पदाथ की वििष्ट कारणता को मनमे रख कर प्रन कर रहा 
हे इसकिए उसका ञ्युकाव उसी की ओर है अतः यह एकतरपक्षावरम्बी संशय है ], तो यह भी 
ठीक नहीं, क्याकि इस वाक्य मे जो "कः" इस प्रकार किमक = कौन!-अर्थै का वाचक पद्‌ है 


उससे एकतरपक्ष का अपनाया जाना सिद्ध नहीं हो पाता। भौर बाह्याली [ धुडसवारी का 


१८द . अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


मैदान अथवा बाहरी राजपथ ] देखने से जेसे पुरुषविदेष याद आते दैः वैसे स्थाणुविदेष नहीं, 
अतः दोनों विष्ट वस्तुओ के स्मरणे जो संदेह हआ उसकी अपेक्षा किसी एक विचिष्ट के स्मरण 
से हुआ तक अवरस्य दही भिन्न है'--इत्यादि ओर मी वहत से तत्व इन दोनों में अन्तर सिद्ध 
करते है जो अत्यन्त गहन है । उन सवकी चचां प्रस्तुत प्रकरणम निरर्थक दै अतः उन्ह यां 
नदीं वतलाया जा रहा । निष्कषं य॒द्‌ कि उक्तदेतुओंसे संदेह ओर निश्वयके बीच का किन्तु 
इन दोनों से भिन्न [इन दोनोँके वीच] विरोक के समान लटका हआ संभावनात्मक बोध 
अवदय ही स्वीकार करना चाददिए । 


विमिनी 


एुवमप्यनिश्वयाव्मकसं भावनाप्रत्य यमूरुत्वादुसपर तायः: कथमध्यवसायमूलत्वम्‌ 1 
तस्य हि विषयनिगरणं विषयिनिश्चवयश्च स्वरूपम्‌ । न चात्रेकमपि संमवति। विषयो- 
पादानान्निश्चयाभावास्चेति। अत्रोच्यते--इह द्विधास्व्यध्यवसायः-स्वारयिक उत्पादि- 
तश्च । तच्र स्वारसिके विषयानवगम एव निमित्तम्‌ तत्सामथ्यरस्वरसत एव विषयि- 
प्रतीतेरल्नासात्‌ । न द्यवगतशयक्तिकास्वरूपभ्य प्रमातुः कदाचिदपि रजतमिदमिति 

प्रस्ययोत्पाद्‌ः स्यात्‌ । इतरत्र तु विषयमवगम्यापि तदन्तःकारेण प्रतिपत्तौ स्वाव्मपर- 
तन्त्रविकल्पबराद्‌ विषयिप्रतिपत्तिमुर्पादयेत्‌ । ,जानान एवहि विषयिविविक्तं विचयं 
तत्र प्रयोजनपेरतया विषयथिणमध्यवस्येत्‌ । तत्राद्यो आान्तिमदादिविषयः । तन्न हि 
म्रमात्रन्तरगता स्वारसिक्मेव तथाविधा प्रतिप्तिवक्त्रानू्यते न तूत्पाद्यते । यदादः - 
प्रमात्रन्तरधीश्रान्तिरूपा यस्मिन्ननूुधते। स श्रान्तिमान्‌" इति । स्वारसिकल्वं पुनरन 
कविप्रतिभानिवंतितमेवेष्टम्‌ । अन्यथा हि ्रान्तिमाघ्रं स्यादिति पूर्वमेवोक्तम्‌ । इतर- 
सस्मर्षाविषयः। स च द्विविधः- सिद्धः साध्यश्च । सिद्धो यत्र विषयस्यालुपात्ततया 
निगीणत्वाद्भ्यवसितप्राघान्यम्‌। साध्यो यत्रेवादयुपाद्‌ानास्संभावनाप्रस्ययारमकत्वाद्िषयस्य 
निगीयमाणव्वाद्ध्यवसायक्रियाया एव प्राधान्यम्‌ 1 अत एवाह-“न्यापारप्राधान्यः इति । 
अत एव चात्र क्चिद्धिषयाचुपादानम्‌ । वाच्योपयोग्यध्यवसायस्य साध्यमान वेनोप. 
क्रान्तत्वात्‌ । केचिच्च विषयस्यानुपादानेऽपि न सिद्धस्वम्‌ । इवाद्यपाद्ानाक्निगीयंमाण- 
तायाः प्राधान्यार्संभावनाग्रव्ययस्येवोदेकात्‌। अत एव चात्र विषयस्य निगीर्यमाण- 
त्वादारोपगभस्वं न वाच्यम्‌ । तत्र विषयस्य विषयितया प्रतीतिः । इह पुनर्विषयस्यः 
निगीर्यमाणस्वेन विषयिण एव प्रतीतिः । नुं विषयनिगरणमध्यवसायस्य कक्तणम्‌ । इह 
पुनवविषयस्य निगीयंमा तेति कथमत्राध्यवसायतेति चेत्‌ , नेतत्‌ । “विषय्यन्तःक्रतेऽन्य- 
स्मिन्‌ सा स्याग्साध्यवसानिकाः इव्याय॒क्त्याध्यवसायस्य विषयिणा विषयस्यान्तःकरण 
खक्तणन्नू । तच्च विषयस्य निगरणेन निगी यमाणखेन वा भवतीति न कश्चिद. 
दोपः । निगीर्यमाणसवमपि पूर्वोक्तनीव्या विषयस्यो पात्तस्यानुपात्तस्य वा भवतीत्यपि न 
कश्चिद्विशेषः । एवं सिद्धेऽध्यवस्ायेऽध्य व लित प्राधान्यं साध्ये च स्वरूपप्राधान्यमिति 
सिम्‌ । एतच ्नन्थक्रदेव विमञ्याग्रे वचयतीति तत एवावधार्यम्‌ 1 यदेव साध्यव- 


सायस्य साध्यत्वं तदेव संमावनाव्मकष्वम्‌ । संभावना द्येकतरपक्षहिधिदटी कारेण पच्ान्तर-~ 


दाल्यन च प्रारभवतीस्यस्याः साध्याध्यवसायतुद व कन्तरवम्‌ । तस्यापि चिषयशिथिदीकारेण 
विषयि दाढर्थन चोत्पत्तेः । अत एव विषयिगोऽपि शाब्देन बृत्तेन सत्यसवम्‌ । विषयिद्‌ाढर्ये- 


= न ४4 [1 म 
नेव साध्याध्य वसायस्वरूपप्राुभावात्‌ । यदुक्तं मवद्धिरेव संभावनायां च संभाव्यमानस्य 
दाढथादपरस्य च दोथिक्याव्‌ः इति । इह संभाग्यमानस्य विषयिणो दाढर्यादन्न संहाया- 


= किया | 
-- ---- कक 


१५ जिया च [क ~ ~~ ~ ~ ~ क ~ = ~~ ~ क क > ~ - - ~~ ---- ~ 


[कि -- 


उत्प्रक्षाल्ङ्कारः ` १८७. 


दे रुचण्यम्‌ । तस्य निय तोभयां्ावलरम्बी किंस्ठिदिति विमर्शो रक्तणम्‌ संभावना- 
विषयस्य च शेथिटयान्निश्चयाद्पि सेदः! विषये हि बाधकसद्धावादेकस्य रोधिल्येन वा 
साधकखद्धावाच्च पक्तान्तरस्य सिद्धिः स्यात्‌, अतिदायोत्तिश्चि निश्चवयाष्मिकेति ततोऽस्या 
मेदः । यत्त “साध्यो यन्न विषथिणोऽसस्यतया म्रतीतिः' इ्यादि मन्थद्द्भच्यति तद्‌ वस्त. 
चुत्तामिप्रायेणाव गन्तव्यम्‌ । तदेवं विषयस्य निगीयंमाणस्वाद्धिषयिणश्च निश्चयास्सिद्धसध्य- 
वसायमरूढत्वसस्या इति यथोक्तमेव कक्तणं प्यांरोचिताभिधानस्र्‌ । तस्मात्‌ 


'इ वादौ निश्चयामावाद्विषयस्य परिग्रहात्‌ । 
कचिदध्यवसायेन नोत्प्रद्ापि तु संश्ञयात्‌ ॥' 

इव्यादयक्तमयुक्तमेवेस्यर बहूना । 

[ रका ] “टेसा होने पर भी [ संमावना को स्देह से भिन्न मानल्ेने पर मी ] उत्प्रेक्षा होती 
तो अनिश्चयात्मक संमावना-प्रतीति पर ही निर्मर, उसे अध्यवसायमूरक [ अध्यवसाय पर निभेर ] 
क्यो वतलाया जा रहा हैः । उस [ अध्यवसाय] का स्वरूप तो धविषयका निगरण = निगला 
जाना [ शब्दतः अकथन ] तथा [ उसका ] विषयौरूप से निश्चयः होता दै । याँ [ उतपरक्षा मे | 
इन दोनों में से एक मी नदीं है । यद्य तो उच्टे विषय का उपादान दही दहै ओर [ विषयौरूपसे 
उसके ] निश्चय का अमाव ।-[ समाधान ] इस पर हमारा कहना है-र्ह अध्यवसाय दो 
प्रकार का होता है ८१) स्वारसिक तथा (२) उत्पादित । इनमें से स्वारसिक अध्यवसाय में 
कारण रहता हे विषय का अज्ञान ही क्योंकि उर [अज्ञान] के आधार पर विषयौ की प्रतीति स्वाभा- 
विकल्पसे ही दहो जाती है। [ यथा शुक्ति म रजत की प्रतीति ]। एसा नहीं देखा जाता कि जिस 
व्यक्ति को शुक्ति [ सीप, छिपनी ] का शुक्तिरूप से ज्ञान होता रहता हो उमे उसमें कभी सौ यह 
प्रतीति होती हो कि प्य रजत है । किन्तु दहितीय [ उत्पादित ] अध्यवसाय मेँ व्यक्ति विषयक 
जानता रहता हे तव भी उसे छिपा देना चाहता है [ = अन्तःकार ] ओर उस पर [ बाह्य कारण 
के विना भी] केवल अपनी इच्छा से जनित विकल्प कै द्वारा विषयी की प्रतीति पेदा करता 
हे । वह विषय को विषयी से भिन्न समञ्चता रहता है तथापि प्रयोजनविशेष से उस पर विषयौ 
को अध्यवसित कर देता है। । 

इनमे से प्रथम अध्यवसाय आान्तिमान्‌ आदिमे होता है। उनमें [ पञ्यु-पक्षी आदि | अन्य 
प्रमाता व्यक्तियों मे स्वभावतः हो रदी वैस [ अमपूरणं ] प्रतीति का वक्ता अनुवादमात्र करता दे 
उसे उत्पन्न नहीं करता । जेसा कि कहा है- (अन्य प्रमाता का आन्तिरूप ज्ञान जहो अनूदित 
किया जाताहै वह दहै भ्रान्तिमान्‌'[ ]। विन्तु यद्य जो स्वारसिकत्व है वह मी कवि. 
प्रतिमासंपादितत्वरूप ही है क्योकि रेखा न मानने पर [ अर्थात्‌ स्वारसिकत्व को शुक्तिरजत 
दृष्टान्त के समान केवल रोकिक मानने पर ] आन्ति केवल भ्रान्ति ही हो सकेगी आन्तिमान्‌ 
अलंकार नहीं । यह्‌ तथ्य पहिले ही स्पष्ट कियाजा चुकाहे। 

दूसरा जो [ उत्पादित ] अध्यवसायदहै वह उत्प्र्षामें होतादै। वही दोप्रकार का 
होता हे (१९) सिद्ध तथा (२) साध्य । सिद्ध वह होता दै जिसमे विषय उपात्त नहीं रहता; 
निगीणे (ए८००९-७४००१) रहता है फलत्तः जिसमे अध्यवसित अथं (विषयी) ही प्रधान रहता है । 
इसके अतिरिक्त साध्य वहाँ होता हे जहो "इव" ध्यथाः [अथवा मानों] आदि शाब्द रहते हे अतः ज्ञान 
संमावनात्मक रहता है अतः विषय [राब्दतः उपात्त रहने पर भी] निगीणै ही रहता है ओर इसक्ए 
जहां अध्यवसाय क्रिया कौ प्रधानता रहती है । इसीलिए लक्षण मे मन्थकारने मी कहा च्यापार को 
प्रधानता रहने पर । [ अभिप्राय यह कि जहाँ विषय का उपाद्‌न रहता है इसङिए “श्व' आदिः: 


बरक क च = अछ र कक ग्कर्का ? "= क = 7 क का च क * ४... चै +> 2 


। 
1 
। 
| 


२८८ अलङ्कारसलवंस्वम्‌ 


दब्दो के प्रयोग के कारण बुद्धिधारा वहाँ अध्यवसायात्मक ज्ञान की ओर वदती तो दै किन्त 
वह अध्यवसायात्मक ज्ञान में परिणत नहींदहदो पाती । अध्यवसायप्रयत्नमात्र तक सीमित रह 
जातीं है। ] ओर इसीलिए कहीं-कहीं विषय का उपादान नहींभी रता यह इसलिर कि 
यहाँ उसी अध्यवसाय को साध्यल्प से प्रस्तुत किया जातादहै जो वाच्योपयोगी होता है 1 किन्तु 
जहां कहीं विषय का उपादान नहीं मी रहता वदाँ अध्यवसाय सिद्ध अध्यवसाय नहीं होता क्योकि 
वहाँ इवः-“मानोँः आदि चाब्दं का उपादान रहता ह इसङिए निगौर्य॑माणता प्रधान हो जाती दे 
ओर संभावनात्मक ज्ञान दी उद्रिक्त हो जातादहै। ओर इसीलिए क्योकि यदं विषय निगी्यमाण 
रहता है उस्ेक्षा आरोपगर्भित नदीं होती [ अल्काररत्ना०ने आरोगमांद्यी मानादहेद्र० प्र 
४८ | आरोपमें विषय कौ प्रतीति विषयी-रूपसे होती दै। अध्यवसाय में विषय निगीयंमाण 
होता दे इसलिए केवल विषयी की ही प्रतीति होती है । 
यहा यह्‌ शका की जा सकती है कि “अध्यवसाय का स्वरूप ह विषयका निगरण [ अर्थात्‌ 
इसमे निगरण कौ ही प्रधानता रहती दै ] ओर य्य बतलायीजा रहीदहै विषय की निगीय॑- 
माणता [ जिसमे निगरण अप्रधान दहै प्रधानता विषय कोंद] अतः इसे अध्यवसाय रूप कैसे 
माना जाय ।' किन्तु यहु ठीक नदीं, क्योकि अध्यवसाय का स्वरूप है विषयीके द्वारा विषय 
क अपने भीतर चछ्िपालेना जेसाकि[ मम्मटमट्रने कान्यप्रकादय द्वितीय प्रकाद्यासे] कदा दहै 
“साध्यवसाना लक्षणा वह हाती हे जिसँ विषय विषयी कै द्वारा अन्तःक्रेत [ = अपने भीतर चछ्िपा 
इना | रहता हे । यह अन्तःकरति चाहे विषय के निगरणसे दहो या विषय की निगीर्यमाणता से 
उसम कोई अन्तर नहीं आता । निगी्य॑माणता मी उपात्त विषय की मी होती है ओर 
जयुपात्त विषय कौ मी । इसलिए उस्म भी कोई फरक नदीं पडता । 


४ दत प्रकार यह्‌ सिद्ध हुआ किं सिद अध्यवसाय मँ प्रधानता अध्ववसित ( विषय) की रहती 
हे ओर साध्य अध्यवसाय में स्वयं अध्यवसाय की ही । इते स्वयं ग्रन्थकार ही अरूग-अल्ग करके 
आने भलीरभति वतलगे । अतः इते वहीं से समञ्च केना चाहिए । हां! यर्दा जो अध्यवसाय 
को साव्यता है वही संभावनात्मकता हाती है। संभावना जो है वह किसी एक पक्ष को शियिल 
करके ओर अन्य पक्ष को दद्‌ करप ही होती है अतः यह साध्य अध्यवसाय के बरावर होती ह । 
व्याकर साध्य अध्यवसाय मी विषय को रिथिल कर विषयी की दृढता से निष्पन्न होता है । दसकिए 
विषयी भौ शाब्दबोध में सत्य ही रहता है क्योकि साध्य अध्यवसाय विषयौ की दृढता से दही 
निष्पन्न होता है । जेता कि आपे मी [ अलंकाररत्नाकर के ¶० ४८ पर उ्मरेक्षा प्रकरणमें हय ] 
कहा है--संमावन। मे संभाव्यमान [ विषयी ] की दढता रहती दै गौर विषय की शिथिरूता ।› 
यां संमान्यमान विषयी की ददता रदती है अतः य्ह संशाय से भिन्नता रहती रहै। क्योकि 
संशाय दो अनिश्चित अंश पर निर्भर रहता है जिसका स्वरूप क्या" -'भथवा' इस प्रकार का 
विमद होता हे । इसी प्रकार संमावना-विषय कौ शिथिलता के कारण यह निश्चय से भी भिन्न 
रहता हे । 
जा निश्चय होता है वद्य एक ओर तो एक पक्ष हट जाता या शिथिर हो जाता है क्योकि 
वाक उपस्थित रहता है ओर दूसरी ओर दूसरे पक्ष की सिद्धिदो जाती है क्योकि साधकमी 
उपस्थित रहा करता है । अततिद्यायोक्ति निश्चयात्मिका दोती है इसलिए उससे भी यह [ उत्तरका | 
भिन्न है। ग्रन्थकार जो यह करेगे कि वद साध्य होता है जिसमें विषयी की प्रतीत्ति असत्य रूप 
से होती है वह वास्तविक स्थिति को मन मेँ रखकर [ न फि काल्पनिक अथवा प्रात्तिम स्थित्ति को ] 
ठेसा समञ्चना चाहिए । 


श ह 
1 गि , "णावा 


उत्प्रक्षालङ्कारः १८९ 


इस प्रकार विषय के निगीयंमाण होने तथा विषयी छा निश्चय होने से यही सिदध होताहेै 
कि यह = उत्प्रेक्षा आध्यवसायमूल्क है, इसलिए अन्थकारोक्त लक्षण ही सोच-समञ्चकर बनाया 
गया लक्षण है- [ पयांलोचिताभिधान ] । इस कारण अधिक क्या इतना कहना पर्याप्त है कि-- 

“उत्प्रेक्षा सवत्र संयते ही होती हे, अध्यवसाय से कही भी नहीं, वेयोकि इसमे “इवः-आदि 
का प्रयोग रहता दै, अतः निश्चय नहीं रहता तथा विषय का उपादान राब्दतः रहता है"-- 
[ अलंकाररत्ना० ०५१ |] 

--इत्यादि कथन सवधा युक्तिशन्य हें । 

विमश्ञः--विमरिनी के अनुपदोक्तं विवेचन का आधार अलकाररत्नाकर का पूरवोदधूत विवेचन 
से लगातार आने का यह विवेचन हे- 

न च '्पा स्थली ° इत्यादावरब्दत्व(देः मोनित्वादिना अध्यवसितत्वाद्‌ निभमित्तविषयोऽध्य- 
वसायः इति वाच्यम्‌ । सवत्र निमित्तविषये अध्यवसायस्य सिद्धत्वेन साध्यत्वाभावाननिभित्तापेक्षया 
चाध्यवसायाङ्गीकारे उपमादीनामध्यवताय एव लक्षणं स्यात्‌, तेन आरोपगभंवेयम्‌ । कचित्तु विषया- 
नुपादान आरोपगभंत्वाभावान्निश्चयरूपां भावे अध्यवसायगमांसपरेक्षेति वाचोयुच्छिरुचितेव तद्गभे 
सन्देहवत्‌ । विषयनिगरणाख्यस्य सुख्यस्य॒ तद रास्य सिद्धत्वात्‌ । सभावनायां च संभाव्यमानस्य 
दार्व्या अपरस्य च शेथिल्याद्‌ इह संभाव्यमानस्य विषयिणः शाब्देन इृत्तेन सत्यत्वं न त्वितरस्य । 
वस्तुतस्तु विषयिणः सत्यतातिदायोक्तो अपि नास्तीति तत्रापि विषयिणः सत्यते्ति न वाच्यं स्यात्‌ । 
अत एव सापहवायां विषयस्येवासत्यत्वात्‌ अपहवः अन्ययथेतरस्यैव स्यात्‌ । इयं च धमं वा धम्यैन्त- 
रत्वेनो्प्कष्यते धमां वा धमान्तरत्वेनेति प्रथमं द्विभेदा । आया शाब्दत्वाथैत्वभेदाद्‌ आरोपस्य 
द्विविधैव । द्वितीयापि षमेरूपविषयोपादाने आरोपगर्मां । अत्र च प्रधानभूतधम्युंपसजंनात्मकविद्ेष- 
णीमूतानां धमाणां परस्परं ॒विदेष्यविदेषणमावानुपपत्तौ सामानाधिकरण्यामावादाथै एवारोपः ! 
अनुपादाने तु अध्यवसायगभां । आरोपगसें तु भेदत्रये विषयापहवानपहवाभ्यां दैविध्यम्‌? । 

(वादो निश्चयामावाद्‌ विषयस्य परिग्रहात्‌ । कचिदध्यवसायेन नोष्परेक्षापि तु संशयात्‌ ॥ 

-- इति संग्रहः । 

--णेसा नहीं कह सकते कि “एषा स्थली" प्य मे अराब्दत्व आदि मौनित्वं आदि के द्वारा 
अध्यवसित हं अतः यहा निमित्तमिषयक अध्यवसाय हे, क्योकि एक तो जहौ-जहां निमित्त के 
ऊपर अध्यवसाय होता हे वहां अध्यवसाय सदा सिद्धदही होता है, साध्य नहीं; दूसरे यदि निमित्त 
को लेकर अध्ययसाय मान ख्या जावे तो उपमा आदिमे भी अध्यवस्ायको ही लक्षण मानना 
होगा। इस कारण उत्प्रेक्षा की आरोपसे ही युक्त मानना चाहिए ) हँ, कहीं-कहीं जव विषय का 
कथन नहीं रहता वहाँ उत्प्रेक्षा को आरोप से युक्त नहीं माना जा सकता, साथ ही वहाँ निश्चया 
मी रहता है अतः वहां उश््रेक्षा को अध्यवसाय से युक्त माना जा सकता है, जेते कि उसे स्देह 
से युक्त माना जाता हे । यह इसङिए किं रेते स्थ मे 'विषयनिगरणः-रूप उस [ अध्यवसाय ] 
का सुख्य अश्च सिद्धरूप से विययमान रहता हे। किन्तु संभावना मे संभाव्यमान ही दृढ बनाया 
जाता ह ओर दूसरे को शिथिल कर दिया जाता है फलतः इसे संभान्यमान विषयौ ही शब्दतः 
सत्य प्रतीत हदोताहेःन कि दूसरा [ विषय ]। परमार्थतः तो सच यह है कि विषयी की सत्यता 
स्व॑यं अतियोक्ति में ही नदीं रहती [ जिसका प्राण ही है अध्यवसाय ] इसलिए उष्परेक्षा मे मी 
विषयी कौ सत्यता रहती है एेसा नहीं कना चाहिए । सीलिए सापहवा उत्प्रेक्षा में विषय हौः 
असत्य माना जाता है ओर उसी का अपहव स्वीकार किया जाता है। रसा न हो तोदूसरे 
[ विषयी ] का ही अपहव स्वीकार किया जाने लगे । 


*₹२.० अलङ्कारसवंस्वम्‌ 


यह [ उत्का ] प्रधानरूप से दो प्रकार की होती दहै। णव तो वह जिसमे धमी किसी अन्य 
धमीकेरूप मे उत्पेक्षित रहता है ओर दूसरी वह जिसमें धम किसी अन्य धमेकेरूपमें। इनमें 
से प्रथम दो प्रकार की होती दै शाब्द ओर आथै,क्योकिआरोपमीदो ददी प्रकार का होता डे । 
दूसरी जो है वह भी धमं का उपादान दोने पर तो आरोपयुक्त होती दै ओर यदह आरोप ञं 
ही होता है क्योकि इसमे प्रधान र्ता है धर्मी ओर धर्मौ मेते सव उसी धमी के विदोषण कै रूप 
म प्रयुक्त रहते दै फकतः उनका परस्पर मे टेक्य नहीं हो पाता । मोर यदि विषय का उपादान 
नदीं रहता तो यही उत्प्रेक्षा अध्यवसाये युक्त मानली जाती हे। जो मेद आरोप से युक्त 
होते हैँवे मीदो प्रकार के होते देँ सापहव तथा निरपहव। इस संपूण विवेचन का सार यह 
हेकि ~ 
उत्प्रेक्षा सवत्र संचय से हो होती है, अध्यवसाय से कदीं मी नदी, क्योकि इसे 'इव"--“मार्नो" 
आदि का प्रयोग रहता दै । अतः निश्चय नदीं रह पाता ओर विषय का उपादान शब्दतः रहा 
करता हे। [ अर० रत्ना० प° ४८; ५१ ]। 


| सवस्व ] 


सख च द्विविघः-लाध्यः सिद्धश्च। साध्यो यत्र विषयिणोऽस्व्यतया 
धतीतिः। असत्यत्वं च विषयिगतस्य धर्मस्य विषय उपनिबन्घे विषयि- 
संभवित्वेन विषयासंभवित्वेन च प्रतीतेः! धर्मो, गुणक्रियारूपः तस्य संभ- 
वाखंभवप्रतीतौ संभवाश्रयस्य तत्रापरमार्थ॑तया असत्यत्वं प्रतीयते, इतरस्य 
तु परमाथेतया सत्यत्वम्‌ । यस्यासत्यत्वं, तस्य सत्यत्वध्रतीतावध्यवसायः 
साध्यः । अतश्च व्यापारप्राधान्यम्‌ । सिद्धो यत्र विषयिणो. वस्तुतोऽसत्य- 
स्यापि सखत्यताध्रतीतिः। खत्यत्वं च पूवंकस्यासत्यत्वनिभित्तस्याभावात्‌ । 
अतश्चाध्यवल्ितप्राघान्यम्‌ । तत्र साध्यत्वप्रतीतो व्यापारभ्राघान्येऽध्यव- 
सायः संभावनमभिमानस्तक ऊह उस्पेश्चेत्यादिराब्दे रुच्यते । तदेवमप्रकृतगत- 
गुणक्रियाभिसंवन्धाद्प्रकतत्वेन धक्ृतस्य संभावनसुस्पेश्चा। सा च वाच्या 
इवादिभिः प्रद्श्यते। भरतीयमानायां पनरिादयप्रयोगः। खा च जातिक्रिया- 

पि 

युणद्रन्याणामप्रकतान।मध्यवसञेयत्वेन चतुग । प्रकृतस्य तद्ेद्योगेऽपि न 
वं(चञयमिति न ते गणिताः । व्रत्येकं च भावामावाभिमानरूपतया दे विध्ये ऽष 
बिधत्वम्‌ । मेदाष्टकस्य च प्रयेकं निमित्तस्य गुणक्रियारूपत्वे षोड भेदाः । 


तेषां च प्रत्येकं निमित्तस्योपादानायुपादानाभ्यां इा्चिशत्पभेदाः, तेषु च 


पव्येकं देतुस्वरूपफनल्रोत्पेश्चणरूपत्वेन षण्णवति्भेदाः । पषा गतिवी- 
च्योस्मरक्षाया, । त्रापि दभ्यस्य भायः स्वरूपोत्परक्षणमेवेति देतुफल्मर- 
त्मक्चाभेदास्ततः पातनीयाः । प्रतीयमानायस्तु ययप्युद्‌ देदचत एतावन्तो 
भेदाः, तथापि निमित्तस्यादुपाद्‌नं तस्यां न संभवतीति तैभदे-युंनोऽयं 
पकारः । इवायदपादाने निमित्तस्य चाकीतेने उत्पेश्चणस्य निष्प्रमाण- 
त्वात्‌ । प्रायश्च स्वरूपोस्परक्षाया यथासंभवं मेदनिदेराः । 


उत्परक्षाचङ्ारः ६९१ 


एषा चाथाश्चयापि घमेविषये रश्ठष्खन्ददेतुका कचित्पद्‌ार्थान्वयवेला- 


यां सारश्याभिवानादुपक्रान्ताप्युपमावाक््यायेतात्पयंसमर्थ्याभिमन्ठव्या- 


पारोपायेदक्रमेणोत्परक्चायां पयवस्यति । क्वचिच्छकादिराब्द्धभयोगे साप- 
हवात्प्रेक्ला भवति । अतश्योक्तवक्ष्यमाणप्रकारवेदिच्येणानन्त्यमस्याः । 

[ बृ० ] वह्‌ [ अध्यवसाय ] दो प्रकार का होताहै ८१) सिद्ध ओर (८२) साध्य) साध्य 
वह॒ जिसमें विषयी असत्यरूप से मासित होता है । असत्यता इसरिए किं विषय मै अस्तित्व 
दिखाने पर विषयिगत धर्मक रेसी प्रतीति होती हे जिसमें वह विषयी मे तो संमव प्रतीत 


होत। हे किन्तु विषय मे असमव । धम होता है युणरूप ओर क्रियारूप । इसकी जो रसंभवात्मक 


ओर असंमवात्मक प्रतीति होती है । उसमे सभवात्मक में धमे अपारमायिक अर्थात्‌ काल्पनिक ओर 
इसीलिए असत्य प्रतीत होता है। ठीक इसी प्रकार दूसरा पारमाथिक = वास्तविक ओर सत्य । 
अव जो असत्य होता है उसकी सत्यरूप से प्रतीति हो तो अध्यवसाय साध्य होतादहे। इसीलिए 
उसमें प्रधानता व्यापार की मानी जाती हे! सिदध अध्यवसाय वह्‌ होता है जिसमे विषयी होता 


तो वस्तुतः असत्य हे किन्तु उमर प्रतीति होती हे सत्यता कौ । यहो सत्यता का अथं है पूवेप्रतीत 


असत्यत्व प्रतिपादक हेतु का अभाव । इसीलिए इसमे प्रधानता अध्यवसित [ विषयी |की रहती 
हे । इनमें जिस अध्यवसाय में साध्यता ओर व्यापारप्रधानता रहती है उसमे संभावनातत्व का 
कथन तकी, ऊद्‌; उत्प्रक्षा आदि राब्दांसेहोतादहे। इस प्रकार अग्रक्तगत गुण ओर क्रिया के 
संबन्ध से अप्रकृतरूप से मक्त की संभावना उस्प्रत्ता कहलाती है । यह जब वाच्य रहती 
हे तव इवादि राब्दों का प्रयोग रहता है ओर जव प्रतीयमान तब इवादि का प्रयोग नद्यं रहता । 

यह्‌ उत्प्रेक्षा चार प्रकारकौी होती हे क्योकि इस्मं जात्ति, क्रिया, गुण ओर द्रव्यये चार 
अप्रकृत अथं अध्यवसेय [ संभाव्य ] होते है । ये चारों भेद प्रकृत पदाथ में भी हो सकते है चिन्त 
उने कोड चमत्कार नदीं होता इसकिए उन्हे छोड दिया गया है । 

उत्प्रक्षाकेये चारों भेद भावरूप होते है ओर अभावकूप भी । अतः इनकी संस्या आठ हो 
जातौ है। इन आं मेदं मे निमित्त गुणरूप होता है या क्रियारूप अतः सोलह हो जाते हे । 
इन समी मेदो मे निमित्तदो प्रकारका होता है ८१) उपात्त ओर (२, अनुपात्त। अतःये दी 
१६ भेद ३२ हो जाते हें । इन वत्तीसों भेदो में उग्रक्षणीय पदार्थंके हेतुरूप, स्वरूप रूप तथा 
फलरूप होने से मेदो कौ संख्या छियान्नवे हो जाती है । यह संपूणै पपच वाच्य उत्प्रेक्षा कादहै। 
इनमेदोमे मी जो द्रव्योत्परक्षा हे उसमे उत्प्रेक्षा केवल स्वरूप की ही होती है, अतः उसमे से रोष 
दो हैतूत्परक्षा तथा फलोत्प्रेक्षा पर आसित भेद घटा दिए जाने चाहिए । प्रतीयमानोत्प्रक्षामे मी 
इतने मेद हाते हें किन्तु केव नामतः क्योकि उसमे निमित्त क। उपादान नहीं रइता । अतः 
उप्परेक्षा के इस प्रकार में तने मेदो की कमी आ जाती है क्योकि (इवः आदि का उपादान न होने 
तथा निमित्त का भी उस्लेखन रहने से उत्परक्षा माननेका कोद आधार दोष नहीं रह ज।ता ! इसके 
अतिरिक्त प्रायः इस उत्प्रेक्षा में स्वरूपोत्प्रक्षा संभवं नहीं होती । इस प्रकार प्रतीयमान उत्प्रेक्षा 
केवे ही भेद वतलाए जाने चादहिएजौ संभवदहों। [ अगे उपहार विममे ये सव मेद स्पष्ट 
कर दिएगणएदहं]। 

यद [ उग्प्क्षा ] हे तो अर्थालंकार अतः होना तो च।हिए इसका आधार केवल अथ ही तथापि 
इसमे जव कभी भम॑ विषय वनता हे तव इसका आधार रिष्ट शब्द मी वन जाता है । 

कदी -कदीं सादररय का राब्दतः कथन रहता है अतः आरम्भमें जहां पदार्थोका परस्परमें 


संबन्ध होता हे वहां उपमाकी ही प्रतीति दोती है तथापि प्य॑वसान उप्रेक्षामं ही होता दै, 


१९२ अल्ङ्कारस्वेस्वम्‌ 


कारण कि वाक्याथ का तात्पये उसी में रहता है मरौर इसका बोध होता हं वक्ता [ अभिमन्ता | की 
मानस-प्रवृत्ति [ व्यापार | कौ अन्तिम सीद्ी पर [ वोद्धाके चित्त द्वारा] चढने पर [ उपारोह 
करने पर ] । 

कहीं यही उत्प्रेक्षा अपहव से मी युक्त दोती दे जहौ छल आदि रान्दोका प्रयोग रहता हे! 
इन कारणों से पूरवाँक्त तथा आगे के जाने वाले भेदं के आधार पर शस [ उत्प्रेक्षा] केषेदोकी 
संख्या अनन्त हो जाती है । 

विमरिनी 

एतदेव व्याचष्टे- विषयेत्यादिना । अभेदप्रतिपत्तिरिति विषयान्तःकरणात्‌ । संभावना- 
प्रत्ययाव्मकष्वेऽपि साध्याध्यवसायस्य वस्स्वभिप्रायेण तद्धेकत्तण्यं प्रदशंयितुमाह-साध्य 
इत्यादि । विषय परिशोधनद्वारेण म्रमाणानुम्राहकल्वात्संभावनाप्रत्ययस्य पुरूषेणनेन 
भवितव्यमिव्यन्र वस्तुच्रत्तेन पुरषस्य सत्यत्वम्‌ । इह पुनस्तत्र तस्य प्रयोजनपरतयाध्य- 
वसीयमानत्वातसंभाव नाविषये संभाव्यमानस्य वस्तुतो न सव्यत्वमिव्याह-असत्यतया 
प्रतीतिरिति । अत्रेव निमित्तमाह-असत्यत्वं चेत्यादि । विषय उपनिबन्ध इत्ति। तद्धतधर्मा- 
मेदे नाध्यवसित इष्यथंः । अनेन सम्रयोजनत्वमेबो पोट क्तिस््‌ \, धर्म इति विषयिगतः । स 
एव चोस्परेच्चणे निमित्तम्‌ । तस्येति धमस्य । संभावनाश्रयस्येति विषयिणः । तन्नेति संभाव-~ 
नाश्रये विषये । इतरस्येति असंभवाश्रयस्य विषयस्य । यस्येति विषयिणः । अतश्चति । 
अध्यवसायस्य खाध्यमानव्वात्‌ । असत्यस्यापीति । वस्त॒तो विषयिणस्तच्राखंभवात्‌ ! सत्य- 
ताप्रतीतिरिति। निश्चवयस्वभावव्वादतिश्योक्तः। असव्यदवनिमित्तस्येति धमंसं चारादेः । 
अतश्चेति धर्मस्ंचारान्निगीयमाण्तायाः प्राधान्याभावात्‌ । अध्यवसितप्राधान्यमिति । विषय 
स्य निगीर्णस्वाद्विषयिण एव प्राधान्यमित्यथैः । खाध्यत्वसिद्धत्वयोश्च समनन्तरमेव 
स्वरूपञ्चुपपादितमितीद न पुनरायस्तम्‌ । तत्रेति द्वयनि्षरणे । अध्यवसाय इत्यादि. 
दाब्देरुच्यत इति संबन्धः । एतदेवोपखंहरति-तदेवमित्यादि । यद्‌ाहुः--"विषयिसवेन 
संभावनयुरप्त्ताः इति । प्रतीयमानायामिति । इवाद्यप्रयोगाच्छब्दानुक्तत्वादूद्यायां न व्य. 
ङ्यायाम्‌ , अलंकार प्रमदानां प्रतिपिपादयिषितव्वाद्‌ व्यङ्गधभेदासिधानस्याप्रस्तुतसवात्‌ 1 
एव वाच्या प्रतीयमाना चोस्परेत्ता भवतीव्यनुवादद्वारेन विधिः। सा चेति । वेचिच्यमिति \: 


तस्य निगीर्यमाणव्वेनाप्राघान्यात्‌ । प्रत्येकमिति जाव्यादीनाम्‌ । निमित्तस्येति धमंस्य ।. 
तद्वशादेव हि प्रककतगतत्वेनाप्रकरतोपनिवन्धः । देतुस्वरूपफरुखच्षणमेवास्या भद्न्रयं 
जीवितभूतमिति तदेव विश्रान्तिधामतया पश्चादुदिष्टम्‌ । जास्यादिमेदगणनं पुनरवेचिच्या- 


वहमपि चिरंतनानुरोधाल्छृतम्‌ । अत एव ग्रन्थङ्ृता प्रातिपद्ेन नोदाहृतम्‌ । अस्माभिश्च 


नो दाहरिव्यते । एषेति । समनन्तरोक्ता । तत्रापीति । सव्यामपि सखमनन्तरोद्िष्टायां सद~ 
गणनायाम्‌ । प्रायःकब्देन च देहफल्योः कुत्रापि संमवोऽस्तीति द्ितम्‌ । अत ए्वा- 
खंकारानुखारिण्यां म्रन्थछतानयोरपि संमवो दितः । तदेवं दभ्यस्य हेतुफख्योः संभवे 
म्ागुक्तेव संया उयायस्ी । अन्यथा सेवद्मेदषोडकाकष्याभाधादशीति्मेदाः। अस्याश्च 


वचयमाणनीर्या हेतुफख्योर्निमित्ताचु पादा नासंभवाचतुःषष्टिरेव भेदाः खंभवन्ति । एतावन्त 
इति षण्णवतिः ! अयं प्रकार इति । ग्रतीयमानोस्परेचाखक्ञणः । प्राय इति । वाच्या यथा 
स्वरूपोसप्रे्ठा रुचेषु प्रचुरा तथेयं न भवतीव्यथः। न पुनरव्यन्तमेवास्या अभावो 
व्याख्येयः । कचिदपि खचयेऽस्या दृष्टेः । यथासंमवमिति खचये मेदनि्द राः कायः । तस्या- 


श्वा्टचरवारिंशदु मेदाः संभवन्ति । तदुक्तमरुकाराचुसारिण्याम्‌--श्रतीयमा नोप्प्रच्तामेद्‌ए 


# की - ज 


[कि - 


उत्प्रक्षालङ्कारः १९६ 


अष्टचत्वारिंशत्‌ इति । अधाश्रयापीति । अर्थाश्रयस्य यद्यपि शब्दहेठकस्वं न क्ाप्युपयुक्तं 
अ चि = $ 

तथापि रिलष्टशब्दृहेठ्‌ कस्वमस्याः क्रचिद्वं चिन्यमावहतीत्य्थः। उपमा उस्प्रन्तायां पय॑वस्य- 

तीति संबन्धः । आनन्त्यमिति बहु प्रकारस्वम्‌ । 


इसी [ उतपरक्षासूत्र ] की व्याल्या करते दै--विषय-[ निगरणेन ] इत्यादि के द्वारा । 

अभेदप्रतिपत्ति = अभेदप्रतीति क्योकि विषय [ विषयौ के | भीतर चछ्िपि जाता है। (सिद्ध 
अध्यवसाय के ही समान ) साध्य अध्यवसाय भी संभावनाज्ञानात्मक होता है तथापि वस्तु = 

ज्ञान के विषयकीं दृष्टि से उस [ सिदध अध्यवसाय ] से इस [ साध्यअध्य० ] का भेद बतटाने 
के लिट ङ्खा- साध्यः इत्यादि । जो संभावनाज्ञान प्रमाण = यथार्थज्ञान के कारण को [ यथाथै- 
ज्ञान करनेमं) सहायता देता हे उस्म [ रस्भावनाके ] विषय का विवेक निहित रहता है। 
विवेक का स्वरूप रहता है- [ पुरोवत्तीं ] इस पदाथ को [ स्थाणु नदीं ] पुरुष होना चा्िए यह्‌ । 
इसमे पुरुष की सत्यता वास्तविक होती है [ जहाँ तक साध्य अध्यवसाय का सम्बन्ध है ] इसमें 
उस [ पुरोवर्ती पदाथे ] पर इस [ पुरुष ] का अध्यवसाय प्रयोजनवशात्‌ प्रतिपादित किया जाता 
हे इसलिए संभावना कै विषय पर॒ संभाग्यमान वस्तु की वस्तुतः सत्यता नहीं रहती । इसी का 
म्रतिपादन करते हर किखा--'असधष्यतया' प्रतीतिः = असत्यरूप से प्रतीति" इत्यादि । असत्यता 
मे कारण वतरते इए लिखा-असत्यत्वं चः = भौर असत्यत्व-- इत्यादि । "विषय उप- 
निबन्धः" = “विषय मं उपनिवन्धः = अस्तित्व दिखलाना = भर्थात्‌ विषयगत धर्मका अमेद कर 
अध्यवक्तित करना । इसरो सप्रयोजनत्व की पुष्टि की गई। धर्म अर्थात्‌ विषयिगत धम । उत्वरेक्षा 
मे निमित्त वही वनता हे। तस्य = उसका अर्थात्‌ धर्म॑का। संभावनाश्रयस्य = संभावना के 
आश्रय अथात्‌ विषयौ का । तन्न = उसमे अर्थात्‌ संभावनाश्रय विषय में। इतरस्य = अन्य का 
अथात्‌ असंभवाभ्रय विषय का । यस्य = जिसका अथात्‌ पिषयी का । अतश्च = ओर स्सङ्िएट = 

क्यांकि अध्यवसाय साध्य है इसलिए । असस्यस्यापि वस्तुनः = वस्तु के असत्य होने पर 
भी-क्यांकि विषयी का अस्तित्व वहां वास्तविक नदीं केवर काल्पनिक होता है। खस्यता. 
रतीति = क्योकि अतिशयोक्ति निश्चय पर॒ निभैर रहती है। असत्यत्व निमित्तस्य = असत्यत्व 
प्र निभेर = इसङ्एि कि इसमे [ अन्य के ] धमका [अन्यम] संचार रहता है। अतश्च = ओर 
इसलिए = धमंसंचार के कारण निगी्य॑माणता की प्रधानता न रहने के कारण “अभ्यवसित- 
प्राधान्यम्‌ = अध्यवसित की प्रधानता" = अथं यह्‌ कि विषय के निगी्य॑माण रहने से प्राधान्य 
विषयो काही रहतादहै। साध्यत्व ओौर सिद्धत्व का भेद अभी-अभी बतला आण है, इसछिए 
गन्थकार नै उसके लिए पुनः यहाँ आयास नदीं किया । "तन्न = उनमेः यह दोनों के क्षेत्र भख्ग- 
अलग करने के लिए लिखा । इसका संबन्ध है .अध्यवास०००० इत्यादि शब्दों से कदा जाता है" इस 
अद्रासे | श्सी का उपरुहार करते हए छ्खा-^तदेवम्‌=तो इस्र प्रकार । जैसा कि कहा है "विष- 
यित्वरूप से सुभावन उत्प्रक्षा-[अलकाररत्नाकर०] । प्रतीयमानायाम्‌ = प्रतीयमान उत्प्रेक्षा मेः 
इवादि का प्रयोग न रहने से शब्दतः कथन न रहने के कारण उद्य = [ ऊहा = तकँ = तद्विषय ] 
म,न कि व्यग्य मे, क्योकि यषां प्रतिपादन अभीष्ट है भल्कारों के मेदो का, अतः यदि प्रतीयमान 
का अथं व्यंग्य किया गया तो वह अप्रस्तुत होगा । इस प्रकार “उत्प्रेक्षा वाच्य ओर प्रतीयमान 
होती है'-इस प्रकार उत्पक्षा के वाच्यत्व ओर प्रतीयमानत्व का विधान इवादि क प्रयोगाप्रयोग 
के विधान के दारा किया गया । सला च = ओर वदुः । "न वेचिन्यम्‌' = "कोई वेचिच्य = चमत्कार 
नहीं होताः क्योकि वहु [ विषय ] निगीरय॑माण होने से अप्रधान रहता है । “रत्येकम्‌ = प्रत्येकः 
का? = जाति जादि मे से प्रत्येक का। "निमित्तस्य = निमित्त का" = धमं का क्योकि उसी के आधार 


१२ अ० स 


९९७ अलडनरसवस्वम्‌ 


यर प्रकृत पर अप्रकृत का उपनिवन्ध रहता दै तु, स्वरूप तथा फल! ये दी तीन मेद इस [उत्प्रेक्षा] 
के प्रधान मेद है इसछ्ए वे हयी विश्रान्तिस्थान = वाक्या्थपय॑वसान विषय है, अतः धनः जो भद्‌ किट 
उनमें इन्दी तीन मेदो को दोहराया गया । चमत्कार तो जात्यादि भेदकौ गणनाम मी नदं हे 
तथापि प्राचीन आरुंकारिकों ने इनकी गणना की है इसलिए इन्दं यदहो वतलाया गया दे। इसी 
ग्रन्थकार ने उननें से प्रत्येक का उद्राहरण नहीं दिया, आर हम मी प्रत्येक का उदाहरण नदादग। 
“एषा = यह्‌ = अमी-अमौ कथित उत्प्रेक्षा । (तत्रापिनउतने पर भीः-अथांत्‌ उपरोक्त मदगणना के 
रहने पर मी । प्रायः दन्द के प्रयोग से यह वतखाया वि उत्प्रक्षाके इस प्रकारमं देतूत्प्रशा तथा 
फलोत्प्रेक्षा मी कहीं संभव होती ई । इसीटिएट 'जलटकाराज्चुसारिणीः मेँ अन्धकारने इन दोर्नौ 
भेदं का भी संमव दिखलाया हे । तो इस प्रकार द्रव्योव्परेक्षामें मीदेतु ओर फल के संभव होने 
ते वही संख्या अधिक उपयुक्त है जो अभी-अमी वतखादं गंदे, नदींतो इन सोलह यदो 
की कमी हो जने ते उस्प्रे्ठा की कुर मेदगणना केवर अस्सी तक पर्हच सकेगो । इस उत्प्रेक्षा के 
केवल चौसठ मेद होते है क्योंकि इसमे होने वाखी हेतृत्परक्षा ओर फलोप्प्र्षा मे, जेसा कि आगे 
बतलाया जाने वाखा दे, निमित्तानुपादान संमव नहीं होता । "एताचन्त एव = इतने दीः छिय।न्नबे 
ही । “अयं प्रकार = यह्‌ प्रकार = प्रतीयमानोत्प्रक्षारूप प्रकार । प्रायः = अर्थं यह्‌ कि जिस 
प्रकार वाच्य स्वरूपोत्परक्षा के स्थर अधिक मिलते है उतने इस [ प्रतीयमाना] के नदीं) यह 
नहीं किं इसके स्थर विलङुल ही नहीं मिरते । क्याकि कर्ही-कदीं यह भी दिखाई देती है 'यथा- 
संभवम = यथासंभव? = अर्थात्‌ लक्ष्य मँ जितने भेद हो सके उतने दी सेदो का निर्दद्ा किया 
जाना चाहिए । एेसा करने पर इसमे केवर ४८ मेद ही होते हँ । जेसा कि अलंकारानुसारिगी 
मे कदा है-- प्रतीयमान उष्परक्षाके भेद ४८ ही होते हँ । “अर्थाश्रयापि = अर्थं पर आश्रित 
होने पर भीः=जो अथं पर आध्रित या निभर रहता है उसमे चब्दहेतुकता कहीं मी उपयुक्त 
नदीं तथापि रसम दिरष्ट्नब्दहेतुक्ता मी करी कहीं चमत्कारकारिणी दोती है । “उपमा उत्प्रेक्षा 
में पय॑वसित दो जाती है"-दस प्रकार की पदाश्योजना यरा [ कचित्‌ पदार्थान्वय ०० वाक्य में ] 
विवक्षित हे । आनन्त्यम्‌ = अनन्तताः = प्रकारो की वहुतायत । 


| स्वेस्व | 


साध्रतं त्विय दिच्वात्रेणोदाहियते । तज जात्युत्प्रेक्षा यथा-- 
स वः पायादिन्दनेववि नटठताकोरिकटिलः 
स्मरारर्यो मूध्नि ज्वलनकपिशो भाति निहितः । 
खवन्मन्दाङ्किन्याः प्रतिदिवससिक्तेन पयसा 
कपालेनोन्परुक्तः स्फटिकधवदेनाङ्कर इव ॥।' 
अघाङ्करदाभ्दस्य जातिशञ्इत्वाज्ञातिरुत्पेक्ष्यते । 
[ब्र | अव इस [ उत्प्रेक्षा ] के दिग्ददोन के किट कतिपय उदाहरण प्रस्तुत किर जाते दहै । 
पिके उक्त मेदो मे से जाद्यु्प्क्षा का उदाहरण, यथा- 
आपकी रक्षा वह चन्द्र करे, नवीन कमल्ककड़ी [ विसलता ] कौ नोक-सा कुरिक, कामारि 
[ चिव | के माधे पर निहित, अत एव [ वृतीय-नेत्रकी ] अग्निस पीला होने से जो रेसा लगता 


देजेसे [िवके ही] निरन्तर बहती मन्दाकिनी से प्रतिदिन सिक्त स्फटिकधवल ललाट 
[ कपा; न किं खप्पर | से फूट पड़ा कोड अंकुर दो ॥' 


" ऋ 
॥ 


उत्पेश्चाठङ्गारः १९५. 


-- यहां अकुर शब्द जात्तिवाचक राब्द हे इसकिए उत्प्रेक्षा जा्तिकी ही दहो रही ङ्े। 

विमशेः-- संजीविनी के अनुसार यदह कुटिलतारूपी युण कारण है । अंकरञब्द जाति का 
वाचक हं। इशसछि यह उत्प्रेक्षा उपात्त ग्निसित्ता मावाभिमानकूपिणी जात्युत्परक्षा इड! यहाँ 
स्वरूपमात्र कौ स्त्प्रक्षाहे,नदेतुकौयौर्‌ न फलकी, जव किं मेद प्रतिपादन में पहले हेतु की 
उत्प्रेक्षा वतराड गड है उसके वाद स्वरूप कौ । इस प्रकार यहं गणनाक्रम का विरोध है । इससे 
यह सिद्ध होताद्‌ कि अन्यद मेदो के उदाहरण देना मन्थक्रार को अभीष्ट नहीं हे । 

यह्‌ “ञवलनकपिशो' के स्थान पर नि० सा० संस्करण ओर मोतीलाल बना० सस्करण में 
'उवलनकषिरोः छपा इ । वामन कौ कान्यालकारतूत्रदृत्ति तथा चित्मीर्मांसा म भौ यही पाठ 
मिल्ताहे। इसपार्मे इस विेषण को मूधा" का विद्धेषण माना गया है । किन्तु “चन्द्रकखाः 
को अष्ररूप से प्रतिपादित करनेके कए ्सी में पीलापन वतलाया जाना उचिते माल्के 
पीलेपन का यह कोड उपयोग नहीं है । अतः हमने इसे “उ्वरनकयपिदोः वना दिया है। इसी 
प्रकार कपालः का अथं दहिवके गलेको सुण्डमालाका कपाल या खप्पर करनामी गरुत है 
क्योकि गंगा द्वारा अभिषेक दिव के ल्कारका हौ प्रसिड हे, अन्य कपारूका नहीं। फिर सिर 
पर स्थित चन्द्रमा पर अर की कल्पना करने के छि उसका उत्पत्तिस्थान सिरके पासका 
र्कार ही मानाजा सक्तादे गकलम पड़ा सुण्ड अथवा हाथमे रखा खप्पर नहीं । य्ह अंकुर 
के तीन धमै, चन्द्रकला मे वतलाए गए है- सफेद, पीलापन तथ। टेदापन । इसमे के सफेदी ओर 


टेदृषन के ल्द उरे कमलिनीकी जङ्‌ से मिलाया गया है मौर पल्पन के छिए ज्वरनकपिश 


बतलाया गया हं । अकर मी सफेदी, पीरेपन तथा टेदृपन से युक्त रहता है । 

यहं निहित का अथं गडा हुआ करना व्यथ है।, द्यपि निहित, निधान; निधि आदि. 
राब्द मूलतः गड़ हए पदाथ केही प्रत्तिपादक दाब्दं हैः। यहं निहित के स्थान पर विधृत भी 
का जा सक्ता ह । विस का अथे कमल की नार नहीं कमल की जड दता है। डो वाखदेवद्रणजी 
ने काद्म्वरो : एक स्सछृत्तिक अध्ययन" मे कमलककड़ी सर्वथा उचित कहा हं । नाल तो हसी होती 
दे । इसी प्रकार अर शाब्द फल ओर पुष्पके ही उद्वेद ॐ खिट प्रयुक्त होतादहे, नकिं नकरीन 
पत्ते के लिए । तदथ किसलयः शब्द का प्रयोग होता है । फिर चन्द्रमा कौ सोलदवौं कला को पल . 


के समान दौ भी नदीं सकती । किसलय मी लकोहके किटि प्रसिद्ध होता है पील्पनंके लिए: 


नहीं । इसमे वक्रता भी नहों रहती । अंकुर सामान्यतः पीलेपन के छ्णि ही प्रसिद्ध होता हे। . 


रलो के किए बहुत कम । उसमे वक्रता भी अप्रसिद्ध नहीं । 


[ सवस्व | 
क्रियोत्प्रेक्षा यथा- 
लिम्पतीव तमोङ्गानि वर्षतीवाञ्जनं नभः ।› 
अचर ठैेपनवषणक्रिये तमोनभोगतस्वेनोस्परक्षयेते । उत्तरां त॒ 
असत्पुरुष्रसेवेव दष्िनिष्फलतां गता ॥' 
इत्यत्रोपमेव नोतपश्चा । 
गुणोत्प्रेक्षा यथा- 
६ ९ # ४4 
संघा स्थली यन्न विचिन्वता त्वां खं मय। नू पुरमेकषुव्यौम्‌ ¦ 


अद्यत त्वच्चरणारविन्द्विर्छेषदुःखादिव बद्धमौनम्‌ ॥' 
अत्र दुख गुणः | | | 


१९द अलङ्ारसवस्वम्‌ 


द्रभ्योत्पेश्चा यथा- 
पातालमेतन्नयनोत्सवेन विखोक्य दध्यं स॒गलाञ्छनेन । 
इहाङ्नाभिः स्वसु खच्छठेन छताम्बरे चन्द्र मयीव खष्टिः ।।' 

अच्च चन्दस्यैकस्वाद्‌ द्रव्यत्वम्‌ । पतानि भावाभिमाने उदाहरणानि । 

[ वृत्ति ] क्रियोत्प्रेक्षा यथा- 

(अन्धकार अग अगको लीप सा रहा दे। 
| आका कस्नलवृष्टि सी कर रहा है ।-खच्छकरटिक ] 

यहाँ तम ओर नभ | रूपी धमी ] मेँ क्रमशः लेपनक्रिया तथा वणक्रिया [ रूपी धर्म॑] 
की उत्प्रक्षाकीजारहीदहै।[ इस पद्य के ]- 

धृष्टि असत्‌ पुरुष की सेवा की नां विफल हो गड है ।? 

-- इस उत्तराधं मे उपमा ही दे; उत्परक्षा नदीं । [ सामान्यतः क्रियापद के साथ प्रयुक्त इवः 
पद उत्परक्षावाचक होता है । उन्तराधं में वेसा नदीं हे वस्तुतः 'वष॑तीवाज्ञनं नभः-मं भी द्रव्यो 
प्रक्षा ही है क्योकि वदँ कस्नल की ही उप्परक्षा में कविसंरम्भ दै ]। 
युणोत्प्क्षा यथा- 


= अ, देहि 


( हे वेदेहि ! ] यह वह्‌ स्थल दै जहाँ ठ्दँं खोजते हए युन्ञे भूमि परर पड़ा [ तुम्दारा ] 
एक नूपुर दिखा था जो मानँ वुम्हारे चरणारविन्द कै वियोग के दुःख से चुप्पी साये था 
[ रघुवंश-१३ | 

-- याँ [ जिसकी उत्प्रेक्षा हो रही है वद ] दुःख गुणदहे। 

दन्यो त्प्रेक्षा यथा- 

इस पात्ताङ को नेत्रोत्सव गरगांक से शल्य देख खन्दर वनिताओं ने यहाँ अपने मुखो के 
बहाने आकरा मँ मानों चन्द्र दी चन्द्रकी खष्टिकर डाली हे।" [ श्रीरामचन्द्र द्विवेदी ने इसके 
अनुवाद मेँ एक तो आकाश्च को छोड दिया हे दूसरे उनके अनुवाद मेँ संभावना का विषय सृष्टि सिदध 
होती है, चन्द्र नदीं फलतः वह क्रियोत्त्रेक्षा सिद्ध होती है द्रन्योत्प्ेश्चा नदीं । ] 

- “यहाँ चन्द्रराबव्द द्रव्यवाचक है क्योकि चन्द्रमा केवल एक ही होता है।' 

ये सव उदाहरण दै भावात्मक [ ८०51४*१< पदार्थो की ] उत््रेक्षा के । 


विमरिनी 


सांप्रतमिति प्राक्चावस्चरम्‌ । दिङमात्रेणेति । अनेन जाव्यादिमेदानामनवक्ट तिर्ध्वनिता । 
तमोगतत्वेनेति । तमोगतव्यापनादिधमनिगरणेनेव्यथः । अत्र हि तमसो धर्मिणगोऽन्यधर्म- 
धर्मिरवं निगीर्यान्यधर्मधर्मित्वमवस्थापितमिस्यय्र एव वच्यामः । व्रव्योत््रेक्षेति । दष्यस्य 
स्वखूपेणोष्प्र्तणस्‌ ! तस्येव हि देतृसपरेक्ञा यथा- 


"जयति चिदिरतायाः कारणं सा हिमादेः 
खिपुरहरकिरीटादापतन्ती य॒सिन्धुः । 
सततसहनिवासी छीरसिन्धोः प्रसूतो 
 दिमकर इव हेतुः श्रेत्यदष्यस्य यस्याः ॥° 


२४ 


उत्येक्षाखङड्गारः १९७ 


अतरैन्दोद्‌भ्यस्य हे .स्वेनोप्परत्तणम्‌ । फलोस्पेत्ता यथा- 
'मध्येसकिकूमादिव्यसंमुखं धूक्िधूसराः । 
ऊुःखदिन्यस्तपस्यन्ति चन्दरायेव दिने दिने ॥° 


अच्र चन्द्रस्य दब्यत्वम्र । एषामेव भावामिमानोद्‌ाहरणत्वमतिदिश्ति--एता- 
नी त्यादिना । 


सारप्रतस्‌ = अव अवसर आ जाने पर। दिङ्मात्रेण = दिण्ददनमात्र, श्ससे यह संकेत 
दे दिया गया किं जाति आदि भेदो के अवान्तर भेदौ के उदाहरण नदीं दिए जागे । तमोग. 
तस्वेन = तम में = अथै यद्‌ कि तमोगत व्यापन आदि धर्मके निगरण कै दारा । इम यह अभी 
आगे चलकर वतलातरेगे कि तमरूपी धमीं में अन्य घमं ते युक्त होना छिपाकर [| निगीणे कर | 
अन्य धमं से युक्त होना ठहराया गया हे | द्रव्योर्प्रेत्ता द्रव्य कौ अपने रूप नं उत्प्रेक्षा | स्वरूपो- 
प्रक्षा | द्रव्य की ही हेतुरूप से उत्प्रेक्षा का उदाहरण- 

हिमाद्िमं जो रिरिरता है उसका कारण दहै दिव के शिर से गिरती गंगा, जो [गगा] 
मानो चन्द्रमा की सफेदी ओर शीतलता से सफेद ओर शीतल है क्योकि वह चन्द्र सदा गंगा के 
समीप ही | हरजगजूट में ] रहता है । वह [ स्वयं सफेद इसकिए है कि वह ] क्षीरसागर से उत्पन्न 


हआ हे, उसकी किरणे रीतर होती हैं । 


-- यहां जो द्रन्यरूप चन्द्रमा है उसको हेतुषूप से उत्प्रेक्षाकीजारही है, द्रव्य की दह्ये फएल- 
रूप से उत्प्रेक्षा का उदाहरण यथा- 

ुुदिनिर्यो जो प्रतिदिन सूयंकौ ओर रंह करके ओर धूकि { -पराग-] धूसर होकर 
पानी के वीच तप करती हे वह मानों चनद्रमाकेही किए ।" 

--यह चन्द्रमा द्रव्य हे [ ओर उसे फलरूप से बतलाया गया हे ]। 

इन्दीं उदाहरणं को भावाभिमान के उदाहरण बतलति हए छ्खिते है-एतानि । 


[ सवंस्व ] 
अभावाभिमाने यथा- 
कपोकफलकावस्याः कष्टं भूत्वा तथाविधौ । 
अपद्वयन्ताविवान्योन्यमीदक्चां क्षामतां गतो ॥* 
अत्रापश्यन्ताविति क्रियाया अभावाभिमानः। एवं जाल्यादावप्यृह्यम्‌ । 
गुणस्य निमित्तत्वं यथा-"नवविसकताकोरिकटिलः इत्यप्रोदाहत 
कुटिदत्वस्य । क्रियाया यथा--श्श्चां श्चामतां गतौ इत्यत्र क्षामतागम- 
नस्य । निमित्तोपादानस्यैते उदाहरणे । अनुपादाने "लिम्पतीव तमोऽङ्गानि 
इत्यादुदाहदस्णम्‌ । 
ठेतूत्प्ेक्चा यथा- 
'विष्टेषदुःखादिव बद्धमौनम्‌ इत्याद । 
स्वरूपोत्प्रक्षा यथा-- 
कवेर जां दि्ाधुष्णरश्मौ गन्तु प्रवृत्ते समयं विलङ्क् । 
दिग्‌ दक्षिणा गन्धवहं मुखेन व्यद्धीकनिःश्वासमिवोत्तसजं ॥* 


| 
| 
। 
। 


.१९.८ अलद्कारखवंस्वम्‌ 


फलटोत्पेश्चा यथा- 
“चो टस्य यद्धीतिपल्ायितस्य भाटतव्वचं कण्टकिनो वनान्ताः । 
अद्यापि कि वाञ॑भविष्यतीति व्यपाटयन्द्रष्डुमिवाश्षसणि ।\' 
एवं वाच्योर्परक्लाया उदाहरणदिग्‌ दत्ता । प्रतीयमानोसष्चा यथा-- 
'महिठासहस्सभरिपए तुह दिप खड सा अमाअंती । 
अणुदिणमणण्णअम्मा अगं तणुंपि तणुर्ड्‌ ॥।' 
अघ्--अमाञतीत्यवतमानैवेति तनूकरणदेतुत्वेनोत्मरेक्षितम्‌ । 
वं मेद्‌न्तरेष्वपि ज्ञेयम्‌ । ~. 
[ वृत्ति | अभाव [ 2९८०४५८ पदार्था की ] उत्प्रेक्षा यथा-वड खदकी बात हे किं इस 
[ पावती ]केवे, केसे कपोल इस, ेसी क्षामता [ दबल्ता ] का प्राप्तो गए । देसा कदाचित्‌ 
इस क्एिहुजा कियेएक दूसरेकोदेख नदीं पा रेह [ज दो सदोदर भाद परस्पर कै 
आत्यन्तिक वियोग से प्रेमवद्ा सख जाति दे ]। 
- यहां “अपदयन्तो = न देख पतेः-द्स प्रकार [ ददन = ] त्रिया म अमाव की 
उत्प्रेक्षा दे । 
इसी प्रकार जाति आदि [की उत्प्रक्षाओं] मं मी [ अभाव के उदाहरण] समब जा 


सकते हे । 


[ उ्परक्षा का ] निमित्त जहां युण्र्प होता दै रेस्ता स्थल यथा-[ सवः पाया- 
दिन्दुः० पच कै-- ] “नवविस्षल्ताकोटिकुटिरः = नवीन कमल्ककड़ की नोक सा कुटिल 
इस { अदा] में {[ अभी अभी ] निदिष्ट कुटिख्ता | 

निमित्त जहाँ क्रियारूप होता दं यथा-इटृक्षां क्षामतां गता = रेसी क्रदरताको प्राप्त इस 
अदा मे करता को प्राप्त होना । । 

उक्त दोनों एसे उदाहरण दँ जिनमे निमित्त का उपादान [ चाब्दतः कथन ] हे । [ निमित्त के ] 
अनुपादान के उदाहरण दै (तम अंग-अंग को ीप-सा रहा दै--इत्यादि । 

हेतूत्प्रेक्षा यथा-[ “सेषा स्थली य॒त्र ०ः-पद् में- ] 

(मानो वियोगदुख से चुप्पी साधेः-इत्यादि मे । 

स्वरूपोत्प्रक्षा यथा-[ दिव कै तपोवन में सदसा वसन्त ऋतु के आरम्भ होने ख्गने पर्‌ | 

सूर्य, जव समय [ दक्षिणायन काल तथा निश्चित भिलनकाल ] का उल्लघन कर्‌ कुबेरसेनित 
[ उत्तर ] दिदाकी ओर चल्नेख्गातो दक्षिणदिश्ाने अपने सुख [ दिगन्तमाग तथारमँह ] सते 
मल्यमारत छोटना शुरू किया, मानों वद उसकी विग्रियजनित उसोसि हौ। [ कुमार- 
छंभव सगं-३ ] 

फलोत्प्रेक्षा यथा-- 

जिसके भय से मागे चोष्देयायिप के माल की त्वचाको कोँट्दार जंगरू मानों यह देखने 
के किए फाड़ रदे थै कि अव्‌ इसे ओर क्या भोगना हं 

इस प्रकार वाच्य उ्प्रक्षा के उदाहरणं का दिग्दशन किया । 


५1 


उत्पेश्षाटज्ारः १९९ 


प्रतीयमान उत्प्रेक्षा के उदाहरण ये ई- 

'महिलासहस्रभरिते तव हृदये सुभग सा अमान्ती । 
अनुदिनमनन्यकमां अङ्गं तनकमपि तनयति ॥ 

-- हे सुभग [सन्दरियो के प्रेमपाच्र ] ! वह्‌ देचारी सहस्रो महिलाओं से भरे तुम्हारे हृदय 
मे जगह नहीं पा सक रही हे, अतः वह ओर कुरू नहीं करती, केवर अपनी स्वभावतः दुबल 
कायाको ओर मी दुबली बनाती जा रही हे। 

-यहां जगह नहींपा सक रहीदहंः इसे काया को दुबली वनानेमें हेतुरूप से उ्प्रेक्षित 
कियाजारहा हं अथात्‌ भार्नो तुम्हारे हृदयम स्थननपासकनेसे वहु अपनी स्वतः दुबली 
काया को ओर भी दुवली करती जा रही हे । 

इसी प्रकार अन्य भेदौ मेभी समञ्च लेना चाहि५ ' 

विमरिनी 

अभ्युद्धमिति अभावाभिमानोदाहरणमस््‌ । निभित्तोपादानस्येति । ऊरिरूत्वस्य क्लामता. 
गमनस्य च साक्तान्निदेश्ात्‌। अनुपादान इति । तिरोक्ायकस्वादेर्मिमित्तस्य गम्यसान- 
स्वात्‌ । भदान्तरेप्विति स्वरूपफरादिकेषु । ्तेयमिति प्रतीयमानत्वात्‌ । तन्न स्वरूपो 
सप्रे यथा- 

मरूअसमीरसमागमसंतोस पणिच्चाराभिसम्बत्तो । 
विध्याइह चरुकिसल्जकराहि साहाहि महूरच्छी ॥' 

जत्र मधघुरखुचमीगतस्वेन चरूकिसर्यकरत्वादि नि गीयं व्याहरणक्रिया स्वरूपेणोत्पेज्षि- 
ता। तदोन्घुख्योस्पाद्‌ कस्वादि च निमित्तमनुपात्तम्‌ 1 यस्पुनर्ददेदञो प्रतीयमानोसत्ेत्तायां नि- 
मित्तानु पादानं न संभवती्युक्तं तन्न म्रायस्तस्याः स्वरूपोत्प्रे्णस्यासंभवो निमित्तम्‌ । 
न्थकरतो हि प्रतीयमानोष्प्क्ता हेतुफरूरूपेवं भवतीस्यसिप्रा्रः । हेत॒फरोस्परेक्णयोश्च 
वचय माणनीव्या निमिक्ानुपादानं न संभवतीरप्राशयेनं तदुक्तम्‌ । तेन प्रतीयमानापि स्व- 
रूपोरप्रत्ता निनित्तोपादानालु पादानाभ्यामेव भवति । तत्र निभित्तालुपादाने उदाहृता । 
उपाद्‌ानतु यथा- 

प्रसारि सवंतो विश्वं तिरोदधद्द्‌ तमः। 
सर्वाङ्गं लिम्पति जनं सान्द्रेश्तकूचंकेः ॥' 

अच्र प्रसारिषव्वादि निगीयं तम'गतस्वेन रेपनक्रिया स्वरूपेणोप्म्रेज्तिता तिरोधाय- 
करवादि च निमित्तम्‌ । 

(तुरीयो ह्येष मेध्योऽग्निराम्नायः पञ्चमोऽपि वा। 
अपिवा जङ्गमे तीथ धर्मो वा मूतिसंचरः ॥' 

इत्यादौ तु वामनमते विशेषाक्तिः--'भूतलकातिकेयः' इतिवत्‌ । ग्रन्थकृन्मते त॒ दडा- 
रोप रूपकम्‌ । यद्वच्यति-या स्वेकहानिकल्पन।यां साम्यदाढय विशेषोक्तिरिति 
विशोषोक्तिरेक्लिता सास्मदर्चंने रूपकभेद एवेति । अत॒ एवान्न तस्सामग्रयभावा- 
दु्प्ररो दाहरणव्वं न वाच्यम्‌ । एवम्‌ “अपरः पाकशासनो राजा' हइव्यत्रापि दडारोपमेव 
रूपकम्‌ । एतच्चारंकारानु सारिण्यामुस्परत्तावि चारे गन्थक्रतेव दितम्‌ । फलोपप्र्ञा यथा-- 

'गिज्जते मगल्गाहि आहि वरगोत्तदत्तकण्णाए । 
सोत्त विणिग्गओ उह होतबह्‌आहि रोमंचो ॥ 
त्र भ्रोतुमिवेति फरमुरप्रर्तितम्‌। ` 


२०० अल्ङ्ारसवंस्वम्‌ 


“अभ्युद्यम्‌ = समञ्च लेना, कल्पना का लेना चादि अथात्‌ अभावात्मक उत्प्रेक्षा की । 
*निमिन्तोपादानस्य = निमित्त के उपादान केः [ उदाहरण, इसक्िए किं = उक्त उदाहरणं में] 


टिकता ओर क्षामता को प्राप्त दोना इन दोनां का साश्चात्‌ दाब्दतः निर्दड दै, 'अनुपादान = 


निमित्त का उपादान न रहने पर क्यांकि [ छिम्पतीव तमोऽङ्गानि० आदि में ] निमित्तभूत जो 
तिरोधायकत्वादि धर्म हें वे प्रतीयमान हं । “भेदान्तरेषु = अन्य भेदो में" = स्वरूपोप्प्रक्षा फल।त्प्रक्षा 
आदि भेदा में । श्ञेयम्‌ = जानना चादिएः-क्योवि उनमें भी उत्प्रक्षा प्रतीयमान दही दोती दहे । 
इनमे स्वरूपोप्परक्षा यथा- 

'मल्यसमीर-समागम-संताष-पाट्चराभिः सवत्र । 

विव्याहरति चलकिंसल्यकराभिः चाखामि मध्ुलक्ष्मीः ॥ 

- मधुलक्ष्मी मल्यपवन के समागम कै संतोष को चुरा लेने वालो किंस्तल्यो के चचर दार्थो 
वाटी राखाओं से जद तदा, सव कदीं बोर रदी हे ।' 

- यहां मधुलक्ष्मी मे चलकिसल्यकरत्व का निगरण कर व्याहरण = बोलना = क्रिया के स्वरूप 
को उग्पर्षा है। इसमे कारण है उसकी ओर उन्युखता उत्पन्न करना आदि । वह्‌ अनुपात्त है । 
उत्प्रेक्षा गिनाते समय यह जो कहा हे कि प्रतीयमान उत्प्रेक्षा में निमित्त का अनुपादान संभव 
नदीं होताः इक्का कारण यह है कि इस प्रतीयमान उत्प्रेक्षा में प्रायः स्वरूप की उत्प्रेक्षा संभव 
नहीं होती । ग्रन्थकार का अभिप्राय यह्‌ है किप्रतीयमान उ्डरक्षा केवर हेतृत्प्रेक्षारूप ओर फलो- 
स्प्रक्षारूप ही होती है। अर्थात्‌ उक्त कथन का अभिप्राय यदह दै कि हेत्पर्षा ओर फलोत्प्रेक्षा में 
अने वतलाए क्रम से निमित्त का अनुपादान संभव नहीं होता । इसका निष्कपं यह निकला कि 
स्वरूपोत्प्क्षा प्रतीयमान दोने पर भीदो प्रकार च्छ होती है। एक वह जिसमें निमित्त का उपादान 
रहता है ओर दूसरी वह जिसमें नदीं रहता । दोनों मँ से निमित्त के अनुपादान से होने वाली 


१0 का उदाहरणदेदिया गयादहै। उपादानमें होने वारी स्वरूपोप्प्रक्षा का उदाहरण 
यह्‌ है- 


द्‌ अन्धकार सव ओर फेल रहा है ओर विश्व भरको चिपाता जा रहा है। य प्रत्येक 
व्यक्ति कैञंगभंगको अमृत कौ नी कूचिरयो ते लीपता जा रहाहै। 


यहां प्रसारित्व = फले वाटा होना निगल कर लेपन क्रिया के स्वरूप की अन्धकार के 
उपर उत्प्क्षा की जा रही दै । उसे निमित्त है त्िरोधायकलत्वादि [ जो कि चाव्दतः कथित = 
उपात्त है ]। 

यहं [ अवहनीय, दीक्षणीय तथा गाहंपत्य इन तीन यज्ञाग्नियों से भिन्न ] चतुर्थं यज्ञाग्नि है 
अथवा पचिवा वेद्‌ है, अथवा चलता फिरता तीर्थ॑दहैयातोमूत्तिमान्‌ होकर घूमता फिरता धरम है । 

इत्यादि में [ काव्याल्कार सूत्रकार ] वामन के अनुसार विशेषोक्ति अलंकार दै जैसे. “मूत- 
ख्कात्तिकेय = पृथिवी प्र उतरा स्कन्द्‌ य। का्तिकमास अथवा कात्तिक पूणिमा का चन्द्र इस स्थल सं 
माना जाता हें । अन्धकार के मत मेँ यँ दृढारोप रूपक ही है । जेसा किं आगे चलकर कटेगे- 
(विजेषोक्ति का “एक [ गुण की ] हानि कसित कर साम्यकौ दृढता विदेषोक्ति होती है"-यह जो 
क्षण [ वामन ने ] किया है, यह हमारे अनुसार रूपक का ही एक भेद है । इसीलिए इसे उत्प्रेक्षा 
का उदाहरण नहीं माना जा सकता क्योकि यहाँ उत्प्र्षाकी सामग्री नहदींहे। इसी प्रकार 
यह राजा दूसरा इन्द्र हैया भी दृढासेष रूपक ही मान्य है । यदह सव अलंकारानुसारिणी मेँ 
उत्प्रेक्षा पर विचार करते समय स्वयं अन्धकार ने ही प्रतिपादित किया है । 


+ 


[कि रक 7 7 त 7 70 कक 07 ठ ब ® क आ? ज 


उत्परश्चाटङ्ारः २०९१ 
फलोत्प्रेक्षा यथा-- 
गर्यान्ते मङ्गलग्राहिकामिवैर गो त्दत्तकर्णांयाः । 
श्रोतं विनिगतः परयत मविष्यद्वध्वा हि रोमांसः॥ 
गरृहकम के वाद मंगलग्राहिका्ओं द्वारा लिट गये वर के नाम पर दत्तक्णां भविष्य वधूका 
रोमांच देखो जो मानां [ उसी नाम को ] सुनने के लिए निकली है । 
-- या “मान खनने के लिए" इस प्रकार फर की उत्प्रेक्षा की गई है । 
| स्वस्व | 
^ उ ्जाा- 
शिटष्टरब्ददेतुयंथा 
'अनम्यसामान्यतया प्रसिद्धस्त्यागोति गीतो जगकत्तीतद्े यः । 
अभूद्हंपूविकया गतानामतीव भूमिः स्मरमागंणानाम्‌ ॥' 
अत्र धमेविषये मागण शब्दः दिटष्टः । 
[ वृत्ति ] दिरष्टरब्दहेतुक [ उत्प्रेक्षा ] यथा- 
“अन्य [ त्यागियो ] जेता [ द्र ] न होने मे प्रसि त्यागी, प्रसिद्ध त्यागी" इस प्रकार गाया 


जनेवालाजो काम के होड कगाकर पर्वने वाल मार्गणे [ वाण तथा याचको ] का बहुत द्ये 
अधिक लक्ष्य वना हआ धा 1" 

- यहां [ वणैनीय व्यक्ति मे मागेण अर्थात्‌ याचकस्वरूप कामवबाणों का विषय बनना ] धमं 
उत्परक्षित किया जा रहा है तदवाचकशब्द मार्गणः यौ [ याचक तथा वाण इन दो अर्थो का 
प्रतिपादक होने से ] दिष्ट है । 
| विमरिनी 


शिलि्ट इत्य थार वाचकस्वात्‌ । 
दिलष्ट इसलिए कि वह्‌ [ मागण शब्द ] याचक तथा वाण दोनो अर्थो का वाचकं हे । 
[ स्वस्व ] 
उपमोपक्रमोत्परक्षा यथा- | 

कस्तूरीतिलकन्ति भाकफठके देव्या मुखाम्भोरुहे 
रोटम्बन्ति तमालबाटपुकटोत्तंसन्ति मोावपि । 
याः कणं विकचोत्पटन्ति कुचयोरङ च कालागुख- 
स्थासन्ति प्रथयन्तु तास्तव शिवं श्रीकण्ठकण्ठत्विषः ॥' 


अ्र यद्यपि 'सवप्रातिपदिकेभ्यः किपः इत्युपमानाक्किञ्विधावाघरुखे उप 
माध्रतीतिस्तथाप्युपमानस्य प्रकृते संभवौचित्यात्संभावनोत्थाने उत्पेक्षायां 
पयवसानम्‌ । यथा वा विरहवणने केयूरायितमङ्गदैः इत्यादौ । पापि 
समस्तोपमाप्रतिपादकविषयेऽपि हषंचरितवार्तिके सारित्यभमीमांसायां च 
तेषु तेषु प्रदेरोषुदाहता, इद तु म्रन्थविस्तरभयान्न प्रपञ्चिता । 
| ब | एेसी उत्प्रेक्षा का उदाहरण जिसके आरम्भ म उपमा प्रतीत हो “नीलकण्ठ भगवान्‌ 
शिव के कण्ठ कौ वे किरणें आपकी कलस्याणश्ृद्धि करे जो भगवती पावती के ललाट पट्ट पर कस्तूरी 


२०२ अलङ्धारसवंस्वम्‌ 


तिल्क का काम करती हे, उनके सुख कमल पर भ्रमर का, सिर पर तमार की नन्दीं नन्दीं 
कलियां के उत्तंस का, कान मे चिल हर नीलकमल का ओर ओंँचरके ऊपर काले अगर कै 
थापेका। 

-- यहं यचपि आरम्भक वाक्याथ॑प्रतीति मं प्रतीत होती है उपमा; क्योकि कस्तूरीतिकक्रन्ति 
आदि नामधातु पदां मे प्रक्ृतिरूप से प्रयुक्त "कस्तूरीतिक्कः आदि नामशब्द तभी क्रियादाब्द 
वनते हं जव वे उपमानाथैक होते हे; एतदथं पाणिनिव्याकरण के नियम सभी प्रात्तिपदिकों से 
किप्‌! [ वात्तिकं ३।१।११ | के अनुत्तार उन किम्‌ प्रत्यय लगता दै ओर वह लगता दै केवल 
उपमाना्थैक राव्द के साथ हौ; तथापि अन्तिम वाक्यार्थं प्रतीतिमें प्रतीत द्ोती हे उत्प्रेक्षा ही; 
क्याकि [ इस वाभ्यां मेँ आण ] कस्तूरीत्िल्क आदि उपमानां का इसी प्रसंग मे वणित लाट 
आदिमंहोनाभी संमव दहै; अतः यहां [ उत्प्रेक्षाका वीज] संभावना उठ खड़ी होती है। 
| अरकाररत्नाकरकरारने यहाँ परिणामगमँपमा मानी £] ओर जेत्त वरिरहवणेन में .अंगदोने 
केयूर का काम किया" इत्यादि स्थलों मे [ देखा जाता है |। 

[ उत्प्रेक्षा के आरम्भमें प्रतीत होने वारी ] यह उपमे।पक्रमोत्प्क्षा वदहोँभीदहोती है जहां 
उपमा का प्रतिपादक शब्द भी विद्यमान रहता हं किन्तु समाप्तम । इसके उदादरण हदषैचरित 
वात्तिक ओर साहित्यमीमांसा में तो उन उन स्थलों म अनेक वार प्रस्तुत किए है, किन्तु यदं 
विस्तारपूवंक विवेचन नदीं किया केवल अन्धविस्तार कै भयसे [ दीकाकारने उदाहरण दे 
दिया हे ]। 


विमद्िनी 
जासुख इति न पुनः पयंवसाने । उपमाप्रतीतिरिति । तदर्थमेव किपः ्रच्रृत्तेः। अत 


एवात्र वाचकामावान्नोरप्र ्तात्वमिति न वाच्यम्‌ । नहि वाचकसखंभवाखंभवमानत्रमेवारुका- 


राणां भावाभावग्रयोजकम्‌ । एवं हि व्याजस्तुतौ निन्द्‌देर्बाच्यव्वेऽप्यवाच्यस्य स्तुरयादेः 
प्रतीतिररुकारष्वपयं वसलायिनी न स्यात्‌ । तस्माद्वाक्याथे एव प्ररूढोऽलकाराणां स्वरूप- 
परतिष्टापकं प्रमाणम्‌ । वाक्यार्थस्य च पदार्थान्वयवेलातोऽन्यैव प्रतिपत्तिः, समवौचित्या- 
दिति । कस्तूरीतिक्कादेविंषयिणो भारफल्कादौ संभवे यथौचिस्यं न तथा कण्टस्विडादे- 
विषयस्वेत्य्थैः । अत एवाश्रोपमायाः प्रकृतस्याप्रकृतकस्तूरीतिलकादिरूपतया परिणामा- 
त्परिणामगर्भत्वं यदन्यैर्क्तं तत्तषां परिणामस्व रूपान भिन्ञव्वम्‌ । न द्यी चित्यमेव तस्य 
स्वरूपं कि त यथोक्तं प्रकृतो पयोतिखमर । ओौचिव्यं च नोप््रेचायां विब्दधम्‌। तस्य सर्व॑ 
तरव भावात्‌ । उत््क्षायां पय॑वसानमिति । कण्ठस्िषामेव कस्तूरी तिरकत्वादिप्रतीतेर्विष- 
भरिणो विषयनिगरणेनामेदपतिपत्तेः सादश्यावगमाभावात्‌ । सादृश्यं द्यभयनिष्ठम्‌ । न 
चात्र प्रङृताप्रः तयोः संश्पधितया प्रतीतिः । यथा वेच्यनेनास्या च्य प्राचुर्यं दितम्‌ । 
समस्तोपमाप्रतिपादकविषये दृश्यमाना । सा तु यथा-- 

स दण्डपादो भवदण्डपादंसव्खण्डयन्रक्ततु चण्डिकायाः। 

यस्थेन्दुरेखा पुरतः स्फुरन्ती त्रव्यत्तङाकोटितुराञुपेति ॥' 

अत्र स्यपि तुखारब्दे चन्द्रेखाया एव तुखाकोटिव्वश्रतीतेरु्रे्तास्वभू । 


जारख = आरम्भ में अर्थात्‌ पय॑वसान = अन्त में नदीं। उपमाप्रतीति क्योकि किप प्रत्यय 
होता दे उसी अथेमे दहै। इस्ति यह कथन कि दाँ वाचक नदीं है अतः सत्पक्षा नदीं हो 
सकती," ठीक नहीं । वाचक का होनायान होना मात्र अल्कारयोके हदोनेयान. होने मे कारणं 


उत्परश्चाटङ्ारः २०३ 


नदीं माना जाता । यदि एेसा माना जाय तो व्याजस्तुति मे निन्दा या स्ति के किसी एक पक्ष 
के वाच्य रहने पर भी तद्विरुद्ध स्तुति या निन्दाका द्वितीय पक्ष अवाच्य रहता है मौर उस 
[ द्वितीय पक्ष |का ज्ञान हो वहां अल्काररूपमें पर्यवसित होता हआ माना जाता है, वह संमव 
न होगा । इसलिए निष्पन्न वाक्याथैको ही अल्कारों के स्वरूप का मरतिष्ठापक परमाण मानना 

उचित हे । जहां तक वाक्याथेज्ञान का सम्बन्ध है उसका स्वरूप पदार्थौ के सम्बन्ध के समय होने 

वाले ज्ञान से भिन्नदहीहोतादहै। 


संम वौचिव्यात्‌ अथं यह कि जितना ओचित्य कस्तूरीतिल्क आदि विषयो कै ललारपट्र 
आदि में संभव होने में है उतना कण्ठकान्ति आदि विषय के संभव होनेमें नहीं। ओर इसीलिए 
[ अलंकाररत्नाकरकार आदि ] अन्य आलंकारिकं ने जो इस प्यमें उपमा मानीहै ओर उसे 
भी जो प्रकृत कण्ठकान्ति को अप्रकृत कस्तूरीतिलक आदि रूपसे परिणत मान परिणामगमित 
उपमा बतलाई हे वह उनने अपना परिणाम के स्वर्पका अज्ञान ही जाहिर कियाहे। केव 
जओचित्य से ही परिणामाटंकार निष्पन्न नहीं होता, उसकी निष्पत्ति प्रकृतोपयोग से दोतौ ह । 
ओर केवल चित्य उत्प्रेक्षा मे विरोधी नहीं होता, क्योकि वह तो सवेन ही रहता हें । 

उस्प्रेक्तायां पयवस्। नम्‌ = उत्प्रेक्षा सें पयवसान अर्थात्‌ यँ कण्ठकान्ति करस्तूरीत्तिलक आदि 
के अभिन्न प्रतीत होती है; इसलिए क्योकि यहां विषयी विषय से अभिन्नरूप से प्रतीत होता दै 
अर्थात्‌ वह विषय को अपने आपमें निगले रहता है फरूतः [ उपमा का बीज ] साद्य यहां 
पर्यवसान मेँ प्रतीत नदीं होना । सदस्य जो है वह सदादोमे रहताहै ओर श्स पद्मे प्रकृत 
ओर अप्रकृत अरग अलग बराबरी के साध प्रतीत नदींहो रहे हे । [ दोनों मेँ अभेद प्रतीतो रहा 
हे । दोनां अलग प्रतीत होते तो उनमें सारय वनता | । 

[ यहां अल्काररत्नाकरकार ने परिणाममुखी ध्पमा की सिद्धि कर खण्डन रूपकसुखी 
उत्प्रेक्षा का किया है, उपमासुखी उप्प्क्षा का नहीं । कदाचित्‌ अ० रत्नाकरकार को स्वेस्व कौ 
कोई रेसी प्रति मिली होगी जिसमे उपमा कौ जगह रूपक पाठ होगा । | 

यथा वा = ओर जेसेः इस प्रकार एक आर उदाहरण देकर यह्‌ वतलाया कि यह्‌ उपमासुखीं 

रक्षा काव्यो में पयांप्त मात्रा मे मिलती हं । 

एषा = यह अर्थात्‌ समस्तोपमाग्रतिपादक विषय मे अथात्‌ रेते स्थलों मे जहां उपमा का 
ग्रतिपादक शब्द रहता है ओर समास मेरहता इ, दिखाई देने वाली । उदाहरण-- 

उसका उदाहरण-“मगवान्‌ इकर के दण्डपाद्‌ [ नृत्यमे पीछे पीठकी ओर से जाकर सिर 
करी ओर ऊपर उठाए गए पैर | से वाजी मारले जाने वाडा भगवती पावती का दण्डपाद 
[ हम सवकी ] रक्षा करे जिसके सामने चमकती [ भगवती पावेता के जडे पर वेषौ | चन्द्रलखा 
टस्ते च॒पुर कौ तुलनाप्राप्त करल्तीह'। इस प्म [ उपमा के प्रतिपादक ] 'तुखाः - शब्द 
का [ समास के भीतर ] प्रयोग हे तवमभी चन्द्रल्खाम नूपुरत्व को संभावनामृलक प्रतीति होने 
के कारण यहाँ उस्परेक्षा है । 


| [ सचस्व ] 
सापहवोष्परक्षा यथा- 
"गतासु तीरं तिमिघट्नेन ससंश्रमं पौरविलासिनीषु । 
यत्रोरलसखत्फेनततिच्छटेन सु्ाह्ृदाखेव विभाति सिप \' 
अ्रेवराब्दमादात्म्यात्खमावनं छल शब्दप्रयोगाच्चापहवो गम्यते । पवं 


२०४ अलङ्कारसवस्वम्‌ 


छद्मादिाब्देश्रयोगेऽपि ज्ञेयम्‌ । “अपरः इव पाकशासनः इत्याद्‌ावपरदाब्द्‌ा- 
प्रयोगे उपमेवेयम्‌ । तत्पयोगे तु भक्तस्य राज्ञः पाकश्ासनत्वभ्रती तावध्य- 
वसायसंभवादिवराब्देन च तस्य साध्यत्वप्रतीतेरुत्परेक्षेवेयम । इवरदाब्दा- 
प्रयोगे सिद्धत्वादध्यवसायस्यातिदायोक्तिः । इवापर्खब्दयोरप्रयोगे तु 
रूपकम्‌ । तदेवं भ्रकारवेदिव्येणावस्थिताया उत्प्रेक्षाया देतूत्प्रक्लायां 
यस्य प्रकृतसंवन्धिनो धमस्य देतुरुत्येक्षयते स धर्मो ऽध्यवसायवरादभिन्न 
उत्परक्चायां निमित्तत्वेनाश्रीयते । स च वाच्य पएव नियमेन भवति । अन्यथा 
कं भ्रति देतुः स्यात्‌ ! यथा--अपदयन्ताविवान्योन्यम्‌ इत्यादौ । अच कथो- 
लयो; प्रकृतयोः संबन्धित्वेनोषात्तस्य श्ामतागमनस्य डेत॒र्दरानशचुत्पेक्षि- 
तम्‌ । देतुफटं च श्चामतागमनं तच निमित्तम्‌ । एवम्‌ “अदश्यत त्वच्चरणार- 
विन्दविचछेषदुःखादिव बद्धमौनम्‌? इत्यत्र नू पुरगतस्य मौनित्वस्य देतु- 
दुःखित्वम्‌ । तदुत््रेक्षणे मौनित्वमेव निमित्तं जेयम्‌ । एवं स्वेत्न । 


-अपहव से युक्त उत्प्रक्षा यथा- 

जहां उछलती फेनराजि के बहाने सिप्रा जद्रदास विखेरती-सी प्रतीत होती है जव नगर- 
वनितां [ स्नान के समय ] मची के टकरा जाने से घवराकर किनारे पर पहं है ।? 

यहां इव = सी" राष्द का प्रयोग है इसलिए संभावना ओर छलः दाब्द का प्रयोग है इसङिए 
अपहति कौ यतीति होती है । इसी प्रकार छद्यः आदि राव्दो के प्रयोग रहने पर भी [ उत्प्रेक्षा 
दती हे एेसा ] जानना चाहिए । 


दूसरा सा इन्द्रः इत्यादि स्थो मेँ यदि अपर = दूसरा राब्द काप्रयोगन होता तो यहां 
7 ही दोती, उसका प्रयोग हो जाने से प्रङ्नत राजां शन्द्रत् को प्रतीति होने कगी फलतः 
चद्‌। अध्यवसाय होना संमव हो गया अौर इव = साः चन्द दारा उस | अध्यवसाय ] में साध्यत्व 
ॐ प्रतीति करा दी, इसकिएि यहाँ उसप्रक्षा ही हृदं । यदि इव राब्दका प्रयोगन होता तो यदं 
सिद्ध अध्यवसाय प्रतीत होता ओर तब अनिक्चयोक्ति होती । जौर यदि, न इव राब्द का प्रयोग 
होता जीर न अपर शब्द का तो यहां रूपका होता । 


. स्स प्रकार उत्प्रेक्षा के भदो म अनेक विचित्रता मिलती है, अतः इसका जो हेतूत्प्रश्षामेद है 
~ त१ शकत % जिस धमै का हेतु उसप्रेक्षित किया जाता है वह धर्मं [ अप्रृतके धर्मत ] अध्य- 
वाय के आधार पर्‌ अभिन्न प्रतीत होता है ओर वही उत्प्क्ता का निमित्त स्वीकार किया जाता 

। ओर वह सदैव कैवल वाच्यही रहतादहे। रेसा[ वाच्य ]नदहौतो उत्प्रेक्षित देतु किसके 
| भरति हेतु सिद्ध होगा ? यथा--भमार्नो एक दूसरे को न देखते हए इत्यादि [ पूर्वोदिघूत ] स्थल मेँ । 
ह) प्रकृत हं कपोल । उनम धर्मरूप से दुर्वैरुता वतलाई जा रही है ओर उस [ दुर्बलता ] मेँ हेत 
वा जा रहा है अदश॑न-न दिखाई देना । इस प्रकार इस [ उसमक्षा ] मँ निमित्ते [न 
दिखाई दने रूप ] देतु का फल = दुबु होना । इसी प्रकार-[ राम की सीता के प्रति उक्ति- 
यम्हारा नूपुर | मानां तुम्हारे चरणारविन्द से विद्ुडने से चुप्पी सधे दिखाई दिया भा-- 
इत्यादि स्थलों मेँ नूपूरगत मौनित्वं = चुप्पी का हेत है दुःखित्व । उसकी उत्प्रेक्षा मेँ निमित्त माना 
जाना चादिए मोनितव ही जौर इसी प्रकार [ हेततरेक्षा कै ] समी स्थला मेँ जानना चाहिए । 


उत्पेक्षाठङ्ारः २०५; 


विमश्चिनी 
छद्यशाब्द प्रयोगेण यथा-- 
स्वेदो द विन्दु सं दोहच्छद मना तव राजते । 
स्मरेणावम्यनघांपि दत्तार्घेव कऋचस्थली ॥' 

अस्याश्च तत्तच्छृब्द्‌ प्रयोगाप्रयोगाभ्यां प्रततीतिमेदादलंकारः सह विभागं द शयिततमाह- 

अपर इत्यादि । तत्प्रयोग इत्य पर शब्द्‌ प्रयोगे । इव शब्द्‌ स्य संभावनाद्योतकस्य प्रयोगा 
सिद्धस्वम्‌ । अत एव चात्र विषयस्यानुपादानमेव । तदुपादाने हि चदडारोपं रूपकमिति 
समनन्तरमेवोक्तम । अन्यन्न पुनः सवत्र विषयो पादानमेव न्याय्यम्‌ । 

तदित्थं मेदवेचिच्येणावस्थिताया उप्पर्ताया हेतुस्वरूपफलानां यथाद्वंभवं स्वरूपं 
द्शंयति- तदेवमित्यादिना । स ध्मंइति यं प्रस्येव हेतरप्प्रेचयते। अभ्यवसायवश्ादिति 
भदेऽप्यमेद्‌ाश्रयणात्‌। अभिन्न इत्यप्रञृतसंबन्धिना धर्मण । स इति निमित्तव्वेनाश्चितो 
धमः । नियमेनेति । अवाच्यः पुनन कद्‌ाचिद्धवर तीत्यथंः । अन्यथेति अवाच्यस्वे। के प्रति 
हेतुरिति 1 तस्यव फररूपत्वात्‌ । नहि य प्रव्येव हेरर्प्प्रे चयते तस्येवावाच्यस्वं युक्तस्‌ । 
साध्यमन्तरेण साधनस्य निवि षयत्वापत्तेः । यदि चास्य निमित्तमात्रस्वमेव स्यात्त 
द्वाच्यव्वमवाच्यत्व स्यात्‌ । एवमेक एव धर्मो हेतोरस्स्पेच्यमाणस्य निमित्तं फल 
चेति सिद्धम्‌ । एतदेव दशेयति-अपदयन्तावित्यादिना । तत्रेति हेतूरप्रत्तणे । निमित्त 
मिति तद्धिनोस्प्रे्णस्यानिष्पत्तेः । दिविधमन्र त्ञामतागमन तपोजनितमदशंनजनित 
च । तयोरध्यवसायवस्चाद्‌भिन्नव्वेनाश्रयणम्‌ । अतश्च हेतोरैक एव धर्मो निमित्तं फलं 
च । वस्तुतस्तु तपोजनितस्य निमित्तदवमन्यस्यतु हेतुफरूरूपत्वम्र्‌ । अत एव नेतरेत- 
राश्रयदोषः । द्वयोरपि भिन्नस्वात्‌ । मोनित्वमेवेति। न इनरन्यत्किचिदिव्यथः) अतश्च 
निश्चत्वादिजनित्य दुःलजनितस्य च मौनिष्वस्यामेदेनाश्रयणम्‌ । सर्वत्रस्यनेन समस्त 
रचयाविर्दधस्व हेतूखरक्तास्वरूपकथनस्योक्तष्‌ । 

एवं देतूरप्रेखाया यथासंभवं स्वरूपं प्रदश्यं स्वरूपोप्प्र्ताया अपि दर्छयति- 
स्वरूपोत्प्रक्षायामित्यादिना । 


छ्य शब्द का प्रयोग होने पर यथा--तुम्हारी कुचस्थली है तो अनघं [ भमूल्य ] तथापि 
म सोचता हू कि कामदेवने पसीने की पँजीभूत वृदो के बहाने इसे अधंयुक्त [ अधं = पूजा में 
जलां तथा मूल्य से युक्त] सावना दिया है।' इस उत्प्रेक्षा मे उन-उन शब्दों के प्रयोग रहने 
ओर न रहने के कारण अन्य अरकारों का भ्रम होने लगता है, अतः अन्य अल्कारों से मेद 
दिखने के लिय ग्रन्थकार छिखते है- 

तस्प्रयोग-उस अपरशब्द का प्रयोग [ अध्यवसाय कौ ] सिद्धता इसलिए किं संभावनाद्योतक 
इव शब्द का प्रयोग नदीं रहता, जर इसीलिए यहं सवदा विषय का अनुपादान ही रहता हे । 
उपादान हो जाने पर इृढारोप रूपक हो जाता है जेसा कि यदीं कुछ आगे कहा गया है । अन्य 
समी स्थछो मे विषय का उपादान ही उचित है । 

इस प्रकार अनेक प्रकार के भेदो से युक्त इस उत्प्रेक्षा के हेतु, स्वरूप तथा फेल नामक मुख्य 
वर्गो मे संभावित भेदो के स्वरूप वताते हए किखते है--तदेवम्‌ इत्यादि । ख धमः = वह 
धमे अथात्‌ जिसके किएरदहेतं की उत्प्रेक्षा की जाती है। अध्यवसायवश्ाव्‌ = अध्यवसाय के 
कारण अर्थात्‌ मेद रने पर भी अभेद मानने से । अभिन्न अथात्‌ अप्रकृत से संबन्धित धमं से । 


स = वह्‌ अथात्‌ निमित्तरूप से आभ्ित धमे । नियमेन = नियमतः सदा ही = अथात्‌ वह अवाच्य 


२०द अलङ्कारसवस्वम्‌ 


कमी मी नहीं होता । अन्यथा वच्यन होने पर । कंप्रति हेतुः = देतु किसक्रा होगा क्याकि 
वही फलसरूप रहता हं । देता ठीक नदीं कि जित्तके किटि दतुं की उ्त्प्रक्षा करी जा रही है वही 
अवाच्य हो वर्योविः तव साध्य के अभावे साधन निरर्थक दहो जाएगा । यदि यह कैव निमित्त 
ही होता तो यह वाच्य ओर अवाच्य दोनों हो सकताथा। इस प्रकार यह सिद्ध हआ कि 
एक ही धमं उत्परकष्यमाण हेतु का निमित्त मी होगा ओर फल मी। इसी तथ्य को उदाहरण द्वारा 
समञ्चाते दै-अपदयन्तौ° न देखते हए । तन्न हेतूपरेक्षा मे । निमित्त क्यांकिं उसके विना उच्प्र्ना 
की निष्पत्ति नहीं होती । य्दा दुव॑ल्ता दो प्रकार से आती दहं तपस्या से अर अददोन से। इन 
दानां को अध्यवसाय कै आधार परर अभिन्नल्प से अपनाएगणएरहैं। इसीलिए एक दही धमं देतु 
का निमित्त भी ह ओर फल भी । वस्ठतः तपोजनित दुर्बलता निमित्त दै ओर दूसरी दुवलता 
देठफलरूप्‌ । इसलिए यहाँ अन्योन्याश्रय दोष नदीं है क्योकि दोनों ही भिन्न हैं । 


मौ नित्वम्‌--अन्य कुछ नदीं । इसीलिए य्दा निश्वल्ता आदि से जनित तथा दुःख से जनित 


मौनित्व अभिन्न मान क्ट गए है । सर्वत्र रेसा कहकर हेतूतपरश्वा ॐ कथित स्वरूप का समस्त 
लक्ष्यो म अविरोध बतलाया । 
इस प्रकार दैतूतक्षा का स्वरूप यथासंभव दिखलाया । जव स्वरूपोत्प्क्षा का स्वरूप भौ 
वतरते हं-- 
[ सवसव | 
स्वरूपोत््रक्षायां यतर धर्मौ धर्म्यन्तर्गतत्वेनोत्पेक्ष्यते तत्रापि निमित्त 
भूतो धमेः कचिच्निरदिश्यते। यथा-न वः पायादिन्दुः इत्यादौ । अत्र 
ङटिखत्वादि निरदिषटतेव । वदैव रागसागरस्यः इत्यादो संश्चोभकारित्वादि 
गम्यमानम्‌ । यच्च च धमे एव धर्मिगतत्वेनोत्परक्ष्यते तत्रापि निभित्तस्यो- 
बद्नाचुपादानार्यां देविध्यम्‌ । उपादाने यथा- 
-भाप्याभिषेकमेतस्मिन्परतितिष्ठासति द्विषाम्‌ । 
चकम्पे छोप्यमानाज्ञा भयविहलितेव भूः ॥' 


अत्र भूगतत्वेन भयविदहछितत्वाख्यधर्मोत्परक्चायां कम्पादिनिमित्त- 
खपत्तिम्‌ । अनुपाद्‌ने यथा - लिम्पतीव तमोऽङ्गानि" इत्यादौ । अचर तमो- 
गतत्वेन छेपनक्रियाकतैत्वोपेश्चायां व्यापनादि निमित्तं गम्यमानम्‌ । व्याप- 
नादौ तूतपरक्षाविषये निमित्तमन्यदन्वेष्यं स्यात्‌ । न च विषयस्य गम्यमानत्वं 
युक्तम्‌ । तस्योत्प्क्षिताधारत्वेन धस्तुतस्याभिधातु बुचितत्वात्‌ । तस्माद्‌ 
यथोक्तमेव साधु । | 
ए व्वरूपोतप्रश्षा मे जहाँ धर्मा दूसरे धमी के मीतर उत्प्रक्षित होता दै वौ भी निमित्तभूत धमं 
हा निदिष्ट रहता है; यथा--वह चन्द्र आप की रक्षा करे० इत्यादि मे, यँ कुटिकत्वादि निदिष्ट 
दा ६ । -रागसमु्र कौ वेला = तटभूमि सी"-में वह गम्यमान अर्थात्‌ अनिर्दिष्ट है । 
, बहा का धमं ही धमीं के भीतर उ्यरेक्षित होता है वदां मी दो विधारे रहती है क्योकि 
घह्‌। निमित्त का कदी उपादान रहता है ओर कीं अनुपादान । उपादान यथा-- 
अभिषेक प्राप्त कर जव यदह अपनी प्रतिष्ठा चाहने खगा तो शुओं की भूमि जिस पर 


( शवो कौ | आज्ञा ठप होने बाी थी सानो मयविहल होकर कोष उठी 


उत्प्श्चालङ्ारः २ ०७ 


--यहां भूमिरूपी धमं के भीतर भयविह्लतारूपी धम की उत्प्क्षा की जा रही है ओर 
उसमे कम्प आदि का निमित्तरूप से उपादान किया गया है । अनुपादान यथा--'अन्धकार 
अगो को मान) लीप रहा है"-इत्यादिमे । वहोंजो तम कै मीतर ल्ेपन-क्रिया के कर्ठंत्व की 
उतपर्ता है उसका निमित्त है व्यापन ओर वह गम्यमान = अनुपात्त है। यदि व्यापनादि 
को उप्प्रेक्षा का मिपय माना जाय तो उसमें निमित्त कोई ओर द्यी खोजना होगा [ यदह एक दोष 
होगा ओर दूसरा दोष यह होगा कि य्ह] विषय [ व्यापन ] गम्यमान हे जो अनुचित है 
क्योंकि विषय ही तो प्रस्तुत होकर उत्तेश्षा का आधार होता ई अतः उसका राव्दतः कथन आवस्यकं 
दौता डे । इसलिए पहले जो [ तममे लेपन ] कौ उत््रश्षाकी जा रही है वही डीक रै! 

विमरिनी 

य्प्युददेशत एरैतस्स्वरूपोपपरे चायां निमित्तोपादानत्वानुपादानत्वमवगम्यते तथापि 
देतत्परक्ञायां यथा निसित्तोपादानमेव संभवति तथात्रापि न संभाव्यमिव्याश्येन पुनरिहे- 
तदुक्तम्‌ । | 

यदा चात्र धर्मो घम्यंन्तरगतत्वेनोप्प्रे च्यते तदा तन्न निमित्तस्य कदर पत्वं भवतीव्या- 
शङ्कयाह- यत्रेत्यादि । धमे एवेति । न पुनधंमीं धर्मिगतत्वेनेति । ध्मिभित्तितयेव्यर्थः। 
अत्र हि ध्मिणोऽन्यधर्मधमिष्वं निगीर्यान्यधर्मधमित्वमवस्थाप्यते । अत एवान्न धर्मी 
भित्तिभरूततया विषयः । घमिणं विना केवरस्येव ध्म॑स्य व्यवस्थापयितुमशक्यत्वाद्यव- 
स्थाप्यमानत्वे वा ध्ित्वमेव स्यात्‌ । वस्तुतस्तु धमं एवोप्प्क्ताविषयः । यन्निगरणे- 
नाभेदप्रतिप्िविंषयिणोऽवसीयते। स च निगीर्यमाणो धर्मः कचिढुपात्तो भवति कचि- 
च्चानुपात्तः। 

प्राप्याभिषेकम्‌” इव्याद्‌ावन्ये हेतूरपर्ञाव्वं-मन्यन्ते इव्युदाहरणान्तरेणोदाहियते- 

नवरोसद्‌ लिअ-घणनिरबलंब-संघडिअ-तडिकडप्प्च । 
नरहरिणो जद कडारकेसरे कंधरावधो ॥' 


जत्र कन्धरावधधर्मिणि सकेसरस्वं निगीयं सतडित्कटप्रस्व सुत्प्रक्तितम्‌ । कडारस्वं च 
निमित्तसुपात्तम्‌ । निगीयंमाणश्च धमों धर्मिंगतस्वेनोपात्तः। ठेपनक्रियाक्त्वोत्परक्षाया- 
मिति, जथांदाशङ्कितायाम्‌ । एवं हि तमोरेपनमिवेति प्रतीतिः स्मात्‌ । न चात्र तथेव्या- 


शङ्कयाह--व्यापनादावित्यादि । निमित्तमन्यदिति तिरोधायकत्वादि। तेन तमसि धर्मिगि 


च्यापनादिधमं निगीयं रेपनक्रियाकर्वस्वरूपो धर्म उषित इत्यर्थः । यदाह श्रीमम्मटः-- 


“व्यापनादि रेपनादिरूपतया संभावितम्‌' इति । यन्न च धर्मान्तरनिगरणेन धमं एव 
घमिभित्तितयोप्प्रेचयते तत्र भित्तिभूतत्वाद्विषयरूपस्य धर्मिणः समनन्तरोक्तनीच्या गस्य 


मानस्वं न युज्यत हव्याह ~न चेत्यादि । विषयस्येति। निगीर्यमाणोस्प्रेचयमाणयोधमयो- 
भित्तिभूतस्य धर्मिण दस्यर्थः। न तु निगीयमाणस्छेति व्याख्येयम्‌ । तस्य द्यु पादानानु- 
पादानाभ्यां द विध्यं भवतीति समनन्तरमेवोक्तम्‌ । तचोदाहतम्‌ । यथा वा- 
यत्पुण्डरीकं इव पावण एव वेन्दाविन्दीवरद्वयमिगबोदितमेकनारम्‌ । 
तत्पद्यरागनिधिमूरूमिवाधिगस्य सम्यग्जितं नयनयोमम आाग्यज्ञक्त्या ॥ 
अत्र मुखादीनासुस्प्रेाविषयाणामनुपादानाद्रम्यमानव्वश् । तस्येति धर्मिरूपस्य 


विषयस्य । उत्परक्षिताधारत्वेनेति । उप्प्रङ्ितस्य रेपनादेधमस्य व्यापनादिष्मनिगरणे- 


नोप्परक्ताविषयीकृतस्याधारस्वेन भित्तिभूततयेव्यथंः । ध्मिगमन्तरेण धमंस्यावि भ्रान्तेः । 
प्रस्तुतस्येति । अवश्यामिधेयस्येव्यथंः । 


। ॥ 
| 
॥ 
| 
॥ 


२०८ अलद्कारसवेस्वम्‌ 


एवं हेतुफरोर्प्र्योरपि धभमिगतस्वेनेवान्यधम॑हेतुकल्वं निगीर्यान्यध्महेत॒त्वमन्य- 
ध्म॑फरव्वं चाध्यवसीयते । अतश्च स धर्मी वाच्य एव भवति । यथोक्तो पपत्तेः । निगी्य- 
माणः पुन्धंमं एवोपादानाुपादानाभ्यां द्विषा । तत्त यथा--एषा स्थरीत्यादि । अन्न 
नूपुरस्य धर्मिणो बद्धमोनव्वे निश्चरत्वादि धमंहेतुकस्वं निगीर्यमाणश्चानुपात्तो धमः । उपा- 
त्तस्तु यथा- 
स्रणारसूत्र निजवल्क भायाः ससुच्सुकश्चाटषु चक्रवाकः । 
अन्योन्यविश्रेषणयन्त्रसुत्रञ्नान्त्येव चन्चुस्थितमा चक्रषं ॥' 
अत्र चक्रवाकस्याकपणे चाटुसमुव्सकटेतृष्वं निगीयं आन्तिहेतुव्वमध्यवसितम्‌ \ 
निगीयमाणश्च धमं उपात्तः । अनुपात्तस्तु यथा- 
कुमुदिन्यः प्रमो दिन्यस्तदानीमुदमी मिलन्‌ । 
नखिन्या भवृविरहानम्कानिमानमिवेखितुम ॥' 
अत्र कुमुदिनीनाप्रुन्मीलने चन्द्रोदयहेतु क्वं निगीयं दर्शनं फट्स्वे नोप््रे्तितधर्‌ । 
निगीयमाणश्च धर्मोऽनुपात्तः। 
तदेवं हेतुस्वरूपयोयंथासंभवं स्वरूपं ददायित्वा फलोप्प्र्ताया अपि दर्शयति- 
फलोत्प्रक्षायामित्यादिना । 
यपि स्वरूपोत्प्रक्षा में निमित्त के उपादान ओर अनुपादान दोनों ही स्वतः प्रतिपादित हो 
जाते हं क्योकि जहाँ ये भेद गिनाए गए है वहाँ निमित्त के उप।दान अनुपादान की चर्चाकी 
जा चुकी दै तथापि यहाँ इस विषय का उल्लेख जो पुनः किया गया उसका तात्पर्यं य्ह है कि 
जेते हेतूत्रक्षा मे सर्वत्र निमित्त का उपाद।न ही रहता है अनुपादान नदीं वैते स्वरूपोत्पेश्षा मेँ 
नही रहता [ अथात्‌ यहाँ निमित्त क¡ अनुपादान मी संमव होता हे ] । 
¢ रका दोती हे कि जव कोद धमं किसी अन्य धर्मी के भीतर उत्प्रभषित होता है तव निमित्त 
धसा होता हे [ उपात्त अथवा अनुपात्त ] । शस पर उत्तर देते है--यन्न ¶ त्यादि । धर्म एव = 
महीन कि षमी मी धमी के भीतर । धमिगत अर्थात्‌ धमीं को भित्ति बनाकर । यहाँ धर्मी में 
अन्य धमं से आने वाला धित्व छिपाकर अन्य ही धमं से जने वाला धमित स्थापित किया 
जाता हं । इसकिए यह धमी भित्ति के रूप मेँ उपस्थित रहता है इसिए वही विषय होता है, 
क्योकि धर्मी के विना केवल धर्मक स्थापना संभव नदीं होती, भौर यदि उसकी स्थापना की मी 
जाय तो वहां धर्मित्व ही सिदध होता दै, जवकि ऽप्प्रक्षा का विषव वस्तुतः ध्म हयी होता है। 
जिस [धमं] के निगरण [ छिपाने ] से विषयी मेँ अभेद प्रतीति होती है । वद जो निगीयमाण 
[ छ्िपाया जाने वाला ] धमं हे वह्‌ कदी उपात्त होता है मौर कदी अनुपान्त । 
प्राप्याभिषेक०" इत्यादि परध में कुछ लोग देतूतपक्चा मानते हैँ श्सकिए हम इसके जिए दूसरा 
उदाहरण प्रस्तुत करते है-- 
“नवरोषदलित-घननिरवलम्ब-संघरित-तडित्करम्रः । 
नरहरेजेयति कडारकेस्रः कन्धरावन्धः ॥” 
यहा कन्धरावन्ध है धमी । उसमे सकेसरत्व को छिपाकर संवरिततडित्करप्रत्व की उत्प्रेक्षा की 
गईं हे । इसमे निभित्त है कडारत्व, जो उपात्त दै । ओर निगीर्यमाण ( छिपाया जा रहा ) धं 
धर्मी के भीतर प्रतिपादित किया गया ३ । 
रेपनक्रियाकवृस्वोप्े्ायाम्‌ = (लेपनरूप क्रिया के कतल की उत्प्रेक्षा भी यदौ मानी जा 
सकती हे। तव तम का लेपन सा रेसी प्रतीति होगी । किन्तु यहाँ एेसा नदीं है"-रेसी शंका 


उत्पेक्चाटङ्कारः २०९, 


कर॒ समाधान प्रस्तुत करते है--व्यापनादो । निमित्तमन्यत्‌ = अन्य निमित्त अर्थाव्‌ तिरोधायकत्व 


आदि 1 इस पक्ष मे तम को धमी माना गया ओर उसमे व्यापनादि धमं को छिपाकर रेपन- 
क्रियाकरठत्वरूप धम की उत्प्रेक्षा कौ गई । जेसा कि श्री मम्मरने का है--ध्यापन आदि लेपन 
आदि रूप से उत्प्रक्षित किया गया 1 

(जहां कहीं दूसरे धमे को चछिपाकर किसी दूसरे धमकी ही धमीं के ऊपर उत्प्रेक्षा कौ जाती 

हे वहां आधारभूत धर्मी का गम्यमान होना = राब्दतः न कहा जाना उक्त रीति से टीक नहीं 
दोताः-इस अभिप्राय से लिखते है--*न चः इत्यादि । विषयस्य = विषय का अर्थात्‌ निगी्य॑माण 
[ छिपाया जाता ] तथा उग्परक्ष्यमाण [ जिसकी उत्प्रेक्षा कीजारही दहै] इन दोनों धमो की भित्ति 
वने हट धर्मी का। न करि निगीयंमाण का। क्योकि निगीयेमाण के विषय में कहाजा चुका है 
करि कहीं उसका उपादान रहता है ओर कहीं अनुपादान । इस प्रकार वह दो प्रकार काहोता 
है। ओर उसके उदाहरण भी दिए जा चुके हे । यह भी उसका एक उदाहरण है--पुण्डरीकं 
[ शवेतपञ्च ] अथवा पूणिमा के चन्द्रमण्डल ( चेहरे ) के वीच मानों पद्यरागमणि की निधि ( अधर ) 
से निकल कर जो एक ही ना ( नासिका ) मेँ दो नीलकमल ( नेत्र ) निकले हृए ह उन्हे पाकर 
मेरे नेत्रां की भाग्यराक्ति सव से बद गई" । यदं सुख आदि उत्प्रेक्षा के विषय हे किन्तु वे गम्यमान 
अर्थात्‌ शब्दतः अनुपात्त हें । | 

तस्य = उसके अथात्‌ ध्मिरूप विषय के । उप्परत्ताधारत्वेन = उ्प्रक्षा के आधारके रूपसे 
अर्थात्‌ व्यापनादि ध्म को छिपाकर उत्प्रेक्षा कौ वस्तु बनाए गए केपनादि धमेके आधारके रूप 

से अर्थान्‌ भित्तिरूप से ेसाइसङ्िएि किषमींके विना धमकी विश्रान्ति नीं होती । 
म्रस्तुतस्य = प्रस्तुत अथात्‌ अवद्य अभिधेय का । 

इस प्रकार हेतूत्प्रेक्षा ओर फलोत्प्रेक्षा मे मी अन्यधम॑हेतुकता को छिपाकर अन्य 
धममहेत॒कता का अध्यवसाय धमी के भीतर किया जाता हे । इसी कारण वह धमं 
नियमतः वाच्य ही होता है । कारण ऊपर बतलाया जा चुका है । निगीयैमाण 
अर्थाच छिपाया जाने वारा होता दहै केवर धमै, ओर वह भी उपादान तथा अनुपादान के आधार 
पर दो प्रकार का होता हे । यथा--टषा स्थलीः इत्यादि । इस पथमे नूपुररूपी धमी मं जो बद्ध 
मौनत्वरूपी धमे है उसका वास्तविक कारण है निश्चरत्व किन्तु उसे छिपा दिया गयाहे ओर 
उसके स्थान पर कारणरूप से दुःखहेतुकत्व कौ उत्प्रक्षा की गद है । इस प्रकार यर्दा जो निगीयेमाणः 
हे वह अनुपात्तहे ओर वह धमंदी है [ धमं नदीं ]। उपात्तधमं यथा-भ्वाट्‌ मे ससुत्सुक- 
चक्रवाक ने अपनी प्रिया की चच में रखे मरृणालसूत्र को मानौ एक दूसरे के वियोग के जनक यन्त्र 
क सूत्र के भ्रमसे खीच छिया[ विंक्र्ांकदेवचरित । ]' यहां चक्रवाक द्वारा किए गए खणालसुत्र 
के खीचनेरूपी काय॑ मे, है तो हेतु चाटससुत्सुकता, किन्तु उसे उस रूप से प्रस्तुत न कर यहां 
आसन्ति को देतुरूप से उप्प्रेक्षित किया गया । ओर जो धर्मं निगीर्य॑माण है अथीत्‌ कारण होने पर 
भी कारणरूप से प्रस्तुत नहीं किया जा रहा वह [ चाडसम॒त्सुकता ] यहां उपात्त दी हे । अनुपात्त 
धमं यथा- 

“उस ( चन्द्रोदय के ) समय प्रसन्न कुसदिनी मानो कमलिनी कौ प्रिय (सुय) के पिरहसे 
उत्पन्न म्लानि को देखने के किए खिल उटी।' 

--यदहां कुसदिनी के चिल्ने मे चन्द्रोदय हेतु है किन्तु उसे हेतुरूप से प्रस्तुत न कर दशैन- 
क्रिया को हेठरूप से प्रस्तुत किया गया है । इस प्रकार डुसुदिनी के विकास मे चन्द्रोदयहे त॒कत्व- 
रूपी वास्तविक धमे को छिपा दिया गया है ओर उसे शब्दतः कहा भी नहीं गया है । 

१७ अ० सख० 


२१० अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


इस प्रकार ८ उत्परक्षाके दो मेद) हेतूत्प्रेक्षा ओर फलोत्प्रेक्षा के स्वरूप यथाप्तंभव वतला 


दिर गए । अव फलोसरेक्षा का स्वरूप 'फलोपपरक्षायाम्‌' इत्यादि अगले मन्थ द्वारा वतलाते ह- 


[ स्वस्व | 
फलोत्परेक्ायां यदेव तस्य कारणं तदेव निमित्तम्‌ । तस्वालुपाद्‌ाने कस्य 
तत्फखत्वेनोक्तं स्यात्‌ । तस्मात्तत्र तस्य निमित्तस्योपाद्मनमेव न प्रकास- 
न्तरम्‌ । यथा-- 
“र थस्थितानां परिवतेनाय पुरातनानामिव वाहनानाम्‌ । 
उत्पत्तिभूमो तुरगोत्तमानां दिदि प्रतस्थे रविरुत्तरस्याम्‌ ॥।' 
अत्राश्वपरिवतंनस्य फलस्योत्तरदिग्गमनं कारणमेव निमित्तत पन्तम्‌। 
फलोत्प्रेक्षा मेँ उस (फल ) का जो कारण होतादहे वदी उसका निमित्त होतादै, यदि 
उस ( निमित्त) का उपादान न किया जाय तो वह (फक) किंसका फल सिद्ध होगा ? इस कारण 
फलोत्प्रेक्षा मे फल के निमित्त का उपादान ही होता दै, अन्य अनुपादान नदो । यथा-- 
¶ वसन्त के समय ] सुय, मानो रथम जुते पुराने धोड़ांको बदल्ने के किए उत्तरदिदा की 
-ओर चला जहाँ उत्तम धोड़े उत्पन्न होते हैँ [ 'विक्रमांकदेवचरितः ] 
--य्हा घोड़ों का बदलना फल है ओर उसका कारण हे उत्तरदिश्चा मे जाना। यद्य यों 
-निभित्तरूप से उपात्त हे । 
विमरिनी 
तस्येति फलस्य । एतच देतूरपर तावि चारग्रन्थविन्रृतेरव गतार्थमिति अन्थविस्तरथयान्न 
सुनरायस्यते । तदेवं मन्धक्दात्मनः श्काघां कटाक्तयन्नेतदुपसंहरति- 
तस्य = उसका अथीत्‌ फर का । यद्‌ सव विचार हमारी टीका मेँ हेतूत्प्रेक्षा पर न्विट गण 
विचार से गताधर हो जाता हे अतः अन्धविस्तार के भय से अव पुनः विचार नीं करते । 
इस प्रकार विवेचन कर यन्धकार अपनी प्ररंसा व्यक्त करते हए उत्प्रेक्षा प्रकरण का उपसंहार 
करते है । 
[ सवंस्व ] 
तदसवुव्पेक्षायाः कक्ष्याविभागः प्रचुरतया स्थितोऽपि टक्ष्ये दस्वा- 
रत्वादिह न प्रपञ्चितः। तस्यश्ेवादिशन्दवन्मन्येदाब्डोऽपि परतिपादकः। 
क्ति तूत्पक्षासामध्रयभावे मन्ये्ब्दध्रयोगो वितकमेव प्रतिपादयति । यथो- 
दाहतं प्राक्‌ “अहं त्विन्दुं मन्ये स्व दृरिविरहः इन्यादि ¦ 
तो इस प्रकार उच्प्रश्षा का वगीकरण प्रचुररूपसे किया जा सकता है, तथापि ( उदाक्रण- 


रूप ) लक्ष्य मेँ इनका समञ्चा जाना कठिन है फलतः [ हमने वर्गीकरण को ] समर्प से प्रस्त 
-नहीं किया । 

षस [ उत्प्रेक्षा ] का प्रतिपादन जैसे दवादि चन्दो द्वारा होता है उसी प्रकार 'मन्येः-रब्द- 
दारा मी, किन्तु यदि उत्प्क्षा की सामग्री नदीं रदती तो मन्येः-रब्द का प्रयोग केवल वितर्क 
मघ्नकाही प्रतिपादन कर पाता है। जैसा कि पहले ( अपहुति प्रकरण मेँ) उदाहरण दिया 
जा चुका है-भ तो चन्द्रमा को मानता द्व वम्दारे रओं के विर्‌ ० -इत्यादि । 


उत्प्रक्षालङ्कारः २११ 
विमशिनी 


तदसावित्यादि । अस्याश्च वाचकञ्यवस्थां दुशंयति--तस्यारवचेत्यादि । उस्मरे्तासामभय- 
भाव इति संभावनाप्र्ययात्मकस्वामावात्‌ । प्रागिति, अ पहतौ । 
एवमिवरन्दोऽपि कचिद्धितकमेव प्रतिपादयति । यथा-- 
छृत्तानुपूवं च न चातिदीघं जङ्घे शमे खृष्टवतस्तदीये । 
दोषाङ्गनिर्माणविधो विधाटरछवण्य उत्पा इवास यरनः ॥' 
इयं च सेदेऽभेद्‌ इत्या्यतिशयोक्तिमेदमस्यपि दश्यते 1 तत्र मेदेऽभेदो यथा--परथ्वी- 


राजविजये-- 
गृहणद्धिः परया भक्त्या बागछिक्गपरम्पराः । 


अन्मदेव यत्सेन्येर्निरमीयत नमंदा ।' 
अत्र नमंदाया असेदेऽपि सेदः । संबन्धेऽसंबन्धो यथा-~ 
अद्रैतं तद्धवतु भवतां संविदद्रेतपुष्टये चमाश्वस्पुत्रीपरिवढरमाकान्तदेहद्वयस्य । 
यत्राकाऽ्ण्यं निज इव विदृन्दक्तिगार्धप्रभाभिर्देहेऽन्येष।सपि पुररिषुः काष्ण्यंमन्तः प्रमा ॥' 
अचत्र काष्ण्यंसंबन्धेऽप्यसंबन्धः । असंबन्धे संबन्धो यथा-- 
तीरत्ताछितिचन्दरेव नीली घौ ताम्बरेव च। 
रङ्कोक्ञिखितषूर्येव वसन्तश्रीरजम्भत ॥' 
अत्र त्तीरत्ताङितव्वा्यसरंबन्धेऽपि संबन्धः । कायेकारणयोस्तुल्यकारूतवे यथा-- 
यरसेव सहोद्‌ भूतः श्चि येव सह व धितः । 
तेजसेव सहोद्भूतस्स्यागेनेव सहोष्थितः।." 
पौर्वाप्यविप्यये यथा-- 
शराः पुरस्तादिव निष्पतन्ति कोदण्डमारोपयतीव पश्चात्‌ । 
अन्वक्प्रहारा इव संघटन्ते प्राणानिद्िषः पूवंमिव स्यजन्ति ।\" 
कायंकारणयोर्विंपयंयेऽपीयं दश्यते यथा-- 
सेयं सततवततम।नभगवद।गाचनेकाम्रताग्यग्रोपान्तरुताविसुक्ूङसुमा चन्द्रसूतिनंदी । 
यस्याः पाण्डुर इण्डरोकपट ष्याजेन तीर द्र ये शश्वष्पावणचन्दमण्डकश्तानीव प्रसूते जरम्‌ 
अत्र नमदातश्चन्द्रस्यो्पत्तिप्रतीतेः कायकारगविपयंयः । कमिकविपयंयेणापीयं 
उश्यते यथा-- 
अखवंगवंस्मितदन्तुरेण विराजमानोऽधर पल्लवेन । 
समुरिथितः कीर विपाण्डुराणि पीत्वेव खयो द्विषतां यशांसि ॥' 
अत्र समुत्थानानन्तरभाषिनो यशःपानस्य पूतनिशास्कमिकविपर्ययः । अत्रैव 
'पिबन्निवोच्चेः' इति पाठे ह कऋमिकयोः समकारूभाविन्वम्‌ । 
इस [ उत्प्रेक्षा ] के वाचक पदो की व्यवस्था पर प्रकाश डालते ह--^तस्याश्च' = इसका । 
उत्प्ेलासाममरयभाव = अर्थात्‌ ज्ञान का संभावनत्मक्त न होना । प्रकर=पदले अथात्‌ अपति 


प्रकरण मे । 
[ जितत प्रकार मन्ये शाब्द वितकौमात्र का प्रतिपादन करता है] इसी प्रकार इव दाब्दं भी 


वितकंमात्र का प्रतिपादक होकर रह जाता हे । यथा- 

'उस [ मगवती पावती ] की शुम, ऊपर से नीचे तक वलुराकार तथा अनधिक लम्बी पिद- 
रिर्य बना लेने पर अन्य अंगों का निमांण विधाता ने कदाचित्‌ नवीन रावण्य इका कर किया 
दोगा [ कुमार-१ | ।' | 


॥ 


२१२ अल्ङ्कारसवस्वम्‌ 


[ यष नवीन लावण्य की कल्पना मात्र की गईं ह । उसका किसी पर संभावनात्मक आरोप 
नदीं किया जैसे भेरी समञ्च मे तो सुख चन्द्र हैः- इत्यादि उक्तिर्थो मेँ किया जाता हे |] । 

यह्‌ उत्प्रेक्षा मेद ओर अभेद इत्यादि अतिरायोक्ति के जो भेद दँ उनसे भी युक्त रदती ह । 
यथा भेद मे अभेद का उदाहरण पृथ्वीराजविजय कान्य मे- 

जिसके अत्यन्त भक्ति के साथ बाण- लिङ्गां [ भगवान्‌ शंकर के लिङ्गां कदाचित्‌ बाणाड्र 
दारा स्थापित शिवल्गों ] का स्पञ्चं कर रहे सेनिकां ने नर्मदा को अनर्मदा स्रा वना दिया ।' 

यदो नम॑दाएक दही है तथापि उसमें मेद की कल्पना की गईं हे । 

संवन्ध मं असम्बन्ध का उदाहरण यथा- 

भगवान्‌ दिव तथा भगवान्‌ विष्णु केदो ( क्रमद्ः गौर तथा इयाम) शरीरो का अद्वैत 

हमारी अद्वैत बुद्धि का पोषक हो, जिस { देदद्याद्वैत) में ८ विष्णुरूप ) दाहिने देहार्धं की 
( दयाम ) कान्ति को अपने इारीर में कालच समञ्च भगवान्‌ रंकर (न केवल उसे ही पाते 
है अपितु ) अन्य लोगों ( भक्तं ) की मानस कार्टोच भीर्पोछदेते हें) 

- यहाँ कार्लोच का रिव से संबन्ध न होने पर भी संबन्ध प्रतिपादित किया गया दहै। 
असंबन्ध मे सम्बन्ध का उदाहरण यथा- | 

"वसन्त श्री अंगड़ादं ठे रही थी, उसका चन्द्रमण्डल मानों दूध से धो दिया गया था; 
आकाश मानों नीक से नहला दिया गया था ओर सुयमण्डल मानँ टंक (छेनी ) से खडोल वना 
दिया गया था 

- यहां दूष से धोना आदि चन्द्रमण्डल आदि में नहीं था तथापि उसकी वदाँ कस्पना कर 
ली गद है । 

कायकारण का एक साथ उदन्न दोना यथा-- 

(मानों य के साथ उत्पन्न हआ, मानो श्री के साथ ब्ृद्धिगत हआ, मानों तेज के साथ 
जनमा, मार्नो त्याग के साथ उठा ।' 
--[ यहा वक्तव्य यह हे किं वण्य॑मान न्यक्ति के जन्म, बृद्धि उत्थान यद्रा आदि के कारण 
हए, किन्तु वे इतने शीघ्र हो गए किं कारण ओर कायं मेँ कालक्रम प्रतीत नहीं हआ ] 
कायकारण के पौवांपर्य मे वैपरीत्य यथा-- 

बाण पदे ही निकल पड़ते हे [ यह्‌ वीर ] मानां धनुष वाद मे चदढाता है, [ओर बार्णो 
के ] प्रहार बाद में होते हँ राच प्राण पद्िलेदी छोड देते हें ।' 

कारण का कायं ओर कायं का कारण वनना यथा- 

“--यहु है वह्‌ चन्द्रमा से उत्पन्न होने वाटी नदी [ नर्मदाजी ] जो तीर लता्ओं से पुष्प 
व्रसा बरसा कर सदा ही भगवान्‌ रिवके छ्गिकी पूजाम एकाय्चित्त रहे आने मे व्यय 
हे ओर जिसका जर दोनों तो पर निकठे वेत पद्मं के वहने मानों सदादी पूणिमा के 
सकद चन्द्रमण्डल पैदा किया करता है । 

--यहां नभदा से चन्द्रमा की उत्पत्ति प्रतीत होती है इसकिए कायै कारणम विपर्यय हमा 
[ क्योकि कोयं = नम॑दाजी से उनके कारण = चन्द्र की उत्पत्ति वतलाई गई । | 

क्रमिक वस्तुओं में क्रम का वैपरीत्य होने पर भी यु [ उत्प्रेक्षा ] दोती दहै, 

| विक्रमांकदेवचरित, १।५० मँ विधाता की चुर्ट सै एक अदू सुत पुरुप उत्पन्न हआ ] जो 
अत्यन्तं गर्वे स्मित से उद्धासित अधर से विराजमान था अतः मानो तत्का शारु का 
दुग्धधवल यदा पीकर पैदा हआ था । 


कि 


उत्परेक्चालङ्कारः २१३ 


--यदां यश का पान उत्पन्न होने के वाद संभव है किन्तु उसका वणैन उत्पन्न होने के पूवे कर 
दिया गया । इसलिए याँ [ क्रमिक वस्तुओं में विद्यमान स्वाभाविक | क्रमका विपयेय हआ) 
य॒दि इसी पयमे “पीत्वेव सयः" कै स्थान पर “पिवन्निवोच्चेःः--"पीता इआ साः पाठ कर दिया 
जाय तो यदी उदाहर ग क्रसिक पदार्थो की एक साथ उत्पत्ति का उदाहरण बन सकता हे । 

विमश--उग्तरेष्ठा का पूर्वेतिदास-- 

भामह -अविवक्षितसामान्या किचिच्चोपमया सह्‌ । 

अतद्गुणक्रियायोगादुत्प्क्षातिदयान्विता ॥ २।९१ काव्य्‌[ल० । 
किरुकव्यपदेशेन तरुमारुद्य सवतः । 
दग्धादग्धमरण्यान्याः पर्यतीव विभावसुः ॥› २।९२ ॥ 

--“ जिसमे सादृश्य बतलाना अभीष्ट न हो तथापि उपमा कौ आंरिक सामयी हो साथ दी अतिराय 
दारा भिन्न वस्तु के गुण ओर क्रिया रूप धर्माका संबन्ध भिन्न वत्तु मे बतलाया वह उत्प्रेक्षा होती 
हे । यथा--परे टेषु के वहनि मान। अग्नि वृक्ष पर चद कर जंगल के जले-अनजले स्थान देख 
रहा है ।› 

वामन--[ सूत्र ] “अतद्रूधस्यान्यथाध्यवस्षानमत्तिशयार्थमुस्प्क्षा 1” 

[ वृत्ति ] अतदूरूपस्य अतत्स्वमावस्य, अन्यथा तत्स्वमावतया अध्यवस्ानमध्यवसायः, न 
पुनरध्यारोपो लक्षणा वा, अतिशयथेमितिं भ्रान्तिज्ञाननिवृच्यर्थम्‌ । सादुद्यादियसुस्परक्षति । 

--जिस वस्तु का [ गुण क्रियादि रूप जो स्वभाव है उसे छिपाकर उसमे] जेसा नदीं है 
उसमें वेते स्वभाव का अध्यवसाय = ज्ञान कराना है उप्परेक्षा। इसत आरोपया लक्षणा नहीं 
दोती । इसमे भतिशय रहता है भ्रान्ति नदीं । यह अलकार सद्रश्यमूर्क होता है। उदादरण- 
स वः पायादिन्दुनवविस्रताकोटिकुटिकः 1 

उद्धर = '“साम्यरूपाविवक्षायां वाच्येवाचात्मभिः पदैः । 

अतद्गुणक्रियायोगादुत्प्रक्षात्तिशयान्विता ॥ ३।३ ॥ 
लोकातिक्रान्तविषया भावाभावाभिमानतः । 


सभावनेयसुत्परक्षा वाच्येवादिभिरिष्यते ।३।४॥ --अलंकारसारक्तग्रह । 

--'यत्रेवादिपदनिवन्धः साम्यस्य च रूपं न विवक्ष्यते तत्रो्प्क्षाख्योलक्कारः । ०००० । अत्र 
असः अग्रकृतो योऽथस्तस्य ये युणक्रियाः तद्योगात्‌ साम्यल्पाविवक्षायामपि इवादिराब्दप्रवृत्तिरवि 
रुद्धा 1 ०००० । तेन अतद्गुणक्रियायोगादस्या इवादिवाच्यत्वम्‌ । ०००० । पुराणप्रजापतिविहित- 
रूपविप्यासेन कविवेधस। पदाथैस्य गुगातिशयविवक्या रूप।न्तरमप्यासङ्क्तं रा्यते । इयं चोत्प्रेक्षा 
बहिरसंभवतः पदाधस्य संमवरदहूप तयो एवणैनादछोकातिक्रान्तमिषया संभावना ।' --लघुवृत्तिः । 

-- जहा इवादि शब्द तो प्रयुक्त रहते है । परन्तु उपमा की विवक्षा नदीं रहती अथात्‌ प्रकृत 
से भिन्नजो अप्रकृत अथं उक्तके धमै युणक्रियाका प्रकृत मेँ अस्तित्व बतल्ाए जाने से इवादि 
उपमा वाचक पदो का प्रयोगतो होता है किन्तु उपमा तात्प्यविषयीभूत नहीं रहती । इस 
लिए यह्‌ इवादि पदा से वाच्य होती दै। भिन्न वस्तुके गुण भिन्न वस्तु में भले ही विधाता 
कीचष्टिमेनजा सक विन्तुक्वि कीसष्टि म यह असंभव नदींहे। इसलिए यह उस्रेक्षा 
जिन विषयों को लेकर चरती है वह प्रायः अलोकिक = लोकभूमिका से ऊपर उटेहए होति 
हैँ अत एव वे संभावनाश्चित होते है । यह सम्भावना भावात्मक पदार्थौ कौ भी होती है ओर अभमावा- 
त्मक ५, कोभी। इसी प्रकार जब शव" आदि शब्दाोका प्रयोग रहतादहै तो यह वाच्य 
होती हं।' 


ज~ = 


२१७ अलङ्कारसवस्वम्‌ 


उदाहरण यथा मावात्मक विषय की संभावना- 
“अस्याः सदाकंविम्बस्थष्ृष्टिपीतातपेजेपेः । 
रयामिकाङ्केन पतित सुखे चन्द्रभ्रमादिव ॥ १॥ 

“पावती जी ने जो जप किया उसमे वे सदा दही सूयविम्व पर दृष्टि लगाए रही भौर नेतरो 
दारा सूर्यातप का पान करती री, [ मौर चन्द्रमण्डल भी ठेसा दी करता] इसलिए उनके 
मुखमण्डल पर जो सोँवलापन आयादे सो चन््के भ्रम से मानां [ चन्द्रमण्डल गत ] कल्कः 
यहाँ जा पहुंचा हे ।› अभावात्मक विषय की संभावना-- 

(कपोलफलकावस्याः कष्टं भूत्वा तथाविधौ । 
अपदयन्ताविवान्योन्यमीटृक्षां क्षामतां गतो ॥ २ ॥ 

रुद्रट = ( १ ) अतिसारूप्यादेक्यं विधाय सिद्धोपमानसद्‌मावम्‌ । 

आरोप्यते च तस्िमिन्नतद्रुणादीति सोत्प्रक्षा ॥ 
'चम्पकतरुशिखरमिदं कुखमसमूह च्छलेन मदनरिखी । 
अयसुच्चैरारूढः परयति पथिकान्‌ दिधक्चुरिव ॥ ८।३३ ॥ 
( २ ) सन्येत्युपमेयगतं यस्यां संमाग्यतेऽन्यदुपमेयम्‌ । 
उपमानप्रतिवद्धापरोपमानस्य तत्वेन ॥ ८।३४॥ 
 आपाण्ड़गण्डपालीविरचितसखगनाभिपत्ररूपेण । 
रारिदाङ्कयेव पतितं लाज्छनमस्या मुखे सुतनोः ॥ ८1३५ ॥ 
( ३ ) `यत्र विरिष्टे वस्तुनि सत्यस्तदारोप्यते सम तस्य । 
वस्वन्तरमुपपत्या संभाव्यं सापरोप्प्रक्षा ॥ ८।३६ ॥ 
अतिधनकुद्भुमरागा पुर.पताकेव दृ दरयते सन्ध्या । 
उदयतरान्तरितस्य प्रथयत्यासन्नतां भानोः ॥ <८।३७ ॥ 

--८१)जहां पहले तो उपमान तथा उवमैय का मत्यन्त सादृदय के आधार पर अभेद बतलाया 
जाय फिर उपमान का सद्भाव सिद्ध बतला कर उपमेय मे उपमान [ युणक्रिया कूप ] धर्म का 
आरोप किया जाए--वदीँ उत््क्षा होती है । यथा- 

(कामरूपी अग्नि पूलँ के वहाने चम्पक तर की चोटी पर चद्कर पथिको को देख रदा है मानों 
वहु उन्हें जलाना चाहता है ।' 

-( २) दूसरी उप्मरक्षा वह होती हे जहाँ प्रसिद्ध उपमेय मे एक अन्य उपमेय की कस्पना 
करी जाय ओर इस कदिपत उपमेय मेँ प्रसिद्ध उपमान पर आरोपित एक अन्य उपमान के अभेद 
वौ संभावना कौ जाय । यथा-- 

। “पीले कपोलं पर बनी कस्तूरी की पत्रलेखा के रूप सेइस तनु के मुखमण्डकके भीतर 
| चन्द्रमा कौ रका से मानो लान्छन भा पड़ाहै। 

| [--स्पष्ट ही दोनों लश्चण ओर दोनो उदाहरण भामह तथा उद्धट के लक्षण ओर उदाहरणं 
| के मावानुवादमात्र दै । ] | 

| --‹ ३) एक उत्प्रेक्षा वह भी होती हदे जिसमें योभनत्व अडोभनत्व आदिगुणों से थक्त वास्त- 
विक पदा्थैमे उसी जैसे किसी अवास्तविक पदाथ की युक्ति के आधार पर संभावना की 
जाती है । यथा-- 

मेषं पर धना ङुंकुमराग क्षि हए यह प्रातः-सन्ध्या दूर से दिखा दे रही मानों पताका 
दे, जो ४ रही दै किं सूर्यं [कारथ) उदयगिरि के पीछे छिपा है ओर उसका उदय 
आसन्न है । 


+ ४ > ०० 
~ ~= ~~~ - ~ न ज न ॐ 


| 
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7 


र ण 


उत्परक्षालङ्ारः २१८ 


[--यदह्‌। रागविरिष्ट॒संध्यारूपी वास्तविक पदाथ पर पताकारूपी एक अत्यन्त कस्पित 
पदाथं ललोहं की समानता प्र॒ संभावित किया गया । पताका की संभावना युक्तियुक्त है क्योकि. 
रवि यदिञआरहाहै तो उसके साथरथका होना आवद्यकहै ओर रथै तो उसके ऊपर 
पताका । नमिसाधरु ने मी उस्परक्षा के कुर मेद प्रस्तुत किए हैं ] 

रुद्रट ने अत्तिशयनामक वगं मे भी एक उप्प्क्ा स्वीकार की है। उसका लक्षण उरन्ोने इसः 
प्रकार किया है- 

यत्रातितथाभूते संभाव्येत क्रियायप्तंभान्यम्‌ । 
सभूतमतदति वा विज्ञेया सेयसुत््रेक्षा ॥ ९।११॥ 
अन्यनिमित्तवद्याद्‌ यद्‌ य॒था भवेद्‌ वस्त तस्य तु तथात्वे । 
हेत्वन्तरमतदीयं यत्रारोप्येत सान्येयम्‌ ।। ९।१४ ॥ 

अथांत्‌--किसी पदाथ मे असंभाव्य क्रिया आदि की संभावना करना अथवा किसी पदाथमें 
अभूत क्रियादि को संभूत बतलाना, यथा चँदनी अंगअंगकोलीपसी रही हे ओर राजः 
प्रासाद नील्मणि के फरो पर पडती चाँदनी से पवित ओर प्रतिबिम्बित तारों से पुष्पित था । 

--अ्थांत्‌ वस्तु कौ निष्पत्ति में प्रसिद्ध कारण को छोड अन्य ही कोई कारण बतलाया जाना । 
यथा--वरसा मं जव ताराव पानीसे खूब भर गया तब मानों नील हंस के विखोह से दुःखी 
होकर कमलिनी पानी में डूब गईं । 

मम्मट = संभावन मथोत्परक्षा प्रक्रतस्य समेन यत्‌ 

--उपमैय का उपमानल्प सते संभावन उत्प्रश्रा है। यहाँ म्म ने संभावन-रब्द आल्कारिकः- 
परम्परा से अपनाया हे किन्तु टीकाकारो ने उसे अपने मन से इस प्रकार स्पष्ट किया है-- 
“उत्कटोपमानेककोटिकः संशयः संभावनम्‌” अर्थात्‌ उस संशय को संभावन कहते है जिसमे उपमान 
को अर बुद्धि का काव अधिक हो । ष्दिष्ट्या धूमाठुलितष्टेरपि यजमानस्याहुत्तिरग्नावेव पतिता ॥” 

शोभाकर = अल्काररत्नाकरकार शोभाकर मिश्र का उत्प्रेक्षा लक्षण पठे दय उद्धृत किया 
जा चुका हं । 

परवत्ता अप्पय्यदीक्तित = 'त्रान्यधर्म॑सम्बन्धादन्यत्वेनोपतकितम्‌ । 

प्रकृतं हि भवेत्‌ प्राज्ञास्तासुस्प्रक्षां प्रचक्षते ॥ 

- -जह्‌ प्रकृत ( उपमेय ) अपने से सिन्न पदाथ ( उपमान ) के धर्मो के संबन्धं से तद्रूपः 
से तकित ।केया जाय वहां उत्प्रक्षा होती हे [ यहाँ भावन के स्थान पर उपतर्वित शब्द महत्व. 
पूणं दे | इसी प्रकार- 

रसगगाधरकार पण्डितराज जगरनाथ .तद्धिननत्वेन तद्भाववच्वेन वा प्रमितस्य पदार्थस्य रम- 
णीयतदवरत्ति-तत्समानाधिकरणान्यतर तदधमैसम्बन्धनिमित्तकं तन्वन तद्वत्वेन वा संभावनसुस््ेक्षा' \ 


इस लक्षण मे धमीं तथा धर्मं इन दोनों की उत्पेक्षा के लक्षण मिलादिए गए हैः । उनके पृथक्‌ 
रूप ये मः 


धमो = सुन्दर साधारण धमै के आधार पर भिन्न पदाथ की अभेद संभावना उत्प्रेक्षा होती है । 

धमं = अपने साथ रहने वाले सन्दर साधारण धर्मं के भाधार किसी रेते धम की किसी पदार्थ 
म संभावना उत्प्क्षा होती है जो धमं उस पदाथ मेँ वस्त॒तः न रहता हो 1 

इस प्रकार उम्प्रक्षा प्रत्येक आलकारिक को अलंकाररूपसे तो मान्य है किन्तु उसके स्वरूप 


म उनकी मान्यतार्पं भिन्न हैँ । भामह ओर वामन इसे अत्िराय भर अध्यवसाय पर निभैर 
मानते हं । उद्भट इसमें पहिखी बार अतिदाय के साथ संभावना को भी स्थान देते है। रुद्र 


॥ 
| 
| 


० ज क कद्र 


२९द अलङ्कारसवंस्वम्‌ 


अत्तिराय को छोड संभावना के साथ आरोप को अपनातते हैँ । यथपि उनका आरोप अतिशय से 
भिन्न प्रतीत नहीं होता किन्तु वे ठेतिहासिक अतिराय दाब्दं को छोड देते हें । मम्मट अतिशय 
ओर आरोप दोनों को छोड एकमात्र संभावना को उत्प्रेक्षा मानते ह। अलकारसटस्वकार 
अपने पूववत्ती आचार्यो मे से भामह ओर वामन को मान्यता प्रदान करते ओर अध्यवसाय 
को उत्परक्षावीज मानते दँ । सोभाकर मित्र इसके विरुद्ध उद्धर दारा प्रवत्तित, रुद्रट द्वारा अनुमोदित 
तथा मम्भट द्वारा सिद्धान्तिति एकमात्र संमावना कौ उत्प्रक्षावीज मानते है । विदोषता यह दै 
कि सर्वस्वकार संभावना.पक्ष का खण्डन नहीं करते जव कि रत्नाकरकार रोभाकर अतिदाय 
अथवा अध्यवसायपक्ष का स्पष्टतः खण्डन करते हे । विमरिनीकार जयरथ रत्नाकरकार को उत्तर 
देते ओर सवंस्व का समर्थन करते टै । अप्पय्यदीक्षित लक्षण में तो संभावना या अध्यवसाय 
-शब्द को छोड़ उपतकं राब्द को स्थान देते है किन्तु वे वृत्ति में (तकः संभावनामात्रम्‌, न त्वव- 
वारणम्‌ , तदीयधमां हि तत्तादात्म्यसंभावनामाव्रहेत॒ः, न व्याप्निपक्षमेतावदिज्ञवद्‌ अवधारणदैतुः"-- 
अथांत्‌--^तकं का अधं यदँ केव संमावनामात्र है, निश्चय नदीं। एक में दूसरे के धमे का 
अस्तित्व दोनो की अभिन्नता की संभावनामात्र कराता है, व्याति ओर पक्षधम॑तासयुक्त देत के 
समान निद्वय नदीं --इस प्रकार तकं को संभावनारूप मान संभावनापक्ष के अनुयायी हं । 
-रुद्रट के आरोपपक्ष का समथन कोद नदीं करता, अतः प्रथम ओर अन्तिमरूप से यह पश्च रुध्य 
तक ही सीमित है इस प्रकार उत्परक्षालक्षणमेंदो दही प्रधान पक्ष ठरते है एक अध्यवसाय या 
अतिशय का मौर दूसरा संमावना का। पण्डितराज जगन्नाथ के उत्त्रक्षाविवेचन से इन दोना 
पक्षा का टीक सो समन्वय हो जाता है । उन्दोँने ठीक उसी प्रकार उ्म्रेक्षा मेँ विषयभूत धम का 
अध्यवसाय माना है जिस प्रकार विमरिनीकार तथा मूल सवैस्वकार ने। “छिम्पततीव तमोऽङ्गानि 
इसका उत्तम उदाहरण हे । यदो €्यापन'-अनुक्त दै अतः निगीणे है । यही दृसरे शब्दों मं व्यापन 
आ अध्यवसाय हे। विमरदिनीकार ने उक्त धमं को मी अध्यवसित माना है ओर अध्यवसाय 
का अथं केवर इतना दी किया है किं उस धम पर अन्य ध्म की संभावना न कर उस धम॑से 
युक्त धमां पर उस धमं कौ संभावना करना । उदाहरण के रूप मेँ उन्दने ध्यृण लसूत्रं निजवछ- 
भायाः" -इत्यादि प्रच प्रस्तुत किया है । यह अध्यवसाय संभावना का अंग वन जाता दै, अतः 
दोनों मेँ कहं विरोष नहीं होता । पण्डितराज जगन्नाथनेभी रसगंगाधर में--“तनयमेनाक- 
गवेषण-लरम्बकृत-जल्धिजठर-प्रविष्ट-दिमगिरिभुजायमानाया मगवत्या भागीरथ्याः सखीः पुत्र 
मैनाक की खोज के छि पलाईं अत एव समुद्र मेँ प्रविष्ट हिमाचर की मुभा सी जो भगवती 
भागीरथी उसकी सखी यसुना"-इस उदाहरण मेँ विषयी युजा की लम्बाई ओर समुद्रप्वेदा के द्वारा 
गंगारूपी विषय की स्वामाविक ठम्बाईं ओर समुद प्रवे को अभेदाध्यवसानातिरायोक्ति' द्वारा 
अभिन्न मानकर उभय साधारण वतलाया है । --“एवं च विषयि-गततादृश्चगवेषणफलक- लम्बत्वजल- 
धिजटठरप्रविषटत्वाभ्यां विषयगतयोः साहनिकलम्बत्व-जलधिजठरप्रविष्टत्वयोः अभेदाध्यवसानातिश्च- 
योक्त्या साधारण्यसंपत्तौ निमित्तताः--[ ए ३७७ निणयसागरीय संस्करण-६ ]। उनके उत्परक्षा- 
करण से एसे अनेक उद्धरण चुने जा सक्ते है । 
 प्रदन यह्‌ है कि उतयरक्षावोष मे वस्तुतः प्रधानता किंस तत्व की है अत्तिशयतत््व की अथवा 
सभवनतत्त्व को । अतिश्ययतक््व बुद्धिधारा को अभेद की ओर ले जाता है ओर संभावनतच्व प्य 
कौ ओर । मेँ तो सुख को चन्द्र॒ मानता हू--यह बोध वक्ता के“--समुख ओर चन्द्रः 
दोनों भिन्न हँ अथवा अभिन्न”--इस मेदामेदविषयक संदाय पर मी निर्भर माना 
जा सकता हे ओर “यह मुख है अथवा च> इस संय पर मी । इसी प्रकार "चन्द्रमा कौन 
सा है यह ( सुख ) अथवा. यह्‌ ( चन्द्र )'-इस संशाय पर मी । इन सव संदर्यो मे मुल प्रदन एक 


उत्येश्षालङ्ार २९१७ 


ही है अभेद का । विन्तु चमत्कार अभेद प्रतीति में नदीं है। चमत्कार अभेद के संशय मे सुख 
पक्षको प्रव बताने में है इसकिएट प्रन अभेद से उठता ओर संय में पय॑वसित हो संदाय 
को ही प्रधान वना देता है । यदि अभेद ही प्रधान हो चमत्कार का कारण बन जाता तो यहाँ 
अलंकार रूपक होता है। संशय चमत्कारकारी है इसकिट यहां ससन्देहाल्कार कौ भी राका कौ 
जा सकती ३, फिन्तु वद भी यहं नदीं दो सकता क्योकि ससंदेदारुकार के सदेह बोध मे दोनों 
पक्ष वरावर रहते हैः अथात्‌ वहो चमत्कार संदेह या संदेदविषयीभूत पदार्थो के बोध कौ वरावरो 
पर निभैर रता रै, जव किं उत्प्रेक्षा में उपमानपक्ष कौ प्रवता पर । अध्यवसाय, अतिराय या 
निगरण का अथं हे साध्यवसाना गौणी लक्षणा द्वारा ओर रत्नाकरकार के अथ॑सार केवल 
साध्यवसाना लक्षणा दारा किसी पदाथं का अन्य पदाथैके रूपमे प्रतिपादन । अथं यहं किस 
पदाथ तै अपना असाधारण धर्म भासित न कराकर अन्य पदार्थं का असाधारण धमे भासित 
कराना । रेसा करने के किए उस पदार्थं को उसके अपने वाचक शब्द से न कहकर जिस पदां 
का असाधारण धम उसमे मासित कराना होता है उसके वाचक राब्द से कह देना । यथा "चन्द्रः" । 
बतलाया जा रक्षा है सुख, किन्त राब्द बोला जा रहा है चन्द्र । परिणाम यह कि व्यक्तरूप से 
भासित हयो रहा है मुख, किन्तु उसमे धमं प्रतिपादित हो रदा है “चन्द्रत्व, सुखत्व नहीं 1 सुखत्व 
तव भासित होता जव मुख के लिए सुख शब्द काही प्रयोग होता । इस प्रकार सुख का चन्द्रत्व- 
धम के साथ ज्ञान ह्य अध्यवसाय या अतिशय है क्योकि यों सुखत्व को चन्द्रत्व ने दवा दिया 
हे इसङ्ए उसे चन्द्रत्व कै द्वारा निगला इअ = निगीणे कद दिया जाता है । यही हं निगरण । 
उत्प्रक्षाबोध में मुखः आदि चा सुखत्व आदि भी भासित होता रदता है भ्याकि यां सुख आदि का 
(मुखः आदि शाब्दा से भी बोध होता रहता है । उनमे चन्द्रत्व के विधान से सुखत्व छोड़ा जाता 
सा प्रतीत होता है । इतने भरसे उसे पूरी तरह अध्यवसित नदीं कहा जा सकता । एसा 
आंदिक अध्यवसाय तो अपहति आदि मेँ मी रहता है । किन्तु उनका अथेबोध अतिशयोक्ति सा 
नहीं रहता । 

ग्रन्थकार ने अध्यवसाय को साध्य ओर सिद्ध इन दो भागों मे विभक्त कर उतपरक्षा को साध्य 
अध्यवसाय पर निर्भर बतला उते अतिशयोक्ति से भिन्न सिद्ध करने का प्रयत्न किया है । किन्तु 
यदि उनके अनुसार उत्प्रेक्षा मे मी चमत्कार अत्तिराय पर ही आशित है तो साध्यत्व या सिद्धत्व 
केवल अवान्तरतामात्र के साधक होगे अलकारान्तरता के नदीं । अल्कार में भिन्नता चमत्कारक- 
तच्च के मेद से आती है । वह तो साध्य तथा सिद्ध दोनों ही स्थितियों मे एक ही हे अतिशय । 

वस्तुतः उपतकँ या वितकं की ओर ठे जाकर अप्प्यदीश्षित ने अधिक स्पष्टता से काम 
ख्या हे। 

उत्प्रेक्षा के जो भेद सर्व॑स्वक।र ने प्रस्तुत किण हे उन्द चिघ्रमीमांसा मेँ अप्पय्यदीक्षित ने अधिक 
स्पष्ट विया है । उनके अनुसार वाच्य उप्परेक्षा के संभावित भेद ये है- 

: २ २ ४ ५ > ७ 4 
व जात्यभाव \॥ ५“ क्रिया क्रियामाव द्रव्य द्रव्याभाव-इन आठकौ 
| 
ॐ अ अ 
| ^< | १६ | २६ | ३२ 

उपात्तगु + व "१ "4 त॒क-इन चार से 


| ३२ | ६४ ९६ | | 
स्वर्‌ पभ+: दतु फाल --इन तीन रूपां मे ९६ उत्प्रेक्षा । 


२१९८ अलङ्ारसवंस्वम्‌ 


इनके नाम “उपात्तयुणनिभमित्तकजातिस्वर्पोत्परक्षा, उपात्तयुणनिमित्तकज।त्यभावस्वरूपोप्परेक्षा"- 
इत्यादि वनाए जा सक्ते हैँ । इन ९६ संभावित भेदो का एक सूत्र संस्कत मेँ इस प्रकार वनाया 
जा सक्ता हं--उपात्तानुपात्तान्यतर-युणक्रियान्तर-निमित्तक-जात्तियुणक्रियाद्रन्य-तदभावान्यतर- 
स्वरूपहेलुफलान्यतमोत्प्रक्षा '” इन संभावित भेदो में ते शक्यता के आधार पर कुछ भेद कमहो 
जाति हे । यथा द्रव्योसपरक्षा ओर द्रव्यामावोप्प्रेक्षा स्वरूपात्मक ही होती है, ेतफलात्मक नदीं । 
इस प्रकार उसके २४ भेदं मेँ से १६ मेद कम हो जाते है, केवल आठ दही मेद शेष रहते है। 


जात्यादि ६ त्वो की उग्प्क्षा में निमित्त का अनुपादान संमव नदीं होता । फलतः उनके केवल 


२४ ही भेद रेष रहेगे । इस प्रकार स्वरूपोपरेक्ा मेँ तो ३२ के ३२ ही प्रकार रगे किन्तु देव 
ओर फल की उत्प्रेक्षा मँ केवल १२, ,२ मेद होगे । फलतः उन दोनो कै प्रकार मिककर २४ 
होगे । ओर इस प्रकार स्वरूप, हेतु तथा फल तीनों की उतपेक्षा्गो के डुल मिलाकर ५६ प्रकार 
होगे । किन्तु ये प्रकार केवल वाच्य उत्प्रेक्षा में हीहगि। प्रतीयमान उत्प्रेक्षा में निमित्त का 


भनुपादान स्वरूपोप्प्रेक्षा मँ भी नदीं दोगा । फलतः स्वरूपोप्पेक्षा ३२ भेदो मे से केवल १६ सेद ही 


फलोत्मरे 


बचे । इस प्रकार १६ स्वरूपोत्परक्षा, १२ हेतूत्प्रेक्षा ओौर १२ फलोत्प्रेक्षा भिल्कर प्रतीयमानो सेक्षा 


के इर ४० ही भेद दोगे। वाच्य उ्प्रक्षा के ५६ भेदो मेँ प्रतीयमान उत्प्रे्ना के ४० मेद मिला 
देने पर पुनः उत्प्रक्षासामान्य के मेद ९६ ही हो जाति है । 

पण्डितराज जगन्नाथ ने एक ेसा उदाहरण भी वता दिया जिसमे द्रव्य की भी देतुरूप से 
उम्रक्षा निकल ती है । वह उदाक्षरण है- 

वराका य॒ राकारमण इति वसन्ति सहसा सरः स्वच्छं मन्ये भिल्द गतमैतन्मखञुजाम्‌ । 

अुष्मिन्‌ या कापि दुततिरतिषना भाति मिषताभियं नीलच्छायादुपरि निरपायाद्‌ गगनतः ॥° 

- जिते नासमञ्ञ लोग चन्द्र कदते है म इसे देवताओं का अगतपूणं सरोवर मानता ह, 

भोर इसके वोच मे जो अत्यन्त घनी नाली छाया दिखाई दे रही है इसे ऊपर के आकाश 
कौ छया 1 

-यदां भश्रत सरोवर रूप से उप्परक्षित चन्द्रमा मे वि्यमान किन्तु यहां शब्दतः अकथित 
जो कंक उसका कारण ञकार वतलाया जा रहा है। आकाश एक द्रव्य ही है, जाति, गुण, 
क्रिया नहीं ' अतः उपस्तकी हैतुरूप से उग्रक्षा द्रव्यदेतूतप्रक्षा का अस्तित्व सिद्ध कर देती है। किन्तु 
यद पण्डितराज जगन्नाथ ने अपना सामथ्यं मात्र दिखलाया है । वे स्वयं मानते हैँ कि एेसे उदा- 
इरण सामान्यतः मिते नदीं है । इसीलिए उन्होने स्वयं फलोत्प्रेक्षा के प्रसंग में द्रव्याफलोत्प्रक्षा 
नहीं दिखलाई । ओर यष्ट कद दिया क्रि जात्यादि मेद मे कोई चमत्कार नदीं हे । चमत्कार 
केवल स्वरूप, देतु तथा फल भेद मेँ ही है | मम्मटनेतोइनभर्दोको भी दछोड दिया। स्वरूपादि 
भेदा कौ कट्पना पहिली वार अल्कारसर्वश्व मे ही मिती है । 

गमन ने एक उत्प्रक्षावयव नामक अलंकार भी माना है गौर उसका लक्षण-'उत्परक्षादे वरुप््ेक्षा- 
वय॒वः'-े्ता किया है, किन्तु इसका हैतूप्प्रक्षा से कोह सम्बन्ध नहीं है । संजीविनीकार 
शरीविचाचक्रवत्ती ने उत्प्रेक्षा कै संपूणं विवेचन का संग्रह इस प्रकार किया रै-- 

रुणक्रियाभिसम्बन्धात प्रकृतेऽप्रकृतात्मना । संभावनं स्यादुत्प्र्षा वाच्येवायैः परान्यथा ॥ 

जात्निक्रियायुण्दरव्योपरेक्षणात्‌ सा चतुविधा । भावाभावाभिमानत्वे जात्यादेः साष्टधा पुनः ॥। 

गुणक्रियानिमित्तत्वे लेया षोडदाधा तथा । द्वा त्रिद्च्च निमित्तस्य पादानादन्यथा स्थित्तेः ।। 

देतो स्वरूपे चोत्मेकषये फले षण्णवतिः पुनः । द्रव्ये हेतुफलात्मत्वासम्भवात्‌ तदिमदां च्युतिः ॥ 

तथा प्रतीयम।नाया निभित्तस्यानुपग्रहः । नापि स्वरूपं ठभेदैस्तस्मान्नयूना भवेदियम्‌ ॥ 

कचिच्दूलेषेण धमौश्चिगतेनैषा न बाध्यते । उपमोपक्रमाप्येषा भवेत्‌ सापहवापि च ॥ 


= 


अतिरायोक्त्यलङ्कारः २१९ 


-युण या क्रिया के सम्बन्ध से प्रकत में अप्रकृत की संभावना उत्प्रेक्षा होती है। यह तवं 
वाच्य दह्ोती हे जव इव आदिका प्रयोग रहतादहै जव नहीं रहता तव प्रतीयमान । उत्म्रक्षा 
जाति, युणः क्रिया ओर दन्य की होती है अतः उसके चार भेद हो जातेदहै। ये चारों भावा- 
त्मक तथा अभावात्मक होते हे, अतः उक्त चार सेद आठ हो जाते है ये आले मेद गण को निमित्त 
वनाकर होते द अथवा क्रिया को अतः सोलह हो जाते है। ये सोलह भेद निमित्तके 
उपादान ओर अपादान के आधार पर बत्तीस दो जाते है । ये वत्तीसों भेद स्वरूप, हेतु ओर 
फल रूप होति हे अतः १६ दो जाते हें। किन्तु द्रन्योत्प्रक्षा हेतु तथा फर रूप नहीं होती 
अतः उनके मेदां की कमी हो जातीदहै। इसी प्रकार प्रतीयमाना उत्परेश्चा मे निमित्त का 
अनुपादान नहीं रहता न स्वरूपोत्पर्षा ही, अतः उतने भेद ओर कम हो जाते हैः । उत्प्रक्षामें 
कदी कदी धम श्च में ररेष रहता हे किन्तु उससे यह वाधित नदीं होती । यह उपमोपक्रमा तथा 
अपहवोपक्रमा भी होती है 


-इस प्रकार स्पष्टदहै कि सजीविनीकारने उत्प्रेक्षा को संमावनस्वरूप माना अध्यवसाय- 
स्वरूप नहीं, जो मम्मटादि के अनुरूप होने पर भी भूलग्रन्थ स्वस्व के पिरद हे । 

स्वरूप हेतु ओर फल तीनां मे टीक वैसा अन्तर है जेसा गौणी रक्षणा ओर शुद्ध रक्षणा में होता हे । 
संस्कृत के आलकारिक आचायौ कौ विद्दोषता है कि वे भेद करते समय किसी विशिष्ट मेद को एकः 
नामदेदेते हें । ओर शेष वचे सामान्य मेदो को शुद्ध मेद कह देते है । उ्प्रेक्षामे भी हेतु ओर फल 
की उत्प्रक्षाओं को हेतुत्व ओर फलत्व के आधार पर विरिष्टनाम देदिया ओर जिस भेदम 
कोदं असाधारण विशेषता नहीं देखी उसे अलग गिना दिया । विन्त यहां उतस्े श्ुदधोत्मरेक्षा 
न कहकर स्वरूपो त्प्क्षा कद दिया । कुच आचार्यौ ने इसी को वस्तत्प्रक्षा कहा है। जो "वस्य, 
अलंकार ओर रसः इस प्रकार प्रसिद्ध भेदप्रक्रिया के अनुसार ठीक है) स्वरूपोत्परक्षा जदं 
द्रव्यगत होती हे वहाँ वह धम्युंत्परे्षा कदलाती हे क्योकि द्रव्य धमे से युक्त होता दहै, इसीलिए 
रसगंगाधरकार ने उसका लक्षण स्वतन्त्र रूप से दरसाया है । किन्तु वह सदेव ध्भिगत ही नदीं 
होती धर्मगत भो होती है ओर रसगंगाधरकार ने शधमैस्वरूपोस््रेक्षाः शीषंक से उसका 


उदाहरण स्वतन्त्र रूप से अल्ग दिया है। शस प्रकार कुछ लोग स्वरूपोप्पेक्षा को केवल धम्यं 
त््र्षा मान बैठते है वह अमहै। 


उप्प्र्षा के विकासमेजो जो अंग जिस क्रमसे छुडे है वह क्रम ऊपर उद्धत सभी आचार्यौ 
के उत्प्रेक्षा लक्षण) ते स्पष्ट है । 


[ स्वस्व ] 


वमप्यवलायस्थ खाध्यतायासुत्पश्चां निर्णीय सिद्धत्वेऽतिशयोक्ति 
छद्वयत- 


॥ ० २३ ] अध्यवसितप्राधान्ये खतिक्ञयोक्तिः। 

अध्यवसान जयं संभवति- स्वरूपं विषयो विषयी च विषयस्य हि 
विषयिणान्त्निगीणेत्वेऽध्यवसायस्य स्वरूपोत्थानम्‌ । तन्न साध्यत्वे स्व- 
रूपप्राधाभ्यम्‌ । सिद्धत्वे त्वध्यवलितप्राधान्यम्‌ । बिबयप्राधान्यमध्यव- 
साये नेव संभवति । अध्यवसितप्राधान्ये चातिशयोक्तिः । अस्याश्च पञ्च 
प्रकारः । भेदेऽभेदः । अभेदे भेदः । संबन्धेऽसंबन्धः । असंबन्धे संबन्धः । 
कायंकारणपोवो प्यंविध्वंसश्च । 


२२० अलङ्कारस्वंस्वम्‌ 


[ दृति ] स प्रकार [उपक करम से] अध्यवसाय के साध्य होने पर संभव उतपक्षाका निणेय 
किया अव [ उस अध्यवसाय के ] साध्य होने पर समव अतिशयोक्ति का कक्षण करते हं- 

[ सत्र ] किन्तु [ अध्यवसाय मे | अध्यवसित की प्रधानता होतो अतिशयोक्ति 
{ नाम अलंकार होता दै | ॥ २३ ॥ 

[ वृत्ति ] अध्यवसान में तीन पदार्थं रदते ह, स्वश्प, विषय ओर विषयी । अध्यवसाय के 
स्वरूप की निष्पतन्ति होती दै तव जव विषय विषयी के द्वारा उसके अपने भीतर निगल लिया 
जाता है । इस [ निगलने ] में यदि साध्यता रहती दहे तो प्रधान रहता दहै स्वरूप [ निगल्ना = 
अध्यवसाय ही ] ओर यदि सिद्धता तो प्रधान होता है अध्यवसित [ विषयी ] । विषय की प्रधानता 
अध्यवसायमें हो ही नदीं सकती । वची अध्यवसित [ विषयी ] की प्रधानता तो वहु अतिश- 
योक्ति रूप से मान्य ही हे । इस [ अतिशयोक्ति ] कै पांच मेद होतेहें। (१) भेद मे अभेद 
(२) अभेद में येद ८३) सम्बन्ध मे असम्बन्ध (४) असम्बन्ध मेँ सम्बन्ध तथा (५) कारण 
तथा कायं के पांपरत्व रूप क्रम का उरूटना । 


विमरिनी 


एतदु पसंहरन्नन्यद्वतारयति- 
एवमित्यादि । तामेव रुष्यित्ुमाह--मध्यवसितेत्यादि । एतदेब ब्याख्यातुमभ्यवस।- 
यस्य तावद्यथासंभवं स्वरूपं दशांयति--अध्यवसान इति । परस्परनिष्ठव्वानु पपत्तरध्यव- 
सायश्य कि विषयविषयिभ्यामिव्याशङ्कयाह - विषयस्य हीत्यादि । विष्रयविषयिभ्या- 
मन्तरेणाध्यवसाय एव न भवतीव्यथंः। एषामेव विषयविभागं द्‌ शंयति- तत्रेव्यादिना । 
तत्रेति त्रयनिर्धारणे । स्वरूपप्राधान्यमिति अध्यवसाय प्राधान्यम्‌ । अध्यवसितप्राघान्य- 
मिति विषयिप्राधान्यन्‌ । साध्यत्वं सिद्धस्वं चोसपेदायामेव निर्णीतम्‌ । नैव संभवतीति - 
जध्यवखायस्वरूपानुदयात्‌ । तदेवं विषयिणः प्राघान्यविवक्तायामलंकारो भवतीव्याह- 

अध्यवसितेयादि । उक्तं चान्यत्र- 

जध्यवस्रायसाध्यत्वप्रतीतावि यमिष्यते। 
तत्सिद्धताध्रतीतौ तु भवेदतिक्ञयोक्तिधीः ॥ इति । 

` पञ्चेति न्यूनाधिकक्षस्यानिरासा्थम्र । अत एव कार्यकारणपौर्वापर्यवि- 
ध्वस्य चतुथमेदान्तभावो न वाच्यः । एवं हि मेदान्तराणामपि तदृन्तभाव एव 
स्यात्‌ । अभेदाद्यसंबन्धेऽपि संबन्धोपनिबन्धनात्‌ । अथ भवस्वेतदिति चेत्‌। न । "जत्र 
च यद्यपि स्व॑त्र मेदेऽभेदादौ वस्तृतोऽसंबन्वे संबन्ध एव वर्णयितुं शक्यते तथाप्य- 
वान्तरभेदविवडयान्येकक्ञित्वाद्विविक्तस्यासंबन्धे संबन्धस्य दृदिीत्वाचच विभागेन 
निशः कृतः” इति भवद्धिरेवो स्वात्‌ । तरसमानन्यायस्वास्कथमस्यापि चतुर्थमेदा- 
न्तभावो न्याय्यः । अथ "यदि काव॑कारणयोः पौर्वापर्यंविध्वंसारसमानकारुतायभा-. 
वेऽपि तथोपनिबन्धे पच्चमोऽत्र प्रकार इष्यते तदे श कालयोः पदार्थसंवरन्धे विक्षेषाभावाद्धिन्न- 
देशरवाभावेऽपि तथोपनिवन्पे षष्टोऽपि भेदः परिगणनीय इति नि्विंषयस्वादसंगतेरभावः 
अर्ज्यत' इति चेत्‌ । नैतत्‌ । यस्मादतिशयोक्छावतिशयाख्यग्रयोजनप्रतिपिपादयिषया 
विषयनिगरणेन विषयिप्राधान्यं विवक्वितम्‌ , असंगतौ तु विरुद्व्वप्रस्यायनाय कायंकारण- 
योभिन्नदेशत्वमिस्युमयत्राप्यरित तावन्निर्विवादो कक्षणमेदः । कार्यंकारगपौर्वाप्यं विध्वंस 
च वक्वभकतृकस्य हद्याधिष्ठानस्य कारणस्य स्मरकर्तककष्य च कार्यस्य पूर्वापरी भावं नि- 
गीयं श्वर्शनेनैव विषयान्तरवैमुख्येन स्वद्भिराषपरेव जातेव्यतिशयप्रयोजन प्रतिपाद्‌- 


अति्ायोक्त्यलङ्ारः २२१ 


नार्थमन्यथाव्वमध्यव सितमिदय तिक्ायोक्तिभेद्व्वमेवास्य न्याय्यं न तस्वसंगतिमेदत्वम्‌ । 
तत्र हि- 
'ववन्ध धम्मिर्ल्मधीरद्ेः चमानाय कश्चस्पकमाचिकासिः । 
चित्तेषु मन्युः स्थिरतां जगाम वि पक्तसारङ्कविरोचनानाभ्‌ ॥' 
इत्यादौ धम्मिज्ञे बन्धधित्तेषु च मन्युस्थेर्यमिति कायंकारणयोर्भिन्नदेशस्वम्‌ । यत्रैव 
बन्धस्तत्नेव तर्कार्य॑स्य स्थैयंस्योपपत्तेविरुद्धस्वम्रस्यायकम्‌ । विरोधस्य चात्राभासमान- 
त्वम्‌ ! धमर्मिज्ञवन्धमन्युस्ये ययो वेस्त॒तोऽपि कायकारणभावसद्धावाभावाख्यस्य वाधक- 
म्रस्ययस्योल्ञाखात्‌ । न च बाधोद्येऽपि विरोधाप्रतीतिः। द्विचन्द््‌प्रतोतिवद्‌नुपपद्ययमानत- 
या स्खर्द्रतिखेन तस्प्रतीतेरवस्थानात्‌ । न चातिश्योक्तो स्वर्द्रतिष्वम्‌ । निश्चय 
स्व भावस्वादस्या अनु पपद्यमानरवश्ञङ्काया अप्यभावात्‌ । नहि कायकारणयोः पौ्वांपयं- 
विध्वंस उपपद्यत इत्यन्न विवक्सितं किंसवेवं फरमेतदिति । अत एवासं गतेरतिद्ाया चेश्व 
स्वरूपमेदोऽपीति कायकारणयोः पौवां पथं विध्वंसेनासंगतिभिज्ञदेश्स्वेन चातिश्योक्तिरिति 
यथोक्तमेव युक्तम्‌ 1 अतएव च 
पौवापय विपर्यांखसमकारुससुद्धवौ । 
कायंकारणयोयों तौ वि रोधाभासपज्ञवौ ॥° 
इव्याद्यपि यदुन्येरुक्तं तदयुक्तमेवेति न न्यूनप्रकारस्वम्‌ 
केचिच्च सर्वांरुंकाराणामप्यतिह्योक्तेरेव म्रमेदस्वादस्या बहुभ्रकारतामाचक्तते। तथा 
द्यपमायामप्यस्व्येतद्धेद्रवम्‌ । न्यूनगुणस्य सुखादेरधिकगुणेन चन्द्रादिना साम्येऽति- 
हायानतिपातात्‌ , अतिज्ायं विना च गौरिव गवय इस्यादाचवनरुकारस्वात्‌ । अतश्चा 
तिक्ञायस्यै व सर्वारंकारबीजमभूतस्वात्‌ "एके वातिश्चयोक्तिश्च काव्यस्यारुकृतिर्म॑ता' इ्युक्तम्‌ । 
नेतत्‌ । इह दयतिश्यस्य द्वयी गतिः यद्यं कविप्रतिभानिवतितः खामान्यार्मा भवति, 
मेदेऽप्यभेद्‌ इस्येवमादिरूपो विरोषारमा ` वा । तत्रा्यः सवे रेवारुंकारबीजतयाभ्युपगतः। 
अन्यथा हि गौरिव गवय इत्यादावरकारस्वं स्यात्‌ । तावता पुनरेतप्रमेदसवं सर्वार्का- 
राणां न युक्तम्‌ । तचे हि विरोषोक््युज्ञेखादी नामपि तल्प्रसङ्गः । स्वांरुकाराणामपि विज्ञे 
षोक्ट्युररेखरूपस्वात्‌ । अथ द्वितीय पक्ताश्रयेणेतदुच्यते तदप्ययुक्तम्‌ । अस्या श्यध्यवसित- 
प्राधान्यं र्तणम्‌ । तच्ारुकाराणां न संभवति । तथासवानवगमात्‌ । अतश्चेषामसं भवन्त. 
त्सामान्यव्वार्कथ तद्विशेषसवमिति बहु प्रकारव्वमस्या निरस्तम्‌ । 
८ १) इस [ उत्प्क्षा-प्रकरण ] का उपसंहार कप्ते ओर अब दूसरे [ प्रकरण ] का आरम्म 
करते हए किखते है-“एवम्‌?-आदि । 
८२ ) उसी [ अतिशयोक्ति ] का लक्षण करते हए छिखते है--'अभ्यवसित' आदि । 
(२) इस [ लक्षण) की व्याख्या करनेके किए पहर अध्यवसाय का संभावित स्वरूप 
वतकाते हए छिखते हे--'अध्यवसानः आदि । 
८ ५ ) “अध्यवस्राय [ एकमात्र विषयी के ही रहने पर होता है अतः उस्‌] मे "परस्पर 
[ विषय ओर विषयी दोनों ] के वीच संभव ही नहीं होता, तव, विषयविषयी की चचा निरथैक 
है"--एेसी रोका कौ कर्पना कर उत्तरम लिखते है--'विषयस्य हि । अथे यह कि विषय 
विषयिभाव के विना अध्यवसाय ही निष्पन्न नहीं होता । 
(६ ) इन [ स्वरूप, विषय तथा पिषयौी ] का क्षेत्रविमाग दिखलाते इए लिखा~'तन्र'-आदि । 
(तत्र = इनमे-यह तीनों का रूप अलग अलग वतरने के उद्देरय से ङ्िखा । स्वरूपप्राघान्य = 
अध्यवसाय क प्रधानता । जध्यवसितप्राधान्य = विषयी की प्रधानता 1 अध्यवसाय मे साध्यत्व 


। 
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२२२ अलृह्धारसवंस्वम्‌ 


ओर सिद्धत्व क्या है । श्सका निणैय अन्धकार ने उत्प्रक्षा के आरम्भ मेंदहीकर दिया है। (नेव 
खभवति = दो ही नदं सकती इसच्िएि किवेसा होने १र अध्यवसाय क। स्वरूप दी निष्पन्न 
नहीं हो सकेगा । 


इस प्रकार जव विषयी कौ प्रधानता रहती है तमी यद [ अत्तिशयोक्ति ] अलंकार होता है 


(८ 
केकि 


इस निष्कषे कौ स्पष्ट करते इ< छिखते ह--अध्यवसितः' आदि । दूसरे मन्थ में कुमी 
गया दै--यह [ उत्प्रेक्षा ] व्हा मानी जाती हे जर्द अध्यवसायमें साध्यताकी प्रतीति रहती 
हे । उसमे यदि प्रतीति सिद्धता की हदो तो अतिययोक्ति का बोध होता है ।' 
पोच पंच ही कहकर संख्या मेँ कमी या व्द्धिको अक्मावित स्दराया। इसीलिए 
कायंकार णपूवापरत्वविप्य॑यः-- इस पांचवे मेद का चतुथे मेद मेँ अन्तर्भाव नदीं बतलाया जाना 
चाहिए-[ जेसा किं अल्काररत्नाकरकारने बतकाया है पृ० ५८,५९ ] क्योकि वैसे तो अन्य 
भेद भी उसी मेद के मीतर अन्तभूत वबतलाए जा सकते है, क्र्योकिं उन भेदो मे भी 
अभेद आदि का कोई संबन्ध न रहने परभी सम्बन्ध जोड़ा जातादहै। यदि कटं कि उन मेदो 
काभी अन्तमाव चतथ मेदमेंदहीद्ो जाय-तो यद ठीक नदीं, क्योकि जपने ही कदा दै- 
न्द मे अभेद आदि अन्य भेदं मे भी यदपि (असम्बन्ध मे सम्बन्धं बतलाया जा सकता है 
तथापि [ इस असम्बन्ध" मेँ संवन्धः-नामक भेद मे मेद में अमेद सम्बन्धः आदि ] अवान्तर भेद 
मानने ही पड़गे इसलिए अन्य आचार्यो [ अलकारसवंस्वकारादि ] ने ये [मेद में असद आदि] 
मेद [ उत्सर्गांपवादन्याय से ] अलग गिनादिणदहैँ ओर अन्तमं [ जव अन्य अवान्तर सेद संभव 
न हा तव |] असंवन्ध मेँ सम्बन्ध नामक भेद [ स्वतन्त्ररूपसे] गिना दिया है, ओर हम 
( अल्क्राररत्नाकरकार ] ने भी उन्दीं के अनुकरण पर यहाँ अन्य भेदो को (असम्बन्धमें 
म्बन्ध नामक चतुथं भेद से अक्ग करके गिना दिया है [ अलं० रत्ना० अत्तिदायोक्ति 
की अन्तिम पक्तिःपृ० ६१ ] इस प्रकार उक्त देतु से यदि आप प्रथम तीन भेदका चवर्थं मेद 
में अन्तमौव नहीं मानते तो उसी हतु के रहते हृ केव पंचम मेद का अन्तर्माव कैसे मान 
सकते ह, ओर यदि मान भी ठतो उसे उचित सिद्ध कैसे कर सकते हैँ । 
ओर यदि [ आप अल्काररत्नकार ] या यह आपत्ति प्रस्तुत करे कि-भ्कारण ओर कार्य 
मं [ उत्पत्तिगत ] समानकाल्ता [ एकसाथ उत्पन्न दोना ] आदि [ धर्म॑ ] वस्तुतः नहीं रहते 
तथापि यदि [ काल्गत ] पौवापय क्रम को तोड़ उन्ँ समानकाकिकि आदि रूपें चिचित कर 
अतिशयोक्ति का यह पाँचवा भेद माना जाता है तो [कार्यं कारण के] दैद्यागत अभेद 
| जहां कायं रहता है वौं कारण के रहने ] का नियम तोड़कर अतिरायोक्ति का एक छठा 
मेद मी माना जाना आवदयक होगा, क्योकि प्रत्येक पदार्थके साथलजिस प्रकार काल का संबन्ध 
रहता है उपरी प्रकार दे का भी। दोर्नो मे कोई अन्तर नदीं है । भौर वह छठा मेद मान लेने पर 
असंगति अल्कार का एक भी स्थर रेष नदीं रह पाएगा, वह उच्छिन्न हो जाएगी [ अरं० रत्ना० 
९० ५९ | तो यह भी ठीक नहीं, क्योकि अतिदायोक्ति ओर असंगति दोनो के लक्षण अत्यन्त 
भिन्न है । अत्तिशायोक्ति मँ विषय को छिपाकर विषयी कौ प्रधानता प्रतिपादितकी जाती है ओर 
उत्करा प्रयोजन रहता है अतिशय का प्रतिपादन, क्योकि अतिद्ययोक्ति मे प्रयोजनीभूत अतिशय 
ही रहता है, जव किं असंगति मे प्रतिपादित किया जाता हैकायं ओर कारण म देदामेद 
[दोनोंका एक स्थानम न रहकर अलग अल्ग रहना] मौर इसका प्रयोजन रहता दै 
( प्रात्तिमासिक | विरोध की प्रतीति। कार्यकारण के काठ्गत पौर्वापर्य क्रम के तोडने से 
जो पोचवीं अतिद्वायोक्ति निष्पन्न होती है उस [ --हदयमधिष्ठितम्‌, इत्यादि जो उदाहरण 


# 
„^ “त ध 


अतिच्णयोक्त्यक्ङ्कारः २२द 


जगे दिया गया देउ | मेँ कारणे मार्तीके हृदयम वल्छ्म का अधिष्ठित ह्योना ओर 
कायं हे (काम का अधिष्ठित होना" । उनकाजो स्वाभाविक काल्गत पोर्वांपयेक्रम ॐ उेचिपा 
दिया गया है ओर उस पर उससे उर्टा पौर्वापर्यक्रम अध्यवसित किया गया है ओर उसका 
प्रयोजन हे [ नायक के समक्त दूती दारा ] इस अततिदराय का प्रतिपादन कि तुम्हारे देखनेमात्र 
ते माल्तीने अन्य सव बातं छोड एकमात्र तुम्हे दही चाहते रहना शुरू कर रखा है") इस 
कारण इस स्थल को अतिद्ायोक्तिका ही भेद मानना उचित दहै, न कि असंगति का। असंगति 
का जो उदाहरण आप [ अरू० रत्ना० कार] ने दिया है उसका तात्पयंहै विरोध कीलय प्रतीति 
म । उदाहरण हे -विक्रमदेवने चम्पक मालाओं से वोधा तो चन्दल्देवी के जूडे को भिन्त 
निरचर्ता को प्राप्त हआ सौतोँ क चित्तो म कोपः [ विक्रमांक्देव चरित-१०।५६ ]। इसे "वन्ध 
जडे में ओर कोप कौ स्थिरता चित्तो मे'- इस प्रकार कार्यं ओर कारण को अल्ग अलग स्थान 
पर चित्चित शिया गया । इसके विरोध की प्रतीति हुड, क्यांकि सामान्यतः यहाँ स्थिरतारूपी 
काय को वहीं तराया जाना चाहिए था जहाँ उसका कारण बन्धं बतलाया गया था। विरोध 
का मी यहां आभास्-माव्र होता, [ वह प्ररूढ नदीं हो पाता] क्योंकि यहां विरोध का वाधक 
ज्ञान भी उदित होता यह ज्ञान है “जडे के बन्धन भौर कोपकी स्थिरता के बीच वास्तविक 
 कारकारणभाव के अभाव का ज्ञान । किन्तु रेसा नहीं होता कि बाधकल्ञान के होने पर विरोध 
ज्ञान न होता हो, क्योकि उसकी प्रतीति उसी प्रकार बाभितरूप मे अन्त तक वनी रहती है 
जिस प्रकार एक चन्द्रम दो चन्द्रौ की प्रतीति । ज्ञान के बाधित होने की यह बात अतिशयोक्ति 
मं नदीं रहती । क्योकि यह होती है निरचयरूप ज्ञान पर निभैर । फलतः इसमें ज्ञानके बाधित 
होने का सन्देह होना भी संभव है । अतिरायोक्ति मे यह बतलाना थोडे हयी अभीष्ट रहता है 
कि "कारण ओर कायं का काल-गत पौर्वापर्यं का ध्वंस संभव होता हैः । यहां तो केवर इतना 
वतलाना अभीष्ट रताद कि दस पौर्वापयं ध्वस्त का फल यह दहैः। ओर इसी कारण [ न कवर 
प्रयोजनों मे अपितु ] अतिशयोक्ति तथा असंगति के स्वरूपो म मी भिन्नता दहै इसलिए यही 
मानना उचित हे कि; अतिश्लयोक्ति वहां होती दँ जहौ कायकारण के कालगत पौवापय क्रम का 
अभाव बतलाया जाता हे ओर ससंगति वहां जाँ कार्यकारण के देरागत एकत्व का अभाव ।' 
गौर हसी कारण किन्ही अन्य आचार्यं का यह कथन मी अमान्य है कि- 

काये तथा कारणके (१) पौवापय का विपर्यासः तथा (२) 'डनकी एकसाथ उत्पत्ति- 
येजोदोतथ्यद्ेयेष्ी हैः विरोधाभास तथा पव ( 2) । 

इस प्रतिपादन से सिद्ध हमा कि अतिशयोक्तिके [ पोँच] मेदो में कमी नदहीकीजा 
सकती । 

ङुछ आचाय [ भामह, आनन्दवर्धन, मम्मट ] सभी अलंकार को अत्तिदायोक्ति का ही भेद 
मानते है ओर कते है कि अतिशयोक्ति के भेद [ केवर पाँच नदीं ] बहुत अभिक संभव हे। १ 
जेते उपमा भी अतिशयोक्ति का भेद है, क्योकि उसमे मी कम गुणवारे सुख आदि का अधिक 
ण वाले चन्द्र आदि से जो साम्य बतलाया जाता है उसमे अतिदाय दस्ता नदीं है 
इसी अतिराय के अमाव में गवय गौ के समानः-इत्यादि उपमिति नामक प्रमाण के वाक्यमें 
[ साम्य रहने पर भी उपमान ] अलंकारत्व नहीं रहता । इसीलिए यदी देखकर कि अतिराय 
ही सभी अल्कारो का वीज है कदा गया है-“एक अकेली अतिशयोक्ति ही काव्य का अरंकार 
मान्य है" । किन्तु यह लीक नहीं है । अतिरायनजोदहें वहदो प्रकारका होता हे (९) सामान्य 
( २ ) विशेष । विरोष यथा मेद मे अमेद । ये दोनों हयी मेद कविप्रतिमा प्रसूत होते हे । इनमें से 
प्रथम दी मेद सभी आचार्यौ द्वारा अलंकारो का बीज स्वीकार किया गया है । इसे नदीं माने तो 


२२७ ` अखङ्ारसखवंस्वम्‌ 


ध्गवय नौ सा'-आदि वाक्यम मी अलङ्कारत्वं माना जाने लगेगा । केवर इतने से समी 
अल्कासें को इसी अतिशयोक्ति का प्रभेद मानना ठीक नदी, क्योकि सवारुकार वौजत्व की 
यह वात विरोषोक्ति, उद्केख आदिमे भी काग हागी, कर्याकि समी अलंकार विद्धेषोक््तिरूप ओर 
उव्टेख रूप होते दै) दूसरा जो विक्णेषरूप दै उसके आधार पर सभी अलंकारो की निष्पत्ति 
मानने का द्वितीय पक्ष मी अमान्य है, क्योकि अतिशयोक्ति मेँ मूलभूत विशेषता दै अध्यवसित 
की प्रधानता । वह अन्य अलंकारो मेँ नदीं मिर्ती न मिल दी सकत । क्योंकि उनमें अध्यवसित 
के प्राधान्य का ज्ञान नदीं दोता, इसलिए इन अलंकारो में जव अतिदयोक्ति का सामान्य रक्त 
लागू नदीं होता तो इन्द अतिशयोक्ति के भेद मानना संभव ही केसेहे। इत प्रकार ज ति- 
दायोक्ति के भेदो की संख्या बहुत अधिक मानने की वात रिक नदीं पाती । 
विमर्ञ-विमरिनीकार ने यदौ अलंकाररत्नाकर के मिन अयाँ काखण्डन कियादैवेयेदं-- 
१=[ सू° ] अध्यवप्तानभति्योक्तिः | वृ° (नश्य च भेदेऽभेदः, असद मेदः, संबन्धेऽसम्बन्धःः 
असम्बन्धे सम्बन्ध शति चतुर्था । का्थकारणयोः पौर्वापयैविष्वंसस्य चतुर्थमेदान्त्मावात पच्चधेति न 
वाच्यम्‌ , तत्रापि समानकाकतायसम्बन्धेऽपि ८ १) विष्वं सपौर्वापर्यसम्बन्धस्य तत्सम्बन्धो पनि- 
बन्धात्‌, अन्यथा देशान्तरेणासम्बन्धेऽपि तथो पनिबन्धे षष्ठस्यापि मदस्य परिगणनीयतायाम्‌ जसज्ञ- 
तेनिविषयत्वप्रसङ्गात्‌ , न दि देदाकाल्योः पदा्थ॑सम्बन्ये कश्चिद्‌ विदोषः, येनेकत्र भेदत्वेन कथन 
मन्यत्र तदभाव इति स्यात्‌ । [ अल्काररत्नाकर प° ५८-५९ | 1 
२ = अत्र च ययपि- निदेशः कतः” यद अंशा विमरिनीकार ने अक्षरशः उद्धृत कर दी दिवा 
हे। इन दोनों अंशो के अथं विमरदिनीसे दही स्पष्ट विमरिनी मँ प्रथम (समानकार 
तायमाव के स्थान पर निणयसागरीय प्रति मेँ 'समानन्यायतायभावःः छापा दे । 


[ स्वस्व || 
त्र मेदेऽमेदो यथा- 
"कमलमनम्भसि कमे च कुवटये तानि कनकटतिकायाम्‌ । 
सा च सुकुमारखुभगेत्युत्पातपरम्परा केयम्‌ ॥\' 
अच्र मुखादीनां कमलाये्भेदेऽभेदः ॥ 
इन [ मेदो ] मे [ से प्रथम ] भेद म अभेदः [ नामक मेद का उदाहरण ] यथा-[ खन्दरो 
को लक्ष्य कर ]- # 
“अरे कमल [ चेष्या ] सोमी पानी के विना ओर कमर के बीच दो नीक कमल | ओंँखे | 
जर ये तीनो सोने की छडी मे, [ सन्दरी की गोरी अगतिका में ] ओर वह [छ्डी | भौ 
सुकुमार तथा सुन्दर । अरे ये उत्पात पर उत्पात कैसा 
--यहौ मुख आदि का कमल आदि से है तो भेद, किन्त बतलाया जा रहा हे अभेद । 


विमदिनी 


सखादीनामिति। न तु वास्तवस्य सौन्दर्यस्य कमलयैरिति। न त॒ कविसमपितेन 
सौन्दर्येण । अत पव च, 'अन्रातिज्ञयास्यमिस्यादिः' तदमिग्रायेणेवाध्यवसितग्राधान्यस्‌”- 
हव्यन्तश्चोत्तरकारिको अन्धः स्वमतिजाञ्याज्ञेबकेरन्यथा टिखित इति निशिन्ुमः। अयंहि 
ग्रन्थद्नतः पश्चासेशिद्धिपश्चिद्धिः पत्निकाभिरटिंखित दष्यवगीता प्रसिद्धिः । ततश्च तैरनवधा- 
नेन ग्न्थान्तरप्रसङ्गव्वादनुपयुक्तरवाद्वा पत्रिकान्तरादयमसमज्ञसप्रायो भन्थखण्डो छिखितः 


4 
क 
“अ = दिक अककण कन्य वपव 
जाक ° अ === । 


राका क क 
` नः | 


अतिरायोक्त्यटङ्ारः २२९५ 


इति । न पुनरेकत्रेव तद्व सुखादीनां कमलाचेभंदेऽप्यमेद इस्युक्स्वापि न ठु वद्‌ नादीनां 
कमखादिभिरमभेदाध्यवसायो योजनीय इष्यादि वचनं पू्ांपरपराहतमश्य वेदुष्यज्ालिनो 
अन्थकारस्य संभाव्यस्‌ । 


[ यहो अभेद | सुखादीनाम्‌ = सुख आदि का [ प्रतिपाद्य है ] न कि वास्तविक सौन्दयं का, 
कमखाद्यः = कमल आदि से, न करि कविकस्पित सौन्दयेसे। [ इन दोनों प्रतीको को मिलाकर 
य& अथ निकारा जाना अमीष्ट है--अभेद सुख ओर कमलरूपी दो धर्मिओं का अभीष्ट है नकि 
उनके भीतर रहने वाके सोन्दर्यरूपी धर्मो का, सुख में सौन्दयं वास्तविक है ओर कमर मे कवि- 
कदिपत ] । अन्धकार के एेसा कने से हमारा निश्वय है कि मन्थ की प्रतिलिपि करने वार्लोने आगे 
का अत्र अत्तिदायाख्यम्‌' यहाँ से आरम्भ होने वारा ओर 'तदभिप्रायेणेवाध्यवसितप्राधान्यम्‌,-यद 
समाप्त होने वाला अन्धांश यददो नासमञ्ची से च्िखि दिया हे । यह प्रसिद्धि भी है किं यह अद्ध 
यन्थकार के बाद कुर विद्वानों ने "पच्चिकार्ओं' में छ्खिा धा । इसकिए निश्चित हयी यहां असंगत 
यदह अन्थखण्ड [ मूलकार की प्रति से नदीं, अपितु ] अन्य की पत्रावली से यों ज्खि लिया है) 
ठेसा इसक्ए कि इस अन्धांरा का प्रसङ्ग यहाँ नदीं, अन्यत्र हे, यदहं यह अनुपयुक्त है । इस मन्थ का 
विद्धान्‌ रचयिता एक ही स्थान पर उसी समय तो यदह कदे कि “सुखादि का कमलादि से मेद 
रहने पर भी अभेद हेः ओर उसी समय इसके विरुद्ध यह मी कहे कि “मुखादि के साथ कमलादि 
का अमेदाध्यवसाय नदीं जोड़ना घादिए-रेसा संभव नदीं । 

[ सवेस्व | 
अभेदे मेदो यथा- 
"अण्णं ठडहत्तणञअं अण्णाविअ कावि वत्तणच्छाथ । 
सामा सामण्णपञवद्णो रेदञ्िथ ण दोड॥ 
अन्न छडदत्वादीनाममेदेऽप्यन्यत्वेन मेदः । यथा वा- 
'मग्गिजलद्धम्मि बलामोडिअचुंबिर्प अप्पणा अ उवणमिप । 
पक्कम्मि पिआदरणः अण्णोण्णा दौति रसे ।› 
अच्राभिन्नस्यापि प्रियाधररसस्य विषयविभागेन मेदेनोपनिबन्धः । ` 
संबन्घेऽसंवन्धो यथा- 
'ङावण्यद्रविणभ्ययो न गणतः क्टेो महान्स्वीकृतः 
स्वच्छन्दं चरतो जनस्य हदये चिन्ताज्वये निर्मितः । 
पषापि स्वगुणाचुरूपरमणाभावाद्‌ वराकी इता 
को ऽथेञ्पेतसि वेधसा विनिदहितस्तन्ब्यास्तनुं तन्वता ॥* 
अन्न चावण्यद्रविणस्य व्ययस्तंबन्धेऽप्यसंबन्धस्तन्वीलावण्यप्रकषेप्रति- 
पादनाथ निबद्धः । यथा वा-- 
अस्याः सगविधोौ प्रजापतिरभूच्वनद्रो च॒ कान्तिध्रद्‌ 
ग्छङ्ञारकरसः स्वयं चु मदनो मासो चु पुष्पाकरः 
वेदाभ्यासजडः कथं जु विषयव्याचृत्तकोौतूहलो 
निमोतुं परभवेन्मनोहरमिदं रूपं पुराणो सुनि; ॥° 
१५ अ० स० 


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२२द अलङ्नारसवंस्वम्‌ 


अचर पुराणप्रजापतिनिमौणसंबन्धेऽप्य संबन्ध उक्तः । 
असंबन्धे संबन्धो यथा- 
“पुष्पं घवात़ोपदितं यदि स्यान्मुक्ताफटे वा स्फुट विदधु मस्यम्‌ । 
ततो ऽयङ्घ्यीद्‌ विरदस्य तस्यास्ताश्रोठपयेस्तख्चः स्मितस्य ॥' 
` अज्र संभावनया संबन्खः | यथावा 
'दाहोऽम्भःप्रखतिपचः प्रचयवान्‌ वष्पः प्रणाटलोचितः 
श्वासाः प्रे्कितदीप्रदीपकलिकाः पाण्डिम्नि मग्नं वपुः । 
कि चान्यव्कथयामि राजिमखिटां व्वन्मागेवातायने 
दस्तच्छत्जनिरुदधचन्द्रमहसस्तस्याः स्थितिवंतेते ।' 
अत्र दाहादीनामम्भःप्रखत्यायेरसंबन्ये ऽपि संबन्धः सिद्धत्वेनो क्तः । 
` (अन्यत्‌ सौन्दर्यमन्यापि च कापि वरत्तनच्छाया 1 
द्यामा सामान्यप्रजापते रेखेव न संभवति ॥? 
` -[ श्स खन्दरी का] सोन्दय॑ कुच ओर दही दहै गौर चेहरे कीरोभामी कुच ओर दही । यह 
घोडरी सामान्य प्रजापति की रेखा मी नहीं हो सकती 1 
-यदाँ ल्टभत्व अर्थात्‌ सौन्दयं मादि मेँ कोई मेद नहीं है तथापि कु ओर हीः ककर 
उसमें मेद वतकाया गया हे । इस मेद का दूसरा उदाहरण यथा- 
'मा्गितलब्धे बलात्कार चुखिते आत्मना चोपनीते । 
एकस्मिन्नपि प्रियाधरेऽन्येऽन्ये भवन्ति रसमेदाः ॥' 
--“खोजने या मेगने से प्राप्त, बलात चुज्ित अथवा स्वयं उपहत प्क ही प्रियाधर मेँ मौर 
ओर दी रस आताहै)' 
यर्दा भरिया के अधर काणक दही रस विषयसेद से भिन्नरूप मं चिच्नित किया गया 1 संवन्ध 


में असम्बन्ध यथा-- 
“लावण्य की संपत्ति का व्यय भी नहीं गिना, महान्‌ कटे भी उठाया, ओर स्वेच्छाचारी 


, ` म्रत्येक व्यक्तिकेहृदयमें चिन्ता की आग सुल्गा दी । इधर शस बेचारी को मी अपनी सुन्दरता 


के अनुरूप वर न देकर नष्ट कर दिया । अन्ततः विधाता का ध्येयक्याथा इस खन्दरी को खन्दर 
काया गढ़ने में । 

-- यौ छावण्य की संपत्तिके व्यय [ की गणना] के साथ संबन्ध के रहने पर भी उत्का 
अभाव तन्वी के लावण्य के प्रकषं प्रतिपादन केलिए वतलाया गया। इसीका दूसरा उदाहरण 
यथा-- 

इस [ उर्वशी ] के निर्माण में प्रजापति तो कान्तिप्रद चन्द्र रहाहोगा, या एकमत्र शगार 
ही जिसका रस है रेता स्वयं काम हयी अथवा पुष्पो का आकर मास चैत्र अथात्‌ वसन्त ऋतु । 
वेद को र्ते रटते जिसकी मत्ति जड़ हो गईं जिसका कुतू विषयो से हट चुका हैेसा वृधा 
{ नारायण ] सुनि [ न कि ब्रह्मा ] इसका निर्माण केसे कर सकता हे ।' 

-यर्हा निर्माण के साथ पुराण प्रजापति [ नारायण ऋषि न कि त्र्या] का संबन्ध हे 
तवे मी उसका अभाव बतलाया गया । 

डो ० रामचन्द्र दिवेदी ने यहाँ पुराण मुनि का जथ ब्रह्मा किया हे जव कि स्वय संजीविनीकार 
ने उसका अर्थं “पुराणो स॒निरनरसखः' रेसा किया दहै । द्विवेदी ने प्राठभी पुराणो विधिः ेसा 


न ~~ = निरे 


ऋ- 


अतिद्ायोक्त्यलङ्ारः २२७ 


मानचियादहे जो निणयसागर की प्रतिमे मी पाठान्तरम दिया इ है। पुराण प्रजापति, = 
इस दृत्ति का अथ भी उन्दने बड्डा ब्रह्मा किया है 

असवन्ध पे संवन्ध का उद्राहरण यथा- 

[ कोड सफेद |] पुष्प यदि कोपलों के वीच खिले या मोतो निखरे मृगो के वच रखा जाय 
तो कदाचित्‌ वह उस | पावती | के रार ओटों परर बिखर उज्ज्वरू स्मिति का अनुकरण कर 
सकता है ' [ कुमारसभव-१ ] | 

यहां | यदि राब्द पादका ] समावना द्वारा [ पुष्प ओर प्रवा आदि का] संबन्ध प्रतिः 

पादित किया गयाहे। [क्यकि वृक्ष मँजव पूर आति दै तव उसके पत्ते कोपर नहीं रह 

जाते) वे हरे होकर जरठ पर्ल्व बन जाते हे (संजीविनी ) योभाकर ने यहो क्रियातिपत्ति नामक्‌ 

अल्कार मानादहे || 
इसी भद का दूसरा उदाहरण यथा-- 

"दाह इतना दै भि पसो [ प्रति, अंजलि ] मर पानी तक सुखा देता है । ओंँपू इतने उमड़ रहे 
हे कि यदि कोड मारी नाली = ( प्रणा) हो तो उसमें ठीक से वह सकते हें । सासि इतनी कम्बी 

कि उन जरते दीपक कीलो दिर उठती है। सारा शरीर पीलेपन मेंड्व रयाहै। ओर 
क्या करर, आजकर उस [ मालती ] कौ वेठक तुम्हारे मागं की ओर का ्रोख। ही वना हुआ है। 
वर्ह वह पूरी पूरी राते हाथ के छत्ते ते चोँदनौ का प्रकाश रोकती ओर वैढी रह जाती है । 

--यहां पानी को पसो आदिते दाह आदि का सम्बन्ध नदीं है अक्तवन्य ही है, तथापि संवन्ध 
सिद्ध रूप सं बतलाया गया हं । 


विमदिनी 

रुइहत्वादौ नामिति, जादि शब्दाद्‌ वतंनच्छायाया एव ग्रहणम्‌ । तन्रेवामेदेऽपि सेद्‌- 
विवज्षगात्‌ । उत्तराधं हि संबन्धेऽप्यसंबन्धः । शछावण्यद्रविणग्ययो न गणितः इत्यस्य 
पादुत्रयी तन्वीरूावण्यप्रकषप्रतिपाद्‌ नाथमिव्येतस्प्रयोजन दशंन सर्वोँदाहरणो पर्ष गप्रम्‌ । 
समावनयेति । नतु वस्तुतः । अत एव संबन्धस्यावास्तवव्वादुदाहरणान्तरमाह-दादोऽम्भ 
इत्यादि । वाशब्दः सख बुच्चयाथः। 

कूडहत्वादी नाम्‌ = यहां आदि शन्द के द्वारा वत्तेनच्छाया = मुखकान्ति का हयी महण 
करना अभीष्ट है, क्योकि अभेद होने पर भी मेद की विवक्षा उसी में ह। इस पद्य के उत्तराधंमें 
तो "सम्बन्ध मे असतम्बन्धः ह । 

'लावण्यद्रविणन्ययो न गणितः'-्स पद्य के तीनों चरण का (नायिका के लावण्य का उत्करषं 
वतरने के जिए है"- यह्‌ जो प्रयोजन दिखलाया गया है । यह सभी उदाहरणं पर लागू होता 
दे । श्सकिए यहां अन्य परं मेँ प्रयोजन की कटपना स्वयं ही कर ठेनी चाहिए । संभावनया = 
संभावना द्वारा अथात्‌ वस्तुतः नहीं । संबन्ध के अवास्तविक होने से हयी एक दूसर। भी उदाहरण 
दिया--'दाहोऽम्भःः इत्यादि । यँ [ "यथा वा-का ] वाः-शब्द समुचया्थक है । 

| सवस्व | 

कायकारणपोवो पयेविध्वंसः पौव पर्यविपर्ययात्तव्यकालत्वाद्वा । विपर्ययो 
यथा-- 

'हदयमधिष्ठितमादौ मालत्याः $सखुमच्ापबाणेन । 
चरमं रमणीवष्भ ! ठोचनविषय त्वया भजनता ॥ 


२२८ अलङ्ारसवेस्वम्‌ 


तस्यकाटत्वं यथा-- 
'अविरखविलोटजलदः कुटजाज्ंननीपसुरभिवनवातः । 
अयमायातः कालो हन्त हताः पथिकगेहिन्यः ।।' 
कारं जोर कारण के [ कालगत ] पौर्वापर्य कामिटना दो प्रकार से संभव दै (१) पौ्वापयैमें 
विपरीतता मने [ कार्य के कारण से पहटे होने ] से ओर (२) [ कायं ओर कारण की उत्पत्तिगत | 
समानकालिकता से दोनों में से विपरीतता का उदाहरण यथा-- 

(तुम जव नेत्रं के विषय वने तो हे रमणीवम ! मालती के हृदय मे पुष्प के ही धनुष ओर 
पष्प के ही बाण वाले [ कामदेव ] ने पिके ही धर कर छया, तुमने वाद में 1 समानकालिकता 
का उदाहरण यथा- 

हन्त ! यह काल [ समय = वषा ऋतु जौर सृत्यु ] जिसमे घने मेध उमड्ते आ रहे है ओर 
कुरैया [ रज ] कोदा [ = अजुन ], तथा कदम्ब [ = नीप ] से वनवात सुरभित है, इधर आया है 
ओर [ उसी के साथ ] इधर पथिकं की घरवाली प्राण छोड रहौ हें ।' 


विमरिनी 


अत्र च काय॑कारणपौर्वापर्यं विध्वंस इत्यनेन प्रसिद्धयोः कायंकारणयोर्विध्वसो 
1 विपय॑यस्तथा पौर्वापर्यस्यादिपश्वात्कालभाविष्वेन प्रसिद्धस्य क्रम्य विध्वंसो व्यत्ययः 
| सहभावो वेव्यपि मेदच्रयं तन्त्रेणोक्तम्‌ । एवं च कायंकारणविध्वंसखस्यापि पच्च प्रकाराः । 
अवान्तरप्रकारतास्पुनरेषां पञ्चप्रकारव्वं नियमगर्भीकारेण पूवं ष्याख्यातसम्‌ । तत्र 
| कार्यकारणयोर्विपयंयो यथा- 
| एञत्त अव अत्त सकोअअरं मिजककांतीदं । 
। सहस्सपं अरद्ंदस्स कारणं भणद्‌ सरस्स ॥ 

अत्रन्टुकान्तेः संकोचे विपर्ययेण इातपत्रस्य कारणस्वमध्यवसितम्‌ 1 अत्र भेदेऽभेद्‌ 
इत्येवंरूपातिशयोक्तिदतष्वेन स्थिता । उत्तरे स्वधं सेव रिकष्टशब्दनिवबन्धना देतु: । 
तथाभावोपनिवन्धश्चानत्र वक्त्रस्य लावण्यप्रकर्षप्रतिपादनार्थम्‌ । कमविपर्ययो यथा--'ङूपि- 
तस्य प्रथममन्धकारी भवति विद्या ततो भ्रुकुटिः, आद्‌विन्दरियाणि रागः समास्कन्दति, 
| चरमं चन्लुः, आरम्भे तपो गरति पश्चार्स्वेदसरिरुम्‌ पूवंमयश्ः स्फुरव्यनन्तरमधर” 
| इति । अत्र कोपकार्यं विद्याशरुकुटथादीनामन्धकारी मवनादौ कमं निगीयं तद्विपययोऽ- 
| ध्यवसितः । तस्यैव सहभावो यथा- 
| “रह भवणाहि परिअणो मखणं मणिमेहखा [णअंवाहि । 

ञ्जा हिजआदहि समोसरंति समं ससिसुद्ीणम्‌ ॥' 

अन्न परिजनादीनामपसरणे कमिकष्वेऽपि खमकारव्वमध्यवसितम्‌ । एवमेषां सवे- 
घामेव मेदानां रो कासंभवद्विषयत्वं दशयितुमाह - 

यहा कायकारण-पौरवांपय॑-विध्वं स" इसी एक ही राब्द से-- 

(१) कार्यं ओर कारणरूप से प्रसिद्ध पदार्थो मँ [ कायेकारणभाव का ] विध्न्स अधात्‌ 
उलटाव = कार्यं का कारण वनना ओर कारण का कार्य, [ = अथात्‌ कायैकारणविध्वस |] । 

(२) कायं ओर कारण क्रमदाःवादमं ओर पहले होने काजो प्रसिद्ध पौवापय [कारणकी 
उत्पत्ति पदे दोने ओर काथं की बाद मे का] क्रम है उसका विध्वस्त = उलग दिया जाना अथवा-- 


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अतिदायोक्त्यलङ्कारः २२९ 


( ३ ) दनां कौ सहोत्पत्ति- 
-ये तीनों मेद बतला दिएगएदहै। 
इसके अतिरिक्त यह जो कायकारणके पौर्वाप्यके विपर्ययका भेद है इसमें [ अत्तिरायोक्ति के 
भेद में अभेद आदि ] पाचों भेदभी जाते हें किन्तु ये भेद अवान्तर भेद है [ अर्थात प्रभेद है] 
इसि [ अतिशयोक्तिके | इन सव [मेदां] के पाँच पाँच भेद अतिशयोक्ति के नियम को 
चित्त मं रखकर [ उत्प्क्षाप्रकररणके अन्त में] पहिकेही [ हमनें] स्पष्टकर दिणदहेः। शन 
[ तीर्न ] भेदो में से [ प्रथम मेद ] कार्यकारण के विपर्यय = उल्टाव का उदाहरण, यथा- 
एतावद वदात संकोचकरं खरगाङ्ककान्तीनाम्‌ । 
सहस्रपत्रकमर विन्दस्य कारण भवति सरसः ॥ १॥ 
--तालाव से निकले अरविन्द की इतनी उज्ज्वल हजार पंुडिएं चन्द्रमाकी कान्तिमें 
संकोच का कारणक्हीजारहीहै। 
-- यदा चन्द्रमा कौ कान्तिके प्रति उल्टे कमर्को संकोचका कारण वत्तरादिया गया हे 
[ जब कि चन्द्रकान्ति ही कमल्षकोचका कारण मानी जाती दहै]। उसमे कारण दै भअति- 
योक्ति का प्रथम मेद भेद में अभेदः उत्तरा्ध॑मेंभी वही शाब्द रेष-दारा निष्पन्न होकर 
कारण वना हे । इस प्रकार के वर्णन का उदेदय है नायिका के चेहरे की कनाई में प्रकषं जतलाना । 
क्रम के उरुटने का उदाहरण यथा- 
जो क्रुध होता है उस्तकी विचा पिरे मल्नि दयोती है भ्रुकुटी बाद मे, राग उसकौ इन्द्र्यो 
को पिले दवोचता है नेत्रं को बाद में, उसका तप पिके गिरता पसीना वाद मे, अपय 
पहले फरफराता हे अधर बादमें। 
- यहा विद्याश्रुकुटि आदि का मलिन होना कोपज कायं हैः तथापि उनके [ उत्पत्ति- ] क्रम में 
विपरीतता अध्यवसित की गई हे । 
काय-कारण-पो्वापय॑-ध्वंस मे सहभाव यथा- 
रतिभवनेभ्यः परिजनो मसृणं मणिमैखला नितम्बेभ्यः । 
रुज्जा हृदयेभ्यः सममपसरन्ति समं शरिमुखीनाम्‌ 11 
-- चन्द्रसुखी सुन्दरि के रतिभवर्नो से परिजन, नितम्बो से मणिमेखला ओर हृद्यो से 
रुञ्जा एकसाथ चुपके से खिसक रहय हैं ।: 
--यहां परिजन आदिका निःसरण = खिसकना होता तो एक के वाद एक करके है किन्तु 
उसमें अध्यवसित किया गया है समकारूत्व । 
अव इन सव भेदो के विषय मेँ वतरते दहै किये लोकभूमिका पर संमव नीं हे, [ केवल 
कान्य या कविकमै कौ भूमिका पर ही संभव है ]- 


[ सवेस्व ] 
पचु पञ्चसु मेदेषु भेदेऽयेदादिवचनं टोकातिक्रान्तगोचरम्‌ । अतश्चा- 
ातिरायाख्यं यत्फलं प्रयोजकत्वान्निभित्तं तत्नाभेदाध्यवसायः। तथा हि 
कमलमनम्भसि' इत्यादौ वदनादीनां कमलाचेभदेऽपि वास्तवं सौन्दर्यं 
कविसमपितेन सौन्दर्येणामेदेनाध्यवसितं मेदेऽभेदवचनस्य निमित्तम्‌ । तक्र 
च सिद्धोऽध्यवसाय इत्यध्यवसितध्राधान्यम्‌ । न तु वदनादीनां कमठादि- 
भिरभेदाध्यवसायो योजनीयः, अभेदे मेद्‌ इत्यादिषु प्रकारेष्वभ्याप्तेः । तच्च 


| 
। 


२३० अटडनरसवेस्वम्‌ 


हि “अण्णं लडदहत्तणओं' इत्यादो सातिद्ायं ठडदत्वं निमित्त तमभदेनाध्य- 
वसितम्‌ । एवमन्यत्रापि ज्ञेयम्‌ । तदभिग्रायेणेवाभ्यवसितप्राचान्यम्‌ । मरका- 
रपञ्चकमध्यात्कायकारणभावेन यः प्रकारः स॒ कायंकारणताश्रयालंकार- 
प्रस्तावे प्रपञ्चाथ ठक्चषयिष्यते । 
इन पोच भेदो मे भेद मे अभेद आदि कथन लोकोत्तर [ कविप्रतिभाकी] भूमिका पर 
निभर रहता है । ओर इसी कारण इनमें जो-'अतिदायः नामक फल दहै जो [ अतिदायोक्ति का] 
निष्पादक होने से निमित्त भी हे उसमे अभमेदाध्यवसाय कौ प्रतिष्ठा मानी गइ । उदाहरणाथै- 
"कमल विना पानी के-आदि स्थलां मँ [ नायिका |-मुख आदि का कमर आदिमे भेद रहने 
पर भी वास्तविक सोन्दयं को जो कवितस्तमर्पित सौन्दयं से अभिन्न प्रतिपादित किया गया वह 
निमित्त वना [इस विधाको] भेदम अभेदः [-विधा] नामदेने का ओर यहां जो 
अध्यवसाय हुआ वह सिद्ध अध्यवसाय हे । श्सलिए प्रधानता हुड अध्यवसित [ विषयी, कमट।दि | 
कीं । यहां (मुख आदि से कमल आदि का अभेदाध्यवसाय दहे एेसी योजना नहीं करनी चाहिए 
क्योंकि वेसा करने पर “अभेद मेँ सेद- आदि प्रकारं में छक्षण नदीं जागा । क्योकि उनमें "कुछ 
ओर ही है सौन्दयै" इत्यादि मेँ मतिशययुक्त सौन्दयं ही निभित्त होकर अध्यवसित हआ दै ओर 
इसी प्रकार अन्य मेदां मे मी। उसीके अभिप्राय से कदा कि श्रधानता अध्यवसित की रहती इ । 
पोँचोँ भेदं जो भेद कायेकारणभावमूल्क है कायंकारणभावमुलक अल्करोके प्रकरणमें 
उसका लक्षण एक वार अर बतलाया जाएगा किन्तु वह केवल पिस्तार या स्पष्टीकरण की 
दृष्टि से । 
विमरिनी 
एष्वित्यादि । एष्विति विषयसप्तमी । एष चावयवनिद॑श्ञः। लोकातिक्रान्तेति । कचि- 
म्रतिभानिमितमेव सातिज्ञायं वस्स्वेषां विषय इव्यथः । अत्रेति मेद्‌ पञ्चे । चकाब्दः प्रमे- 
यान्तरसमुच्चयार्थः । फलमिति । तस्येव प्रतिपिपाद्यि षितस्वाव । तत्रेति । वा,तवस्थ 
सौन्दर्यस्य कविसमर्षितेन सौन्दर्यणामेदव चने । ननु चात्र वदनादीनां कमलायभ्यव- 
सायः प्रतीयत इति कथमेतदुक्तमित्याङाङ्कयाह-- न प्वित्यादि । कुतश्च तेष्वव्याक्िरिव्या- 
शङ्कथाह - तत्र हीत्यादि । कमल्मनम्भ्ीत्यत्र हि यदि वदनादीनां धमिणाममद्‌ाध्यव- 
साययोजनं क्रियते तत्तस्य धमिगतव्वेनेवेष्टेरिह धर्माणां न स्याद्व्याप्षिः। अतश्च पूतत्र 
धर्माणामेवाध्यव सायो योजनीयो येन सवंत्रेक एव पत्तः स्यादिति ततारपययांथं. । उपख्चय 
चेतत्‌ । यावता द्यध्यवचितप्राधान्यमस्या लत्तणम्‌ । तच्च धमिणामस्तु धर्माणां उति को 
विशेषो येनाग्याषिः' स्यात्‌ । प्रद्युत धमंयोरमेदाध्यव सायाभ्युपगमे उपमादीनामप्यति- 
चयोक्तिप्रसक्गः स्यात्‌। तच्रापि धर्माणामेव सेदेऽभेद्विवक्तणात्‌ । एवं च विजातीयत्वेन 
मेदे ध्मयोरप्यव्याप्िः प्रसज्यत इस्यरमसङ्गतय्रन्थाथ) दीरणेन । प्रपन्रा्थमिति। नतु 
निणया्थम्‌ । इहैव तस्य निधितव्वात्‌ । प्रपञ्चश्च तत्रेव दुशं यिष्यते । 
एषु = इनमे यँ सप्तमी विषय अथ॑मेंहै। ओर [ इनमेंके] इनः का अथं है अवयव, 
छोकातिक्रान्त = कविप्रतिभानिर्मित एतएव अतिदाय से युक्त वस्तुदी इन भेदा का विषय दहे। 
अन्र = इनमे अर्थात्‌ पांचा भेदो मँ । व्च = ओर प्रयोजन दै--अन्य प्रमेय [अथं] का संग्रह । 
फरुम्‌--क्रयो कि फल ही का प्रतिपादन अभीष्ट रहता ह। 'तत्र--यर्दो" अथांत्‌ वास्तविक सोन्दय॑ 
कै कविस्रमपित सौन्दयं के साथ गमेदके कथनमें। शका होतीदहेकि यहां प्रतीति होतीदहै 


अतिदायोकत्यलङ्कारः २३१ 


मुख आदि पर कमल आदि के अध्यवसाय की गोर कदा जा रहा हे कि प्रतीत होता हे अध्यव- 
सितः, यह कैसे'”--इसके उत्तर मे लिखते है--तच्र हि । तात्पये यह कि कमर विना पानौ के- 
यह यदि सुखादि धमी का अभेदाध्ययसराय किया जाय तो वह केवर धमियां मे हौ रहेगा, धर्मों 
मे नदीं दोगा इसलिए अव्यापि होगी ? इस कारण पहिले अभेदाध्यवसाय धमो मंदही मान चखिया 
जाना उचित है जिसे सभी भेदो मे एक ही योजना रहे । 


[ कुछ रोगो का कहना है कि ] यह तो उपलक्ष्यमात्र है क्योकि इस अतिरायोक्ति का रक्षण 
हे “अध्यवसित की प्रधानता, वह अध्यवसान धमं का हो अथवा धम का, कोई अन्तर नहीं पडता 
इसलिए अन्यापि की वात नहीं बनती । वल्कि धर्मों मँ अभेदाष्यवसाय मानने पर उपमा में 
अतिरायोक्तित्व जाते का भय रहेगा, क्योकि वहां भी धर्मम मेदके रहते इएभी अभेद की 
विवक्षा रहती है  [ किन्तु ]एेसे तो धर्मौ मे क्षण लागून होगा क्योकि उनमेमी मेद रहता 
है क्योकि वे परस्पर मे विजातीय होते दहे इसकिए उक्तं क्रम से [ “उपलक्ष्य कहकर ] जो मूल 
ग्रन्थ की व्याख्या की गई है वह असङ्गत है, उसकी चचाँसे विरामल्ेना ही अच्छा [| यह्‌ 
कदाचित्‌ अरुकाररत्नाकरकार के “अध्यवसान च सवेत्रः-से लेकर 'निविषयत्वप्रसगादित्यरु बहुनाः ` 
यँ तक पृष्ठ ५९ [ 0. 8- ~. ८००५ १०४२ ] पर विद्यमान विवेचन का सांकेतिक खण्डन हं । 

प्रपञ्चार्थ न कि निणयाथ । क्योकि निणैय तो यदीं किया जा चुका है । प्रपच [ विस्तार मात्र 
रोष है सो वह आगे [ विदेषोक्ति ओर असंगति के बीच ] बतला दिया जायेगा । 

वि मशंः-- अतिशयोक्ति का पूर्वेतिहास = 

भामह = (निमित्ततो वचो यत्तु रोकातिक्रान्तगोचरम्‌ । 

मन्यन्तेऽतिरयोक्ति तामलङ्ारतया यथा ॥ 
स्वपुष्पच्छविहारिण्या चन्द्रभासा तिरोहिता । 

अन्वमीयन्त अेङ्गाल्वाचा सप्तच्छदद्रुमाः ॥ 

अपां यदि त्वक्‌ शिथिला च्युता स्यात्‌ फणिनामिव । 

तदा शुक्लांजुक्षानि स्युरङ्ग ष्वम्भसि योषिताम्‌ ॥ 
इत्येवमादिरुदिता राणातिङ्घययोगतः । 

सवंवातिशयोक्तिस्तु तर्कयेत्‌ तां यथागमम्‌ ॥ 

सेषा सवव वक्रोक्तिरनया्थों विभाव्यते । 

यत्नोऽस्यां कविना कायः कोऽलङ्कारोऽनया विना ।।› [ २।८१-८५ | 

-- किसी निभित्त से कथित जो . लोकोत्तर [ २।८१-८५ ] उक्ति वही अतिद्ययोक्ति ओर 
उसी को अख्कार मानते हे [ ८१ ] उदाहरण [ १ ] = अपने पुष्पों की कान्ति चुराने वाली 
चोदनी मे छिपे सप्तपणे [ छितवन ] वृक्ष मोरो की गुज से अनुमानित किए गए [८२ ] ओर 
[ २ ] यदि पानीसे कोई ञ्लीनी त्वचा निकले जैसे सापो से निकल्ती है [ कैचुर ] टो उससे 
जलक्रीडा निरत ख॒न्दरियो के ञंग.पर [ पारदं] आवरण वख बनाया जा सकता [ ८३ ] 
[ जिसे अंग छिपे नही, स्मरणीय कालिदास का 'संदष्टवस्ेष्ववलानितम्बेषु० १६ सगे ] । 

-इन ओर एेसे ही अन्य स्थलों मँ अतिशयोक्ति मानी जाती है। यदह गुणो मे अत्तिशाय 
जोरा दिया जाता है [ ८४ ]। यह जो अतिशयोक्ति है यही पूरौ की पूरी वक्रोक्ति है सामान्य 
अथेमे इसी के दारा विभावन-[ रसनीयता, चमत्कार ]-राक्ति आती है) प्रत्येक कवि को 
इस दिदा मे सचेष्ट रहना चाहिए । इसके बिना कोई भी अलंकार निष्पन्न नदीं ह्येता [ ८५ ] ॥ 
अलंकार सवस्वकारने छोकातिक्रान्तगोचरः-शब्द ओर निमित्त शाब्द भामह से द्यी चिदिह) 


२३२ | अलङ्कारसवस्वम्‌ 


मामह का प्रथम उदाहरण मीकित या सामान्य का उदाहरण हो सकता ओर द्वितीय उत्तराल्कार 
का । किन्तु द्वितीय में 'यदि"-से निष्पन्न होनेवाली अतिशयोक्ति भी हो सकती हे । 
वामन = उत्परेक्षेवात्तिशयोक्तिरिति केचित्‌ , तन्निरासार्थमाह- 
[ सू० ] संभान्य-धमे-तदुत्कषकल्पनातिद्चयोक्तिः ! 
[ वृ० ] संमान्यस्य धर्मस्य तदुत्कषेस्य च कट्पनातिरायोक्तिः । यथा- 
उभो यदि व्योम्नि पृथक्‌ प्रवाहावाकाद्गङ्गापयसः पतेताम्‌ । 
तेनोपमीयेत तमाल्नीलमासुक्तमुक्ताकुतमस्य वक्षः ।॥ माघ० ॥ 


य॒थधावा- 
'मल्यजरसविदटुप्ततनवो ० । 


-ऊछ आचार्यो का कहना है किं “उत्प्रेक्षा दी अतिदायोक्ति है इसका निराकरण करने के 
चिए [ उत्प्क्षानिरूपण के तुरन्त पश्चात्‌ अतिद्ायोक्ति का लक्षण दिया-- | 

[ सूत्र | संभाव्य धमे ओर उसके उत्कषं की कल्पना अतिङायोक्ति । 

[ वत्ति ] यथा = भमौक्तिक की माला की दो लडिर्यां से विभूषित मगवान्‌ कृष्ण के तमार नील 
वक्ष कौ तुलना अकाश सेकौ जा सकती है, यदि उसमे आकादागंगाके जल के दो प्रथक्‌ प्रवाह 
ऊपर. से नीचे की ओर वहने लगँ । ओंर- 

“वेत प्रसाधनं से युक्त खेताभिसारिकार्पँ चौँदनी मेँ अल्ग समञ्चन नदीं पडती अतः निभेय 
होकर वे अपने प्रिय के स्थान तक पर्हुव जाती है| 

निश्चित ही दोनों उदाहरण भ।मह के उदादूर्णो के समानाथक उदाहरण हैं । 
उद्धट = निमित्ततो वचो यत्तु लोकातिकान्तगो चरम्‌ । 
मन्यन्तेऽतिद्योक्ति तामल्कारतया बुधाः ॥ २।११ ।॥। 
भेदेऽनन्यत्वमन्यत्र नानात्वं यत्र॒ वध्यते । 
तथा संभाव्यमानाथैनिबन्धेऽतिरायोक्तिगीः ।। २।१२ ॥ 


कार्यकारणयोयत्र पौर्वांपयंविपयंयात्‌ । 

आश्युमावं समारम्ब्य वध्यते सोऽपि पृवंवत्‌ ।। २।१३ ॥ 
उदाहरणानि- 

तपस्तेजःस्फुरितय। निजलकावण्यसपदा । 


करदामप्यक्ररामेव  टरयमानामसंशयम्‌ ॥ 
अचिन्तयच्च भगवानहो नु रमणीयता) 
तपसास्याः कृतान्यत्वं कोमाराद्‌. येन लक्ष्यते ॥ 
पतेद्‌ यदि दारिद्योतच्छटा पद्ये विकासिनि । 
म॒क्तफलाक्चषमाकायाः करेऽस्याः स्यात्‌ तदोपमा ॥ 
मन्ये च निपतन्त्यस्याः कटाक्षा दिश्च पृष्ठतः । 
प्रायेणाप्रो तु गच्छन्ति स्मरवाणपरम्पराः॥ 
~ [ भगवती पावती ] तप से उत्पन्न तेज से चमचमाती अपनी लावण्यसंपत्ति से कृश 


होने पर मी निशित अक्रा लगती थीं । 


--[ पावेतीजी को देखकर ] भगवान्‌ ने सोचा ओहो कितनी अद्भूत है इसका सौन्दर्यं । 
तपने इते कुमारी से भिन्न [ युवती ] बना दिया ह, 

~ [ पावंतीजी के ] हाथमे रखी स॒क्तानिर्मित जपमाला कौ उपमा तव दहो सकती है जव 
चन्द्रमा कौ कान्ति कमल मेँ पड़े । 


। + न द 


त्रो = ~ अ, - अ, 1 वि र 


अतिशयोक्त्यलङ्कारः २३द 


-- [ कदाचित्‌ पार्वती जौ का ही वणैन ] ओर सुने कुच णेसा लगता है कि इसके कक्ष 
वाद में गिरते हैँ कामके वारणो कार्ता प्रायः पहिली ल्ग जाता है। 

इनमें प्रथम उदाहरण भेद में अभेद का, द्वितीय अमेद में मेद का, तीसरा असम्बन्ध में संबन्ध 
का तथा चौथा कार्यकारण के पौ्वापये के उरूटने का उदाहरण है । 

इससे स्पष्ट हे उद्भट ने “संबन्ध मे असससम्बन्ध" नामक भेद नहीं माना है। किन्तु कायेकारण- 
पौर्वापयै.विपयेय को अवदय स्वतन्त्रभेद बतलाया है । यह भी स्पष्टही दहे उद्धट का आधार भामह 
का दी अतिशयोक्ति विवेचन हे। 

रुद्रट = रुद्र ने अतिशयोक्ति नाम से एक कोई स्वतन्त्र अल्कार नदीं बतलाया । अलंकारो 
के एक वर्गं ॑को अतिदाय नाम दिया है टीक उसी प्रकार जिस प्रकार एक वर्गं को वास्तव ओर 
एक वग को ओपम्य । अत्तिशयवर्ग म उन्होने ( १ )“पुवं ( २ ) विष ( ३ ) उत्प्रेक्षा ( ४ ) विभावना 
(८ ५ ) तद्गुण ( £ ) अधिक (७ ) विरोध (८ ) विषम (९ ) असंगति (१०) पिहित (११) 
व्याघात तथा ( १२) अहेतु ये १२ अलंकार माने हेः । इनमें प्रथम पूवे? अलंकार कारण-कायं- 
विपर्यय नामकमेदकादही दूसरा नामहे, 

उसका लक्षण-- 

धयत्रातिप्रबङतया विवक्ष्यते पूवमेव जन्यस्य । 
प्रादुमोवः पश्चाञ्जनकस्य तु तद्‌ भवेत्‌ पूवेम्‌ ॥› 

- जहां अतिप्रवरता मात्‌ कारण के द्वारा विना व्यापार के ही कारयोँत्पत्नि वतलाने की 
इच्छा से कायै कौ उत्पत्ति कारण की उत्पत्ति से पहिले ही बतला दी जाती है वह है पूवम्‌ । यथा- 

(जनमखरभमभिलषतामादौ इउन्दद्यते मनो यूनाम्‌ । 
गुरुरनिवारप्रसरः पश्चान्मदनानरो ज्वरूति ॥ 

--असुलभ व्यक्ति को चाहने वाले युवकों का मन पहर ही जलता है भयंकर ओर अप्र्च- 
मनीय मदनानल बाद मे सुल्गता हे। अतिश्शयसामान्य का लक्षण रुद्रट ने इस प्रकार 
दिया दै- 

“यत्राथधमनियमः प्रसिद्धिबाधाद्‌ विपर्ययं याति । 
कश्थित्‌ कचिदरतिलोकं स॒ स्यादित्यतिश्यस्तस्य ॥ ९१ ॥7' 

-- भाव यह किं जहाँ पदां भोर उसके धम की प्राङृत्तिक व्यवस्था प्रसिद्धि के विरुद्ध उल्टी 
प्रतिपादित की जाती है वहां उसकी यदी अत्तिलोकता अर्थात्‌ लोकातीतता अतिदाय कहराने 
लगती है । 

ठीक एेसा हौ एक अन्य पूवे" नामक अलंकार रुद्रट ने ओपम्यव्ं मेँ भी गिनाया है - 

धत्रेकविधावर्थो जायेते यौ तयोरपूर्वस्य । 
भभिधान प्रागभवतः सतोऽभिधीयेत तत्‌ पूवम्‌ ॥ ८।९७ ॥ 

--अथात्‌ उपमानोपमेय किसी एक कार्यं से युक्त हो रहे है उनमें से उपमेयभूत पदार्थं भङे 
दी उपमानसद्ररा वणित कायेसे युक्त साथ साथ या बाद मे ह्यो रहा हो परन्त यदि उसे 
उपमान कौ अपेक्षा पिले ही वेसे कायं से युक्त वतला दिया जाए तो वहीं पूवं नामक अलंकार 
होता हे यथा- 

कारे जलदकुलङुखद शदिशि पूर्वं बियो गिनीवदनम्‌ । 
गल्दविरर्सक्िकभरं पश्चादुपजायतते गगनम्‌ ॥ ८।९७२ 

-मेघङुलो से दों दिशाओं को आकु करने वाला समय अर्थात्‌ वर्षाऋतु जव आती है तो 

वियोगिनीवदन अविरलजलस्रावी पहले हो जाता है, काश बाद मे ॥' 


न = 9 


= 


म 


य 


जानानम 
- -* न  --भ्ववू--- य न 


२३७ अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


-- उपर्युक्त उदाहरण तथा इस लक्षण से यह तो स्पष्ट होतादहै कि रद्रट के मन में अति- 
दायोक्ति का पूर्वाचायै प्रतिपादित रूप है किन्तु वे भामह या उद्भट के अनुसार इसको स्वतन्त्र 
अलंकार नदीं मानते । 

यदह एक यह मी ध्यान देने योग्य त्यहं फि वामनाचायं ने उत्प्रेक्षा को अतिशयोक्ति से 
छभिन्न मानने वालो का स्पष्ट खण्डन किया है ओर उनके परवत्ती रुद्रट स्पष्टरूपसे वेसा 
मानते हैँ । निश्चित ही वामन के पुवं अल्कार-संप्रदायकी कोई ओर भी कड़ी रही होगी जो 
अव्र अनुपरग्ध है किन्तु रुद्रट को उपलब्ध थी । 

मम्मट = निगीयाध्यवसानं त॒ प्रकृतस्य परेण यत्‌ । 

प्रस्तुतस्य यदन्यत्वं यथोक्तौ च कल्पनम्‌ ॥ 
कायैकारणयोयंश्च पौर्वापयेविपर्ययः । 
विज्ञेयातिदायोक्तिः सा । 

--( १) उपमान द्वारा उपमेय का निगरण, ( २ ) प्रस्त की अन्यरूपता, (३) यदि दाब्द 
के अर्थं की उक्ति द्वारा असंभाविताथं की कटपना तथा ८४) कार्य ओर कारण के पौवापय का 
विपयंय यह सब अतिक्षयोकिति अल्कार दहै। इसमें से मम्मट ने प्रथम का उदाहरण (कमल- 
मनम्भसि", द्वितीय का अण्णं ल्डहत्तणअम्‌' तथा चतु्थंका !हृदयमधिष्ठितम्‌ ही दिया हे) 
तृतीय + अवदय-- 


^र।कायामस्रतांयोद्चेदकल्ङ्कु भवेद्‌ वपुः । 
तस्या मुख तद। साम्यपरामवमवाप्तुयात्‌ ॥ 


--पूणिमा मं चन्द्रविम् यदि कलंकरहित हो तो उसका मुख साम्य का तिरस्कार उठा 
सकता दहै, यह नया उदाहरण दिया है । 

इस प्रकार मम्मर ने भी अतिदायोक्ति के चार ही भेद माने दैँ। संवन्ध में असंबन्ध नामकः 
भेद उद्धट के ही समान उनके विवेचन में नहो मिलता । 

शोभाकर = ने अतिद्धायोक्ति के यदर्थं अर्थात्‌ असंवन्ध मे संबन्ध भेद के लिए यद्यर्थोक्ताव- 
संमाव्यमग्नस्य क्रियातिपत्तिः = ध्य॒दिः आदि शब्दो के धर्थंके द्वारा जौँ अक्षभाग्यमान पदाथ 
की कल्पना कौ जाय वह्‌ क्रियातिपत्तिः, - इस प्रकार क्रियातिपत्ति नामक एक स्वतन्त्र अलुकार 
माना है ओर उस्तका उदाहरण पुष्पं प्रवालोपदितम्‌ प्य ही दिया है। उनका अतिशयोक्ति 
सम्बन्धी शेष वित्रैचन पहले आ ही चुका दै इर्दानि एक अतिदायनामक अलंकार ओर मानाहे, 
किन्तु उसका अतिश्चयोक्ति से कादं संबन्ध नदीं हे । 

अप्पय्यदीङ्धित = परवत्तीं अप्पय्यदीक्षित कुवल्यानन्द में तो (१) रूपकातिशयोक्ति (२) 
सापहवातिद्ययोफिति ८ ३ ) भेदकातिदायोकिति ( ४ ) स्म्बन्धातिदायाक्ति ( ५) अप्तम्बन्धातिडायोकिति 
( £ ) सक्रमाति्चयोकिति ८ ७ ) चपलातिद्धयोकिति तथा अत्यन्तातिद्चयोक्िति नामक सात मेद मानते 
ओर अन्तिम तीन मेदो मे कार्यकारणपौर्वापयंविपयंयमूलक अतिशयोक्ति मी स्वीकार करते 
हे, साथ ही अपनी भर से स्वतन्त्र उत्तम उदाहरण भी देते है, किन्तु चित्रमीमांसा में वे केवल 
चार भेद ही प्रतिपादित करते हैँ मेदेऽमेदः, भभेदेऽभेदः, सम्बन्धेऽसम्बन्धः ओर असम्बन्धे सम्बन्धः । 
कायकारणभे्वांपयविपय॑य को वे छोड़ देते दैः । चित्रमीमांसा मे उनने अतिदयोक्ति का लक्षण 
इस प्रकार किया है-- 

'विषयस्यानुपादानाद्‌ विषय्युपनिवध्यते । 
यत्र सातिरायोक्ति.ः स्यात्‌ कविप्रोढोक्तिनिर्मिता ॥° * 


अतिद्ायोक्त्यटेकारः २६९५ 


पण्डितराज जगन्नाथः - 

लक्षण--पविषयिणा विषयस्य निगरणमतिश्चयः, तस्योक्तिः। अधांत्‌--विषयी द्वारा विषयका. 
निगरण होता दै अतिशय ओर उसकी उक्ति = अतिद्ायोक्ति । 

पण्डितराजने जो उदाहरण दिए है उन मे उन्होने सवंस्वकार द्वारा प्रतिपादित पाँचोंमेद 
नामोदेखपूरवक धटाए हं । ओर अन्त मे उन्होने इन सभी भेदो के उक्त रक्षण के समन्वय का 
प्रयत्न किया है एतदर्थं उन्होने प्राचीनो के अनुसार “एतद्मेदपच्चकान्यतमत्वम्‌› = इन पाचा 
भेदो मे से कोर यदह सामान्य लक्षण किया है। किन्तु उन्होने नव्यो के अनुसार केव प्रथम = 
निगरण मूलक मेद को ही अतिशयोक्ति वतलाया है ओर अन्यमेदों को अन्य कोड अलंकार, 
किन्तु उन अल्कारो का नाम नदीं वतलाया। भेद मेँ अभेद का, अभेदमे भेदका, सम्बन्धमं 
असम्बन्धका, असम्बन्ध मै सम्बन्ध का ओर कायकारण के क्रमविपयये मे वास्तविक क्रमका 
निगरण माना जा सकता रै, किन्तु यह निगरण वेसा निगरण नहीं होगा जेसा कमलमनम्भसि? 
आदिमे विषयी द्वारा विषय के निगरणे होता दै जीँ विषय का ज्ञान उसके अपने धमक 
साथ नहो होता । [ उसमे विषयी के धमेकाहीज्ञान होता दहै] क्योकि प्रथम भेद के अतिरिक्त 
अन्य सवमभेदोमें विषयकाज्ञानभीदहोता ही रहतादहै। इसी अभिप्राय से पण्डितराजने यदह 
पक्ति लिखी दै--'ननु प्रस्तुतान्यत्वभेदे भेदेनाभेदस्य, असम्बन्धे सम्बन्ध इति भेदे संबन्धेना- 
सम्बन्धस्य, सम्बन्धेऽसम्बन्ध इति भेदे असवन्धेन सम्बन्धस्य कायंकारणपोवांपयेविपयेये च तेन 
वानुपुव्येस्य च निगरण रत्नाकर -विमरिनीकाराचक्तक्रमेण संभवतीति चेत्‌ न, अन्यत्वादिभिः 
[ साध॑म्‌ ] अनन्यवस्तु-प्रतीतेरेव चमत्कारित्वम्‌, त्वनन्यत्वादिभिः [ कवेः ] तेषाम- 
नुभवासङ्गतेः । 

वोक्तं (अन्यतमत्व' दारा संभव निर्वाड परभी वे कटाक्ष करते हए नर्न्योकौ ओरसेः 
लिखते है--“न चान्यतमत्वमनुगतमिति शस्यत्ते वक्तुम्‌, विच्छित्तिवेलक्षण्ये स अन्यतमत्वस्या- 
प्रयोजकत्वात्‌ ।'-"अन्यतमत्व पाँच भेदो मे लागू नोदयो जाता है विन्तु वह पाँचों मेदो को एकः 
अलंकार सिद्ध नहीं करा पाता, कर्याकि पाँच म जो चमत्कार है उस मे अन्तर हे । 

पण्डितराज के इस विवेचन की जडम जो दुबलता है वह वहीं पकड में आ जाती हे जहां 
वे द्वितीय से लेकर पौँचवे भेद तक के चार भेदो को अलंकारान्तर तो करार देते है किन्तु उनका 
नाम नांल पाते। सचयक€दै कि इन सव भेदो मे सामान्य धमं है (लोकातिक्रान्तगोचरता' । 
ओर इते पृव्वतीं सभी आचार्यौ ने स्वीकार किया है। यहो इसी से चमत्कार होता दै इसक्णए 
अन्य अल्कारो मे इसके रहने पर मी उन्हे अतिशयोक्ति नदीं कदा जाता, क्योकि वहां चमत्कार 
के दूसरे दूसरे कारण रहते हे । 

पण्डितराज ने सम्बन्ध म अष्ंवन्य ओर `असम्बन्ध म सबन्ध' दोनों भेदो को कुछ ` आचाय 
दारा अनभिमत बतलायादहे। ये आचार्यं कोन दहं यह एक गवेषणीय तथ्य हे । सजाविनाकार ते 
अतिद्ायोक्ति भिवेचन का सारसंग्रह इस प्रकार किया है- 

अभेदाध्यवसायो हि फकेऽतिद्यनामनि । न पुनः फलिनो स्तत्रामेदे मेदो न सिद्धयत्ति ॥' 

अभेदाध्यवताय अतिरायनामक फल मे होता है, फल्वानो मे नहीं क्योंकि इस पक्ष मे (अभेद 
मे मेद कौ सिद्धि नहीं हो पाती ।' 


विमरिनी 
एतदुपसहरज्नन्यदवतारयति- 
अब इस [ प्रकरण ] का उपहार करते हृए अन्य [ प्रकरण ] का आरम्भ करते हे -- 


५. अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


[ सवंस्व ] 
एवमध्यवसायाश्नरयमटंकार्द्यमुक्त्वा गम्यमानोपम्याश्चरया अलंकारा 
इदानीमुच्यन्ते । त्रापि पदार्थवाक्यार्थगतत्वेन तेषां दवैविध्ये पदार्थगतम- 
ठकारदयं कमेणोच्यते-- 
[ ० २४ ] ओपम्यस्य गम्यत्वे पदाथगतत्वेन प्रस्त॒ता- 
नामग्रस्तुतानां वा समानधमांमिसंबन्धे तुस्ययोगिता । 
इवाप्रयोगे द्यौपम्यस्य गम्यर्वम्‌ । तज पाकरणिकानामप्राकरणिकानां 
वाथानां समानगुणक्रियासंवन्धे अन्विता्था तुख्ययोगिता। यथा-- 
सज्ातपत्नप्रकाराञ्ितानि समुदधदन्ति स्फुटपाटटठत्वम्‌ । 
विकस्वराण्यककरप्रभावादिनानि पद्यानि च चृद्धिमीयुः "' 
अच्र कतुषणेनस्य पक्रान्तत्वादिनानां पद्यानां च भरङृतत्वाद्‌ बृद्धिगमनं 
क्रिया । एवं गुणेऽपि । यथा- 
योगपद जटाजालं तारवी त्व ङ्ग्खगाजिनम्‌ | 
उचितानि तवाङ्गेषु यद्यमूनि तदुच्यताम्‌ ॥ 
उचितत्वं गुणः । अप्राकरणिकान। यथा - 
'धावच्वदश्वपृतनापतित अुखेऽस्य 
निनिद्रनीटठनलिनच्छदकोमटाङ्गचा । 
भग्नस्य गूजरच्रपस्य रजः कयापि 
तन्व्या तवासिखतया च याः प्रसुष्टम्‌ ॥° 
अत्र गूजंरं प्रति नायिकासिलतयोरप्राकरणिकत्वे माजनं क्रिया । गुणो 
यथा-- 
€त्वदङ्गमादेवं द्धः कस्य चित्ते न भासते । 
मालठतीशशथरस्टेल(कदट्धीनां कटोरता ॥ 
कटोर्त्वं गुणः । पवमेषा चतुर्विधा व्याख्याता । 
[ बरृ० ] इस प्रकार अध्यवसाय पर निर्भर दो मरुंकारो का निवंचन किया । अव ठेते अरूकारां 


का निर्वचन किया जाता है जिनमे सादृश्य गम्यमान रहता है। उनमेंमी दो विधार्य रइती दे 


( १) पदार्थगत ओर ८२) वाक्यार्थगत। इनमे से क्रमसे पदाथगत दो अल्कारों का निवेचन 
[ पहले ] करते है-[ विमरिनीकार ने भपहुति के आरम्भ मे यहाँ के (दवमध्य ° क्रमैणोच्यते- 
इस गन्धां को उदधृत किया है । वहां क्रमैणोच्यते' पाठ है, अतः याँ मी हमने वेसादही पाठ 


जना दिया हे ]~- 
विमरिनी 


[ सू° ] “सादृश्य यदि गम्य [ शब्दतः अकथित ] हो ओर [ कवर | प्रस्तुतो अथवा 
[ केवर ] अप्रस्तुता का पदार्थस्तर पर समानधम-सम्बन्धहो तो तुक्ययोगिता 


[ होती हे ] ॥ २४॥ 


किक 0 = तिक ज काज काक क >~ =-= 


तुस्ययोशितालज्ञारः २३७ 


[ च्र° ] साद्रश्य गम्य होता है जव इवादि [ सादद्यवाचक पदों ] का प्रयोग नहीं रहता । 
इस स्थिति में केवल प्राकरणिक अथवा केवल अप्राकरणिक अर्थौ काही गुण क्रिया आदि रूप समान 
धमो से संबन्ध हो तो उसे अथानुरूप तुस्ययोगिताशब्द से पुकारा जाता है । यथा- 

[ यरीष्म में ] दिन ओर पञ्च दोनों वृद्धि. को प्राप्त हए । दोनों सज्जातिपत्रप्रकरांचित ये, दोनों 
पाटरूता [ लर्लोडं ] धारण किएहएये ओर दोनों ही विकस्वर [ विकासी ]थे। [दिन पश्च 
मे = सञ्ज = सन्नद्ध जो आतपत्र = छातते उनफे प्रकर = समुदाय से अचित = युक्त, पद्य पक्ष मे = 
सत्‌ = अच्छे जात = उत्पन्न हुए जो पत्र = पत्ते उनके प्रकर = समुदाय से अचित = सुरभित ] । 

--यहां प्रस्त॒त है ऋ तुवर्णन, अतः उसमे दिन ओर प्रय दोनों ही प्रस्तुत है भौर दोनोंमें 
वृद्धि को प्राप्न होना = क्रिया अन्वित होती है। इसी प्रकार गुणके भी उभयान्वयी होने पर 
भी यथा- 

ध्योगपड़, जटर्णे, वृक्ष की छार, सृगचमे, ये सव तुम्हीं तला यदि तुम्हारे शरीरके किए 
उचित हो । 

-- यदं उचितत्व गुण है । [ अकूकाररत्नाकरकार के अनुसार उचित शब्द नपुसकल्गि वबहु- 
वचनान्त होने से योगपद आदि प्रत्येक मे अन्वित नहीं होता, यह एक दोष है ] अप्राकरणिक 
का [ एक धमं प्रे अन्वय ] यथा- 

-- “नष्ट गुजरेश के चेहरे पर आपकी दौडती इई अश्वसेना की पड़ हुईं भूर को उसकी खिले 
हए नीलकमल के समान कोमल अंगवारखी प्रियाने पाछा ओर उसकी कीति को आपकी 
[ वैसी ही ] असिर्ताने।' 

- यहाँ वणेन है गुजैरेश का अतः उसकी खी ओर असिल्ता दोनों ही अप्रस्ेत दै । ओर 
उनमें माजेन = पांछना-रूपी क्रिया का अन्वय हो रहा है । 

[ अप्रकरणिकों मे ] गुण का अन्वय यथा- 

तुम्हारे रारीर की स्रदुताको देखने वाले किस व्यक्ति के चित्त मे मालती, रािकला ओर 
कदली की कठोरता का भास नहीं हो जाता । | 

- यहां कठोरता गुणदहे। इस प्रकार यह चार प्रकारकी होती दहै ओर उसकी व्याख्या 
कौ गदं । 

विमरिनी 

एवमित्यादिना । गम्यमानौपम्याश्रया इति इवाद्प्रयोगात्‌ । पदार्थमिति । वाक्यार्थाः 
पेश्तया पदाथप्रतीतेरन्तरङ्गष्वात्‌ । तत्र प्रथमं तुल्ययोगितामाह-ओपम्येत्यादि । एतदेव 
भ्याचषटे--दवेत्यादिना ।. तत्रेस्यो प्यस्य गम्यस्वे सति । प्राकरणिकानामिति इयोः समान. 
धमसंबन्धस्य संभवादेव ग्रहण सिद्धे बहु वचननिदेशो बहूनां महगा्थंम्‌ । अत एव च 
बहू नामो पम्यग्रहणायेति न वाच्यम्‌ । वचयमाणोदाहरणेषु हयोरोपम्यस्योद्धासमानष्वात्‌ । 
एवं दी पकेऽपि जेयम्‌ । अन्वितेति । समानधर्म॑संबन्धिनामन्न भावात्‌ । अनेनैव चास्याः 
प्रहृतानासप्रज्ृतानां च गुणक्नियारमकधर्मयोगाद्‌ द्ेविध्येन चतुष्प्रकारस्वमप्युक्तब्र्‌ । न 
चास्यातिशयोक्तिरनुप्राणकतया वाच्या । तां विनापि वच्यमाणोदाहरणेष्वस्याः संभवात्‌ । 
ओपम्याभावेऽपि गुणसाम्योदाहरणद्रयं प्राच्यो दाहतत्वाद्‌ मन्थङ्कतोदाहृतम्‌ | यन पुनर. 
प्यं प्रतीयते तदु दाहियते यथा- 

देष्यांविकारावसरे तवबोचितमिदं भ्रिये। 
स्खरुद्र तित्वं वचसां रीराचडक्रमणस्य च ॥ 


२३८ अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


अत्रोचितत्वं गुणः । अग्रकृतयोस्तु यथा- 
भूभारोद्रह नव्यम सुचिरं सवयि तिष्ठति । 
देवादय फणिनामथ्रयः कूर्मश्च सुखिनो परम ॥' 
अत्र सु खिघ्वं गुणः । 
केचिच्च नायिकामिलितयोः प्राकरणिकत्वं मन्यन्त इर्युदाहरणान्तरेणो द्‌ाहियते 
-यथा-“चभोयंन्नखरश्मिभिः प्रणमतश्चूडामणित्वे स्थिता 
गङ्गा चन्द्रकरा च सवंजगतां बन्द्यत्वमा पादिता । 
युक्तायाः परतापदावविपदः कन्यापितणामसौ 
| दूरीकायहिमाख्या कथमुमापादद्वयी प्राप्यते ॥ 
अत्र भगवतीपाद्द्रयस्येव वणनीयस्वाद्‌ गङ्खाचन्द्रकल्योर प्रकृतत्वम्‌ । आपादनं 
च क्रिया । 
विम्वग्रतिबिम्बभावेनापीयं भवति । यथा- 
ज्रिपन्व्यचिन्व्यानि पदानि हेख्या स्वराजहंसानधिदद्य च स्थिता । 
कवीन्द्रवक्त्रेषु च यत्र इारदा सहस्तपत्रेषु रमा च रज्यति ॥ 
अत्र वक्त्रपद्ययोिम्वप्रतिविम्बभावः । अनेनव चायेनात्रारुंकारवार्तिकरे ग्रन्थक्रता 
वशिष्टवमस्या दितम्‌ । द्ध सामान्यरूपत्वेन यथा- 
आस्तां बारस्य स नद्धे द्वे घात्यो तस्य वृद्धये । 
एका पयःप्रलविणी सवंसंपत्प्रसुः परा ॥' 
अत्र प्रवणस्य शुद्धसामन्यरूपत्वम्‌ । 
एवम्‌ इत्यादिना । गम्यमानोपम्याश्रया = गम्यमान साद्‌ श्य पर अश्रित अर्थाद्‌ इवादि का 
प्रयोग न होने से। पदार्थम्‌ क्योंकि पदार्थकी प्रतीति वाक्या्थकी प्रतीति की अपेक्षा अन्तरग 
[ पूरववत्तीं ] होती है । पदार्थगत इस वग के अलंकार मे पहले तुल्ययोगिता का लक्षण करते दै- 
'ओपम्य० । इसी की व्याख्या करते दै इव । तन्न = प्राकरणिकानाम्‌ = प्राकरणिकं का। 
यहाँ वहुवचन का प्रयोग दो से अधिक अप्राकरणिको के संग्रहके लिए किया गयादहै, वेते तुस्य- 
योगिता केवल दो अप्राकरणिकोंमें हृए समानधमं सम्बन्धसे भी संभवदहै। इसीलिए यह कहा 
जाना ठीक नहीं कि बहुता का ओपम्य अपनाने के किए-- [ यह अलंक।(ररत्नाकरने नहीं कहा 
हे ]। क्योकि आगे कहे जाने वाटे उदाहरणं मेँ केवल्द्ोदो के भी सादृदय उपनिबद्ध ह । यदी 
स्थिति दीपकमें मी मान्यहे। 
अन्वितां = क्यांकि इस [ तुल्ययोगिता ] म समानधमै से सम्बन्धित पदार्थौ का अस्तित्व 
है । इसीते यह चार प्रकार की होती दै कर्योकि इसमें प्राकरणिक ओर अप्राकरणिक का गुण ओर 
क्रियारूपदो धर्मो से अन्वय होता दहै। अतिद्योक्ति को इसका साधक नहीं मानना चाहिए 


क्योकि यह अतिद्चयोक्ति कै विना भी अगे प्रदद्ित उदाहरण में पाईं जाती हे। मन्धकारने यदं 


जो गुणसाम्य कै दौ रेत्ते उदाहरण दिए हैँ जिनमें ओपम्य = सादृश्य नहीं है वह केवर इसलिए 
चि उन्हें प्राचीन आलंकारिकं के उदाहरण रूप से प्रस्त॒त किया था । ओपम्ययुक्त स्थर ये है- 

८हे प्रिये ! ईर््याविकार के समय तुम्हारे किए यदह उचित हे कि तुम्हारी वाणी ओर रीलापूणं 
गत्तिमे स्खलन आए ।*-- यु उचितत्व गुण है । [ य्दा दोनों प्रक्रतदहे]। दोनों के अप्रकृत 
दाने पर- 

८ देव [ राजन्‌ ] आप परथिवी का मार डढोने मे निरत दहै इसकिए आजकल शेषनाग ओर 
आदि वर्म दोर्नो बड़े ख॒खी है ।" - यँ खखित्व यण है [ ओर वणेन राजा कार है अतः रेष ओ 


॥ कजनः 0 व क [त क । 1 णि कि वा त या 1 (५ कक = 
 # त नो किक 


तुस्ययोगिताल्ङ्कारः २२९ 


कर्म दोनों अप्रकृत दै ]1 कछ लोग दो नायिकायुक्त पदार्थौ मेँ प्राकरणिकता मानते है अतः दम 
दूसरा उदाहरण देते है -- 

भगवती पावती की एेसी चरणारविन्दद्वयी कते प्राप्त कौ जा सकती हे जिसने प्रणाम कर 
रहे भगवान्‌ दिव के सिर पर विद्यमान गंगा ओर चन्द्रकला दोनों को अपनी नखरदिमओं से 
संसार भर के लिए वन्य वना दिया हे तथा जिसने [ अपने पिता] हिमालय को कन्था के पिताओं 
के हृदय मेँ र्गी अत्यन्त ताप रूपी दवाग्नि की विपत्तिसे दूर करदियादहै। 

-- यहा भगवती पावंती के चरण ही वणेनीय है अतः गंगाः ओर च्चन्द्रकलाः ये दोनों 
अप्राकरणिक है । उनमें पक [ जगदत्रन्यता विषयक ] “आपादन = प्राप्षिः क्रिया का अन्वय है 

य॒ह तुल्ययोगिता विम्बप्रतिविम्बमाव से भी निष्पन्न होती हे । यथा- 

‹जह कवीन्द्रवक्ो मे रारदा ओर कमलो म लक्ष्मी प्रेमपृन्क रहती दहेः, जो दोनों कभी तो 
अचिन्त्य पदो [सरस्वतीपक्ष में = काव्यघरनानुरूप पदावली, लक्ष्मी पक्षम = पदचाप] को रीलापूवेक 
विचेरती ओर धरती रहती हेः ओर कभी अपने राजहंसो [ सरस्वतीपक्ष मं इंसविरोष तथा लक्ष्मी 
पक्ष मे राजारूपी हंस या हंसतुल्य विवेकी राजा ] पर सवारी किण हृए रहती हं ।' 

यद्य वक्त्र ओर कमल श्न दोनो मँ विम्वप्रतितरिम्बभाव है । इसी आदाय से अन्थकारने 
अपने अलकारवात्तिक नामक अन्मे [ तुल्ययोगिता के ] इस भेदको एक विरिष्ट भेद बतलाया हं । 

रुद्ध सामान्यरूप से निष्पन्न तुस्ययोगिता, यथा - 

'उस वाल्क की वृद्धिके छिदो धात्री [ धाइ ओर परथिवी ] सदा तत्परथीं एकधात्रीजो 
दुग्धदात्री [ षाइ ] थी ओर दूसरी धात्री सवरसम्परत्ति उत्पन्न करनेवाली [ प्रथिवी ]। 

--यदहों [ पयः ]--श्रसखवण = [ दूध ] देना शुद्ध सामान्यरूप क्रिया हे । 

विम :- तुल्ययोगिता का पूर्वेतिहास- 

भामह = न्यूनस्यापि विशिष्टेन गुणसाम्यविवक्षया- 

तुल्यकायंक्रियायोगादित्युक्ता तुस्ययोगिता ।1› यथा- - 
(शेषो हिमगिरिस्त्वं च महान्तो युरवः स्थिताः । 
यदलद्धितमयादां चलन्तीं विग्र क्षितिम्‌ ।1› [ ३।२७-२८ | 

-- कम युणवाङे पदां का विशिष्टयुण वाले पदां से गुणगत साम्य वतरने के लिए समान 
कार करना प्रतिपादित किया जाय तो त्रर्ययोगिता होती है। यथा-दोषनाग, हिमाचल, ओर 
हे राजन्‌ आप अत्यन्त गरिमामयदहें जो सयांदाकी रक्षा कर डोलती प्रथिवीको धारण करते 
र्ते हें । 

वामन = वविदिष्टेन साम्याथमेककालक्रियायोगस्तुस्ययोगिता । 

विदिष्टसे न्यून की समता वतलाने के लिए एककाल्िकि क्रिया मेँ दोनों का अन्वय तुस्ययोगिता 
कहलाता है [ अतः यह व्याजोक्ति से द्विया है ]। 

यथा--'जलनिधिर शनाभिमां धरित्रीं वहति भुजंगविमुभवद्‌भुजश्च ।' 

भस समुद्रमेखला पृथिवी को शेषनाग या आपका भुजदण्ड धारण करता हं । "वहन = धारणः 
क्रिया मेँ शेष ओर मुजदण्ड का अन्वय है । 

उद्धट = उपमानोपमेयोक्तिच्यैरप्रस्ततेवंचः । 

साम्याभिधायि प्रस्तावभाग्िर्वां तुल्ययोगिता ॥ ५।५ ॥ 

जिनमे उपमानोपमेयभाव कथित न हो ेसे केवर अप्रस्तुतों अथवा केवर प्रस्तुतो का साम्य- 
प्रत्यायक कथन तुस्ययोगिता । 

य॒था = त्वदङ्गमादवम्‌० इत्यादि तथा ध्योगपद्यो जराजालम्‌' ध्त्यादि । 


२७० अलङ्ारसवेस्वम्‌ 


सेद्ररट= + ~+ + + + 
मम्मर = "नियतानां सक्रद्‌ धमः सा पुनस्तुस्ययोगिता ॥ 
नियतानां प्राकरणिकानामैवाप्राकरणिकानामैव वा । 
यथा = पाण्ड्क्षामम्‌+केबल प्राकरणिकं या केव अप्राकरणिको में किसी एक धमेका 
, अरित्व तुल्ययोगिता । यथा = “इत्यादि, 
'पाण्ड़ क्षामं वदनं हृदयं सरसं तवालसं च वपुः । 
आवेदयति नितान्तं क्षेत्रियरोगं सखि हृदन्तः ॥ 

-हे सि, तम्हारा पीला ओर दुवंङ चेहरा, आप्र हृदय तथा आलस्ययुक्त रीर किसी 

हृदयस्थ प्रधान रोग कौ सुचना देते हैँ । याँ समी प्राकरणिक है । 
कुमुदकमलनीलनीरजालिंलितवि लासजुषोटरशोः पुरः का । 
अमृतममृतरदिमरम्बुजन्म प्रतिहतमेकपदे तवाननस्य ॥ 

-क्सुद, कमल, नीलोत्पल तुम्दारी ठलितविलास युक्त ओंखो के सामनेदै ही क्या, ओर 
अमृत, चन्द्र, कमर तुम्हारे मुखविम्ब के समश्च एक साथ ध्वस्त हे 1 यदा केवल नायिका वण्य॑मान 
अतः प्रस्तुत है । देष सव अप्रस्तुत है ओर उनमेंष्ैही क्या" ओर ध्वस्तः पदों द्वारा व्यक्त 
व॒च्छत्व रूपी एकमे का अन्वय हो रहा हे । 

-इस संदमं से स्पष्ट है कि रुद्रट तुल्ययोगिता को दीपक से भिन्न नहीं मानते भामहने 
दीपक को आदि, मध्य तथा अन्त में स्थित किसी एक ध्म के साथ अनेक पदार्थो के अन्वय कै. 
आधार पर तीन भार्गो मे बँग है आदिं दीपक, मध्यदीपक तथा अन्त दीपक । उन्हीं के अनुकरणः 
पर रुद्रटने मी दीपक के ये तीनां भेद किए दहे । विन्तु ऽन्हनि दीपकगत अनेक पदार्थो के प्रस्तुतत्व 

या अप्रस्तुतत्व पर ध्यान नदीं दिया है, अतः उनके यहाँ तुल्ययोगिता के दीपक से भिन्नदोनेका 
प्ररन ही नदीं उठता । भामह भोर उनके अनुकरण पर वामनने तुल्ययोगिता को दीपकसे 
अलग अवदय प्रस्तुत विया है किन्तु उस में प्रस्तुत या अगप्रस्ठेत की णेकान्तिकता अथवा समष्टि का 
उन्न कोड प्रतिवन्ध नदीं लगाया । उनके उद्हिरणसे सपष्टहै कि वे तुल्ययोगिता मे प्रस्तुत 
ओर अप्रस्तुत दोनों का ही भन्वय मानते है क्योकि उनके उदाहरण मेँ स्तूयमान राजा की भुजा 
प्रस्तुत हे मौर शेषनाग अप्रस्तुत ।-इन दोनाँंका एक वहन = धारणः क्रिया मै अन्वय बतलाया 
गया है । भामह ओौर वामन ने यदं उपमानोपमेय मे हीनाधिकगुणत्व पर॒ ध्यान दिया जिससे 
तुल्ययोगिता उपमा से भिन्न सिद्ध नदीं होती । अगे दीपक के प्रकाश मं उद्धूत उनके रक्षण तथा 
उदाहरणा से इस दिरा म ओर अधिक प्रका पड़ेगा कदाचित्‌ इसी लिए रुद्रटने तुल्ययोगिता 
को स्वतन्त्र भलकार की मान्धता नहीं दी । 
निश्चित ही सव॑स्वकार ने मम्मटके ही समान तुल्ययोगिताके लिए उद्धट को प्रमाण माना 

है । उन्दोँने तो उदाहरण भी उद्भट के ही प्रस्तुत किए हँ । परवती आलकारिर्को मे- 

अलंकारत्नाकरकारने चस्ययोगिता का लक्षण--^ सकृद्‌ धमेस्य निदे शेऽप्रस्ठुतानां प्रस्तुतानां वा 
त॒स्ययोगिता'-- अर्थात्‌ अप्रस्ठत या प्रस्ततों के धमे काणक ही वार निर्देश तुल्ययोगिता 
कदलाता है- इस प्रकार करा ^त्वदंगमादवंः + पयको उदाहरण-स्वरूप प्रस्त किया हे । उन्दने 
यहां एक धर्मान्वयी पदार्थौ मे से किसी एक मे उपमानता या उपमैयता मानना अस्तंमव बतला 
कर परस्पर मं उपमानोपमेयभाव बतलाया है । 

अष्पय्यदीक्तित कौ-चित्रमीमांसा मे दीपक भर वुल्ययोगिता दोना ददी अल्कार दरू 
गए हे किन्तु उनके कुवल्यानन्द मे उन्होने चन्द्रालोक से भिन्न- 

'वण्यांनामितरेषां वा धर्मेक्यं ठस्ययोगिताः 


द ` त 2 1 क 7 7 श अक्क 


^ 


तु स्ययोगिताटङ्कारः २७९ 


-- अथात्‌ वणैनीय = प्रस्तुत अथवा अप्रस्तुत का धमेक्य तुल्ययोगिता यह रक्षण करं 
उदाहरण रूप से सवेस्वकार द्वारा प्रदत्त सत्वदङ्गमाद॑वम्‌ः तथा “संजातपत्रप्रकरान्वितानिः?० 
पद्य प्रस्त॒त किए हे । । | 

पण्डितराज जगन्नाथ = श्रकृतानामेवाप्रकृतानामेव वा गुणक्रियादिरूपेकधमान्वयस्तुल्ययोगिता 
(अथाव केवल प्रकृतां अथवा केवर अप्रक्ृतों का गुण क्रिया आदि रूप किसी एक धर्म में 
अन्वय तुल्योगिता- इस प्रकार तुल्ययोगिता के लक्षण में युण ओर क्रिया के अतिरिक्त अन्य अमाव 
आदि तत्वों को भी अनेकान्वयी वस्तु के रूपमे स्वीकार कर सव॑स्वकार ओर कुवल्यानन्दकार 
के शगुणक्रियमाघ्रः तक सीमित पक्ष को उपलक्षणमात्र वतलाया है। उन्होंने तुल्ययोगिता के. 
उदाहरण पूवांचा्यौ से प्रायः मिल्ते-जुरते ही गदे हैं । | | 

कारकतुस्ययो गताः पण्डितराज जगन्नाथ ने एक कारकतुल्ययोगिता भी स्वीकार की है । 
उसका लक्षण-- | 
यत्र च प्रकृतानामेवाम्रङृतानामेव वा क्रियाणामेककारकान्वयः सा कारकतुल्ययोगिता-- 
अथांत्‌--“जहांँ केवर प्रकृत अथवा केवर अप्रकृत हौ क्रियाओं का किसी एक कारक मे अन्वय हौ 
तो वह कारकतुस्ययोगिता कदरती है--इस प्रकार किया है ओर उदाहरण के रूपमे - 
वख दातु यद्यो धातुं विधातुमरिमदेनम्‌ । 
रातु च सकलां प्रथ्वीमतीव निपुणो भवान्‌ ॥2 ५ 

--धन देने, यश लेने, शञ्जओं को मसल्ने भौर सारी परथिवी की रक्षाकरने मे आप बहुत 
ही निपुण हं 1 यह प्य प्रस्तुत किया है। इसमे दान, धान) विधान ओर त्राण ये सभी 
क्रिया प्रस्तुत हैः भोर उन सव का एक स्तूयमान राजा रूपी कारक के साथ अन्वय है । पण्डित. 
राज ने इसे अधान्तरन्यास से मी अन्वित बतलाया है । 


संजीविनीकार ने ठेस्ययोगितासंग्रह इस प्रकार किया ३-- 
प्रकृतेष्वथवान्येषु ज्ञातव्या तुल्ययोगिता । 
गणक्रियाभिसम्बन्धात्‌ समानादन्विताथिका ॥ 

~ प्रकृत अथवा अप्रकृतं मेँ युण अथवा क्रिया के समान सम्बन्ध से तुल्ययोगिता यह अन्वथ- 

नामक अक्कार होता है। 

उद्भट, वामन ओर मम्मट ने तुल्ययोगिता को दीपक के बाद रखा है जब कि, अलंकारसर्व- 

स्वकार, अल्काररलाकरकारः करवल्यानन्दकार तथा रसर्गंगाधरकार ने दीपक के पिले परवत्तीं 
माचार्यो ने यदह क्रम प्रकृत ओर अप्रकृत के शुद्ध स्थ ओर दोनों के मिभित स्थल को दृष्टिमें 
रखकर स्वीकार किया किन्तु तुल्ययोगिता ओर दीपक दोनों मे एक वस्तु के अनेक वस्तु के साथ 
अन्वय को हो कला चमत्कारभूमि ह, साथ दी आदि सुनि भरत से लेकर पण्डितराज जगन्नाथ 
तक सभी आचायौ ने दीपक को अलंकार माना ह इसि वस्तुतः दीपक को ही प्रथम स्थान 
दिया जाना चादिए । दीपक का ही सूक््मरूप तुल्ययोगिता है । इसके विरूढ पण्डितराज ने दीपकः 
प्रकरण मे तुस्ययोगिता से दीपक के पृथक्करण पर आपत्ति उठाई है भर कहा है-अत्रेदं बोध्यम्‌~ 
ठल्ययोगितातो दोपकं न प्थग्मावमदहंतति धर्मसङृद्इत्तिमूलाया विच््छि्तेर विशेषात्‌ विच््छि्तिवैल- 
क्षण्यस्य चालंकार विभागहेतुत्वात्‌ । ००००! तस्मात वस्ययोगिताया एव चेविध्यसुचितम्‌ , म्रकृता- 
नामेव धम॑स्य सक्रत्‌ इतिः, अप्रकृतानामैव; प्रकृताप्रकृतानां चेति । एवं च प्राचीनानां तुस्ययो- 
गितातो दोपकस्य एथगलद्कारतामाचक्षाणाना दुरायहमात्रमिति नन्याः ।--्यहौँ यह समञ्च लेना 


६०० ५. 


श, 


| 


| 


२७२ अलङ्लारखवंस्वम्‌ 


आवद्य ह कि दीपक को तुल्ययोगिता से अलग नहीं किया जाना चादिए, क्योकि एक धमक 
अनेक से संबन्ध पर निभ॑र चमत्कार दोनों मे वरावर या एकसादही दहै, ओर अल्कारों में मेद 
केवल चमत्कार मे मेद के आधार पर ही किया जाता है। ०००० । इस्ङक्िद तुल्ययोगिताके ही 
तीन मेद मान छेना उचित है८(१) प्रकृतां काही किसी एक धर्मं से संवन्ध, (३) अग्रक्र्तो 
काद्य जौर (३) प्रकृत तथा अप्रकृत दोनो का । इस प्रकार नर्व्यो के अनुसार प्राचीनो ने जो 
दीपक को तुस्ययोगिता से पृथक्‌ एक स्वतन्त्र अलंकार वतलाया है वह उनका दुराय्रहमात्र हे ।' 
आगे द्यीपक के प्रकरण में विमरिनीकार मी यदी वात कते दिखाई देते हैँ [ दर्टव्य--(न चेताव- 
तेवानयोः पृथक्‌ लक्षण युक्तम्‌- चिरन्तनानुरोधात्‌ कृतम्‌ दीपक पर आरम्भिक विमर्शिनी ] । किन्तु 
सच यह हैकि दराय्रह नवीनो का दी है । सामान्य भाषा में नवीनो का जो एकधर्मान्वय है वदी 
प्राचीनो कौ आल्कारिक भाषा में दीपक है । नवीर्नो ने स्वयं कहादहै किं जसे दीपक उदद्धेड्यभूत 
वस्तु को तो दिखलाता द्यी है अन्य वस्तुको भीदिखलछा दिया करता दहै, उसी प्रकार कोड 
क धम किसी एक प्राकरणिक मेँ तो अन्वित होता ही है अप्राकरणिक में भौ अन्विति ह्यो जाता है 
ओर इस प्रकार वह धमे पूरे वाक्याथ की शोभा वदा देता है। फलतः दीपक के समान होने से 
उसे दीपक कहा जाता है । 
द्र्टन्य-( १) एकस्थस्येव समस्तवाक्यदीपनाद्‌ दीपकम्‌"-मम्मट । (२ ) प्रस्तुकतैकनिष्टः 
समानो धमः प्रसङ्गादन्यत्रोपकरोति प्रासादार्थमारोपितो दीप इव रथ्यायाम्‌ इति द्ीपसाम्याद्‌ 
दीपकमू, सज्ञायां चः [ वा० २४५८ ] इतीवा्थं कन्प्रत्ययः ।--अप्पय्यदीक्षित, कुबल्यानन्द । 


( २ ) दीपयति प्रकादयति उन्दरीकरोति दीपकम्‌ , यद्‌ वादीप इव दीपकम्‌, संश्ञायां कन्‌ 
दीपसादृररयं च प्रकृताप्रकृतप्रकाडकत्वेन वोध्यम्‌--पं० जगन्नाथ, दीपकारूकार । 


(४) दीप इव दीपकम्‌ , संज्ञायां कन्‌ , दीपरस्यैकस्थैव सकलप्रकाडयकत्ववदेकत्वस्येव सवैः समन्वय- 
बोधजनकत्वेन तत्साधम्यांत्‌ । दीपयतीति दीपकमित्यन्ये -अरूकारकोस्त॒भ दीपकप्रकरण । 
इस प्रकार यदि नव्य तुल्ययोगिता में दीपक को अन्तभूंत करना चाहते हैं तो प्राचीन दीपक 
में तुल्ययोगिता का अन्तर्भाव वतला सकते दँ । भरतसमुनिनेभी दीपक का जो उदाष्रण दिया 
हे [आगे दीपक के प्रकरण मे उद्धृत ] उसमें समी पदार्थं प्राकरणिक दहै। दीपक को स्प्रदीपक 
कहु उन्दने दीपक शाब्द के प्रयोगके मूरुमें दीप के साटृद्य को मू माना है । प्राकरणिकत्वा- 
प्राकरणिकत्व को नदीं । अतः हृदयसाक्ष्य, प्रत्युत; दीपक के ही पक्ष में अधिक है, क्योंकि चमत्कार 
की अतिभूमि प्रस्तुत के साथ अप्रस्तुतविधान मेँ ही अनुभव में आती हे, केवल प्रस्तुतो अथवा 
केवल अप्रस्तुतों के उपनिबन्ध मेँ नदीं । उत्तमे प्रतिभा का कों चमत्कार नदीं ^रदता । केवल एक 
वर्मान्वय की कलामात्र का अभिन्यक्तिगत क्षीण प्रकाश्च वशं रहता हे । फलतः हदय साक्ष्य अप्रस्तुत 
विधान की प्रतिमा ओर रेतिदासिक मान्यता के आधार पर तुल्ययोगिता का ही दीपक मे अन्तभाव 
अधिक समुचित है । अल्कारकोस्तुभकार विद्वेदवर पण्डित ने मी पण्डितराज के उक्त आश्षिप को 
उद्धत कर उस पर यदी उत्तर दियादहै कि क्योकि दीपक भरतसुनिसे माना जाताआरहादहै 
अतः उसी में तुल्ययोगिता का अन्तभाव अधिक उचित है । [ द्रवं दीपकप्रकरणान्त ] ओर यदि 
दोनों को दो स्वतन्त्र अलंकार भी मानना हो तो प्रथमतः दीपक का निवंचन द्वी उचित दहै। 


विमरिनी 


एतदपसंहरश्न्यदवतारयति- 
अव इस [प्रकरण] का उपसंहार करते ओर दूसरा [एकरण)] आरम्भ करने के किए कदते दे- 


~ = 0 


~ = म जा मि णाः मानः त कनद = अ क 2 


| दीपकाटङ्ारः २७३ 
[ सवंस्व ] 


परस्तुताध्रस्तुतयोग्यस्तत्वे तुद्ययोगितां प्रतिपा समस्तत्वे दौपक- 
मुच्यते- 


[ ख० २५ | प्रस्तुताग्रस्त॒तानां त॒ दीपकम्‌ । 


ओपम्यश्य गम्यत्व इत्यायचुवतंते । पाकरणिकाप्राकरणिकयोमेध्या- 
देक निदिष्ठः समानो धमः परसङ्घनान्यत्नो पकारादीपनादहीपसादश्येन दीप- 
काख्याटकारोच्थापकः । तत्रेवाद्यप्रयोगाद्पमानो पमेयभावो गम्यमानः । सं 
च वास्तव एव । पूर्वत्र शुद्धप्राकरणिकस्वे शुद्धाप्राकरणिकत्वे चा वेवक्षिकः, 
प्राकरणिकत्वनिर्वतिंतत्वादुपमानोपमेयभावस्य । अनेकस्येकक्रियाभिसंबन्धा- 
दोचित्यात्पदाथेत्वोक्तिः । वस्तुतस्तु वाक्याथेत्वे आदिमध्यान्तवाक्यगतस्वेन 
धर्मस्य चुत्तावादिमध्यान्तदी पकाख्याख्योऽस्य भेदाः । 

[ व° ] प्रस्तुत ओर अप्रस्तुत के अरग अलग रहने पर संभव तुल्ययोगिता का प्रतिपादन 
किया । अव दोनां की मिलित स्थिति में संमव दीपक का प्रतिपादन करते है-- 

[ सू° २५ ] [ सादृश्य यदि गम्य = शब्दतः जकथित हो ओर समान धमं मं ] प्रस्तुत 

तथा अप्रस्तुत दोनों का [ एक साथ पदार्थान्तर पर संबन्ध | हो तो दीपक [ नामक 

अकार होता है ] ॥ २५ ॥ 

[ व° | यहां .साटरदय यदि गम्य हो इव्यादि रेषां कौ अनुवृत्ति [ तुस्ययोगिता से ] होती 
है । प्राकरणिक ओर अप्राकरणिक दोनो मेँत्ेकिसी एकके साथ निर्दिष्ट समान ध्म प्रसंग के 
आधार पर दूसरे का भी उपकार करता हे [ तथा उप्तम ] दीपि जाता है [ अतः ] दीप का साषृद्य 
होने से वह दीपक नामक अल्कार का जन्मदाता बनता है । उसमे (इवः आदि का प्रयोग नहीं 
रहता इसक्िए वहां उपमानोपमेयभाव गम्यमान रहता दे । किन्तु वह रहता वास्तविक ही हे 
जव कि पूर्वोक्त अलंकार में केवल प्राकरणिक अथवा केवल अप्राकरणिक के रहने पर वह [ उपमा- 
-मानोपमैयम।व ] विवक्षाधीन = टेच्छिक होता है, [ क्योकि वहाँ जहां केवर प्राकरणिकत्व रहता. दै 
-वहौँ उपमानत्व ` अवास्तविक होता हे ।.अतः उसे विवक्षा द्वारा निष्पन्न करना पडता हे ओर जरां 
केवर अप्राकरणिकत्व रहता हे वहां उपमेयत्व अवास्तविक रहता है क्योकि उसे भी व्हा विवक्षा 
द्वारा निष्पन्न करना दोताहै। इस प्रकार उपमानोपमेयभाव आंरिकरूप से ही रहता है ] क्योकि 
उसकी निष्पत्ति प्राकरणिकत्व ओर अप्राकरणिकत्व पर निभैर रइती है [ प्राकरणिकृत्व पर 
उपमेयत्व कौ ओर अप्राकरणिकत्व पर उपमानत्व की ] । अनेक का एक त्रिया से संबन्ध रता है 
इसलिए ओचित्यतः [ दणैपक मे ] पदा्थगतत्व बतलाया गया है [ तस्ययोगिता कौ अवतरणिक्रा मे ] 
वस्तुतः तो यह ॒वाक्यार्थगत ही रहता है, तभी इसके आदिदीपक, मध्यदीपक ओर अन्तदीपक 
न।मक भेद होते हें, क्योकि इसका धमे जिसके आदि, मध्य तथा मे अन्त मे रहता है वह्‌ 
वाव्यदहीहे। 


विमिनी 


्रस्॒ताप्रस्व॒तानामिति । एकत्रेति प्राकरणिकेऽप्राकरणिके वा । अन्यत्रेति प्राकरणिकादौ 
 -दीपकेति "संज्ञायाम्‌" इस्यनेन कन्‌ । सादृश्येन समुदायगम्थायाः संज्ञाया अभावात्‌ । 


२७४ अङ्ारसवंस्वम्‌ 


तत्रेति दीपके । वास्तव इति । भ्रह्ृताम्रङृतयोरुपमानोपमेय रूपरवाचु । पूवेत्रति तुल्य 
यो गितायाम्‌र्‌ 1 इयानेव च दी पकतुस्ययो गितयोविदेषोऽस्तीव्यप्यनेन दृदितम्‌ । न चंता. 
चतेवानयोः प्रथग्कक्षणे युक्तम 1 जो पम्यगरभ॑त्वाख्यस्य सामान्यस्य योर प्य जुगमात्‌ । 
एवं च समुचितोपमादेरपि प्रथग्छच्वणं स्यात्‌ । अन्थकता षु नश्चिरन्तनाजुरोधास्छृतम्‌ ॥ 
वैवश्षिक इति । यत्रेव वक्तुरुपमानत्वञ्ुपमेयव्वं वा वक्तुमिष्टं तत्रेव प्रकरणादि वलाद्‌ा- 
श्रयणीयमित्यथेः। अतश्च श्रस्तुतस्य त॒ नान्येन व्यभिचारस्य दशंनातः इति नीव्या 
प्रस्तुताप्रस्तुतस्वमात्रनिबन्धन एवोपमानोपमेयभावो न भवतीति मावः । एवं “प्रसिद्धेना- 
भ्रसिद्धस्य सादृश्यमुपमा मताः इत्यादिदा प्रसिद्धा प्रसिद्धत्वमाच्रनिवन्धनोऽप्युपमानो- 
पमेयभावो न वाच्यः । “खमिव जर जरमिव खम्‌, इत्यादौ द्वयोरपि त॒स्यव्वात्‌ प्रसिद्ध- 
गुणत्वा्यभावेऽप्युपमानोपमेयभावस्वेष्टे्यंमि चारस्य दृशंनात्‌ । ननु चान्न साधम्यं वा 
कयार्थगतव्वेनेव प्रतीयत इति कथं तस्य पदार्थगतस्वसुक्तमिव्याश्चङ्कयाह-अनेकस्येत्यादि । 
एवं पूर्वत्रापि ज्ञेयम्‌ । 


भस्तृताप्रस्त॒तयोः इति । दसी का लक्षण वतलते दै--म्रस्वुताप्रस्तुतानामर इति । एकत्र = 
एक ग प्राकरणिक अथवा अप्राकरणिक मे 1 अन्यत्र = प्राकरणिक आदि में। दीपक = “संज्ञायां 


[ चः वात्तिक | द्वारा [साद्द्याथं मेँ] कन्‌ प्रत्यय, क्योकि साट्द्य के आधार पर संज्ञा समुदायगम्या 
नहीं दो सकती । तत्र = वहां दीपक मेँ । वास्तव = वास्तविक, क्योकि प्रकृत ओर अप्रकृत कमराः 
उप्मेयरूप तथा उपमानरूप होते हैँ । पूव॑त्र = पृवोक्त तस्ययोगिता मे । इससे यद भी वतला दिया 
करि दीपक भौर तुस्ययोगिता मँ इतना ही भेद है । इतक्िए केवल इतने से अन्तर के आधार पर 
इन दोना का लक्षण अलग-अलग बतलाना ठीक नदीं है । क्योकि साद्दयधरित दोना दोनो का 
साधारण धमं है ओर वह दोनो मेँ ही अनुगत है । इसी प्रकार समुच्चितोपमा आदि का लक्षणमभी 


अरग नहीं किया जाना चाहिए । मन्धकार ने जो रन्द एथक्‌-पृथक्‌ बतलाया है वद्‌ केवर प्राचीन 
आकारिका के नुरोध्‌ पर 


वेवक्तिक-तुस्ययोगिता में प्रसंगके आधार पर केवर वहीं उपमानोपमेयभाव स्वीकार 
किया जा सकता है जहो वह वक्ता को अभीष्ट हो । इसे तात्पयं यह निकला कि उपमानोपमेय- 
भाव केवल प्रस्तुतत्वाप्रस्तु तत्वमात्र पर निभेर नदीं रहता हैः जेसा कि [ अलुकाररत्नाकर में] 
कदा गया हे-{ सद्रदय | प्रस्तुत का अप्रस्तुत से नदीं माना जाना चाहिए क्योकि अनेक स्थर्लो 
मँ उसको उद्टा भी देखा जाता है ।' ओर इसलिए उपमानोपमेयभाव को केवर प्रसिदधत्व ओर 
अग्रसिद्धत्व मात्र पर आधित नदीं मानाजा सकता जैसा कि [ अलंकाररत्नाकरकार ने] कदा है -- 


“्रसिद्ध से अप्रसिद्ध का साटदय उपमा मानी जाती है [ अलंकाररत्नाकर में ये दोनो अर्ध्यां 
ष्क ही इलोक की देँ । इस प्रकार-- 


'प्रसिद्धनाप्रसिद्धस्य साद्दयसुपमामता । 
प्रस्तुतस्य तु नान्येन, व्यभिचारस्य दशनात्‌ 
अथात्‌ प्रसिद्ध का अप्रसिद्ध से सादृश्य उपमा मानी जातीहैनकि प्रक्रत का अप्रकृत से, 
क्योकि अनेक स्थानों पर रेसा नदीं देखा जाता यथा ] 'आकाड के समान जल ओर जल के समान 
आकाराः-इत्यादि स्थलों म दोनों ही एक से हैः जतः व्यभिचार दिखलाई देता है शसक कि प्रसिद्ध 
यणत्व ओर अप्रसिद्धयुणत्व के अभाव मेँ मी उपमानोपमेयभाव देखा जाता है । 
दका होती है कि ष्दीपक मे साधर्म्यं वाक्याथंगतरूप से ही प्रतीतदोताहै तो इसे पदार्थगत 
कयां बतलाया जा रदा है- इस पर उत्तर देते दै-अनेकस्य । इसी प्रकार पूर्ववन्ता [ तुल्ययोगिता ] 
अट्कार मे भी [ वाक्याथगतता ] समञ्चनी चादि । | 


> क "का काक्का । कं जत = ज -=- 2 (वि हि अ 


दी पकाल्कारः २७८ 


[ सवंस्व ] 
कमेणोदाहरणम्‌- 
^रेडइ मिहिरेण णदं रसेण क्वं सरेण जोव्वणं । 
अमपण चुणीघवञ तुमए णरणाह जुवणमिणं ॥ 
संचारपूतानि दिगन्तराणि कृत्वा दिनान्ते निखयाय गन्तुम्‌ । 
परचक्रमे पलवरागतास्रा परभा पतङ्गस्य मुनेश्च पेचुः ॥° 
किवणाण घणं णाञर्णं फणमणी केसराई सीहाणं । 
कुटवािञआणं थणञा कृत्तो ऊेप्पेति अमुजआणं ॥ 
पवमेकक्रियं दीपकच्रयं निर्णीतम्‌ । अत्र च यथानैककारकगतत्वेनेक- 
क्रिया दीपकं तथानैकक्रियागतत्येनेककारकमपि दीपकम्‌ । 


यथा- 


~ 


'साधूनासुपकतुं लक्ष्मीं धतु विदायसा गन्तुम्‌ । 
न कुतूखि कस्य मनश्चरितं च महात्मनां तुम्‌ ॥' 
अ बोपकरणायनेकक्रियाकतप्वेन क तूड विरिष्टं मनो निर्दिष्टम्‌ । छाय!(- 
न्तरेण तु माटादीपकं प्रस्तावान्तरे लक्षयिष्यते । 
क्रम से उदादहरण-[ आदिदीपक ] 
“राजते मिहिरेण नभो रसेन काव्यं सरेण [ स्मरेण ] यौवनम्‌ । 
| अमृतेन धुनीधवस्त्वया नरनाथ ! भुवनमिदम्‌ ॥› 
-रोभित होता हे सुयं से आकाश, रस से काव्य, सर~हार से अथवा स्मर-काम से यौवन= 


स्तन, अमृत से समुद्र ओर हे नरनाथ तुमते यह्‌ भुवन । [ यहां शोभित दोना यह क्रियापदं 


वाक्यारम्भ में प्रयुक्त दे ओर प्रकृत भूतल तथा अग्रकृत आकाञ्च आदि से अन्वित होता है ] । 
| मध्यदीपक |- 
"दिगन्तराल को अपने संचार से पवित्र कर दिनान्त होने पर॒ निख्य को जाना आरम्भ 
किया, पछवराग सी तामिया, सूयय की प्रभा ने ओर सुनि की पेनु[ नन्दिनी ] ने ॥› [ यद 
आरम्भ करना क्रिया वास्य के मध्य में प्रयुक्त हे ओर उसका अन्वय प्रकृत प्रभा तथा अप्रकृत 
भेनुतेहे] † 
[ अन्तदीपक ]- 
कृपणानां धनं नागानां फणमणिः केपराः सिदानाम्‌ । 
कुरुबालिकानां स्तनाः कुतः स्पृश्यन्तेऽखरतानाम्‌ ॥' ॥ 
--करपणो का धन, सर्पो की फणामणि, सिह के रिरःकेश ८ अयाल ) ओर र्बालिकार्ओं 
के स्तन केसे छु जा सकते हैः यदि ये मृत न हो ।' [ यहाँ 'स्पद' क्रिया अन्त में प्रयुक्त दै ओर 


उसका अन्वय यदि कृपण पदार्थं प्रङृत हो तो उससे ओर कुरूबाला प्रकृत हो तो उससे होने क 


साथ दही रेष समी अप्रकृतोंसेभीदहोरदाहै]। 

- इस प्रकार एक क्रिया के [ प्रकृताप्रकृतो म अन्वय से निष्पन्न ] तीनों दीपक निशित इए । 
जेसे [ उपयुक्त ] श्न दी पकों मे अनेक कारक मे अन्वित होने वाली एक क्रिया का दीपक होता 
दै वैसे ही अनेक क्रियाओं से अन्वित होने वाले एक कारक का मी दीपक होता है । यथा- 


२७६ अच्छज्ञारसवस्वम्‌ 


साधु पुरुषों का उपकार करने, दौकत समैगने, आकाड्ञ से उड़ने ओर महात्माओं के चरित्र 


सुनने मेँ विस का मन कुतृदल्युक्त नदीं होता 1 
- यँ उपकार” आदि अनेक क्रियाओं के कतां के रूप मं एक अकेले कुतूदलयुक्त मन का 
निरदेदा किया गया हे । | । 
इसी प्रकार एक मालादीपक भी होता ह । उसका सौन्दयं निराला ही होता दे अतः उक्त 
दूसरे प्रसंग में वतकाया जाएगा । 


विमरिनी 


धेनुसंध्ययोः प्रङ्तसवादत्रान्ये तुल्ययोगितां मन्यन्त इव्युदाहरणान्तरेणो दाहियते- 
शधम्मञ्जणेण काण वि काणवि अध्थञ्जणेण बोट । 
कामज्जणेण काण वि काण वि एमेअ संसारो ॥ 
एकक्रियमिव्यनेनेकगुणमपि दीपकं स्वयमेवो दाहायंमिति सूचितम्‌ । तत्त यथा-- 
'फणासहख्रश्डदधो दिवि नेत्रसहस्नश्त्‌ । 
अहितीयः पृथिव्यां च भवान्नामसदखश्चत्‌ ॥ 

. अद्वितीय स्व गुणः । एवमेकां क्रियां गुणं वानेककारकगतववेनाभिधाय तदेव च दष्टान्ती- 
कृव्येककारकमप्यनेकक्रियागतस्वेन दी पक भवत्तीव्याह--भत्रेत्यादि । भत्र चोच्छु वास्रवण- 
नीयं भरवाचायांदिसक्तञुपकारकरणादिविशेषरूपं प्रस्तुतं श्रोतनवबोधयित्तु कविकतक- 
मिदं साधूपकारकरणादीनां सामान्यानामप्रस्तंतानां प्रदांसनम्‌ । तेषां च सामान्यानां 
परस्परम पम्यप्रती तेरेककारकगतस्वेनेयं कारकतुल्ययोगिता। अतश्च नेद्‌ कारकदीपक- 
स्योदाहरणम्‌ । तत्त यथा- 

जलिद्धितुं शशिमुखीं च सुधां च पातुं कीतिं च साधयित्ुमजयिहठं च रुचमीम्‌ । 

स्वद्धक्तिमेद्धतरसां हदये च कतु मन्दाद्रं जनमहं पश्युमेव जने॥ 

अन्नालिङ्गना्यनेकक्रियाकतृस्वेनंक एव जनो निर्दिष्टः । प्रस्तुताप्रस्तुतं स्फुटमेव । 

[ संचारपूतानि"-पच में ] कुछ लोगों [ अलंकाररत्नाकरकार | के अनुसार धेनु ओर संध्या 
दोनों ही प्रकृत दै अतः तुल्ययोगिता है इसङिए हम इसका एक दूसरा उदाहरण दिए देते है- 

ध्धम्मांज॑नेन केषामपि केषामप्यर्थाजनेन व्यत्येति । 
कामाजनेन केषामपि केषामप्येवमेव ससारः ॥ 


८िन्दीं का संसार धर्मा्जन में बीतता है, किसी का अर्थाजन मे, किसी का कामार्जन मँ ओर 
किसीकारेसे द्यी 

'एकत्रिय = एक क्रिया का, अथं यह किं एक गुणकाभी दीपक हो सकता हे, उसे स्वयं खोज 
केना चाहिए । उसका स्थल, यथा-- | 

(नीचे [ पाताल मेँ ] हजार फन धारण करने वाला [ शेषनाग ] मद्धितीय है, स्वगं में हजार 
नेत्र धारण करने वाखा [ इन्द्र ] ओर पृथिवी पर सदस नाम धारण करने वाङ आप ।' 

- यहा अद्ितीयत्व गुण है । इस प्रकार एक क्रियाया एक रुण को अनेक कारको मे अन्विति 
होता बतलाया, अव उसी के दृष्टान्त पर एक कारक मे अनेक किंयाओं के अन्वय से निष्पन्न होने 
वाखा दीपक भी सम्भव वताते इए लिखते दै--"अन्नरः । [दर्षचरित के] इस [ससाधूनासुपकत्त म्‌” 
पद्य ] मे आगे पूरे उच्छवास दवारा वर्णनीय भैरवाचाय॑ का एक विशिष्ट उपकार करना आदि प्रस्तुत 
है! उत्ते श्रोताओं [ अथवा पाठकों ] को सूचित करने के किए कवि ने सामान्यरूप से साघुञं का 
उपकार करना आदि जिन पदार्थौ को भरस्तत किया है वे -सव ` अप्रस्तुत दहे । इस सामान्यरूपः 


दौपकाटङ्कारः २७ 


[ अप्रस्त॒त ] पदार्थौ में परस्पर में साट्द्य कौ प्रतीति दोती हे तथा इन सवका एक [ मन-रूपी | 
कारक में अन्वय हे, अतः यहाँ कारकतुस्ययोगिता है। इस कारण यह [प्य] कारकदीपक 
का उदाहरण नदीं हो सकता । कारक दीपक का उदाहरण यह्‌ होगा- 

न्चन्द्रसुखी का आलिङ्गन करने सुधा का पान करने कीत्ति कौ प्रापि करने, लक्ष्मी का अजेन 
करने ओर आपकी अद्‌मुत आनन्द देने वारी भक्तिको हृदय मे खाने मे जो जन मदादर [ उत्सुक 
नहीं ] होता है उसे में पश्च ही समञ्चता हूं ।' 


-यहां आलिन्ञन आदि अनेक क्रियाओं के रूप मे जनः शब्द से एकी निर्दिष्टे साथ दही 
यहां जो प्रस्तत है [ भगवद्भक्ति] गौर जो-जो अप्रसत॒त [ च्द्ररुखी आदि ] वह स्पष्टहीहे। 


विमशं-( १ ) 'साधूनासुपकटम्‌ः- पच हषचरित के तृतीय उच्छ्वास के आरम्भ में आता 
हे । तृतीय उच्छ्वास मे हषेवधेन के पूवपुरुष पुष्यभूति का वणैन हे । वह भेरवाचायं नामक 
योगो की सहायता करता है जिससे वह योगी यक्षदेह धारण कर आकाञश्च मेँ उड़ जाता है । सस्त 
साहित्य मेँ महात्मा शब्द महासत्व ब्यक्ति के किए चरता है अतः पुष्यभूति ओर भैरवाचायं दोनों 
ही महात्मा हैँ । उनका चरित्र तृतीय उच्छवास की कथावस्तु है । इस पद्य द्वारा उसको पूवं सूचना 
दीजा रही है । यदहं मन्थकार ने कारकदीपक मानादहै ओर टीकाकार ने कारकत॒स्ययोगिता । 
कदाचित्‌ यन्धकार की दृष्टि यन्थ के प्रसंग पर है ओर रीकाकार की ठृतीय उच्छवास कौ भावी 
कथावस्तु पर । हषं स्वयं महदासच्च ओर मदात्मा है उसका चरित म्रंथविषय होने से प्राकरणिक 
है, श्सकिए उक्त पच कौ 'वरितं च महात्मनां श्रोतुम्‌ यह चतुथंचरणगत श्रवणक्रिया प्रस्तुत ह 
रोष~'उपकार, धारण, गमनः क्रियाय आगामी कथावस्तु के अंतमेदही प्रस्तत हो सकती ह मारम्म 
म वे अप्रस्तुत दही हं । फलतः प्रस्तुत ओर अप्रस्तुत क्रियाओं का एक मनः कं साथ अन्वय 
होने ते अन्थकार के अनुसार य्ह कारकदीपक है ! टीकाकार के अनुसार आगामी 
भैरवाचारथरूपी मदात्मा के चरित का श्रवण, आरम्भ म भप्रस्तत हौ दै अतः समी 
क्रियाय एक-सी हो जने से कारकतुस्ययोगिता है । वस्तुतः, प्रथम दो उच्छवासं मँ हषे का 
चरित न कहकर बाण ने अपने पूवपुरुषों का वणन किया है । अतः तृतीय उच्छवास के आरम्भ मे 
ये श्रोतार्ओं अथवा पाठकों का ध्यान काव्य कै प्रधान वण्ये हषं के चरितः कौ ओर आकृष्ट रखने 
हेतु चरित च महात्मानां श्रोतुम्‌” कह रहे है । यह अलग बात है कि उनके इस कथन का लक्ष्य 
परवर्ती कथापुरुषो का चरित मी बना रहा हे। उने केवर मैरवाचायं ही नदी, प्रभाकरवधेनः 
यरोवती, राज्यवधेन, दिवाकरमितर, राज्यश्री ओर स्वयं हष॑व्धन मी आते हं । अतः चरित. 
अवण को प्रस्तत मानना ही अधिक उचित हे। 


टीकाकार के अनुसार यदि सभी क्रियायां को अप्रस्तत मान ले तो उनका यहु कथन 
असंगत दोगा किं भैरवाचायं का वर्णन प्रस्तत है, क्योकि वह तो आगामी है । यदि कवि के चित्त मं 
उपस्थित होने से उसे प्रस्त॒त माना जाए तो सारी प्रियाएं प्रस्तत ही कही जानी चाहिए । फिर 
विचार तो सहृदय की अनुभूति को लेकर किया जाता है। तृतीय उच्छवास को कथावस्तु से 
अपरिचित सहृदय के किए सारी क्रियाये अप्रस्तत ही है । यदि सारी क्रियाय मप्रस्तुतदहतो 
टीकाकार क अनुसार यदह्‌। प्रस्त॒त भेरवाचायं आदि विश्लेष व्यक्तियों के किए अप्रस्त॒त सामन्य 
का कथन होने से अप्रस्तुतप्रदोसा होनी चाहिये ओर यदि एक-सी अनेक क्रिया के एक कारकमें 
अन्वय होने का शिल्प भी यहां है तो न्ह यहां अप्रसतुतप्रदंघ्ा के साथ तुस्ययोगिता का संकर 
मानना चाहिए । 


(२) टीकाकार ने भ्रन्थकार के उक्तं उदाहरण को अमान्य रहरा कारकदीपक का जो 


२४८ अच्ङ्ारसर्वंस्वम्‌ 


उदाहरण [ “आङ्गितुम्‌”० ] अपनी ओर से प्रस्तुत किया है उस्र पर पण्डितराज जगन्नाथ ने 


निम्नडिखित आपत्ति प्रस्तुत की दै-- ४ ५ 
( १) उक्त पद्य मे किसी एक व्यक्ति को पदु कहने की अपेक्षा एकाधिक व्यक्तियों को पड्ु 


कहना अधिक चमत्कारी है अतः (जनः-रब्द को य्ह जात्यथेक एकवचन मेँ प्रयुक्त मान अनेक 
व्युक्तिपरक मानना चादि । तव विमरिनीकार का यह कथन अक्तंगत होगा किं “आक्गिन 
आदि अनेक क्रियाओं का कर्तां केव एक (जन ही है 

( २ ) यदौ चमत्कार का कारण दारिय॒खी, खधा, कीत्ति, रक्ष्मी तथा भगवद्भक्ति का विम्ब- 
प्रतिविम्बभाव है अतः विमरिनीकार का यहद कथन अमान्यदहै कि यदहं अनेक क्रिया का, एक- 
कारकान्वयित्वरूपी साधारण धमं के आधार प्रर निष्पन्न साष्दय चमत्कारी है। 

(३ ) उक्त पद में कारकदीपकत्व केवर 'मन्दादरत्व को केकर माना जा सकता है, क्योकि 
उसका अन्वय प्रत्येक तुसुन्नन्त क्रिया के साथ अन्वित कर्ताके धमंकेल्पमेंदोता है। किन्तु 
पण्डितराज यदि मन्दादर के मन्दादरत्व को केकर कारकदीपक सिद्ध करना चाहते है तो 
'जनः-े जनत्व को केकर वैसा क्यो नदीं करते । तव उनकी कारकवदत्व की काल्पनिक आपत्ति 
क्टजाएगी। . | 
। अल्काररतनाकरकार ने प्रस्तुत पच देकर कारकदीपकं यह एक दोष बतलाया है कि 
कारक क्रिया क्रा धमं नदींहोता जव किं समान ध्मैसंवन्ध को दीपक का जनक माना गया है 
इसका परिष्टार भी करते हए उन्दोनि कदाहै किक्म से कम इस पय मे मन्दादरत्वविदिष्ट 
कारक कौ योजना ह जो अपने आप मेँ चमत्कारक्ारी है, अतः चमत्कार होने से यद्य दीपक 
जङ्कार मान ख्या जाएगा । उक्त दोषनिषारण के छिद लक्षण की पदावर मे थोड़ा अन्तर किया 


जा सकता है । 
| ४ विमरिनी 


स्विद्यति कूणति वेदति विवरूति निमिषति विरोकयति तिर्यक । 

अन्तनन्दति चुम्बितुमिच्छति नवपरिणीता वधूः शायने, ॥ 

इत्यत्र तु स्वेद नादिक्रियाणां प्रस्तुतानामेकाधारगतव्वेन समुचीयमानस्वाच सम्रुचया- 
ख्कारो न तु कारकदीपकम्‌ । तद्धि प्रस्तुताप्रसतुतानां क्रियाणामौपम्यसद्धावे भवति । एवं 


. © 


सवक्रियाणां प्रसतृतस्वेऽपि सघरुरवयस्यौपम्याभावादेव तुखययागितातोऽपि भेदः । ओौपम्य- 
सद्धवेऽपि तुह्ययो गितेव । यथा- | 

` ` चकार दुवंखानां यः इमामागरिवनामपि । 

जहे निरपराधानामपि यश्च बरीयसाम्‌ ॥' 
अत्र करगहरणयोः प्रकृतष्वम्‌ । द्वयोरपि राजगतस्वेन वणं नीयय्वाव्‌ । 

¦ नवोढा वधु [ प्रथम रात्रिम पत्तिके साथ] शय्या पर पसतीना-पसीना होती, सिकुडती, 
करवट लेती, चितपुट होती, ओंँख मींचती, कनखी से देखती, मन ही मन हरसाती गौर चूमना 
चाहती है “ यहां [ कान्यप्रकादयकार ने कारकदीपकर माना है किन्तु ] स्वेदन आदि समी क्रियाँ 
फक तो प्ररतुत हे गौर दूसरे इन्द एक हो आधार मेँ छरा स्थित बतलाया गया है, अतः यद्यं 
सखच्चयाल्ङ्कार है, नकिं कारकदीपक । वह [ कारकदीपक ] तो तथ होता है जव क्रियां 
अनेक हो, उनमें कोई प्रस्तुत भौर कोई अप्रस्तुत द, साथ ही उन साद्स्य प्रतीत हो । श्सी 
प्रकार समी क्रियाओं कै प्रस्त॒त दने पर भी य्ह वव्ययोगिता नदीं है, क्योकि यष्ट उन क्रियाओं 
मे परस्पर साष्रर्य नदीं है । फलतः यहां समुच्चयालंकार ही है। यदि सारस्य ॒दोता तो यं 


ठलच्ययोगिता ही होती । नेते 


दीपकालङ्कारः २७९ 


“जिसने अपराधी होने पर भी जो दुर्बल ये उन्हें क्षमा किया ओर जो अपराधी नहींथे किन्तु 
सवर ये उनकी क्षमा [ पृथिवी ] को हर लिया । 
--य्टांकरना ओर दरना दोनों क्रियाएं प्रक्रत है क्योकि दोनों ही प्रस्तुत राजा के भीतर 
प्रतिपादित की जा रही । 
विमश्चैः-टीकाकारमदोदय यदहो क्रियाओं का साद्रेय बतलति समय चुप्पी साधगणदहे। 
वस्तुतः ओपम्य या साषृर्यकी बात तुल्ययोगिताया दीपक के क्रियागत भेद मे परम अवै- 
ज्ञानिक दै । 
अर्क।ररत्नाकरकार ने भी तुल्ययोगिता तधा ससुच्चय को ओपम्य के आधार पर दी प्रथक्‌ 
किया है- 
प्रकृतानां क्रियाणासेककारकसंबन्धे यदरोपम्य- 
प्रतीतिस्तत्तस्ययोगिता, तदभावे तु सुच्चयारुकारः ।' --[ दौपकप्रकरणान्त | । 


रसगंगाधरकार ने भी यह तथ्य स्वीकार किया है- 

८ १ ) ओपम्यम्‌०० अत्र गम्यम्‌ = [ तुल्ययोगितालक्षणव्रन्तिः ] 

( २ ) अत्रोपम्यस्य गम्यत्वम्‌ = [ दी पकलक्षणवृत्तिः ] 

८ ३ ) दीपकतुसल्ययोगितादो गन्यमानमोपम्यं जीवातुरिति सेषं संमतम्‌-[ दी पक्रकरण- 
पृ० ४२४ नि० सा० सं० ६] 

रसगंगाधरकारने भो काव्यप्रकाशकार के उपयुक्त “स्वियति० आदि उदाहरण पर विमरिनौ- 
कार के ही समान आपत्ति प्रस्तुत करते हए कहा है- 


इस पथ मेँ समी क्रिया प्राकरणिक है । ००० । ओर उनके भी परस्पर सादृश्य मै कवि का 
कोई संरम्भ नहीं है। इसक्िएि इसमे ससुच्चयालंकार की ही छाया मानना ठीक दहै! यदि 
स्वेदन आदि क्रियाओं के वीच परस्परम सादृश्य कौ प्रतीति मानी जा सके तो यों कारकत॒ल्य- 
योगिता मानी जा सकती है, कारकदीपक नदी, क्योकि समी क्रियाए प्रस्तुत हँ । [ रसगंगाधर 
दोपकप्रकरण प° ४२३४-५, नि° सा० ६ |] 

वस्तुतः काव्यप्रकाशकार ने कारकदीपक का जो लक्षण कियादहै उसमे क्रियागत साम्यकौ 
प्रतीति कौ कोई बात नहीं है । उनका रक्षण है - 

सक्रदलृत्तिस्तु धममस्य प्रकृताप्रकृत त्मनाम्‌ । 
सेव क्रियासु बहीषु कारकस्येति दीपकम्‌ 1" 

--अथांत्‌ एक दीपक वह होता है जिसमे अनेक प्रकृत ओर अप्रकृत पदार्था म किती एक 
धमे का अस्तित्व रहता है ओर दूसरा वह जिसमे किसी एक कारक का अनेक क्रियाओं में 
{ अस्तित्व रहता ह }' । उन्दौने- 

"माखादीपकमाचं चेद्‌ यथोत्तरगुणावहम्‌ ।' 

--ई्स धकार एक मालादीपक भी माना है जिसका उदाहरण संग्रामाज्ञणमागतेन ०” इत्यादि 
पदाथ हे, जिसमे कहा गय है "राजन्‌ ! आपकर संग्राम मेँ अति ही जिस जिसने जो-जो वस्तु अप- 
नाई उते सनिए--थनुष ने बाण अपनाए, वाणो ने शुरओं के सिर, उनने भूमण्डल, भूमण्डल 
ने आपको, आपने कोतिं को ओर कीति ने तीनों लोको को याँ प्रस्तुत है राजाका वर्णन । 
उसके प्रसंग में तत्सम्बद्ध सभी पदां प्रकृत ही हँ । अतः यहां भी तुल्ययोगिता मानी जानी 
चाहिए । किन्तु काव्यप्रकाशकार के अनुसार यां केवर मालात्व ओर आसादनरूपी ध्मगत एकता 
के आधार पर यहां मालादीपक है । इतने पर मी ्वनुष, बाण, राञ्ुसिर, भूमण्डरू, राजा, 


२९५० अलडगरसवंस्वम्‌ 


कीति ओर त्रैलोक्य में परस्पर किसी दृदयदारी साद्ररयकी प्रतीति नदीं होती । आसादन- 
कत्त्व को साधारण धम मानकर यदि धनुष आदिमे साम्य सिद्ध भी किया जाय तो यह सिद्ध 
नहीं होता कि कवि को किसी साम्य के आधार पर इन सवका स्मरण आया है, जेसा कि .संचार- 
पूतानिः = आदि स्थल मे देखा जाता हे! यदं तो केवर सम्बद्धत्वमाच्र के आधार पर धनुष 
आदि को प्रस्तुत किया गया है। उतने में ही चमत्कार है गौर इसीलिए यां दीपकत्व है । 

इस प्रकार कारकदीपक ओर मालादीपक में कवि को साम्य की विवक्षा रहती है रेसा काव्य- 
प्रकाद्यकार का आय्रह नदीं है । पण्डितराज भी इस तथ्यको समञ्चते दै उन्दने स्वकल्ित 
कारकतुल्ययोगिता के समधेन मे इस तथ्य को पपक्ष के रूप मे प्रस्तुत किया है ओर लिखा है- 
न च क्रियाणां प्रकृता प्रकृतात्मताविरदेऽपि श्ुद्धपरकृतत्वे शुद्धाप्रकृतत्वेऽपि वा कारकस्य सङ्ृदव्त्ते- 
दप्रकत्वम्‌ ; क्रियाभिन्नानां तु प्रकृताप्रकृतात्मतायामेव क्रियदेरध॑मेस्येति वैलक्षण्यात्‌- 

[ सक्रदइृ्तिस्तु धर्मस्य ॒प्रहृताप्रकृतात्मनाम्‌ । सेव क्रिया बह्वीषु कारकस्येति दीपकम्‌ इति ] 
लक्षणद्रयसुक्तम्‌--इति वाच्यम्‌ कारकतुल्ययोगितोच्छेद। पत्तेः । 

-जथात्‌ ्दीपककेदो लक्षण हए अन्तरके आधार परकिएदैः किम्रथममेँ कारको के 
वीच मरकृताप्रङतत्व अपेक्षित दै, किन्तु द्वितीय मेँ क्रियाओं के वीच नीं, किन्तु एेसा मानने पर 
कारक्तुल्ययोगिता का उच्छेद होने लगता है । पण्डितराज की इस आपत्ति का उन्तर हम 
ठस्ययोगिता के प्रकरण मेँ यह्‌ कह कर दे चुके दै कि-“तुल्ययोगिता का दीपक मे अन्तर्भाव 
होना दोष नदी है । नन्योँ के भनुसार उरन्ोने वव्ययोगिता मे दीपक का अन्तर्भाव मानाहै। 
प्राचीनो के अनुसार तव्ययोगिता का दीपक र्मे अन्तर्भाव मानाजा सकता दै। ओर वही 
सिक वेज्ञानिक है ।› 

निष्कषे यह कि कारकदीपकं न तो प्रकृताप्रक्ृतत्व मेँ कों चमत्कार रहता ओरन 
साम्य मं । उस्म चमत्कार रहता है केवल एक कारकम अनेक क्रियाओं के अन्वय का, 
ससुच्चयाकंकार मे एक कारक मे यनेक क्रियां के अन्वय का चमत्कार नदीं रक्ता वहां 
चमत्कार रहता है किसीमी प्रकारके रेते अनेक पदार्थौ की आकस्मिक एकत्र उपस्थिति में 
जिनमें किसी एक कायं की सिद्धि के प्रति साधकता हो । अतः “स्वियति० आदि प्य मे रत्नाकर- 
कार, विमशचिनीकार तथा रसरगंगाधरकार का समुच्चय मानना अनुभूतिविरुदध है । 


विमरिनी 


इदं विग्बप्रतिविम्बभावेनापि भवति । यथा- 
मणिः शाणोज्ञीढः समरविजयी देतिनिहतः कराशेषश्चन्दः सुरतश्दिता बारुलरना । 
मद्ङीणो नागः शरदि सरिदाश्यानपुलिना तनिश्चा शोभन्ते गलितविभवाश्चार्थिषु जनाः ॥ 
अत्र शाणोज्ञीडखादीनां बिम्बप्रतिविम्बभावः। शद सामान्यरूपत्वं यथा- 
फणरअणरादइअंगो सुअंगणदहो धरं समुव्वह& । 
णहद्प्पणोवसोहिअसिहो अ तुह णाह सुजदंडो ॥ 
अन्न राजितत्वश्ोभितत्वयोः शद्ध सामान्य रूपत्वम्र्‌ । नन्वेतदनन्तरमेव मालादीपक- 


> © #. { - 
मन्यरुक्तितं तदिहापि किं न रचयत इव्याशङ्कबाह -छयेत्यादि । द्ायान्तरेणेति श्द्कका- 
रूपेण । प्रस्तावान्तर इति । श्द्कुकाबन्धोपचितरूपस्वाव । 

यह [ दीपक | विम्वप्रतिविम्बभावमुलक भी दोता हे । यथा - 


'शाणचदी मणि, दखक्षत समरविजेता, कठारेष चन्द्र, खुरतद्दित वाक्वधू, ` मदक्षीण हाथी 


दीपकालट्कारः २५९ 


दारत्काटीन सूखीवारी-वाी नदी तथा याचकों को बोँट-्वँट कर धनदीन बने दाता तनुता 
[ दुवलेपन ] से शोभित होते हं ।' 
-- यौ शाणोख्लीढत्व = शान पर चद्ना आदि में विम्बग्रतिविम्बभाव हे । 


शाड सामान्यरूप [ दौोपक | का उदाहरण यथा- 
'फणर त्नराजिताङ्गो मु जङ्गनाथो धरां समुद्वहति । 
नखद पेणोपद्योभितशिखश्च तव नाथ भुजदण्डः ॥' 


-- “स्वामिन्‌ ! प्रथिवीको धारण करता दहै फणरत्नसे विराजित अंग वाला नागराज ेष,. 
ओर नखरूपी दपंण से रोमित रिखा वाला आप का भुजदण्ड ।› 
- यहो राजितत्व ओर सयोभितत्व शुद्ध सामान्यरूप है । [ उनमें वम्तुप्रतिवस्तुभाव दै. 
यद्यपि, फण तथा उंगली, मणि तथा नख में यद भो विम्वप्रतिविम्बभाव हे । ] 
प्रशन-द्यपकके दही तुरन्त पश्चात्‌ [ मम्मट आदि] अन्य आचायौँने एक मालादीपक भौ 
तराया है, उत्ते यहाँ क्यों नदीं बतलाया जा रहा है ? उत्तर देते द-“छाया' जादि । छायान्तर = 
ृङ्कलास्वरूप भिन्न रिल्प के द्वारा । प्रस्तावान्तर दूसरे प्रक्षग मे [ अथात्‌ शङ्कलामूरकः 
अलंकारो के प्रसंग में ] क्योकि वह [ मालादीपक ] भी शङ्का द्वारा निष्पन्न होता है । 
दीपक का पूचतिहदास- 
भरतमुनिः--"नानापिकरणस्थानां रब्दानां संप्रदीपकम्‌ । 
एकवाक्येन सयोगं तद्‌ दीपकमिदहोच्यते ॥› १६।५३ नास्यद्चा० 
यथा-- 
(सरांसि हसेः कुसुभेश्च वृक्षा मतते्दिरेफेश्च सरोरुहाणि । 
गोष्ठीभिरूचयानवनानि चेव तस्मिन्नराल्यानि सदा करियन्ते ॥ 


'ताराव हंसों से, वृक्ष पुष्पा से, कमर मत्त मोरो से तथा वन-उपवन गोष्ठिओं से वदो सदा दही 
भरे रहते हें 
यहाँ कारिका का अर्थं उदाहरण के भाधार पर मनचाहा र्गाया जा सकता है । उदाहरणम 
अनेक कारको का एक “अशुन्यीकरणः क्रिया मे अन्वय है । किन्तु यदहो दीपक का प्राणभूत तत्व 
प्राकरणिकाप्राकरणिकत्वमिश्रण नहीं है, तालाव आदि सभी पदार्थं प्राकरणिक हैं । 
भामह--अदिमध्यान्तविषयं त्रिधा दीपकमिष्यते । 
एकस्येव त्यवस्थत्वादिति तद्‌ भिद्यते तरिधा ॥ 
अमूनि इुवेतेऽन्वथामस्याख्यामथेदीपनात्‌ । 
( १) मदो जनयति प्रीति साऽनद्गं . मानभङ्गरम्‌ । 
स प्रियासङ्गमोत्कण्ठां साऽसद्यां मनसः शुचम्‌ ॥ 
( २ ) मालिनीरंश्ुतः खियोऽलङ्करुते मधुः । 
हदारोतश्ुकवाचश्च भूधराणासुपत्यकाः ॥ 
( ३ ) चीरौीमतीररण्यानीः सरितः शष्यदम्भसः। 
प्रवासिनां च चेतांसि शुचिरन्तं निनीषति ॥ 
--दीपक तीन प्रकार का माना जाता है आदिदीपक, मध्यदीपक तथा अन्तदीपक, क्याँकिः 
इसमे एक ही वस्तु तीन [ आदि मध्य अन्त ] स्थानोँमे रहती है। एक ही के [ आदि मध्य 
अन्त मेँ ] अवस्थित होकर वाक्याथ मे प्रकादा लाने के कारण इसकी.संत्चा सार्थको जातौहें\ 


२९९२ अलङ्कारसवंस्वम्‌ 


| { भामदहदके इस लक्षण में 'एक-दाब्द का अथं अस्पष्ट हे। परवत्तीं आचार्यो ने उसका क्रमः 

| स्पष्टीकरण करिया है ] एक-एक का क्रमाः उदादरण-- 

॥ (२) मद [ नद्या ] प्रीति को उत्पन्न करतादे, प्रीति मानभङ्गपट काम को; काम घिया के 
संगम की उत्कण्ठा को ओर वह [ उत्कण्ठा ] अस्य मानस वेदना को" [ यदहं वाक्य के 
आरम्भ मेँ › युक्त “उत्पन्न करनाः मद, प्रीति, काम उत्कण्ठा के साथ अन्विति होता दहै। इसि 
यहाँ आदिदीपक दहै। साथदही यहं शृङ्लक्रम भी है जिससे परवरत्तौ आचार्यो ने माला- 
दीपक माना है ]। 


(८२ ) माछ्नी, ओर श्चीनाअंगुकपदिनी सिया को वसन्त अलक्त करता ह ओर हारीत 
तथा शुकको वाणी एवं पव॑त की उपत्यकां को मी) [ य॒ 'जल्क्रत करना? वाक्य के 


मध्यमे प्रयुक्त है ओर माछ्िनी आदि अनेक कर्मो स्ते अन्वित दो रदा दै, अतः यह मध्य 
दीपक हआ ||. 


॥ (२) युर स्कार वाङ धोर जंगल, सूख रदे पानी वाटी नदियों ओौर प्रवासिर्यो के 
` चित्तं को गरीष्म समाप्त करना चाहता है। [ यहाँ ्ीष्म वाज्य के अन्ते प्रयुक्त दै ओर उसका 
जग जादि अनेक कर्मो से अन्वय है अतः यह अन्तदीप्क हआ ] | 


वामन = | सू° |] उपमनोपमेयवाक्येष्वेका क्रिया दीपकम्‌ । 

तत्तिविधम्‌, आदिमध्यान्तवाक्यवृत्तिमेदात्‌ ॥ 

--उपरमानवाक्य ओर उपमेयवाक्यों मेँ प्रसङ्गवश्ाव या सामर््यवशात्‌ छागू होने वाली 
एक क्रिया दीपक कहलाती ह । दीपक तीन प्रकार का होता दै, उस क्रियापद के वाक्य के आदि, 
मध्व ओर अन्त में रहने के कारण । उदाहरण - 

। (भूष्यन्ते प्रमदवनानि वालपुष्यैः कामिन्यो मधुमदमांसङेविरासैः । 
| ब्रह्माणः छतिगदितेः क्रियाकलाप राजानो विरङ्तवैरिभिः प्रतापैः ॥ ° 
| परमदवन वारपर्ष्पा ( किओ ) से भूषित होते है, कामिनि्याँ आसवजनित नने से मांसल 
विलासो से, बराह्मण तिओं द्वारा प्रोक्त क्रियकलाओं से जर राजा लोग रावुर्ओ को नष्ट कर चुके 
| अपने प्रतापो से।' 


यहा एक ही भूष्वन्ते = भूषित होते दै" क्रिया का प्रमद्वनादि कारक से अन्वय हो रहा है 
। अर वहु वाक्य के आरम्म मेँ प्रयुक्त है अतः यह आदिदीपक हृआ। इसी प्रकार अन्यदो 
उदाहरणां मेँ वामन ने केवल क्रिया को अनेक कारकगत वतलाया है ओर उसे वाक्य के मध्य 
तथा जन्त से प्रधुक्त दिखलाकर वँ मध्यदीपक तथा अन्तदीपक की स्थापना की है । किन्तु वामन 
कारक्र की प्राकरणिकता या अप्राकरणिकता का उब्लेख नहीं करते । यदं यह ध्यान देने 
योग्य तथ्य है करि दीपक मे उपमानोपमेयभाव का निवे वामन ही पदिरे.पदर कर रहे है । 


इनन्हानि ५ [ है 
। उन्दने भामह के अस्पष्टा 'एक-दब्द्‌ का अथं क्रिया कर दिया दह। 


उद्धट~'आदिमध्यान्तविषयाः प्राधान्येतरयोगिनः । 
अन्तगतोपमा धर्मां यत्न तद्‌ दीपकं विदुः ॥' 
जहा धम्‌ प्राधन्य तथा अप्राधान्य से युक्त वा वैसे पदार्थो से संद्र वाक्य के आदि, मध्य 
तथा अन्त मे स्थित तथा उपमागभित हों वह दीपक माना गया है । यद्यं प्राधान्याभ्राधान्य का 
अध प्रतौहरेनदुराज ने उपेयत्व ओर उपमानत्व क्रिया हे । उदाहरण-- 
(सजहार शरत्काकः कदम्बकुखुमश्चियः । 
म्रयोवियोगिनीनां च निःशेषञखसम्पदः ॥' मु + 41 


. द न, 
(1 नि क 1/0 1 क 9 क 


(श त +,  , नोकाि्कन्डकनि 


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दीपकाल्ड्ारः २९५३ 


-- शरत्काल ने कदम्बं की कुखम-शोभा तथा श्रिय वियुक्त वनिताओं की समस्त संखसम्पत्ति 
समाप्त कर दी 1- यहां मू दलोक में (समाप्त करना? क्रिया वाक्यारम्म मे प्रयुक्त है अतः आदि- 
दीपक हआ । इसी प्रकार मध्यदीपक तथा अन्तदीपक के मी उदाहरण उद्धरने दिए हैः । उद्भट 
आमह के ही समान केवर क्रिया को अनेकान्वयी नहीं वतलाते । भामह के अस्पष्ट 'एक-राब्द 
के स्थान पर वे स्पष्टतः धमे का उच्लेख करते दै । साथदही वे उपमानोपमेयभावमात्र पर जोर 
देते हें प्राकरणिकाप्राकरणिकत्व पर नहीं । यहाँ यदह ध्यान देने योग्य तथ्य है किं इन तीर्नो 
आचार्यो का मालादीपक पर कोई ध्यान नदीं हे । 

रुद्रट-यत्रेकमनेकेषां वाक्यार्थानां क्रियापदं भवतति । 

तद्वत्‌ कारकपदमपि तदेतदिति दीपवं, दधा ।७।६४॥ 
आदो मध्येऽन्ते वा वाक्ये तत्संस्थितं च दीपयति । 
वाक्याथानित्ि भूयखिधेतदेवं भवेत्‌ षोढा ॥७।६५॥ 

- जरह अनेक वाक्यार्थो मे एक क्रियापद होता है ओर इसी प्रकार अनेक क्रियात्मक 
वाक्यार्थो मे एक ही कारकपद वह दो प्रकार का दीपक माना जाता है । - 

यह [ क्रियापद अथवा कारकपद ] वाक्य के आदि, मध्य ओर भन्तमें स्थित होकर वाक्यार्थौँ 
को दीप्त करता है अतः छ प्रकार का होता है । उदाहरण- 

कान्ता ददाति मदन मदनः संतापमसममुप्मम्‌ । 
संतापो मरणमहयो तथापि शरणं नृणां सेव ॥ 

- कान्ता काम प्रदान करती है, काम अतुल्य ओर अनुपश्चमनीय संताप ओर संताप मरण, 
किन्तु आश्चयं यह दहै कि इतना होने पर भी मनुर््यंके किए शरण = रक्षा करने वाली वह 
कान्ता ही है यहाँ ददान क्रियाः वाक्य के आरम्भ में प्रयुक्त है अतः आदि क्रिया दीपक है। 

'निद्राऽपहरति जागरसुपशमयति मदनदहनसतापम्‌ । 
जनयति कान्तासुगमडखं च कोडन्यस्ततो बन्धुः ॥ 

"निद्रा से वड़ा वन्धु कोन है, वह जागर [ उन्निद्रताकेरोग ]कोदूर कर देती है, मदनाभ्चि 
के संतापको शान्त कर देती है ओर भ्रियामिल्नका सुखमीदेदेती है।"- यों एक निद्रा 
मे अनेक क्रियाओं का अन्वय बतलाया गया । निद्रा वाक्य के रम्भ मेँ प्रयुक्त है अतः यह आदि 
कारकदीपकं इञा। रुद्रट ने क्रिया ओर कारक के शेष चार अन्य दीपकं के मी उदाहरण 
दिए हे । किन्तु उन्दने भामह द्वारा प्रस्तुत उदाहरण मेँ वियमान उस विद्ेषता पर मी ध्यान 
दिया है जिससे मालादीपक को विकास मिला है। यथपि उन्होने मालादीपक नाम से किसी 
नवीन दीपक को प्रस्तुत नदीं किया है । इसके अतिरिक्त कारकदीपकं की कल्पना भी पदिली 
वार रद्रट मं ही दिखाई देतीःहै। किन्तु रुद्रट ने वामन के समान केवर क्रिया को ही अनेक 


कारकान्वयी धमे बतलाया । वस्तुतः यह धारणा भामह से ही चल पडी थी क्योकि मामह के समी 
उदाहरणों मे एक ही एक त्रिया का प्रयोग है । 


मम्मरट-'सकृद वृत्तिस्तु धर्मस्य प्रकृताप्रकृतात्मनाम्‌ । 
स्व क्रिया बहीषु कारकस्येत्ति दीपकम्‌ ॥ 
मालादौपकमाचं चेद्‌ यथोत्तर गुणावहम्‌ ॥ 
इनका अथ अभी-अभी स्पष्ट किया जा चुका है । इनके लक्षण मे दीपक की आदि, मध्य तथा 
अन्त मे धमादि के प्रयोग को लेकर होने वाली विशेषताएं छोड दी गई है । पण्डितराज जगन्नाथ 
ने इसका कारण चमत्कार का अभाव बतलाया है अर्थात्‌ वाक्य के आरम्म आदि मे किसी पद 


3 


7 प कमी 


२७ अल्ङ्कारसवेस्वम्‌ 


के उपयुक्त होने से चमत्कार मे कोई अतिराय नीं अता । 'धमस्यादिमध्यान्तगतत्वेऽपि चमत्कार- 
वैलक्षण्यामावात्‌ तरैविध्योक्तिरापातमात्रम्‌ ।› अन्वित होने वाला पदाथ मी यों धमेरूप बतलाया 
गया है केवल क्रियारूप नदीं । अनेक क्रियाओं में एक कारक के अन्वय का भी स्वतन्त्र स्थान दे 
ओर मालादीपक का मी । प्राकरणिकत्व ओर अप्राकरणिकत्व का भी स्पष्ट उल्लेख दै । साडर्य 
का महत्व स्पष्ट रार्व्दो में स्वीकार नहीं किया गया है । इस प्रकार मम्मटका दीपकरक्षण प्राचीन 
-लक्षर्णो के आधार पर निमित एक सखुविचारित लक्षण हे । 
परवत्तं आचार्यो मं-- 
चोभाकर ने अल्काररत्नाकर मेँ दीपक का लक्षण इस प्रकार किया हे-¶{ सक्रद्‌ धमेस्य 
निदेशेऽप्रस्त॒तानां प्रस्तुतानां वा आर्थमौपम्यं तुल्ययोगिता-- ] “मिश्राणां दीपकम्‌ ।› अर्थात्‌ 
[ धर्मका एक वार निर्दे होने पर केवर अग्रक्रत अथवा केवल प्रक्रत पदार्थौ का आथे ओपम्य 
तुल्ययोगिता होती है ओर ] 'मिधित पदार्थो का दीपक । यथा-- 
"दूरे परिच्छेदकथा हि सत्यमैतदूगुणानासदधेरपां च ॥ 
(इस [ साहसांक ] के गुर्णा ओर समुद्र के जर्लो की इयत्ता पाना वहत दूर कौ वात हे । 
शोभाकर ने (संचारपूतानि०? पद्यमें प्रभा मौर धेनु दोर्नो को प्रस्तुत मान तुल्ययोगिता स्वीकार 
की है, दीपक नहीं, जव किं व्यक्तिविवेककार आदि ने दीपक स्वीकार किया है । 


अप्पयदीक्तित ने ऊुवल्यानन्द में दीपक का निरूपण इक्न प्रकार किया हे - 
वदन्ति वरण्यावरण्यानां धर्मक्यं दीपकं बुधाः । 
मदेन भाति कलमः प्रतापेन महीपतिः" ॥५।४८॥ 
-वण्यं = प्रस्तुत = प्राकरणिक ओर अवण्यं = अप्रस्तुत = अप्राकरणिक का धर्मेक्य दीपकः यथा 
हाथी मद से खरोभित होता दै ओर राजा प्रताप से। तथा--(मणिः राणोच्लीढः०?-पद्य । 
पण्डितराज जगन्नाथ ने इसी का निरूपण इस प्रकार किया है-- 


श्रक्रतानामगप्रकृतानां चेकस्ताधारणधमान्वयो दीपकम्‌ ।' 
प्रकृत तथा अप्रकर्तो का एक साधारण धर्म.मे अन्वय दीपक होता हे । 
पण्डितराज जगन्नाथ दीपक के माङादीपक मेद को दीपक का भेद न. मान शंखलामूलक 
अलंकार एकावली का मेद मानना उचित मानते हैँ । उनका कना हे कि मालादीपक में साद्य 
का अभाव रहता है। वस्तुतः कारकदीपक मे भी कविप्रत्तिमा-साट्स्य से प्रवृत्त नदीं होती, 
अतः साद्य दीपक का अनिवाथं देत नदीं दै । एकावली मेँ एकान्वयित्व का अभाव रता हेजो 
दीपक का प्राण है। अलकारसर्वस्वकार ने दीपक के इस मेद को गिनाया तो श॑खलामूलक भेदो में 
हे किन्तु नाम मालादीपक दही रखा हे । 
विश्वेश्वर पण्डित ने दीपक का निरूपण इस प्रकार किया दै-- ६ 
१. ¶ सूत्र ] प्रकृताप्रक्ृतानां यचेकान्वयितास्ति दौोपक तत स्यात्‌ ।' 
[ वृ० ] यत्रोपमानोपमेयभूतानां प्राकरणिक्रप्राकरणिकानामैकपदोपात्तेन = गुणक्रियादिना 
धर्मणान्वयस्तदी पकम्‌› । 
- जहां उपमानोपसेयरूप प्राकरणिकं तथा अप्राकरणिको का एक शब्द से कथित गुणक्रिया 
आदि धमै के साथ अन्वय हो वह्‌ दीपक । 
२, [ सू° ] यत्रेकमैव कारकमन्वयमेति क्रिया बहीपु । 
[ व° ] यत्रैकमैव कारकमनेकक्रियास्वन्वितं तदपि दीपकम्‌ । 


~~ ~~~ ~ --------------------------- यु कक ~~ अ~ ~ कः ~< ष र द्ये त 


परतिवस्तूपमालङ्कारः २५५ 


-जहां एक ही कारक अनेक क्रियाओं में अन्वित हो वह भो एकु दीपक होतादहै। विदवेदवर 
पण्डित ने कतां से केकर अधिकरण तक के सभौ कारको के अनेक क्रिया मे अन्वय के उदाहरण 
दिएदहे। 


३. [ सू०° ] माला त॒ पृवेपूवं विध्यन्तरेणोत्तरान्वयिनि ॥ 
[ बर° ] तस्यां क्रियाणां रूपान्तरेणान्वितस्य पुनस्तस्यामेव रूपान्तरेणान्वये मालादीपकम्‌ । 
-एक ही कारक एक ही क्रिया में भिन्न-सिन्न रूप से अन्वित हो तो मालादीपक । 
उदाहरण पुवांचायप्रदत्त उदाहरण नेसे हयी दिए हैं । किन्तु उन्दने मालादीपक को एकावली 
मानने के सुञ्चाव पर पण्डितराज का खण्डन नहो किया, न तो उसमें स्वयं साद्द्य की सिद्धि की। 
सजीविनीकार वि्याचक्रवत्तीं ने दीपकविवेचन का सार-संग्रह इस प्रकार किया है- 
"दीपक वास्तवोपम्यं प्रकृताप्रकृताश्रयम्‌ । 
आदिमध्यान्तवाश्येषु क्रियाकारकभेदतः ।' 
प्रस्तुत ओर अप्रस्तुत का परस्पर वास्तविक किन्तु [ वस्तुरूप वाच्य से ] गम्य [ = वास्तव ] 
साद्रय दीपक होता हे। क्रियादीपक ओर कारकदीपकं दो प्रकारो का वह [ अनेकान्वयी 
धमे के ] वाक्य के आरम्भ, मध्य ओर अन्तमें प्रयुक्त दोने से पुनः तीन प्रकार काह छ प्रकारका 
माना जाता है । वस्तुतः संजी विनीकार की यह्‌ सं्रहकारिका अलंकारसवंस्वकार के दीपकनिरूपण का 
आकलन समयरूप से नहीं करती । 


[ स्वस्व ] 
[स्‌० २६] बाक्याथेगतत्वेन सामान्यस्य वाक्यद्वये पृथङ्निर्देशे 
प्रतिवस्तपमा । 
पद्‌ाथौरब्धो वाक्याथ इति पद्‌ाथगतालंकासनन्तरं वाक्याथेगताटंकारः- 
अस्तावः। त्र सामान्यधमेस्येवाय॒ पादाने सृन्निदंशो उपमा । वस्तुरति- 
वस्तुभावेनाखरूननिदंरोऽपि सेव । इवायदपादाने सकृन्निर्देरो उपमा । वस्तु- 
प्रतिवस्तुभावेनासङ्ननिदेद्े तु श्ुडस(मान्यरूपत्वं बिम्बप्रतिबिम्बभावो वा । 
आद्यः भकारः प्रतिवस्तूपमा । वस्तु-शब्दस्य वाक्याथेवाचित्वे प्रतिवा- 
वाक्याथेसुपमा साम्यमिव्यन्वर्थाश्चयणात्‌ । केवट कण्यस्मयात्प्यायान्त- 
रेण पुथङ्निदेश्ः | द्वितीयप्रकाराश्रयेण दश्टान्तो वक्ष्यते । तदेवमो पम्याश्चये- 
णेव प्रतिवस्तूपमा । यथा - 
'चकोयं पव चतुराश्चन्द्रिकाचामकमेणि । 
आवन्त्य एव निपुणाः खुदो रतनमंणि ॥" 
अच्र चतुरत्वं साधारणो धमे उपमानवाक्ये, उपमेयवाक्ये तु निपुण- 
पदेन निदिष्ठः। न केवलमियं साधर्म्येण यावद्‌ वेधर्म्येणापि । यथजेवोत्तर- 
स्थाने 'विनाचन्तीने निपुणाः खुडशो रतनर्मणि' इति पाठे । 
[ सू° ] [ यदि उपमा ] वाक्यार्थो मे [ हो ओर तदथं ] साधारण ध्म का दो वाक्यो 


मं भिन्न-भिन्न शब्दो से निदश्च क्रिया गयादहो तो [ वह उपमा] प्रतिवस्तूपमा 
[ कहकाती है ] ॥ २६॥ 


२ अचलङ्कारसवंस्वम्‌ 


[ वृण ] वाक्यार्थ पदार्थ से निष्पन्न होता है, इस कारण वाक्यार्थगत अल्कारो का प्रकरण 
पदा्थगत अल्कासो के बाद प्रस्व॒त किया जा रहाहे। यहां जो यह सामान्य या साधारण धमं है 
इसका निर्दा यदि केवर एक वार किया जाय तो वहां तो उपमाल्कार होता दही हे, वहां मी उपमा- 
लकार ही योता है, जहां साधारण धमं का निर्देश एकाधिक वार वस्तुग्रतिवस्तुभाव से किया जाता 
है, विन्त॒ यदि इवः-भादि राब्दोँ का उपादान नदीं रहता वहां यदि साधारणधम का निर्देश 
केवल एकवार हो तो दीपक या तल्ययोगिता होते हैँ, ओर यदि उसका निदेश एकाधिकं वार दहो 
तो वहां या तो वह [ साधारणधम ] शुद्ध सामान्यरूप ही रदता दै या वहां विम्वबप्रतिविम्बभाव 
रहता है। इन्दीं दो स्थितिर्ओं मेँ से जो प्रथम स्थिति है उसमे उपमा को [ उपमा न कहकर ] प्रति- 
वस्तूपमा कहा जाता दहै, इसलिए कि टेसा कहने से उसका अथे अपने समयररूप मे सष्ट हो जाता 
है, क्योकि वस्तु शब्द का अर्थं है वाक्यार्थः, अतः श्रतिवस्तु-शब्द का अथं हुआ व्वाक्यार्थं 
वाक्याथ मे" जौर “उपमाः इाब्द का अथंतो साम्यदहैदी। [ इस प्रकार प्रतिवस्तुपमाका अथै हुमा 
वाक्याथ का वाक्यार्थं से साम्य ] यहां साधारण धमे को भिन्न-भिन्न शर्ब्दो से कदे जाने की जो 
परतिज्ञा है वह केव इसङिए कि कान्यकला मे सौन्दयं कौ रक्ता वेसा ही करनेसे होती है [ खाब्द 
न वदल्ने ते अभिव्यक्ति मेँ हृदयस्पर्दिता कम हो जाती हे इसीलिए काव्यद्ास्त्र = कान्य समय 
मे एक दी शब्द के पुनः प्रयोग मँ “कथितपदत्व' दोष माना गया है ] 
उक्त दो स्थितिर्यो मे विम्बप्रतिविम्बभाव की जो द्वितीय स्थिति दे उसत्ते जो अलंकार निष्पन्न 
होता है उसे दृष्टांत कदा जाता है, उसका निरूपण इस अलंकार के वाद किया जाएगा । 
इस प्रकार प्रतिवस्तूपमा सादृद्य पर ही निभर रहने वाका अक्कार है । यथा-- 
(्वन्दिका के आचमन की कला मेँ चकोरियां ही चतुर होती देँ [ ओर] खरतकेखि मे निपुण 
अवन्तीजनपद्‌ की स॒न्दरियां = माक्विकायं दी हआ करती हँ 1? 
--यदां साधारण धर्म है चतुरता, उसे उपमानवक्य मेँ चतुरश्ब्द ओर उपमेयवाक्य में 
निपुण शब्द से निर्दिष्ट किया गया ह । 
य॒द्‌ प्रतिवस्तूपमा केवर साधम्यं के आधार पर नदीः वेधम्य के आधार परभी होती है। यथा 
इसी पद्य के उत्तरां म “अवन्तीजनपद की स॒ुन्दरियां को छोड अन्य स॒न्दरियां स॒रतकेरिमें 
निपुण नदीं होती ° एेसा पाठ मान लेने पर । 


विमरिनी 


वाक्या्ेत्यादि । एतदेव व्याल्यातुमटंकारान्तरेः खहास्या विभागं द॒श्चंयति - तत्रे- 
त्यादिना 1 (तया स पूतश्च विभूषितश्च इव्यत्रोपमायां सङ्कन्निदशः। "पाण्ड्योऽयमंसार्पित- 
रुम्बहारः' इत्यादावपि चासङृननिरदेशः। तदेवमिवायुपाद्‌ाने साधारणधर्मस्य यथासंभवं 
स्वरूपं निरूप्येवाद्यनुपादानेऽपि निरूपयति--इवादीत्यादिना । यथपि दीपकतुख्ययोगि- 
तयोः सामान्यस्यासङ्कननिर्दैशोऽपि संभवति, तथापि सक्न्चिरदेशं विना तयोरजुस्थानात्तदे- 
वेह प्राघान्येनोक्तमू । असक्रन्नि देशश्च द्विधा भवतीस्याह-असङृदिव्यादि । आयः प्रकार 
इति शुद्ध सामान्यरूपत्वम्‌ । यदि चात्र सामान्यस्येकरूपत्वमेवासिति तर्कि पर्यायान्तरेण 
णुथडनिदेशचः क्रियत दइव्याशाङ्कथाह-- केवलमित्यादि । यदुक्तम्‌--*नैकं पदं द्धिः प्रयोऽथं भ्रायेणः 
इति । बिम्बप्रतिविम्बभावो द्वितीयः प्रकारः। | 

एवमेतद्पसंहरय्‌ प्रकृतमेव चिद्धान्तयति--तदेवमित्यादिना । ओपम्याश्रयेणेत्ति। एत- 
द्भिद्धता मन्थता प्रतिवस्तूपमाया दष्टान्ताद्धेदो दु्धितः । यतोऽस्याः प्रङ्तार्थ॑स्य 
विशेषाभिधित्सया सादश्या्थ॑मप्रक्ृतमर्थान्तरस्युपादीयते, अत एव चान्न प्रकृताप्रज्तयो- 


8. 


जा काका 


जय क याय नि कडि छिन 


-~ 
[षा काक मो 7 क = 


प्रतिचस्तूपमा्ङ्कार २९५७ 


डपमानो पमेय भावः । च्टान्ते पुनरेतादशो चत्तान्तोऽन्यत्रापि स्थित इति प्रङ्ृतस्यार्थ- 
स्याविस्पष्टा प्रतीतिमां भूदिति प्रतीतिविक्षदीकरणाथंसथान्तरस्युपादोयते । अत 
एवात्रा्न्तरो पादानं प्रह्ृतस्य न क्राप्युपयुक्तमपि द प्रतिपत्तः प्रृताथप्रतोतेरविस्पष्ट- 
तानिरासात्‌ । केचिच्च दष्टान्ते इयोः सखमध्यंसमर्थकभावेनानयो मदमाह: । 
तदसत्‌ । यतः खरूपयो विंरोषयोः खमध्यंससमर्थकमावो न भवति । वस्त्वन्तरेण चश्त्व- 
न्तरचिद्धयनुपपत्तेः । ख हि सामान्यविशोषयोरेव भवति । सामान्यस्य नियमेन दिनलेषनिष्ठ- 
स्वाद्विशेषस्य च नियमेन सासान्याश्नयस्वात्‌ ¦ यदि चात्र समध्यंसमर्थंक भावः स्यादर्थान्तर- 
न्यासादस्य प्रथगलकारता न ध्यात । ससध्यंसमथेक मावात्मनः सामान्यस्यो भयत्राप्यनु- 
गमात । अन्ये पुनर्मयच्राप्यार्थमौपम्यसाध्रिसव्य सामान्यस्य शद्ध सामान्यरूपस्वविम्ब- 
प्रतिबिग्बभावाभ्यां व्यव श्थितेरनयोभंदमाह्ुः । तदप्यसत्‌ । एतावतेवौ पम्याख्यस्य सामा- 
न्यरुक्तणस्यानुगतष्वादु पमामेदवद्‌ नयोः परथगरंकारस्वानु पपत्तेः! तदेवं वाक्यनेरपेच्येऽपि 
वक्कप्रतिपस्त्नोरेव विशेषाद्‌ नयोभंदः चिद्धः 1 वेधम्यणापीति । भवतीति दोषः। 

वाक्याथं इत्यादि, इसी की व्याख्या करने के छिए अन्य अलंकारो से इसका विषयविभाग 
करते हथ लिखते है--तघ्न । श्रमामहत्या-तया स पूतश्च विभूषितश्चः [ कुमारसं° १ ]--प्यमें 
आईं उपमा मे स्राधारणधमं का निदं कैव एक बार किया गया है ओर "पाण््योऽ्य्मसा्पित०ः, 
[ रधु० ६] पमे साधारण धमे [ विम्वप्रततिविम्बभावसे हार आदि] का निदा एकाधिक 
वार किया गयादहं। इस प्रकार इ” आदि का उपादान रहने प्रर साधारणधर्म का जैसा ङक. 
रूप संभव था उसका निरूपण करिया । अव इवादि का उपादान न रहने पर संभव स्वरूप पर 
विचार करते हं--'द्वादि' इत्यादि अन्ध दारा । ययि दीपक ओर तुल्ययोगिता मँ साधारण- 
धमं का एकराधिक वार भी निदेदा रद सकता है तथापि ये दोनों, विना केवल एक वार निर्देद्यके 
निष्पन्न नहीं हो सकते इस कारण एक वार निर्दर ही प्रधान है अतः उसीका उल्लेख किया गया । 
"एकाधिकं वार निद्या दो प्रकार से संमव है'-यद वतलाते हुए लिखिते दै--अषक्त्‌ इत्यादि \. 
आजाद्यः प्रकारः प्रथम प्रकार जिसमे साधारणधम॑ शुद्ध सामान्यरूप रहता है । [ साधारणधमं के 
भिन्न-भिन्न शाब्दो से निर्देश प्र | प्रन उठ सकता है कि यदि प्रतिवस्तूपमा मे भिन्नसिन्न वाच्यां 
म केवल एक ही साधारणधमं बतलाना होता है तो उसका भिन्न-भिन्न पर्यायौ से ही बतलाया 
जाना कर्यो आवदयक हैः । इस पर उत्तर देते है . (केवलं काव्यसमयःः इत्यादि । 
जेसा कि [ वामनाचायं ने काव्यप्तमयः नामक प्रकरण तें ] कहा है -- (नेक पदं द्विः प्रयोज्यं प्रायेण 
[का० सू° ५।१।१|--प्रायः एक ही पद एक ही इलोक मेँ दो बार प्रयुक्त नहं किया जाना चादिएः । 
दवितीयः प्रकारः = दितीय प्रकार अर्थात्‌ विम्बप्रतिविम्बभावात्मक | 

इस प्रकार इस विस्तार का उपसंहार करते हए प्रकृत प्रतिवस्तूपमा पर॒ निष्कृष्ट सिडान्त 
प्रस्त॒त करते हे--तदेवम्‌, इत्यादि द्वारा । ओपम्याश्रयेण = साद्स्य पर आधित कहकर 
गन्थकार ने प्रतिवत्तूषमा का दष्टान्त से भेद दिखला दिय) । इस [ प्रतिवस्तूपमा ] में अप्रकृत अथं 
शसकि९ अपनाया जाता हे कि उप्तके साथ साट्स्य सिध हौ जाने से प्रकृत अथं ओर अधिक 
सन्दर दो सके इस कारण इसमें प्रकृत ओर अप्रकृत अर्थौ कै बीच उपमानोपमेयभाव रहता है । 
्ष्टान्त मे अश्रक्ृत अथ॑ का उपादान दूसरे उद्देर्य से कियाजातादहै। वह है प्रक्रत अथैक 

रदतया प्रतौति भ्याकि इष्टान्त-वाक्यार्थं सै म्रकृतसूप ते उपात्त अथै के विष्यमे दृष्टंत देते के 

पूवं पसा भाग नदीं दोताहै किउस जैसी स्थिति अन्यत्र सम्भव नहीं है, अतः उसके 
पिषय म कटी गई बात चित्तम ठीक जम नहीं पाती । दृष्टांतरूप से अन्य वाज्या्ं प्रस्तत कर देनं 
पर वहं जम जातौ हे । इसर् दृष्टां मे दूसरे भथं का उपादान प्रक्रत अथं के लिट उपयोगी न 


१.७ अ० स० 


२५८ अच्छङ्कारसवंस्वम्‌ 


होकर प्रतिपत्ता = बोद्धा = सहृदय पार्क कै ल्एि उपयोगी होता हे, क्योंकि वह प्रक्रत अथं कै 
विषय मँ बनी धूमिर, अप्ररूढ रतीति को उसके चित्त मे विस्पष्ट ओर प्ररूढ वना देता है । 
[ इस पर पण्डितराज जगन्नाथका कना दै कि जव प्रकृत ओर अगप्रक्रत अ प्रतिवस्तू- 
पमा के ही समान दृष्टान्त मेँ भी रदत हँ तो यह कहना युक्तिदीन है कि प्रतिवस्तूपमा मे साद्द्य 
की प्रतीति होती है ओर दृष्टान्त में नदीं । किसी एक मे साद्द्य मानने पर उच्टे, दृष्टान्तमें 
ही साढ्दय मान कर प्रतिवस्तूपमा में उसका अभाव बतलाया जा सकता है । इसके अतिरिक्त अप्र. 
कृताथ हारा कृताथ का विशदीकरण साट्दय से भिन्न ङछ नहीं हो सकता । द्रष्टव्य रसगंगाधर 
दृष्टान्तप्रकरण । | 
ङु विद्वान्‌ इन दोनों को [ दृष्टान्त मेँ ] समथ्यंसम्थकभाव [ मान उस ] के आधार पर भिन्न 
वतलाते है, किन्तु वह ठीक नही, क्योंकि समथ्यंसम्थंकमाव एक से दही एक सेदो विदेषों मे नदीं 
होता । क्योकि भिन्न वस्तु से भिन्नवस्तु का समर्थन संमव नदीं होता [ विदोष-विद्ेष परस्पर भिन्न 
षी रहते है ]। वह कंवल सामान्य यौर विद्रोषकेदही वीच होता है, क्योकि सामान्य नियमतः 
विशेष से अभिन्न रहता है भोर विदोष मी नियमतः सामान्य से। यदि दृष्टान्त मे समर्थ्यसमथैकभाव 
होता तो इसे अर्थान्तरन्यास से अख्ग अकुकार मानना संमव न होता । न्योँकि सम््य॑समथकमाव- 
रूपी विदेषता दोना मे द्यी समानरूप से रहती है । 
कुछ विद्वान्‌ इन दोनों मँ विचमान अर्थं सादृद्य के धरातल पर इनका भेद करते हैँ क्योकि 
प्रतिवस्तूपमा में साधारणधमं वस्तुप्रतिवस्तुभावापन्न शुद्ध सामान्यरूप साधारणधर्म॑रहता है ओर 
दृष्टान्त मेँ विम्बप्रतिविम्बभावापन्न । किन्तु वह भी ठीक नही, क्योकि इस आधार पर ये दोर्नोदो 
विदोष प्रकार की उपमा ही सिद्ध हाँगे क्योकि सादरदयतत्तव दोनो मेँ उपमा जेखा ही रहेगा । [ यह्‌ 
स्वयं सवव॑स्वकार का ही खण्डन है ] | 
इस प्रकार इनका मेद वाक्य से संमव नहीं होता । वक्ता ओर बोद्धा की मानस संवित्तिको 
षी लेकर इनका येद टीक ठहुरता हे। ८ 
वधम्यणापि = वैधम्य॑ से भी इसमें होता है--इतना जोड़ना शेष है । 


विमर्चः-- प्रतिवस्तूपमा का पृठेतिदास- 
मामह यर वामन ने प्रतिवस्तूपमा को उपमा का दही मेद माना है । यथा-- 


मामह- 
'समानवस्तुन्यासेन प्रतिवस्तूपमोच्यते । यथेवानभिधानेऽपि युणस्ताम्यप्रतीतितः ॥ 
कियन्तः सन्ति गुणिनः साधुस।घारणध्रियः । स्वादुपाकफलानघ्राः कियन्तो वाध्वश्लाखिनः ॥ 
साधुसाधारणत्वादियुणोऽत्र व्यतिरिच्यते । स साम्यमापादयति विरोधेऽपि तयोय॑तः ॥ 
= ९४२१ ।॥ 
--यथा श्व आदिका शब्दतः कथन न रहने परर मी समान वस्तुओं [ वाक्यार्थो ]को 
उपस्थित करने ते [ उपमा ही ] प्रतिवस्तूपमा कदी जाती दै क्यकि व्हा गुणक्ाम्य की प्रतीति 
दोती है। यथा-पेपते गुणी कितने होते हं जिनकी संपत्ति साधुजनो फे किष छुल्म रहती है, 
या परिपक्व फल से छक ठेते भितने वृक्ष होते दँ जो रास्ते पर लगे रहते हे ।' 
यहाँ पुत्रीढं ओर उत्तराधं कौ वस्तुं भिन्न भिन्न हैं तथापि साधुसाधारणत्व आदि गुण 
यहा दानो अधं के वाक्यार्थो मैं साम्यकी प्रतीति करा देता दै यद्यपि वह्‌ पृरवाद्धं मे साधुसाधारण 
दाब्द से कयित है ओर उत्तरार्धं मै उसपे भिन्न मागेस्थित-दब्द से [ क्योकि 'मार्गस्थितः दचाब्द से 
-खीक रास्ते चलने वाला भं मी निकलता है जिसका विरोधार्थं शब्द “उन्माग॑परवृत्त' है ] । 


प्रतिवस्तूपमाटङ्ारः २८५९ 


इस विवेचन से स्पष्ट दै किं भामह प्रतिवस्तूपमा की प्रायः संपूण सामग्री प्रस्तुत कर देते हे । 
वामनः-संप्रव्युपमप्रपञ्चो विचायते । 
[सू०] प्रतिवस्तुध्रखत्तिः उपमाप्रपच्चः ॥ ४।३।१॥ 
वाक्यार्थोपमायाः प्रतिवस्तुनो मेदं दर्चयित॒माद- 
[सू०] उपमेयस्योक्तो समानवस्तुन्यासः प्रतिवस्तु ॥ 
[ब्र०] समानं वस्तु वाक्याथैः, तस्य न्यासः समानवस्तुन्यासः- 
उपमेयस्याथांद्‌ वावया्थस्योक्तो सत्यामिति । 
अत्र द्वौ वाक्यार्थो, एको वाज्याथोपमायामिति मेदः । तचथा- 
देवीभावं गमिता परिवारपदं कथं भजलत्वेषा । 
न खट परिभोगयोग्यं दंवतरूपांकितं रत्नम्‌ ॥' 

--अव उपमा के प्रपच पर विचार करते है- 

[ सू° ] प्रतिवस्तूपमा आदि उपमा का प्रप॑च है । वाच्या्थोपमा [पाण्डयोऽयमंसापित०ः आदि 
पयो के पूरे वाक्याथ मे रहने वाली उपमा] से प्रतिवस्तु कौ उपमा का भेद वतरने के किए किखिा- 

[ सू० ] उपमेय को कहकर समान वस्तु प्रस्तुत करना [ है ] प्रतिवस्तूपमा । 

[ वृ० | समान जो वस्तु अथात्‌ वाक्याथ, उसका न्यास = अथात्‌ प्रस्तुतीकरण इ समानः 
वस्तुन्यास, किन्तु तब, जव उपमेय अथात्‌ वाक्याथरूप ही उपमेय पदिक प्रस्तुत किया जा चुका 
हे । इस प्रकार इस [ प्रतिवस्तूपमा ] में दो वाक्याथ रहते है जव कि [ "पाण्डयोऽयम्‌०--इत्यादि 
पद्य के परे वाक्याथेमें रहने से] वाक्यार्थोपमा [ कही जने वारी उपमा ] मे केवर एक दही 
वाक्यां रहता है । यथा- 

यह्‌ रत्नावली अव जव महारानी हो गई तो यह परिवार [ नौकर चाकर जो आसपास 
धिरे रहते है ] पद पर कैसे रह सकती है । जिस रत्न पर देवप्रतिमा उकेर दी जाय वह परिभोग 
के योग्य हो एेसा नदीं होता ॥› 

वामन के इस विवेचन सेस्पष्टहैकिवे प्रतिवस्तूपमाको उपमा ह्य मानते है, यहमी 
स्पष्टहे कि प्रतिवस्तूपमालक्षण कौ समय्रता यदीं निष्पन्न हो जाती है 

उद्धर = उद्धट ने भी प्रतिवस्तूपमा को उपमा के ही प्रसङ्ग में प्रस्त किया है- 

'उपमानसन्निधाने च साम्यवाच्युच्यते बुधेयत्र । उपमेयस्य च कविभिः सा प्रतिवस्तूपमा गदिता ॥ 
प्राकरणिकत्वस्थित्येकश्चो पमेयतां रमते । उपमानत्वं चापर इत्युपमावाचिद्यल्यत्वम्‌ ॥ 
कविजन, जहौ साम्य [ साधारणधमं ] वाची चन्द का प्रयोग उपमान के साथमभी करते है 


ओर उपमेय के साथ मी उसे प्रतिवस्तूपमा कहा गया हे । 
- यहां एक भं प्राकरणिकलत्व कै आधार पर उपमेय सिद्ध हो जाता है ओर दूसरा उपमान 


दइसर्िए उपमावाचक शब्द का प्रयोग नदीं रहता । यथा- 

उस [ पावती ] जेसी सौन्दयं ओर शीर दोनों से सख्रद्ध युवत्तियँ कम दही होती हें। एेसी 
राते कितनी होती हेः जिनमें व्षांमी हो ओर पण चन्द्रविम्ब मी। 

स्पष्ट हौ यह उद्धर ने मामह्‌ तथा वामन से आगे बढ़कर उपमावाचक रब्द के अभाव 


तथा साधारण धयं कै उपमान अ।र्‌ उपमेय के साथ अलग-अलग प्रयोग पर वरू दिय{। किन्तु 
उनका .साम्यवाचीः शाब्द भ्रामक 


द्रटः-- रद्र ने प्रतिवस्तूपमा को उभयन्यास नामक ओपम्यमूलक अल्कार माना है 
(सामान्यावप्यर्थो स्फुटसुपमायाः स्वरूपतोऽपेतौ । 
निदिद्येते यस्मिन्तुभयन्यासः स विज्ञेयः॥ 


२द० अट्कारसवेस्वम्‌ 


-जहां दो सामान्य प्रतीत होने वाके अथक तोस्पष्ट रूपे जायं भिन्त वे उपमा कै 
स्वरूप से रदित दो उसे उभयन्यास समञ्लना चाहिये) स्पष्टही रुद्रटकी यह कारिका 
अर्थं की समयता का वहन नहीं कर पाती । उपमा के स्वरूप से रहित कहने का अथं उपमावाचक 
इवादि के प्रयोग का अमाव ही दो सकता है। भामह ओर वामन ने समानवस्तुन्यासः राब्द 
का प्रयोग किया था ओर एक अर्थान्तरन्यास नाम का अल्कारमी मानाथधा। रुद्रट ने उसी 
(अथान्तरन्यास' राब्द का अनुकरण कर प्रतिवस्तूपमा के किए .उभयन्यासः खन्द वना लिया । 
अधिक अच्छा दता यदि वे समानन्यास दन्द चलात्ते क्योकि उमय शब्द "वस्तु" या ्र्तिवस्तुः 
रदाब्द के ही समान असमानद्वय तक व्यापीदहैे। स्वधा रुद्रटने प्रतिवस्तूपमा को उपमासे 
अभिन्न या उपमाकादहीए्क भेदन मानकर उसे कुछ दूर खींचना चाहा है जिसका अनुकरण 
मम्मट में देखा जाता हे ओर कदाचित्‌ प्रथमतः सर्वस्वकार नेदह्ी इनका क्रम सक किया ह । 
रुद्रट मे उभयन्यास नामे प्रतिवस्तूपमाका लक्षण करजो उदाहरण दिया दे वह ठीक 
भामह के उदाहरण का भावाथं हे 

सकर्जगत्साधारणविमवा श्रुवि साधवोऽधुना विरलाः । 
सन्ति कियन्तस्तरवः स॒स्वादुगन्धिचारफलाः ॥' 


-इस समय रेसे साधुपुरुष विरल ही हँ जिनका वभव सरे संसारके किट उपयोगी हो| 
ठेते वृक्ष कितने होते हं जो उत्तम सवाद से युक्तः सुगन्धी तथा सन्दर होते हैः। यहां भामह के 
उदाहरण में उपलब्ध भमाग॑स्थता' को छोड रुद्रट उपमानवाक्याथ में साधारणधर्म की स्थापना नदीं 
कर सके । कदाचित्‌ वे साधारण धमं के दो वार भिन्नदाव्द के निर्देश को अनावद्यक मानते दों 
ओर कदाचित्‌ उनके मनम वस्तुप्रतिवस्तमाव का अभिप्राय वही जमादहौो जो परवन्त रीकाकारों 
में भिलता है । वे एकस्येव धम॑स्य प्रथक्छब्दाभ्यासुपादानं वत्तुप्रतिवस्तुमावः--्एक ही धर्मका 
भिन्न-िन्न रार््दो से उपादान वस्तप्रतिवस्त॒भाव है--[ नागेश्-रप्तगंगाधर प्रतिवस्तृपमा |] इस 
प्रकार वस्तुप्रतिभाव को वाक्याथैपरक न वनाकर साधारणधमपरक बनाते हे । रसंगंगाधरकार 
के आगे उद्धृत किए जाने वाले लक्षण से यद तथ्य स्पष्ट्है। इसीलिए रुद्रटने कदाचित्‌ प्रति- 
वस्तूपमा शब्द को भी हग दियादहे। यहां तक कि टीकाकार नमिप्ताधु ने मी यहां इस दाब्दं 
को स्मरण नहीं किया । 

मम्मट :--[ सू° | प्रविवस्तूपमा त॒ सा, सामान्यस्य द्विरेकस्य यत्र वाक्यद्ये स्थित्तिः । 

[ व° | साधारणो धमः उपमैयवाक्य उपमानवाक्ये च कथितपदस्य दुष्टतयाभिदहितस्वात्‌ शाब्द- 
मेदेन यदुपादीयते सा वस्तुनो वाक्याथस्यो पमानत्वाव प्रतिवस्तूपमा ।- यथा द्देवीमावं ०? । 

[ सू० ] प्रतिवस्तूपमा वह जाँ एकं सामान्य दो वाक्यां मे दो वार स्थित हो । 

[ वृ° ] [सामान्य = ] साधारण धर्मको उपमेयवाक्य ओर उपमानवाक्य मे, कथितपदत्वदोष के 
परिहार कै हेतु जो भिन्न-भिन्न चब्दों से कदा जाता है उसीको वस्तु अथात्‌ वक्ष्या के उपमान 
होने खे प्रतिवस्तूपमा कहा जाता हे । 

-मम्मट कौ पदावली वृत्ति में स्पष्टलूप से साधारण धमं के भिन्न चान्द से असकृत्‌ कथन की 
ओर अधिक उन्मुख है, कदाचित्‌ वे प्रतिवस्तेपमा में चमत्कार का बीज इसी को मानते ह्यं । 

उन्हनि वस्तु का अथं वाक्याथ तो किया है विन्॒ उस्म जडे श्रतिः-राब्द की ओर ध्यान नहीं 
दिया । वामन ने उते ठीक से पकड़ा है। संमवदहै मम्मट ने साधारण धमकी द्विरुक्ति पर इस 
ङिए अधिक बरु दियादहो, किरुद्ररने उसकी सवेधा उपेक्षा करदी थी। किन्तु उनके श्स 
करम से प्रतिवस्तूपमा की तुला मेँ साधारणधमे द्विरुक्ति,का पलड़ा वाक्यार्थगत साम्यप्रतिपत्ति के 


परतिवस्तूपमालङ्ारः २६९ 


पड से भारी पड़ गया । वस्तुतः प्रतिवस्तूपमा का प्राण उपमा है ओर उसमें यद्यौँ प्राण है उसकी 
वाक्याथृत्तिता तथा गम्यता । साधारणधमं की सिन्नराब्दा द्विरुक्ति ओर शवादि उपमावाचर्वो 
की अनुक्ति तो इनमं साधनदहं। 

मामहं, वामन, उद्धर ओर रद्रट ने मालाप्रत्तिवस्तूपमा का उव्लेख नदीं किया न तो वैधम्य॑- 
मूलक प्रतिवस्तूपमा .का हौ । अल्कारसवंस्वकार ने यद्यपि वेधर्म्यमूलक प्रतिवस्तूपमा को जोड़ा 
किन्तु मालाप्रतिवस्तूपमा उनसे मी द्ूट गईं । परन्तु वस्तुतः प्रतिवस्तूपमा मेँ मालात्व से उतना 
अतिदाय नहीं आता जितना वेध्यं से आता है । फिर मारात्व उपमा आदि मे प्रतिपादित भी 


कियाजा चुका हे। उते यहाँ स्वयं भी जाना जा सकता है। वेधम्यमुलकता अवद्य ही एक 
उट्टेखनीय विदोषता थी । 


शोभाकरः-[ सूत्र ] वाक्यद्वयेऽसक्ृद्‌ [ धर्म्य निदेरोऽप्रस्त॒तानां प्रस्तुतानां चाधंमो पम्यं ] 
प्रतिवस्तूपमा ॥ १६ ॥ 


| वृत्त | वाक्याथयोरुपमानोपमेयभावस्याथैत्वे साधारणधमेस्यासङ्दुपादाने प्रतिवस्तूपमा । 
कथितपदस्य दुष्टत्वाद्‌ वाक्यद्वये शब्दभेदेन परथङः निदे शः 1 .. 


-[ सूत्र ] “दो वाक्यो मं साधारण धमं का यदि एक(धिक बार निदेश ह्यो गौर प्रस्तुताप्रस्तुर्तो 
मे आर्थं ओपम्य हो तो प्रतिवस्तूपमा । [ बृ० ]-ष्दो वाक्यार्थो का साद्य आर्थं हो ओर साधारण- 
धमे का उपादान एकाधिक वार किया गया दहो तो प्रतिवस्तूपमा होती है। कथितपदत्व = अर्थाव्‌ 
एक ही वाक्यया प्य मेँ एक वार आट शब्द को दूसरी बार प्रयुक्त करना दोष है अतः दोनो 
वाक्या मं साधारण धमं का वाचक राब्द भिन्न भिन्न शब्दों दारा प्रस्तुत किया जाना चाहिए ।' 


रत्नाकरकार शोमाकर ने वाक्याथ के (१) शुद्ध प्रकृत, (२) शुद्ध अप्रकृत ओर ८३) 


मिश्रये तीन वग वनाकर प्रतिवस्तूपमा को तीन प्रकार का बतलाया है। यह उनका अरुकार- 
सवस्वकार से आगे बद्कर प्रतिवस्तूपमा मे किया गया योगदान है । 


नाकरकार ने इसे वेधम्यमूल्क भी मानादहै ओर उदाहरण के रूप म अलंकारसव॑स्वकार 
दवारा प्रस्तुत "चकोयं०० विनावन्तीनं०' प्य ही दिया है। किन्तु उन्होने यहो एक मार्मिक विचार 
भी प्रस्तुत कियादहे।- | 
अत्र यपि चायस्य न निपुणा इत्यनेनाभावप्रतिपादनाद्‌ एकस्य  धर्मस्यासङ्ृन्निदेलाभाव- 
स्तथापि वेधम्यस्य साधम्याक्षेपकत्वाद्‌ अवन्तीनां रते निपुणत्वेन प्रतीतेर्थाचा ठयंस्यासङ्ृन्निदे रः ।° . 


चकोयं एव ०? पय में उपमानवाभ्य मं व्वातुयै-शब्द से जिक्त साधारण धम का निर्देश. किया 
गया है उपमैयवाक्य मे (न निपुणाः = निपुण नहीं है--इस प्रकार उसी. साधारण धमका 
अभाव बतलाया गया है, फलतः साधारण धम का असकृत्‌ निदं यदहो नदीं हआ तथापि यह्‌ 
दोष नदीं हे क्योकि अवन्ती की खिर्यो को छोडकर अन्य कोड निपुण नहीं हैः ेसा कहने से 
“केवर अवन्ती कौ ही खियोँ निपुण है-यह्‌ तथ्य निकल आता है ओर इसमे साधारणधमे का 
दूसरी वार वैसे ही निदेशो जाता है जेते सीधे साधम्यं वाक्य के प्रयोग से साधम्यैमूलक प्रति- 
वस्तूपमा में होता है । रत्नाकरकार ने वेधम्यं शब्द के विषयमे छवा है-“अभिहितविपरीतो 
दर्थ विधर्म, तस्य भावो वेध्यम्‌ । यथा--भ्वको्य" इत्यत्र चकोरीणां प्रतिपादितस्य चातुर्य्य 
विपरीतोऽथैः तदभाव उपमानवाक्ये चकोरीतुस्यावन्तीव्यतिरिक्ता अन्या युवतयो न निपुणाः इत्व- 
भिदितः। न चात्र नजादिप्रयोगमात्राद्‌ वेधम्य॑मिति वक्तभ्यम्‌, “स्थितो देवदत्तो न गतः इत्यत्र 
पर्यायप्रयोगेऽ्पि वेधम्यप्रसङ्गात्‌ ।' 


२६२ अलङ्कारसवंस्वम्‌ 


--“जो अर्थं कथित भर्थं के विपरीत दो वह अर्थं कहलाणएगा विधां ओर उसका भाव होगा 
वेधम्य । यथा भ्वकोर्य° पद्मे पूर्वाद्धंमे जो चकोरियों की चुरता बतलाई गईं हे उत्तराधं के 
उपमान मे उससे उल्टा भ्चकोरीतुल्य अवन्ती युवतिर्यो से भिन्न युवतियोँ निपुण नदीं दोर्तीः- 
यह अर्थ कदा गया दै । णेसा नदीं समञ्चना चाहिए कि प्रतिवस्तूपमा में केवर (नः के प्रयोग 
मात से वैधम्यं की प्रतीति हो जाती है, क्योकि देवदत्त भभीवैठा है, गया नदीं दहै इस वाक्यमें 
भी, जहां केवर पर्याय मात्र का प्रयोग होता है, वैधर्म्यं मानने की विवदता उठ पड़गी । 

'वेधम्यै, प्र्‌ सूक्ष्म विवेचन करने पर भी अटंकाररत्नाकरकार मालाप्रतिवस्तूपमा पर 
सर्व॑स्वकार के ही समान चुपदहे। 

अप्पयदी चित को चित्रमीमांसा मेँ प्रतिवस्तूपमा का विवेचन रह गया है किन्तु कुवल्यानन्द 
मे वह इस प्रकार है-- | 
वाक्ययोरेकसामान्ये प्रतिवस्तुपमा मता । 

तापेन आआजते सूरः शुरश्चापेन राजते ॥? 

--्दो वाक्यो मेँ यदि एक ही साधारण धमं हो तो प्रतिवस्तुपमा होती दै यथा-स ताप 
त सुशोभित होता है, शर चापसे विराजता है! [ वृत्ति] = ध्यत्रोपमानोपमेयपरवाक्ययोरेकः 
प्षमानो धमः पृथङ. निदिदयते सा प्रतिवस्पूपमा । प्रतिवस्तु प्रतिवाक्याथेम्‌ उपमा समानधमाोंँऽस्या- 
मिति ग्युत्पत्तेः । 

--जहां उपमान ओौर उपमेय फे वाक्यो मेँ एक ही समान धम पृथक्‌ निर्दिष्ट दो वह होगी 
प्रतिवस्तूपमा क्योंकि प्रतिवस्तुपमा शब्द की व्युत्पत्ति है--प्रतिवस्तु प्रतिवाक्याथं उपमा = समान 
धरम हो जिसमे । 

अप्पयदीक्षित ने प्रस्तुताप्रस्त॒तत्व का मिश्रण ओर वेधम्येमूलकता इन दोनों पर ध्यान दिया 


हे किन्तु मालाप्रतिवस्तुपमा के विषयमे वे मी मोन दें, 


पण्डितराज जगन्नाथ ने प्रतिवस्तपमा पर पर्याप्त सूक्ष्मता से विचार किया है ओर इस 
प्रकार लक्षण स्थिर किया हैः- 

'वस्तुप्रत्तिवस्तमावापन्नसाधारणधर्मकवाक्याथैयोराथंमोपम्यं प्रतिवस्तपमा ।? 

-- “जिसमें साधारणधमं वस्तुप्रतिवस्तुभाव से युक्त हो रेते दो वाक्यार्थौका अथै सादद्य 
प्रतिवस्तूपमा । 


पण्डितराज ने वस्तुप्रतिवस्तुभाव को धमे से जोड़कर श्रतिवस्तुपमाः शब्द के परम्परागतः 


अर्थं को बदल दिया है । मालाप्र्तिवस्तूपमा पण्डितराजने भीषखोडदीदहे। विदवेश्वर पण्डित ने 
उसे भी अपनाचियादहे। 
दृष्टान्त से प्रतिवस्तपमा क्रा मेद विमर्दिीनीकारने जिस विन्दु पर किया है उसमे स्व्यं 


सर्वस्वकार का मत कर गया है । सवव॑स्वकार ने वस्तुप्रतिवस्तुपमा को बिम्ब-प्रतिविम्बमावमूक. 


दृष्टान्त से भिन्न किया है । विमदिनीकार इन दोनों भावा को प्रतिवस्तपमा ओर दृष्टान्त को 
परस्पर मँ मेदक तो मान लेते है किन्तु वे कहते दहै किं श्नके आधार परर इन दोनों का उपमा 
से भेद सिद्ध नदीं होता अतः उनका तकं ही मानना उचित हे। किन्तु आस्चयं इस वातका है 
कि सवेस्वकार प्रतिवस्तपमा ओर दृष्टान्त को उपमा ते भिन्न मानते ही नदीं, तव इसे विमर्िनो- 
कार उनके मत के विरोध मे आपत्तिरूप से प्रस्छत केसे कर रदे हं। अथापि इस विषयमे 
तक विम डिनीकार के दी मान्य दहे। 
संजीविनी-कार श्री वियाचक्रवत्तीं ने प्रतिवस्तूपमा का सार संक्षेप इस प्रकार किया है-- 
'असकृदधर्निदेरा इवादेरनुपयहे । प्रतिवस्तपमा ज्ञेया प्रतिवाक्याथैसाम्यतः ॥ 


कक्किर्यक्कक्क्कन 0 आ, क नि अ वयि किक 


= ~ क ब किक नि 2 <~ 


दथ्ान्ताटङ्ारः २६२ 


--यदिं साधारण धमं का निर्दड अनेक वार हदो ओर इवादि-उपमावाचकों का उपादानन 
रहे तो वाक्यार्थं के साथ होने वाङी वाक्याथ कौ उपमा प्रतिवस्तुपमा होती हे। 


[ स्वस्व ] 
[ घ०° २७ ] तस्यापि बिम्बप्रतिषिभ्बभावतया निर्देशे चान्तः । 
तस्यापीति न केवलरमुपमानोपमेययोः । तच्छब्देन सामान्यधमेः प्रत्यव- 
खष्टः । अयमपि साधम्यवेधर्म्याभ्यां द्विविधः । आचो यथा-- 


'अन्धिटेद्गित पव वानरभरैः कि त्वस्य गस्भीरता- 
मापाताकनिमग्नपीवरत नजो नाति मन्थाचलः । 

देवीं वाचपुपाक्षते हि बहवः सारं तु सारस्वतं 
जानीते नितरामसो गुरुक्कटकिटष्टो मुरारिः कविः ॥ 


अत्र यद्यपि ज्ञानाख्य पको धर्मो निर्दिश्स्तथापि न तन्निबन्यनमोपम्यं 
विवद्षितम्‌ । यन्निबन्धनं च विवक्षितं तजाज्विलङ्गनादावस्त्येव दिव्यि- 
वागुपासनादिना प्रतिबिम्बनम्‌ । द्वितीयो यथा- 

छृतं च गवाोभिपुखं मनस्त्वया किमन्यदेवं निहताश्च नोऽरयः । 

तमांसि तिष्ठन्ति हि तावदंद्युमान्न यावदायात्युदयाद्िमोटिताम्‌ ॥° 

अचर निह तत्वादेः स्थानादिना वेधम्येण पतिबिम्बनम्‌ । 


[ सूत्र ] यदि उस [ साधारण धमं] का भी निर्देश बिम्वप्रतिबिम्बभाव से हो 
तो [ वही उपमा ] दृष्टान्त [ कहलाती हे | ॥ २७ ॥ 

[ वृत्ति० ] “उसका भी -का अर्थं यह हुआ कि केवर उपमान ओर उपमेय काद्ी नहीं।, 
यहां उसः-शाब्द का प्रयोग सामान्य धर्म के किए है । यह [ दृष्टान्त ] भी साधम्यं ओर वेधम्यं 
भेद से दो प्रकार का होता है। इनर्मे से प्रथम यथा- 

वानरवीर्यो ने सुद्र लोँध तो च्या किन्तु इसकी जो गम्मीरता है उसे केवल मन्थाचलः 
ही जानता रै जिसका विद्र शरीर उसमे पराताल-पर्यन्त निमम्नदहै। रेसे बहुत लोग हैः 
जो वाग्देवी को उपासना करते है किन्तु इसमे जो सारभूत तत्त्व है उसे केवल सुरारि कवि दी 
जानता है- जिसने युरुकुकर मे कठोर तप किया है ।› 

[ इस पद्य मे देवीं वाचम्‌? के स्थान पर “देवीं वाचम्‌” पाठ छपा हआ मिलता है उसके 
आधार पर इस शब्द का अथं सुरभारती = संस्कृत भाषा कर ख्या जातादहै किन्तु सारं तु 
सारस्वत" के सारस्वतः-पदा्थं से अभिन्न सिद्ध करने के लिट वदँ 'वाग्देवी'-का अथै देने वाला 
देवीं वाचः पाठ ही माना जाना चादिए। स्सस्क्रृत माषाः को तो बहुत लोग पदते है किन्तु 
सरस्वती का पार सुरारि ही जानता है यह्‌ कथन उसी प्रकार असंगत है जिस प्रकार "काष्य- 
प्रकारा तो बहुत लोग पद्ते है पर सादित्य का सार मंहय जानता हूँ" यह कहना। क्योकि 
वक्ता को काव्यप्रकाश के ज्ञान मेँ अन्यो से निज का अतिरेक दिखलाना है अतः "किन्त उसका 
सार में ही जानते हूः यह कहना है । ] 

- यदह यपि [ पृवाद्धं के उपमान वाक्य तथा उत्तराधं के उपमेय वाक्य म ज्ञानार्क एक 
ही श्ञा' धातु के जानाति = जानता है ओर 'जानीतते' = जानता है -इन दो रूपों द्वारा ] साधारण 


2२६ अलङ्कारसवंस्वम्‌ 


धर्मतो एक ही [ अथात्‌ एक ही खाब्द दारा ] दिखलाया गया है ओर वह है ज्ञान, तथापि [ यहं 
ग्रतिवस्तृपमा नहीं है क्योकि | साद्य को उस पर निभम॑र्‌ नहींरखागयादहे, ओर साद्रय को 
जिस पर निर्मर रखा गया हे वद है सयुद्रल्वन आदि, ओर उस्म [ विम्बभूत ] वाग्देवी की 
उपासना ऋ प्रतिविम्बन है ही । 

[ इस प्य में विम्वरभूत सुरारि कवि का प्रतिविम्ब है--मन्थाचरू ओर बहुत राब्द से कथित 
विदाना का प्रतिविस्व हे. वानरवीरोका सञुदाय। येदोनाँ धर्मी-पमीं के चिन्वपरतिविसम्बभाव 
दै । इनके अतिरिक्त याँ विम्वभूत संस्कृत की उपासना का ससुद्ट्वन ओौर तरसे ही गुरुकुलक्लेडा 
का पातालपयंन्त इवना प्रततिविम्व हं । ये दोनों दै धमंगत । विस्वप्रतिविम्बभाव का अथ हे भिन्न 
पदाथा का साद्रयमूलक रेक्य । उक्त पदार्थौ मेँ व गौचित्यसिद्ध है, अतः यद्धं दृष्टान्त की दी 
अलकारता मन्य है | । दूसरा [ वेधरम्य॑मूलक ] यथा-- 

आपने ज्यो ही आपका चित्त गर्वं कीओर घुमायाकि, जौर क्या, हमारे सारे रा्ुनष्टहो 
गए । अधकार तमी तक ठहरता है जव तक मगवान्‌ सूयं उदयाचल से द्ग पर नदीं पदु चते । 

--यदां (नष्ट होना" इसका प्रतिविम्व है पहुंचना" किन्तु वैधम्यं से। [ अर्थाव्‌ ‹ पर्टुचनाः 
आक्षेप दारा भागनेः को खींच काता है जौर तव उसके साथ नष्ट होने का विम्बप्रतिविम्बभाव वन 
जाता है ]। 


विमरिनी 


तस्यापीति | सामान्यधमंस्यापीस्यर्थः ] उपमानोपमेययोरित्ति । प्रृताप्रकृतयोध्मिणो- 
रिस्यथंः। अतश्च धर्माणां धर्मिणां च विम्बध्रतिविम्बभावेन निरदशोऽयमलंकारः । यदुक्त- 
मन्यत्रापि--!ृष्टांतः पुनरेतेषां सर्वेषां प्रतिविम्बनम? इति । उपमानोपमेययोरिति तु 
स्वाथं एव न व्याख्येयम्‌ , अर्थान्तरस्य प्रृतदार्व्यायो पादानात्सादश्याविव चत्र णात्‌ । 
आद्य इति साधम्पंण । यथा वा-- | 

“स्थानेषु शिष्यनिवहेः प्रतिपाद्यमाना विद्या गुरं हि गुणवत्तरमातनोति । 

आदाय शक्तिषु वराहकविग्रकीर्णे ररनाकरो भवति वारिभिरम्बराश्चिः ॥ 

जत्र स्थानादौनां शुक्स्यादिभिः प्रतिबिम्बनम्‌ । यज्निवन्धनं चेत्ति। अर्थालंकारस्वं न 
-युनरौपम्य॒मू । तस्य च समनन्तरोक्तयुक्स्यासं भवात्‌ । 


तस्यापि = उसका ( अर्थात्‌ साधारण धमं का, भी । उपमानोपमेययोः = उपमान ओर 
ओर उपमेय का अर्थात्‌ के प्रकृत ओौर अप्रकृत धर्मीका । इस प्रकार यह सिद्ध हु कि धर्म ओर 
धमीं दोनों के विम्बप्रतिविम्बभाव से निर्दड दी यह अलंकार हे । जेसा कि अन्यत्र [कान्यप्रकाड म] 
केहा गया है-- (हन समी का प्रतिनिम्बन दृष्टान्त. श्दोता हैः । उपमानोपमेययोः = उपमान- 
उपमेय का, इसमे जो उपमान ओर उपमेय शब्द हैः इन्दे इन्दीं के अथं तक सीभित नदी 
समञ्ना चादिए क्योकि य्ह जो दूसरा अथं अपनाया जाता है उसका उद्दरेरय 
केवर प्रकृत अथं की पुष्टि करना रहता दै, साद्द्य की सिद्धि करना नदीं , आद्य = प्रथम 
साधम्यमूखक । [ रत्नाकरक्षार ने इस प्रय में प्रतिवस्तूपमा का संकर वताया है अतः -- इसका 
इसरा उदाहरण यह हौ सकता है - 

'रिष्यगण जव स्थानं पर्‌ [ ठीक दिष्य में | विचा प्रदान करने र्गते हे तो उससे गुरु ओर 
अधिक युणी सिद्ध होते है । [ समुद्र से ] जरू ठेकर मेघ जव उसे सीपांँ रमे बरसाते दै तो उससे 
जलराशि समुद्र रत्नाकर कहलाने क्गता हे ।?-- यहा (स्थानः आदि का (सीपःआदि से प्र्तिबिम्बन 
किया गया हे। [ आदि पदसे शिष्यके प्रतिबिम्ब मेघ, युरु का प्रतिनिम्ब समुद्रः चिदया का 


दश्रान्तालङ्कारः २६५ 


प्रतिविम्ब जक, गुणवत्तरता का प्रतिविम्ब रत्नाकर ] 'यल्निदन्धनं च = जिसके आधार पर, 
यह ओौपम्य के लिए नहीं, अर्थाङ्कारत्व के किए कहा गया है । क्योकि ओपम्य तो अभी अभी 
प्रतिपादित युक्तिसे यदहो समवदही नहींद्येता। [ युक्ति है-प्रकत अथंकौ पुष्टिमात्रके लिए 
अप्रकृत अथं का प्रस्तुतीकरणः, न किं साटृद्य या ओपम्य को तात्पर्य रूप से प्रतिपादित करने के 
किए, इसी तथ्य को प्रतिवस्तूपमा प्रकरण मे अगप्रक्ृतार्थं द्वारा प्रकृताथं का विदादीकरण कहा हे ] । 
विमश्ः--( १) टीकाकार का कथने कि यदो प्रकृत-अप्रङेत केवल प्रकृत-अग्रकृत ही 


रहते है उपमेय ओर उपमान नहो बन पाते क्योंकि दृष्टान्त मँ अप्रकृत अर्थं केवल प्रक्रत अ्थंकी 


पुष्टि के किए आता हे, साटृर्य-सिद्धि के छिए नहीं, अतः स्व॑स्वकार ने जो उपमानोपमेय" चाब्द 
दिया हे उसका अर्थं केवर प्रकृताप्रकृत &† किया जाना चाहिए । किन्तु यदौँ प्रकृताप्रकृत उपमानो- 
पमैय नहीं बन पाते यह्‌ कथन अनुभव विरुद्ध है । विम्बप्तिविम्बभाव एक साधन है साधारण धमं 
की निष्पत्ति का, ओर साधारण धमे की निष्पत्ति का एक फल यदि प्रकृतां की पुष्टिहै तो दूसरा 
उपमानोपमेयभाव कौ निष्पत्ति मौ है । यह अलग बातदहै कि उपमानोपमेयमाव यहाँ प्रकृताथं 
पुष्टि के पीछे रहता हे स्वयं प्रधान नदीं वनता । सच तो यह है कि उपमारुकारमें भी प्रकृत 


जथं क पुष्टि के अतिरिक्त ओर कुछ प्रयोजन नहीं रहता अप्रकृत अथै कौ उपस्थिति का ! 
जेसा कि प्रतिवस्तुपमाप्रकरण मँ बतलाया जा चुका है विमशिनीकार की इस मान्यता का 


खण्डन दृष्टान्त के ही प्रकरणम पण्डितराज जगन्नाथने मी प्रायः श्न्दीं तकौ दारा बहुत ही संरम्भ 
के साथ किया है ओर विदवेश्वर पण्डित ने उनके खण्डन का समर्थन किया है। [ द्र" इष्टन्ता- 
रकारान्तः, अरु० कोस्तुभ ] | 

( २ ) टीकाकार ने थयज्निबन्धनंः का अथं “अ्थाल्कारत्वनिबन्धनंः करना चाहा है किन्तु यदह 
मी मूर के विरुद्ध है । मूल मे “ओपम्यं, विवक्षितम्‌ , यज्निवन्धनं च विवक्षितम्‌" इस आनुपुवीं से 
उपस्थित वाक्य के यत्‌ शब्द का अथं ओपम्य को छोड़ घोर कुछ किया ही क्या जा सकता है । 
फिर प्रतिवस्तुपमा की भूमिका से दौ ग्रन्थकार दृष्टान्त को उपमा बतङाता राद! वहं 
आकर वहं उसे उपमा का अभाव सिद्ध करना चाहता है यह कैसे मान्य । टीकाकार यदि दृष्टान्त 
जर प्रतिवस्तुपमा मेँ अन्तर सिद्ध करने के किए दृष्टान्त मे प्रकृतार्थपुष्टि वतलाना चाहते है तो 
उसमें उपमानोपमेयमाव वाधक नहीं है, अतः उसका निराकरण भी आवद्यक नदीं है ! यदि 
निराकरण भी करना हो तो उन अपनी ओर पे करना चाहिए । उसे यन्थकार या उसके मन्थ 
पर नदीं थोपना चाहिए । बिमरिनीकार की सर्वनाम के अर्थ पर इस मनमानी का उत्तर 
पण्डितराज ने ओर भौ समर्थं शब्दों प्र दिया है । उन्होने कहा दै-- ८५८2 

न चेत्राथेम्‌ ओदनः पकः, यदर्थं च पक्रः स भेत्रः" इत्यादौ द्वितीयपक्वादिज्ञब्दानाम्‌ अध्याहत- 
शाकादिपरत्वे असंगतेः स्फुटत्वात्‌ ।' | | | | 

-- "भात चत्र के लिए नहीं पकाया गया है, जिसके किटि पकाया गया है वह दै मेत्र--इस् 
उक्तिमं जो द्वितीय वाक्य का “पकाया गया' शब्द है वह पूर्वोक्त मात को छोड़ ऊपर से लाए गण 
शाकादि के किए नदीं माना जा सकता । द्रष्टव्य = इष्टान्तप्रकरण, रस्तगंगाधर । 

(३ ) विमरिननी की “उपमानोपमेययोरिति तु स्वाथ एव न न्याख्यैम्‌' यह पंक्ति कदाचित्‌ 
उप००० रिति त्वाथयोरेवेति व्याख्येयम्‌" रेसी होगी । (नः निणयसागरीय संस्करगमें (न) 
इस प्रकार जोड़ा गया है । 

दृष्टान्त का पृवेत्तिहास :-- 

भामह ओर वामन मे दृष्टाम्त नहीं भमिरुता । 

उद्धटः-- इष्टस्याथस्य विस्पष्ट -प्रतिविम्बनिदरानम्‌ । 

यथेवादिपदेः शस्यं बुधैदृष्टान्त उच्यते ॥ ६८ ॥ 


२६६ | अल्रङ्कारसवस्वम्‌ 


यथा--किं चात्र वहुनोक्तेन ब्रज भत्तारमाप्नुदि । 
उदन्वन्तमनासादयय महाननयः करिमासते ॥ &।९ ॥ 


--प्रतिपा्य अथे का विलक्रुल स्पष्ट प्रतिविम्ब अथात्‌ सद्द अथं सादुर्यव।चकः इव आदि रारब्दो 
के प्रयोग के विना उदाहरण के रूप मं प्रस्तुत करना दृष्टान्त-नामक विद्टन्मान्य अल्कार 
हे । यथा-- 

-[ पावैतीजी के ग्रति उसके पिता हिमाचल कौ उक्ति ] अभिक कहने से क्या? जाओ ओर 


अपना पति भप्त कर लो । महानदियां क्या पिना समुद्र को पाए रुकती हे 
सद्रटः- अविशेषः पूवं याट़ङ्‌ न्यस्तो विवक्षिततेतरयोः । 
ताट्ररामन्यं न्यस्येद्‌ यत्र पुनः सोऽत्र दृष्टान्तः ॥ ८।९४ ॥ 


यथा--्वयि दृष्ट एव तस्या नि्वांत्ति मनो मनोभवज्वकितम्‌ । 
आलोके हि सितांशोविकस्ति कुमुदं कुषुद्वल्याः ॥ ८।९५ ॥ 


--विवक्षित-अथांत्‌ प्रस्तुत ओर उसते भिन्न अर्थौ मंसे पदिक जैसा अर्थात्‌ जिस प्रकार के 


युणधमं से युक्त अथं पहले प्रस्तुत किया गया हो वाद मेँ उसी जेसा अन्य अथं यद्वि प्रस्तुत किया 
जाय तौ वह कान्यकला का इष्टन्त माना जाता हे । यथा--वुम्दारे दिखाई देते हयी उसका काम- 
द्ग्ध चित्त शान्त हो जाता है । ठीक ही है, कुमुद्वती का पुष्प कुमुदउज्ज्वल किरणों वाले चन्द्रमा 
के प्रकाडसे हीन खिलता है 


( यहां नायिकाचित्तरूपी जो पदाथ पवाद मेँ प्रतिपादित किया गया उसमे प्रियद्ौनजन्य 
निदृति = दान्ति 7५! रूपी धर्म बतलाया गया । उत्तरां मे ठीक वैसा दी दूसरा अथं प्रतिपादित 
किया गया = चन्द्र के दद॑न से उद का विकसित होना ] इन दोनों वाक्यार्थो मँ नायिका ओर 
ङसद्वती, मन ओर कुमुद, ददन गौर प्रकाशा तथा निर्वाण ओर विकास के बीच परस्पर विम्ब 
मरतिविम्बभाव है अथात्‌ दोनों निदित साम्य द्वारा अभिन्न से प्रतीत होते है ]। 

मम्मट-दृष्टान्तः पुनरेतेषां सर्वेषां प्रतिविम्बनम्‌ । 

यथा--त्वयि दृष्ट ००००० सुधारो ००० कुसुमं कुमुदवत्याः । 

कारिका का अर्थं विमर्दिनी मे अमी अभी स्पष्टहो चुका है ओर उदाहरण का ऊपर प्रदत्त 
रुद्रट के उदाहरण मेँ । 

परवत्तीं आचार्यो मं- 

शो भाकर-[ सू० ]-श्र्तिषिम्बेन शष्टान्तः ॥ १७ ॥ 

[ ब्रु° ]-वाक्यद्वथे धम॑स्य प्रतिविम्बने = विम्बभ्रतिनिम्बभावेनावस्थने आ्थमौपम्यं दृष्टान्तः ।-- 
दो वाक्यों मेँ धमं के विम्बप्रतिविम्बमाव से स्थित होने पर जो आथ गौपम्य होता है उत्ते दृष्टान्त 
कहा जाता हे । 

योभाकर ने अलंकार सवंस्वकार द्वारा उदाहृत 'अव्धिलद्धित एवः-इस पद्य मँ आपत्ति उठात्ते 
ए कहा है कि इसमे वस्तुप्रतिवध्तुमाव भी है क्योकि इस प्यमें ज्ञानरूपी धर्म (जानात्ति' ओर 
-जानीते' इस प्रकार दो असिन्नधावुक क्रियापदोसे ही कथित दहै, दोनों क्रियापदो की प्रकृति 
कदी हे ज्ञानार्क श्ञा' धातु । कदाचित्‌ इसीलिए विम्थिनीकार ने इसका दूसरा भी उदाहरण 
भरस्तत कर दिया है । परन्तु वह॒ भी कोद अच्छा उदादरण नदीं हे । 


अ०यदीक्ितः - स्याद्‌ विम्बप्रतिविम्वत्वं दष्टान्तस्तद च्करतिः । 
त्वमेव कीत्तिमान्‌ राजन्‌ विधुरेव दि कान्तिमान्‌ ॥ ५२ ॥. 


| 


द छान्ताटट्कारः २६७ 


-- यदि विम्वप्रतिविम्बत्व हो तो इष्टान्तालकार होता है। यथा हे राजन्‌ ! कौत्तिमान्‌ केवल 
त॒मदहीदहो । कान्तिमान्‌ केवल चन्दर क्षोतादे। 

दितीय उदाहरण-^देवीं वाचसुपास्ते० । - 

इस पथ्यम रोभाकर द्वारा ददित प्रतिवस्तूपमा के संस्पें का अप्पयदीक्षित प्रतिवाद करते 
ओर अरुकारसवेस्वकार के दृष्टान्तपक्ष का समन करते हए ल्खिते दै- 

नन्वत्र उपमानो पमेयवाक्ययोज्ञानमेक एव धम इति प्रतिवस्त॒पमा युक्ता, मेवम्‌ › अचेतने 
मन्धाचजङे ज्ञानस्य बाधितत्वेन तत्र जानातीत्यनेन सागराधस्तलावधिसंस्पक्षंमात्रस्य विवक्षितत्वात्‌ । 

-- भ्य उपमानवाक्य ओर उपमेय वाक्य दोनों में श्ञानः-रूपीएक ही धर्म [एकी 
दाब्द से कथित ] है अतः यहाँ प्रतिवस्तृपमा माना जाना उचित है [ यह जो अलंकाररत्नाकर-कार 
का पक्ष है वह आपततः तो ठीक लगता है ] किन्तु तथ्य वेसा नहीं है । मन्थाचरु अचेतन है, 
अतः उसमें ज्ञान अपने वास्तविक अथै में बाधित हे, अतः उसके साथ ज्ञान का विवक्षित अथं यों 
समुद्र का तलस्पर्ल॑मात्र है 1 

वस्तुतः अलंकाररत्नाकर द्वारा प्रस्तुत आपत्ति अपरिहायं है अतः इसका कोड प्रतिवाद नहीं 
करिया जाना चाहिये । स्थिति यह है कि दृष्ट।न्तलकार का ठेसा उदाहरण जिसमे वस्तुप्रतिवस्तुभाव 
का संस्पश्ये सवान दो, मिलना कथिन है । शोभाकर ने भी भापत्ति प्रतिवस्तपमा के सस्पदयं 
पर नहीं की है । उन्होने आपत्ति की हे प्रतिवस्तूपमा के श्रचुरतर' संस्पशे पर । उनकी पंक्ति है- 
देवीं वाचम्‌०› इत्यादो प्रतिवस्तपमया सहास्य प्रचुरतरः सङ्करः ।› प्रतिवस्त्पमा के सामान्य स्पश 
सेतो न दसोमाकर के ही दृष्टान्तोदाहरण सुक्त है ओर न स्वयं अप्पयद्यीक्षित के । स्वयं विमरिनी- 
कार ने जो नवीन उदाहरण स्थानेषु शिष्य० आदि दिया है उसमें मी प्रत्तिपायमानत्वः ओर 
विप्रकीणन अथेतः एक ही धमं हें । अप्पयदीक्षित भी (जानात्ति-को क्षणिक भङेदही बतलादे 
किन्तु लक्षणा द्वारा 'तलस्पदौ' अथं लाकर मी वे ्ञानरूपी' अथं को सवधा दूर नहीं रख सकतेः. ` 
तट को गंगाशाब्द से कहने पर तट मेँ गंगात्व प्रतीत ्ोताही रै, 


पण्डितराज जगन्नाथ- [ सूत्र ] प्रकृतवाक्याथघटकानासुपमानादीनां साधारणधम॑स्य च विम्ब- 

प्रतिनिम्बभावे दृष्टान्तः" । 

[ इत्ति | "अस्य चालकरारस्य प्रतिवस्त॒पमया भेदकमेतदेव यत्‌ तस्यां 
धर्मो न प्रत्तिविभ्वितः, किं तु शुद्धसामान्यात्मनेव स्थितः, 
इह तु प्रतिबिम्बितः 

[ सू० ] प्रकृत वाक्याथै के [ उपमेय आदि] सभी अङ्ग उपमान आदि साधारण धमं 
इन सवका विम्बप्रतिविम्बभाव दौ तो दृष्टान्त होता हे । 

[ इत्ति ] इस अलंकार का प्रतिवस्तुपमा से भेद केवल यष्टी हे कि उसमे धमे प्रतिनिम्ब नहीं 
वनता, वह शुड सामान्यरूप ही रहता ह जब कि इस [ दृष्टान्त ] में वहु [ धमं ] मी प्रतिविम्बित 
होता दे । 

विश्वेश्वर पण्डित-[ का० ] साधारणस्य साम्यप्रतियोग्यनुयोगिनोयंत्र । 

निदेशः स्याद्‌ विम्बप्रतिविम्बतया स दृष्टान्तः ॥ 


[ वृत्ति ] बिम्बग्रतिबिम्बमावेनैव यत्र॒ साधारणधर्मस्योपमानोपमेयदिि उपादानम्‌, न 
त्वेकत्वम्‌ › स दृष्टान्तः । प्रतिवस्तूपमाया तु एकस्यैव वारदयं प्रयोगान्नातिव्या्धिः । 

[ का० |-साधारण धम ओर साद्य के प्रतियोगी [ उपमान ] तथा अलुयोगी [ उपमैय | 
इन सवका विम्बप्रतिविम्बभाव से निदंश हो वह दृष्टान्त । 


२द८ अल्छङ्ारसवेस्वम्‌ 


[ वृति | जरह साधारणधम का उपादान मी उपमान ओर उपमेय के समान विम्बप्रति- 
विम्बमावसेदहो,न कि वह एकदहीहो, वह दृष्टान्त । प्रतिवस्तुपमा मँ एक ही साधारण धर्म॑ 
कादोवार प्रयोग होता दै अतः इष्टान्त का लक्षण उसमें काग होने से वच जाता है, 

विद्वेखवरपण्डित ने दृष्टान्त दाब्द की व्युत्पत्ति मी इस प्रकार दे दी है- 

--इष्टो ज्ञातप्रामाण्यकः अन्तो दारष्टान्तिकवाक्यार्थनिश्वयो यत्रेति व्युत्पत्या प्रकृतवाक्यार्थ- 
म्रतिपाचकायैकार भावे यद्ये तद््रादकौभूतान्वयन्यतिरेकयोय्ोत्तर वाक्यार्थो इ्टान्तत्वेन पर्यव- 
स्यति स इत्यथः ॥ 

- नदो दष्ट हो अथात जिसका प्रामाण्य जाना जा चुका हदो ेता अन्त = अन्तिम दार 
न्तिक = प्रस्तुत = उपमैयभूत वाक्यां हो जिसँ वद दृष्टान्त । इस व्युत्पत्ति के आधार पर अर्थं यह 
निकला कि दृष्टान्त में परकृत वाज्या्थ मे विवक्षित कार्यकारणभाव साध्य रदता है ओर उसके 
साधक जो अन्वय-व्यतिरेक होते हैँ उनकी पुटि दृष्टान्तरूप उत्तरवाक्या्थं से दतती है । 
् र महामहोपाध्याय गोविन्द ठक्कर ने दृष्टान्त चाब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार 

दृष्टोऽन्तो निश्चय उपमानिर्वाहकोऽत्रालङ्कार इति । 
- रेखा गया अन्त अर्थात्‌ निश्चय अर्थात्‌ उपमानिर्वाहक द्यी यद्य अलंकार हे ।? 
काव्यप्रदीप के टीकाकार नागे ने अपने उदोतमें प्रदीप कीञक्त पंक्तिकाजो स्पष्टीकरण 
दिया हे उत व्यवस्थित रूप वामन ज्ललकीकर न इस प्रकार दिया ३-- 
वत्र दष्टान्तवाक्येन दा्टान्तिकवाज््यार्थनिश्चयस्य प्रामाण्यग्रहो मवति स इृष्टान्तनामालङ्कारः ।' 
“जहां दष्टन्त वाक्य के द्वारा दाष्टान्तिक वाक्यार्थकै ज्ञान में प्रामाण्य बुद्धि जागती दै वह 
दता हे इष्टान्त नामक अलङ्कार | | 
काव्यप्रकाड की एक अन्य दीका विवरण के रचयिताने भी-दृष्टान्त शाब्दपर यह निरुक्ति 
दी है- 
निश्चयः प्रस्तेतस्या्थैस्य निःसदेदा प्रतीतिः, सोदाहरणवाक्येन प्रतिपायमानो ह्यर्थो हेत्वा- 
काक्षानिदृत्या असंडायमेव प्रतीयते । तदियं संज्ञा योगरूढिः । 
~ -[ कान्यप्रका्कार ने दृष्टान्त को दृष्टोऽन्तो निश्चयो यत्र स इष्टान्तःः--यह जो उ्युत्पत्ति 
दी है इसके ] निश्चय शब्द का अर्थं है प्रस्तुत अर्थं की सन्देह रदित अर्थात्‌ प्रामाण्यपूर्णं प्रतीति । 
वात यह हे कि जो विषय सोदाहरण काक्य द्वारा प्रतिपादित किया जाता है उसकी प्रतीति 
म कोद संदाय नीं रहता, क्योकि उदाहरण देने से देठ [क्यों] को जिज्ञासा शान्त हो 
जाती हे। | 

इस प्रकार अलंकार अथं मं धषटान्त'-संकज्ञा योगलूढ दै । हमं इछ ेसा लगता है कि दृष्टान्त 
रब्द मँ अन्त राब्द ठीक वैसे सौन्दयं का वाचक है जैसे वनान्त मँ ओर दृष्ट शब्द का अथं है 
अनुमूत वस्तु । किसी अनुभूत वस्तु मँ साम्य के कारण सौन्दयै आ जाता है। इस प्रकार दृष्टान्त 
का सीधा अथ॑ प्रस्तुत अथं जेसी होने से खन्दर कोडं अन्य वस्तु । इस प्रकार एक स्थापना जहाँ 
विलकुर उसी जेसी किसी अन्य अनुभूत घटना के विशिष्ट प्रस्तुतीकरण द्वारा पुष्ट कौ जातौ दै, 
तो वहाँ अल्कार को षटन्तः-दब्द द्वारा असिदहित करना उचित ही है । 

श्रीविचाचक्रवत्तीं ने इसका सारसंक्षेप इस प्रकार किया हे-- 

"विम्बानुविम्बन्यायेन निदेशे धमेधर्मिणाम्‌ । 
द्टान्तालच्छरतिक्ञया भिन्नवाक्यार्थसंश्रया ॥' ५ 


निद्दोनाल्ड्गारः २६९ 


--धमे ओर धमीं दोनों का निदेरा यदि विम्बप्रततिनिम्बन्यायसे होतो अल्कार इष्टान्त कहा 
जाता हे ¦ यह दो भिन्न भिन्न वाक्यार्थो परर निर्म॑र रहता है। 

विन्व ओर प्रतिविम्ब दोनों भिन्न होते हैँ क्योकि उनके अधिकरण भिन्न होते है जैसे शरीर. 
गत सुख ओर उसका दपणगत प्रतिविम्व ! एक का अधिकरणै दासीर ओर दूसरे का दपण) 
अभिन्न वस्तु एक साथ दो भिन्न भिन्न अधिकरणं मे नदीं रह सकती । किन्तु भिन्न हदोनेपर भी 
विम्ब का प्रतिविन्व मं इतना साद्दय रहता हे कि उन्दः आपाततः अभिन्न ही कहा जाता है। 
सुख के प्रहिविम्ब को प्रत्येक व्यक्ति भेरा सुख" ही कहता हे । वस्तुतः विम्बप्रतिविम्बभाव समान 
धर्मसंबन्ध, या साद्रर्य का ही एक विरिष्टं रूपै जिसमे एक साडृदय दूसरे साद्रर्य का 
निष्पादक होता हे, ओर निष्पादक साई य निष्पाय साद्य कौ निष्पत्ति साक्षात्‌ न कर अपने 
से विशिष्ट पदाथा मे प्रातीतिकं अभेद निष्पन्न करा परम्परया कराता है । इस प्रकार निष्पा् 
साद्रर्य मं साधारण घम बने पदाथ भी निष्पादक साट्दयरूपी धमे से युक्त होकर तो धमी वन दही 
जाति हे उनम स्वगत अन्य अक्ताधारण विशेषताओं का मी अस्तित्व प्रतीत होता रहता है अतः 
उनको बृष्टित्ेमी वे धर्मी होते हं । यदि यह्‌ कदा जाय तो कदाचित्‌ इष्टान्त का रहस्यभूत 
तत्व अधिक निकट से परखा जा सक्या किटृष्टान्त में साधारण धम मी धर्मरूप दही रहता है, 
इसमें उपमावाचक पद्‌ का प्रयोग नहीं रहता साथ ही उपमानोपमेयमाव के अनुयोगी-प्रतियोगी 
वाक्याथ ही रहते हें । 

[{सवस्व | 
[ छ २८ ] संभवताऽसंभवता वा वस्तुसबन्धेन गम्यमानं प्रति- 
चिम्ब्रकरणं निदञ्चेना । 

प्रतिबिम्बकरणप्रस्तावेनास्या लक्षणम्‌ । तच कचित्संभवन्नेव वस्तु- 
संबन्धः स्वसामथ्योद्धिम्बप्रतिबिम्बभावं कट्पयति। क्चिच्पुनरन्वयवाधाद्‌- 
संभवता वस्तुसवन्धेन प्रतिविम्बनमाक्षिप्यते ¦ तत्र॒ संभवद्वस्तसंबन्धा 
यथा- 


“चूडामणिपदे धत्ते यो देवं रविमागतम्‌ । 

सतां कायातिथेयीति बोधयन्‌ गरहमेधिनः ॥ 
अच्च बोधयन्निति णिचस्तत्समर्थाचरणे प्रथोगात्संभवति वस्तसंबन्धः । 
असंभवद्स्त संबन्धा यथा- 
“अव्यात्स वो यस्य निसगवक्रः स्पृदात्यधिञ्यस्मरचापटीकाम्‌ । 
जडापिनद्धोरगराजरत्नमरीचिीढोभयकोटिरिन्दः | 
अश्र स्मर्चपसंबन्धिन्या टीलाया वस्त्वन्तरभूतेनेन्दुना स्परानमसंभ- 

वीटां खद्ामवगमयतीत्यद्‌रविध्रकर्षास्प्रतिविम्बकट्पनुक्तम्‌ । 

[ सूत्र | वस्तुओं [ पदार्थो अथवा वाक्यार्थो ] ॐ [ बीच उने ] संभव अथवा 


अक्ंभव संबन्ध से प्रतीयमान प्रतिबिम्बन निदद्चना [ नामक अरंकार 
कहराता है | ॥ २८ ॥ 


[ वत्ति । इसका लक्षण यहाँ शसक किया गया क्योकि याँ प्रततिकिम्ब का प्रकरण चला 
हमा हे । यद कदं तो पदार्थो का संबन्ध संमव रहता है ओर वह अपनी शक्ति से विम्ब-प्रतिविम्ब- 


६४ अलङ्लारखवंस्वम्‌ 


भाव को निष्पन्न करता ह । किन्तु कदीं कदी अन्वय वाधित हौ जाने से वह वस्तुसंवन्ध असंभव 
होता हुआ प्रतिविम्बन का आक्षेप करता दे। दोनों में से प्रथम का उदाहरण जिसमें वस्तुसंवन्ध संभव 
होता ३ै--“जो [ पवत ] अत्ति के समान आए हए भगवान्‌ सूयं को चूडामणि के स्थान पर धारण 
करता है, गरहरस्थो को यह वताते इए कि सत्पुरुषं का आतिध्य करना ही चादिए ।" 
ध्या बोधयन्‌ = बतलाता इभाः यह जो णिच = हेत्वथैक प्रत्यय दै इसका प्रयोग वेसा 
करने मे सदायकः होने अथं में हआ है, अतः वस्तुसम्बन्ध संभव है । [ कुबल्यानन्द चन्द्रिकाकार के 
` अनुसार समथाचरण = सामथ्यांत्पादन, पव॑त गरहस्थं मेँ आतिथ्य धर्म के बोध के सामथ्यं की उत्पत्ति 
म सहायक हो ही सकता दै, अतः बोधयन्‌" दारा ज्ञापित बोध सामथ्योत्पादन मेँ सदायकता पक्त 
मे संमवदहीहं। ्‌ 
दूसरी का उदाहरण जिसमे वस्तुसम्बन्ध असंभव रहता है-- वे भगवान्‌ रांकर आप की रक्षा 
करे जिनका निसर्णवक्र [ स्वभावतः टेडा ] तथा जटाजूट में वधे नागराज की फणामणि की किरणों 
से स्पृष्ट दोनों नांक वाखा चन्द्र कामदेव के प्रत्युचा चदे धनुष की रोमा को किंचिच्‌ धारण करता 
हे ।› [ कल्पना कीजिए कि टेदी चन्द्रकला ओर नागराज का फण दोनों जटाजूट के वीच वरावरी 
वरावरी पर स्थित है ओर नागराज की फणामणि से निकल्ती ओर टेदी होकर सीधी फकती 
किरणें चन्द्रकला कौ दोनों नोक ह्रूती हें । इस प्रकार चन्द्रकला का वांस के समान गोलाकार 
नेवा बिम्बवृत्त धनुष बन जाता है। वड़ा ही विम्बय्राही चिघ्रण ₹ै।] 

--इस पद्याथे मेँ उक्त कामचापकीद्योमा का कामचाप से भिन्न [ वस्त्वन्तर ] चन्द्रमा द्वारा 
क्रिचिद्‌ मी धारण किया जाना संमव नदीं है । [जिसका धम उसी के ही पास रहेगा, उत्ते उससे भिन्न 
व्यक्ति नहीं अपन। सकता ] अतः यहो यह अथं निकलता है कि चन्द्रमा कामचाप की दोभा के 
समान ओोमाको धारण करता दै। इन दोनो कौ चोभाओं मँ अभिक दूरौ नदीं हे अतः [ निदशेन 

लक्षण मे ] प्रतिविम्ब-कस्पना की वात की गईं हे । 


विमरिनी 


संमवतेत्यादि । विम्बग्रतिविम्बभावमिति उपमानोपमेयस्वभिव्यथः। धर्मधर्मिणोरसेदो- 
` पचारात्‌ । एवं चानत्र निद्ङनायां सादश्याविनाभावः । तेन- 

प्रभाते प्रच्छृन्तीरनुरहसतव्रत्तं खहचरीनंवोढा न चीडामुकुकितम्रुखीयं कथयति ¦ 

कखिन्तीनां पस्त्राङ्करमनिक्मस्यास्तु ङचयोश्वमस्कारो गृढं करजपदमासां प्रथयति ॥ 
इत्यादौ संमवस्यपि वस्तुखंबन्धे प्रथनस्योपभ्याभावान्न निद्‌्ंनारंकारस्वस्र्‌ । अने 
नेव वस्तसंबन्धस्य संभवासंमवाभ्यामस्या सेदद्वयमप्युक्तम्‌ । तदे वो दाहरति--चूडामणी 
त्यादिना । तव्समर्थाचरणे प्रयोगादिति "कासेषोऽध्यापयतिः इव्यादिङदत्‌ । अभ्यागतध्य 
रवेर्भिरिणा शिरसा धारणं तच्छमर्थाचरणम्‌ । अतत एवात्र बोधयन्निति णिचस्तव्खमर्थां 
चरणे प्रयो गान्मयेव अवदि भरप्यत्तिथिसपर्या कार्येति वंभवत्घंबन्धमूकसन्राथंमो पम्यस्‌ । 
एवं च पर्व॑तस्य बोधनक्रियाकवृस्वासंभवादेवाभिमन्तृव्यापारोपारोदाभावान्नात्र प्रतीय. 
मानोस्वेक्धा \ नापि स्थ्रव्यरंकारः । गरहमेधिनां पवंतकवतकस्य सद्विषयातिथ्यवोधकस्वस्य 
वाक्यार्थस्वात्‌ । तन्न हि खदशद्‌ च नाद्स्त्वन्वरश्य स्खतिभंवति । नचान्न गहमेधिनां रवि- 
दशनादतिधिष्शतौ कर्वसवम्‌ । तेषां खद्‌ातिथ्यक्तंब्यताया बोध्यस्वात्‌ । नाप्यत्र रविणा 
तिथेरतिथिना वा रवेः साम्यं विवक्सितम्‌ । अपि तु मयेव गृहमेचिभिरपि सतामातिथ्यं 
कार्यमिति । अत एव नात्र वस्व्वन्तरकरणाध्मापि विश्ञेषारंकारः । तपनावगमेऽतिथ्या- 
 देरसंभाग्यस्यावगमो जात दइष्येवमास्मिकायाः प्रतिपत्तेरभावात्‌। अतश्च सस्यघ्ति वा 


निदरोनालङ्ारः २७१ 
ङ्ध 


संबन्धे निदशनेति वाच्यस्‌ । तेन यथोक्तमेव सेदद्वयं स्याद्‌ ! असंमवदिति । धर्भ्यन्तरस- 
चन्धिनो धमेस्य धम्यन्तरेऽन्वयायोगात्‌ । अदूरविप्रकर्षादिति । धमं खेन सादश्यस्य किंचि. 
रप्रव्यासश्व्वात्‌ । यथा वा- 


अङ्गे पुअं अहरं सवेपिञं जंपिअं ससिक्कारं । 
सभ्व सिसिरेण कञअ जं काञजव्वं पिञजञअमेण ॥ 
अन्न वररूभकायंस्य पुरकादेर्धम॑श्य वरस्त्वन्तरभूतेन शि्जिरेण करणमसं भवत्तस्य 
साम्यम तगमयतीति शिशिरस्य बल्कभवुल्यताप्रतीतेसैपम्यम्‌। अतश्चाच्र धर्माणामसंबन्धात्‌ 
निदरानेप्युक्सवा प्रतिमारुंकारत्वं न वाच्यम्‌ । प्रतिमायाश्चान्यो दाहरणेष्वरकारान्तरा- 
वियोगः स्फुट एवेति न पृथगलंकारस्वं वाच्यस्‌ । एवमन्येषामपि समय्ाणामभिनवा- 
ंकाराणां चान्येरन्यारुकारयोगो योजयिरं शक्य एवेति अन्थविस्तरभयादस्मदर्थने तद्दू- 
 षणोद्धारस्येव च प्रतिन्ञातस्वादस्माभिः प्रातिपदेन न दूषितम्‌ । न पुनरेतावतैव परमत 
मम्रतिषिद्धमनुभतमेवेति दशा एषामपि पृथग कारस्वं युक्तं मन्तव्यस्‌ । 


संभवता--इत्यादि । बिम्ब प्रतिबिम्बभावम्‌ = विम्बप्रतिविम्बमाव को अर्थात्‌ उपमानोपमेय- 
भाव को एेसा इसलिए कि ध्म ओर धर्मी में ओौपचारिक अभेद माना जातादहै। ओर इस प्रकार 


सिदध हआ कि निदरान मे साटृर्य रहता ही दहै। इसक्ि [ मल्काररत्नाकरकार का यह कथन 
मान्य है कि-- ] 


-- | प्रथम मधुयामिनी वीतने पर ] सवेरे जब सहचरियां = सखियां एकान्त [ रायनागार | 
की बाते पूचती है तो नवोढा का चेहरा = सुखमण्डल लाज से सुखित हो जाता है ओर वह कुछ 
मी कह नहं पातौ विन्तु प्रतिदिन पत्रावली बनाने के कारण इसके उरोजों से परिचितवे 
सखियां आज इसके उन्दी उरोर्जो मँ चमत्कार [ पूलापन ] देखती है तो उससे उन्दै विदित हो 
जाता है भाज प्रिय ने उन पर नखक्षत किएरहैजो चोलीमे दवे है 

यहां जोर से भन्य स्थल मै भले ही श्रथनः = "विदित कराना, = [ चमत्कार आदि ] 
संभव हो तथापि, जेसा कि अलंकाररत्नाकरकार ने मी कहा है यद्यं साद्रर्य नहीं है अतः निदस- 
 नालुकार नीं हे । इसी वक्तव्य से इस अलंकार केवे दो मेद मी अन्धकार ने बतला दिए जिनमे 
से एक मं वस्तुसम्बन्ध संभव दोता हे ओर दूसरे म नदीं । इन्दीं को उदादरण द्वारा स्प करते 
है--च॒डामणि० इत्यादि । तर्समर्थाचरणे प्रयोगात्‌ = वैसा कर सकने मथवा वसा करने मे 
समथ आचरण अथ में प्रयोगः । यदह ठीक वैसे दोगा जेते कण्डे की आग पट्वा रही है-मयोग 
मे दोता है [ जथात्‌ दोनों स्थलों म पर्व॑त तथा अग्नि इन द्ोर्ना अचेतन कत्तं में बोधन तथा 
अध्यापन का काय लक्षणया उपपन्न ह्‌।ता है | । पव॑त मे समथ आचरण है जभ्यागत रविका 
सिर पर धारण करना । [ समर्थाचरणः की व्याख्या आगे दिए उद्भट के निददाना-निरूपण में 
देखि । इसीरिए अथात्‌ प्वोधयन्‌ = वतलाता हभ.- इसमे आए णिच = प्रयोजका्थक अत्यय 
का प्रयोग होने से यहाँ यह एक आं साद्श्य निकलता है कि भ्रेरेद्यी सानं आप सवकोभी 
भतियि-सत्कार करना चाहिए, इममे वस्तुसम्बन्य संमव है अर्थात बन सकता हे, अक्तमवया 
बाधित नदीं है। ओर श्सीकिए यहां प्रतीयमान उत्प्रेक्षा नहीं है क्योकि वह्‌ तब हेती जव पर्व॑त 
स्वयं बोधन क्रिया का कत्तं बन न सकता जौर तदर्थं उस पर उस्तकी अधिष्ठात्री देवता का 
आरोप किया जाता [ जेते वेद मँ "नदियों बोलीं कदे जने पर जड़ नदियों की देवियोंका 
भारोप कर किया जाता है जिन्हे नचथिष्ठात्री देवता कहा जाता हे ] । क्योकि पर्व॑त बोधन-क्रिया 
-का कत्त वन सकता दै अतः उस पर उसकी अधिष्ठात्री देवता का आरोप नदीं शो पाता यँ 


` 1 ## 


२२७२ अलङ्ारसवेस्वम्‌ 


[ अरुकाररत्नाकरकार ने प्रतीयमान स्मरणाक्कार का स्पद्यो वतटाया है ओर कहा दै क्योकि 
यह लोक सुनते दी जीवन में कमौ अत्िथि-सत्कार कर चुके व्यक्ति को पने किये हुए अत्तिथि- 
सत्कार का स्मरण आ जाता 8 किन्तु वह ] स्मरणाल्कार भी नदीं हे क्योकि यर्दा पद्यवाक्य का 
सुख्य प्रतिपा है “पर्व॑त दारा गृहमैधियोः को गृहागतं सत्पुरुष के आतिथ्य का वोध कराना, 
जव कि स्मरणाठंकार मे जो स्मरति होती है वह समान वस्तु के दिखाई पड़ने ते याद आई किसी 
अन्य की वस्तु की दह्ोती है [ आप वत्तला रहेहं कि गृहस्थो को उनके द्वारा किए गए आतिथ्य का 
स्मरण आ रहा है किन्तु ] यहाँ गरदस्थों को चुयेददोन से संमव अतिथि-सत्कार का कन्त नदीं 
बतलाया जा टदा, यदहो तो उन्हें सत्पुरुष के आतिथ्य का संबोध्य वतलायाजारहादहे। नतो 
यँ सूयं के साथ अतिथि का या अत्तिथि के साध सूय का कोडं साम्य हौ विवक्षित हे । जो विवक्षित 
है वह केवल इतना ही कि भैरे समान गरहरस्थो को मी सत्पुरुषो का आतिथ्य करना चादि ।' 
इसीलिए यँ [ एक वस्तु का निर्माण करते-करते ] (दूसरी वस्तु का भी निमांण-` एतद्रंप जो 
विद्ेषालद्भार है वद भी सम्भव नहीं है क्योकि यहां यद बोध नदीं होताकिसूय॑काज्ञानदोतेदी 
अतिथि आदि असंभाव्य व्यक्तिकामी ज्ञान शो गयाः! इस किए यही कहना उचित है कि 
सम्बन्ध कै संमव या असंमव होने से निदरनादी है। इसचिणए निदरयना के केवर दो ही भेद 
दमि जेसा कि कहा गया हे । | 
'असंभवद्‌ = वस्तु के साथ सम्बन्धके न वननेसे'। इसलिए कि दूसरे धमी के ध्मका 
सवन्ध दूसरे धर्मी से वन ही नहीं सकता । 
अदूरवि प्रकर्षात्‌ = दूरी कम होने से-शमं के दवारा संभव साद्रद्य के कुच पास रहने से \ 
अथवा दूसरा उदाहरण :- 
“अङ्गे पुलकम्‌ अधरः सवेपितो जस्ितं ससीत्कारम्‌ । 
सवं शिरिरेण कृतं यत्‌ कत्तेव्यं प्रियजनेन ॥" 


-शछरीरमें रोमांच है, अधर में कम्पनदहै, ओर बोल्नेमें सीत्काररहै। इस प्रकार शिदिर 
ने वह सव कायं करदियादहैनजो प्रिय के द्वारा किया जाना घाहिए ।' 

यर्दा पुलक दि धमं प्रिय के कायं हैं उन्हें निष्पन्न होता हआ वतलाया जारहादहै 
प्रिय से भिन्न शिदिरके द्वारा वह असंमव है अतः वह प्रियकाय॑जेसे कायै का ज्ञान कराता है 
ओर तव प्रतीति होती है कि "दिदिरभ्रिय कै समानदैः। इसक्िएि य्ह वाक्याथ साद्र्यमें 
पयंवसित होता है । [ इस गाथा = अगे पुलकम्‌" मे अल्ंकाररत्नाकरकार ने प्रतिमानामक एकः 
नवीन अल्कार माना है। उसका लक्षण दै “अन्यधर्म॑योगाद्‌ आथेम्‌ ओपम्य्‌ प्रतिमाः = एक वस्तु 
का दूसरी वस्तु से जथं-साम्य दो उस वस्त के धमै के इस वस्तु म॑ संबन्ध दोने से, तो वह साम्य 
प्रतिमा ह्येता हैः । इस गाथा के वाक्याथं की स्थिति रेस्ती ही हदं अतः यहां प्रतिमाल्कार संभव हे । 
विमरिनीकार इसका प्रतिवाद करते गौर कते हैं ] क्योकि उक्त क्रम से इस गाथाम निद्चना 
है शसक यद नहीं कदा जा सकता कि धह प्रतिमालङ्कार है निदद्यना नहीं ओर निदर्ना 
का अमाव बतलाने कै ल्ि यह हेतु नदीं दिया जा सकता किं निदरोना में एक कन्दर धमका 
[ दूसरे मे ] संबन्ध नहीं रहता जव कि यहाँ [ प्रिय के धमे का शि्चिर मेँ संवन्ध ] है-' [ शवर्माणा- 
मसम्बन्धाभावान्न निदद्लना-? अलंकाररत्नाकर, प्रतिमाल्कार को आरम्मिक वृत्ति ] कारण कि 
प्रतिमा कों स्वतन्त्र मरंकार नदीं है । उसवै [ आपने ] जो ओर दूसरे उदाहरण दिए हैँ उनमें मी 
स्पष्ट ही अन्यान्य मल्कारो का अभाव नींद) अव हमारे द्वारा प्रस्त॒त इस क्रमसे दूसरे 
समीक्षक [ अलकाररत्नाकरकार द्वारा स्थापित ] अन्य सभी नवीन अलंकारो मेँमी दूसरे प्राचीनः 


निद्‌शोनाटङ्कारः २२.७३ 


अलंकारो का अस्तित्व वतला सकते है इसछ्िण हम एक-एक कर, उन सव प्र अपनी ओर से 
दोष नहीं दिखला रहे हे ' रेसा करने मेँ मन्ध के विस्तार का मय है ओर हमते प्रतिज्ञा भी केवल 
यही कीट किहम उनकेहमारौ सौीमामेंअएदोर्षोकादही निराकरण करेगे। किन्तु हम दोष 
नदीं दे रहे हं इसलिए ^दूसरेका दूसरे को मत मान्य है यदि उसने उसका खण्डन नीं किया 
इस सामान्य धारणा के आधार पर [ अल्काररत्नाकरकार द्वारा प्रतिपादित] प्र्तिमातिरिक्त 
अन्यु नवीन अल्कार हम स्वतत्र अल्कार के रूपमे मान्य हैरेसा मान वैठना ठीक नहींहोगा। ` 
| सवेस्व | 

प्रापि पदाथवाक्याथंच्त्तिमेद्‌द्‌ द्विविधा पदाथेच्चत्तिः समनन्तरमुदा- 
हृता । वाक्याथेन्नत्तियेथा- 

५ त्वत्पाद्‌नखरत्नानां यद्‌ कक्तकमाजनम्‌ । 

इदं श्रीखण्डटेपेन णाण्डुरीकरणं विधोः ।' 

केचित्त द्न्तालंकायेऽयमित्याहुस्वदसत्‌ । निरपेश्षयो वौक््याथेयोरहिं 
विम्ब प्रतिविम्बभाबो इदन्तः । सखन च प्क्कते वाक्याथ वाक्याथौन्तर- 
मारोप्यते सामानाधिकरण्येन तच्च संबन्धादुपपत्तिमूत्ा निदशौनेव युक्ता 
न दष्ान्तः । पवं च- 

“शयु दान्तदुठेभमिदं बपुयाश्रमवा्िनो यदि जनस्य । 
दूरीकृताः खदु गुणेख्यानटता वनलताभिः ॥` 

दइत्यत् द्ान्तवुद्धिने कायौ । उक्तन्यायेन निदरनाभाक्ेः । 

यह्‌ [असभवदवस्तुसंवन्धा निदराना] मी दो प्रकार की होती हे पदाथेगता तथा वाक्याथगता 1 
दोना मे से पदाथगता का उदाहरण अमी दिया) [ अव्यात्‌ स वः० ] वाक्ष्यार्थगता का उदाहरण 
यह दै- 


ठम्दारे प॑र के [ पद्यराग या पुष्पराग ] मणियो के समान [ लार खाल ] नाखून का अक्ते 
सेजोरगाजाना हे यह सफेद चन्दन का ङ्प कर चन्द्रमा का सफेद किथा जाना है) 

दुख विदानो ने कहा हे कि यहाँ दष्टान्ताकुकार है । किन्तु वह ठीक नीं दै। इष्टान्त वहं 
होता है जँ दो निरपेक्ष वाक्यार्थो में विम्बप्रत्तिविम्बभाव रहता है । जहाँ प्रकृत वाक्यार्थ पर 
अन्य वाक्याथ [ सोऽहम्‌ आदि के समान] सामानाधिकरण्य [ नखमाजन विधुरेपन दै- इस 
प्रकार अभिन्नरूपता | दवारा मारोपित किया जाता है वहोँ संबन्ध संभव नहीं होता । अतः तन्मूलक 
[ साटृर्य मं पयैवसित होने वाली ] निदरना ही यहाँ मान्य हे दृष्टान्त नदीं । इसी प्रकार- 

| शाङ्न्तला को देख दुष्यन्त कौ स्वगत छक्ति ] हमारे अन्तप्पुर में दरम यह रदारीर यदि 
आश्रमवासी जन का प्राप्त है तव तो उद्यानरूताओं को वनल्ताओं ने अपने गुणों से ओञ्च कर 
दिया ।` [ शाकुन्तरू |] 


-- यदह । इष्टान्त नहीं समज्ञ बैठना चादिए क्योकि उक्त हेतु से यहो भी निदर्ष॑ना ही 
प्राप्त हे। | 


विमरशिनी 


एषेत्यसंमवद्वस्त॒संबन्धनिबन्धना। न केवरं निदर्शना यावन्तद्‌ेदोऽप्ययं द्विविध 


द्यपिशभ्दाथः । उदाहृतेति (जष्यासस वः, इष्यादिना । केचिदिति श्रीमम्मटादयः। 
१८ अ० सं० 


२.७७ अलङ्ारसवेस्वम्‌ 


तदिति दष्टान्तारंकारवचनमस्न्‌ । एतदन्यत्रापि योजयति- एवमित्यादिना । उक्तन्यायेनेति 
प्रकृुतवाक्यार्थ वाक्यार्थान्तरस्य खामानाधिकरण्येनाध्यारोप्यमाणत्वात्‌ । अतश्चान्यवाक्या- 
थ॑योः सामानाधिकरण्यनिद्‌ शाच्छरी तारोपसद्धावेन वाक्यार्थंरूपकं यदुक्तं तत्तावदास्ताम्‌ + 
यत्पुनः प्रतिवस्तुपमो द्ाहरणसव सुत्तं तद्‌ युक्तमेव । निरपेचयोवाक्याययाधमस्य खद्ध- 
सामान्यरूपत्वे प्रतिवस्तूपमा । न चाच्रेकमपि संभवति । वाक्याथयोः सापेक्तत्वाच्छुद्ध- 
सामान्य षूपर्वाभावाच्च अथां पचयुदाह्‌रणव्वमप्यत्रायुक्तम्‌ । 

जाग्रतः कमल ल्ल चमीं यञ्जग्राह तदद्‌भुतम्‌ । 

पादद्वन्द्रस्य मत्तेभगतिस्तेये तु का स्ततिः॥ 


इत्यत्रतु प्रतिवस्तूपमोद्‌ाहरणत्वं पापाव्पापीयः। अन्रहि वाक्याश्योः परस्पर सादश्य. | 


मान्नरमपि नाश्तीति का कथा प्रतिवस्तूपमायाः। एवंविधमेव चान्यत्र सर्वाङुकारोदाह- 
रणेष्वासमज्ञस्यं संभवदपि समनन्तरोक्ूृटेतुद्ध याच्च दितम्‌ । तथा क- 
'आन्ञाघरः पञ्चशरः पुरस्तार्सुधा पुनः कमंकरी सुखस्य । 
स चापि सौन्द्‌यंविशेषवन्दी यत्रेन्दुरिन्दीवरखो चनानाम्‌ ॥ 
इत्यत्र विषयविषयिणोद्धं योरप्युपादानारस्फुटेऽपि रूपकत्वेऽतिश्ञयोक्तयुदाहरणत्व मुक्तं 
तत्र छातिह्योक्तित्वमेव नास्तीति कि कायंकारणभावपूवंकत्वनिदरनेनेव्यल बहटना। 
असभवद्भस्तुसंबन्धनिबन्धनायाश्च यद्यपि वस्तुसवन्धस्याविशेषेण संभव उक्तस्तथापि सम 
तरोक्तोदाहरणेषु यथो पमानसंबन्धी धमं उपमेयगतत्वेनेव संभवति तये वो पमेयसं बन्धी 
धमः कचिदधुपमनेऽपीत्याह--इयमित्यादि । 
एषा = यदहः = असभवद्‌वस्तुसवन्धमूला निदश्ना । भमी" का अथं यह हे कि केवल निदर्सना- 
सामन्यदहीदो प्रकार कौ नदीं होती, उसका यह एकमभेदमीदो प्रकारका होता है 'उदा- 
हता = जिसका उदाहरण दिया जा चुका दै" = अन्यात्‌ स वः" इत्यादि । 'केचित- कुक, श्रीमम्मट 
आदि [ मम्मर के काव्यप्रकाश मे श्ुद्धान्तदुकुमः पथ कीं मी उदाहृत नद्दीं है ] । (तत्‌ = वह्‌ 
अथात्‌ यह कथन कि यहाँ दृष्टान्तालंकार है [ भमान्य है] इसी तथ्य को दसरे प्म मी 
प्रतिपादित करते है ओर कहते है--“वं च । उक्तन्यायेन उक्त हेत से = प्रक्रत वाव्यार्थमें 
अप्रकृत वाक्याथ के सामानाधिकरण्य द्वारा अध्यारोपित किए जाने से इसखिएट दो वाक्यार्था के 
सामानाधिकरण्य का निर्देश देख एक अन्य सञ्नन ने श्रोत = शब्दतः कथित आसेप के आधार 
पर निष्पन्न जो वाक्यार्थरूपक माना है वहतो बहुत दूर दे, कुछ रोगों [ अलंकाररत्नाकरकार ] 
ने जो इसे प्रतिवस्तूपमा का उदाहरण मान रखा है वह मी वेतुका दहै क्योकि प्रतिवस्तूपमा वदां 
होती है जदा दो निरपेक्ष वाक्यार्थ में कोई एक शद्ध सामान्यरूप साधारण धमं रहता है, यहं 
इनमे से एक भी नदीं है । यहाँ दोनो वाक्यार्थं सापेक्ष ङे ओर धमं मी शुद्धसामान्यरूप नहीं है । 
[ अलंकाररत्नाकरकार ने--्दण्डापूपिकयाथैस्यापतनमथापत्तिः = अर्थात जेसे यदि चह दण्डको 
ऊुतर दं तो उसे उस प्रर टंगे माल्पृओं का चहो द्वारा खाया जानामी सिद्धदहौोजातादहैतो 
उसे अर्थापत्ति कहते हैं वसे हयी किसी एक अर्थं के सिद्धहो जाने पर जव कोई दूसरा अथं सिद्ध 
होजाए तो उसे भी अर्थापत्ति अलंकार कहेंगे इस्त प्रकार अर्थापत्ति का लक्षण कर उसके ४८ 
भेद किट ये ओर उदाहरण कै रूप मँ श्ुदधान्तदुलंभ० पद्य प्रस्तुतकर च्वि था किं यष्ट दारीर 
के वृत्तान्तसे उसी जेसी लता का ब्त्तान्त खाया गया दहै अतः शरीर मे लोकोत्तरता सिद्ध 
करने पर कताओं मेँ मी वह अपने आप सिद्ध हो जाती है अतः यदौ अथापत्तिहे। विमरदिनी- 
कार इसका खण्डन करते हृएट कहते दै-- ] इस पय को अथांपत्ति का उदाहरण भी नदीं माना 
जा सकता । [ क्योकि यहाँ वाक्यार्थ-द्यगत सापेक्षता होने ओर शद्ध सामान्य धमं का प्रयोग 


निदरोनाकङ्ारः २७५ 


न होने से निदशोना है, अथवा अर्थापत्ति एक नवीन ओर कलित अलंकार है जो अमान्य है अथवा 
आप जव इसर्मे प्रतिवस्तूपमा मानते हें तो म्थापत्ति कैसे मान सकते है । ] फिर-- 


[ उसके ] दोना पैरो ने जागते हुए [ अतएव सावधान ] कमक से [ उसकी ] भी छीन ली 
रसम हे आश्य, मदमत्त [ अतएव असावधान ] हाथी को गति चुरा ल्ने में उसकी कोई 
वड्ाईं नदीं । 

इस पच मे [ अलंकाररत्नाकरकार ने ] जो प्रतिवस्तूपमा मानीदहै [ओर कहा है कि 
यहां ग्रहण करनाः छीन लेना साधारण धमं है, उसे उत्तर वाक्य मे स्तय = चुराना' शब्द से 
कहा गया हे, इधर केवर कान्ता प्रकृत है, पद्य ओर मत्तगज दोनों अप्रस्तुतः-द्षटन्थ प्रतिवस्तूपमा- 
भरकेरण | वह तो बद से बदतर है । यहं जो वाक्याथ है उनमें साद्य तक तो है नदी, [ अल्कार- 
रलाकरकारके | प्रतिवस्तूपमा को कथा ही क्या १ अन्य सभी अरुकारों के उदाहरणा मेँ मीरेसा ही 
असामजस्य हं किन्तु [ यन्थविस्तारभय तथा केवर अपने ऊपर दि गए दोषों के निवारण कीं 
परतिज्ञा इन अमी अभी ] कथित दो कारणों से उसे हम नहीं दिखला रहे हैँ । जेते एक स्थल 
ओर टीजिए-- 

जहां कामदेव उत्पलाक्षियों = नीलकमल्सी ओंँखोँवाली बालाओं के मुखमण्डल का 
आज्ञाकारी हे जो जपने पोरचो वार्णो के साय सदा सामने खड़ा रहता है, खधा कमकरनी = चेरी 


दं ओर चन्द्रमा उस [ मुख-मण्डल ] के जनोखे सौन्दयं का वैताछिकि है । 

यदं विषय ओर विषयौ दोनों का उपादान है अतः स्पष्ट ही यों रूपकालंकार है तथापि 
( अल्काररत्नाकरकार ने ] इस्त प्य को अतिशयोक्ति का उदाहरण माना है [ ओर कहाहे कि 
यद अतिशयोक्ति कायंकारणमावमूला है । यहाँ “टककार्कारित्व'-रूपी संवन्ध के आधार प्र 
पहले कामदेव से सव॑था अक्तबद्ध आज्ञाकारित्व का कामदेव से संबन्ध हो जाता है अथात्‌ अस्तवन्धं 
पर सन्ध का अध्यवप्तायवोध हो जाता है, फिर कारणरूप आज्ञाधरत्व का उसकी कायेमूत काम- 
विकारोत्पत्ति से अभेद बोध हो जाता ह] किन्तु यह अतिश्चयोक्तित्व ही नही, उसके कायं- 
कारणनूलकत्व कौ ओर तदथं सस पद्य को उदाहरणरूप से प्रस्व॒त करने की तो वात ही क्या। इस 
“कार्‌ यदहं उदाहरण असंगत हे । अव हम ओर अधिक उदाहरण देते बैठ यद गक नीं । 

'अस्तभवद्वस्तुसम्बन्धमूलक निदरंना के जिस वस्तु-संबन्थ का अभी [ अव्यात्‌ सः"-प्रय मे] 
संभव प्रतिपादित किया गया है उसमे कोड विन्ञेषता प्रतिपादित नदीं की गई थी, [ वह प्रतिपादित 
वस्तुसम्बन्ध सामान्यरूप से प्रतिपादित किया गया था ] तथापि [ उसर्मे विदोषता्ँ मीद्रंदी जा 
सकती ह जेते ] अभी दि उदादररणो म जिस प्रकार एकमात्र उपमानगत ध्म का उपमेय 
मे पर्टंचना संभव प्रतिपादित किया उसी प्रकार उपमेयगत धमं का उपमान मेँ पहुंचना भी संभव 
मरतिपादित किया जा सकता है"--इस तथ्य का प्रतिपादन करने हेव छिखते है-- 


[ सवेस्व | 
इयं चोपेमेय उपमानचृत्तस्यासंभवाल्पतिपादित पूरैः वस्तुवस्तू पमेय- 
बरत्तस्योपमनेऽसंभवादपि भवति । उभयत्रापि संवन्धविघटनस्य वियमान- 
त्वात्‌ । तद्यथा- 


"वियोगे गोडनारी्णां यो गण्डतल्पाण्ड्मा । 
अलक्षयत स चलजेरीमञ्जरीगभरेणणुघु ॥' 


2२,७दः अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


अज्ञ गण्डत ट घ्रकृतम्‌ । वद्धम॑स्य पाण्डिश्नः खजेरीरेणुष्वसंभवादौपम्य- 
प्रतीतिः । पष च्च पकारः श्ङ्कटान्यायेनापि भवति । यथा-- 


(मुण्डसिरे वोर्फट बोरोवरि वोर थिर धरसि । 
विग्गुच्छाअई्‌ अप्पा णाछिभकेजा छचिजन्त 


[ यदह जो असंमवद्रस्तुसम्बन्धमूला निदर््ना है ] इसका प्रतिपादन [ मन्मट आदि | प्राचीन 
माचार्यो ने केवर रेसा किया था जिसमें केवल उपमेय में उपमान के धमं का असंभव प्रतिपादित 
होता था, किन्तु सत्य यह है कि [ निदनाकी] यह [विधा] रेसी मी दहौती हे जिसमें 
उपमैय के धम उपमान में असंभव प्रतिपादित रहता है, क्योकि संवन्ध का अभाव इन दोनो में 
ही समान रूप से विमान रहता है । इस [ द्वितीय विधा ] का उदादरण-[ जिसमें उपमेय धमं 
उपमान में असंभव प्रतिपादित रहता है, यदह दै-- | 

"गौड देदा की वियुक्त वनितां के कपोरुतख कौ पीतिमा [ वसन्त ऋत में ] खजौर मजरी 
के परागमें दिखाई पड़ी 1? 

-- यदा कपोरुतर प्रक्रत [वर्णनीय] है [ अतः उपमेय है ओर ] उसका धमं पीतिमा [ पीटेपन 
में कपोर्तरू के उपमानभूत ] खजूरपराग मे असंभव हे अतः [ वाक्याथ का पर्यवस्तान उपमानो- 

पमेयभावमें होता दै ओर अन्तमें] भौपम्य की प्रतीति होती है-[ कि कपोलपीतिमा सद्दा 
पीतिमायुक्त खजर पराग, खजृरपरागगत न कि पीतिमा के समान पीतिमा से युक्त कपोलतलङ ] । 

यह [ उपमेय धमं का उपमान मेँ असं मवरूप अथवा. अस्तमवदवस्तुसम्बन्धमूल्क ] जो प्रकार 
दे यह वला क्रमसेमी होता है। यथा- 

“मुण्डरिरसि बदरफल वदरोपरि बदरं स्थिर धारयस्सिं। 
विजियुप्सयस्यात्मान नागरिकच्छेकारख्य्यन्ते ॥? 
 न्तुम जो चतुर नागरिको को छलना चाह रहे हो, यह एक प्रकार से संडे सिर पर वरैर 
( वदरीफल ) ओर उस वैर पर एक भौर वैर [ थिराना ] चाह रहे हो, अपने आपको घरणास्पद 
बना रहे हो 1 


विमरिनी 


उभयत्रेध्युपमेये उपमाने वा । वसन्तवणंनस्य प्रक्रान्तच्वाद्‌ हयोः प्रङ्ृतस्वेऽपि गण्ड 
तटस्यो पमेयव्वम्‌ । तद्भतत्वेनेव पाण्डि्चः सिसाधयिपितत्वात्‌ । सिद्धसाध्यधमेरवमेव 
ष्चोपमानोपमेयत्वस्र्‌ । यथा वा- 
स्वद्वकत्रङावण्यमिदं खगा्ति संखचयते पत्युरपि क्षपायाः । 
कथं त्वनेनाहृतमेतद्यय कलावतां वा किमसाध्यमस्ति ॥° 
अच्र चाटुषु नायिकायाः प्रस्वुतव्वाद्क्त्रस्ुपमेयम्‌ । तद्धमंस्य च खावण्यस्योपमाने 
शशिन्यसंभवः । एष इति असंभवद्वस्तुसं बन्धनिवन्धनो वा वाच्यः । 
उभयत्र = दोनो मेँ = उपमेय मे ओर उपमान में । [ वियोयेषु पद्य मे ] वसन्त का वणेन किया 
जा रदा है अतः उसमे दोनों ही प्रकत है [ वियोगिनीकपोल मी ओर खजूरमंजरी भी ] तथापि 
उपमेय है कपोल्तर ही, क्योकि पातिमा उसी के भीतर सिद्ध करना अभीष्ट है, क्योकि सिद्ध 
धमवाला ही पदाथ उपमान बनता है ओर साध्य धमवाखा उपमेय । अथवा दूसराउदहरण लीजिए- 
"हे मृगाक्षि ! वम्दारे चेदरे की नाई चन्द्र में मी दिखाई दे रदी दहे। इसने इसे कंसे इड़पा 
होगा १ भथवा जो कलावान्‌ होते है, उनके ठिए असाध्य दी क्या रहता हे ।' + 


निदरोनाटकारः २.७७ 


-यहां नायक नायिका का चाट कर रहा है अतः यहां नायिका का चेहरा प्रस्त है भौर 
इसीलिए उपमेय भी । उप्तका जो कावण्य॒रूपी धमं है उसका चन्रमा मे अप्तंमव है । 


एष = यद्‌? = प्रकार |[ संभव हे ], इसका दूसरा अथं असंभवद्वस्तु संबन्धमूलक निदश्चना भी 


किया जा सकता है । 


[ स्वेस्व | 
इयमपि कचिन्माठयापि भवन्ती दश्यते । यथा- 
अरण्यरुदितं छृतं रावशारीरमु ढर्तितं 
स्थलेऽन्जमवरोपितं खुचिरमूषरे वर्षितम्‌ । 
भ्वपुच्छमवनामितं बधिरकणेजापः ऊतः 
ध्रतोऽन्धञ्रुखद्र्प॑णो यदबुधो जनः सेवितः ॥° 
कचित्पुननिषेधसाम्यादाक्षिघ्तायाः परासः संबन्धायुपपस्यापि भवति । 
यथा- 
“उत्कोपे त्वयि किचिदेव चठति द्वाग्गूजेरक्ष्माथ्ता 
सुक्ता भ्रून पर भयान्मरुजुषां यावत्तदेणीटरराम्‌ । 
पद्भ्यां हसगतिसुंखेन शशिनः कान्तिः कुचाभ्यामपि 
क्लामाभ्यां सहसेवं वन्यकरिणां गण्डस्थटोविशथ्चमः ॥' 
अन्र॒मुक्तति निषेधपदं तदन्यथानुपपत्या पादयोर्हसगतिप्रा्िस- 
क्षिप्यते । सा च तयोरनुपपन्ना सादश््यं गमयतीति असंभवद्स्तसंब- 
न्धनिवन्धना निदराना। 
यह [ निदशेना सामान्य ] कहीं माङारूप मे भी मिलती है । यथा- 
भूखे व्यक्ति को चाकरो जो फि वह निजेन जंगलमें रोया गया, सत रारीर मे उवट्न 
रुगाया गया? मिद्धो पत्थर पर कमर रोपा गया, काफो देर तक ऊषर मे बरसा गया, इत्ते 


के पृछ सीषी को ग, बहिर के कानमे जप किया गया ओर [ दोनों आंखों के] अन्पेके 
सामने दपण रखा गया । 


[ निषेध प्राप्षिपूवक होता है इस कारण ] कदी-कदीं निषेध से आक्षिप्त प्रापि कासंबन्धन 
वनने से भी [ यह्‌ निददेना ] होती है। यथा- 

आपके क्रुद्ध होकर [ युद्धाथे ] थोड़े से चलते ही भयसे गुर्जर के राजा ने परथिदी ही नहीं 
छोड़ी, अपितु मरस्थर मेँ भटकती उसकी सन्दर के पैरो ने हंश्तगत्ति, सुखो ने चन्द्रकान्ति 
दुब॑र स्तना ने जंगली हाथियों के गण्डस्थली का विभ्रम मी एकाएक छोड दिया । 

- यहा “मुक्ता = जोड दिया यह निषेधवाचक पद पिले परा दारा हंसगति को प्रधि 
करने क अक्षिप करता है, करयांकि विना उ [ प्राप्ति ] के वह निषे वनता दी नदीं है । ओर वद 


| हंस गति को | उन [परो] में संमव नहीं है अतः “उस जेसी गतिः का ज्ञान कराती हे। 
इ्सथिए यहां जसंभवदवस्तुसम्बन्धमूला निदर्शना हुई । 


विमरिनी 


आक्िपताया इति । प्राप्ति पूवकस्वान्निषेधस्य । सेति प्राक्चिः। साद्रयभिति पादयोरसगति- 
तुङ्याया गतेः प्रतीतेः । 


२७८ अल्छदधारसवस्वम्‌ 


इयं च सामान्यस्यानुगामितया । यथा-अन्यात्स व इत्यादि । अत्र निसगंवक्रता- 
ख्य धमंस्याचुगामिरवम्‌ 1 शद्ध सामान्यरूपत्वेन यथा- 
हारेणामरकस्थुलमुक्तनासुक्तकुन्तरुः 1 
फणीन्द्र बद्धजूटस्य श्रियमाप सख धूजंटेः ॥ 
अत्रासुक्तवद्ध योः शद्ध सामान्यरूपत्वम्र्‌ । विम्बप्रतिविम्बभावेन यथा-- 
(उह सरसदतमडरक पोरुपडिमागञओ मञअच्छीद्‌ । 
अंते सिदूरिजसंखवत्तकरणि वहदइ चंदो ॥ 
| अच्र दुन्तमण्डरुसिन्दूरितव्वयो विम्वप्रतिविम्बभावः। 
"५ "आ्िप्तायाः = आक्षिप्तः इसकिणएि किं निषेध प्रािपूवक दोता है। (सा = वहः = प्राक्षि। 
| 'सारश्यम्‌ = क्योकि पैरों में हंसगति तुस्य गति की प्रतीति होती हे। 

यह्‌ [ निदराना ] साधारण धमं के अनुगामी होने पर भी होती है यथा--“अव्यात्‌ स वः 
इत्यादि मेँ । यहाँ निसर्गवक्रता- नामक धमं अनुगामी है। इसमें धम कीं शद्धसामान्यस्वरूप 
भीददोताहे। यथा- 

- “ओव जेसे स्थूल मोतियोँ के हार से उसके केश कपे हए थे । अत्तः वह्‌ भगवान्‌ दिव की 
शोमा प्राप्त कर रहा था जिनका जटाजूट हेषनाग [ जो अपने धवल वणेके लिए प्रसिद्धै] से 
बेधा रहता है । | 

यहां भायुक्तत्व" ओर “आवद्धत्वः दोनों श्चुद्ध सामान्यरूप हैः । | 

विम्वग्रतिविम्बमावमूलक, यथा - । 
“परय सरसदन्तमण्डलकपोलग्रतिमागतो सृगाक्ष्याः । 
अन्ते सिन्दूरितराङ्गावत्तंकरणीं [ क्रियां | वहति चन्द्रः ॥ 

-देखो, [ ताम्बूलरस से ] सरस द॑तमंडल [ ऊपर नीचे की दोनों पंक्ति ] वाले कपोलो पर 
म्रतिविभ्वित यह चन्द्रमा नीचे {[ सुखभागमें] सिन्दूर से रगे हए दाख के आवतं [ अंजलि, | 
कटोरी धोत्ते समय जिसमे पानी भराजाताडै, या जिसमे ऊंगलियों के अयपर्वं फसाकर रांख 
को पकड़ा जाता है ओर यदि यह शंख के दाहिनी ओर होतादे तो शंख को दक्षिणावनत्तं का 
जात। है, सामान्यतः यह दाख के बड ओर ही होता । वस्तुतः केले कुण्डलित पत्ते जैसी एक परत 
होती दहै जो भीतर ही भीतर कुण्डलित होती जाती है इसखिए इसे आवत्तं = भौर कहा जाता है । ] 
की करनी [ क्रिया ] धारण कर रहाहे। | 
यहाँ दन्तमण्डल' ओर “सिन्दूरितत्वः इन दोनो में निम्बप्रतिविम्बभाव हे ।? । 

विमदाः निददयना का पूवं इतिदास- 

भामहः = (क्रिययैव विदिष्टस्य तद्थस्यो पदद्यनात्‌ । 

ञेया निदर्चना नाम यथेववतिभिविना ॥ ३।३२ ॥ 
यथा = अयं मन्ददयतिमांस्वानस्तं प्रति यियासति । 
उदयः पतनायेति श्रीमतो बोधयन्‌ नरान्‌ ॥ २।३४ ॥ 

--निदरोना इसलिए कदलाती है कि इमे क्रिया के द्वारादौ विदिष्ट अथै प्रदरित किया 
जाता हे ओर यथा, इव, वत्ति आदि उपमावाचर्को का प्रयोग नदीं रहता । . 

यथा = "ह प्रकाशाराशि सूर्य॑ तेजोहीन होकर अस्त की आर जाना चाहरहा दहै, श्रीमाम्‌ 
लोगों को यह वतराता हुआ सा कि उदय का अन्त पतन होता हं ।' 

स्पष्ट है कि भामह मँ संमवदवस्तुसंवन्धा निदडना का दी निरूपण इञा है । इन्हीं के अर्युकरण 
पर वामन मी केवर निदद्यैना का निरूपण करते है-- 


ह 


निद्‌रोनालङ्नरः २.७२. 


वामन = { सृ° ] क्रिययेव स्वतद्थान्वयख्यापनं निदरस॑नम्‌ ° 
[ बृ० ] क्रिययेव शुद्धया स्वस्यात्मनः तदर्थस्य चान्वयस्य संबन्धस्य ख्यापनम्‌, सतव॒ुल्ति- 
हेतुदृष्टान्तविभागदशेनात्‌ निदशेनम्‌ । 
[ सू° ] स्वयं ओर उसके प्रयोजन के अन्वय का कथन ही निदशन । 
| च | शद्ध [ अन्य निरपेक्ष ] क्रिया के द्वारा अपना भौर अपने प्रयोजन के संबन्ध का 
मरतिपादन निददोना कदलाता है, क्योकि इसमें हेतु ओर दृष्टान्त का अन्तर तिरोहित रहता है । 
उदाहरण - “अत्युच्चपदाध्यासः पतनायेत्यथ॑श्चालिनां शंव । 
आपाण्डु पतति पत्रं तरोरिद बन्धनयन्येः ॥ 
-- बश्च का यह पीरा पत्ता भरीमन्त लोगो से यह कहता इभा बन्धनय्न्थि से गिर रहा हे 
कि अत्यन्त ऊचे पद पर पहुंच जाना पतनकारी हय होता ह ।' 
यहो गिर रहा है-- यह्‌ क्रिया है, उसका प्रयोजन है अति उच्च पद प्र प्॑वना 
पतनकारी होता है" यह, ओर इसका कथन हुआ है श्रीमन्त लोगों से कहता हभाः इस प्रकार । 
उद्‌भटः--उद्धटाचायने निदाना को विददंना कह नागमे भी प्रिवत्तन कर दिया है 
जर लक्षणम मी श्स प्रकार परिष्कार किया है 
“भवन्‌ वस्तुसम्बन्धो भवन्‌ वा य॒त्र कल्पयेत्‌ । 
उपमानोपमेयत्वं कथ्यतते सा विदर्चना ।॥ ५।१० ॥ 
उदाहरण--विनोचितेन पत्या च॒ रूपवत्यपि कामिनी । 
विधुवन्ध्यविभावर्याः प्रविभत्ति विदोभताम्‌ ॥ 
--असंभव या रभव वस्तुरःबन्ध जहां उपमानोपमेय भाव की कल्पना कराए उसे विदर्छ॑ना 
कहा जाता है । 
विदशेना शब्द की व्युत्पत्ति स्पष्ट करते हुए प्रतीहारेन्दुराजने क्ख है-"वि= विदिष्ट 
अथे = उपमानोपमेयमाव, उसक। द्च॑न = प्रतिपादन = उससे युक्त 'विदशनाः। निदशन दाब्द 
उपमा से कुछ दूर हो इष्टान्तपरक हो जाता है । 


उदाहरण `उचित पत्ति के बिना कोई मी सुन्दरी चन्द्रहीन रात्रि की ओोभाशुन्यता धारण 
करती है) 

इस उदादरणमं रात्रि की रोभादुल्यता का खन्दरी से संबन्ध संभव नहीं होता अतः उसका 
अथं तत्तुल्य अन्य शोभाशत्यता में परिणत हो जाता है । इस प्रकार यह्‌ उदाहरण असंमवद्वस्तु- 
संबन्धमूला निदशेना का है । | 

द्वितीय का उदाहरण उद्धट्ने नहीं दिया । अतः उद्भट के काव्यालकारसारसयह को टीका 
रघुविदृति के रचयिता प्रतीदारेन्दुराज ने अपनी ओर से भामह का “अयं मन्दयुत्तिः पच उद्धृत 
कर उसका विदररेषण इस प्रकार किय। है- 
वद उदित होकर अस्त होता सूये प्रयोजककर्ता है ओर प्रयोज्यकर्ता है उदयशाली श्रीमन्त 
जन । सूये उन्हे य्ह बोधकरा रहा है कि 'उदय का अन्त पतन होता हे इसलिए इस बोधनः-क्रिया 
मे वह हत॒ हे । किन्तु सूयं जङ्‌ है अतः उस प्रयोजकं हेतुत्व केवल “बोध मे समथे आचरण करने 
तक सीमित है जेते [स्डमें आग जलाकर पडते छात्र की--] कारीष = के्डो कौ अभि अध्ययन 
करवा रह दै" इस उक्ति मे । इस प्रकार श्रीमन्तो भौर सूयं ॐ वीच यद्‌ जो प्रयोज्यमयोजक- 
भाव हे यह वस्तुतः समव नदीं होता । फलतः यह्‌ उपमानोपमेयभाव का सा्टेप कराता है, अर्थात्‌, 
इस प्रयोज्यप्रयोजकभाव का पर्यवसान शे धीमन्त सञ्ननो ! जिस प्रकार मेरा उदय पतन मे 


| 
। 
| 
। 


२८० अलङ्ारसवेस्वम्‌ 


परिणत हो रहा है उसरी प्रकार आपकाभी उदय पतनमें परिणत होगा-रेसा आप छोग समञ्च 
टः इस प्रकार के उपमानोपमेयमाव मँ होता हे। 
यहो “समर्थाचरणः दाब्द का प्रयोग स्वयं अल्कारसवेस्वकार, प्रतीदारेन्दुराजः; पिमरदिनीकार 
रत्नाकरकार, अप्पयदीक्षित तथा पण्डितराज-इन सवने किया है चिन्तु इसका अथं कुवलयानन्द के 
टीकाकार वैयनाथ तत्सत तो बड़ी ही सफाई के साथ सक्षेपमे इस प्रकार क्रिया दै-.समधांचरणे 
समर्थकरणे सामर्थ्योत्पादन इति यावत्‌ मावप्राधान्यात्‌। ` समर्थाचरण अर्थात्‌ समथं वनाना अर्थात्‌ सामथ्यै 
उत्पन्न करना 12 इस प्रकार प्रयोजककर्ता भले ही जड हो वह चेतन के भीतर होने वाली ज्ञानोत्पत्ति में 
आलम्बन तो वन ही सकता ह । जड की यदह आलम्बनता न्यायङ्ञाख्र की भाषामें विषय का ज्ञान 
के प्रति कारण दहयोना माना जा सकता है | व्याकरण की भाषामें इते दही ज्ञानोत्पत्यतुदरूलता कदा 
जा सकता है । गौर यदह तो जड मं संभव ही है । प्रस्तुत पदां मेँ सूयं भले ही जड़ दै, वह्‌ श्रीमान्‌ व्यक्ति 
अर्थात्‌ चेतन व्यक्तिर्यो मेँ उत्पन्न होने वाटे “उदय पतन मे वदरत है"-इस ज्ञान के प्रति सहा- 
यक तोदो दी सकता है । यदी सदायकता उसकी प्रयोनकवरैता दै ओर यह सूयं में संमव दही दहे। 
त्चृडामणिपदे ° इस मन्थकार के उदाहरणम इसी प्रकार यह प्रयोजकता पव॑त मेँ सम्भव दहै । वस्तुतः 
यह भी एक ओपचारिक प्रयोजकता ही है वास्तविक नहीं । इसलिए रसम॑गाधरकार ने यहां 
न्यायश्चाख्र के अनुसार व्यंग्य उत्प्रेक्षा स्वीकार कीदै। सत्य यहदहैकिइस निदरना का सीक 
निरूपण वामन ने ही किया हे । वस्तुसम्बन्ध के संमव होने की वात डाक्कर उद्धर ने उसमे एक 
विचार-संघपं पेदा कर दिया । 
श्दररः = रुद्रट के काव्याल्कार मं निददना नदीं मिरुती । 
मम्मटः = अभवन्‌ वस्तु सम्बन्ध उपमापरिकदपकः । 
स्वस्वहेत्वन्वयस्योक्तिः क्रिययेव च सापरा ॥ 
-- वस्तु सम्बन्ध न संभव होकर यदि उपमा की कसना कराए तो निददना, अथवा कोई कार्यं 
स्वयं का स्वयं के कारण के साथ सम्बन्ध बतलाता हआ प्रतिपादित दौ तो निदर्धना । 
मम्मट ने प्रथमके दो उदाहरण दिए हँ--उनमं से प्रथम की अभिव्यक्ति सर्वस्वकार के (त्वत्पाद- 
नख०ः ओर श्ुद्धान्तदुलंम० की अभिन्यक्ति से भौर दूसरे की अभिव्यक्ति अव्यात्‌ सवो" की अभिग्यक्ति 
से स्॑धा मिलती हे । द्वितीय निददना का उदादरण उन्होने ठीक वेसा ही दिया है जैसा - सव॑स्व- 
कार ने चचूडामणिपदे०ः । किन्तु विदोषता यह हं कि काव्यप्रकाराकार ने इस मेद मेँ वस्तुसम्बन्ध के 
संभव होने की वात नदीं कदी है । 
शोभाकर = अल्काररल्लाकरकार ने मी निदद्चंनालक्षण में वस्तुसम्बन्ध के संभव होने की 
वात छोड दी है | 
[ सूत्र 1 असति सम्बन्धे निददोना ॥ < ॥ 
[ वृ० ] असति असंमवति सम्बन्धे आथंमोपम्यं निदलंना । 
-- सम्बन्ध संमवन हो तो निदड्यना होती है यदि उपमानापमैयमावकी प्रतीति अथतः हो । 


इसी तथ्य को ओर अधिक स्पष्ट करते हए उन्होने खा है- 


'संवन्धवाये सति लक्षणातो यत्रोपमायाः प्रतिपत्तिरस्ति । 
निदर्शना तत्र यदा तु किञ्चिद्‌ वस्त्वव रक्ष्येत तदा परे स्युः ॥ 
- जहां सम्बन्ध का वाधहो जनेपर लक्षणाके द्वारा उपमाकान्ञान दो वदां निदशंना, 
ओर जाँ किसी वस्तु का ही लक्षणा द्वारा ज्ञान दो वहां दूसरे अल्कार दोते हं । 
उदाहरण के रूप मे उन्होने अदिव दिव कौ मङ्गिमा धारण करता है--यद वाक्याथ प्रस्तुत 
किया हे । ५ 


निददोनाल्यडूलरः २८१ 


संभवदवस्तुप्तम्बन्धमूका निदशेना तो अल्काररत्नाकरकार ने मानी नहीं है तथापि उन्होने 
उसके उदाहरण देने की अस्पष्ट ओर असफर चेष्टा की है । 
वत्पादनखरत्नानाम्‌ः पथ मे रत्नाकरकार ने वाक्याथरूपक मानते हए कहा है कि नर्खो 
को अरूतेसे ला करना चन्द्रनाको सफेद चन्दन से सफेद करना हैः यहां प्रथम वाक्याथ 
पर द्वितीय वाक्यां का आरोप उसी प्रकार है जिस प्रकार सुख चन्द्र है-- यों प्रथम 
पदाथ पर द्वितीय पदाथंका। रूपके निदशंना का विषयभेद बतराते हए उन्दने छ्िखि 
है कि “जर्हो आरोप श्रोत = चाब्दतः कथित नहीं हो ओर अं संबन्ध न बनता हदो वँ 
निदशदना होती है ओर जहाँ सान हो वहं रूपक ष्ोता है। अल्काररलाकर के इस प्रति- 
पादन का पण्डितराज ने अनुकरण कियादहै। ओर अल्काररत्नाकरकी ही पदावली का प्रयोग 
करते हुए उन्दोने इस उदाहरण मेंरूपकदहीमानादहै। निदशेना माननेके किए इस पद्यमें 
उन्होने इस प्रकार परिवतेन आवदयक बतलाया है-- 


^त्वत्पादनखरत्नानि यो रज्यति यावकः । 
इन्दु चन्दनरेपेन पाण्डुरीङुरुते हि सः ॥' 


--जो तुम्हारे पैर के नखों को अल्तेसेरगता है वद्‌ चन्द्रमा को चन्दन के चप हारा 
सफेद करता हे! यहां यत्‌ इदम्‌" इस प्रकार उदद्रेरयविपेय वाक्यार्थो को अभिन्न बतलाने वाङ 
सवन्नामपदों का प्रयोग नदीं है । पण्डितराज ने रूपक ओर निदशेना मेँ अन्तर अभेद के उदृदेर्य- 
विधेयभाव पर निर्भर माना है । रूपक मँ वह उद्देश्यविधेयभाव से युक्त रहता है ओर निददोना 
मे नहीं । दोनों के उदाहरर्णो से यह तथ्य स्पष्टमीहै। 

अप्पय दी चित = अप्पयदीक्षित कौ चित्रमीमांसा म निदशना नहीं है किन्तु इसका निरूपण 
उन्दोने कुवल्यानन्द मे बड़ी ही सफाई से इस प्रकार किया है-- 


'वाक्याथयोः सदृशयो रेक्यारोपो निदश्चेना 
या दादठुः सौम्यता सेयं पूर्णन्दोरकल्कता ॥ 
दो सद्शवाक्या्थौ मे टेक्य का आरोप निदश्ना द्योत है । यथा ्दाता की जो सौम्यता 
दे वह पूरणेन्दु की अकलंकता है . जोः 'वहुः- इन दो स्व॑नामों से याँ दो वाक्यार्थो मे टेक्य 


बतला जा राह [ रत्नाकरकार के अनुसार यद्‌ रूपक दै, अतः दीक्षितजी ने उदाहरण के रूप 
मे सव॑स्वकारद्वारा उदप्रत "अरण्यरुदितं कृतम्‌” पय भी प्रस्तुत किया है ] । 


पद्‌ाथनिददयना के सवेस्वकारद्वारा प्रतिपादित दोनों भेद मी उर्ोनि बतला हे । उपमान- 
धमे के उपमेय मं सवन्ध के किए त्वन्नेत्रयुगरं धत्ते लीलां नीलाम्बुजन्मनोः” = तुम्हारे नेत्र नील- 
कमर को रोभा धारण करते है--यह उदाहरण ओर “उपमेयधर्भ, के उपमान मे संबन्ध के किष 
सवस्वकार दवारा प्रदत्त "वियोगे गोड प्च दी प्रस्तुत कियादहै। इस द्वितीय उदाहरण मं 
उन्दने पदाथेनिदशना ही मानी है, सर्वस्वकार के अनुसार वाभ्याथं निदशयेना नदाः ओर 
वाक्याथ निददेना से पदाथ निदशना का मेद यह्‌ कहते हुए किया है कि जाँ उपमानोपमेय में 
से एकं क धमं का दूसरे मे आरोप हो वदँ पदाथनिददंना तथा जहां दोनों के धर्मौ मे से एक 
धम का दूसरे पर आरोप हो वरहा वाक्याथनिदर्चना माननी चाहिए । 


तीसरो संमवद्वस्तुसम्बन्धाः नाम से सवंस्वकारदारा प्रतिपादित निदशैना को ुवल्या- 
नन्दकार ने 'वोधननिदर्ना' नाम दिया है। 


"अपरां बोधनं प्राहुः क्रियया सदसदथंयोः । 


२८२ अन्ट्कारसवेस्वम्‌ 


क्रिया के दवारा अच्छेया बुरे अर्थं का बोधन तीसरी निदर्ाना। उदाहरण के रूपमे अन्य 
उदाहरणों के अतिरिक्त ध्चुडामणिपदे०ः प्य भी दिया है। इसके स्पष्टीकरण मेँ उन्दने 
क्खिादै- 

'वोधयन्‌ गरदमेधिनः” इत्यादौ हि "कारीषोऽग्निरध्यापयतीःत्तिवत्‌ समर्थाचरने णिचः प्रयोगः । 
ततश्च यथा कारीषोऽग्निः शीतापनयनेन बहून्‌ अध्ययनसमथांन्‌ करोति एवं वण्यंमानः पवंतः स्वय- 
सुपमानभावेन गृहमेधिन उक्तवोधनसमथांन्‌ कन्त क्षमते । 


"बोधयन्‌? = वताता हज इत्यादि स्थलों मे "णिच्‌" = प्रयोजक प्रत्यय का प्रयोग ठीक उसी 
प्रकार समधाचरण अथं में हे जिस प्रकार कण्डों की आग पढवा रही दै इत्यादि प्रयोगो में । 
जसे कंडे कौ आग ठ्ड दूर कर वटओं को अध्ययनसमथ बनाती हे वैतसे हयी पवंत स्वयं उपमान 
बनकर गृहस्था को आतिथ्य के उक्त वोध में समर्थं करने में सक्षम हे। 

चन्द्िकाकार ने सम्थांचरण का अर्थं समथ करनाः किया हे जेता कि पीछे बतलाया जा 
चुका हे । 

अप्पय्यदोक्षित ने (संमवद्वस्तुसंबन्ध" ओर (अपंभवद्‌वस्तुसवन्धः नामों से निदर्छना का वगो. 
करण नहीं किया । केवर अन्त मेँ अन्यं के नाम से इनका निर्देदामात्र कर दिया हे । 

पण्डितराज जगन्नाथ- 
सामान्य = विम्वप्रतिविम्बभावानापन्नयोरुपात्तयोररथयोरा्थामेद ओपम्यपर्यवसायी निदर्शना ।? 


विदिष्ट ( १ ) व्यवहारद्कयवदधम्य॑भेदप्रतिपाद नाश्षिप्ो व्यवहारद्यामेदो वास्यार्थनिदरना । 
[ रुलिताल्कार प्रकरणे | । 
( २) उपमानोपमेवधमेयोरमेदाध्यवसायमू उपमेय उपमानधम॑सम्बन्धः पदार्थनिद्च॑ना । 
[ लङि ताल्कार प्रकरणे | 
-भिम्बप्रतिविम्बभाव से रहित ओर शब्दतः कथित अर्थौ का साद्द्य मेँ पर्यवसित होने वाला 
अभेद निदर्शना कदलाता है 1 अत्रापि- 
-- दो व्यवहारो से युक्त दो व्यवदारियों का अमेद वतरने से व्यवहासो का जो अभेद फलित 
होता हे वह वाक्याथनिदज्ंना कहलाता है" ओर-- 
उपमान तथा उपमेय के धर्मौ के अमेदाध्यवसाय के आधार पर उपमेय मेँ उपमान के 
धमं का सम्बन्ध पदाथ निदशंना ॥ 

हसते स्पष्टहे कि पण्डितराज ने उपमान मेँ उपमेय के धमं का संबन्य स्वीकार नदीं किया 

हे फलतः उनके मत मेँ “वियोगे गौड०? पद्य मेँ सव॑स्वकारदारा दरित यह प्रकार अमान्य है । 
पण्डितराज ने अलकारसरवंस्वकार के निदश॑नालक्षण को अपर्याप्त ठदहराते हृ कहा है कि 
वह रूपक तथा अतिदायोक्ति मे मी लागू हो जाता है। सुख चन्द्र है" इत्यादि रूपक मे ओपम्य 
गम्यमान है ही ओर मुख को केवर “चन्द्रः कदने से निष्पन्न अतिदयोक्ति मे भी दोनों का उपमा- 
नोपमेयभाव गम्य रहता है । स्व्यं पण्डितराज ने उपात्तत्वः तथा आर्थत्व का निवेशचकर अति- 
शयोक्ति तथा रूपक से इसे पृथकं करने का प्रयत्न किया है । अतिशयोक्ति मँ विषय उपात्त नहीं 
रदता जबकि निदशना मेँ रहता है। पदा्थनिदशना मेंमीवे टक दोभाः आदि ब्द का 
उपान तथा उपमेय दोना की दोमा का वाचक मानते है क्योकि श्ोमात्वः धमं उन दोनों में 
एक ही रहता है । रूपक मेँ दोनों ही अं उपात्त रहते हैँ जौर अभेद भी रहता है किन्तु वह 
अभद वाक्याथ क प्राथमिक प्रतीति में दही भासित दो जाता है जव कि निददाना मेँ पहले दोनों 
वाक्यो अथवा पदां से अपने स्वतन्त्र अर्थं निकलते हे, फिर असम्बद्धता हटाने के लिए उन मे अभेद 


निदरोनाट्ङ्कारः २८३ 


राया जाता हे अतः वह बाद में प्रतीत होता है। रूपक ओर अतिदायोक्ति से निदर्शना काः 
दूसरा भेदक अभमेदगत अन्य वरेरिष्ट्य मी है । रूपक तथा अतिरयोक्ति मे उपमान का अभेद उपमेय 


मे त होता हे जव कि निदशंना में किसी एक का किसी दूसरे में अर्थात्‌ दोनों का परस्पर 
म अम्द्‌ । 


गकं चास्याः शरीरं ताट्ङपदाथयोः परस्पराभेदमात्रम्‌ उभयत्र विश्रान्तम्‌, रूपकस्य तु 
उपमेयगत उपमानामेदः अतिशयोक्तेश्च ।' [ नि ० सं० प° ४६० | 

विश्वेश्वर पण्डित ने निदशंना का विवेचन अपेक्षाक्ृत अधिक स्पष्ट किया है- 

[ का० ] उपमापयंवसन्नो यत्रार्थोऽन्योन्यमन्वयानहंः । 

यच्च क्रियया कारणकायान्वयधीनिदशंना सोक्ता ॥ 

| वृ० | (१) यत्र॒ पदार्थयोवाक्याथयोर्वां अन्योन्यमेकवाक्यतयान्वयवबोधाजनकयोरुपमानो- 

पमेयभावं कस्पयित्वेवान्वयवोधप्य॑वसानं सा निदयेना । 

(२) यत्र च कायकारणयोः क्रियया हेत॒हेतुमदभावे प्रतिपादिते उत्तरवाक्याथैः पूववाक्यार्थं 

प्रतिपाद्य सामान्यकार्यकारणमावे इष्टान्ततया पयंवस्यति सा द्वितीया निदरोना । 

-जहाँ परस्पर मे अथ॑ परस्पर मँ अन्वययोम्यन शने से उपमानोपमेय. रूप उहरतेदहे 
वह, ओर जहो क्रिया द्वारा कारण तथा उसके काका सम्बन्ध ज्ञात हो वद निदर्शना । 
प्रथम निदरेना का स्पष्ट रूप होगा- 

-जहों विभिन्न प्दाथंया विभिन्न वाक्याथ अपने आप अपना बोध परस्परम भिलित 
रूपसेन करारहे हों फलतः जहाँ उनका वैसा ज्ञान उनमें उपमानोपमेयभाव की कल्पना करने से 
वन पाता हदो वह एक प्रकार की निदसंना होगी । 

- द्वितीय निदरोना वद होगी जिसमे पूवेवाक्यार्थमे क्रिया दारा प्रतिपादित सामान्य 
कारकारणभाव के लिए उत्तरवाक्याथं [ मे प्रतिपादित कोई विशिष्ट का्य॑कारणभाव ] दृष्टान्त बने । 

द्वितीय निदशेना के उदाहरण के रूप मे इन्होने मम्मरभट् दारा प्रदत्त ओर- 

"उन्नतं पदमवाप्य यो लघु लयैव स पतेदिति ध्रवम्‌ । 
रोरुरोखरगतो दृषत्कणदचारुमारुतधुतः पतत्यधः ॥? 
-जोष्षुद्र हो ओर उन्नतपदपाजाएतो यह निशित दै किं वह गिरतादहीदहै। 


पवेत की चोरी पर रखी ककरी हवा के हल्के ज्लोके से भी नीचे आ पडती है। 
विदवेदवर ने इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार किया है- 


“अत्र लाघवे सत्युन्नतपदग्राभ्षित्वं कारणतावच्छेदकम्‌ । पतनं कायतावच्छेदकम्‌? इति काय- 
कारणमावः पूर्वाधप्रतिपा्यः। तते दृष्टान्ततयोत्तराद्धपादानम्‌ । तेन "लाघवे सत्युन्नतपदम्रा्चिः 
पातहेतुः, यथा दृषत्कणस्येति दृष्टान्तपयेवसानाच्निद शेनात्वम्‌ । 

-इस पययाथमेंजोनजोष्षुद्र होते हुए उन्नत पद पाता है वह प्रत्येक गिरताहैः इस प्रकार 
पूवादधके दवारा श्ुद्रताके साथ उन्नत पदकी प्रािः कारण रूपसे प्रस्तुतकी गई है ओर 
पतनः कायरूप से। इस काय॑कारणभाव मे उत्तराधंका वाक्यार्थं दृष्टान्तरूप से प्रस्तुत किया 
गया हे । इस्ङ्ए पुण्वाक्या्थ-'ुद्रता के साथ उन्नत पद की प्रापि पतनका कारण होती है जैसे 
दृषत्कण = ककरो क्ी"[ क्षद्रताके साथ उन्नत पर की प्रापि] इस प्रकार दृष्टान्त मे परिणत 
होता हे अतः यहाँ निदर्घना है । 

मम्मटने हस प्म श्ुवम्‌, के स्थान पर ध्लुवन्‌? पाठ मानाथा,जो पूर्वै आचार्यौकी 
परम्पराकी रक्षा के किए आवद्यक था। वामनाचा्य॑ने क्रियाके द्वारा कार्यकारणभाव के 
ख्यापन' को आवदयक बतलाया था। मम्मटनेमी उस ख्यापन के किए अपने लक्षणमें 


२८७ अलङ्ारसवेस्वम्‌ 


“उक्तिः राब्द्‌ दिया है। इसी प्रकार प्राचीन आचार्यो के .अन्वयः-रोब्द को भी उम्होँने अपनाया हे। 
ध्रुवन्‌? पाठ होने पर पतन क्रिया का क्तं दषत्कण श्ुद्रता के साथ उत्नरतपदप्राक्चि पतनकारक 
दोती हैः यद तथ्य कता हआ चित्रित होता दै अतः वदँ ख्यापन को अभिसन्धि पूर्णं होती है। 
पण्डितराज यददो श्रवम्‌” पाठ दै णेसा ्रमवद्या समञ्च वेढे हैँ । श्रवन्‌" पाठ होने पर जड़ 
इृषत्कण मे पूर्वोक्त (समथांचरण' की कठिनाई उपस्थित होती । धारणामाच्र पर हट इस गंभीर 
पाठभेद पर॒ विदवेद्वर पण्डित ओर रसगंगाधर के नगे, मंजुनाथ तथा पुरुषोत्तमशमा-इन 
टीकाकारो का भमी ध्यान नहीं गया हे । आश्चयं की वात यह दै कुवर्यानन्द में ध्वन्‌" पाठहीदहै 
ओर उसका अथं "धयन्‌ मी करिया गयादहै। पण्डितराजका उस्परभी ध्यान नहींहे। 
अथवा उन्होने यह पाठ भमपनी ओरसे स्वयं गद छया दोगा) निदद्येना का अर्थान्तरन्यास से 
भेद समर्थ्यंसमर्थके वाक्यार्थो के धर्म मेँ रहने वाले अभेद ओर भेदको लेकर होता है। निदर्शन 
मँ ममेद रहता है ओर अ्थान्तरन्य।समें मेद । इसी तथ्य को विदवेदवर ने इस प्रकार स्पष्ट 
किया दै-समथंनीयवाक्या्थप्रतिपा्यकायकारणमावान्तर्गतकाय॑तावच्छेदक-कारणतावच्छेदकधर्मयोः 


समर्थकवाक्यान्तर्ग॑तका्यकारणमावधघरककार्यतावच्छेदककारणतावच्डेद कधर्माभिन्नत्ठे निदरीना;, भेदे 
त्वथाँन्तरन्यासः 1 


निददयना का दृटन्त से मेद है इनके वाक्यार्थो म स्वसिद्धि के खिट अन्योन्यनिरपेक्षता 
तथा सापेक्षता को केकर । दृष्टान्त मं पृवंवाक्याथं उत्तर वाक्याथंके विना भी सिद्ध रदता है 
जवकि निदशना मे पूव॑वाक्यार्थं अपनी सिद्धि के लिए उत्तर वाक्यार्थं कौ अपेक्षा रखता हे । 
विदवेदवर पण्डित ने इसे भी इस्त प्रकार स्पष्ट किया है पूर्ववाक्रयारथप्रतिपाचकार्यकारणमावे 
उत्तरवाक्याथप्रतिपायकार्यंकारणमावस्य यत्र यआहकत्वं तत्र॒ निदर्डना । त्वयि दृष्ट इत्यादौ 
[ दृष्टान्तस्थले ] तु उत्तरार्धीयका्य॑कारणमावो न पूर्वार्धीयकार्यकारणभावस्य आहत्य याहकः ।› 
[ निददोना प्रकरण ] । इसी प्रकार- 
( २ ) यत्र पूठकार्यकारणमावे साक्षदेवोत्तर कार्य॑कारणमावोऽनुकूलस्तत्र निदर्च॑ना, यत्र तु पूवे- 
कायंकार णभावग्र।हक एवोत्तरकार्यकारणमावोऽनुक्रूलस्तत्र दृष्टान्तः ।' [ निदश्ंनाप्रकरण ] । 
संजीविनीकार वि्याचक्रवर्ती ने इस अलंकार पर हए अल्कारसवस्वकार कै विवेचन को इस 
म्रकार इलोकवद्ध किया दै- 
'संभवन्‌ वस्तुसम्बन्धोऽसम्भवन्‌ वाऽववोधयेत्‌ । 
प्रतिविम्बं यदि तदा निज्ञातव्या निदशेना॥ 
विम्बानुविम्बाथतया वाक्ययोः प्रकृतान्ययोः । 
स्यान्नैरपेश्षये दृष्टान्तः सापेक्षत्वे निदश्चेना ॥ 
-- संभव अथवा असंभव वस्तुसन्वन्ध यदि प्रतिनिम्वर का वोषन कराए तो निद्लना होता है। 
प्रकृत ओर अप्रक्रेत वाक्य मे विम्बरप्रतिविम्वता हो ओर दोनों निरपेक्षो तो दृष्टान्त, किन्त 
यदि सापेक्ष हो तो निदश्चंना। 
वस्तुतः निदद्यंना ओर दृष्टान्त दोना का मेदक तत्त्व साधारणधम का विभ्वप्रतिविम्बभाव है। 
दृष्टान्त में चमत्कार का अस्तित्व उसी पर निभेर रहता दे जव कि निदश्यना म असम्बद्ध वाक्यार्थो 
के आयं उपमानोपमेयभाव मेँ । अर्थं यह कि निददना मे चमक्करति फठकभित दहै ओर दृष्टान्त में 
कलाश्चित । 
रकुलितालङ्कार- | 
अप्भय्यदीक्षित ने कुवल्यानन्द मे रकुलित।(खंकार नामक एक नवौन अल्कार की उद्धावना की 
दे। इसका लक्षण उन्दने इस प्रकर ॑दिया दैव्ये स्याद्‌ वरण्यदृत्तान्तप्रतिविम्बस्य वणनम्‌ 


॥ 
किः 


चक क 


[क श = ८ 


व्यतिरेकालङ्कारः २८८५ 


रुतम्‌ 1°-- अर्थात्‌ वणेनौय = प्रस्तुत पदार्थं के वृत्तान्त = ध्म का वर्णन न कर॒ उस वृत्तान्त के 
प्रतिविम्बरभूत किसी वृत्तान्त का वणन करना ललित कहलाता दै। अल्कारकोस्तुभ मे यही 
लक्षण इस प्रकार उद्धृत है--्रस्तुते वण्य॑वृत्तान्ते प्रतिबिम्बस्य वर्णनम्‌ 1" अधिक उपयुक्त यही 
पाठ हे । उदाहरण दिया है--निगते नीरे सेतुमेषा चिकीषतिः- "पानी निकल जाने पर यह बोध 
बनाना चाद रही दहै, यह किसी एक रेसी सखी कै प्रति किसी सखी को उक्ति है जिसका 
प्रिय आकर कोट गया हो ओर उसके बाद वद च्ते पानेका यत्न कर रहीहो। इस उक्तिमें 
नायिकाके व्यापार का नहीं अपितु उस जेते गत-जल-सेतु-बन्धरूपी व्यापार का वर्णन है। 
यदो अप्रस्तुतप्रद्सा नदीं हे क्योंकि इसमें प्रस्त पदाथं = नायिकाकादयी वर्णनदहै। समासोक्ति 
भी नदीं क्योकि उसमें प्रस्तुत व्यवहार ही कथित होता है । निदाना मी नहीं मानी जा सकती 
क्योकि उसमे प्रस्त॒त ओर अप्रस्तुत दोनो के धमे शब्दतः कथित रहते है ओर उनमें एेक्य फङित 
होतादे। इस प्रकार मम्मट का च्छ सूर्प्रभवो०ः यह निददंना का उदाहरण लकित का उदाहरण 
सिद्ध होता है, क्योकि इसमें ^ तुच्छ मति से पुयैवदाका वणन करना चाहता ह्ं। इस 
प्रस्तुतव्ृत्तान्त का उर्लेख नहीं ह । उद्लेख केवल उस जेत्ते डोगे से सस॒द्रको पार करानेकारहै। 

अप्पयदीक्षित के अनुकरण पर पण्डितराज जगन्नाथ नेभी ल्कितालुकार का लक्षण इस 
प्रकार किया दहै श्रक्ृतधमिणि प्रकृतव्यवहारानुल्लेखेन निरूप्यमाणोऽप्रङृतन्यवहार संबन्धो 

रुलितारकारः । 

-- प्रकृत धमीँ में प्रकृत व्यवदार का उल्लेख न कर उसमे अप्रङृत व्यवहार के संबन्धका 
निरूपण रकित अलूकारः । 

यह सत्य है कि लकित के स्थलं मेँ निदश्ंना के स्थलों के समान प्रकृत व्यवहार का उल्केख 
नदीं रहता तथापि उपमा में जेते ठप्तोपमा वगं के अन्तर्गत किसी किसी ध्मका अभाव रहता 
हे तव भी उसे उपमा से भिन्न नदीं कहा जाता क्योकि वहो सव भेदम चमत्कारका एक ही 
कारण रता दे सादृश्य, रसे दी प्रकृत धम के रहने ओर न रहने दोनों स्थलों मे चमत्कार यदि 
असंबद्ध अथौ के साद्रय पय॑वसान मेंदहै तो अलंकार मी एकी मानना होगा निदशनाया 
लल्ति । निदशना पूर्वाचार्य को मान्य है अतः ल्क्ति का ही उसम अन्त्माव करना 
उचित है । इसी अभिप्राय से विदवेद्वर पण्डित ने रुङित का निदश्च॑नाप्रकरण मे खण्डन किया है । 


स्वयं पण्डितिराजने भी रुक्ति के प्रकरण मे कुलित को न मानने वालो की ओर से भी तक॑ प्रस्तुतं 
कर उसका निदशना में अन्तमाव दिखलाया है । 


[ सवेस्व | 
प द । ^) ३ = (~ © 
० २९ | मेदप्राधान्ये उपमानादुपमेयस्याधिक्ये विपयेय वा 
व्यतिरेकः । | 


अधुना भेदपाघान्येनाटंकारकथनम्‌ । मेदो वैलक्षण्यम्‌ । स च 
द्विधा मवति, उपमानादुपमेयस्याधिकशुणत्वे विपयेये वा भावात्‌ । 
विपयंयो न्यूनगुणत्वम्‌ । 

[ सूत्र २९ ] [ सादृश्य मे ] प्रधानता मेद की हो ओर यदि उपमान की अपेक्ता 


उपमेय मं [ गुणो की ] अधिकता अथवा न्यूनता प्रतिपादित हो तो [ अरुंकार |] 
व्यतिरेक [ कहरूाता है ]। | 


२८६  अटङ्ारसवस्वम्‌ 


[ व° ] अव मेद्‌ की प्रधानता वाठे अल्कारराका निक्र॑चन हो रदा दै। मेद क्रा अर्थंदहै 
विलक्षणता = भिन्नता 1 ओर यद दो प्रकार का होतादै उपमान की अपेक्षा उपमेये युर्णो 
की अधिकता होने से अथवा इसके रिपरीत । विपरीतता यानौ युर्णां की कमी । 

विमरिनी 

मेदप्राघान्य इत्यादि । अधुनेति प्राक्षावसरम्‌ । भेदस्य चाच्र प्राधान्यादमेद्‌स्य वस्तुतः 
सद्धावः । सादश्य एव पयंवस्रानाव्‌ । अत एव सादश्यव्यतिरेकेण संभवन्नपि सेदो नास्य 
विषयः । यथा- 

"दिग्योत्तरीयण्छति कोौस्तुभरत भाजि देवे परे दधतु छन्धधियोऽनु बन्धम्‌ । 
ख्प दिगम्बरमखण्डनरमुण्डचूडं भावत्कमेव तु बतेश मम स्प्रहायं॥ 

अन्न वे्णवेभ्यः स्वात्मनि विष्णोर्वा परमेश्वरे सेदमान्न विवकितिन तु स्नापि कस्य- 
चिदौपम्यम्‌ । स इति मेदः! तस्याधिक्यविपयंयाभ्यां वंविध्याद्रयतिरेकोऽपि द्विविष्ः। 
तदाश्रयव्वाद्‌स्य । 

मेदप्रा्ान्य इत्यादि । अधुना = अव अथात्‌ अमेदप्रधान अलङ्कारो का निरूपण हो जने 
पर भेदप्रवान अकारो का अवसर आने प्र । मेद की प्रधानता का अथं यह कि यँ [ अप्रवान 
रूप से | अभेद भी रहता हीह क्योकि इस अल्कार का पयंवसान साद्द्य मे हो जात। दहे । 
स्तीरिए जरह मेद॒ साद्ृश्यमूलक नदीं होता वँ यह अलंकार नहीं माना जाता । ऊपे इत 
पद्याथं मे- 


हे भगवन्‌ [ रिव ] जिन्हे उछ चादि वे उस देवताके पीछे पड़े जो दिव्य उत्तरीय 
[ पीताम्बर | धारण किए हृए दै ओर क्रौस्तुभमणि से अल्कृत दै, क्योकि वह्‌ भी उत्छष्ट है । सुस 
तो केवर आप के ही इसत दिगम्बर [ विवख, नग्न ] ओर सिर पर अखण्डित नरकपाल से 
खुशोभित रूप की स्पृहा है ।' 
यदं शिव भक्त मे विष्णु भक्त से अथवा भगवान्‌ रिव मेँ विष्णु भगवान्‌ से मेद मात्र 
बतलाया जाना अभीष्ट हे | किसी का किसी से साद्य नीं । 
= वह॒ = भेद । 
[ सवस्व ] 
क्रमेणोदाहरणम्‌-- 
"दिरक्चवः पक्ष्मरताविटखासमक्ष्णां सदसखस्य मनोहरं ते । 
वापीषु नीोत्पलिनी-विक्ासरम्यासखु नन्दन्ति न षटपदोघाः ॥' 
५, 
श्लीणः क्षीणोऽपि शशी भूयो भूयो विवधेते सत्यम्‌ । 
विरम प्रसीद खन्दरि यौवनमनिवतिं यातं तु॥' 
अन्न विकस्वरनीखोत्पटिन्यपेश्चया अक्षिलदसखस्य पक्ष्मलतया अ 
धिकशुणत्वम्‌ । चन्द्रापेक्षया च यौवनस्य न्यूनगुणत्वम्‌ । दारिवेलछक्च- 
ण्येन तस्यापुनरागमात्‌ । 


करम से एक एक का उदाहरण-[ उपमान से उपमेय मेँ युणाधिक्यका-] भरे आप के 
सह नेत्रो कौ पक्ष्मल्ता की छवि देखना चाहते द, अतः वे नीरे कमलो के विकास से रम्य 


बवेडियां में नदीं रमते । [ उपमान से उपमैय मेँ न्यूनयुणता का-- ] 


9९ कि 7 ति कका 


व्यतिरेकालङ्कारः २८७ 


“चन्द्रमा, सचमुच; घट घट कर फिर भी वद्‌ जातादहै, परन्तु सुन्दरि, मान जा, अधिक्‌ न 
रूठ, यह योवन है, वीत गया तो फिर नदीं लोरने का) | 

--इन [ दोनों उदाहरणा में से प्रथम ] मे खिले नीरू कमल की अपेक्षा नें मे ध्क्ष्मलता? 
रूपी गुण को केकर अधिकता हे | दितीय में ] चन्द्र की अपेक्षा यौवन मे न्युनयुणता है क्योकि 
उसमे पुनः न लोटना वतलाया गया है, जो चन्द्रमा मेँ नहीं रहता । 

विमरिनी 

चन्द्रपिक्षयेति । शशियोवनयो्हिं समानेऽपि गस्वरत्वे शशिनः एुनरागमनमपि संभवति 
न तु योवनस्येति ततोऽस्य न्यूुनगुणवस्वम्‌ । 

नन्वत्र विपयंयमेवेति सूत्रितं भेदान्तरमयुक्तम्‌ । उपमानादुपमेयस्य न्यूनगुणव्वे 
वास्तवत्वात्‌ , ते चारुकारस्वानु पपत्तेः । यौवनस्य चाच्रास्थिरस्वे प्रतिपाये चन्दापेष्या- 
पिकगुणत्वमेव विवक्ितम्‌ । यदेतचचचन्द्रवद्यातं सन्न पुनरायातीति । असदेतत्‌ । यतोऽत्र 
चन्दरवद्‌ गतं सद्‌ यौवनं यदि पुनरप्यागच्छेत्‌ तत्‌ प्रियं प्रति चिरमीर्याचुबन्ो युज्येत । 
कालान्तरेऽपि द्यस्य तद्‌वरोकनादिना सफरीकारः स्यात्‌ ! इदं पुनर्हतयौवनं यात सष्पु- 
ननांगच्छतीतीष्यां्न्तराय परिहारेण निरन्तर तयेव प्रियेण सह सफल्यितव्यसिति धिगी- 
ष्याम, त्यज प्रियं भ्रति मन्युम्‌, ऊरु प्रसादमिव्यस्मिन्‌ प्रियवयस्यो पदेशे प्रियं प्रति 
कोपोपङामाय चन्द्रापेया योवनस्यापुनरागमनं न्यूनगुणत्वेनेव विवकितमिति वाक्याथ. 
विद्‌ एव प्रमाणम्‌ । न चेतद्‌ वास्तवसुपमेयस्य न्यूनगुणस्वम्‌ । तस्यैव सातिश्यव्वेन 
श्रतिपा्यत्वात्‌ । प्रक्ृताथो परञ्जकस्वे हि सर्वथा कवेः संरम्भः । तचचचाधिकगुणसुखेन भवतु, 
इतरथा वा को विशेषः। तस्माद्युक्तमेव विपर्यये वेति सूत्रितम्‌ । प्रष्युत प्रतिकलस्वं वेति 
सूत्रितमयुक्तम्‌ 1 उपमानादुपमेयस्याधिक्ये इस्येतावतेव रूषणेनास्य व्याप्तत्वात्‌! यतः 
“स्वरेण तस्या अस्रुतल्ल॒तेवः इत्यादावन्यपुष्टाकापस्य प्रतिकलस्वोक्तेः कणेकटुकस्वादिना 
न्यूनस्वादगतेष्पमेयभूताया भगवस्याः संबन्धिनः स्वरस्याखतखतेवेस्यभिधानादानन्दा- 
तिशायदायिस्वादेश्चाधिक्यमेवावगम्यत इव्यरं बहुना । अस्यापि सादृश्याश्रयस्वारसामा- 
न्यस्य त्रयी गतिः । तच्राजुगामिता यथा- 

नगेन्द्रदस्ताश्स्वचि क ङंशत्वादेकान्तशेव्याकदरी विशेषाः । 
रड्ध्वापि रोड परिणाहि रूपं जातास्तदूर्वोरुपमान वाद्याः ॥ 

अत्र परिणादिरूपत्वस्याद्चुगामिस्वसर्‌ । वस्तुप्रतिवस्तुभावे पुनर्भन्थङ्कतेवोदाहतम्‌- 
दिषटक्षव इत्यादि । अत्र मनोहरस्वरम्यष्वयोः शुद्धसामान्यरूपत्वम्‌ । पचमरुताविरा सविक- 
स्वरयोश्च बिम्बग्रतिबिम्बभावः। 

चन्द्रापेक्तया = चन्द्रमा की अपेक्षा । अथं यह कि क्षीण होना या जाना चन्द्रमा ओर यौवन 
दोनों का ही स्वमाव है, किन्तु चन्द्रमा का पुनः पुष्ट होनाया लौट आना मी संमव रहता है, 
यौवन मे नहीं । इसलिए यौवन मेँ चन्द्रमा की अपेक्षा याण की कमी है । 


। अङ्काररत्नाकरकार ने उपमान कौ अपेक्षा उपमेय के न्युनगुणत्व के आधार पर व्यतिरेक 
मानना असमव बतलाते हए कहा है- 


उपमानस्यान्यस्मादाधिक्यं हि स्वभावतः सिद्धम्‌ । 
`तत्वे तेन न युक्तो व्यतिरेकश्चारुताविरहात्‌ ॥ 
--अथात्‌ उपमान उपमेय की अपेक्षा अपने आप मधिकं गुणदराली होता है अतः उसकी 
अपेक्षा उपमेय मे न्यूनयुणता दिखलाने मे कोई चमत्कार नहीं रहता । फलतः वहाँ व्यतिरेक तो 
दो सकता दै, परन्त व्यततिरेकनामक अलंकार नहीं हो सकता । वद अभिक से अधिक उपमा- 


२८८ अलङ्ारसवस्वम्‌ 


रुंकार दी मानाजा सकता है) इसीलिए अरुंकारसव॑स्वकार के शविपयंयःको छोड अलङ्कार 
रत्नाकरकार ने उसके स्थान पर ्प्रतिकरूल्ताःको सूत्र मेँ स्थान दिया है-“उपमेयादन्यस्य 
न्यूनत्वं प्रतिवरूरुत्वं वा व्यत्तिरेकः । क्षीणः क्षीणोऽपि०ः पद्य में उन्होने उपमान से उपमेय की 
अधिकरणता ही मानी है न्यूनगुणता नदीं । उनका कहना दे कि इस प्यमें न्यूनाधिकभाव की 
विवक्षा चन्द्र ओौर यौवन मेँ नदीं जपितु उनकी भस्थिरतामें हे। उपमैय = यौवन कौ अस्थिरता 
उपमान = चन्द्र की अस्थिरतासे वड़ी दै अतः यहां उपमेय दही अधिकगुणद्चाखी हे । फलतः 
यह पथ प्रथम व्यतिरेक का ही उदाहरण हे। इस्त प्रकार रत्नाकरकारने सवंस्वकार के “विपयंयः- 
पक्ष को अमान्य ठहराया है । विमर्दिनीकार इस्तका खण्डन ओर सवस्वकार के मतका समन 
करते हए कहते हे ] शंका = 4विपयंय? कदकर सूत्र मेँ जो दवितीय [ उपमान से उपमेय कौ न्यून- 
गुणता का ] भेद प्रस्तुत किया गया है वह ठीक न्दी दै, क्योकि उपमान की अपेक्षा उपमेय नें 
न्यूनयुणता [ स्वभाव सिद्ध अथात्‌ ] वास्तविक दी होती ह [ कविकस्िित नदीं ] अतः उपमेय के 
न्यूनयुण होने से कों अलंकार सिद्ध नदीं हो सकता । [ क्षीणः क्षीणोऽपि प्म तो ] “यहु यौवन 
चन्र के समान चलातो जातादहै परन्तु जेते चन्द्र पुनः लौट आतादै वैसे लौरता नहीं।' 
उपमेय = यौवन में दी उपमान = चन्द्र की अपेक्षा अधिकयुणत्व है क्योकि इस पद्मे 
प्रतिपा है यौवनगत अस्थिरतादही। 
समाधान = यह कथन अमान्य है । क्योकि यह [प्रियसे रूटी नायिकाके प्रति उसकी] 
प्रियसखी का उपदे है। इसका उद्देदयदहै रूटी सखोके रोष की दान्ति। वह तमी संभवदहै 
लव चन्द्र की अपेक्षा यौवन मेँ "पुनः न खौटनाः? कमी के रूपमेदही प्रतिपा माना जाय । सखी 
इसी कमी को इस प्रकार प्रतिपादित कर रषी है-"चन्द्रमा जेसे जाकर पुनः कोट आता है 
वैसे दी यदि योवनमी छौयने वाला होतातो प्रिय के प्रति देर तकरूढेरहना ठीक दता, 
वर्योदिः तव भ्रियकोगौर कभीमी देख च्या जाता ओर इस यौवन को सफल बना लिया 
जाता । किन्तु यद इत [ सुजा ] यौवन, रेसा है कि एक वार निकर जाने पर॒ लौटता ही नीः 
इसलिए भिय से एक मी क्षम अल्ग न होना चाहिए भोौर इसे सफर वना ठेना चाहिए, ईष्यां 
आदि सब इसमें विध है, इन्दे ताकमें रख देना चाहिए । अतः मार इस इष्यां को छोड़ इस 
प्रियके प्रति अपनाए कोप को ओर अपना अपने प्रियको खुशी से) हमारा यह कथन 
कां तक संगत है इसे वाक्या्थवेत्ता दी वतला सक्ते हँ । इसके अतिरिक्त अस्थिरता 
को लेकर यह जो उपमेयभूत यौवन मेँ कमी वताय गं हे वह वास्तविक = लोकिकं 
गमा जैसी मी नीं है, क्योकि उसमे अतिशय प्रतिपाद हे) क्वि जोह वई सदा दही 
प्रक्रत पदाथ को श्ोभाद्चाखी बनाने मेँ भ्रयत्नश्योल रहता हे । वद चाईे किसी प्रकार दो, युणाधिक्य 
क प्रतिपादन स्ते या युणगतन्यूनता कै प्रतिपादन से। उसमें कोद अन्तर नहीं पड़ता । इसकिए 
यन्कार ने सूत्र मेँ जो विपर्यये वाः ककर उपमान से उपमेय कौ गुणन्यूनता का जो प्च 
प्रस्तुत किया दै वहु ठीक दी है । बचक्कि [ अूकाररलाकरकार्‌ ने ही] सूत्रम ्रतिक्रुल्त्वं वाः 
इस प्रकार प्रतिकूलता को स्थान दिया है वही अमान्य दै । क्योकि प्रतिकूलता कौ बात तो सून के 
'उपमानादपमेयस्याधिक्येः = (उपमान से उपमेय की अधिकता इतने हौ अंश से गताथं हो जाती 


है ओर इतना ही लक्षण अलकाररलाकरदारा प्रदत्त प्रतिकरूल्त्व के उदाहरण मं भीकलागू हो 


जाता है, वर्योकि प्रतिकूलता के छिए अलंकाररलाकरकार ने जो- 9 
स्वरेण तस्यामग्रतसुतेव प्रजसिपितायामभिजातवाचि । 


अप्यन्यपुष्टा प्रतिकरूकद्न्दा श्रोठवितन्त्रीरिव ताडयमना ॥ 
। कुमार सं०। 


^“ ऋ ` ) म 


ज्यतिरेकाटङ्ारः २८९ 


-- भगवती पावती की वाणी अत्यन्त अभिजात थी भौर स्वर अमृत.स। बरसाता था। वे 
जव कभी वोरती थं तो कोयर की कूक ओताको कीणा के विरुद्ध तार की सनकार प्रतीत 
होती थी । [ कु. १।४५ | 

यदं उदाहरण दिया है [ ओर कहा है कि ध्यं केवर य प्रतीति होती है किं कोयल 
का स्वर पावती जी के स्वर के प्रतिकरूरू है । फलतः यदद उपमेय उपमान के केवर विरुद हे, उससे 
न्यूनयुग नही, किन्तु | इसमं कोय की बोली को प्रतिक्रूल कहने से उसमे कर्णकडत्व की प्रतीति 
होती है ओर इस प्रकार उसमे उपमेय पार्थतीस्वर कौ अपेक्षा न्यूनयुणतः की प्रतीति होती है, इसी 
प्रकार उपमेयभूत जो भगवती पा्व॑ती जी हैः उनके स्वर को अद्ृतखावी-सा कहने से उसमे अत्यन्त 
आनन्ददायित्व आदि अधिक गुणोँकी प्रतीति होती 8। फलतः यहां भी उपमेय मे उपमान 
को अपेक्षा युणायिक्य ही प्रतीत होता है। इस विषयमे मौर अधिक क्या कहै इतना ही 
पयांप्त हे । 

यह [ व्यतिरेक ] भौ सा्र्य पर आश्रित अलकार ह । अतः इसमें मी धम = साधारणधमं तीन 
प्रकार कारहतादहै) तीनोंमें से अनुगामी साधारणधर्म का उदाहरण हो गा-[ अल्काररत्ना- 
करकार दारा उद्घ्रत कुमारसंभव का 'नागेन्द्रहस्ता०? इत्यादि प्य का यह अर्थ-- ] 

हाथी की सड की चमडी कठोर होतीहै ओर कदलीस्तम्भ एकदम शीतर होते हैः। 
इस कारणये दोनों संसार में पर्यास प्रसिद्ध ओर सुन्दर आकार पाकर भी पार्वती के ऊरुदय के 
उपमान नदीं हो सके । [ कु० १।३६ ] 

-- यहां आकार की खन्दरता या प्रसिद्धिः [ उपमान तथ; उपमेय दोनों मँ समानरूप से 
अन्वित होने वाला घमं है जतः ] अनुगामौ धर्म है । वस्तुप्रतिवस्तुभाव से युक्त साधारण धर्मका 
उदाहरण स्वयं अन्धकार का हौ दिदृक्षवः यह उदाहरण है । यदहं मनोहरत्व भौर रम्यत्वं राद्ध 
सामान्यरूप हं अथात्‌ वस्तुतः ये दोना एक है, केवल चाब्दं मे मेद हे सी प्यमेंजो पक्ष्मल्ता 
विलास ओर विकस्वरता = विकास है नमे विम्बप्रतिविम्नमाव [ भिन्न होने पर भी साट्दय। 
मूक अभेद है । 

विमदशे--भ्यतिरेक का पूवं इतिहास- 

नामह--उपमानवतोऽथंस्य यद्‌ विदोषनिददयंनम्‌ । 
व्यतिरेक तमिच्छन्ति विशेषापादनाद्‌ यथा ॥ २।७५ ॥ 
` सितासिते पक्ष्मवती नेत्रे ते ताघ्नराजिनी । 
एकान्तद्युभ्रदयामे तु पुण्डरीकासितोत्पङे ॥ २।७६ ॥ 

--उपमान के साथ उपमेय का उल्केख हो ओर उसमे उपमान कौ अपेक्षा वैि्टय दिखलाया 
जाए उसे व्यतिरेक कहते हैः क्योकि इसमे वैरिष्टय का संपादन किया जाता ह । यथा-- 

--प्हारे नेत्र खेत भी हैः ओर श्याम भी, इनमे पक्षम मी हें मौर ताज्रवणं कौ रेखां भी [ इस 
प्रकार ये रेत, द्याम ओर रक्त इन तीनों र्गो सत राबकित हं जबकि | पुण्डरीक [ सफेद कमर ] 
केवर सेत ही होता हे मौर नीलोत्प केवर नील । स्पष्ट ही यां उपमानमूत दवेत कमल 
ओर नीलीट्ल कौ अपेक्षा, उपमेयभूत नेत्र म अभिक रंगों भौर उनसे जनित अधिक वेचिच्य का 
प्रतिपादन हं । इस कार्‌ भामह केवल एक ही प्रकार का व्यत्तिरेक मानते हें जिसमे उपमान से 
उपमेय का आधिक्य रहता है । 

वामन = [ सु° ] उपमेयस्य गुणातिरेकित्यं व्यतिरेकः । ४।३।२२ । 

[ बृ । उपमेयस्य युणातिरेकित्वं गुणाधिक्यं यद्‌ , अथाद्‌ उपमानात्‌ स व्यत्तिरेकः । 

१९ अ० स० \ 


२९.० अलडूलरसवंस्वम्‌ 


--“उपयेयः के यणो का अतिरेक व्यतिरेक ।› उपमेय के गुणों का जो अतिरेक अथात्‌ आधिक्य 
अर्थात्‌ उपमान की अपेश्चा वये व्यतिरेक ।° [ स्पष्ट हय मामह ने व्यतिरेक चान्द के धवि" उपसग 
पर ध्यान दिया था भौर उसकी सार्थकता वतलाई थी जव कि वामन उसके (अतिरेकः-राब्द पर 
ध्यान दे रहे हैँ । ] उदादरण :- 

'स्त्य॑हरिण्ञ्चावाक्ष्याः प्रसन्नुभगं सुखम्‌ । 
समानं शिनः किन्तु स कलङ्कविडम्वितः ॥ 

--यदह सच है कि मरगछने की ओंँ्बो-ती आंखो वाली इस सुन्दरी का खख प्रसन्न भी है ओर 
सुन्दर भी इसि यह चन्द्रमा के समान है किन्तु चन्द्रमा कलंक से दूषित दै । 

वामन ने व्यतिरेक में उत्वर्षापकरषहेतु युर्णो को प्रतीयमान भी माना दै। तुम्हारो चतुर 
ओर ललित चितवन ने नीलोत्पल का कोई स्थान नदीं रहने दिया" = चतुरङकितेस्तवा्ै- 
विलोकितः कुबल्यवनं प्रत्याख्यातम्‌ यहां उपमैयभूत चितवन मं तौ उत्कषहेतु गुण चतुरता 
रुक्ितता है, विन्त उपमान मँ उनका अस्तित्व दाब्दतः कथित नदीं है अतः वहो वे गम्यया 
म्रतीयमान हं । 

वामन ने उपमेय के न्यूनगुणल्व कौ व्यततिरेकजनक नदीं बतलाया हे । 

उद्धट ने मी केवल उपमान से उपमेय के युणाभिक्य में ही व्यतिरेक माना न्यूनयुणतामें 
नदीं । किन्त अन्ने व्यतिरेक मे वामन फे गन्यमान युण नामक अभिनव भेद कोभी अपनायादहै 
ओर उपमानोपेयमाव के गभ्यत्व तथा वाच्यत्व के आधार पर व्यत्तिरेकके दो वगे वना उनमें 
दिष्ट तथा शुद्ध शाब्दो पर आश्रित [ उत्करषापकपं के ] निमित्ता के उपादान तथा अनुपादान क 
अनुच्छेदो द्वारा कुल मिलाकर आढ मेद प्रतिपादित किटदहं। यथा गस्य उपमानो पमेय- 
भावमं:- 

८ १ ) अनुपात्तनिमित्तक शुद्र राब्दमूकक व्यत्तिरेक -- 

(तपसे कदा परर्वतीने राह से निपीत प्रभा वाले चन्द्र कौ जीत रखा थाः । 

यँ उपमेय पावती है, उपमान चन्द्र है, साधारण धमै है छन्दर होने पर भी कारणवरा 
आया फकापनः जो राब्दतः कथित नहं दै ओर न उपमावाचक “इव' आदि ही यहां उपलब्ध 
हे। 'जीतः-दाब्द्‌ से उपमानभूत चन्द्र की अपेक्षा उपमेयभूत पावती म उत्कपं प्रतिपादित हुंजा । इस 
उतकप्रंकाकारणहे पावती जी का अभिक छश होना जौर इसकाकारणदहैतप मे रां कौ अपेक्षा 
अधिक तीष्णता । ये दोनों ही कारण यहां चब्दतः कर्थित नहीं हं । इस प्रकार य॒हां उपमेय के 
वैरिष्टय कै निमित्त अनुपात्त ष्टोने से यद व्यतिरेक अनुपात्तनिमित्तक हु । दल्ेष भी किसीभी 
दब्द में नदीं है अतः यह व्यतिरेक शुदध्ब्दमूलक हआ । 

८ २ ) उपात्तनिमित्तक चुदधदाब्द मूक व्यतिरेक 

"पा्ठंती का युखमण्डल रा्रिदिव कान्तिमान रहता था अतः वद रात भ श्रीविहीन हौ जाने 
वाठ प्द्च को नीचा दिखला रहाथा ओर दिनमें वैसे ही दहो जने वारे चन्द्रको सी। 

-यदां उपमान हैः चन्र ओर पद्म, उपमेय है पाव॑तीमुख । साधारण धमं हे कान्तिमच्व, वहु 
कथित नदीं ई भौर “्व' आदि उपमावाचकं का भी यहां उपादान नहीं है । सुखने चन्द्र ओर 
प्च को नीचा दिखलायाः इस कथन से सुख का उत्कषे ओर चन्द्र तथा पद्म इ अपकषं न्यक्त 
हञा। उक्कषं तथा अपक के निमित्त भी यदा उपात्त है। वे है ुख में रात्रिदिव कान्तिमान्‌ रहना 
ओर चन्द्र तथा पद्य का 'कैवल रात्रिया केवक दिनमें।: शब्द समी इरेषरदहित हे । इसर्िएट यह 
उपात्त निभित्तक; शुडश्चब्दमूकक व्यतिरेक इजा । 


+ 
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पा क त म त म छ किकः | + 9 क । „ > 9 ति त 


'^#॥ 
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उ्यतिरेकाटड्गरः २९१ 


ह. इन दोनो हयी उदाहरण मेँ उपमा के वाचक इव आदि शाब्दो का अभाव दै अतःये दोनों 
येद गम्यौपम्य वग के हए । यदि इन्दींमं इवादि का प्रयोग कर दिया जाय तोये ही वाच्यौपम्य 
वग मँ आ सकते दै । यचपि उद्भट ने उनके उदाहरण पृथक्‌ दि हैँ । इस प्रकार चार भेद शुद्ध 
दाब्दमूलक गम्य-ओपम्य वगं के हए । इन्दं मेँ यदि इरेष का उपयोग कर दिया जाएतोयेडही चार 
दठेषभूलक हो सकते दे । उलेषमूलक व्यतिरेक आगे मम्मट ने भी माना दहै, किन्तु उद्धट के समान 
नदीं। उद्धट ने व्यतिरेक मे एक ही हयथेक शब्द का उपमान तथा उपमेय दोर्नो के साथ दो बार एथक्‌ 
पृथक्‌ प्रयोग करना ञावदयक माना दै । उदाहरण दिया है संस्कृत के (तपस्‌ शब्द को ठेकर । तपस्‌ 
काणक तो तपश्चर्यां अथ प्रसिददहै दूसरा अथं माधमसिमभीदहै। माघ ज्लिहिर ऋतु का मद्यना 

क लेता है । उद्धट ने अपने स्वनिमित कुमारस्तंभवमें इस चान्द का प्रयोग करते इए ङिखा- 

ध्या रौचिरी श्रीस्तपसा माते नकेन विश्चुता । 
तपसा तां खदीषेण दूराद्‌ विदधतीमधः ॥ 

---शिरिरकी जोश्री केव एक महिने के तपसे प्रसिद्धथी उसे जगदम्बा पावती 
अपने सुदीधे अनेक ववैव्यापी तपसे वहत ही निम्न सिद्ध कर रही थीं ।--इस प्रमे तपः 
शाब्द की योजना द्वारा व्यतिरेक साधा गया है अतः वह दिर्ष्टशब्दमूलक हे । 

इन आटो मेदोका वृक्ष इस प्रक्ञार बनाया जा सकता हे । 


ॐ; 
० 9 3.८.19 9 | 
वाच्यो पम्य॒क + २ 
॥\ ~, + + {ङ्ख र ५१ 
दिलष्टराब्दमूकक रुदरब्दमूलक -४ 
| > 1.32 
अं 
| | 
उपात्तनिमित्तक अनुपात्तनिमित्तक-८ 


यहां ध्यान देने की बात यह है किं वामन ने निमित्तके अनुपादान में मम्मट के समान तीन 
मेद न मानकर केवल एक मेद माना है । मम्मट ने ( १) उपमानापकषनिमित्तापादान, ( २) उप- 
मेयोत्कषनिभित्तानुपादान तथा (३ ) 'उभयानुपादानः इस प्रकार निमित्तानुपादान के तीन भेद 
किण है । निभित्त के उपादान का अथं दोर्नो म एक दी है अर्थात्‌ उपमानापकषं तथा उप्मेयोत्कषं 
इन दोनों के दोनो निमित्तं का उपादान । 
उद्भट का मूलयिवेचन इस प्रकार है- 
'विद्लेषापादनं यत स्यादुपमानोपमेययोः । 
निभित्तादुष्टिदृष्टिभ्यां व्यतिरेकी द्विधा त॒ सः ॥ 
भ्यो वेधर्म्यंण दृष्टान्तो यथेवादिसमन्वितः । 
व्यतिरेकोऽ सोऽमीष्टो विदेषापादनान्वयात्‌ ॥ 
दिरष्टोक्तियोग्यश्चब्दस्य पृथक्‌ परथयुदाहतो । 
विद्ञेषापादनं यत्‌ स्याद्‌ व्यतिरेकः स च स्पृतः ॥२।७१ ८॥ 


॥। 


२९.२२ अलङ्ारसवंस्वम्‌ 


रुद्रर-सवंस्वकार के व्यतिरेक का आधार वस्तुतः सुद्रट का व्यतिरेक-निरूपण दहै । रुद्रटने 
व्यतिरेक क- 
[ क ]-[ ६1] उपमेय में यणोक्ति तथा उपमान में दोषोक्ति । 
[ २ ] केवर उपमेय मे युणोक्ति तथा 
[ ३ ] केव उपमान मं दोषोक्ति। 
[ ख ]-[ १] उपमेय मं दोषोक्ति तथा उपमान में युणोक्ति। 


--इस प्रकार केवल चार मेद मनेदहैं। दोष गुणं की उक्ति गौर अनुक्तिरुद्रयकी भमाषामें 
निमित्त उपादान ओर अनुपादान दहै । रुद्रटने ज्दधट से आगे बदर निमित्तानुपादान केदो 
भेद तो किए किन्तु परवन्त मम्मट द्वारा लक्षित उमयानुपादान पर उनकी दृष्टि नदीं गई । वाच्यता 
ओर गम्यता, शुद्धता या दिल्ष्टता पर भी वे ध्यान नदीं देते। उनका मूल विवेचन इस प्रकार है- 

( १) यो गुण उपमेये स्यात्‌ तत्प्रतिपन्थी च दोष उपमाने । 

व्यस्तसमस्तन्यस्तौ तौ व्यतिरेकं त्रिधा कुरुतः ॥ 

(२) यो गुण उपमाने स्यात्‌ तत्प्रतिपक्षी च दोष उपमैये। 

मवतो यत्र॒ समस्तौ स व्यतिरेकोऽयमन्यस्तु॥ 

-उपमेय में गुण बतलाया जाय ओर उपमान मेँ उसके विरुद्ध दोष तो अलंकार व्यतिरेक 
होता है । कहीं युण ओर दोष दोनों कथित रहते है ओर कहीं दोनों मे से कोद एक । इस प्रकार 
` तन्मूलक व्यत्तिरेक तीन प्रकारका हो जाता दै। 

-इसके विरुद्ध जव उपमान मेँ गुण बतलाया जाता ओर उपमेयमें दोषतो व भी एक 
व्यतिरेक होता है । [ जिते भामह, वामन ओर उद्धटने छोड दिया है ]। इसमें विदेषता यह है 
कि उसमें गुण ओर दोष दोनोंमेंसे केव किसी एकका उल्लेख नदीं होता। नियमतः 
दोनों का ही उल्लेख रहता है, अतः इसका एक ही मेद होता है । क्रम से उदाहरण- 

( १) तुम्हारी उपमा हर ( नाद्चक दिव) से कैसे हो सकती है तुम अभुजंग [ “भुजगो विट- 
सपयोः के अनुसार भुजंग = विट अभरुजंग = अविट या विटरहित, संयमी] हो [जव कि शिव 
भुजंग = सपं से युक्त सयुज॑ग है ] भौर समनयन [ सवको वरावर मानने वले] जोदहो [जव कि 
दिव विषमनयन = रिनयन है ] -अयुजंगः समनयनः कथमुपमेयो हरेणास्सि ।2 

(२) दोषाकर [दोषा=रत्रि का कर=निमाता ओर दोषां का आकर |] 
= चन्द्र॒वम्हारा उपमान कैसे बन सकता रै। वह तो कल्की [ काले धव्बे-पृथ्वी कौ 
छाया से युक्त] ओर जड [ =जल, जलरूप] जो है [जव कि तुम निष्कलंक 
ओर चेतन हो ]। 

-सकलङ्न जडेन च साम्यं दोषाकरेण कीदृक्‌ ते ।' 

(३) तम्दारे नेत्र तरल है ओर नीलकमल निश्चल । मला श्नकी उपमा कैसे हो सकती है । 
इसी प्रकार तुम्हारा चेहरा विमल है ओर च॑द्रमा कलंक-मलिन । वह तुम्हारे चेहरे का उपमान 
कैसे बन सकता है । 

"तरर लोचनयुगरं कुवल्यमचलं किमेतयोः साम्यम्‌ । 
विमं मचल्निनं मुखं शचदिना कथमैतदुपमेयम्‌ ॥' । 

( ४ ) क्षीणः क्षीणोऽपि०? । 

मभ्मट ने व्यतिरेक के भेदो की संख्या चौबीस तक पहा दी है। उन व्यतिरेक काणक दही 
पक्ष मान्य है जिसमे उपमेय का उत्करं बतलाया जाता है । उपमेय के अपक्षं के व्यतिरेक की 


क 


उ्यतिरेकालङ्कारः २९द 


संभावना का उन्होने खण्डन किया हे । उनका व्यत्तिरेकरक्षण इस प्रकार है- 
'उपमानाद्‌ यदन्यस्य व्यतिरेकः स एव सः । 
अन्यस्योपमेयस्य व्य॒त्तिरेक आधिक्यम्‌ । 
| -- “उपमान की अपेक्षा उपमेय का 
आधिक्यरूप व्यतिरेक ही व्यतिरेकालकार कहलाताहै। इस लक्षणमें मम्मट ने व्यतिरेक 
दाब्द के अंरा अतिरेकमात्र पर ध्यान दिया । "वि" उपसग की पूर्वाचार्य-प्रत्िपादित सार्थकता को 
उन्दने स्थान नहीं दिया । रुद्रट के उपमेयगत अपक से संभावित व्यतिरेक पक्का खण्डन 


करते हुए उन्होने कहा श्षीणः क्षीणोऽपि“ “इत्यादि मे एक किसी ने उपमेय से उपमान की 


अधिकता वतलाईं हे किन्तु वह गलत है, क्योकि यहो यौवन तै अस्थैर्य की अधिकता 
ही बतलाना कवि को अभीष्ट हे ।" यहाँ मम्मटनेरुद्रट का नाम नहीं लिया श्सलिए कान्यप्रकारा 
के ऊुछ टीकाकारो ने इस मत को उद्धट ओर अरुंकारसवंस्वकार का मत बतला दिया है। वामन 
सर्कीकरने इसे अल्कारसवेस्वकार काही वतलाया है जव कि अलकारसरवस्वकार मम्मट से 
वादके हें। 
मेदां की गणनामे मम्मटने उद्धट कौ सभी विधारे अपना ली हैँ केवल प्रतीयमान 

साट्दयमूलक भेद के साथ दही उन्दने आक्षिप्त-साट्श्यमूल्क भेद की भी कल्पना करली हे। 
इसके अतिरिक्त उनन्दानि निमित्तके अनुपादानको केवल एक सेदन म।नकर तीन सेदो में 
विभक्त किया है । उनका भेदक्रम इस प्रकार है- 

“हेत्वो रुक्तावनुक्तीनां त्रये साम्ये निवेदिते। 

रान्द्ाधांभ्यामथाक्षिपे रिष्टे तद्वत्‌ त्रिरष्ट तत्‌ ॥ भर्थात्‌- 


व्यतिरेकः 
| १ | | ॥ | 
देत्ति [उपमानापकपदेतु तथा उपमेयोत्कषेहेतु दोना कौ उक्ति] _ हत्वनुक्ति 
| १ | २| ३ | 
| उपमैयोत्कषानुक्ति उपमानापकरषानुक्ति उभयानुक्ति 
| २ अथात्‌ २ अर्थात्‌ ४ | 
| 1. न 
+ ` 1 | = 1 
| | | 


श्रोतस्ाम्य-४  आ्थ॑साम्य-४ (+ ४ = <) 1/1 (+ ८ = १२) 
॥ ४ 3 
| 


| । | 
षः १२ धः १२ ( + १२ = २४) 


२४ 

आश्िप्क्षाम्य का उदाहरण मम्मट ने यह दिया है- 
“इय सुनयना वद्यसीकरेततामरसश्चिया । 
आननेनाकलङ्ुन जर्यतीन्दुं कलङ्किनम्‌ ॥ 


२९७ अलड्ारसवंस्वम्‌ 


-- यह खन्दरक्षी कमल्श्री को दासी वना लेने वाटे अपने अकट्के मुख से कट्की चन्द्र को 
जीत रही हे 1 यहां जयति = जीत रही है" इस कथन से साम्य का आक्षेप होता है । रेतसे उदा- 
हरण उद्धयनेमीदिएदहें किन्तु उन्हे गम्योपम्यमें गिना दिया है। मम्मटने उसके मी आर्थं तथा 
आक्षिप्त ये दो भेद कर दिए हें । 

परवती जाचायों मं- 


 शोभाकर-के व्यतिरेक का निरूपण सामान्यतः पूर्वपक्ष के रूप मे विमरिनी के अवाद मेँ 
दियाजा चुका हे। 


जप्पयदीक्तित-ने कुवल्यानन्द मेँ व्यतिरेक का विवेचन अत्ति संक्षेपमे कियादहै। उन्दने 
उपभेयापकपं को भी व्यतिरेक का एक भेद मानकर सर्वस्वकार के दी समान रुद्रट की परम्पराका 
भनुमोदन किया हे । उनका विवेचन इस प्रकार है- ्यत्तिरेको विशेषद्चेदुपमानोपमेपयोः । 
-यदि उपमान तथा उपमेय मँ से किंसी एक की अपेक्। दूसरे मे विद्रेषता दिखाई जाण 
तो व्यतिरेक । स्पष्ट ही यहोँ व्यत्तिरेक दाब्द की व्युत्पत्ति पर विदेष ध्यान नदीं दिया गया है 
उदाहरण 
[ १ ] उपमान से उत्कर्षं का उदाहरण यथा -- दला इवोन्नताः सन्तः किन्तु म्रक्ृतिकोमख[: 12 
सन्त रोग पर्व॑ताँ के समान उन्नत तो होते है परन्तु स्वभाव से कोमल रहते हे । 
यहाँ उपमेयभूत सन्त प्रकृतिकोमल्ता मेँ उपमानभूत कठोर पर्वतो से उक्ष प्रतिपादित हे । 
[ २] उपमेय के अपकधं का उदाहरण~--सर्वं तुल्यमशोक केवलमहं धात्रा सदयोकः कृतः? । 
-दे अरोक, तुम्हारी ओर मैरी ओर सव व्रते तो समान हैँ, केवर इतना ही अन्तर है कि 
देवव तुम रोक दो ओर मेँ सोक । 
दीक्षित जी के अनुसार यहाँ वक्ता ने अथात्‌ उपमानभूत अश्योक ने स्वयं को शोकाभाव 
मे छोटा प्रतिपादित किया है। ध्वनिकार तथा पण्डितराज जगन्नाथ ने यदहं उपमादूरीकरणको 
तास्येविषयी भूत माना है । जो जंचता है । 


(२ ) अनुमयपय॑वसायी [ न तो _विसी के अपकषं मेँ पय॑वसित होने वाला ओर न किसी 
के उत्कषे में | यथा-- 


'ढतरनिवडमुष्टेः कोदानिषण्णस्य सहजमलिनस्य । 
कृपणस्य कृपाणस्य च केवलमाकारतो मेदः ॥ 


--करपण भौर कृपाण मँ मेद केवल (आकारः [ आः अक्षर तथा आकृति ] को लेकर दहै वैसे 
दोनों ही बद्धमुष्टि होते है [कृपाण मे सुष्टि= मूठ = त्सरु, कृपण मेँ खचं न करना ] दोनों ही 
कोडा स्थित [ कोद्य = म्यान, खजाना ] रहते हैँ ओर दोनो ही स्वभावतः मजिन [ मलिनता = 
गंदगी, दयामता ] होते दै» यदुं कृपण ओर कृपाण में मेदमात्र प्रतिपादित किया गया है किसी 
का किसी सै उत्कषं या अपकषप नदीं । भ्यक्तिविवेककार ने .श्स पच के वाक्यां पर आपतन्तिदी 
है । उनका त्क ३ेक्िं (आकारः का अथं है आः अक्षर । उसे लेकर दोनों अर्थो का अन्तर मरति- 
पादित नहीं किया जा सकता किन्त उन्होने माना यदं व्यतिरेक ही है। यदपि इस संदभं में 
एेकान्तिक रूप से यह नदं कदा जा सकता कि उनका भ्यतिरेक रान्द अल्कार के किए ही प्रयुक्त 
हे । पण्डितराज जगन्नाथे भी इते दूषित ठहराया है ओर इसमे केवल दलेषमूलक उपमा दी 
स्वीकार की हे। उनका कथन है कि यदौ केव दरीर्घाक्षर मात्र में अन्तर प्रत्तिपादित करते का 
तात्पयं दै स्व॑था साम्य । क्योकि अक्षरमात्र के अन्तर से अथंगत कों वास्तविक अन्तर सिद्ध नदीं 
होता) उनका कना टीक भी है, विन्तु कुवल्यानन्द की टीका, चन्द्रिका कै रचयिता वरैयनाथ ने 


व्यतिरेकालङ्कारः ` २९४ 


पण्डितराज की इस मीमांसा को अत्यन्त तुच्छ वतलाया है ओर यदहौँ तक कदा है किं यह इतनी 
तच्छ दहे कि इसे उद्श्रत मी करना अनुचित हे ।' य॒ उनकी मूलभक्ति ही हे । 

पण्डितराज जगज्नञाथ--(उपमानाद्‌ उपमेयस्य गुणविन्लेषव््वेनोत्कर्षो व्यतिरेकः ।° 

--उपमान से उपमेय का युणविद्ञेष के आधार पर उत्कं व्यतिरेक । इस लक्षण के अनुसार 
पण्डितराज उपमेयापकपं से व्यतिरेक कौ निष्पत्ति स्वीकार नहीं करते । वे उसका] खण्डन भी 
करते हे । उद्भट की व्यतिरेककारिका मे वैधम्यं चन्द आया है) उससे म होता है कि कदाचित्‌ 
व्यत्तिरेक सधम्यं के साथदहौी वेध्य से मी निष्पन्न होता है। पण्डितराज जगन्नाथ उसका स्पष्टी- 
करण कर देते । वे वेध्यं को व्यतिरेकानुभूति मे मिन्न प्रतिपादित करते हैँ। सच भीदहै। 


ग्यतिरेकवरोध के लिए अपेक्षित साधम्यं यदि दृष्टान्त ब्गदि जेते वैषम्यं दारा प्रस्तुत हो तो काव्य : 


पहेली वन जाएगा । आक्षिप्त अथवा आर्थं सादृर्य र मानस बोध सीधे साद्य से ठकर।ता है, 
जव फि तेधम्य म साद्रद्य कै अभाव से। इसत प्रकार यहाँ व्यतिरेक बोध की भूमिका तिर्मेनली 
वन वेठतौ हें । उद्भट कै वेधम्यं ब्द का अथं विपरीत धर्मं नदी, “भिन्न धर्मः ३, ओर इस अं मे 
स्वयं पण्डितराजने भी वेधम्यं राब्द का म्रयोग इस प्रकरणसे किया हे पण्डितराजने व्यतिरेक 
शाब्द के दोना अवयवो पर भी ध्यान दिया है--“वि-उपसगे पर भी ओर अतिरेकः शब्द पर 


भी। “विः उपसग कौ उन्दने विदेषाथैक मानकर उसका अथं युणविदेष किया तथा अतिरेक , 


का उत्कपे । यह्‌ वल इस्ङकिए कि यह दाब्द्‌ चल चुका ह, परम्परागत हे। अन्यथा “जतिरक- 
राब्दमात्र पयां शआ । अतिरेक विना विशेषता कै संमव नही, जतः विदोषतः का अपने आप 
आक्षेप संभव था । 


पण्डितराज ने व्यत्तिरेक के चौवीस भेद मम्मट केही अनुसार स्वीकार कर किए है किन्तु 
दरेषमूलक व्यतिरेक मे कहीं उभयानुपादान को असमव प्रतिपादित किया है । यथा- 
"भवान्‌ सदसः समुपास्यमानः कथं समानखिद शाधिपेनः 
--आपकौ तुलना डइन्द्रसेकेसेकोजा सकती है । आप की सेवा सहसो करते है अतः आप 


सलाधिप हं जव कि इन्द्र केवल त्रिदशाधिप ।' य॒दाँ 'त्रिदञ्चाधिपः शब्दके दयो अ्थहै(१). 
त्रिदश = देवता तथा (२) तीन गुणा दश तीस अथवा तीन ओर दश्च = तेरह । इस प्रकार व्यतिरेकी ` 
अथ यह निकला कि जो त्रिदशाधिप अर्थात्‌ केवर तौस अथवा तेरह का स्वामी है वह सहल 


क स्वामी का उपान कैसे वन सक्ता है । यहं यदि चरिद्ाधिपत्व तथा सहखाधिपत्व ये विभिन्न 


धम हरा दिए जा तो वाज्याथै ही निष्पन्न नहीं होगा, क्योकि व्यतिरेकसिद्धि तो दूर की वस्तु. 
हे न्द्र से राजा कौ तुरना अनुचित हैः य्‌ स्थापना निर्म रही आणगी । पण्डितराज के : 
इस तकं को नागेश ने भौ प्रदीपौचोत मेँ स्वीकार किया है। किन्तु यह तकं वीं तक सीमित है: 
जदा ल्प व्यतिरेकसाधक विशेषणो मे ही हो। इलेष जह केवर साम्यसाधक विशेषणो मै : 


रहता है गौर व्यतिरेक की सिद्धि अन्य विशेषणो से होती है वदँ तीनो अनुपादान संमव है ओर 
अलंकार कौस्तेमकार विश्वेश्वर पण्डित ने भी मम्मर कै ही समान दलेषमे मी श्स प्रकार के 
तीनो अनुपादानों के यथावत्‌ उदाहरण दिए है । अगे अरकारकौस्तुभकार ॐ प्रकरण मे इन्द 
देखा जा सक्ता हे । संख्यानियम पर्‌ दूसरी वात पण्डितराज ने य्‌ भी की है कि व्यतिरेक 


साद्रद्यमूलक होता हे अतः सादृद्य के जो २५ भेद उपमा में हए ह वे सव यहाँ भी संभव है जिससे . 


व्यत्तिरेक को मेदसंख्या बद भी सकती है । 


पण्डितराज जगन्नाथ ने सर्वस्वकार द्वारा श्षीणः क्षीणोऽपि ० पथ मे प्रतिपादित उपमेयापकष- 
मूलकं व्यतिरेक का मम्मट तथा दोभाकर ङ हयी तकौ मे खण्डन किया है । विशेषता यहु है कि; 


२९६ अच्छ्लारसवस्वम्‌ 


उन्दने विमरिनीकार द्वारा किए गए इसके मण्डन का अक्षरक्षः अनुवाद किया ओर उसपर 
भी निम्नक्खित आपत्तियां दी हे मले ही यह उक्ति नायिका की हितेच्छु किसी प्रियसखी 
कीहो तव मी इसमें उपमैयभूत यौवन में उपमानभूत चन्द्र की अपेक्षा गुणाधिक्यं ही विवक्षित 
है, गुणत्व नदीं । इससे विवक्षिताथं की पुष्टि अभिक होती है क्योकि इस उक्ति से सिद होता दै 
कि चन्द्र पुनः पुनः कौट आता हे भतः खलम है जतः उसका उतना माहात्म्य नहीं है । यौवन 
कदापि नदीं लोटता इसि दलम है ओर इसीलिए वह अधिक उत्कृष्ट है । उत्ते मान आदि विध्न- 
भूत कायो से असफल नहीं होने देना चाहिए ¦ जह्य कलय उपमेयगत अपक्षं मी प्रतिपादित 
रहता हे वहो मी वहु अपक्षं वस्तुतः उत्कं मे ही परिणत होने वाखा होता है। जेते च्चन्र दी 
मला हैजो क्षीण होकर पुनः पुष्ट हदो जाता है, इस यौवन को थिक्रार है जो क्षीण होकर पुनः 
नहीं लोरता ।› यहाँ धिक्कार धारा मान के प्रति आकरो व्यक्त किया गया है ओर वह आक्रोदा 
योवन के लाम कै प्रति क्षणमर भी उदासीन न रदने का संकेत देता है । 

विश्वेश्वर पण्डित ने अल्कार कोस्तुम मे केवर उपेयोत्कषं में दी व्यतिरेक स्वीकार किया है, 
उपमेयापकपषं में नहीं-- “उभयोः साम्वप्रोक्तो विदोष उपमेयगे व्यतिरेकः ।' 

- दोनो के साम्य प्रतिपादित हों तवर यदि उपमेयमें वैरिष्टय बतलाया जाय तो व्यतिरेक 
होता हे  न्यत्तिरेक शब्द कौ व्युत्पत्ति में विदवेरवर ने परम्परा को तोड दिया है । उन्दने व्यतिरेक 
का अथं व्यावतंन = अल्गाव किया है--त्यतिरिच्यते उपमानाद्‌ व्यावत्यतेऽनेन उपमेयमिति 
च्युत्पत्तेः [ व्यतिरेकः |' = उपमान से उपमेय जिसके दारा हटा लिया जाय 

व्यतिरेक में क्षीणः क्षीणः प्रच द्वारा प्रथमतः रुद्रट द्वारा प्रतिपादित ओर प्रथम सर्व॑स्वकार 
दारा अनुमोदित उपमैयापकषंजनितत्व का जसा खण्डन प्रथमतः मम्मटने कियादै ओर उस 
खण्डन का पण्डितराजने जेसा अनुमोदन कियादै विद्वेदवरनेमी उत्ते उसी रूपमे स्वीकार 
कर लिया है । वे लिखते है- 

न चन्द्रयौवनयोरूपमानोपमेयमावो विवक्षितः, किन्तु चन्द्रयोवनक्षययोरेव, तत्र चन्द्रक्षयस्य 
बृद्धिप्रागभावस्षमकरालीनत्वेन न्युनत्वम्‌, योवनश्यस्य चाये तच्छरीरावच्छेदेन योवनामावात्‌ 
समानाधिकरणयोवन प्रागमावक्षमानकालीनत्वं नास्तीत्याधिक्यम्‌ । एवं च विवक्षितस्य मानत्याग- 
स्यावदयकत्वसिद्धिः ॥ 

- यहाँ उपमानोपमेयभाव चन्द्र मर यौवन का नदीं अपितु उनकेक्षयोंका प्रतिपाबङहै। 
दोनो क्ष्या मे चन्द्र का क्षय तव तक ही रहतादहै जव तक चन्द्रकी बृद्धि श्चुरू नदीं होती भतः 
वह क्षय क्षणिक दै अतश्व न्यून है, यौवन का क्षय किसी अन्य यौवन के पहले तक रहने वाला 
नहीं क्योकि एक रारीरमें दूसरा यौवन नीं आता, इसच्िएि वह स्थायी है ओर इसीलिए 
अधिक है । हस प्रकार मानत्याग की आवरयकता सिद्ध होती दै ।' 

व्यतिरेक के मेद भी विदवेदवर ने मम्मट के ही अनुसार चौवीसर माने है- 

८हानिप्रकरष॑हेत्वोरुक्तौ तरेधा च तदनुक्तौ । 
राब्दा्थक्ेपोत्ये साम्ये इलेपे च दिग्युगमितः सः ॥ 

--“उत्कषं ओर अपकर" इन दोना की उक्ति, एक-एक ओर एक साथ दोनों की तीन अनुक्ति 
जहां शब्द, आथं ओर भाक्षेपलभ्य साम्य होने पर अथवा इलेष होनेपरदहो तो व्यतिरेक 
युग = दो तथा उस पर दिक्‌-चार अर्थात्‌ र२ण्मेद होते हँ । पण्डितराजने ररेषमें त्रिविध 
अनुपादान कौ जो अक्यता ध्वनित की थी, उसका मोन उत्तर देते ए विदवेदवर ने उरेषमूलक 
तीनों अनुपादानों के तीन उदा्रण दे दिए दहै । वे ये है- 


व्यतिरेकालङ्कारः २९७ 


दोनो हेतुओं की अनुक्ति- 
अतिनिबिडस्य हृताखिर्दनराक्तेस्तमोव्रजस्येव । 
धम्मिल्लस्य न तेऽसिदयामलता तेजसा नादया ॥' 

-तन्हारा केडपाश्च ध्वान्तस्ंधात केही समान भत्यन्त धना ओर प्रत्येक की समय 
ददोनराक्ति नष्ट करने वाला हे। किन्छ॒ इसकी असिघुल्य दयामता प्रकाश्चनारय नदीं हे। 
यहां व्यतिरेक हे श्यामताः के प्रकाद्चानादयत्व मँ ओर देष है अत्तिवनत्व मादि विद्धोषण- 
वाचक राब्दों मेँ । 

उत्कषद्ैसव नुक्ति- 

'सकल्लोचनमानसहारिगोऽतिद्यितां दधतः सुकुमारताम्‌ । 
तव मुखस्य रुचिनं परिच्छदां भजति भास्वदधौनसरोजवत्‌ ॥ 


-- (तुम्हारा चेहरा प्रत्येक व्यक्तिके नेत्र ओर चित्त दोनोंको आङ्ृष्टकर केतादै ओर 
अत्यन्त सुकुमारता किए हे । इसकी छवि सूयं के अधीन कमल की छ्वि-सौ परिच्छिन्न नदीं है ।* 
यदा कमर की छ्विकौी परिच्छिन्नतमें हेतुहे सूयांबीनता, वद्‌ कथितदहै। सुखकौ छविकी 
अपरिच्छिन्नताका दहेतु कथित नहीं हे। इस प्रकार अपरिच्छन्नतारूपौी उत्कषं के हेतु कौ यहां 
अनुक्ति हे । इटेष दै "सकल ०? इत्यादि विशेषणार्थ मं । 

अपकष॑हेरवनुक्ति- 

"वरां मावयतो निखिलजनोल्छासनाहेतोः । 
अपचयर हितस्य तवाननष्य नेन्दोरिव दुतेदानिः ॥ 

-- तुम्हारा चेहरा भोर चन्द्र दोनों ही उज्ज्वल वण॑केदहे ओर दोना ही प्रत्येक व्यक्ति को 
उरलसित कर देतेहै, किन्तु तुम्हारा चेहरा चन्द्रकी नाई घटता-बदता नदीं है अतः इसकी 
छवि मे चन्द्र की छवि-सी हानि नदीं है यद चन्द्रको छवि मे अपकष का हेतु हानियुक्तत्व 
कथित नहीं हे । 

विदवेदवर के उदाहरणं की अपेश्चा मम्मट के उदाहरण अभिक अच्छे हे । मम्मटका 
उदाहरण है- 

जितेन्द्रियतया सम्यग्‌ विदाबृद्धनिषेविणः । 
अतिगादथुणस्यास्य नान्जवद्‌ भङ्गुरा युणाः ॥ 

--यहं जितेन्द्रिय है, विचाब्रद्धो कौ सेवा करता रहता है भौर इसके गुण अत्यन्त गाढ हे 
इसलिए इसके गुण कमल के समान भङ्गुर नहीं है ।' यँ गुण शब्द मेँ उसी प्रकार दल्ेष है 
जिस प्रकार उद्धट के उदाहरण म (तपसः शब्द मँ । कमलके गुण मङ्खर हे ओर वण॑नीय 
पुरुष के गाद्‌ । इप्त प्रकार उपमानभूत कमलके युणों में अपक्षं का हतु भङ्खुरत्व राब्दत 
कथित हे ओर उपमेयभूत पुरुष के गुणो म उत्कषं का हेतु गाढत्व । य॒दि इनमे से एक वार एक 
एक का उपादान क्रिया जाय ओर दूसरी वार दोनों को छोड दिया जाय तव मी गुण शब्द में 
दइरेष रहेगा ओर तीनों अनुपादान बन जार्पैगे । 

वस्तुतः साम्य की वाच्यता ओर अवाच्यता से चमत्कार म कोई अधिक अन्तर नीं आता 
फलतः प्राचीन आलंकारिकों द्वारा प्रतिपादित मेदक्रम ही अधिक उपयुक्त है । 

इस प्रकार प्रायः सभी आचार्यो मे केवल रुद्रट, स्वस्वकार तथा अप्पय्यदीक्षित ही रसे 
आचाय हे जो उपमेयगत अपक्षं मे भी व्यतिरेक मानते हें । भामह, वामन, उद्भट, मम्मट, 
श्ोभाकर, पण्डितराज तथा विदवेद्वर केवर उपमेयगत उत्कष में ही व्यतिरेकं प्रतिपादित करते है । 


२९८ ॑ अच्छडारसवेस्वम्‌ 


संजीविनीकार श्रीविघ्याचक्रवतीं ने व्यतिरेक के सवेस्वकारक्त संपूण प्रतिपादन का संक्षेप 
इस प्रकार किया है- 
“मेद प्रधाने साधम्यं व्यतिरेको विधीयते 
आधिक्यादुपमैयस्य न्यूनत्वाद्‌ वोपमानतः ॥` 
-साधम्य॑में यदि मेदकी प्रधानताडहोतो उपमान की अपेक्षा उपमैयु के उत्कपं अथवा 
खपकषं ते व्यत्तिरेक होता है । 
| सव्व | 
॥ घ्‌° ३० | उपमानोपमेययोरेकुस्य प्राधान्यनिर्देशेऽपरस्य 
सहाथसबन्धे चहोक्तिः । - 
मेदप्राधान्य इत्येव ।` गुणपघानभावनिमित्तकमत्र मेदप्राधान्यम्‌ । 
सदहाथप्रयुक्तश्च शुण्रधानभावः । उपमानोपसेयत्वं चान्न वैवश्धिकम्‌ , 
योरपि पराकरणिकत्वादग्राकरणिकत्वाद्धा । सखदार्थसामर्थ्यद्धि तयो 
तुस्यकक्लत्वम्‌ । त्न तृतीयान्तस्य नियतेन गुणत्वाद्पमानत्वम्‌ । अर्थाच 
परिशिष्टस्य अभधानत्वादुपत्ेयत्वम्‌ । शाब्दश्चा्च शुणग्रवानमावः । 


वस्तुतस्तु विपययोऽपि स्यात्‌ । तत्र नियमेनातिशयोक्तिमूखत्वमस्याः। 
सा च ज्ायकारणप्रतिनियभविपयेयरूपा असमेद्ध्यवसायसरूपा च । 
अभेदाध्यवसायञ्च श्छेवभि्तिकोऽन्यथा वा । साहित्यं चान्न कर्चादिनानाभेदं 
ज्ञेयम्‌ । तन्न च 
कायेकारणप्रतिनियमविपयेयरूपा खथा-- 
“भवदपराधेः साधं संतापो वधेतेतरामस्याः ।' 
अच्रापराधानां संतापं प्रति हेतुत्वेऽपि तुद्यकाटठव्वेनो पनिबन्य; । 
ष्टेषभित्तिकाभेदाध्यवसायरूपा यथा- 
“अस्तं भास्वान््रयातः सह र्वुभिस्यं संहियनन्तां वलानि । 

अच्रास्तं गमनं श्लिष्टम्‌ । अस्तमित्यस्योभयाथत्वात्‌ ॥ 

[ सू० ३० { [ भेद की प्रधानता रदने पर ] यदि उपमान जीर उपमेय मंसे 

एक की प्रधानता बताह गह हो ओर दृखरे मे (साथः-वाचक किसी शब्द्‌ से 

प्रतिपादित अथं का [ अग्रधानताद्योतक ] संबन्ध हो तो [ अरंकार ] .सहोक्ति 

[ कहराता टै | । | 

[ बृ० ] [ यद्धं ] भेद की प्रधानता इतना पदरेसे ही प्राप्त है, [किन्तु] यदाँमेदकी 
मभानता निर्भर रहती है अप्रधानता तथा प्रधानता पर गौर अप्रधानता तथा प्रधानता निष्पन्नः 
होती हे सह = साथः शव्द कै अथं कै कारण । यहाँ जो उपमानत्व ओर उपमेयल्व है वे विवक्षाधीन 
रहते हं । यह इसकल्थ क्रियातो दोनों अर्थं प्राकरणिक ही रहते दै या अप्राकरणिक द्य ।, 
। उपमानोपमेयभाव के लिट भपेक्चित ] साम्य उनम “सदह = साथः शब्द्‌ के अथंसे आताहै। 
उनमें मी जिसको तृतीयाविभक्ति [ सस्रत व्याकरण के अनुसार "सदः शब्द के प्रयोग होने परः 
अप्रधान स्के वाचक शब्द के साथ प्रयुक्त होने वाली विभक्ति] जिसके साथ र्गती है उस: 


सदोक्त्यलङ्ारः ` २९९ 


खब्द का अथं नियमतः अप्रधान रहता दै अतः वही उपमान माना जाता है, देष वचा प्रथमा- 
विभक्ति से युक्त ब्द का अथैतो वह प्रधान होता है अतः वह अपने ही उपमेय सिदद 
जाता है । इस प्रकार यँ प्रधानता अप्रधानता का निर्धारण केवल राब्दस्थिति [ ओर तउ्ननित 
बोध ] पर चिभ॑र रहता हे, अथंस्थिति तो विपरीत भी ह्यो सकती है । 

इसका आधार सदा ही अतिशयोक्ति वनती है), सत्िरायोक्ति मीदो प्रकार की (१) कायं 
कारणमावके पो्वापयं के विपर्यय से होने वाली ओर (८२) अभेदाध्यवसानमूलक । इनमें से 


अभदाध्यवसाय यहां दोनों दही प्रकारकादहो सकतादहै (१) दरेषमूलक मी यर (२) शुद्ध 
[ इलेषरहित ] मी । 


यद जो सादिव्य = सहाथक दाब्दं से प्रतिपादित सम्बन्ध रहता है वह कर्ता, कमं आदि 
कारको मे होता हे, ॐतः वह अनेक प्रकार का होता ₹ै। इनमे से- 

कास्कारणमाव के विपर्यय से निष्पन्न अतिरयोक्ति पर निर्भर सदोक्ति यथा-आपके 
अपराधो के साथ इसका संताप वदतादहीचलाजा रहाहे। 

- यहां [ नायक के द्वारा किएगए] अपराध संताप कै प्रति कारणदहं तथापि उनको एक 


साथ उत्पन्न होता बतराया गया हे । इटेषमूलक अभेदाध्यवसाय रूप अतिदायोक्ति से निष्पन्न 
सदोक्ति यथा- 


यह सूयं राच्रेओं के हौ साथ अस्त को प्राप ह्‌ गया ह । अब सेनां वयेर टी जोँट 
- यदह अस्त को प्राप्न होना दिलष्ट हे क्योकि 'अस्तः-दाब्द उमया्थक [ इवना, नष्ट होना 
इन दो अर्थो मं प्रयुक्त ] हे । 
विमरिनी 


उपमानेत्यादि । किटेतुकं चात्र डेद्‌म्राधान्यसिष्याशङ्ध्याह--गुणेत्यादि. ' गुणप्रधानः 
भावोऽपि किहेतुक इ्याह~ सदहार्थैत्यादि । एकस्य प्रधानभूतविभक्तिनिदंशादन्यस्य च 
विधिविभक्तिनिदंखात । वेवक्तिकिमिति न पुनर्वास्तवस्‌ ¦ उपमानोपमेयस्वं हि द्रयोस्तु- 
ल्यककसवे भवति तच्चात्र किनिसित्तकमिष्याज्ञङ्कवाह-- सहार्थत्यादि । परिशिष्टस्येति प्रथ- 
मान्तस्य । चान्द इति न पुनरर्थः, वस्तुतो विपर्ययश्यापि संभवात्‌ । एवं गुणप्रधानः 
भावनिमित्तकं सेदभाधान्यमपि शाब्दमेवत्र केयम्‌ । वस्तुतो हि खादश्यस्येव पयवसा- 
नाद्धेदाभदयोस्तुल्यष्वेनेव प्रतीतिः । तस्माच्छाब्दमेव मेद्‌ प्राधान्यमाभिस्येहास्या वचनम्‌ । 
विपयय इति । प्रधानविभक्स्या निदिष्टस्याप्राघान्यं गुणदिभक्व्या च निर्दिष्टस्य प्राधान्य । 
नियमेनेति । अनेनातिश्योवस्यनुश्राणनमन्तरेणाल कारस्वमेवास्या न भवतीति ध्वनितम्‌ । 
सेस्यतिन्ञयोक्तिः। कायकारणयोः प्रतिनियमस्य क्रमस्य विपर्थयस्तुस्यकालस्वादि नोक्तेः। 
अन्यथेति अश्लेषरूपः । तदेवसध्या अतिज्चयोक्तिमेद चतुष्टयमनुप्राणकम्‌ । कन्नादीति आदिः 
काब्दात्‌ कर्मादयः। तत्रेति निधारणे । [ कायंकारणपतिरदियमविपयंयरूपेति | । अस्या 
मनुप्राणकस्वेन स्थितेति शेषः । अन्नापराघानां शचाञ्दो गुणभावः। वस्ततस्तु प्राधान्यं 
तेषामेव, प्रतिपाद्यत्वात्‌ । एवमन्यन्न ज्तेयम्‌ । 'दयमेति सा वराकी स्नेहन समं त्वदीयेन 
हस्यस्याधंमर । द्ुव॑न्त्वाप्ता हतानां रणशिरसि जना वह्भिसाद्‌ देहभारानश्रन्मिध्रं कथंचिद्‌ 
दतु जलममी बान्धवा बान्धवेभ्यः । मागंन्तां ज्ञातिदेहान्‌ हतनरगहने खण्डितान्गृध् 
कड्कैः" इव्यस्याद्य पादत्रयस्‌ । 
उपमान इत्यादि 1 "यहा मेद कौ प्रधानता का आधार क्या है" इस रका पर उन्तर देते है- 
श्ुण०* अप्रधानता' 1 श्ुणप्रधानमाव = अप्रधानता भौर प्रधानता किस पर निंर दहै" इस 
रका पर॒ उत्तर ह--(सहाथ० ।› एसा इसलिए कि एक मे रहती दै प्रथानभूत विभक्ति ओर 


३०० अलङ्ारसवंस्वम्‌ 


दूसरे मँ विथि [ सग्रथानभूत ] विभक्ति का निर्देश रहता है। वेवङ्धिक = विवक्षाधीन अर्थात्‌ 
वास्तविक नदीं । उपमानोपमेयभाव होता है तव जवदो पदार्थो मेँ समानता रहती दहै। यदह 
समानता यहाँ कैसे निष्पन्न होती है--इस डंका पर उत्तर देते है--"सहाथंसा०'। परिशिष्ट = 
दोष अर्थात प्रथमा विभक्तिसे यक्त पदका अथं । ज्ञाढ्दं = राब्दजनित बोध पर निभेर, न 
कि अर्थं पर निर्भर । क्योकि वास्तविक स्थिति विपरातमभी दहो सकती दै। इस कथन से निष्कषें 
यह निकला कि प्राधान्याप्राधान्य से जनित येद की प्रधानता मो सहोक्तिः में दाब्दजनित 
बोध पर निर रदैगी । ओर, सत्यतो यदै कि यँ अन्तम प्रतीत होता है साद्य ही, 
अतः यहाँ “भेद गौर अभेद” इन दोनों की प्रतीति समान सू्पसेही होती है। इसकिण दाव्द- 
जनित वोध पर॒ निमंर भेदप्रधानताको दही लेकर यदहं इस मेदप्रवान अलका के प्रकरणम 
सदोक्ति क) रखा गया ह। “विपयंय = विपरीतस्थितिः = प्रधान विभक्ति [ प्रथमा ] से निर्दिष्ट 
भी अप्रधान हो सकता दै ओर अप्रषान विभक्ति [ तृतीया ] से निर्दिष्ट भी प्रधान । नियमेन = 
नियमतः सदा ही । टेसा कहकर यह संफेत किया कि सदोक्ति अतिशयोक्ति की सहायता के विना 
अलंकार ही नहीं बनती । ख। = वह = अतिदाय)क्ति । काय ओर कारय का प्रतिनियम = क्रम = 
नियमतः वाद मे ओर पहले उत्पन्न दोना, इसका उलट जाना अर्थात्‌ दोनों का एक साथ उत्पन्न 
होता हसा वतलाया जाना या काये कौ पले तथा कारण को वाद्‌ मेँ । अन्यथा = दूसरे प्रकार 
का = इेषरहित । तो इस प्रकार च।र प्रकार की अतिशयोक्ति से यहाँ सदोक्ति को सहायता 
भिलती ह । कन्तां आदि, अदि पद से क्म आदि भी। तत्र = उनमें यह परस्पर में अन्तर वतरने 
के छिए कहा जा रहा हे । | कायंकारणप्रतिनियमवि पयंयरूपा = ] अर्थाव्‌ यह अतिशयोक्ति 
जदा अनुप्राणक = सहायक रूप से स्थित रहती है वह्‌ मेद । य्ह [ भभवदपरापैःः० मेँ ] अपराधो 
कौ अप्रधानता केवल इसङिए है कि यदह उसके वाचक पद = अपराध मेँ ठृतीया विभक्ति जोड़ी 
गदं है, वस्तुतः प्रधान वे ही हैः क्योकि यँ प्रतिपायवे द्यी हैं इसी प्रकार अन्य उदाहरण में 
भ जानते रहना चाहिए 1 इस [ (भवदपराप्ैः प्० ] का उत्तरां यद दहै-- क्षयमेति सा वराकी 
स्नेहेन सम॑ त्वदीयेन" = वद॒ वेचारी तुम्हारी प्रीति केही साथक्षयको प्राप्त होतीजारहीदहे। 
इस्त [ “अस्तं भास्वान्‌० प्य ] के प्रथम तीन चरण ये है-- 

(कुवन्त्वाप्ता हतानां रण्चिरस्ति जना वहिसाद्‌ देहमागा- 

नश्रुन्मिश्र कथच्चिद्‌ ददतु जलममी बान्धवा बान्धवेभ्य॒ः । 

मार्गन्तां ज्ञातिदेदान्‌ हतनरगहने खण्डितान्‌ गृश्कङ्कैः" 

--अवजो आपदहैः वे लोग युद्धस्थल मँ खत लोगों की अन्त्येष्टि करये लगे हैः उनकी र्चो 
को देर, ये[ चार्यो ओर रोते विरुखते ] भाई बन्ध अपने माई बन्धां को अश्रुन्मिश्र [ ्ओंओं से 
मिश्रित ] पानी जैते तेते दे ठ; [ जिन्हें अभी तक अपने भाई बन्धुं की लं नदीं मिली हैवे] 
अपने माई बन्धुभं की लाँ फिर से खोजें, वहाँ खोजे जहां आदमियों कौ राशो के पुराने टेर ल्गे 
है, उन्हे काले ओर सफेद गिद्ध ने विक्त कर दिया होगा-[ उनके नाक कान ओंख नोच खा 
होगी ] ।--वेणीसंहार ५।३६। | 

॥५्‌ 
| सवस्व | 
तदन्यथाङरूपा यथा- 
कुमुदवनैः खद संश्रति विधटन्ते चक्रवाकमिथु नानि ।` 


अच्च विधंडन संबन्धिभेदाद्धिन्नं न तु दिष्टम्‌ । 


हिदि ७ 9 ~~~ र प 


सहोक्त्यलृङ्ारः ३०१ 


~ पतद्धिरोषपरिहारेण सटोक्तिमान नालंकारः । यथा- 


“अनेन साघ विहराम्बुराेस्तीरेषु ताटीवनममरेषु' इध्यादौ । पतान्येव 
क तृसादहित्ये उदाहरणानि । 


कमंसादित्ये यथा- 


दुजनो सखव्युना साधं यस्याजौ तारकामये । 
क, भ 
चक्रे चक्राभिधानैन पेष्येणाक्तमनोरथः ॥' 


सच करोतिक्रियपेक्चया चनस्य सरत्योध्ध कर्मत्वम्‌ । 


पषा च माख्यापि भवन्ती दश्यते । यथा- 
'उत्द्चत्तं सह कौशिकस्य पुलकैः साधं सुखेनीमितं 
भ्रूपानां जनकस्य संरायधिया साक समास्फालितम्‌ । 
वेदेद्या मनसा समं च सहसाकृ्ं ततो भागव 
[} = [| सः, ¢ 
प्रोढा्हंङूतिकन्दलेन च समं तद्‌ भग्नमैरां घञः ॥।' 

शद अतिशयोक्ति पर निभर सदोक्ति यथा- 

--कुसुदवनों के साथ इस समय चक्रवाको के जोड़े मी अलग-अलग दहो रहे हें। 

-- यहां अलगाव में रेष नदीं है [ क्योकि वह मूलतः अनेकाथक नदीं हे ] वद सम्बन्धी 
[ कुखुद, चक्रवाक ] के भेद से भिन्नरूप बन जाता है [ कुयुद के साथ खिलने = पुडिया के अल्ग- 
अलग होने रूप मे, चक्रवाक के साथ बिद्धुडने रूप मे ] | 

विरोषता [ अतिरयोक्ति कौ सहायता] के विना केवर सह = साथः राब्द या इसके 
समानाथैक राब्दका प्रयोग करने पर [ सदोक्ति वस्तुमात्र होती दै उसमे ] अलंकारत्व नहीं 
आता । यथा- 

"इसके साथ समुद्र के तें पर विहार करो, जहोँ ताङीवन लगा होगा ओर उसमे मम॑र- 
ध्वनि दहो रही होगी [ इन्दुमती स्वयंवर-रघुवंड ] 1 - इत्यादि में । [ अतिरायोक्ति से निष्पन्न 
सहोक्ति की सहायता के किए दिर गए ]येजो उदाहरण है, [ इनमें जिन-जिन अर्थौ का साथः 
प्रतिपादित है वे= अपराध ओर संताप, सूयं ओौर सेना, कुखदवन ओर चक्रवाक-सभी कर्तां के 
रूप प्रस्तुत है अतः ] ये समी [ उदाहरण ] कतैसाहित्य के उदाहरण है । 

कर्म--[ के साथ कमे के ]-सादित्य का उदाहरण । यथा- 

“जिसके चक्र नामकं प्रेष्य = [ मेजने योग्य सेवक ] ने युद्ध के बीच, ख्रत्यु के ही साथ देवताओं 
को भी तारकासुररूपी बीमारी के विषय मं पूर्णेच्छ कर दिया ।' 

[ यहाँ 'तारकक्षयेः पाठ अधिक अच्छा रहता ] ।-- यद्य "करनाः-क्रिया में देवता ओर भ्त्यु 
दोनां कमं है । | 

यद [ सदहोक्ति ] मारा रूपमे मी दिखा देती है । यथा- 

-- भगवान्‌ राम ने भगवान्‌ रिव का धनुष विश्वामित्र के रोमांच के साथं खड़ा किया, 
राजाओं के सुखो के साथ नवाया; जनक जी की संदेहबुदधि के साथ आस्फाल्ति किया [ प्रत्यंचा 
चदाकर दो-चार वार उसे गूढा ओर तजनी से कु कुछ खींचकर छोड़ा, बुद्धिपक्ष मे आस्फालन 
उभाड़ना, उछाल्ना = द्र° "भास्फालितं यद प्रमदाकराग्रे° रघुवंश्च-१६ ] जानकीजी के हदय के 
साथ खींधा गोर परश्चुराम के प्रौढ भदहंकार के साथ टरक-टूक कर डाला 


| 


1 ररि + । 
1 


३०२ अटठ्ारलवेस्वम्‌ 


विभर्चः--य्य “अस्तः शब्द में शद्धपक्च में लक्षणा थी ओर सुर्यं पक्ष में अभिधा । “अर्गावः 
ते दोनों पक्षा में अभिधा द्यी हयद्‌ मी एक मेदक तथ्य दिखा देता है । चिन्त 
यहो अथ॑देष, जिते उपमा आदि मे साधारण धर्मौ के वीच माना जाता है, अस्वी- 
कार नहीं किया जा सकत । इस प्ररन पर संजीविनीकार के ही साथ विभररिनीकार 
ओर विच्ेश्वर पण्डित भी चुप हैँ । किन्तु पण्डितराज जगन्नाथ ने इस यन्धि को 


खोलने जर खलञ्चाने का असफल प्रयत्न किया है । उर्हौने कदा है--दलेष वर्ह 


होता है जरा प्रतिपा्य अर्थो को भिन्न-भिन्न धमे भासित होते ददो जैसे श्टाञ्चुवधुओं के 
नेत्र दिर्नोकेदी साथ वषितिदहो रहै हैः यहाँ दिवसपक्ष मे वष॑का अर्थं है संवत्सर 
ओर नेत्रपक्ष मे है वरसना, आंसू बहना । "पद्यपत्रों के साथ उन्मीक्ति दोती सू्ै- 
रदिमर्या " = इस स्थल मे उन्मील्नरूपी अथं दोनो पक्षो मँ एक दही है यतः वहं इरेष नहीं हे । 
वस्तुतः यह पक्ष पण्डितराज की ही मान्यता कै विरुद्ध है | पण्डितराजने मी रूपक में 'विद्न्मान- 
सद॑सः इस स्थल में प्रयुक्त “मानसः राब्द में रकष मानाहै जव कि उसते प्रतीत (सरोवर तथा 
चित्तः इन दो भिन्न अर्थो मं एक हो भमानसत्वः धम भासित होता हे। संस्कत मे खण्डित करने 
ओर देने अथं में कमेवाच्य मे एक दही राब्द निष्पन्न होता = दीयते । पण्डितराज ने "विपद्धिः सद 
दीयन्ते संपदः इस प्रयोग द्वारा उस पद में दटेष स्वीकार किया हं । वहं प्रतिपादित अर्थौ में 
एकं ही धमं मासित होता है दानः अथवा (दानाश्रयत्वः । सत्य यह है कि यदि याँ रेष नहीं 
माना जाता तो अथेदलेष उच्छिन्न हो जायगा । कडा वोवल इतना जा सकता था कि अतिद्ायोक्ति 
मं कहीं मगदरेष होता हे ओर कीं अभंगदरेष । देष के ये सव उदाहरण इन्दं दो कोटिओं मे 
आते हं । इन दोनों उदाहरण मँ एक़ के अस्त पर दूसरे के अस्त ओौर एक के अल्गाव पर दूसरे के 
अल्गाव्‌ का अमेदाध्यवसान हे क्योकि दोनों अर्थो के वाचक करूप में एक-एक खब्दकादही 


रयोग किया गया हे । 
विमरिनी > 
सह कमरुरुकनानां मानः संकोचमायाति, इव्यस्याधम्‌ । एतद्विशेषपरिहारेणेति 
अतिायोक्व्यनुध्रागनमन्तरेण । द्भीपान्तरानीतल्वङ्गपुष्पेर पाकरतस्वेद्ख्वा मरद्धिःः इति 
द्वितीयमधम्‌ । एतानीति समनन्तरोक्तानि । यमापेक्या थजनस्यानन्तरमाक्तमनोरः- 
थत्वमिति आदि पश्चाद्धवेन कमिकयोस्तेल्यकारुत्वेनोक्तिः । यथा वा- 
"भाग्यैः समं सञुत्पन्नं प्रजाभिः सह रालितम्‌ । 
वर्धितं सुकृतेः साधंम्गोराजमसूत सा ॥ 
अन्न खयुरपर्यनन्तर तद्धाग्यानाबुस्पत्तिरिति क्रमिकयाः समकारूत्वम्‌ । अस्याश्च शद्ध 


सामान्यरूपश्वं यथा- 
मङञाणिरेण खह सोरहवासिएण दद्जाण । 


वडढन्ति बहरूसोमारूपरिमला सास्रणिउरवा ॥ 

अच्र सोरभपरिमर्योः छडसामान्यरूपस्वप्र । विम्वभ्रतिविम्बभावो यथा- 
दिनञरअरणगिउरंबा कणजाअक्कडञअरेणविप्फुरिभा । 
विअसंति परिमिरूभरोऽभठेहिं कमलकिरहिं समं ॥ 


अन्न कनकाचरूकटकरेणुविच्छुरितव्वक्य परिमिकमयेद्धररवं बिस्बप्रति विम्बस्वेन 


निर्दिष्टम्‌ । 
कुमुद वन०' का उत्तरार्धं है शह कमल्कंकनानां मानः संकोचमायातिः = कृमल्वनों के साथ 


{दिन भर कौ रूढौ | च्ल्नाओं का मान संकुचित हो रहा है"। एतद्‌ विशेषपरिहारेण = इस 
विरोषता क विना अथात्र अत्तिद्ययोक्ति कौ सदायता के विना ।. “अनेन ०? का उत्तरां दै- 


ची 


सडोक्त्य खड्नरः ३०३ 


्ीपान्तरानीतल्वक्गपुष्पैरपाजरतस्वेदलवा मरुद्धिः" = “वहौँ तुम्हारे [ श्रमजनित ] स्वेदकण हवा के 
ओके दूर करते रगे, जो पार कने दीप से ख्वंग पुष्प उड्ा-उड़ाकर आ रहे होगे 1” [ रदुवंश-६ ] । 
एतानि = ये = अमी-जमी कथित । [ कमं सादित्य के उदाहरण श्यजनो०? मेँ] यम की अपेक्षा 
देवताओं कौ मनोरथस्सिद्ध वाद मे होती है [ क्योकि उनमें का्यकारणमाव है] इस पकार मेँ 
पूवेवत्तित्व ओर परवत्तित्व [ दिपश्चाद्भाव ] होने के कारण क्रम दै, क्योकि यदौ कभिक होने 
पर दोनों मनोरथ ्िद्धियों की निष्पत्ति एक साथ वतला दी गरं इसकल्द यह कार्यकारण-पौर्वापर्य 
विपययात्मिका अतिशयोक्ति है । दूसरा उदाहरण यथा-- 

“उसने भाग्यं के साथ उत्पन्न, प्रनाओं के साथ राछित, पुण्यो के साथ वधित अर्णोराज को जन्म 
दिया।' 

-- भाग्यं को उत्पत्ति व्यक्ति की उत्पत्तिके बाद होती हे विन्त दोनो की उत्पत्ति एक साथ 
वतला दी गड हे शसकिए यों क्रमिक वस्तुओं में समकालिकता [ से निष्पन्न अतिरायोक्ति ] ई । 

यह्‌ शुद्धसामान्यरूप भी होती ह । यथा- 

मलयानिलेन सह॒ सोर मवासितेन दयितानाम्‌ । 
वधेन्ते वहल्घुकमःरपरिमला शासनिकुरम्बाः ॥? | 

-सोरम से वासित मल्यानिरू के साथ प्रियाजनों क पर्याप्त सुकुमार सगन्ध से युक्त श्वासपुंज 
ठते जा रहे दैः । 

-- यहाँ सौरभ ओर परिमल = सुगन्ध शुदसामान्यस्वरूप दँ । विम्बप्रत्तिविम्बमाव का उदा- 
हरण यदह है-- 

दिनकर -कर-निकुरम्बाः कनकाचल-क्टक-रेणु-विस्फुरिताः । 
विकसन्ति परिमल्भरोद्भटैः कमलाकरैः सार्धम्‌ ॥ 

--खवणं गिरि समेरु के शृङ्ग की धूल मे सनी सुयं कौ सहक्च-सहख किरणै परागपुज से 
उद्धट कमलं के साथ विकसित हो रही हें ।' 

--यहां युवणेगिरि के शग की धूर मे सनना [ कनकाचलकटकरेणुविच्ुरितत्व ] 
ओर परागपुंज से उद्धट होना [ परिमरूमरोदभर्त्व ] इनका निदेश विम्बप्रतिविम्बभाव कै 
साथदहे[ क्योकि इन मेँ वर्णगत साद्स्य है ]। 

विमनैः- सहोक्तिः का पूवं इतिदास :-- 

भासह्‌ = (त॒स्यकाले क्रिये यत्र॒ वस्तुद्यसमाश्रये । 

पदेनेकेन कथ्येते सा सहोक्तिम॑ता सताम्‌ ॥ 

जहां एक पद के दारा रेस दो क्रियां कही जोय जो दौ भिन्न वस्तुओं में रहती हं भौर 
-समानकालिक हँ वहाँ सदोक्ति होती दै । 

उदाहरण = वृद्धिमायान्ति यामिन्यः कामिनां प्रीतिमिः सह ॥ 

--[ ठंड में ] रात्रिया कामिजनों कौ प्रीति के साथ बदती जा रहौ हे । यहां रात्रि ओर प्रीति 
दोनों की वृद्धि एक साथ होती है ओौर उप्ते एक हयी क्रियापद से कदा जा रहा है। 

वामन सूत्र  वस्तुद्वयक्रिययोस्तुल्यकाल्योरेकपदाभिधानं सहोक्तिः । 

[ बृत्ति ] वस्तुद्वयस्य क्रिययोस्तुल्यकाल्योरेकेन पदेनाभिधानं सहाथसामर्यात्‌ सोक्तिः । 
दो पदार्थो कौ समानकाकिकि क्रियाओं का यदि एक दी. शब्दके द्वारा सहः शब्दं के 
अथे के बल पर हो तो सदयोक्ति । 

उदाहर ण--अस्तं मास्वान्‌ प्रयातः सह रिपुभिरयम्‌० ।' 


३०७ अच्र्गरसवंस्वम 


इस प्रकार वामन ने मामद की ही सदोक्तिकारिका को सूत्र रूपदे दिया है इतना अवक्य 
हे कि वृत्ति मे उन्दने सदोक्तिराब्द की साथंकता बतलाने के छिए .सहोक्तिसामथ्यं" का भी उल्लेख 
कर दिया है । अरुंकारसवैस्वकार ने उलेषमूलक अभेदाध्यवसाय से निष्पन्न सहोक्ति के किए वामन 
के दी इस उदाहरण को प्रस्तत किया हे । 

उद्धट-उद्धट ने मी वामन के ही समान भामह की ही सहोक्तिकारिका को-- 

(तुल्यकाले क्रिये यत्र॒ वस्तुद्वयसमाश्रिते। 
पदेनैकेन कथ्येते सा सदोक्तिम॑ता सताम्‌ ॥ 

--इस प्रकार प्रायः ज्यांकात्योँ अपना लियाहै। उदाहरणके रूपमे उरम्होने अलंकारः 
सवस्वकार द्वारा कमं साहित्य कै उदाहरण के रूप मेँ अपनाया गया पद्य ध्चुजनो०" ही 
दिया है । 

र्‌द्रट-मामह से उद्धट तक सहोक्ति उपमानोपमेयभाव की चचां नहीं थी । न तो 
उसमे मेद ही किट गए थे । रद्रट ने उसमे अधिक संरम्भ दिखलाया, ओर सहोक्ति को निम्नलिखित 
रूपो में प्रस्तुत किया- 

“ वास्तववर्गीय-- 
[ १ ]--भभवति यथारूपोऽधैः कुव॑न्नेवापरं तथाभूतम्‌ । 
उक्तिस्तस्य समाना तेन समं या सहोक्तिः सा ॥ ७।१३ 


-एक अथं अपने जेसे किसी दूसरे अथं का वस्तुतः हो तो निर्माता [ कारण ] विन्तु उन दोनों 

कौ उत्पत्ति समान रूप से एक साथ वतला दी जाय तो सहोक्ति ।' यथा 
"कष्ट सखे ! क यामः सकलजगन्मन्मयथेन सह तस्याः । 
प्रतिदिनसुपेतति वृद्धि कुचकररनितम्बभिन्तिभरः ॥ 

-मितव्र ! वड़ा कष्ट है । आखिर कहँ जाय १ उसके कुचकुम्भ॒ ओर नितम्बभित्ति रोज-रोज 
वदते जा रहे हँ ओर अकेठे नदीं सारे संसार को मथ डालने व।ङे मन्मथ के साथ ॥ 

- यदं नायिका के अंगो की वृद्धि कामनव्ृद्धि का कारण हे किन्तु उनकी उत्पत्ति साथ होती हई 
वतलाई गहं हे । ` 

[२] शयो वा येन क्रियते तथैव भवता च तेन तस्यापि । 

अभिधानं यत्‌ क्रियते समानमन्या सदाक्तिः सा ॥ ७।१५। 

- साधारणधरमयुक्त कार्यकारण कौ सहोत्पत्ति वतलाना भी एक अन्य सदोक्ति होती है। 
यथा--भभवदपराधेः साधम्‌" पूणंपच-- 

[ ३ ] “अन्योन्यं निरपेक्षो यावथावेककालमेकविषौ 1 

मवतस्तत्कथनं यत्‌ सापि सहोक्तिः किटेत्यपरे ॥' 

--अन्य आचार्यं [ मामह, वामन, उद्धट ] उप्ते भी सहोक्ति मानते हं जिसमें दो देसे अथं 
जो [ पूवं उदाहरणों मँ आए अर्थौ के समान परस्पर कायेकारणमाव आदि से संबद्ध न दौकर 
स्व॑था ] निरपेक्ष होते ओर एक दी समय मे किसी एक क्रिया मेँ अन्वित होते हं । उदाहरण 
वुसुदद लः०' पूण॑पच । 

इन्हीं तीन मेदे प्रथम दो भेदो मँ सवैस्वकार ने कायक्ारणपौवांपयैविपर्ययास्मिका 
अतिशयोक्ति पर निर्भर सदोक्ति मानी है ओर तृतीय मे शद्धामेदाध्यवसानात्मिका अतिशयोक्ति 
पर नि्म॑र सदोक्ति। प्रथम ओर द्वितीय पय मे उन कोई विदेष अन्तर नदीं दिखाई दिया-- 
कदाचित्‌ इसीलिए उन्होने उसे छोड़ देष दोनों मेदो के उदाहरण भी रद्रट से अपना किएि। 


# 


सदहोक्त्यटज्लारः ३०८९ 


यह सचदहेकिरद्रनेजो लक्षणकारिकाएं वनाई दैवे पहञ़े जैसी अन्यक्तार्थं ओर दुरूह हो 
मई है । । | 

[ २ ] ओपम्यवगींय - 

[ १] सा हि सदोक्तियस्यां प्रसिदधदूराधिकक्रियो योऽथः । 
तस्य॒ समानक्रिय इति कथ्येतान्यः समं तेन ॥› ८।९९ 

--जदां मधिकं सामथ्यवान्‌ वस्तु को उससे कम सामर्थ्यं वाली वस्तु के साथ-साथ समान 

बतलाया जाय वह सदोक्ति ।' यथा-- 
सपदि मधौ निजसदनं मनसा सदह यान्त्यमी पथिकाः ॥? 

-- वसन्त मे ये पथिक मनकं साथ अपने धरकी ओर चलू पड़े दैँ। यहां गमनक्रिया मे 
मन ओर पथिको का साथ-साथ सम्बन्ध बतलाया जा रहादहै जव कि मन तीत्रगति के छि 
अनुपम होता है । 

[ २ ] “वत्रैककत्तृका स्यादनेकक्मानिता क्रिया तत्र । 
कथ्येतापरसदितं कर्मकं सेयमन्या स्यात्‌ ॥ ८।१०१। 

-- जहा किसी क्रिया का कतां एक हो किन्तु कमं अनेक, ओर अनेक कमो मे मी अन्य कर्मो 

को किसी एक प्रधान कमे के साथ बतलाया जाय वह्‌ भी एक सहोक्ति होती है । यथा- 
स त्वां विभन्ति हृदये युरुभिरसंख्येमंनोरयेः सार्धम्‌ ॥ 

-सखि ! वद ठ॒स्ञे अनेक वड़-वडे मनोरथो के साथ हृदय में धारण किये इए है" यजँ 
श्वारण करना क्रियाम कतां तो एक ही है किन्तु कमं नायिका मौर मनोरथ है । उनमें भी मनो- 
रथो को नायिका के साथ लगाकर प्रस्तुत किया है । 

नमिसाघु ने वास्तववगीय सहोक्ति का भौपम्यवगींय सहोक्ति से भेद करते इए कहा हे कि 
वास्तववगींय म॑ साट्ृद्य नदीं रहता भौर ओपम्यव्गीय मे कायकारणभाव । सर्वस्वकार ने सब 
के सव भेदा कौ ओपम्यमूल्क मानल्यादै। सपष्टहै किः सरवस्वकार का सदोक्तिविवेचन शतशः 
रुद्रट के अतिशयोक्तिविवेचन पर निर है। मम्मट रद्रटका यह विदरेषण टीक से नदीं 
अपना सके । 

मभ्मट :-- "सा सदोक्तिः सहार्थस्य बलादेकं द्विवाचकम्‌ ।' 

-- सहोक्ति वह जा सहाथं = सह शब्द के अर्थं कै बर पर एक पद दो पदार्थौ का प्रतिपादक 
हो ।' यथा-- | 

सद दिवसनिशीभे दीर्घाः खासदण्डाः ।› 

--खासदण्ड दिन भोर रात के साथ लम्बे वनते जा रहै हैः मम्मट के सहोक्ति लक्षण में रुद्रय 
कौ विविपता तो नहीं 2 किन्तु उसमे पुथवत्ती सभी आचार्यौ की-सी कमी मी नहीं है । प्राचीन 
साचायो ने लक्षण सें सह'-साथः शब्द नदीं दिए ये । उसके धिना वे सदोक्ति को दीपक आदि से 
भिन्न सिदध नहीं कर सकते । सह? = (साथ, शाब्द कै अथ के दारा जो अर्थौ मेँ प्रधानता गौर अप्र- 
धानता जाती दै वही वस्तुतः सदोक्ति का अन्य तत्सदृश अलंकारो से भेदक है। यद एक 
ध्यान देने क वात है कि मभ्भर ने सहोक्ति को साटदयमूलक नदीं बतलाया है । 

परवती आचायों में-~ | 

सोभाकर न--'सहाथवरूदेकस्यानेकसंबन्धे सहोक्तिः ।-यह लक्षण कर॒ मम्मर 
का ठीक अनुसरण क्ियाहै। इन्दोने सदोक्तिको न केवल अतिद्ययोक्तिपर ही अपितु वस्य. 
योगिता पर भी निभेर बतलाया है। मम्मर कै सदहोक्ति उदाहरण मे उन्होने विनोक्ति का संस्पदों 
बतलाया हे । 


2० ० सण 


३०दे अल््ङ्ारसवस्वम्‌ 


अप्य दीक्तिति-ने चित्रमीमांसा मे तो सदोक्ति पर विचार नहीं ही किया, कुवल्या- 
नन्द मेँ भी उस पर अत्यन्त द्यी थोडा विचार किया है- 
(सोक्तिः सहभावश्चेद्‌ मासते जनरज्नः । 
दिगन्तमगमत्‌ तस्य कीत्तिः प्रत्यथिभिः सह ॥ 
--सदोक्ति वह जिसमे न्दर सहमाव भासित हो । यथा--मापकी कौत्ति आपके राघुर्ओं के 
साथ दिगन्त चली गईं हे । 
पण्डितराज ने अवदय रुद्रटः ओर सवेस्वकार के पश्चात्‌ पदिटी वार सदोक्ति पर संरम्भ 
दिखलाया है । उनका विवेचन इत प्रकार है- 
गुणप्रधानमावावच्छिन्नसदहा्थसम्बन्धः सहोक्तिः । 
-- प्रधानता तथा अग्रधानता से युक्त सह शाब्द कं अथं से सम्बन्ध का नाम सदोक्ति । 
यह एक प्रकार से सवैस्व के ही लक्षण का परिष्कार है। पण्डितराज ने सदोक्ति को सवेस्वकार 
के ही समान अत्िरयोक्तिमूल्क माना है । उसमे कठैस्ताहित्य ओर कर्म॑सादहित्य का भी 
प्रतिपादन किया है । सदोक्ति को शाब्द मी माना है किन्तु आर्थं भी बतलाया है। किन्तु आर्थं 
कहकर उन्हें वैयाकरणो से सगडना पडा है जिसमें उरन्ोने अपनी सहज स्वच्छन्दता दिखलाईं 
दे ओर इसीलिए उन्दं अपने वेयाकरण टीकाकार नागेशय के दंश सहने पड़ हैं । 
पण्डितराज ने एक नवीन प्रन उठायाहै ओर कहा है कि सहोक्ति अतिदायोक्ति में दी 
अन्तभूत कर दी जानी चाहिए । उन्होने क(रणक्रर्यविपर्ययमूलक अतिशयोक्ति से युक्त युणप्रधान- 
भाव मं चमत्कार का कारण अतिशयोक्ति को दही माना है इसका प्रामाण्य सहृदय की अनुभूति पर 
निभर ह । कदाचित्‌ इसीलिए विदवेश्वर ने एसा कोई प्रन नहीं उगाया है । 
सवस्वकार ने सकशेचिलक्षण मे उपमानोपमेयभाव को स्थान देकर उसमे साद्रदय को 
भनावदयक रूप से खींचना चाहा है । वह वस्तुतः अमान्य है । 
संजीविनीकार ने सदोक्ति का संक्षेप इस प्रकार किया दै- 
'गुणप्रधानभावां यः ओाब्दस्तेन भिदोत्कटा । 
संध्रितातिश्योक्ति च सहोक्तिः समयोमेता ॥ 
--यदि प्रधानता ओर अगप्रधानता का योतन शाब्द द्वारा हो फलतः उसप्ते जित्तमे मेद की 
प्रधानता सिद्ध हो, ठेसी अतिरायोक्ति पर आश्रित वह दो समान पदार्था की सह-राब्दाथं दाराकी 


गदं उक्ति सहोक्ति कदलाती हे । 
[ स्वस्व ] 
सदोक्तिप्रतिभरटभूतां विनोक्ति टक्षयति- 
[ घर २८ ] पिना #िचिदन्यस्य सदसस्वाभावो विनोक्तिः । 
सत्वस्य रोभनत्वस्याभावोऽद्ोभनत्वम्‌ । पवमसच्व्याश्लोभनत्वस्या- 
भावः शोभनत्वम्‌ । ते दवे सच्वासच्वे यत्र कस्यचिद संनिधानान्निवध्येते सा 
द्विधा विनोक्तिः । अच्र च दोभनत्वारोभनत्वसत्तायामेव वक्तन्यायामसत्ता- 
सुखेनाभिधानमन्यनिच्रत्तिष्रयुक्ता तन्निश्रत्तिरिति ख्यापनाथम्‌ । एवं चान्या- 
निवृत्तौ विधिरेव प्रकारितो भवति । आदा यथा- 
“विनयेन विना का श्रीः का निद्या राशिना विना। 
रहिता सत्कवित्वेन कीदशी वाग्विद्ग्धता ॥' 


+ 0 


विनोक्त्यलङ्ारः ` ३०७ 


अञ विनयाद्यसनिविप्रयुक्तधीषिरहायभिवानसुखेना ्ओोभनत्वसुक्त म्‌ । 

[ इत्ति ] अव सहोक्ति से उल्टी विनोक्ति का लक्षण करते है - 

[ सू° ३१ | किसी [ जन्य | के विना[ किसी ] अन्य सें सरव या जसरव का अभाव 

[ बतलाया जाना चमव्कारी हो तो | विनोक्ति। 

[ इत्ति ] सत्व = शोभनता, उसका अमाव = अद्योभनता । इसी प्रकार अस्व = अ्लोभनता 
उसका अभाव = शोभनता । [ विनोक्ति मे ] ये दोनों सत्व ओर अस्व किसी [ भन्य ] के 
जसन्निधान से उत्पन्न वतलाए जाते हे अतः यह विनोक्ति दो प्रकार की होती है। यहां प्रतिपा 
तो रहता हे शोमनत्व ओर मशोभनत्व का सद्धाव ही तथापि उसका प्रतिपादन अभाव के माध्यम 
से किया जाता है, यह इसकिए कि यह प्रतीति ह सके कि उसका अभाव कित्ती अन्य कं कारण 
हे, स्वतः नहीं । ओर इस प्रकार यदि किसी अन्य का मभाव प्रतीतनहो तो अन्यका सद्भाव 
भी प्रतिपादितदहो जाता है। इनमें से प्रथम विनोक्ति यथा- 

नप्रता के विनाशी केसी ? चन्द्रमा के विना रत्नि कैसी? सत्कवित्व के विना वाणी कौ 
विदग्धता केसी १। 

-यहों विनय आदिके अभावके कारगश्री आदि का अमाव बतलाया गया ओर इस 
अकार [ श्री आदिमे ] अशोभनता का प्रतिपादन किया गया। 


विम्िनी 

परतिभरभूतामिति प्रतिपमूताम्‌ । अत एवैतदनन्तरमेतल्ञषणम्‌ । तदेवाह-विना- 
किचिदित्यादि । एतदेव व्याचष्टे-सत्वस्येत्यादिना । 

कस्यचिदिति यत्र यादृशो विवदितस्तस्येति । ननु चात्र सतवास्खयो्विधि. 
सुखेनेव उाच्यतवे किमिति प्ररीतिवैषम्यदायिना निषेधपुखेन निर्दैशः कृत हव्या. 
इयाह-अत्र चेत्यादि । 

तच्छब्देन सस्वास्त्वयोः प्रघ्यवमशैः । अन्यनिवृतिप्रयक्तेन तशिन्रत्तिख्यापनेनापि 
कि भवतीत्याशङ्क्याह - एवं चेत्यादिना । 

अन्यस्य कश्यचिद्निचरत्तौ सत्वमसरवमेव वा भयतीव्य्थः। अवेति असरवनिब- 
न्धनोक्तिः । का श्रीनं काचिच्छ्रीरिति श्रियो विरहोऽसद्धावः । विनय।खद्धाबेऽपि धियोऽ. 
सद्चावोऽस्तीव्येतद भिधानं श्रि योऽसस्वे पयंवस्यतीति विनयनिडत्तिपरयुक्तं भ्रियोऽघत्व- 
युक्तम । एवं विनयस्यानिचृत्तौ श्रियः सरव एव विधिः प्रकाशितो भवतीति विनय श्व 
भरबन्धः कायः । एवमन्यत्रापि ज्ञेयम्‌ । अन्ये चात्र वाश्तवस्वं मन्यमानाः- 

“तस्थाः शव्यं विना ऽयोरस्ना पुष्पद्धिः सौरभं विना । 
विनोरणस्वं च इतभुक्स्वां विना प्रतिभासते ॥' 

इस्यत्न विनोकस्यरंकारत्वमाहुः । अत्र हि ऽयोरल्ञादीनां शेवयादिना निव्यमविनाभवेऽपि 
विनाभाव उपनिबद्धः । यदाहालंकारमा्यकारः--“निष्यसंबद्धानामवंबन्धवचन 
विनोक्तिः इति विनोक्तिदपसंख्यास्यते” इति। म्रन्थङ्ृता पुनरियं चिरंतनरक्षितस्वा - 
ज्ञ्तिता । 

परतिमरभूता = उल्टी = विरुद्ध । इसी कारण इस [ सहोक्तिं ] के रक्षग के बाद इत 
[विनोक्ति] का लक्षण रखा जा रहा है । यह लक्षण वतलाते है -- विना िचित्‌० । इती करौ व्वाख्या 
करते हैँ सर्वस्य इत्यादि के द्वारा । कस्यचित्‌ = किसी के = जो अथं जक जिस प्रकार का 
विवक्षित दो उप्तके। यहां प्रन उठता है~-यदि यां सख ओर नस का प्रतिपादन सद्धा. 


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३०८  अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


वात्मक रूप से ही विवक्षित दै तो फिर प्रतीति मे विपरीतता लाने वाले निषेध के द्वारा इसके 
गरतीति क्यो कराई जाती है, इसके उत्तर म कहते दे--अत्र चः-इत्यादि । (तत्‌ = तन्निवृत्ति-2 
ननं आया तत चाब्द सतत्वासत्व के किए है । हका होती है कि भके दी किसी वस्तु का अभाव अन्य 
किसी वस्तु के अमाव के माध्यम से प्रतिपादित किया जायः उससे लाभ क्रया है। इस पर उत्तर 
देते है- "एवं च = इस प्रकार ।` अन्य की निवृत्तिन होने पर दोभनता या अद्योभनता जो जेसी 


रहती है उसकी उसी रूप में प्रतीति होती है । आदा = प्रथम = एेसी विनोक्ति जिससे अशोभनता 
प्रतीत होती दो। [ “विनयेन विना-पच मेँ] का श्रीः =श्री कैसी-का अथे निकलता ह "किसी . 


मी प्रकार की श्री नहीः। इस प्रकार श्री का अभाव प्रतीत हवा जो अश्योभन है। विनय न 
होने पर भी श्रीका अभाव द्यी रहतादहैः ेसा कदने से श्री की अञ्लोमनता निकरती 
है । इस प्रकार श्री की भद्ोमनता विनय के अभाव में प्रतिपादित की गदं । यदि विनय का अभवि 
न हो तो श्री मे निषेधात्मक अद्योभनता से उल्टी विष्यात्मक शोभनता ही प्रतीत होती हे । 
इय प्रकार शी की शोमनता अद्लोमनता का सारा मार विनय के अस्तित्व अनस्तित्व पर निभेर 
है । अन्य स्थलोमेमीरेसी दी योजना करनी चाहिए । 

[ अरंकाररत्नाकरकार मादि ] कुछ आचाय विनोक्ति कौ वास्तविकता पर भमी निभेर मानते 
हे ओर वे- 

(तुम्हारे विना उस [ वेचारी ] को चँदनी विना शीतलता कौ प्रतीति दोती है, पुष्पस्तयुदाय 
[ अथवा वसन्त ] विना सुगन्ध का, ओर अग्नि विना ऊष्मा की । 

-एेसे स्थल मे बिनोक्ति को अलंकार मानते है । चँदनी आदि शीतलता आदि से कभी 
भी अलग नहीं रदतीं तथापि यहं उन्दं उनसे अलग बतलाया गया है  जेसा किं अलंकार 
भाष्यकार ने [ मी ] कदा ै--“नित्यसम्बद्धानामसम्बन्धवचनं विनोक्तिः? = “नित्य सम्बद्ध पदार्थो मे 
सम्बन्ध का मभाव वतलाना विनोक्ति कदलाता है" । यद विनोक्ति मी भागे वतलाववेगे । मरन्कार 
ने जो यह [ "विनयेन ० आदि पच मै ऊपर निर्दिष्ट ] विनोक्ति मर यहां बतला है यद इसलिए 
कि प्राचीन आचार्यं [ मम्मट ] ने इसी मेद्‌ को विनोक्ति के रूप मेँ प्रस्तुत किथा हे । 


[ खवस्व ] 
अन्न विनारब्दमन्तरेणापि विनाथविवक्षा यथाकथंचिन्निमिनत्तीभवति 
यथा सदोक्तो खहा्थविवक्षा । एवं च- 
“निस्थकं जन्म गतं नदिन्या यया न दष्टं तुहिनांशुबिम्बम्‌ । 
उत्पत्तिरिन्दोरपि निष्फलैव न येन दषा नदिनी प्रबद्धा ॥' 
इत्यादौ विनोक्तिरेव । तदिनां्दर्यनं नलिनीजन्मनोऽशोभनस्वप्रतीतेः । 
इयं च परस्परविनोक्तिभङ्गचा चमत्कासातिद्चयकृत्‌ । यथोदाहते विषये । 
यहाँ विना शब्द वे अभावमें मी विना चन्द के अथंकी विवक्षामौ ठीक उसी प्रकार जिस 
किसी प्रकार कारण वन लाती है जिस प्रकार सदोक्ति मेँ [ सद शब्दके अभावमें भौ ] 
सहराब्द के भथ॑ की विवक्षा । ओर इस प्रकार~- 
“उस कमलिनी का जन्म निष्फल ही बीत गया जिसने चन्द्रमा का विम्ब नदीं देखा । भौर 
चन्द्रमा का जन्म भी निष्फल ही रहा जिसने प्रबुद्ध कमलिनी को नहीं देखा ।' 
इत्यादि स्थलों मे विनोक्ति ही अलंकार माना जाएगा । 
विनोक्ति तव अधिक चमत्कारक होती है जब उसमें दो पदार्थौ म एक दूसरे के अभाव से पर 
स्पर मेँ श्ोभनत्व भौर अद्धोमनत्व बतलाया जात है । जसे उदाहृत ['निरथैक०] पच के स्थल मे । 


विनोक्त्यलङ्कारः ३०९. 
विमदिनी 


यथाकर्थचिदिति । यश्पि यथा सखहरब्दं विनापि सहार्थे वृतीयास्ति तथा विनाक्ञब्दं 
विनापि द्वितीयादीनां विनार्थे खद्धावोऽसिति, तथापि वाक्यार्थपर्यांरोचनसामभ्यांत्तदुर्थैः 
पर्यवस्य तीत्यस्य भावः । खहशब्दं विनापि सहा्थविवक्ता यथा- 

“विचरण्वता सौर भरोरदोषं बन्दिितं व्णगुणेः स्प्ररन्ध्या । 
विकस्वरे कस्य न कर्णिकारे घ्रागेन दृष्टेद॑न्रुधे विवादः ॥' 
` अच्र घ्राणेन सहेति तस्प्रयोगं विना दध्पतीतबेव चिश्रान्ते। एवं चेति। यस्माद्‌ विनाश्चब्दं 
विनापि तदर्थविवनक्ता भवतीरयर्थः। यथोदादह्त इति निरथंकमिव्यादौ । यथा वा- 
हसाण संरेहि विणा सराण सोहाविणा ण हं सेषं । 
अण्णोण्णं चिज एए अप्पाण णवरं गरुएति ॥' 

यथाकथंचित्‌ = जिस किसी प्रकार अर्थात्‌ ययपि जपे सहशब्द के विना भी सह अथै में 
तृतीया हो जाती है वैसे ही विना शब्द के विनामो भिना के अर्मे द्ितीया अदि होती हे तथापि 
उनका सथ वाक्याथ के पर्यारोचन के वर पर निकलता है । 

सहशब्द के विना भी सहदयब्द के अथं की विवक्षा का उदाहरण यथा- 

(कणिकार [ अमल्ताश्च ] के पल उठने पर रेसा कोन व्यक्ति था जिसकी द्ष्टिका 
उसकी नासिका से विवाद न हो राहो । दृष्टि उसके सुवर्णोपमं वणं की बन्दी 
बनी हदे थी ओर नासिका उप्तम गन्धका दारिद्रय वतला र्यी थी। [ मंखक्घत श्रीकण्ठ- 
चरित, इसी पद्य पर मङ्ग को कणिकार संख, नाम दिया गया था] 

-यदां यचयपि सहः राब्द का प्रयोग नहीं है तथापि घ्राणपद में प्रयुक्त तृतीया विभक्ति उसी 
अथं मे पयवस्सित होती हे । 

एवंच = ओर इस प्रकार अथात्‌ जब कि विना शब्द के अथं कौ विवक्षा विना शब्द्‌ के विना 
मौ संभव दोती है तव । यथा उदाहृत = निरथैकः पयां मे। दृप्ता उदाहरण यदहो 
सकता दै- 

"हंसानां सरोभिर्विना सरसां रोमा विना च हंसेः। 
अन्योन्यं ॒चैवेत्ते आत्मानं केवलं गरयन्ति ॥ | 

-दंसों की रोभा सरोवर के विना नहींद्योतीओरनतो ससोवसोकी द्य चोभा इसके 

विना । ये दोनों केवल आपस मेँ एक दूसरे को सम्रदध बनाते है । 


[ सवेस्व ] 
द्वितीया यथा-- 
“सगलोचनया विना विचित्रन्यवहाग्प्रतिभाप्रभाप्रगद्भः। 
अस्नतय्य॒तिखुन्दयदायोऽयं खुद्दा तेन विना नरेन्द्र चुः ॥' 


न्ारोभनत्वामावः शोभनपद्‌ा्थप्रक्षेपभज्गयोक्तः। सेष। द्विधा विनोक्तिः । 


द्वितीय [ विनोक्ति | यथा-- 
"यह्‌ राजमार उस सुन्दरी के विनार्माति मति के व्यवहार की प्रतिभाकी प्रभासे म्रगसभम 
रहता हे । इसी प्रकार उस मित्र कै विना द हृदय से चन्द्रमा कै समान उज्ञ्वर रहा 


भाता ह "~~ यदा अज्ञोमनत्व का अभाव शोभन पदाथ की उक्ति के दारा बतलाया गया है। 
इस प्रकार वह्‌ विनोक्ति दो प्रकार की हहं । 


३९० अलज्लारसवंस्वम्‌ 


विमरिनी 
द्वितीयेति शोभनव्वनिबनधनोक्तिः । 
द्वितीय विनोक्ति = रोभनता मे पयेवसित होने वाटी विनोक्ति । 
विमदाः-विनोक्ति का पूवं इतिहासः- विनोक्ति का प्रतिपादन प्रथम वार मम्मट ने ही 


किया है 1 भामह, वामन, उद्धर, रद्रट तथा मोज के अरन्थँ मं यदह नहीं मिलती  मम्मटने इसका 
निरूपण इस प्रकार किया है- 


“विनोक्तिः सा विनान्येन यत्रान्यः सन्न नेतरः । 


-जहां अन्य के विना अन्य शोभन न हो अथवा अद्लोभनन दहो वद्‌ विनोक्ति। अश्ोभनत्व 
का उदाहरण-- 

'अरुचिनिशया विना रदी ददिना सापि विना महत्तमः । 
उभयेन विना मनोभवस्फुरितं नेव चकास्ति काभिनोः ॥' 

--रात्रि के विना चन्द्रमा मं कों सोन्दयं नहीं रहता ओर रात्रि भी चन््धमाके विना घोर 
तम सिद्ध होती है। इन दोनों के विना कामिजनो मे काम का स्फुरण नदीं रुचता । मम्मटका 
यह्‌ उदाहरण अन्योन्य-विनोक्ति का स्थर माना जा सकता है 1 

दूसरा शोभनत्व का उदादरण--'ृगलोचनया० परय । प्रवत्तं आचार्यौ मेँ अलकाररला- 
रकार ने विनोक्ति को सष्टोकित के पदिलञेरखाह ओर उसका लक्षण यह किया है-- 

[ सूत्र | विना कचित्‌ सद सत्वे विनोक्तिः ॥ ४१ ॥ 

[ वृत्ति ] केनचिद्‌ विना कस्यचिद्‌ अस्निधानेऽर्थान्तरस्य स्वं शोभनत्वम्‌ असत्वमशोभनत्वं 

वा विनोक्तिः । 

--किसी के चिना अर्थात्‌ किसी के असन्निधान में अन्य किसी अथे का सत्व = शोभनत्व या 
अस्त्व = अद्रोभनत्व विनोक्ति । 

रत्नाकरकार ने विनोक्ति को शाब्द ओर आथंदो भार्गो बोँटहै। प्रथम के उदाहरण के रूप 
म श्रोभनत्व के लिए तो रत्नाकरकार ने मी ्ृगलोचनया० पच्दही प्रस्तुत किया है किन्तु 
द्वितीय के लिए 
“स्वामी पिश्चुनविसुक्तो मात्सयरदहितः कविस्तथा लोके । 
विषधरदल्योऽपि निधिः प्राप्यते पृणपुण्येः॥" 

--चुगलखोरो से रहित स्वामी, मात्सयं से रदित कवि ओर सपं से रदित निधि परं पुण्यां 
से प्राप्त होते हैँ ।"--यह उदाहरण दिया है जिसमे विनोक्ति का आधार ठीक उसी प्रकार 
वास्तविकता है जिस प्रकार (तस्याः रत्य विना ज्योत्स्ना" इस स्थल में । 

विक्रमांकदेवचरित का ४।१२०-्रत्यक्तं मधुनेव०› पच रत्नाकरकार ने विना राब्द के अभाव 
के उ्दाहरणकेरूप म दिया है। यह पध स्व॑स्वकी भमी कु पाण्डुप्रतियो मे मिलता हे किन्तु 
जयरथ ओर विन्या चक्रवती इसका कोद उव्लेख नहीं करते । कदाचित्‌ रत्नाकर के तुरनात्मक 
सध्ययनमं रगे किसी विद्वान्‌ ने अपनी हस्तङ्खित प्रति मे उसे जोड़ लिया होगा 

रत्नाकरकार ने विनोवित को सम, विषम ओर प्रतिवस्तूपमा अल्कारों पर निभेर माना 
है) विनोक्ति को अप्पदादीक्षित ने केवर कुलवयानन्द में ही बतलाया है किन्तु खा नदीं । 
पण्डितराज ने विनोवित का लक्षण "विना्थसम्बन्धः-मात्र करिया है, अथात्‌ उस्म विन।क्रत वस्त॒ 
की रमणीयता या अरमणीयता का निवेद्य नदीं किया ओर दीपक, प्रतिवस्तूपमा तथा रलेषमूलकः 


- 


विनोक्त्यलङ्कारः ३११ 


उपमा को सहायक बतलाते हए, “निरथकं जन्मः पद में विनोकति कौ ध्वनि मानी है । इस पय का 
चतुथं चरण इनके रसगंगाधर में ेसा है- कृता विनिद्रा नलिनीन येनः । 

कोश्तुभकार विश्वेश्वर ने विनोक्ति का रक्षण पूवैवत्तीं आचार्यौ के हौ अनुसार इस प्रकार 
किया है- 

“यत्रान्येन विनान्योऽसाधुः सन्‌ वा विनोक्तिः सा 1 

--जहां अन्य के विना अन्य शोभन या भरोभन हदो वहाँ षिनोक्ति । 

अलंकारभाष्य का जो वचन विमशिनीकार ने उद्धृत किया है उसको पण्डितराज तथा 
विश्वेश्वर पण्डित ने भी उद्धृत किया है ओर वही अरुचि व्यक्त की है जो स्वयं विमशिनीकारने 
कीहै। इन तीनों ने वास्तविकता पर निर्भर विनोजित को भलंकार मानना अवेज्ञानिक 
बतलाया ह । 

प्राचीन आलरंकारिकों दारा विनोकति को अलंकाररूप से न गिनने मे दहेतु सोचते हए रत्नाकरः 
कार ने कहा था किस्म चमत्कार स्वतः का नहीं अन्य अलंकारो का रहता ह'-एेसा मानकर 
ही कदाचित्‌ अन्य आचार्यं इसे स्वतन्त्र अलंकार नदीं मानते । वस्तुतः इसमे चमत्कार “विनाभाव 
से निष्पन्न होता है इसलिए इसे अन्य अल्कारों मेँ अन्तभूंत मानना अनुभवविरुदध है । पण्डितराज 
जगन्नाथ ने भी कदाचित्‌ इन्दीं तकौ पर विनोविति कौ स्वतन्त्रता का मौन समर्थन किया हे, 
उन्दने लिखा दै- 

'अलङ्कारान्तरसमालिङ्गनाविभूंतमेवास्या हृवत्वम्‌ , न स्वतः, तेनालङ्कारान्तरत्वमपि शिथिल- 
मेवेत्यपि वदन्ति ।' - अथात्‌ - 

(इसमे चमत्कार दूसरे अलंकारो के योग से ही आता है, स्वतः नी, इस कारण इसे स्वतन्त्र 
अलंकार मानना भी हिथिल ही है-ेसा भी कुछ रोग कहते हे ।' स्पष्ट ही उन्होने- कु लोगः 
कहकर अपनी भसंमति व्यक्त कर दी है । विनोकति पर हुए इस आक्षेप फे प्रति उनकी असंमतिं 
इससे भौ स्पष्ट हे कि यह पश्च उन्होंने विनोकिति के उपसंहार मे सूचित किया हे वह भौ अलकार- 
भाष्य के उपयुक्त मत के पश्चात्‌ । अलंकारकोस्तुभकार ने भी इस पक्ष को अमान्य बतलाया 
दे। स्पष्ट ही विनोक्ित मे “विनाभाव-का एक स्वतन्त्र चमत्कार र्ताहै श्सकिए श्से समः 
विषम, दीपकः प्रतिवस्तूपमा, उपमा या पर्यायोक्त आदि मे अन्तभूत करना उचित नहीं है । 

इस प्रकार सवेस्वकार ने मेद की प्रधानता पर निभैर व्यतिरेक, सदहोकति ओर विनोक्ति इन 
तीन अलंकारो का निरूपण किया । वस्तुतः इनमें प्रथम दो ही मेद प्रधान माने हैं । विनोक्ि तो 
केवर इसलिए बतला दी गईं है कि वह सदोक्ति से क उल्री किन्तु चमत्कारक अभिव्यक्ति 

है । संजीविनीकार ने विनोकिति कै सवस्वकारक्रेत इस संपूण विवेचन का सारसंक्षेप इस प्रकार 
किया है- | 
'सद सत्वनिवृत्तिश्वेन्निवृत्त्यान्यस्य वण्येतते । 
तदा द्विधा विनोभितः स्याद्‌ विधिरत्र फलं मवेत्‌ ॥ 


“--अन्य की निवृत्ति से यदि अन्य के रोभनत्व ओर अशोभनत्व की निवृत्ति बतलाई जाएतो 
वह॒ दो प्रकार की विनोवित होती हे । इसमे फ़ल रहता है विधि । 


[ सवेस्व | 
अधुना विरोषणविच्छिच्याश्रयेणाटं कार्यमुच्यते । तत्रादौ बिशेषण- 
खाम्यावष्ठम्भेन समासोक्तेमाद- 


३१२ अटङ्कारसवेस्वम्‌ 


[घ्‌० ३२] विशेषणानां साभ्यादग्रस्तुतस्य गभ्यत्वे समासोक्तिः । 
इ प्रस्त॒तापस्त॒तानाः कचिद्‌ वाच्यत्वं किद्‌ गम्थत्वमिति द विध्यम्‌ । 
वाच्यत्वं च शठेषनिर्दराभन्गव्या पृथगुपादानैन वेत्यपि द्ैविध्यम्‌ । पतद्‌ 
द्विभेदमपि शटेषाटंकारस्य विषयः । गम्यत्वं तु प्रस्तुतनिष्टमगप्रस्त॒तथरयंसा- 
विषयः अधस्तुतनिष्टं तु समासोक्तिविषयः । तञ्च च निनित्तं विद्ोषण- 
साम्यम्‌ । विशेष्यस्यापि साभ्ये शटधेषप्राप्तेः। विरोषणसाम्याद्धि भरतीय- 
मानप्रस्तत व्रस्ततावच्छेदकत्वेन प्रतीयते, अवच्छेदकत्वं च ऽयवहारलमा- 
रोषः । रूपसमारोपे त्ववच्छादितत्वेन भ्रकृतस्य तद्रू परूपित्वाद्‌ रूपकमेव । 

[ मेदग्रधान अलंकारो का निरूपण करने के पश्चात्‌ ] अब [ (समासोक्ति ओर परिकर” इन ] 
दो अल्कारों का विवेचन करते दै जिनमे चमत्कार [ समास ओर साभिप्राय ] विष्णो पर 
निर्भर रहता है । इन दोनों मे विद्धेषणगत समानता [ दोनो पक्षो प्रं अन्वित दोने की क्षमता अतः 
दिष्टता ] को लेकर निष्पन्न होने वाले [ ओर इसीलिए परिकर कौ अपेक्षा अधिक चमत्कारक ] 
समासोक्ति का निरूपण पहले करते है-- | 

[ सूत्र ३२ | [ केवर | विदोषर्णो के साम्य [ = श्छेष ] से यदि अग्रस्त॒त गम्य हो 

तो समासोक्ति ॥ 

[ इत्ति ] यां [ अलंकारं मेँ | प्रस्तुत भौर अप्रस्तुत का निरद्् दो प्रकार से किया जाता है 
( १) वाच्यल्प से ओर ८२) गम्यरूप से। जो नि्देद्य वाच्यरूप से कियाजातादहैवहभी दो 
म्रकारकादहोतादहै८१) रेष दारा भौर ८२) अल्ग अल्ग श्दोद्वारा। ये दोनों ही प्रकार 
के वाच्य निर्दशो म अलकार रकष ही माना जाता दै। किन्तु जर्शे निदश् गम्यर्पसे रहता 
वहां यदि वह प्रस्तुत विषयक दो [ अर्थाव्‌ प्रस्तुत अथं गम्यरूपसे प्रतीतदौ ] तो अल्कार होता 
है-अप्रस्ततप्ररंसा। ओर यदि अग्रस्तुतविषयक हो [ अर्थात्‌ अप्रस्तुत अथं गम्यरूप से प्रतीत 
हो ] तो अलंकार को समासोकित कदा जाता है । इसका निमित्त होती है केवल विद्णेषणों की 
समानता क्योकि यदि विदध्य भी [ प्रकृताप्रकेतोमय-- ] समान हो तो वहां दलेष हो जाता दै । 
अप्रस्तुत अर्थं जव विशेषण करौ समानता से गम्यर्प मेँ प्रतीत होता है तव वह प्रस्तुत का अवच्छेदक 
होकर प्रतीत होता हे । अवच्छेदक होने का अथंहै व्यवहारकाञरोप, रूप का आरोप नहीं। 
श्प का आरोप मानने पर तो प्रकृ अथं अप्रकृत अर्थं से अवच्छादित द्ये जाएगा र 
तब व्हा रूपक होगा । क्योंकि [ अग्रङ्ृृतरूप से अवच्छादित] प्रकृत वरहा वस्तुतः 
अग्रक्ृतकेरूपसेरूपितदहीहोगा। 

विमर्िनी 


तत्रेव्यटारद्वयमष्याव्‌ । आदाविति प्रधानतया । अस्या हि विन्ञेषणमाच्रावष्ठम्मा- 
र्परिकराद्िज्ञेषणसाम्या वष्टम्मस्देन विश्चिष्टव्वस्र । विदषणेत्यादि । अध्याश्चारटकारान्त- 
रेभ्यो विभागं दर्शयितुमुपक्रमते-- इदेत्वादिना । वाच्यत्वं चात्र इयोः प्रस्तुतयोरप्रस्त तयोः 
भरस्तुताघ्रस्तुतयोश्च भवति । गग्यरवं पुनः कदिसप्रस्तुतस्य कचिचाप्रस्तुतस्य । प्रश्तुताप्रस्त- 
तयोस्तु न भअदति। ताद्वप्येण वस्तुसद्धावा भावाद्‌ ) दटेषनिदं शभङ्गयेति । प्रस्तु तये रप्रस्तुत- 
योश्च । पृथगुपादानेनेति । प्रस्तु तयोरग्रस्त॒तयोः प्रस्त॒ताप्रस्त॒तयोश्चेतदिति वाच्यम्‌ । अचर 
चाप्रस्तुतर्य किटेतुकं गम्य^वमिव्य क्ृयाह- तत्र चेत्यादि । तत्रेति अप्रस्तुनक्य गम्यस्वे। 
विशेषगानां चात्र बहुत्वमेव विवक्षितमिति न वाच्यम्‌ । 


समासोक्त्यठङ्ारः ३१३ 


“श्वसन विषमा रात्रिञ्योच्ला तरङ्कितविञ्चम। शशिसणिश्रुवो वाष्पायन्तेनिमीरुति पञ्चनी । 
उपतचिततमोमोहा भूमिग्य॑नक्ति विवर्णतां तदिति गहने दशं दां कथं सखि जीव्यते ॥' 
दष्यत्र विद्ोषणबडुव्वा मावेऽपि समासोक्तेः सद्धावात्‌। अतश्च विशेषणानां साभ्या. 
दीति न सूत्रणीयम । अबह्स्वे तस्याष्याषेः । विरोषणसाम्यमपि कस्मादन्न हेतुश्वं भजत 
इष्याश्चङ्कयाह ~ विरेषेणेत्वादि । अप्रस्तुतसिति न पुनरपरस्तुतधसां एव । नद्यन्यधर्मिसं ब- 
न्धिनो धमाः स्वधसिणसन्तरेणान्यत्नाव तिष्ठन्ते । नद्यनायके नायकधमाणामन्दयो युञ्यते । 
अन्यधसांणामन्यन्रान्वयासंभवात्‌ । जत एवान्य रोप्यमाणोऽन्यवहारोऽन्यन्न न सं भवतीति 
तद्विना भावाष्स्वभ्यवहारिणमाहिपतीव्याक्िप्यमाणेनाप्रस्त॒तेन धर्मिगेव प्रस्तुतो धम्य 
वच्छे न पुनरच्छाद्यते । तथात्वे इ्यप्रस्तुतेन प्रस्तुतस्य रूपरूपितस्वादुपसलमा- 
रोपः स्यान्न व्यवहारसमारोपः । अत्त एवाह-प्रस्तुतावच्छेदकत्वेनेति । अत एवाप्रस्तुतस्य 
| गग्यस्वे इति सूत्रितम्‌ । एवं समासोक्तौ ग्यवहारसमारोपाद्प्रस्तुतेन प्रस्वतस्य देशिष्टथ- 
| रुच्षणमवच्डेद कस्वं विधीयते । रूपके तु रूपसमारोपाद्रुपरूपितत्वाखयमाच्छाद्‌कस्वमिरय- 
नयोसं दः । तेन "विरोषगानां साम्य1दुप्रस्तुतघर्मावच्छेद' इत्य पास्यास्मह्वत्त गानुगुण्येनेव 
| विशेषणसाभ्यादुप्रस्तुतावच्छैदः खमासोद्िरित्येव सूत्रणीयम्‌ । अतिश्चयोक्ध्याशङ्धा पुनरत्र 
निष्प्रमाणिकेव । विषयस्योपाद्‌ानाद्विषयिणश्चाद्चुपादानात्‌ । 
तत्र = उन दोनों अलंकारो में ते । आरी = पदक, पदे इसलिए कि दोनों मं यही प्रधान 
है। समासोक्ति जो दै, वह परिकर से अधिक मद्व कीरै क्योकि परिकर में विद्ेषण केवल 
साभिप्राय रहते है जब कि समासोक्ति में प्रस्त॒त के समान अप्रस्तुत अथं मे भी अन्वित होने 
योग्य । 'विशेषण-इत्यादि [ सूत्र है ] । अव इसका अन्य अलंकारो से अन्तर दिखलने के च्वि 
कहते हैँ - इइ = यहां = अलकारो मे शत्यादि । यहाँ वाच्यता तो पेते मीदो पदार्था की होती 
हैजो कवल प्रस्ठत रहै, षते भीदो कीदहोतीहैनो दो केव अप्रस्तुत हौं ओररेसोंकीमी 
जिनम एक प्रस्तुत हो ओर दूसरा अप्रस्त॒त । किन्तु गम्यता कहं केवल प्रस्तुत की होती है ओर 
कहीं केवल अप्रस्तुत की। प्रस्तुत ओर अप्रस्तुत दोनो एक साथ गम्य नहीं होते । इसलिए ठेसा 
होना कदी समव ही नहीं । 
श्ेषनिदंश् भङ्गधा = देष दारा निदेश अर्थात्‌ केवल प्रस्त॒तो का ही या केवल अप्रस्तुतों का 
ही। एरथकउपादान =अल्ग अङ्ग कथन अर्थात्‌ केवर प्रस्तुर्तो का, केवल अग्रस्त॒तोंकायां 
प्रस्तुत ओर अप्रस्तुत दोनों का । इस सम।सोक्ति मे जो अप्रस्तुत गम्य रहता है इसका कारण 
9 क्या होता हैः--इस पर उत्तर देते है--(्तत्र चः । तत्र = उसपें = अप्रस्तुत के गम्य होने में । य्ह 
` यह कोई बाध्यता नहीं कि विङ्ञेषण वहुत ही हों क्योकि-- 
(रात समीर से विषम दहे, चँदनी तरंग के विभ्रम से युक्त है। चन्द्रकान्तमणि कौ भूमिर्याँ 
सू बहा रही है, कमलिनी संद रदीदहै, तमकी अंधियारी वद जनि से भूमि भी अव विव 
। होती जा रही है - यह सब जंगल मै देख देखकर, है सखि जिस किसी प्रकार जिया जा रहा हे ।* 
-यहां आदि मे एक एक ही यिशेषण है तथापि उनम [ नायिकात्वं आदि 
प्रतीत होने से ] समासोक्ति है । इसङ्ए [ सर्वस्वकार ओर रलाकरकार दोनोको ] "विशेषणो की 
| को समानता इस प्रकार सूत्रम विदेषण शब्द के साथ वहुवचन नहीं जोड़ना चाष्ट 1 उते 
क जोड्ने से उप्त समासोक्ति मे लक्षण लागू नही होगा जिसमें विशेषण भनेक नहीं होते । 
विरेषण्ताम्य मी याँ हेतु किंस कारण बन जाता है-दस शका पर उत्तरं देते है 
'विक्ञेषण-' इत्यादि । अप्रस्तुत = अप्रस्तुत भी, न कि अप्रस्तुत के धर्म॑ ही । क्योकि जो धम 
विसी अन्य धमींमं रहते हवे अपने धर्मीको छोड़कर अन्य किसी मीं मे नही 


३१४ अलङ्कारसवंस्वम्‌ 


पचते । अनायक में नायक के धर्मौ का सम्बन्ध ठीक्‌ होता भी नदीं । फिर वस्तुस्थिति यह है 
कि अन्यकेधमोौ का अन्य मे सबन्ध संमव भी नदीं हे । इस कारण सिद्धान्त यह मानना ह्येता है कि 
जव अन्य का व्यवहार अन्य मे संभव नदीं होता तव यदि वह अन्य पर आरोपित किया जाता 
हे तो वह अपने व्यवहारी = धर्मी अर्थात्‌ जिससे वह कमी भी भलग नदीं होता, का आक्षेप 
कर लेता है ओर तब आक्षेप द्वारा प्राप्त यह अप्रस्तुत व्यवहारी = धमी प्रस्तुत व्यवहारी = धमीं 
मे निविष्ट होता हे; ेसा नदीं कि प्रस्तुत धमी अप्रस्तुत धमीं से अवच्छादित किया जाता है। 
क्योकि अवच्छादित किए जाने पर तो प्रस्तुत अप्रस्तुत के स्वरूप से रूपित दो जागा फलतः 
वह्‌ रूपका आरोप मानना होगा व्यवहार का नहीं । इसी विषय को मनम रखकर कहते है-- 
“्रस्तुतावच्छेदकत्वेनः० । श्सीलिप सूत्र मे अप्रस्तुत गम्य हो तोः रेस्रा कहा गया है । इक्त प्रकार 
समासोक्ति मे व्यवहार करा समासेपद्यो जाने पर प्रस्तुत धमीं अप्रस्तुत ध्मींसे विरिष्टं बन 
जाता ह, इसे ही अप्रस्तुत कँ प्रति अवच्छेदक बनना कदा जाता है । 
रूपक मे समारोप होता दै रूपका, जतः वदाँ प्रकृत को अप्रकृत से अवच्छादित माना जाता है 
क्योकि अवच्छादितत्व रूपरूपितस्व का दी दूसरा नाम है । यह है जवच्छेदकत्व जोर भवच्छादितत्व का 
परस्पर म अन्तर [इसलिए अप्रस्तुत षमीं के प्रस्तुत धीं मे अवच्छेद क वनने मेँ अरुंकाररत्नाकरकारने 
जो रूपक की शंका प्रस्तुत की है वह निर्मल हो जाती है] भौर इसीक्िए [अल्काररत्नाकरकार 
कोभ] समासोक्ति लक्षण के किए--विषेषर्णो की समानता के कारण अप्रस्तुत के धमस 
प्रस्तुत का ] अवच्छेद देस सूत्र न वनाकर हमारे लक्षण के अनुरूप केव “विशेषणं की समा- 
नता रहने से अप्रस्तुत का अवच्छेद! पसा ही सूत्र बनाना चादि । ओर [ अलंकाररत्नाकर- 
कारने प्रस्तुत धमी पर अप्रस्तुत धमी के अवच्छेदका खण्डन करते हुए ] जो अतिशयोक्ति 
हीने की दाका प्रस्तुत की दै वह भी बिल्ल निमल दहै क्योकि यहां उपादान विषय काही 
रहता हे ओर अनुपादान विषयीका ही [जव क्रि अतिशयोक्ति दोती है विषय के अनुपादान 
तथा विषयी के उपादान होने पर ] 1 ध 
विमश्ं :-अलंकाररत्नाकरकार ने समासोत्तिका लक्षण अलंकारसवस्वकार से भिन्न किया 
धा गौर उसका कारण सव॑स्वकारके लक्षण में रूपक या अतिशयोक्ति कौ संमावना बतलाया 
धा । विमरिनीक्रार ने उसी का खण्डन ऊपर के विवेचन द्वारा करिया है। अलकाररत्नाकर का 
सम्बन्धित विवेचन इस प्रकार है- 
[ सूत्र ] "विरोषणानां साम्यादप्रस्तुतधमवच्छेदः समासोक्तिः" । 
[ वृत्ति | (क ) समानविदेषणमहिम्ना यत्र॒ प्रस्तुतस्या्थैस्याप्रस्तुतगतयुणक्रियादिरूप- 
धभेविच्छेदः प्रतीयते सा समासोक्तिः । ततश्ाप्रस्तुतन्यवदारसमारोपः, न रूपसमारोपः । पू, ७१ 
( ख ) अत्र विदेषणमात्रसाम्याद प्रस्तुतवस्तु सम्बन्धिनो धमां एव प्रतीयन्ते, न तु धरम्य॑पि; 
धर्मिणोऽपि प्रतीतो रूपस्षमारोपाद्‌ रूपकम्‌ अतिदायोक्तिवां स्यात्‌ , न तु समासोक्तिः, अत एव ना- 
प्रस्तुतस्य गम्यत्वम्‌ , अपितु तदधमांणामैव । तेन “अप्रस्तुतस्य गम्यत्व" इत्या्यलक्षणमैव । 
[ सूु° | विरोषणों की समानता के कारण अप्रस्तुत के धमं का [ प्रस्तुत मे] अवच्छेद 
समासोक्ति । 
| वृत्ति | ( क ) समान विदोषर्णो के बल पर जहो प्रस्तुत अथंमे अप्रस्तुत अ्थके गुण क्रिया 
आदि रूप धर्म का अवच्छेद प्रतीत हो वह समासोक्ति । इस प्रकार याँ अप्रस्तुत फे व्यवहार का 
हौ आरोप होता हे रूपका नदीं । 
( ख ) यहाँ विशेषणमात्र का साम्य रहता है अतः यहाँ अप्रस्तुत वस्तु के धर्मोकीही 
प्रतीति होती है, धमी की नदीं। धर्मी कीभीप्रतीतिदहोतो आरोपसरूपकाहोगा। तवयातो 


समासोक्त्यटकारः ३१९५ 


रूपक होगा या अतिरायोक्ति; समासोक्ति नदीं । इसीकिए गम्यता अप्रस्तुत की मानना टक नहीं 
है, अप्रस्तुत के धर्मो की ही गम्यता मानना ठीक है । इस कारण [ सवेस्वकार का ] “अप्रस्तुत 
गम्य हो तोः--इत्यादि समासोक्ति लक्षण ठीक लक्षण नहीं ह । 

पण्डितराज जगन्नाथ ने मी सवंस्वकार के 'विदोषणसाम्याद्धि-प्रकृतरूपरूपित्वाद्‌ रूपकमेव 
स्यात्‌"-दस अंश को उद्ध्रत किया है ओर (तदेतदुक्तिमात्ररमणीयम्‌”-कहकर इसका खण्डन किया 
है ओर तदथं प्रायः रत्नाकरकार द्वारा प्रस्तुत तकं ही उपस्थित किए है। किन्तु विमरिनीकार 
दारा प्रस्तृत समाधान से वे सहमत हें। पण्डितराज ने प्रस्तुत धर्मी पर अप्रस्तुत धमींका 
आरोप तो स्वीकार नदीं किया, किन्तु वे उन दोनों धर्म्यो के अभेद को अस्वीकार नहीं कर सके । 
उनकी पक्ति है-- 

( क ) विशेषणसाम्यमदिम्ना प्रतीतोऽप्रह़ तवाक्याथैः स्वानुयुणं नायिकादिमथंमाक्षिप्य तेन परि- 
पुण्विरिष्टश्रीरः सन्‌ प्रकृतेवाक्याथे स्वावयवतादात्म्यापन्नतदवयवोऽमेदेनावितिष्ठते । स च 
परिणाम इव प्रञतात्मनेव कार्योपयोगी, स्वात्मना च रसादुपयोगी । 

( ख ) अग्रक्रताभिन्नतया व्यवसितः प्रकृत्यवहारः स्वविशेष्ये तरदिरोष्याभिन्नतयाऽवस्थिते 
भासते ) 

-[ क ] विशेषणसाम्य कै वर पर प्रतीत हभ वाक्याथ अपने अनुरूप नायिका आदि धर्मां 
का आक्षेप कर लेता है, ओर उसके द्वारा उस अप्रस्तुत वाक्यां का शरीर पूणै दहो जाता हे । 
तब वह प्रकृुतवाक्या्ं मे अभेद सम्बन्ध से सम्बन्धितप्रतीत होता है, इस अभेद मे कारण होतादहे 
दोनों वाक्यार्थो के अवयर्वो का परस्पर मेँ अभेद । अप्रकृत अथं कायोँपयोगी होता हे प्रक्ृतरूप से 
ही । अपने आपके रूप मे वह्‌ रसोपयोगी बनता है) 

[ ख | प्रकृत न्यवहार अपने अप्रकृत धमी से अभिन्नरूप से प्रतीत हो रहे-धरमीं मे अप्रकृत 
व्यवहार से अभिन्नरूप से भासित होता है) पण्डितराज ने कुबरयानन्दकार अप्पयदीक्षित को 
सर्वस्वकार की आज्ञा का अनुवरती कहा दै भोर उनका विभिन्न सात तको दारा खण्डन किया हे । 

[ सवंस्व ] 
तच्च विशेषणसाम्यं हिटष्रतया साधारण्येन पम्यगभत्वेन च भवत्‌ 
जिघा भवति तच ङ्कष्टतया यथा- 
'उपोढरागेण विलोटढतारकं तथा गरहीतं चादिना निशामुखम्‌ । 
यथा समस्तं तिमिरंद्युकं तया पुरोऽपि रागाद्चलितं न ठक्षितम्‌ ॥' 
अत्र निरशारहारिनोः; दिलटष्टविरोषणमदहिम्ना नायकञ्यवहारप्रतिपत्तिः । 
अपरित्यक्तस्वरूपयोनिशादारिनोर्नयकतास्यघमेविरिटयोः प्रतीतेः । सावा- 
त्येन यथा- 
“तन्वी मनोरमा बाला छोकाक्षी वुष्पहासिनी । 
विकासमेति सुभग भवदशेनमाअ्तः ॥ 
अन्न तन्वीत्यादिविशेषणसाम्याहोरखाश्षया टताग्यवदहारप्रतीतिः । तच 
च छतेकगामिविकासाख्यघर्मसमासेषः कारणम्‌ । अन्यथा विरोषणसखाभ्य- 
मात्रेण नियतलताभ्यवहारस्याग्रतीतेः । विकासश्च प्रृते उपचरितो ज्ञेयः । 
पवं च कायं समारोपेऽपि ज्ञेया । इयं च समारोक्तिः पूवोपेक्षयाऽस्पष्ठा । 


३९६ अलङ्भारसवेस्वम्‌ 


यह जो विद्धेषणसाम्य है यह (१) दिष्ट रूप से (२) साधारणरूप से ओर (३) उपम।- 
-गभितरूप से होता है, अतः तीन प्रकार का होता दहै । इन तीनों में से प्रथम रिलष्ट विेषणसाम्य 
का उदाहरण है। 
राग लिए चन्द्रने निशा का चंचल ताराओं वाला सुख इस प्रकार पकड़ा किं उसने राग 
के कारण सामनेसे ही सारे के सारे खिसके अंधकाररूपी अंज्ुक को भी नदीं जाना 
- यरद जो निरा ओर खासी के विदोषण है वे दिष्ट हैः । उनके आधार पर यद नायक तथा 
नायिका के व्यवहार कौ प्रतीति होती है; क्यंकि यहाँ निदा ओर चद्यी अपना स्वरूप विना छोडे 
नायकता [ नायिकात्व तथा नायकत्व ] नामक धर्म से धुक्त प्रतीत होते हैं, 
साधारणधमरूप से ( विद्ेषणसाम्य ), यथा--हे सुभग ! वदै देखने भर त वह॒ तन्वी, 
सनोरमा, वाला मौर पुष्पहास्तिनी चंचलाक्षी खिल उठती है 1 
- यहा तन्वी" आदि विद्ेषणों के साम्य से चचलक्षी राब्द से कथित नायिक्षामें लता कै 
व्यवहार को प्रतीति होती हे। इसमें कारण है विकास नामक धम का समारोप जो एकमात्र र्ता 
काही धमं हे । उसके विना अन्य विदोषर्णो के समान होने पर मी उतने भरस्तेल्ताके व्यवहार 
को प्रतीति निध्ितरूप से न होती । प्रस्त॒त अथं [ नायिका ] म विकास को खक्षणिक समञ्चना 
चाहिए । { स्स उदाहरण से ] यह भी जान लेना चाषिएकि[ न केवर व्यवहार या धर्मकेही 
समारोप से अपितु ] कायं के समारोप से मी समाप्तोक्ति होती है [ क्योकि इस पद्य में (विकसितं 
होना" = खिलना' एक क्रिया है ] । यह जो [ क्रिया कै समारोप से संमव ] समासोक्ति है पुवंवत्ती 
समासोक्ति की अपेक्षा कु कम स्पष्ट हे । 


विमदरिनी 

तदिति अग्ररतुतस्य गम्यते निमिक्तमर 1 तत्रेति निर्धारणे । नायकेति सरूपयोरेकदोषः। 
अपरित्यकतस्वरूपयोरितति । रपरूपितस्वे हि परिव्यक्तं स्वस्वरूपं स्यात्‌ । तत्रेति । कता- 
श्यवहारप्रतीतौ । ननु यदि करूतैकगाम्येव विकासाष्यो धमश्तत्कथं भरङ्ते संगच्छत 
इव्याशङ्कयाह--विकास इत्यादि । एतदेवान्यत्रापि योजय॒ति--एनमित्यादिना । तदैवं साधा- 
रण्येन वमासोक्तविंरोषणसाम्पे सस्यप्यप्रङ्तसंबन्धि धमंकायसमारो पमन्तरेण तद्वयव ह्‌]र्‌- 
प्रतीतिनं भवतीति सिद्धम्‌ । 

तत्‌ = वह विदेषणसाम्ब अर्थात्‌ वह विदेषगताम्य जो अप्रस्ठुत को गम्यता मं कारण वनता 
हे । तत्न = इनमे, यह निर्धारणाधेक है । नायक = राब्द मे एष समास हे क्योकि नायक ौर 
नायिका ये दोनों चाब्दं समानस्पवलेदहं। (अ परिव्यक्तस्वरूपयोः' = “अपना स्वल्प विना 
छोड = जव ल्प का आरोप होता दै तव [ आरोप के विषय निशा राशी आदि का ] अपना स्वल्प 
टट जाता है। तश्र = इसमें अर्थात्‌ लतान्यवहार प्रतीति मं । २ (विकास धमं केवल लतामात्र 
मे अन्वित होने वाला है तो फिर वह प्रकृत नायिका म अन्वित कसे दीगाः एसी रोका कर उत्तर 
देते है - विका क्त०१ इत्यादि । इसी विषय मेँ से एक नवीन तथ्य का [नदरा करते हुए कहते 
हे- “एवम्‌, । इस प्रकार यदह सिद्ध हृञा कि साधारण्य से निष्पन्न समासोक्ति में विशेषणो का 
सामभ्य रहता दै तथापि अग्रक्षत से संवन्धित धर्म अथवा कार्य के समारोप के विना उस [ अप्रकृत ] 
कै व्यवहार की प्रतीति नदीं होती । [ नीचे दिए विवेचन मे पण्डितराज ने मूर क। खण्डन 
करते हए विमरिनी के इस अद्ाको निरस्त कर दिया है । पण्डितिराज जगन्नाथ ने (तन्वी 
मनोदरा'- इस प्रच म व्यंग्यरूपक मानना उचित वतलाया हैः भार अलकारसवस्वकार का 
खण्डन करते हृ समासोक्ति को अमान्य ठहराया हे । उनका प्रधान तक यद दै करि इस पच में 


सखमासोकत्यट्ड्नरः ३१७ 


अन्य अथं की प्रतीति एक मात्र साधारण घमं के आधार पर न होकर “विकासः-रूपी असाधारण 
धमं कै आधार पर हो रही हे । समासोक्ति केवर वहीं मानी जा सकती है जहो सभी विदोषणः 
साधारण हों। उन्होने सव॑सवकार पर यह भी दोष लगाया है कि उनकी यह मान्यता उन्हीं के 
सूत्र के विरुद्ध हे । सूत्र मे विरेषणोँ की साधारणता को अन्या की प्रतीति मे कारण बतलाया 
गया दहै जव कि यहो असाधारणता को। पण्डितराज का कथन अधिक संगत प्रतीत ह्येता है । 
[ द्र° रसगगाधर ए” ५०९-१०, नि. सा. सं, £ | 
[ सवंस्व ] 
ओपम्यगर्भत्वेन यथा- 
'दृन्तप्रमापुष्पचिता पाणिपद्छव्शोभिनी | 
केशापारालिन्ुन्देन सवेषां हरिणेक्षणा 

अच दन्तप्रभा पुष्पाणीवेति सखवेषत्ववदादु पमागमत्वेन छते खमासे 
पश्चाद्‌ दन्तभ्रमासदसेः पुष्पैश्चितेति समासन्तराश्चयणेन समानविरोषणमा- 
हात्म्याह्तान्यवहदारप्रतीतिः ।: अन्नेव "पसैता दरिणेश्चणाः इति पाड उपमा 
रूपसाधकवबाधकाभावात्‌ संकरसमाश्चयेण कंते योजने पश्चात्‌ पूवेषत्‌ 
समासान्तरमहिम्ना ठकताभतीतिज्ञेया । रूपकगभस्वेन त॒ समासान्तराश्रय- 
णात्‌ समानविदेषणस्दं भवदपि न समासोक्तेः प्रयोजकम्‌ । एकदेशविवर्ति 
रूपकसुखेनेवा्थन्तरधतीतेस्तस्या वैयथ्यत्‌ । न च पूवेद्रितोपभासंकर- 
विषये एव न्यायः । उपमासंकरयोरेकदेराविवतिनोरभावात्‌ ¦ तच्चैकदेशा- 
विवतिरूपकमश्ेषेण शटेषेण च भवतीति दिविधम्‌ । अदिं यथा- 

निरीक्ष्य विचयु्यनेः पयोदो सुखं निद्ायामभिसारिकायाः \ 

धारानिपातेः सदह कि चु वान्तश्चन्द्रोऽयमित्यादतरं ररास 1: 


अन्न निरीक्षणाुशुण्याद्धिदयुन्नयनैरसित रूपके पयोदस्य द्वष्टुपुखष- 
निरूपणमातंतरं ररासेत्य्च अपतीयमानोसपेक्चाया निमित्तत्वं भजते ॥ 
दिटष् यथा- 
'मदनगणनास्थाने ठेख्य४पञ्चपरुदश्चयन्‌ 
विचकरिल -ब॒हत्पत्न्यस्तद्धिरेफमषीचवेः। 
$टिखटिपिभिः कं कायस्थं न नाम विखुज्यन्‌ 
व्यधित विरहिभाणेष्वायग्ययावधिक मधुः ॥ 
| श्री च ० ६।७० | 
अन्न हि पत््रलिपिकायस्थशाब्ेषु इठेषगभं रूपकं दिरेफमपौखवैरि 
स्येतद्रुपकनिमित्तस्‌ । अस्य च प्रचुरः प्रयोगविषय इति न समासोक्ति 
बुद्धिः कायो | 


उपमागमित विशेषणसाम्य का उदाहरण यथा-'दन्तप्रभापुष्प से खचित, पाणिपद्ल्व पे 
सुशोभित ओर केशपाशभ्रमराली से खवेष। है यद्‌ मृगाक्षी ।' 


| 
| 


३१८ अलङ्कारस्वस्वम्‌ 


-- या [ नायिका मे कताभ्यवहार कौ प्रतीति होती है किन्तु] सुवेषत्व [ केवर नायिका 
का धर्मं है अतः उस] के कारण [ समी विदोषर्णो को नायिकापक्ष मेँ अन्वित करने हेतु ] पदिक 
"दन्तप्रभा पुष्प क समानः रेसा उपमागमित [ उपमित- ] समास करना होता दै, तत्पश्चात्‌ 
[ उन्दीं विदोषणों कमो रुतापक्च मं अन्वित करने हेतु ] दन्तप्रभासद़श पुष्प इस प्रकार एक दूसरा 
[ मध्यमपदलोपी या विेषण ] समास अपनाना पड़ता है तव कहीं विद्ेषणां की समानता 
बनती ओर रतान्यवहार की प्रतीति दोती हे यहीं यदि परीता =पिरी हदं हे सगत, ठेता 
पाठ होता [ अथीत्‌ केवर नायिका मं ही अन्वित होने वाला सवेषत्व जसा कोई विदोषण न रहता | 
तोन तो य्दा उपमा का साधक प्रमाण रहता ओरन रूपक का वाधक । तव [ विश्चदवाक्य मं | 
दोनो का संकर मानकर पदाथ योजना की जाती [ किन्तु तव भी नायिका पक्ष प्रथम पक्ष हे अतः 
उसके अनुरूप विरषणयोजना मे सदायक उपमितिसमासमूलक विग्रह पहले किय। जाता ओर | 
तत्पश्चात्‌ पूववत्‌ अन्य समास [ मध्यमपदलोपी या विशेषण समास ] के आधार पर लता प्रतीति 
होती इदं मानी जाती । यदि [ यहां विशेषण मेँ सीधे सीघे ] रूपक ही माना जाय ओर तदथै अन्य 
समास [ मध्यमपदलोपी या विदेषण ] दी यहाँ [ प्रथमतः ] अपनाया जाय तो यदौ विशेषर्णो 
मे समानता [ उभयपक्ष मेँ अन्वय की योग्यता ] तो आ जाएगी, किन्तु उसे समासोक्ति कौ सिद्धि 
नहीं होगी, क्योकि तव दूसरे अर्थं [ ठ्ता ] का बोध णकदेरापिवत्ती रूपक ते दी हो जायगा फक्त: 
उस | इस समासोक्ति का कोहं प्रयोजन नदीं रहेणा ] वहु व्यथं पड़ जाएगौ । यद स्थिति पूव 
दक्चित उपमा तथा संकर के विषयमे लागून होगी कर्योफि उपमा ओर संर एक देविवर्तौ 
नहीं होते । 

[ स्स्व के “भौपम्यगर्भतवेनः इस अद से केकर उपमा संकरयोरेकदेशाविवत्तिनोरभावातः ~~ 
शस अदय तक स्पष्टीकरण पण्डितराज जगन्नाथ ने अपनी मषा मेँ इस प्रकार किया है --“ओपम्यगभे- 


त्वेनापि विरेषणसाम्ये संभवति । यथा - 'दन्त-क्षणाः अत्र हरिणेक्षणामात्रदत्तेः खवेषत्वस्य महिम्ना 


दन्तप्रमासद् शानि पुष्पाणीत्यादि योजनां विहाय दन्तप्रभाः पुष्पाणीवेत्याचपमितखमाघताश्रयेण 
कृते योजने भ्रकृता्थसिद्धौ स्यां बृ्यन्तरेण त्यक्ताया अपि योजनाया पुनरुस्जीवने पष्पपछ्वाजिन्दे- 


रूपमेयैराक्षिप्तायाः क्तायाः प्रत्ययादत्र तद्व्यवहारारोपः । एवं सुवेषेत्यपदाय परौतेति कत उपमा- 
रूपकसाधकवाधकप्रमाणाभावात्‌ तदुभयपंशयरूपसंकराश्रयेण कृते योजने पश्चात्‌ पूर्वोक्तरीत्या लता- 
प्रतीतेः सम।सोक्तिरेव । समासमेदना्थं मदेऽपि शब्दैक्यमादाय दिल्ष्टमूलायामिव विदेषणसाम्यं 


बोध्यम्‌ । आदावन्ते वा रूपकाश्रयेण दन्तप्रभा एव पुष्पाणीति योजने कते ठ हरिणेक्षणांशे आक्षिप्त 


रतातादात्म्यकेने कदे शविवत्तिरूपके णवा प्रकृता्ैप्रत्ययोत्पत्तरनाथैः समासोक्तेरत्र ।' 

-- विशेषणसाम्य ओपम्यगरित मी होता है । यथा--दन्त प्रभा० पयाये मं । हदरिणेक्षणामात्र 
के विदोषण के सुवेषत्व के वल प्र दन्तप्रमासद्श पुष्पः इत्यादि योजना को {छोडकर दन्तप्रभा 
पुष्पों के समान इत्यादि उपमित समास की योजना करनी पड़ती है । तव प्रकृत (हरिगेक्षणापक्षीय) 
जथ की सिद्धि होती है । इसके पश्चात व्यंजना द्वारा छोडी हई समासयोजना को पुनः 
जिलया जाता है । तव पुष्प, पल्लव ओर अचिनरन्द रूपी उपमेयां से लतारूपी उपमैय की प्रतीति 
आक्षेप से होती है फलतः उसके भ्यवहार का आरोप नहीं हो पाता [ जिससे यहां रूपक हो सके | 
किन्तु वेषः” इस पद को छोडकर (परीता! यह पद अपना छ्य जाटतो नतो यहां उपमा 
का साधक कों प्रमाण रहेगा ओर न रूपक का वाधक । इसक्एि इन दोनों का संदेह रुंकर 
होगा । इस संकर की प्रतौति परहञे होगी, तव्र पूर्वक्तरीति से लता कोप्रनोति होने पर यहां 
समासोक्तिदही होगी । यथपि समाप्त बदरे ही अ्थवरल जाएगा तथापि श्य नहीं बदल्गे 
इसङिण जपते इल्षमूला सम।पोक्ति मे विशचेषणक्ताम्य होगा वैतेही यमौ दहो जायगा । किन्तु 


समासोक्त्यटङ्नारः ३९१९ 


यदि आरम्भ या अन्त में रूपक के अनुरूप (दन्तप्रभा कौ पुष्प एेसी योजना की गईं तो हरिणेक्षणा 
रूपी अथं पर आक्षिप्त क्ता रूपी अथे का तादात्म्य भासित होगा फलतः यहो एकदेरावत्त रूपक 
हो जाएगा । ओर तब अप्रकृत अर्थं की प्रतीति उसीत्े ही जाएगी, निदान यहं समासोक्ति का 
कोर प्रयोजन दीन रहेगा] 

यह एकदे राविवत्तौ रूपक कीं ररेषरहित होता है ओर कहीं इलेषसदित । दोनों में से [प्रथम] 
दटेषरदहित का उदाहरण यथा- 

(मेव विदचयन्नयर्नो से रात मे अभिसारिका का सुख देखकर कदाचित्‌ यह सोचकर अधिकं 
आतता के साथ नाद करता है कि क्या गिरती धाराओं के साथ यह्‌ चन्द्र गिर पा है ? 

- यहं निरीक्षण [ रूपीकायं नयनां में संभव है ओर उसका अन्वय नयनो के साथ तव संभव है 
जव समास मेँ उन्दी की प्रधानता हो ओर एेसा समास वही समास होगा जिससे रूपक की निष्पत्ति 
होती है, इस प्रकार निरीक्षण रूपक का ] साधक है फलतः 'विचयन्नयनशब्द मेँ [ विदयुद्रूपी नयन” 
इस प्रकार ] रूपक सिद्ध हो जाता है) उससे मेष मे द्रष्टा पुरुषका निरूपण होता है। 
वह “अधिक आतता के साथ नाद करता है--इ्स प्रकार की प्रतीयमान उप्प्रक्षामे कारण 
वनता है। 

ररेषसदहित का उदाहरण यथा- 

(मदन [ रूपी राजा ] के गणनास्थान मे विचक्रिलवृृक्षौं के विद्ाल पत्तों [ रूपी पन्नं] 
पर न्यस्त भमररूपी मसीचिन्दुओं से ठेखा जोखा का प्रपंच फैलाते हए मधुने विरहियोके प्राणो 
का आयव्यय अधिक वडा दिया । इस प्रकार उसने छुटि [ ओर कूट] कल्पि के लिए प्रसिद्ध 
[ उपलक्षण मे तृतीया ] किस कायस्थ [ काय = शरीर म स्थ = स्थित = आत्मा तथा काय = 
राञ्यापिकरण मे स्थ = स्थित = केखपाल आदि अधिकारी ] को व्यथित नहीं फिया । 


यहां जो हे सो, पत्र, छ्पि ओर कायस्थ शब्दो मे ररेषमू्क रूपक है । यह्‌ रूपकं द्विरेफ 
मषीलव राब्द से प्रतिपादित [ भोरो पर स्याही की वृदां के ] रूपक का निष्पादक रै । 


इस एकदे राविवतीं रूपक का प्रयोग बहुत अधिक होता है । यह समञ्ञे रहना चाहिए 
ओर वर्ह समासोक्ति नदीं समञ्च वैठना चादिए । 


विमरिनी 
सुवेषस्वं प्रकृताथं एवानुगुणमिस्युपमायाः साधकम्‌ अतश्च तत्समासाश्रयः । -समासान्त- 
राश्रयणेनेति । यद्यष्यत्रोपमासमाख एव स्थितस्तथाप्युपमानोपमेययोञ्यंस्ययादेव 


समाखान्तरव्वसुक्तम्‌ । पूर्वापेक्ञयास्यान्यथास्वात्‌ । अत्रैवेति दन्तप्रभेत्यादौ । उपमारूपक- 
साधकबाधकामावादिति । परीतष्वस्य दहि प्रकृताप्रकृतयोस्तथा नानुगुण्यभिति साधक- 
स्वाभावः। तथा च न विगुणह्वमिति बाघकसष्वाभावः। अतश्चेकपक्ताश्रयाभावादुपमारू- 
पकयोः संदेहसंकरः । तस्य समाश्रय -उभयसमासग्रहणमर । तच्चेकस्मिन्नेव वाक्ये न 
संभवतीति कामचारेण तयो््र॑हणम्‌ । 

संकरसमाश्रवेणाप्युपमासमासयोजने कते यद्वद्य मेवा कारस्तहवदु पकसमासयो जनेऽ 
पि किमयमेव किञ्ुतालंकारान्तरमिव्या्ञङ्कयाह-रूपकेत्यादि । एतच्च साखाक्पि 
रूपकगभं समाव योञयम्‌ , समानन्यायत्वात्‌ । ययेवं तद्यपमासमाश्रयेऽपष्पेकदेश- 
विवघ्युपमाञ्ुखेनेवाथान्तरप्रतीतेः फ नंतद्धवतीस्याज्ञङ्कयाह-न चेत्यादि । एष इति 
खूपकोक्तः। अभावादिति उद्धटमतेन । यदाहुः -"न च सग्रटस्येवोद्धटस्यकदे श्च विवति- 


३२० अच्ङ्ारसवंस्वम्‌ 


रूपकवदु पमासंकरावेकदेि नौ श्तः।› अतश्चंतत्तन्मताभिग्रायेणोक्तम्र्‌ । अन्थङ्न्मते हि 
वच्यमाणनीच्या तयोः संभवः । ननु यदि तयोग्र॑न्थक्रन्मते संभवस्तदौ पभ्यगर्भ॑वि लेषणे 
स्थापितः सखमासोक्तिप्रकारस्त्हि न संभवति । तस्येकदेदाविवतिरूपकवदेकदेशाधिवतिभ्या 
स॒पमासंकराभ्यामेवार्थान्तरप्रतीतिसिद्धेवे यर््यांत्‌ । नैतत्‌ । यतोऽस्त्येव तावद पम्यगभै- 
विशेषणहेतुकव्व समासोद्छेः । किष्वेतदन्यमेदसहचरितमेवाध्या निसित्ततां भजते न पुनः 
केवब 1 तथासवे हि विदोषणानामो पम्यगर्भत्वे एकदेदाविवरतिन्या उपमायाः प्रा्िः । 
तन्न शिठष्टव्वसहष्चरितमेतयथा- 
(परिपिज्जरितासिताम्बरेनिविडेः कं न हरन्ति हारिभिः। 
अयि सायमिमाः पयोधरे स्फुटरागाश्चरतारका दिशः ॥' 
जत्र स्फुरटसंध्यातपकुङ्कमेः' इति पाठे संध्यातपङ्ङ्कमेरिस्योपम्यगर्भं विशोषणम्‌ । 
साधारण्यसहचरितं यथा- 
'तन्वी मनोरमा बाला रोाक्ती स्तवकस्तनी । 
विकासमेवि सुभग भवदशंनमात्रतः ॥? 
अत्र स्तवकस्तनीर्यौ पम्यगम॑ विदोषणम्‌ । शद्धका्यंसमारोपसहचरितं यथा- 
'समाडरोहोपरिपादपानां द्रो पुष्पोत्कररेणुएञ्जे । 
[| ~+ [१ 
रुताग्रसनांश्चकमाचकषं क्रीडन्वने कि न चकार चंत्रः ॥' 
जच्र प्रसूनांश्चकमिध्यौ पभ्यगर्म॑विद्चेषणम्‌ । केवरस्वे घुनरैतेषामेकदेशविवतिन्युपमेद 


यथा- 
"बभौ लोराधरदलस्फुर दश नकरेखर म्‌ । 


अविरास्ाङ्िवख्यं रूडितं रुकुनास्रुखम्‌ ॥' 
अन्न कुङ्ितष्वञ्चुपमासाधकम्‌ । समासान्तराश्रयाव्‌ समानविशेषणत्वं खवद्पि नात्र 
समाघोक्तः प्रयोजकम्‌ । एकदेशविवध्युपमास्ुखेनवार्थान्तरप्रतीतेस्तस्या वयभ्यात्‌ । एवं 
दृन्तम्रभेष्यादवपि ज्ञेयम्‌ 1 दन्तप्रभाः पुष्पागीवेस्येव खमासे कृते उपमानभूताया छताया 
प्रतीतिसिद्धेः समास्ान्तराध्रयेणागतायास्तस्प्रतीतेव्यथत्वाच । अप्रङ्ृतागूरणे हि कवे 
संरम्भः तञ्चानयव सिद्धमिति किं समासोक्त्या ¦ चिरतनानुरोधाव्‌ पुनरत्र म्रन्थङ्कता 
समासोक्तिर््ता । यत्त यत्र समासोक्तायाममुपमायां समास्षान्तरेण विशेषणसाम्यं योजयितुं 
शाक्य तत्रपम्यगर्भविदोषणप्रभाविता सखमास्रोक्तिश्क्ता' इति वचयति तदपि चिरंतनानु 
रोधपरमेव । अन्यथा हि समानन्यायस्वादेकदेश्विवतिनि रूपकेऽपि यन्न समानविरोषणस्वं 
योजयितुं दाक्यं तन्नापि समासोक्तिरिति कि नोक्तम्‌ । यत्त॒ नोक्तं तद॒क्तम्‌ । रूपक- 
माह्म्यात्‌ प्रथममेव तप्प्रतीतिसिद्धेरनन्तरं समासोक्तिश्चुखेनाप्रक्ृतप्रती तेवय्यात्‌ । 
आह्ादिचन्द्रवदना स्फुरत्तारकमीक्तिका । 
घनान्धकारधस्मिज्ञा राजते गगनस्थरी ॥ 
इत्यादी, पुनर्पमायाः साधकाभावादेकदेज्ञविवति रूपकमेवेति न समासोक्ति्मः 
क्यः न चवमादाबुपमारूपकयो संददहसकरो त्याय्यः ॥ तस्यालंकारसार कारादिभिनि- 
रङ्ृतत्वात्‌ । समासोक्तिरुकणावसरे फं खपकनिरूपणेने्याश्ञङ्कयाह-- अस्या इत्यादि । 


सुवेषत्व" के प्रकृत अथं [ नायिका पक्ष ] मे हयी अन्वित दोता है इसि वह उपमाकाही 
साधके है, यतः उस पक्ष मे [ विदेषणों के छिए ] उसी [ उपमा ] का समास अपनाया जाता ३ । 


~ 


^ 


समासोक्त्यलङ्कारः २२९ 


समासान्तराश्रयणेन = अन्य समास का आश्रय केकर = अर्थं यह करि यहां वस्तुतः तो उपमा- 
समास दही हे श्सक्ट उपमानोपमेयभाव को छोड देने [ ओर आरोप्यआरोपकभाव को स्वीकार 
करने | पर ही यहाँ अन्य समास अपनाया जा सकता है । इसे अन्य इसर्पि कहा गया क्यो 
यह पूवं [ समासत] कौ अपेक्षा भिन्न है। "अन्व = यदीः = दन्तप्रभाः इत्यादि पर सें, 
'उपमारूपकस्ाधकवाध्षकामाबात्‌' = उपमा के साधक प्रमाण ओर रूपक के वाधक प्रमाण के 
अभाव से" = यह श्सकिए कि "परीतत्व = धिरा रहना? न तो केवल प्रक्रत मे उस प्रकार अनुदर हे 
[ जिस प्रकार सुवेषत्व विरोषण ] ओर न केवल अप्रक्रत मेही [उस प्रकार अनुकूल है जिस 
प्रकार (तन्वी-इत्यादि प्रय मे विकास ] इसक्एि वह किसी कामी साधक नदींहै। इसी प्रकार 
वहु दोनांमेसेकिसीका वाधक भी नहीं दै, क्योकि वह किसी के प्रतिकूर नहीं है। इसा 
यहो उपमा ओर रूप्रक का संकर है क्योकि दोनों मसे किसी एक पक्षको नदीं अपनाया ना 
सकता । उस (संकर) का आश्रय अथात्‌ प्रारंभ मे दोनों प्रकार के समासो का भपनाया जाना । यह 
केवर एक वाक्य मेँ समव नहीं है अतः दोनों समासोमेंसे किसी कोमी अपनाया जा सकता है । 

प्ररन :--संकरसम।स मानने पर भी जिस प्रकार उपमासमाप्त की योजना करने पर यह 
समासोक्ति अलंकार निष्पन्न होता है उक्ती प्रकार रूपक समास की योजना करने पर भी क्या 
यही अलंकार होगा याअन्य कोडं अलंकार । इसके उत्तर मे छिखते है-रूपक इत्यादि । 
श्स [ पक्ति | को साक्षात्‌ [ संकर निरपेक्ष शुद्ध ] रूपक गर्भित समास मे लगाया जा सक्ता ३ । 
क्योंकि स्थिति दोनों मे एक सी रहती है । 

पररः, यदि देती [ संकर समाप्त कौ ] स्थिति है तो फिर उपमासमास भी किया सकता है 
ओर तव [ एकदेशविवतीं रूपक के समान ] पकदेराविवतीं उपमा से दूसरे अथंकी प्रतीति हो 
सकती € । दसा मानने यहो समासोक्ति अनाव्यक सिद क्यों नदीं योती । उत्तर देत हे- 
न च । एष = यह्‌ अथात्‌ रूपक मे कथित न्याय । अभावात्‌ = एकदेरविवतीं उपमा का अभाव 
अथात्‌ उद्भट के मत वे अनुसार । जषा कहा है [ फिसने कहा हे पता नहीं शोभाकरने नदीं कहा ] 
उद्धर के मत मे एकदेराविवतों रूपक के समान एकदे राविवतीं उपमा भोर संकर नहीं होततेये 
रुदर के दौ मतम दोते दे ।' इती मत के अनुसार अन्धकार ने यदौ यह कहा । स्वयं अन्धकार क 


मतमंतोये दोनो एकदेशपिवत्तीं उपमा ओर एकदे ाविवत्ती रूपक होते ही है जैसा कि आगे 
कहा जाने वाला हे । 


रका; यदि एकदेशविवत्तीं उपमा ओर एकदेराविवत्ती संकर अन्धकार के मतम संमवदहैतो 
फिर समासोक्ति का उपमागभ-मेद न होगा, क्योकि वहं अर्थान्तर की प्रतीति एकदेद्विवन्तीं 
रूपक के समान पएकदेराविवत्तीं उपमा ओर एकदेशविवत्तं संकर से ही हो जाएगी । तव वहाँ 
समासोक्ति मानना व्यथं दोगा । समाधान :-रेसा नहीं है । क्योकि समासोक्ति उपमागभित 
विरेषणों से मी निष्पन्न होती दिखाई देती ३ । किन्तु यहु [ उपमागर्भितविशेषणसंयोजन ] 
अन्य मेदां के साथ रहकर ह इस [ समासोक्ति | का कारण वनता हे, अकेला नहीं । 

अलकारान्तररहित होकर यदि विरष्णों भं समानता रहेगी ओर उनमें उपमित्तिसमास के 


आधार पर । उपमागमितता मानी जाएगी तो वह। अलंकार एकदेराविवत्तीं उपमा हयी बन 
जाएगी, समासोक्ति नहीं । 


[ जिस प्रकार एकदैशविवत्तीं रूपक रलेषसदहित ओर दलेष-रहित दोता है उसी प्रकार 


एकदेराविवत्तौं उपमा भी रेषसहित ओर रेषरदहित होती हे। दोनों में से प्रथम ] विद्घेषणगत 
दटेषरदहित उपमा का उदाहरण यथा- 


[ भलंकाररत्नाकरकार दारा समासोक्ति के उदाहरण ऊ रूप में प्रस्त 
२१ अ० स० 


लिए अन्य समासत साननाव्य 


३२२ अलङ्कास्सवेस्वम्‌ 


“अयि [ भित्र! ] च॑चरू तारौ वारी जौर स्छुटरागसे युक्तये दिशा लाल पीडे ओर 
नले अम्बर वाले, साथ ही निविड अतएव आकषेक पयोधरो से किसको आष्ट नर्द कर रदी ।' 

- इस पथां मै यदि [ स्फुटरागाइचकर्तारकाः? = इस विदेषण के स्थान पर ] 'स्फुटसंध्या- 
तपकुद्कभेःः = स्पष्ट ही कुकुम जेसी संध्याकालीन धूप से युक्त [ पयोधर ]--पाठ दोतो य्ह 
विद्धेषण उपमा से गित दो सकेगे, [ क्योकि कुंकुम का अन्वय मवमे न होता अतः इस पदमे 
उपमित्तिसमासर करना पड़ता ओर इस विदोषण का अन्वय पयोधरो के साथ हौ जनेस्ते 


दिशाओं का नायिकापक्च ध्रूमिल हो जाता। यद इस्तङ्ष्‌ करि उनके दो दिष्ट विशेषण स्फुट 


रागत्वः तथा 'चलतार कत्व इट जाते । फलतः ङंकुमसदृद्ा आतप से रजित स्तनसष्ड मेधो से 
दशार्णे किमे आक्रष्ट नहीं कर लेर्ती-" टेसा कने से दिञ्चाओं के साथ भी नायिकासदरद्त्व खिच 
आता है, क्योकि दिदार्ओ के साथ खीखिग को छोड़कर नायिकासट्रर्य को उपस्थिति करनेवाला 
कोई विदरोषण नहीं ३, भतः वहाँ उपमा एकदे श्विवत्ती दे । | 

साधारण विद्धेष्णो से युक्त एकदेदाविवत्तं उपमा का उदाहरण-- 

"यह चचलाक्षी, तन्वी है, मनोरम है, वाका है, गुच्छं सदृश स्तन वाखी है ओर, हे सुभग! 
वहारे दर्चनमात्र से विकसित हो उठती ह ।-- यहां [ अन्धकार द्वारा प्रस्तुत ^तन्वी' आदि प्य 
मे 'पुष्पदासिनीः- विदोषण को हटाकर “स्तवक्स्तनी?-- विशेषण करं दिया जाय तो ] (स्तत्रक- 
स्तनी" यह विद्ञेषण ओौपम्य से गर्भित होगा [ इसमे उपमितिस्मापस माना जाएगा ] क्योकि यँ 
श्लोलाक्षी' विशेषण केवल नाथिक्रा पक्ष मेँ तत्पर होतादै ओर नायिकाके साथ ठता की उपमा 
बतलने वाला कों विरेषण नहीं है, सलिए उपमा एकदेलविवतीं होगी । 

शुदधकार्यसमारोप से युक्त एकदे राविवतीं उपमा यधा-- 

"उपवन सँ क्रीडा करते हर चैत्र मास ने क्या-क्या नहीं किया । वह दक्षो के ऊपर चदा, 
पूर्लो क पराग मेँ कोट-पोट हमा, ओर उस्ने कताओं के पुरा शको को खीचा ।› [ विक्रमंकदेव- 
चरित ७।७ ] यहां श्रसुनांश्यकः शब्द [ मे उपभित-समप्ि ८: प्रसून अश्युक के समान, इस 
रकार उपमागभित है । [ यदं चद्ना, लोट-पोट दोना जौर खोँचना- एते कायें जो नायकं 
रहते है । इनका चैत्रमास पर आरोप हमा | । 

जव ये [ विशेषण ] केवल [ अथात्‌ रठेणदि उपयुक्त वरिदोषता्ओं से रहित अतणवं शुद्ध ] रहते 
है तव मी एकदेशविवत्तीं उपमा हौ होती हं । यथा-- 

(ललनामुख [ कमर के समान ] वड़ा ही लल्ति ल्ग्‌ रह्‌ चा । उप्तम पुडयं के समान 


स्पन्धित अधर्त के वीच केसर ॐ समान दांत चमक रदं थे ओर च्रृविलास्र भ्रमराली के समान 


उप्ते घेरे दए थे + कन ५.२४ । 
यहां “लछितत्व' यद एक टेसा विशेषण है जो [ एकमात्र ] उपमा का साधकहै। क्योकि 


उसके ताथ उपमिति समास नदीं है । [ वहां 'लकिततवः $ स्थान पर बछितित्व भी पाठ है । विन्तु 
दोनों ही पाठके विशेषण न उपमा कं साधक ह ओर न रूपक के वाधक | वदा दूसरा समास 
ही अपनाया जा सक्घता है ओर उस्तते भी विरेषणतसान्य निष्पन्न हौ सकता है तथापि उस समास 
से यहां समासोक्ति निष्पन्न नदीं होगी, क्योकि तव एकदे शविवर्तो उपमा के द्वारा ही दूसरे अथं 


की प्रतीति हो जने पर यहां समापोक्ति व्यथं पड़ जाएगी । यदी रिथति दन्तप्रभा--इत्यादि 


क 


पच मेँ मी समश्चनी चादि । यहां जो शुरू मं (दन्तप्रमा पुता के समानः-एेसा समास किया 
भीजातादहै, दसम भी उपमानमूत र्ता की प्रतीति दी ॥ जाती ह । फलतः उसकी प्रतीति कै 
ं ५ ह। यां जो अप्रकृत पदाथ है उप्तकी ही प्रतीति करने मँ कवि 


प 


समासोक्त्यखङ्गारः | ३२३ 


कासंरम्मदै, ओर वह प्रतीति इस [उपमा] से दही बन जाती है अतः समासोकितिकी 
आवदयकता द्यी क्या है । भ्रन्धकारने जो यहां इस प्य में समासोक्ति वतलाई है वह केवल. 
इसक्िए कि एक प्राचीन आल्कारिक [ उद्धट ] ने रेसे स्थलों में समासोक्ति मानी है। [उद्धरने 
अपने ङमारसंमव में भगवती पावती का वणेन एेसे ही प्ययमें किया है- 


'दन्तप्रभामनसं, पाणिपदछवदोभिनीम्‌ । 
. तन्वीं वनगतां लीनजटाषटचरणावकलिम्‌ ॥ 

--ओर इसे समासोक्ति के उदाहरण के रूप मेँ प्रस्तुत किया है। प का 'दन्तप्रमाः इत्यादि 
जो पाठ म्रन्थकारने दिया है वहु तो मम्मट, इद्र, वामन ओर भामह मे नदीं हयी भिता, उसकी 
पदावली से भिरती-जुकती पदावलो वाला प्रच भी नदीं मिलता ] ओर अगे [ इसी समासोक्ति 
प्रकरण मेँ ] मन्धक्नार ने यह जो कहादैकति समासे कथित उपमा के स्थलों मँ जहां अन्य 
समासे दारा विरोषणसाम्य कौ योजना की जा सकती हे वहां ओपम्यगं विद्लेषण से 
प्रभावित समासोक्ति कदी गई इते मौ प्राचीन आल्कारिक [ उद्धः ] के अनुरोध [ अनुसरण ] 
पर दही कदा हुआ समञ्चना चाहिए । [ अन्यथा यदि यहु मन्थक्रार का अपना स्वयंका मत होता 
तो ] एकदेद विवत्ता रूपक मेँ भौ जदो विद्ेषणक्ताम्य को योजना संभवदहोतौीदहेवे समासोकतिक्यों 
न मानते, क्योकि वहां [ रूपक से अन्या्प्रतीति संभव होने पर समसोरि व्यथं होगी यह] 
जो हेतु प्रस्तुत किया गया है वदी हेतु यर्हमो लामू होता है [ यहां मी अन्याथे-प्रतीति उपमा 
से ही हो जागी फलतः समासोक्ति निरथेक सिद होगी] । वर्ह [ रूपकस्थल्में] जो समासोक्ति 
नहीं मानी वह टीकर दही किया, क्योकि वरह रूपक कै प्रभाव से अथान्तर को प्रतीति पहलेहो 
जारगौ तब पुनः सम।सोक्ति के द्वारा अथान्तर को प्रतीतिं मानना व्यथं होगा-[ अल्कार- 
रत्नाकरकार को | । 


प्रत्न चन्द्रवदन वाली, चमकृते तारम क्तिक वालो धने अनकार-केश से युक्त गगनस्थली 


 विराजरदीहै।' , ॐ 


-यदां समासोक्तिकाभ्रम नदींहोना चादि क्योकि इस ओर रेते स्थला मे उपमासाधक 
कोड प्रमाण नहीं है इसङ्षएि यहो एकदेरविवत्तीं रूपक ही है। न तो रेसा स्थलों मे उपमा 
ओर रूपक का सेह संकर ही मानना उचित है, क्योकि अलरूकारसार'कार अदि ते उसका निरा- 
करण कर दिया दहे। 

समासोक्ति के प्रकरण में रूपक के विचार से क्या-- टेसी आपत्ति का उत्तर देते हण 
लिखते है--"अस्याः' इत्यादि । 

विमशं रस कुम्ब प्रकरणम विमररिनीकार कौ मूल के विरुद्ध यदह मान्यता है कि 
ग्रन्थकार ने जिस प्रकार एकरेश्यविवत्तीं रूपक के स्थलमें समासोक्ति नहीं मानी उपी प्रकार 
एदेशविवत्तौ उपमा के स्थलमें मी उन्दः समासोक्ति नदीं माननी चाहिए । एकदैरविवत्त उपमा ` 
के स्थल में भी द्वितीयाथं कौ प्रतीति उपमाते ही हो जाएगी, फलतः समासोक्ति अवद्य न होगी । 
उन्दने एकदेशविवर्ती उपमा के इरेष आदि उन सव स्थितियों के उदाहरण दिए है-जो स्थितियों 
स्वयं ग्रन्थकार समासोक्ति के मेदो मे अभी तुरन्त बाद वतलाने वाङ है । 


एकदेरविवत्तौ उपमा को समासोक्ति का बाधक मानने पर समासोक्तिका ओपम्यगम सेद 
मानना संमव नहीं है, किन्त पिमरिनीकार उसका समाधान करते है फि यह भेद वीं संभव 
हो सकता हे जहां उपमा के साथ अन्य अल्कासौ का पुट हो । उदाहरणरूप से प्रस्त पमे 
उपमा के साथ रूपक का संदेहसंकर भी है। किन्तु सच यददहैकि पिमशिनीकार का यह तक 


३२७ अलङ्कारसवंस्वसर 


केवर मूरभक्तिमात्र है । वस्तुतः अन्य अलंकारो से मिधित उपमा स्थम भी समासोक्ति 
मानना आवदयक नहीं । समासोक्ति 'अयमेन्द्रीयुखं पद्य रक्तदयुम्बति चन्द्रमाः = देखो यह राग- 
पूणं चन्द्र प्राची का सुख चूम रहा दै"-इस स्थल मेँ अकाव्यरूप से सिद्ध हे । फल्तः जहां उपमा 
अथवा रूपक से अप्रस्तुता की प्रतीति सम्भव हो वं समासोक्ति स्वीकार करने की अधिक भाबु- 
कृता त्याञ्यहीदहे। 
रसगंगाधर ने “दन्तग्रमाः पर्य में विमररिनीकार द्वारा प्रदत्त आपत्ति आपत्तिरूपमें दी स्वीकार 
करली है, य्पि उन्होने विमरिनीकार का उल्लेख नदीं भिया है, ओर 'दन्तप्रभा०ः प्रच में उन्होने 
एकदे दावन्तीं उपमा द्वारा ही ल्तारूपी अन्या्थकी प्रतीति स्वीकार कर अलंकारसवंस्वकार के 
मत का उर्टेख पूञक खण्डन करते हुए समासोक्ति अस्वीकार कर दी है। उनकी पंक्ति दै- 
दन्तप्रभाः पुष्पाणीवेल्युपमागमेत्वेनाप्यादौ योजने कते हरिणेक्षणांरो आक्षिप्तलतोपमानिकया 


 एकदेदाविवत्तिन्या उपमयेव गतार्थत्वात्‌ समापोक्तेरानर्थक्याद ्राप्रप्तक्तेः । ०००। तस्मादोपम्य- 


गभविदरोषणोत्थापितः सम।सोक्तिप्रकारो न गच्छते ।› 

दन्तप्रभा पुष्पके समानः रेस्रा उपमागभित समास करने पर भी यहाँ समासोक्ति नदीं 
हो पाती क्योकि यहाँ वह निरर्थक सिद्ध होती है कारण कि यद लतारूपी जिस अन्यां कौ 
प्रतीति के लिए समासोक्ति मानी जाती है वह एकदेद्ाविवत्तीं उपमासे दीहो जाती हे। यदीं 
उपमा एकदेशविवत्तीं ्सलिणए होती है कि यहाँ हरिणेक्षणा के प्रति उपमानमूत ल्ताका ज्ञान 
आक्षेप दारा होता ह [ क्योकिं यहाँ कता का वाचक कोई भी चब्द प्रयुक्त नदीं है। रसगंगाधर 
पृ० ५११ नि० सा० सं० | ] 

विमरिनी 
अस्याश्च यथोपपादितान्मेदान्संकर्यति- तदेवमित्यादिना । 
अव इस [ समासोक्ति ] के पूर्वोक्त भेदो का संकर्न करते ओर लिखते दै-- 
[ सवंस्व | 

तदेवं दिदष्टविरोषणस्जुत्थापितैका । साधारणविद्येषणसमुत्थापितात्‌ 
धर्म॑कायंसमासेपाभ्यां दहिमेदा । ओपम्यगभेविरोषणसनुत्थापितोपमासंकरः- 
समासाभ्यां दिमेदा । रूपकक्तमाश्रयेण त भेदद्वयमस्या न विषयः । तदेवं 
पञ्चप्रकाया समासोक्तिः । 

इयं च छुद्धकायंखमारोपेण विरोषणसाम्येनोभयमयत्वेन प्रथमं निधा 
समासोक्तिः । विदोबणसःम्यं च पञ्चप्रकारं निर्णीतम्‌ । 

सर्वं चाज उयवदहारसमायेप एव जीवितम्‌ । स च त््रीकिके वस्तुनि 
लोकिकवस्तुभ्यवहारसमासेपः । राद्ीय वस्तनि राख्जीयवस्तन्यवदहारसमा- 
रोपः । व्किके वा शाख्नीयवस्तु्यवहारस्सभायोपः। राख्रीये वा टलोकिकः- 
वर्तुग्यवहारसमायेप इति चतुधा भवति । तदेवं बहुप्रकारा समासोक्तिः । 

इस प्रकार दिल विशेषणो से निष्पन्न समासोक्ति एक ही प्रकार की होती है; किन्तु साधारण 
विशेषणो से निष्यन्नदो प्रकारकी होती है, वयोक्रि उसमें कीं ध्म का आरोप होताहै ओर 
कीं कायं का । जो समासोक्ति ओपम्यगमित विदषणों से निष्पन्न होती है वहमभी दो प्रकार 
की होती दै क्योकि उसमे दो समास होते हैँ एक उपमितसमास्ष ओर दूसरा संकरसमास। दो 


भेद वदाँ भी हौ सकते हँ जहां विदोषणों मे रूपक माना जाएगा । [ एक रूपकसमास ओर दूसरा 
संकरसमास ¡ विन्त वहो समासोक्ति न होगी । निदान समासोक्ति उपयुक्त क्रम से पाँच प्रकार 
की होगी । 


समारोप होगा, दूसरी वद जिसमें विदोषणसाम्य होगा । ओर तीसरी वह जिक्षमे ये दोनों ही 
विदोषता्णँ रहेगी । इनमें से उपयुक्त पांच अद केवर विशेषणसाम्यमूलक समासोक्ति के है । 


रहता हे ]। ओर वह [ व्यवहार समारोप ] मौ चार प्रकारका होता है (१) लोकिक वस्त॒ 
पर लोकिकं वस्तु के व्यवहार का समारोप, (२) शासनीय वस्तु प्रर शाख्रीय वस्तु 
के व्यवहार का समारोप, ( ३ ) रोविक वस्तु पर शाख्नीय वस्तु के व्यवहार का समारोप तथा 
(४ ) शाश्लीय वस्तु पर रोकिक वस्त॒ के व्यवहार का समारोप । इस प्रकार समासोक्ति के भेद बहुत 


हो जाते हे , 


विश्रान्तेः । प्रथममिति । पएतद्धेदन्नरयमस्या मूलभूतसिव्य्थः। उक्तं पुनः प्रकार पञ्चकमस्या 
अवान्तरभेदरूपम्‌ । विरोषणसाम्यस्येतद्धेदस्वात्‌ । यद्यपि द कार्यसमारोपेऽपि विशेषण- 
साभ्यमेवार्ति तथाप्यत्र शद्ध एव कायंसमारोप उद्िक्ततया प्रतीयत इति तस्य परथग्मे- 
दत्वमुक्तम्‌ । सर्वत्रेति मेद सक्चके । बहरप्रकारेति । खौ किकादीनां वय वहाराणामानन्व्यात्‌ । 


ओर दूसरा संदिग्ध अथात स्देदसंकर पर निभैर। न विषयः = वहां समासोक्ति नदं होती, 
क्योकि पूव-प्रदरित कारणो से वहां अल्कारत्व रूपक म रह जाता है । प्रथम = पहर अधात्‌ ये 
तीन भेद समासोक्ति के मूलभूत भेद है, ओर जो पांच प्रकार अभी अभी बतलाए हैः वे समासोक्ति 
के अवान्तर भेद अथात प्रभेद हँ क्योकि वे समासोक्ति के मूलभूत भेदो मे से केवल एक विेषण- 
साम्य नामकमेदके भेद हे यहां व्हा मी होता तो विशेषणसाम्य ही है जहो केवल कायं का 
समारोप होता है तथापि [ कायंसमारोपमूलक ] इस [मेद ] मेँ शुद्ध कार्यसमारोप ही प्रयुख 
रूपे प्रतीत दोता है इसकिए उसे पृथक्‌ भेद बतलाया गया है। सर्वन्न = सातों मेदो में। 
“बहुप्रकारा = समासोक्ति मे वहत भेदः इसक्एि किं लोकिक व्यवहार इतने होते है जिनका 


समासोक्त्यट्ङ्ारः २२५ 


इन भेदं के मी पिल समासोक्ति तीन प्रकार की होगी एक वह जिसमे केवल कायैका 


ह्न समी स्थलों मेँ प्राण हे व्यवहार का समारोप [ समासोक्ति मे चमत्कार उसी पर निभेर 


विमरिनी 


मेदद्यमिति सान्तास्सं दिद्यमानस्वेन वा। न विषय इति यथोक्छोपपत्ते पक एव 


भेदहय = दो मेद' = रूपकाश्चित दो भेद अथात्‌ एक साक्षात्‌ अर्थात्‌ स्वयं रूपक पर निर्भर 


अन्त नहीं । 
विम्ं- समासोक्ति का मेदवक् शस प्रकार होगा- 
१ 
॥(१) | । 
श्ुद्धकायंसमारोपमूला त ती उभयमूला 
९ ७ 
। | । 
दिलषटविशेषणमूला क ओपम्यगभितविरोषणमूला 
२ (| 


(क| [श | 
धमंसमारोपमूला कायंसमारोपमूला उपमितिसमासमूका संकरसमासमूला 
६ ४ ५ ६ 


३२द अलङ्कारसवस्वम्‌ 
[ सवेस्व | 
तत्र शुद्धका्यंसमायोपेन यथा- 
"विलिखति कुचावुच्चैर्गाढं करोति कचन्रहं 
लिखति ठदिते वक्चे पत््रावखीभसमञ्ञसाम्‌ । 
श्चितिप खदिरः श्रोणीदिम्बाद्‌ विकषेति चांशुकं 
मरुभुवि टात्‌ चस्यन्तीनां तवारिखगीरराम्‌ ॥° 


अच्च पत््रावलीविठेखनादिद्युद्धकायसमारोपात्‌ खदिरस्य दटकामुकत्व- 
प्रतीतिः विरेषणसाम्येनोदाहता । 


इन [ सातां भेदो ] मेँ से श्चुद्धकायंसमारोपमूला समासोक्ति यथा- 

राजन्‌ ! खैर [ सैजड़, एक ववूल जेसा दक्ष ] का पेड़ आप के शजुजं की मरुभूमि में डर कर 
मागरहौ खन्दरियों के स्तन गहरे मे डुरेद देता है, जोर से कचय्रहु कर लेता, खन्दर चेहरों पर 
फूडड़ पत्रावली [ पत्तियां, चैजड़ की पत्तियां ववूल की पत्तियों सी बहुत छरी होती हँ मतः 
अवरी-ठेर ओर पव्रावली-अलंकरण ] माँइता है ओौर इतना ही नदीं उनके गोल मरोर दरदो पर 
की रेदामी साडी भी ्चरकेसे खीचदेताहे,। 

-- यहां पत्रावलीटेखन = पत्रावली माँदना शुद्ध [ केवल नायक का ] काय॑ हे [ क्योँकिं लेखन 
क्रिया या मांटना जिसे संस्कृत मे मण्डन का जाता है केवर पत्रावली नामक अलंकरण मे संभव 
है अतः पत्रावली ब्द की अभिधा "र्त की पंक्तिः इस अथंसे हटकर केवर अलंकरणविेषरूपी 
अधैमे सीमित हो जाती है] इसका समारोपदहदोनेसे खदिरवृक्षमे[खीकेन चाहनेपरमभी 
वलात्‌ कामप्रटृत्त पुरुष = ] ह ठकासुकत्व [ वकात्कारो पुरुष का व्यवह (रः यहां उच्चैः विलेख = 
गहरे मे ुरेदना; गाढ कचमह = जरो से वार पकड़ना, पुरुप जव अधिक गावेग में जतादहेतो 
चित्त सोश्खीके वेदा दोना हार्थोसे नोते पकडता ओौर अधिक वेग से मैथुन करता है, इसे 
सस्करत के कामदा गौर कार्यो मेँ कचग्रह कदा जाता है; खदिर के कर्ये मेँ वा फस जाते 
हे; पावली का पएूदडपन ओर नितम्बवख का हाटक ठेना ] कौ प्रतीति दोती है । 

विदेषणसाम्यमूलक समासोक्ति का उदाहरण दिया जा चुका हे [ उपोढराग इत्यादि दवारा ]। 


विमरिनी 
उदाहतमिति-उपोढरागेणेव्यादिना । 
[ सवेस्व | 
उभयमयत्वेन यथा-- 
(निर्ठनान्यलकानि पाटितमुरः छृरस्ोऽधरः खण्डितः 
करणे दग्जनिता कृतं च नयने नीछान्ञकान्ते क्षतम्‌ । 
यान्तीनामतिसंश्रमाङ्कद्पदन्यासं मयै नीरसः 
कि किं कण्टकिभिः कतं न तख्भिस्त्वदठे रिवामश्चवाम्‌ ॥› 
अत्न नीरसैः कण्टकिभिरिति विशेषणसाम्यम्‌ । निलृनान्यलकानीत्यः- 
दिषु कार्यसमारोपः । 


समासोक्त्यलङ्ारः २३२७ 


व्यवहारसमारोपप्रकारच तुष्टये क्रमेणोदाहरणम्‌ । यथा-- 
'दयामालिलिन्ग सुखमा दिखं चुचुम्ब 
रुद्धाम्बरां राशिकल्ामचिखत्करा्रेः। 
अन्तनिंमश्चचरऽष्परायेऽतितापात्‌ 
कि कि चकार तरूणो न यदीक्चणागश्निः 1!" 
लोकिकं च वस्तु रसादिमेदान्नानाभेदं स्वयमेवोत्प्रेक्ष्यम्‌ । 
"येरेकरूपमखिलास्वपि चत्तिषु त्वां 
परश्यद्धिर्ययमख्यतया प्रच्रुत्तम्‌ । 
लोपः इतः किर परस्वज्चषो विभक्ते 
स्तेलश्षणं तव छृतं भरुवमेव मन्ये 
अन्नागसराख्रप्रसिद्धे चस्तुनि व्याकरणप्रसिद्धवस्तुखमायेपः । 
"सीमानं न जगाम यन्नयनयोनौन्येन यत्संगतं 
न स्पृष्ट वचसा कदाचिदपि यद्‌ इष्टोपमानं न यत्‌ । 
अथोद्‌ापतितं न यन्न च न यत्तरिकविदेणीदशां 
सछाचग्यं जयति प्रमाणरहितं चेतश्चमत्कारकम्‌ ° 
अन दछावण्ये लौक्षिके वस्तुनि मीमांसाशाखपरसिद्धवस्तुसमारोपः । 
पव तकाीयुवदज्योतिःशयल्रधसिद्धवस्तुसमासेपो बोद्धग्यः। 
यथा-- 
स्वपक्षटीकारलितेरूपोढदेतौ स्मरे दर्शयतो विशेषम्‌ 
मानं निसकतुम्तेवयूनां पिकस्य पाण्डित्यसखण्डमासीत्‌ ५ 
अत्र तकशासखप्रसिद्धवस्तु समारोपः । पाण्डिव्यद्यान्दः प्रङ्कते ठश्चणया 
व्याख्येयः | 
मनदमश्चिमचुरयंसोपला दश्चितश्वयथु चाभवत्तमः । 
 इष्टयस्तिमिरजं दिषेविरे दोषमोषधिपतेरसंनिधौ + 
अत्रायुवद्प्रलिद्धवस्तुसमासतेषः । 
"गण्डान्ते मददन्तिनां परतः ्मामण्डद् वैधृते 
रह्ामाचस्तः सद्‌ बिद्धतो करेषु याजोव्सवम्‌ । 
पूबोमव्यजतः स्थिति छुभकरीमासेव्यमानस्य ते 
 वधन्ते विजयश्चियः किमिव न श्रेयस्विनां मङ्गलम्‌ ।/ 
अत्र ज्योतिःराख्भरलिद्धवस्तुलमासेषः । 
भ्रसपत्तात्परयैरपि खदयुमानेकरसिक्ष- 
रपि क्ञेयो नो यः पथिंमितगतिस्दं परिजहत्‌ । 
अपूवव्यापाये शुरुवर ! बुधेरित्यवक्ितो 
न वाच्यो नो टक्ष्यस्तव सहृदयस्थो गुणगणः ॥° 


२२८ अकत्छङ्ारस्वेस्वम्‌ । 


अत्र भरतादिश्ाखप्रलिद्धवस्तुसमायेपः । तथा दयन्न गुणगणगतत्वेन 
श्ङ्ारादिरसम्यवदहारः भ्रतीयते । यतो रसो न तात्पय॑शक्तिक्तेयः ! नाप्यनु- 
सानविषयः; | न चब्देरमिधान्यापरेण वाच्यीकृतः । न लक्षणागोचरः । कि 
तु विगलितवेचयान्तरत्वेन परिडतपारिमित्यो व्यञ्जनलक्षणापूवे्यापारविष- 
यीरूतोऽ यकाया चुककतरगतत्व परिहारेण सष्टदयगत इति प्रल्र्प॑त्तात्पर्येरि. 
स्यादिपदै रस पएव प्रतीयते । एवमन्यद्‌पि ज्ञेयम्‌ । 

दोनों [ काय॑समारोप जर विदेषणसाम्य ] से होने वाटी समासोक्ति यथा- 

नीरस जोर कण्टकी वृक्षों ने आपकी रावुखुन्दरियों के साथ क्या क्या नदीं किया। जव 
वे मरुस्थल मेँ अत्यधिक मय के कारण ऊवड़ खावड़ पौव रखती हुई माय रही थीं, उनके अलक 
कार टिः छती फ़ड़ दी, पूरा अधर खण्डित कर दिया, कानों मे दद॑ पैदाकर दिया, ओर 
नीर कमल से स्दृहणीय नेत्रो मे धाव कर दिए । 

यहां नीरस शब्द से कथित नीरसत्व [ वृश्ष-पक्ष मेँ सुखापन, कायुक-पक्ष मेँ रूखा ] ओर 
कण्टको शब्द से कथित कण्टकित्व [ कण्ट = कोटे वाले ओर रोमाचथुक्त ] ये दो विद्धोषण वृक्ष 
भोर कामुक दोना पक्षो मेँ अन्वित होते है अतः इतने अं मेँ यहो विदोषणसाम्य है । (अलक काट 
ङि" श्त्यादि अंशो मेँ [ बरक्षो पर कामुक के ] कायं का समारोप है। 

व्यवहारसमारोप होने पर जो चार भेद होते है उनमें से एक एक का क्रमराः उदाहरण- 

[ १ = लोकिक वस्तु पर लौकिक वस्त॒ के व्यवहार का समासेप यथा-- ] 

-चो का आल्गिन किया, दि्ाओं के सुख [ आरम्म माग, आनन ] शीघ्र दीघर चमे, [ स्प 
किया, चुंबन किया ], अम्बर [ अकारा, वख ] को रोककर विद्यमान शिकला को कर [ किरण, 
हाथ ] के अग्रभागो [ अगले हिस्से ओर नख] से ङुरेद उाखा। इस प्रकार जिस [ शिव] के 
तरुण ओर काम को भीतर किए हुए [ काम जाते हए, कामी | नेत्राग्नि ने अतितापसेक्याक्या 
नहीं किया । [ यदौ अम्बर, कर ओर तरुण इनमें विरोषणसाम्य है, रोष में कायेसमारोप हे । अग्नि 
के व्यवहार पर कासुक के यवहार का आरोप है। भतः यह प्रथम भेद हमा क्योकि मरन्थकार 
के अनुसार शिव-नेव्ाग्नि भौर कामुकये दोनों ही लौकिक वस्तु हे । वस्त॒तः दिषनेवराग्नि 
भी चाखीय ही है। ] किन्तु शाखी वस्तु का अथं यहां शाख कौ पारिभाषिक वस्तु है । नेत्राग्नि- 
रूपी वस्तु वेसी नहीं है । 

लोकिक वस्तु के मेद रस आदिकेभेद से अनेकदहोते हं न्ट स्वयं जान लेना चादिए। 
[ चाख्रीय वस्तु पर शाक्ञीय वस्तु के व्यवहार का समारोप यथा-- | 

भर ठेसा मानता हू कि हे भगवन्‌ ! आपका ठीक लक्षण उनने किया है जिनमें समस्त 
[ जागरित, स्वप्न, सुषुक्षि नामक ] समस्त वृत्तिर्या [ स्थितिर्यो ] मे आप को [ विराट्‌ , तैजस 
प्राज्ञ नामक भेदो से रहित ] एक रूप [ शुद्धवेतन्यरूप | अग्यय [ = अक्षरात्मा या भविनी ] 
ओर सदैव संख्यातीत रूप से विमान देखा है ओर इसीकिए जिन्दनि [ तस्माद्धान्यन्न परं 
किंचनास-वचनों के ही अनुसार ] आप से परे आप से भिन्न विभक्ति [व्यक्ति] क्रा लोप कर 
दिया ह)" 

यहं मागम चाख्मे प्रसिद्ध वस्तु [ परमर्चिव या ब्रह्म | पर व्याकरण शाख मे प्रसिद्ध 
वस्तु [ अन्यय शाब्द ] का समारोप है। [ व्याकरण में व्ययका लक्षण हे ्सदृद्ं त्रिषु लिङ्गेषु 
सवा च विभक्तिषु । सर्वेष्वपि च कालु यश्च व्येति तदव्ययम्‌" अथात्‌ जो शब्द तीनों र्गो मे, 


न 1 ~ कययतिििियोििियिकिनयििििि ो  ि क -ो ि ~  ा =  ो 2  ि  - ~ ~ 1 - ~ ः ~ क 


| 
| 


समासोक्त्यलङ्ारः ३२९ 


सभी विभक्तिओं मे ओर सभी कालों मे न बदरे वहु अव्यय । जैसे इसी पद्य में श्रुवस्‌' खाब्द । 
अन्यय राव्द पक्ष में वृत्ति = कारक आदि वृत्तिर्या, संख्यातीत = संख्यारहितः, क्योकि अव्यय राब्दो 
म जो एकत्वसंख्या रहती टदै वह द्ित्वसापेक्च नदीं होती स्वरूप-सापक्ष होती है, वैसी एकत्व 
संख्या ब्यम मी है । परविभक्ति = प्रकृतिभूत भ्रुव आदि शर्ब्दो पे परे अने वाली प्रथमा 
आदि ओर उनके ख" आदि का अव्यय के साथलोपदहो जाता है] 

[ लोकिक वस्तु पर शाल्ञीय वस्तु के व्यवहार के समारोप का उदाहरण ]-- 

'सुन्दरियों का जो लावण्य नेत्रं की सीमा [ प्रत्यक्षप्रमाण ] से परे है, जिसकी किसी से संगति 
नहीं हे [ सादाचयनियम अतएव अनुमान प्रमाण का अभाव], जो चाब्द से अदत हे [ राब्द 
प्रमाण क्रा अमाव ] जिक्तका उपमान [ उपमान प्रमाण ] कभी दिखाई नदीं दिया ओर जो अथं 
[ विेपनादि परदाथं तथा धन ] से छाया हुआ नदीं हे [ अर्थापत्ति प्रमाण का अभाव ] किन्तु रेसा 
आ नहींकि नो बुक न दो [ अनुपरव्ि प्रमाण का अभाव] रेस्ाजो प्रमाणरदहित [ प्रत्यक्षादि 
प्रमाणाविषय तथा अपरिमित ] ओर चित्त को चमल्कृत करने वाला [ अनुभवैकदेय ] है वही 
सवांत्कृ्ट है । 

- यां कवण्यरूपी लोकिक वस्तु पर [ उत्तर ] मीमांसाशाख् मेँ प्रसिड परमात्मस्वरूप वस्तु 
काआरोप हे [ यदि यहां अतिशयोक्ति नदीं ह] 


विमरिनी 


क्रमेणेति यथोद्‌देशम्‌ । मीमांसेव्यश्रोत्तरमीमांसा विवक्तिता । तत्र हि निखिर्प्रमागा- 
गोचरं परमाप्मस्वरूपं दितम्‌ । तद्वयवहारसमारोपोऽत्र कृतः । 

क्रमेण = क्रम से अथात्‌ जिस क्रमसे नामगणनाकी गहै उसी क्रम से, मीमांसा = 
उत्तरमीमांसा क्योकि परमात्मा का स्वरूप उसी म समस्तप्रमाणोँ का अविषय बतलाया गया है । 
यहां उसी के व्यवहार का समारोप किया गया हे। [ पूरव॑मीमांसा कभम॑वादी ददन है। उसमें 
शेश्वर या परमात्मा नदीं माना जाता । | | 

विमशं-रोकिक वस्तु पर शाश्लीय वस्तु के समारोप के एकं उदाहरण के पश्चात्‌ जव उस विषय 
का इसी प्रकार अन्य शासो के व्यवहार का समारोप जाना जा सक्ता ह इस प्रकार उपसंहार 
कर दिया गया तव इससे भागे का “शाखीय वस्तु पर लोकिक वस्तु के व्यवहार के समारोपः का 
विवेचन क्रिया जाना उचित था। तदथं केवर 'पर्यन्ती० पको हयी इस्त प्य कै पश्चात्‌ दिया 
जाना चािएटथा, किन्तु बीचमें तक, आयुर्वेद, ज्योतिष ओर साहित्य मे प्रसिद्ध वस्त॒ के 
आरोपके किट भी उदाहरण के रूपमे स्वपक्ष०, मन्द०, गण्डान्ते तथा प्रस्त“ पयदे दिए 
गए है । इनमे से प्रथम तीन प्र विमरिनीक्रार एक शब्द मी नहीं किखते ओर संजीविनीक्षार 
शण्डान्ति०' पर । भागे विमरिनीकार "पर्यन्त पद्य पर भी एक मी अक्षर की रीका नहीं छिखते 
जव कि संजीविनीकारने इस पर॒ अत्यन्त उदार व्याख्या छिखी है। इससे यह सोचा जा 
सकता दै कि रीकाकार बौचके पर्को प्रक्षिप्त मानते ओर उन्हें छोडाजा सक्षताहै। 
कु° जानकौ ने शण्डान्तेः पको मूल से हग मी दिया है किन्तु ्रसर्प॑त्‌० प्च दोनो ही 
रीकाकत्तां को मूलरूप से मान्य हे इसलिए को कारण नहीं किं भन्य पौ को त्याज्य 
समन्षा जाए । अतः हम इन्हे प्रक्षिप्त नदीं मान रहे हेः । 

इसी प्रफार तक॑शाख्, आयुत्रदशाख्च, ज्योतिःशाज् :[ आदि ] मेँ प्रसिद्ध वस्तुका समारोपमी 
[ लोकिक वस्तु ] पर जाना जा सकता है । [ यथा ]- 


३३० अलद्कारसवंस्वम्‌ 


[ वसन्त ऋत मे ] उपोढदेतौ [ हेति = दाख, तथा हेतु से युक्त अत एव पक्षभूत ] स्मर मे 
अपने पक्ष [ पंख तथा मत, प्रतिपाद्य ] की लीला [ सचेष्टता, प्रतिश्या स्थापना के पश्चात्‌ 
उपपादन क्रम ] कौ लङ्तता [ खन्दरता ओर सफई ] से जव विह्ेष [ विरिष्टता, तथा विदोष 
नामक कल्पित पदाथ ] दिखलने भौर सभी युवकों [ युवावस्थावाल ओर प्रौढ पण्डितो ]का 
मान [ रूठना तथा पाण्डित्यगवे | का निराकरण करने मे कोकिल का पाण्डित्य अखण्डित 
[ परिपू्णै ] था [ श्रीकण्डचरित ६।१६ || 

यां तक [ विशेष पदाथ को मानने वले न्याय ] शाच् मेँ प्रसिद्ध [अनुमानप्रक्रियारूपी)] 


वस्तु का समारोप क्रियाजा रहा है। प्रक्रत [ कोकिल] मे पाण्डित्य चाब्दं को लाक्षणिक. 
मानना चाहिए । 


[ न्याय शाख में अनुमानप्रक्रिया के किए निम्नलिखित पदा्थयोजना की जाती रै-- 
( १) पक्षनिदश, पक्ष का सथं है वहु स्थान जिसमें किसी वस्तु का अनुमान क्ियाजारहादो, 
यहां काम को पक्ष मानादहै,(२) पक्षम हेतुका निर्दड, यँ शसील्िए कामको उपोढहेतौ 
कहा गया दै, ( ३ ) साध्य, अनुमान द्वारा जिक्तकी सिद्धिकीजारहीदहो यँ वहु है विदोष। 
परमाणुं को परस्पर मे अलग-अर्ग सिद्ध कृरनेके किए नैयायिक उनमें पिदोषनामक स्वतंत्र 
पदार्थं की कल्पना करते हैँ । क्योकि परमाणुर्भो मे अवयव नदीं होते ओर अन्य समी द्रव्य 
अवयवभेद से भिन्न सिद्धहोतेदहें। जो न्यायद्ाखी विद्धेष पदाथं की सिद्धिकर लेता ओर अन्य 
दारानिकों दारा निगृहीत नहीं होता, वह प्रद पण्डित माना जातादह। दलेकमें आए पक्ष 
ङाब्द का अथं स्जीविनीकार श्रीविदाचक्रवत्तीं तथा श्रीकण्ठचरित के टीकाकार जोनराजने 
प्के ही किया है-- वह धर्मी जिसमें साध्यस्िद्धि की जा रदी हदो । वस्तुतः याँ पक्ष शब्द केवर 
अपने प्रतिपा मत, पिषय के लिए प्रयुक्त है, क्योकि न्यायज्ञाख् से "पक्षः शब्द द्वाराजो अथ॑ 
च्या जाता है- य्य उस रूप मेँ स्मर को अपनाया गया दै । भवंत पर धुओं है" इसलिए “यहां 
अग्नि होनी चाहिए इस अनुमान मे पर्वत पक्ष, घुआं हेतु ओर अग्नि स्राध्यहै। प्रस्त॒त प्यमें 
'समर' पक्ष है ओर 'विदेषः साध्य । देतु कथित नहींदहे। पक्षको धमींकदा जातादै व्योति 
वह दहेत ओर साध्य से युक्त रहता दे। इस प्रथमँ स्मर को “उपोढहेतोः कहकर इलेष दारा 
हेतु से युक्त वतलाया गवा । हतु को पक्षम रहना चादिद । इते हतु का पक्षटृ्तित्व धं कहा 
जाता है । यहां पक्षभूत स्मर को उपोढहैतु कहकर हेतु का पक्षवृत्तित् मी वतलया गथा ] 
सायंकार के समय सूर्यकान्त मभियां मन्द अग्नि | कम जलन भौर मन्दाम्नि रोग ] धारण 
कर रही शीं गौर अन्धकार को पुजन [शोथ दो रहो थी; ओषपिपत्ति [ चन्द्रमा 
ओर वैय ] के सन्निहित न रहने के कारण दृष्टां तिभिर [ अन्धकार आर रती नामक नेत्र 
सेग ] से त्पन्न दोष का सेवन कर रही थी। | 
-यहां आयुवेद शाल मेँ प्रसिद्ध वस्तु का आरोप हं ' 
अप मदमत्त दाथियों के गण्डान्त [ कनपटि्यां ओर गण्डान्त मूल या गण्ड नामक योग 
करा अन्त आने ] पर प्रहार करते है, वैधृते [ वैधृति योग, पै रते = धारण किए सप्तमी ] अथा 
वैधृति = देवगण उनका लोक परथिवी-मण्डल पर रक्षा करते ह, सदालट दै परयात्रा का 
उत्सव मनाते है; पूवां [ ( १) पले से प्राप्तः (२) पव दिशा तथा (२) पूर्वाफास्युनी, पूर्वा 
माद्रः पर्वाषाढ नक्षत्र ] को न छोडते हए, कल्याण कर स्थितिं का सेवन करते रहने वाके आपकी 
विजयश्री वदती ही जा रह्यीहै। ठीक दी है श्रेयः्ाली पुरुषां के किट क्या मङ्गर नहीं होता ।' ` 
--यह ज्योतिःशाख् मे चाच मेँ प्रसिद्ध वस्तु का समारोप हं । [ज्योतिमशाख् के पक्ष मे (१) 
गण्डान्ते = गण्डयोग के अन्त में। गण्डयोग = 1 तथा बृद्धि योग वे वीच आने वाला योग 


समासोकत्यदट्ङ्कारः ३२९१ 


जिसमे उत्पन्न जातक ‹स्वकायंकन्तां परकार्यदन्तं गण्डोद्मवः के अनुसार ओर तदथं परकार्य- 
नादाक माना जाता है वैधृतेः क्ष्मामण्डले रक्षामाचरतः, = पृथिवी की रक्षा वैधृति योगके वादं 
शुरू करने वाला, वैधृति = सत्ताद सर्वाँ अत्यन्त अश्चुम योगः पूर्वादो दो भागों मे विभक्त फाल्यनी, 
आद्रपद तथा आषाद्‌ नक्ष्वो का पूवं पूवे भाग, इनमे पू्वांषाद़ा प्रस्त नक्षत्र माना जाता है, 
शुभकरी स्थिति = शुभयोग । 

शह गुरुवर ! सहृदयो मे स्थित आपका गुणगण न तो उन्दं समञ्च मे आ सकता जो तात्पर्यं 
कोदूर तके जाते हैँ [ तात्पय॑श्क्ति मानने वाले मीमांसका के अनुसारी धनिक आदि] 
ओर न उन जो केवल प्रामाणिक अनुमान के [ न्याय शाल के अनुयायी ] रसिक है! रसा 
इसलिए कि [ ये सव साधन परिमित हें ओर ] आपका गुण अपरिमित है विद्वानों ने उसे अपूर्वं 
व्यापार [ नवीन हे गतिविधियाँ जिसकी ओर नवीन राब्दशक्ति व्य्जना ] समञ्चाहै, न तो वाच्य 
[ कथनीयः; अभिधादृत्तिददारा कथित अथ ] ओर न लक्षय | प्रत्यक्ष प्रमाणगम्य, लक्षणाबृत्ति द्वारा 
प्रतिपाय अथं ]। 

-यदां भरतादिके राख [ नाय्यश्चाछ्, काव्यद्चाख ] मे प्रसिद्ध वस्त॒ कासमारोपदहे। 
क्योकि यहां गुणगण में शृङ्गारादि रस का व्यवहार प्रतीत होता है क्योकि यदां प्रसर्॑त्तात्पयः 
आदि शान्दोंसे- रसस न तात्पय॑क्तिसे क्ञेयहै, न अनुमानका विषय है,न रन्दो द्वारा 
अभिधान्यापार का दी विषय वनाया जाताञौरन लक्षणा व्यापार का दी। अपितु वड व्यंजना- 
स्वरूप एक नवीन व्यापार का विषय वनता है जर जव वह इस्त व्यपार का विषय बनता है किसी 
भी जन्य [वद्य] पदः काल्ञान नदीं रहता बहु [ देशकालादिजनित ] परिमित भाव दूर 
कर देतादहे, साथदहौी उसकी प्रतीत्ति नतो [राम आदि] अनुकारयो मे होती ओर न [ नट 


आदि 1 अलुकत्तामो मे अपितु सहदयमें होती हे--इस प्रकार रस की प्रतीति दोती है । इसी 
प्रकार ओर भी उदाहरण खोजे जा सकते हैं । 


विमदानी 
न तात्पय॑ति । यदुक्तम्‌ - 
'नाभिधव न तारपयं लन्तणानुमितिनं वा | 
ध्वन्यन्तभौवने शक्ता भेदेन बिषय स्थितेः ॥* इति । 
अनुकायो रामादिः। अन्चुकर्ता नटादिः। तद्वोचरश्च नरसखः प्रतीयते । यदक्तम्‌- 
“नाञुकायंऽपि रामादौ नटादौ नाजुकत॑रि । रसः सचेतसां कि तु" इति । अन्यदिति । अन्यः 
शाखप्रसिद्ध वस्तुसमारोपरुक्तणस्‌ । | 
न ताप्पयति-- जेसा कि कहा रै- ध्वनि को भपने आप म अन्तभूत करनेमेंन तो अभिधा 
समथ है, न तात्पयै, न रक्षणा ओर न अनुमिति । क्योकि ध्वनि क्षेत्र भिन्न है ओर इन सवः 
का कत्र निन अज्चुकायं राम आदि । अनुक्ता = नट आदि । रस उने प्रतीत नदीं होता । 
जेसा कि कहा है--^रसनतो राम आदि अनुकायं मे प्रतीत होता ओर न नट आदि अनुक्ता 
म ही । वह सहृ्दयमे दी प्रतीत होता है। अन्यदिति = ओर, = जन्य चोमा में प्रसिड वस्तु ` 
का समारोप । 
विक्त रस प्रक्रिया समञ्चने कै लिए काव्य प्रकाड के चतुथे उलछास का रसप्रकरण ओर 
तत्रापि अभिनव शप्त का अभिव्यक्तिवाद पट्‌ ना चाहिए । पण्डितराज जगन्नाथ ने मी उसका 


स्पष्टीकरण अच्छी तरह किया हे । प्रस्तुत प्रय मे रसाभिन्यत्तिवाद स्वीक्षार किया गया है । इसका 
स्वरूप संक्षेप मे इस प्रकार रै- 


का न 
> ~व क क = अ क 


३३२ अलड्कारसवेस्वम्‌ 


राङुन्तला-दुष्यन्तादि, उनको चेष्टां तथा उन्दीं से व्यक्त उनकी क्ञ्जा आदि मनोवृत्तियां कान्य 
नाय्य के माध्यम से ज्ञात होती हें तो [ सद्दय ज्ञाता की चेतना पर पडे इनके ज्ञानात्मक प्रति- 
विम्ब ] क्रम्यः विभाव, अनुभाव ओर संचारीभाव नाम से पुकारे जाने लगते है । अपने मूर रूप 
मेये सव वस्तुमात्र र्ते दें! यदि इन तीनों की योजना अनुरूप रहती है तो [ ज्ञानरूप ] इन 
तीनों के समूह से सहृदय ज्ञाता के चित्त मे वासनारूप से विमान रत्ति आदि स्थायी चिन्तृत्तियां 
मी जाग उठती दहै । तव विभावादि तीन ओर रत्यादि, इन चार का समूह्‌ वन जाता है। 
समूह बनते दी श्नसे एक राक्ति पैदा होती है। वह इनके गौर सहृदय की आत्मा के वीच 
के आवरण को हटा देती है । आवरण हटते दही विमावादि समूद आत्मतत्व के प्रकाश्च 
मे प्रकारित हो उठते हँ । उनके साथ स्वयं आत्मतच का प्रकादामी रहता है। वह प्रकाश 
भानन्दरूप होता है क्योकि यह आत्मरूप ही रहता है भौर आत्मा आनन्दरूप होता है । इसी 
विभावाद्ियुक्त आत्मतच या आत्मानन्द का नाम है रस । इते छंगारादि नाम दिया जाता है-- 
रत्यादि स्थायी भरवां के आधार पर, इसि इसको आत्मविरिष्ट स्थायौीरूप भी कह दिया 
जाता है । 
परिहतपारिमित्य--जव इसका अनुभव होता हे तव अनुभविता की चेतना देशकाल्व्यक्तित्व 
को सीमित भावनाओं से परे हो जाता दहे। उस समय उसे यहु ज्ञान नीं रहता कि वह किंस 
स्थान मेँ बैठा है अथवा वई समय कौन सा है जिसमे वह अनन्द से रहा है। उसे यह भी ज्ञात 
नहीं रहता किं वह स्वयं क्या दै? सख्रदधदैया दरिद्र, पण्डित देया यथाजात, व्द्धदहै या वाल्क, 
राम है या कृष्ण । इसी प्रकार उते यदह मी विदित नक्षीहोताकि काव्यया दाखल जो पात्र 
आ रहेहेवेउसीके या अन्य किसी के कुदं या नहीं । राङुन्तला आदि को वह्‌ दुष्यन्तपत्नी 
नहीं समक्ता ओर सीता को रामप्रिया या जगदम्बा । न तो यदी समञ्चता कि उनसे उसका 
कों संबन्ध नहीं है । इस स्थिति को कहते हैँ साधारणीकरण की स्थिति । इसमे प्रधान साधारणी. 
करण है विभाव का। सच यह दकि विभाव में विम।वता दी तव आती है जव वह साधारण 
हो जाता है जैसे पक जाने के बाद ही भात भात दोता है । शकुन्तलादि को उक्त साधारणरूप से 
जानते ही सामाजिक की व्यक्ति चेतना भी सीमाभावसे परे दो अपरिमित भोर असीम बन 
जाती है । सहृदय के साधारणीक्रत या असीम अपरिमित होते ही उसमें रहने वाला रत्यादिभाव 
मी साधारणदहो जाता है। 
वेदयान्तरश्चूल्य जव यह आनन्द होत। है तव भौर कुछ नहीं सञ्चता । चित्तम सुप्त अन्य 
संवेदन उस समय नदीं जागते । अतः यह विगलितवेधान्तर कहा जाता है। विगकित = अलग 
हो गण है वेयान्तर = अन्य वेच जिसे । 
अपू व्थापार = जिस शक्ति से विभावादि चतुष्टय ओर आत्मततत्वके बीच के आवरण का 
भंग होता दै वह अन्धकार का आवरण इटा घट भादि पदार्थौ को प्रकाशित करने वाली उस 
शक्ति के समान है जो प्रकार मेँ रहती है, अतः उसे व्यंजना राक्ति के अतिरिक्त ओर कुछ नदीं 
कदा जा सकता । प्रका राक्ति से घटादि कीर्व्यजना ही जो होती हे । यह्‌ व्यंजना कान्ब पाठ 
से होती है तो ध्वजिवादधी इते काव्यात्मक शब्द की राफि मान वैठ्ते है। सर्वस्वकार भी उसी 
पन्थ के अनुयायी है । इनकी मान्यता यह भी दहै कि इस भ्यंजना राक्ति द्वारा केवल आवरण भंग 
ही नहीं होता रसानन्दभोग भी होता है । व्यंजना तो प्रष्येक वस्तु के ज्ञान के समथ रोकानुभव 
मेभीहोतीदै। घटकाज्ञान बुद्धि तमी करती है जव धटविषयक आत्मनिष्ठ आवरण नष्ट होता 
। शदुन्तलदि का ज्ञान मी तभी होता है जव तद्िषयक आव्मनिष्ठ भावरण नष्ट होता है। 
इसि विभावादि चतुष्टय के जितत समूह से व्यंजना का उदय माना गया धा आत्मन्रृत्ति आवरण 


समासोक्व्यल्ङ्कारः ३३६ 


का नाञ्च उसके पूवं भी विभावादि मेंपेएकएककेज्ञानके किणि हो चुका था, किन्तु उस समय 
आत्मा की जानन्दकला का परामशे नहीं हआ था । विभावादि के साथ सामानजिकनिष्ठ रति 
काज्ञान होते दौ आत्मा की आनन्दकला भी जाग उठती है भौर उसका परामर्चं होने रुगता 
हे । व्यजनावादी के असार इस आनन्दकला का जागरण भी व्यंजन। से होता है ओर व्यंजना- 
रूप ही होता हे । सोचना यह्‌ है कि प्रकाड्चत्े व्यक्तवटका ज्ञान भी व्यंजनारूप है या उससे 
भिन्न । स्पष्ट ही भिन्न है। व्यंजना ज्ञान मे सहायक है इसीकिए उद्भूत रूप, महत्‌ परिमाण 
ओर आलोकसंयोग को वस्तु के चाक्चष प्रत्यक्ष का कारण माना जाता है। व्यंजना आलोक-संयोग- 


स्वरूप ही दे। अतः वह वस्तुज्ञान का कारण है वस्तुज्ञानात्मक नहीं । इसीलिए भटनायक्‌ 
रस का भोग मानते दहं 


अभिधेय नदीं = इस रस का अभिधावृत्ति से अनुभव नहीं होता क्योंकि रस मे अभिधा 
यातोरसरब्द की मानी ना सक्तीटहै या शगार आदि राब्दौ की । स्थिति यहदहैकि रसया 
ङ्ञार आदि शब्दों को कहने मात्र से रसानुभूति नही होती । उसके विपरीत रस या श्ङ्गारादि ` 
खाद का प्रयोग न होने प्र मी विभावादि-संयोजन से रसानुभूति हो जाती है! इसीकि 
अनुभवरूपं रस वाच्य नदीं हो सकता । जभिधावृत्ति से उस आनन्द का कथन संभव नहीं । 

रक्ष्य नदीं = रस रक्ष्य भी नदीं होगा क्योंकि उसमे लक्षणा संमव नदीं है । लक्षणा भिधा 
म वाधा अने से दोतौ ह। वद एक प्रकार की अमुख्य अभिधा द्यी द्येती है । रसानन्द मेँ जवः 
अभिधा दौ नहीं दाती तो रक्षणा संभव ही कैसे । इस प्रकार यदि रसानन्द वाच्य होगा जौर 
उसमं कोड वाधा आती तो लक्षणा द्वारा गम्य होकर रक्ष्य माना जाता । इस प्रकार रसानन्द 
लक्ष्य मी नहीं हे । 

तातपयेवेय नदीं = घट को राओ कहने पर घट का अर्थं होता दै घण्द्रव्य ओर को" का अथै 
होता हे कामता । इन दोनो के अतिरिक्त एक अर्थं ओर निकरता ह वह॒ दै "कर्मता का षट मे 
रहना । इसका वाचक यहां कोई राब्द नदीं है । अतः संबन्धरूपी यह अर्थं पदाथ = पद का अर्थ 
नहीं हे । तव भ यह अर्थं भपित तो दोता है वस्मानय--घर को लाओः इस प्रकार वाक्यशूपी 


राब्द से दी । जतः इते वाक्यार्थं माना नाता है । कुछ दानिक संबन्धरूपी हस अर्थ के ज्ञान कै 
लिए वाक्य मं तात्पये शक्ति मानते है । रसपदाथे सम्बन्धरूप नहीं है अतः उसे तात्पय॑राक्तिवे्य 
भी नहीं माना जा सकता । 


धनिक भादि कुछ एसे भी आलकारिकं है जो तात्प्यशक्ति को कैव संबन्ध तक सीमित न 
रख, अन्तिमि अथे तक सक्रिय मानते है। शसक लिए वे वाणका दृष्टान्त देते दह जेते छोड़ा 
गया बाण कवच को तोड़, त्वचा को फाड़ ओर हृदय का विदारण कर प्राणदरणरूपी तात्पयेभूत 
कायं एक ही वेग नामक व्यापार दारा निष्पन्न करताहे उसी प्रकार राब्द भी एक बार बोला 
जाता हे ओर वह अपने अभिधा व्यापार कै दारा ही प्रथम, द्वितीय, वृतीय ओर चतुथं सभी अर्थौ 
को बतला देता ह । शङ्खा पर धरः प्रयोग मे गङ्गारब्द ही अभिधा व्यापार से ही गङ्गाप्रवाह 
गङ्गातट, तट मं शत्य पावनत्व आदि समौ अर्थौ का ज्ञान केरा देता है। उसी प्रकार सरस काव्य). 
की पदावली अभिधा दारा प्रथम अभिषेयार्थ, द्वितीय रक्ष्या ओर तृतीय रसरूपी अर्थ 
काभी ज्ञान करा सकतीदहै। इसमतमें न तो लक्षणाकौ हौ आवदयकता पडती ओरन 
व्यजनाकौ हौ । | 

अन्य दारोनिक इसका खण्डन यह कह कर करते है कि अभिधा संकेत पर निर रहती है 
अतः असंकेतित अन्य अर्थौ तक उसकी पह नदीं हो सकती । गंगा का संकेत गंगा कै तट तक मे तो 


३३७ अद्ङ्कारसवंस्वम्‌ 


हे नदीं अतः वह अभिधा तरकामी ज्ञान नदीं करा सकती, उसे अने प्रतीत होने वाले प्रयोजन 

का ज्ञान उसप्ते संमव ही कैसे होगा प्रसपेत्तापयंः राब्दसे पय केनिमताका इसी प्क्षकी 

ओर सफेत है । 
| न च सदनुमानेकविषयः = वह॒ अनुमान का विषय भी नदीं है। अनुमान से इतनाद्यी 
| जाना जा सकता हे कि नटरूपी रामादि के भीतर अमुक अमुक भाव है। जहो तक सदय मेँ 
ं आत्मानन्द का संबन्ध हे वह तो प्रत्यक्ष या अपरोक्षानुभूतिषूप स्ववेदनात्मक है । रांङुक आदि 
ङछ आचाय ने रस को अनुमेय माना है, उसक। अर्थं केवल नटमे भा्वोँका अनुमान है, जो 
मान्य हे । अभिनव गुप्त या व्यंजनावादी भी उतने अंश म अञ्ुमान मानता है। यहं अनुमान 
मरमाणात्मक नी होता, इसङिर शते व्यजनारूप भी कह दिया जता है । मदिममट ससे अनु. 
मान हो मानते हें किन्तु शिथिल अचुमान न कि प्रमाणात्मक़ । सदनुमानैकनिषय कदकर पयकार 
ने अनुमान कौ प्रमाणात्मकता की ओर संकेत भिया ३ । 

वुधैरवतितः-इस पदावरी पर .ध्वनिक्रारको (काव्यस्यात्मा ध्वनिरिति बुधैः समाम्नात- 

पूवः तथा श्ल ध्वनिरिति सूरिभिः कथितः" इन उक्ति की स्पष्ट ही छाप है। ेसा कहकर ध्वनि- 
। कार ने कदा था कि ध्वनिः को बुध लोगों ने स्वीकार किया दे--'विद्वदुपज्ञेयसुक्तिः ` इसि 
| वहं मान्य हे । बुभ शाब्द से उन्दने व्वाकरणलालिर्यों का संकेत किया है ओर कहाहै- 
भ्रमे हि विद्वांसो वैयाकरणाः? । मम्मट ने मौ ध्वनिकार की इस पदावली को अपने उत्तम काञ्य॒-लक्षण 
म शइदयुत्तममतिशविनि व्यङ्ग्ये वाच्याद्‌ ध्निवुपैः कथितः" इस प्रकार स्वीकार किया ह । 


सहृदय राब्द से भी "तेन ब्रूमः सहृदयमनःप्रीतये तत्स्वरूपम्‌” उक्ति के अनुसार वृत्तिकार 
| आनन्दवधेन से भिन्न ध्वनिकारिकाँ क निर्माता के रूप में मान्य सह्य नामक विद्वान्‌ की ओर 
| संकेत है । यथपि यह तय नहीं है कि ध्वन्यालोकके कारिका माग ओर वृत्तिभाग कं रचयिता 
भिन्न भिन्न हं । अभिन्न मानने पर सदधधय शब्दका अर्थं साधारण कान्यरसिक दही माना 
जाएगा । 


| स्वस्व | 


“पश्यन्ती चपयेव यत्र तिरयत्यात्मानमरध्यन्तरे 
यञ्च चरख्यति मध्यमापि मधुरष्वन्युज्िदालारसात्‌ । 
चाट्रू्चारणचपटं विदधतां वाक्‌ तत्र बाद्या कथं 
देश्या ते पर्या प्रभो सह रहःकीडाख्ड'!छिङ्गने ।' 
अत्रागमप्रसिद्धे वस्तुनि च्छ ककवस्वुभ्यवहारलम।रोपः । ठोकिकवस्त्‌- 
उयवहारश्य रसादिमेदाद्‌ बहुमेद्‌ इत्युक्त प्राक्‌ । 
तत्र शुद्धकार्यस्मायेषे कार्यस्य विरोषणत्वमो पचारिकमाक्नित्य विसेष- 
णसाम्बादिति लक्षण पूर्व॑रालरानुखारेण िदहितं यथाकथंचिद्‌ योऽयम्‌ । 
जहां पयन्ती [ वाक्‌ ] मानों लज पे स्वयं को भीतर ही चिपालेती दै ओर जहां मध्यमा 
[ वाक्‌ | भी मधुर ध्वनि [ शरो्रग्राद्य चारण ] को उन्मीकिति करने मेँ दूय जाती है, हे प्रभो ! 


आङे प्रा दैवी के साथ एकान्त की क्रीडा के रेते दढ आल्गिन के विषय मँ बाह्य [ वैखरी ] वाक्‌ 
चादक्ति की चपलता कैपे करे । ` 


समासोक्त्यलङ्कारः । २३३५ 


यहां आगम प्रसिद्ध वस्तु [ पयन्ती आदि वाणिओं ] पर लोकिक वस्तु [ खीपुरूष ] के व्यवहार 
का समारोप हे। जहां तक लोकिक वस्तु के व्यवहार का संबन्ध है, रस आदि के भेद से इसके 
अनेक भेद होते हेः यह पहिले ही कहा जा चुका है । 

[ समासोक्ति क ] "शुद्ध कार्यसमारोपः नामक मेद मेँ कायं ८याक्रिया) को ओौपचारिकरूप 
से विेषण मानकर प्राचीन [ अलकार ] सालों के अनुसार निमित “विद्चेषणसाम्य' इस [ समासोक्ति 
के ] लक्षणां की योजना यां जैसे तैसे कर लेनी चादिए। 

विमशं-वाणी के जो चार विक्त होते है परा, पदयन्ती, मध्यमा ओौर वैखरी, ध्न ङे विषय 
मेँ विस्तृत विवेचन इम अन्ध क मंगर पयमेंकियाजा चुका है । इस पद्य पर संजीविनीकार ने 
पर्याप्त गंभीर ओर स्पष्ट विवेचन किया है उसे देख लेना चाहिए । 

विमरिनी . 

तदिष्थं सप्रपल्लां समासोक्ति प्रतिपाद्य पुनरपि सहृदयानां इदयं गमीकवु अन्थक्तदेतद्प- 
तीति विभागेन छखचवे योजयति-इह चिवित्यादिना। 

इस प्रकार समासोक्ति प्रतिपादन विस्तारपृव॑क कर दिया गया 1 अव सहृदयो को हृदयंगम 


कराने के छ्िए समासोक्तिकी प्रतीति जहां जेसी होती है उसे उदाष््रण द्वारा वतलाते इर 
लिखते हं- 


[ स्वस्व | 
इह त॒-- 
“णेन्द्र धनुः पाण्डुपयोधरेण रारद्‌ द्‌धानाद्रनखश्चताभम्‌ । 
प्रसादयन्ती सक्लङ्कमिन्दुं तापं रवेरभ्यधिकं खकार |) 
इतव्यन्नास्ति तावद्‌ रविशदिनोनयकत्वप्रतीतिः । न चाच विरोषणसाम्य- 
मिति सखा कुतस्त्या । प्रसादयन्ती सकल इमिन्दुभिति विक्तेषणसाभ्या्छस्दो 
नायिक्रात्वप्रतीतो तदादयुष्यात्‌ तयोः समासोक्त्या नायकत्वप्रतीतिरिति 
चेत्‌ आद्रेनखक्चताभवैन्द्रं धचुदेधानैत्येतद्‌ वि्लेषणं कथं साम्येन निर्दिष्टम्‌ । 
न चेकदेराविवरतिन्युपमो क्ता यत्लाम्यीन्नायकव्वप्रतीतिः स्यात्‌ । तत्कथमज 
व्यवस्था । अ बोच्यते -पकदेशविवतिन्युपमा यदि प्रतिपदं नोक्ता तत्र्‌ खा 
फेन प्रतिषिद्धा । सामान्यल्श्चणद्वारेणायातायास्तस्या अ्जापि खंभवात्‌ । 
अथान्न नोपमानत्वेन नायकः स्वस्वरूपेण प्रतीयते अपितु रविदाशिनोरेव 
नायकत्वप्रतीतिः ¦ तयोरत्र नायकत्वात्‌ । तद्जाः नल्लक्चताभमिव्यत्र द्थित- 
मपि श्रुत्योपमानत्वं वस्तु पयीखोचनय रन्द्र धञुषि संचारणीयम्‌ , इन्द्रचा- 
पाभं नलक्षतं दधानेति प्रतीतेः, यथा दधा ज॒दोतिः इत्यादौ दधि संचायेते 
विधिः । पवभियस्रुपमाय॒भ्राणिता समासोक्तिरेव । 
दह पुनः 
नेनेरिवोत्पङः पदसेस्वि सरःधियः। 
पदे पदे विभान्ति स्मर चक्रवाकः स्तनैरिव 
इत्यत्न सरःशियां नायिकात्वपरतीतिनं समासोक्त्या, विज्ञेषणसाम्याभा- 

वात्‌ । तस्मान्नायिक्ात्रोपमानत्वेन प्रतीयते न तु सरःश्रीधर्मत्वेन नायिकात्व- 


३३द अदङ्ारसवेस्वम्‌ 


^ १४... ¢ प 
प्रतीतिरित्येकदेशराविवर्तिन्युपमेवाभ्युपगम्या, गत्यन्तयाखंभवात्‌ । यस्तु 
नोक्ता तेषमप्युपसंख्येयेव । यत्न तु केदापारालिचरन्देन' इव्यादौ खमासो- 
्ायामुपमायां समासान्तरेण विदेवणसाम्यं योजयितुं शक्यं तत्रो प्यग्भै- 
विदोबणप्रमाविता समासोक्तिरेवेति न विरोधः कथित्‌ । 

किन्त यह जो- 

(छारद्‌ ने ताजे नखक्षतं जते इन्द्रधनुष को उज्जञ्वर पयोधरो पर धारणकररखाथा। ओर 
वद्‌ सकरकं चन्दर को प्रसन्न [ उज्ज्वल कान्ति, खडा ] कर रही थी । ठेसा करते इट उसने सूरय 
का ताप बहुत वदा दिया । 

-एेसा पथ [ -अथं ] है इसमे यदतो सर्वमान्य हैकि सूर्य ओर चन्द्रमा मे नायकत्वे 
कौ प्रतीति होती है, किन्तु यहां विद्धेषर्णो की समानता नहीं है [ अतः प्रन उव्तादहै कि 


तव यह प्रतीति दो केसे रही है। यदि रेस कहा जाय किं (सकरंक चन्द्र को प्रसन्न कर रीः 


यह विशेषण [ नायिका ओर शरद्‌ दोनों में अन्वित होता है अतः] समान दहै फलतः इसके 
आधार पर शरद्‌ में नायिकात्व की प्रतीति हो रही 8 । [ क्योकि नायिकात्व नायकत्व-सापेक्ष द्योता 
दे अतः ] उसके अनुरूप होने से उन दोनों | सूयं ओर चन्द्र ] में समासोक्ति द्वारा नायकत्व कौ 
प्रतीति मी हो जाएगी ।' तो [ दूसरा जो ] 'ताजे नखक्षत जेसे इन्द्रधनुष को धारण कर रही 
यह्‌ विशेषण [हे इसे नायिका ओर शरद्‌ में] समान रूप से निर्दिष्ट [ उभयान्वयी ] कैसे 
मानाजा सकेगा । [ ओर आप उद्धट अदि ने], एकदेदाविवत्तीं उपमा का निवेचन किया नहीं है 
जिसके बर पर यहाँ नायकत्व की प्रतीति हो सकती । [ इस प्रकार यदहो यदि एक विशेषण किसी 
प्रकार समासोक्ति का साधक हेतो दूसरा विशेषण उसी प्रकार उसका वाधक ] तव इस प में 
[ अल्कार ] व्यवस्था केसे दी जाय । 

इस प्ररन पर उत्तर यह्‌ हे कि यदि एकदेशविवत्तीं उपमा को स्पष्टरूप से [ हम लोगों ने] 
नदीं मी कहा तव॒ मी उसका प्रतिषेष [ खण्डन ] मी किसने किया दै ! उसका निक॑चन [ उपमा 
के ] सामान्य लक्षणसेदी दो जाता है; अतः यहाँ इसे माना जा सकता है। इसके अतिरिक्त 
[ उपमा सिद्धि के किए अपेक्षित उपमान का स्वस्वरूप से कथन यदहो नहीं है श्योकि यद्धं ] नायक 
की प्रतीति उपमानरूप से नदीं हती क्योकि यदह वह्‌ स्वस्वरूप से प्रस्तुत नदीं है, उसकी प्रतीति 
सुय-चन्दरूप से ही होती है क्योकि यदाँ ये दोनों [ सूय चन्दर ] ही [ शरद्‌ के प्रति] नायकरूप 
से प्रतीत होते हं [ इसलिए यहां एकदेराविवत्तीं उपमा को ही अलंकार नहीं माना जा सकता ] । 
[ अतः यहां उपमा से अनुप्राणित समासोक्ति ही अलंकार है] जौँ तक “आद्रंनखक्षताभम्‌” विदेषण 
का प्ररन दै [ माना कि ] इसमे [ नखक्षतरूपी ] उपमान शब्दतः कथित दै, तथापि उसके उपमानत्वं 
को [ नायिका-पक्ष की ] पदाथैयोजना पर ध्यान देकर इन्द्रधनुष मे संक्रान्त कर केना चाहिए 
क्योकि यँ [ न यिका-पक्ष मे ] इन्द्रधनुष के समान नखक्षतः रेसी-[ ही | प्रतीति मानी जा 
सकती है । [ उपमानत्व की अन्यत्र संकान्ति वैसे ही संभव है] जैसे [ अग्निहोत्र के ङिए हवन 
करता हैः इस वाक्य से हवनविधि सिद्ध दहो जाने पर ] दही से हवन करता है" इस वाक्य में 
विधि को [ हवन से हटाकर ] दही में संक्रान्त माना जाता दै । अतः इस पर्य मै उपमा सेअतु- 
प्राणित समासोक्ति दी [ अलंकार ] है [ रेसी व्यवस्था दी जा सकती दै ] । 

निम्नलिखित पच "नेत्ैरिवो०' के- 

(सरःश्री नेत्रो जसे उत्पल से, मुखो जैसे कमलो से ओर स्तनो के चक्रवाकं से जगह जगद्‌ 
खुरोभित हो रही थीं।ः 


समासोक्त्यल््ारः - ३३७ 


इस अथं मं सरःश्री में नायिकात्व की प्रतीति का जहाँ तक संवन्ध है वह समासोक्ति से 
नदीं होती क्योकि यहाँ विरेषणों का साम्य [ उभयान्वयित्व ] नदीं हे । श्सङ्एि यहाँ नायिका 
उपमानरूप से हौ प्रतीत होतीदहेन किं नायिकात्व की प्रतीति सरभ्भी के धम के रूप मे, इसखिट 
यहां एकदे शविवत्तां उपमा ही स्वीकार कौ जानी चादिए। दूसरी कोड गत्ति [ भलंकार ] है 
मी नहीं । एकदेराविवरत्ता उपमा का जिनन्दोनि लक्षण नदीं किया हे उन्हें भी इसका संग्रह करना हयी 
चादि । जहाँ कों "केरापााछि ० आदि पो मेँ उपमा [ उपमित ] समास के दवारा कथित रहती 
हे, साथ ही अन्य समास के द्वारा विशेषणसाम्य की योजना भी संमव रहती है वहो .जोपम्यगर्मं 
विदेषणः से निष्पन्न समासोक्ति हौ रहती है । इस प्रकार [ इन दोनों का परस्पर मे] कोई विरोधं 
नहीं हे । 

विमदिनी 
` अविग्रतिपत्ति्योतनार्थस्तावच्छृन्दुः 1 कुतस्त्येति । किमश्या निमित्तमिति भावः। तदा- 

जुगुण्यादिति । शरदौ नायिकाववप्रतीत्यनु गुणष्वात्‌ ! तयोरिति रविश्श्शिनोः। कथमिति । 
अप्रकृताथांननुगुणत्वात्‌ साम्यायोगात्‌ । कथमत्र व्यवस्थेति । विशेषगसाभ्यायोगात्‌ खमा. 
सोक्तेरभ्रासेरेकदेशविवततिन्या उपमाया अनुक्तव्वात्‌ । सामान्यलक्षणेतति । उपमानोपमेययोः 
साधम्यं भेदामेदनुस्यस्वे उपमेति । एवमेकदेशवि वल्युंपमासामभ्यदिवान्न नायकस्व प्रती ति- 
रिति भावः। अथेति पडान्तरे। यदि चान्न पू्वोक्तयुक्स्येवानुगुण्याद्‌ रविश्चकिनोः समा- 
सोक्तिश्धंखेन नायकस्वप्रतीतिस्तद्ाद्र॑नखइताभमिति विशेषणं कथं साम्येन योजयितुं 
शक्यमिव्याशङ्कयाह--तदग्रस्यादि । एतदेव श्ाखान्तरप्रसिद्धद्टान्तस्ुखेन हदयंगमीक- 
रोति--यथेव्यादिना । अग्निहोन्नं जुहु यादित्यनेनोस्पत्तिविधिवाक्येन हि होमो विहितः। 
तस्य॒ च पुनविधानसदृश्धदृहनन्या्ेन याव द्राक्षं तावद्‌ विधेर्विषय इस्यभ्युपगमान्न 
युञ्यत इति तनत्रायुक्तत्वाहुपपदे दध्नि संचार्त इव्यथः । उपमानुप्राणितेति। ओपम्यगभ- 
विशेषणोस्थापितेस्यथंः । समासोक्तिरेवेत्ति। न पुनरेकदेशविवर्तिन्युपमा । गव्यन्तरमल- 
कारान्तरम्‌ । येरिच्युद्धरादिभिः ! यत्न स्विस्यादे्भन्थस्य पूर्वमेवास्माभिरभिप्राय उक्तः| 

-तावत्‌'- तो" शब्द सूचना देता है अविप्रतिपन्ति की [ अर्थाद “न्द्रं धनुः पच मे नायकत्व 
को प्रतीति रविशशीमें होती है इसमे किसौ को आपत्ति नहीं हे ]। कुतस्त्या" = { रविरायी में 
नायक्रत्व कौ प्रतौति ] दो कैसे री हैः = अर्थात्‌ इस प्रतीति का मूल क्या है। तदानुगुण्याव्‌ = 
उसके अनुरूप होने से = रारद्मे दो रही नायिकात्व की प्रतीति के अनुरूप होने से । कथम्‌ = 
केसे [ 'आद्र॑ंनखक्षतामम्‌०› यह विशेषण ] [ नायिकारूपी ] अप्रकृत अथं के अनुरूप नहीं है [क्योंकि 
नायिका मं नखश्चत के समान इन्द्रचाप नदीं अपितु इन्द्रचाप के समान नखक्षत ही संभव दहै, 
अतः उक्त विशेषण मेँ] साम्य [ उभयान्वयित्व ] वन नदीं पाता । कथमत्र ्यवद्था, = यलं 
व्यवस्था कैसे दी जाए" = वर्योवि, विदेषणसाम्य न होने से समासोक्ति हो नदीं सकती ओर एक- 
देशविवत्ता उपमा कदीं नहीं गई है! 'सामान्यल्षणा०)-[ उपमा का ] सामान्य लक्षण = उप्‌- 
मान ओर उपमेय का समान धर्मं कै साथ पेसा संबन्ध जिसमें भेद ओर अभेद [ प्रधान या अप्रधान 
न होकर | समान हो उपमा [ नामक अलंकार ] कहकाता है, यह । इस प्रकार यहाँ नायकत्व की 
प्रतीति एकदेशविवत्ती उपमा से ही हो जाती है । “अथ = श्सके अतिरिक्त --इस प्रकार दूसरा पक्ष 
प्रस्तुत क्या जा रदा है व्यँ यदि पूर्वोक्त युक्ति से ही अर्थात [ शरद्‌ के प्रति ] अनुरूप होने 
से दी रवि ओर शशी मे समासोक्ति के दारा नायकत्व की प्रतीत्ति मान ली जाए तो आगद्रंनल- 
क्षताभम्‌” यहं विशेषण [ दोन पक्षो मे ] समानरूप से कैसे अन्वित किया जा सकेगा रेसी शंका कर 


2२ अ०् सर 


३३८ अलरङ्कारसवेस्वम्‌ 


उत्तर देते है- तदत्र इत्यादि । इसी तथ्य को दूसरे शाख [ मीमांसा] में प्रसिद्ध इष्टान्त दारा 
हृदर्यगम कराते हए कहते हैँ--'यथा?-- इत्यादि । अग्निहोत्रं जुहयात' = (अग्निहोत्र के दि हवन 
करे” यह एक विधि-वाक्य है 1 इसे हवन कौ उत्पत्ति का विधान दोत्ता है । फलतः इससे दवन 
क्रामी विधान ह्यो जाता है। उसी इवन का विधान पुनः [ दध्ना जुहोति = दही से दवन करता 
डे" इस वाक्य के दारा ] किया जाय यह टीक नहीं क्योकि नियम यह्‌ है कि विधान उतने काही 
होता है जितना पर्व॑तः प्रप्र नदीं रहता जेते [ अभ्रक भादि की भस्म वनानेमे जो द्वितीय तृतीय 
युर दि जाते हँ उनमें] ग उक्ती को जलती है जो पहले से दग्ध नदीं रहता । इसङ्९ उस [हवन] 
मं [ विधान के ] अयुक्त होने से उसका जो उपपद दही है उसमें विधान का संक्रमण माना जाता 
दे उपमानुप्राणिता = अर्थात [ यहाँ] ओौपम्यगर्भं विदोषण से निष्पन्न समासोक्ति [ मानना 
उचित है ] समासोक्तिरेव = (समासोक्ति ही" = अर्थात्‌ एकदे शविवत्ती उपमा नदीं । शगस्यन्तर”= 
“अन्य गति" अर्थात्‌ अन्य अल्कार नदीं है । यैः = जिनने अर्थाव्‌ उद्भट आदि ने। यन्रतु इत्यादि 
जो पंक्ति रै इसका अभिप्राय हम पदे हयी [ इस अलंकार के आरम्भमें ] बतला चुके हें। 
विमदः --[ क ] 'अधात्र-नायकत्वप्रतीतिः इस पंक्ति कै कुछ अंशो म पाठान्तर दै। 
उनका विवरण इस प्रकार दै- 
१ घथात्र = ययप्यत्र-निणेयसागर पाठान्तर । 
२ नोपमानत्वेन = उपमानत्वेन -निणेयसागर पाठान्तर । 
३ नायकः स्वस्वह्पेण = नायकत्वं स्वरूपेण-निणैयसागर, 
नायकत्वम्‌-अनन्तरायन, मेहरचन्द 
४ नायकत्वप्रतीतिः = नायकव्यवहारप्रतीतिः- निणेयसागर मूल 
नायकत्वप्रतीतिः - निणयस्तागर पाठान्तर, मोतीलाल चारदाप्रति, 
नायकत्वन्यवहार प्रतीतिः मोतीखाक, अनन्तरायन, मैहर चन्द 
समासोक्ति मे अप्रकृतार्थं की प्रतीति प्रक्ृताथं से निश्वेक्न अथात्‌ स्वतन्त्र रूप से नदीं होती, 
उपमा मे अप्रङृताथ प्रक्रृताथनिरपेक्ष होकर दी प्रतीत दोता है मले दी वह वाच्य दो या अवाच्च। 
इस रिथति मं “देन्द्रं धनुः० पद्य मे अप्रकरत नायक ओर उसके व्यवहार की प्रतीति क प्रकृत 
रवि-शशौ तथा उनके व्यवहार कौ प्रतीति से निरपेक्ष नदीं माना जा सकता, फलतः (नायकः 
स्वस्वरूपेणः ओर (नायकत्वप्रतीति' पाठ ही ठीक वैठता है । नायकत्व ओर नायकन्यवहार तत्वतः 
एक हें इसङ्िए (नायकत्वन्यवदार” पाठ मे एक ही तच्च का कथन भाववाचक (त्वः-प्रत्यय से तथा 
न्यवहार शब्द से होने के कारण पुनरुक्ति दोष है। संजीविनीकार ने ^रविशशिनोरेव नायकत्व- 
व्यवहारे प्रतीतिः" एसा कह 'नायकत्वव्यवदारप्रतीति? को ही मूल माना है । इनकी इस पक्तिका 
अथ नायकत्वरूपी व्यवहार किया जाय या "नायकलानुरूप व्यवदार” त्व" ओर श्यवदार 
दोनो मसे कोई एक व्यथं ठहरता है। नायकत्वानुरूप व्यवहार के स्थान पर (नायकानुकूपः 
व्यवहार भी कहा जा सकता है । 


( ख | मन्धकार ने जो धनुष को उपमान बनाकर नखक्षत को उपमेय बनाने का विकर 
स्तुत क्रिया हे यह केवल नायिकापक्च की दृष्टि से संगत दहै। नायिका नखक्षत ही धारण कर 
सकती है जिस प्रकार शरद्‌ इन्द्रधनुष ही । इस विरेषण को नायिकेकगामी बनाने पर (तन्वी 
इत्यादि प कै "विकास" धम के समान इस विदेषण को एकमात्र अप्रकृतपक्षीय विरोषण मानना 
रोगा । विन्तु यह्‌ सव अत्यन्त अवैश्ानिक हे । कहा जार 'नलक्षत के समान धनुषः ओर अर 
निकाला जाए धतुष के समान नखक्षत' यष संमव हौ कते हे । नां तक दध्ना जुदोति' का संबन्ध 


ण न अका" ` कम 


समासोक्त्यलकारः ३३९ 


दे उसमें "विधानः जुहोति से हराकर दधिमें संक्रान्त कर किया जा सकता है। उदेद्यविघेयमाव 
व्याकरण पर निभेर नदीं रहता अतः उसे पिवक्षा के अनुरूप खींचा-ताना जा सकता है । य॒होँ 
नखक्षत का उपमानत्व 'आद्रनखक्षताम' इस प्रकार समासमं आ आभा ब्द पर निर हे। 
वह लोक मं धनुपके साथ नहीं नोड्ा जा सकता इस प्रकार वह केवर शरद्‌ काही विदोषण 
बनता है ओर इससे धनुष उपमेय ही प्रतीत होता है उपमान नहीं। निदान इस विदोषणर्मे 
उपमा ही मान्यदहे। शरद्‌ में नायिकात्व ओर रवि तथा राशी मं नायकत्व स्वतन्रस्पसे प्रतीत 
नहीं होते, इसलिए उतने अंश मे समासोक्ति मानी जा सकती है । पूणे वाक्याथ म चमत्कार 
उपमानुप्राणित समासोक्तिसे ही मानाजा सकता हे किन्तु अनुप्राह्यातुय्रादकभावमूक संकर 
की रीति से, न कि ओपम्यगभित समासोक्ति की रीतिसे। 

यहाँ अन्थकार सप॑चुचुन्दरन्याय का शिकार हौ गयादहै। पह तो उसने उद्धट आदिक 
अनुकरण पर अथवा समासोक्ति पर अयपिक मोह के कारण एकदेराविवत्तीं उपमा नहीं सानी । जव 
यहो समासोक्ति का निवह कठिन दिखाई दिया तो उसे राजनीतिक चार चलकर मान लिया 
किन्तु उसे समासोक्ति की निर्वाय स्थिति का मोह सताने र्गा ओर उसने उपमानत्व का भवन 
धनुष में करना शुरू कर दिया । इसीलिए इनकी इस व्यवस्था का अनुमोदन न पण्डितराजने 
किया है मौर न विदवेश्वर ने ही । अप्पय्यदीक्षित के ही समान ये दोनों आचायंभी इस विषय प्र 
चुप हें। 


[ सवेस्व ] 


साच समासोक्तिस्थान्तरन्यावे कचित्वमथ्यंगतत्वेन कचित्समर्थंक- 
गतत्वेन च भवति । क्रमेण यथा- 


अथोपगूढे शरदा राङ्क प्राच्रड ययो रान्ततडित्कराक्चा । 
कासां न सौभाग्य गुणो.ऽङ्गनानां नष्टः परिशचष्टपयोधराणाम्‌ \0 
असमाक्तजिगी षस्य स्ीचिन्ता का मनस्विनः 
अनाक्रम्य जगत्‌ सव नो संध्यां भजते रविः ।+ 
अत्रोपगूढत्वेन दान्ततडित्कटाक्षत्वेन च राशाङ्नयर्दोनीयकञ्यवडहार- 
प्रतीतौ समासोश्त्यालिङ्कित पवा विरोषरूपः सामल्याश्रयेणार्थान्तरन्या- 
सेन समथ्यंते । सामान्यस्य चात्र इटेषवरादुत्थानम्‌ । शान्ततडित्कराक्षे- 
त्यो पम्यगभं विरोषणं समासान्तयश्रयेणान्न खमानम्‌। अस्तमातेत्यादौ तु 
खीराब्दस्य सामान्येन सखीत्वमात्राभिघानात्‌ सामान्यरूपोऽथो लिङ्कविद्ेष- 
निर्देश्गभण कार्योपनिबन्धनैनोत्थापितया सपासोक्त्य। समारोपितनायक- 
ठ्यवहरेण रविसंध्याचरत्तान्तेन विद्चेषरूपेण खमभथ्यंते । 
आरृष्िवेगविगलद्धजगेन्द्रभोगनिमोकपटपरिवेषतयाम्बससेः । 
मन्यन्यथाञ्युपद्माथेमिवाश्चु यस्य मन्दाकिनी चिरमवेटत पादम्‌ ॥ 


अत्र निमाकपट्पह्वेन समारोपिताया मन्दाकिन्या यद्धस्त्चत्तेन पाद्‌ 
मूढे वेष्टन तच्चरण पू वेष्टनत्वेन एकेषमूखयातिशथोकत्याध्यवस्तीयते । तत्‌ 


३७० अलङ्कारखवस्वम्‌ 


दथाध्यवसितं मन्थन्यथाव्युपच्मार्थमिवेत्युस्परेक्षासरुच्थापयति । स्मेत्थाप्य- 
मनिवाम्बराशिमन्दाक्रिन्योः पतिपत्नीव्यवहायाश्रयां समासोक्ति गर्मकरोति ) 
पवं चोत्पेश्चाखमासोक्व्योरेकः काठः । 

पवं (नखश्चतानीव वनस्थलीनाम्‌ इत्यत्रापि वनस्थद्छीनां नायका 
व्यवहार उत्ेक्लान्तयायुप्रविष्टख्मासोक्तिमू प्व । 

पवमियं खमासोक्तिरनन्तव्रपञ्चेव्यनया दिया स्वयसुत्प्रक्ष्या । 

यह समासोक्ति अर्थान्तरन्यास्रमे भी होती है, कमी समथ्यं अञ में ओर कभी समक अं 
म । [ दोनो के ] क्रम से उदाहरण यथा-- 

"अव, जव चन्द्र का आल्िगन दरद्‌ ने कर ख्यातो वषां अपना तडित्कराक्ष इन्त कर चली 
गं । पयोधर नष्ट हो जाने पर विन चखि्यो का सौमाग्ययुण नष्ट नदीं हो जाता । 

“जव तक्‌ विन्येच्छा समाप्त नदीं हयो जाती किसी मी मनस्वौ को खीकी चिन्ता कैसे 
सकती है । संपूण जगत्‌ पर आक्रमण कर लेने के पूव सूये सन्ध्या को नदीं भजता ।' 

इनमें [ से प्रथम मे ] आलिगन ओर तडित्कटक्ष की दान्ति [इन दो विरेषर्णो ] ते चन्द्रमा 
ओर शरद्‌ मे नायक तथा नायिका के व्यवहार की प्रतीति होती हद । इस प्रकार यहा जो विद्ञेषरूप 
अर्थं है वह समासोक्ति से युक्त है ओर उसी रूप म उसका सामान्यरूप [ अगनाद्यब्द से कथित | 

यन्य अर्थं के उपन्यास से उत्पन्न अर्थान्तरन्यास्ताटंकार से समथन होता हं । [ अतः प्रथम प्य में 
समासोक्ति समथ्य॑ अदाम है] य्ह [ समथक ] सामान्यां की निष्पत्ति दलेष से इडे 
[ वयोकि पयोधर शाब्द में मेध तथा स्तन अथैका रलेष हे इसी प्रकार सम्य विदोषं मे | 
'हान्ततडित्कटाक्षा--- यष्ट विदेषण [ तडित्रूपी काक्षः इस समास के अतिरिक्त तडित्‌ क 
के समान कटाक्षः इस ] एक अन्य समास के मानने पर [ उभयपक्में ] समान बनता दहे। 
'समाप्त०? इत्यादि पच मेँ [ समथ्यं वाक्य मेँ आया | खीराब्द [ सखी-]-सामान्य का वाचक हें । 
इसलिए [ उसे उपरिथत ] सामान्यरूपी अथं | समभ्यं है उस] का रविसन्ध्यादृत्तान्तरूपी 
विद्ेष अथ॑ से समर्थन हो रदा है, जिस पर समासोक्तिके द्वारा नायक त नायिका के वृत्तान्त 
का आरोप हो रहा है । यह समा्ोक्ति निष्पन्न हो रही है | समान - कायं ते निदे, जिसमे 
विचिष्ट लिगं [ ख्ञीलिग तथा पँटिङ्ग ]कायोगदहै। [इस प्रकार इस प्रच समासोक्ति समथैक 
उदम हे]। 

¶ समुद्रमन्थन के समय ] खिचाव के जोरसे शेषनाग के [ धवल | शरीर का [ धवर | 
नि्मोकपड् [ केँचुल की पट्टी ] निकल कर गोल गोल लिपट जाने के कारण जिस [ मन्दराचल ] 
के पाद- [ प्रत्यन्तपर्वत ओर चरण ] मूल को मार्नो सस्र के मन्थन की व्यथा शीघ्र रान्त करने 
के हेत बहुत देर तक मन्दाकिनी लपेटे रदती थी ॥ [ हरविजय ४।७ 

- यां [ यह नि्मोकपद्र नहीं हे अपितु मन्दाकिनी है" इस विवक्षा द्वारा ] निमांकपट् का 
मपहव कर उस पर मन्दाकिनी का आसेप किया गया है भोर उत्त [ मन्दाकिनी | का जो पवत. 
कटक के मूर मे वास्तविकरूप से च्पिथ्ना है उते उसके चरण के मूलम लिपर्नेकेरूपमं रलेष- 
मूलक अतिशयोक्ति द्वारा प्रस्तुत किया जा रहा है । [ यह हा वरणमरल मे किपरनेरूपी अथै के 
दारा कटकमूल म लिपरनेरूपी अथै का अध्यवसाय ]। इस प्रकार प्रस्तुत [ अध्यवत्तित ] वह्‌ 
मानो मन्थन की व्यथा चान्त करने के हेतु" [ किया गया ] इस प्रकार उत्प्रेक्षा को निष्पन्न करता 
हैः । वह [उत्ेक्षा] निष्यन्न होने लगती है तो समुद्र तथा मन्दाकिनी कै पति-पत्नी व्यवहार से जनितं 


| 
॥ 
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४ 
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। | 


समासोक्त्यलङ्ञारः ३७१ 


समासोक्ति को अपने भीतर ले ठेतौ हे। इस्त प्रकार उत्प्रेक्षा ओर समापोक्ति दोनों हयी एक साथ 
निष्पन्न होती हें । 

हसी प्रकार [ कुमारसंभव के ठृतीयसगं के बाछेन्दुवक्राणि० इस पद्य के ] वनस्थली के नखक्षतों 
सेः इस अशमंभी जो नायिका के व्यवहारकी प्रतीति होती है वह उत्प्रेक्षा के भीतर निविष्ट 
समासोक्तिसे दी होती दहै। 

इस प्रकार यह सोचकर कि इस समासोक्ति के फेलाव का अन्त नहीं है उपरिनिर्दिष्ट पदति 
से उसके अन्य मेदां कौ करपना स्वयमैव कर लेनी चादि । 


विमरिनी 


तेत्युक्तप्रपञ्चा । सामान्यस्येव्यङ्गनाशब्दस्य सख्रीवमात्राभिधानात्‌ । उक्ेषवश्चादिति, 
पयोधरागां हि शि्टस्वम्‌ । लिङ्गविरेषेति, रविसंध्ययोः पुंखीख्पेग काय॑ मजनास्यम्‌ । 
एवसन्याठकारसंमिश्रस्व्मप्यस्या दृर्शंयति -आक्कषटीत्यादिना । सेव्युप्प्रत्ठा । एकः काल 
इति । क्तो खमासोक्तिग्ीकारेणैवोसत्रेक्ताया उत्थानात्‌ । एवमिति । यथोक्तगय्येव्यर्थः । 


सा = वहं अधात्‌ यह अथात्‌ यह समासोक्ति जिसका विस्तृत विवेचन करिया जा चुका है । 
सामान्यस्य = सामान्य का अभिधायक इसकिए कि अगनाशब्द खीतमात्र का. अभिधान करता 
दे । ररेषव शात्‌ = रलेपदारा अर्थात्‌ पयोधरो के अनेकार्थक होने से । छिगविलेष = रवि ओर 
स्यामे पुल्ग तथा खील्गि ओर उनका कायं मजनक्रिय। कथित भजन = सेवन । इसी प्रकार 
इसका भन्य अल्कारों के साथ भौ मिश्रण रदता है, उसे दिखलाते है- 'आङ्कष्टिः इत्यादि उदरो 
दारा । सा = वद = उत््क्षा । एकः कालः = एकदही समयमे प्रतीति होती है अर्थात्‌ बोधे 
उत्प्रक्षा समासोक्ति को अपने भीतर लेकर ही निष्पन्न प्रतीत होती ६। एवम्‌ = उक्त क्रमसे। 


विसश्ः--( १) उुमारसंमव का "लन्दुवक्राणि०” पच पूरा इस प्रकार है- 
"व लेन्दुवक्राण्यविकासभावाद्‌ बुः पल डान्यतिलोहितानि । 
सद्यो वसन्तेन समागतानां नखक्षत।नीव वनस्थलीनाम्‌" ॥३।२९॥ 

पलाश [ सू | के अनखिटे पुष्प [ प्रतिपद्‌ के ] बिन्दु के समान टदे ओर लालच ये 
इसक्एि वे एसे लग रहे थे मानों वसन्त से तत्काल भिली वनस्थलियों के नखक्षत हो । 

(२ ) मन्दाकिनी का अथै अन्थक्रार के अनुसार मागीरथी गंगा प्रतीत होती है। इस अर्थं 
सै पद्यका अभिप्राय यहु माना जाएगा किं जते कोई सपत्नी अपने पति की रक्षा के लिटि आक्नान्ता 
के चरण से छ्पिट जाती हे उसी प्रकार मन्दाकिनी मी अपने पति समुद्र को मन्थन व्यथा से वचाने 
के खि मन्दर के कटफों मे लिपट ग। 

( ३ ) समासोक्ति का इतिदास- 

मह = “ त्रोक्तो गम्यतेऽन्योऽ्स्तत्समानविद्ेषगः । 

सा समासोक्तिरदिष्टा संक्षिप्तार्थतया यथा ॥ 
स्कन्धवानृजुरव्यारः स्थिरोऽनेकमदहाफल; । 
जात्तस्तरुरयं॑चोच्चैः पातितश्च नभस्वता ॥२।७९, ८०॥ । 

-- जह एकं के कने पर उसी जैसा समान विरोषण वाला दूसरा अथं प्रतीत दो तो उसे 

समासोक्ति का जाता ह क्योकि इसमे अभिक अथं थोडे म कह दिया जाता है । यथा- 


--इस स्कन्धा से युक्त, सीधे, सापो से रदित, ओर दढ क्च मेँ ज्यों ही वड़े बडे फल रगे, 
हते आभी ने गिरादिया। 


३७२ अन्ध्धारसवंस्वम्‌ 


वामन = [ सूत्र ] “अनुक्तो समासोक्तिः ।४।३।३ 

[ बृत्ति ] उपमेयस्यानुक्तौ समानवस्तुन्यासः समासोक्तिः, संक्षेपवचनात्‌ समासोक्तिरित्याख्या । 

-- उपमेय को विना कहे समान वस्तु का विन्यास समासोक्ति कदलाता दै । [ समास का अथं 

है संक्षेप ] संक्षेप मे कथन रहने से समासोक्ति यह नाम पड़ा । यथा- 
'दलाघ्या ध्वस्ताध्वगर्कानेः करीरस्य मरौ स्थितिः । 
धिक मेरो कच्पवृक्षाणामव्युत्पन्नाथिनां नियः ॥' 

-पेड करीरुकाहीदहो गौर मले दही वह मरुभूमिमेंदही जमा हौ तव भी वह इलाध्यहै 
क्योकि वद्‌ रास्तागीरं की ग्लानि ( थकावट ) दूर करता रता है । श्सके विरुद्ध याचकां की इच्छा 
पणन करने वाला कद्पदृक्च ही क्योँनदहौ ओर सुवण कै पर्वत घमेर्‌ पर ्ीकत्यांन उगा दो; 
उसे धिक्तार है । 

स्पष्ट ही समासोक्ति के नाम से वामन ने जिस अलंकार को प्रस्त किय। परवती आचार्यौ के 
अनुसार वद अप्रस्तुतप्ररसा ही हे । 

उद्धर = “प्रकृतार्थेन वाक्येन तत्समाने विदोषणेः। 

अप्रस्तुताथेकथनं समासोक्तिरुदादहता ॥२।१०॥ 

-- वाक्य ग्रकृताथंक हो किन्तु उसके विद्रोषण इस प्रकार समान हां कि उनसे अप्रस्तुत अथ का 
कृथन होता हो तो उसे समासोक्ति कदा जाता है । उदादरण-- पवांदघ्रृत 'दन्तप्रभाञ्ननरूं' = पय ¦ 

स्पष्ट ही उद्भट भी एक देराविवत्तीं रूपक मे समासोक्ति समञ्च वे । | 

रद्द = रद्र ने समासोक्ति का निवचन भामह के अनुकरण पर इस प्रकार किया हे-- 

'सकल्समानविदेषणमैकं यत्राभिधीयमान सव । 
उपमानमेव गमयेदुपमेयं सा समासोक्तिः ॥८।६७॥ 
यथा--^फलमविकलमर्घीयो लर परिणति जायतेऽस्य सस्वादु । 
प्रीणितसकल्ग्रणयिप्रणतस्य सदुन्नतेः तरोः ॥८।६८॥ 
-जदां केवल उपमेय ह कदा जाय भौर वह सभी विशेषणा कौ समानता के आधार पर 
उपमान की प्रतीति व्यंजन दारा कराए तो वहां समासोक्ति होती द । यथा ~ 
-- “समी याचक ओर प्रणत व्यक्तियों को प्रसन्न करने वाले अच्छे वदृ हए इस सन्दर वक्ष का 
फर कमी चूकता नही, आक्रार मे बहुत वड़ा होता है, शीघ्र परिणत्‌ ( पक ) हो जाताहे ओर 
बड़ा ही स्वादु रता दै ।› [ यहां व्ृक्ष ही प्रस्तुत दै अतः उपमेय ह । उससे उस जसे सत्पुरुष की 
प्रतीति समान विदचेषर्णो के आधार पर दोती है । ] अतः यहां समासौक्ति दै । 
नमिखाघु ने वामन के अनुसार यँ उपमान से उपमेय की प्रतीति एेसा अथं कर दिया दहै; 
चिन्तु यह उदाहरण से मेल नदीं खाता । उदाहरण मे वृक्ष का दइ्स' = इस प्रकार देसे सवनाम 
दारा निर्दा किया जा रहा दै जिससे यह प्रतीत होता हे कि वृक्ष सामने ल्गा है। फलतः वहु 
प्रस्युत रै। भूतो खींवतान कर दूसरा अथं मी ल्गाया जा सकता हे किन्तु जव उपयुक्त अथं 
निकाला जा सकता है तव अनुपयुक्तं अथ॑ का माय्रह करना उचित नदीं कदा जा सकेता । कदाचित्‌ 
मम्मट को रुद्रट कै इस द्वितीय अर्थ॑से ही समासोक्ति का निग्नठिखित लक्षण बनाने कौ प्ररणा 
भिखी होगी । 
मम्मट = "परोक्तिभंदकेः दिले: समासोक्तिः ॥ 
रिल्ष्ट विषणा द्वारा अन्य अथं की प्रतीति समासोक्ति ककती हे ! 
~ पूर्ववन्ती आचार्यौ ने विशेषण के उमयार्भक दोने कौ बात तो कदी थी किन्तु विरोध्य के 
उभयार्थक होने का प्रतिषेध नहीं कियाथा। मम्मट ने उक्तं लक्षण की वृत्ति द्वारा उसे भी स्पष्ट 


समासोक्त्यटङ्ारः २७३ 


कहा - श्रकृता्थप्रतिपादकवाक्येन दिल्टविशेषणमादत्म्यात्‌, न तु विदोष्यस्य सामर्थ्यादपि यद्‌ 
अप्रङ्ृतस्याथस्याभिधानं सा समासेन संक्षिपेणार्थंदयकथनात्‌ समासोक्तिः? प्रकृत अथं का प्रतिपादक 
वाक्य यदि केवर रिष्ट विरोषरणों के वल पर, न किं विरोष्य के भी बलू पर अप्रकृत अर्थं का म्रति- 
पादन करे तो वह समासोक्ति कराती है, समास अर्थात्‌ संक्षेपके द्वारा दो अर्थौ का म्तिपादन 
करने से।" 

परवत्तीं आचार्यो मै- 

शोभाकर ने अलंकारसवंस्वकार के समासोक्ति-लक्षण परर जो आपत्तिः उठाई है 
उन्हे पले ही प्रस्तुत किया जा चुका है । 

अप्पय दी्ित- ने उनके कुवल्यानान्द मे चनद्रालेक के समासोक्तिः परिस्परत्तिः प्रस्त॒तेऽ- 
प्रस्तुतस्य चेत्‌ । -दस समासोक्ति लक्षण की वृत्ति लिखते हए कदा है- 

“यत्र प्रस्तुतदृन्तान्ते वण्यमाने विदेषणक्ताम्यबलाद्‌ अप्रस्तुतदृत्तान्तस्यापि परिस्पफूत्तिः तत्र 
समासोक्तिरलंकारः । 

- जदं वणेन किया जारहा हो प्रस्तुतवृत्तान्त का किन्तु विशेषणसाम्य के बर पर अग्रस्तुत- 
वृत्तान्त भी निकल रहा हो तो अलंकार का नाम समासोक्ति होता है । 

पण्डितराज जगन्नाथ ने समासोक्ति का लक्षण ओर भी अधिक संरम्भ के साथ इस प्रकार 
कियादहै-- 

ध्यत्र प्रस्तुतधर्मिको व्यवहारः साधारणविशेषणमात्रोपस्थापिताप्रस्तुतधर्मिकन्यवहारामेदेन भासते 
सा समासोक्तिः 

- जह प्ररंछत धमी का व्यवहार साधारणविश्चेषणमाच्र के द्वारा उपस्थापित प्रस्त धर्मीकै 
व्यवहार से अभिन्न भासित होता हो वह समासोक्ति है । 


विश्वेश्वर ने समासोक्ति का रक्षण इस प्रकार किया दै- 
"यत्र प्रकारवाचकपदमत्रे व्यङ्ग्यवाच्यसामान्यम्‌ । 
तच्छक्तेरप्रकृता्थोक्तिः सोक्ता समासोक्तिः ॥› 
-- जां केवर विंशेषणवाचक पद ही वाच्य ओर व्यङ्ग्य दोनों अर्थौ मे समान हों ओर उनकी 
दाक्ति से अप्रकृताथं का कथन दो तो उपसे समासोक्ति कहा जाता है । 
उपयुक्तं विवेचन से स्पष्ट है किं केवर वामन को छोड समासोक्ति के विषय मे सभी आलं- 
कारिक एकमत है ओर समासोक्ति के मेदप्रमेदौं को कल्पना का श्रेय अलकारसर्व॑स्वकार को 
ही है। 
अलंकाररत्नाकरकार ने यहो समासोक्ति, ररेष ओर चब्दशक्तिमूलक ध्वनि का अन्तर भी 
स्पष्ट किया है। हम इसे इलेषप्रकरण के पश्चात्‌ प्रस्त॒त करेगे । 


संजीविनौकार ने समासोक्ति के संपूण विवेचन का सारसक्षेप इन कारिकाओं में किया है- 
[ १९] अप्रस्तुतं प्रतीतं चेद्‌ मेदकांरेकसाम्यतः। 
व्यवहारं स्वमारोप्य प्रस्तुते न्यग्मवत्यथ ॥ 
| २ | तेनाप्रस्तुतवृत्तान्तारोपेण प्रस्तुतं स्वयम्‌ । 
सक्षेपेणोच्यते तस्मात्‌ समासोक्तिरियं मता ॥ 
| ३ , स्याद्‌ विक्षेष्यांरासाम्यं चेत्‌ प्रस्त॒ताकाररूपितम्‌ । 
भवेदप्रस्तुतं मेधयं रूपकालडकृतिस्तदा ॥ 


३७७ ` अलङ्कारसवंस्वम्‌ 
 [ ४ ] विद्लेषणांदासाम्येनाप्रस्त॒ताथेस्य गम्यता । 
. समासोक्ति्मता येन संक्षिप्यार्थोऽभिधीयते ॥ 
[ ५] जुडधका्य॑समारोपे साम्यं स्यादोपचारिकम्‌ । 
व्यवहारसमारोपः सा्षादस्याः प्रयोजकः ॥ 
[ ६ ] स्याद्‌ विरोषणसाम्यं चेत समासान्तरसश्रयात्‌ । 
उपमा वाधते नेनामेकदे दाविवत्तिनी ॥ 
[ ७ ] दृच्यतेऽथान्तरन्यासे समर्ये च समर्थके। 
उत्प्रक्षायोगिनी चेषा कचित्‌ स्यद्ेककालगा ॥ 
| १ । अप्रस्तुत यदि केवल विरोषर्णो के साम्य के आधार परप्रत्रीत दहो ओर वहः प्रस्तुत पर 


अपना व्यवहार आरोपित केर अप्रधान रहा आए 
( २ | तो यह समासोक्ति अलंकार माना जाता है क्योकि यहो अप्रस्तुत वृत्तान्त के आरोप के 


साथ प्रस्तुत संक्षेप मँ कदा जाता है । 
[ ३ ] यदि विह्लेष्यांद्य का साम्यमभी हो ओर अप्रस्तुत विद्ेष्य प्रस्त॒तके रूपमे रूपितदह्यो तो 


वहां रूपकारुकार होता हे । 

[ ४ ] यदि विङेषणांडा का साम्य हौ ओर उसे अप्रस्तुत अर्थगम्य हदो तो समासोक्ति मानी 
जाती है । समासोक्ति नाम इप्क्िय कि इसमें संक्षिप्त रूप से अर्थो का कथन रहता हे । 

[ ५ ] इस हों केवल काये का समारोप रहता दहै तो साम्य ओपचारिक माना जाता है, 


वस्तुतः ह्सका साक्षात्‌ प्रयोजक व्यवहार का समारोप रहता है । 
[ & ] विश्चेषण का साम्य यदि अन्य समासके सदहारेहो तो समासोक्ति को एकटैदाविवर्तिनी 


उपमा नदीं वाधती । 
[ ७ ] यह अर्थान्तरन्यास मेँ भी कमी समथ्यंगत ओर कमी समथकगत रहती है । वदी यह 


उत्प्रेक्षा में मिरी रहती है, ओर कीं उत्प्रेक्षा के साथ साय प्रतीत होती हे। 
[ स्वेस्व | 
[ 8० २३ | विरशेषणसामिप्रायत्वं परिकरः । 
विरोषणवेचित्यप्रस्तावादस्मेह निर्देशः । विद्ोषणानां साभिधायत्वं प्रती. 
~ । अत पव प्रसन्नगम्भीस्पदत्वान्नायं धवनैर्विषयः। पवं 
च प्रतीयमानांशस्य वाच्योन्घ्रुलत्वात्परिकर इति साथंकं नाम । 
"राज्ञो मानधनस्य काञ्ुकथ्रतो दुयोधनस्याच्रतः 
प्रत्यक्च कुखवान्धवस्य मिषतः कणस्य शाव्यस्य च | 
पीतं तस्य मयाद्य पाण्डववधूकेशाम्बराक्षिणः 
कोणं जीवत पव तीक्ष्णकर्जक्चुण्णादसखग्क्षसः ।» 
अत्र राज्ञ इध्यादौ सोत्प्रारत्वपरं प्रसन्नगर्भीर्पदत्वम्‌ । 
पवम्‌- 
(अङ्गराज सेनापते राजवछ्म द्रोणोपहासिन्‌ कणं, सांप्रतं रक्षैनं 
मीमाद्‌ दुःचासनम्‌' इत्यादौ ज्ञेयम्‌ । 


परिकरालङ्कारः ३७५ 


[ सू० ३३ ] विदोषर्णो की साभिग्रायता परिकर [ कहराती हे ] ॥ 
[ चृ | प्रकरण विशेषण के वैचित्यका है इसक्ि९ इसे यह रखा जा रहा. है । विद्धोषर्णो 


की साभिप्रायता अथात्‌ उनका प्रतीयमानां से गित रहना [ च्सका अथं केवर इतना ही 


हे फि ] याँ विदेषण प्रसन्न के साथ गम्भीर भी रहते है [ अर्थात्‌ प्रधानता उन्दीं की रहती है ] 
अतः इसे ध्वनि का विषय नदीं माना जा सकता । श्सीकिए इसका परिकर नामभी सार्थक है 
वरयोकि इसमें प्रतीयमान अथं वाच्य अंके प्रति [ परिकर = सामयी, दास की नाई ] उन्घुख 
रहता हं यथा- 
शस राजा, मानधनी ओर [ निहत्ये नहीं, हाथ मे ] धनुष किणि दुयोधन के सामने, इसी 
प्रकार कौरवं के बन्धु वने कणं ओर श्य के अपनी आंखों से देखते-देखते भने आज उस, 
पाण्डवां की वधू [द्रौपदी ] के केश ओर वख खीचने वाले [ दुद्शासन ] के तीते नाखूनों से 
विदारित वक्ष से निकला खून उस्तके जीते जी पी ख्या) [ वेणीसंहार ] 
यहो राजाः आदि [ विदेषण ] म उपहास-[ सोत्परासत्व ]-परक प्रसन्नगंमीरपदत्व हे 1 
दसौ प्रकार “अरे अङ्गदे के राजाः अरे [ कौरव ] सेना के पत्ति, अरे राजाके प्रिय, अरे द्रोण 
चा उपहास करने वाके कणै, अव वचा इसत दुरशासन को मीम से, [ वेभीसंद।र ] इत्यादि स्थलं 
मे भी जानना चाहिए । 
विमरिनी 
विोपणे्यादि । इदेति समासोक्स्यनन्तरम्‌ । विशेषगानां चात्र बहुस्वसेव दिवक्ितम्‌ । 
अन्यथा द्य इष्टांस्य दोषस्वाभिधानात्‌ तन्निराकरणेन स्वी तस्य पुष्टर्थस्यायं विषयः 
स्यात्‌ । एवमेवंविधानेकविशेषणोपन्यासद्वारेण वै चिज्यातिशयः सं मवतीस्यस्यारंकारस्वस्‌ । 
प्रतीयमानाथंस्य वाच्योन्घुखस्वेन प्राघान्याभावाद्रभींकारस्तदन्तःृतस्वम्‌ । अत प्वेति 
प्रतीयमानार्थस्य प्राधान्याभावात्‌ । प्रस्रवं वाच्यस्यैव प्राधान्येन नि्दैलात्‌। गम्भीरस्वं 
प्रतीयमानस्याप्यथेस्य वुणीभावेन ग्भीकारात्‌ 1 यन्न च प्रतीयमानं प्रति उपसजैनीक्तस्वा- 
थयोः शब्दाथयोरवस्थानं स ध्वनेर्विषय इति ध्वनिधिदः। यदाहुः--'तस्परावेव शब्दार्थो 
यत्र व्यङ्गय प्रति स्थितो । ध्वनेः स एव विषयः इति। अत्र च न तथास्वमिध्युक्तं नायं 
ध्वनेविंषय इति । अत एव नामाप्यस्य योगिकसिव्याह--एवं चेव्यादि । सोत्प्रासत्वपर- 
मिति । तथाच राज्तो जगद्‌ रदितभ्यसस्य पुनरनुजमान्ररत्तगासिद्धेरन्यदेव नाममात्रेण 
राजत्वमिस्युपदासपरस्वम्‌ । षुवसन्येवामपि स्वयमेव तद्‌ वगन्तव्यम्‌ । लादिशब्देन 
ध्यस्येकस्यैव दोष्णां जयति दुलशती सान्वयो द्वारि रदः 
कारागारे सुराणां पतिरपि च शची चामरभ्यग्रहस्ता। 
कन्या तस्येयमेका रजनिचरपतेरेष शड्धान्तमेको 
बाखो निःङ्कमस्याः प्रदिक्षति च नमस्ते से वैष्णवाय ॥” 
दप्यादावपि विशेषणानां प्रसन्नगस्मीरस्वं ज्तेयम्‌ । 
वशेषण इत्यादि । इह = यहा अर्थात्‌ समासोक्तिव।द । यदो विशेषणो का अनेक हौ दोना 
अपेक्षित हे । नदीं तो, 'अपुषटा्थक [ विद्ेषण पद] को दोष कहा गया है, उसके निराकरण से 
माद पुष्टाथकता का यह विषय होगा । इसके विरुद्ध एसे ही [ पुष्टाथक ] विद्नेषणों की संख्या 
अधिक रहती है तो उसते [ वाक्यां मेँ ] अत्तिशय विचित्रता निष्पन्न होने र्गत है, अतः य॒ 
अल्कार का विषय बन जाता है। प्रतीयमान अथं वाच्य के प्रति उन्मुख रता ३, अतः उसका 
प्राधान्य नदीं रहता, अतः उसका जो गभीकार है वह वाच्य के भीतर दवा रहता है । (अतएव = 
इसीलिए" अथात्‌ प्रतीयमान अथं की प्रधानता न रहने से, प्रसन्नष्व इसङ्थ कि वाच्यका 


^ = ऋ 


३७द अटङ्कारसवंस्वम्‌ 


ही निदेश प्रधानरूपसे रहता है। गम्भीररव इसलिए कि प्रतीयमान अथंभी [ वाच्यम ] 
अप्रधान होकर छपा रहता है। इसके विपरीत जहाँ प्रतीयमान अर्थंकेप्र्ति शब्द ओर अर्थ 
अप्रघान वनकर रहँ वह ध्वनि मानी जाती है-एेसा ध्वनिवादी आचार्यो का मतहे। जैसा 
[ आनन्दवधैनाचा्यं ने ] कदा दै-- 

“ध्वनि का विषय वही माना जाना चारिण जहाँ शब्द ओर अथ॑ व्यज्गया्थके प्रति तत्पर 
होकर ही स्थित, 

इसी कारण इस [ अलंकार ] का नाम मौ यौगिक है यद कते हुए छिखते है- (एवं चः 

इत्यादि । सोध्प्रासत्वपरमर्‌ = [ रारदाङ्पि की प्रतिमे यही पाठ है |--उपहासपरक = "जो 
राजाहो उसेतो रक्षा पूरे जगत्‌ कौ करनी चाहिए, यह तुच्छ ेसा है कि अपने ही छोटे भाई 
व रक्षा करने मँ सफ़ल है, इसका राजत्व तो ओर ही कुछ है, केवल नाममात्र का राजत्व 
है--इस प्रकार उपहासपरक है यह । इसी प्रकार अन्य विदोषण भी उपहासपरक है। उनकी 
उपहसपरकता स्वयं जान लेनी चाहिए । आदि राब्द से- 

जिस [ सहस्व।ह ] कौ अपनी ही हजार भुजार्पँ उक्छृष्टतम पराक्रम से युक्त है, जिसके दार 
पर भगवान्‌ रद्र अपने परे परिवार के साथ खड़े रहतेदै, जिसके कारागारमें देवोंका पति 
इन्द्र विड़ा हे ओर [ उसकी पत्नौ ] रची हाथ मेँ चमर लेकर जिसके ऊपर इलाती है, उसी राक्षप्त 
राज कौ यह एक ही कन्या है ओर उसके शुद्धान्त ( रनिवास् ) मे यह एक अकेला वालक निःराक 
प्रवेद करता जा रहा है । सचमुच भगवान्‌ विष्णु के तेज को नमन है ।' 

--इत्यादि मे विरोषणों की प्रसन्नता ओर गम्भीरता जाननी चाहिए । 

विमश :--परिकर करा निरूपण पहिली वार शद्रट के काव्यालङ्कार मे भिल्ता हे। भामह, 
दण्डी, वामन ओर उद्धर मे इसकी कोई चचां नदीं दै। रुद्रटने परिकरका लक्षण इसप्रकार 
किया है- 

“साभिप्राये सम्यग्विदोषणैव॑स्तु यद्‌ विरिष्येत । 
द्रव्यादिभेदभिन्नं चतुविंधः परिकरः स इति ॥ ७।७२ 

- द्रव्य युण, क्रिया तथा जाति रूप चार्‌ वस्तु जव साभिप्राय विदोषर्णो से ठीक-ठीक विरिष्ट 
कीजाएतौ [ चार वस्तुओं मेंस एक-एक वस्तु के आधार पर ] चार प्रकार के परिकर होते हे । 
उदाहरण 

द्रव्यपरिकर--'उचितपरिणामरम्यं स्वादु गन्धि रवयं करे पतितम्‌ । 

 फलमुव्छज्य तदानीं ताम्यसि सुग्धे सुषेदानौम्‌ ॥ 

-उचित परिणाम (पाक ) से रम्य, स्वादु, सुगन्धि जपने आप हाथमे आ भिरे फलको 
छोड़कर हे सुग्धे ! तू वथा ही व्यथित हो रही है।' ( यहो फल के विशेषण अनेक हैँ भौर साभि- 
प्रायं । फल द्र्य है अतः यह द्न्यपरिकर हआ )। नमित्ताधुने फल्को जात्तिवाचक मान 
वेणीसंहार का कत्तं द्यूतच्छलानां" प्य उदाहरण के रूप में प्रस्त॒त किया है। सव॑स्वकार का 
^राज्ञो मानधनस्य" प्य उसका टीकर समानाथीं प है । इसमें दुयोधन एक ब्यक्ति है अतः उसका 
वाचक ब्द द्रन्यवाचक शब्द है । उस्तके विशोषण द्रव्य के विशेषण हाने से यहाँ दरव्यपरिकर हआ । 

युणपरिकर - कार्येषु विष्नितेच्छं विदितमदहीयोऽपराध्तंवरणम्‌ । 

अस्माकमधन्यानामाज॑वमपि दुलमं जातम्‌ ॥ 

- कायो में श्च्छा विल्नित करने वाखा, बड़े सेव्डे अपराधकाभी संवरण करने वाला 
आजव ( सीध।पन ) भी हमारे दुर्माग्य से दुलभ हौ गया । यहाँ आजव युण है ओर उस्म मनेक 


साभिप्राय विद्रोषण जोड़े गए है । 


परिकरालङ्कारः ३७७ 


क्रियापरिकर-'सततमनिदैतमानसमायाससहखसंकटक्रिलष्टम्‌ । 

गतनिद्रमविश्वासं जीवति राजा जिगीषुरयम्‌ ॥ 

-- यह विजयेच्छु राजा सदा ही अदान्त चित्त हो सदरस्लो आयासं के संकर से क्लेदरा मे पड़ा 
प्रजागरन्यथित हो, विना कि्तीका विश्वास किट जीता हे! यहाँ 'जीनाः क्रिया के अद्रान्त- 
चित्तता आदि अनेक साभिप्राय विदोषण हे अतः यह परिकर क्रियापरिकर इमा । 

जातिपरिकर-अत्यन्तमसहनानासुरुराक्तीनामनिन्नवृत्तीनाम्‌ । 

एकं सकले जगति स्पृहणीयं जन्म केसरिणाम्‌ ॥ 

-- केवर सिका दी जन्म एक रेसा जन्मरहै जो स्पृहणीय है, जो अत्यन्त असहनराक्ति; 
अत्यन्त बलशाली ओर अपराधीन रहते है । यहो सिह जातिवाचक शब्द है अतः यहो जाति- 
परिकर हुआ । 

नमिसाधु ने यद्य मव्ृहरि का क्ररः काणः खज्जः प्यमभी उदाहरणके रूपमे प्रस्तुत 
किया है, जो स्यन्त उपयुक्त है । रद्रट के इतने महत्वपूण ओर ॒विश्यद विवेचन को मम्मटने 
संक्षेप में इस प्रकार प्रस्त॒त किया- 


(~ = _ =, [२ 


सम्मट = 'विशोषणेय॑त्‌ साकूतैरुक्तिः परिकरस्तु सः । 

--अनेक साभिप्राय विशेषणो के साथ विदेष्य का कथन परिकर कदलाता है । उदाहरण के 
रूप मे दिया है किराताजनीय का- 

महौजसो मानधना धनाचिता धनुभैतः संयति लन्धकीत्तंयः । 

न स्हतास्तस्व न भिन्नवृत्तयः प्रियाणि वाज्छन्त्यञ्भिः समीहितुम्‌ ॥7- यदह पय 
यहाँ धनुधेर वीरां को महान्‌ ओजस्वी आदि अनेक विद्दोषणों से युक्त बतलाया गया 
हे । अन्त मं मम्मरने अपुष्टाथैत्व दोष के अभावमें परिकर के जन्तव की संमावना कर उक्षा 
परिहार इस प्रकार किया ३- 

'यदप्यपुष्टाथंस्य दोषताभिधानात्‌ तन्निराकरणेन पुष्टाथस्वीकारः कृतः तथाप्येकनिष्ठत्वेन बहूनां 
विद्ोषणानामेवसुपन्यासे वेचित्रयमित्यलंकारमध्ये गणितः । 

विमरिनौकार ने इन्दी पंक्तियों को तनिक से रूपान्तर के साथ परिकर-विमर्दिनी के प्रारम्भ 
मे उदप्रत कर मम्मटरके इस सिद्धान्तको मानचियादहैकि साभिप्राय विदोषणों की अनेकता 
दोषाभाव से आगे आलकारिक चमत्कार तक व्याप्त वस्तु है। 

निश्चित दी अल्कारसवस्वकार ने रद्रट ओर मम्मट के केवल साभिप्रायत्वं का व्य॑ग्यार्थं से 
संबन्ध जोड ओर परिकर शब्द्‌ की अन्वथैता की सिद्धि कर परिकर-विच।र को पर्याप्त पुष्टि दीहै। 

शोभाकर अलकाररत्नाकरकार ने सवेस्वकारकामतज्योकात्यों स्वीकार कर ल्या है, 
उनका विवेचन इस प्रकार है- 

[ सूत्र = विशेषणानां ] साभिप्रायत्वं परिकरः । 

[ वृत्ति = । साभिप्रायत्वं प्रतीयमानार्थगभंता । तस्य च प्रतीयमानस्य वाच्यं प्रत्युपस्कारकत्वाद्‌ 
गुणीभूतत्वेनालद्कायेत्वाभावाद्‌ अलंकारता । वाच्यस्यैवोपस्कार्य॑तवेन प्राधान्यादलंकार्यता । य॒त्र तु 
वाच्यस्य व्यडग्याथपयेवसायितया व्यङ्ग्यस्य प्राधान्यं न व्यङ्ग्यग्भ॑ता स ध्वनेविषयः | 

- विशेषणो की साभिप्रायता परिकर ) साभिप्रायता अर्थात्‌ प्रतीयमानां से गित होना । 
यह प्रतीयमान अथं वाच्य के प्रति शुणीभूत होता है क्यो कि वह वाच्य का उपस्कारक दोता है, 
ओर इसीक्िए अर्काय नदीं होता फलतः अलेकार कहलाता है । उपस्कायं वाच्यां ही होता है 


३७८ अल्क(रसवंस्वम्‌ 


श्सिए वह अल्काये होता हे । जा वाच्य व्यङ्ग्य के प्रति समर्पित रहता है वद्य व्यंग्य प्रधान 
रहता हैन कि वाच्य मेँ गमित, वदाँ ध्वनि होती है। 

ण्डितराज जगन्नाथ ने दोभाकरक्रत परिकर ही परिकर के लक्षणकेसूपरमे अपना खिया 
हे विशेषणानां साभिप्रायत्वं परिकरः । साभिप्रायत्व का अ्थंमी उन्द्‌) ने-श्रक्रता्थांपपादकचम- 
त्कारिव्यङ्ग्यकत्वः किया है। ` 

अप्पय्यदीक्तित ने परिकर का कोर स्वतन्त्र लक्षण नदीं दिया इ । चन्द्रलोक का "अलंकारः 
परिकरः साभिप्राये विशेषे, यह पूर्वाचार्य के परिकर-लक्षणका समानार्थौ लक्षण ही उन्दोनि 
स्वीकार कर छ्य है । किन्तु दीक्षितजीने एक नवीन प्रन उणाया है। वहु यह्‌ फि जहां 
मम्मट ओर विमरिनीकार ने स्यष्टर्पसे तथा रद्रट, सर्॑स्वकार तथा रोमाकर ने अस्पष्ट रूप 
परिकर में पिरोषणों की अनेकता पर बल द्विया था वहां अप्पय्यदीश्चित ने श्सके विरुद्ध केवल एक 
विदेषण की सामिप्रायता मेँ भी परिकर को अलंकार मानते की पहल की है । उनका आधार 
चन्द्रलोक के उक्त लक्षण म आया विद्धेषण चान्द का एकवयन है! श्त पक्ष का प्रतिपादन क्रते 
इए दीक्षित जी ने कुवल्यानन्द मेँ छ्िखिा है- 

'अनेकविरेषणोपन्यास एव॒ परिकर इति न नियमः । इकेषयमकादिषु ००० एकस्यापि वि 
पणस्य साभिप्रायस्य विन्यापसे विच्छिन्निविदोषतद्धावात्‌ परिकरत्वोपपत्तेः ° (अपिच एकपदाथंहेतुकं 
कान्यलिङ्गमरंकार इति सवंसम्मतस्‌, तददेकस्यापि विशेषणस्य सामिप्रायस्यालकारत्वं युक्तमेव? । 

यह आवदयक नहं कि अनेक विशेषणा के भाने पर ही परिकर अलंकार माना जाय। 
साभिप्राय विेषण केवल एकमभी दहो किन्तु उक्से चमत्कार प्रतीति द्य रहीदहोतो वर्ह भी 
परिक्ररारुंकार माना जा सकता है । दलेष, यमक आदि पँ वैप्ी प्रतीति द्येती भीहै। प्क तथ्य 
यह भी ध्यान देने यौग्यहेकि केवल षक पदाथ॑के हेतु होने प्र्‌ काव्यल्गि को सर्व॑संमत्ति से 

भल्कार माना जातादहै। इसी प्रकार एक साभिप्राय विलचेषणते परिकिरको भौ अलकार मानना 
ठीक दी हे। पण्डितराज जगन्नाथ ने मी अप्पय्यदीक्षिति के इत मतको मान लिपराहै। उन्डोनि 
ङ्ख है- 

(विरेषणनेकलवं हि व्यङ्गयाधिक्याधायकत्वाद्‌ वैचित्यिद्धोषावायकमस्तु नाम, न तु प्रकृता 
लकार दारोरं तदेवेति दाक्यं वक्तुम्‌ , एकस्यापि विरोषणस्य चमत्कारिताया अनपहवनोयलात्‌ 

-- विशेषण की अनेकता से व्यङ्ग्यकीमात्रा वद जाती है अतः वह वैचित्यं मेँ अधिकता 
मले ही छादे, यह नदींकि वह परिकर का शरीर मानी जाने लगे । क्योकि केवर एक विदेषण 
मे मी चमत्कार रता है इते अस्वीकार नदीं किया जा सकता रेखा मानने पर ुष्टाथताल्प्‌ 
दोषामाव से परिकर को पृथक्‌ करना कठिन हौ जाता है । पण्डितराजने इतत पर ये युक्तियाँ 
प्रस्तुत को है- 

[ पुष्टाथतारूपेण द्योषाभावेन परिकरालक्कारध्य विषयविभागो दुःशक इति प्राप्ते नुमः] --“सुन्दरत्वे 
सत्युपस्कारकत्वमलद्कारत्वम्‌ › चमक्तारापकषकाभावत्वं च दोषामावत्वम्‌ । तदेतद्‌ धर्मदयं विविक्त- 
विषयं यदि देवादेकस्मिन्‌ विषयविशेषे समाविशेत्‌ तदा का हानिः स्यात्‌, उपधेयसंकरेऽप्युपाध्य- 
संकरात्‌ । यथा ब्राह्मणस्य मूखत्वं दोषः, विया त॒ दोपाभावश्च मवत्ति गुणश्च तयेदाप्युपपत्तिः। न 
च दोषामावतया प्राप्तस्यापि परिकरस्य किमित्यरंकारेषु गणनागौरवमिति वाच्यम्‌ , उभयात्मकत्वे" 
नेतरवेलक्षण्यज्ञापनार्थतया गणनोपपत्तः, यथा गुगीभूतन्यड्ग्यमेदतया संगृहीतायि समापतोक्तिर- 
ङंकरारगणनायां पुनर्भण्यतते, यथा वा प्रा्तादवासिषु गणितोऽप्युमयवाप्ती भूत्ाक्षिगणनायां पुन“ण्यते 
तथेहापीति न कश्चिद्‌ दोषः । अन्यथा प्राचां काव्यलिङ्गमप्यल्कारो न स्यात्‌, तस्यापि निहंतुरूपः- 
दोषाभावात्मकत्वात्‌ । 


परिकरालङ्ञारः ३४९ 


-अलंकारत्व हे खन्दरता के साथ उपस्कारकता ओर दोषाभाव है चमत्कार के अपकषकत्चौ 
का अभाव । अल्ग अलग क्षेत्र के ये दोनों तत्व यदि एक दही क्षेत्र मे आ जार्दँतो कोई हानि 
नदीं । क्योकि इनके मिलने पर भी इनकौ विेषतार्दँ भिन्न ही होगी । उदाहरण कै रूप ते जेते 
ब्राह्मण के किए मूखंता दोष हे ओर विद्या मूखंतादोष का अभाव भी ओर गुण भी । वरैसा ही यहोँ 
मी माना जा सकता हे । परिकर दोषाभाव के साथ ही मलकारस्वरूप उसी प्रकार ह निस प्रकार 
समासोक्ति युणीभूतन्यग्य मी जर जकार मी, अथवा जे मवन ओर भूमि दोनों म रहने 
वाला भवन निवासी भौ माना जाता है भौर भूमि निवाक्ती मी। एसा न मानने पर प्राचीन 
आलंकारिकं द्वारा अल्काररूप से मान्य कान्यलछ्गि भी अलंकार नहीं होगा, क्योकि उसका भी 
अन्तभांव निहं तुत्वदोष के अभाव मेँ कर छलिया जवेगा | 

विश्वेश्वर ने अलंकारकोस्तुभ मेँ मम्मट ओर जयरथ, अप्ययदीक्षित ओर पण्डितराज जगन्नाथ 
सव के उक्त मर्तो को प्रस्तुत किया है। 

पदाथहेतुक कान्यलिग से परिकर को पण्डितराज ने व्यंग्यांशच को लेकर भिन्न किया है। 
कान्यल्गि मं चमत्कार, वस्तु के हेतुत्वेन प्रस्तुतीकरण पर निर्भर रहता है जव कि परिकर में 
उसके व्यग्यगमितत्व पर । 

केवर एक साभिप्राय विरेषण से निष्पन्न परिकर का उदाहरण चन्द्रालोककार ने यह्‌ 
दिया दै- ध 

-सुधांयुकलितोत्तसस्तापं हरत वः दिवः । 

-- चन्द्रचूड शिव आपका संताप दूर करे ।' यदं चन्द्र चूडत्व से शीतता व्यक्त होतीदहैजो 
तापहरण मे सहायक है । | 

सजीविनौकार ने परिकर विवेचना का संक्षेप इत प्रकार किया है 

“विशेषणानां व्यग्याथंगर्मीकरणलक्षणा । 
सोतपरास्ता परिकरो व्यङ्ग्यः परिकरो मतः ॥ 


--अनेक विशेषणा कौ व्यंग्याथं को अपने गभं म किए रहने रूप सोलासता परिकर कराती 
हे व्याकि इसमे व्यंग्याथं परिकर [ सेवक, सामथ्री ] के रूप मे विद्यमान रहता हे । 

परिकरांङर-- चन्द्रालोककार जयदेव तथा ऊतख्यानन्दकार अप्पय्यदीक्षित ने विष्य के 
साभिप्राय दोनेपर एक परिकराङ्कर नामक अल्कार मी माना है ।-- 

साभिप्राये विष्ये तु भवेत्‌ परिकराङ्करः? 

इसका उदाहरण मान। दै--प्वतुण्णौ पुरुषार्थानां दाता देवश्चतुयंजः । चतुभज देव चार 
पुरुषार्थौ का दाता है । 

यहां पुरषाथं चार हे ओर सुजा मी चार इसलिए एक एक हाथ से एक णक पुरुषाथं देने का 
तथ्य व्यक्त दता हे। विदेश्वर पण्डित के कथनानुसार उनके सवपते छोटे भाई उमापत्ति पण्डित 
इसे परिकर मं दौ अन्तभूत मानते है । उनके कथनानुसा र--चतुयंन" शब्द भगवान्‌ विष्णु कै 
अधमं रूढ है जतः "वार अजां यह अर्थ यह्‌ विष्णु का विशेषण होकर ही भासित होता है ओर 
चमत्कार उसी में है इसलिए यहां परिकरालंकार ही है। 

कचिद्‌ विशेषणं साक्षादेव प्रकृतो पकारकम्‌ , कचिन्तु प्रकृतोपकारकमर्थान्तरमाश्षिष्येतति०० विज्ञ 
व्यविशेषणोभयप्तामिप्रायत्वेऽपि परिकर एवेति त्वस्माकं यविष्ठभ्रातुरुमापततेः पक्षः 1 

--विरोषण कहीं साक्षात्‌ ही प्रकृताथ का उपकारक होता है ओर कहीं प्र्ृतोपकारक्षम किसी 
अन्य मर्थं का आक्षेप कर, इ्छिए दोनों ही स्थलों पर परिकर ही ह्येता है जहां विशेषण साभिप्राय 
रहता है वां भोर जहां विलञे्य साभिप्राय र्ता है वहां भी । 


३५० अलङ्कारसवंस्वम्‌ 
[ स्वस्व | 
[ स्र०° ३४ ] विशेष्यस्यापि साम्ये हयोर्घापादाने शेषः । 


केवङविेषण साम्यं समासोक्ताबुक्तम्‌. । विरोभ्ययुक्तविरोषणसाम्यं 
त्वधिकृव्येदञ्युच्यते । त्र द्वयोः; भ्राकरणिकयोरप्राकरणिकयोः प्राकरणिक 
प्राकरणिकयोवां शिटष्टपदो पनिबन्पे श्टेषः । तत्राद्यं प्रकारढयं विद्ेषणविन् 
्यसाम्य एव भवति । वृतीयस्तु परकाये विशोषणक्षाम्य एव भवति । विले 

भ्यलाभ्ये स्वथप्रकरणादिना वाच्या्थनियमेऽथौन्तरगतध्वनविषयः स्यात्‌ । 
आधं तु प्रकारद्यये दयोर्प्यर्थयोर्वाचयत्वम्‌ । अत पवर -हयोर्व- 
पादाने इति तृतीयप्रकारविषय्वेनोक्तम्‌ । “विदलेष्यस्यापि साम्ये इति तु 
शिष्प्रकारद्यविषयम्‌ । 
[सूत्र ३४ ] विशेषर्णो के साथ ] यदि विशेष्य क। भी साम्यहो जथवा [ समान 
विेषग वारे दोनो [ विोर्प्यो ] का इाञ्दुतः कथनहो तो [ अलंकार को] श्ेष 
[ कहा जाता है | ॥ 

[ वृत्ति ] दे वल विशेषणं का साम्य समासोक्ति मेँ बतराया गया, उप्ते मिते विरेष्य से युक्त 
विदोषणों के साम्य को लेकर बतलाया जा रहा है यह । ठेसे दो अथा का दिष्ट पदां दारा कथन देष 
कहलाता है जिनमे से दोनों हयी अथं प्राकरणिक हों अथवा दोना ही अप्राकरणिक ओर एक प्राकरणिक 
तथा एकर अप्राकरणिक । इन तीनों प्रकारो मेँपेजो प्रथमदो प्रकार दैवे तमी होते है जव विदेषण 
ओौर विष्य इन दोर्नो कादी साम्य [ द्वयथेकता ] दो इसके विरुढ जो तीसरा प्रकार है बह 
केवल विङेषणके हयी साम्यमेंहोताहै। यदि व्िजञेष्यका भी सम्य द्यो तो वह अन्य अथैका 
बोध कराने वाली ध्वनि का विषय वन जाएगा क्योकि वदँ अथगत वाच्यता प्रयोजनः, प्रकरण आदि 
से नियमित हो जाएगी [ फलतः वाच्यरदित अन्य अ्थ॑का ज्ञान ध्वनिसे होगा] । 

प्रथम दो प्रकारो में दयेनोँ ही अथं वाच्य होतेह । इसीटिण यहां द्वयोवांपादनेः- (अथवा 
दोना का शब्दतः कथन यह्‌ तृतीय प्रकार के लिका गया है ओर विरोपय में मी साम्य दो- 
यह तो रोष बचे [ प्रथम ] दो प्रकारो के लिए। 


विमर्िनी 


विकेष्यस्यापीध्यादि । श्दमिति शेषलक्षणम्‌ । भायमिति । प्राकरणिकगतस्वेनाप्राकर- 
गिकगतव्वेन च । एवकारश्चात्र भिन्नक्रमो द्रष्टभ्यः। तेन प्रकारद्वयमेवेति व्याख्येयम्‌ । 
अतश्च तृतीयः प्रकारो विदोषणसखाम्य एव भवतीति भ्यवच्छेदफरम्‌ । अन्यथा हि प्रकार- 
इयध्यास्य विदेऽय लाम्या मवेऽपि दर्छनाद्भ्याप्षिः स्यात्‌ । त्था (संचारपूतानि दिगन्तः 
राणि' इण्यादि । अन्न प्रभाघेन्वो द्वयोः प्रङ्कतयोरविंोभ्ययोः साम्या मावः। 
'भावाह्ूद्रतमण्डखाग्रश्चयः सनद्धवडःस्थराः 
सोष्माणो बणिनो विपन्तहदयभोन्माथिनः ककशाः। 
उस्सृष्टाम्बरदष्टविग्रहभरा यस्य स्मराग्रेसरा 
योधा देव वधूस्तनाश्च न दधुः छोभं स वोऽभ्याञ्जिनः ॥' 


१टेषाटङ्ारः ३५९ 


अत्र श्तनयोधयोरग्रक्रतयोर्विंशेष्ययोः साम्याभावः । विशेषणसाम्य एवेति न पुन. 
विशेष्यसाम्ये । एत््पि विशोष्यसाभ्ये किं न भवतीव्याशङ्कयाह - विशेष्यसाम्ये त्विस्यादि । 
यथा- 
“रुंकारुञाणे पुत्तअ दसंतमास्म्मि रुद्ध पसराणम्‌ । 
आपीअलोहिञाणं वीहेडइ जणो पटास्णस्‌ ॥' 
अनच्र पलाञशानामिति विज्ञेष्यस्यापि श्िष्टस्वम्‌ । परकरणवश्ाच छ विशेषणमेव वाच्य. 
स्वनियमाप्प्रस्तुतव्वेन निजश्ञाचराणामप्रस्तुतानां ष्यङ्गचत्वम्‌ । अत्र चोपमाया एव व्यङ्गयष्वं 
युः नातिशयोक्तेरिति प्रक्ृतानुपयोगादिह नोक्छम्‌ । ननु च यथेवायं ध्वनेर्विषयस्तयेवाय- 
मपि मेद्यं किं न भव तीत्याज्ञङ्कयाह-आच इध्यादि । वाच्यत्वमित्ति, अत एव न ध्वनेर्वि- 
षयः । तस्य वाच्यातिरिक्तश्व रूपत्वात्‌ । तृतीयप्रकारभिषयत्वेनेति प्राधान्यादुक्तम्‌ । आद्य 
स्यापि प्रकारद्रयस्य इयोरूपादानसं भवात्‌ । 


विशेष्यस्यापि । इदम्‌ = यह अर्थात्‌ दलेष का लक्षण । आद्यम्‌ प्राकरणिक गत तथा अप्रा 
करणिकगत । “एव = ही कहा गया है साम्य के वाद विन्तु इसे प्रकारद्वयके साथ लगाना 
चाहिए [थेदो प्रकार ही इस प्रकार ] रसा करने पर ही तृतीय प्रकार विद्दोषणके ही साम्य 
मँ होता है यह व्यवच्छेद सार्थक सिद्ध होगा । 'एव-ही" को "साम्य से मलग कर यदि प्रकार्य 
के साथ नहीं रखा गया तो प्रथम दो उन स्थल मेँ नदीं मने जा सकेगे जिनमे विशोष्य का साम्य 
नहीं रहता यथा-- संचारपूतानि दिगन्तराणि' यह [ दीपक प्रकरण मे आया रघुर्वंद्य का प्रच] 
यहां प्रमा जोर धेनु दोनों विशेष्य प्राकरणिक ओर इन्हें दिल चखब्द से न कहकर स्ववाचक पृथक्‌ 
राब्द से कहा गया है । 

"वहु जिन पकी रक्षा करे, काम के अयगामी वीर ओर अप्सराओं के स्तम्भ जिस्म क्षोभ 
उत्पन्न नहीं कर सके, जो दोनों मुजाभों तथा फैले मण्डल [घेरा वीर पक्षमें धनुषका घेरा] 
से सुशोभित ये; जिन्हं वक्षःस्थल को सन्नद्ध [ कवचादि से बद्ध, परिपणे ] कररखा था, जो गरम 
[ वीर पक्ष मे ओज, गवं ] से भरे ये जिन पर ब्रण [ धाव, रतनपक्च म नखक्चत ] बने ये, जो विपक्ष 
[ वौरपक् = शञचुपक्ष, स्तनपक्त मेँ- सपत्नी ] के हृदय के दल्ने वाले येजो कर्कडाये, ओर जो 
उत्सष्टाम्बर इ्टतियरह भी [ वीर पक्ष मै-खुले आकाश मेँ दिखाई दे रदा है विग्रह = युद्ध जिनका 
या मरने पर वीर गति प्राप्त होने के कारण आकाडामे दिखाई दे रहै, विग्र = शारीर जिनके, 
स्तनपक्ष मे--उत्तरीय छोड़ अपना पूरा शरीर दिखला रहे ] थे ।° [ का० अ० सू° बृ° मेँ वामन 
के द्वारा उद्धृत | । 

-- यहां [ प्रकृत है जिन अतः] वीर ओर स्तन दोनो अग्रक्ृतदहै ओर इन्दं किसी 
रिल्षटशब्ददारा नदीं कहा गय। है । [ वस्तुतः इन स्थलों मे देष नदीं है । मलंकार हे ठल्ययोगिता 
या दीपक |। 

विशेषगसाम्य एव = केवर विदोषणों के ही साम्य मँ यह प्रकार व्यो नदीं होता ? इस प्रदन 
पर उत्तर देते है -‹विरोष्यसाम्ये तु"-- "यदि विभ्य का भी साम्ब टो तो" शत्यादि । जेसे- 

'लकालयानां पृत्रक ! वसन्तमासे लब्धप्रतराणाम्‌ । 
आपौतलोहितानां बिभेति जनः पलाञ्चानाम्‌ ॥ 

--दे पुत्र ! कंका के वप्तन्त मेँ रुब्धप्रस्र तथा लाल-पीले पलाशं से छोग डर रहे हे ।' 

यहां पलाशचः- यह्‌ विशेष्य भौ रिलष्ट है परन्तु प्रकरण के आधार पर॒ वाच्यता केव दृक्ष 
विशेष (टेषु ) मं ही नियमित हो जाती है, क्योकि वदी प्रस्तुत हे, अतः अप्रस्तुत निदाचर ( पल= 


३५२ अलङ्कारसकवेस्वम्‌ 


# # हे च ~ 
मांस, अदा-खाने वाले ) यषां व्यंजना द्वारा प्रतीत होते है । फलतः यह ध्वनि का उदाहरण ह 
यहां उपमा को ही व्यंग्य मानना उचित है, अतिरायोक्ति को नदीं, यह विचार प्रकृतोपयोगी नदी 
हे इसलिए इसका प्रतिपादन नदीं किया गया । 


प्रदनः जिस प्रकार यह्‌ ( तृतीय भेद विदोष्यके साम्य में) ध्वनि का विषय मान लिया 
जातादै उसी प्रकार प्रथम दो भेदो को ध्वनि का विषय क्यों नहीं मान लिया जाता । ्स पर 
उत्तर देते हए छिखा-- "जाय । इत्यादि । वाच्यत्व इसीलिये यह ध्वनि का विषय नहीं होता । 
क्योकि उसका स्वरूप वाच्य से भिन्न होता हे। तृतीयप्रकारविषयत्वेन = (दोनों का शब्दतः 
कथन यद्‌ केवर ) तृतीय प्रकारके किषिही कदागया हेः यद केवर प्राधान्य को लेकर कदा 
=. यकि 3 * अ, 
गया हे व्याक प्रथम दोन प्रकारो मेँ मी दोर्नो का पृथक्‌ उपादान संमव दे । 


[ सवसव | 
क्रमेण यथा-- 
भयेन ध्वस्तमनोभवेन बलिजित्कायः पुराखीकृतो 
यश्चोद्‌ वत्तथुजंगहारवलयो गङ्गां च योऽधारयत्‌ । 
यस्याहुः शरिमच्छिरोहर इति स्तुत्यं च नामामराः 
पायात्त स्वयसन्धकक्षयकरस्त्वां सद॑दोमाधवः ॥' 
'नीतानामाङठीभावं लुब्धेभूरिशिली्रलेः। 
सरो वनचद्धानां कमलानां तदीक्षणे ॥ 
स्वेच्छो पजातविषयोऽपि न याति वक्तं 
देहीति मागेणश्यतेश्च ददाति दुःखम्‌ । 
प्रोह्ात्लमाक्षिपति जीवितमप्यकाण्डे 
क्रं मनोभव दवेश्वरदुविदग्धः ॥ 
अत्र हरिहस्योद्वयोशपि प्राकरणिकत्वम्‌ । पञ्चानां स्ुगाणां चोपमानःवाद्‌- 
प्राकरणिकत्वम्‌ । ईश्वरमनोभवयो; पराकरणिकाध्राकसणिकत्वम्‌ । पवं च 
वदार्थोभयगतत्येन वतेमानत्वाल्तरिविधः । वत्रीदात्तादिस्वर्मेद्‌स्प्रयलभेदाच 
राब्दान्यत्वे शाष्दश्ठेषः। यत्र ध्रायेण पद्भज्ञो भवति । अथकेषस्तु यत्न 
स्वरादिमेदौ नास्ति । अत एव न तन्न सभङ्गपदत्वम्‌ ! सलकलटनया तूभय 
बटेषः। यथा- 
रक्तच्छदत्वं विकचा वहन्तो चाट जलेः संगतमादधानाः । 
निरस्य पुष्पेषु खचि समय्रां पञ्चा विरेञ्चः श्रमणा यथेव ॥ 


अत्र र्तच्छद्त्वमित्यादाव्थश्टेषः। नालठमित्यदौ राञदशढेषः । उभयः 
घटनायाश्रुभयग्र्तेषः । ब्रन्थगौरवभयात्तु प्रथ ठ्‌नोदा्टतम्‌ । 


क्रम ते [ एक एक के उदाहरण ] यथा-( दोना प्राकरणिक अ )- 
संस्कृत का धेन ध्वस्त” यह पच । ( श्समे दो समानान्तर अथ॑ निकल्ते है, एकं रिवपरक 


जर दूसरा विष्णुपरक । दोनो मेँ से प्रथम शिवपरक अथै इस प्रकार है- 


श्ठेषालङ्ारः ३५३. 


--[ शिवपरक अथं |--जिन्दोने काम को ध्वस्त किया है, जिन्होँने एक बार ( त्रिपुरवध के 
समय ) विष्णु के शरीर कौ अल्ञ बनाया था, जो फनफनाते सर्पो के हार ओर ककण पहने रहते 
है, जिन्होंने ( स्वगे से गिरती ) गंगा को धारण किया था, देवगण जिनके सिर को चन्द्रमा से युक्त 
कहते, तथा जिनका इरः यह स्तुत्य नाम पुकारते है रेसे अन्धकासुर के निहन्ता पावेती प्रिय 
स्वयं भगवान्‌ कर आपकी रक्षा करे । 

[ विष्णुपरक] जो अजन्मा है ओर जिरन्होने शकटासुर को ध्वस्त किया है, जिन्होंने अपना बङ्ि को 
जीतने वाला ज्ञरीर [ अग्रत वाटते समय मोहिनी अवतारमें ] स्री रारीर बना दिया था, जिन्होंने 
फनफनाते [ काल्य ] सपेका दमन किया, जो चक्रको धारण किए दहे, जिन्न [ गोवधेन ] 
पर्व॑त ओर [ पाताल गईं ] पृथिवी कौ धारण किया, देवलोग जिसका °राहृरिरोभंजकः यह स्तुत्य 
नाम छेते वे अन्धकवंशको [ दवारकाम] वसाने वाले ओर उसके विनाश करने वाके, 
स्व॑स्वदाता स्वयं भगवान्‌ विष्णु आपकी रक्षा करे । 


[ ये दोनो अथ इस पद के शब्दो को तोडने से निकलते है । यथा रिवपक्च म ध्वस्तमनोभव = 
ध्वस्त फिया मनोभव कामको जिसने, विष्णुपक्ष मे ध्वस्तम्‌ अनः अभवेन = जिसने अन = राकट = 
दकटासुर को ध्वस्त किया है तथा जो अजन्मा है। बलिजित्काय = बकिजित्‌ = विष्णु, वज्िको 
जीतने वाला शारीर, पुरास्वरीकरत = रिवपक्ष मे पुरा अस्रीक्रृत, विण पण०्मे पुरा खलीकृतः, उद्ट्त्त 
भुजंग्षारवल्यः = शि ० प० में- उद्वृत्त भुजगो के हार ओौर वरूयवाङ़े अथवा अ = विष्णु उनका 
रव = नाम उस्म ल्य है जिनका, वि० प° मेँ = उदूढत्त युजंग के हा-- “मारक? भरवङ्य = चक्र. 
तद्वान्‌ , शिवपक्ष मे = र॑गां = गगाकौ विष्णुपक्ष मँ = अगं गां = पवेत तथा पृथिवी को, रारि- 
मच्छिरोहर = ि० प० मे--शिमान्‌ दिर वाले, तथा हर शस नाम वाले, वि° प° मे-शशी 
को मथने = सनेव राहका शिर हइरने वाके, अन्धकक्षयकर = शि० प० मं--अन्धकाडर का 
क्षय विनाश्य करने वाले, विण प्र० मैँ--अन्धकवंश्च के किए क्षय = निवास्स्थान उसका वनाने वाले 
तथा उसका क्षय = विनाश करने वाके, सवदोमाधव = शिण पण पँ सवेदा उमाधव = उमा के पति 
दिव, वि० प० मँ-सवदः = सवङुछ देने वाला, माधव मा = लक्ष्मी के धव = पति = विष्णु । | 

[ दोनों अप्राकरणिक अथ यथा ]-- 

“नीतानामाक्लीमावम्‌” यह प्य । [ इसमे दो अथै निकर्ते है १-प्द्परक, ई-इरिणपरक । 
प्रथम के पक्ष में इलोक अथं दोगा-- ] । 
'उसवे नेत्र अनेक छन्ध मौर से आक्र भोर पानी मे उग कर वदे कमलं के समान हे ।' 

दूसरा पक्ष--उसके नेत्र अनेक वाण वाले बहे दारा आङ इष जंगली दहिरणों [के 
नेतरो ] के समान हँ । 

[ कमल पक्ष = ढन्य = लोभी, रिलीमुख = भमर, वन = जर, कमलन्पद्च । हरिणपक्ष = छन्ध= 
बहेङिया, शिलीयुख = बाणः, वन = जगल, कमल = हिरन-- | 

[ एक प्राकरणिक ओर एक अप्राकरणिक अर्थ, तथा विशेषण ओर विशेष्य दोनों का शब्दतः 
कृथन-- यथा ]--स्वेच्छीप०ः पद्य का यह्‌ अ्थ-- 

वेद की वात है कि नासम्च स्वामी काम के समान होता है जो स्वेच्छोपजातविषय | भ्रमु = 
अपनी इच्छा भर विषय = धनधान्यादि, काम = अपनी श्च्छा के अनुसार विषय = खी आदि] 
पाकर मी मा्गणदत के द्वारा [ प्रभ = सेको याचको द्वारा ] देदीतिः [ प्रथु = देहि = दीजिण 
इति ेसा ] कहा नदीं जाता, भौर दुःख देता है [ काम भी मार्गणङ्चत=सेकड़ बार्णो के दारा दुःख 
देता 8 ओरं देहीति = देही = शरीरो आत्मा नहीं कषा जाता ] भौर मोह से [ रथ नासमक्षी से; 


२३ अ० ख 


२५७ अल्ङ्ारसवंस्वम्‌ 


काम = मूच्छ से] जीवित को [ प्रभु'जीविका को, कामनचप्र्णां को] मी एकाएक नेष्ट कर 
| । 

ध प [ तीनां पयो में ते प्रथम परय] में चिव ओर विष्णु दोनों प्राकरणिक दे [ द्वितीय 
प्य मेँ ] पञ्च ओर मग दोनों उपमान दै इसङ्िर अप्राकरणिक है [ जर तीसरे पथ में] स्वामी 
प्राकरणिक है ओर काम अप्राकरणिक । | | 

यह राब्द, अथ ओर दोनांँ मेँ रहता रहै, इसछ्िएट तीन प्रकारका होतादहै। इनमे शब्दका 
दटेष वह होता है जिसमे उदात्त आदि स्वर का अन्तर पड़ जाता है फलतः [ उच्चारण के] 
प्रयत्न मँ अन्तर आ जाता है अतः खब्दमभी कदल जाताहे। यहां प्रायः शब्द दूरता है। अर्थ 
दलेष वहां होता हे जहां स्वर आदिकामेद नदींदहदोता। इसीकिर इसमे रब्दँमे भङ्ग (टूट) 
नहीं रहता । उभयदल्ेष होता है इन दोनो के एकत्रीकरण से । 


यथा-- 
पद्म ठीक वैसे दी सशोभित द्यो रदैये जसे श्रमण। क्योकिवेलालवणैके छद्‌ ( पड़ी ) 


धारण यि हृएये [ श्रमण मी लार वणे का छद = कन्था धारण करते दै ], वे विकच [ खिले हुए 
धे, श्रमण भी कच = वेशो छे रदित = विकच = युण्डित सिर होते दै ] जलो म संगत = षी 
नाको धारणकिए हये ओर श्रमण मी जड़ व्यक्तियों का भधिक साथ नहीं करते = [ जलेषु = 
जडेषु जलम्‌ = अधिक, संगतम्‌ = साहचर्यं न दधानाः ] [ अन्य ] पुष्पों की संपूरणं रुचि निरस्त 
कर चुके थै । [श्रमण भी पुष्प खी या पुष्पधन्वा कामकी संपूण रुचि = चाह समाप्त कर 
देतेहे]। 

५५४ -रक्तच्छदत्व आदि [ आदि पद से विकचत्व, पुष्परुचिनिरसन ] मे अथदलेष है ओर 
नालः भादि [आदि शाब्द | गँ [नाक तथान अलम्‌ ; जल तथा जड़ इस शब्दभेद होने 
से । शब्ददकेष हे । क्योकि यहां दोनों एक ही वाक्य मेँ भिरित है इतछिर यहा उभयदलेष हुभा । 
तीनों के उदाहरण भलग-अलग नहीं दिए न्थ कलेवर वदने के भय से । 


विमश्चिनी 


` एष इति त्रिविधोऽपि श्टेषः। तत्रेति त्रयनिर्धारणे । यत्रेति शढदृश्रेषे । अत एवेति 
स्वरादिभेदाभावात्‌ । संकलनयेति सभङ्गास भङ्गपद्समेखनया । पएरथगिति भेदेन । ^ 
शब्दशरेषो यथा 
ति गच्छन्ति महापदं भुवि, पराभूतिः सश्चते 
तेषा, तेः समलं निजङल, तैरेव खभ्धा क्सितिः । 
तेषां द्वारि नदन्ति वाजिनिवहास्ते भूषिताः प्रसह 
ये दृष्टाः परमेश्वरेण भवता तुष्टेन रेन वा ॥ 
अन्न पदानां सभङ्गत्वं स्पष्टष्‌ । अर्थश्छेषो यथा- 
इच्छन्तौ चिबुकाम्रचुम्बनमथो होथित्यशष्कोज्छ्ितो 
नेविडयेन परस्परस्य न सनाकं नापि कभ्धान्तनै । 
धन्यौ तौ तकणीध्तनाविव न यौ स्वप्नेऽपि विशिकिष्यतो 
विश्टेषं विषमं विषह्य भवतो नाधोश्चुखौ जातु वा ॥ 
जन पदानामसभङ्गष्वं स्पष्टम्‌ । संकलनया तु मन्थङृतेवोदाहतम्‌ । भस्य च शऽ्दा- 
ाश्रित्वादुभयाठकारतां दक्च॑यति -अलकार्येत्यादिना । 
एष = यह भात तीनों प्रकार का इ्ठेष । तन्न तीनो मे । य॒त्र = जँ अर्थात्‌ श्ब्दश्छेष मेँ । 
अत एव = इसौिए अथात्‌ स्वरादि का मेद न होने से । प्ंकलनया = एकत्रीकरण अर्थात्‌ सभङ्ग 


| = ` क चा ता 


इटषाट्ङ्ारः ५ ५१ 


पद एवं अभङ्ग पद के भिश्रण से। पथक्‌ = अलग-अलग = अथात प्रत्येक का उदाहरण भिन्न 
करे । भिन्न उदाहरण इस प्रकार है- 

आप परमेदवर है । आप जिस पर प्रसन्नयारुष्ट होते हेः वे महापद [ महान्‌ उच्च पद, 
महा आपद्‌ यापत्ति ] को प्राप होते है, प्रथिवीमण्डल पर उनकी पराभूति [ परा = उक्छृष्ट भूति = 
त्रेमव, पराभूति = पराभव ] होती है, वे अपने ल को समक्त [ सम्‌ = सव प्रकार से अलंकृत = 
ोभित, समलं = मकसदित कल्कित | कर देते दैः वे ही क्षिति [ पृथिवी क्षय को पा क्ते हे, 
उनके दरवाजे वाजिनिवह [ वाजि = घोडा के निवह ससुदाय, वा = या आजि = युद्ध = निवह |] 
गरजते दहै, ओर वे ही प्रतिदिन भूषित [ अलक्तः भू = पृथ्वी पर ससित = पड़ इए ] रहते हें ।' 
यँ पदो मे भङ्ग है । 

अर्थंदलेषप यथा ` 

वे [ दम्पती ] धन्य है तरुणीस्तन के समानजो सदा दही चिबुकाग्र [ उडी के अग्रमाग | 
का चुम्बन करना चाहते हैँ, जिनमें शिथिल्ता कौ शंका नही रहती, परस्पर मे इतने धने [ सदे |] 
रते हैँ कि अन्य किसी को वीच मेँ जगह नहीं मिलती, जो स्वप्न मं भौ अङ्ग नहीं होते ओर 
अलग होते मी दै तव भी कभी अधोडुख नदीं होते ' -- यौ पदां मे ङ्ग नी है यह स्पे । 
दोना का मिलित उदाहरण स्वयं प्रन्थकार ही [ ^रक्तच्छदत्वं” यह | दे चुके हं । 

य॒द्‌ दाब्द ओर अथं दोनों पर आश्रिते, इसख्यि ईस्तको दोनों का अलकरार बत्तल्मते इए 


कहते दै ¢ 
| सवंस्व | 


अदंका्यीटंकरणमावस्य छोकवदाश्रयाश्चरयिभावेनो पपत्तेः रकच्छइत्वम्‌? 
इत्यादाव्थदवयाश्चितत्वाद्‌ यमथठंकारः "नाकम्‌, इत्यादो तु शब्दद्वयाधित- 
न्वाच्छन्दाटंकासेऽयम्‌ । य्प्यथभेदाच्छम्दभेद्‌ इति देने ^रक्तच्छदत्वम्‌' 
इत्यादावपि रब्द्‌ाश्चितोऽयं तथाप्यौ पपत्तिकत्काद्‌्न राब्दभेदस्य प्रतीतेरेक- 
ताबखायान्नास्ति शाब्दभेद्‌ः । नाकम्‌? इत्यादौ तु प्रयत्नादिभेदात्‌ प्रातीतिक 
छव शब्दभेदः । अतश्च पूवेतैकञ्न्तगतफढद्वयन्यायेनाथेद्ययस्य शब्दरिल- 
छत्वम्‌ , अपरत्र जलुकाष्ठन्यायेन स्वयमेव दिलष्टत्वम्‌ । पूवेजान्वयव्यति- 
सकाम्या शब्दहेतकत्वाच्छब्दाटटंकारत्वमिति चेत्‌ , न आश्चया्चविभावेना- 
कारत्वस्य लोकवद्‌ भ्यवस्थानात्‌ । 
अलंकार्याङंकरणभाव [ काव्य मेँ भी | आश्रयाश्रयिमाव के आधार ही ठीक उसी प्रकार समव 
जिस प्रकार लोक मे, अतः 'रक्तच्छदत्वम्‌, इत्यादि पच मे यह [ इकेष | दो अर्थौ पर 
हुने से अथं का अलंकार है। इसके विपरीत "नाल इत्यादि स्थर में दो शब्दां पर आधित 
रहने से यही राब्दका अलंकार है । यथपि "अर्थं भिन्न हो तो शब्द भी भिन्न होता हेः इस सिद्धांत 
के अवतार “रक्तच्छदत्वम्‌' इत्यादि मेँ भी यह [ रल्ष ] शब्दाश्रित ही माना जा सकता हे तथापि 
तेद सिद्ध करने पर सिद्ध होता है, प्रतीतितो होतीदेणकसरूपसेही। इस कारण यँ 
न्यसे प्रतीति का सारा खेल हे अतः इसकी दृष्टि से ] चनब्दभेद नही है । ओर इसीखिए प्रथम 
£ नदो अर्थौ का [ एक | राब्द मे देष = जोड़ उसी प्रकार हे भिस प्रकार एक इन्त मे दौ फलों 
[है जव कि दूसरे इलेष मेँ स्वयं शब्दों का टी रकष = जोड़ रेता हे, क उसी प्रकार 


दोत 


होता है 
अश्रित र 


३५ अलङ्कारसवंस्वम्‌ 


[ अभंग ]मेदमें भी [ इष ] शब्द का दी अलंकार है क्योंकि उसका रद्ना न रहना शब्द के 
रने न रहने पर निर्भर है इसङि उसके प्रति राव्य ही देतु दै, ओर अल्कारकी रब्दाथगत- 
त्वेन व्यवस्था हेतहेठमदमाव के आधार पर होनी चाहिए, क्योंकि वस्तुतः कान्यालकार मी 
लौकिक अलंकारो के समान दही घाश्रयाश्रयिभावको ठ्ेकर ठदरार जा सकते है [ हेतदेतमद्‌- 
भाव को रुकर नदीं | । 


विमरिनी 


नज च “याचन्त एवमथाः स्युः शाब्दस्तावन्त एव हि" इस्याद्यक्स्या रक्तच्छद्स्वमित्या- 
दावपि शष्दद्वयाश्रयाच्छुब्दारंकार एवायं तस्कथमन्यथोक्तमित्याश्द्कयाह--यचपीत्यादि । 
एकताव्तायादिति । रक्तच्छुदस्वादेः प्रयध्नादिमेदं विना सादृश्ये नाथंदयाभि्ानात्‌ । अत. 
शेति । अथंद्यश्य शब्दद्वयस्य च रिष्टत्वात्‌ । पूर्वत्रेति । रक्तच्छदस्व मित्यादौ शष्दस्य 
चृन्तस्थानीयत्वात्‌ । अपरत्रेति नारूमिव्यादौ । जतुकाष्टन्यायेनेत्ति परस्परं संवरितिष्वात्‌ । 
पूवत्रति रक्तच्छंदस्वमिस्यादौ 1 अन्वयन्यतिरेकाभ्यामिति । रक्तच्छृदस्वमिस्येव शष्दे स्थिते 
श्रेषः शब्द परिवतने तु छते न शेष इव्यत्रापि काऽदहेतुकस्वाचदरुक।रस्वमेवेत्यर्थ; । 
ाश्रयात्रयिभावेनेति । न पुनरन्वयव्यतिरेकाभ्याम्‌ । ताभ्यां हि यस्य यद्धेतुकसवं तस्य 
तस्काय॑वं स्यान्न पुनस्तदरंकारत्वम्‌। लोकवदिति लो हि यथा कणांभ्रितः कुण्डलादिः 
क्णाटंकार उच्यते न पुनः सुवर्णकारणहेतुकत्वात्तद लकारः । 


राग्द उतने ही होते ह जितने अर्थः इत्यादि वाक्यों के अनुसार 'रक्तच्छदत्वम्‌ इत्यादि में 
भी यह्‌ लेष शाब्द काही अलंकार है क्योकि वांमी यददो र्द पर आशितहै। फिर 
आप इसके विपरीत इसे [ अथांशध्ित ] क्यों वतला रद है, इस रका पर॒ उत्तर देते है- 
"यद्यपि" इत्यादि । "एकतावसायाव, = प्रतीति मँ एकता का ज्ञानः-श्सकलिए कि ‹क्तच्छदलवः 
आदि राब्दां मे प्रयत्न आदि के भेद के बिना एकरूपता ( सादृरय ) के आधार प्रदो अर्थौ का 
कथन होता है । “अतश्च = गौर श्सीलिएः = अर्थात्‌ दो अर्थं ओर दो शब्दौ क रिल्ट = जुड़े 
हए होने से । पूर्वत्र = प्रथम मे -रक्तच्छ्वत्व इत्यादि मे क्योकि वहाँ चन्द रहता है वृन्ततुस्य । 
भपरत्र दूसरे म = नालम्‌, इत्यादि मेँ । (जतुकाष्ठन्यायेन' = लाख भोर काष्ठ कै समान एक 
दूसरे मे चिपके रहने से । पूर्वत्र = प्रथम मे = ९रकुच्छदत्व" इत्यादि में ।,अन्वयव्यतिरेकाभ्यामर= 
एक के रहने पर दूसरे का रहना भौर न रहने प्रन रहना = ^क्तच्छदत्वः इसी शब्द के 
रहने प्र इलेष रहता है, स शब्द के बदर देने पर्‌ देष नही रहता । इस प्रकार यहाँ पर भी 
रेष शब्दमूलक हे अतः उसे शब्दालंकार ही मानना पड़ेगा । आश्रयाश्रयिभावेन = आश्रया 
भ्रयिभाव से, न कि अन्वयन्यत्तिरेक से। इन | भन्वयम्यतिरेक ] के द्वारा यह सिद्ध हो सकता रै 
किजो जिसते पैदा होता दै वद उसका काथं है, यह नदीं फि वह उसका अलंकार है । 
खोकवद्‌ = लोक वै समान-' लोक मे जिस प्रकार कान में पना कुण्डल भादि भलंकार कान का 


दो अलंकार [ शोमावरधक ] कहा नतारे नकि ५4 5 
उवणं का अलंकार [ शोमावरभुक ]। 


॥५। 
५ विमशेः--इ्ेष रब्द का प्रमुख मं डना, चिपकना, ओर अलंकार शब्द का अथं है 
ए ` 1 सथा जम्रपान रूप से चमत्कारजनक तत्व । प्रश्न उठता है श्लेष मै अवारयं कौन 
` ९१ स्वय हना अलंकार, घतः भरताय शब्द्‌ या अथं इन दोमेसे कोड एक दो सकता है । 


श्टेषाटङ्ारः २५७ 


उद्धर ओर स्व॑स्वकार सभग ओर अभंग हम दोनो इेषों को अधाल्काररो के प्रकरणम रखते है 
अतः सामान्यतः यही सिद्ध होंतादहै करि दोनी प्रकारका इलेष अधांल्कारद्टीहै। उधर 
उद्धटने संग उलेष को राब्दालकार कदा दै अतः मम्मट्ने उसके अथांल्कारों के बीच रखे 
जाने पर आपत्ति उाई है-- शब्दालंकार इति चोच्यते, अर्थारुकारमध्ये च गण्यत इति कोयं 
नयः [ नवम उल्लास ] रुद्रट के अनुकरण पर मम्मटने स्वयं शब्ददलेष को नवम उल्लास में 
रब्दालुकारों के वीच रख। है ओर अर्थैदरेष को अ्थांल्कारों के बीच दशम उच्छास में। सवेस्वकार 
ने अतिशयोक्तिको तोदो अलग-अलग प्रकरणों मे रखकर वर्गीकरण को महत्व दिया, किन्तु यहं 
उन्दने वैसा नदीं किया मर सभ॑ग इल्ेष को यब्दालंकार कहकर भी उसे अथालंकारों के वीच 
रखा । विचित्रता यह है कि मम्मट द्वारा श्लेष पर उठाई गं अन्य आपत्तियों का उत्तर देते 
हए भी वे इत मापत्ति पर मौन है । वस्तुतः यह उनकी शिथिलता हीदहै। इक्त प्रकार सभग 
दकष तँ अलंकारं चाब्द ही मान्य है । अथ यदह कि सभंग दलेष शब्दालंकार ही है । 

अभंग दकष मे अलकां के निमैय की समस्या जटिल है। जरिता इसलिए है किं निणायक 
बिन्दु पर आचार्यो का मत एक नहीं है। उद्भट के अनुसार निणाँयक है आश्रयाश्रयिभाव । इस 
मत में दलेष का आश्रय ही इलेष का अल्का्यहै। सभग दलेषमें दो शब्दों का जोड रहता है 
ओर वह लाख ओर ल्कड़ी के जोड के समान स्पष्ट दिखाई देता है । अतः वहाँ शब्द ही इकर्ेष का 
भाश्रय ओर अलक्रा्यं मान लिया जाता दहै । किन्तु भभंगदलेष भै आश्रय का निणेय करना 
कठिन है। अभंग रेषे अदो होते दहै श्सकिढ अथंके जोम कों मतमेद नहीं उठता । 
जहाँ तक शाब्द का संवन्ध है इसके विषयमे दो मतदहै। एक के अनुसार अभंग इलेष मं यचपि 
दाब्दं मे मेद नहीं रहता अतः उनका तैसा जोड नदं रहता जैसा सभ॑ग रेष मेँ रहता हे, 
तथापि एक दूसरे प्रकार का जोड अवश्य रहता है । वह है गाय ओर मंसकेदो भिन्न दूर्थाके 
मिश्रण जैसा जोड़ । फलतः उसमे जोड की प्रतीति नदींहो पाती प्रतीततिन होने परमी 
शब्द मे जोड श्ल माना जाताहै फिअर्थं वदरते ही शब्द भी बदल जाता है । जसे 
मानस शब्द के दो अथं होते है, एक मानसरोवर तालाब ओर दू्तरा चित्त । यथपिम्‌,भाःन्‌, 
अ, स्‌, अ, ये वणै उसी क्रम से तालाववाचक मानस राब्दमे अतिदहै जिस क्रम से चित्तवाचक 
मानस शब्द मे, जि्तसे दोनो मानस शाब्द के उच्चारणमे प्रवलमेद नदीं होता, अतः दोनों 
दाब्दं मे एकता की प्रतीति होती है तथापिवे दो भिन्न शब्दैः क्योकि अर्थौमें भेद है । 
लेता कि कहा जाता है- प्रत्यर्थं शब्दा भिधन्ते › इस सिद्धान्त के अनुसार जोड या श्लेष का 
आश्रय शाब्द है इ्तलि९ रल्षरूपी अर्टकार का अलंकारं शब्द ही है । इस मत के प्रवत्त॑क भावायं हैँ 
मम्मट । उनकी पंक्ति है- 

[ का० ] वाच्यभेदेन भिन्ना यद्‌ युगपद्माषणस्प्राः । 

दिलभ्यन्ति दान्दाः दलेषोऽसो "ˆ" *“ `“ ॥" 
[ वृ० ] “अभेदेन दाब्दमेद' इति द्लने वाच्यमेदरेन भिन्न अपि रान्दा यद्‌ युगपद्च्चारणेन 
दिलष्यन्ति = भिन्नं स्वरूपम पहुवते स ङकेषः। [ काव्यप्रकारा उ८० ९ - । 

--अरथमेद मे शब्दभेद इस सिद्धान्त के अनुसार अरथमेद से भिन्न इए भौ शब्द एक सार्थ 
उच्चारण के कारण अपना भिन्न रूप छिपा लेते है तो उते च्ब्दररेष कह्‌। जाता हे" 

अर्भमेद से शब्दभेद का सिद्धान्त मम्मट के पूर्व उद्भट ने मी माना था ओर कदा धा-- 

'एकंप्रयत्नोचार्यांणां तच्छायां चेव बिभ्रताम्‌ । 
स्वरितादियुणेभिन्नेवैन्धः रिष्टम्‌ ।' ४।९ ॥ अथीत्‌ 


३५८ अद्धारसवस्वम्‌ 


-एक ही प्रयत्न से उच्चा अत एव समान प्रतीत होते शव्द का वन्ध व 
इभा = जोड़ से युक्त कदलाता है । (समान प्रतीत होते श्स कथन का आधार ५. ५ 
शब्दभेद" सिद्धान्त ही हे। उद्धर के कान्याल्कारसारसंग्रह की टीका ठधुकृत्ति मे प्रतीहारे 
न्दुराज ने भी लिखा है- 

“अथमेदेन तावच्छब्दा भिन्त इति भद्ोदूमरस्य सिद्धान्तः ।' 

किन्तु उद्धर ने ठेते शब्दो के दलेष का अलकायं इाब्द को न मान अथं को मान लिया- 

“पदेः, हिविधेर्थशब्द)क्तिविरिष्टं तत्‌? 

पद दो प्रकार के होते है-८ १) एकोच्चारण वाले भौर ( २) भिन्न उच्चारण वाले। 
श्न दो प्रकारके पदोँसेदलेषमीदो प्रकारका होता है अथरलेष गौर शान्दरलेष पकमयत्नो- 
च्वायं शन्ददज्ष दूसरे वदो म अंगदलेष हीहै। इस पर मम्मटने आपत्ति उठाई र 
कहा जव इलेष इाब्द मेँ माना [ अर्थात्‌ इलेष का आश्रव शब्द को माना | तव अल्का्य अर्थं कैसे 
माना जा सकताहे। रदे र्लेष किसीमे भौर अलक्त करे किसी को यह वात तकंडुड नदीं 

कह जा सवती । ओर इसीक्एि अभंग दलेष को अर्थालंकार नहीं माना जा सकता । वह शब्दा. 
र्कार ही दहै। 

णके प्रन ओर उपरथित हमा । यह कि अभंग द्लेष मे अर्थभेद्‌ से राव्दमेद मानन ओर 
फिर शब्द में ही इलेष स्वीकार करना कां तक वास्तविक है । यद केवल शाक्लभक्तिहीहै या 
इसमे कोद यथाथ मी है। इसका उत्त मम्ब ने तकशा की दुहाई कर दरिया । उन्होने कहा 
भभगदलेष मे रेष का आश्रय कौन है यह्‌ तथ्य अन्वय ओर व्यत्तिरककी कतसोरी से परखा जा 
सकता हे । चदि रद के इरा दिए जाने ते इटेष न हे तो वह अवद्यही रब्दका रलेषपन 
दोगा, अथं का ही देष होगा । ^रक्तच्छदत्व,-आदि अंग उष के स्थलं मँ स्थिति एेप्ती नदीं 
दे । यदो यदि रक्तच्छद' शब्द्‌ के स्थान पर क्तप्र राब्ददे दिया जायतो इस दाब्दं का अर्थं 
भमण पक्षम लागू नदीं होगा, फलतः रेष नष्ट दो जाएगा । विकच शब्द मी नीं हटाया जा 
सकता । विकेश या 'विकसित' कहने प्रर एकान्वथौ अथं ही निकलता हे अतः दलेष नष्टदहे 
जाता हे । श प्रकार इटेष का आश्रय अभंग इलेष नै भौ राब्द ही होता है । 


अलकारसवरवकार ओर जयरथ ने मम्मर को इत ताक्रिक्ता को सहदयतासे कारने की 
कोरिरा करी । अन्वयन्यतिरेक को इन दोनों ने कार्यकारणमाव का नियामकं माना, अल्कार का 
नहीं । अलंकार को इन्दोने आश्रयाश्रयिभाव प्रदहो निभेर मानने का पक्ष प्रस्तुत किया है। यं 
उनके अभी आण ग्न्धाशसे हौ स्पष्ट है । लोक म जसे केवूर का कारण सुवणं होता हे किन्तु वहु 
लकार होता है मुज का, इसकछिए वेनूर्‌ के अन्ववन्यतिरेकं सवणे के साथ रहते है, सवण के न 
रहने पर केयूर नदीं रहता ओर्‌ रहने पर रहता, जव करि अटकायांलंकारभाव अजा के साथ, 
नो केयूर का आश्रय है । फलतः अलकायारंकारभाव आध्रयाश्रयिभाव प्र निर माना जाना 
चाहिए । अभंगदलेष में जहौँ तक आश्रय का सम्बन्ध है इसका निर्णय करिपत शाखस्िद्धान्त पर 
नी, अनुभव ओर संविन्ति पर्‌ किया जाना चाहिए, वर्योकरि यह क्षत्र कान्य का क्षत्र हे । संवित्तिमें 
भसगरतेपस्थल मे दैत अर्थगत ही भासित होता द, शब्दगत नदीं । पारतः शब्द एक दृन्त = 
च्ठर हे, जिसमे दो अथैके दो फ़ल लगे हुए हैः । 

फर दो हांतोदृन्तकोभीदो मानते की नासमञ्ची 
उसमे इलेष या जोड़ का कोई प्रन दो नहीं उठता । प्र 
व्ही हे । फलतः दलेषु अर्थौ त दीदे। अ्थंहीदलेषकेअ 


कोद नदीं करता । वन्त ॐ एक होने से 
ग फलम ही उठ सकता है क्योकि परैत 
श्रय हे । अ्थंही इलेष वै जलका है । 


इठेषालङ्ारः ३५९२ 


दलेष अथं का ही अल्कार हे । ओर सच भी है। बहू भौर बेटे यदि आदलेष करे तो उसे अलंकार 
साप् सखर का नदीं माना जा सकता । 

निश्चित ही इन आचार्यौ के तकं न्दर ओर समथ है । प्रातीत्तिकं भेद मानकर शब्द मे इलेष 
की सिद्धि अवद्य ही शाख्रभक्ति हे। 

मम्मट के अन्वयव्यतिरेक पक्ष का पुनववींक्षण करने पर कुच ओर भी विवरातार्णै सामने भाती 
हे । अन्वयव्यत्तिरेक अलकार्यांलंकारभाव के लिए मी अत्यन्त उपेक्षणीय नदीं हे। यदह अवद्य ही 
एक विचारणीय तथ्य है कि शाब्द कं बदल देने पर अभंगदेष क्या समाप्त हो जाता है । आश्रया- 
श्रयिभाववादी उक्त दोनों भाचा्यं इसका उत्तर यद देंगे किं दाब्दके स।थ रेष का कारणकायं- 
भाव संवन्ध है । अथौ का शेष संमव नहीं दोता जव तक रक्तच्छदत्व आदि उभयान्वयी राब्द का 
प्रयोग नहीं ह्येता । फलतः द्वयक शब्द ही विभिन्न अर्थौ को दलेष का कारण दहे। अथं यह 
कि इले अर्थौमेंद्यी रहता है तथापि वह तब तक संभव नदीं होता जव तक विरिष्ट शाब्द का 
प्रयोग न हो। इसत प्रकार अन्वयव्यतिरेक से अभंग इलेष मँ कारणतो शब्द दौ सिद्ध होता है 
तथापि रेष रहता अर्थो मे ही है । सुभिव्रा के गभ॑ मे लक्ष्मण ओर शुष्न जडे इष थे । सुमित्रा 
एक ही थी । शचुष्न के किए दूसरी ओर लक्ष्मण के किए दूसरी नीं। इसीकिए रटेष- जोड़ 
केवल लक्ष्मण ओर रइुल्नमें ही था, कारणभूत खमित्रा में नहीं। अन्वयन्यतिरेकवादी को ओर 
ते यदह कहा ना सकता है कि दो विभिन्न अर्थौ मेँ इरूेष उत्पन्न करने कौ जो क्षमता “र क्तच्छदत्वः 
आदि दय्थक शब्दौ मेँ रहती है वह क्षमता अपने आप में कोद विरिष्ट ध्म है या नदीं । उससे 
कोई चमत्कार काव्य मे गाता है या नहीं । अवदय ही वह चमत्कार मेँ अंशतः प्रयोजक हे । 
इसके अतिरिक्त अभिन्नानुपू्वीक अतएव एकप्रयत्नोच्चायं श ब्दो म यदि वास्तविक भेद नहीं 
रहता भर उनका इष एक प्रातिभासिक या कल्पित इलेष है तो एते शब्द से प्रतीत दो अथौ का 
इञेव वास्तविक है इसमे भी क्या प्रमाण । एकसशब्दवाच्य होने से उनमें सदसा भेद रक्षित नदीं 
होता केव इतना ही अनुभवसि है । दोनों शब्द जुड़े रहते दे यद नदीं । ओर यदि एसा 
को$ इरेष अभंगरलेष के अर्थौ मे रदता है तो वह सभंग ररष के अर्थौ मी रहता दीदे तव्‌ 
संग इरुषको उभयारंकार कयो नदीं माना जाता । यदि यह कहा जाय गिः सभ॑ग इलेष मे शब्दो 
के जतुकाष्टवत जोड़ के कारण अर्थौ मेँ जोड़ रहता, अर्थी का जोड़ वहां स्वाधीन न 
होता तो यदी वात अभंग देष मेँ कही जा सकती ह । वहां मौ अर्थरलेष शब्दरलेष पर निभर है 
केवल जतुकाष्टवत शन्दो मेँ रेष ही वाँ लक्षित नदीं हता । तत यदि दन्दके कारण हीने से 
त्गदेष यँ इलेष शाब्द का अलंकार है तो अ्मंगदलेषमें भी कारण दोने से देष को शब्द 
काही अलंकार क्या नहीं मानाजा सकता । एकं बात ओर । यद कि अलंकाये जलुकार्‌ का 
आश्रय ही हयो यह आवदयक नहीं है । यदि वाक्याथ मै भवादि साम्नी नहींहो तो | उसमें 
लाद रूपक आदि अलंकार नदीं माने जाते । मावादि सामग्री अलंकाराश्रय नहा दा 


८ म, प्रक्‌ लकृ ॥ अल † से भिन्न 
ध ः 2 | हस (र जब अलक्ाय काराश्रय 
श्रय अथ होता हे ओर वह उससे व्यक्त होती हे य क्लीर उसी के प्रति च्टेष को 


सिदध होता है तब जिसपर दलेष हौ उसीको दलेष का अलका ८ 
अलका मानना ठीक नदीं है। फलतः अभंग देष में भले हणी दलेष अथौ ( ४५ पे ४ ८.५ 
देष का अकाय हो यहं नी माना जा प्तकत कायं वहु दोता हे जिस्म शोभा काआधा 

49 क + भः # त हे। दूसरे शाब्दो मे दलेष- 
वह अथदयवाचकता से रोमा आती है अतः वह शब्द » ६ ४ 1 तं 
परतिपादकता शब्द मं होने से चब्द ही अल्कायं मानाजास र ५ 
ते तन्व शब्द से पुकारा हे \ तन्त्र का अथ एकाधिक अर्थौ का प्र 


ऋ 
क~ 


३६० अलङ्ारसवंस्वम्‌ 


फकतः अधिक अच्छादहोकि मभ्मट ओर अलंकारसर्वस्वकार अपने पूैवत्तीं माचा उद्धर ओर 
अर्थमेद से शब्दभेद मानने वाके अन्य दादोनिकों का सुलादिजा न कर भभग ररेष के स्थान पर्‌ 
"तन्त्रारुकार' नामक एक स्वतन्त्र अलंकार को स्वीकार करे । 

पण्डितराज जगन्नाथ तथा विद्वेश्वर ने इन मतमेदो का उन-उन आचार्यो के नामके साथ 
अनुवादमात्र कर दिया है । हन पर अपनी ओर से कोई टिप्पणी नहीं है । 


विमरिनी 

तत्‌ , एवं रूपस्याशध्य 'निरवकाश्चा हि विधयः सावकाक्नान्विधीन्वाधन्ते' इति नीध्या 
निरव काशरवाप्सवांरुकारापवाद्कत्वं ऊचिद्‌हुरिष्याह--एष चेत्यादि । 

“जो विधि निरवकाश होती है वे सावकाद्च विधियो को बाधित कर उनफे स्थान पर चरि 
तार्थं मानी जाती हैः इस सिद्धान्त के अनुसार उक्त प्रकार के शस देष को निरवकारो मानकर 
कुछ [ उद्धर भादि ] आचाय अन्य सव अलंकासे का अपवाद या बाधक मानते दं । म्नन्धकार श्सी 
तथ्य को प्रस्तुत्र करते इए च्खिते दँ 

- | [ खवस्व ] 

पष च नाप्राततिष्वटंकारान्तरे्वारभ्यमाणस्तद्वावकस्वेन तत्प्रतिभोत्पत्ति- 
हेतुरिति केचित्‌ । येन ध्वस्तमनोभवेन वलिनित्कायः पुरास्त्रीकृतः" इत्यादौ 
विविक्तोऽस्य विषय इति निरवकारात्वाभावान्नान्यवबाधकत्वमित्यन्येः सह 
संकरः, दुबेलत्वाद्वा बाभ्यत्वमित्यन्ये। तत्र पूरवैषामयमभिप्रायः । इद प्राक 
रणिकाप्राकरणिकोभयरूपनेकार्थंगोचर्त्वेन  तावत्प्रतिष्ठितोऽयमटंकारः । 
तत्राद्यं प्रकारद्वयं तुस्ययोगिताया बिषयः । तृतीये तु प्रकारे दीपक भवतीति 
तावदटेकारदयमिदं श्डेषविषयं उ्याप्त्या व्यवतिष्ठते । तत्पृष्टे चारकारान्त- 
-राणासुत्थानमिति नास्ति विविक्तोऽस्य विषयः । यत पवाटंकारन्तर(णां 
वाधितत्वात्परतिभानमातेणावस्थानम्‌ । येन ध्वस्तमनोभवेनः इत्यादौ च 
प्राकरणिकत्वादथंद्रयस्य तुव्ययोभितायाः प्रतिभानम्‌ । एवं च 'सकलठकठं 
पुरमेतज्ञातं संभरति शखुर्ाद्विम्बमिष' इत्यादौ न गुणक्रियासाम्यवच्छग्द्‌- 
लाभ्यमरुपमाभ्रयोजकम्‌ अपि तूपमाध्रतिभोत्पत्तिषटेतः शकष एवावल्ेयः। श्ठेष- 
गसं त रूपके रूपकदटेतु कस्य श्देषस्य तृतीयकश्चायां रूपक एव विश्रान्तिरिति 
रूपकेण इषो बाध्यते ¦ शिटष्टविरोषणनिवन्धनायां च खमा घोक्तौ विरोष्य- 
स्यापि गभ्यत्वाच्छकेषस्य बाधिका समासोक्तिः । 

[ उद्धट भादि ] कुछ आचार्यो कौ मान्यता हैँ कि यद ॒[ दकेष ] जदोँ-जहाँ होता हे वहं अन्य 
कोई अलंकार भवदरय ही उपस्थित रहता हे [न अप्राप्त = इसमे आए दो निषेध आवद्यकत्व के 
वाचक है | इसलिए यह्‌ अन्य अलंकार का वाधक होता है, फलतः वहाँ इलेष के कारण अन्य 
अल्कारों का भाभासमात्र [एरतिभा] दो पाता है [ भन्य अलंकार अलंकारत्वेन प्ररूढ नदीं हो पाते] । 

इसके विरद्ध [ मम्भट आदि ] अन्य आचार्यो का मतदैकि %टेष चयेन ध्वस्तः आदि 
स्थलों म अन्य अलकारो की वाधा ते रहित है, अतः देष निरवकाश नदीं है फलतः यह अन्य 
अलंकारं का बाधक नदीं है। निदान अन्य अल्कारो के साथ इसका संकर = मिश्रण हो सकता है 


अथवा दुर होने के कारण अन्य भलकारो के द्वारा यही बाधित मान। ला सकता हे । 


॥ 


श्ठेबाठ्ङ्कारः ३६१ 


इने से प्रथम आचार्यौ का अभिप्राय यह है--थयह तो सर्वमान्य है कि यह ( इलेष ) 
अलंकार प्राकरणिक, अप्राकरणिक अथवा उभयरूप नो अनेक अथं होते है उनको लेकर प्रतिष्ठित 
होता है।, इनमेंसे प्रथमदो प्रक्ञार के अथं तुल्ययोगिता का विषय है ओर तीसरा प्रकार 
दीपक का। इस प्रकार ये दो अरकार देष के संपूण क्षेत्र को व्याप्त किए रहते हे । इनके पीछे 
[ उपमा आदि ] अन्य अल्कार भी उठते दिखाई देते ह । इसलिए इस [ दरेष ] का एसा कोई 
स्थर नदीं है जिसमें केवल इलेष माना जा सके । इसीक्िएि अन्य अल्कारो को दलेष से बाधित 
मानना पड़ता है ओर इलेषस्थल म उनके अस्तित्व का अभासमात्र स्वीकार करना पडता है । 
[ विविक्त विषयकंरूप में जो उदाहरण प्रस्तुत किया गया है उस्र ] येन ध्वस्तमनोभवेन०' मे मी 
दोनों अथ प्राकरणिक है अतः तुल्ययोगिता का आभास होताद्दीहै। इस प्रकार गुण ओर 
क्रिया के साम्य के ही समान सकलकल [ कलकल राब्द-सदहित] यह नगर इस समय चन्द्रषिम्ब सा 
[ सकलकल = सकर कला से युक्त] हो गया है' इस स्थल मे [मम्मटने नो] शब्दके 
साम्यकोभी उपमाका प्रयोजक [ मानाहे वह ] नहीं माना जा सकता, अपितु यहाँ [उस 
अदा में] दलेष माना जाना चाहिए जिसे उपमा का तो आभासमनत्र रह जाता हे। 
[ 'विद्रन्मानसः आदि परम्परित रूपक मेँ ] रूपक जहां इलेष से युक्त माना गया है वरदो रूपक 
रलेष से श्सछ्िए वाधित नदीं होता कि वशं [ पदे राजा पर हंस के रूपककी प्रतीति दोतौहे 
तब वह ] रूपक [ मानसमें | श्टेष को जन्मदेता है तदनन्तर [ वाज्याथंकी ] तीसरी कक्षा में 
रूपक को प्रतीति मे [ वाक्याथकी ] विश्रान्ति होती है। किन्तु समासोक्ति जहाँ इेषयुक्त 
विरोषर्णो से युक्त दोती है वहो विशेष्य के [ राब्दतः कथित्‌ न होकर ] गम्य होने से समासोक्ति ही 
देष की बाधिका होती है । ओर-- 


विमरिीनी 


कचिदिति, उद्धटादयः । केचित्पुनर्विषयवेविक्ष्यस्य संभवा्धिरवकाशस्वाभावान्नास्य 
सर्वारुंकारापवादकत्वमभ्युपयन्तीव्याह - येनेत्यादि । अन्यथा इति मादश्ताः । विविक्तोऽस्य 
विषय इति तुल्ययोगिताया जत्राभावात्‌ । खा हि हयोरपि प्रङ्तयोरप्रङ्ृतयोवां विशेष्ययोः 
घुथगुपादाने ओपम्यस्य च गम्यस्वे भवति । इह तु तद्‌ मावः । विशेष्ययोः पथगनुपादानात्‌ 
ओ पम्यघ्य च गम्यरवाभावात्‌ । न द्यत्रोमाधवस्य माधवेन तेन वा तस्य सादृश्यं विव- 
दितभ्‌ । एकेनैव शब्देन रिकुष्टतयार्थद्वयस्य प्रतिपिंपादयिषित्वात्‌ । अचर हि परस्परनैर- 
वेचयात्‌ तयोष्माघववाक्याथपरामशेवेकायां माघववाक्यार्थपरामक्ंमान्रमपि नास्तीति को 
नामौपम्यस्याव्षरः । तस्मादेवमादावरुकारान्तरविविक्तविषयष्वाच्छदिष्टतायाश्चोद्‌घुरक- 
धरी भावेन प्रतीतेन निरवषाज्ञः श्केषः। अन्यः सह्‌ संकर इति योरपि हुक्यकरता- 
प्रतीवेः । बाध्यमिति । श्छेषकषय दुव॑रुत्वादछकारान्तराणां च बरवस्वात्‌। पतच्च म्रन्थ- 
देवान्ने दश्ञेयिष्यतीति नेहायस्तम्‌ । तदैव मस्य सवारंकारापवादकत्वं न युक्तम्‌ । जन्या- 
ल कारवदेव षाध्यबाधकभाषादिदनल॑नात्‌। एतक्चारुकारसारङता सप्रपञ्चमुक्ूमितीह ग्रन्थ- 
विश्तश्मयाव्‌ तथा नोच्छम्‌ । पूत्॑षामिति, उद्धदाकीनापर्‌ । अविप्रतिपत्ति-धोतकस्ताव- 
च्छुडदः । व्याप्येति । सवेरुषयग्यापकष्वेन, सवंशरैवास्य त्रिरूप्वात्‌ । तय ऽति तुर्य 
थोगिताक्षीपकोपरि । अलकारान्तराणामिति उपमादीनाक्न्‌ उत्थानमिति । तुक्ययोगितादी- 
पकाभ्यामपि तस्प्रतीतेर्देकात्‌ । अत एवेति । तस्य विविक्तविषयध्वाषंमवात्‌ । प्रतिमान- 
मिति भभासमात्रब्‌ । न पुनस्तदेव विश्रान्तिरिस्यथैः। एत यथा नोपपद्यते तथा सम. 
नन्तरमेवोक्तम्‌ । तदेवं स्वमतोपोद्लनाय पूवंमन्पान्येः सह संकरो दुवंरुष्वादाबाध्य. 


३६२ अलङ्ारसखवस्वम्‌ 


स्वमिति यदुक्तं तदेव प्रपञ्चयितुमेतव्कर्ठंकं तावदन्य।टंकारवाध्यरवं दर्लयति -दलेषेत्या- 
दिना । वृतीयकक्षायामिति । ब्रथमकच्वायां हि रूपक्प्रतीतिरेव । हवितीयकत्तायां त शरेष- 
ग्रतीतिः 4 शेषस्य सर्वाटंकारापवादव्वमिच्डृद्धिरण्यौदधटेर्यदन्याटंकार वाध्यस्वमेतस्योक्तं 
तत्‌ स्वव चनविडङद प्राथमेतेषामिति ध्वनयितं तड्क्तमेव रूपसमासोक्तिवाध्यस्वमेतस्य 
अन्थङ्कतेद दशितम्‌ ! बाध्यत इति विद्भन्मानसहंबेध्यादौ । बाधकेति उपोडरागेभेष्यादौ । 


केचिद्‌ = कुछ उद्धगदि आचार्यं । किन्तु [ मम्मट आदि ] कछ [ आचार्यं ] इत्ते अन्य सव 
जल्कारो का अपवादक नहीं मानते क्योकि वे इते निरवकाश नदीं मानते, एतदर्थं वे इसका 
स्वतन्त्र [सवांंकार रदित] विषय वतलाते हैँ । इस तथ्य को लिखते हए कहते है-- ध्येन ध्वस्त ०? 
इत्यादि । अन्ये = जन्य मुञ्च जैसे [ अर्थात्‌ स्वयं अन्धकार जसे ]। "विविकछोऽस्य विषयः = 
बस दलेष का अल्कारान्तरशुन्य विषयः क्योकि यहाँ [ धेन ध्वस्तः-पय म | तुल्ययोगिता 
नहीं है । वह तव होती है जव केवल प्रकृत या केव अप्रकृत विद्यो का पृथक्‌ ¶थक्‌ उपादान हो 
तथा सादृदय गम्य हो । इस [ येन ध्वस्त ] पमे उस [ तुल्ययोगिता ] का अभावदहै क्योकि 
यहां विद्यां का उपादान पृथक्‌ नदीं हृञा है तथा साद्य गम्य नदींहै। एेसा नदींहे कि 
शस पद्य मं उमाधव [शंकर] का माधव से या माधव क्रा उमाधव से सादृदय विवक्षित हो । यहाँ तो 
दोनों अर्थो काणकदी राब्दक्े द्वारा दिलष्टरूप से प्रत्तिपादन भभीष्टदहै। यहौँतो उन [दोनों 
पक्षो | मे परस्पर निरपेक्षता होने से जव उमाधव-सम्बन्धित वाक्यां कौ प्रतीति होती है तव 
शववव क्वथ का परामरामात्र तक नहीं रहता । तव यहां सद्रद्यका अवसर ही क्याहो 
सकता ह । श्स कारण एेते स्थला मेँ इलेष अन्य अलंकारो के स्पशं से रदित रदकर विचयमान है 
तथा य॒दा रिश्ता प्रमुख रूप से परिरक्षित दिखाई दे रही है फलतः इसे निरवकाश नदीं कदा 
जा सकता । अन्यः सह संकरः अर्यो के साथ संकर”--कर्योकि दोनो समानरूप से प्रतीत होते है । 
बाध्यत्वम्‌ = बाध्य होनाः = क्योकि देष दुर्व॑ होता है ओर अन्य अल्कार प्रबल । इसे स्वयं 
अन्धकार ही अगे दिखलापगे इसलिए इसके विवेचन पर यहां श्रम नहींकिया जारहा। तो 
इस प्रकार इस [ इठेष ] का समी अलंकारो को बाधित कर उनका अपवाद माना जाना टीक नहीं 
है । क्योकि [ उपमा मौर रूपक आदि ] अन्य | स्वतन्तर ] अलंकारो केही समान वाध्यवाधक- 
माव [ तथा स्वतन्त्र विषयता ] भादि दिखाई देते है । इसका विस्तृत विवेचन अल्कारलारकार 
ने कर रखा हे । इसलिए उतने विस्तार के साथ यहाँ विवेचन नदीं किया जा रदा । श्ससे मन्ध 
विस्तारका भौीभयथा [ इससे स्पष्टहै किविमरदिनीकार मूलके विरुद्ध मम्मट के समर्थक 
हे ] पूर्वेषाम्‌ = प्राचीन = दद्धट आदि । तावत शब्द इस बात का चयोतक दै कि इस विषयमे 
विपक्षी को मी आपत्ति नदीं है । ध्याप्टया = व्याप्त कर = क्ष्य के सवेदेदा मं व्याप्त होने से क्यांकि 
तीन रूपका यह [ इलेषप या अर्थं ] सर्वत्र किक्तीन क्ििसीसरूप में दिखाई देता हे। तस्णृष्ठे= 
उसके पीछे अर्थात तुल्ययोगिता ओर दीपक के ऊपर । अल्काशन्तरागामर्‌ = अन्य अलंकारं 
का अर्थात्‌ उपम। सादि का । उत्थानमिति = क्योकि उन [अन्य अलंकारो | की प्रतीति तस्य 
योगिता भोर दीपकत्ते षी उठती है। अत्तएव = इसीख्एि अथात्‌ पिविक्तविषयता = स्वतन्त्र 
छत्र न शने से । प्रतिभानम्‌ = आभासमात्र । अथै यह कि विश्रान्ति उसी में नहीं होती । किन्तु 
वहं तथ्य जिस प्रकार सिद्ध भ होता वह अभी अभी कहा जा चुका है। इस प्रकार्‌ अपने मत 
के समधैन कै किए पहठे जो कदा है कि-- सका अन्य अलंकारो के साथया तो संकर रहता है 
या फिर दुबल रहने पर अन्य अलंकारो ते बाधितः, इसी को ओर अधिक विस्तार मे प्रतिपादित 
करने केकि अव यह वतलातेदहे कि यह अटंकार अन्य अलका को बाध देता है-श्रेष- 


१ 


्टैषाटद्कारः ३६दे 


इत्यादि के द्वारा । (ठृतीयकङायास्‌--ठृतीय कक्षा मे" = प्रथम कक्षा मे रूपक की ही प्रतीति होती 
हे । इरेष की प्रतीति होती है द्वितीय कक्षा मे । उद्धटानुयायी आचाय एक ओर तो इरेष को 
सभी अलंकारो का बाधक बतलाते देँ मोर दूसरी रवे ही कुच अल्कारों से उसे बाधित योता 
इआ मी वतलाते दै, यदह उनके दारा अपनी मान्यता काही विरोध है--इस तथ्य को ध्वनित 
करने के ङि उन्हीं [ उद्धट आदि] केद्वारा प्रतिपादित इलेष का रूपक ओर समासोक्तिसे 
वाधित होना यन्थकार ने यहां दिखलखाखा । बाध्यते = बाधित होता है- 'विदन्मानसहंसः 
इत्यादि [ दिल परम्परित रूपक ] म । बाधिका = “उपोढरागेण इत्यादि पँ मे । 

विमर्श--^नाप्राप्तेः = का मूल धेन नाप्राप्ते य आरभ्यते स तस्य बाधकः--य॒ह है । इसे 
येन की तृतीया का अथ है क्रतव, प्रतिषेधद्वय का अथं है आवदयकत्व, क्त प्रत्यय का सरं है भाव । 
शस प्रकार न्याय की माषा में इस वाक्य का अथं निकलेगा- 

'यत्कतृकावदयप्राप्तौ य॒ आरभ्यते स॒ तस्य बाधकः । पुनः येन के ्यत्‌›-शब्द का अथं है 
व्यापकत्वं ओर यः इसके यत्‌ दाब्द का अथै है व्याप्यत्व । उतः न्याय की भाषा 
अथं होगा- 

'व्यापकस्येव सर्वत प्राप्तौ निरवकायो व्याप्यस्तं [ व्यापकं ] बाधत्ते -- 

इन्दीं तथ्यों को मन्कार ने (नप्राकेषु जआरस्यमाणः" तथा शन्याप्त्याः--इन अंशो द्वारा सुचित 
किया था । पण्डितराज ने इरेष पर उद्धट का मत इसी प्रकार स्पष्ट किया है- अत्राहुरुद्धटाचार्याः- 
येन नाप्राप्तेय आरभ्यते स तस्य बाधकः इति न्यायेनालकारान्तरविषय एवायमारभ्यमाणोऽल- 
कारान्तरं बाधते ।› यह उद्भट के मत का अलकारसवंस्व प्र॒ आधित भावानुवाद मात्र है। उद्भट 
वी उक्ति इस विषय पर देसी है- 

शदिरष्टम्‌, अलकारान्तरगतां प्रतिभां जनयत्‌०)।४।९, ६०। 

--रिलष्ट अलंकारान्तर की प्रतिमा उत्पन्न करता है । उद्धट ने इस विषय मे इससे अधिक 

कुछ नदीं लिखा । केवर उदाहरणमात्र प्रस्तुत कर दिए है- 
'प्रभातप्तन्ध्येवाप्वापफलरुटन्पेहितप्रदाः- 

-- पावती प्रभात सन्ध्या के समान थीं--अस्वापफलङ्ग्येदितप्रदा = [ पावंती-न, सु आप 

फल = दुलेम फर पर॒ लव्धको ईहित = अभीष्ट फल देने वारी तथा प्रभात (्सन्ध्यास्वापफल = 


निद्राफर श्रमपरिहार पर लन्धस्वाप फर लुब्ध, तद्धिन्न अस्वापफलल्ब्ध उसमें हित = हितकारी 
अदृष्ट उत्पन्न करने वारी ] इसी प्रकार- 


“अविन्दुसुन्द्री नित्यं गलल्लावण्यविन्दुकाः 
-- पावंतौ अविन्दुसुन्दरी भी थी ओर उनसे रावण्यविन्दु चरते रहते थे [ विरोध ], [ परि. 
हाराथ- | अप्‌ = जल उसमे प्रतितिभ्वित जो इन्दु = चन्द्र उप्तसी स॒न्दरो । 
प्रथम मे उपमा ओर द्वितीय में विरोधाल्कार है उद्धट के अनुसार उनका अस्तित्व प्रात्तिभासिकं 
मात्र है । वास्तविक सत्ता दलेष की ही है । परन्तु उद्धट ने अपनी इस मान्यता की पुष्टि मे 
कोदं हेतु नदीं दिया । आनन्दवधेनाचाये ने इपे इसी रूप मँ स्वीकार कर छिया । उन्होने ध्वन्यालोक 
के द्वितीय उयोत मे देष को उपमा व्यतिरेक, विरोध आदि अल्कारो से पुष्ट होता हुआ कहा 
हे ओर वहं 'येन ध्वस्त०› पद्य प्रस्तुत कर यह भी कद दिया है किं रेष वहँदोता है जहौ 
दोनो थे अभिधा द्वारा कथित होतेह स।ध दही वहं यदि अन्य कोड अलंकार मी वाच्य होता ह्यो 
तो वहां देष ही माना जाना चाहिए-वस्तुहये शब्दराक्त्या प्रका्चमाने रर्षः, तथा - य॑त् 
द व्दरक्त्या साक्षादटंकारान्तरं वाच्यं सत्‌ प्रतिभासते स सवेः ररेषविषयः) । [ १० २३५-३६ 


मी 


+~ ~ 


३६४ अलङ्कारसवंस्वम्‌ 


चो० सं° १९९७ ]। आनन्दवधेनाचायं के ही समान महिमभद्रने मी उद्भट के मत को स्वीकार 
कर चिया । उन्दने व्यक्तिविवेक के द्वितीय विमं मे अकारो की सीमा निधांरित करते हृ ओर 
अनेकं अल्कारो मेँ वाच्यावचन दोष वतलाते इए छिखा है- 
यत्र हि यदलंकारप्रतिभानुगुणशब्दोपरचितः दलेषः तत्र तदलंकारनिवन्धः तमैव दरेषमभि- 
व्यनक्ति, न त॒ तस्य विषयमतिक्रामति ।› [ प० ३९५ चो० सं° २०२५ | 
"जहाँ जिस अलंकार का सामास मात्र कराने के ल्टिकी गर पदरचना से देष बनता दै" 
वहो वह अलंकार उसी देष को अभिभ्यक्त करता है, उस [ इलेष ] के क्षेत्र मे वह्‌ स्वयं न्दी 
धमकता ।› इसी तथ्य को कारिकारूप मं उपनिबद्ध करते हए उन्होने लिखा-- 
यदलंकारव्यक्त्ये ये शब्दास्तदितरोऽपि तैरेव । 
न्य॒ज्येताल्पतरैयेदि तदसौ ग्रद्येत लाधवान्नान्यः ॥ 
व्यक्तिविवेक की टीका मेँभी अलंकारसर्वस्वकार ने उलेष को निरवकार मानकर अन्व 
अरुकारो का वाधक हरी माना है--“उपमोत्थापिते केषं नोपम। इरेषं वधते, तस्य विविक्तविषयत्वा- 
भावात्‌ , देषस्तु तां बाधते इति युक्तम्‌ ।' [ द्रश्व्य-प० ३९६ च० सं० नवीन संस्करण | । 
आनन्दवधंनाचायं ने दरेष के विचार के पूवं अस्पष्ट स्वर मेँ इलेष को भलकारान्तर से एक्‌ 
वतलाया था । मम्मट ने उसे पकड़ छया । भौर उद्भट के मत कै विरुद्ध इष को अन्य अलंकारो 
दरा बाध्य वतरने हेतु भपेक्षित अल्कारान्तर से देष का पाक्य बतलति हर उन्दोने- 
देव ! त्वमेव पातालमाशानां त्वं निवन्धनम्‌ । 
त्वं चामरमरुदभूमिरेको लोकत्रयात्मकः ॥ 
-यह पद उद्धृत किया । इसका अर्थं है-दहे राजन्‌ ! आप लोकत्रयात्मक दै आप हौ 
“पातालम्‌? [ पाताल = नागलोक तथा पाता अकम्‌ = पर्याप रक्षक ] है, आप दी आश्ानिवन्वन 
[ = आशा = दिशा उनके ।धार एथ्वीलोक, आश! = इच्छार्णं उनके आधार | है, आप ही ध्वामर- 
मरुद्भूमि? [ च = ओर समरमरुत्र = देवगण तथा पवन कौ भूमि = स्वगं तथा चामर--चवर की 
मरुत्‌ =दवा को भूमि=आस्पद्‌ = विषय जिसपर चवर दले जाति हं | परन्तु व्हा राजा पर तीनों 
छो क्षा आरोप है तथा अन्य राजा जहाँ कोई एक कायं करने तक्र सोमित हँ वहां यह राजा 
अन्य सव कायं मी करता र अतः यद उने उल्क है, इस व्यतिरेक का भी अस्तित्व है । अतः 
य॒ स्थर शुद्ध दलेष का स्थल नदीं माना जा सक्ता । पण्डितराज ने भी रसगंगाधर मे इस पय 
। 3 ल्पकप्रतीति मान मम्मट का खण्डन क्षिया दै। वस्तुतः स्वयं मम्मश्ने भौ इस स्थल मं रूपकं 
व्यतिरेक का स्पद्चं अनुभव किया था। यद तथ्य उन्हीं के इसत प्यके वादके म्रन्थाजञ से क्षल्कता 
है। दटेष की अलंकारान्तररद्टितता के लिए अलंकारसरवंस्वकार ने आनन्दवधेनाचायं द्वारा प्रस्तुत ध्येन 
ध्वस्त० पद्य चुना । इसते मम्मट की स्थापना को वरु मिला । 
मम्मर ने उद्भट के मत का खण्डन करते हए अन्य तकर मी दिए थे। उन्होने कहा था पूर्णोपमा 
स साधारण धर की निष्पत्ति नियमतः दलेष ते ही होगी, वरहो यदि दष को दी अलकार माना 
जायगा तो पूर्णोपमा कीं होगी दी नदी--धूर्णोपमाया विषयापहार एव स्यात्‌, । इती भरकर 
उन्दोनि व्यतिरेक, विरोध, रूपक अदि भन्य मलंकास म सी इलेष को निष्पादक भौर व्यतिरक 
आदि कौ ही निष्पाघकूप से प्रधान सलंकार मानाहे। 
पण्डितराज जगन्नाथ ने इन दोनो पक्षौ को अपनी भाषां स्पष्टीकरण के साथ उद्धृतमति 
कर दिया हे । उनका संपूणं विवेचन स्व॑स्वकार तथा विमर्िनीकार के मत पर आधृत है । सव 
स्वकार्‌ उद्धर ओर ध्वनिकार के भनुयायी है गौर विमर्चिनीकार मम्मट के । उन्दने येन ध्वस्तः 


श्टेषालङ्कारः ३६५ 


पद्य में तुल्ययोगिता का अभाव बडी वारीकी से सिद्ध किया है। पण्डितराज ने उसे स्वीकार कर 
लिया है । वस्तुतः "येन ध्वस्तः पथमे तुल्ययोगिता के अमाव की बात भल्काररत्नाकर से ली 
गे है। अल्काररत्नाकरकार ने सवस्वकार के--“इह प्राकरणिका-- त॒ल्ययोगितायाः प्र्ति- 
आनम्‌ इस कथन का मावाथे स्पष्ट कर उसका निराकरण करते हुए कहा है- 


-- थेन ध्वस्तमनोमवेनेः - त्यादौ यत्र प्रकृतयोरप्रकृतयोवां विदेष्ययोः सछृदुपादानं तक्र 
तुल्ययोगितायाः अभावात्‌ । 


--[ सवैस्वकार का उक्त कथन अमान्य है ] क्यांकि तुल्ययोगिता मे प्रकृत या मप्रक्त विष्यं 
का अनेक वार कथन रहता हे, एक वार्‌ कथन रहने पर तुल्ययोगिता नहीं होती । ध्येन ध्वस्त०? 
पद्य मेँ विरेष्यां का कथन एक वार ही है अतः य्ह तुल्ययोगिता नदीं है): आगे कोरि प्रकोरि 
चलाते हप उन्होने छ्खिा कि यदि आवृत्तिके द्वारा विशेष्यं का असकृत्‌ उपादान मान च्या 
जाय तो धमो का उपादान भी उसी प्रकार आब्ृत्तिके दारा एकाधिक बार मानना पड़ेगा । 
उसे धमो मे अनेकता चली आण्गी । तुल्ययोगिता खा दीपक केवल धम की पएकतामें ही होते हे । 
अतः आवृत्ति दारा विष्य कौ अनेकता मानने पर भी तुल्ययोगिता सिद्ध न होगौ। इस प्रकार 
मम्भः, रोभाकर्‌ ओर जयरथ इरष की बाध्यता स्वीकार करते है जवकि उद्भट आनन्दवर्धन तथा 
अलंकारसवेस्वकार अलंकारान्तर की । एकतर पक्ष के निणैय के लिए एकमात्र चमत्कार प्रयोजकता 
को कसोरी माना जा सकता है । सहृदयो के भनुभव से चमत्कारनिष्पत्ति इरेष या उरेषेतर भिस्ते 
सिद्ध होती हदो उसीको अल्कार माना जाएगा तव निरवकाश्चत्व भौर सावकाद्चत्व के शाख्ीय 
जटप अकिंचित्कर सिद्ध हांगे जहाँ एकाध रिष्ट विदेषण से उपमादि निष्पन्न होतेर्हो वहां 
उपमादिका ही चमत्कार मानाजा सकता दै ओर जद 'उदामोस्कल्िकाः भादि स्थलों म अनेक 
विशेषणो में श्टेष हो वदां निशित ही चमत्कार इरेषयोजनासे होगा । . फलतः वहां इष ही 
मानना उचित होगा । अलकाररत्नाकरकार शोभाकरमित्रने श्सतथ्यको स्वीकार कियाद ओर 
इरेष को पांच स्थिति मे मिक्ता बतलाया है- 

'प्रधानभूतालकारवियोगात्‌ सावकाडता । 
ऊुचरचित्‌ प्रतिमोत्पत्तिहेतुत्व कचिदङ्चता ॥ 
कचित्‌ प्ररोहविरहात्‌ प्रातिमत्वं परत्र च । 
अनुप्राणकतास्येति इर्षोऽयं पञ्चभूमिकः ॥ 

दरूष पांच भूमिकां में निष्पन्न होता है- 

( १ ) स्वतन्त्र भूमिका, जहां अन्य किसी भल्कारका इसके साथ भिश्रण नहीं होता। 
[ यथा--धयेन ध्वस्त०ः-प्यमें ]। 

( २ ) भन्य अल्कारों की सत्ता प्रातिमासिक सिद्ध कर रहने की भूमिका । [ यथा-~'सकल- 
कलम्‌ इत्यादि प्य मं |। 

( ३ ) अप्रधानता कौ भूमिका, [ यथा--'विष्णुका वक्षस्थल ससुद्रतट के समान वनमारूभरण 
है इस वाक्य मे वनमालाभरण' शब्द म वनमाला एक माला, वनमाला = तयवत्तीं जगल की पात 
यहां इरेष उपमा काञंग हे |] 

(४ ) आभासात्मकता कौ भूमिका [ यथा-'भनिन्दुसुन्दरी ०” स्थलमे विरोध की प्रधानता 
होने से श्केष को आभासात्मकता | 

(५ ) अनुप्राणक्रता कौ भूमिका, [ यथा-समासोकि मं] । 


३६६ अलङ्कारसवेस्वम्‌ 
बिमरिनी 


एवं श्रेषस्यालंकाराणां च परस्परं बाध्यबाधकभाव प्रकाश्यान्येः सहाध्य स ङी णत्वं 
दरशंयति--इह स्विस्यादिना । | 

हस प्रकार [ उपर्युक्त मन्थ द्वारा ] ररेष भौर अन्य भलंकारों का परस्पर मे वाध्य॒वाधक- 
आव दिखलाया । अव इकेष का अन्य भलंकारोँ के साथ सांकयं दिखलति हए किखते है- 


[ सवंस्व | 


इह तु-- 
'त्रयीमयोऽपि प्रथितो जगत्ख यद्वार्णों परस्यगमद्‌ विवस्वान्‌ । 
मन्येऽस्तन्नेलात्‌ पतितोऽत प्व विवेदा द्ुच्छे बडवाग्निमध्यम्‌ ॥' 

इति श्लोके विवस्वतो वस्तुच्रदसंभवि अधप्रदेशसंयोगकश्चणं यत्प: 
तितत यच्च वडवाग्निमध्यभरवेरास्ते दे अपि च्रयीमयत्वसंबन्धिवारुणौ- 
गमनरूपविङद्धाचर्णदेतुकाभ्यां वतितत्वाग्निप्रवेश्याभ्यामतिरयोकत्या इेष- 
मूखया अभेदेनाध्यवसिते । सोऽयतेकक्रियायोगः ! सद्धेत॒का च मध्ये "अत 
पव उद्धयः शत्युस्परेश्चा । अत्रात पवेति पराशश्ो विरोधालंकासखकतोऽथो 
देतस्वेनोत्मरेक्ष्यते । श्चद्धयै इति च फलस्वेन । ततश्च हेत॒फलयोदधेयोरप्य्ो- 
तमेवा । विरेधाटंकारस्य च विरोधाभासत्वं लक्षणम्‌ । अतो विरोधामाखन- 
लमय पव देतपलरोसपरे्वयो खल्थानम्‌ । उत्तरका तु वियेवसमाधिः । 
शेषस्य च स्वौटंकारापवादत्वाद्‌ विरोधभ्रतिभोत्यत्तिदतुस्यं श्छैषः। 

५ वेद्‌- ] ्रयीमय रूप से तैरोक्य में प्रसिद्ध दोने पर मी सूयं वारुणी [ पश्चिम दिशा तथा 
मदिरा ] की ओर जो गया भँ सोचता हं कदाचिव इसी से [ पतित हकर भौर ] अस्ताचल् से 
गिरकर शुद्धि के लिट वडवाग्नि मेँ प्रवेश्च कर रहा हे । 

इस पां मे अधः पदेश्च से संयुक्त दोना रूपी जो वास्तविक परतितत्व = गिरना दं भौर 
जो वढवाग्नि मे प्रवेद करना है ये-दोर्नो वेदत्रयीमय होने पर भी वारुणीगमन करने रूपी निरुद्ध 
आचरण से जनित जो पतितत्व तथा अग्निवेश्य है उनके द्वारा इलेषमूल्क अत्तिशयोक्ति के भाधार्‌ 
पर अभिन्न रूप से भध्यवसतित दै ओर यह हमा [ समासोक्ति का जनक सूयं तथा षार्भिक पुरुषरूपी 
दो विभिन्न व्यक्तियों का भग्निप्रवेश् रूपी ] एक क्रिया मँ अन्वित होना । इसके भाधार पर 
निष्यन्न होती है शँ समक्ता ह कि इसीसे शुद्धि के किण" - यहं । देत॒-फलो प्प्र्षारूपी ] उत्प्रेक्षा. 
इस [ उत्प्रेक्षाया ] मँ श्सीमे [ अर्थात्‌ विरुद्ध भाचरण करने से ] इस प्रकार पराग्रष्ट जो विरोधाल्कार 
हे उसमे अलङ्कत भर्थं हतुरूप से उप्प्रे्षित दो रहा हे भोर [ उसीमे ] शुद्धि के लिए" यदह अंशा 
फलरूप से । इत प्रकार यहां हेतु नौर फल दोनो की उ्प्रक्षा हो रदी है । भौर जौ तिरोषा- 
लकार है उसका लक्षण है विरोधामासित्व, अतः हेतु बौर फल की उग्प्रक्ार्ओ का उत्थान उसी 
सप्रय होता दै जव विरोध का आभासात्मक ज्ञान होता रहताहै। वादर्मेतो विरोध कासमा- 
धान ( परिहर ) हो जाता है। इधर दलेष जो दै वह सभी भलकारो का भपवादक है भतः इस 
पद्य मे इरेष विरोधप्रतिमोत्पत्तिहेतु होकर स्वयं प्रधान लकार है । 


भक 


समासोक्त्यलङ्नारः ३ ६.७ 
विमदिनी 


वडवाग्निमध्यभ्रवेशेऽपि चस्तरञत्तसं मवीति विशेषणं लिङ्गवि परिणामाद्‌ योऽयश्च । 
ते दे इति, वडवाग्निमध्यप्रवेशपतितसव्वे । पतितत्वाग्निप्रवेदाभ्याभिति, नाद्यण्य परिच्याव- 
प्रायश्चित्तात्मकाभ्याम्‌ । सोऽयमिति । यत्‌ पतितत्वाभ्निपवे्ञयोवंस्ततोऽन्यथास्थितयोरम्य- 
न्यथाभरूताभ्या ताभ्यामभेदेनाध्यवसायः । तद्धेतुकेति तच्छब्देन तच्छियायोगपरामरलः । 
फलत्वेनेति उप््रेचयत द्व्यत्रापि संबन्धः । ततर्चेति हैतुफकयोद्व॑योपरेचयमाणस्वाद्‌ । 

-वस्तुदृत्तस्तंभविः = वास्तविक" यद जो विरेषण है इते किगपरिणाम [ नपुंसकच्गि को पुंदिज्ग 
मे वस्तुवृत्तसंभवीः इस प्रकार वदल ] कर भन्वित करना चादिए । ते द्वे = वं दोनो अर्थात वडवाग्नि 
मे प्रवेद ओर पतितत्व । "पतितस्वाग्निप्रवेक्ञाभ्यासर" = "पतितत्व ओर अग्निप्रवेशः जो बाद्मण्य = 
ब्रह्मवृत्ति से च्युत होने का प्रायधित्त हँ । “सोऽयस्‌* = यह अथात्‌ मूलतः भिन्न रूप कै पत्तितत्व 
मौर अग्निप्रवेश् भिन्न रूप के उन्दी परतितत्व ओर अग्निग्रवेद् दारा अभिन्न रूप से अध्यवसाय 
तद्धेतुका = इसमे तत शब्द से उपर्युक्त [ प्रवेश ] करिया म [ दो भिन्न व्यक्तियों के] अन्वय का 
परामश है। फरुत्वेन = फल रूप ॒से = इसमे मी उत्पक्ष्यते = उत्प्रेक्षा की जाती है = इसका 
संबन्ध है । ततश्च = इस प्रकार = हेतु भौर फल इन दोनों की उत्प्रेक्षा हो रही है शस कारण । 


विमद्धिनी 


नु विरोधारुकारश्य विरोध एव रूपं तस्य दुष्टत्वात्‌ इधते च समाधाने विरोध एव 
नास्तीति विरोधारुृतोऽथेः कथमनत्रोपप्र्तायां हेतुस्वं मजत इस्याचाङ्कवाह-विरोधेव्यादि । 
यद्वचयति--“विरोधाभासस्वं विरोधः' इति । अत एव च विरोधस्यामाखसाच्रसारस्वाद्‌ 
यथावमास विध्रान्त्य्वान्न प्ररोहो नापि बाघोन्पत्तिः, अपितु रैत्तिकउव ङरस्तस्भते मिरिक- 
चन्द्र द्याव भासवदसिति प्रष्यय इति नान्न पूवं विरोधबोधः पश्चादविरोधक्षीरिति वाक्य- 
स्यावस्थाद्वयम्‌ । ननु बाध्यनिषेधपरो नैतदेवमिति प्रव्यथरूपो बाधो बाध्यं च तथेव प्रतीयते 
चेत्‌ कि तेन छतं स्यादिति चेच्‌ › स्खरद्वतिस्वमिति ब्रुमः! तथाहि श॒क्तिकारजतमरीचिका- 
सङिरखादिविरान्तिष्विवं नात्र प्रथसप्रचत्तविङ्द्धम्रतिभासस्व भावबाध्यविल्लानसयघुख्ुंस- 
नेन बाधकस्वसयुदेति, बाधोदयेपि पैन्तिकञवरुरस्तम्भतेमिरिकचन्द ह्वयाव भास्वद्‌ विश्ड- 
प्रतिभासानिच्त्तेः । कंवल्मन्र तद्वलदेवानुपपयमानताकारा स्खरूद्भतितेवावगस्यते ॥ 
स्खरद्भतिष्वे च प्रतिपत्तन्यवहारं प्रति निसित्तत्वाजुपपत्तिः। न हि पैत्तिकः स्वपित्तविका- 
राञऽवलरूतम्भदंनं मन्यमानणर्तत्र दाहपाकादयर्थितया प्रवतंते । तिमिरदोषं वा जानान 
रतेभिरिकोऽपि बहिश्वन्द्र ह यास्तित्वव्यवहारं विधत्ते । पुवं बाघोत्पत्तेरुपप्यमानव्वात्‌ 
स्खद्वतिस्वेन प्रतीयमानोऽपि विरोधो न प्रतिपच्त्रपे्तोपपरे णरक्तणभ्यवहारनि मित्तभाव- 
मुपगन्तसुव्सहते । यतोऽनुपपद्यमानव्वेन स्खरुद्रतिष्वसुपप्ययमानत्वेन च ऽयवहारनिमित्त- 
स्वमिति परस्परविश्द्धत्वादजुभवविरोधाच्च तयोः कथमेकत्र समावेशो घटते । अतश्चाने- 
नेवाभिप्रायेणाह-अत इष्यादि । विरोधामासनसमय वेति, न तु बाधकोदयसमय 
हव्यधः। बाथोदयानन्तरं विरोध्यो पपर्ाहेतुष्वं न युऽ्यते इषध्युपपादितं ्थितं चोस्पे्ा- 
हेवं विरोधस्येति बाधोदयाश्रागेवान्यथानुपपर्या निश्वीयते। बाषस्य च स्वारसिकत्व- 
वस्तुच्रततेः पयांरोचनारुभ्यष्वेन ह्विविधस्यापि र्व्नोत्तरकारूमेवोदरासः संभवति । तस्य 
च वाध्यनिष्ठव्वादाध्यस्य च पूवंकारमाविस्वात्‌। अन्यथा हि नि्विषयो बाधः श्यात्‌ । 
अतश्वोत्तरकाकं तु विरोधसमाधिरिति भणितेर्थ॑मजानानेनायमथोऽन्वेषणीयः। यदि हि 


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३६८ अलङ्ारखवेस्वम्‌ 


बाधः ्रागप्युसेक्तायाः स्वाधिकारवरेन स्वरसत एवोररसेत्‌ तदुक्तनीत्या उस्परे्ठोरथानमेव 
न स्यादिस्यबाधित एब विरोध उस्प्रेलाया निमित्तमि्युक्तुत्तरकारं विरोधस्षमाधिरिति । 
स च खमाधिरन्र दिगादर्थाधिगमादवचुभ्यत इति विरोधस्य श्डेषोऽङ्गम्‌ । तद्वश्चादेवा. 
स्योस्थानात्‌ 1 तथा चात्रानयोः सक्छीणंस्वमाच्रमेव न पुनः संकरालकारः। स त यथा- 
'सञ्जातपन्रप्रकूराश्चितानि समुद्ह न्ति स्फुटपाटर्व्वस््‌ । 
विकस्वराण्यकं करप्रभावाद्‌ दिनानि पद्यानि च चृद्धिमीयुः ॥' 


अन्न श्छेषतुक्ययोगितयोरेकवाचकानुप्वेशेन संकरः । प्राच्यानां मते पुनरेतत्परति 
मस्पत्तिदेुः श्खेषोऽयमिस्याह--दलेषस्येरयादि । तेनाथः प्तः श्वाभिप्रायेण अन्थङ्ृतोक्तः । 


य द्व चयस्ये तच्छुरो क विचार एव संकरारुकारे । अत्र प्रथसमेऽघं विरोधप्रतिभोत्पत्तिहेतुः 


श्खेषः । द्ानान्तरे तु विरोधरश्केषौ ्वावरूकाराविति । 
प्रन = विसोधालंकार का स्वरूप विरोध ही है ओर वह॒ अपने भाप मेँदोष सूप है, फलतः 
उसका समाधान [ परिहार ] किया जाता &, ओर जव परिहार दो जाता हे तव विरोधका 
अरितत्व ही नदीं रहता । इस प्रकार विरोध से कोई अथ मल्कृत दी केत होगा जो उच्रक्षा मे हेतु 
बनेगा ।? इस्त पर॒ उत्तर देते दए लिखते है--"विरोध०? इत्यादि । जैसा फ भगे कदैगे ¶विरोषा- 
भासत्व विरोधः है । [ भलकाररत्नाकरकार ने त्रयीमयोऽपिः पच भौर उसपर भलंकारसवंस्वकार 
का मत उद्धृत कर उसका खण्डन करते हर छिखा था-विरोध मं समाधान रब्दरभ्य न होकर 
सामाजिक को मानस अनुभूति से लभ्य होता है जो पयांलोचनरूपा होती है । विरोधकावाध 
हो जाने पर भी श्चब्दसे तो विरुद्ध अथंकादहीन्ञान होता रहता हि। इसलिए विरोध का परिहार 
वाक्याथ का अंग कभी भी नदीं बनता, इसकिए यदां उत्तरेक्षाप्रतीति के बाद परिह।र का वाक्याथ 
मे मानना ठीक नदीं । अन्तम विरोधपरि्ार का अर्थं केवर इतना ही है कि विरोध प्रातीत्तिक 
है, वास्तविक नदीं । अन्त मे परिदार का अभ यह्‌ नदीं है कि आरम्म मे विरोध वस्वृतः रदताहै 
जओर अन्त म उसका परिहार दो जाता हे ( द्र० ए० ९२, ९३ पूना संस्करण ) । शसीको स्वीकार 
करते इए किन्तु अलंकारसर्व॑स्वकार के मत का समर्थन ( खण्डन नहीं) करते हए विमरिनीकार 
कहते दै-- ] ओर श्सीलिए [ ग्रन्थकार के मतम] विरोध के अभासमत्ररूप होने पे उसकी 
प्रतीति प्रयैवसान मे भारम्भ सैसी नहीं होती, फलतः न तो वह्‌ प्ररूढ ही हो पाता जोर न उपतका 
परिहर ही होता अपित॒ यहां पित्तरोग से पीडित को जसे जलते भग्निस्तम्भ दिखाई देते है 
अथवा त्िमिररोग से पीडितिकोदो चन्द्रवती दो अर्थोकी प्रतीति मात्रहोती है। इसलिए 
न तो यहां पहले विरोध का [ भामाससूपमेज्ञानन होकर विरोध रूपमे ही] ज्ञान होता 
मोर न बाद में भविरोधका ज्ञान होता, जिससे वाक्याथंको दो भार्गो मे विभक्तं किया जा सके 
[ प्रन ] बाध "यह रेसा नींहै" शस प्रकार के ज्ञान का नामहै। शसते बाध्य अथं का 
निषेष इभा करता है । यदि यजौ बाध भौर बाध्य दोनों की दी वसी [ द्विचन्द्र भादि जैसी ] 
प्रतीति मान खी जाय तो उससे क्या हयेगा ? [ उत्तर = ] इसत विरोध का ज्ञान केवर अभासा- 
त्मकमात्र सिद्ध होगा । [ विरोध पूर्णतः कट नीं जाएगा ] विरोधाङ्कार के विरोध के परिहार 
मे जो बाधक्ता होती है वह्‌ पहले से हो रहे भामासात्मक विरुद्ध ज्ञान रूपी बा्य को रखाड कर 
नई होती जेसी कि युक्ति मे हो र्य ैया मरुमरीचिका में दहोती जरू की आन्तिर्मे। यदांतो 
वाधक प्रतीति हो जाने पर भी विसतेधाभासरूपी बाध्य अथं हरता नदीं है जैसे पिन्तन्याभिवाले 
क समाने से असत्य खूप से विदित होने पर भी अग्निस्तम्भ नहीं इटताया तिभिररोग वाङ 
मे सामने से चन्द्रदेत । यदं केव इतना होता ह विरोष मै भनुपप्मानता [प्ररूढ न दो 


श्ठेबाटङ्कारः ३६९. 


पाना ] आ जाती हे वह्‌ भी इसलिए किं केवर [ परिहार, समाधान ] की उपस्थिति के कारण 
ही ! इस आमासात्मकता, स्खल्द्गतिता या अनुपपच्मानता से लाम यह है करि विरोधज्ञान 
बोद्धा कौ प्रवृत्ति का कारण नहीं वन पाता रएेसाथोडे हीहै कि पित्तका रोगी यह जानते हए 
किं उसे जो अग्निस्तम्भ दिखाई दे रहा है वह विकार के कारण दिखाई मर दे रक्षारहै उसका 
वास्तविक भसरितित्व नहीं है, उस अग्निस्तम्म में ङ्क जलाने या कुछ पकाने पद्व जाता हो अथवा 
तिमिर रोगका रोगी तिभिर-विकार को जानते हए मी [ अपनी अभासात्मक द्विचन्द्र प्रतीति से ] 
बाहर भी दो चन्द्रौ का अस्तित्व जतराता फिरता हो । इसत प्रकार बाध [ परिहार ] उत्पन्न हो जाने 
के कारण विरोध वास्तविक सिद्ध नीं हा पाता 1 वह्‌ अभासात्मकमात्र सिदध होता है ओर इस 
रूप मे प्रतीत होता रहने पर मी विरोध बोद्धा के मानस में उप्प्रक्षारूप व्यवहार का कारण नहीं 
बन सकता , बात यह हे कि अवास्तविकता सिद हो जाने पर॒ आभासात्मकता, उत्पन्न होती है 
व्यवहारनिमित्तता [ नहीं, वह ] सिद्ध होती है वास्तविकता सिद्ध होने पर । इस प्रकार [ अभासा- 
त्मकता तथा व्यवहारनिमित्तता ] ये दोनों धस परस्पर मे विरूढ है ओर भनुमवमें भीय 
विरुद्ध ही प्रतीत होते हे, अतः इन दोनोका एक ही स्थान पर समावेश केसे दो सकता है । 
इसी आपत्ति के कारण इस सव अभिप्राय से अमन्थकार ने किखा-अतः [ विरोधाभासनसमय |] 
इत्यादि । विरोधाभासनसमय एव = विरोध के आमासात्मक ज्ञान के समयतक हीन कि 
बाधक [ परिहार | के ज्ञान के समय तक! वाधोदय के पश्चात्‌ विरोध उत्प्रेक्षा को जन्म नीं 
दे सकेगा जर अलुमवमें भारहादहैकि विरोध उत्परक्षाको जन्म दे रहा है, मतः अन्यथा- 
लुपपत्ति रूप अथापनत्ति के माधार प्र यहां बाधोदय के पहर ही विरोध को उत्परक्षादेत मान केना 
दोगा । ओर [ अलंकाररलाकरकार के द्वारा प्रतिपादित ] जो दो प्रकार का वाध है८( १) वास्तविक 
ओर (२ ) बोडा कौ पयालोचना से प्राप्य, दोनों ही प्रकार का वह [बाध] प्रत्येक स्थल मेँ विरोध की 
प्रतौति के वाद ही हो सकता हे क्योकि वह निभैर है बाध्य पर, फलतः वाच्य को पहर से विमान 
दोना चाहिए । मोर वहु पदलेसे रहाभीआतादहै। रेसानहोतोवाधहो हये किसका १ इसलिए 
[ अलंकाररलाकरकार ने सवस्वकार के ] बादमेंतो विरोध का परिहार ही हो जाता डै-- 
इस कथन का [ दम।रे द्वारा प्रतिपादित ] उक्त जथ नहीं समञ्चा । [ अतः इसका खण्डन किया 
दे ] अतः उन्हें [ उनके अनुयायिययो को ] यहां एेसा ही अथे निकलना चाहिए । "यदि परिहार भपने 
भाप उप्प्रक्षा के पहर हौ जाए तो उक्त क्रम से उ्मरेक्षा का उत्थान हीन हो, अतः विरोध परिहार 
क पुवं ही उत्प्रेक्षा का निमित्त बनता हुआ माना जाना चादि यद है अभिप्राय बादमेंतो 
विरोध का परिहार हो जाता है--इस कथन का। यहजो परिहार है यह [ वारुणी का] दिशा 
आदि रूप अथं समञ्चन पर विदित होता है इसलि० इरेष विरोध का अंग है । क्योकि उस [ इष ] 
के ही आधार पर इस [ विरोध ] की निष्पत्ति होतीहै। तो रपत प्रकार [ व्रयीमयोऽपि ] इस 
पथ मे इन दोनों [ विरोध ओर रेष ] मे संकरमात्र रै, संकरालंक।र नही । वहं [संकरालकार] तो 
[ यदीं उस्ययोगिता के प्रकरण मे उद्धृत ] 'सजञातपत्रप्रकरा०" इस प्य के अर्थं नेहै। क्योकि 
इस पाथ में रूष ओर तुल्ययोगिता का एकवाचकानुप्रवेद् संकर है। प्राचीन आचार्यो ने इष 
को विरोध का बाधक [ प्रतिमो्त्तिहे ] माना है, इस तथ्य को बतल।ते हए छिखते है - श्डेषस्य 
इत्यादि । ग्रन्थकार ने अपने मतकेरूपमें प्रथम पक्ष ही प्रस्तुतक्िया है, जेसाकि संकरालकार 
पर विचार करते समय आगे कगे । इस [ त्रयीमयो पच] मँ पूर्वा म विरोध को 


दवाकर दर्प ही भलंकार है। दूसरे सिद्धान्तो के अनुसार यहाँ विरोध ओर रेष दोनों ही 
अलंकार ह । 


२४ अ० खर 


३७० अलङ्ारसवेस्वम्‌ 
विमरिनी 


च (६ [] . ¢ [ | 2 ॐ 
तदेवं स्वमतानिप्रायेगच्याङकारान्तरव दन्याटंकारे; सह बाध्यवाधक भावं संकीणव्वं 


च प्रकाश्य शब्दशाक्स्युद्धवाद्‌ धयन्ति रोषं प्रतिपाद्यति-- यत्र तिवित्यादिना । 


~ ~ € अ 

इस प्रकार अन्य अलंकार्यो के समान इस अलंकार का वाध्यवाघकमाव तथा सांकयं अपने 

मत के अनुसार प्रकारित फिया। अव खाब्ददाक्तिमूलक ध्वनि से इस [ देष ] का अन्तर वतलाने 
के लिय क्िखतेदहे-- 


[ स्वेस्व | 
यत तु घरस्तुताभिषेयपरत्वेऽपि वाक्यस्य श्िलष्टपद्सदिर्ना वक्ष्यमाणा 

थनिषठमु पश्चेपापरभिधानं स्तूचकत्वं त्च कि टेव उत ब्द रक्तिमूछ- 
ध्वनिरिति विचार्यते ~ तत्न न तावच्छठेषः, अथंद्वयस्यानन्वितत्वेनाभिधेयतया 
वक्त॒मनिषधेः । नापि ध्वनिः, उपष्चेप्यस्याथेस्य संवद्धत्वाभावात्‌ तेन सहोप- 
मानोपस्रेयत्वस्याविव्चणात्‌ । न चान्या मतिरस्ति । तदत्र कि कतव्यम्‌ । 
उच्यते - श्ठेषस्योक्तनयेनाप्रच्सेध्वनैरेवायं विषय इति निशिचुमः। तथाहि 
शब्द्राक्तिमूे ध्वनावथीन्तरस्यासंवद्धत्वात्‌ संबन्धाथेमौ पम्यं कर्ष्यते । 
स च संबन्धः प्रकारान्तरेणौपम्यपरिहारेण यदथुपपादयितुं राक्यः स्यात्‌ 
तत्‌ कोऽयमभिनिवेद्ास्तन्न ? उपमाध्वनौ वस्तुध्वनिरपि संबन्धान्तरेण 
समीचीनः स्यात्‌ । अत पव 

“अत्ेकायो ऽथ वस्त्वेव राब्दाद्‌ यच्नावभासते । 

प्रधानत्वेन ख ज्ञेयः राब्द्राकत्युद्धबो द्विधा ॥\' 


इति व्यायभवनवबन्धेन द्विधा राब्द्राक्व्युद्धब उक्तः पवं प्रकृतेऽपि 
यत्र सूचनाऽ्यापासेऽध्वि तत्र रब्दरक्तिषूले वस्तुष्वनिर्बोद्धञ्यः । यथा- 


सद्यः; कौरिकदिग्विजम्भणवशाद्‌ाकारागषट स्लात्‌ 
त्यक्त्वा धुखलरकान्तिवस्कलधसे राजास्तशें ययौ । 
तत्कान्ताप्यथ सान््वयन्त्यलिकुलष्वानेः सनुल्ास्तिभिः 
कन्दन्तं कुमुदाकरं खुतमिव दिधर प्रतस्थे निरा ॥' इति । 
हर्श्चन्द्रचरितेऽच्र प्ानवणेनायुगुण्येन राजशरान्दाभिषेयेऽस्तमुपेथुषि 
च्रं रोहिताध्वाखडयतनयसदहितया उदशीनया वध्वा युक्तस्य दरिश्चन्द्रस्य 
राज्ञो वि्वामित््ल्तपादितोपद्रववक्लात्‌ पातः स्वराष्ट्र त्यक्त्वा वाराणसीं प्रति 
गमनं सूचितं स्यात्‌ । तथा च कौरिकङ्चाव्दः प्रकृते इन्द्रो टूकयोवेतेते । 
सूचनीया्थविषयत्वेन तु विभ्वाभित्छघ्न्तिः । वल्कटस्युताभ्यां स्वौपभ्यं 
सृचनीया्थनेरपेश्षयेण सादद्यश्चभवमात्रेण विश्नरमणीयम्‌ । अतश्च प्रक्रतेन 
सूचनीयस्य संबन्धाच्छब्द्‌ शक्तिमूखो वस्तुध्वनिरयम्‌ । 


इठेबालड्गरः ३७१ 


(जहां [ नाटक आदि मे] वाक्यः प्रस्तुत होने के कारण केवल अभिधाच्रत्ति से प्रतिपाय अर्थं 
ही प्रधानतया वतलाता रहता है तथापि शब्दों मे इेष [ अनेकार्थकता ] होने के कारण भाग 
कदे जाने वारे अथे की भौ सूचना दे देता है जिसे [ नाव्यद्ाख्च की भाषा म वीजन्यास उपक्षेपः? 
इस सूत्र ॐ अनुत्तर ] उपक्षेप भी कहा जाता है वहां रलेष होतादहै कि राब्दशाक्तिमूर्क 
ध्वनि इस पर विचार करते है- 

वहां रेष तो होता ही नही, क्योकि वहां दोनों अर्थं परस्पर सै असम्बद्धं रूप मे बतलाना 
अभीष्ट नहीं रहता, ध्वनि भी नहीं होती क्यांकि [ वहां मी ] उपक्षेप्य [ सूच्य | अथं प्रकृत अथं 
से सम्बद्ध नहीं रहता अतः उसके साथ उपमानोपमेयमाव कौ विवक्षा नहीं रहती । तीसरी कोई 
गति हे नहीं । अतः यहां क्या करना चादिए । इस पर हमारा कहना है- | 


वहां दल्ेष उक्त [ अर्थो मे अपबद्धतान होने रूप] हेतु से पहु नहीं सकता इसलिए इसे 
हम ध्वनिका ही विषय निश्चित करते हेः। यह इसछ्ए कि राब्दराक्तिमृलक ध्वनि मे तो दूसरा 
अथं असम्बद्ध ही रहता है, फलतः संवन्ध के लिए उपमानोपमेयमाव की कर्पना करनी पडती 
है । इतना अवदय है कि यदि वह सम्बन्ध उपमानोपमेयमावसम्बन्ध को छोडकर अन्य किसी प्रकार 
से उपपन्न किया जा सके तव॒ उस्र [ उपमानोपमेयमावसंबन्ध ] प्रर ही यह अभिनिवेश केसा १ 
[ यहां | उपमाध्वनि के स्थान पर वस्तुध्वनि भी किसी अन्य सम्बन्ध से समीचीन होगी । 

श्सीठिएट ( काव्यप्रकाशकार ने )--“अल्कार या वस्तु जहां प्रधानरू्प से शब्द केद्वारा 
भासित होरहीदहोतो उसेदो प्रकार कौ चब्दराक्तिमूलक ध्वनि माना जाता है ।' 

-[ काव्यप्रकाद् ४।३८, ३९ | 

--श्स प्रकार राब्दशक्तिमूलक ध्वनि कोदो प्रकार का कदा है क्योकि वों [ रन्दो का ] बन्ध 
[ जमाव एेत्ता रहता है जिस ] मे दोनों अर्थौ के सूचक हेतु [ न्याय ] रहते हैँ [ सवन = स्थान ]। 
प्रकेत मे मी इसी प्रकार जहां सूचनान्यापार हो वहो सब्दशक्तिमरक वस्तुध्वनि जानना 
चाहिए । यथा हरिश्चन्द्रचरित [ नामक नाटक ] के- 


कोरिफदिग्विजुम्भण [ कौशिक = इन्द्र, उसकी दिक्‌ = दिशा = पूवंदिशा, उसका विजुम्मण = 
प्रमात तथा कोशिक = उच्ल्‌ , उनका दिशां मे विजम्भण = मागदौड उस ] के कारण बाकाश्च- 
राष्ट [| आका्रूपी राष्ट तथा आका राष्ट के समान ] को [ रसात्‌ = ] स्वेच्छया छोडकर मलिन. 
कान्तिवल्कर [ मलिनकान्तिरूपी मलिन व स्कर तथा मल्िनिकान्ति वल्कल के समान ] धारण किए 
हुए राजा [ राजा तथा चन्द्रमा ] अतिशीघ्र अस्तरैल [ अस्त वैमवहीनता शैल के समान तथा 
अस्तगिरि ] को प्राप्त दहो गया तो उठते अरमरज्लांकारसे रो रहे कुमुदाकर को पुत्र जेते सान्तना 
देती इड उसको कान्ता [ राजमदहिषीरूपी ¡] निज्चा ने मी [ वहाँ से ] प्रस्थान कर दिया । 

-- इस प्याथे मं प्रकरण प्रभातवणेन का है इस कारण राजाः-शनब्द से पहले तो अभिधा हारा 
अथं निकलता है चन्द्रमा, जो अस्त हो रहा दहै फिर उक्ती रराजा'-शब्द से महाराज हरिशचन्द्र 
[का ज्ञान दोत्ता है ओर उन] के रोहिताश्च पुत्र को लेकर पत्नी उक्लीनरी के साथ प्रातःकाल 
अपना देशा छोड़कर वाराणसी की बोरं प्रस्थान की सूचना मिती है । य॒ इसकिषए फि (कोरिक- 
शब्द का अथं [ प्रभात के ] इस प्रसंग मँ इन्द्र हयो सकता है या उल्ट्‌ , किन्तु [ नारक के भावी ] 
सूचनीय [ कथावस्तु-- | पक्ष में उसका अर्थं होगा विश्वामित्र । जँ तक वस्र ओर पुत्रका 
संबन्ध है उनके साथ [ प्रकृत मकखिनकान्ति तथा कुयुदसमूह की ] उपमा मान ठेनी चाहिए क्योकि 
[ यह | साद्य वन जाता है किन्तु उस उपमां को सूचनीय अर्थं से अतव रखना दोगा 
[ क्योकि उस पक्ष मे पूस्रकफान्तिवल्कल का अथं मरमैला वर्क करना दोगा ओर कुमुदाकरं 


३७२ अलङ्ारखवस्वम्‌ 


सुतमिव को “सुतं ङुसुदाकरभिवः के रूप में लाकर कुमुदसमूह के जेते पुत्र को यह अथं करना 


होगा फलतः, प्रथम मेँ तो उपमा बनेगी ही नदी, दूसरे मेँ बनेगी मी तो उसमें चन्द्रपक्ष का उपमान 
उपमेय वन जाएगा जौर उपनेय उपमान ] इसी [ चन्दो की आंरिक दयथंकता तथा आंशिक 
साम्ययोजना कै ] कारण [ तथा दोनों अर्थौ के केवर प्रक्रत अथवा केवर अग्रत न होकर एक के 
प्रकृत तथा दूसरे के अप्रकृत होने साथ दी दोनो के परस्पर मे जसम्बद्ध न होकर - प्रकत के साथ 
सूचनीय [ अप्रकृत | अथं के सम्बद्ध होने से यहां [ देष न होकर ] यह राब्दराक्तिमूलक वस्तु 
ध्वनि हदं । 
विमरिनी 

संबद्धस्वाभावादिति उपङ्तेप्यस्यार्थस्यावर्ण नीयस्वात्‌ । अन्येति श्टेषभ्वनिभ्यतिरिक्ता । 
उन्तनयेनेति अर्थ॑द्वयस्यान्वितस्वेनाभिधेयतया वक्तुमनिषटेरिव्यनेन । संवन्धाथमिति 
संगघ्य्थम्‌ । यथा- 

“अतन्द्र चन्द्राभरणा सञुदी पितमन्मथा । 
तारकातरला श्यामा सानन्दं न करोति कम्र ॥' 

अन्र प्रङ्घताप्रक्कतयोरसं बद्धाथस्वं मा प्रसाङन्तीदिति ना{धिकानिश्चयोरौ पम्यं कल्पनीयम्‌ । 
संबन्धान्तरेणेति यन्न याददोन विवक्षितेन । तत्रेति चब्दश्क्तिमूले ध्वनौ । अत एवेति । 
जओौपम्यं विनापि प्रकृताग्रक्ृतयोः प्रकारान्तरेण संबन्धस्योपपादयितुं शक्य्वात्‌ । उक्त इति 
काव्यप्रकाशकृता । चन्द्र इति वण्यंमान इति शेषः । सूचितमिति श्ब्दशक्सग्रा। तामेव 
विमञ्य ददांयति-तथा चेत्यादिना । अतश्चेति, इध्येव शब्दश्चक्तेभांवात्‌ । अत्र च यद्यपि 
सुतादिरूपार्थाच्तिरप्यस्तीति वस्तुध्वनेडभयशाक्तिमूखत्वमेव तथापि शब्द्ञक्तिरत्र स्फुटा 
स्थितेति तन्मूरु्वमेव भन्थक्तास्योक्तम्‌ । शस्त शब्दश्यक्तिमूरो वस्त॒ध्वनियथा- 

"न॒ महानय न च बिभति गुणस्मतया प्रधानताम्‌ । 
स्वस्य कथयति चिराय प्रथग्जनतां जगव्यननभिमानतां दघ ॥ 


अश्र केवर्यंव शब्दशक्त्या सांख्यपुरुष्पं वर्स्वभिभ्यक्तमर्‌ । यत्त॒ काव्यप्रकाशसंकेते 


ग्रन्थकृता वश्तुध्वनेः शष्द्‌शक्तिमू त्वं दिन्त्यमुक्कं तदुदाहरणाभिप्रायेणेवोन्नेयम्‌ । तत्र हि 
(पन्थिअ ण इष्य सत्थरं' दव्याच्चदाहरणद्ुभयशक्तिमूरं चब्दशक्तिमूलश्य वस्तुध्वनेः 
श्रीमम्मटेनो पात्तम्र । इह तु यथाल्लंभवमेव विचारितम्‌ । 

एवं स्वमतेन शेषस्य यथोपपत्ति श्वरूपं प्रतिपा्यापि प्राच्याचुरोछात पुनरपि तदीयः 
मेव मतं दश्चंयितुमाह--इद चेत्यादि । 

सम्बद्धस्वाभावाद्‌ = ( उपक्षेप्य अर्थं प्रक्रत से ) सम्बद्ध नहीं रहता क्योकि उपक्षेप्य अथै वहां 
वणैनीय [ अतः प्रकृत ] नहीं रईता [ विमरदिनी के निगय सा० संस्करण मं यह पंक्ति असम्बथेस्य 
वणै° इस प्रकार छी ह ]। अन्या = अन्य [ तीसरी ] गति = रेष ओर ध्वनि को छोड । उक्त 
नयेन = उक्त दतु से= दोनो अर्थौ के परस्पर म सम्बद्ध होने तथा दोनों को अभिषेयरूपसे 
कदना अभीष्ट न शने से । कम्बन्धाथन्र = संगति के लिए । यथा- 

“अतन्द्र चन्द्र [ चन्द्रमा, कर्पर ] से अलक्त, सुदत्त मन्मथवाली, भोर चंचल तारका [ तारे 
ओर शख की पुती ] वाली द्यामा [ रात्रि, षोडशी ] किसे आनन्दित नहीं कर देती 

- यहां प्रकृत [ रात्रि ] ओर अप्रकृत [ नायिका | म भसम्बद्धतान भा जाए शस हेतु नायिका 
जोर निद्या मे उपमानोपमेयमाव की कद्पना करनी होती है । 


। कन्व 


श्ठेषालङ्ारः ३७२ 


सम्बन्धान्तरेण = अन्य सम्बन्ध = जय जो विवक्षित हो 1 तन्न = वहां अथात्‌ शब्दराक्तिमुक 
ध्वनि मेँ [ अभिनिवेद केसा ]। अत एव = इसीलिए, अर्थात्‌ उपमानोपमेयभाव के विना मी 
प्रकृत ओर अप्रकृत का संवन्ध दूसरे प्रकार सेभीसिद्धक्तिया जा सकता हे शस कारण । उक्तः = 
कदा दहै" = अथात्‌ काव्यप्रकाशकार ने, चन्द्रे = चन्द्र अर्थात्‌ जो .प्रस्तुत प्रसंग मं वणेन का विषय 
वना इभा है। सूचित = राब्दशक्ति कै द्ारा। उसी दाब्दराक्ति को [ अर्थराक्ति से] ल्ग कर 
बतलाते इए लिखिते हँ-- तथा च~हत्यादि अतश्च = इसी कारण अर्थात्‌ उप्यक्त शस शब्दराक्ति 
के रने से। यहां ययपि खुतादिरूप अथौ कौ मी शक्ति [ अन्वा्थं कौ सुचक्र ] है इसत कारण 
वस्तृध्वनि उभयदाक्तिमूल्क दी है तथापि यहाँ शब्ददाक्ति अधिक स्पष्टरूप से स्थित ह इसङ्ए 
ग्रन्थकार ने इसे शन्दशक्तिमूलक ध्वनि नाम ही दिया । केवल शब्दराक्तिमूलक वस्त॒ष्वनिःयई दे- 

(न तो यह [ श्रीकृष्ण ] महान्‌ [ उच, बुद्धित्व ] है भोर न यण [ शीरसोन्द यादि, सतत्व- 
रजस्तम ]-गत समता के अभाव मे यह प्रधानता [ प्रसुखता, प्रकृतिरूपता | ही धारण करता । 
यह तो संसार में निरभिमान होकर पृथग्जन [ तुच्छ व्यक्ति, प्रकृति ओर बुद्धित्व के नीचेकी 
विक्ृतियां से पृथक्‌ पुरुषरूप ] सिद्ध होता है । [ शि्युपाल्वध १५।२ प्रक्षिप्त | 

-- यषा केवल राब्दशक्तिके ही दारा सांख्यपुरुषरूपी वस्तु व्यक्त दोतौ हे । अन्धकार ने काव्य- 
प्रकारा-[ पर स्वरचित ]-संङेत-[ नामक रीका ] में [ कान्यप्रकाङ्चकार द्वारा "पन्थिअ ण इत्थ 
पद्य मं प्रतिपादित शब्दश्यक्तिमुलक |] वस्तुध्वनि का शब्दसक्तिमूलकत्व अमान्य बतलाया था वह 
केवर उन्हीं के [ उक्त] उदाहरण को लेकर बतलाया गया मानना चाहिए । वां [ राब्दराक्ति- 
भूक वस्तुध्वनि के ] उदाहरण रूप में प्रस्तुत प्ंयिअण इत्थ सत्थरम्‌ः-दहस प्च मं उभयदाक्ति- 
मूरकता है तथापि वस्तुध्वनि को श्रीमम्मट ने केवर रशब्दशच्िमूरक बतलाया है । यहां [ ^सघः 
कोरिकः पमं] जो विचार किया गया है वहु केवल आंिक संभावनाको लेकर [ इस पच 
म॑ आंरिकरूप से राब्दश्यक्ति है गौर आंरिकरूप से ही मथशक्ति मी || 

इस प्रकार अपने मत के अनुसार रेष का स्वरूप तक ओर युक्तियां हारा प्रतिपादित कर 
दिया तव भी प्राचीन आचार्यौ की मान्यताओं के अनुसार रेष पर फिर से विचार करते ओर 
अव केवल उन्दीं प्राचीनो का मत प्रस्तुत करने के लिए लिना आरम्भ करते हं-- 


[ स्वस्व | 
इह च-- 
'आङृष्यादावमन्द्मदमटक चयं वक्जमासञ्य वक्त्रे 
कष्ठे लग्नः सुकण्ठः प्रभवति कुचयोदेत्तगाढाज्गसङ्गः। 
वद्धासक्तिनिंतम्बे पतति चरणयोयेः स ताडक भियो मे 
वादे ! ठा निरस्ता, नहि नहि सरठे ! चोखकः कि चपाङत्‌ ।॥' 
इत्यलं कासान्तरविविक्तो ऽयं शठस्य विषय इति नाराङ्नीयम्‌ , अपहु- 
तेसर वियमानत्वात्‌ । वस्तुतोऽपह्वस्य सादश्याथंम त्र प्रवुत्तेनोयमपहुत्य- 
टकार इति चेत्‌, न । उभयथाप्यपहतिस्षभवात्‌ , सारद्यपयवसा- 
यिना वापह्ववेनापहवपयेवसायिना वा साद्येन, भूताथापहवस्योभयत्र 
वियमानत्वात्‌ । 
सादश्यभ्यक्तये यत्रापहबोऽसावषहतिः । 
अपहवाय सादृश्यं यत्राप्येषाऽप्यपहतिः ॥१ 


२७७ अलटङ्ारसवंस्वम्‌ 


इति संक्षेपः । आद्या स्वप्रस्ताव णपवोदाहता, द्वितीया तु संप्रति 
दिता । तेनाटंकारान्तरविविक्तो नास्य विषयोऽस्तीति सर्वाटंकारापवादोऽ- 
धमिति स्थितम्‌ । 


ओर यद्ां-- 

'जो पहले तो केरा को जोरों से पकडकर खींचता है, [फिर] सद से सेह सटा देता दे; 
जिसका स्वयं का कण्ठ बड़ाही अच्छादहौताहे ओर जो कण्ठ से चिपक जाता दै, जो अंग-अंग 
का गाड आङ्गन कर छुचों पर प्रभुत्व जमा ल्ेतादै, इसी प्रकार जो नितम्बो से स्कर पैरों 
पर पड़ा रहता है वैसा वह मेराश्रिय है। [ सुनकर दूसरी सखी कहती है-- वह इतना सव कर 
डालता हैतो क्या ] वाले! तञ्च भव लाज नदीं आती  [ प्रव्युत्तर मे पूवंसखी कती द | नीं 
हीं । त्‌ बड़ी मोली, [ मेरा भभिप्राय समन्ची नदीं ] अरे कीं चोरक [ चोली, चौल देशक 
धुवक ] से मी खाज आती हे ।' 

- इस पाथं सरे दइंका नदींकरनी चादि कि यहु दटेष का स्थल है जिसमें अन्य 
कोई अलकार नदीं है क्योकि यहाँ अपहृति विधमान हे । चयहां वास्तविक स्थिति यह है 
कि यदं जो अपहव [ छिपाव ] अपनाया गया ह उसक्रा उदेदय है साद्रदय की निष्पत्ति, अत 
यहां अपहृति [ साधनमात्र है वह ] अलंकार नहीं हो सकती" यदि टेसा के तो वह ठीक 
नहीं, वर्योकिं अपहृति दोनां ही प्रकार से हो सक्ती दहै; वर्योकिं जहां अपहव [ छिपाव |] 
सादय मै पर्यवसित होतादहै या जहां सादृरय अपहव [ छिपाव ] मेँ पयंवसित होता है वहां 
दोनों ही जगह वास्तविक वस्तु का अपहव रहता ही हे । संक्षेपमें- 

'साददय को व्य॑जित करने के लिए जष्ां अपहव दोता है अर्थात्‌ किसी वस्तुको छ्पाया 
जाता है वह तो अपङ्ति होती दी दहै, अपदुति वहभी होती है जहां अपहव को व्यक्तं करने के 
लिए साद्ख्यविधान किया जाता हे 

[ इनमें से ] प्रथम का उदाहरण तो [ अपहति के ] अपने प्रकरणमेंहीदेदियाहै, दहितीयका 
उद।हूरण य॒ष्टी [ आष्रष्या० ] पद्य हे । 

इस प्रकार सिद्धान्त य निकला फ इस [ दरेष ] का एेसा कों स्थल नहीं है जिसमें अन्य 
अलंकार न हौ, फलतः यह समी अलंकारं का अपवाद है। 


विमरिनी 


भूताथों वास्तवः । संत्तेप इति प्रमेयसं चयात्‌ । आयेध्यादि सादृश्य पयंव साय्य पहव- 
स्वरूपा । स्वग्रस्ताव इध्युपहतिकक्तणे। उदाह्तेति पूणन्दोरिप्यादिना । द्वितीयेति 
अपहतिपयंवसायिसादृश्यरूपा । प्रद्ितेति आकरष्याद्‌ावित्थादिना । अन्न च मन्थता 
श्टेषः सर्वारंकारापवादक इति न केवर प्राच्यमतानुसारयुक्छन्न यावद पहवपयंवसा 
यिसादश्यरूपोऽपहतिभेदोऽपि तन्मतावुसारमेवोक्तः । यद्ववयति--ग्याजोक्तौ चोत्तर 
प्रकारो वियत हृस्युपक्तम्योद्धटसिद्धान्ताश्रवेणम तत्तघ्रोक्तमिति । अतश्चात्र अन्ज्कन्मते 
व च्यमाणसादश्या श्टेषञरूला व्याजोक्तिः । तस्या एव वाक््यार्थीभूतस्वेन विधान्तेः। 


भूताथं = वास्तविक । संक्षेप = प्रतिपा का एकतर संयोजन होने से संक्षेप कदा [नकि प्रति- 
पा को सूत्ररूप मँ प्रस्तुत करने से ] क्योकि कारिका भी अपने अपम काफी वड़ी है]। 
आद्या = प्रथम अर्थात्‌ सादृदय मे पयवस्सित होने वाले अपहव की अपहृति । स्वप्रस्ताव एव 


श्टेषालङ्लरः ३७५ 


अपने प्रकरण मे ही" अर्थात्‌ अपहति के प्रकरण मेँष्टी। उदाहृता = उदाद्रण दियाजा चुका 
है--पपूणेन्दोः० इत्यादि पय । द्वितीया = दूसरी अपहुति भमथांत्‌॒ जपहव में पयवस्तित होने 
वाले सादृद्य मे बनी । प्रदर्दिता = "कृष्यादौ ० श्त्यादि पच के द्वारा । 


यहां मन्धकार ने वेव दरेष को ही प्राचीन आलंकारिकों के मत के अनुसार प्रस्तुत नहीं 
किया भपित अपहति के द्वितीय भेद 'अपहव मे प्॑वसित होने वाले साद्य से बनने वारौ 
अपहतिः को भी प्राचीनो के मतके अनुसार प्रस्तुत कियादहै। जेसाकरि अगे [ व्याजोक्ति 
प्रकरण मे ] कदैगे--्याजोक्ति मे [ मपहत्ति का] दूसरा प्रकार विद्यमान है" यां से आरम्भ कर 
वं वह्‌ उद्भट फ मत के अनुसार कडा है यहां तक के मन्थां दारा । इसक्ए उक्त [आङ््‌ष्या० 
प्य मै अपने मत मे तो वक्ष्यमाणसाटस्या दकेषमूल। व्याजोक्ति दी अलंकार है। क्योकि वही यहां 
प्रधान वाक्यार्थंके रूप म पय॑वक्सित दोती 


श्रेष का पूवंतिहास-- 

भामह-मामद ने दकेष को दिलष्ट कदा दै ओर दकेष का वही एक भेद बतलाया है जिसे 
दोनों का उपादानः कहकर स्व॑सखकार ने वृतीयमेदके रूपमे लक्षित किया है। मामहके 
अनुसार केवर विशेषणं की ही उभयान्वयिता मात्र रेष है । भामह ने दोनों का उपादान सह- 
भाव ओर उपमानोपमेयभाव के दारा होता इआ वतलाया है! इस प्रकार उनका इल्ष अल्कारा- 
न्तरशुन्य नहीं ठहरता । भामह ररेष का लक्षण रूपकं के रक्षण से भिन्न 
नक्ष वना सके है । रूपक का लक्षण ही ररेष मे संगत मानकर भामह ने रूपक 
से रलेष का भेद भी बतलाते हए कदा है-रूपक मे उपमान तथा उपमेय के विरेषण 
अलग-अलग रहते हैँ जैसे (जल्द-दन्ती शीकराम्भोमद चुभा रहे हैं । दष में रसा न ककर 
कहा जाएगा प्सार्मद्रमाः महान्तश्च छायावन्तः = मागेदुम ओर वड़े रोग छया [ छंद आर 
कान्ति ] वाले होते है । इसी प्रकार-"अच्छे राजा मधो के समान उन्नत होतेह, ओर आप 
रत्नल्ाटी ओर अगाध होने से समुद्र के सदृश हैः । इन तीनो स्थलों में प्रथम दुम ओर मह्‌ा- 
जनः दोनांका छायाशीलता साहचय होने से भामह के अनुसार इरूेष सहोक्तिं से अनु 
प्राणित है, दितीय मे उसी प्रकार उपमासे ओर वृतीयमे भी उपमासे ही अनुप्राणित है किन्त 
उसमे हेतुदेव॒मदमाव कथित है जो द्वितौयमें नदींहै। इस प्रकार भामह के अनुसार रेष के 
तीन मेद दए सदोक्तियुक्त, उपमायुक्त, देतयुक्त । भ।मह की यह भेदकल्पना अत्यन्तं स्थूल 
हे । रेते तो “रलवाके होने से आप समुद्र है टेसा कह द्वा जाए तो तृतीय मेद रूपकानु- 
प्राणितं इल्ष कहा जा सकता है ओर इसी प्रकार उक्तिभेदसे रलेषके अनेक भेद किएजा 
सकते हे । 

रेष में दरेष = जोड किसका होता है यह्‌ प्ररन भी भामह के मरितिष्कसे टकराया था। 
इस पर भी उन्होने उत्तर दिया है किन्तु वह भी अस्पष्ट है । उन्होने कहा दै--दलेषादेवाथवचसोः०” 
इस देष मे रलेष दोनों में रहता है अथैमें भी ओर राब्दमें भी। 

इस प्रकार भामह का इलेषविवेचन हौ परवन्त आचार्यो मै तीन प्ररो को जन्म देता है, 
दाग्ददलष ओर अथैरलेष का परस्पर मेद्‌. ।९ के अलकां भौर अन्य अल्कारो से 
रेष की भिश्चित स्थिति मे अन्य अलंकारं का इरष दारा अपवादं । 

भामह का विवेचन अपने मूलरूप मे इस प्रकार है- 

'उपमानेन यत्‌ तत््वमुपमेयस्य साध्यते । 
गुणक्रियाभ्यां नाघ्ना च छिष्टं तदभिधीयते ॥ 


३७द अच्छरङ्कारसखवंस्वम्‌ 


लक्षणं सूपकेऽपीदं लक्ष्यते कामम त॒ । 
इष्टः प्रयोगो युगपदुपमानोपमेययोः ॥ 
रीकरास्भोमदसजस्तङ्गा जल्ददन्तिनः । 
इत्यत्र मेघकरिणां निदंराः क्रियते समम्‌ ॥ 
रखेषादे वाथैवचसोरस्य च क्रियते भिदा 
तत्सद्योक््युपमाहेतुनिर्देशात्‌ त्रिविधं यथा ॥ 
छायावन्तो गतव्यालाः स्वारोहदाः फलदायिनः । 
मागदरुमा महान्तश्च परेषामेव भूतये ॥ 
उन्नता लोकदय॒ता महान्तः प्राज्यवपिणः । 
दमयन्ति क्षितेस्तापं उराजानो घना इव॥ 
रत्नव्वादगाधत्वात्‌ स्वमयांदाविलच्लनात्‌ । 
बहुसत््वाश्रयत्वाच सदखस्त्वमुदन्वता ॥ ३।१४-४० ॥ 


भामह के तीनों उदाहरणा से स्पष्ट है करि उपमा आदि भन्य अलंकारं में भी अनेकष्िष्ट 
हे = ¢ = फ 
विद्ञेषणों का एक स्वतन्त्र मद्व है, उनमें कविकमं कौ एक नवीन विधा आर वेचिभ्य कीः जसा- 


धारण उदग्रता अवदय ही निदित हे । 


वामन-उलेष का रूपके जो अन्तर भामहने बतलाया था उसीका अनुवाद करते 
इए वामन ने लिवा- 

[ सूत्र | स धमं॑घु तन्त्रप्रयोगे ररेषः [ ४।३।७ | 

[ बृत्ति ] उपमानेनोपमेयस्य धमषु युणक्रियाञ्ब्दरूपेषु स ॒तत्वाध्यारोपस्तन्तरप्रयोगे तन्त्रेणो- 
च्चारणे सति ररेषः । यथा-आक्रष्टामलमण्डलाग्रः० । 

[ रूपक के ही समान |] उपमान का उपमैय पर समान गुणक्रिया आदि धर्मों के आधार 
प्र तततवारोप दौ ओर यदि तन्त्र [ अनेकार्थं्चब्द ] प्रयोग शो तो [ रूपक ही] रेष कहलाने 
रुगता हे । उदाहरण यथा-- 

[ विमरिनी मं उदुघृत ] (माङ्ृष्टा० यह्‌ [ पूणे ] पच । वामन ने भामह मे प्राप्त भन्य 
अलकारों से दलेष के पाथैक्यया ठेक्यका विवाद नदीं अपनाया । उस पर पदिली वार्‌ काव्या. 
र्कारसारसं्रह मं उद्भट ने विचार किया जिक्तका अधिकारा दवप्रकरणों मे उद्धृत कियाजा 
चुका हे । 

उद्कट--उद्धट का पूणं दटेषविवेचन इस प्रकार है-- 

“एकप्रयत्नोच्चार्याणां तच्छायां चेव बिभ्रताम्‌ । 
स्वरितादियुणेभिन्नेवेन्धः श्िष्टमिहोच्यते ॥ 
अलंकारान्तरगतां प्रतिभां जनयत्‌ पदेः। 
विविधैर्थदाब्दोक्तिविरिष्टं तत्‌ प्रतीयताम्‌ ॥ ४।९) १० ॥ 


इस विवेचन मँ “कप्रयत्नोचायं' पद अन्य कुछ नदीं वामनाचायै नतन्वः-शब्द की व्याख्या 
दे । लधुविवृतिकार प्रतीहारेन्दुराज ने लिखा मी--्ये तन्तरेणोच्चारयितं रक्यन्ते ते एकरप्रयत्नो- 
च्चायाः ।' तन्त्र का अर्थं करते इए उन्होने सूत्र मी साधारणं भवेत्‌ तन्त्रम्‌ यह उदुभरृत किया 
है । उद्भट का उक्त प्रथम कारिका अपना पूरा अथै देने मँ समथ है, अतः इसका भावार्थं मम्म- 
चाय ने इस प्रकार स्पष्ट किया है- 


.स्वरितादियुणमेदाद्‌ भिन्नप्रयत्नोचचार्याणां तदभावादभिन्नप्रयत्नोच्चार्यांणां च शब्दानां बन्पे 


शटेषाटङ्कारः ३७७ 


--स्वरित आदि युर्णो के भिन्न होने से भिन्न प्रयत्नो के द्वारा उच्चारण करने योग्य तथा 
उसके अभाव [ स्वरितादि गुणों मं मेद न होने] के कारण अभिन्न प्रयत्न.कै दारा उच्चारण योग्य 
जो राब्द उनका बन्ध० ।' [ काव्यप्रकाद उदछछास्-९ ] | 

उद्धट ने जो पूर्वोद्ध्रत उदाहरण दिए है उनम प्रतीहारेन्दुराज ने स्वरितादि स्वरौ का 
अन्तर भी दिखलाया ओर तदनुसार अर्थमेद भमी उसी प्रकार स्पष्ट किया 2 जिस प्रकार 
“इन्द्रा आदि वेदिक शब्दो मेँ किया जाता है । किन्तु उनका यह विदलेषण छान्दससंस््रत से भिन्न 
लोकिक संस्कत की प्रवृत्ति से मेल नदीं खाता । अतः मम्मटने क्राव्यमार्गे स्वरो न गण्यते = 
काव्यम स्वर की गणना नहीं की जाती ककर उपे छोड़ दिया। हम भी उसका विवेचन 
आवदरयक नहीं समञ्चते । 


रद्रट-भामह, वामन ओर उद्धरते टल्ेष को शब्दगत मानते हट उसे अर्थालुकातें त 
गिनाया धा। इद्रटने उसे अक्ग-अलग भागों मे विभक्त किया ओर शब्ददर्ेष के वे आ्ों मेद कान्या- 
लकार के चतुथं अध्याय मेँ उन्दने बतला जो मम्मट ने कान्यप्रकाडा के नवम उच्लास में दिख- 
राणे इस विषयमे मम्मटनेरुद्रके ही विवेचन का सारसंक्षेप कर दिया है। केवल उदाहरण 
नवीन दिणहे। उर्दनि एक नवम देष भी माना है जिते अभङ्गदरेष कहा जा सकता हे । पूर्ववत्ती 
आठ मेद की गणना में मम्मट ने रुद्रट की- 

'वणेपदलिङ्गभाषाप्रकृतिप्रत्यय विभक्तिवचनानाम्‌ । 
भत्राय मतिमद्धिविधीयमानोऽ्धा भवति ॥ 


इस कारिका को इसी रूप मँ--स च वणपदलिगभाषाप्रङृतिप्रत्ययविभक्तिवचनानां मेदादष्टधा' 
इस प्रकार उद्पृत कर दियाहे। रुद्रटने अथैदलेष को स्वतन्वरूप से दरम अध्याय मे रखा 
है ओर उसमे दलेष को एक अलंकार नहीं अपितु क वग माना है जिसके अन्तम॑त इन दस 
मेदो के नाम गिनाए हे-- अविशेष, विरोध, अधिक, वक्र, व्याज, उक्ति, असंमव, अवयव, तत्व तथा 
विरोधामास । इनमें से प्रत्येक के उदाहरण देकर अन्तये इन मेदो के संकर तथा संसष्टि से 
निष्पन्न भेदो का संकेत भी किया । संकर ओर संखष्टि मे भी व्यक्ततव ओर अव्यक्तत्वं दो-दो 
मेद किणे । स्पष्ट ही वे देष को स्वतन्त्र अलंकार नहीं बतला सके मोर कदाचित वेभी 
उद्धट के ही समान इरेष को अन्य अलकारौ का अपवाद मानते है । 

इन दसो मेदां मे एक खटकने वाला तथ्य यह है किं रुद्रटने जो उदाहरण दिए है उने से 
अनेक रसे हं जिन्हे मम्मट के अनुसार राब्ददल्ेष का उदाहरण ही मानाजा सकता है 
यथा दुर्योधनोऽपि युधिष्ठिरः य्ह न तो दुर्योभन राब्द ही बदला जा सकता ओर 
न युधिष्ठिर शब्द ही, अतः उन्हीं के साथ अत्वयृन्यतिरेक दह्येने से ररेष शब्दगत दी माना 
जाना चाहिए । [ दश्व्यः--रुदरशप्रणीत काव्यालकार, चौखंभा संस्करण तथा दिष्ली से छपा 
चोधरी संस्करण ]। 

मम्मट-मम्मटाचायं ने दल्ेष कौ तीनों समस्याओं की टीक व्यवस्था कर सिद्धान्त स्थिर 
किया कि सभग ओर अभंग दोनों ही इ्लेष राब्द फे ही अल॑कार है जर उन्द चब्दालंकासें 
मे दी गिनाया। साथ दही मामह, उद्धर भौर रुद्रटकी नाई रेष को जन्य अलक्षासौ का 
अपवाद मानने कौ भूर उन्होने नक्ष की । उन्होने दर्ष की स्वतन्त्रता का अनुभव किया, भके 


ही वे उसका उदाहरण ठीक नदीं दे सके । उनका विवेचन तत्‌ तत्‌ प्रसङ्गा मे यथास्थान 
उदुधृत किया जा चुका है । 


३७८ अलङ्ारसवंस्वम्‌ 


सर्दस्वकार ने दकष का जो विवेचन किया है उसका काव उद्धट की मोर अधिक है । यदच्पि 
विमदिनीकार यइ सिद्ध करने का प्रयत्न करते रहे हैँ कि सर्व॑स्वकार ने उद्धट का मत दुक्तियां 
दवारा स्पष्ट कर॒ उद्धरतमात्र किया हे, उसे अपना स्वयंका मत नहीं माना हे; तथापि अन्धकार 
की प्रबरत्ति वसी नदीं दिखाई देती । अन्वयव्यतिरेक को काटकर आश्रयाश्रयिभाव को निणांयक 
मान अ्मंगररेष को अथदलेष सिद्ध करते समय सव॑स्वकार ने उद्धट का अनुसरण किया 
हो ठेसा नदीं ल्गता । ध्येन ध्वस्त० प्य मे तुल्ययोगिता सिद्ध करने मे सवेस्वकार उसी 
प्रकार विफल हैँ जिस प्रकार काव्यप्रकाद्चकार मम्मट द्रैव त्वमेव पच मेँ शुद्ध देष । इसकिए 
मम्मट दारा प्रस्थापित दटेष की स्वतन्त्रता भले ही उनके स्वयं के उदाहरण तेसिदधनदहोती दो; 
उनके विरोधी आचाय सवस्वकार के उदादरण से अवद्य ही सिद्ध हदो जाती है । फलतः दरेष निर. 
वकारा नहीं रह पाता । किन्तु अन्य अलका मे जाँ दटेष की मात्रा अधिक रहेगी वहां भी दटेष 
कोष्ठी वाध्य मानने की टेकान्तिकता मी अनुमवविरुद्ध होगी । फलतः “उदामोत्कलिकाम्‌०ः 
आदि परयो मे मम्मटको पुनविचार करना होगा । 

मम्भट के पूरववत्तीं आचार्य महिमसद् ने मी देष का दिदरेषण विस्तार पूवक किया है । यह भी 
उदधृत किया जा चुका है । महिमभट्र ने स्पष्टरूप से उद्धट का मत स्वीकार कर लिया हे । 

सर॑स्वकार के परवत्तीं आचार्यो मँ से शोभाकर, अप्पयदीक्षित ओर पण्डितराज के मत उद्धृत 
किरजा चुके है । उनके सामान्यलक्षणये हें-- 

श्लो भाकर-"विदष्यस्यापि साभ्ये दयोवांच्यत्वे रलेषः 

--विदेषण के साथ विशेष्य भी यदि उमयाथंक हो ओर यदि उसत्ते निकालते दोनों अथं वाच्य 
होते हों तो अल्कार टलेष होता हे । 

अप्पय दीक्तिति--अनेकाथंशब्दविन्यासः देषः । स त्रिविधः प्रक्ृतानेकविषयः, अप्रक्ृतानेक- 
विषयः, प्रकृताप्रकृतानेकविषयश्च । 

--"अनेकाथक राब्दौ का विन्यास ट्टेष कहराता है। वहु तीन प्रकार कादोता है, प्रथम-- 
जिसमे अनेक अर्थौ मे से समी प्रकृत होते हे, दितीय- जिसमे समी अप्रकृत ओर तृतीय-जिसमें 
दोनों होते हँ" दीक्षितजी ने इनके उदाहरण भी सल्ग-अल्ग दिए] हम ध्येन ध्वस्त” पच 
को प्रथम दो करा तथा तृतीय का उदाहरण विमरिनीकार दारा उदधरत अतन्द्रचन्द्राभरणा-सानन्दं 
न करोति कम्‌? पच माना जा सकता हे । तृतीय में शब्दराक्तिमूलक ध्वनि का अस्तित्व दीक्षितजी 
ने दूसरे प्रकार से साधाहै। ठते अगे स्प्टकरंगे। 


पण्डितराज-[ सु° | श्रुत्येकयानेकाथप्रत्तिपादनं रृलेषः ।' 

[ बृ० ] (तच्च द्वेधा, अनेकधमंपुरस्कारेण, एकधमपुरस्कारेण च । आद्यं दधा अनेकशचब्दप्रति- 
भानद्वारा एकदाब्द प्रतिभानद्वारा चेति चरिविधः) तत्रा्यः समङ्गः द्वितीयो ह्यभङ्गः" इति वदन्ति । 
तरतीयस्तु बुद्धः। एवं चरिविधोऽप्ययं प्रकरतमाव्राप्रकृतमात्रप्रक्रताप्रकृतो मयाशचितत्वेन पुनस्त्रिविधः । 
तत्राचे मेदे द्वितीये च विक्लेष्यस्य दिलष्टतायां कामचारः, तृतीयभेदे तु विदेषणवाचकस्येव शि्टत्वम्‌ , 
न विेष्यवाचकस्य, तथात्वे त॒ शनब्दशक्तेमूखकष्वनेरुच्छेद एव स्यात्‌ । 


-“एक शब्द कै द्वारा अनेक अर्थौ का प्रतिपादन रेष । वहु दो प्रकारका होता है। एक वह्‌ 
जिसमें अनेक धर्मौ का ज्ञान होता है गौर दसरा वह जिसमे एक धमं का । इनतें से प्रथम दो प्रकार 
का होता है ८१) जिसमे अनेक दाब्दोकामानदहोता है ओर (२) निसं केवर एक शाब्द का। 
ङक आचार्यं दोनों मेँ प्रथम को सभङ्ग ओर दवितीय को अभंग नामसे पुकारतेदहै। तृतीय शुद्ध 
[ अर्थात्‌ अर्थगत ] होता है। ये तीनों रेष पुनः तीन प्रकार फ होते हें प्रकृता्थित, सम्रङ्घताधित 


#] 
"=> -------- 


इ्लेषाटङ्ारः ३७९ 


ओर उभयाश्रित । श्नमें से प्रथम जौर द्वितीय भेद मे विज्ञे्यवाचक पद द्ववर्थक हो यानो 

किन्तु ठृतीय में केवल विदेषणवाचक पदोमें ही दयर्थकता ह।ती है विश्ेष्यवाचक पदों मेँ नहीं। 

यदि विदोष्यवाचक मे भी यथक हो तो शब्दशाक्तिमूक ध्वनि का कोई स्थान ही नीं रहेगा ।' 
विश्वेश्वर-उभयविदेष्यान्वितियोरेकेन प्रो क्तिरथंयोः इलेषः ।? 


दोनों विेर्ष्यों मेँ अन्वित अर्थौ की एक शब्द के द्वारा उक्ति इरेष कराती है । 
सम।सोक्ति, दलेष ओर राब्दशक्तिमूरक ध्वनि इन तीनों अनेकार्थक शब्दों दवारा अनेक अर्थौ 
को योजना रहती है, न्तु समासोक्ति सै अनेका्थकता केवल विशेषणवाचकः रन्दो मे हयी रहती 
हे जव कि उलेष ओर ध्वनि मेँ विेष्यवाचक चा्ब्दो मे मी। इस कारण समासोक्तिका द्वितीय अर्थ 
विशेष्या मेँ पयु रहता है । इसी प्रकार समासोक्ति भोर शण ० ध्वनि में एक अर्थं प्रस्तुत ओर 
अभिधा द्वारा कथित रहता है तथा द्वितीय अधं अप्रस्तुत ओर व्यंजना द्वारा प्रतीत, इसमे मी 
प्रस्त अभिधेय अथं हौ नियमतः पहले प्रतीत होता हे, अप्रस्तुत व्यंग्य अर्थं नियमतः पश्चात्‌ , साथ 
ही द्वितीय अथं प्रथम अर्थं पर निमैर रहता है। अतः दोनों मै असम्बद्धता न रहकर संबम्धदही 
रहता दै। रेष मे विदेष्य ओर विशेषण दोनों के वाचक शाब्दो में द्य्थकता या अनेकाथकता 
रहनेपर मौ दोनों ही या सभी अथं ररेषके प्रथम दोमेदोँ्मे या तो केवल प्रस्तुत होते हे या केवल 
अप्रस्तुत, फलतः दोनों ही अर्थोका ज्ञान केवर एक दही वृत्तिसे होता है, अभिधासे) इसके 
अतिरिक्त दोनों या समी अर्थौ की प्रतीति अभंगपदो का प्रयोग होने पर एक साथद्यो जाती है 
भौर सभ॑ग पदों का प्रयोग होने पर क्रमसे, किन्तु इस क्रमसे विसीमी अथंकी प्रतीति पहङे 
ओर किसी की भी बादमें मानी जा सकती है क्योकि इन अर्थौ मे संबन्ध या सापेक्षता का अभाव 
रहता हे । गाय॒ वे, सिर पर निकले शृङ्गा के समान ये अथं परस्पर में निरपेक्ष रहते है । तृतीय भेद 
म एक अथं प्रकृत ओर दूसरा अप्रक्रेत माना जाता है तथापि उसमें समासोक्ति के समान विदेष्यांश॒ 
मे दटेष नहीं रहता, उपमा रूपक आदि के समान विष्यं का कथन पृथकपृथक्‌ ब्दो से होता 
हे । अन्तर केवल दिष्ट विरोषणां की अनेकता या अधिकता ओर एकता या न्यूनता का रहता है । 
उपमादि मँ रिष्ट विद्ोषण केवल कुछ ही रहते है जब किररेषमें उन्हींकी भरमार रहती 
हे । फलतः चमत्कार, उन्हीं का प्रधान हो जाता है । ययि सर्व॑स्वकार एक भी दिलध्विदोषण हो तो 
देष ही मान ठेते हे । अलंकाररत्नाकरकार ने समासोक्ति प्रकरण में यही मेद इस प्रकार इलोकबद्ध 
किया है- 
“प्रक्रतस्याथवान्यस्य विरोष्यस्याभिधायकम्‌ । 
समान यत्र नो तत्र समासोक्तिर्‌ › ध्वनिहि सः ॥ 
विश्चेषणानां तुस्यत्वे विशेष्याणामपि कचित्‌ । 
अनेकाथांभिधायित्वे देषः स्यादिति निणेयः ॥ 
अल्कराररत्नाकरकारने विष्ेष्यकी रिलष्टतामेभीजो रलेषारुकार माना है वह देष का 
वह तीप्षरा मेद हे जिसमे सव॑स्वकार ने पूरवाचा्यो के अनुकरण प्र दोनों विशेष्यो का प्रथक्‌ 
उपादान भावदयक माना है। अप्पयदीक्षित ने एक उग ओर भस ओर इस तीसरे भेदमेभी 
दल्षप्रसिद्धि $ ङ्ए दोनो का पृथक्‌ पृथक्‌ उपादान आवश्यक मान, हस भेद मै भी विशेष्य को 


दिष्ट स्वीकार कर ज्या । तव राब्दशक्तिमूलक ध्वनि से रलेष का अन्तर करने का प्रदन उठातो 
उत्तर मं ल्खा- 


"यद्र प्रताप्रक्तदटेषोदादरणे ₹ब्दराक्तिमूलध्वनिमिच्छन्ति प्राञ्चः तत प्रकृताप्रकृताभिधान- 
मूलकस्यो पमादेरलकारस्य व्यडग्यत्वाभिप्रायक्म्‌ , न तु अप्रकृतारथस्यैव व्यङ्ग्यत्वाभिप्रायकम्‌ ; 


३८० अटड्ारसवेस्वम्‌ 


अग्रङ्ृतार्थस्यापि खब्दराक्त्या प्रतिपाचस्याभिपेयत्वावदयंभावेन व्यक्तयनपेक्षणात्‌ । ययि प्रक्ृतेऽथं 
प्रकरणवलज्कटिति बुद्धिस्थे सत्येव पश्चात्‌ तत्तद्विषयकशक्त्यन्तरोन्मेषपूरवंकमप्रस्तुताथेः स्फुरेत्‌ , 
न चैतावता तस्य व्यङ्ग्यत्वम्‌ , शक्त्या प्रतिपाचमाने स्वयैव व्यक्तयनयेश्षणात्‌ । 

-- प्राचीन आरूकारिक प्रकृताप्रकृतो मयाधरित दच्ष के उदाहरणम जो चब्दशाक्तिमूक ध्वनि 
मानते हैः वह अभिधा दारा कथित प्रत ओर अप्रकृत दोनोंकी व्यङ्गय उपमादि [ अल्कारां | 
के अभिप्राये; नकि अप्रकृत अथैको व्यङ्ग्य मानकर; क्योकि यप्रक्रेत अथे अभिधा दारा 
प्रतिपादित होता दै अतः उते अभिधेय मानना आवदयक है, फलतः उसको व्य्जना की कों 
अपेक्षा नर्ही हे य॒यपि प्रकृत अर्थ के साथ प्रकरण रहता है इस कारण उसका ज्ञान अविलम्ब 
हो जातादै ओर अग्रकृेतका ज्ञान उसके पदचात्‌ द्योता दै जव उसके विषयकी दूसरी अभिधा 
का उत्थान होता है तथापि इतने भर से उसे व्यङ्ग्य नद कदा जा सकता । जां प्रतीति अभिधा 
से होती दे वहाँ व्य्जना की कोई अपेक्षा नदीं रहती ।" 

रसगंगाधर के दितीय आननके भारम्भमें द्वितीय अथंकी प्रतीतिमें प्रत्यायक दाक्तिका 
निणैय करते समय पण्डितराज जगन्नाथ ने अप्पयदीक्षित के इस मत को अपने राब्दों मे अनेक 
विकर्पो गौर विविध ऊदापो्ो द्वारा प्रस्त किया ह । उनके उस्र रम्बे विवेचन का निष्क इतना 
ही है कि ( १) नानाथक शब्दके सुनाईंदेतेदह्ी समी अर्थो का ज्ञान तत्का अभिधाशक्ति के 
द्वाराहीदहो जाता, क्योकि संकेत समी अर्थौमें गृहीत रहतारहै, (२) इसके पश्चात्‌ यह 
सदे हदोताहेकि इस राब्द का तात्पयं किंतस्त अथ॑में दहै, अर्थात्‌ इन सभी अर्थौसमेस्े वाक्यां के 
लिए उपयुक्त अथं कौन है, (३) जिसका निर्णय प्रकरणादि से हो जाता दहै, तदनन्तर (४) 
दोमेकोडं एकवोध होताहे यातो एकाथमात्रविषयक पुनर्वोध या उसके विना दही सीधे-सीे 
वाश्याथवोष । इस प्रकार दो्नोदहीअर्थौका ज्ञान पहलेसेद्ी अभिधा इयारा इ रदतादै, 

दूसरे अथं मं व्यज्ञना मानना टीक्‌ नहीं हे ।ः 
पुनर्बोध मानने का संकेत अप्पयदीक्षित ने भी किया है जाँ उन्दोने [ यदीं उद्धृत अं में] 
दूसरौ शक्ति के उन्मेष की वात कदी है । वस्तुतः जव सभी अर्थौ का बोध पहली दो चुका है 
तव क्रिसी एक अथे का पुनर्वोध न होकर पदटेसे ज्ञात उस एक अथं के मीतर वाक्याथ पयोगितव- 
मत्रिका नवीन बोध होता, इसलिए पण्डितराजने द्वितीय पक्षको प्रथम पक्ष के संशोधन कर 
रूप मं परस्तत किया है । मन्मट आदि समी आचाय पुनर्बोधवादी हैँ । अप्पयदीक्षित ओर पण्डित- 
राज का कहना हे कि पुनर्वोधि क्ो या सीधा वाक्याथैवोध, ये दोनों प्ररन अनेक अर्थो मत्ते किस 
एक सथं से संबन्धित है । जहाँ तक द्वितीय अथं का संबन्ध है उसका ज्ञान अभिधा द्वारा पले ही 
हो चुका रहत। हे अतः उसे व्यंजना मानना आवदयक नदीं है । दाँ भमिध। द्वारा विदित देनो 
अथा के संबन्ध म अवदय व्यंजना मानी जा सकती है। मम्मट आदि द्वितीय अथ॑का ज्ञानभी 
व्यजना द्वारा मानते हें । तदथं वे ेसा उदाहरण देते हँ जितम प्रकरण का ज्ञान पहले से रहता 
हे । उनका कहना है कि वहाँ अभिधा प्रकरणोपयोगी अथं की ही ओर प्रवृत्त हो पाती है। वाक्याथ 
बोध होने के पश्चात्‌ अप्राकरणिक अथैका ज्ञान भी होने लगता है किन्तु उस्म अभिधा क्रियाच्ित 
नहीं होती कर्योफि वह प्रकरण द्वारा नियन्त्रित हो जाती द । सर्वैस्वकार भी रेसा ही उदाहरण 
देते दँ । सः कोश्चिक०' पय का हरिदचन्द्रपरक अथं पूरा नाटक पद्‌ लेने क पश्चात्‌ पच को पुनः 
पटने अथवा नारक की कथावस्तु प्रसिद्ध होती है इसकिर उसका पह से ध्यान रहने के कारण 
होता हे । पण्डितराज का कथन है कि प्रकरण ज्ञान रहने पर भी यदि दवरथक शाष्द उपस्थित दे 
तो उससे दूसरा अथं भल्ग दाक्ति से निकलता माना जाना ठीक नदींहे। प्रकरण या इस्त 
उत्पन्न तात्पयनिणेय अभिधा का नियन्त्रण नीं करते, वे किसी एकं अ्थंका निणय करा- 


॥,; 
[5 


अप्रस्तुप्रशसालङ्कारः ` २८९ 


कर॒ वाक्याधवोध मं सहायकमात्र वनते हे । इस विषय पर हमारा 
मत दमने हमारे दहिन्दो व्यक्तिविवेक की भूमिका में स्पष्ट करदिया है। इस विषयमे हु 
व्यक्तिविवेककार महिममट् का सिद्धान्त ही स्वीकार है। व्यंजना का राब्ददृ्तित्व तत्वचिन्तन 
से परे एक निरी भावुकता है । व्यंजना के शब्ददृत्तित्व का खण्डन हमने अपने एकत अन्य ङेख 
'सादित्य-संप्रदाये तात्पयस्वरूपम्‌ः में मी किया है । देखिए सारस्वती सुषमा २४।३ अंक । 
सजौविनीकार श्री विचाचक्रवकत्ती ने सवेस्वकार के संपूण विवेचन का संक्षेप इस प्रकार 
0. “शब्दसाम्यं भवेच्छरेषो विंदोषणविशेष्ययोः । 
ययेकोऽप्रकृतोऽथेश्चेद्‌ भेयांदे भिन्नरन्दता ॥ 
दाब्दार्थोभयनिष्ठोऽयं सववांलद्कारवाधकः । 
पूवेसिद्धस्य चेदज्गं॑तदा न्यायेन वाध्यते ॥' 

--रब्दसाम्य [ शब्दो कौ अनेक पक्षा मे समानथकता ] इटेष ककाता है, किन्तु यह 
साम्य विद्दोषण मौर विदेष्य दोनों मे रहता है) अनेक अ्थौमेंसे यदि कोरे अथं प्राकरणिक 
हो तो विशेष्या अलग-अलग चाब्दं से कथित रहते हे । 

-यह [ रेष ] शब्द मे रहता दहै ओर अर्थौपे मी तथा यह्‌ [ जन्य] सभी अल्कारो का 
वाधक है । [ हां, यदि कोई अलंकार पहलेसे सिद्ध दो तो दलेष उस] से बाधित द्यो जाता 
दे यदि [ रेष ] उस [ पूवैसिद्ध अल्कार ] काअंगदहो। 

संजीविनीकार ने सारसक्षेपकी इन कारिकाओं के तुरन्त बाद अपना विरोध मौ प्रकर 
कर दिया है ओर अपना मत मम्मट के पक्षम देदियाहै। 

भाषारासखर भी रटेष पर विचार करता है किन्तु उसकी विचारभूमिका अ्थपरिवत्तन के 
कारणों से संबन्धित है, अलंकार द्याख उससे भिन्न परिवत्तित अर्थो अथवा विकसित अर्थौकी 
चमत्कार-भूमिका से विचार आरम्भ करतादै। इस प्रकार भाषा एक खुन्दरी है। माषााखर 
उसको वंश्य पर विचार करतादहै ओर अलुकारञ्ाक्ल उसके सौन्दयै पर । कविता एक लता है 
ओर भाषाद्ाख वनस्पतिशाख जो कुता के निष्पादक तत्तो को गवेषणा करता है। मलकारदाज् 
मनःशाल है जो यह खोजतादहै फिंल्ता अपने किस अग के सौन्दयंसे दरक को आङ्ृष्ट ओर 
आनन्द-विभोर कर रही हे। 

[ स्वेस्व | 
परस्तुतादभस्तुतथ्रतीतौ समासोक्तिदत्ता ¦ अधुना तद्वेपरीव्येनाप्रस्त॒तात्‌ 
प्रस्तुतध्रतीतावप्रस्तुतथ्रद्॑सोच्यते-- ६ 
[ ० ३५ ] अप्रस्तुतात्‌ सामान्यविदेपभावे कायंकारणमावि 
सारूप्ये च प्रस्तुतप्रतीतावग्रस्ततप्रकसा । 
इदाप्रस्तुतस्य वणेनमेवायुक्तम्‌ , अप्रस्तुतत्वात्‌ । प्रस्तुतपरत्वे तु कदा 
चित्‌ तद्‌ युक्त स्यात्‌ । न चाप्रस्तुतादसंबन्धे ्रस्तुतपतीतिः, अतिप्रसङ्गात्‌ । 
संबन्धे तु भवन्ती न च्चिविधं संबन्धमतिधतेते, तस्थे वार्थान्तस्प्रतीतिदेत- 
त्वोपपत्तेः । चिविधश्च सवन्धः- सामान्यविरोषभावः कार्यकारणभावः 
सारूप्यं चेति । सामान्यविशेषभावे सामान्याद्‌ विशेषस्य विरोषाद्‌ वा 
सामान्यस्य प्रतीतो द्वैविध्यम्‌, कार्यकारणभावेऽप्यनयेव भमङ्गवा 


अपना 


३८२ ` अलङ्ारसवेस्वम्‌ 


द्विधात्वम्‌ , सारूष्ये त्वेको येद्‌ इत्यस्याः पञ्च प्रकाशः ! तत्रापि सारू- 
ष्यहेतुके मेदे खाधम्यवेधम्यीस्यां द्वेतिध्यम्‌ । वाच्यस्य संभवास्ंमवो- 
मयरूपताभिद्खयः धकाः । रिकषरब्द्प्योगे त्वथौन्तरस्यावाचयत्वाच्छछ- 
षाद्‌ विद्योषः । इटेषे छनेकस्याथस्य बाच्यत्वमिव्युक्तम्‌ । 


्रस्त॒त से अप्रस्तुत की प्रतीति होने पर समासोक्ति दोती दै ओर उसके [ ठीक ] विपरीत 
अप्रस्त॒त से प्रस्त॒त की प्रतौति होने पर॒ अप्रस्व॒तप्रशंसा। समासोक्ति का निवैचन क्रिया जा 
चुका है । अप्रस्त॒तप्ररंसा का निवंचन अव आरम्म करते द- 

[ स्र ३५ ] अघ्रस्तत से सामान्य-विदोषभाव, कायंकारणभाव _ जथवा सादृश्य 
संबन्ध होने पर प्रस्तुत की प्रतीति हो तो [ अरुंकार कौ लं्ता | भप्रद्ठतव्रशंसा 
[होतीदहै]४५ 

[ बृत्ति ] यद्यं [ अप्रस्तुत से प्रस्तुत की प्रतीति की जो यह बात हे इसमे | भग्रस्तुत का 
वर्णन [ सामान्यतः ] अनुचित ही दोता हे । यदि वह [ अप्रस्त ] प्रस्व॒तपरक हौ तो कदाचित्‌ 
[ उस्रा वणैन ] उचित हो सकता है । इधर अप्रस्तुत से प्रस्तुत की प्रतीति तव तक संभव 
नदीं जव तक [उनका] कोई सम्बन्ध न हो क्योकि विना संबन्ध के प्रतीति मानने परक्प्तीसेभौ 
किसी की भी प्रतीति संभव होगी । संवन्धसे होने परभी [ उक्त] तीन प्रकार के सम्बन्ध को 
छोड अन्य किसी सम्बन्ध से वहु संमव नदीं होती, क्योकि वही [ तीन प्रकार काही सम्बन्ध | 
अन्य अर्थकरी प्रतीति कराने मँ समथं [देतु ) बन पातादहै। तीन प्रकार का सम्बन्ध है 
[ १] सामान्यविशेषभाव [ २] कार्यकारणमाव तथा [ ३ | सा्रर्य । सामान्यविदेषभाव संबन्ध मे 
यातो सामान्य से विदेष की प्रतीति हदोतीदहै या विद्ञेष से सामान्य की; इसलिए यहु दो प्रकार 
काहो जाता दहै) कार्यकारणभावमें मी इसी प्रकार दो प्रकार होतेह [ कारण से कायं की प्रतीति 
याका सेकारण की प्रतीति] साषृद्यमे केवल एक दही प्रकार होता दे। इस प्रकार 
इस [ अप्रस्तुतप्ररंसा ] के [ मूल ] भेद [ केवर ] पौँच होतेह । इनमेमी जो मेद सादृरय- 
मूलक होता है उसमे मी दो मेद होते हैँ साधम्यमूलक ओर वेधम्यैमूलक । [ इसमें ] वाच्य 
अर्थं भी तीन प्रकार का होता दै [ १] संभव; [२] असम्भव ओर [ ३] उभयरूप। [ इ 
जहाँ कहीं ] दिल दाब्दं का प्रयोग होता है वहां दूसरा अथं वाच्य नहीं होता अतः यह इक्ष 
ते भिन्नहै। दलेषमे,जोहैसो, पूरा का पूरा अथं वाच्यदही होताहेजेसा कि [ देषप्रकरण मे 
अभी-अभी ] कहा जा चुका है । 

विमरिनी 


उक्ति समनन्तरम्‌ । यत्त समासोकस्यनन्तरं परिरश्टेएयोव चनं तद्‌ विरेषणसा- 
म्यादिना प्र्ङ्गागत्तम्‌ । तामेवाह--अप्रस्त॒तादित्यादि । नन्विह्ाप्रस्वुतस्य वणंनमेवायुक्त- 
मिति कथं तस्मादपि प्रस्तुतस्य प्रतीतिभंवतीष्याशङ्कयाह--इदैत्यादि । तदिति, अप्रस्तुत. 
वर्णन । अतिप्रसङ्गादिति स्व॑स्मात्‌ सवंग्रतिप्यारमनः । तस्यंवेति त्रिविधस्य संबन्ध- 
स्य । सामान्यस्य विशेवाश्रयत्वाद्‌ विहेषश्य च खामान्यनिष्ठर्वाद्‌ सामान्यविशेषयोः 
पस्परमागूरणे संबन्धः । एवं च कायस्य कारणपरतन्त्रस्वादन्त्याचस्थस्य कारणस्य 
कार्योन्मुखश्वास्कायंकारणयोरपि संबन्धः। हस्थमेत्‌ संबन्धद्वयं वास्तवम्‌ । सारूप्यं 
पुनः प्रातीति कमेव । प्रतीतावेव खदडोन वस्स्वन्तरेण सदज्ञस्य व्घ्वन्तरस्य प्रतीतिसिद्धेः । 


-वस्तुस्वे हि वस्ष्वन्तरप्रतीव्या वश्वन्तरप्रतीति्नं स्यात्‌ । अनयेव भङ्गपेति कारणात्‌ 


अप्रस्तुतव्रशंसालङ्कारः ३८३ 


कार्यस्य कायाद्‌ दा कारणगश्य प्रतीतौ । तन्नापीति सत्यपि पञ्चप्रकारस्वे । शिष्टरब्दप्रयोग इति । 
शिर््टशब्दनिबन्धनाप्यभ्रल्ुतव्रशसा भवतीत्यजुवादाद्‌ विधिः । अत्त एवास्य बहभकार- 
सव सक्तस्‌ । 

~ समासोक्ति का निवंचन कियाजा चुका है अथात्‌ असी-अभी। समासोक्ति के वाद 
[ वरन्त पश्चात्‌ अग्रस्त॒तप्रर्ंसा का निवेचन न कर वीच में ] परिकर भौर दलेष का जो निर्वचन 
किया गया हं वह विशेषणस्ताम्य आदि के कारण आनुषङ्गिक रूपसे किया गयाहै। उसी 
[ अप्रस्त॒तप्रशसा ] का लक्षण सूत्रङ्प में प्रस्ठ॒त करते है--अप्रस्तुतात्‌ त्यादि । 

[ प्रन |--जव यहां [ काव्यम ] अप्रस्तुत का वर्णन संभवी नहीं है तव उस परस्तुत 
कौ मी प्रतौति केसे होगी इत पर उत्तर देते इए कहते हैं इह इत्यादि । तत्‌ = वह्‌ ग्थात्‌ अप्रस्तुत 
का वणन । अतिप्रसङ्ग = समौ से समौ अर्थो कौ जो प्रतीति तत्स्वरूप । तस्यव = वही = निविष 
सम्बन्ध । सामान्य ओर विशेष का परस्पर की व्यंजन मेँ सम्बन्ध रहता है क्योकि सामान्य विदोष 
पर आश्रित रहता दै ओर विशेष सामान्य पर । इती प्रकार कायं भी कारण के विना निष्पन्न नदीं 
होता ओर कारण मी अपनी अन्तिम [ परिणति की ] अवस्था मे कायैरूप स परिणत होने वाला 
होता है अतः ध्नका मी परस्पर में सम्बन्ध हे । इस प्रकार ये जो दो सम्बन्ध हये दोनों वास्तविक हैः । 
किन्तु सारूप्य = साद्य काल्पनिक ही दोता ह, क्योकि समानवस्तु की प्रतीति दोन पर ही त्त्समान 
अन्य वस्तु कौ प्रतीति हती हे । यदि यह वास्तविक हौ तो अन्य वस्तु को प्रतीति से अन्य वस्त॒ 
की तीति न हो । अनयेव भङ्कया = इसी प्रकारः समर्थात्‌ कारण से काये की ओर कायं से कारण 
की प्रतीति होने से। (तत्रापि = इनमें भी" अर्थात्‌ ये पोच मू भेद होने पर भौ । श्िष्टक्ञब्द- 
प्रयोगे = रिलटरब्द का प्रयोग होने परः इस अनुवादात्मक [ उददेर्यभावपूणं ] कथन से यहं 
विपि निकरूती है किं भप्रस्तुतप्ररंसा इलेषमूल्क भी होती है। ओर श्स कारण इसकी ओर मी 
अनेक प्रकार संभव बतलाएहें। ॥ 

। स्वेस्व | 
तत्र सामान्याद्‌ विरोषस्य प्रतीतो यथा- 
'तण्णत्थि किंपि पहणो पकष्पिभ जं ण णिञदघरणीप । 
अणवरमगअणसीखस्स काठपदहिभस्स पाहिञ्जं।) 
अत्न प्रहस्तवघे विरोषे प्रस्तुते सामान्यमभिहितम्‌ । 


उक्त भेदो मे से स्तामान्य से विशेष कौ प्रतीति का उदाहरण- 
(तन्नास्ति किमपि पत्युः प्रकट्पितं यन्न नियतिगेहिन्या । 
अनवरतगमनशीलस्य कारपथिकस्य पाथेयम्‌ ॥ 
"देसी कोई वस्तु नहीं है जिते नियनिरूपी गेहिनी ने अपने भनवरत गतिदील कालपथिकरूपी 
पति के किए पाथेय ( रास्तेकाकंलेवा) न बना दिया हो । 


यहां प्रदस्तवधरूपी विशेष अथ॑ प्रस्तुत दै ओर कहा गया है सामान्य अथं । 


विमरिनी 
प्रस्तुत इति । प्रहस्तवधवणंनस्येव प्रकान्तप्वात्‌ । अन्न वाक्ष्यान्तरोपात्ते विशेषास्मनि 
प्रस्तुते प्रहस्तवघे नियतिकमंरुक्षणं सामान्यामिधानमथाोन्तरन्यास इस्यन्वे मन्यन्त 
द्यु दाहरणान्तरेणोदहियते । यथा- 
'दुजंनदू षितमनसां पुंसां सुजनेऽपि नास्ति विश्वासः। 
बारः पायक्लदश्धो दध्यपि पएरट्खस्य भक्तयति #१ 


२८७४ अल्ङ्कारसवंस्वम्‌ 


अच्र केनापि दुजेनेन विप्ररुब्धस्य कस्यचित्‌ सुजनविशेषे वि्स्भो न जायते तस्य 
खुजनस्येय विशेषे प्रस्तेते सामान्योक्तिः । 

म्रस्तुत वर्योकि प्रकरण प्रहस्तके वधकादहदी चल रहा है। इस प्म अन्य आचाय 
[ अलंकाररत्नाकरकार ] यद मानते हैँ कि यहाँ विदेषरूप ओर प्रस्तुत प्रहस्तवध अन्य वाक्यों से 
कथित है इस कारण नियत्तिकमंरूप सामान्य अथं का कथन अर्थान्तरन्यास ही है । इसी कारण 
वे अप्रस्तुतप्रदंसा के इस भेद पर यह एक दूसरा उदाहरण देते हँ-- 

जिन पुरुषों का मन दुजैनां से दूषित डहोजातादै वे खजनोंका मी विश्वास नदीं करते, 
दूध से जला वाल्क दही को मी फूककर खातादहे।ः 

जहां विशेष प्रस्तुत है जोर तदथं यह अप्रस्तुत सामान्य की उक्ति दै कर्योकि यद्‌ किसी दुजंन 
दारा ठगे गए अतएव किसी सुजन पर भी विश्वापस्त न कर रहे व्यक्तिके प्रति उसी सुजनकी 
उक्तिदटे। 

[ वस्ततः अप्रस्तुतप्रशंसा इसी पच मेँ नदीं है, इसमें रूपकानुप्राणित दृष्टान्ताल्कार है दुन, 
खजन ओर साधारण व्यक्तिका गरम दूष, ददी ओर वाल्क के साथ सामान्यविशेषभाव नदीं 
है । विन्वग्रतिविम्बमाव ही दो सकता है । अतः यदा अधान्तरन्यास् मी नहीं है । 'तन्नास्तिः पद्य 
अपने जपम अप्रस्तुतप्ररोस्ा हो सक्ती दहे। विदोष अथैका श्लान इस वाक्यसे नहीं होता, 
अन्य वाक्यों से होने पर भी उसका प्रभाव इस पर नदीं पडता क्र्याकि विदेष का ज्ञान जिस किसी 
प्रकार तो पके सेरहना भपेक्षित ही हे वह चाहे वाक्रयान्तर सेदो या प्रत्यक्ष, प्रकरण आदिसे।] 

[ सवंस्व | 

विरोषात्‌ सामान्यप्रतीतौ यथा- 

"एतत्‌ तस्य सुखात्‌ कियत्‌ कमचिनी पत्त्रे कणं वारिणो 
यन्मुक्ामणिरिच्यर्म॑स्त स जडः छण्वन्यदस्मादपि। 

अदङ्कुल्यभ्रलघुक्रियाप्रविङयिन्यादीयमाने दानै 
स्तच्रोडडीय गतो हदेव्ययुदिनं निद्राति नान्तःद्युचा ॥ 

अन्न जडानामस्थान पवोच्म इति सामान्ये प्रस्व॒ते विरोषोऽभिहितः | 

कारणात्‌ कायंपरतीतो यथा-- 

(व 9 =, 46 ५ 
पद््यामः किमिय प्रपद्यत इति स्थेयं मयालम्बितं 
कि मां नाठपतीत्ययं खद राठः कोपस्तवयाप्या्ितः। 
इत्यभ्योन्यविदलक्चदश्िच तरे तस्मिश्चवस्थान्तरे 
सभ्याज्ञ हसितं मया ध॒तिहये बाष्पस्तु सुक्तस्तया ॥' 
¢ भ 
अश्च धाराधिरूढो मानः कथं निच्त्त इति काय प्रस्तुते निन्त्तिकारणभम- 


भिहितम्‌ । 


कार्यात्‌ कारणप्रतीतौ यथा - 
इन्दुटिप्त इवाञ्चनैन जडिता दष्टिरगीणामिव 
प्म्टानारुणिमेव विद्रुमड्चिः श्यामेव हेमध्रभा । 
काकष्यं कलयामि कोकिटवधूकण्टेध्विव प्रस्तुतं 
सीतायाः पुरतश्च हन्त रिलिनां बहीः सगां इव ॥? 


अप्रस्तुतप्रशासाठ्ङ्ारः ३८५ 


अत्र संमाग्यमानेरिनद्वादिगतैरञ्ननलिघ्तत्वादिभिः कार्यरूपेरभयस्तुतैत्ोको- 


तरो वद्नादिगतः सौन्दर्यातिशयः कारणरूपः भरस्तुतः प्रतीयते । तनेयम- 


प्रस्त॒तप्ररासा। 


[ अप्रस्त॒त ¡ विशेष से [ प्रस्तुत ] सामान्य की प्रतीति यथा- 

उसके सुख से इतना जो तमने खना दै कि वहु जड़ [ मूखंन्यक्ति ] कमलपत्र पर पड़ी पानी 
की वद्‌ कौ सुक्तामणि मान बैठा" यह कौन वड़ी वात है, इसे भी वड वात [ एक मोर है उसे] 
खनो कि [ एक दूसरा जङ्‌ ] उते उठाने लगा किन्तु ज्यो [ उसने 1 उंगली के अय्रभागस्तेभी 
ओर बड़ी ही वारीकी के साथमी उप दुमा वद [ वृद पतते प्र से छंड़क कर॒ पानी मँ भि गई 
ओर इस प्रकार ] ल्त दो गई । इतका उते इतना शोक ह कि कितने ही दिनों से उसे नीद नहीं 
आ रही है । वह मन ही मन हाय हाय कर रहादहेकिमेरा मोती उड़ गया । 

शस पराथ में वक्तव्य तो है यह सामान्य वस्तु कि जो जड़ या नासतमञ्च होते हे वे कहीं 
मी ऊुछ भी करने लगते हैँ किन्तु कथन | किसी व्यक्ति ] विशेष का किया गया है। [ यही पद्य 
काव्यप्रकाराकार ने भौ दिया है किन्तु वहं तत्रः के स्थान पर त्र = कं उड्‌ गयाः यह्‌ 
पाठ हे । “ण्वन्यदस्मादपिः का पदच्छेद “णु अन्यत्‌ अस्मादपि" मी किया जा सकता है ओर 
-ण्वन्‌ यत्‌ मस्मादपि = किं इससे खनते हए भीः द्वितीय पदच्छेद मेँ '्मी- अपिः व्यथै होगा ओर 
मी अनेक दोष आ जाएंगे । ] 

| अप्रस्त॒त ] कारण से [ प्रस्तुत ] कायंकौ प्रतीति होने पर यथा- 

भि तो यह सोचकर स्ूठे ही गम्भीर हो गया कि देखूं यह क्या करती हे, ओर वह भी यह 
सोचकर पित हौ गहं किएक तो यह छिपकर दूसरी से भिका ओर ऊपर से बातचीत भी 
बन्द कि वेढाहै। इस विपरीत स्थितिमे हम दोनों [ कुछ देर तक तो ] इुकी निगाहों से 
[ एक दूर को | बड़ी ही सफाई के साथ देखते रहे, वाद पै, भे, किसी बहाने हंस पड़ा ओर 
उसका भी धीरज द्र गया भौर ओप वह निकले ॥ 


- यहां [ जिज्ञासा तो थी | देर तक्त प्रवृत्त मान हट गया ? इस प्रकार कायं [ के" विषय 


मे अत्तः | कायै [ ही ] प्रस्ठत था किन्तु कदा गया है (हट जानः का कारण । 

[ अप्रस्तुत । काय से [ प्रस्तुत ] कारण की प्रतीति, यथा-- 

सीता के समक्ष चन्रमा मानो काजर्से पुता हुड, सगि कौ दृष्टि मानों स्तन्ध है 
मूगे कौ कान्ति क अरणतां मारना कुम्दखा गईंहै, सवणंकी कान्ति मानों काली पड़ गड है, 
कोयल कौ कूक मे ककंराता दिखा देती है, क्या कटै, अब्र मोरंगे [ मथूरपिच्छ | निन्दार्पद 
प्रतीत हो रहे दै) 

यहो चन्द्रमा आदि मे जिन कञ्जललिषप्तत्व आदि की संभावना कीजारषीहै वे कार्य 
रूप हं आर अप्रस्तुत हैँ । इनते. इनका कारण सीताजी कै मुख आदि का लोकोत्तर ओर 
अतिज्ञायौ सोन्दयं जो वर्णनीय होने से प्रस्तुत है, प्रतीत होता है। इस कारण यहां अप्रस्तुत 
प्रशंसा हे [ उत्प्रेक्षा नहीं ]। 

विमरिनी 
तेनेत्ति । अप्रस्तुता कार्यात्‌ प्रस्तुतस्य कारणस्य प्रतीतेः । यथा वा- 
अनेन साध तरयूवनान्ते कृ नन्मयूरीमुखरे विहस्य । 


विलासवातायनसेवनेन शछाध्यामयोध्यां नगरीं विधेहि ॥ 
२५ अ०् सर 


| 
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३८८द ` अलङ्कारखवंस्वम्‌ 


अचर स्वयंवराख्ये कारणे प्रस्तुते कायंस्यामिधानम्‌ । 
ननु चाच्र कार्यात्‌ कारणस्य प्रतीतो यदि अस्तुतप्रशसा स्यात्त तद्‌ वचयमाणस्य 


पर्यायोक्ताटंकारस्य को विषय इव्य!द- नन्वित्यादि । 

(तन = इस कारण, क्योकि यहां अप्रस्तुत कायं से प्रस्तुत कारण कौ प्रतीति हौ रदी है । अथवा 
दूसरा उदादरण-- 

(सखि ! तुम मोरनिर्यो की बोली पे सुखर सरयु तट के वन-उपवर्ना मे [ स्वयवरमे आए] 


इस [ राम के वंशधर कुमार ] के साथ विहार करने के पश्चात्‌ विलाक्त-बातायन | विरास्ताथं 


निमित मवन की खिड़की ] का सेवन करके अयोध्यापुरी को रलाघ्य बनाओ ।› [ विक्रमांकदेवः 
चरित ९।९१ ] । 
यहाँ स्वयवररूपी कारण प्रस्तुत हे किन्तु कथन किया गया हे [{ उसपे होने वाले 
विदारादि ] कायै का [ यद उदाहरण विमरिनौकार ने अलंकाररत्नाकर से च्या है 
भ्अन्र स्वयं _ कायस्याभिधानम्‌? यह पूरी पंक्ति अलंकाररत्नाकर से उद्घृत पंक्ति ह ' निणेय 
सागर संस्करण में इस पय के पहले ओर नतिनेति' के वाद आईं पंक्ति तथा इस पक्ति मं कारण शब्द्‌ 
के स्थान कायं शब्द छपा है, तथा कार्यशब्द के स्थान पर कारण शब्द जो सवथा अक्षगत हे । | 
यदि इस कार्यं से कारण की प्रतीति" भेद में [ अलंकार ] दोगी अप्रस्तुतप्रशंसा तो भगे कै 
जाने वाडा पर्यायोक्तालकार कदा होगा'-- शस दका पर उत्तर देते हण कदते है - 
[ सवंस्व | 
नचु कायौत्‌ कारणे गम्यमनेऽप्रस्तुप्रशंसायामिष्यमाणायाम्‌ - 
ध्येन टम्बालकः साखः कराघातारूणस्तनः । 
अकारि भग्नवलयो गजासुरवधूजनः `” इति, 
तथा- 
"चक्राभिधातप्रसमाक्ञयेव चकार यो राहुवधजनस्य 
आलिङ्गनोहामविटठासशन्यं रतोत्सवं चुम्बनमात्ररोषम्‌ ॥' 


इत्यादो सुप्रसिद्धे पर्यायोक्तविषयेऽप्रस्तुतप्रशंसायोगः । अज दि गजा- 
खुरवधूगतेन ठम्बाठक त्वादिना कार्येण कारणभूतो गजाखुरबधः भरतीयते । 
तथा राहुवधूगतेन विि्ेन रतोत्सवेन राहुिरश्छेदः कारणरूपो गम्यते । 
पएवमन्य्रापि पर्यायोक्तविषये ज्ञेयम्‌ । तस्मादपरस्तुतपरशसाविषयत्वात्‌ पया. 
योक्तस्य निविंषयत्वधरसङ्गः । नैष दोषः। इह यज कायात्‌ कारणं प्रतीयते । 
तत्र कार्य प्रस्तुतमग्रस्तुतं चेति द्वयी गतिः। तच्च यत्र प्रस्तुतत्वं कायस्य कारण- 
चत्‌ तस्यापि वर्णनीयत्वात्‌ तजन कार्यञ्ुखेन कारणं पयायोक्तमिति पयौयो- 
क्ताटंकारः। तत्र हि कारणापेक्षया का्यंस्यातिदायेन सौन्दर्यमिति तदेव 
वर्णितम्‌ । यथोक्तोदाहरणद्वये । गजाखरवधूव्वत्तान्तोऽपि भगवत्प्रभावजन्य- 
त्वात्‌ प्रस्तुत एव । एवं राहुवधूच्रत्तान्तेऽपि ज्ञेयम्‌ । ततश्च नायमप्रस्तुत- 
प्रहाखाविषयः । यञ्च पुनः कारणस्य प्रस्तुतत्वे कायंमपरस्तुतं वण्यते 


अप्रस्तुतप्ररासाटङ्ारः ३८७ 


तत्न स्पष्ठेवाप्रस्तुतप्रशंसा । यथा--“इन्दु्ित्त इवाञ्जनेन इत्यादौ । अत्र 
हि इन्द।द्यः स्फुटमेवाप्राकरणिकाः । तत्प्रतिच्छन्दभुतानाँ मुखादीनां पाक- 
रणिकलत्वात्‌ । तेनाचेन्द्वादिगतेनाञ्जनलि्षत्वादिना अप्रस्तुतेन कायण प्रस्तुतं 
मुखादिगतं सौन्दयं सहदयाह्नादकारि गम्यते इत्यज्ाप्रस्तुतप्रशंसा । पवं 
च यत्र वाच्योऽ्थोऽथोौन्तरं ताददामेव स्वोपस्कारकत्वेनागुरयति तत्र पयौ- 
योक्तम्‌ , यञ पुनः स्वात्मानमेवापस्तुतत्वात्‌ प्रस्तु तमथौन्तरं प्रति समप 
यति तशाप्रस्त॒तप्ररांसेति निणेयः । ततश्चानया प्रक्रियया 

“राजन्‌ राजसुता न पाडयति मां देव्योऽपि तूष्णीं स्थिताः 

कुञ्जे भोजय मां कुमार सचिवेनदयापि संभुज्यते । 
इत्थं राजश्युकस्तवारिभिवने मुक्तोऽध्वगैः पञ्चरा- 
च्ित्रस्थानवलोक्य शुन्यबलभावेकेकमाभाषते ॥ 

इत्यत्र पर्यायोक्तमेव बोध्यम्‌ । अन्ये तु (दण्डयात्रोद्यतं त्वां बुद्ध्वा 
त्वदरयः पलाय्य गता इति क्रारणरूपस्येवार्थस्य प्रस्तुतत्वात्‌ कायंरूपो- 
ऽर्थोऽग्रस्तुत पव राजश्चुकबुत्तान्तस्यापरस्तुतत्वात्‌ प्रस्वुता्थं प्रति स्वात्मान 
समपेयतीत्यप्रस्तुतपरशंसेवात्र न्याय्येति वणंयन्ति। सवथा पयायोक्ता- 
प्रस्तुतप्ररां सयोर्विषयविभागः सुनिरूपित पवेति स्थितम्‌ । पतानि साधः 
ग्योदाहरणानि । 

रंका--यदि कार्यं से कारण की [ व्यज्ञना द्वारा] प्रतीति होने पर अप्रस्तुतप्रशसा 
भभीष्टहेतो - | 

--जिस् [ शिव ] ने गजाघुर की सियो के केश लटका दिए, ओँघू वदा दिए, स्तन हथेकियां 


के आधातां से लार कर दिए ओौर चूढियां तुडवा दी । ऽस तथा- 


जिस [ विष्णु ] ने [ अपने ] चक्र [ खुदशैन ] को आधात की एकाएक आज्ञा देकर हो 
वान 44 के रतोत्सव को आङ्गिन के उदाम विलास से शून्य ओर केवर चुम्बनमात्र तक 
त कर दिया ।' 


इस जेते पर्यायोक्तालंकार के सुप्रसिद्ध स्थलों मे मी अप्रस्तुतप्ररसा का व्यवहार 
होने लगेगा । यहां भी गजासुर-ख्लीगत कदा ल्टकने आदि कायं से उसके कारण 
गजासुरःवध की प्रतीति होती है। उसी प्रकार राहृवधूगत विशिष्ट रतोत्सव [ रूपौ कायं ] 
से कारणरूप राहुशिरद्छेद की प्रतीति दहयोती है । यही स्थिति पयांयोक्त अल्कार के अन्य 
उदाहरण मे मी जानी जा सकती है। इस प्रकार [ कायं से कारण की : तीति वाले स्थलों को | 
अप्रस्तुतप्रशंसा का विषय मानने पर पर्यायोक्तालंकार का कोडं स्थल ्ी नदीं रह परायगा । 

उत्तर = यह दोष नदीं आता । यँ [इन दोनों भलंकारों में ] जदो काये से 
कारण कौ प्रतीति होती है वहां कायं दो प्रकारका होता है प्रस्तुत या अप्रस्तुत। उन [ दोनों | 
म से जहाँ कारण के समान कार्यं मी वर्णनीय होता है अतः कारय प्रस्तुत रहता है वहाँ पयायोक्ता- 
कार होता हे वर्योकि वहं कारण का प्रकारान्तर ते अर्थात्‌ कायं के द्वारा कथन रहता है, साथ 
ही वर्ह कारण की अथेक्षा कायं का सौन्दयं सातिशय होता दै हसक उसी का वणेन किया 
जाता ह, जेसे[ पयायोक्त के ] उक्त दोनों उदाहरणों मे । इन [ उदाहरणं मँ से प्रथम उदाहरण | 


३८८ अलृङ्कारसवेस्वम्‌ 


मे गजासुर क्री खिर्योकी ददा भी [ वणेनीय अत एव |] प्रस्तुतदही है, क्योकि वह भी भगवान्‌ 
[ किव ] के दही प्रभाव से जनितदे। इसी प्रकार राहु चखियांकी दद्या भी [ प्रस्त॒त ही | समन्ली 
जानी चाहिए । इसी कारण ये स्थल भग्रस्तुतप्रशंसा कै नहीं माने जा सकते) जहां कीं 
कारण प्रस्त॒त रहता है ओर कायं अप्रस्तुत, साथ ही वणेन अप्रस्तुत कार्य का विया जाता है वहां 
स्पष्ट ॒ही अप्रस्त॒तप्रशसा रहती है [ उस्म पर्यायोक्तं की संभावना कथमपि नहीं रहती | 
जेते “इन्दुः इत्यादि पय में । इस्त पमे स्पष्टदही श्दु आदि अप्रस्तृत दँ क्योकि उनके प्रतिपक्षी 
सुख आदि दी याँ प्रस्तुत [ वण्नीय ] है । सलिए यँ इन्दु आदि पँ वणित अंजन 
लिप्तत्व [ काजल से ल्पा हृभा होना ] आदि जो अप्रस्तुत कायं हैँ उनसे सुखादि कै 
भीतर [ कारणरूप ] सौन्दर्य प्रतीत होता दै। ओर वदी सहृदयहृदय मं आनन्दान्रुभूति 
जगाता दहै। इसक्िए यहां अप्रस्तुतप्रशंसा है। इस प्रकार निर्णय यह हा कि पयायोक्त 
वहो होता है जां वाच्य अथै अपने ही जैसे [ वाच्यरूप से प्रतीत ] अन्य अथं को अपनी 
शोमा वदने वाके अर्थ के रूप मेँ व्यञ्जित करता दै, किन्तु जहाँ वह [ वाच्य अथं | 
न्रस्तुत होने के कारण स्वयं को ही [ व्युजना से प्रतीत ] प्रस्ठेत अथे के प्रति समित कर 
देता टै व्यौ अप्रस्तुतप्रशंसा होती है। ओर इस प्रक्रिया के अनुसार 

रास्तागीरों दारा पिजरे से उडाया र।यञ्चजा आपके दाञ्चुओं के भवनों में शून्य छञ्ञे पर 
छिखित एक एक के पास जाकर कहा करता है- "राजन्‌ , राजकुमारी सन्चे पदा नर्द रही, रानियां 
भी चुप दै, अरी बढी ! खिला सने, कुमार ¡ मित्र के साथ अमी तक मोजन नहीं हो रहा । 

 -- इस वाक्याथ मेँ पर्यायोक्त ही समञ्चना चाहिए । [ काव्यप्रकाडकार आदि ] अन्य [ आल- 


कारिक ] इसके विरुद्ध यद कहते दै कि यदं प्रस्तुत है--आपको युद्ध यत्रा के छि उत्‌ जान 
आपके शाञ्च भाग गर है" यदह कारण रूप अथं [ उक्तं राजश्युकवृत्तान्तात्मक | कायं रूपी 


अर्थं अप्रस्तुत है, क्योकि रायघुए की स्थिति काजो वर्णेन दै वह अप्रस्तुते [ वण्ये या सुख्य 
प्रतिपा नदीं है ], अतः वह प्रस्तुत अथं के प्रति अपना समपेणकर देता हे, फलतः यहां अप्रस्तुत- 
प्ररंस्ता ही मानना उचित है ।*-जो दहो उक्त निरूपण से यह भलीभांति निधितहो चुका हे कि 
पर्यायोक्त ओर अप्रष्त॒तप्रश्धसा कै विषय भिन्न हे । | 
अभी जो उदाहरण दिए गए दहे ये सव साधम्य के उदाहरण है । 
विमरशिनी 
सुप्रसिद्ध इति घर्वारंकारकाराभिभते । तत्रेति दवयनिर्धारणे । तदेव वणित्तमिति कायः 


मेवोक्छसर्‌, कारणस्य. गभ्यमानघ्वात | ततस्चेतति द्वयोरपि कार्यकारणयोः ग्रष्ततस्वाव । 
रष्टवेत्ति । अप्रसततस्यैव कार्यस्य प्रशंसितत्वात्‌ । जतश्च द्वयोरपि प्रस्तुतत्वे पथायोक्तम्‌, 


प्रस्तुताप्रस्त तसे सग्रष्तुतप्रशं सेति विषयविभागः} अतश्च सामान्यविशेषयोः प्रस्तुतस्वास 
न ९~- 3) 
भवात्‌ कार्यकारणयोः `प्रष्तुतत्वेऽपि , कार्यात्‌ कारणध्रतीतिवत्‌ कारणात्‌ कायग्रतीतेव" 


चिव्याभावाच । न्च. 
-“पर्यायत्वे कायंहैस्वो भद सामान्ययोस्तथा । 


अप्ररतुतप्रशंसाय सरूपस्येव गम्यता ॥' 
दस्याद्यक्तमयुक्तम्‌ । 
(५, कृ" [] ] । 9 9 
यदेवं तद्र पर्यायोक्ताप्रस्त्‌ तप्रशंसयोः प्रश्त॒ताप्रसरहृतरूपं काय प्रस्तुतं कारण कथमा. 
गृूरथतीव्याशङ्कथाह --एवं चेत्यादि । तादश्चमेवेति वाच्यम्‌ । स्वोपस्कारकत्वेनेति, स्वसिद्धश्थ 


परसश्यातेपात्‌ । समप॑यतीति वाच्योऽर्थः । इस्थं च (स्वसिद्धये पराचतेपः पराधं स्वसखमपंणम्‌ । 
उपादानं खुषणं चः इत्युक्या छच्तणाद्वयाध्रितत्वादनयोरवान्तरोऽपि विषयमेदोऽस्तीस्यत्र 


अप्रस्तुतप्रशासालङ्ारः ३८९ 


तारपयमूर्‌ । ततर्चेत्ि अनयोर्भिन्नविषयत्वात्‌ । अन्य इति काञ्यप्रकाकाराद्यः । स्येति, 
तन्र पर्यायोक्तमप्रस्तुतप्रश्ञंसा वास्सिविष्यभिप्रायः। ॑ | 
इह च खाधम्यण सारूप्योदाहरणानां पू्वमनुदिष्टानामपि "एतानि साधम्योदाहरणा- 
नी'स्मनेनातिदेडवाक्येन [ अतिदेश ] इति निश्चिनुमः! अयं हि मन्थो मन्थक्‌तः पश्चात्‌ 
कैरपि परिन्रिकाभिङ्िखित इति प्रसिद्धिः । तेश्वानवधानादुदाहरणपस्िका न लिखिता । 
अतिदेश राय च पस्त्रिकान्तराज्लिखितमिति ग्न्थस्यासगतव्वमर्‌ । बहूनि पुनरूदाहरणानि 
सारूप्यहेत्‌कस्य भेदस्य, रुचे प्राचुर्यं द्ं नाथम्‌ । एवं "वाच्यस्य संभवे उक्तान्येवोद्‌ाहरणा- 
नी त्यत्राप्ययसेवाभिप्रायो योऽय: 1 अतश्च - ॑ 
"परार्थ यः पीडामनुभवति भङ्गेऽपि मधुरो यदीयः सर्वेषामिह खलं विकारोऽप्यभिमतः 


न संप्राप्तो वृद्धि यदि स श्छशमततेत्रपतितः किमिद षोऽसौ न पुनरगुणाया मद्ुदः ॥ 
तथा- 


"पातः पूष्णो भवति महते नोपत्तापाय यस्मात 
कारेनास्तं क इव न गता यान्ति यास्यन्ति चान्ये । 
एतावत्त व्यथयति यदालोकबाद्येस्तमोनसि- 
स्तस्मिन्नेव प्रकृतिमहति व्योन्नि कन्धोऽव काः ॥ तथा- 
“पथि निपतितां शन्ये कन्ध्वा. निरावरणाननां ननु दधिषटीं गर्वोज्नद्धः सुद घुरकधरः। 
निजसमुचितास्तास्ताश्रे्टा विकारशताकुरो यिन कुषषते काणः काकः कडा जु करिष्यति ॥ 
दद्युदादरणान्यत्र म५१ रेखितब्यानि येन ्रन्थस्य संगतश्वं स्यात्‌ । अत्र च सारूप्य 
साधम्य वाच्यसंभवश्च स्फुट एव । 
सुप्रसिद्ध = [ आनन्दवर्धन आदि | समौ अआलङ्कारिकों को मान्य । तन्न = उनमें से अर्थात्‌ 
उन दोनों मेसे। तदेव वर्णितम्‌ = उती का वणेन किया जाता है = उसी का अर्थात्‌ कायं का, 
वणेन = शब्दतः कथन, क्योकि कारण | शब्दतः कथित न होकर ] प्रतीयमान रहता है । ततश्च = 
ससौ कारण = अथात्‌ कायं ओर कारण इन दोनो क ह प्रस्तुत होने के कारण । स्प्ेव = क्योकि 
यहां जप्रस्त॒त कायं ही राब्दतः कथित है । इस प्रकार (दोनों ही प्रस्तुत हा तो पयांयोक्त होता हे, 


स्वत्‌ भर्‌ > अत्रस्दत तो अप्रस्तुतप्रशंसा यह हुमा [ इन दोनों का ] विषयविभाग । 
इसलिए "कायं ओर कार 


1 तथा सामान्य जर विजेष ये दोनों मेद पर्यायोक्त के अन्तर्गत अजा जाति 
मे केवर सारूप्य ही गम्य होता हे। | 

इत्यादि जो [ किसी आचाय ने, अलंकाररत्नाकरकार ने नदीं ] कदा दै वह ठीक नदीं ह, 
क्योकि सामान्य ओर विशेष [ दोनों णवं साथ ] प्रस्तुत बन नदीं पाते, जो बन पाते हें उन 
कार्यकारण ममी [ प्रस्तुत ] कारणस्े | प्रस्तुत ] काये कौ प्रतीति मेँ वैसा कोई चमत्कार नदीं 
दोता जसा | प्रस्तुत ] कायं से [ प्रस्तुत ] कारण कौ प्रतीति मे होता है। 

यदि णसा हेतो वतलाइ कि पर्यायोक्त मे 
[ दोनों मे हौ ] प्रस्तुत कारण को किंस रूप पं 


हे अतः अप्रस्तुतप्रशंसा 


प्रस्तुत ओर अप्रस्तुत-पररंसा मे अप्रस्वुत कार्यं 


44 व्यजित करते है [ अर्थात्‌ इन दोनों के कारणां में 
मी कोई भेद है अथवा नहीं ] इस [ प्रश्न 1 पर [ उत्तर ] देते इए लिखते है-एवं च । तादन्च- 


मेव = वेसे दौ अथात्‌ वाच्य हौ | स्वो पस्कारकसवेन = अपनी शोभा वदने वाले अके रूपमे 
सकि कि इसमें दूसरे अथ॑ का आक्षेप अपनौ सिद्धि कै छि होता दै। समपयति = समपित कर 
देता हे अथात्‌ वाच्य अथं समधित कर देता ै। इस प्रकार ॒तात्पयै यह कि [ कान्यप्रकाराकार 
दारा कथित | अपनी सिद्धि फ किए दूसरे का आक्षेप उपादान क्लाता है नौर दूसरे अथं 


| 


३९० अल्छड्ारसर्वस्वम्‌ 


को अपना समर्पण [ अर्थात्‌ स्वस्वरूप का सर्वधा त्याग ] लक्षणा-येजो दो लक्षणा हे, उक्त 
दोनों अलंकार इन पर निर्भर रहते े [ पयांयोक्त उपादान पर भोर अप्रस्तुतप्रंसा लक्षण पर ] 
जर इनका यद भी एक नवीन विभाजक तत्व है । ततश्च = ओर [ इस कारण ]= श्न दोनों में 
विषय.विमाग हो जाने से। अन्य = काव्यप्रकाशकार आदि) सवंथा = जो हो, अर्थात राजन्‌ 
राजसुता नः प मे पर्यायोक्त हो या अप्रस्तुतप्रश्यसता । 

यदा हम इस निश्चय पर पचते हैँ किं ये सव साधम्यं के उदाहरण दै" इस अतिदेशवाक्य 
द्वारा साधम्य॑मूलक सारूप्यजनित अप्रस्तुतप्रशंसा के मेदो का अतिदेशमी दहो जाता है यद्यपि 
ये मेद अभी तक बतलाए नदीं गए हें । बात यह है कि यद मन्थ अन्धकार के पश्चात्‌ अन्य कुछ 
व्यक्तियों ने [ तार आदि की] पत्तियां पर छ्िखा था, [ प्रतिल्पि की थी] रेसी प्रसिद्धि है। 
उन व्यक्तियों ने भूलसे उदाहरणांश की पपन्ती तैयार नदीं की। ओर उक्त अतिदेरावाक्य 
अन्य पत्तियों पर से उतार लिया । इसलिए मन्थ की संगति टूट गरे । जदं तक अप्रस्तुतप्ररोसा के 
सारूप्यमूलक भेद के उदादर्णो का सम्बन्ध हे इसके उदाहरण [ अन्धकार ने या मम्मटादि अन्य 
साचायौ ने ] जो अनेक पर्चो द्वारा प्रस्तुत किए वह केवल यह दिखलने के किए किं काव्यम 
यही मेद प्रचुर मात्रा मे मिलता है । उक्त [ लेखक-प्रमाद की ] वातत [ अभी यदीं जागे आने वले | 
वाच्य जहौ संमव होता है उसके ष्दादरण मीयेदही देहस म्न्धांरा के विषय म मीलागू 
होती माननी चाहिए । इसलिए यदा बीच मे-- 

'जो दूसरों के किए पीडा का अनुभव करताहै [ पेरा जाता है टोडा जने पर भीजो 
मधुर ही रहता 8, जिसका विकार [ गुड-शक्रा आदि ] मी सवको प्रिय होता है, रेता श्च 
[ ईव, गन्ना, सांय ] यदि विपरीत भूमिमेंरोपदिया जाय ओर पनपन पाए तो क्या यह उस 
इ्चुकादोष होगा ? ऊषर मरुभूमिका नदीं 


तथा- 
“सूरय नारायण डूब जाते है इसका तो अधिक दुःख नदीं होता, क्योकि समय अने पर कोन 
व्यक्ति नहीं इवा, कोन नहीं इवता ओर कौन नदीं डूबेगा; व्यथा इसकी है कि उसी प्रकृत्ति- 


महान्‌ काद्य मेँ जालोकविरोधी अन्धकार ने धर कर ल्वा ।' 
तथा- 
शत्य पथ पे सुले ह ष्डी दही की मटकी पाकर यदि काना कोम गव॑ से पएूल्कर 
गरदन उठा उठाकर ओर सैकड़ों विकारो से भरकर अपने अनुरूप तत्‌ तत्‌ चेष्टे न करे तो फिर 
कव करेगा ।" 
-ये उदाहरण लिखि दिए जाने चाहिए, जिससे ग्रन्थ [में विषय] की संगति वन सके। 
इनमे साह्प्य, साधम्यं ओर वाच्याथं की संमवता स्पष्टरूपसे विमान दहे) 
विमशं--मूल अन्ध की निरूपित एवेति स्थितम्‌? पक्ति के पश्चात्‌ डं राधवन्‌ ने अपने 
संस्करण मँ सारूप्ये यथाः यदह अंडा ओर दे दिया है। इसके आगे उदाहरण उन्दने मी नदीं 
दिए दै । इस प्रकार सारूप्यमूलक मेद के उदाहरण की कमी सव॑स्व के सभी संस्करर्णो मेँ विमान 
हे । यह कमी विमर्दिनीकार कै समये ही है जैसा कि उनके उक्त विवेचन से स्पष्ट है। समुद्र 
वन्धनेमी ष्सक्मीको परखा है ओर अपनी ओर से उदाहरण जोड़कर ग्रन्थ पुरा कर दिया 
हे । किन्त संजीविनीकार का ध्यान इस ओर नहीं गया है। वस्तुतः इन दोनों संस्करणों में 
यहा कौ संजीविनी अव्यवस्थित है। दोनों ही संस्करणों म यँ यह पंक्ति दी इदं है-- "एतानि 
साधम्यं इति, वेध्यं तून्नेयानि । सारूप्यहेतकं त॒ मेदमनया नीत्या साधर्म्येण सुज्ञानत्वाद्‌ वैधर्म्य 
णोदाहरति धन्या इति ।› !इस अदय म सारूप्यं यथाः पक्ति का कोई प्रतीक नदीं मिक्ता । उसकी 


अप्रस्तुतप्रश्सालङ्कारः ३९१ 


आवदयकता भी नदीं है । यदि प्रतिलिपिकार ने यह लिखि! होता तो वह उदाहरण ल्िखिनान 
भूलता । शस अंश पर विमरिनी भी धूमिल है! उसमे 'वाक्येनातिदेश् इतिः के स्थान पर 
'वाक्येनेति"-- इतना ही छ्िखा मिलता है । वाक्येनातिदेश्यः' योजना हमने अपने मनसे की है। 
इसी प्रकार वहूनि पुनरुदा- प्राचुयंदशनाथ॑म्‌ पंक्ति का स्वारस्य हमने खीचतान कर निकाला है । 


स्पष्ट ही अल्कारक्षवेस्व की प्रतियां उसमे निर्माण के कुछ ही वर्षौ बाद अन्यवस्थित हो गईं ॑थं 
ओर मूर प्रति नष्ट हो गहं थी । 


ध. [ स्वेस्व ] 
वैधर्येण यथा-- 
"धन्याः खलं वने वाताः कल्नारस्परदीतल्ा । 
राममिन्दीवरश्यामं ये स्पृशन्त्यनिवारिताः ।।' 


भत्र वाता घन्या इत्यपरस्तुताद्‌ थौदहमधन्य इति वैधर्म्येण प्रस्तुतोऽर्थः 
प्रतीयते । 


वाच्यस्य संभव उक्तान्येवोदादहरणानि । 
असंमवे यथा-- 
"कस्त्वं भोः कथयामि दैवहतकं मां विद्धि शाखोरकं 
चराग्यादिव वस्ि साघु विदितं कस्मादिदं कथ्यते । 
वामेनात्र वटस्तमध्वगजनः सर्वात्मना सेवन 
न च्छायापि परोपकारङूतये मार्गस्थितस्यापि मे ।" 
अत्राचेतनेन सह प्रन्नोत्तरिका नोपपन्नेति वाच्यस्यासंमव प्व । भरस्तुतं 
रति तात्पयात्‌ प्रमु पव तद्ध्यारोपेण प्रतीतिरिति युञ्यत पवेतत्‌ । 
उभयरूपत्वे यथा- 
अन्तश्छिद्राणि भूयांसि कण्टका बहवो बहिः । 
कथ कमलनाखस्य मा भूवन्‌ भङ्करा गुणाः ॥' 
अत्र वाच्येऽ्थ कण्टकानां भगुरीकरणे हेतत्वं संभवि छिद्राणां त्वसंभ- 
वीत्युभयरूपःवम्‌ । प्रस्तुतस्य तात्पयेण प्रतीतेस्तद्ध्यायोपात्‌ त्र संगतः 
मेवेतदिति नासमीचीनं किचित्‌ । एतदेव च षटेषगभायामस्यामुदाहरणम्‌ । 
वेधम्यमूलक य॒था - 
^रक्तकमल के स्पर्ं से शीतल वनवायु बड़ीदहौी धन्य हैँ जो नीलकमल के समान दयाम 
भगवान्‌ राम को निबाधरूप से चछ्ूत रहती है 
यह वा धन्य दै" शस प्रकार के भपरसतुत अधं ते शे अधन्य हू यह्‌ प्रस्तुत अरं दषम् 
के द्वारा प्रतीत होता है । 
जहां वाच्याथ क्भव होता है उसके उदाहरण पवोक्त उदाहरण ही है । 
वाच्य जहां असंभव होता है उप्तका उदाहरण यह है-- 
(तुम कोन हो, भाई ! बतलाता हू मुञ्चे भाग्य का मारा शाखोटक समश्चो । ठम तो एेसे बोल 
रहे दो जसे विरक्त दौ । आपने ठीक समञ्चा। रेसा क्यौ ! बताता हं । यहां जो बँ ओर बड़ 


३९२ ` अच्ङ्कारसवेस्वम्‌ 


करा पेड है, रास्तागीर इसका सेवन सव प्रकारसे करते, मे तोरस्तिपरदही ल्गा दह किन्तु 
मेरो छाया तक दूसरों का छाम नहीं कर पाती ।' 

- यहां अचेतन के साथ प्रदनोत्तर नदींहो सकते इसलिए वाच्याथं असंमव ही है । वह 
प्रस्तुत के प्रति तत्पर दै, अतः पहले उस [ प्रष्तत] का आरोप दहो जाता तब [ वाक्याथ 
को | प्रतीति होती ह, फलतः यष्ट [ प्रदनोत्तर ] संभव हदो जाताहे। 

उमयरूप [ संभव ओर असंभव वाच्य ] का उदाहरण य॒था-- 

मीतर बहुत से चह ओर बाहर वहते कटि। भला कमल नाल के गुण [ तन्तु] भंगुर 
कैसेनदहों।ः 

- यहां [ तन्तुं के | भङ्गुरत्वमें कायो की कारणता संभव है [ काटो मेँ उलन्च कर धागे, 
सूत्रः केपड़ फट शी जाते हें | विन्तु च्छिद्र की कारणता संमव नहीं है [ तन्तनिमित वख्रादि 
मंचिद्रि तो रहते ही है, उनसे वख नष्ट नहीं होता] इसलिए [ यदं वाच्याथं ] उभयरूप 
हे [ संमव भी है ओर असमव मी] प्रस्त॒त की प्रतीति तात्पर्यविषयीभूत अथं केरूप में होती 
हे अतः उस [ प्रस्तत ] का [ अप्रस्तत पर} आरोप हो जाता है। फलतः यह [ अप्रस्त॒त भी ] 
यहां संगत ही है । फलतः यहां कोई दोष नदीं आता । दलेषगमित इस [ अप्रस्तुतप्ररेसा | का 
उदाहरण मी यही हे । 


विमरिनी 


तद्ध्यारोपेणेति प्रस्तुतारोपेण । एतदिति अचेतनेन सह प्रश्नोत्तरकरणम्‌ ¦ एतच्च 
सामान्मादिमेद्पन्चक वाच्यं सदर्थान्तरन्याखद््टान्तयोर्विषयो भवति । अन्यथा पुनरस्या 
एवेति द्ञयितुमाह - तत्रेत्यादिना । 

तदृभ्यारोपेण = उसके अध्यारोप के द्वारा = प्रस्त॒त के आध्यारोपके द्वारा। एतत्‌ = 
यह्‌ अधात्‌ अचेतन के साथ प्रदनोत्तर । ये जो सामान्यादि पांचमेददहैये यदि वाच्य [मात्र] 
होते हं तो अर्थान्तरन्यास ओर दृष्टान्त के विषय वनते है, नहीं तो शसी [ अप्रस्ततप्रशंसा ] के-- 
यह दिखलने के लिए कहते दै- 


| स्वस्व | 
तद्त्र सामन्यविदोषत्वेन कायंकारणत्वेन सारूप्येण च यद्‌ सेद्पञ्चकधुदि् 
तत्र दयोः सामन्यविरोषयोः कायकारणयोश्च थद्‌ घाच्यत्वं भवति तदार्था 
न्तरन्यासाविभोवः । सरूपयोस्तु वाच्यत्वे दण्रन्तः । अप्रस्तुतस्य वाच्यत्वे 
© श ४५ 
प्रस्तुतस्य गम्यत्वे सवप्रस्तुतप्रशसेति निणयः । 
यहां यह निष्कं निकलता है कि ये जो सामान्यविज्ेषमूल्क कायंकारणभावमूलक 
तथा सद्ृर्यमूलक पांच मेद वतलाए गए हैँ इनमे जव [ आदिम ] दौ [मेदो ] में सामान्य ओर 
विदेष तथा कायं ओर कारण [ये दोनों ही अर्थं] वाच्य होते हं तो [ अलंकार ] निष्पन्न 
होता है अर्थान्तरन्यास; ओर जव [ सा्ररयमूलक भेद ॐ] दोनों समान अथं वाच्य होतेह 
तो दृष्टान्त । किन्त वह सव॑था अप्रस्ततप्ररंसा दी होती है जहां भप्रस्त॒त वाच्य होतादहै भौर 
प्रस्तुत गम्य । 


विमदिनी 


सर्वथेद्यनेनेतन्ञक्षणस्याभष्यभिचार उक्तः। 


अपरस्तुतप्रदासाल्ङ्ारः २९२ 


स्व॑था कह कर यदह संकेत किया किं अप्रस्तुतप्रशंसा का जो लक्षण बनाया गया है वह 
दूसरे अरुंकारां मे संक्रान्त नहीं होता । 
विमक्लं-- यों एक ध्यान देने कौ बात यह दहे किकायसे कारण की प्रतीति वाके भेद में 
अप्रस्ततप्रशंसा से पयांयोक्त का अन्तर अन्धकार ने वही कहकर किया है जो कहकर अप्रस्तुतप्र्सा 
से अर्थान्तर न्यास का अन्तर कर रहे है । उन्दने पर्यायोक्त मँ मी कायं को प्रस्तत ही बतलाया 
है जैसा कि यहं अथान्तरन्यास मे भौ वतला रहे है । फलतः पर्यायोक्त ओर अर्थान्तरन्यास के वीच 
मेदक तत्व का विचार करना ह। मन्थकारने इस विषय प्र्‌ यहां ओर इन दोनों अल्कारों 
के प्रकरणमें मौ उछ नदीं क्ख । विमरिनीकार भीचुपहैः। इसछिए कि अन्तर स्पषटह। 
यह कि अथान्तरन्यास मे कारण दोनो वाच्य रहते है जव कि पयायोक्त मे केव कायं ही वाच्य 
होता दै । इसीलिए अथान्तरन्यापस् मे समथ्य॑समर्कभाव बन जाता है, पर्यायोक्त मे नहीं । 
अप्रस्त॒तप्रशंसा का पू्वतिहास - 
भामह-- भामह मं अप्रस्तुतप्रशंसा के मेद नदीं मिलते । सामान्य लक्षणमात्र इस प्रकार 
मिलता है- 
अधिकारादपेतस्य वस्तुनोऽन्यस्य या रतुत्तिः । 
भप्रस्त॒तप्ररासेति सा चैव कथ्यते यथा॥ १।२९ ॥ 
प्रीणितप्रणयि स्वादु काले परिणतं वहु । 
विना पुरुषकारेण फलं पदयत राखिनाम्‌ ॥ ३।३० ॥ 
--मभिकार = [ प्रकरण ] से मलग [ अप्राकरणिक ] किसी अन्य पदार्थं की जो स्तुति उसे 
“अप्रस्तुतप्रश्यसा' इस नाम से कदा जाता है । यथा- 


-- याचको को संते्ट करने वारे, स्वादु, समय पर फले तथा विशाल फल, देखो तो, वृक्षों मेँ 
विनादही पुरुषाथंकेल्गगएदहें। 


यहा भामह ने प्रशंसा शब्द का अर्थं स्तुति किया है । वस्तुतः प्रसा का अर्थं केव कथनमात्र 
हे । परवत्ता आचायों ने यही अथं माना हे। 


वामन :--वामन के यहां प्रस्तुतप्रशंसा का स्वरूप अत्यन्त भूमिक भौर अस्पष्ट है । उसका 
अन्तमाव अतिशयोक्ति के निगी्याध्यवसान भेद में दो जाता है। वामन का अप्ररोसाविवेचन 
यह ह- 

[ सूत्र | [ उपमेयस्य ] किचिदुक्तावप्रस्त॒तप्ररंसा । 


[ वृत्ति ] उपमेयस्य किचिच्िलिङ्गमात्रेणोक्तौ समानवस्तुन्यासोऽप्रस्त॒तप्रदंसा । यथा- 
'लावण्यसिन्धुरपरेव हि केयमत्र यत्रोत्पलानि शशिना सह संप्लवन्ते । 
उन्मस्नति द्विरदकुम्भतटी च य॒त्र यत्रापरे कदलिकाण्डमृणालदण्डाः ॥ 
भप्ररतुतस्याथेस्य प्ररंसनमग्रस्ततप्रशसा । 
उपेय का सकितिकल्पमात्र से ही उर्लेख हो ओर प्रधानरूप से उकर्लेख हो तत्समान 
पदाथं का तो अप्रस्त॒तप्ररंसा होती है । जैसे [ किसी युवती के वणेन मेँ कथित यह उक्ति }~ ध्यह 
तो कोई एक भिन्न ही लवण्यस्िन्धु है जिसमे कमर [ नेत्र] चन्द्रमा [ युखमण्डल ] के साथ 
तेर रहे दै । साथ हौ जहो हाथी के कुम्म [ स्तन ] उभर रदे हे ओर जँ कोई दूसरे ही कदली 
के काण्ड तथा स्रृणाल के दण्ड मौ विमान है । अप्रस्त॒त की प्रशंसा होने से यह अप्रस्ततप्ररंसा 
नाम से पुकारी जाती है।' 


३९७ अलङ्कारसलवंस्वम्‌ 


स्पष्ट ही मामह ओर वामन केव सारूप्यमुलक भेद को दी अपरस्तुतप्रडंसा बतला रदे है। 
वामन इसीलिए श्से उपमा का अवान्तररूप वतलाते हैँ उनका उदाहरण स्पष्टरूप से अतिरायोक्ति. 
काही उदाहरण दहे । 

 उद्धट = उद्धर ने भामह के लक्षण को प्रायः ज्यो का त्यों अपना ज्या दै-- 
"अधिकारादपेतस्य वस्तुनोऽन्यस्य या स्तुत्तिः। 
अप्रस्तुत प्ररसेय॑ ्रस्तुताथनुबन्धिनी ॥' 

--अधिकार [ प्रकरण ] से दूर किसी अन्य अथंकी रेसी स्तृतति जो प्रकृत अथं से संबन्ध 
रखती है अप्रस्तुतप्ररांसा कदल ती है । स्पष्ट ही उद्धट ने भामह से आगे बदकर एक ही बात 
कही । वह है अप्रस्तुत का प्रस्तुत से संबद्ध रहना । उन्दने उदाहरण दिया- 

ध्यान्ति स्वदेहेषु जरामसंप्राप्तोपमोक्तृकाः । 
फलपुष्पद्धिभाजोऽपि दुगदेरावनश्चियः ॥ 

--दुगम स्थान की वनश्री फल ओर पएूल की सम्रद्धि से युक्त होने पर भी उपभोक्ता न 
भिल्नेसे अपने देद में ही जरा को प्राप्हो जाती ह । यहु वाक्य अविवाहित ओर अस्पृरय 
या भल्युच्च वंदा की सन्दरी को लक्ष्य कर कहा गया है । भतः यह अप्रस्तुतप्रंस्ा का सारूप्य- 
मूक भेद हे । श्सके अतिरिक्त अन्य भेद उद्धर में भामह ओर वामन के ही समान नहीं मिरूते । 
अप्रस्त॒तप्ररोस्ा नाम के विषय में भामह ओर उद्धटकामतषदहीरहै। 


रुद्रट = रुद्रट के कान्यालंकार में अप्रस्तुतप्ररसानाम से कों अल्कार नहीं मिलता । भन्योक्ति 
नाम से जो अलंकार मिलता है उत्ते सारूप्यमूलक अप्रस्तुतप्रशंसा माना जा सकता है । अन्यौक्ति 
का निरूपण रुद्रटने इस प्रकार किया 8- 
'असमानविेषणमपि यत्र॒ समानेतिवृत्तसुपमेयम्‌ । 
उक्तेन गम्यते प्रमुपमानेनेत्ति सान्योत्तिः ॥ ८।७५ ॥ 
यथा- | 
“मुक्त्वा सलीलहसं विकसितकमलोज्ज्वर सरः सरसम्‌ । 
वकटुलितजलं पल्वलमभिलषसि सते ! न हसोऽसि ॥ 


- जह केवल उपमान ही कहा जाए ओर उपमेय विशेषणं की उमयार्थकता न रहने परमी 
योव इतिवृत्त की समानतामात्र पे आक्षिप्त हयो वह [ मल्कार |] अन्योक्ति कहुछाता है । यथा-- 

-- “मित्र ! हंसों की लीखा से युक्त, खिले कमलो से उद्धासित तथा सरस जल्वाले सरोवर 
को छोडकर वगुलं से गंदे गददे को चाह रहैहो, तम हंस नदीं दो यहाँ विदग्धगोष्ठीको 
छोड़ उचक्तों के गिरोह मे जा रहे किसी शिष्ट मित्र ने उपालम्भ किया है। स्ारूप्यमूलक भप्रस्तुत- 
शस्ता का यह एक उत्तम उदाहरण है। भामह, वामन ओर उद्धर के उदाहरणं की अपेक्षा 
यही श्सका वास्तविक उदाहरण माना जा सकता है । 


मम्मट = अप्रस्तुतप्रशंसा का जो निरूपण अलंकार सरव॑स्वकार ने किया है उसका आधार मम्मट 
का अप्ररतुतप्रशंसाविवेचन है । मम्मटने उक्त पांचा मेद स्वीकार किए हैँ ओर स्ारूप्यमूल्क 
भेद के अनेक उदाहरण दिए है । कस्त्वं मोः०? प्य ममभ्मटने भी उदुधृत किया है ओर उस पर 
चेतनारोप की बात आनन्दवधंन कै हयी समान कही हे । एतत्‌ तस्यः पद्यभी मम्मट ने उद्धूत 
किया है । राजन्‌ राजसुता० प्य मे उन्दने अप्रस्तुतप्रशंसा ही मानी है जिसपर सवस्वकार 
ने अपनी विमति व्यक्त की है । मम्मट का अप्रस्त॒तप्र्ंस्तानिरूपण इस प्रकार है- 


अग्रस्तुवप्ररासालङ्कारः २९५ 


[ लक्षण = ] “अप्रस्तुतप्रशंसा या सा सेव प्रस्तुताश्रया । 
[ सेद = ] कार्य निमित्ते सामान्ये विषे प्रस्तुते सति । 
तदन्यस्य वचस्तुल्ये तुल्यस्येति च पञ्चधा ॥ 


लक्षण पर इत्ति लिखते हुए मम्मट ने अप्रस्तुतप्रशंसा नाम पर अपना भामह तथा उद्धट के 


मत से भिन्न मत संकेतित किया है--अप्राकरणिकस्याभिधानेन प्राकरणिकस्याक्षेपोऽप्रस्तुत- 
प्रशंसा "° अथांत-- 


[ अप्रस्तुत = ] अप्राकरणिक [ अथं ] की [ प्रशंसा = ] अभिधा० द्वारा उक्ति से प्राकरणिक. 
अथे का आक्षेप होने के कारण अलंकार रा नाम अप्रस्तुतप्र्ेसा पड़ता है, लक्षण मे भी मम्मर 
ने अप्रस्त॒तप्रशंसा शाब्द को योगिक शब्द के {रूप में अपनाया है जोर उद्भट के ्रस्तुतार्थाचु- 
बन्धिनी" पद का अथे अपनाकर '्रस्तुताश्रया' कते हुए उन्होने लक्षणके रूप सें अप्रस्तुतप्रदांसा 
राब्द को ही पतांप्त बतला दिया है । उनकी लक्षणकारिका का अनुवाद होता-- 

श्रस्तुताधित जो अप्रस्तुतप्रशेसा वदी अप्रस्तुतप्रशंसा? । विमर्शिनीकार ने सादृश्यमूल्क 


भेद के जो अनेक भेदं का संकेत दिया दै उसका मूल मम्मट का विवेचन द्यी है। मम्मट ने 
लिखा हदै- 


दच्ये प्रसते तस्याभिषाने रयः प्रकाराः, उङेषः, समासोक्तिः, साट्स्यमात्रं वा तुस्यात्‌ तुल्यस्य 
ह्याक्षेपे देवः ।- 
अथात प्रस्तुत तुर्य के अप्रस्तुत तुल्य से आक्षेपमें तीन भेद होते है, क्योकि तुल्य से 
तुल्य के आक्षेप मं इलेष, समासोक्ति ओर सादृर्यमात्र ये तीन हेतु होते है । 
यां दलेष का अथ द यथतामात्र हे । इसी प्रकार समासोक्ति का अथं मी संक्षेप मेँ अनेकाथानु- 
रूप शब्दयोजना है । रलेषालंकार या समासोक्तिलकार नहीं । इन तीनों के एक एक उदाहरण 
देने के पश्चात्‌ मम्मरने यह मी स्पष्ट किया हे कि अप्रस्तुतप्रशंसा मे कहीं चेतन का अध्यारोप 
अपेक्षित नदीं होता, कीं अपेक्षित मौ हदोताहै तोया तो सर्वात्मना या फिर अंशतः, 
“कस्त्वं भोः प्य को उन्दने सर्वात्मना अध्यारोप का उदाहरण माना है । 
मम्मट ने साषम्य-वेधम्बं कौ च्चा नदीं की है, न तो पर्यायोक्त, दृष्टान्त तथा अर्थान्तरन्यास कै 
साथ सान्यकषम्य दौ उन्दने बतलाए । सवस्वकार का अप्रस्तुतप्रशंसा मे यदी रेसा योगदान है 
जिसे मम्मटसे अगे वदा हुआ कहा जा सकता है । | 
रोभाकर- परवर्ती शोभाकर ने अप्रस्तुत मे एक नवीन विचार छ्डाहे। वह है द्वितीय 
मर्थं कौ प्रतीति करनेवाली शब्दवृत्ति का । आनन्दवधेनाचायं ने अप्रस्तुतप्रसुसा मे द्वितीय अथं 
की प्रतीति व्यजना दवारा मानी थी मम्मट ने उस्तका विरोध नहीं किया। शोभाकर का कहना 
है कि यहां द्वितीयाथं कौ प्रतीति व्यजनासे न होकर लक्षणासे होती है। उनका कहना है कि- 
अप्रस्तुत अथं प्रस्ताव अथात्‌ प्रकरणके दारा बाधित हो जाता है, अतः उसको सास्य आदि 
सम्बन्ध के आधार पर प्रकरणानुरूप अथं में लक्षणा हो जाती है । इसका प्रयोजन होता है प्रस्तुत 
अथं का प्रतिपादन छिपाकर करना । इस प्रकार इसमे लक्षणा के सुख्याथैबाध, सुख्याथ॑सम्बन्ध 
तथा प्रयोजन ये तीनो हेतु विद्यमान रहते है । व्यंजन वहां होती है जहां वाच्यां बाधित नहीं 
रहता ॥ शोमाकर ने इस विषय मेँ किंस अज्ञात आचाय कौ एक कारिका भी उद्धृत कौ है-- 
“मुख्यार्थवाधादिस्मस्तःे तयोगादसौ रक्षणयेव युक्ता! विमरिनीकार ने कदाचित्‌ इसी धारणा 
प्र उपादान ओर लक्षणलक्षणा की चचा चला है । रत्नाकरकार ने यहां जिन रक्षणामेदं का नाम 
लियाहै वे इनसे भिन्नहैं। 


३९६ अलङ्कारसवंस्वम्‌ 


रत्नाकरकार यहां लक्षणा के कोन से मेद मानना चाहतेदहैः यह उनके लेखे स्पष्ट नहीं 
होता । य्॒यपि पयायोक्ताल्कारमें आए इसी प्रकारसे ल्गतादहेकि वे अप्रस्त॒तप्रशंसामें मी 
उपादानलक्षणा ही मानते हे । ययपि सवेस्वकार ने भी य्यत्र वाच्योऽ्थोऽर्थान्तरं स्वो पस्कारकत्वे- 
नागूरयति तच्र पर्यायोक्तम्‌ तथा यत्र पुनः स्वात्मानमेव।प्रस्तुतत्वात्‌ प्रस्त॒तमर्थान्तरं प्रति समण्यति 
तत्राप्रस्तुतप्रशं साः इन पंक्तियो के द्वारा मम्मट को स्वसिद्धये पराक्षेपः" तथा "परार्थं स्वसमथनम्‌ 
इस रक्षणानिरूपक कारिका की पदावली से मिलती-जुल्ती पदावली मे पर्यायोक्त से अप्रस्तुत- 
प्रदासा का मेद दिखलाया है तथापि उनमें उनका प्रतिपाय लक्षणा नहीं है । उनके उक्त कथन का 
अर्थं केवर इतना ही है किं पर्यायोक्त मेँ व्यग्याथं वाच्याथैकी रोभा व्डाता है ओौर अप्रस्तुत- 
प्रशंसा म उसपते उच्टे वाच्याथं ही व्यंग्याथं की भी । आगूरण राब्द को मम्मट ने व्यजना का प्याय 
माना है [ द्वितीय उछ।सान्त ]। पण्डितराज ने भी अप्रस्तुतप्रशंसायां प्रस्तुतं व्यङ्ग्यमिति निवि- 
वादम्‌ [ अप्रस्तुनप्र्ंसाप्रकरण का अंत ] इस प्रकार अग्रस्त॒तप्रशंसा मे प्रस्तुतां को व्यजनाल्भ्य 
ही माना है । वहां अतिशयोक्ति से अन्तर करते हट उन्दने अप्रस्तुतप्रशंसा मे लक्षणा का खण्डन 
भी किया दहै। लक्षणा मानने से अप्रस्तुतप्रद्ाके सादृस्यमूल्क भेद का अतिशयोक्ति से अन्तर 
नीं किया जा सकेगा । अन्य मेदो में कायक कारण में अथवा कारण कौ कायै में लक्षणा माननी 
होगी, जो असंगत होगी क्योकि कायंकारणके वीच हृदं लक्षणाका प्रयोजन कायं ओर कारण कै 
वीच अमेद सिद्धकरनादहदी होतादहै जे्ताकि श्वत युद" आदि प्रयोगोंमें देखा जाताहै। 
अप्रस्तुतप्ररांसा मे अभेद की विवक्षा नहीं रहती । केव चछिपाकर कहने की विवक्षा करती हे। 
इसीकिए पण्डितराज जगन्नाथने मी अप्रस्तुतप्ररसामें दोनों अर्थोमेंमेद दही मानाहै ओर इसी 
तकं पर लक्षगका खण्डन कियाद द्रष्टञ्य -वाच्याथेतारस्थ्यनैव व्यङ्ग्यप्रतीतेः सवंसहृदय- 
सम्मतत्वात्‌' [ अप्रस्त॒तप्रदंसाप्रकरणान्त ] फलतः विमरिनीकार के दारा मी इस प्रकरण मे लक्षणा 
करा अस्तित्व मानना रत्नाकरकार आदि की सवंस्व की इन पक्तियोके विषय में वनी अन्यथा धारणा 
करा प्रमाव मानना होगा । 
दोभाकर का अप्रस्तुतप्रंसारक्षणा शस प्रकार दै-- 
'अप्रस्त॒तादन्यप्रतौतिरप्रस्तुतप्रदसा ।' 
--अप्रस्व॒त से भन्यकौी प्रतीति अप्रस्तुप्ररंसा 1" 


अप्रस्तुतप्ररंसा का प्रवाह अप्पयदीक्षित तक आकर समुद्र मं गिरती शगा के प्रवाह के समानः 


बहुली हो गयी । समासोक्ति मेँ प्रस्ठ॒त से अप्रस्तुत कौ व्यंजन हती थौ ओर अग्रस्ठुतप्रशंला मे 
यप्रस्त॒त से प्रस्तुत की । एक स्थल टेसा मिला जिक्तमें प्रतीत होने वाला दितीय अथंमी प्रस्तुत ही 
रहता है ओर प्रतीति कराने वाला प्रथम अथै मी । अप्पयदीक्षित ने उसे एक प्रथक्‌ अलंकार बतलाया 
ओर उते परिकरांकुर के समान प्रस्तुताकुर नाम दिया । उसका निरूपण इतस प्रकार क्िया-- 


'प्रस्तुतेन प्रस्तुतस्य चोतने प्रस्तुताङ्करः । 
[ यथा- ] किं अङ्ग ! सत्यां मालत्यां केतक्या कण्टकेद्धया ॥ 


प्रस्तुत से प्रस्त का [ ही ] च्ोतन हो तो अलंकार प्रस्तुताक्र होगा । यथा- 

--अरे शृङ्गं ! माक्ती के रहते हए करीरी केतको से क्या । | 

अप्पयदीक्षित के अनुसार यह्‌ उक्ति नायक के साथ उचानविहार कर रही नायिकाकी दै, 
फलतः यहां शङ्गपक्ष मी प्रस्तुत ही दै ओर खुन्दर कुल्वधू को छोड़ क्रूर वेर्या के प्रतिं आङ्ष्ट होने 
वाले नायक का पक्ष भी प्रस्तुत ही है। इसी प्रकार कस्त्वं भोः कथयामि०' पच्च मे भी भप्पय्‌- 
दीक्चित ने प्रस्ठतां्ुर हयी माना है । उनका कहना है करि अचेतन के साथ भी बातचीत संभव डे 


न्ग्ययषीिि - 


अप्रस्तुतप्रदसालङ्कारः ३९७ 


अप्तमव नहीं, भोकेपन मे या अधिक भाषुकता में ऊपर सङ्ग के प्रति नायिका की उक्तिके समान 
दराखोरक के साथ मी पथिक की उक्ति वन सकती है । 


पण्डितराज जगन्नाथ ने एसे स्थलों मे अप्रस्तुतप्रशंसा ही मानी है। उनका कहना है कि 
“अप्रस्तुतप्रशंसा मे अप्रस्तुत शब्द का अथं है वह अथे जो सुख्यतात्पयंविषय न हो ।*--भअग्रस्तुत 
दाग्देन दि सख्यतात्पयंविषयीभूता्थांतिरिक्तोऽथों विवक्षितः [ द्रष्टव्य रतगंगाधर ५४२ निर्णय० 
संस्क० & | ंगके प्रति नायिका की उपयुक्त उक्तिमें नायिका का मुख्य तात्पर्यं नायक की 
चपलता कौ ओर इगित करना है । अङ्गचेष्टा तो वहां माध्यम मात्र है, 

अगे चरुकर पण्डितराज मी बहक गए है । उन्होने एक प्ररन उठाया कि यदि रेसा को$ 
स्थर हौ जिप्तमं॑विरेषणगत दरेष न हो किन्तु प्रस्तुत से अप्रस्तुत कौ प्रतीत्तिहो रही हो वहां 
समासोक्ति मानी नहीं जा सकेगो क्योकि समासोक्ति विदेषण देष पर निर्भर रहती है । अप्रस्त॒त- 
प्रसा इसलिए नदीं होगी कि वहां प्रस्तुत से अग्रस्तुत कौ व्यंजना रहती है। तव वहां कौन सा 
अल्कार माना जाएगा । उदाहरण के रूपमे उन्होने निम्नलिखित पद्य वनाया- 


'आपेदिरेऽम्बर पथ परितो विज्ञ] 
भृङ्गा रसालमुकुलानि समाश्रयन्त । 
संको चमच्चति सरस्त्वयि दीनदीनो 
मीनो नु हन्त कतमां गतिमभ्युपैतु ॥ 
-दे सरोवर ! त॒म विल्कुल सूखने लगे तो पंख वाके पेरू आका मे उड़ गए, भोरे 
आच्रमंजरी पर जा बे । परन्तु यह अत्यन्त दीन मीन कहां जाए | 
-- यहां रोदृत्तान्त ही प्रस्त॒त दो ओर राज्यनाशोन्सुख राजा अथवा संपत्तिनाशोन्सख 
माश्रयदाता अप्रस्तुत तो प्ामान्यतःन तो समासोक्ति मानी जा सकेगी क्योकि चिह्ेषणोंमे 
द य्थकता नदीं हे, ओर अप्रस्त॒तप्रस। भी नहीं मानी जा सकेगी क्योकि यहां वाच्यां प्रस्तुत 
हे अप्रस्तुत नदीं । ॑ 
पण्डितराज इसका उत्तर न दै सके ' उन्दने यहां अप्रस्तुतप्रशंसा को ही मान्य्‌ उहरादिया । 
उन्होने कदा कि अ्रस्त॒तप्रदंसाशब्द का अर्थं अप्रस्तत की प्ररंसा करनेके साथ द्यी अप्रस्तुत से 


प्रशसा भी किया जा सकता है। अर्थात्‌ भग्रस्तुतप्रशंसा शब्द मे षष्ठीतत्पुरुष के साथ तृतीया 
तत्पुरुष भी माना ज। सकता है । द्वितीय अथं के मनुसार उक्त पच 
जा सकेगी । पण्डितराज कौ पक्तियां है- 


'अप्रस्तुतप्रदोसेवाालंकारः । भमप्रस्त॒तस्य प्ररसेति न तदथः वि त्वप्रस्त॒ततेनेति। सा चार्थात्‌ 
रस्त॒तस्यैव । एवं च वाच्येन व्यक्तेन वा अप्रस्तुतेन वाच्यं व्यक्तं वा प्रस्तुतं यत्र साद्स्यान्यतम- 
प्रकारेण प्र्यस्यते साभप्रसतुतप्रशसेति, न तु वाच्येनैव व्यङग्यमेवेति। 

- उक्त स्थिति मे भी अलंकार अप्रस्तुतप्रशंसा ही होगी । वह उसका अथं अप्रस्तुत की 
प्ररंसा न होगा अपि अप्रस्तुत से प्रशंसाः होगा । अर्थात्‌ प्रस्तुत की प्रदंसा । इस प्रकार अप्रस्तुत- 
प्रशंसा का क्षण होगा क्रि वाच्य या व्यङ्ग्य अप्रस्तुत के दारा वाच्य या व्यंग्य प्रस्तुत की 
प्रशंसा जहां सादृश्यादि पांच प्रकारो मे से किसी एक प्रकार से हो वह अप्रस्तुत प्रशंसाः न किं 
वाच्यकेदही द्वारा ब्यग्यकी ही प्ररंसाहोतो)' 

पण्डितराज ने अप्रस्तुतप्रशंसा का रक्षण इस संशोधन के वहे श्स प्रकार किया था- 


'अप्रस्॒तेन यवहारेण सादृर्यादिवक्ष्यमाणप्रकारान्यतमप्रकारेण प्रस्त॒तन्यवदारो यत्र प्रशस्यते. 
साऽप्रस्त॒तप्रशंसा ।' 


येमे मी अप्रस्तुप्ररांसा मानी 


३९.८ अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


जह्य अप्रस्तुत व्यवहार से साट्ृस्यादि [ पाँच प्रकारो मेँ से किती प्रकार के द्वारा 
प्रस्तुत व्यवहार का प्र्यस्तीकरण दहदौ वह अप्रस्तुतप्रशंसा प्रशसा का अर्थं करते हुए उन्न स्पष्ट 
लिखा प्रशंसनं च वर्णनमात्रं, न त॒ स्तुतिः, धिक्‌ तालस्योन्नततां यस्य च्छायापि नोपकाराय' - 
इत्यादावन्याप्त्यापत्तेः ॥ अर्थात्‌ श्रं सा का अथं यँ केवर वणेन है, स्तुति न्दी, क्योकि (ता 
की उता को धिक्रार है जिसकी छाया तक उपकार मे नदीं आतीः--इत्यादि अगप्रस्तुतग्रर साओं 
तं लक्षण संगत न होगा । इस लक्षण मेँ पण्डितराज ने प्राचीन आचार्यौ का सुलादिजा तोड़कर 
नवीन व्यवस्था प्रस्तुत की थी। प्राचीनां ने अप्रस्तुत का शब्दतः कथन चमत्कारहेतु माना या 
जर अग्रस्ततप्र्ंसा शाब्द की वैसी दी व्याख्या की यी । पण्डितराज ने यौः चमत्कारदैतु माना 
अप्रस्तुत द्वारा प्रस्तुत के वर्णन को । वणेन दाब्द का अथं उर्ोनि ज्ञान मात्र माना ह क्योकि मेद करते 
हए छिलिा है इयं च पञ्चा अप्रस्तुतेन प्रस्त॒तं गम्यते यस्यामित्येका' । परवर्ती संरोधित रक्षण 
म उन्दने प्रशस्यते = प्रशस्तीकरणः का अथं स्पष्ट नदीं किया । किन्तु वे यहाँ प्रशंसा का अथै 
प्रस्त॒त की शोभावृद्धि को छोडकर ओर कुछ कर ही नदीं सकते । क्योकि अन्य कोद अर्थं “आपेदिरे 
पथा्थं जेते परयाथं मे लागू नदीं होगा। ओर योभाव्रद्धि अथ का वे समासोक्ति से अप्रस्तुतप्रशंसा 
को भिन्न नदीं कर सकते । समासोक्ति मेँ अप्रस्तुत के द्वारा प्रस्तुत कौ शोमा बडादं दी जाती 
ड । नागेडा ने यह आपत्ति उठाई दौ ओर “आपेदिरे” पच मेँ इती कारण समासोक्ति दी मानौ । 
दोभा व्दाने की बात कार्यकारणभाव ओर सामान्यविशेषभाव में कट जाएगी । वहीं आपस मं 
किसी की किसी से शोभा नदीं बदृती, केवल "छिपावः की कला द्वारा वाक्याथकौ रोमा वदा 
जाती है । जहां तक -समासोक्ति शब्द के अथं का संबन्ध है उसका जो अथं विशेषणदलेष द्वारा संक्षेप 
म दो भिन्न भिन्न पदार्थो की उक्ति किया जाता है वद “आपेदिरे०' पद्याथ म अवदय नहीं हे क्र्वोकि 
वँ रलेष नीं है तथापि समासोक्ति शाब्द को इलेषसे न बाध कर उसका जथ किती मी प्रकार 
“संक्षेप मेँ अधिक अथं की उक्तिः कर लिया जाय तो वेप्ती कोडे आपत्ति नदीं उठती । वस्तुतः 
प्रस्त॒त के स्थान पर अप्रस्तुत के कथन को ही अप्रस्तुतप्ररसा का चमत्कारकेन्द्र मान कर इस 
अलंकार को अन्य अलंकारो से भिन्न किया जा सकता हे । पण्डितराज ने प्रदन तो मामिक उठाया 
किन्त समासोक्ति फो केवल विदेषणदलेष से जकड़कर वे समाधान ठीक नदीं दे पाए पण्डितराज 
की शस पलायनदृन्ति प्र विदवेश्वर चुप रह गण यह आश्वय का विषय है । उन्दने उक्त अन्य 
सव विष्यो पर विचार किया किन्तु पण्डितराज द्वारा “आपेदिरे प्रय पर अपनाए नए पथकी 
ओर देखा तक नदीं । 
विचाचक्रवत्तीं ने अप्रस्तुतप्रशंसा का सारसंक्षेप इस प्रकार किया है-- 
अप्रस्तुतप्रशंसा त॒ प्रस्त॒तावगमोऽन्यतः । 
सा सामान्यविश्चेषादिविच्छित्या पच्वधा मता॥ 
मवेत्‌ साधरम्यवेधम्य॑योगतः सा पुनरद्विा। 
संमवेऽसंभवे देये वाच्यस्याथ पुनख्िधा॥ 
प्रस्त॒तस्यावगम्यत्वात्‌ पयायोक्ताद्‌ विभिचते । 
दयमथान्तरन्यासाद्‌ दृष्टान्तालड्कृतेरपि ॥ 
--अप्रस्त॒तप्रशंसा वह है जिसमें प्रस्त॒त का ज्ञान अन्य [ अप्रस्तुत] से दो। वह सामान्य 
विदेष आदि प्रकारो ते पांच प्रकार की मानी गहं हे। 
-वह साधम्यं तथा वैषम्य के द्वारा पुनः दो प्रकार की होती हे। इसी प्रकार वाच्य क 
संमव, असमव तथा दोन प्रकार कै हने से वही तीन प्रकारकी भी दो जाती हे। 


अथौन्तरन्यासाखङ्कारः ३९९. 


-- यहाँ प्रस्तुत अथं प्रतीयमान होता है इस कारण यह पयायोक्त से भिन्न सिद्ध होती है 
ओर इसी कारण अधाँन्तरन्यास तथा दृष्टान्त से मी । 


# 
| स्वस्व | 
उक्तन्यायेन प्राप्ता सलरमथौन्तरन्यासमाद- 


[ घ ३६ ] सामान्यविशेषकायेकारणमभवाभ्यां निर्दिषप्रङृत- 
समथेनमथान्तरन्यासः । 


निदिठस्याभिहितस्य ' समथेनादेस्य प्रकृतस्य समथकात्‌ पूवं पश्चाद्ा 
निदिष्टम्य यत्‌ समथंनमुपपादनम्‌ , न त्वपुषेत्वेन प्रतीतिरनुमानरूपा सोऽ 
थोन्तरन्यासः । तत्र सामान्यं बिदेषस्य विरोषो वा सामान्यस्य समथेक 
इति द्वौ मेदौ । तथा कार्य कारणस्य कारणं वा कार्यस्य समथेकमित्यपि 
दधो मेदौ । तत्र मेदचतुष्टये प्रत्येकं साधम्यवेधम्याभ्यां मेददयेऽष्टौ मेदाः । 
हिकश्ब्दाभिघानानभिधानाभ्यां समथेकपूर्वोपन्यासोत्तरोपन्यासाम्यां च 
मेदान्तरसंभवेऽपि न तद्गणना सहदयह्टदयहारिणी, वैचिञ्यस्याभावात्‌ । 
तस्माद्‌ मेदा्टकमेवेदो इङ्कतम्‌ । 


उक्त हेतु [ सामान्य विशेष तथा कायकारण दोनों के वाच्य होने ] से [ अर्थान्तरन्यास निष्पन्न 
होता है अतः अप्रस्तुतप्रशंसा के पश्चात उक्तका ] अवसर प्राप्त है फलतः अव अर्थान्तरन्यास का 
विचार करते है- 


[ सु° ३६ | किसी निदिष्ट [ शस्दतः कथित ] प्रज्ृत अथं का समन सामान्यविशेष 

भाव या कायंकारणमाव सम्बन्धके द्वाराहो तो [ जलंकार का नाम ] अथान्तर- 
न्यास [ होगा | ॥ 

[ वृत्ति । निर्दिष्ट अथात्‌ अभिधादृत्ति के दारा कथित । समर्थन की अपेक्षा रखने वाले प्रकृत 
[ वणेनीय | अथं का समथैन करने वाले अथं के पहले या उसके पश्चात्‌ ज्ञब्दतः नि्देरा करके जो 
समथैन अथात्‌ उपपादन किया जाता है वह अर्थान्तरन्यास कहलाता है, विना निदे के परे से 
अज्ञात प्रस्तुत का समथेन अर्थान्तरन्यास नदीं कहला सकता क्योकि इस प्रकार का श्ञान अनुमान 
का विषय बनता है क्योकि वहां सामान्य से विशेष या विशेष से सामान्य का अनुमान आ पहुंचता 
है, इसी प्रकार कायैसेकारणकामभी। इनकेदो भेद होते है- एक वह जिसमे सामान्य विशेष 
का समर्थक बनता है ओर दूसरा वह जिसमें विशेष सामान्य का । इसी प्रकार जहां कायं से कारण 
कातथा कारणमसे कायका समथन होताहै, इसकेवे भीदो भेद होतेह । इन चारो 
भेदो मंसे प्रत्येकं भेद साधरम्येमूलक तथा वेधम्यंमूल्क होकर दो प्रकार के होते हे। 
फलतः इसके आठ भेद हो जते है । [उद्भट के अनुसार] इसकेभोर मी भेद 
संमवदहैः। जेसे कहीं इसका 'हि'-्योकि [आदि] शब्दो के द्वारा अभिधान 
रहता है ओर कीं नहीं । कहीं इसमे समर्थनीय अथं का समर्थक अथ॑ के पहले निर्देश रहता है 
ओर कदीं बादमे, किन्तुये भेद सह्यो के चिन्त आक्रष्ट नहीं कर पाते क्योकि इनमें कोर 
वमत्कार नहीं रहना, इस कारण यहां आष ही मेदां का उर्लेख किया गया है । 


&०० अल्ङ्कारसवंस्वम्‌ 
विमरिनी 


उनक्तन्यायेनेति अप्रस्ठत प्रशंसाभेद्‌ानामेच उाच्यस्वकथनांघ्‌ ) अआदेति सामान्येव्यादिना ¦ 
समर्थनाहस्थेति, साकाङ्चष्वादु पपाद्‌ नायेस्वात्‌ । उपपाद नमिति,एवमेवेतदिति नेराकाङ- 
थोष्पादनरुच्णस्न्‌ । 

'उश्छन्यायेन' = उक्त देत से अधात्‌ [ अप्रस्तुतग्रश्यसाप्रकरण के अन्त मे] “अप्रस्तुतप्रह्णंसा के 
रूप स परिणत होने वाटे वाक्याथ ही अथान्तरन्यास रूप मे परिणत होते वतलाए गए हैं यदि उने 
दोनो ही अथे वाच्यदाजार्टः इस दहेतु से। “आह = विचार करते दै--सामान्य इत्यादि सूत्र 
वाक्य से आरम्भ कर च्चिगए अन्थ द्वारा । खमर्थनाह--साकांक्ष होने के कारण उपपादनकौी 
अयपेश्चा करने के कारण । उपपादनन्र तादी हे यहः इस प्रकार की निराकाह् प्रतीति को 
जो उत्पन्न करना तत्स्वरूप । 

[ स्वेस्व | 
क्रमेण यथा- 
“अनन्तरत्नध्रभवस्य यस्य हिमं न सोभाग्यविलोपि जातम्‌ । 
पको हि दोषो गुणसनिपाते निमज्जतीन्दोः किरणेष्विवाङ्कः ॥' 
“लोकोत्तरं चरितमपेयति प्रति 
पुसां कुट नहि निमित्तश्रुदत्ततायाः । 
वातापितापनसुनैः कटदात्पसखति- 
छीलायतं पुनरभुद्रसमुद्र पानम्‌ । 
सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्‌ । 
चणते हि विम्बुश्यकारिणं शुणद्डन्धाः स्वयमेव संपद्‌: ॥° 
अज्र सहसाविध्ानाभावस्य विश्य कारित्वरूपस्य च कारणस्य सं पद्वरणं 
कार्यं साधर्म्येण समर्थकम्‌ । तस्यैवेतत्का्यविरुद्मापत्पदत्वम्‌ सहसावि. 
धानाभावविरुदाविवेकका्यं वैशरम्यंण समथंकम्‌ । | 
"वुथ्वि स्थिरा भव भुजंगम घारथैनां 
त्वं कूम गाज तदिद्‌ द्वितयं दधीथाः । 
दिकङ्कञ्जसः कुत तत्तितये दिधीषा 
देवः करेति दस्कान्रुंकमाततञ्यम्‌ ॥' 
अन्न दरकार्मुकाततज्यीकस्णं पृथ्वीस्थैयौदिधरवतेकत्वे कारणं समथे- 
कत्वेनोक्तम्‌ । | 
क्रम से उदाद्रण यथा- 
“जो [ हिमालय ] अनन्त रत्नो को उत्पन्न करता रहता 8, इसलिए एक अकेला हिम उसके 
महत्त्व का नाश्चक नदीं बन सका । ठेसा इसलिए कि जौँ युणों का जमघट रहता हे वहां एक 
आध दोष इव जाया करता ३, जैसे चन्द्रमा की किरणो मे कलङ्क [ कुमार० १] [ यदौ उत्तराधं 


की गुण ओर दोष रूपी सामान्य पदार्थ की उक्ति से पर्वाधं की रत्न तथा दिमरूपी विशेष पदार्थ 
कौ चक्तिका समर्थन दहै] 


अथोन्तरन्यासाठ्ङ्गरः ४०९ 


“प्रतिष्ठा दिलाता हे लोकोत्तर चरित, कुल व्यत्तियो की उदात्तता का कारण नहीं बनता । 
वातापी राक्षस को नष्ट करने वाले सुनि अगस्त्य वी उत्परन्तिषडेसे हई थी, किन्तु महत्व 
मिला निःसीम ससमुद्र के पान का) | 

[ यहाँ पू्वाधे मेँ कथित व्यक्ति सामान्य तथा चरितसामान्य का उन्तराधं म कथित अगस्त्यरूपौ 

व्यक्तिविरोष तथा ससुद्रपानरूपी चरितविदोष के द्वारा समर्थन किया गया है ]। 

- कोड कायं एकाएक न करे, अविवेक मारी विपत्ति का आस्पद होता है। विचारपूवंक कायं 
करने वाले व्यक्ति को गुणों पर लुब्ध संपत्तियां स्वयं हयी वरण कर लेती है। | किराताजनीय-२ ] 

यहां सप्ता कायं न करना तया विचार कर कायं करना ये दो कारण है, इनका समथेन 
हो रहा हे संपत्तिओं द्वारा वरण करने रूपी कार्यं से । यह समर्थन साधरम्य॑मूरक है । [ इसी अकार ] 
उसी [ कारण | का समथैन इस [ संपद्रणरूप ] कार्यं से विरुद्ध विपत्ति का आस्पद होने से भी 
हो रहाहे,जो एकाएक काय न करने कै विरुद्ध विना विचारे कायं करने का कायं है । विन्तु यह 
समथन वेधम्यंमूलक इ । £ 

थ्व! स्थिर हो जा, नागराज ! तुम इते सम्हाले रहो, बृर्मराज ! तुम इन दोनों को 
सम्हारे रहो, ओर दिग्गजो तुम रोग इन तीनों को धारण किए रहने में ्गे रदो [ क्योकि ] 
देव | राम ] हिव धनुष पर प्रत्यंचं चदाने जा रहे हे । | 

- यहो एथ्वी आदि से स्थिर होने आदि की वात कहने में कारण है शिवधनुष पर अत्यंचा 

का चट्ाया जाना । यह्‌ यहां समथ॑क रूप से कदा गया है । 
विमरिनी 

कायंकारणभावाश्रयस्य सेद्द्वयस्य कःभ्यलिङ्गध्व ग्रन्थक्रदेव वचयतीति सामान्य. 
विशेषभावाश्रयमेव मेदृद्वयमाश्रयणीयम्‌ । विरेवेणापि खामान्यसमर्थने यत्र सामान्यवाक्य - 
स्योप्पादनापेखत्वं तत्रायमेवाटंकारः । नहि विशेषाप्मकागस्त्यवृत्तान्तोपादानं विना पुंसां 
कुर्वे रण्येन चरितमान्नमेव प्रतिष्ठानिसित्तमिति सामान्यात्मा प्रकृतोऽध॑ः विद्धयेत्‌ । 
यन्न पुनः स्वतःसिद्धस्येव प्रतीतिविश्दीकरणा्ं तदेकदेशभूतो विष उपादीयते तन्नोदा- 
दरणारकारः । गुणसंनिपाते दोषनिमनजनात्मनः सामान्यस्य नेराकाङ्कयेण सिद्धस्येन्दोः 
किरणेष्विवाङ्क इति तदेकदेश्चभूतो विशेषस्तत्र प्रतीतिविखदीकरणाथंसुपात्तः । अतश्च 
"वि शोषश्यान्येन समथंनमर्थान्तरन्यासः इत्यन्न विकेषेगापि सामान्यस्य सम्थ॑नमिति सूत्र 
णीयम्‌ । अन्यथा द्यभ्या्षिः स्यात्‌ । तस्यैवेति सहसाविधानाभावश्य । एतत्कार्यविरुढ- 
मिति संपद्रगकायंविङ्द्रम्‌ । 

का्यकारणभावमूलक जो दो मेद्‌ है वे कान्यल्िगि के भेद सिदध दोतते है यह स्वयं अन्धकार ही 
भागे वतलने वले दै, इसकिट यहाँ सामान्यविश्ेषमावमूलक दो मेदां को ही गिना जाना चाहिए । 
श्न दो भेदांमें मौ विदेष से सामान्य के समर्थन का जो मेद है उसमे भी जव सामान्या्थ-परति- 
पादक वाक्य समथन की अपेश्वा रखता है तव तो यदी [ अर्थान्तरन्यास ] अल्कार्‌ होता है, रेता 
नहीं हे कि अगस्त्यवृत्तान्तरूपी विशेष अथं के उपादान के विना, क्रुरनिर पेक्ष चरितमात्र ही व्यक्तियों 
को प्रतिष्ठा का निमित्त होता हे" यद सामान्य अर्थं सिड हो जाए । किन्तु जह्य वह [ सामान्य 
अथं ] स्वतःसिद्ध रहता हे ओौर उसके एक अंशविशेष का उपादान केवल इसलिए किया जाता 
हे कि उस सामान्य सथं की प्रतीति ओर स्पष्ट हो जाए वहाँ अलुकार उदाहरण होता है। यणो के 
समुदाय मे दोषके इूवने रूपी सामान्य अथं की प्रतीति अन्य किसी [ समर्थक ] अथं की अपेक्षा 
व विना अपने जाप मी सिद्ध दो जाती है श्सल्थ चन्द्रमा की किरणों मे कलंकः यद्‌ जो उसी का 


द अ० सण 


७०२ | अलङ्कारसवंस्वम्‌ 


विदधोषरूप एक अंडा है इसका उपादान उस [ सामान्य ] अथं की प्रतीति में स्पष्टता लने मात्र क 
किण है। [इस कारण "अनन्तरत्न ० पय मेँ उदाहरणालंकार ही मान्य है ] इसीकिए [ अल्कार- 
रत्नाकरकार को चाहिर कि वे] ्विदोष का सामान्य के हारा समन अथाँन्तरन्यासः- इस 
सूत्र मे विशेष के दारा भी सामान्य का समर्थनः इतना अंडा ओर जोड़ । न्दी ता उनका स्त 
अर्थान्तरन्यास के एक [ विशेष से विरेषणसापेक्ष सामान्य के समेन से निष्पन्न | न्दम लागू 
नदींहो पाएगा । 
तश्यैव = उसी का = एकाएक कायं न करने का । एतत्कायंवरिरुद्धमर्‌ स्स कायं क विरुद्ध = 

संपत्ति दारा वरण किए जानेरूपी कायं के विरुद्ध । 


[ सवंस्व | 


वैधर्म्येण क्ामान्यविल्तेषभावो यथा-- 
अदो हि भे बह्धपराद्धमायुषा यद्त्रियं वाच्यमिदं मयेददम्‌ । 
त एव धन्याः खुद्दा पराभवं जगत्यदष्टवेव हि ये श्य गताः ॥' 
| .: : ` अन्नायु कर्ठकापराद्धत्वाक्चिक्तस्याघन्यत्वस्यायुर्विंरद्धश्षयगति प्रयुक्तं धन्यत्वं 
| विरुद्धं सामान्यरूपतया खमथेकत्वेनोक्तम्‌ । कायंकारणतार्या  चचम्यः 
| णोदाहतम्‌ । दिशब्दाभिहितत्वानभिदहितत्वादिमेदाः स्वयमेव बादधव्याः, 
` चाख्त्वातिरायाभावालेह प्रद्िताः। 
वेधर्म्यमूलक सामान्यविरेषमाव का उदाहरण यथा- 
'ओदहदोहो! मेरी इस आयु ने बहुत वड़ा अपराध कियाकि सञ्च एेसी अग्रिय बात कनौ 
पड़ रदी ३ ।चेद्दी जन धन्यै जो संसार में भित्र का परामव देखे विना दी चरु वसते दै ।' 
यौ “जायु के दारा अपराध किए जाने की वात से आक्षिप्त अधन्यता' के प्रति श्सके विरुद्ध 
"आयु की उर्टे, चल बसने रूपी कार्य से जनित जो सामान्यरूप धन्यता" है उसे समथेकरूप से 
कहा गया है । 
काये कारणभाव मँ जो वरधम्य॑मूलकता होती ह उसका उदाहरण [ सदसा विदधीत० ] द्वारा 
देही दिया है। इसके अतिरिक्त "हि = क्योँकिः शब्द के दारा अथान्तरन्यास के अभिधा द्वारा 
कथित होने ओर कथित न होने ते जो मेद होते हैँ उनका अनुसंधान स्वयं ही कर केना चादिए। 
उनमें कोदं विशिष्ट चमत्कार नदी रहता अतः उन्हें यहाँ नदीं दिखलाया गया । 


विमरिनी 


विरुद्धं सामान्य ङूपतयेस्यनेन वैधर्म्येण विशेषः , सामान्येन समर्थित दव्युक्तम्‌ । 
सामान्यं तु विशेषेण समभ्यते यथा- 
(गुणानामेव दौराष्म्याद्धुरि धुर्यो नियुऽ्यते। 
असंजातकिणस्कन्धः सुखं स्वपिति गौगंडी ५ 
अत्रापि म््य॑समर्धक मावसमर्धनादुदाहरणत्वं वाच्यम्‌ । उदाहतभिति सहसा विद्‌. 
धीत--' इध्यादिना \ 
(बिहद्धु सामान्यरूपतया! इत्यादि दारा यह बतलाया कि यहो वेधम्य के दवारा सामान्य 
से 1 का समर्थन हृभा । जहौ तक विशेष से सामान्य के समर्थन का संवन्ध है उसका उदादरण 
यह्‌ है- 


अथान्तरन्यासाखङ्गारः | ७०३ 


यह रा्णोकौ हौ दुर।त्मताहकिघुयं [ वोज्ञा ढोने मेँ अभिक सक्षम वैल ] बोञ्च ढोने के किर 
जोता जाता है। गल्यार वैल के लेमे वद्धा तक नदीं पड़ता ओर मजे मे सोता रहता है । 


समध्यप्तमथकभाव इसमें मी है श्ङ्िए इते मी [ अर्थान्तरन्यास का उदाहरण कडा जा सकता 
द [ जलकाररत्नाकरकार के अनु्ार आयं उदादरणालकार नहं ] । उ दृाहतम्‌ = 'सहसा विद- 
धीतः-- पद्य दारा । 
दिसशं--अथा-तरन्यास् का पूर्तिदातस्त- 
भामह, वामन तथा उद्भट मं अधान्तरन्यास के सामान्यत्रिेषभाव कौ चर्चां नहीं मिङती। 
इसरो चचां रुद्रट से आरम्भ होती है । मम्मट उप्तका अनैतरण करते है किन्तु कार्यकारणभाव 
को योजना प्रथम ओर अन्तिम वार केवल स्स्वकार करते हैँ । रत्नाकर, विमर्शिनी, ऊुवल्या- 
नन्द तथा रसगगाधर में उप्तको मान्यत। नहं मिरी है। भामह ने 'हि-राब्द के उपादान तै 
भने वाली स्पष्टता को अर्थान्तरन्यास मेँ प्रकट श्रिया था । उद्भट ने उसके अगे समर्यं वस्तु कै 
समथक वस्तु के पहले तथा पश्चात्‌ उपादान की मी चर्चा की। रुद्र ने पहिली वार साधम्यं तथा 
वेधम्यं की भी चर्चां की। इसके पदे के आचार्यं इ विषय मेँ सौ चुप ये । इस प्रकार अर्थान्तर- 
न्यास का जो सव्ंमत स्वरूप मान्य है उते स्थिर करने काश्रेयरुद्रट को है। पू्वांचार्यो के अर्थ 
न्तरन्यास विवेचन इस प्रकार है- 
मामह- । 
'उपन्यसनमन्यस्य यदथस्योदितादते । 
लेयः सोऽथान्तरन्या्तः पूर्वाथानुगतो यथा ॥ 
परानीकानि सीमानि विविक्षोनं च ते व्यथा । 
साधु वासाधु वागामि पंसामात्मेव रसति ॥ 
हिखब्देनापि देत्वथप्रथनादुक्तसिद्धये । 
अयमथान्तरन्यासः सुतरां व्यज्यते यथा॥ 
वहन्ति गिरयो मैघानभ्युपेतान्‌ यगुूनपि । 
गरोयानेव हि गुरून्‌ बिभत्ति प्रणयागतान्‌ ॥ २।७१-४ ॥ 
जव कोद एक बात कदी जाय ओर फिर उसप्े भिलती-जुलती दूससी बात तो उसी का 
नाम अथान्तरन्यास हो जाता है । [ अर्थान्तर = अन्य भं का न्यास उपस्थिति ]। यथा-- 
--राद्ुकी भयंकर सेनाम आप प्रवेश करना चाह रहे भौर आपको तनिक भी व्यथा 
नदीं हो रदी । होने वाले भले या बुरे की सूचना व्यक्ति को उसको भात्मादही दे देती है। 
हेत्वथं का स्पष्टीकरण करने के किए जव हि = क्योकि राब्द का प्रयोग रहता है तब यह 
अधान्तरन्यासर अधिक स्पष्ट हो जाता है। जेसे- 
-- पवेत अपने पाक आएवडे सेवडे मधोँको भी अपना लेतेदैँ। इच्छा लेकर आण 
बड़ं को वड़े लोग ही वहन करते हैं ॥ 
वासन = [ सु° ] उक्तसिद्धये वस्तुनोऽथौन्तरस्येव न्यसतनमथान्तरन्यासः ॥--कथित वाक्याथ 
की सिद्धि के किट अन्य वाज्याथे की उपस्थिति अर्थान्तरन्यास । यथा-- 
प्रियेण संप्रभ्य विपक्षस्न्निषावुपादितां वक्षसि पीवरस्तने । 
सरजं न काचित्‌ विजहौ जरा पिलां वसन्ति हि प्रेम्णि गुणा न वस्तुषु ॥ 
--भ्रियने स्वयं गुधकर सौतों के सामने परीवरस्तन वक्ष पर पहनाईै मालाको किसी 
खन्दरीने त्यागा नदीं य॒यपि वह माला पानीसे भीगी हृदं थी। वात यह है कि महत्व प्रेमका 
होता है वस्तु का नहीं 


७०७ अलङ्ारखवस्वम्‌ 


स्पष्ट हयी वामन अर्थान्तरन्यास के आर्थं मेद से राब्द भेद के अन्तर पर भामद्‌ के समान 
ध्यान नदीं देते । इतना अवश्य है किवे समर्थक अथं का वाक्या्थरूप दोना आवक्यक मानते 
३ । पदार्थरूप होने पर वे अर्थान्तरन्यास की निष्पत्ति स्वीकार नदीं करते। स्पष्टही व।मन का 
लक्षण भामह कै लक्षण की छाया हे । 
उद्धट = (समथकस्य पुवं यद्‌ वचोऽन्यस्य च पृष्ठतः । 
विपयंयेण वा यत्‌ स्याद्धिरब्दोक्त्या<न्यथापि वा ॥ 
ज्ञेयः सोऽ्थान्तरन्यासः प्रक्रताथैसमथेनात्‌ । 
अप्रस्तुतप्ररा साया दृष्टान्ताच्च पृथक्‌ रिथितिः ॥ २।४५ ॥ 
-समर्थकका कथन पहले हो मौर समर्थनीय वाद में, अथवा इससे उल्टा दो, भौर यह 


“हि = वरयोकि, ब्द के साथ दहो अथवा उससे रदित तो श्से अथान्तरन्यास समञ्चना चाहिए । 
इसमे प्रक्रत अर्थं का समर्थन रदतादहै। इसलिए यदह अप्रपतुतप्ररंसा मोर दृष्टान्तसे भिन्नो 


जाताहे। 


उद्धट के अनुसार अ्ान्तरन्यास्त के चार भेद हुए । उन्कं नाम इस प्रकाररखेजा सकते 
ह ( १९) देत॒वाचकपदोक्तिपूर्वकसमर्थकपूर्वापन्यास्तात्मक अथान्तरन्यास् \ (२) हेतुवाचकपदोक्ति- 
रदहितसमर्थकपूर्वोपन्यासात्मक अर्थान्तरन्यास । (३) देतुवाचकपदोक्तिपूवंकसमथनीयपुवा- 
पन्यासात्मक अर्थान्तरन्यास तथा (४) हेतुवाचकपदोक्तिरहितसमथनीयपूर्वापन्यासात्मक 
अर्थान्तरन्यास । 'समथकपश्चादपन्यासात्मक~-इत्यादि योजना कै दवारा मीये चारो नाम 


बनाए जा सक्तेें। श्न चारों के उदाहरण उद्धटने दिए ह विन्तु वे रवतः सोचे जा 


सकते हें । 
भामह ने जिसे पपवार्थानुगत्तिः कदा था नौर वामन ने “उक्तसाधनः; उसी सम्बन्धतत्तव 
को उद्धट ने पहली वार 'समर्थनः-रोब्द से कहा !~आगे यही दाब्द अपना लिया गया । 
सद्र ट-“धमिणमथविद्ेपं सामान्यं वाभिषाय तत्सिद्ध्ये । 
य॒त्र सधमिकमितरं न्यस्येत्‌ सोऽथान्तरन्यासः ॥ 
पुदंवदमिधायेकं विशेषप्तामान्ययोद्ितीयं त॒ । 
तत्सिद्धयेऽमिदभ्याद्‌ विपरीतं यत्र सोऽन्योन्यम्‌ ॥ 


साधर्थ॑मूलक- जदा विदेष या सामान्यसूप किसी धर्मी को कहकर उसकी सिद्धि कै 
ठ्एिषसी से मिलते-जुलते किसी अन्य धमी को उपस्थित किया जाय वह अधान्तरन्यास 
केहराता है । 

वैधग्यंमूटक-दसी प्रकार विशेष या सामान्य मंसे कसी एक को कहकर उसकी सिद्धि 
के किए उनके विपरीत विसी भन्य वस्तु का कथन दूसरा अथान्तरन्यात्त होता है । 

विद्वेष के सामान्य द्वारा साधर््॑मूलक समथैन का उदाहरण इनके अनुस्तार यह है-- 

त॒ङ्गानामपि मेधाः देकानास्ुपरि विदधते छायाम्‌ । 
उपकर्तं दि समां भवन्ति महतां महीयांसः ॥ 

- मेव उंचे-ञचे पर्वतो परभी छाया करदेतेहैः। ठीके वड़ो का उपकार वड़े ही कर 
पातिहै। रद्र का यह उदाहरण सर्वव ओर कान्यप्रकाश के उदाहरणा सेस भेद कलि 
च्छा है| 

रुद्रट ने अन्य तीनों के भेदोके उदादरणमभी श्च्छेदिए हँ । इन चारो मेँ हि तथाद्िः 

आदि हेतुवाचक पदों का पयोग है, अतः मार्थं अर्थान्तरन्यास का उदाद्रण उनमें नदीं हे । 


अथान्तरन्यासालङ्कारः ७०५ 


रुद्रट के लक्षण मं धर्मो" शब्द का प्रयोग विरोषतः विचायं है। इसश्रा अथं नामिसताधु ने उपमेय 
किया हे । विदोष ओर सामान्य समान युरो से युक्त होते इ भी उपमानोपमेयभाव से युक्त नीं 
दोते। उपमानोपमेय वे वनते हँ जो परस्पर मे भित्र मी होते है ओर समान मी, इसीलिए अनन्वय 
को उपमासिन्न माना जाता हे । सामान्य ओर विदेष समान तो है, भिन्न नदीं होते । वस्ततः वामन 
ने वस्तु शब्द का प्रयोग जिस अथं में कियाथा रुद्रटः उसी अर्थं से धमीं राब्द का प्रयोग कर 
रहे हँ । साध्यसाधक्भाव यदि पदाथैगत हृञा तो उसे अर्थान्तरन्यास मानना संमव न होगा । 
वामन ने इसका उदाहरण देकर निराकरण भी किया है-षस्तग्रहणात्‌ पदार्थस्य हेतोन्य॑सनं 
नाधान्तरन्यासः,) यथा इह नातिदूरगोचरमस्ति सरः कमर सौगन्ध्यात्‌-इति -यदि हेत पदार्थरूप 
हआ तो वहां अथान्तरन्यसि न होगा यथा--्यहां से ताल अपिक दूर नदीं दिखाई देता है, कमल 
सुगन्ध से- यहां । 


मम्मट-' सामान्य वा विशेषो वा तदन्येन समथ्यंते । 
यत्त॒ सोऽधान्तरन्यासः साधर्म्येणेतरेण वा ॥? 
[ बृत्ति ] साधम्यं वेधरम्य॑ण वा सामान्यं विषेण यत 
समथ्यंते विषो वा सामान्येन सोऽर्थान्तरन्यासः 
- साधम्य या वेधम्यं के दारा सामान्य अथं से विरेष का समर्थन कियाजाय या विशेष 
अथं छे सामान्य अथंका तो वह्‌ अर्थान्तरन्यास होता है। 
सामान्य से विशेष के साधम्येमूलक समर्थन का उदाहरण मम्मट ने यह दिया है- 
“नि जदोषाढतमनसामतिञुन्दरमेव भाति विपरीतम्‌ । 
परयति पित्तोपहतः रारिषुभ्रं शङडमपि पीतम्‌ ॥ 


-स्वयं सदोष व्यक्तिको सवधा अदोष वस्तु भौ भिपरीत दिखलाई देती है! पीलिया 
कारोगीचन्द्रपेशुभ्ररांखकोभी पीलाही देखता है, 

मम्मटने विरोष के सामन्य दारा साधर्ब॑मूलक समर्थन काजो उदाहरण दिया दहै वहं 
रुद्रट के ऊपर उद्धत उदाहरण दारा तथा सर्वस्वकार के (छोकोत्तरं चरितम्‌०› पच कते द्वारा गतां 
हे। वेधम्यं का एक उदाहरण मम्मट ने ध्युणानामेव०ः यह्‌ प्य दिया हे जिसे विमिनीकार 
ने उद्धृत किया है ओर दूसरा "अहो हि”? यद प नो स्वयं मूल मे ही उद्धृत है । 

अर्थान्तरन्याष ओर काभ्यङ्गिः-- 

उपयुक्त विवरण से स्पष्ट है कि स्व॑स्वकार के पदे तक अर्थान्तरन्यास मे का्ंकारणमाव का 
समवे नदीं हज धा। परवती आलंकारिकं ने शसा खण्डन किया। योभ।कर ने इते 
हेत्वल्कार का विषय माना । हेत्वलंकार शब्द शोमाकर ने काञ्यल्गिालंकार के लिए अपनाया है 
मम्मटने भी हैत्वरखकार को कान्यछिग से अभिन्न बत्य धा । इतत प्रकार विमद्धिनीक्ारने जो 
कायकारणमावमूलक भेदं को काम्यलिङ्ग पँ अन्तभूंत बतल।य। उसङा मू रत्नाकर ही है। 
रत्नाकरकार ने हेत्वलङ्कार के उदाहरण के रूप मेँ विण कवि की-- 


'वक्षःस्थली रक्षतु सा जगन्ति जगत्प्रसूतेगेरुडध्वजस्य ।' 


--जगत्‌ के पिता विष्णु भगवान्‌ कौ वद्नःस्थली जगत्‌ कौ रक्षा करे" यह उक्ति दी ३। 
इम जगद्‌ रक्षा फे छिए जगित कारण है। पिता अपने व्च परसंनानकी रक्षा करता है। 
यहा देठ॒॒पदधात्मक दै अतः यड निश्चित ही पद्ैकव्यलिक्गालङ्कार ह। स्व॑स्वकार द्वारा 


मथान्तरन्यास्‌ के कि उदन कावंञयरणमावूलक भेदो मँ जो हेतु है वे वाक्या थात्मक दै, इतक ¦ 


७० अलङ्ारसवेस्वम्‌ 


उनका पदार्थकाव्यल्िग या पदाध्टेतु मे भन्तमाव नहीं हो सकता । वाक्याथहेतुक काव्यलिङ्ग का 
उदाहरण मम्मट ने यद दियादै- . 
'वपुःप्रादुभांवादनुमितमिदं जन्मनि पुरा 
पुरारे ! न प्रायः चिदपि मवन्तं प्रणतवान्‌ । 


_ हे मगवान्‌ दंकर ! इस दारीर मे पुनर्जन्म से यह अनुमान है कि गतजन्ममें मेने 
आपको कमीभी प्रणम नहीं करनेका अपराध किया है। इस स्थलमें प्रणामन करना 
अपराध के प्रति देतदै। यहदेतु वाक्य के द्वारा प्रतिपादित दै, अतः यह वाक्याथ देठक 
कान्यल्गि हआ । अव यद सोचना है कि स्वस्वकार द्वारा दिए उदाहरणो की स्थिति इस 
` उद्धरण की स्थिति से भिन्न है अथवा अभिन्न । पृथ्वि स्थिरा भवः पयसेतो स्थिति स्वेधा 
अभिन्न है। (भगवान्‌ रामके द्वारा िवधनुषका चद्ाया जानाः वा्या्थं कारण है पृथिवी 
आदि को स्थिर आदि होने की दिदायत्त करने में) यदं अवदय ही कारण अर्थान्तर है भोर 
उसका उपस्थापन न्यास, अत्तः अर्थान्तरन्यासत्व यहो है, किन्तु सोचना यह है अलंकार मी 
वही है अथवा अन्य कोई । स्पष्ट ही चर्दौ चमत्कार हेतुकथन मे है यातो उससे दौ रही भगवान्‌ 
राम के ज्ञोर्यातिद्य की व्यंजनामेँ। इस कारण यहाँ अलंकारत्व हैतृक्तिमें है, देतुगत अर्थान्तर- 
त्व मे नदीं । दूसरी वात यद दहै किजिस प्रकार वपुःप्रादुमावात्‌० प्यते अपराध की सिद्धि 
विना नमनाभाव के नदीं होती उसी प्रकार शृथ्वि ! स्थिरा० प्ये मी पृथिवी आदि को आदेश 
देने या सावधान करने की वात ्िवधनुष के चढाए जनेरूपकारणके विनास्सिद नहीं होती । 
इस प्रकार इन दोनों पो के अथं अधिकांदामें समान हें । जहाँ तक "सहसा विदपीत०ः प्यका 
म्ररन है, इस पय मँ पूर्वां तथा उत्तराधेमे एकदही वात कही गद दहै कि “विना विचारे कामन 
करे" ओर इसकी पुष्टि अनुरूप ओर प्रतिरूप दो फलश्रुतियों द्वारा की गड है विना विचारे काम 
करने से सिर पर आफत आती है भौर विचारके काम करने से सम्पत्ति भिल्तीदै। इ 
भ्रकार यद्य सामान्यविदेषमाव नदीं है क्योकि दो विशेष दी विदशेष वक्तव्य यहाँदिए गएहे। 
कार्यकारणभाव अवदय है । सलिए, यहाँ वस्तुतः एक ही अथं का न्यास दै-भथांन्तर का नर्ही। 
इसी प्रकार चमत्कार भी हैत कथन मेँ है फलतः इसे भी कान्यकल्गि का स्थल मानना दही उचितदहै। 
इतना अवदय है फि रत्नाकरकार ने प्रजानां विनयाधानाद प्तपिता, प्रनाके पितादिलीपदही ये 
क्योकि वे उन्हे दिक्षा देते ये" इस स्थल्मेंहैतु का कथन स्पष्टहाने से ञपसर्मे चमत्कार का अम्‌।व 
माना ह भौर उत्ते कान्यलिगालंकार य। हेत्वलंकार मानना उचित नदीं मानादहै। ठीकणेसीदी 
स्थिति 'सहसाः पय की ६। भजन्तु यह नदीं कदाजा सकता कि यहां कोरं अलंकार नहींहै 
वयोकरि शस पचम चमत्वारक्रला का स्पष्ट ही अस्तित्व है) इस प्रकारः कायंकारणभावभूलक 
अर्थान्तरन्यास के स्थल काव्यल्गि या दहेतु के स्थलों से अभिन्यक्तिगत आंशिक भेद रखने परभी 
सौन्दर्यवोधगत मेद नहं रखते भतः भिन्न नहीं कदे जा सकते । सवेस्वकार को इन भेदा कै 
ममत्व ने श्सल्एि सताया हयोगा कि भामह ने देतुदैत॒मद्धाव' का असितत्वं अ्थान्तरन्याप्त में 
वतराया था । ओर स।मान्यविदेष के समध्यंसमधकभाव मेँ भी दैवेव॒मद्धाव रहता ही ई । 
वस्तुतः अर्थान्तरन्यास का प्राणतच्च समध्य॑समर्थको कौ मौलिक एकता है । वैवम्य॑मूलक अथान्तर मे 
मी अनुरूप अर्थान्तर का आक्षेप होने के प्रशवात्‌ दी समर््य॑स्मर्थकमाव चरितार्थंदोताहे। शुद्ध 
कार्यकारणभाव मँ यह ण्वता नदीं रहती । फल्तः एकतापन्न अर्थान्तर का न्यास ही अधान्तर- 
न्यास की स्वतन्त्र अलंकारताका बीजदहै। रएेतेतो अथान्तरका न्यास उपमामं भी उपमान 
रूप से रहतादहीहे। 


अथोन्तरन्यासालङ्कारः &०७ 


अर्थान्तरन्याख ओर उदाहरणलकारः- 

जिस प्रकार कायेकारणमावमूलक अथान्तरन्यास्र पर विवाद था उसी प्रकार ग्विश्ेषस्ते 
सामान्य के समथैन वले मेदमें भी विवाद दहै! रत्नाकरकारने शस भेदको भी अर्थान्तरन्यास ते 
हटा दिा है । उन्होने भ्थान्तरन्यास् का लक्षण केव इतना ही किया है- 

'विदेषस्यान्येन समर्थनमथान्तरन्यासःः । | 

--विदोष का अन्य [ सामान्य ] से समथंन अर्थान्तरन्यास होता है। विमर्दिनीकार ने 
श्सी का खण्डन करते हुए "विशेषके दवारा मी समन्य का समथनः सूत्रम संनिविष्ट करनेकी 
बात कही दहै। रत्नाकरकारने सामान्यद्वारा त्रिष के समथेनमें उदादरणारंकार मानाहै। 
उनका तकं यहदहै किस मेदकोमी अथान्तरन्यासका मेद मानने पर अर्थान्तरन्यास के 
लक्षण तै एकरूपता नहं आती । कारण यह्‌ दियादहैकिसामन्यके दारा विह्ेष के समथनमें 
व्याप्यव्यापकभाव का अनुभव होता है। विदेष व्याप्य रहता है ओर सामान्य व्यापक। यदि 
विद्टेष से सामान्य का समथ॑न माना जाय तो यह व्याप्यव्यापकमाव अनुभव में नहीं आता। 
इस प्रकार सामान्य दारा विशेष के समर्थन मे व्याप्यव्यापकभाव दर्दित रहेगा ओर विजेष दारा 
सामान्य के समभन मे हेतुहैतुमद्धावमात्र । कोई सामान्य सम्बन्ध नदीं बन पारगा । विमरदिनीकार 
ने इसका खण्डन करते हए कहा कि विशेष से सामान्यका समथेन दो स्थितियोंमें ह्ोताहै 
एक्‌ तो तव जब समथनीय सामान्य वाक्याथ समथंकरूप से प्रस्तुत विदोष वाक्याथे के समर्थन के 
विना प्रतिष्ठित नदीं हो पाता अतः उसकौ अपेक्षा रखता है, इस प्रकार जहाँ समर्थनीय अथेकी 
सिद्धि समथैन पर निभैर रहती है । दूसरी स्थिति वह होती है जिसमे समथ॑नीय अथं समथंन की 
अपेक्षा नहीं रखता, स्वतः ही सिदध हदो जातादहै। इनर्मे से सम्थनसापेक्ष सामान्य अर्थान्तर- ` 
न्यास के अन्तगैत आता है ओर समथननिरवेक्ष सामान्य उदाहरणालकार के अन्तर्गत । रेसा 
अन्तर कर विमरिनीकार ने लोकोत्तरं चरितम्‌" प्च को अर्थान्तरन्यास का उदाहरण माना था, 
किन्तु अनन्त रत्न ० प्च को उदाहरणालङ्कार का दी उदाहरण स्वीकार किया था। रत्नाकर. 
कार द्वारा उठाई आपत्ति का उन्दने कोई उत्तर नदीं दिया । वस्तुतः अर्थान्तरन्यास मेँ प्राणभूत 
तत्व सामान्य विशेष का परस्पर समभ्येसमथकमाव रहै, ग्याप्यन्यापकमाव नहीं । जहौ तक 
समभ्य॑समथकभाव का सम्बन्ध है यह विष द्वारा सामान्य के समर्थने मी रहता है। इसके 
अतिरिक्त व्याप्यव्यापकमाव मी नदीं रहता रेसी बात नदीं । सामान्यसे विशेष के समर्थनमें 
वह व्याप्याभिपुखी हे ओर विशेष से सामान्य के समर्थन मे व्यापकामिसुखी इतना ही अन्तर 
रहता हे । हाथी देखकर उसके पदचिह् का मी अनुमान कियाजा सकता दहै ओर पदचिह 
देखकर हाथी का भी । व्याप्यव्यापकभाव दोनो ही ओर बन जाता है। पण्डितराज जगन्नाथे 
विमरिनीकार द्वारा प्रस्तुत समथनसापेक्षदा ओर समर्थननिरपेक्षता के तकौ दारा अर्थान्तरन्याक्त 
ओर उदाहरणलंकार का भेद न मान अन्य प्रकार से माना है विमरिनीकार का इस्त विषय तें 
उल्लेखपूरंक खण्डन करते हुए उन्दने लिखा है--मम्भर द्वारा दिए गए 'निजदोषावृत० पय मे 
समथनीय वाक्याथ की सिद्धि समर्थन पर निर्भर नदीं है। वह स्वतः निष्पन्न हो जाती हे, 
दोपे भ्रमदहोताहै शस तथ्य में वार भी संदेह नदीं करता।' [ द्र° रसगंगाधर-निण॑यसागर्‌ ` 
सरकर ण१-& १० ६३९ । उक्त लकारो के भेदके विषयमे उन्होनेजो त्क दिरहै वेये है 
सामन्याथसमथक विशेष अथंदो प्रकार कादोताहै। एक वह्‌ जिसमे अपना स्वतन्त्र विधेय 
नहीं रदता ओर दूसरा वह जिम रहता है। इनसे प्रथमे उदराहरणारंकार होता है 
ओर द्वितीय मे अथाँन्तरन्यास । उदाहरण-- 

उपकारमैव ङुरुते विपद्गतः सज्जनो चितराम्‌ । 
मूच्छ। गतो मृतो वा निदरेनं पारदोऽत्र रसः ॥' 


७०८ | अल्ारसवंस्वम्‌ 


-- सत्पुरुष अत्यन्त विपदूय्स्त हो जाने पर मी एकमात्र उपकार ही करता है, इसमे दृष्टान्त 
हे मूच्छित हुआ अथवा मरा हआ पारा । 


अथान्तरन्यास-- 
(उपकारमेव कुरते विपद्गतः सञ्ननो नितराम्‌ । 
मृच्छौ गतो शतो वा रोगानपदरति पारदः सकलान्‌ ॥› 
सत्पुरुष अत्यन्त विपद््रस्त हो जाने पर मो उपकार ही करते दहै । मूच्छितियाम्रतहुभा 
पारासमीरोगोकोदूर करतादहै। 


स्पष्ट ही प्रथम पाथं मे विधेयभूत क्रिया एक ही है “उपकार करना जव कि द्वितीय पद्यां 
म उत्तरां कौ क्रिया स्वतन्त्र है ष्टूर करनाः । न्मे से प्रधम पाथमंजो दो वाक्याथ कदे दं 
उनमें से प्रथम अथं अवयवी है जौर दूसरा उक्ती का अवयव । शस प्रकार वहां भवयवावयविभाव 
का निरूपण है । उदाहरणारंकार का प्राण अवयवावयविभाव का निरूपण ही होता है । पण्डितराज 
ने इसका लक्षण इसी प्रकार का वनाया है-- 

“सामान्येन निरूपितस्यार्थस्य सुखप्रतिपत्तये तदेक्देदो निरूप्य तयोरवयवावयविभाव 

उच्यमान उदाहरणम्‌ । 

-सामान्यरूप से निरूपित वाक्यां कौ प्रतीति खखपूर्वक हो सके एतदथ उसी वाक्यार्थ 
के किंसीणएक अं का निरूपण कर उन दोनों का अवयवावयविभाव शाब्द से कहना उदाहरण 
नामक अलंकार कराता है । 

अर्थान्तरन्यास में सामान्य ओर विदेष भी परस्पर म अवयवावयविभाव से युक्त रहते हैं। 
उनमें सामान्य अवयवी होता है ओर विद्ेष अवयव । किन्तु इनका यह अवयवावयविभाव उाब्द 
से कहा नहीं जाता 1 उदाहरणालंकार मेँ इस भाव के वाचक राब्द होते है (हव, यथा, निदर्खन, 
इष्टान्त' आदि 1 उपरक्त पयय मँ निददोन शब्द प्रयुक्त है । अर्थान्तरन्यास वाके पद्य मे रेतसे किसी 

भी राब्द कास्पष्ट दौ अमाव है) इस प्रकार उदाहुरणालंकार मेँ चमत्कार का कारण अवयवावय- 
विभाव रहता है। इसी भाव को केकर यहु उपमाते भिन्न रहता है। उपमा मे उपमान तथा 
उपमेय के वीच अवयवावयविभाव की विवक्षा नहँ रहती । स प्रकार उदाहरणाल्कार पण्डितराज 
के अनुसार नियमतः राब्दध या वाच्य ही होता है। रत्नाकरफार ते इसे आर्थं भी माना है। 
पण्डितराज ने इसका उन्तर उदाहरणालंकार के प्रकरणम देते हुएर्खिाहे कि अवयवावयविभाव 
माथं होगा इसका अर्थं इतना ही है कि उसके वाचक दाव्द का प्रयोग न होकर उसके प्रतिपादक 
दाब्द का प्रयोग होगा । अथं यह किं जहाँ माथ होगा वहां भी उसका चब्दतः प्रतिपादन रहेगा 
ही साक्षात कथनमात्र नदीं रहेगा । ईस प्रकार यह आर्थी उपमा कं समान ही आका जा 
सकेगा । अ्थान्तरन्या(सालंकार के प्रसंगे भी रत्नाक्रर के इस पक्ष को पण्डितराजने उर्याहे। 
वहां उन्दने सका खण्डन तो नदीं किया किन्तु इसके उत्तर म समथ्यंसमथक वाक्या मँ विधेयगत 
उपयुक्त एकता का एके स्वतन्त्र तकं प्रस्तुत कर भर्थान्तरन्यास से उदाहरण कासेद स्पष्ट कर 
दिया । इस तकं मे अवयवायविभाव की सिद्धि ही प्रसुख दै । उसका तात्पयं यष्ट निक्राल्ना चाहिए 
कि जहां चमत्कार का कारण अवयवावयविभाव या उसके द्वारा किया गया समर्थन हो वहाँ 
उदाहुरणाल्कार होता है । अर्थान्तरन्यास मेँ चमत्कार का कारण सामान्यविरोषमाव या तत्कृत 
समथन रहता है श्सलिए इससे उदाहर णाल्कार भिन्न ठदरता है । 

इस प्रकार अवयवावयिमाव का वाच्य या वाच्येतर रूप से प्रतिपादन तथा उस्तका 
ही चमत्कारजनक होना उदाहूरणालंकार का प्रधान भेदक तत्व ठहरता है । 


अथान्तरन्यासालङ्ारः ७०९, 


पण्डितराज ने यह मी कहा है कि मम्मट ओदि प्राचीन आरंकारिक उदाहरणालकार को उपमा 
से अभिन्न मानते हें । उनके अनुसार जव उदाहरण नाम का कोड स्वतन्त्र अल्कार होता दही 
नहीं है तव "विशेष से सामान्य के समथैन' से निष्पन्न मेद्‌ को अन्तर के अतिरिक्त भन्य किंत्तमें 
अन्तभूत किया जा सकेगा अकुकारसवेस्वकार ने मी उदाहरण को स्वतन्त्र अल्कार नहींमाना 
है । अतः उन्होंने अनन्तरत्न०' प्य को अर्थान्तरन्यास का ही अंग मानादहै। 

श्स प्रकार जेते स्व॑स्वकार का यह मत अमान्य ठहरताहै कि अर्थान्तरन्यास मे कायै- 
कारणमावमृलक मेद भी होते ह उसी प्रकार अलकाररत्नाकरकार का यह मत भी अमान्य 
ही ग्दरतादहेचकि विरेष से सामान्य का समधैनः अर्थान्तरन्यास न होकर उदाहरणालंकार 
होता हे । फलतः अधान्तरन्यास्त के केवर एकया चार भेद मान्य न होकर केवल्दो भेदी 
मान्य ठरते हे । ओर इस प्रकार अथान्तरन्यास्त पर रुद्रट का सिद्धान्त हयी मान्य सिद्धान्त 
ठह्रता है । 

कायकारणमावमूलक भेदो की गणना मे दिचकिचाह्ट तो सवंस्वकारको भी थी क्योकि 
इन्दोने मेदो की गणना दो-दो करके षी है । एक साथ चार करके नहीं । 

विकस्वरालकार- 

जयदेव ने चन्द्राछोक मे समथ्यंसमर्थकमाव को लेकर एक नवीन कल्पना की दै, उन्होने 
एक रेसा समथक खोज निकला है जिसमें तीन अश्च रहते है-आरम्म मेँ८१) विशेषांश, मध्य 
मे (२) सामान्यांशः, अन्तर्मे पुनः (३) विशेषाश्च । इसका निरूपण उन्होने इस प्रकार 
किया है- 

“यस्मिन्‌ विदेषसामान्यविजञेषाः पत विकस्वरः । 
स न जिग्ये महान्तोदहि दु्धंषाः सागरा इव ॥ 

जिम पहले विशेष फिर॒ सामान्य तथा तत्पस्चात्‌ पुनः विशेष का उद्लेख हो वह 
विकस्वर नामक अल्कार माना जाना चाहिए । उदाहरण-'उते [ उप्त राजा को] जीता 
नदीं जा सका क्याकि जो महान्‌ होते है वे बडे दुर्धषं होते हैँ । जसे सागर । 

यहां व्यक्तिविशेष के अपरामव का महान्‌ व्वक्तियों की दुर्धषता से समथ॑न किया 
गया पुनः उसको पुष्टिके छि सागरशूपी विशेष पदाथं की उपमा प्रस्तुत कर दी गईं। 
्स प्रकार यहां विशेष का सामान्य से ओर सामान्य का पुनः विशेष से सम्धन किया 
गया । ठीक यदौ स्थिति भअनन्तररत्नप्रभव"० पद्य मे है । अप्पयदीश्चित ने स्पष्ट उदाहरण के 
रूपमे दश्सी पद्यको प्रस्तुत कियाहै। इस पमे हिमाचल के सोभागम्यलोप के अमाव का 
समन युणसन्निपातमें एक दोषके छ्िप ननेकी उक्तिके दारा ओर इस समर्थक वाक्याधंका 
सथन चन्द्रकिरणो मे छिपे कलंक के द्वारा क्षिया गया ६ै। पण्डितराज जनन्नाथ ओर उन्दी के 
अनुयाय विदवेश्वर पण्डित ने यहाँ अप्पयदीक्षित का खण्डन करते हु? छ्लिादहै कि यँ 
उदाहरणालंकार ओर अर्थान्तरन्यास अथव। अर्थान्तरन्यास के ही भेदौ की संसष्टि मान लेना 
अधिक उपयुक्त है । 

पाठान्तर :- 


'सदसा विदधौत० पच के तुरन्त बाद की जो पक्ति है उप्तका नि्यप्तागरोय रूप ही 
हमने स्वकायं माना है । त्रिवेन््रमसंस्कवरण मे उप्त "च, नक्ष ३। ङ” राघवन्‌ तथा डँ द्विवेदी 
ते अपने संस्करण) ते त्रिवेन््रम्‌ वाला पाठ ही मपनाया है । “सोचे भिना काम न करना? तथा "सोच. 
समन्ञ कर काम करना दो भिन्न तत्त्व दै) अभिन्न नहीं एक अभावात्मक है भोर दूसरा 


४१० अल्ङ्ारसवेस्वम्‌ 


भावात्मक । यह अवदयक नहीं किजो ग्यक्ति "विना विचारे कम नदीं करता वह्‌ विचार कर 
काम करेही। संभवदै कोद एेसा व्यक्ति हदो जो चाहतातो हो विना विचारे काम न करना, 
किन्तु सोच.विचारन कर पाता दो अतः निष्क्रिय वैठा रहता हो । इस प्रकार सदसा 
विधानामावः तथा विख्श्यकारित्वः को अभिन्न मानकर मूल पंक्ति से समुञ्चायक चको 
हटाना ठीक नदींदै। मूल की परवत्तीं पक्तिकी स्थित्तिसेमी यह तथ्य प्रमाणित दोतादहे। 
उसमे 'सदसाविधानाभावविरुद्धाविवेककायम्‌ः पद से अथै निकलता है कि अविवेक सदसा 
कायं करने का विरोधी तच्वदहै। अविवेक विरोधीदहे तो विवेक को अविरोधी या अनुकूल दही 
कडा जा सकता है। यदि विवेक सहस्ाविधानाभावसे अभिन्न होता तो अविवेक को उससे 
भिन्न का जाना विरुद्ध नदी । निर्णयसागर संस्करण मे श्न पंक्तियां मेँ कोड पाठान्तर मी नदीं 
है । द्यन का सिद्धांत मी यष नदीं है कि अमावाभाव नियमतः मावस्वरूपदहो दी । इसीलिए 
कान्यप्रकादयकार ने यः कौमारहरः० पमे विभावना ओर विद्ोषोक्ति को अस्पष्ट मानाहै 
वर्यो कि उन्म अपेक्षित कारणामाव तथा कार्याभाव अमावाभावसुखेन कथित हे स्वरूप से 
नहीं । उत्कण्ठा का कारण उद्यीपकगत नवत्व होता है। उसका अमाव यहं नवत्वाभावहूप से 
न कहा जाकर तत्पद द्वारा पराग्रष्ट प्राचीनत्वं रूप से कहा गया हे । श्सी प्रकार 
प्राचीनत्वक्रा कार्यं उत्वंठाका अमाव यहां उत्कंठारूप से कहा गयादहै जो अनुत्कडाभाव या 
उत्कण्ठाभावामाव के गभं से निष्पन्न होने वाला अर्थं हे। अमावामाव यदि सवांत्मना मावरूप 
होता तो अस्पष्टता का यह देव यहां न आता फलतः सहसाविधानाम।व ओर विमृश्य 
कारित्वं को भिन्न मानना ओौर तदनुसार पंक्ति म परिवत्तंन न करना ही टीक दै । 
संजीविनीकार विद्याचक्रवरत्ती ने अर्थान्तरन्यास का संग्रह कारिका में इस प्रकार कियादै- 


'समथ्यंत्वेन निदिष्टः प्रकृतो यत्‌ समर्थ्यते । 
सोऽयमथान्तरन्यासः सामान्यादिभिरष्टषा ॥ 


-समथनीय रूप से निर्दिष्ट प्रकृत अर्थं का जो समथन वह्‌ भधान्तरन्यास सामान्वादि प्रकारो 
से माठ प्रकारका दोतादहै। 


विमरिनी 
एतदुपक्षहरन्नन्यद्‌ वतारयति~- एवमित्यादिना । 
इस [ अर्थान्तरन्यास प्रकरण ] का उपसंहार करते भौर भन्य प्रकरण का भारम्भ करते 
हेए कदते है-- 
[ सस्व ] 
पवमप्रस्ततप्ररांलाचुषङ्गायातमर्थान्तरन्यास क्त्वा गम्यमानप्रस्तावागत 
पयायोक्तमुच्यते - 
[ ० ३७ ] गम्यस्यापि मङ्गयन्तरेगाभिधानं पयायोक्तम्‌ । 
यदेव गम्यते तस्येवारिघाने प्यीयोक्तस्‌ । गम्यस्य सतः कथमभि 
धाननिति चेत्‌, गम्यावेश्चयां परकारान्तरेणामिघानस्य भावाद्‌ ! नहि तस्येव 
तदैव तथेव विद्या गम्यत्वं वाच्यत्वं च संमवति, अतः कायीदिद्धारेणा- 
भिधानम्‌ , कार्यादेरपि तच्च परस्तुतत्येन वणेनाहेत्वात्‌ ¦ अत पवाप्रस्तुत- 


पयायोक्तालङ्ारः ७१९ 


प्रद्ंसातो मेदः । एतच्च वितव्याप्रस्तुतप्रदासाप्रस्तावे निर्णीतमिति तत पवा 
वधार्यम्‌ ¦ उदादर्ण्स्‌- 
'स्प्ास्ता नन्दन चाच्याः केरासंभोगलालिताः 
सावज्ञं पारिजातस्य मर्थो यस्य सेनिकैः 
अन्न हयग्रीवस्य कायेुखेन स्वगंविजयो वर्णिवः । प्रभावातिराय- 
प्रतिपादं च कार्णादिव कायीदपीति काय॑मपि दणंनीयसेवेति पयायो. 
कस्यायं विष्यः । 

दस प्रकार [ समासोक्ति लक्षण ते प्राप्त अर्थान्तर ओर उसी गम्यता, इन दो त्वो में से प्रथम 
अर्थान्तर का निरूपण ] अप्रस्तुतप्ररसा [मे किया ओर उक्ती ] से ल्गे-ल्गे अथा.तरन्यास् का. 
[ मी ] निरूपण किया, अव गम्यता के प्रसंग से प्राप्त पयांयोक्त का निरूपण करते हें -- 

[ सूत्र ३७ ] गम्य [ अर्थ] का भी प्रकारान्तरं से अभिधान पर्यायोक्तं [ नामक 

अरुकार कहराता हे | ॥ 

[ वृत्ति ] जिसकी प्रतीति व्यंजनासेहोरहीदहोउसीको यदि भिधासे मौ कदा जा रहा 
हो तो[ अलंकार ] पर्यायोक्त [ कदलाता है] जो अथं व्यंजना से प्रतीत हो रहा होगा उसका 
अमिधःन [ घमिधां से कथन ] संभव ही कैसे १[ जिस रूपसे व्यंग्य होगा उस ] से भिन्न रूप से 
सभिधान होनेमे। रेसा नदीं कि वही [ अर्थं] उसी समय उसी रूप मे व्यंग्य भौर वाच्य दोनों 
हो, अतः असिधान [जो होता है वह्‌ ] कायै आदि के द्वारा होता है क्योकि कायं भादि भी 
प्रस्तुत ही होते है अतः वर्णनयोग्य दोते दै इसीलिए [ इस अलंकार का ] अप्रस्तुतप्ररंसा से 
भेद हे । यह [ मेद ] विस्तार पूर्वक अप्रस्तुतप्रशंसाप्रकरणमे तय कर दिया है अतः इसे वीस 
जान ठेना चाहिए । 

उदाहरण- 


डाची के केशप्तमोग से लाङ्ति वे पारिजातममजरियों नन्दनवन मँ जिसके सैनिकों ने 
अवज्ञापूवेक दुई ।› 


1 


यर्दा काये के दारा हयग्रीव का स्वर्गजय बतलाया गया । प्रभावातिद्धाय का प्रतिपादन कारण 


के समान कायं से मी संभव होता है अतः कायं भी वणित किया जा सकता है, अतः यह स्थल 
पर्यायोक्त का विषय दै । 
विमरिनी 


तदेवाह ` गम्यस्यापीत्यादि । नज्ु कथमेकस्यंवेकस्मिन्‌ कारे गम्यर्वं वाच्यत्वं च संभवती 
स्याह -तिभ्यस्येवेत्यादि । प्रकारान्तरेणे कार्यादिह्वारेण । अत इति । एकस्य वंकसिमिन्‌ कारे गस्य- 
त्व वाच्यस्वासंभवात्‌ । कार्यादिद्रारेणेति, आदिक्ञब्दः प्रकारे 1 अभिधीयमानं हि काय तदवि. 
नाभावेिरवात्‌ स्वसिद्धये कारणमा्तिपतीति गम्यमपि तद्‌ वाच्यायमानभमिति यदेव गस्यते 
तस्यव भङ्गयन्तरेणाभिधाननघ्‌ । अतश्च 
स्वभ्यस्तदुनयजयस्तनयस्तदीयः चमासाररक्त जयवाहननामघेयः । 
दु वरवे रिवरवीरविखास्सिनीनां श्वप्नावज्ञेषसमकरोस्प्रियदकषैनं यः ॥ 
दुरयादावरकारप्रकारश््वं न वाच्यम्‌, बहूधाजयत्‌ इति हि च्ियमाभे गतोऽस्तमकों 
भातीन्दुः' इस्यादिवदेतद्‌कान्यमेव स्यात्‌ । नच दोवाभादमात्रमरंकारस्वभिति बहुलः 
प्रागुक्तम्‌ । यत्त॒ स्वप्नावज्ेपप्रिय दशेनात्सककायरूपेणायन स्वसिद्धयथ कारणरूपश्तद्वध 


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४१२ अल्कारसवंस्वम्‌ 


आक्षिप्यते तदितरप्रकारान्तरं प्रथग्वक्ुं न युक्तभिति निर्वीजेव पर्यायो ्छान्तरवाचोयुक्तिः। 
अत एवेति । इयोरपि कायकारणयोः प्रस्तुतत्वात्‌ । कार्यमुखेनेतति । पारिजातमन्नरीस्पर्ल- 
डारेणेव्यर्थः ! स्वगंविजय इति कारणरूपः। वणनीयमिति, प्रसतुतसेवेत्यर्थः। 

उसी को कहते हैँ “गम्यस्यापि - इत्यादि के दारा । टक ही वस्तु एक ही समयमे गम्य ओर 
वाच्य दोनों केसे हो सकती है"-इस रका पर समाधान देते हए कहते है गमभ्यस्यैव । प्रकारा. 
न्तरेण = दूसरे प्रकार, दूसरे रूप से" = कायं आदि रूप से । अतः = इसलि९ अर्थात्‌ एक ही का 
एक ही समय में गम्य जोर वाच्च दोनों होना संमव नदीं होता इसि । कार्यादि द्वारेण = 
इसमे आया भादि रब्द प्रकारवाचक है, अर्थात्‌ कायं आदिकेल्पते। कायंको अभिधासे 
कदा जाता हे तो वह॒ अपनी सिद्धिकेलिएकारणका आक्षेप कर लेता है क्योकि यह कारण से 
अलग नहीं रहता । इस प्रकार कारण गम्य होने पर मी [ वाच्यसिद्धिका कारण होने से] वाच्य 
जेसाहीदहो जाता दै। इस प्रकार नो अथ॑ व्यंजनासे प्रतीत होता है, दूसरे रूपमे अभिधाद्वारा 
कथन भी उसी का होता रहता दै। ओर इसी कारण [ अलंकाररत्नाकरकार ने जो-“सापेक्षत्वा- 
दुपादानेनान्यग्रतीतिः, भज्गयन्तरेण वाभिधानं पयायोक्तम्‌'-- सापेक्ष शोने के कारण उपादान लक्षणा 
द्वारा अन्य अ्थ॑की प्रतीति अथवा दूसरे रूप से अभिवान पयायोक्त होता है-इस प्रकार 
पर्यायोक्त के दो अरूग-अल्ग मेद माने भोर- ] 

(जयवाहन नाम का उसका दुर्नीति को जीतने मं खूव अभ्यस्त पुत्र पृथ्वी की रक्षा करने 
लगा, जिसने दुर्जय शघ्ुओं की सन्दर वनिताओं के लिए उनके प्रिय का दर्घन केवल स्वप्न तक 
सीमित कर दिया । 

-इस पाथं कं द्वितीय पर्यायोक्त का उदाहरण माना है, यह नदीं मानना चाहिर। यदि 
` न 
कथन सूर्यं अस्त हो गया दै, चन्द्र चमक रदा दै"--इत्यादि कथर्नो के समान अकाव्य ही सिद्ध 
होगा जओौर हम पीछे यह कद वार कद चुकेदै कि दोपामावमात्र जलंकार नहीं होता, ओर 
क्योकि यदं मी श्रियदशैन का स्वप्नावदेष होना" यह जो कार्यरूप अहे यहु अपनी सिद्धि के 
लिए अपने कारण श्व काञक्षेप करता हे [ अतः यहां मी कारणरूप अथं वाच्यु सिद्धिका 
कारण है ] फलतः इसे पयायौक्त का [ ेता प्क | दूसरा प्रकार मानना ठीक नहींहै [ जिसमे 
वाच्या्ैकी सिद्धि व्य॑स्याथं की अवेक्षा नदीं रखती ]। अतष्व = कार्यं ओर कारण देना ध 

रस्त होने ते । कार्यञ्ुखेन = कायं के द्वारा अथात पारिजातमंनरी के स्प कं द्वारा । स्वर्ग. 
ज्ञथं अर्थात्‌ कारणह्प स्वर्गजय । वणंनीय = अर्थात्‌ प्रस्तुत ॥ 
विमर्ञ--पर्यायोक्त का पृवेतिदास- 
भामह :- 
पर्यायोक्तं यदन्येन प्रकारेणामिधीयते । 
उवाच रत्नाहरणे चेयं चाङ्गषनुयंथा॥ 
गृहेष्वध्वसु वा नान्नं मुंज्महे यदधीतिनः। 
न युक्ते द्विजास्तचच रसदानविवृत्तयेः ॥ ३।८९ ॥ 
पर्यायोक्त वह जितम अन्य प्रकार ते भभिधान होता है। जते रत्नाहरण नामक्‌ [ अनुप- 
लव्ध ] कान्य में श्रीकृष्ण ने शि्युपाल से कहा- 
हम रास्ते मेँ भोजन नहा करते ओर षरों मे मी वह भोजन नहीं करते जिते वेदपाडी 
ब्रह्मणं ने न किया दो 


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पयायोक्ताटड्नरः ४२३ 


यह जो कहा हे यद्‌ केवर विषदान का परिहार करने के लिए । 
यहां मन कौ वात न कहकर बातें वनने का नाम ही पर्यायोक्त है । 
वामन में पयांयोक्त का निरूपण नहीं मिलता । 
उद्ट-उद्धट ने पयांयोक्त का निरूपण भामह से ठे लिया है किन्तु उसमे “अन्य प्रकारः का 
भर्थमी जोड दिया है- 
'पयायोक्तं यदन्येन प्रकारेणामिधीयते । 
वाच्यवाचकवृत्तिभ्यां ान्येनावगमात्मना ॥ 
'वाच्यवृत्ति = लक्षणा तथा वाचकवृत्ति अभिधा से भिन्न व्यज्ञनावृत्ति के दवारा अन्य प्रकार से 
कथन पयायोक्त कृहलाता हे ।' 
अभिनवगुप्त ने लोचन मे इसे उदधृत किया है ओर इसकी व्याख्या शस प्रकार की है 
(पयायेण प्रकारान्तरेण अवगमात्मना व्यङ्ग्येनो परक्षितं सद्‌ यद्‌ अभिधीयते तदभिधीयमान- 
मुक्तमेव सत्‌ पयायोक्तमित्यभिधीयते । 
पयाय का अथं हे प्रकारान्तर, प्रकृत मे उसका अथं दोगा व्यंजना, अतः पर्यायोक्त का अथं 
होगा व्यङ्ग्यत्व तै युक्त होकर कथित । [ ध्वन्यारोक १।१३ वृत्ति ] 
आनन्दवधनाचायंके लेख पेएेसा विदित दहोतादहैकि वे उद्धट का मत हयी स्वीकार करते 
दै । एक नहर्वपूणं तथ्य यहो यह हे कि उद्धर की इस कारिका सें व्यंजना्कत्तिका 
अरितत्व स्वीकार कर ख्यागयाहे। इस प्रकार व्यंजनावृत्ति का अस्तित्व भानन्दवध॑न के 
पुवं दी आचार्यौ के अनुभवमें आ चुका था । 
अभिनवयगुप्तने इस कारिकाको उद्धृत कर उदादरणके रूपमे निम्नकिखित प्य प्रस्तुत 
कियाथा- 
'राचुच्छेददृटेच्छस्य मुनेरुत्पथगामिनः । 
रामस्यानेन धनुषा देरदिता धमेदेरन। ॥- 
--अथात्‌ रचुच्छेद कौ दृट्‌ इच्छा वाके अतएव विपरीत पक्षम लगे सुनि परशुराम कौ 
[ भीष्म के | इस धनुषने धमशिक्षादे दीदे यहां कहना तो है परश्चराम के प्रभाव को 
दबा देने वाङ भीष्मके प्रमाव को, किन्तु कहा गया है धनुष दरा धर्मोपदेद की बात को । 


रुद्रट--रुद्रट ने पयायोक्त तथा पयायाल्कार को प्यायः नामक एक ही सीर्ष॑क मे प्रति- 
पादित किया है उनका लक्षण इस प्रकार है-- 


“वस्तु विवक्षितवस्तुप्रतिपादनराक्तमसद्ररं तस्य । 
यदजनकम जन्य वा तत्कथनं यत्‌ स पयायः ॥ ७४२॥ 

-णेसौी वस्तु जो विवक्षित वस्तु का प्रतिपादन करनेमें समथैतोहो किन्तुन उसके समान 
हो, न उसकी कारण हौ ओर न काये, तो उसका जो कथन वह होता है पर्याय नामक अलङ्कार ।? 
उदादरण- | 

"राजन्‌ ! जहासि निद्रां रिपुबन्दीनिबद्धनिगडशब्देन । 
तेनेव॒ यदन्तरितः स कल्को वम्दिब्न्दस्य ॥ 

- राजन्‌ ! आपकी नींद बन्दी बना९ शाञ्चुओं कौ वेडियो के तुमुल शब्द से सुरती है । नींद 
खुलाने के लिए वैतालिका का जो कलकल होता था वह उसी में छि गया है। 

नमिसाधु का कहना हे कि- यदह उक्ति राजा की चापलूसी मे कही गई है। इसे बन्दियों 
की वेदियां के राब्दसे नींद खुल्नादही तात्पयै नदींहै, जपितु यहभी तात्प ह पि 


ए 


७१७ > अलङ्ारसर्वस्वम्‌ 


आपने दावुओं को जीत च्या है ओर इनकी सियो को बन्दी वना क्या है। इस 
ग्रकार समी राओ को जीत लेना मी यहां प्रकारान्तर से व्यक्त होता है) 

रुद्ररने जो व्यंग्याथे में साट्ख्य का व्यवच्छेद करनेकेदी साथ कार्यकारणभाव का भी व्यव- 
च्छेद करिया वह दिए उदादरण की वस्तुस्थिति क विपरीत हे। इस उदाहरणमें त्रुनय कारण है 
उनके या उनकी स्यो के वन्दी बनाए जाने का । अत्तः यां कोायंकारणमाव का अभाव 
न्दी हे) 
सम्मर-मम्मटने प्यायोक्तका जो लक्षण वनाया है वह अपने आपे पर्यायोक्त का 
उदाहरण वन गयाहे। वे जो कना चाहते हैः वह अथै उनकी कारिका से वड़ी कृटठिनःई 
से निकलता है- 

पयांयोक्तं विना वाच्यवाचकत्वेन यद्‌ वचः । 

इसका अथं मम्मरने ही वृत्तिम ठीक वही किया है--जो उद्धटने अपनी कारिका द्वारा 
स्पष्ट किया था । वह्‌ 2 - 

धाच्यवाचकमावव्यतिरिक्तेनावगमनन्यापारेण यत॒ प्रतिपादनं तत पयायेग भङ्गवन्तरेण 


कथनात्‌ पययांयोक्तम्‌ । 
अर्थात्‌ वाच्यवाचकभाव से भिन्न व्यंङ्ग्यव्यंजकमभाव के दारा जो प्रतिपादन वही पर्याय 


अर्थात्‌ भिन्न प्रकार ते कथन होने के कारण पर्यायोक्त ।' 

यहाँ इतना अवदय दै किं उद्धट ने जो वृत्तिभ्य्‌ाम्‌? कदा था ओर द्विववन का प्रयोग करियाथा 
उत्तकी सार्थकता सिद्ध करने के अनावदयक प्रयास्त से मम्मटने पाठक को ववाया है। इस 
अलंकारपर मम्मर का उदाहरण ध्वन्यालोककार के प्वक्रमिघात०ः प्यके समान दही सटीक 
उतरा है-- 

“य प्रक्ष्य चिररूढापि निवासमप्रीतिरुञ््िता । 
मद्रेनेरावणमुच (मानेन द्दये हरेः॥।' 

--लिस [ हयग्रीव ] को देखकर मद ने ठेरावत के खुलमे ओर मानने दन्रके हृहयमें चिर 
रूढ निवास प्रीति को छोड दिया \ 

इस पर मम्मरने छिखा है- 

“अत्र ठेरावणदधक्रौ मदमानमुक्तौ जाताविति व्यङ्ग्यमपि रन्देनोच्यते। तेन यदेवोच्यते तदेव 
व्यङ्ग्यम्‌ , यथातु व्यङ्ग्यं न तथोच्यते । ॑ 

--यक्शां व्यङ्ग्य निकलता है कि “देरावत ओर इन्द्र मद तथा मान से रदित हो गर किन्तु इते 
ब्द से मी कदा जारहाहै। इसत प्रकार यदतय हृभाकरिजो वाति जभिधास्ेकीजारही है 
वही वात व्यङ्ग्य भी हो रदी है, किन्तु जिस प्रकारसे व्यंग्य दहो रदी हे शब्दतः कथन इस प्रकार 
से नहींदहो रक्टा । 

मम्भट के अनुसार प्रकार का अ्थ॒विदयेष्यविशेषणमाव भी दे । उक्त पथ मे विरोष्य॒विेषग का 
क्रम वाच्यरूप मँ इस प्रकार का है--'मदमानकतृकेरावतस॒चेन्द्रहदयाधिकरणकचिररूढनिवास- 
परीतिकर्मकं यत्पदवाच्यईयगरीवग्रक्षणप्रयोज्यमुज्छनम्‌ः अधात्‌ उक्त वाक्य में छोडना क्रिया में 
मद ओर मानका भन्वयकर्ताके रूपमेंदहो रद्वादै, रवत के मुखता इन्द्रफे हृदय का 
अधिकरग के रूप मँ तथा चिररूढ निवासप्रतीति का अन्वय कम॑रूप मं ।' व्यंग्याथं यदि देरावत 
तथा इन्द्र तथा इन्द्र मद तथा मानसे युक्त दो गए" यहदोतो इसका विशेष्य विङञेषण भाव 
दोगा--“देरावतदक्रौ मदमानकर्मकसुर्त्याश्रयोः अथात्‌ इसमें छोडना क्रिया मै रेरावत 


क 


तथा इन्द्र का अन्वय कर्ताके रूपमे तथा मद तथा मान का अन्वय कर्मके रूप स 


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" ह~ ॥ र र ` + 


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= व क 9 0 आ व । 


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पयौयोक्तालङ्ारः । ७१५ 


हो रहा दहै व्यंग्य का कों अन्य स्प हदो सकता दै। वह निशित नहीं इस प्रकार 
विेष्यविदोषणमाव दोनोंदही अथौ मेँ भिन्न किन्तु वक्तव्या्थं एक ही है। ममभ्मट ने इसे 
समञ्चाने फ किर सविशल्पकज्ञान तथा निविकल्पकज्ञान का उदाहरण दिया ह । निविकल्पक 
ज्ञान में व्यक्ति तथा ज।त्ति, अक्ग-अलग भासित होते दै । निर्विकल्पक ज्ञान यदिधयरकादोरदादहैतो 
उसमें ज्ञान तो घ ओर घटत्व दोन का होगा मन्तु यह ज्ञान न दोगा फि घटत्व घट मे रद रहा हे । 
सविकल्पक ज्ञान मे धरत्व घटम रहता हुआ विदित होता है। इस प्रकार ज्ञान दोनो ज्ञानोंमें 
अभिन्न या एक ही विषय का होता है किन्तु एक में विषय अलग-अलग भासित होते है, अन्य 
मे संसष्ट, सम्बद्ध ओर अन्वित रूप में। वह केवल विशेषणविशेष्यभाव मात्र का मेद हुआ। 
इस प्रकार मम्मट के अनुसार पयाय का अथं प्रकार हुआ ओर प्रकार का भथ इभा विह्ेषण- 
विदेष्य भाव, मामद्ाभिमत "उक्ति का टंग' नहीं इसी प्रजार मम्मट के अनुसार प्यांयोक्त मे वाच्य 
के समान व्यंग्यभी दोनो ही होते है, धम मी ओर धमी मी । | 
अप्पयदीक्िति- जयदेव ने सर्व॑स्वकार के हयी आधार पर पयायोक्तका रक्षण यह क्या 
था--“कार्याचैः प्रस्ततैरुक्ते पर्यायो क्ति प्रचक्षते"-प्रस्तुत कार्यादि उक्ति से वक्तेव्य अथं का कथन 
पर्यायोक्ति कदलाता है। अप्पयदीक्षित ने इसे स्वीकार नदीं किया । उन्होने मन्मट के लक्षण 
को आधार माना है। उन्दने मम्मट के उक्तमतकोजेसा का तेसा मान क्या दै। उन्न 
चन्द्रारोक के लक्षण के स्थान पर- 
'पयायोक्त तु गम्यस्य वचो भङ्गयन्तराश्रयम्‌ । 
नमस्तस्मै कृतो येन सुधा राहुवधूकुचो ॥' 

--दूसरे प्रकारसे गर्म्याथं का अभिधान पर्यायोक्त। यथा उसको नमस्कार ह जितने 
राहुवधुर्ओ के कुचौ को व्यर्थं दिया । --यह लक्षण बन। कर लिखा कि य्ह मगवान्‌ विष्णुं अपने 
असाधारण रूप से गम्य है (व्यंग्य नहीं) ओर वे दी राहुवधृकरुचपेयथ्येकारित्व स्प से 
वाच्यमभौदहे। 

पण्डितराज ने मम्मट कौ इस मान्यता का खण्डन किय्‌। है ओर ध्मींको व्यंग्य न मानकर 
केवर वाच्य माना है । वाच्यता भौर व्यंम्यता दोनों को एक साथ केवर धमं में स्वीकार किया हे । 

ध्यो व्यंग्यां्चः स न कदापि रूपान्तरपुस्कारेणाभिधीयते, यश्ाभिधीयते धर्मी स ठ 
तदानीमभिधाश्रयत्वाद्‌ व्यजजनन्यापारानाश्रय एवेति व्यङ्गयस्य प्रकारान्तरेणाभिधानमस्तंगतमेव 
[ पृण ५४९ रस्त० |। 


अन्ततः पण्डितराज ने अलंकारसर्वस्वकार के मत को ही सिद्धान्तित करते हए इन्दीं पंक्ति 
के तुरन्त बाद लिखा है- 
"तस्मात्‌ कार्यादिसुखेनोक्तमिव पर्यायोक्तम्‌ । तेनाक्षिप्तमित्येवाथैः । [ १० ५४९ रस ° | । 


-इसलिएट प्यांयोक्त का अथैहोना चाहिए काथ आदिक दारा कदा हृंजा सा अथात्‌ 
आक्षिप्त । 

अलंकारसवस्वकार का मत उन्दींके शाब्दो म पण्डितराजने इसप्रकार उडत किया हे-- 
“अलंकारसर्वस्वकारस्तु--"गभ्यास्यापि मङ्गयन्तरेणाभिषानं पयायोक्तम्‌ । गभ्यरयेव सतः कथमभि- 
धानमिति चेत्‌ कयादिद्वारेण' इत्याह । [ पृण ५४८ रस० | । 

इसका तात्पये भी उर्दि यष्टी तय किया हे कि ध्चक्राभिघात०' पद्य में ध्यः = जो' पद्‌ के हारा 
विष्णुभगवान्‌ कथित है, अतः व्य॑जना के द्वारा उनके भीतर "राहुशिरर्छेत्तत्वः--रूपी धमे ही 


७१६ अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


भासित दोत। है । इसी राहु्िरर्छेतृत्व को वाच्यरूप मं कवि ने रराहुवधूजनसम्बन्िचुम्बनमात्रा- 
वि्िष्टरतोत्सवनिर्मातृत्वः रूप से कदा हे । 
इस प्रकार पण्डितराज क अनुसार मम्भर व्यंरग्यांडमें धमींया विदध्य को मी संनिविष्ट मानते 
है ओर अंकारसवंस्वकार वैवल धमं को । इन दोनों मेते पण्डिराज सवंस्वक्रार का मत स्वीकार 
करते हें। | 
वस्तुतः भलंकारसववस्कार न्यंग्यांशको नतो धमीं-अंश मे वाच्य मानते ओर ध्म-अंमें। 
उनके मत में वाच्य होते दै कार्य आदि भोर व्यंग्य होते देः कारण आदि। इसप्रकारवे भामह 
द्वारा प्रतिपादित पर्यायोक्त को मान्यता देते ह । यचपि (आदिः शब्द से विमशेनीकारने ‹विदेषणः 
कोमी सर्वस्वकेमतमेंरनेका यत्न किया है तथापि यदह उनकी मम्मरमक्तिही है । कारण कि 
सर्वस्वकार ने वंसा कोई उदाहरण नदीं दिया । 
पण्डितराज-पण्डितराज ने स्वयं पर्यायोक्त का लक्षण इस प्रकार वनाया दै- 
[ सू° ] विवक्षितस्याथस्य भङ्ग्यन्तरेण प्रतिपादनं पर्यायोक्तम्‌ । = 
[ ब्र° ] येन रूपेण विवक्षितोऽैस्तदतिरिक्तः प्रकारो मङ्ग्यन्तरम्‌ । आक्षेपो वा । 
विवक्षित अथैका दूसरी मङ्गिमा से प्रतिपादन पर्यायोक्त । मडग्यन्तर = दूसरी भंगिमाका 
स्थं है जिस रूप से अथं की विवक्षा हो उससे भिन्न प्रकार या तो आक्षेप ॥ 
यहां अन्तर इतना ही है कि प्रकारान्तर का अस्तित्व अन्य आचार्यो ने व्यंग्यांश में वतलायां 
धा । पण्डितराज उपे वाच्यां मे बतला रहे हैँ । मत पण्डितराजका दही मन्यै, क्योकि प्रथम 
अथं वही अर्थं रहता दै, जिते बाद में कवि दूसरा रूप देकर अभिधा में संजोता हे । 
विश्वेश्वर-विदवेरवर पण्डित ने पण्डितराज जगन्नाथ फे विरुद्ध मम्मट के मतका समेन 
किया है । उनका लक्षण इस प्रकार है- 
[ करिका ]-- "पर्यायोक्तं कथितं वाच्यस्यैवान्यमङ्योक्तिः ।° 
[ बृत्ति ] वाच्य एवाथो यत्र व्यङ्ग्यतयोच्यते तत्‌ पयेवस्यति । 
एवं च व्यङ्गयग्रकारसमानाधिकरणप्रकारान्तरेणाभिधानं तदिति पर्यवस्यति । 
वाच्याय कौ ही अन्य प्रकार से उक्ति को पर्यायोक्त कहा गया है। अर्थात्‌ पर्यायोक्त वह 
दे जहां वाच्य अर्थंही व्यङ्गयरूप से कहा जाता है । निष्कं यद कि प्रिती वसतु का एक साथ 
व्युग्य ओर वाच्य दो प्रकारो के साथ कथन । 
विदवेवर ने वक्ता की मनस्थिति के मिपरीत व्यवस्था दी है । वक्ता कहना नो चाहता है उत 
भपने मूलरूप मेँ न ककर भित्न रूप मेँ कदता है, िन्तु इस प्रकार कदता है कि, मूलभूत अथं 
विना निके नहीं रदता । इसी उक्तिपक्रिया को पर्यायोक्त कदा जाता है। इसके अनुसार 
व्य्या्थं का वाच्य बनना मान्य है, वाच्य का व्यंग्य बनना नहीं । इसत प्रकार माम, उद्भट, रुदर, 
मम्मट, सवस्वकार, शोभाकर, जयदेव, अप्पयदीक्षित तथा पण्डितराज काही क्रम वेक्ञानिक 
क्रम हे। 
उपयुक्तं विवेचन से निष्कधं यहु निकलता है कि सभी आचार्यो ने पर्यायोक्त के विषये 
मृल्स्थापना तो माम्कीही मानरखीदहै, अर्थात्‌ भामहने जो “अन्य प्रकार से अभिधान 
को पयायोक्त कहा था, परवत्ती प्रत्थेक आचाय ने इस 'अन्व-प्रकार से अभिधानः कोबातको 
अपना रखा है, किन्तु अन्व प्रकारः का स्वरूप निधारित करने ये माचार्यौ मै. तीन 
मतद । पके उनका जो प्रकार का भं शब्दवृन्ति करते है, इसके प्रवततंक हैः उद्भट । दूरा 
उनका जो प्रकार का अथ॑ शब्ददृत्तिकेसाथदही विदेषणमी करते हैः । इसके प्रवतत है मम्मट। 


` ~ 2 व क क ~ = अ 4 ~ = ~ ~ >" 


पयायोक्व्यलङ्ारः ७१७ 


ओर तीसरा उनका जो प्रकार का अथं शाब्दवृत्ति तो करते है किन्तु उसका अथं विदेषण न कर 
काय आदि सम्बन्धित वस्तु अथं करते हें । इसके प्रवत्तंक हे सवंस्वकार । इस प्रकार यदि प्रथम 
मत को द्वितीय-तृतीय मत मे अन्तलीँन मान लिया जाय अथवा दितीय ओर वतीय मत को 
उक्त प्रथम मत का परिवधेन या विकास मान लिया जायतोवेवल दो ही मत देष बचैगे। एक 
मम्मटक्राओर दूसरा स्व॑स्वकार का। दोनों के अनुत्तार विवक्षित अथं व्यंजनासे ही प्रतीत 
होगा किन्तु वाच्य अथ॑ मम्मट के अनुसार व्यस्य धमींका कोड अन्य धमै या घटक दोगा 
ओर सवस्वकार के अनुसार व्यंग्य धमींका धसं या घटक न द्येकर उससे संबन्धित कायं 
आदि होगा । 
अप्पयदीक्षित ने इवल्यः नन्द मे व्याज से इष्टसिद्धिः को मी पयायोक्तमेद माना है-- 


पयांयोक्तं॒तदप्याहूुयेदव्याजेनेष्टसाधनम्‌ । 
यामि चूतलता द्रष्टं युवाभ्यामास्यतामिह्‌ ॥ 

--उसे मी पर्यायोक्त दी कहा गया है जिसमँ व्याज द्वारा इष्ट साधन कथित हो यथा-- 

मे आच्र की टहनियां देखने जा रहीदहू आप दोनो यी रहें। यां दूती नायक-नायिका 
को मिलाकर हर रह है, वस्ततः यह भामह के उदाहरण जैसा ही उदाहरण है । समे अल्कारत्व 
की मनोती मनःपूत नहीं है । 

रुक्तणा = पयांयोक्तमें द्वितीय अर्थं की प्रतीति उद्भट, आनन्दवधेन, अभिनवयुप्तः मम्मटः 
पण्डितराज ओर विचवेश्वर स्पष्टरूप से व्यंजना द्वारा मानते हें । सवस्वकार ने व्यंजना शब्द 
कातोकिसीमभीरूप में प्रयोग नदीं किया है किन्तुवेन्यंजना का खण्डन नदीं करते अतः उन्हं 
भी प्यांयोक्त मँ अपराथं की प्रतीति व्यंजना दारा मानने वाला माना जा सकता है । रत्नाकरकार 
जिनका पर्यायोत्तालक्षण पदे दिया जा चुका है [ लोभाकर- | को इस पर आपत्ति है । जेसा किं 
सप्रस्तुतप्ररंसाप्रकरण मे पहले बतलाया गया है कि रत्नाकरकार ने पयांयोक्त म वाच्याथे को 
सपराथंसापेक्ष माना है ओर अपरार्थनिरपेक्ष भी । इनमे से भपरार्थनिरपेक्ष को उन्होने ध्वनिरूप 
माना है, विन्तु अपरा्थ॑सापेक्ष वाच्य वाले मेद मे वे अपरां की प्रतीति में व्यजना न मानकर 
लक्षणा दही मानते हैँ । उनका तकं यह है कि यदि यों मी व्यंजना ही मान ली गहं तो उपादान 
लक्षणा के समी स्थलों मे व्यंजना टी मानी जाने ल्गेगी। फलतः उपादानलक्षणा का विलेप दहो 
जाएगा । उनकी पक्ति है- 

'सापेक्षत्वे तु कुन्ताः प्रविदन्तीत्तिवत्‌ भथंप्रतीतिलक्षणया, न तु व्यजनेन, उपादानरक्षणाया 
सस्तमय प्रसङ्गात्‌ । तेनैवमादौ लक्ष्यत्वेनाथान्तरस्य व्यङ्ग्यत्वामावात्‌ गुणीभूतम्यङ्ग्यत्वभेदत्वं न 
वाच्यम्‌ । [ अतः |- 

स॒ख्या्थसाकाङक्षतया प्रतीतिराक्षेपतोऽथस्य दि लक्षणेव । 
व्यद््ग्यत्वगन्धोऽपि न वितत ध्वनित्वदङ्कापि न तेन कायां ॥' 

इस प्रकार रल्नाकरकार अप्रस्तुतप्रशंसा के हयी समान पर्यायोक्त मे मी अवाच्या को प्रतीति 
लक्षणा द्वारा मानते है । व्यंजना दारा नदीं । पण्डितराज जगन्नाथ ने इसका स्पष्ट विरोध किया 
है 1 उनका कथन है-- 

"न हि 'चक्राभिघ।तप्रसमाक्ञयैव' इति. पये चुम्बनमात्ररेषर तोत्सवांे बाधोऽस्ति, येन लक्षणा 
स्यात्‌ । एवमप्रस्तुतप्रद्ंसायामप्य प्रस्तुतस्य प्रस्तुते न लक्षणा कं त॒ व्यंजनेवेत्ि सवसम्मतम्‌ । अन्यथा 
पर्यायोक्ते वाच्यस्य प्राधान्यम्‌ , भप्रस्तुतप्रक्षंस।यां ठ गम्यस्येति सिद्धान्तस्य भङ्गः रयात्‌ । लक्षणायां 
हि लक्ष्यस्येव प्राधान्यं स्यात्‌, न वाच्यस्य ।' [ प° ५५५ | । 


2५9 अ० खथ 


७१८ अलङ्कारसवंस्वम्‌ 


[ पर्यायोक्त के प्रसिद्ध उदाहरण ] व्चक्राभिषातः प मेँ चुम्बनमात्रदेषरतोत्सवसूपी अयमं 
कोई ब।ध नदीं है जिसमे य्ह लक्रणा मानी जा सके इसी प्रकार अप्रस्तुतप्रदसा में भौ अप्रस्तुत 
की प्रस्ततमें लक्षण नक्ष अपितु व्यंननादोहदोतो ३ यौ समौ को मान्य है। रपेसानदहोता 
तो पर्यायोक्त मे वाच्य कौ ओर अप्रस्तुतग्र्सा में गम्य अथं कौ प्रधानता रहती है यह सिद्धान्त 
कट जाएगा । क्योकि लक्षणा मानने पर प्रधानता खश्ष्यकी दी होगी वाच्य की नहीं 

पण्डितराज का यद मत हम भी मान्य है जेसा फि हम दोभाकरके मत के निरूपणमं 

अप्रस्तुतप्रशंसा प्रकरण में बतला आणरदहें। 
पाठान्तर --( १) सव॑स्व के पर्यायोक्तसूत्र मे निणैयस्तागर प्रति मे भदग्यन्तर शब्द के स्थान 
पर '"पर्यांयान्तर' शब्द पाठान्तर के रूपमेँ दिलाया गया हे) डो० रामचन्द्र द्विवेदी ने उसी | 
को मू मान ल्या है ओर भङ्ग्यन्तर दाब्द को पाठान्तर मेँ डाल दिया है। ढोर जनकौ ने 
इसके विपरीत भङ्ग्यन्तर को दी मूक माना हे । त्रिवेन्द्रम संस्करण मेभी भङग्यन्तर्‌ को मूर माना | 
| || गया है । वस्तुतः “भंग्यन्तर-पाठ्दी मूल पाठहै। विमरदिनौमे इसी पदका प्रयोग भिल्तादहै 
यद्यपि यह प्रयोग प्रतीकभूत पद के रूप मे नदीं किया गया दे । संजीविनी मेँ प्रतीकरूप स्ते 
मंग्यन्तर को ही उदघ्रृत किया गया है । सूत्र भी उसमे भग्यन्तर-पदषटित ही बतलाया गया है- | 
‹तत्र सूत्रम्‌ = गम्यस्यापि मङ्गयन्तरेणाभिधानं प्रयांयोक्तमिति" । इसके अतिरिक्त सवैस्वकार का 
पयायोक्त सूत्र अप्पयदीक्षित, पण्डितराज तथा विदवेश्वर ने भी उदघ्रृत किया है) उनके उद्धरणं मेँ 
मडग्यन्तर'-पाठ ही भिलता है । 
अप्पयदोक्तित--अलकारसवंस्वकृतापि पर्यायोक्तस्य संप्रदायागतमिदमेव लक्षणमङ्गीकरतम्‌- 
गम्यस्यापि मङ्ग्यन्तरेणामिधानंः प्यायोक्तमित्ति । [ ६० कुवल्यानन्द पर्यायोक्त ] 
पण्डितराज--का उद्धरण पहले दिया जा चुका है । 
विश्वेश्वर -“सर्वस्वकारस्तु-गम्यस्यैव मङ्ग्यन्तरेणाभिधानं पर्यायोक्तम्‌, इति [ वौस्तुम, 
पर्यायोक्त प्रकरण ] 1 ४ । 
इन दोनो कै अपने पु यायोक्तसूत्रो मे भी मङ्खी ओर भङ्ग्यन्तर राब्दका उपयोग किया गया 
है । रल्नाकरकार ने भी अपने पर्यायोक्तसूत्र मे मङ्ग्यन्तर शब्द्‌ ही अपनाया हे । उद्धृत वचन 
ते स्पष्ट है कि मम्मटने मी वृत्तिम मक्ग्यन्तर शाब्द करा प्रयोग किया है । पर्यायद्चब्द को भूल 
मानने का उद्रेर्य परयायोक्तशब्द की भ्युत्पत्ति हो सकती हे । किन्तु पर्यायद्चब्द का कुछ रेस्ता 
इमाम रहा दै कि अभिनवगुप्त को छोड उसा उर्लेखपूवेक स्पष्टीकरण किसी ने नदीं किया । 
पण्डितराज ने तो उक्टे भङ्ग्यन्तर शाब्द की दी व्याख्या करना उचित समश्चा । इस प्रकार पर्याय | 
राही अथ ह प्रकारान्तर ओर मङ्ग्यन्तर। किन्तु भङ्ग्यन्तर शब्द का प्रयोग पूव ओर पर के 
आल्कारिका मं सवस्वके नाम से प्रसिद्ध हे अतः उसे हं टकर वास्तविक हकदार पर्याय चन्द को 
मूर सूत्र मं स्थान देना संमव नहींहोपारहा है। यथपि स्व॑स्वकार ने मडग्यन्तर चाब्द का 
वृत्तिम एक वार भी प्रयोग नहीं किया है| र 


नन 


(८२) सूतके पात्‌ कौ प्रथम प्रक्ति ममी पाठान्तर की समस्या कराती है। वह निणेय- 
सागर संस्करण मे व्यदेव गम्यत्वं तस्यैवाभिधाने० छपा ह भर इस पर्‌ पाठान्तर के रूप में ङुछ 
नहीं द्रसाया गया हे । डो० जानकी ने निणयसागर की. इस पंक्ति भं अभिधानैः के स्थान पर 
अभिधानं भर वदला है । पाठान्तर मेँ उन्होने भी कोई अन्य पाठ नदीं दिखलाया है। विमरदिनी 
ओर संजीविनी म इस पंक्ति के प्रत्येक चब्द को प्रतीकरूप मं उद्धृत नदीं किया गया है । अतः 
उनके आधार प्र भौ मूलभूत पाठ कौ योजन नदीं कौ जा सकती । संजीविनी म इस पक्ति का 


उयाजस्तुत्यलङ्ारः ७१९ 


प्रथम ध्यद्वैवः पद प्रतीक के रूपमेंदिया हआ है । उधर विमरिनौ मे गम्यमपि तद्‌ वाच्याय- 
मानमिति यदेव गम्यते तस्येव मङ्ग्यन्तरेणाभिधानम्‌” इस पंक्ति में "यदेव गम्यत्तेः पद से कूगता है 
कि मूल पिमे गम्यत्वं के स्थान पर गम्यत्तेः रहा होगा। इस कारण इमने यही पाठ 
मान लिया हे। यचपि डो० रामचन्द्र द्विवेदी ने चदेव गम्यं तस्येवाभिधानं पर्यायोक्तम्‌ गम्यस्य 
सत०? इस प्रकार जो पंक्ति बनाई है, वह "गम्यस्य सतः" इस पंक्ति से मिलती-जुलती पंक्ति है अतः 
अधिक साफ़ है तथापि इसके अनुसार "गम्यत्वं-का सर्वत्र अन्यभिचारी प्रयोग छिपिदोष न सिद्ध 
होकर पिषयदोष सिद्ध हो जाता है । "गम्यतेः-रूप मानने पर विषयदोष हट जाता है । “गम्यस्य 
सतः के साथ इस पाठका मी कोई अधिक वेषम्य नहीं रहता । | 

पर्यायोक्त के संपुणं विवेचन को संजीविनीकार ने इस प्रकार कारिकावद्ध किया है-- 

"पर्यायोक्त तु कायादिद्रारा गम्यस्य वणैनम्‌ । 
अप्रस्त॒तप्ररसातो वाच्यस्य प्रस्तुते भिदा ॥' 

-कार्यादि के द्वारा गम्य अरथका वर्णन पर्यायोक्त कदलाता है । इसमे वाच्य प्रस्तुत रहता है 
इसलिए श्स का अप्रस्तुतप्रशंसा से भेद रहता हे। 

[ खवंस्व | 

गम्यत्वविच्छित्तिप्रस्तावाद्‌ व्याजस्तुतिमाह- 

[ ख०° ३८ 1 स्ततिनिन्दाभ्यां निन्दस्तुत्योगेम्यत्वे व्याजस्तुतिः । 
यन स्तुतिरभिधीयमानापि प्रमाणान्तराद्‌ बाधितस्वरूपा निन्दायां पयं- 
व्यति त्रासव्यस्वाद्‌ व्याजरूय स्तुतिरित्य्ुगमेन तावदेका ष्याज्स्तुतिः। 
यन्नापि निन्द्टाब्देन प्रतिपाचमाना पूवेवद्‌ बाधितरूपा स्तुतौ पयेवसिता 
भवति सा द्वितीया भ्याजस्तुतिः । भ्याज्ेन निन्दालरुखेन स्तुतिरिति इत्वा । 
स्तुतिनिन्द्‌रूपत्वस्य विच्छित्तिविरोषस्य भावादप्रस्त॒तप्रश्सखातो भेदः । 
गम्यत्वजनित चमत्कार के प्रसंग मे भव व्याजस्तुति का निरूपण करते है- 

[ सूत्र ३८ ] स्तुति ओर निन्दा से निन्दा ओौर स्तुति गम्य दहो तो [ अरूकार की 

संज्ञा ] व्याजस्तुति [ होती ३ ] ॥ 

[ वृत्ति ] जँ अभिधा दारा स्तुति ही प्रस्तुत कीजारही दहै किन्तु अन्य प्रमाण से उसका 
स्तुतिरूप बाधित हयो रहा दहो फलतः वह निन्दा मे परिणत हो रही दो वर्ह, भसत्य होने से 
'्याजरूप स्तुत्ति' इस प्रकार की ब्युत्पत्ति के द्वारा एक प्रकार की व्वाजस्तुति होती दै। इसी 
प्रकार जौ राब्द से निन्दा कटी जाती दो भिन्त पूवैवत्र उसका स्वरूप बाधित हो रहा हो ओर 
वह स्तुति मे परिणत हो रद दयो तो वह दूसरी व्याजस्तुति होती दै--्याज अथात्‌ निन्दा क 
बहाने स्तुतिः इस व्युत्पत्ति के आधार पर । इसमे स्तुति ओर निन्दारूप विरिष्टं प्रकार की छक्ति 
रहती है इसलिए इसका अप्रस्तुतप्रशंसा से भेद हे ¦ 

विभमरिनी 

आहेति स्त॒तिनिन्दाभ्यामिष्यादिना । प्रमागान्तरादिति बक्तृाच्यप्रकरणादिप्यालोषच- 
नारमनः । वाधितस्वरूपेति । आसुख एव प्रस्वरुदरपेध्यथैः । अतं एवास्या धवनेभंदः । 
स हि विश्रान्ते वाक्याथ वक्वृचाच्योचित्यपय)रोचनाबरादुवगभ्यते। इह पुनः प्रमा. 


&२० अच्रङ्ारसवेस्वम्‌ 


णान्तराद्वाधितः खन्‌ वावया्थैः श्वयमनुपपद्यमानस्वात्‌ परत्र निन्दादुी स्वं समपंयति । 
तत्रेव प्रह्ृतवाक्याथस्य विश्रान्तेः । एवन्‌-- 
° अह खज्जणण मर्गो खुदहअ तष च्चेअ णव र्‌ जिच्चरूढो } 
इण्डि अण्णं हिअषु अण्णं वाद्‌ रोअस्स॥' 
इस्यादौ विश्रान्ते वाक्यार्थ वक्वृवाच्योचिस्यपयांरोचनावटान्निन्दायाः प्रतीतिरिति 
ध्वनिविषयस्वमेव युक्तम्‌ । एचवदिति प्रमाणान्तरात्‌ । एका द्वितीया चेव्यभिदधता दं एवात्र 
ज्याजस्तुती न पुनरेकेव द्विविधा भ्याजस्तुतिरिति सूचितम्‌ ! प्रकारध्रकारिभावो हि 
सामान्यरुडणासखद्धावे न भवति । असंभवत्तवसामान्यश्य तद्िेषर्वःमादात्‌। शाब्द. 
निबन्धनं तु सामान्यमाधरिव्य इयोरत्राभिघानम्‌ । णवं स्ठेतिनिन्द्‌ाभ्यासप्रस्तुत्तभ्यां 
निन्दाश्तुस्योः प्रस्तुतयोर्गम्यव्वमिव्यत्र सिद्धम । ययेवं तत्किमियमप्रस्तुतप्रशंसेव न 
अव तीस्याद्ङ्कयाह--स्तुतीत्यादि । तच्र हि खामान्यविदोषादीनां गस्यत्वघ्ुक्तब्‌ । 
| आह = निरूपण करते है=“स्तुतिनिन्दाभ्याम्‌? इत्यादि अगले मन्थ के द्वारा । प्रमाणान्तरात्‌ 
अन्य प्रमाण से वक्ता, वाच्य, प्रकरण आदिः के पयांलोचनरूपी प्रमाण से । बाधितश्वरूप्‌ = 
आरम्म मेँ द्यी उसका अपना रूप प्रस्खलित होने लगता हे। इसीलिए इसका ध्वनि सेभेदहै। 
| घ्वनि वौ होती है जदा वाक्याथ म को आपत्ति नहीं रही अर्थात्‌ वह विश्रान्त हो जाता ३ । 
| तदनन्तर वक्ता, वाच्य ओर ओचित्य आदि कै पयाँलोचन से अन्य अथं विदित होता ै। शसक 
विपरीत यहाँ वाक्याथ प्रमाणन्तर तसे बाधित हो जाता है । अतः अपने आप तर वहु अनुपपन्न 
रहता है अतः स्वयं को निन्दा आदि अन्य अथौ मँ परिणत र देता हे। क्योकि प्रकृत वाक्यार्थ 
ॐ की विश्रान्ति उन्दीं अथा मे होती हं । इस प्रकार-- 
“इह सज्जनानां मागः खहत्तया चैव केवकं निर्य; । 
इदानी मन्यदपधरदयमन्यद्‌ वचनानि लोकस्य ॥' 


--“अमौ तक तो स॒ञ्जनों का मागं केवल सौहाद के कारण निभमता रहा है अवतो लोगों के 
हृदय भिन्न ओर वचन भिन्न हो गहे । ४ 


इत्यादि स्थल में वाक्याथ ठीक उतर जाता दै, तव वक्ता, वाच्य ओर मौचित्य पर ध्यान 
देने से निन्दा की प्रतीति दौती दे, इसलिए यहाँ ध्वनि ही मानना ठीक है । [ वस्ततः यदं 
निन्दा भी उत्तराधं से स्फुट है अतः हो तो, यहाँ केवल गुणोभूतन्यग्यता हो सकती रहै, किन्त 
यह तय हं कि वां व्याजस्ठति नीं है ]। पूर्ववत्‌ = अन्य प्रमाणों से । एक गौर दूसरी रेखा 
कदने से यद सूचित श्रिया ये दोनों व्याजस्तुत्ति दो अलग-जल्ग अर्थात्‌ स्वतन्त्र व्याजस्तुति है, 
एक व्याजस्तुति के दो मेद नही हे। किसी का कोई मेद सिद्ध नदीं होता यदि कोई सामान्य 
रक्षणन हो । क्योकि मेद का अथ॑ होता विदोष भौर किसी का सामान्य धमं किसी मेँ नर्ही 
रहे तो वह उसका विशेष नदीं माना जता। यहाँजो दोना व्याजस्तुतियां को एकं साथ कहा 
गया हे वहु नाम-साम्यमात्र के भाधार पर । इस प्रकार यह सिद्ध दहा किं यहां शब्दतः कथित 
स्तुति बौर निन्दा अप्रकृत रहती है ओर उनतते गम्य निन्दा स्तुति प्रकृत । "यदि रेसाहैतो यह 
अप्रस्तुतप्ररासा ही क्यों नहीं मान खी जाय--इस श्रा पर उन्चर देते दै--प्ठति०ः इत्यादि । 
वहां भग्रस्तुतप्ररंसा मे जो है सो गम्य होते हे सामान्य विदेष, [ न कि स्तुति जिन्दा ] 
[ सवस्व | 


क्रमेण यथा-- 
"हे हेठानितवबोधिखस वचसां कि विस्तरैस्तोयषे 
नास्ति त्वत्तदक्ाः परः वरहिताधाने श्रहीतवतः | 


उ्याजस्तुत्यलङ्कारः | ७२९ 


तुष्यत्पान्यजनोपकारघटनावेमुख्यलग्धायरो- 
भारथोद्हनै कयेकि पया साहायकं यन्मरोः ।}' 
अत्र विपसतलश्चषणया वाच्यवेपरीन्यप्रतीतिः। 
“इन्दोत्रहम तरिषुरजयिनः कण्ठपीदी ुसरि- 
दिङ्नागानां मदजकमवबीमाञ्ञि गण्डस्थलःनि। 
उअदयाव्युर्बीवठकय।तटक इयामच्िम्नायुलिक्ता- 
न्युद्भासन्ते चद्‌ धवलितं किं यशोभिस्त्वदीयैः 
अत्र धवलखताहेतुयरोविषयानवक्टक्षिप्रति पद्नेन शविद्येषध्रतिषेषे सोषा 


भ्यचुज्ञानम्‌' इति न्यायात्कतिपयपद्‌ायेवञ समरस्तवस्तधवठ्ताकारित्व 


चपयङ्सः प्रतीयते । 
किं चृत्तान्तैः परगरहगतैः कि तु नाहं समथं- 
स्तूष्णीं स्थातं पररतिस्रुखसरो द्ाक्चिणात्यस्वभावः। 
गेहे गेहे विपणिषु तथा चत्वरे पानगोष्ठ्या 
मुन्मत्तेव श्रमति भवतो बङ्भा हन्त कीर्तिः ॥ 


इत्यत्र प्रक्रान्तापि स्तुतिपयव त्ायिनी निन्दा हन्त कोर्तिंरिति भणित्या 
उन्मूलितेति न प्ररोहं गमितेति दिलषएटमेतदुदाहरणम्‌ । 

क्रम से [ उदाहरण ] यथा-[ स्तुति से निन्दा ]- 

हे जलनिधे, हे [ गंभीरता की ] सुद्र मे बोधिसचको जीत लेने वाले! अधिक क्या कँ 
दूसरा का दित करने का ब्रत धारण करने वाला तुम्हारे जैसा कोईंदूपरा नदीं है प्यासे 
पथि के उपकार से विमुख होने की अपकीत्तिके मारको ढोने म मरस्थल कीजो त॒म सहायता 


करते दहो । 


यहां विपरीत लक्षणाके द्वारा वाच्य के धिपरीत अर्थ॑की प्रतीति होती है। 

[ निन्दा से स्त॒ति यथा-- ] 

दे ृथ्वीमण्डल के तिलक ! चन्द्रमा का कलंक, शिवजी का कण्ठ, निष्णु भगवान्‌ , दिग्गजों 
के मदजल कौ स्याही से लिप्त गण्डस्थल समी तक सांवलेपन से लिप्त दिखाई दे रहै दहै [ तब] 
बतलाइए आपके यो ने फिंसे धवल बनाया । 

--यदह्‌। धवलता के जनक यश की विषयो म अपयांभि का प्रतिपादन करने के कारण (विषं 
[ किसी एक ] के निपेधसते शेष का विधानः इस नीति से कुछ पदार्थो को छोड़ रेष सव पदार्थौ 
को धवल करने का रुणराजा के यशसे प्रतीत दता है। [ किन्तु- ] 

दूसरे कौ षरेल्‌ बातोंसे करनादही क्याहै, परन्तु चुपवैठ नददीपा रहारः बोल्नेकी 
आदत पड़ गइ हं, दक्षिणियां जेता स्वभाव हो गया है। धरधर मे, बाजारबाजार मे, चोरास्तो 
प्र, आसवगोष्ठियां मै उन्मत्त जेसी घूमती फिर रही है । [ कौन ] आपकी वद्लमा । [ कोन ] 
इन्त कीत्ति। 

- यहं स्वति मे पयंवसित होने वाली निन्दा भारम्भतो की गई किन्तु (न्त कीति" इस 
कथन से वह उखाड़-सी दी गई, जमने नही दी गहै, अतः [ अभिनवगुप्त द्वारा लोचन के प्रथम 
ठोत मं व्याजस्तुति के उदाहरणके रूपमे प्रस्तुत ] यह उदाहरण [ एकं प्रकार से] इलेषका 


| 


७२२ अद्छड्रसवेस्वम्‌ 
दो उदाहरण है [ ज्से दोनो अर्थ दल्ेषमें अभिधाद्वारा प्ताफासाफ कददिए जाते है वेसेहीवे 
यहोँ भी कथित ही हँ ] 

विमध्िनी 


विपरातलश्चणयेति । सनिमित्तान्र वाच्यव परीस्यग्रतीतिरिति मावः 1 अन्यथा हि सव- 
स्मात्‌ सर्वप्रतिपत्तिः श्याव । कषणा च सुख्यार्थवाधपूर्विकेव भवतीष्यमिघीयमानायाः 
स्तुतेन धितस्वरूपस्वस्ुक्तस्‌ । १०}, 
अस्याश्च निन्दास्तध्योर्वाच्यस्वे स्ततिनिन्दयो्दा गस्यस्वमेव भवति तदेवारुकारत्वं 
नान्यदेति दर्शयिहमाह- किं वृत्तान्तैरित्यादि । उन्मूक्तिति । स्तुतिरेव वाच्यय्वेनोक्तेदयथंः । 
दिलष्टमिति। अनु दाहरणसेयै तदिति ताप्पय॑म्‌ । अतश्चास्य खोचनकारेण य द्कयाजस्छव्युदा- 
हरणव्वस्युक्तं तदयुक्तमेदेति भावः। 
विपरीतलन्तणा विपरीतलक्षणा के द्वारा, माव यद कि यहं वाच्य के विपरीत अथं की 
जो प्रतीति द्येती है वह सदेतक है । एसा न हौतातो समी से समी अथो की प्रतीति दोने लगती । 
ओर लक्षणा सदा सुख्य अथ॑का वाधदहोने पर दही होती हे, इसलिए अभिधा द्वारा कही जा रहय 
[ अतएव सुख्याथैभूत ] स्ति क] अपना स्वरूप यहां बाधित हौ वतलाया गया हे । 
धयह [ व्याजस्तुति ] तमी अलंकार होती हे जव वाच्य निन्दा ओर वाच्य स्तुति से [ उनकी 
उल्टी ] स्तुति ओर निन्दा गम्यहीहां। नदीं तो नहीं ।-इस तथ्य को वतलाने के लिए कहते 
हैँ = “किं वृत्तान्तेः० । उन्मूखिता = उखाड़ सी दी गईं = अथं यह्‌ कि स्तुति कोष वाच्यरूप से 
कह दिया । रिल्ष्टम्‌ = इसका तात्पयं यह कि यह्‌ पद्य व्याजस्तुति के प्यके रूप मे उदाहरणीय 
नदीं है। ओर इसलिए रोचनकार ने इत्ते नो व्याजस्तुति का उदाहरण कदा है वहु गलत ही 
हे [ पण्डितराज जगन्नाथने इस पद्य मेँ समासोक्तिगर्भित व्याजस्तुति मानी है ओर सर्व॑स्वकार 
तथा विमरिनीकार का उद्धरणपूवंक खेण्डन कर लोचनकार का समथन किया है [द०रस 
प° ५६० || 
व्याजस्तुति का पृव॑तिदास्- 


न्याजस्तेति के जो रूप यह सवस्वकार ने प्रस्तुत किये हैँ श्सकर स्थापना पहली वार र्रर 
नेकीथी। मम्मट ने उन्हें सवखकारके ही समानज्योंका त्यों अपना छियाहै। भामह ओर 
वामन मे व्याजस्त्ति की इल्कतो पाईं जाती है परन्तु उनकी दृष्टि इस विषय मेँ स्फीत नदीं है । 
(न दृष्टि स्फीत अवदय है किन्तु वह एकाङ्गी है। निम्नलिखित उद्धरणों से यह तथ्य 
स्पष्ट है- 


भामह--दूराधिकयुणस्तोत्रव्यपदेदेन तुच्यताम्‌ । 
किचिद्‌ विधित्सोयां निन्दा व्याजस्तुतिरसौ यथा । 
रामः सप्ताभिनत्‌ साखान्‌ गिरिं क्रौल्चं भृगृत्तमः। 
दातांशेनापि भवता कि तयोः सदृशं कृतम्‌ ॥ ३।६२,३३ 


-- अत्यधिक गुणद्चाली व्यक्ति की स्ठृति के बहाने उसकी समानता बतलाना चाहने वाले के 
दारा [ अन्य किसी व्यक्ति की] जो निन्दा की जाती है वह व्याजस्तति होती है । यथा- 

-रामने सातव्रक्षोको वेधा, परशुरामे कंच पवत को। उनके समान आपने चतांदा 
भी क्या किया इसका अथं यह निकल्ता है पि मनुष्य जो कर सकता है वह्‌ आप कर चुके, 
केवर देवों का पौरुष ही आप मेँ श्ञेष है। 


उ्याजस्तुत्यटङ्ारः ७२३३ 


वामन~--वामन ने भामह के अनुकरण पर ही व्याजस्तुति का निरूपण किया है। वामन का 
व्याजस्तुतिनिरूपण भामह का स्पष्टीकरण है । उनका निरूपण इस प्रकार दहै- 
[ सु° ] संमान्यविरिष्टकमाकरणान्निन्दा स्तोत्राथां व्याजस्तुतिः । 
[ ब्रू ] अत्यन्तयुणाधिको विशिष्टः, तस्य च कमे वििष्टकमे, तस्य संभाव्यस्य कत्तु शवयस्या- 
करणाननिन्दा वििष्टसाम्यसंपादनेन स्तोत्राथां व्याजस्त॒तिः । यथा-- 
'ववन्ध सेतुं गिरिचक्रवालेविभेद सपेकदयरेण तालान्‌ । 
एवंविधं कमे ततान रामस्त्वया कतं तन्न सुपैव गवैः ॥° 
शुरणो मे अत्यन्त बड़ अतएव किसी विचष्ट व्यक्तिका किया कार कियातो जा सकता हो किन्त 
उसेकिसीनेक्ियानदष्ो तो उसकी निन्दा व्याजस्तृति कराती है क्योकि उससे विरिष्ट व्यक्ति 
के साथ निन्दा वाले व्यक्ति की समानता ्ल्कने ल्गती है फलतः वह्‌ निन्दा स्तुति मे पर्यवसित 
हो जाती हे। यथा-- 
“पाङ का पुरु बोध डाला, एक वाणसे साततालको वेधदिया।रमने रेसा कायं 
किया । तुमने वैसा कायं नदीं किय। है, अतः गवं व्यथं है ।' 
स्पष्ट ष्टौ वामन का लक्षण उसका स्पष्टीकरण ओर उदाहरण अक्षरशः भामह के व्याजस्तुत्ति- 
निरूपण का स्पष्ट अनुवाददहै। हमेंतो इन दोनों आचार्यो के उक्त विवेचन मे पयाीयोक्त कौ छाया 
दीखती है। आचार्यौ के अनुसार यहां कवि को कहना यह है किं नतुम रामके समान दहो" । 
इसी को वद निन्दासुखेन प्रतिपादित कर रहा है । साम्य का प्रतिपादन यहां अत्यन्त क्षीण है अतः 
स्त॒ति का कोड स्पष्ट भाव जागता नहीं । एकमात्र साम्य तक सौभित रख कर भी उक्त आचार्यो ते 
व्याजस्तुति की व्यापक अभिव्यक्ति का अधिकांश छोड दिय है । 


उद्धट--उद्धट कौ धारण भामह ओर वामन से मिर्ती-जुल्ती ही है किन्तु उनका निरूपण 
अत्यन्त प्रांजरू है- 


'शन्दराक्तिस्वभावेन यत्र निन्देव गम्यत्ते । 

वस्तुतस्तु स्तुतिः श्रेष्ठा व्याजस्त॒तिरसौ मता ॥ 
यथा -धिगनन्योपमामैतां तावकीं रूपसम्पदम्‌ । 

्ेरोक्येष्वनुरूपो यद्‌ वरस्तव॒ न रभ्य॒ते ॥ 

-राब्दराक्तिके स्वभावसे [ अभिधा द्वारा ] जहां विदित तो होती ह निन्दा-सी किन्तु 
वास्तविकरूप मँ र्ती हो उत्कृष्टतम स्तुति तो उसे व्याजस्तुति कहुगे । यथा-[ तप कर रही 
पावती के प्रति उनकी सखी की उक्ति ]- 

-तम्दारी इस अतुलनीय रूपसपत्ति को धिक्कार है, जिसके सनुरूप वर तीनों लोका मे नदीं 
भिर रहा हे, 

यहां भगवती पावेती को अतुलनीय रूप से युक्त बतलाकर उनकी प्ररंसा की जा रही है । 

ग्याजपूण स्तुति से निदा की प्रतीति का दूसरा व्याजोक्तिभेद भामह भौर वामन के समान 
उद्भट को दृष्टि में नहीं भया । इसके अतिरिक्त उन्होने अपने व्याजस्तुतिभेद का जो उदाहरण दिया 
उसमे स्तुतिपक्च एकमात्र गम्यन होकर वाच्य भी हो गया है । 'अनन्योपम।› विदेषण दारा पार्वती- 
रूपसम्पत्ति को अतुरनीयता को शब्दतः भी कह दिया गया है । सवेस्वकार के अनुसार यह 
उदाहरण भी कि वृत्तान्तःः० पच के समान ही व्याजस्तुति का उदाहरण नदीं माना जा सकता । 

श्द्रट--रुद्रर ने व्याजस्तुति को व्याजररेष नाम दिया गया है ओर इसे अ्॑दलेष के प्रकरण 
म रखा है । इसके अतिरिक्त उन्दने स्त॒त्ति से निन्दा की व्यंजना वारे मेद को भी इसके अन्तग॑त 
गिना है । उनका निरूपण मी सवथा स्पष्ट है- 


७२४ अलङ्धारखयस्वम्‌ 


'्यस्मिन्निन्दा स्त॒तितो निन्दाया वा स्तुतिः प्रतीयेत । 
अन्या विवक्षिताया व्याजदलेषः स विज्ञेयः ॥ १०।११॥ 

--जदां शब्दतः कही जा रदी स्त॒ति या निन्दा से तद्धिन्न [निन्दा या स्तुति ] की प्रतीति 
हो रही हो उते व्याजदटेष समक्चना चाहिए । 

यहां यह एक विष रूप से ध्यान देने योग्य तथ्यहे किरुद्रटने स्तुति ते व्यक्तं होने वाली 
निन्दा को प्रथम स्थान दिया है । निदिवत दी यदह उनका पूर्वा ार्यो मेँ इङ्गे अमाव ओर अपने 
दवारा इसके इदं प्रथमतया प्रतिपादन की ओर संकेत दै । 

रुद्रटने दोनोकेजो उदादहरणदिए हैं उने द्ाब्दगत दक्ष भी टै ओर उन शुद्ध व्याजस्वुत्ति 
नदीं है, अन्य आलंकारिक विधाओं कामी स्पशं दहै, अतः मम्भटने रुद्रटका लक्षणमत्र अपनाकर 
व्याजस्तुति का निरूपण इस्त प्रकार किया है-- 

मस्मट--"्याजस्तुतिसंखे निन्दा स्तुतिवां रूढिरन्यथा । | 

-- “व्याजस्तुति वह जिसमे आरम्म मेँ मासि दो निन्दाया स्तुति ओर अन्तमें ्िद्धदहो 
उससे उल्टी स्तुति या निन्दा 

स्तुति से निन्दा का उदाहरण उरन्ोनि हे देला०' पद ही दिया है । 

व्याजस्तुति दाब्द की संगति उन्होने व्याजरूपा व्याजेन वा स्तुतिः" ¶्याजल्प स्तुतिया व्याज 
से स्त॒ति' यहदीदीथी। 

इस प्रकार व्याजस्तुति का स्वरूप तो मम्मट तथा सवरस्वकारने रुदटसे ही अपनाया, किन्तु 
उसका नाम उन्होने परम्परासेदहीलिया। रुद्रटने व्याजस्वुतिर्मे जो देष का अस्ति माना 
था उसते उसे अल्ग करने का श्रेय मम्मटको जाताहे। सव॑स्वकारने जो कि वृत्तान्तैः० पच के 
पश्चात्‌ 'दिल्टनेवे तत्‌, कहा है इसका सोत कदाचिच्‌ रुद्र द्वारा व्याजोक्तिमें टेप का असितत्वं 
माननादीदहे। इस कारण संजीविनीकार द्वारा दिष्ट दाब्दके लि९ क्लिष्ट शब्द की पाठान्तर. 
कट्पना उचित प्रतीत नदीं होती । संजीविनी तथा विमरिनी दवारा इस्त शाब्द पर चुप्पी साधना 
भीवेसादीह। । 

शोभाकर--परवत्तीं शोभाकरर ने मी व्याजस्तुतिकेये दोनों मेद माने है । उनका सूत्र है- 

[ सू० । स्ठतिनिन्दाभ्याम्‌ [ अन्यप्रतौतिः ] व्याजस्तुतिः । 

[ इण | स्तुत्या निन्दा, निन्दया वा स्तुतियंत्र भवति सा व्याजस्तुतिः । 


--स्त॒ुति ओर निन्दा से अन्य [ निन्दा ओर स्तुति ] की प्रतीति व्याजस्तुति कदलाती है । 

सवेस्वकार के ही समान रत्नाकरकारने भी व्याजस्तुति मे अन्य अथं की प्रतीति रक्षणा 
दारा मानी है। 

विमर्िनीकार ने व्याजस्तुति के विषय म एक मदत्वकौ वात यहु कही थी कि व्याजस्तुति 
नामसेजिनदोमेदोकीगणनाकौ गहै यै दोनों मेद वस्तुतः दो स्वतन्त्र व्याजस्तुति्याँ है 
किप्ती पक व्याजस्तुति के मेद नदीं । परवती संजीविनीकार ने भी यद तथ्य स्वीकार किया दै इस 
दिशा में स्वयं स्वस्वकार तथा रत्नाकरकार का मी ध्यान नदीं गयाथान तो उनक्र पूवेवत्तीं मम्मट 
मादि आचार्यो का ही । प्रवत्तं भवचार्यो मँ कुवरलयानन्दकार अप्पयदीक्षित पण्डितराज जगन्नाथ 
तथा विद्रदेश्वर से भौ यह तथ्य छुट रह गया है। जयदेव का “उक्तेव्यंजस्तुतिनिन्दास्तत्तिभ्यां 
स्ेतिनिन्दयोः"--निन्दा ओर स्वति के दवारा स्तुति ओौर निन्दा कौ उक्ति का नाम है व्याजस्तुतिः। 
यह क्ण मानकर अप्पयदीक्षित ने व्याजोक्ति के चार मेद वतलाश्हं। दोभेद तो उपयुक्त भेद 


ञ्याजस्तुत्यल्ङ्नरः ४२९५ 


ही दहैँ। दो अन्य भेद वे है जिनमें जिसकी निन्दा या स्वुत्ति कथित होती है गम्य 
स्तुति या निन्दा उसमे भिन्न कौ प्रतीत होती हे। अन्य कौ निन्दा से भन्य कौ स्तुति का उदाहरण 
उन्दने वह दिया दे-- 

अप्पयदीक्धित = "कर्त्वं वानर ! रामराजभवने लेखा्स्ंवाईको 

यातः दुत्र पुरागतः स हलमान्‌ निदग्धलङ्कापुरः । 
वद्धो रक्षससूनुनेति कपिभिः संताडितस्तजितः 
स त्री डात्तपराभवो वनभ्रगः उुत्रेति न ज्ञायते ॥ 

[ लंका मे जगद से किसी राक्षस कौ उक्ति ] भरे वनरतू कौनसा वानर ह, [ उत्तर] राम 
कै राजमवन मे डाकरिया का काम करने वाला । [ प्ररन ] वई जो एक दलुमान्‌ नामक वानर पहुके 
यहं आया था ओर र्का को जला गया था वह्‌ कं गया। [ उत्तर ] यह जानकर कि 
उते रक्षस के च्ड्केनेवधि ल्या था, उततेवानरो ने मारा पीटा ओर दुत्कारा,तो खाजके मारे 
वह जंगली वानर कां चला गया पता नदीं । 

- यहां निन्दा श्नुमान्‌जौ को को गदे है ओर स्तुति व्यक्तदहोरषी है उनते भिन्न वानरस 
की। इसी प्रकार अप्पयदोक्षितने स्तुतिसे निन्दाकी प्रतीतिका मीरेता हो उदाइरणमभी 
दियादह। | 

इन दो मेदां की कर्पना रत्नाकरकार के मरितष्क म मी आई थी, किन्तु उन्होने हन्है अति. 
छयोक्ति ओर भप्रस्वतप्रशंसा मे गतां बताया था । सत्तिशयोक्ति मेँ तव जव पयैवसित होने वारी 
निन्दा या स्ति मं अतिशय कौ विवक्षा हो यथा “इन्दुङिपत' इत्यादि उद्धत प मँ । यदि अतिशय 
की विवक्षा नदीं रहतौ तो इन मेदां का अन्तर्भाव भप्रस्तुतप्रशं्ा मे हौ होता है। यथा ूर्वादधत 
'वन्याः खलु वने बाताः' प्च मेँ । अन्त मे रत्नाकरकार ने कहा है कि ध्यस्यैव स्तुतिनिन्दे तस्यैव 
निन्दास्ततिप्रतीतो त्वतिशयविवक्षायां व्याजस्तुतिः" व्याजस्तुति वहां होती है जहाँ जि्की 
निन्दा ओर स्त॒ति कदी जाय पयवप्तान मौ उप्तौ स्तुत्तिया निन्दा ह 
अतिशय कौ विवक्षा हो । 

पण्डितर।ज--पण्डितराजने भौ ह्न दो नवीन भेदो को अमान्य ठदराति हष तक दिया है 
कि अन्य की निन्दा से अन्य मो सतति व्यक्त होने पर निन्दाका स्तुति मे पय॑वसान होने की 
वात नहीं नेग । ग्याजोक्तिमं निन्दा या स्तुतिष्् स्तुति या निन्दा मेँ परिणत होती है । अन्य 
की स्त॒त्ति या निन्दा स्तृति या निन्दा सूप ही रदी अपग । इत प्रकार यदा "याज ही उच्छनर 
हो जाश्गा । पण्डितराज का कथन दे-- 

इयं व्या जस्ततियंस्येव वस्तुनः स्तुतिनिन्दे प्रथभरमुषक्रम्येते तस्येव चेन्निन्दस्तुत्योः पयवसानं 
भवेत्‌ तदा मवति । वेयधिकरण्ये तु न + [ ¶० ५६१ ] 

इन मेदो का खण्डन करते हए पण्डितराज रत्नाकर का उर्छेव नहीं करते । पण्डितराजने 
त्वयं व्य।जस्तुति का लक्षण इस प्रकार किया है~- 

“भामुखप्रतीतान्यां निन्दास्तुतिभ्यां स्तुतिनिन्दयोः क्रमेण पर्यवसानं व्याजस्तुतिः । 
--आरम्भमे प्रतीत या निन्दा स्तुति के द्वारा पयेवस्तान मे क्रम से स्तुति य। निन्दा का बोध 
न्याजस्तुति । 
पंडितराज ने भी व्याजस्तुति मे अपराथं की प्रतीतिमेलक्ष्णाको ही कारण माना है। 
विश्वेश्वर--विदवेदवर ने मी व्याजस्तुति के रुद्रटाभिमत भेद ही माने है । अप्मयदोक्चित कै 
चार भेदो का विवेचन भौ उन्शने किथा हे भोर उनका भपनी ओर से कोई खण्डन नदीं किया 


भोर उप पर्यवसिते 


| 


४२द अलङ्ारखवंस्वम्‌ 


चिन्तु प्राचीनो की ओर से नवीन दो भेदौ को अप्रस्तुतप्रशंसा मँ गता वतलाया हे। विद्वेश्वर का 
व्याजस्तुत लक्षण इसत प्रकार दै-- 
याजस्तति्विषययपयैवसानेऽस्त तिस्तुत्योः 1 
--अस्तति [ निन्दा ] ओर स्त॒ति का उल्टा पयवसान व्याजस्तुति कदलाता हे ।' निन्दा भर 
सस्तति अभिन्न नदों कदी जा सकतीं । अस्त॒ति स्तुति का अभाव होती है। निन्दा अभावात्मक 
नदीं होकर भावात्मक होती दै। इस प्रकार तो स्तुत्तिको भी निन्दा का अभाव कहा जा 
सक्ता दहै । 
पाठान्तर = व्याजस्तुत्ति की अन्तिम पंक्ति मं डों० जानकी ने उन्मूल्ताके स्थान पर 
'उन्मीलिताः पाठ मानादहै ओर शिल के स्थान पर "विलष्ट । “उन्मीकल्िता' पाठ के अनुसार 
“निन्दा उन्मीलिताः यह अन्वय होगा ओर भथ निकलेगा--निन्दा कौ उद्धारित केर दिया गयाः 
जव कि निन्दा किं वृत्तान्तैः०ः पच मेँ वाच्य दै अतः उद्धारित ही है। दूसरा अथ निकाला जाएगा 
८उसका रहस्य खोल दिया गयाः । यह दूरगामी कल्पना होगी । वस्तुतः पण्डितराज ने इत पक्ति 
को "गमिताः तक उद्धृत विया है । उसमे “उन्मूकिताः पाठ ही है-[द्र४त्व-व्याजस्तुति प्रकरण पृ० 
५६० ] दिल्ष्ट लोर किलष्ट का विचार हम यदीं रुदरट के प्रसंग मे कर भाण हें। 
श्री विधयाचक्रवत्तीं ने अपनी संजीविनी मे व्याजस्तुति छा संग्रह कारिका द्वारा इस प्रकार 
क्षिया है- 
'्याजेन व्याजषूपा वा स्तुतिन्यांजर्तुतिद यम्‌ । 
अग्रस्त॒तप्रशंसातः स्तुतिनिन्दात्मिका भिदा ॥' 
-श्याज से स्तुत्ति भौर भ्याजरूप स्तुति ये दो व्याजस्तुति ती हँ । स्तुतिनिन्दा दने सेये 
अप्रस्तुतिप्रशसा से भिन्न दहो जाती हे ।' 
[ सवेस्व | 
गम्यत्वमेव प्रकृतं वि्तेषविषयत्वेनोररीकृत्याक्चेपाटंकार उच्यते- 
[ चु ३९ ] उक्तवक्ष्यमाणयोः प्राकरणिकयोविजञेषप्रतिपर्यर्थं 
निषेधाभ्च अक्षेषः 
इ प्राकरणिकोऽथेः प्राकरणिकत्वारेव बक्तमिष्यते तथाविधस्य विधा 
नाहस्य निषेधः कतु न युज्यते । स कृतोऽपि बाधितस्वरूपत्वानिषेघायत 
इति निपेधाभाकल्लः संपन्नः । तस्यैतस्य करणं प्रक़ृतगतत्वेन विरोषप्रतिप 
्यथेम्‌ । अन्यथा गजसखानतुद्यं स्यात्‌ । स चाभासमानोऽपि निषेधस्त- 
घ्ोक्तश्य वा स्यात्‌ आसूचिताभिधत्वेन वक्ष्यमाणस्य वा स्यादित्याक्षेपभ्य 
द्यी गत्तिः । तक्रोक्तविषयत्वेन केमथंक्यपरमाटोचनमाक्चिपः । वक्ष्यमाणः 
विषयत्वेनानयनङ्पमायूरणमक्चेपः । पवं चाथेमेद्‌ादाक्षेपदाब्दस्य दावा 
श्चेपाविति वदन्ति । तत्रोक्तविषये यस्येवेष्टस्य विरोषस्तस्येवाक्चेपः । वक्ष्य 
माणविषये त्विष्ठस्य विश्लेषः, इ्टसंबन्धिनस्त्वन्यस्थ सामान्यरूपस्य निषेधः 
तेनात्र लक्षणभेदः । विद्ेषश्य चात्र चाग्दाचुपात्तत्वाद्‌ गम्यत्वम्‌। तथोक्तः 


\/ 
॥ न्ट 


आ्चेपाटङ्कारः २.७ 


विषय आ्चेपे कचिदस्तु निषिध्यते कज दस्ठुकथनमिति दौ भेदौ । वक््यमाण- 
विषये त॒ वस्तुकथनमेव निषिध्यते । तच्च सामान्यरविह्ायां कचिद्िरोष- 
निष्ठस्वेन निषिध्यते कचित्‌ पुनरंशोक्तावंश्ान्तरगतत्वेनेत्यत्रापि द्यौ येद । 
तदेवमस्य चत्वाये मेदाः । खाब्दसाभ्यनिबन्धन सामान्यवि्लेषभावमवलस्ञ्य 
चान्न पकारिप्रकारभावप्रकस्पनम्‌ । 

गम्यता का प्रकरण चला आ रहा है ओर आक्षेप मं "विश्लेष" की गम्यता रहती है इस कारण 
ठसी को लेकर अव आक्षेप।लंकार का निरूपण करते हँ-- 

[ सूत्र ३९ | विशेषता की प्रतीति कराने के रिष उक्त [कटे जा चुके ] अथवा वचय 

माण [ के जाने वारे | प्रकरणिक के निषेध का आभास आक्तेप [ नामक अकार 

कहरूाता दे ] 

[ वृत्ति ] यदौ [ प्रत्येक वाडमय मेँ ] जो अथं प्राकरणिक होता हे प्राकरणिक होने कै कारण 
ही उसका कथन अमीष्ट होता है। रेता अथं विधानाहं होता है अतः उसका निषेध करना 
उचित नदीं होता । यदि वह [ निषेध ] किया भी जाता है तो उसका स्वरूप बाधित हो जाता 
है, अतः वद निषे जसा रहता है फलतः वह निषेधाभास बन जाता हे । इस प्रकार के इस 
[ निषेध ] का जो विधान होता है उसका उदेरय [ वक्तव्याथ ] में वैदिष्व्य [ जोर ] कना होताहै। 
रेसान दहो तो वह गजस्नान के समान [ किया न किया वरावर ] हो जाए । यह जो आमासमान 
निषेध है वहदमीयातोषरेसे अथं न्महोताहै जिसे कद चुका जाता है या फिर रेपे अथैका 
जिसके कथन की भूमिकामात्र वनी रहती दै; ओर जिसे स्पष्टरूप से अगे कहना रेष रहता 
हे, इस कारण आक्षेप मी [ उक्तविषयक ओर वक्ष्यमाणविषयक, इस प्रकार ] दो प्रकार का हो 
जाता दै। इन [ दनां ] मे [ प्रथम मे ] विषय उक्त रहतादे तो [ निषेधरूप ] आक्षेप रेसा ज्ञान 
सिद्ध होता दै जिसमे अन्ततः [ कथित अथे के विषय मे ] किमथैकता = “इस सव के कहने से क्या? 
इस अभिप्राय की प्रतीति होती है, [ ओर द्वितीय आक्षेप मे ] विषय वक्ष्यमाण रहता है तो [ यही 
निषेधरूप ] आक्षेप [ अकथित अथै को अथेबलात्‌ ] (ले आने"-रूप व्यंजन सिद्ध होता है । इस 


प्रकार आक्षेप शब्द का अथं बदल जाने से [ भामद भादि ] डु आचाय यह कहते है कि आ्षेपा- 
टकार [ अलग-अलग दो होते हे । 


इन | दोनों आक्षेपो ह मे से [ प्रथम ] उक्तविषय | नामक आक्षेप ] में उसी का आक्षेप 
[ निषेधामास | रहता हं जिसम्‌ विरोषता का प्रतिपादन अभीष्ट रहता दै जव कि [ द्वितीय ] 
वक्ष्यमाणविषय [ न।मक आक्षेप | मे विदेषता अभीष्ट अथ॑मेदहो प्रतीत होती है, किन्तु निषेध 
उस अभीष्ट अरं ते सम्बन्धित अन्य रूप का होता हं जो सामान्यात्मक रदता दहै! इस कारण इन 
दोनों मेदो मै क्षण बदल जता दै । 

विज्ञेषता यां गम्य होती है क्योकि उसके वाचक शब्द का प्रयोग नहीं रहता । उक्तविषय 
( नामक ) आक्षेप म कहीं तो निषेध रहता है स्वयं वस्तु काः ओर वीं वसतु के कथन का इस 
प्रकार उसके दो मेद हो जति दै, परन्तु कक्ष्यमाणविषय ( नामक ) अक्षेप भ केवल वर्तुकथन 
करा ह्य निष्थ रहता ६ै। उस [ कथन ] म भी यदि सामान्य का कथन रहता है तो निषेध विशेष 
का हुआ करता है जर कथन आंरिकरूप से होता है तो [ निषे] अन्य अंश॒ का [ हा करता 
है] शस प्रकार इस भेद मै भी दोभेद हो जाते दै। इस प्रकार आष्ेप फे चार भेद दोतते है । 
[ समी आक्षेपो का वाचक आक्षेप ] शब्द एक ही है इस कारण सामान्यविरेषमाव मानकर ओर 
प्रकारप्रकारिभाव [ प्रकार = विशेष; प्रकारौ = सामान्य | को कस्पनाकी हे । 


किक 


७२८ अलङ्ारसखवेस्वम्‌ 
विमरिनी 


उररीङ्थ्येति आश्चिस्य 1 तमेवाद--उक्तवक्ष्यमाणयोरित्यादि । तथाविधष्येति ववतु. 
मिष्टस्य । अत एव त्रिधानाहंस्येव्टुक््म्‌ । स इति निषेधः। वाधितस्वरू्पत्वादिति। प्राक्छ- 
रणिके विधानां तस्यासं भवात्‌ । ययेवं तद्यंसावका्यं॑पएवेव्याद्ञ याड --तव्येत्यादि । 
अन्ययेतति, विन्लेखप्रति पत्तिनं स्यात्‌ । तस्य च विष्यं दर्शंयति-स चेत्यादिना उक्तस्थेति 
वस्ठुतः कथन रूपस्य । आसूत्रिताभिधत्वेनेति सामान्य सुखेनौशोेक्ति पुखेन वा 1 अन्यथा 
हि सर्वत्र विवङिता्थंस्य निषेघमान्रादैव प्रतीतिप्रसङ्गः । कैमर्थत्येति, किमर्थमेतदिति पर्य 
ज्ुयोगरूप दस्यथंः । एवमिति । कमथंक्यपर्याखोचनानयन रूपागूरण रूपत्वात्‌ । बद्न्तीति 
ग्राच्याः। यदाह भामहः-~ 
"व च्यमाणोच्छदि पयस्तन्रारेपो द्विधा मतः । 
एकरूपतया दोषा निदिश्यन्ते यथाक्रमम्‌ ॥' इति । 
तेनास्माकमेतन्न मतमिति सावः। चचयमागविषतरे हि कथनस्यैव निषेध्यष्वातर्‌ 
कथ्यत इति केंमर्थक्यपरमारोचनमेव प्रततीयते इर्वेक एवाक्तेपरनब्द्स्याथं इति मेदा भावाद्‌ 
ह्वावाक्तेपाविति न युक्तम्‌ । तक्किमेक एव्तेपो भवन्मते युक्त इव्यालङ्कयाह- तत्रेत्यादि । 
आक्तेप इति विरेषः। कायकारणयोरमेदोप चारात। इष्टव्येति विेषात्मनः । भन्यस्पेति 
विदोषात्‌ ।. एवं निषेषविरोषयो भंदैनावस्थितेर्नात्र सामान्यङ्चगसंभवोऽस्तीति तास्प्र॑म्‌ । 
ननु सवंविदोषाणां सामान्याुप्रणितध्वदैक कापि छतो निपेधादिरपरत्रावश्यतेव पर्यव. 
स्यतीति कथमत्र निपेधवितोषयोर्भिन्नवि षयस्व मुच्छम्‌ । सत्यम्र्‌ । यथ्प्येई तथाप्यरेतन्न 
राब्दा्थम्‌ । अर्थवदोन तत्र तथार्यावगतेः! इह च श्ाठ्डमेवें तदाद पाङ्ग नाथवज्ञायातम्‌ । 
तथाप्वे हि रूपकादीनामप्युपमाव्वं स्यात्‌ । तेषामप्यार्थस्य सादृश्यस्य मावा । एतद्चोद्धट. 
विचारे राजानकतिरकेनैव सप्रपञ्चमुक्तमिति !न तथार्माभिराविष्डरतम्‌ । तनति । निषेध- 
विशेषयोरेव भिन्नविषयस्वादन्ेपशब्द स्वार्थं मेदात्‌ । यस्त्वत्र विशेषः स किं वाच्य्‌ः किमुत 
गस्य इत्याश्चङ्कयाह--विदेषसयेत्यादि । कथनमेवेतिः न पुनः साच्वाद्‌ वस्तु । तदिति कथनम्‌ । 
सामान्यप्रतिज्ञयेति । सामान्यमेवाध्रिस्येस्यथः । विदेषनिष्टत्वेनेति। सामान्यस्य रिशेषाविना. 
भावित्वात्‌ । निषिध्यत इति, अत्र, उत्तरत्र च संबन्धनीयम्‌ । अंशान्तरगतत्वनेति । सामान्य. 
पतिज्ञयेत्य दरापि संबन्धः। अत्रापि ह्यपरांशोक्तिः सामान्यञुखेतनैव निपिध्यते। विरोषस्य 
हि साक्तादत्र निषेधो न भवति । निषेधानन्तरं तसप्रतीतेभाबिनो निषधातं प्रवात्‌ । न द्यक्तो 
निपेधः शान्दासमपिंते तत्कामप्रतीयमाने च विषये संभवति । अस्पेव्यात्तपस्य । नघ 
इयोरार्ेपयोश्चत्वारो भेदाः सं मवन्तीति कथमेकश्येवोक्ता हर्याश्च ह्याह शब्देत्यादि । 
प्कसपनमिति । न पुनवंस्तुतः सद्धाव इव्यथः । 
उररोक्ध्य = लेकर = उसी को आधार बनाकर । उक्ती को कते हैँ--उक्ट-वचयमाणगयोः 
इत्यादि दवारा तथाविधध्य = ठेसा अथं = विवक्षित, वक्तव्य । इसीरिए विधानां । सः = वड = 
निषेध । बाधितस्वरूपष्वात = उसका स्वरूप वाभित रदता र इसकिए = रथात्‌ जो अर्थ प्रा्रणिक 
होता वह विधानां होता है अतः उसका समव नहीं होता इसलिए । ध्यदि यह संमव नदीं होता 
तो फिर इतका विधान दही नहीं किया जाना चादिए--इम शंका प्र उत्तर देते है--तस्य 
दत्यादि । अन्यथा = यदिरेपान हो अर्थात्‌ विशेष भधेका ज्ञान न हो। उत [ निषेध ] का 
विषय [ प्रतियोगी, जिसका निषे होता है वह विषय ] बतकति है-- स च इत्यादि के द्वारा । 
उक्तस्य = कथित का = किन्तु वस्तुतः कथनह्प का । आसूत्रिताभिधत्य=जित्तके कथन की भूमिका- 


आक्ेपालङ्कारः ४२९ 


मात्र वनी रती है। अथात्‌ या तो सामान्यात्मक रूपसे याफिर अमात्र के कथन कै 
रूप से । यदिरेसान दहो तो फिर विवक्षित अथेकौ प्रतीति सभी स्थलों मे निषेध के द्वारा दयी 
होने लगे । केमथक्य = इससे क्या' शस प्रकार ॒का अर्थात्‌ पयंलुयोगरूप । एवम्‌ = इस प्रकार 
अर्थात्‌ वैसवयपयांोचन शौर (आनयन = ठे अ{नाः-रूप जो आगूरण तद्रूप । वदन्ति = कहते 
हेः अर्थाव्‌ प्राचीन आचा । जेसा कि भामह ने कहा है-- 


“उन [ आक्षेप, मथान्तरन्यास, व्यत्तिरेक, विभावना, समासोक्ति ओर अतिरायोक्तिः-- चन छ 
अलंकारो ] मे से केवल भाक्षिप च््ष्यमाणविपय ओर उक्तविषयः इस प्रकार दो प्रकार का, गोर 
देष सव एक हो एक प्रकार कं क्रमशः बताए जार्पैगे | [ काव्यारुकार २।६६-६७ ॥8॥ 


इसका भथ यद कि हमें [ सवस्वकार का ] यह मान्य नदीं है । वस्तुतः वक्ष्यमाणविषय नामक 
साक्षेप मे मी निषेध किया जाता ह कथन का ही । अतः वों भी ज्ञान मेँ सा किसर छि [ अर्थात्‌ 
निरर्थक | इस प्रकार का बोध होता हे इसलिए [ दोनो ही मेदोमें] आक्षेप शब्द का अर्थं एकं 
ही रहता हे) इस प्रकार [ दोनों भेदो में ] मेद नदीं रहता, फलतः "आक्षेप दो ह सा कहना 
ठीक नदीं दै । तो क्या आपके मनम क्षिप एक ही प्रकार का मान्य है--इस प्रन पर 
उत्तर देते हए कहते दै तन्न इत्यादि । आ्तेप अर्थात्‌ विद्येष, कायं जर कारण में ओपचारिक 
अभेद मानकर । ६्टस्य = अभीष्ट अथं भात्‌ विशेषरूप । जन्यस्य = जन्य भिन्न अर्थात्‌ विश्च 
धात्मकं अथं से भिन्न [ सामान्य जथं]। इस प्रकार तात्पय॑ यह निकला कि निषेध ओर विशेष 
ये दोनो अल्ग-गल्ग र्ते है, इस कारण इसमे सामान्य लक्षण का होना संमव नदीं है । [ रङ्गा] 
(समी विशेष सामान्य से अनुप्राणित्त रहते इसलिए एक का निषध अपने आप अवदय ही 
अन्य का निवेध वन जाता हे, तव यहोँ निषेध गौर विदोष को अलग-अलग वैसे कहा गयाः । 
[ उत्तर ] ठीक है। यचपि दोता फसा दौ हे तयापि यद्‌ भं शब्द से नीं निकलता ! रसाः 
प्रतीत होता दे अथसगति से । प्रक्रत मे जिस आक्षेपका विचार चर रहा है वह शाब्द आक्षेप 
काही अंग हे, अ्वशाद्‌ भाया इञा नदीं है । वेसा मानने पर तो रूपकादि मी उपमादि.स्वरूप 
सिद्ध दोग । क्योकि अर्थवलात्‌ ष्र्य तो उनमें भी रदता ही ह३। यह सव इद्ध विष्वारसें 
राजानक तिल्क ने दौ विस्तारपूव॑क कद दिया है इस कारण उतने विस्तारे 
विचार नदीं किया 1 तेन = इस कारण = निषेध जौर विश्चेष दोनों कै 
आक्षेप शब्द के अथेमे मेद दौ जने के कारण । भव (जो यँ विद 
हे या गम्य रेस श्भा का उत्तर देते हे--विदोषस्य सत्यादि । कथनमेव = कथन ही, न क्ति 
स्वयं वस्तु । तत्‌= वह्‌ = कथन । सामान्यप्रतिज्ञया = सामान्य का ही आश्य लेकर [ कथन 
हने से] । विदहोघनिष्टस्येन = विशेषपरक होने से -सामन्य व्शिष से पृथक्‌ नहीं रहता 
इसिए । निधिध्यतते = निषेष किया जाता है इसका संबन्ध यदो ओर आगे भी जोढ्ना चाष । 
'अंदान्तरगतष्वेन अन्य किसी अशाका| निषेष । इसका रबन्ध 'सामान्यप्रतिक्तया = सामान्य- 
मात्रका कथन रहता है" इसे भी करना चादिए कयोनि य॒ भी अन्य अरा का निषेध सामान्य. 
रूप कै ही माध्यम से हज करता ह । सीधे-सौषे विहेष का निष नहीं होता । व्रयोकिं उसकी 
प्रतति निषेथ कै बाद होती है, तव [ वक्ष्यमाण ] भावौ का निषेष नदीं हो पाएगा \ जो निषेध कद] 
जाता ३ वह शब्दतः अकथित या प्रतीयमान विषय का नहीं हो सकता क्स्य = इसके = अक्ष 
कके । व्वार भेद दौ अष्षेपौ के होते है, तव एक ही क्षिप ३ चार भेद कैसे बतलाए जा रहे हैः 
दस दाका पर कहते दै--शञ्द्‌ त्यादि । प्रकर्ष नम्‌ = कटपना की है = भथं यद्‌ कि इसका 
वास्तविक सद्भाव नर्द है । 


हमने इसका 
भिन्नेविषयक हो जाने से 


ष रहता हे वह वाच्य होता 


७३० अलङ्कारसवेस्वम्‌ 
[ स्वस्व ] 


क्रमेण यथा- 
"वाय णाहं दुई तीण पिओ सि त्ति णस्टवावासे । 
खा मर्द त॒जञ्छ अयसो पञ धस्पक्लरं भणिमो ।।' 
प्रसीदेति ब्रूयामिदमसति कोपे न घरते 
करिष्याम्येवं नो पुनरिति भवेद्‌भ्युपगमः। 
न पे दोषोऽस्तीति व्वभिदमपि हि ज्ञास्यसि सषा 
| किमेतस्मिन्वत्तुं श्चममिति न वेदि प्रियतमे ॥ 
| "सुह विल्वस्ु थोअं जाव इमं विरुहका(थरं हिअअं । 
संटविङण भणिस्सं अहवा बोदेषु कि भणिमो । 
'उयोर्स्ना तमः पिकवचः क्रकचस्तुषारः 
क्षारे सणाट्वलखयानि छतान्तद्‌न्ताः। 
सवं दुरन्तमिदमय शिरीषस्द्वी 
सा नूनमाः किमथवा हतजदटिपितेन ॥' 


आदये उदाहरणद्वये यथाक्रमं वस्तुनिषेपेन भणितिनिषेघेन चोक्तविवय 
आक्षेपः । वत्र चोक्तस्य दूतीत्वस्य वस्तुनो निषेध्रुखेनेव वास्तवत्वादि 
विंरेषः। तथा भण्यमानस्य धरसखादश्य निषेधञ्नुखेनेव कोपोपरागनिवतनेना- 
। वश्यस्वीकायंत्वं विदोषः । उत्तरस्मिन्‌ पनख्दादस्णद्धये यथाक्रमं सामान्य- 
| इारेणे्ठस्यांदोक्तावष्यंद्यान्तरस्य स्वरूपेण च भणितिनिषेषे वक्ष्यमाणविषय 
| आक्षेपः । तत्र च वक्ष्यमाणस्तरेष्टस्य अणिस्समितिभ्रतिन्ञातस्य सातिरयो 
मस्णश्ङ्ञोपजनकत्वादिर्विंयेषः । तथा चांशोक्तावंशान्तस्स्य स्ियत इति 
प्रतिपाद्यस्यादाक्यवचनीयत्वादिविरोषः। पयं च आश्चेपे दशोर्थः तस्यैव 
निषेधः, निषेधस्यायुपपद्ययानत्वाद सत्यत्वम्‌ , विदषपतिपाद्नं चेति चतष्ठ- 
यप्ुपयुञ्यते । तेन न निषेधविधिः; न विदहितनिषरधः) किं तु निषेधेन 
विषधेसाक्चेपः । निषेधस्यासत्यत्वाद्‌ विधिपयेवसखानात्‌ । विधिना तु निषेधोऽस्य 
मरदत्वेन वक्ष्यते । ततश्च हषेचरिते--अनुरुपो देव हइत्यात्मक्तंभावना- 
| इत्यादौ, तथा श्यामीति न स्नेदसदश्चम्‌' इत्यादाबुक्तविषय आ्चेपः। 


^ याला 


क्रम से उदाहरण यथा-- 
“वाक ! नाहं दूती तस्याः त्रियोऽक्लीति नास्मद्न्यापारः 
सा भ्रियते तवायद एतद्‌ धमांक्षरं भणामः ॥' 
[ १ ]-[ दूती की नायक कै प्रति उक्ति] "वाच्क ! तुम उस [ मेरी सखी ] के प्रिय हो इस 
कि सने दूती न समञ्च बैठना, हम लोग यह काम नदी करतीं । इम तो चह मर जादगी ओर 
` उम्दारा भयश्च दोगा यहु धरम कौ बात भर कदने आई हें ।" 


आक्षेपाटङ्गारः | ४३९१ 


[ २ |-यदि कहूं किं प्रसन्न दहो जाओः तो यह जमत। नहीं, क्योकि तुम गुस्सा[ तो] हो 
नदी, “दसा पुनः न करूगाः यह कर्हू तो यह अपना दोष स्वीकार करना है, कहू कि "दोष मेरा नहीं 
हे" तो इसे ठम ठ समञ्ोगी । हे प्रियतमे ! में नदीं समञ्च पारहा कि इस विषम स्थितिमेंक्या 
कहना उचित है ।› 

सुभग विलम्बस्व स्तोकं यावदिदं विरहकातर हृदयम्‌ । 
सस्थाप्य भणिष्याम्यथवापक्राम किं भणामः ॥ 

| ३ ]--“सुभग ! थोड़ा ठहरो । अपने विरहकातर हृदय को स्थिर तक कर्हगी, या जाओ चले 
जाओ । कहं ही क्या ? 

[४ ]-- चांदनी अधियारी हो गहै, कोकिल की वूक आरा बन गेहे, ओसकी वृदं क्षार 
ओर स्ृणाल्पुंज यमकी दंतौडी प्रतीत होरहैहैः। इस प्रकार शस समयये समी दुखदायी बन 
वेढे है । रिरीषकोमल अकेली वह्‌ निरिचत ही, किन्तु आः इस सव वेकाम भाषण से क्या छाम । 

[इन चार स्थ्लेमे से ] प्रथम दो स्थलंमें क्रम से (प्रथम में) वस्तुनिषेधात्मक तथा 
[ द्वितीय मे ] कथननिषेधात्मक आक्षेप है 1 यह आक्षेप उक्तविषय आक्षेप है । इनमे से [ प्रथमम] 
दूतीत्वरूपी वस्तु कदी जा चुकी है। उसका निषेध किया गया है । उसी से उप्तम वास्तविकता 
आदि रूप विदोषता का ज्ञान ्टोतादहै। इसी प्रकार [ द्वितीय में ] प्रसन्न दहोनेकौ जो बात कही 
जा रही है उसमे "कोप [ रूपी राह ] का महण हटाकर अवदय स्वीकार किये जने योग्य होने कौ 
विशेषता विदित होती है । यद्‌ विद्ोषता निषेध केद्वारा द्यी निकल्ती हे। 

परवतीं जो दो उदा्रण है । उने क्रमशः [प्रथम में] विवक्षित अथ सामान्य रूप से कह दिया 
गया हे अतः उसका आंशिक कथन हो चुका है तदनन्तर अन्य अंश ओर स्वयं कथन का भी निषेष 
होता हे। अतः यहां वक्ष्यमाणविषय [ नामक ] आक्षेप है। इसमे ककरहुगी'-रब्द के दारा लिप्त 
वस्तु के कहने की वात कही गई है उस अभीष्ट वस्त्मे जो वैदिष्टय प्रतीत दोता है वह दै- 
अत्यधिक मात्रा मे मरणक्षंका उत्पन्न करना' । इसी प्रकार [ अन्तिम स्थल में}. प्रतिपाद्य वस्तुका 
छ अंश क दिया गया है ओर कुछ अंश जिसका प्रतिपादन "मरने वारी है इस प्रकार किया 
जाना रेष हे उसमे [ निषेध कै द्वारा ] “उसका कहा जाना संमव नहीं है आदि विद्ञेषतार्ं प्रतीत 
होती हे । 

इस प्रकार आशक्षेपर्मे ( १९) अभीष्ट अध, (२) उसी अथैका निषेध, (३) निषेध का सिद्ध 
न होना ओर (४) विशेषता का प्रतिपादन इन चार तत्वों का उपयोग होताहै। इ्सल्िनतो 
यहा निषेध का विधान होता ओौर न विदहितका निषेध ही। यहांतो निषेध से विधि का आक्षेप 
होता दै। यह इसक्एि कि निषेध असत्य होता है अतः उप्तका विधि में ही पय॑वसान हो जाता हं । 
विधि से जो निषेष प्रतीत होता है उसे तो इम इसी [ आक्षेप ] का एक मेद बतलने वाले है । 

सकि दष चरित मे आई [प्रथम उच्छ्वास मे दाधीच कौ दूती मालती द्वारा सरस्वती के प्रति 
कथित इमारे ] मालिक आपके भनुरूप है यह्‌ स्वयं की बड़ाई करना है'-[३६ ¶० नि सा० सं° ७] 
इत्यादि उक्ति में, तथा-[ तृतीय उच्छवास प दक्षरूप मेँ परिणत भैरवाचाये के राजा पुभ्यभूति के 
प्रति कथित | “जाता ह यह कहना स्नेह के अनरूप न होगा [ ¶० ११६ वही ] श्त्यादि वाक्यं में 


उक्तविषय आक्षेप हे । 
विमरिनी 


वस्तुनो निषेधधरुखेन विशेष इष्यनेन यस्येव निषेधस्तस्येव विशेष ह्युक्तं 
निवांहितम्‌ । 


४२२ अलङ्कारसवस्वम्‌ 


८दूरपवासे संहो सि सुह आल्िगणं खणे रसु । 
अहवा ला हि इमिणा गमणम्मि विंबञारेण ॥' 

इस्यन्न पुनस्क्तध्यालिङ्गनस्य निषेधो विधौ तात्पयांमावान्न निषेधाभासतामियादि- 
स्येतदुदा€रणं न वाच्य्‌ । यतोऽत् विरम्बनकारिण आर्िङ्नध्यंव निषेधेन गसमनविधि- 
सुद्े्दितः ¦ सख च विधिरलुपपद्यमानस्वाद्प्रस्थानख्तण निषेधं रुडयति । छत्र च गसन 
स्यावश्य परिदार्यव्वादिरविंशेषः प्रयोजनम्‌ । क्तण्यटिङ्गनमान्रस्यव चेष्टस्वे गमनस्य 
विधिरेव पर्यवस्थेन्न निषेध इति विवङ्ितवाक्याथविग्रखोप एव स्यात्‌) अतश्चैन््विषये 
चि हितनिषेधेऽप्याक्तेपत्वमन्यन्न निषेधोऽन्यन्न विशेषश्चेति न वाच्यस्‌ । 

'वस्तुनो निषेधमुखेन विशोषः--वस्तु के निषेध से उसकी विदेषताः इस कथन का तात्पये यह 
निकला कि 'विद्दोषता उसी मे प्रतीत होगी जिसका निषेध होगा) [ अतः सल्काररत्नाकरकार 
को उक्तविषय भाक्षेपके किए] 

“टूर प्रवासे संसुखोऽसि छमग | ाल्िगनं क्षणं कुर्‌ष्व । 
अथवा द्यल्मेतेन गमने विलम्बकारिणा ` ॥ 


-खभग ! दूर देश जाने को उद्यत ही । आभो, एकक्षण छातीपसे ल्ग लो [आङ्गन कर लो 
अथवा रहने दो । इससे जाने में विलम्ब हौ जाएगा । 
इसे उदाहरण नहीं वतलाना चादिए । क्योकि इसमे उक्त [ कह दिए गए ] आल्गिन काजो 
निषेध किया गया है उसका तात्पये [ भपने ] विधान मेँ नदीं है अतः वह निषेधाभास नदीं बन 
पाता । ठेसा सलिए दोता है कि श्स पच में [ पूवैविहित ] 'अक्गिन करोः शब्द के द्वारा विलम्ब 
कारी आंलगन का षीं [पस्चात्‌ ररहने दो इसे" इस प्रकार] निषेध कर गमनविधि का समथन किया 
गया है । यष विधि अपने आपे वाधित है [क्योकि वक्ता को अनमीष्ट है] अतः इसकी 'अप्रस्धान- 
[ गमनःमाव, गमन-निषेध ]-रूपी निषेधमें लक्षणा हो जातीदहै मौर श्स लक्षणा का प्रथोजन 
ठहरता है गमनम इस वेश्िष्टय की प्रतीति कि वह अवदयमेव परिहाय है। [ इस प्रकार निषेध 
किया गया अआलिगनरूपी अन्य अथं का ओौर विदोषता प्रतीति हृदं गमनरूपी अन्य अर्थम ]। 
[ वस्तुतः इस पाथ मेँ गमनविधि के द्वारा प्रतिपादित गमननिषेध दही अभीष्ट अथं हं ] यदि यहां 
क्षणाल्गिनमात्र भभीष्टहोता तो गमनका विधान [ वाधित न होकर विधान सरूपमें] ही अन्त 
तक प्रतीत = [ पय॑वसित ] ता, निषेध नही, ओर शस प्रकार वाक्यसे जो अधं विवक्षित 
[ = अभीष्ट ] है वही अर्थं सर्वधा द्ूट जाण्गा। ओर इसी कारण [ अलंकाररत्नाकरकार को ] 
यह भी नदीं कदना चादिए करि “उक्तविषय आक्षेप वष्ांमी होता है जहाँ विहित का निषेध होता 
हे ओर वहां भी जहाँ निषेध अन्यत्र होता है ओर विद्ेषता की प्रतीति अन्यत्र । 
विमर्ल-विमरिनी का यह अंद्य रत्नाकर की सर्व॑स्वविरोधी मान्यता्भों का उत्तर है। 
रत्नाकर मेँ श्ोभाकरमित्र ने श्ूरप्रवासे०ः पद मै उक्तविषय नामक आक्षेप का वस्तुनिषेध नामक 
मेद माना है । उनके भनुसार इस पथ मेँ क्षणाल्िगन ही वक्ता का अभीष्ट जथं दै । उसके निषेध से 
वे गमन म (आवदयकत्व मौर (अपरिष्टायेत्वः इन विक्षेषताभों की प्रतीति मानते) इस प्रकार 
श्लोभाकर के अनुसार निषेध आल्गन का होने पर भी विशेषताकी प्रतीति गमनमें होती हे । 
स्व॑स्वकार का सिद्धान्त है कि निषेध ओर विदेष दोनों पक दही वस्तु के होते दै । रत्नाकर इसका 
उव्लेखपूर्वक खण्डन करते मौर इस पाथं के आधार पर कदते है--“वं चेवमादावालिगनानिषेषेः 
प्यन्यविरोषप्रती तेः" "यस्यैव निषेधरतस्यैव विद्धेष' इत्यायसङ्गतम्‌ , गव्यापक्षत्वात्‌" ।--“उक्त पद्य कै 
अर्थम निषेध आल्गनका होरदादहै, ओर विश्लेषता गमनम प्रतीतदहोरहीहै शस कारण 


ॐ ~ _ न 


आ्चेपाटङ्ारः ७३३ 


 सवेस्वकार का | “जिसका निषेध हो विशेषता मी उसी में प्रतीत होः यह्‌ कथन असंगत है । यह 
आक्षेप के सभी भेदा को व्याप्त नदीं करता । 

सवेस्वकार ने कहा हे “विहित का निषेध नदीं होताः । रत्नाकरकार इसके भी विरोध मेँ स्पष्ट- 
रूप से कहते है--अत्राछ्गनस्य॒विदितस्यापि निषेधे ओक्षेपरुंमवाद्‌ "विहितस्य निषेधो नाक्षेपः 
इति न वाच्यम्‌, = अथात्‌ इस परय मेँ जो आङ्गिन विहित है उसी का निषेध हआ है । यहां आक्षेप 
खंभव हे तो [ सवस्वकार को ] विदित का निषेध आक्षेप नहीं होता" यह नदीं कहना चाहिए । 


विमशिनौकार इस पय मे गमन का निषेध विवक्षित [या वक्ता को अभीष्ट] मानते है भौर उसी 
मं अवरयपरिदायेत्व रूपी विरोषता की प्रतीति स्वीकार करते है । इस प्रकार उनके अनुसार यहां 
निषेध ओर विदेषता दोनों का आधार एकं ही ठदरता है । इतने पर भी वे इस पध को आक्षेप क 
उदाहरण नहीं मानते, क्योकि यहां न तो गमन का विधान ही कथित है भौर न उसका निषेध ही । 
दोनों विमरिनीकार के {अनुसार राब्दशाक्तिसे भासित न होकर अशक्ति से भासित होते है । 
गमन का विधान भासित होता है उसमे विलम्ब करने वाले आल्गिन के निषेध से व्यंजना दारा, 
ओर उस्तका निषेध भासित होता है लक्षणा द्वारा । रत्नाकरकार के अनुस्तार यदि गमन मेँ प्रतीत 
होने वारी विशेषता थी भवर्य अपरिदार्य॑ता तो विमरिनीकार के अनुसार उसके निषेध में प्रतीत 
हाने वारी विशेषता हृदं अवरय परिहा्यता । फलतः निणैयसागर संस्करणमे रत्नाकर की ही 
पक्ति के समान विमरिनी में मी जो अवरयापरिहायेत्व' छपा है वह स्वधा विपएेत है । 

वस्तुतः "दूर प्रवास्ते"० प वाच्य आक्षेप का उदाहरण न होकर व्यय आक्षेप का उदाहरण हे । 
निषेध मर विशेष दोन जो यहां शाब्द वाच्य न होकर व्यंग्य है । ब्यग्य॒ होने पर भी यह्‌ ध्वनिरूप 
त होकर गुणीभूतव्यग्यरूप है क्योकि इसमे गमन रखब्दतः कथित है। ध्वनित्व उसी व्यंग्य 
संमव ष्टोतादेजो किसीमीअंडमे वाच्यन दहो 

विमरिनीकार के मत मे एक विचित्र तथ्य यह है कि वे आक्षिप्त याग्युग्य अथमे मौ लक्षणाका 
उत्थान मानते हँ । गमन सोब्द से गमनविषि का आक्षेपहोता रै, वह वक्ता को अभीष्ट नदीं ह 
अतः उसका पयेवसान निषेधमें हो जाता है । विमर्िनीकार इस पयेवसान में कारण मानते हें 
विपरीत लक्षणा । लक्षणा तो दाब्द से कथित अतएव सुख्य या वाच्य अर्थं के वाध से उत्थान पाती 
हे, वाच्य या सुख्य अर्थं से आने वाके अर्थं के बाध से नदीं । 


विमदिनी 
प्रखारस्येति वस्तुतो न, बयामिति तस्कथनस्येव निषेधः। सामान्यद्वारेणेति । भणिष्या- 

मीति मणनसामान्यमाश्िष्वेस्यर्थः। तच्च तत्तद्‌ पराधो दीरणपरमेवेति तस्य विशोषागूरकत्वम्‌ । 
इष्टस्येति काकाचिन्यायेन योऽयम्‌ । अंश्ञोक्ताविति खव दुरन्तमिस्यादिना । अंज्ञान्तरस्येति 
त्रियते इध्यादेः। किमथवा हतजटिपतेनेति सामान्यरूपष्यव निषेधः । पएकमप्यस्य 
विभज्य स्वरूपं प्रतिपादय ति~ णवं चेत्यादिना । उपयुज्यत इति । एतच्चहुशटयमन्तरेणाक्ेप एव 
न भवतीष्यथः। तदेवाह तेनेत्यादिना । निषेधविधर्नाेप इति संबन्धः । एतदुत्तरत्रापि 
योऽयम्‌ । यडाहुः- 

"विहितस्य निषेधेन न निपेधविधौ भवेत्‌ । 

निषेधेन विधिर्न्न तनत्राक्ञेपः प्रकीतितः॥' इति । 


तच्र निषेधविधियंधा~- 
"एष छीरोदजन्मा ऊुसुदङरूपतिः सेयमाकाशगङ्गा 
ब्राह्यं शीषं तदेतत्तदिदमनिमिषं नेन्नरमग्नेरगारभ्‌ । 


२२८ अ० खर 


७३७ अल्रङ्भारसवेस्वम्‌ 


सैषा हाराहउश्रीव॑रयिततनवो नागराजास्त एते 
कद्काङं काल्ियारेरिदसपि तदरं भाषितैरो नमस्ते ॥१ 

अच्वाङमिति निषेऽस्येव विधिः ! अतश्च न तस्यासरयस्वम्‌ ! तदभावाच्च न विधिपर्य- 
वसखानमिस्यान्तेपो पयो गिन्याः सामग्या अभाव इति नायमन्रालंकारः! ख हि चतुष्टय 
दंनिधावेव मवति । विहितनिषेधस्तु यथा- | 

'ब्रह्यभ्यः शिवमस्तु वस्स विततं किचिद्‌ वयं ब्रूमहे 

हे खन्तः श्णुताच धत्त च छतो युष्मासु सेबान्जलिः । 
यद्भवा किं विनयोक्तिभिमम गिरां यद्यसित सृक्ताश्घतं 

माद्यन्ति स्वयमेव तत्ुमनसो याच्ना परं देन्यभूः ॥' 

अन्न विहितानां विनयोक्तीनां निषेध इति विहितनिषेधः ! पूर्ववच्चात्र नातेषा- 
खकारः ! निचेेन विधिश्ठु मन्थद्तेबो दातः । 

प्रसादस्य = प्रसाद का निषेध, वस्तुतः प्रसादह्ू्पी वस्तु का नहीं, अपितु उसके ब्रयाम्‌ = 

ह श्स प्रकार शब्द से कथित कथन काही निषेध किया गया है । "सामान्यद्भारेण = सामान्य 
दारा, सामान्यरूप से अर्थात्‌ (भणिष्यामि = कर्हूगी' इस प्रकार राब्द से कथित कथन स।मान्य को 
लेकर । ओर यह [ कथनसामान्य ] नायक के उन-उन मपराधों कौ ओर संकेत करने ॐ छि दयी 
हे, इसङिए वह॒ विशेषता का व्यंजक है । इष्टस्य = अभीष्ट इसक। अन्वय कौए की [ एक ] भख 
का [ दोर्नो ] गोको के समान दोनों [ अंश॒ बौर अं्ान्तर ] मँ करना चादि । अंश्ो्तौ = 
अश्चतः उक्ति = भांिक कथन, अथात्‌ “सवं दुरन्तम्‌ = सभी दुखदायी' इत्यादि के द्वारा । “अंशाः 
न्तरस्य = अन्य सरा काः भ्रियते = मर रहा हैः इत्यादि का। "किमथवा इतजस्पितेन = अथवा 
इस व्यथं भाषण प्ते क्या इस प्रकार सामान्यरूप से कथित का ही निषेध किया जा रहा है । 

इस प्रकार आक्षेप का विवेचन धल्ग-अल्ग मेदो मे कियातवमी मेदं का प्रतिपादन पुनः 
करते हए कहते है--“एवं च' इत्यादि । उपयुउयते = उपयोग दोता है = अथं यदह कि श्न चार 
मेदो के विना आक्षेप की निष्पत्ति ही नदीं हो पाती । इक्ती तथ्य को पुनः कहते दै-- तेन = अतः 
इसलिएः--इत्यादि के दारा य्ह इस प्रकार अन्वय करना चादिए--निषेधविपि आक्षेप नहीं है 
इसी प्रकार परवक्तीं वाक्य मेँ भी--वविदितनिषेथ आक्षेप नदीं हे" जेसा किं कहा गया है 
“आक्षेप न तो विदित के निषेध मेँ होता ओर ननिषेध के विधानमे, अपितु जं निषेध से विधि 
का आक्षेप योता है वँ आक्षेप माना गया हे 

इनमे से निषेव का विधान यथा- 

'य॒ह तो क्षीरसागर से उत्पन्न चन्द्रमा, यह आकारागगा; यह ब्रह्मा का सिर, यदह अभिका 
निवासगरह निनिमेष तीसरा नेत्र, य वह्‌ हाखाहर कौ नील छ्टा, शरीर को घेरे हृएये वे नाग- 
राज, यह वह काल्यिारि का कंकाल, अधिक कदने से क्या, भगवन्‌ आपको “भो नमः? । 

य॒य “अलम्‌ = अधिक कदने से क्या? इस प्रकार निषेध का ही विधान विवक्षित है। इसीलिए 
इस निषेध म असत्यता नहीं हे। असत्यता न होने से उसका पयैवसान विधि म नदीं 
होता \ इख प्रकार यद आक्षेपोपयोगी सामग्री दी नदीं है। फलतः यहां यह [ आक्षेप ] अकार 
नहीं है । वह तो चारो अंगो के रहने पर दही होता हे। 

विहित का निषेध यथा- 

त्राह्मणो का कल्याण हो । हम अत्यन्त विस्तीण वस्तु को संक्षेप मेँ कदने जारदेदहै। है 

सप्पुरुषो ! आप सव इसे सने भोर समन्य । मापकी सेवा में दमारी यह अंजलि है [ हम दाथ 


= क वा अक काकाः ााकाकाकत  । ा ा 


आक्षेपालज्ारः ७२५५ 


जोड़ते है ] । अथवा ये विनयपूणं वचन कइने से क्या 1 यदि मेरी वाणी मेँ थोडा-वडत खुमाषितरूपी 
अरत होगा तो उचेता जन स्वयं ही प्रसन्न होगे । याचना मँ तो दीनता रहती है । | 

यहां विनयौक्ति का विधान हो चुका है । तदनन्तर उनका निषेध क्रियां गया है इस कारण 
यह विहितनिषेध इञा । प्रथम उदादरण के समान यहां मी भआक्षेपालंकार नहीं है! निषेध से 
विधिक्राजो उदाहरण हो सक्ता हे वह स्वयं मन्थकारने हीदे दिया हे। 


विमरिनी 

ञघ्र च निषेधः स्वयमनुपपचमानस्वादुविश्र।म्यन्‌ स्वात्मानं विध्व्र्थं समर्षयतीति 

“पराथं स्दसमपंगसरः इव्येवं रूपरूणामूरत्वसस्य चिद्धम्‌ । यद्ुक्तमन्यत्र- 
"यन्न स्वयमविश्रान्तेः पराथ स्वसमर्पणम्‌ । 
ऊुरतेऽसो स॒ आक्तेपो निषेषध्यावभाखनात्‌ ॥ इति । 

निषेधदिधो विहितनिकेधे च पुनरसिघेयः। न पुनः “स्वसिद्धे पराक्तेप' इ्येवं 

रुक्षणामूरुत्वमन्र वाच्यम्‌ । स्ुख्याथ॑स्येव विश्रान्तेरुख्याथंबाघाचमावात्‌ । अतश्चान्यैः 
"स्वसिद्धये परात्तेपः प्रतिषेधस्य यन्न हि) 
आन्तेपस्ततन्न नेवेष्टः प्रतिषेष्षस्य भासनात्‌ ॥? 

इत्याद्ययुक्तमेवोक्स्‌ । यद्यपि ङच्णायां “स्वसिद्धये पराकेपस्य प्रागभाव 
एव प्रागुक्तस्तथाप्येतस्पत्ताश्रयेऽपि प्राच्यानामपयांरोचिताभिधानमिव्येवं परमेतदुक्तम्‌ । 
ननु च ययेवं निषेधत्यासष्यस्वाद्‌ विधिपयंबसाने; आक्ञेप उक्तस्तद्वदेव विघेनिरेषपर्य. 
वसाने को नामारुकार इत्याशङ्कबाह--विधिनेत्यादिना । अस्थेति आक्तेपस्य । शञ्द साभ्य- 
निबन्धनं सखामन्यभावमाभ्रित्य चान्न प्रकारभ्रकारेभावः कलितो न तु बास्तत्ः। विधि. 
निषेषयोनिषेधविध्यागृरकष्वादनयोः सामान्यलक्तगापोगाव्‌ ¦ ततश्चेति निवेधस्य विधि. 
पयंव सानात्‌ । 

अस्य चारुकारान्तराश्रयाद्‌ वेरहण्यं दृ शंयति-वल्भित्यादिना । 

इसमें निषेध अपने आप मे बनता नदीं है वाधित हो जाता है अतः अपने आपको विधि 
अथेमे समपितकर देता है। इत कारण यह ्टूसरे अथै के किर अपना समपैणः इस प्रकार कौ 
जो [ लक्षणलक्षणा या जदत्स्वार्था नामक ] लक्नगा होती है तन्भूलक सिद्ध द्योता दै। जैसा 
कि अन्यत्र कहा गय। है--“जदां स्वयं मँ असि रहने से व।च्याथं अपना समर्पण दूसरे अथं को 
कर देता हे उते आक्षेप कहा जाता है क्योकि उसमें निषेव का आभासमात्र होता है।” निषेष- 
विधि या वि{हितनिषेष मे आक्षेप अभिधेय होता दहै। इन स्थला मे उक्त “अपनी सिद्धि के लिए 
अन्य अथं का आशक्षेपः--दस प्रकार की [ उपादान ] लक्षणा से उसका ज्ञान नहीं होता । वहां 
[ उपादान लक्षणा मे | तो सस्य अर्थं अन्त तक बनादही रताद, अतः लक्षणा के किर अपेक्षित 
सुख्याथे बाधादि सामग्री का अभाव रहता है । इसीकिए किन्दीं अन्य आचायं ने - 

-- जहां निषेध अपनी सिद्धिके कि दूसरे अथ का आक्षेप करता है, वहां आक्षेप नहीं दोता; 
क्योकि वहां तो निषेध का भान ही होता रहता है । 

--इत्यादि अमान्य वतिं ही कहौ है । यथपि हमने [ उपादान रक्षणा नाम से केवर रक्षण 
का खण्डन करते हृए ] वाक्याथ द्वारा अपनी िद्धिके लिए दूसरे अथंका भाष्षेप हुभा करता दही 
नदीं यदह अभी-जमी कहा हे तथापि [ उपादान लक्षणा को न मानने वाके अतः हमारे हयी पक्ष के 
ही होने परमो | एक आचा्यैके मतको हमने भभी-भभी जो यह खण्डन किया है वह यह 
बतलनेके चिकि यदि प्राचीन आचाय यह [ उपादान लक्षणा का ] पक्ष भी अपना तवमभी 


छ२द्‌ अङ्कारसवेस्वम्‌ 


उनका [ विदितनिषेध ओर निवेधविधि से संमव आक्षेपालंकार के पक्षक ] प्रतिपादन प्रज्ञा 
पूणं नदीं होगा ।' 

भ्यदि रेसा है तो { यद बतलाइएट कि ] निषेध के अप्तत्य हो जाने से उसके विधि मं पयवसित 
होने प्र जसे आक्षेप बतलाया गया, वैसे दी विधि के निषेध मे पयंवसित दोने पर कोन सा अलंकार 
होगा ठेस दका कर उत्तर देते दै--“विधिनाः इत्यादि के द्वारा । अश्य--इसका आक्षेप का । 
॥ आक्षेप रान्द्‌ दोर्ना के लिए प्रयुक्त होता है । इस ॥ राब्दसाम्य के आधार पर निष्पन्न 
सामान्य भाव को ठेकर यहां प्रकारप्रकारिमाव कौ कट्पनाकी गहे, यह प्रकारप्रकारिभाव 
वास्तविक नदीं है । यह इसक्एि किं विधि मौर निषेध से [ उनसे उल्टे ] निषेध ओर विधिका 
ज्ञान होता रै, फलतः दोनो दों मे कोद सामान्य लक्षण संमव नदीं हो सकता । ततश्च--इसक्एि 
अर्थात्‌ निषेध का विधि मेँ पयंवसान होने से, 


युद [ निषेध का विधिम पर्यवसान ] अन्य अलंकारो मँ मी रहता हे अतः उनसे अन्तर 
बतलाते द-- 
[ सर्वस्व | 


केवट वाक इति इुतरामपरित्याञ्योऽस्मि, रक्षणीय इति भवद्धजपञ्ञस्मेव 
रक्षास्थानम्‌" इत्यादावाक्षेपवुद्धिने काया, बाछत्वादेरुक्तस्य निषध्यत्वेना 
विवक्षितत्वात्‌ । प्रव्युतात्र बाव्यादिः परित्यागनिषेधकत्वेन प्रतीयते । तेन 
नायमाक्षेपः । कस्तद्येयं विच्छित्तिष्रकारोऽटंकार इति चेत्‌ , भ्याघाताख्य- 
स्याटंकारस्यायं द्वितीयो भेदो वक्ष्यते । 
'तदिष्ठस्य निषेभ्यत्वमाक्षपोक्तेनिंबन्धनस्‌ । 
सौकर्यं णान्यङ्कतये न निषेधकता पुनः ॥' 
इति पिण्डाथः। 
इह ठ-- 
'साहिव्यपाथोनिधिमन्थनोत्थं कर्णा्नतं रक्षत हे कवीन्द्राः । 
यदस्य दैत्या इव दृण्ठनाय काव्यायेचौरः प्रगुणीभवन्ति ॥ 
गृह्णन्तु सवं यदि वा यथेच्छं नास्ति क्तिः कापि कवीश्वयणाम्‌ । 
रत्नैषु देषु बहुष्वम्यैरद्यापि रत्नाकर एव सिन्धुः ॥* इति । 
तथा- 
देया क्िलापटकवायमुद्रा शओीलण्डदोलस्य दरीग्रदेषु । 
वियोगिनीकण्डक पष वायुः कासग्रदस्यास्तु चिरदभिज्ञः \ 
बाणेन हत्वा खगमश्य याचा निवायेतां दक्चिणमाख्तस्य। 
इव्यथंनीयः रावराधिरयाजः श्रीलण्डपुथ्वीधरकन्द्रस्थः ॥ 
यद्वा खषा तिष्ठतु दैन्यमेतन्नेच्छन्ति वेरं मख्ता किराताः । 
केट्िप्रसङ्गे दरावराङ्गनानां ल हि स्मरर्कानिमपाकरोति ।।' इति 


आक्षेपालङ्कार ७२७ 


नाक्षेपबुद्धिः काया । विहितनिषेधो दयम्‌ । न चासावाक्चेषः। निषेध 
विधौ तस्य भावादित्युक्तत्वात्‌ । चमत्कारोऽण्य श्र निषेधहेतुक पवेति न 
तद्धावमात्रेणाक्षेपवरुद्धिः काया । 

[ माल्वराज पर आक्रमण करने जाते समय राज्यवधैनसे स्वयंको भीले जनेके किए 
हषंवधेन की उक्ति-- ] 

“केवल वालक हू" [ एसा समञ्चकर नले जा रहै] ततो ओर भी अपरित्यज्य [ साथ 
ले चलने योग्य ] हू, रक्षणीय हूं [ रेस्ा समञ्चकरन लेजारहेहों ] तव॒ भी रक्षास्थान आपक्रा 
सुजपंजर हे ।' [ --हषचरित उच्छ वास-६, नि.सा. प° १८४ ] 

इत्यादि स्थलां मे आक्षेप नहीं समञ्च ठेना चाहिए, क्योकि यहो कथित वार्त्वादि निषेध्यरूप 
से विवक्षित नदीं है । वारुत्वादि तो उल्टे, छोड जाने के निषेधक प्रतीत होते है । इसि [ यहाँ ] 
यह यगक्षेप नहीं है [ प्रदन ] तब कौन सा अलंकार दै क्योकि उक्ति तो वेचिच्र्यपुणे है १ [ उत्तर] 
आगे बतलाया जाएगा कि यह व्याघात नामक अल्कार का दूसरा मेद है। इस प्रकार सार 
यद्‌ है कि- 

[ अकार क ] आक्षेप कहने मे कारण अभीष्ट अर्थं की निषेध्यता [ वतलाना ] है, न किं अन्य 
[ अप्रस्तुत | कायै के प्रति सौकयं से अन्य [ प्रस्तुत ] कायं के प्रति [अन्य भप्रस्तुत कामें] 
निषेधकता [ वतराना ] । [आगे कहे जा रहे] इन पयाँ मे भी आक्षेप नीं समञ्च वेढठना चादहिए-- 

“हे कवीन्द्रो ! [ श्रव्यद्रयात्मक कान्यरूपी ] साहित्य-समुद्र के मन्थन से निकठे कणांम्रत 
[ इस महाकान्यरूपी श्रन्यकान्यविद्या] की रखवाली रखो क्योकि कान्या्थचौर लोग इसे 
ल्टने के चयि दैत्यो के समान समुघत रहते हँ । “अथवा एसे जितने लोगदहै वे सव [इसे] 
यथेच्छ चुराते चले [ इससे ] जो कवीदवर हँ उनकी कोर क्षति संभव नदीं है। देवतां ने 
बहत से रत्न निकाल लिए तथापि समुद्र अभी तक रत्नाकर ही है" 


इसी प्रकार- 

मल्यगिरि की गुफागृहो म चद्ानों के किवाड बन्द कर देने चादि [ जिससे ] वियोगिनिर्यो 
के किएक वना यह [ मलय ]-पवन काफी देर तक कारागृह का मजा चे । 

(मल्यगिरि के रावरपति से यह प्रार्थना करनी चादि कि श्स दक्षिणापवन कै 
[ वाहन ] खगकोबाणसे मार डारो ओर इसे इधर आने से रोक दो), 


अथवा यह फिजूल कौ [ याचनागत ] दीनता रहे, किरात लोग वायुसे वैर नहींकरना 
चाहते । केलिप्रसंग में राबराज्ञनाओं कौ स्मरग्लानि को यही वायु जो दूर करता है । 

यह तो विहितनिषरेध है। यह आक्षेप नदीं हे। क्यांक यह्‌ कहा जा चुक्रा है फ वद वहां 
होता हे । जहाँ निषेध की विधि होती है। यदहो चमत्कार मीनिषेध सेही हो रहादहै [नकि 
निषेधजनित विपि से] । इसलिए केवर आक्षेप से भिलती-जुलती स्थितिमात्र को देखकर 
[ जहां-कहीं मी ] आक्षेप नदीं समञ्च बैठना चाहिए । 


विमरिनी 


अन्न राज्य वध॑नोक्तो वा छस्व देकत्स्वम्‌ । श्रोहष॑देवोक्तो तु निदेधविव क्वा ! प्रद्युतेति । 
न केवर वाट्पाथत्रानिपेध्यसवेन विवद्वितम्‌ , यावदेतदेवान्यनिषेधकः्वेनापीष्य्थः । तेनेति, 
जाटप्वादेनिषेध्यष्वेनाविवक्तितप्वात्‌। वक्ष्यत इति, सौकर्येण कार्यविष्दधा क्रिया चे्यादिना। 


७३८ अलङ्ारसवंस्वम्‌ 


एतदेव सारार्थतया पिण्डीद्रर्यापि प्रत्तपादयति- तदिषटस्येत्यादिना । अन्यक्ुतय इति 
निचेधार्थन्‌ । अस्य च यथा विधिद्खेन प्रतीतिस्तथ! निषेधञ्चुखेनेति सोकथय॑म्‌ ¦ एवं च 
निषेधकतेवाक्लेपोक्तेनं निबन्धनमिति विहितनिषेधादावेतद्धमो न विधेय दस्णाह-श्ड 
त्वित्यादि 1 तस्ये स्याच्तेपस्य ! तद्धावमाघ्रेणेति 1 केवखेनव चमरछ।रखद्धावेनेव्यर्थः । 


यहां राञ्यवधेन की उक्ति [ वाक रक्षणीय इति ] मं बार्त्वादि उक्त है ओरश्री हषंदेव की 
उक्ति [ खुतरामपरित्याज्योऽस्मि° ] मे [ उनके ] निषेध की विवक्षा नदीं हे । 


ग्ररयुत = उकूटे = अथं यइ कि यहां बारत्वादि न केवर अविषेध्यरूप से विवक्षित ई, 
अपितुये डी अन्य के निषेधककं रूपमंमी विवक्षित हैँ। तेन इस कारण - अर्थात्‌ बारत्वादि 
के निषेध्यरूप से विवक्षित न होने के कारण। वच्यते = कहा जाएगा सौकर्येण काय॑विरुटा 
क्रिया चः इत्यादि के द्वारा इसी तथ्य को साररूप से बटोर कर प्रतिपादित करते इए 
लिखते है-"तदिष्स्यः इत्यादि करिका द्वारा । अन्यद्धतये = अर्थात्‌ निषेध के किए इसकी 
प्रतीति जसे विधिकेद्वारादहोतीहै वैसे ही निपेध केद्वारा भी यष्टी ह सोकयं। शस्त कारण 
केवल निषेधकता ही आक्षेप संज्ञा में कारण नहीं बनती, इसरिए विहितनिषधादि मेँ इस्तका चरम 
नदीं करना चाहिए-ः इस तथ्य को वताते हट लिखते है-- श तु" इत्यादि । तस्य उक्तका = 
आक्षेप का। तद्‌भावमात्रेण = उसके मावमात्र से = चमत्कार के सद्धावमात्र से [ इसकी अपेक्ष 
हमारा अर्थं अधिक अच्छाहे || 


[ स्वस्व ] 


अयं चाक्चेषो ध्वन्यमानोऽपि भवति । यथा- 
'गणिकास विधेयो न विश्वासो वद्टभ स्वया । 
किकफि न कुर्वतेऽनयेमिमा धनपरायणाः ॥' 
अच् हदि गणिकाया उक्तौ तददोषोक्किप्रस्तावे नादं गणिकेति प्रतीयते । 
न चासौ निषेध प्व । गणिकास्वेनावस्थितयेव गणिकात्वस्य निषेधात्‌ । 
सोऽयं प्रस्सठद्रपो निषेधाभासङूपो वक्त्या गणिकायाः शुद्धस्नेहनिवन्धन- 
त्वेन धनविभ्ुखत्वादौ विदरेष पयवस्यतीव्युकविषय आ्चेपध्वनिस्यम्‌ । 
न तु- 
ख वक्तमसि खाज्दाक्तो दयश्नीवाधितान्‌ गुणान्‌ । 
योऽअ्ब॒ङ्कम्भेः परिच्छेदं ज्ञातुं राक्तो महोदधेः । 
इत्याक्चेपध्वनावुदादायंम्‌ । निषेधस्येवाज गम्यमानत्वात्‌ । न निषे 
घाभासस्य । गुणानां वक्तमदाक्यत्व पवाच्र तात्पयंम्‌ । तन्निमित्तक एवात्र 
चमत्कासे न निषेधाभासदेतक इति नाक्षेपध्वनिधीरत्न काया । सवेथेष्ठ 
निषेधाभासस्य विध्युन्तुखस्याष्षेपत्वमिति स्थितम्‌ । 
यह आक्षेप ध्वन्यमान भी होता है । यथा-- 


प्रिय | तुम्है गणिका्ज पर विदवास् नदीं करना चाहिए । धनपरायण ये क्या-क्या अन 
नदीं करतीं । | 


आ्चेपाटङ्गारः ३९, 


--यह उक्ति गणिका दै। इसमे स्वयं के दोषकी वात कही जारी है अतः प्रतीत होता 
हे वि [ बोलनेवाखी गणिका यद बतलाना चाइतीरहै कि] मे गणिका नीं &ं। किन्तु यह 
निषेध ही ही ेसा नदी, क्रयाकि यहो [ गणिका ने ] गणिकात्व को गणिकात्वरूप से रखते इण 
ही उप्तका निषेध क्रिया है, अतः इस निषेध का स्वरूप बाधित दो जाता है। इसकिए यह निषेधा- 
भासरूप सिद्ध होता है ओर बोल्ने वाली जो गणिका है उसके शुद्धस्नेदमूलक धनविसुखता- 


+ 


रूपी वेरि््य मे पर्यवसित हौ जाता है। इसि यह उक्त विषय [ नामक ] आष्षेपकी 
ध्वनि हुदं । [ आनन्दवधनाचार्यं को-- ] 

हयग्रीव के पूरे गुणों को गिनने मेँ समथे वदी हो सकता है जो महोदधि कौ इयत्ता पानी 
के घडा से जान सकता हो । 


-इस पद्याथंको आक्षेपका उदाहरण नदीं बतलाना चाहिए क्योकि यदौ निषेध ही 
गम्य हे, निषेधाभास नदीं । गुणों की अवचनीयता मेदी यहाँ तात्पयंहे। उप्ी को लेकर यों 
चमत्कार हेन कि निषेधाभास को लेकर । इस कारण यहां आक्षिपध्वनि नदीं समञ्चनी चादिए । 
इस प्रकार तय यह रहा कि 'विधानोन्सुख इष्टनिषेधाभास् ही सवधा आक्षेपरूप सिद्ध 
होता टे । | 

[ पण्डितराजने इस पद्य में ्वनिकार का समन ओर सव॑स्वकार का नामोस्लेखपूवक खण्डन 
किया हे । उनका कहना हे कि निषेध का आभास ही आक्षेप नीं है। श्सलिणए इस पद मे निषेध- 
मात्र मी आक्षेप हो सकता है। इसके अतिरिक्त उन्दने ध्वनिकार के आप्तत्वं कीमभी दुहाई 
देकर सवेस्वकार का खण्डन करना चाहाहै [द्र० रसगंगाधर आक्षेप प्रकरण ] वस्तुतः स्वयं 
ध्वनिकार ने आक्षेप का वही लक्षण स्वीकार कियादहैजो भामह ओर उद्धर ने प्रस्तुत कियाद 
धविरोषणाभिषानेच्छया प्रतिषेधः आक्षेपः [ “उद्योत० १ ] फलतः उन्हे निषेव कौ आभासात्मकता 
ही मान्यदहै। इस कारण पण्डितराज का सर्वस्वकार पर आक्रोश व्यक्त करना शद्धामात्र है 
ध्वनिकार्‌ कै प्रति । 


विमरिनी 


प्रतीयत इति गम्यते, नाहं गणिकेति निषेघस्य शब्दानुपात्तध्वाद्‌ विशेषमान्न्य 
गम्यस्वे आकेपारुकारो वाच्य एव, निषेधामासस्यापि गम्यस्वे ध्वन्य इत्यनेन दरि. 
तम्‌ । ऽन्यथा ह्यस्य ध्वन्यमानोदाहरणत्वमयुक्तं श्याद्‌ । तस्येहानु पक्नान्तस्वात्‌ । इर्थं 
नच निवेधाभासस्यव गम्यस्वेऽयं ध्वन्यमानो भवति न निषेघमात्रस्यैवेति दचंयितुमाह- 
नत्वित्यादि । नतश्च ध्वनिता यदेतदान्ेपध्वनाबुद्‌ाहतं तदु युक्छमेवेति भावः 1 एवं चास्य 


यथोपपादित स्वरूपञुपसंहार भङ्गयापि प्रतिपादयति - सर्वथेत्यादिना । सवथेस्यनेन कत्रा 


प्यस्य व्यभिचारो नास्तीति द्वित्‌ । एतदु पसंहरन्नन्यद्वतारय ति-- एवमित्यादिना । 


प्रतीयते = प्रतीत होता है = गभ्य = व्यंग्य दता है क्योकि भ्न गणिका नहीं हू यदह निषेध 
शब्दतः कथित नदीं है । एेसा कहकर अन्धकार ने यह सिद्धान्त बतलाया करि 'विक्ेषमात्र के 
गम्य होने पर आक्षेपाटंकार वाच्य होतादहै भौर विशेष फे साथ-साथ निषेधाभास भी गम्य 
हो तो [ गम्य ओर प्रधानरूप से गम्य अर्थात्‌ ] ध्वन्य। यदि रेसा सिद्धान्त न निकाला जाय तो 
इस [ आक्षेप | की ध्वन्यमानता का उदाहरण देना ही टीक नहीं होगा क्योकि [ वाच्यालंकासें के 
ङिएिरचेजारहे ] ईसग्रथ में ध्वन्यमानता काको प्रसग नहीं है। इसी प्रकार यह्‌ बताने 


७७० अल्छङ्कारसवेस्वम्‌ 


के किए कि यह [ आक्षेप ] वीं गम्य दोता दे जहो निषेधाभास्दही व्यंग्य हो, केवल निषेध 
न्दी" छिखते है-न तु इत्यादि । इसका माव यह हुमा कि अन्धकार यह कहना चाहतेहें 
कि उक्त कारणो से ध्वनिकारने [ स वक्ठु] इस पद्यको जो आक्षेपध्वनि का उदाहरण माना 
वह अमान्य दी है । इस प्रकार इस आक्षेप काअभी तकनजो [ एक] मेद प्रतिपादित किया 
उसका उपसंहार करते हए भी अपना उक्त सिद्धान्त बतला देते हैः 'सर्वथाः इत्यादि लिखकर । 
सवथा ककर यह दिखलाया कि श्स सिद्धान्त या लक्षण का व्यभिचार कीं नदीं होता । 


अव इस् भेदके विवेचन का उपसंहार कृरते है ओर अन्य मेद का उपक्रम करते हुए 
कते है-- 


[ सवस्व | 
पएवमिष्टनिषेधेनाक्चेपमुक्त्वा समानन्यायत्वादनिष्टविधिनाक्षेपमाद-- 
| स्‌० ४० ] अनिष्टविध्यामासथ। 
यथेष्रस्येषटत्वादेव निषेधो ऽच॒पपन्न पवमनिष्ठस्याप्यरिषएटः्वादेव विधानं 
नो पपद्यते । तत्‌ क्रियमाणं प्रस्लटद्रपत्वान्निषेधे पयंवस्यति । ततश्च विधि 
रुपकरणी भूतो निषेषे, इति विधिनायं निषेधोऽनिषएटविरोषपयवक्तायी निषेधा 
गूरणादक्षिपः। यथा- 
'गच्छ गच्छसि चेत्‌ कान्त पन्थानः सन्तु ते शिवा । 
ममापि जन्म तन्नैव भूयाद्‌ य्न गतो भवान्‌ ॥ 
अन्न कयाचित्‌ कान्तस्य प्रस्थानमत्मनो ऽनिष्टमप्यनियाकरणसमुखेन 
विधौयते । न चास्य विधियुंक्तः। अनिष्टत्वात्‌ । सोऽयं प्रस्लठद्रपत्वेन 
निषेधमागुरयति । फट चात्रानिष्ठस्य परस्थानस्यासंविज्ञानपदनिवन्धन- 
मत्यन्तपरिहायत्वप्रतिपादनम्‌ । इदं च ममापि जन्म तन्रेवेत्याशीःप्रति- 
पादनेनानिष्टपयवसायिना व्यज्जितम्‌ । यथा वा-- 
(नो किचित्‌ कथनीयमस्ति भग पोढाः परं त्वादराः 
पन्थानः कुशला भवन्तु भवतः को मादशामाग्रहः । 
कि त्वेतत्‌ कथयामि संततर्तङ्कान्तिच्खदस्तास्त्वया 
स्मतेव्याः शिशिरः सदं ल ख्चयो गोदावरीवीचयः । 
अन्नानभिप्रेतमपि कान्तप्रस्थानं यदा प्रमुख पवाभ्यु पगम्यमानं प्रती 
यते, तदायमनिषटटविधिरामासमानमाक्षेपाङ्गम्‌ । स्मतन्या इत्यनेन गमन 
निच्र्तिरेवोपोद्लिता । तस्मादयमपि भ्रकार आक्षेपस्य समानन्यायतया- 
भिनवत्वेनोक्तः । 
इस प्रकार इष्ट के निषेध के द्वारा निष्पन्न आक्षेप का निषेचन किया अव उसी प्रकार अनिष्ट 
की विधि से निष्पन्न आक्षेप का निर्वचन करते हँ- 
[ सू० ४० | तथा अनमीष्ट [ अभ्राकरणिक | के विधान का जमास [मी] । 


| 


आध्चेपालङ्ारः ७७१ 


[ वृ० ] जिस प्रकार इष्ट पदां के इष्टहोने से ही उस्का निषेध नदीं बनता इसी प्रकार 
अनमीष्ट पदाथ के अनमीष्ट होने से ही उप्तका विधान भी नहीं बन पाता। वह यदि किया जाता 
है तो बाधित होकर निषेध में परिणत हो जातादहे। 

फलतः यहां विधि-निषेध का साधन [ ज्ञापकहेतु ] है) इस प्रकार क्योकिं निषेधका ज्ञान 
विधि से होता है अतः इस [निषेध] का फल होता है अनमीष्ट पदाथ में वेरिष्टय का क्ञान कराना । 
[ इस प्रकार क्योकि इस भेद मेँ ] निषेध को ऊपर से लाया जाता है [ जिते प्रथमदो भेदो के 
निर्वचन मँ आनयनरूप आगूरण कदा गया है ] फलतः [यह] आक्षेप कदलाता है [ ओर शसीडिणए 
यह केवल वक्ष्यमाणविषय तथा आगूरणात्मक ही होता है ] । उदाहरण यथा-- 

कान्त ! यदिजाही रहेदहो तो जाओ। ठम्हारे पथ मंगल्मयदहौँ। मेरा भी जन्म वहीं 
हो जाए जहो आप पहुचे हए दों । 

यहां किस नायिका दारा अपने भ्रियके प्रस्थानकाजो उसे अभीष्ट नहींहै, निराक्रणन 
कर विधान किया जा रहा है। किन्तु उसका विधान संभव नीं है, क्योकि वह्‌ अनमीष्ट दे । ठेसा 
यह विधान बाधित दो जावा है भौर [ लक्षणा द्वारा ] निषेध का ज्ञान केराता है। इस [ लक्षणा | 
का फल [ प्रयोजन ] है यहां इस भनभीष्ट प्रस्थान की असंविज्ञान-[ अनभिधायक तथा वक्ता कौ 
विवशता ओर तन्मूलक तटस्थता के द्योतक ]-पद [ चेत्‌ = यदि] के प्रयोग से प्रतीत अत्यन्त 
अपरिहार्या का ज्ञापन । यह्‌ [ फल ] व्यंजनादृ्नि से प्रतीत दोता है जिसमें [ उपयुक्त तटस्थता 
द्योतक असविज्ञान पदप्रयोग के अतिरिक्त ] अमंगल [ ग्रत्यु | रूपी अथ॑ देने वाली भेरा मी जन्म 
वहीं हो जाएः इत्यादि इच्छा [ मी षएक ] कारण हे। 

एक उदाहरण ओर- 

ुछछ कहना नदीं है सुमग ! त॒म जेते तो स्वयं ही काफी समञ्चदार होते देँ । [ तुम्हारे ] पथ 
मंगलमय दो । त॒मते सञ्च जेसी का आग्रह ही क्या हदो सकता है १तवब भी इतना कहती हू कि तुम 
गोदावरी की वे निरन्तर सुरत से उत्पन्न थकावट हटाने वाली, पर्याप्त शोतल ओर हदंस-सचार से 
सन्दर तरंगे याद करते रहना ।' 

यहां आरम्भमें ही सही किन्तु जब श्रिय का प्रस्थान अनभीष्ट होने पर भी स्वीकार किया 
जा रहा प्रतीत होता है तव तक तो यह अनमीष्ट विधान ठरता है, किन्तु बवादमें कारण [अग 
बन जाताहै भआक्षेपका, क्योकि [ तव यह वास्तविक न ठहर कर ] अभासात्मक ठहरता है । 
[ एेसा इसक्णिमी कि यहाँ ] (स्मतव्याः = याद किया करना" इस कथन के द्वारा गमननिचृत्ति 
परहीवल दिया गयादहै। इसी कारण [ अभिन्यक्ति के] इस्त प्रकार को मी स्थितिसाम्य के 
धार पर आक्षेप का एक नया प्रकार बताया है । 

विमरिनी 

सम।नन्यायत्वादिति। यथात्रष्टस्य निषेषो बाधितष्वाद्‌ विधौ पर्यवस्यति तथेवेहाप्यनि- 
टस्य विधिनिषेधे इत्येवंरूपात्‌ । एवसेतावन्माप्रमस्याद्यस्य चाक्तेपस्य साजाध्यम्‌ , न पुनः 
सामान्यलक्तणसं मव इति भावः । तदेवाह --अनिष्ेत्यादि । एतदेव र्टान्तद्वारकं व्याचष्टे - 
यथेत्यादिना, । तदिति विधानम्‌ । भरस्खढ्दरुपष्वादिति स्वा्थंबाघात्‌ । पयवस्यतौति । 
स्वाटमसमपणेन निषेधं छष्यतीत्यथः। ततश्च॑ति । विधेर्निषेषलन्तणात्‌ । उपकरणीमूत इति । 
स्वाथबाघादुपसजेनीभूत इस्यथः । छ निष्टविशेषेति, अनेन प्रयोज नमन्रोक्तम्‌ । अन्यथा हि 
गजखानवुर्यष्वं स्यात्‌ । निषेधागूरणाडिति निषेधस्यान्र रचयमाणष्वात्‌ । सर्वत्रैव हि 
छन्तणायां खाणिकेनेव रदयोऽथं भागुयंते । तस्मात्तप्रतिपत्तः। 


७७२ अचरङ्कारसवेस्वम्‌ 


समानन्यायसव्वाव- उसी प्रकार अर्थात्‌ जितस प्रकार भभीष्ट पदाथे का निषेध वापित होकर 
विधि में पर्यवसित होता है उसी प्रकार इसमभेद मे भी अनभीषश्ट की विधि निषेध में पर्यवसित 
होती है। भाव यद कि इस ओर इसके पूवं प्रतिपादित आक्षेप में इतनी सजातीयता भर है, इनमें 
कोद सामान्यं लक्षण संभव नदीं ह । उप्ती को [ सूत्र के दारा ] कहते है-अनिष्ट इत्यादि । इसी को 
शन्त के द्वारा स्पष्ट करते दँ--यथा?-इत्यादि के द्वारा । तत्‌-वह अर्थात्‌ विधान । प्रस्ख्दूरूप- 
स्वात्‌ । अर्थात्‌ स्वाथ का वाध हो जाने से पयंवस्यति = पय॑वसित होता है अर्थात्‌ अपना समर्पण 
करॐ निषेध को लक्षणा वारा बतलाया है । ततश्च = इस्त कारण = विधिसे निषेध की लक्षणा दारा 
प्रतीत होते के कारण । उपकरणीभरतः = उपकरण = हेतु वना हज अर्थात्‌ स्वार्थंकावाधदहो जानि 
से अप्रधान वना हसा । अनिष्ट विशेष = इसके दवारा लक्षणा का प्रयोजन वतलया गया । अन्यथा 
गजस्नान के समान लक्षणाका होनान होना बरावर हो जाता [ हाथी नहाने के वाद अपने 
ऊपर भूल उछाल ठेता है भतः उसका नहाना न नहाना वरावर हदो जाता है ] निषेधागूरणात्‌ = 
निषेध को लक्षणा के द्वारा छाया जाता है। लक्षणा में सवत्र लाक्षणिक शब्दके द्वारा ही लक्ष्य अथं 
लाया जाता है क्योकि उस [ लक्ष्य | की प्रतीति उसी [ लाक्षणिक ] से दौती है। 


विमक्न॑-अल्काररत्नाकरकारने आक्षेपके इसमेद को विध्याभास्त नामदियाहै ओर 
सवस्वकार के खण्डनमे किखा दै-- 

[ सू ] अनिष्टविधानं विध्यामासतः, [ वृ० ] ०००० । न चाय॒माक्षेपस्य भेद इति वाच्यम्‌ 
आक्षेपपदाथस्य परयेनुयोगस्याभावात्‌ । विधिना निषेधस्योपादानरूपादावाक्षेपत्वे कथ्यमाने व्याज. 
स्तुत्यादावपि आक्षेपमेदत्वप्रसङ्गः, तत्रापि निन्दादिना स्तुत्याचाक्षेपस्ंभवात्‌ । ००० । तेनाल- 
ङ्कूरान्तरमेव । “आकषिप्यतेऽत्र विधिना न यतो निषेधः स्वार्थं विधावपि न पय॑नुयोगवुद्धिः । 


तस्मादनिष्टविधिरेष विलक्षणत्वान्नाक्षेपमध्यपतितोऽपि तु भिन्न एव ॥ इति सग्रहः । 


--अनमीष्ट का विधान विध्यामास [ ककाता हे ] ००० । यह्‌ आक्षेपका [ही एक] मेद 
दे एेसा नदीं कहना चादिए क्योकि यहां आक्षेप शाब्द का जो अथं है--पयनुयोग [ इसते क्या 
लाम, किम्थकता रूप वह नहीं है । यदि विधिसे निषेध के उपादान आदि को आक्षेप सन्ना 
दी जाए तो व्याजस्तुति आदिभी आक्षेपके ही मेद कहै जाने लगने वर्योकिं उननै भौ निन्दा 
आदि के द्वारा स्तुति आदि का भाक्षेप [ उपादान ] होता है । ००००० । इसि यह एक भिन्न ही 
अलंकार हे । संक्षेप मे स [ अनिष्टविधानरूपी विध्यामास नामक अल्कार ] मँनतोविधिसे 
निषेव का आक्षेप होता जौर न विधिम हय स्वार्थं के प्रति प्नुयोग [ फिम्कता ] की बुद्धि होती । 


भ अनमीष्ट का यह विधान विलक्षण होने से आक्षेप मे अन्तभूत नदीं होता । यह्‌ सवधा 


विमर्विनीकार इस खण्डन का खण्डन करते ओर कहते है-- 


विमरिनी 


तच्च॑थान्तरागूरणं (स्वसिद्धये पराक्षेपः, इर्येव रन्षणाप्रकारस्य पूवं निरस्तश्वात्‌ स्वा- 
प्मसमपगेनेव भवतीति यथोक्तमेव युक्तम्‌ । अत एवाश्यान्वथामिधसवम्‌ । पय॑लुयोग- 
वशाद्गूरणमपि द्याहेपज्ञब्दस्यार्थः । भ्याजस्तुच्यादौ तु भ्याजेन स्तुतेर्विवदितसवाव्‌ तत्र 
तश्वमेव युक्तं नापे्तस्वभ्‌ । "इह हि प्रधानेन व्यपदेशा अवन्तिः इति न्यायाद्‌ यदेव यत्र 


अआश्चेपाठ्ङ्ारः ` ७७३ 


्रघानतया विवचयते तदेव तन्न ष्यपदेश्चनिमित्तम्‌ ! न तु प्र्ताति्णयवतां "प्राज्ञा वस्तुनि 
युध्यन्तिनतु सामयिके ध्वनौ इति नीष्या नान्नि विवादो युक्ः। तस्माच 
४खादिष्यतेऽन्न विधिना न यतो निषेधः स्वार्थो विधावपि न पयनुयोगचुद्धिः ! 
तर्मादनिश्टविषिरेष विरुक्तणस्दा्नाक्तेपमध्यपतितोऽपि तु भिन्न एच ॥ 
इव्यादि न वाच्यस्‌ 1 अनिराकरणसुखेनेति । प्रबृत्तक्रियश्वात्‌ कान्तस्यानुमोदनाव्‌ } 
ननु विधिस्युखेनास्य किमागूरण स्वयं निषेध एव 'क्रियतामि'याश्ङ्कयाह-फरमित्यादि ॥ 
एतच्चेति विपेनिवेधागूरकत्वम्‌ । यथा वेस्यनेनास्य रुचये भराय दितम्‌ । भयुख 
एवेति । न पुनः पर्यवस्ान इध्यर्थः। एतदेवो पसंहरति-तस्मादित्यादिना । भमिनवश्वेनेति 
दण्डथाद्पेद्तया । तेन ह्यसौ व 
'इव्याज्ञी वं चना्षेपो यदाङीवांद वत्मना । 
स्वावश्थां सूचयन्व्येवं प्रिययाच्रा निषिध्यते ॥° 
इस्य॒क्तेरसंभवतापि कक्षणेन करुक्तितः। न पुन््रन्थङ्दु पन्षवेने तव्यास्येयम्‌ । ‹“विधि- 
निषेधाभ्यां प्रतिषेधविध्युक्तिराक्तेपः” इ तीदगेव हि श्रौ भोजदेवेनाप्यस्य खत्तणं कृतम्‌ । 
जओौर जो यह अन्य अथैका लक्षणा द्वारा लाया जाना है यह वाक्याथ के समपेणके [ अर्थात्‌ 
लक्षणलक्षणा के ] द्वारा ही संमवहोतादहै, न कि अपनी सिद्धिके किष दूसरे के आक्षेप [ अथात्‌ 
उपादानलक्षणा ] के दारा, क्योकि लक्षणा के इस [ उपादान नामक ] मेद का निराकरण किया जां 
चुका है, अतः [ सवंस्वकार ने ] नो का है वही ठीक है इसीलिए [ अलंकार का आक्षेप यह ] नाम 
भी सार्थक उहरता है क्योकि आक्षेप शब्द का अथं [पुवोक्त] पर्यनुयोग के कारण आगूरण [अन्य अथैका 


रक्षणा द्वारा छाया जाना ] भी हे । व्याजस्तुति आदि में व्याजे स्तुति का किया जाना अभीष्ट 
रहता हे भतः उसमें मी तद्रुपता [ लक्षणलक्षणाजन्य टेक्य ] ही मानना टीक है [ भिन्न रहकर अन्य 


अथ कौ | अपेक्षा करना नहीं । जहां तक नाम का सम्बन्ध है वह जहां जो मेद प्रधान होता है ह 
के नाम पर पड़ताहे। कहामभी जातादहै भनाम प्रधानका लिया जाता रैः सच यहदहैकि 


समल्ल के धनी लोर्गो को नाम पर विवाद नदीं करना चादिए, जैसा कि कहा जाता है--प्पराज्ञ जन 
पदाथं पर ल्डते हँ [ समय = शाख, सामयिक = ] शाख्रीय [ ध्वनि ] राब्द [ नाम ] पर नहीं । 
इसङ्एि [ पूरवाक्त ] “आश्षिप्यतेः इत्यादि कहना ठीक नहीं हे । 

अनिराकरणसुखेन = निराकरण न कर अथात्‌ कान्त जा हयी रहा था अतः उसका अनुमोदन 
कर । प्रस्खर्द्‌रूपस्वेन ~ स्वाथे के वाधित हो जनेसे। आगूरयति = दूसरे अंको राता है 
अथात्‌ अपने अथेका उते समपंण [ सवधा त्याग ] कर । [ दंका ] इस प्रकार विधान के दारां 
निषेध का आगूरण क्यो, स्वयं निषेध ही कर दिया जाना चादिए- टेसी जरंका कर कहते है = 
फरुस््‌ हत्यादि । एतच्च = विधान मं निषेधका जो आग्रकत्व है वह यथावा इस उदाहरणा- 
न्तर के दारा यह वतलायाकरि यह द्ितीय मेद भी काव्यो मे खूव भिलता है । प्रभु एब = 
आरम्भ में ही अथात्‌ अन्तमं नदीं। अवदइस भेदका उपसंहार करते है- तस्मात्‌० इत्यादि के 
दवारा । अभिनवध्वेन = नवीन प्रकार अर्थात्‌ दण्डी आदिके मतमें। दण्डीने [ काव्याददचें 
२।१४१ पद्य के रूप में गच्छ गच्छस्ि० पथ्य देकर ] इस आक्षेप का- यह आक्षेप आ्ीवेचनाक्षेप 
हे वरयोकि इमं आशीवाद के माध्यम से अपनी अवस्था की सूचना दे रही प्रिया द्वारा भिययात्रा 
का निषेध कियाजारहा दैः [ कान्यादशे २।१४२ ] इस प्रकार लक्षण बनायाथा जो वस्तुतः 
संमव नहीं है । इस [ अभिनवत्व ] की व्याख्या यह नहीं करनी चाहिए कि इस आक्षेप को पहले. 
पहर अन्धकार [ सवेस्वकार ] ने ही प्रस्तुत किया है। ठीक रेसा ही लक्षण मोजदेव ने भी विधि 
या निषेषसे निषैधया विधि की उक्ति आक्षेप--इस प्रकार बनाया दहै। [ भोज की मूलकारिका 
इस प्रकार है- 


७७७ अठङ्कारसवेस्वम्‌ 


'विधिनाथ निषेधेन प्रतिषेधोक्तिरत्र या । 
रुद्धा मिश्रा च साक्षेपः ॥ सरस्वतीकण्ठाभरण, ४।६४ ॥ 


इसमे विधि ओर निषेध दोर्नोसे केवर निषेध की उक्तिको आक्षेप का गया दहै, विधि 
की उक्ति को नदीं। भोज ने भी उदादरण के रूप मं गच्छ०' पद्यदियाहे। |] 
विमज्ञ-इतिहास-[ १] प्रथभ आगक्षेपांकार एक स्पष्ट अलंकार है। इसका स्वरूप 
भामह- पहठे-पदर भामह ने ही स्पष्ट कर दिया है । उनका आक्षेप लक्षण इस प्रकार है- 
"प्रतिषेध इवेष्टस्य यो विशशेषाभिधित््या । 
आक्षेप इति त सन्तः रंसन्ति दविविधम्‌०० ॥ २।६८ 


-वेरिष्टयग्रतिपादन कै लिए अभीष्टपदा्थका जो निषेध जैसा फिया जाता है उसे विद्वज्जन 
आक्षेप कहते हैँ । वह दो प्रकारकाहोताहै। भामहनेष्नदोर्नो प्रकारोंके जोनाम दिएये 
परवतो आचार्यं उन्दँ ही दुहराते गरदहैं। ये नामरहँ वक्ष्यमाणविषय तथा उक्तविषय । इन पर 
मामह की कारिका विमरिनीकारने इस अलंकार के. विवेचनके आरम्भमेंदही उद्धृत कर दी 
है- षवक्ष्यमणोक्तविषयस्तव्राक्षेपो द्विधा मतः । २।६७। 

दण्डी-दण्डी ने आक्षेप को प्रतिषेधोक्ति कदा है- 

(प्रतिषेधोक्तिरक्षेपः । २।१२० । 

प्रतिषेधोक्ति का अथं उनके उदादर्णो ते ¶किसीमी वस्तु का निषेध-कथनः निकलता है। 
हस निषेधषकान तो आभासात्मक दही होना आवदयकदै ओरन निषेध्य वस्तु मे विदोषताका 
ज्ञान । यह तथ्य निम्नङिखित एक उदाहरण से स्ट हदो जाता है- 

“कुतः कुवलयं कणं करोषि कृकमाषिणि | 
किमपाङ्गमप्यांप्तमसिमिन्‌ कमणि मन्यते ॥ २।१.२ ॥ 

कलमाषिणि } कानमे नीकुकमल [का कणैपूर ] क्यो पहन रहीदहोए क्या अपने अपाङ्ग 
[नेत्र ] को इस्त कायं मेँ अपर्याप्त मानती हो।' इस पर स्पष्टीकरण देते हुए दण्डी ने स्वयं छिखा- 

स वतंमानाक्षेपोऽयं कुरवत्येवास्सित)त्पलम्‌ । 
करणे काचित्‌ प्रियेणेवं चाटुकारेण रुष्यते ॥ २।२४। 

इसमे, कान में नीलोत्यल पहन रही कोर उस्तके चाटुकार प्रिय के दारा रोकी जा रही 
हे, अतः यह आक्षेप है। 

स्पष्ट दहै किस आक्षेपे नतो निषेध आमास्तात्मक है भौर निषेध्य नीलोत्पल म ही कोई 
विशेषता काज्ञान क्ता हां नीलोत्पल की अपेक्षा ख॒न्दरीके नेत्रां मेँ अवदय विद्दोषता प्रतीत 
दती हि। 

भामह मे आक्षिप्य कौ कालजनित विदेषतार्देदो ही शीं, वक्ष्यमाणविषय मेँ भविष्यदूविषय- 
कता ओर उक्तविषय मँ मूतपिषयकता दण्डी ने श्न दोनों के अतिरिक्त वत्त॑मानविषयता को भी 
पताकार्‌ किया हे । इसका उदाहरण ऊपर दिया पच ही दिया है । उकम पहने जारहै नीलोत्पल 
का निषेष है, जतः उसे व्तम।नाक्षेप कहा हे । 

दण्डने इस प्रकार के चौवीसत आक्षेप गिनार है भौर श्सक्षी संख्या आक्षिप्य व्व 
ऋ संख्या पर निर्भर व्तलाकर अनन्त वता दी है । मन्तु जो चौवीश्त उदाहरण दिए है उनमें 


टसा एक मी उदाहरण नही है जिसे मामदोक्त आक्षेप के समान किसी कदी हरं अथवा कदने 
के छिए उपक्रान्त वस्तु को न कहने की मंगिमा भई हो । 


आक्चेपाटङ्ारः ७४५५ 


इस प्रकार दण्डी का आक्षेप केवर निषधोक्तिमात्र है। फरूतः-इसका अन्त्माव प्रतीप, व्यति- 
रेक आदि अन्य अलुकार्योमेंहो जातादहे। 

वामन-वामनने आक्षेप को उपमानोपमैयभाव तक सीभितरखादहै। उन्न श्सकेमी 
दो भेद किट देँ टक उपमान की निरथेकता से जनित प्रतिषेधरूप आक्षेप ओर दूसरा 
उपमान की आर्थी प्रतीति से जनित आक्षेप । इनमेंसे प्रथम मेद मे आक्षेप शब्द का भर्थं 
होगा अधिक्षेप । यह तथ्य दिये उदाहरण से स्पष्ट है । उदाहरण है-- 

'तस्यारचेन्मुखमस्ति सौम्यसुभगं किं पाव॑णेनेन्दुनाः । 

--यदि उस सन्दरी का सोम्य खुमग सुख है तो फिर पृणिमाके चन्द्रसे क्या! 

दूसरे का उदाहरण समासोक्ति मे सवंस्वकार दरा उद्धत “न्द्रं धलुः"० पद है। इसमें 
शरद्‌ ऋतु, चन्द्रमा ओर रवि के उपमान क्रमशः वेदया, नायक तथा प्रतिनायक का ज्ञान ऊपर 
सेहदोतादै। 

स्पष्ट ही वामन का प्रथम आक्षेप प्रतीपमें तथा द्वितीय समासोक्तिमें अन्तभूंत हो जाता 
हे । यहां यह ध्यानदेनेयोग्य तथ्यदहै कि दण्डी का उपर्युक्त वन्त॑मानाक्षेप तथा वामन का 
उपमानाधिक्षेपरूप प्रथम आक्षेप सवथा अभिन्न हैँ । ददितीय आक्षेप मे मी बहुचचित ागूरण की 
स्थित्ति है ययपि यहां आगूरण का विमरिनीकाराभिमत लक्षणारूपी अथं नहीं दो सकता । 

वामन का मूलभूत सूत्र है-- उपमानाक्षेपश्वाक्षेपः । उन्दी की वृत्ति मे इसके अथ॑है-- 
( १ ) उपमानस्याक्षेपः प्रतिषेधः । तुल्यकायाथ॑स्य नेरथैक्य विवक्षायामाक्षेपः । ८ २ ) उपमानस्या- 
क्षेपः, आक्षेपः प्रतिपत्तिरित्यपि सूत्राधैः। 

उद्धट-- उद्धर ने आक्षेप का पूरा लक्षण भामहसे ठेलिया है। उन्होनेमेद भी भामहके 
शब्दों मे ही प्रस्तुत किणदहै- 

'प्रतिषेध इवेष्टस्य यो विद्धेषाभिधित्सया । 
आक्षेप इति तं सन्तः सन्ति कवयः सदा ॥ २।२॥ 
वक्ष्यमाणोक्तविषयः स॒ च दिविध इष्यते । 
निषेधेनेव तद्बन्धो विधेयस्य च कीतितः ॥ २।३ ॥ 

--"विरोषता बतलाने के किए अभीष्ट अथैकाजो निषेधाभास उसे विद्वान्‌ कवि आक्षेप कृहते 
हे । वहदो प्रकारका माना जाता है वक्ष्यम।णविषय तथा उक्तविषय । दूसरे श्चन्द्यो मे उस 
[ आक्षेप ] का निमांण विधेय के निषेधाभास से मी बतलाया गया है ॥ २।२, ३ ॥ 

सद्रट-रुद्रट का आक्षेप कथनाक्षेप है। इते द्‌सरे शन्दों मे उक्तविषय भी कह सकते 
हे । अक्षेपका अथ निषेहीहे। रुद्र ने इसके कारण दो बतरार है प्रसिद्धि ओर विपरीतता । 
रुद्रट के अनुसार आक्षेप केवल प्रतिषेध तकर सीमित नहीं दे। उस्म निषेधका दृष्टान्त द्वारा 
प्रमाणित किया जानाभी भअपेश्चितहै। इसप्रकार रुद्रः के अनुसार आक्षेप केदो भागहे 
एक कथननिपेध ओर दूसरा उसकी पृष्ट मै तत्समान पदार्थं का उपन्यास । लक्षण है- 

“वस्तु प्रसिद्धमिति यद्‌ विरुद्धमिति वास्य वचनमाक्षिप्य । 
अन्यत्‌ तथात्वस्सिदधये यत्र॒ ब्रूयात्‌ स आक्षेपः॥ <।८९॥ 


-- वस्तु के प्रसिद्ध होने या विरुद्ध होने के कारण उसका कथन रोककर, उसकी प्रसिद्धता 
या विरुद्धता को सिद्धि लिए के अन्य किंपसी पदाथ का कथन आक्षेप, उदाहरण- 
८ १ ) जनयति संतापमसौ चन्द्रकला कोमलापि मे चित्रम्‌ । 
अथवा किमत्र चित्रं दहति हिमानी हि भूमिरुहः ॥ ८।९० ॥ 


छ७दे अलद्कारसवंस्वम्‌ 


--कोमल होते हर भी यद चन्द्रकला सज्ञे संतापदेरहदीहै, यह आश्वयेकरी वात है । अथवा 
इसमे क्या आश्चयं । पाला पेड को जला देता हे । 
८ २ ) (तव गणयामि युणानदहमरकूमथवाप्तस्रलपिनीं षिडमाम्‌ । 
कः खलु कुम्भैरम्मो मातुमलं जलनिधेरखिलम्‌ ॥ ८।९१ ॥ 
म लम्दारे यण गिनती रहतीरहू। न्दी, नदीं में उल्टा वो वेठी, सुन्ञे धिक्कार है। 
देता कौन होगा जो धड़ भर-भरकर ससुद्र का पूरा पानी नाप सके ।' 
हन दोनो पेते प्रथमम पले मौर पेड का उदाहरण देकर आस्चर्य में प्रसिद्धता सिद्ध की 
गड है ओर तत्प्रयुक्तं अकथनीयता कौ । द्वितीयर्मे युणगणना मं अनुचितत्व या विपरीयता प्रति. 
पादित कर उस्तकी अकथनीयता बताई गडं हे । 
उक्त प्रतिपादन से स्पष्ट कि कथनाक्षेपको ाक्षेपका रूप पहठेपहर रुद्रटसे मिडाड। 
सवेस्वकार ने दस्की प्रेरणा रुद्रटसे दी पडे होगी । रुद्रट के प्रतिपादनमं दोष यह्‌ है कि उन्होने 
आक्षेप रखब्द का अथं नहीं दिया) किन्तु प्राचीन आचायोंनें आक्षेप का प्रतिषेध या निषेध नाम 
तेजो अथ कियाथा रुद्रट को वी मान्यहे। वामनने जो अधिक्षेपं अथंकियाथा रुद्रट कै उक्त 
विवेचन से वद उन्हे मान्य प्रतीत नहीं होता । 
रुद्रट ने आक्षेप के वक्ष्यमाणविषय तथा उक्तविषय नाम से भेद नदीं किए, किन्तु 
लगता दै कि उन्दः वक्ष्यमाणविषय मेद सवथा अमान्य है यचयि उसका उन्होने खण्डन नदीं 
कियाहै। इसी प्रकार उक्तविषय उन्दँ मान्य हे यद्यपि उसका भी उन्दने नामोष्टेख नहीं 
क्रिया है। 
सवथा रद्रट का आक्षेप पुवेवत्तीं आचार्यो से गृहीत न होकर स्वतःकथित प्रतीत होता है। 
सम्मट-मम्मट का आक्षेप मामदह्‌ के आक्षेप से उद्धर के ही माक्षेप के समान सर्वथा अभिन्न 
दै \ उन्दने जद्धट के समान भामह की कारिका उदधतत कर दी है किन्तु उसका अनावरयक अदय 
हटा दिया है- 
"प्रतिषेध इवेष्टस्य यो विद्धेषाभिधित्सया । 
वक्ष्यमाणोक्तविषयः स आक्षेपो द्विधा मतः॥ 


अथं स्पष्टहे। इसत कारिकाका यही रूप मामहके नाम से लोचन मँ उद्धूत आक्षेपकारिका 
मे मीमिलता हे। यदि इस कारिका को काव्यप्रकाद्च के संस्कार पर प्रवतं पण्डितो ने छुधारा 
नदी हे तो कारिका के परिष्कार का त्रेय मम्मटको नदीं अभिनवयु्च को ही है [ द्रव्य लोचन 
प्रथम उदयोत ] | 
| २ . द्वितीय आक्षेप कौ उदूभावना प्रथमतः दण्डीमें ही भिल्ती है। भोजमेंदण्डाकाही 
अनुकरण हे । दोनों आचार्यौ कै मत उपर दिए जा चुके है। 
उपयुक्त इतिहास से स्पष्ट है कि प्रथम आक्षेप के विषय मँ सव॑स्वकार के पदे तक निम्न- 
लिखित तीन मत बन चुके थे- 
९-- विेबाभिधान छे रिष इष्टप्रतिषेधाभाष्ठ। इसके प्रवत्त॑क हँ आमह गर अनुयायी 
ह उद्धट, रुद्रट, भानन्दवधैन, अभिनवगुप्त तथा मम्मट । 
२ केवल प्रतिषेधोक्ति । इसके प्रवत्तंक है दण्डी ओर अनुयायी भोजदेव । तथा-- 
२--उपमानाक्ञेप । इसके प्रवत्तंक हैँ वामन ओर अनुयाय कोई नीं । 


इन मतां मे से तृतीय मत के माक्षेप का स्वतन्त्र भसितित्व सिद्ध नदीं होता । इसका प्रथम मेद 
भ्रतीप ओर द्वितीय मेद समासोक्ति म अन्तभत हो जाता है । अभिनवगुप्तने वामन का मत उद्धत 


आक्चेपालङ्ारः ॑ ॐॐ ॐ 


कर॒दन्द्रं धनुः परथमे आक्षेप को समासोक्ति से अभिन्न ही बतलाया है। कहादहैध्यषा त॒ समा- 
सोक्तिरेवः [ ध्वन्यारोकलोचन उद्योत-- १ | प्रथम भेद का उदाहरण उन्होने बदरू दिया है ओर 
उसका प्रतीप मे जन्तभाव नदीं दिखलाया है तथापि यह अन्त्माव तकाश्युद्ध दै आने होने 
वाले प्रतीप के विवेचन से यह तथ्य स्वयंदही स्पष्टदहो जार्गा। पण्डितराज जगन्नाथ ने सर्वस्व- 
कारका मत स्पष्ट करते हए उपमान ॐ अधिक्षेप को प्रतीप का सेद वतलाया मी है अल्कार- 
कोस्तुसकार ने मी इसे काव्यप्रकादाकारादि के अनुसार प्रतीप हयी बतलाया है। इस प्रकार वामन का 
आक्षेपमत निरस्तदहो जाने परदो दही मत शेष बचतेदहेँ। 

प्रथम दो मरतो मेंसे द्वितीय मतम आक्षेप का लक्षण अपूणै है। एक तो उस विद्धोषाभि- 
धानेच्छा को स्थान देना आवद्यक है । श्योकि गच्छ गच्छसि-पय मे मौ विशेष का अस्तित्व हे 
डी) दण्डी ने इसमे मी भा्यौवेचनाक्षेप माना हे । दूसरे आद्ीवैचनाक्षिप में आक्षेप का अर्थं यदि 
निषेध हो तो लक्षण में एकमात्र व्यंग्यदश्लाका दी समावेद्य रहता हे, वाच्यदद्ा के लिए पुनः 
कोड निवंचन अपेक्ित रहता दहे। इसीलिए सवस्वकार ने अनिष्टविध्याम।सः को लक्षण माना है । 
उक्त आश्ीकवचनाक्षेप में वाच्य विध्याभसदहीदहै। 

दण्डी के लक्षण केही अनुसार भमहके लक्षण मे मी एकाङ्किता चली आती है। यदि 
रत्नाकर के अनुसार द्वितीय आक्षेप को स्वतन्त्र अरूकार मान ल्या जाय तो भामह का आक्षेप- 
क्षण निर्दोष अवद्य रह सकता है किन्तु यदि सवंस्वकार ओर विमरिनीकार के अनुसार उसे 
आक्षेपकाद्ी एक अन्य रूप मान क्या नातादहेतो इस दितीयरूप के समावेद्य के लि भामह 
के लक्षण में संयोधन या संवधंन की आवदयकता भा पडती है । उन्होने तो केवल प्रतिषरेधामास 
कोदही लक्षण में स्थानदियादहै। 

सवंस्वकार ने इन दोनों मतो को आदर देना चाहा किन्तु वे दोनां मे अन्वित होने योग्य 
कोद एक लक्षण नहीं बना सके दोनों को अल्ग-अल्गदहीरखनादहोतो रत्नाकर का दोनों को 
दो स्वतन्त्र अलका मान लेनाक्या बुरा ह, परवत्तीं अप्पयदीक्षित ओर पण्डितराज नेमी 
इन दोनों मतो का कोड समन्वित लक्षण नहींदिया है। पण्डितराज ने जह मत्येक अल्कार का 
एक स्वासिमत स्वतन्त्र लक्षण दिया हे वहाँ वे आक्षेप के लिए विभिन्न मतों को उपस्थित कर संत॒ष्ट 
दो गए दहै। पण्डितराज का निषेधमात्रमाक्षेपःः कथन सामान्य लक्षण के लिट पर्याप्त है। 
मारी दष्टिमे- 

'विङलेषप्रतिपत्यथंमिष्टविधिनिषेधान्यतराभास आक्षेपः- 

--अर्थात्‌ "विदोषता के प्रतिपादन के चि इष्टपदाथं के विधान ओर निषेधमें से किसी एक 
का आभास आक्षेप । यहाँ यह कहना अधिक आवर्यक नहीं कि विन्ञेषता का क्लान निषेध्य 
वस्तु अथवा निषेधमें ही होना चाहिए । 

शोभाकर-सवंस्वकार के बाद के आचार्योमें ोभाकरका मत आक्षेप के विषय मे इस 
प्रकार है-- 

[ सूत्र ] 'विश्ेष(वगमायेष्टनिषेध आक्षेपः" 

[ ठृत्ति ] इष्टस्योक्तस्य वक्ष्यमाणस्य वा विज्ञेषावगमाय निषेध!भास आक्षेपः । 

-- विशेषता के ज्ञान के किए इष्टनिषेध आक्षेप । इट पदाथ जो उक्त होगा या वक्ष्यमाण, का 
निषेधाभास आक्षेप कहलाता है । 

~ विषय को रत्नाकरकार ने कारिका दारा मी विराद किया है- 


“विदहित्तेऽथं निषेधस्य स्याच्चेदाभासमानता 1 आक्षेपोऽसौ । 


४४८ अलङ्कारखवेस्वम्‌ 


--विदित अथ॑का निषेध ददो अतः वह्‌ आभासमात्र सिद्धहो रहा हो तो वह्‌ आक्षेप 
कषलाता है । 

इस प्रकार प्रथम आक्षेप द्यी रत्नाकरकार को आक्षेपरूप मे मान्यदहै। दितीय को उन्दने 
जिस प्रकार विध्याभास नामक स्वतन्त्र अल्कार बतलाया हे वह स्पष्टहोदही चुका हे, 

अप्पयदीकित--अप्पयदीक्षित ने उक्त तीनों मतोँ का पृथक्‌ पृथक्‌ उ्लेख मात्र किया द । 
कोद स्वतन्त्र लक्षण नहीं दिया । सवंस्वकार ने विदितनिषेध के लिए उदन्त 'साहित्यपाथोनिषि म 
आदि जिन परयो में आक्षेप नदीं माना था अप्पयदीक्षित ने उनमें मी आक्षेप स्वीकार किया । एतदथ 
उन्दने यद्‌ लक्षण बनाया है-- 


आक्षेपः स्वयमुक्तस्य प्रतिषेधो विचारणात्‌ । 

स्वयं के दारा कथित अर्थं का, विचार करने पर प्रतिषेध आक्षेप कदलाता है । उक्त पथं 
म कान्याधचोरो से रखवारी की प्राना की गई है किन्तु बाद र्मे अपने सृक्तिरत्नां की अक्षय्यता 
का ध्यान आतेदही रखवाली का निषेध कर दिया गया हे। उन्दनि सवैस्वकार कामत इल प्रकार 
प्रस्तुत किया है- 

( २ ) निषेधामासमाक्षेषं बुधाः केचन मन्यते । 

- शकु विद्वान्‌ निषेधाभास को आक्षेप म।नते हैँ 1 वृत्ति मे कुरछ-शब्द के स्पष्टीकरणमें 
उन्दाने भल्कारसवेस्वकार का ही उच्लेख किया है-केचिद्लकार सव॑स्वकारादयः। स्पष्टतः वे 
मामह से प्रवृत्त इस परम्परा की अन्तिम कड़ी सवंस्वकार्‌ पर अधिक आस्थावान्‌ है । इसके 
उदाहरण में उन्दने "वाल्क नाहं दृूती०" पच्च का रूपान्तर रख दिया हे । 

( ३ ) “आक्षेपोऽन्यो विधौ व्यक्तं निषेधे च तिरोहिते} 

तीसरा आक्षेप वद्‌ दोता है जिसमे विधान होता है वाच्य भरिन्त उसे व्यंजित होता है 
प्रतिषेध । इसके उदाहरण के लिए उन्दने "गच्छ गच्छसि ०? पका ही संक्षेप कर दिया है । 

पण्डितराज-- पण्डितराज जगन्नाथ ने आक्षेप पर विविध मत इस प्रकार प्रस्तुत किए है- 

( । अपनयस्यापमानसम्बन्विसकटमरयोजननिष्पादनकषमवदुषमानकेमथयुपमानाभिकषपरूप- 

मा क्षेपः” इति केचिदाहुः । 

ङु कते हे कि उपमेय मेँ उपमान से होने वले समी कायो को निष्यन्न करने की क्षमता 
होने से उपमान की निरर्थकता आक्षेप कहलाती है जिसका अथं उपमान का अनादर होता है । 
स्पष्ट हो वह वामन का मत है उदाहरण के लिए (तस्यास्तन्सुखमस्ति० पद्य कै माव पर एकं दूसरा 
पच पण्डितराजने वना दिया है । 


( २ ) अपरे तु-पूवोपन्यस्तस्ार्थस्य पक्षान्तरावलम्बनग्रयुक्तो निषेध आक्षेप = इत्याहुः । 

दूसरे आचाये--ूर्वैकथित पदां का अन्य पक्ष के आधार प्र किया गया निषेध आक्षेप 
हे, एेसा कते ° स्पष्ट ही ये सादित्यपाथोनिधि० भादि प्यस्तमुदाय मेँ आक्षेप मानने वाटे 
भप्पयदीक्षित देँ । कुच एसे ही विचार रुद्र के भी प्रतीत होते हैं। 

(३ ) तीसरे मत के लिए पण्डितराजने मम्मट की “निषेधो वस्तुभिष्टस्यः कारिका उदप्रत 
की है। किन्तु उन्होने मम्मट करा नाम नदीं लिया हे। कदाचित्‌ वे भी शस कारिकाका मूल 
जअभिनवगुप्न के पूवे उद्धृत रोचन मेँ पाते हं ओर इसके सिद्धान्त का मूल भामह मे। इसी प्रसंग 
मे वे सवस्वकार के संपूणं आक्षेप विवेचन का सार मी अत्यन्त खलक्षी माषा मेँ ( अप्पयदीक्षित कौ 
नाई' संकोच के साथ नहीं ) सवीगीणता के साथ प्रस्तुत करते है! इसमे उन्होने आक्षेप के दोना 


आश्चेपालङ्लारः ७७९. 


ही पश्च उपस्थित किंए हें निषेषामासात्मक तथा विध्याभासात्मक । विन्तु वे विष्यामासात्मकं आक्षेप 
के लिए उसके मूर प्रवक्तक दण्डी का उल्लेख नदीं करते । 

( ४ ) चतुथैमत में पण्डितराज ने उक्त सभी मतां का समाष्टार करने का यत्न किया है। 
इसके छि उन्दने लिखा है- 

'चमत्कारिनिषेधमात्रमाक्षेपः । वे सभी निषेध आक्षेप हे जिनमे चमत्कार निषेधगत रहता 
हे! पण्डितराज का कहना है कि उक्त सभी पक्षो मे निषेष का चमत्कार रहता है, अतः उनका 
श्य चतुथ मत में समाहार हो जाता है । ेसा ल्गता है कि यह उनक्षा अपना पक्ष ह किन्तु 
वे इसमं अपना नाम जोड़ने का सादस्त नदीं कर सफे कारण यह है कि इतनी उदारता वरतने 
पर उन्हे प्रतौपालंकार से हाथ धो केना पड़ता । एक वार वे प्रतीप ओर उपमेयोपमा का उपमा 
मे मी अन्त्माव मान वटे थे [ द्र° रसगं० उपमा विवेचन का आरम्भ ] । 

विश्वेश्वर विरवेश्वर पण्डित ने साक्षेप पर उक्त सभी मत पण्डितराज के ही समान उपस्थित 
किए हें किन्तु उन्होने अपनी मूल कारिका “निषेधामास्त' पक्ष पर ही वना है अतः उन्होने 
अपना मत भामहादि के पक्षम खुलकर दे दिया है । पण्डितराज के समान अपने मत को चछिपाण 
रखने का प्रयत्न उन्दने नदीं किया दै । उन्दने कदाचित्‌ पण्डितराज के समाहारपक्च का 
खण्डन मी फिया धा, किन्तु उनके अङुकारकोस्तुम का यह अं खण्डित हो गया है 

विदवेश्वर की आक्षेपकारिका इस प्रकार दै- 

“इष्टस्याप्यभिधातुं योऽस्य विरेषवबोधाय । 
स्वयमेव प्रतिषेधः स वक्ष्यमाणोक्तविषय आक्षेपः ॥ 


इससे अच्छी कारिकातो स्वय मम्मटकोहीथी। उसीको दे देना उचित था। सिद्धान्त 
तो उनकाहै ही । सवेस्वकार का मत भी विदवेश्वर उतनी सफादं के साय नहीं दे सके जितनी 
सफाई के साथ उसे पण्डितराजनेदियायथा। 


इस प्रकार पूवं ओर पश्चात्‌ के आचार्यो के मतपरीक्षण से सिदध यह होता है फि भक्षेप पर 
जो सिद्धान्त सवंस्वकार ने दिया है वही सव॑मान्य है। 


लक्षणा--माक्षेप मं वाच्य निषेध या विधिमें विमरदिनीकार ने विपरीतलक्षणा स्वीकार की. 


है ओर रत्नाकरकार ने उपादानलक्षणा, किन्तु स्वस्वकार ने संपूणं भक्षेपविवेचन मे लक्षणा का 
नाम एक वार भी नहीं ख्या है । उन्होने विधि ओर निषेध को वाच्यरूप म केव बाधित होता 


हुआ कहा है । उनका शब्द हे "निषेधस्यानुपपचमानत्वादसत्यत्वम्‌' । यहाँ असत्यता का अथं यह 
नदीं दै कि निषेध की लक्षणा अससतत्यतामें शो जाती है। असत्यता का ज्ञान यह टीकवेसेष्ठी 
होता हे जैसे श्वार्मिक ! गोदावरीतट पर रह रहै शेर ने उस कृत्ते कौ मार डाला हैजो तुम्हे 
वहां सताता रकता था, अव प्रेम से वहां घूमना" इस वाक्य मं ्जमणनिषेध का ज्ञान होता है । 
यहा निचित ही न्रमणनिषेध का ज्ञान लक्षणासतेन दोकर व्यजना या अनुमानसे ह्येता है। यह 
इसलिए कि यहां भ्रमण की विधि सवधा अ्ञक्य नहीं है । एक कठिनाई, लक्षणा मानने पर, यह भी 
भाती हि कि आष्षिप में निषेध कौ लक्षणा निषेधाभावमें ही की जा सकती है। यह निषेधाभास 
अभावात्मकमात्र सिद्ध होता है फलतः यद्य रेसा कोई अथं नदीं आता जेसा व्याजस्तुतिमें 
स्तुति की लक्षणासरे निन्दाया निन्दा की लक्षणासे स्तुतिरूपी विपरीत अथं आतां था। 
निन्दा या स्तुति या निन्दा का एकमात्र अभावं नदीं ह वे अपने आपमे मस्तित्वराली 
भावात्मक तत्व भौ हं । आक्षेप मे एेसा कोश सतिरिक्त अथं भासित नीं होता। यह 


२९ अ० सण 


= 9 न "र १ 


७५० अदह्ारसवेस्वम्‌ 


निषेध तो ठीक वैसा ही आमासात्मक निषेध है जसा आमासात्मक सीतल कपड़ा की 
दूकान पर॒ खड़ी खीमूत्ति म रदता दहै, उसमें खीत्व का विधान तो रहता हे किन्तु वद 
एकमात्र आभासात्मकष्षी रहता है। सच यहे किडष्टके निषेधसे या अनिष्टके विधान 
त्ते इष्ट मेँ अनिष्टत्व ओर अनिष्टत्वमें इषशटत्व का ज्ञान होता है, तत्पश्चात्‌ तात्पयै जिज्ञासा द्वारा 
अनिष्टरूप से प्रतिपादित इट या इष्टरूप से प्रतिपादित अनिष्ट में विदेषता का ज्ञान होता 
है। इस प्रकार निषेध या विधि अतात्पयंविषयीभूतमात्र सिद्ध दति है, उनका वाघ नदीं होता, 
इष्ट या अनिष्ट मं अनिष्टत्वं या इष्टत्व का प्रतिपादन उन्म वाध उत्पन्न नरी करता फलतः आक्षेप 
के दस अंदामें मी रक्षणा का मानना अवैज्ञानिक है। 


सवेस्वकार के अनुसार आक्षेप ब्ृक्ष इस प्रकार का होगा- 


आक्षेप 
| 1 
| 
14 अनिष्टविध्यामासात्मक 
क क | 
| | वक्ष्यमाणमात्नरविषय 
| 1; वक्ष्यमाणविषय ८५ 
1 २ | 
पदार्थनि षेधात्मक पदाथकथननिषरधात्मक | 
१ २ | | 
उक्तसामान्याक्षिप्तविदोषनिपेधाव्मक उक्तविदोषाक्षिप्रविदषान्तरनिपेधात्मक्ष 
र 1 


इस प्रकार आक्षेप के पाँच भेद सिद्ध दते हैं । 
संजीविनीकार ने सवेस्वकार के संपूण आ्टिपविवेचन का संक्षेप कारिकाओं नं इस प्रकार्‌ 
किया ह~ 
प्रथम आकेप~-ननिषेधामास आक्षेपः प्रक्ृतस्वेष्टसिद्धये । 
स॒ उक्तविषये वस्तुतदुक्त्यो्वारणात्मकः॥ 
वक्ष्यमाणे पुनस्त्वन्यो जेय आगृरणात्मकः। 
सामान्यतो विदषोऽरादंशादचेत्येष च द्विधा ॥ 
इटोऽथांऽस्य निषेधोऽस्य वाधोऽथातिद्ययष्वनिः । 
चतुष्टयमिदं ज्ञेयं संभूयाक्षेपकारणम्‌ ॥ 
द्वितीय आक्ञेप-- अनुक्तस्य निषेधस्य विध्याभासेन सूचनम्‌ । 
आक्षेपो वक्ष्यमाणैकविषयस्त्वेष संमतः ॥ 
पाटान्तर्‌--अक्षिप विवेचन का स्वस्व ओर विमरिनी दोनों मेँ अमी तक छपे संस्करणों नै 
काफी पाठभेद हे। मूक में ये पाठमेद प्रधान द-- 
( १ ) छहय०' पच कौ वृत्ति मेँ 'सातिद्चयो मरणर्गोपजनकत्वादिः के स्थान पर्‌ निरण॑य- 
सागर संस्करण मे (्सात्तिशयात्‌ कोपजनकत्वादिः" छपा है। ॐ द्विवेदी ने इसके स्थान पर 
शातिद्नयोत्कोपजनकलयादिः' पाठ वना ख्या है । ° राघवन्‌ ने यहाँ मृ मे तो 'साततिशयको- 


आक्षेपाटज्ञारः ७५९१ 


पजनकत्वादिः" पाठ बनाया हे । परन्तु पाठान्तर म सात्तिरायकोपजनकत्वम्‌ पाठ रख छोड़ा 
हे । अनन्तशयन ( चरिवेन्द्रम्‌ ) संस्करण तथा काशी क चारदा मन्थमाला संस्करण में क्रमः 
'सातिशयो मरणशक्को पजनकत्वादिः' तथा (सातिश्यान्मरणराङ्कोपजनकत्वादिः पाठ को मूर पाठ 
माना गया है । इनमें प्रधान समस्या मर णदाङ्कोपजनकत्वादि" ओर "कोपजनकत्वादिः की है। 
इसके नीचे आहे पंक्ति में भ्रियते इस प्रकार मरण की वात को प्रतिपा बतलाया गया है । अतः 
हम अधिक पाण्ड्प्रतियां मे अन्य पाठ मिलने प्र मी मूर पाठ मै (मरणः-श्ब्दं को आवरयक 
समञ्षते हं । (शङ्को पजनकत्व' भौर कोपजनकत्वः के विषय मे ओचित्य से निर्णय ङियाजा 
सकता हे । यहाँ गुस्से कौ बात ही भला क्या है प्रिय कै प्रवास का दुःखपुणं अवसर दहै । याँ 
कोप नदी, विषाद या देन्य ही अधिके संभव हैः । कोप तो रोने मे विलम्ब करने पर संभव है । 

( २ ) “अनुरूपो देव शत्यात्मसंमावना'--इस पंक्ति मेँ समी संस्करणों मेँ देव की जगह देव्याः? 
छपाहे। प्रसंग है हषैचरितमें दाधीचकी दूती मारुती के दारा शोणतट प्र रुकी सरस्वती 
के प्रति उसके अनुराग कौ व्यंजना का । मालती ने पुल दाधीच की दशा का वर्णन किया है। 
तदनन्तर उसके विषय में अपनी इच्छा व्यक्त की है । इसमे उसका यदी प्रथम वाक्य है । इसमे 
ऊमार का परामश किया जाना अत्यन्त आवदयक भौर वक्ता की वाक्प्रवत्ति क अनुरूप है । निर्णय- 
सागर संस्करण मेँ छपा भमौ देवः हयी है। राघवन्‌ सा० ने इसका संदर्भ तो हैढ निक्षाला है 
परन्तु संशोधन नहीं किया । इसी प्रकार “केवलम्‌, को समी ने उद्धरण का अंग मान रखा ३। 
वह न तो वाक्यां के अनुरूप है ओर न मूलमें दह्ये प्राप्त है। 

( २ ,) चमत्कारोप्यत्र निषेषदेतुक एवेति न तद्धावमात्रेण०" पक्ति के "न तद्भाव के स्थान पर 
डो” द्विवेदी ओर ० राघवन्‌ ने "न तत्सद्धाव पाठ को महत्व दिया है । हमारी इष्टि मँ यह 
पंक्ति ततश्च हपचरितेः ते आरम्भ होने वाके पूरे प्रषट्टक के उपसंहार के किए आई पक्ति है। 
जतः हमने तद्भावः का अथे “आक्षेप जेता आश्चय' या आक्षेप से मिलता-जुलता करना उचित 
समञ्चा है । 'तत्सद्धावः--पाठ मानने पर अथ होता है चमत्कार का अस्तित्व इसमे पंक्ति का 
मत्व केवर 'साहित्यपाथो० से आरम्भ होने वह प्रकरण तक सीभित रह जाता है । क्योकि 
निषेधमूरक चमत्कार इन्दं परयो म दै । दष॑चरित के वाक्यो मे चमत्कार सौयरयमूरूक है । विमि. 
नीकार ने भी यहो तत शब्द को चमत्कार काही परामश्चकं माना ह, उन्होने "तद्भावः का 
“चमत्कारसद्धाव' शाब्द के दारा स्पष्टीकरण किया है। इसमे सद्धाव शब्द से उनके मस्तिष्क में 
भी 'तत्सद्धावः पाठ ही मान्य होने कौ संमावना ज्लल्कती है किन्तु वह अत्यन्त खीक है। फिर 
उन्हे मूल की प्रतिरयां बहत अशुद्ध भिली थीं । ससुद्रबन्ध ने यहा 'तत्सद्भाव पाठ हयी माना है 

किन्तु उसका अथं उन्दने तत्सदभावो निषेधसद्धावः' इस प्रकार निषेधपरक करिया है । 

विमरिनी मेँ सी अङद्धि्यो की भरमार ३ । उसमें जेते अवर्यपरिहार्यत्व के स्थान प्रर भवद्या- 
परिहायत्व च्पाहै वैसे दी ¶विहितस्य निषेवे नः के स्थान पर विहितस्य निषेधेन, 'निषेधस्याव- 
भासनात्‌? के स्थान पर "निषेधस्येव भासनात्‌), 'ाब्दानुपात्तत्वात्‌ । विेष०› के स्थान प्रर शनब्दा- 
जुपात्तत्वाद्विरेष ° तथा 'अनिराकरणसुखेनेतिः ॐ स्थान पर निराकरणञुखेनेति' । 


विमरिनी 
इदानीं विरोधस्य लक्तणघरुपक्रमते--आश्षेप इत्यादिना । 
अव विरोध का लक्षण आरम्भ करते है-- 
[ स्वस्व ] 
आक्षेपे इनिषेधेऽनिष्टविधौ चाजुपपचमानत्वाद्‌ विजुदधत्वमप्रविषटम्‌ । 


। 
॥ 


४८२ अलङ्ारसवस्वम्‌ 


पतस्यस्तापेन विसेधगर्भोऽलकारवगः धक्रियते ! तजरापि वियेधाटकार- 
स्ताब्क्षयते ~ 
[ दत्र ४१1 विरुद्राभासत्वं षिरोधः। 
इह जात्यादीनां चतुणां पदाथानां पव्येक तन्मध्य पव सजातीयविजा- 
तीयायां विसेषिभ्वां संबन्धे वियेधः ¦ स च समाधानं चिना प्ररूढो दोषः । 
सति त॒ खमाधाने प्रप्रुल पवाभादमानस्वाद्धितेधाभासः । तत्र जाति 
विरोधस्य जात्यादिभिः सह चत्वासे भेदाः । गुणस्य गुणादिभिः सड चयः | 
क्रियायाः क्रियाद्रभ्याभ्यां सह द्ध मेदो । द्रव्यस्य द्रव्येण सहेकः। तदेवं 
दरा विसोधमेदाः | 
आक्षेप मे, इष्टनिपेध ओर अनिष्टविधि के बाधित होने के कारण [ इनके | वीच विरोध आं 
गया है। इसी [ विरोध ] के प्रसंग पे अव विरोधमूल्क अलंकार आरम्भ किएजा रहै है । तत्रापि 
[ मूलभूत ] विरोधाल्कार का लक्षण पहले दियाजारहादहै-- 
[ सूत्र ४१ | विक्द्धता का आभास विरोध [ नामक अकार करता है ] ॥ 
यँ जाति आदि [ युण, क्रिया मौर यदृच्छा = द्रव्य ] चार पदार्थो मेते प्रत्येक फे उन्हीं के 
वीच के सजातीय ओर विजातीय विरोधिर्यो के साथ सम्बन्ध का नाम है विरोध । वह, यदि 
समाधान न हो भौर अन्त तक वना रहे तो दोष होता है, ओर यदि प्षमाधान हो जाए तो 
[ होता है] विरोधामास् [ नामक अलंकार ] क्योकिं तव वह केवल आरम्भमें ही मासित हज 
करता है ! इनमे मी जाति विरोध जाति आदि चारो के साथ होता है, इसलिए उसके चार मेद 
होते हेँ। गुण का विरोध गुणादि तीन के साथ होता है भतः उसके मेद केवल तीन दोतते हैः। 
त्रिया का विरोधचज्रिया ओर द्रम्यश्नदोकेष्ी साथदहोतादहै इसछिए शसके दो मेद होते है। 
द्रव्य का विरोध केवल द्रभ्य के साथ होता है, अतः यह केवल एकदही प्रकार का होता है) इस 
प्रकार विरोधके दसत मेद होते हे। 


विमरिनी 


एतत्प्रस्तावेनेति । विश्दधाव्वानुप्रवेडानुगुण्येनेव्यथः । तत्रापीति । विरोधगर्भालंकारोप 
करमेऽपीव्यर्थः। तावदि्युपक्रमे । तत्र हि विर्दधगभंस्वस्य प्राधान्यम्‌ । तदेवाह--विर- 
देत्यादि । तन्मध्य एवेति । जात्यादीनां युण्णदय एव विजातीया, गुणादीनामपि जास्यादय 
एव विजातीया माद्या; न पुनरन्ये यदच्छाद्य इ्यथः। ननु विरोधस्य दोषत्वं वाच्यं 


म्स्युत, जस्य कथनमर्कारस्वसुच्यत इत्याशङ्कयाह--स चेत्यादि । समाधानमित्ति । वस्तु | 


वत्तपर्यालोचनाभ्यो विरोध ग्रतीस्यनन्तरभावी नैतदेवमिति प्रस्ययरूपो बाधः। भ्रञुख 
एवेति न पुनः पर्थवद्चाने । तेनाम्ुललावगतो विरोधः पर्यवसाने न तथा प्ररोहमेतीति 
भावः । एतर्च श्ठेष एव वित्य प्रतिपादितमितीह न पुनरायस्तम्‌ । पुवं च सध्यपि 
समाधाने दोषामावमात्रमेवास्य स्वरूपं नाशङ्कनीयम्‌ । अलकारस्वपर्यवसायिनो विरि 
त्तिविदेषस्यापि संमवात्‌ । जातेर्गुभेन सह विरोषे उक्तं "विरोधोऽन्योन्यवाधनम्‌ः इति 
शा तेनेव गुणस्वापि जारवा सह विरोधः सिद्धः। अत एव गुण्य जातिवर्यं त्रयो 
भेदाः । एवमन्यत्रापि जेयम्‌ । 


वियेधालङ्ारः ४५३ 


“एुतस्प्ररतावेनेति - इसी प्रसंग से = अधात्‌ विरोध का प्रवेश दोनों अलंकारो मेँ समानरूप 
से रहता है इस अनुक्रूरता के कारण । तत्रापि = विरोधमूलक अल्कारों क निरूपण के मारम्म 
से भी । तावत्‌ = आरम्भमें ) इसलिए कि इसमे विरोध ही प्रधानरूप से चमत्कारकारी होता है। 
यदी [ विरोध का लक्षण सूत्र दारा | प्रस्तुत करते इए कहते है--"चिङ्द्ध'इत्यादि (तन्मध्य एव = 
उन्हीं के बीच” अथात्‌ जाति भादि के प्रति [ स्वयं सजातीय ओर देष वचे ] गुण आदि [ तीन ] ही 
विजातीय मानने हदोगे, इसी प्रकार गुण आदि के प्रति भी [ स्वयं सजातीय भौर शेष वचे ] जाति 
आदि [ तीन ] ही विजातीय हगि। नकिइ्न [ चारोंसे] भिन्न नामराब्द आदि, [ अथात्‌ 
जाति गुण ओर क्रियाये तीनों द्रग्य के वास्तविक धमं माने जाते है ओर नामश्चब्दं काटपनिक । 
इस प्रकार वास्तविक होने से जाति आदि को परस्परम सजातीय मानकर नामशब्द को कारप- 
निक होने से विजातीय मानाजा सक्ता, किन्तु यह उक्त चारों से भिन्न पौँचवा तत्व है। 
(तन्मध्य एव” कहकर अन्धकार सजातीय विजतीय का निण्य इसको लेकर नहीं मानते ] । 
[ राका ]--विरोध को तो उल्ग दोष कहा जाना चाहिए, इते अलंकार केसे कहा जा रहा है" एेसी 
रोका का उत्तर देते हे--सखच। समाधानम्‌ = समाधान का अथंहै[ विरोध का] बाध अर्थात्‌ 
'्यद्‌ वस्तु रेसी नदींहैः इस प्रकारका ज्ञान, जो विरोध प्रतीति के वाद्‌ वास्तविक स्थिति करा 
अनुद्ौलन करने पर होता है। ्प्र्ुख एव = आरम्भमें हीः। न कि अन्तिम पय॑वसानमें मी 
हसते तथ्य यद निकला कि विरोध केवल वाक्याथप्रतीत्तिके आरम्भमें ही भासित होता दै, 
वाक्याथप्रतीति के अन्तमें वहु वैसा नहीं र्ता । यह विषय इलेषाटंकार पँ ही विस्तारपूर्वक 
प्रतिपादित किया जा चुका है अतः याँ उप्तके ल्यि पुनः आयास नहीं किया गया । इसी प्रकार 
समाधान हो जाने पर विरोध दोषाभावरूप भर नहीं रहता, इसमे वई विद्ेषता भी रहती है जो 
[ किसी भी उक्तिमें | अलंकारत्व में पयेवसित होती है। जात्तिकागुणके साथ विरोध बतला 
देने पर "विरोध का अथंहै परस्पर में एक दूसरे को बाधित करना इस दृष्टि से युण का जाति के 
साथ विरोधमी स्वयं ही वहीं अवगतदहो जाताहै, इसीलिर म्रन्धकारने गुणके विरोधके 
केवर तीन ही मेद वतलाएहें। जाति के साथ विरोको छोड दिया है, अन्य क्रिया अदि 
मँ मीशसी प्रकार [ पूवेभेदों से स्वतः अवगत भेदौको छोड कर रेष भेद वताते काक्रम] 
अपनाया गया जानना चाहिए । 


| स्वस्व | 
तत्न दिङ्मात्रेणोदाहरणं यथा-- 
"परिच्छेदातीतः लकटखवचनानामविष्यः 
पुनजन्मन्यस्मिन्नचभवपथं यो न गतवान्‌ । 
विवेकप्र्वसादुपवितमहामोदगदहनो 
विकारः कोऽप्यन्तजंडयति च तापं च कुङते ॥? 
अन्न जडोकरगतापक्ररगयोः क्रैययोर्वियेधो वस्तसौन्दरथेगावराति- 
पयंवसानैन परिहियते । वथा- 
“अयं वारामेको निलय इति रल्लाकर इति 
धितोऽस्माभिस्वृष्णातरलितसनोभिलेटनिधिः। 
क एवं जानीते निजकरपुटीकोटरगतं 
क्षणादेनं ताम्यत्तिमिमकरमापास्यति मुनिः ॥' 


७८७ अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


अर जटनिधिः पीत इति द्रग्यक्रिययोर्वियोधो मुनिगतेन महाप्रभावस्वेन 
समाधीयते । एवमन्यदपि ज्ञेयम्‌ । 

विविक्तविषयत्वेन चास्य दशः पङैषगभत्वे विरोधप्रतिभोत्पत्तिदटेतः 
इष ओद्धयानाम्‌ । ददोनान्तरे तु संकराटधकारः। यथा--'संनिदित- 
वाटान्धकासय अास्वन्मूतिश्च' इत्यादौ वियेधिनोद्ध॑योरपि दिटश्त्वे । 
पकस्य तु शिटष्रत्वे छकपत्तिमपि कलत्रवह्ठभम्‌ः शत्यादौ । पएकविष- 
यत्वे चायमिष्यते ¦ विषयभेदे त्वस्तंगतिग्रभ्रतिर्वक््यते । 

इन [ दस मेदां | मंसे [ प्रत्येक का उदादरण देकर ] कुछ के उदाहरणदिए्जा रहेहैःजो 
इस प्रकार है-~ 

इनके कतिपय उदाहरण यथा-[ विरही माधव की उक्ति- | 

“जो इयत्ता से परे दै, जो किसी भी प्रकारके शब्दां का विषय नहीं बनता, इस जन्मतेंजो 
पुनः कभी अनुभव मं नदीं आया, विवेक के सातिदाय ध्वंसे प्रवृद्ध महामोहके कारण जो 
अन्यत्र निविड है टेसा कोई [ चेतो- | विकार हदय को शीतल मी वनारहादहे ओर तपाभी 
रहा है । 

- यां शीतल वनाना ओर तपानाइन दो त्रियाओंका विरोध दहै। यह वस्तु [ पदां] 
के सौन्दयं के द्वारा एग दिया जाता है । [ यद सौन्दयं अभिलाष श्रंगार्‌ म पय॑वसित होता है । ] 
इसी प्रकार- 

यह जलसमूह का एकमात्र निल्य है [ सभी जल इसी मे भाकर समाते दै ] यह रत्नों का 
भण्डार है" यह सोच वृष्णातुर चित्त वाजे हम लोर्गो ने जलनिधि का आसरा लिया था; यह कौन 
जानता था कि तिलमिलाते समस्त तिमि मकरोासे व्याप्त इसे अपनी अजलिकी खोह में समेट 
कर अगस्त सुनि एकक्षणमेंदही पृराका पूरा पी जागे ।' 

- यहाँ समुद्र" [ जलनिधि ] ओर पीनाः इन दो द्रव्य ओर क्रियाका विरोध दै। इसका 
समाधान यनि के प्रभाव की महत्तासे हदो जाताद। अन्य [भेदके उदाहरण] भी पेते 
जानना चाहिए । 

यह [ विरोध दलेषरदित भतः ] सतन स्थलों मं भी देखा जाता है अतः जहां कीं यह 
दलेषमूल्क होता है वहाँ उद्धगचायं के अनुयायी देष को विरोध का वाधक मानते दँ भन्य मत में 
यहां संकरारंकार माना जाता हे । उदाहुरणाथ- 

“जो [ सरस्वती ] सन्निहितवारान्धकारा [ जिसके बाल = केशो म वाल अन्धकार कालिमा 
सन्निदित हे ] ओर भासवन्मूत्ति [ सू्ंरूपः प्रकारित ] है । 

इत्यादि [ हपैचरित-१ ए० २७] मे जहाँ विरोधिभों मसे दोनोँही [के वाचक पद] 
दलेष युक्त हं । जहाँ केवल एक के [ वाचक पद भरँ] देष होता है उसका उदाहरण 
यह दै-- 7५ 

कुपरति [ कुत्सित पति ओर ङ = प्रथिवी का पति ] होने पर जो प्रियां को प्रिय था। 
यह [ संकर ] वह माना जाता है जह [ विरोध भौर देष ] दोनो णक ही स्थान [ पद ] में 
8 द । जाँ कीं अलग-अलग रदते है वहां अगति आदि अन्य अलंकार बताए 
जार्यैगे । 


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विरोधालङ्कारः ७५५ 
विमरिनी 


दिद्मात्रेणेति । अनेनेषां कचे तथा वेचिन्याभावादनवक्लृशिध्व॑निता । अत एवा- 


स्माभिरप्येते नोदाहताः । अन्यदिति । अनेनेह॒चिरंतनैरलुत्म अपि वेचिन्याधायिनो 
भेदा अद्चुसतभ्या इस्यपि सृचितसू । तेन भावयोरभावयोश्च विरुदधत्वो पनिबन्धे विरोधो 
देय इति । तत्न भावयोभन्थङ्तेवोदृाहतम्‌ । अभावयोस्तु यथा- 
"त वीचध वेपथुमती सरसाज्गयष्टिर्नितेप एव पद सुद्‌ छतसुद्वहन्ती । 
मागाचरभ्यतिकराङलितेव चिन्धुः क्ेलाधिराजतनया न ययौ न तस्थौ ॥' 

अत्रामावरूपयोः क्रिययोर्विंरोघः । सावाभावयोस्तु यथानङ्गरेखायां राजवर्णने 

धविद्‌ सा ङ्नाजनमपि द ेगभेकरमकरोत्‌ , पञ्चतां जनयन्नपि पञ्चालस्य वेमुख्यम- 
पुर्णात्‌ , पारसीकरणमप्यपारसीकरणं चकार, मागधानपि विमागधान्‌ ष्यधात्‌ , 
चोरुकान्ता अप्यचोरुकान्ताः समपादयत्‌ , कन्तरालसानप्यङ्कन्तलारुखांश्च निममे 
श्रूरसेनानप्यश्रसेनानद्शेयत्‌ ।› इत्यादि । 

अस्यापि मतभेदेन श्रेषेण सह उ्यवस्थिति दर्शयितुमाह विविक्तेत्यादिना। (जडयति 
च तापं च कुरते इत्यत्रास्य विचिक्तविषयत्वम्‌ । दशं नान्तर इति म्रन्थक्द्भिमते संकर 
राब्दश्वात्र संकी णेस्वसात्रे वतते ।. तेनात्र संकरेण संकीणस्वेन च ररेषमिश्रसेनारकासे 
विरोामाल इति ष्यास्वेयघरु । जलंकारशब्देन चान्न विरोधाभास एवाभिधीयते । तस्थै- 
वेह प्रस्ठतस्वात्‌ ¦ अन्न हि रेषो विरोधोस्पत्तौ है तुस्वं भजते । तेन विना तस्यानुव्थानात्‌ । 
संकरश्च स्वहेठवलाररुभ्धसत्ताकयोरलंकारयोभंवति । तेन यो यस्य हेतुस्वं भजते तेन 
सह तस्य संकरो न युक्तः । यद्वच्यत्ति--"न च विरोशोष्पत्तिदेतौ श्छेषे शेषस्य विरे. 
धेन सहाङ्गःक्िसंकरः' इति । द्वयोरेकस्येव्यनेन श्रेषमिश्रस्वश्यापि वेचन्यं दितम्‌ ! 
जस्य च द दयमाणाद्‌ विरोधगभांइरकाराद्‌ वैलक्ष्यं दुर्शयति--पवेत्यादिना । जदीकरण- 
तापकरभयोविकारयोविकरारिगतव्वेनास्येकविषयष्वम्‌ । विषयभेद इति । कार्यकारणाद्ष. 
नामेकविषयस्वो पपत्ताकपि भिन्नदेश्षरवादयुपनिबन्धनात्‌ 

दिङ्मात्रेण = इछ एसा कदकर । व्यक्त विया कि इन भेदके जो स्थल हते है उनमे 
कत्कारगत अन्तर नहीं रहता । इसी कारण हमने भी इनके उदाहरण नहीं दिए । अन्यत्‌ = 
भन्य, दसकं दारा यह भी सूचित क्ियाकि विरोधके जोभेद प्राचीन आचार्यौ ते नहींमी 
वतराए हं किन्तु यदि उनमें कोई तरेचिन्य होतो उन्हें भौ गिन लेना चाहिए। शतके अनुसार 
वह्‌ भौ विरोध साना जा सक्ता है जहां केवल माव भाव का विरोध बतलाया जाताहैे या 
केव अमाव अभावकाया भाव भोर अभाव का। इनमें से केवल भाव-माव के विरोध का उदा- 
हरण स्वयं मन्धकारने ही दे दिया है । अभाव अभावे फ विरोध का उदाहरण यह है- 

( त्रह्मचारौ का वेष छोडकर अपने रूप मे आए ओर पावती को पकड कर जनि से रोक 
रहे । उन [ भगवान्‌ शंकर ] को देखकर पार्वती कोपने लगी, उनकी जररयष्ट सस्वेद हो 
गड आर वे जगे रखने के किए उठाएवैर्‌ बोऽउ्ठाए्‌ हए हीथीं। इस प्रकार माम॑ म पव॑त 


[सामान्य पहाड़ ओर परकृत प्रसंग मे हिमाचल] के आ नाने से आ्कुहिति नदो ॐ समान पद॑तराल 
कीपुत्रीनतोजादही सकींओरन रुक सकीं। 


-- यहां अभावात्मक क्रियाभों का विरोध ३ै। 

माव ओर अभाव वे विरोध का उदाहरण अनङ्गलेखा म राजा कै इस वणन म मिलता १ 

'जिक्ने विदमं [ द्म = कुश-रहित तथा विद जनपद की ] सुन्दस्य को दपण हाथ 
वारी [ विधवा अतएव तपस्िनी वना दिया, पक्ता उन्न करता हआ [ मृत्यु फो प्राप करता 


७५द अल्ट्कारसवंस्वम्‌ 


इआ ] मी जो पन्ना की विुखता में बृद्धि कर राथा, पारसीर्कोके रणको अ-पारसीक-रण 
[ अपार = सीकरण = सीकरता ] के रूपमे वदल दिया, मागर्धो को जिसने विमागध [ मागध- 
त्वविरुद्ध, मागध = वेताल्किां से रित ] वना दिया, चोल कौ कान्ताओं को जिसने अचोल- 
कान्ता [ चोल की कान्ता से उल्टा, चोख्कान्त सन्दर चोलीसे रदित] कर दिया, इुन्तल मे 
सव प्रकार ते योभित योने वार्ले को अ-ङुन्तलालस [ कुन्तल देदामें सवे प्रकार की चोमा से 
ते रदित ऊन्तङ = केश से रदित अथात्‌ खण्डित अर अलस = आलस्य युक्त | वना दिया, 
द्रप को भी अदयूरसेन [ कायरसेना वाला ] प्रमाणित कर दिया ।--इत्यादि । 
स्स [विरोध] की मी रेष # साथ भिन्न-मभिन्न मतो मेँ जो भिनन-भित्त स्थिति हैः उन 
स्दिग्डचप्ने क च्छि च्छिद दै--दिवि्क० । (शीतल करता है ओर तपातामभी हैः यह इस 
[ विरोध ] का स्वतन्त्र [ रलेषसुक्त | स्थल है । दहानान्तर = अन्य मत में अथात्‌ अन्धकार 
को मान्य मतमे। यह [ संकराल्कारश्चव्दमें] संकर दाब्दं का प्रयोग संकीणैतामात्र के छिर 
किया गयादै। इस यदा | संकरालकारदाब्दय की] सकर ओर संकीणैत्व दोना ही प्रकारस्े 
देष का भिश्रण ह्यन पर निष्पन्न होने वाला अक्कार अर्थात विरोधाभास रेसी व्याख्या करनी 
चाहिए । [ संकरालंकार दब्द मेँ जो अल्कार शब्द | है उस ] से यदो विरोधाभास का ही कथन 
हो रदा ह । क्योकि यदं वही प्रस्त॒त है। ांजो है सो रेष विरोध कौ उत्पत्ति मेकारण 
वनता है। क्योकि उस [रेष] के विना वद [विरोध] खडा नहीं हदो पाता। संकर 
तोउन अल्क्रासका ह्येता दै जो भपने-जपने हतुं से निष्पन्न दो चुके रहते हं । इसलिए 
जो जिसका हेत होता है उसके साथ उसका संकर मानना ठीक नदीं है। जेसा कि स्वयं अन्ध- 
कार ही [ संकराल्कार से प्रकरण मे ] कदैगे--रेसा नदीं भजि रेष यदि विरोध की निष्पत्तिका 
हेवहो तो दलेष का विरोध के साथ अंगागिमावसंकर माना जाए) द्वयोः एकस्य! = दोनों 
या एकः ठेसा कहकर अन्धकार ने यद बतलाया कि जहां विरोध दटेषमिश्रित रदता है वहां 
मी इसके अनेक भेद होते दै । इस [ विरोध ] का भागे के जाने वाले विरोधमूल्क अलंकारो 
से भेद दिखलति है- “एक” इत्यादि ककर । (जडीकरण = श्ीतकरण ओर तापकरण = 
पाना इन दोनो विकारो का आश्रय एक ही है अतः वां पिरोधको एकी स्थान मेँ रहना 
माना जा सकता है। “विषयभेद = अल्ग-अल्ग रहने परः अर्थात्‌ काय ओर कारण भादि 
का विषय एक होने पर भी स्थान में भिन्नता आदि के वतछनेसे। 


विमलं :- पूवं इतिहाघ~- 

विरोधालंकार के उपयुक्त दस मर्दों का निदेश पहले पहल रद्रट ने कियाहे। रद्रट के पूर 
उद्भट, वामन भोर भामहने विरोध का जो निव॑चन किया दहै उसमे विरोध का मृरुभूत दहूप 
निखरता नदीं है । 


भामह-मामई ने विरोध का निहूपण इस प्रकार दिया है - 
“गुणस्य वा क्रियाया वा विरुद्धान्यक्रियामिधा । 
या विद्ेषाभिधानाय विरोधं तं विदुक्ुधाः॥ 
यथा- 
उपान्तरूढोपवनच्छयाश्चीतापि धूरसौ । 
विदूरदैशानपि वः सन्तापयति विद्धिषः॥ 


--विदषता वतलने के क्षि युणया क्रिया के विरुद्ध अन्य त्रिया का जो उश्लख उप्ते विद्वान्‌ 
खाय विरोष कहते हे । यथा~ 


विरोधाल्ङ्ारः ७५७ 


--"पासमें ही ल्गे उपवनं कौ च्या के समान शीतल होने पर भी आपकी यह धुरी 
[ राज्यभार] सदूर देदा मेंमी रह रहे रा्ओंको तपारहीदहै।' यहां एक दी राज्यभार- 
रूपी पदाथ मे शीतल्तारूपी गुण के साथ उपक विरुद संतापक्रिया बतला दी गई है। मामहं 
के इस निरूपणमें युग ओर क्रियाकीजो चचां वही है परवत्तीं दस मेदो की कल्पनाका 
स्रोत । इतने पर भी मामह का निरूपण अपूणं है । 

वासन--वामन ने विरोध कामम समञ्च छ्याथा किन्तु वे उसको असंगति से भिन्न 
नहीं कर सके थे । उनका निरूपण इस प्रकार है- 

| सू° ] विरुद्धाभासत्वं विरोधः । 

| व° | अथस्य विरुद्धस्येवाभासत्वं विरुदाभास्त्वम्‌ । 

यथा--( १ ) "पीतं पानमिदं त्वयाच दयिते । सत्तं ममेदं मनः० । 
(२) पसा बाला वयमप्रगल्ममनसःसा खरी वयं कातराः ॥ 

- विरुदधामासत्व विरोध । विरुद्धामासवत्व का अथं है किती पदां म विरुढता-सौ प्रतीत 
होना । यथा- 

( १) € प्रिये } आसव पिया हे तुमने, किन्तु न्ञा चदा है हमारे चित्तो । 

(२) वाला हे वह, अप्रोढ मन वले हो रहे है हम, खी दै वह किन्तु कातर हो रहे है हम०।' 
स्पष्ट हो वामन का विरोधसूत्र सवस्वकार तथा रत्नाकरकार नेञ्यों कार्यो अपना ल्या 
हे, विन्तु वामन ने जो उदाहरणदिण है वे असंगति के उदाहरण है, अतः उक्त आचार्यौ ने उन्द 
छोड दिया हे। 

उद्धट--उद्धटाचाय ने विरोध पर भामह की ही पदावली को इस प्रकार उतार दिया है- 


"गुणस्य वा क्रियाया वा विरुद्धान्यक्रियावचः । 
यदिवरोषाभिधानाय विरोधं तं प्रचक्षते ॥ 
उदाहरण भामह का ठीक था किन्तु उद्धट्ने उसे छोड अपना एक रेसा पच दिया डेनजो 
स्पष्टतः विषमालंकार का उदाहरण है-- 
भवत्याः क्वायम(कारः क्वेदं तपस्सि पाटवम्‌” 
आपको यह आकृति कहाँ ओर काँ यह तपस्या म तत्परता ।' कालिदास द (तपः क्व 
वत्से ! क्व च तावकं वपुः- यह्‌ उक्ति ही उक्त पदार्थमे ढालली गई है। स्पष्टहै कि रक्त दोनों 
आचार्यो ने भामह कै ही समान जातितरिरोध आदि अवान्तर मेदौ की भोर ध्यान नदीं दिया । 
न तो इन आचार्यो ने षिरोध में दटेष का अस्तित्व ही बतलाया है । 


उ्द्रट-रुदरटने विरोधल्कार कादौ अलग-अलग प्रकरणों मँ प्रतिपादन किया हे। एफ 
अतिशय प्रकरण म ओर दूसरा दक्ष प्रकरण मे । इलेष प्रकरण के विरोध को उन्हे टौक उसी 
प्रकार विरोषदलेष नाम दिया है जिस प्रकार व्याजस्तुति को व्याजरेरेष । इस प्रकरण मं रुद्रट 
ने विरोधाभास नामक एक स्वतन्त्र अल्कार मी मानाहै। इस प्रकार स्पष्टरूपसे रद्ररने विरोध 
मे इटेष का अस्तित्व भी स्वीकार किया है | रुद्रट का विरोध निरूपण इस प्रकार है- 
खत्तण- ॑ 
“यस्मिन्‌ द्रव्यादीनां परस्परं सवथा विरुद्धानाम्‌ । 
एकत्रावस्थानं समकालं भवति स्त विरोधः ॥' ९।३०॥ 


४५८ अल्ङ्कारसवंस्वम्‌ 


-- जहां परस्पर मेँ सर्वधा विरुद्ध द्रव्य भादिका षक दही स्थानम एकसाथ अस्तित्व दिखलाया 
जाय वह्‌ विरोध [ नामक अलंकार ] दोतादै। इस लक्षणसेस्पष्टहे किरुध्यके मन विरोध 
ओर असंगति का वद भेदक तत्व मी स्पष्ट था जिते सर्व॑स्वकार ने विरोध-प्रकरण कै अन्त मेँ विषयेक्य 
ओर विषयभेद नामसे. दियाहे। उदरटके लक्षणमें अधिक्षरणेक्यके साथदही समयैक्यका 
भी सन्निवेद्य है जो अत्यन्त अपेक्षित दै। विरुद्ध वस्तुं का अधिकरणेक्य यदि सिन्न-भिन्न समय 
मे वदलाया जाए तो उत्ते विरोध मुखर नदीं हो पाता । 

भेदो के विषयमे रद्रटकी धारणा मम्मट, सर्व॑स्वकार आदि परवती आचार्योको प्रभावित 
करती इह भी अंशतः भिन्न है । इन्होंने केवल नौदहदी मेद स्वीकार किणदैँं। दशम जातिद्रव्यविरोध 
भेद का खण्डन किया हे । रुद्रट कौ मेदगणना भी बहुत स्पष्ट है । वहु इस प्रकार है- 

अस्य सजातीयानां विधीयमानस्य सन्ति चत्वारः । 
सेदास्तन्नामानः परत्व त्वन्ये तदन्येषाम्‌ ॥ 
जातिद्रन्यविरोधो न संभवत्येव तेन न षडेते । २१, २२॥ 

-जव यह्‌ विरोध सजातीय पदार्थो का [अथात्‌ द्रव्यका द्रव्य के'साथ, जाति का जाति के साथ, 
गुण काराणकेसाथतथा क्रियाकाक्रियाकं साथ] होतार तो इसके उन्दीं नामों के चार मेद 
होते हं । इनसे भिन्न [ विजातीया ]के साथजो विरोध होत्रा हे उत्ते पोँचदी मेद होते दे [ जाति 
गुण, जातिक्रिया; गुणक्रिया, युणद्रन्य, क्रियाद्रव्य-के विरोध ]। जात्ति ओर द्रव्य का विरोध 
हो ही नकीं सकता, अतः ये [ विजातीय ] मेद छ नीं माने जा सकते ।› उक्त जात्यादि के विसेध 
के अमा्वोंके मेरोँकीजो चचां विमर्दिनी में भिल्ती है उप्तकामीघखोतरुद्रट ही दहै। उन्दी 
लिखा है-- 

“यत्रावरयंभावी ययोः सजातीथयोमवेदेकः । 

एकत्र विरोधवतोस्तयोर भावोऽयमन्यस्तु ॥ ५।३३ ॥ 

जहां से दो सजातीय पदार्थं जो परस्परमें विरुद्ध हो, भौर जिनदोमें से किंसीषएकका 

| अभाव रहने से दूसरे का ] अस्तित्व अवदयंमावी हो, तथापि यदि दोना काही अभाव दिखलाया 
जवे तो वह भी ए+ [ चार सजातीर्यो के भाधार पर चार ] प्रकारका विरोध होता है" रुद्रे 
उक्त सभा मेदो के उदाद्रण दिए है । त्रिया ते क्रिया के ओर प्रियास द्रव्य के विरोध के उदाहरण 
सवरवफार ने रट्ररसे दी ठि इनम ते प्रथम मे सजातीय विरोध है भौर द्वितीय मे विजातीय 
विरोध । शेष के उदाहरण रुद्र से इतत प्रकार लिए जा सकते है - 

द्रव्य से द्रव्य का विरोध :-- 

जतरनद्रनीलभित्तिषु गुहासु रेके सद। सवेलास्ये । 
अन्योन्यानभिभूते तेजस्तमस्री प्रवत्तेते ॥ 

"यहां सवे नामक गिरि पर जो इन्द्रनील मणि की भित्तियों से वनी गुफादं हैँ उनमें 
तेज ओर तम दोनो परस्पर से भभिमूत हृए विना फलते रहते हैः । यदं तम ओर तेन दोनों 
पद्‌ द्रव्यवाचक पद हे, अतः युाँ विरोध द्रग्यगत हुआ । 

ण से गुण का विरोध-- 

ब्रह्मन्‌ ! परमस्ि विमलो वितताध्वरधूममलिनोऽपिः | 

हे व्रदव ! तुम यज्ञधूम से मलिन होते हृ भी अत्यन्त निल हो › यद मलिनत्व ओर 
निमलत यणो का विरोध &ै। क्रिया से क्रियाके विसेधका उदाहरण रृद्रट ने भी जडयति च 
संतापयति चः--इसी पदावली के पचद्रारा दिया है । जाति से जाति के विरोध का उदादरण-- 


= 


विरोधालङ्कारः ७५९. 


"एकस्यामेव तनो विभक्ति युगपन्नरत्वसिहत्वे । 
मनुजत्ववराहत्वे तथेव यो विुरसौ जयति ॥' 

--जो परमेश्वर एक ही शरीर में एक साथ नरत्व ओर सिहत्व को धारण करता है, श्सी 
प्रकार मङष्यत्व ओर वरादत्व को, वह प्रणम्य है ।' यहो नरत्व जाति का प्यव व्याप्य जाति 
सिहत्व ओर वराहत्व के साथ विरोध है । विजातीय मेदौ मै- 

द्रव्ययुणविरोध- ॑ 
^तेजस्विना गृहीतं मादंवसुपयाति परय लोहमपिः। | 

-- तेजस्वी [ अग्नि ] द्वारा गृहीत लोहा भी कोमल्ता को प्राप्त दो रहा है ।' यहोँ रोह द्रव्य 
हे कठिन किन्तु बतलाया जा रहा है कोमल । | 

युणक्रियाविरोध-- 

सा कोमलापि दलयति मम हृदयम्‌ ।› 
कोमल होते हुए भी वह सुन्दरी मेरा हृदय दल रही है ।' 
जातिक्रियाविरोध- 
मथ्नासि येन नितरामबलापि बलान्मनो यूनाम्‌ 1 
--खन्दरि ! तेरा चरित्र अद्यत दै । अवक होते हुए भी तू समी युवकों का चित्त बङात्‌ मथ 


रही है! यहाँ अवखात्वं जाति हे । मन्थनक्रिया उसके विरुद है ! अभाव के चार उदाहरण इसं 
प्रकार है- 


द्रव्यद्रव्य के अभाव का विरोध-- 

'अविवेकितया स्थानं जातं न जलं न च स्थलं तस्याः । 

अविवेक केकारणनतो उप्तके ल्एिजलमेदही जगह रह गई है भरन स्थर मे) 
यहं जल ओर स्थल द्रव्य है। सामान्यतः किसी को यदि जलम जगह न भिले तो स्थल्मे 
अवदर्य हो मिल जानी चाहिए, इस प्रकार यदि स्थल मै जगह नभे तो जल मे मिल जानी 
चाहिए । यहाँ दोनों मे ही उसका अभाव बतलाया जा रहा हे । 

गुण-गुण के अभाव का विरोध- 

न खदु न कठिनमिदं मे हतहृदयं परय मन्दपुण्यायाः। 
यद्‌ विरदानलतप्तं न विल्यसुपयात्ति न च दाढर्यम्‌ ॥ 

-- क्च भमागिन का यह सृतहृदयनतोष्रदुहयीहे भौर न कठिन ही । क्योकि विरहानल 
मं तप कर यद नतौ विल्यको दही प्राप्त होता ओर नतो दृढता को ही) यँ हृदय को मृदु, 
न होने पर कठिन होना चाहिए, परन्तु उप्तम दोनों का अभाव बतलाया गया ह । 

क्रिया-क्रिया के अभाव का विरोध- 

"नास्ते न याति हंसक परयन्‌ गगनं धघनद्यामम्‌ । 
चिरपरिचितां च नलिनीं स्वयमुप सुक्तातिरिक्तरसाम्‌ ॥' 

“आकाश को मेधो से नील तथा चिरपरिचितं कमिनी क) स्वयं उपञुक्तशेष रस से युक्त. 
देखकर हंस नतो ठहरताष्टौ हैओौरनजातादी) यह ठीक "न ययौ न तस्थौ" की अभिव्यक्ति 
का अनुकरण है । 

जाति-जाति फे अभाव का विरोध-- 

न सखीन चायमस्नी जातः कुरुपांसनो जनो यत्र । 
कथमिव तत्‌ पातालं न यातु कुरमनवरुम्वितया ॥' 


७६० अलट्धारस्वेस्वम्‌ 


--"लिक्में टे्ा कुलकलंकी पुष पेदाद्यो गयादहोजोनतोखीदीदहदोओरन अखी दही वह 
ऊर निरवलम्ब होकर रसातल को प्राप्त क्यों नहींष्टो ।' यँ (अली चाब्द मे ल्ीविरुडध अल्नी 
ओर अल्ल वाला इस प्रकार रेष मानाजासक्तादै। जोनतोखीदहो ओरन शर्‌ बह नपुंसक 
अवदय ही कुर वाने वाला होगा । 

दरेषमूल्क विरोध का नित॑चन रद्र ने इस प्रकार किया ३ै- 

“यत्र विरुद्धविद्दोषणमवगमयेदन्यदर्थ्तामान्यम्‌ । 
प्रकरान्तमतोऽन्या्टगृवाज्यदलेषो विरोधोऽसौ ॥ १०।५ ॥ 

-- जहां प्रसंग प्राप्त अथं दूप्तरा हदो फिन्तु विश्लेषण रेते हौ जनते पिषरीत अथं मी निकलता 
होतो टेते वाक्यदलेष को विरोध [ दटेष ] कह। जाता है । 

उदाहरण- 

'संवधितविविधाधिककमलोऽप्यवदल्ितनाछिकः सोऽभूत्‌ । 
सकलारिदार-रसिकोऽप्यनभिमत-पराङ्गनासङ्गः ॥* १०।६ ॥ 

वह्‌ संवधित कमल [ संवधित किया दै कमल को जिसने वह तथा संवधित किया दहै कमला 
श्री को जिसने वह ] द्यति हए भी अवदल्ितिनालिक्र [ अवदल्िति = नष्ट किया है नाछिक = कमल 
को जिसने तथा नाक्कि = मूखं को जिसने ठेसा ].था । इसी प्रकार सकलारिदाररस्ििक [ सकल = 
समी अरि = दावुओं के दार =श्ियोका रसिकन्रस लेने वाला, सकल रानुओं का दार = 
दारण करने का रसिक ] होने पर मी परल्लीसङ्ग मे विमुख था ।› यहाँ सवधितकमल तथा मरिदारः 
रसिक राब्द प्रकरणविरुद्ध प्रथम अर्थं भी प्रस्तुत करते हें । 

विरोधामास- 

'स इति विरोधामासो यस्मिन्नथेदयं पृथग्भूतम्‌ । 
अन्य॒द्‌ वाक्यं गमयेदविरुद्धं सद्‌ विरुढमिव ॥? १०।२२ ॥ 

“जहा एक दी वाक्य रेते दो भिन्न.मिन्न अर्थो को अवगत कराए जो वस्तुतः भविरुद्ध रहने 
प्र भी विरुद्ध जसे प्रतीत हो 1› यथा- 

(तव दक्षिणोऽपि वामो वलमद्रोऽपि प्रलम्ब एष भुजः । 
दुयोँधनोऽपि राजन्‌ युधिष्ठिरोऽस्तीत्यदो चित्रम्‌ ॥ 

--छुम्हारा बाह दक्षिण हयोनेपर मी बाम [ दक्षिणेतर तथा सन्दर ] हे, वलमद्र्‌ [ वलराम, बल 
से सन्दर] होने पर मी प्रबलम्ब [ प्रलम्बाुर, जाजानुलम्बी ] है । दुर्योधन [ कौरवाधिप या 
धृतराष्ट्‌ का प्रथम पुत्र ओर जिप्फरे साथ स॒खिल् से ल्डाजा स्फेणेसा ] होने पर भौ युधिष्ठिर 
[ पाण्डुपुत्र धर्मराज तथा युद्ध मेँ स्थिर ] है । यह आश्चयं की बात दै। इस स्थल कौ अपेक्षा 
ूर्वोदूघत स्थर्लो मँ भन्तर्‌ केवर शतना है क्रि इस भेद मे स्वयं वि्ेष्यपद रिष्ट है ओर उनके 
द्वितीय विरुद्ध अर्थं भी निकलता है जव कि पूरवोदधृत स्थो मे विशेषणांरा मेँ ही दलेष ओर विरोध 
हे । यह भेद अर्विचत्कर है अतः अमान्य ३ । 

रुद्रट के इस विवेचन मँ उतना ही विस्तार है जितना प्राचीन तीनों आचार्यो के विवेचन मं 
संक्षेप था। परवती आवार्य नँ रद्र के विरोधसंवन्धी विकीणै तथ्यो का संकलन ओर संक्षेप 


दिखाई देता है । 
मम्मरद--मम्मटाचार्य ने विरोध का ददं मेद भी मान ल्या है किन्तु अभाव तथा देष 


ओर आमास के आधार पर किए भेदं .को अल्ग नदीं गिनाया है। मम्मट इन.;सब भेदा को 
विरोध काही अंग मानते है । मम्मट कै अनुसार विरोध का लक्षण इस प्रकार दै-- 
“विरोधः सोऽविरोधेऽपि विरुद्धत्वेन यद्‌. वचः ।' 


व 
१ 
क ख, 


सि 


0 वा क ऋः " अ" कक तात क त 


विरोधालङ्ारः &दे१ 


-- "विरोध वह जिसमं विरोध न रहने पर मी वात ेसी कदी जाय कि विरोध आमासित 


हो । इसके मेद गिनाते हए मम्मर ने ल्खा- 


'जातिश्चतुमिजत्याचेविरुडा स्याद्‌ गुणस्िभिः । 
क्रिया द्वाभ्यामथ द्रव्यं द्रव्येणेवेति ते दद ॥ 

“जाति का विरोध जाति आदि चारोंसेहोताहेै, गुणका गुण आदि तीन से, क्रिया का 
क्रिया जोर द्रव्य दो से तथा द्रव्य का केवल द्रव्य से ही ्स भ्रकार विरोधके दक्त भेद होते है ।' 
दस प्रकार मम्मट ने जाति का द्रव्य के साथ विरोध माना किन्तु रुद्र का खण्डन नहीं किया है, 
उन्दने इसका उदाहरण यह दिया है- 

खजत्ति च जगदि-दमवति संहरति च दै्येव यो नियतम्‌ । 
अवसरवद्यतः शफरो जनादनः सोऽपि चित्रमिदम्‌ ॥ 

जो परमेश्वर, इस संसार को खेल-खक मँ बनाता, पाल्ता ओर भिगाया करता है वहः 
भो अवसर भाने पर मछली वना यह्‌ आश्चयं की बात है ।› यहाँ भगवान्‌ विष्णु एक हँ जतः 
द्न्यरूप हें । मछली का वाचक शफर शब्द जात्िवाचक है क्योकि मछलियां अनेक होती है । 
विष्णु भगवान्‌ मेँ शफरत्व जाति का रहना स्थितिविरुदध है अतः यँ जातिद्रन्यषिरोध है । 
सवेस्वकार ने "रिच्छेदातीतः० तथा “अयं वारामेकः०' पद्य मी मम्मट के विरोधीदाहरणों मेसेही 
णहे । मम्मटने भी इन पदों में क्रियाक्रियाविरोध तथा क्रियादव्यविरोध माना है। 

उपयुक्त विवेचन से स्पष्ट हे कि जहाँ र्ट के अमावमृलक विरोधों को मम्मट ने नदीं अपनाया 
वहो मम्मट दारा अपनाए दस भेदं को सवेस्वकार ने आदर नदीं दिया । परवत्तीं - 

शो भाकर--शोभाकर भित्र ने अलंकाररत्नाकर मेँ जातति, गुण, क्रिया, धर्ममात्र, द्रव्य तथा 
अभाव इनमे पूवं पूवे के पदार्थो का बाद-बाद के पदार्थो के साथ विरोध मानकर जाति विरोध के 
छ, युणविरोध के पोच, क्रियाविरोष के चार, धमैविरोध के तीन, द्रव्यविरोध के दो तथा अभाव 
विरोध का एक भेद मान विरोध कं मेद ग्यारह के स्थान पर इक्ीस माने है । प्रत्येक का उदाहरण 
उन्दाने मौ उस्ती प्रकार नदीं दिया जिस प्रकार सवेस्वकार ने । अभावविरोष के ठि जो प्तं वीक्ष्च? 
उदाहरण विमरिनीकार ने दिया है वह उन्होने रत्नाकर सेद लिया है। विरोध का लक्षण 
उन्दने भी सर्वस्वकार के ही समान वामन से लिया है- "विरुदधाभासत्वं विरोधः ।? 

अप्पयदी्तित-कुवलयानन्दकार ने विरोधाल्कार प्र कोई वि्ञेष विवेचन नदीं किया 
हे । उन्होने - चन्द्रलोक का ही- 

आभासत्वे विरोधस्य विरोधाभास इष्यते । 
-- विरोध यदि आभासरूप हो तो विरोधाभास माना जाता है--, यह लक्षण देकर- 
'विनापि तन्वि हारेण वक्षोजौ तव हारिणो" 


हे उन्दरि ! तेरे उरोज विना हार के भी हारी [ हार वाके, आकषक ] है - यह उदाहरण 
दे दियाहे। 
पण्डितराज--पण्डितराज जगन्नाथ ने विरोध का लक्षण दो विकलो भे प्रस्व॒त किया है- 


( १ ) 'एकापधिकर णसम्बदत्वेन प्रतिपादितयोरथेयोभांसमानेकाधिकरणासंबद्धत्वम्‌, एकाधि- 
करणासम्बद्धत्वभानं वा विरोधः । यद्ा- 


( २ ) एकाधिकरणासंबद्धत्वेन प्रसिदधयोरेकाधिकरण ~ संबद्धस्वेन प्रतिपादन सः 1 


वि श व त कः 


७६२ अदद्धारसवेस्वम्‌ 


--^्एक ही अधिकरण मेँ संबन्धितरूप से प्रतिपादित अर्थका एक अधिकरण में सबन्धित न 
होने का आमास अथवा एक अधिकरण में संबन्धित न होने का मान विरोध कंदराता हे । अथवा 
[ इसका उल्टा ] एक अधिकरण मे संबन्धित न होने वाले रूप से प्रसिद्ध अथ का एक अधिकरण 
नै संबन्धितरूप से प्रतिपादन विरोधदहदोता दै) स्पष्टदही रद्रटकी प्रथम विरोध-परिभाषाका 
यहु नव्यन्यायमूल्क वि्दीकरण हे । तव भी इसमें एककारुत्व को छोड़ दिया गया हे । पण्डित- 
राज ने (आभासः का अथै किया है ङुछ-ङुकछ मास्ित होने वालाः = “आ = इषद्‌ भासत इत्या 
भासः" । इन्होने कीस मदो को न मान दस्र भेदो को ही स्वीकार किया है । यद्यपि अभावमूलक 
नेद का निरूपण भी कर दिया है। विद्धोषता यह दै किं पण्डितराजने धर्ममत्र तथा अभावको 
जात्यादि के भीतर ही अन्तभूंत मान जिया है। उनका कहना दै--'जात्यादिरितिं धमेमात्रं 
विवक्षितम्‌ , उपलक्षणपर त्वात, तेन ध्यः वालकोऽपि पुराणपुरुषः 'अगोद्धारकोऽपि नागोद्धारकः? 
इत्यादौ सखण्डोपाधेर भावस्य च परिप्रदः ।' 

_ (जात्यादि का अर्थं है धर्ममत्र । अतः जो वालक होते इभी पुराणपुरूष है, जो भगो- 
दारक [ वृक्ष का उद्धारकत्तां ] दोते इद मी नागोद्धारक [वृक्षका उद्धार न करने वाला, 
नाग = कुवल्यापीड हाथी का उद्धारक ] है-- इत्यादि स्थल) म उपलन्ध पुराणपुरषत्व आदि 
खण्डोपाधि तथा अमावका संग्रह भी हो जाता है।' पण्डितराजने उक्त दस्त भैर्दोकोभमी 
सर्वस्वकार के ही समान अह्व माना दै ओर कदा है-- 

“वस्तुतो जात्यादिमेदानामहयत्वाच्छुदधत्वदलेषमूकत्वाभ्यां द्विविधो ज्ञेयः । 

सत्य य॒द्‌ दै कि जात्यादि मेदो मँ कों चमत्कार नदीं दहै अतः विरोधके शुद्ध मौर 

दिल्ष्ट इस प्रकार केवल दोही प्रकार का मानना चाहिद 1 [ रसगंगाधर विरोधप्रकरण |\ 


विश्वेश्वर विखेदवर ने भी मम्मर से द्यी मिती पदावली मे- 
'अविरोवेऽपि विरोधो यत्रोक्तः स्याद्‌ विरोधः सः । 
स्याञ्जाते्यणकमंद्रव्याणां स्वस्वपरयोगात्‌ ॥' 


इस प्रकार विरोध का लक्षण तथा उसके दस ही मेद स्वीकार किणं । 
संजीविनीकार श्रीविच्ाचक्रवर्त नै विराध के सवेस्वकारकरेत संपूण विवेचन का सार संग्रह 
इस प्रकार किया है- 


‹विरोधस्तु तदाभासो जात्याचधंसमाश्रयः । 
तदवैचित्रयाद्‌ ददाविधो विषयेक्ये व्यवस्थितः ॥ 


-- विरोध कदलाता 8 विरोध का आमास । यह जाति आदि पर निभैर रहता दै ओर 

इनकी विरेषता ते दस प्रकार का होता है। यदह वहीं होता है जरह विषयेक्य रहता हे 1 
| सवश्व | 

पव वियेधतरुकत्वा विरोधप्रला अङकारः प्रदश्येन्ते । तत्रापि काये 

कारणभावमूटत्वे विभावना तावदाह-- 
९ [ अ 
| घू० ४२ ] कारणाभावे कायंस्योतपत्तिषिंभावना । 

इह कारणान्वयव्यतिरेकायुधिधानात्‌ कायस्य कारणमन्तरेणासंभवः । 

अन्यथा विरोधो दुष्परिहरः स्थात्‌ । यदि तु कयाचिद्‌ भङ्गया तथाभाव 


स ~~ ~ ______ क काका 


विभावनालङ्कारः ७ दद 


उपनिबध्यते तका विभावनाख्योऽलंकारः । विशिष्टतया कार्यस्य भावनात्‌ । 
सा च भङ्गिविंरि्टकारणाभावे कायोपनिबन्धः। अभस्तुतं कारणं वस्व॒तो.ऽ- 
स्तीति विसयेधपरिहारः । कारणाभावेन चोपक्रान्तत्वाद्‌ वटवता कार्यमेव 
वाध्यमानत्वेन प्रतीयते, न तु तेन कारणाभाव इत्यन्योन्य बाधकस्वानु- 
प्राणिताद्‌ वियेधाटकाराद्‌ मेदः । एवं विेषोत्तौ कायाभावेन कारणसत्ताया 
पच बाध्यमानत्वसुन्नेयम्‌ । येन खापि वियेधाद्‌ भिन्ना स्यात्‌ । 

इट च ऊष्चणे यच्प्यन्यैः कारणपदस्थाने क्रिया्रहणः छतं तथापीह 
कारणपद्मेव विहितम्‌ ¦ नहि स्वैः क्रियाफलमेव कायेसभ्यु पगम्यते । 
वेयाकरणेरेव तथाम्युपगमात्‌ । अतो विरोषमनपेक्षय सामान्येन कारण- 
पदमेवेह निर्दिष्टम्‌ । 

इस प्रकार विरोध का निवंचन किया। अव विरोषमूल्क भलंकार बतलाए जा रहे ङ, 
उनमें भौ कायकारणमावमूलक अलंकारो मे प्रथमतः विभावना का निव॑चन करते है. 

( सू० ४२ ] कारण के अभावे कार्यं की उत्पत्ति | बताई जाए तो अल्कार ङी 

खंच्ता | विभावना [ होती हे]। 

| ° | यहांकारणकेदोनेन होने पर कायका होनान दोना निभ॑र रहता हे इसल्एि 
कारण कं विना कायै की निष्पत्ति संमवदी नहीं दोती। पेसानदहोतो विरोधका परिहार 
करना संभव न हो । इतने पर मी यदि किसी प्रकार वैसा [ कारण कै विना काये की उत्पत्ति का ] 
वणेन किया जाताहेतो वहाँ अलंकार विभावना नामक होता हे, क्योंकि इसमे वि = विरिष्ट- 
रूप ते कायं का भावन = उत्पादन यह व्युत्पत्ति खागू होती हे। वह प्रकार है विशिष्ट [रिद] 
कारण के अमावमं काय की उत्पत्ति बतलाना यहो अने वाला विरोध “अप्रस्तुत कारण 
वस्तुतः वि्यमान है" इक ज्ञान से हट जाता है । यों कथन का आरम्भ कारणाभाव कै प्रतिपादन से 
होता हे अतः वही बल्वान्‌ होता है, फलतः उसके दारा कायेही बाधित होता-सा प्रतीत 
होतादे,न कि उस [कायं] केद्वारा कारणामाव [ बाधित होता है] फलतः अन्योन्यवाधकत्व 
पर निभेर विरोध नामक अलंकार से [ इस अल्कार का] अन्तर दहो जाता है। इसी प्रकार 
विशेषोक्ति में कायांमावके द्वारा कारणसद्धाव बाधित होता प्रतीत होता इभा जानना यादहिए । 
फरतः वह भी विरोध से भिन्न सिदध ह्योती है। 

यचपि यहां रक्षण मं [ भामह, वामन, उद्भट ओर मम्मट इन ] अन्य आचार्यौ ने कारण- 
शब्द के स्थान पर क्रियाञ्न्द अपनाया है तथापि [ मन्धकारने | यहां कारणश्ब्द का हयी 
विधान क्रिया, क्योकि ेसा नदीं हे किका्यकोक्रियाकाही एरु सभी | दारोनिक्‌ ] मानते हों । 
वसी मान्यता तो केवल वैयाकरणो की ही है। इस कारण विरि [ केवल वेयाकरण को 
अभिमत पदावली | को छोड यहाँ [ विभावनालक्षण को 1 सामान्य [ सर्वमान्य ] बनाने कै 
लिए कारण पद का उपयोग किया। 

विमदिनी 


तावदिति पथम्‌ । कारणा मावे कार्योतपत्तेरस्यन्तं विरुद्धत्वात्‌ । सदेति । कारणाभाव 
इस्यादिना । तन्न तावत्‌ कायस्य कारणपरतन्त्रतां दर्च॑यति--इहेत्यादिना यटुक्तम्‌- 
“यो हि येन चिना नारित यस्मिश्च विद्ते क्रिया । 
तदेव कारणं तस्य॒ नान्यत्‌ कारणञ्मुत्यते ॥' इति । 


७द४. अचङ्कारसवेस्वम्‌ 


अन्वयेति । यदि कारणं विनापि कार्यस्य संम्व उपनिबध्यत इस्यथः। नतु यथेव 
तत्कथं कारणाभावे कार्योस्पत्तिरूपा वि भावना भवतीस्याशष्कयाह - यदि त्वित्यादि । 
तथाभाव इति कारणाभावे कार्योर्पत्तिः । अत एव कायस्य वििष्टस्वम्‌ । सेति । यया 
भङ्गया कारणं विनापि कायंसंमव उपएनिवध्यत इस्यथः। विचिषटेति प्रलिद्धम्‌ । विरोष- 
परिहार इति 1 अप्रसिद्धस्य कारणान्तरध्य प्रस्ठतत्वाच्‌ । नतु यथेव तस्कथमयं विरोध 
एव न मदतीष्याज्ञद्कवाह- कारणेत्यादि । तेनेति कायण । यदुक्तमू-- 
'कारणरय निचेधेन बाध्यमानः फलोदयः । 
वि जावनायामा माति विरोधोऽन्योन्यवाधनस्रं ॥ 
अतो दूरविभेदोऽस्या विरोधेन स्यवस्थितः ।' इति । 
एतदेव प्रसङ्गाद्‌ .वित्तेषोक्केरप्याह--स्वमित्यादि । टखककरिपतश्चायमपपाटः। तथा हि 
'ठ्रतापि तच्च ख्स्यः दव्यादौ बङाहरणेन काथंभावेन तञ्ुहरणसरूपं कारणं न बाध्यते अपि 
तु सत्यपि तचुहरणाख्ये सखामभूये कथं न व हतमिति कायां मावस्यंव बाध्यस्वेन प्रतीतिः। 
तस्मात्‌ "एवं विशेषौ कारणसत्तया कार्याभावस्य व वाध्यमानत्वसुन्नेयम्‌' इति पाठो 
ग्ाद्यः ¦ एतदेव राजानकतिखकेनाप्युक्तम्‌- “कार सामग्रयमिह वाधकष्वेनेव प्रतीयते का- 
यानुस्पदिस्तर बाध्यत्वेन इति । प्रन्थक्कचच प्रायस्तन्मतानुवस्यंव । तदुक्तसमानन्यायोऽ- 
स्माभिः पालो छक्ितः । येनेति । एकस्येव वाध्यव्वेन प्रतीतेः ¦ ननु च "क्रियायाः 
प्रतिवेघेऽपि यर्फलछस्य विभ्रावनम्‌ । ज्ञेया विभावना-' इस्यादिनोद्धटादिमिरेतद्रकणे 
क्रियाग्रहणं कृतमिति कथमिह तदुल्टद्वनेन कारणग्रहणं छतमिर्याज्ञह्कयाह -- इदेत्यादि । 
स्नैरिति बौद्धादिभिः। अत इति । वेयाकरणेरेव क्रियाफलस्य का्ंस्याभ्यु पगमात्‌ । 
सामान्येनेति । सर्ववादिखाधारणतयेव्यर्थः ¦ सवंवादिसाधारणोऽयं भ्रन्थः । 
तावत = प्रथमतः । इसलिए कारण के अभाव में कायै की उत्यत्ति अत्यन्त विरुद्ध होती हे । 
आदह- निर्वचन करते है, कारणामाव ०” इत्यादि के द्वारा । यहीं पदङे कायेको कारण पर्‌ 
निर्भर वतरते है-- ह ०! इत्यादि के द्वारा । जेसा कि कहा है. जो जिसके विना [संमव] 
नहीं होता तथा जिसमे क्रिया रहती है वही उस [ काय॑ ] काकारण होताहै। अन्य विसीको 
कारण नहीं कहा जाता । अन्यथा = अथात य॒दि कारणक विनाभी कायं की निष्पत्ति वतलाईं 
जती है। यदिरेसादहैतो कारण के अभाव में कायांतपत्तिरूपी विभावना केसे मानी जाती दै- 
ठेसी शंका कर कहते है--यदि तु । तथाभावः = वेसा वणन अर्थात्‌ कारण के अभाव में कायेकी 
उत्पत्ति का वर्णन । इसीलिए यहो कायं विद्िष्ट [ असामान्य ] हुआ । सा = जिस प्रकार से 
कारणकेविनाभमी काय की उत्पत्ति वतलाईं जाती है। विज्लिष्ट= प्रसिद्ध । विरोधपरिहार = 
क्योकि वहाँ अन्य कोई गप्रसिद्ध कारण उपस्थित रहता है। यदिपेसाहे तो यह [ विभावना | 
विरोध दही क्यो नदीं मानी जाती' इस शंका पर ऽन्तर देते है--कारण इत्यादि । तेन = 
उससे = कायं से। जेसा कहा दै--¶विभावना मे कारणाभाव से कायांत्पत्ति का बाध प्रतीत 
होता दहै, जव कि विसोधमें एक दृू्तरे से एक दूसरे का वाध । इसलिए विरोध से इप्त [विभावना] का 
पयाप्त अन्तर है ।› 
इसी प्रसंग में विक्षेषोक्ति सेभी विरोधकामेद वतलाते हए लिखते है--एवमर्‌ इत्यादि 
के द्वारा । वस्ततः पंक्ति का यह रूप किसी प्र्िङ्पिकार की कल्पना दै, जो गलत ह । क्योकि 
[अगे दिए जाने वाले] ्द्रतापि तनुम्‌" पमे ओररेते ही भन्यस्थर्लोम वक्केन दरे 
जाने रूप कार्योत्पत्ति से शरीर का हरा जानाः रूप कारण बाधित नदी होता । प्रत्युत शशरोर- 


विभावनालङ्कारः 8६८ 


दरणरूप कारणके रहने परभी बरु काइरण क्यों नदीं इभाः इस मानसविकट्प के दारा 
कायं का अमाव दही वाधित प्रतीत होता दहै। इसक्ि याँ मूल पाठ यह मानना चाहिए- 
“एवं विदोषोक्तो°? = “इसी प्रकार विदोषोक्ति मे कारणस्तद्धाव के दारा कायांमाव बाधित होता 
समज्ञा जाना चाहिए । राजानक तिरक ने भी यदी कहा है- हों कारणो की समयता बाधक- 
रूप से ही प्रतीत होती है ओर काये की भनुत्पत्ति वाध्यरूप से अन्धकार प्रायः उनके मत 
का अनुसरण ही करते हे । अतः हमने उनके [ इस उद्धृत ] कथन से मिरुता हा ही पाठ 
स्तुत करिया दै । येन = जिसे अथात्‌ किसी एक के ही वाध्यरूप से प्रतीत होने के कारण । 
रोका--क्रियाका जभाव रहने परमभी फलकी जो विशिष्ट उत्पत्ति उसीको विभावना जानना 
चाहिए" इत्यादि कहकर उद्भट आदिने इसके रक्षण में क्रियाराब्द अपनाया है। आपने 
उसका उरलंघन कर्‌ कारणशब्द का हण क्यों किया है रेसती ंका कर उत्तर देते है- 
"दहः ०-इत्यादि । सदः == बोद्ध आदि के दारा अतः = वैयाकरणो हीने कायं को क्रिया का 
फल स्वीकार किया हे । सामान्येन = सामान्यरूप से अर्थात्‌ सभी दाश्ंनिको को भभिमतरूप 
से [कारण राब्द दे देने से अव ] यह यन्थ सव॑मान्य हयो गया । 
| स्वस्व | 
यथा- 
'असंश्तं मण्डनमङ्गयषेरनासवाख्यं करणं मदस्य । 
कामस्य पुस्पभ्यतिरिक्तमचखं बास्यात्‌ परं साथ वयः परपेदे ॥' 

अश्न द्वितीये पादे मदस्य प्रसिद्धं यदासवास्य॑ करणं तद्भावेऽपि 
यौवनदेतुकत्वेनोपनिबन्धः छृतः । मदस्य च दे विष्येऽप्यभेदाध्यवसा- 
यादेकत्वमतिश्योक्त्या। सा चास्यामव्यभिचास्णीति न तद्वाधेनास्या 
उत्थानम्‌ , अपि तु तद्‌नुप्राणितत्वेन | 

इयं च विरोपोक्तिवटुक्ताजुक्तनिमित्तभेद्‌ाद्‌ हि विधैव । तथोक्तनिमित्तोद्‌- 
हता । अचचुक्तनिमिन्ता यथा- 

अङ्गटेखामकाषश्मीरसमाटम्भनवपिञ्जराम्‌ । 
अनालक्तकतास्राभामोष्ठटेखां च बिश्रतीम्‌ ॥' 

अञ्न सहजत्वं निमित्तं गम्यमानम्‌ । असंश्तं मण्डनमिति, कामस्य 
पुष्पञ्यतिरिक्तमस्रमिति चात्र विवदन्त--श्यमेव विभावनेति केचित्‌ । 
संभरणस्य पुष्पाणां च मण्डनमसखं प्रस्यकारणत्वाद्‌ वाउ््रा्मेतत्‌ । पएक- 
गुणान विरोषोक्तिरित्यन्ये। रूपकमेव!धिरोपितवैरिष्स्यमिति त्वपरे । आसे- 
प्यमागस्य धरते संभवात्‌ परिणाम इत्यद्यतनाः । 

[ ( उक्तनिमित्ता ) विभावना का उदाहरण ] यथा- | 

“भव्‌ वह [ पावती ] अंगयष्टि का साजसस्नारहित अलंकरण, भसवनामरदित मद का कारण, 
काम का पुष्पभिन्न अख जो वास्य के बाद का वय [ यौवनारम्भ ] उपे पर्ची । [ इुमारसं° १। ] 

यह द्वितीय चरण मेँ नरे का जो आक्तवनामक प्रसिद्ध कारण ह उस अभाव सें 
मी मद कौ योवन से उत्पत्ति बतला गै है । वस्तुतः [ आवसजनित भोर यौवन- 
जनित । मद दो अलग-अलग प्रकार के है तथापि [ एकशब्दवाच्यतामूरकः ] भतिश्षयोक्ति कै 


२० अ० सण 


७६६ अच्छङ्ारसवस्वम्‌ 


दारा अमेदाध्यवसाय होने से [ यदो ] दोनों एक हे । यद [ अतिरायोक्ति ] यहं [ विभावनामं | 
नियमतः रहेगी ह अतः इस [ विभावना ] की निष्पत्ति उस [ अति्योक्ति] के वाध के नदीं 
दोती, भपित उससे अनुप्राणित होकर होती हे । 

विशेषोक्ति के [दी ] सम(न यह [ विभावना ] दो प्रकार कौ दोतौ है उक्तनिमित्ता तथा 
अनुक्तनिभित्ता । शनम से उक्तनिमित्ता का उदाहरण [ अकखृतम्‌० | दिया जा चुका है । अनुक्त- 
निमित्ता का उदाहरण यह दै-- 

८अंगेखा [ अंगयष्टि ] जो केदार रस केलेपके विनाद्ी पीत वण कौ थी तथा ओष्ठलेखा 
जो विना आलक्तक के ताघ्रवणं की थी, कौ धारण की इडे [ पावती ]। 

य्या अपने आप उत्पन्न होना रूपी कारण [ शब्दतः कथित नदीं है, अतः ] गम्य है । 

'ताजसल्नारदित मण्डनः यद, भौर “काम का पुष्पभित्न अख्ः यह [जो अंश हे इस पर 
छ विचारक [ हमारे ] विरुद मान्यता प्रस्तुत करते ओर कडते दै “[ वस्तुतः ] विभावना यही 
[ अथवा यह्‌ विभावना दी ] है"; [ किन्तु सत्य यदह है कि] यद उक्तिमात्र है [ उक्तिवेचित्रयरूप 
जटक्नार नदीं ], क्योकि साजसञ्ना मौर पुष्प क्रमशः मण्डन ओौर भख के प्रति कारण नदीं दै । 
अन्य आचाय [ वामन भादि ] यद्य [ वैचिच्य का अनुमव करते ओर ] एक युण की दानि से 
होने वारी विदेषोक्ति मानते है । दूसरे [ उद्धटादि ] आचायं वैशिष्ट्य के आरोप से युक्तः रूपक 
मानते है । यहां अ(रोप्यमाण [ मण्डन, अख् ] प्रकृत [ वय ] मेँ संभव है अतः आधुनिक विचारक 
यहां परिणाम स्वीकार करते हं । - 


विमरिनी 


दवितीय इति । अन्यपाद्योर्न वि भावनेष्यर्थः 1 यौवनदेतुकत्वेनेति । खमाधानायाप्रसिद्धं 
कारणमानिस्येस्य्थंः । अन्यथा हि विरोधपरिष्टारो न स्यात्‌! ननु चाक्वन्नितोऽन्य 
पव मदो यौवनहेतुकश्चान्य एवेस्यत्र यो वनहेतुक एव विवक्षित इति कथं कारणाभावे 
कार्यस्योर्पत्तिरिस्या च ङ्कधाह-मदस्येत्यादि । द्वैविध्य इति कते्यदृपैरूपे । सेव्यतिक्ञायोक्ति । 
अव्यभिचारिणीति । अतिश्चयोक्ति विनास्या अनुस्थानाक्ु । अत एवेयमतिक्रायोकव्यनुप्राणि- 
तैव भवतीति किद्धम्‌ । तदेवाह--तदनुप्राणितत्वेनेति। यषुक्तमन्यत्रापि -'जश्िष्टाति- 
शयोक्तिशथ सर्वत्रैव विभावना" इति । 


ननिरुपादानक्षंभारमभित्तावैव तन्वते । 
जगचिच्रं नमस्तस्मे कराश्छाध्याय शूलिने ॥' 


० म, 
इष्यत्र तु जगत उपादानादिविरदेणैव भगवत्कार्य॑स्य वास्तवत्वाद्‌ विभावनेव 
नास्तीति कश्यातिक्योक्त्यनुप्राणितश्वं स्थात्‌ । एवम्‌- 


प्ण अ र्वं ण अ द्धी णावि कटं ण अ गुणा ण विण्णाण । 
एमेअ तह विकस्ख विको वि अणो वल्लहो हो ॥' 


इत्यादावपि जेयम्‌ । अतश्च कचिच्छुदधस्यापि संभवात्‌ सव॑त्रास्यातिश्योक्च्यनु- 
ति न वाच्यमिति यदुक्तं तदयुक्तम्‌ । विरोषोक्तिवदिति । विदोषोक्तौ प्राच्येयथो- 
क्तमित्यर्थः। 

अन्न चाध उदाहरणे द्वितीयपाद एव विभावना व्याख्येया न यु नरन्येयंथोक्तमि- 
स्याह--अ्मृतमभित्यादि । के चिदिति विवदृन्त इति संबन्धः । अकारणत्वादिति । सं मरणादि 
हिमण्डनादेः स्वरूपम्‌ । यथेवं तद्यत्रान्यः कोऽरंकार इस्याज्ञङ्कधाह--पकेत्यादिना । 


> न 


विभावनालङ्ारः ७६७ 


अन्य इति वामनीयाः । अपर इध्यौद्धटाः । चृतीयस्तु पत्तो न गाह्य" रेखक परिकहिपत- 
प्वात्‌ । तथाद्यरोष्यमागस्य परङ्ते संभवं इति न परिणामरुचगमस्‌। आरोप्यमाणस्य 
प्रकृत उपयोग इति तस्य ्क्तितव्वाच्‌ । संभवोपयोगयोश्च नैकष्वम्‌ । भिश्चत्वात्‌। न्थ. 
तापि _ सादिस्यमीमां लायामेतच्छरोकविच्र॒तौ पचद्धयमेवोक्छपर्‌ । ठेखकेशचास्य अन्थस्य 
भरतिपदमेव विपयांसः कृतः । तथा चात्रेवा्तमिस्यादिको अन्धस्तदूनुप्राणित्पेनेस्य- 
स्य पश्चादुपपन्नोऽपि गम्यमानमिध्यस्य पश्चा्लिखितः। एतच्च न तथा दूषणमित्यस्मा- 
भियथास्थित एव मन्थो व्याख्यातः । 

द्वितीय = द्वितीय चरण कने का अथ॑ यह है कि अन्य दो [ प्रथम तथा तृतीय ] चरणों 
म विभावना नदीं है । चयोवनहेतुकतवेन ध्योवन से जनित अथात्‌ समाधान के किए अप्रसिद्ध 
कारण को अपना कर । अन्यथा विरोध का परिहार न दोता। [ रोका ] आसवजनित मद अन्य 
दी है जौर योवनजनित अन्य ही, यां यौवनजनित मद ही विवक्षित है तव कारण विमान 
दी हे उस | के अमात्र मेँ कायं की उत्पत्ति केसे वतलाश्जा रदी दहै रेस देका कर उत्तर देते 
द -मदस्य० । द्वैविध्य = क्षीवता [ नशा] रूप ओर दं रूप। सा= वह = अतिद्ययोक्ति 
अञ्यभि जारिणी = अतिशयोक्ति के विना श्स [ विमावना ] की निष्पत्ति नदीं होती इसि 
सिद्ध यह हमा किं यह [ विभावना ] अतिशयोक्ति से सदा टी अनुप्राणित रहती हे। 
श्सी को कते है--तदनुप्राणितत्वेन । जेसा कि अन्य॒त्र मी कहा गया है-विमावना सदा 
अतिशयोक्ति का आलिगन किर रहती है। 

“विना उपादान सामग्री के ओर बिना भित्तिके जगत्‌ रूपी चित्र बनाने वाले भतः राव्य 
कला वाले भगवान्‌ राकर को नमस्कार हे। 

-- यदं तो जगत्‌ उपादान के विना ही वास्तविकरूप से भगवान्‌ का कायं सिद्ध होता & 
अतः यहां [ अल्काररत्नाकरकार द्वारा स्वीकार की गईं ] विभावना ही नहीं है फलतः अत्ति. 
शयोक्ति से भनुप्राणित किते माना जाय। इती प्रकार-[ रलाकरकार दारा विभावना कं 
लिर उद्धृत |] - 

न चरूपन ऋदधिनांपि कुलं न च गुणा न विज्ञानम्‌ । 
एवमेव तथापि कस्यापि कोऽपि जनो वभो मवति ॥? ॑ 

-नतोल्पही रइता,ःन ऋद्धि [ धन] नकुल, न शुण भौर शिल्प [ विज्ञान ] छ । 
तथापि, रेते ही किती के छ्एिकोईं जनभ्रिय होता है।--इत ओर रेते दयी अन्य स्थलों 
भी जानना चार्दिए। [ प्रीति जिस प्रकार सहैठुक होती है उसरी प्रकार अहेतुक प्रत्ति भी 
होती ढै, अतः यदं वस्तुकथनमात्र हे अल्कार नदीं ] ओर इसीकल् | अल्काररत्न[करकार 
ने निरुपाद्‌ान ` पद्य मेँ अतिशयोक्तिरहिते शुद्ध विभावना मानकर सर्व॑स्वकार की विभावनां 
सदेव अतिशयोक्ति से अनुप्राणित रहती है'--इस मान्यता का निराकरण करते हुए जो ] 
कर शद | अतिशयोक्ति दित ] विभावना भी संमव है अतः यह सर्वत्र अतिक्योक्ति से 
अनुप्राणित रहती दै ठेसा नदीं कना चादिए--यद कहा है [ अलंकाररत्नाकर १० ९४ 1 
वह ठीक नदीं दै । वद "विशेषोक्तिवत्‌' = विेषोक्ति के समान-, अर्थात्‌ प्राचीन माचार्यो 
ने नो भेद केवल विशेषोक्ति मे बतलाए है, वे इस विभावना ममौ संमवहह। 

य्दा जो पहला [ असंगृतम्‌० ] चदाहरण है उपे विभावना केवह दूसरे ही चरणमें हे रेप्ती 
ग्याख्या करनौ चादि न कि अन्य लोगो ने(?) जैसा कहा है। यी कहने के लिए लिखते 
हे -असंरतं इत्यादिं० । "केचित्‌, = इसका संबन्ध "विवदन्ते, से है । अकारणत्वात्‌ =कारण न 
होते से--अथांत्‌ संभरण = साजसस्ना भादि तो मण्डन स्वह्प ही हे, उनसे भिन्न नहीं, जो कारण 


७द८ अलकारसवेस्वम्‌ 


हे, ध्यदि रेखा & तो यदं दूसरा कौन अलंकार है- रेसी दका उठाकर लिखते दै- एक° 
इत्यादि । अन्ये = अन्य अर्थात्‌ वामनाचुयायी । अपरे = दूसरे अर्थात्‌ उद्धटानुयायी । तृतीय 
[ परिणामपक्ष ] अग्राह्य है क्योकि वह प्रतिरिपिकार द्वारा जोड़ा गया हे । इसलिए कि परिणामका 
'ञासेप्यमाण का प्रकृत मेँ संभवः यह लक्षण नहीं है । इसका लक्षण तो मन्थकार ने "आरोप्यमाण 


का ग्रकृत मे उपयोगः रेसा दिया हे । संमव ओर उपयोग दोनों एक नदीं हो सकते । वे भिन्न 


है 1 मन्थकार ने सादित्यमीमांसा मेँ जहां इस प्य की व्याख्या की दै वों [ विेषोक्ति ओर 
रूपक के] दो दी पक्ष प्रस्त कि हैँ [ परिणाम पक्ष नहीं ]। यदतो स्पष्ट है कि छिपिकाररं 
ने इस अन्थ में पदे पदे उल्ट-फेर किए है । यहीं 'अरंमृतम्‌? इत्यादि [ थात्‌ असंथतम्‌-अथतनाः' 
इस अन्तिम ¡ मन्थां को रखना उचित था (्तदनुप्राणितत्वेनः के पश्चात्‌; कन्तु उप्ते रखा हे 
“गम्यमानम्‌” इसके पश्चात्‌ । यदह उतना सदोष नदीं था, इस्त कारण हमने अन्थ स्थिति को छखधारे 
विना ही व्याख्या कर दी है। [ विमधिनीकार का सक्लाव ठीक है) दक्षिणो पोथियां मं एेसा 
पाठ भिकर्ताभीदहे|। 
विमर्श सर॑स्वकार ने अरयतं०? पथ मँ विभावना इसलिए मानी कि उद्धट ने “अंगटेखा०? 
पद्ये विभावना मानीथी। इउद्धय्के ठप्त डुमारसुंमवके स्स पद्य पर कालिदास के कुमार 
संमव के उपर्युक्त 'अरखतम्‌' पद्य की रपष्ट ही छाया है । समानमाव वाला दीने सतेस्वकार 
ने अंगटेखाः पच को छोड़ (अरभतंः पय को अपनाया यदपि उन्हें इस पयमें अरुचिमी ह । 
वस्तुतः उनकी अरुचि निल हे। उनका कहना किडइस प््यमें केवल द्वितीय चरणमं दही 
विभावना है। प्रथम तथा तृतीय चरणमें नहीं। इसका कारण उन्होने यह मानादहेकि प्रथम 
तथा तृतीय चरणों मँ जिसके भभाव में जिसकी उत्पत्ति वतलाईं गहं है उनमें परस्पर में काये 
कारणमाव नदींदहै। अर्थात्‌ प्रथम चरणमें जो स्मरण ओौरमण्डनदहंवे एक दूसरेकेकारण 
नहदींह। वे परस्परमें अभिन्न अर्थातजो संभरणदहै वदी मण्डन है तथा जो मण्डन वही 
संमरण । इसी प्रकार पुष्पभी कामके वारणो के कारण नदीं सवयंबाणदहीदहे। वस्तुतः संमरणका 
अर्थ सव॑स्वकारने रीक नदीं समस्षा। वेउसे क्रिया रूपया क्रिय।फल समञ्च गए । कविक्ी 
विवक्षा उससे भिन्न है । वह कहना चादतादहे कि यौवनके आततेदही बिना अल्करण सामयी के 
शरीरयष्टिकारोम रोम अल्क्ृत हो गया। अस्मृत दब्दका अथं संमरणया सामग्री के विनाः 
है । कालिदास के ही इस्त पच से यह तथ्य स्पष्ट है- 
अथ मधु वनितानां नेत्रनिवेरानीयं मनस्सिजतरु-पुष्पं र| गवन्धप्रवालम्‌ । 
अकतकविधिसवाज्गीणमाकरपकजातं विरसितपदमायं यौवनं स प्रपेदे ॥ [रघु ° १८।५२ 
अग्निवणै यौवन म पचा । यौवन क्याथा, बनिताओंके द्वारा भर्खोसे पिया जाने 
वाला मधु था) कामवृक्ष का रागवन्धरूपी प्रवा से मण्डित पुष्प था, विना बनावट के भगञअंगका 
अलंकरण था अर विलास काधर था) 
य॒ष्टा अक्रतकविधिः शाब्द से निककते कृतकराब्द दारा करतिमता ओर करत्रिमता दारा मण्डन 
के उपरी साजसनज्जासे वन।एजानेकातथ्यस्पष्टहै) खली भौर पुरुष के मण्डन में जिन जिन 
वस्तुनां की आवदयक्ता हाती थी काटिदासने उनका भी उर्लेख राज्याभिषेक के पूवे हण 
मतिथिके मटंकरणमें [रघु० १८।२२-२५ ], तथा हिव भौर पार्वती कै विवाह के प्रकरण 
[ कमारसं, ७ ] म एक एक करके कर दिया हे । संभार शब्द का प्रयोगमीवे सामग्रीके किए 
क्रतेहेः। रघुव्दामें भगवान्‌ रामके यज्ञका वर्णेन करते हुए वे लिखते है- 
'विधेरधिकसंमारस्ततः प्रववृते मखः। 
आसन्‌ य॒त्र क्रियाविघ्रा राक्षसा एव रक्षिणः ॥ १५।६२ ॥ 


त 
| 


विभावनालङ्कारः ७६९ 


यज्ञ आरम्भ इञ, जिसमें संभार विधिप्ते अधिक था भोर जिसमें यक्ञध्वंसक राक्षप्त दी रक्षक 
थै इस पमे विधिसे अधिक संभार का अथै यहहै कि यज्ञ विधानमे जितनी सामयी अपेक्षित 
थी उससे भी अधिक सामग्री व्हा थी । कालिदास श्रद्धा भोर विधि के साथ वित्तभी यज्ञ के लिए 
अपेक्षित मानते है -- 
श्रद्धा वित्तं विधिस्चेति त्रितयं तत्‌ समागतम्‌”-[ शाुन्तङ ७ ] 


(रा न्तरा, सवेदमन तथा दुष्यन्त तीर्न का मिलन एक प्रकार से धद्धा वित्त भौर विधिका 
मिलन हे ।› इस प्रकार (असंभृतम्‌ का अर्थं सामग्री रदित करना दही ठीक हे, सामगी मौर 
मण्डन मे करायकारणभाव सिदधदही है। फलतः प्रथम चरणे भी विमावना मानी जा सकती ३। 


तृतीय चरणमें मो विभावना मानी जा सक्ती है कर्योकिकामके वाण के प्रति पुष्प कारण 
रूप से प्रसिद्ध है । कालिदास स्वर्यं लिखते है-- 


(स यःप्रवालोद्धम चारुपत्रे नीते समाप्ति नवचूतबाणे । 
निवेदयामास मधुद्धिरेफान्‌ नामाक्षराणीव मनोभवस्य ।› [ कु° ३।२७ ] 

-- नवौन आच्रपुष्प रूपी बाण तत्काल निकलो कपल के लाल रार पत्तो से युक्त होकर 
जव पूरा बन चुका तव बसन्तने उसपर मानों मोरो को कामदेवके नामाक्षरके रूपमेंजडा 
स्पष्टदहेकरि पुष्प रत्तिकास्थानीयदहै ओर बाण धटस्थानोय। दूसरे शर्ब्दो मे दृक्ष मानां षस 
हे, पुष्प बस कौ पतली चाखा अथवा करी ओर छी डण्डी | बाण नहीं। बाण वह तव बनती 
हे जव उसमे पौरे पंख ल्ग जार । पंख हैः पत्ते। रति विलाप करते इए वसन्त कै छि एक विरेषण 
प्रयुक्त करती दै-कुखमायोजितका्यंकः- 

क्वनु ते हृदयंगमः सखा कुख॒मायोजितकासुंको मधुः । [ कु० ४।२४ ] 


तुम्हारा प्रिय मित्र वसन्त कहा है जो पूरष्पा से तुम्हारा धनुष बनाया करता धा ' इससे स्पष्ट 
हे किएक पुष्पनतो वाणी बनता ओरन चपही। बाण भौर चापकी योजना पुष्प कोर्गुध 
गूंध कर कौोजा सक्तीहे। इसीलिए उप्यक्त पद्मे आन्रमज्जरीको बाण कहारै । मजरी 
विशिष्ट अकार के पुष्प समुदायका ही नाम होता है। संरछृत के अन्य कवियों म भी यह अभि- 
प्राय पयाप्त मात्रा में मिलता है। इस प्रकार (कामका बाण ओर पुष्पः इनमे मी कार्यं 
कारणभाव सिद्धहो जातादहे। इस प्रकार सवैस्वकार का यह कथन कविस्तंमत नद्दींकि पुष्प 
ओर वाण मँ कायंकारणमावनदहींहै। हौँवे रतना कह सक्तेथेकि तृतीय चरणमें प्रसिद्ध 
कारण का अभाव प्रतिपादित नहीं है, अपितु अप्रिद्ध कारण का प्रतिपादन विवक्षित है--पपुष्प 
व्यतिरिक्त बाण कहने का यही अभिप्राय हो सकता है। इस कारण यहो विभावना के एक अंश 
कारणभाव का अमाव हे फर्तः विभावना संमव नदीं होतो वह व्येग्यमात्र हो सक्ती है, क्योकि 
पुष्पव्यतिरिक्त कहने से पुष्पके अभावमे भी बाणनिष्पत्तिकी गुज सुनाई देती है । इस 
प्रकार प्रथम चरणमें तो विभ।वना निश्चित रूपसे विधमानदहैही तृतीय चरण में विभावनां 
मले हौ सिद्धन दहो स्वैस्वकार द्वारा उसके अभावकेक्एिदिया देतु संगत सिद्ध नदीं होता । 


पण्डितराज जगन्नाथ ने मी अंसृतम्‌- “पच पर सव॑स्वकार के उद्धृत तका का खण्डन किया 
दे । उनका कहना हे कि -ध्यहोँ योवनमे दो तत प्रतिपादित किएजा रहे है एक तो आसव- 
भिन्नता जर दूरा मदकफारणता । इनके प्रतिपादन से विभावना कौ निष्पत्ति संमव नहीं । 
वहु तब समव होती जव मद रूपी काये की निष्पतन्ति वतलाई जाती जर बतलाया जाता भासव 
का अभावः साथदहौी अन्य किप्ती कारण का असितित्वन बतलाया जाता। यतो यौवन रूपी 


७७० अटट्धारसवेस्वम्‌ 


कारण का अस्तित्व दही बतलायाना रहा है अतः विमावना के किए अपेक्षित कारणामाव रूपी एक 
अंग यहां नदीं है । योवन भी भासवके ही समानमदकाकारणदहै। [ द्र° रसगंगाधर ५८४ पृ८] 

अन्ततोगत्वा पण्डितराज ने यां प्रथम ओर तृतीय चरण मेँ न्यूनामेद रूपक माननेकी 
संभावना व्यक्त कीदहै ओर द्वितीयचरण मेँ प्रतीयमान उत्प्रक्षा। वस्ततः इस पद्मे असंभृतं 
मण्डनम्‌? क्स प्रथम चरणमें ही हमारे दारा प्रतिपादित अंके अनुसार शद्धतम विभावना 
संमव हे । देष चरण विवादास्पद हैं । 

विभावना का इतिहदास- 

मामह्‌, दण्डी; वामन, उद्धर, रुद्रटः मम्मर ओर सवंस्वकार के विभावनाविवेचनों से 
विदित होता है किं विभावनाका मृलभूत तच्च कारण के अमाव रे कार्योत्पत्ति का वर्णन दै । 
यह्‌ वणेन अनेक प्रकार से किया जाता है अतः उक्त आचार्ये स्ते रुद्रट तथा दण्डी ने विभा- 
वना के एकाधिक प्रकार बत्तरने का प्रयत्न किया हे। उपयुक्त आचार्यो का कालक्रम पूवं प्रदत्त 
अलंकारो के इतिहास मे स्पष्ट हे अतः यहाँ इनके विभ।वना लक्षण उपजीन्य-उपजीवक भाव वे 
घाधार पर दिए जते है- 

भआमद- तथा 

खद्धट-- क्रियायाः प्रतिषेधे या तत्फलस्य विभावना | 

लेया !विमावनैवासो समाधौ सलमे सति ॥ 


--{ कारणभूत | क्रिया के भमाव मे उसके फल की विभावना [ असंभव सती उत्पत्ति] ही 
विभावना [ नामक अलकार ] कहलाती हे किन्तु यदि समाधान सुलम हो । उदादरण- 

भामह = जपीतमन्ताः शिखिनः" = पक्षी विना मधुपानकै मन्त ये।' 

उद्धर = सवस्वकार द्वारा उदाहृत “अंगलेखाम ० पद । 

चामन-{ सूत्र ] क्रियाप्रतिषेधे प्रसिद्धतत्फलव्यक्तिविंभावना ॥ 

[ वृत्ति | क्रियायाः प्रतिषेधे तस्या एव क्रियायाः फलस्य प्रसिद्धस्य व्यक्तिरविभावना | 

क्रिया को निषेधोक्तिके साथ साथ उसके फल के [ प्रसिद्ध = सिद्ध = ] निष्पन्न हाने 
का | व्यक्ति | उक्ति विभावना कहलाती हे । उदाहरण = भक्षाटिति विद्युद हृदय ।› स्पष्टहे कि 
भामह के लक्ष्ण क पदावली मे वामन ने अपनी मौरसे केवल दो नए ह्द जोड़ दविणदहै 
एक प्रसिद्ध ौर दूसरा व्यक्ति। ये दोनों शब्द व्याख्यासापेक्ष है । संसत म प्रसिद्ध शब्द 
का प्रयोग सिद्ध अथमेमीहोतादहै [द्र हमारा लेख- कालिदास के शब्द'--नागरी प्रचारिणी 
पत्रिका २०१९ | व्यक्ति का अथं नीचे दिए मम्मट कै लक्षण तथा उत्तकी वृत्ति के अनुसार 
प्रकाशन हे जत एव मने इसे “उक्तिः शब्द से अनूदित कियाहै। मम्मरका लक्षण वामनक 
लक्षण का अधिक विदद ओर सार्सक्षेप है 


मग्मट = [ सु° | (क्रियायाः प्रतिषेधेऽपि फलध्यक्तिविंभावनाः । 
[ वृत्ति | “हेतुरूपक्रियायाः निषेधेऽपि तत्फल प्रकाशनं विभावना 


-देरूप क्रियाया का अभाव [ अभावोक्ति ] रहने पर भी उसके फल कौ उत्पत्ति [ उत्पत्ति 
कथन विभावना कहलाती हे 1 


उदाहरण = वह वियोगिनी अमरप॑क्ति दारा न काटने पर मी लोट-पोट दोरही थीः 
[ भचञ्क्िैरदष्टापि परिवत्तते स्म सा ] 


॥ 9 त _ 4 ‰ ऋक सौ नि नि 
---- यि न~ म 


विभावनाटङ्कारः ७७१ 


इस प्रकार उक चार आचार्योमे विभावना का स्वरूप प्रायः एक ही पदावली मं स्पष्ट 
किया हुआ मिलता है । इनके उदाहरणं मे भी अभिव्यक्ति की एकरूपता मिलती है। सवर्मे 
विभावना के दोनों अंगस्पष्टदहेः(१) कारणका अभाव गौर (२) कायं की उत्पन्ति। दण्डी 
ओर रुद्रट ने इन अभिव्यक्तियों मे विभावना का समथन किया किन्तु उर्ोनि अन्य अभिन्यक्तियों 
पर भी विचार किया । इनके विवेचन इस प्रकार है :- 
दण्डी = [ १ | श्रसिद्धहेतुन्यावृत््या यत्किचित्‌ कारणान्तरम्‌ । 
[ २ ] यत्र स्वामावाविकत्वं वा विभाव्यं सा विभावना ॥ 


-- प्रसिद्ध हेतु को अलग का जहां कोई अन्य हेतु अथवा स्वाभाविकता प्रकाडित की जाए उसे 
विभावना कहते हे ।' उदाहरण- 


१ = अपीतक्षीवकादम्बं जगत्‌” = रारत्काल मं संसार कुछ एेसा था जिसमे कादम्ब [ नीले 
दंस ] विना मयपान के मत्तये 1 

२ = अकारणरिपुश्चन्द्रः' = चन्द्रमा विना कारण के राञ्रुहे। 

इनमें से प्रथम में मत्तता का प्रसिद्ध हेतु म्यपान हटाकर अन्य हेतु मयपानामाव बतलाया गया 
दे। दवितीय मे चन्द्र को अकारण अर्थाव्‌ स्वभावतः रिपु बतलाया गया है। अतः कान्वादरकार 
दण्डी के मनुप्तार दोनों स्थलों में .क्रमद्यः पूर्वोक्त दोनों विभावनां हैँ । वस्तुतः मद्यपान का 
अभाव अन्य कोई कारण नीं, अपितु प्रसिद्ध कारण मवपान का जमाव ही है । इसका ठीक उदाहरण 
उपरि उद्घ्रृत असंचतंः इत्यादि पूर्णं पद्य है । उप्तम यौवनरूपी नवीन कारण प्रस्तुत किया 
गया हे । रुद्रट दारा अगे जो तीसरी विभावना बतलाई जाने वाली है उसका उदाहरण (मददेतुर- 
नासवा लक्ष्मीः मी इसके लिए उपयुक्त उदाहरण कहा जा सकता है । माम ओर दण्डी दोनों 
के उदाद्रणा मे स्मानाथकता विचारणीय है । द्वितीय विभावना म एक सूक्ष्म अन्तर है । यह 
कि विभावना में प्रायः कारण विज्ञेष का उच्लेख कर उसका अभाव बतलाया जाता है! उपयुक्त 
सभी उदाहूरणो मे मद्यपान, क्षारन) केसर तथा अरमरदंशण्सेही कारण है जिनका भमाव 
वतलाकर उनके कायं का सद्धाव वतलाया गय। है । (अकारणरिपुश्चन््र मे रेखे किसी विदशेष 
कारण का अभाव नहीं बतलाया गया। इस कारणम इस उक्ति मे उसका आक्षेप द्वारा ज्ञान 
होता हे । ज्ञान होता ३ कि ष्चन्द्रमा का वैसा कोड अहित वियोगी ने नदीं किया जैसा कि राह 
आदि के द्वारा किया जाता है, अथापि चन्द्रमा उन बेचारोंका बैरी बना हा है। इस प्रकार 
यहां विमावना बन तो जाती हे परन्तु वह अस्पष्ट या व्यङ्ग्य रहती है । 

स्दटररुद्रटने कारण के अभावके कायं की उत्पत्तिके साथ साथदो अन्य प्रकारं से 
भो द्मिोद्न मानो हे विग्टुं उनके ये दोना प्रकार प्रथम प्कारमें ही भम्तभूत दहो जाते हे तीनों 
प्रकार क्रमाः इस प्रकार है- 

१ = सिय विभावनाख्या यस्यासुपरभ्यमानमभिषेयम्‌ । 

अभिधीयते यतः स्यात्‌ तत्कारणमन्तरेणैव ॥ 


-- “जां कोड पदाथ विना {उस्तके कारण के प्राप्त होता हृभा बतलाया जा रहा दहो उसे 
विभ(वना कहते हें › उदादरण = शं वो दि्याद्‌. दिनङ़दतैलपूरो जगदीपः ।-- वह्‌ सूये आपका 
करयाण करे जो विना तेर भरे पूरे जगत्‌ मेँ उजाला करने वाला दीपकः है 

२= यस्यां यथा विकारस्तत्कारणमन्तरेणेव सुव्यक्तः । 

प्रभवति वस्तु विशेषे विभावना सेयमन्या तु ॥! 


७७२ अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


-- जहां कोई विकार अपने कारणके विना ही किं्ती वस्तु मे व्यक्त दिखलाया जाय तो वह 
एक अन्य विभावना होती है । यथा- 
जाता ते सखि साप्रतमश्रमपरिमन्धरा गतिः किमियम्‌ । 
कस्मादमवदकस्मादि यममधुमदाल्सा दुष्टिः ॥ 
-हे सखि! तेरी यह गत्ति विना श्रम के मन्थर क्यों दहो गर्ईदहै भौर यह दृष्टि मधुमद 
के विना भकस्मात्‌ दी अलसाईं क्यों हो गहं । 
३ = भयस्य यथात्वं लोके प्रस्सिदधमर्थस्य विद्ते तस्मात्‌ । 
अन्यस्यापि तथात्वं यस्यासुच्येत सान्येयम्‌ ॥ 
कोड विश्चेषता किसी एक वस्तु मेँ ही प्रसिद्ध हो किन्त यदि उप्ते अन्य वस्तु ममी वतला 
दिया ञाएतो वहमी एक प्रकार की विभावना होती है। यथा-'मदहैतुरनाप्तवो लक्ष्मीः = 
लक्ष्मी मासव नदीं है ओर मद का हेतु है" यहां मदजनकतारूपी गुण है तो प्रसिडढः वल आसव मे, 
किन्तु वतकाया जा रहा है वह लक्ष्मी मे मी। वस्तुतः यदी वह उदाहरण है जिसके लिए 
दण्डी का प्रथम लक्षण उपयुक्त ठहर सकता हे । 


उक्त अध्ययनसे स्पष्टहै किपूरव॑वतीं किसी भी आचाय॑ने विमावना मै उक्तदेत॒ुत्व ओर ` 


अनुक्तदेतुत्व की कल्पना नहीं की । इसका श्रेय प्रथमतः स्व॑स्वकारको ही प्राप्त है। ययपि यह 
मीस्पष्टदेङगि प्राचीनो के उदाहूर्णोर्मे ये दोनों वगं बनाए जा सकते है । अपीतक्षीवता' आदि 
मे अनुक्तनिमित्तता भर लक्ष्मी अनाप्तव मदहेवु है' मेँ उक्तनिमित्ता अप्रयासरव्ध है । 
उक्त अध्ययन से यह भीस्पष्टहैकरि विभावना निवैचनमें स्वीकार मामह की परम्परा के 
अनुयायी हे । दण्डी ओर रुद्रट के नवीन विकल्पों मेँ वे मी मौलिकता नदीं पाते) 
परवर्ती माचार्या मे- 
श्ोभाकर--दित्वमावे फलोत्पत्तिविभावनाः- 
देतु के भमाव में फक की उत्पत्ति विभावना" इस प्रकार सव॑स्वकार का अनुसरण ही करते हें । 
वे क्रियाशब्द को छोड सरवंस्वकार द्वारा सुञ्चाए कारण राब्दकोही लक्षणमें स्थान देते हे । 
ससी भकार निषे भौर व्यक्ति शब्द की उलक्षन से वचने के किणि मलंकारसरवेस्वकारने नो 
अभाव त्था उत्पत्ति शाब्द दिए ये रत्नाकरकार उन्ह भी अपना ते है । इतना भवदय है करि प्राचीन 
साचा्यो के समान वे प्रसिद्धि गौर प्रसिद्धिको भी लक्षणे स्थान देते है। ज्यं सर्वलकार 
कारण मे प्रस्तुतत्व ओर अप्रसतुतत्व का निवेद करते है वदँ रत्नाकरकार प्रसिद्धि भौर अप्रसिद्धि 
का निवेद्य करते हए लिलते है- 
प्रसिद्धस्य दहैतोरभावे फलोत्पत्ति्विभावना । व्तुतस्तविहाप्रसिद्धं कारणमस्त्येव, अन्यथा 
विरोधो दुष्परिहर एव स्यात्‌ 
प्रसिद्ध हेतु के भमाव मेँ फल की उद्यत्ति विभावन। कहलती है । यश, सच यह रहै कि, 
अप्रसिद्ध कारण रईइताही है नक्षींतो विरोध का परिहार ही नदींदह्यो पाएगा । 
(न का सवेस्वकार से जितने अंशं विरोधहै उपे विमरिनीकार प्रष्ठुत कर 
चुके हे । 
अष्पयदीचित-ने विभावना कै छ प्रकार वतलाट है-- 
१-- कारण के विना कार्यं की उत्पत्ति, उदाहरण = अपीतक्षीव्‌०? । 
२--अस्षमय हेतु से कार्योत्ति = उदा० काम अतीक्षण वर्णो से जगत्‌ कोजीतल्ेताहै। 
३-- प्रतिबन्धक के रहने पर भी कार्यं की उत्पत्ति= उदा०-आपका असिपप॑नरेन््ँ 
[ राजा तथा विषवर्यो ] को ही उसता है । सर्षद॑श में विषवैच प्रतिवन्धक-साधक होता है । 


विभावनाटङ्कारः ७७२ 


४--अन्य के काये की उत्पतन्ति अन्य से = यथा- 

यह शङ्ख से वीणानाद षो रहा है यहांगारही सुन्दरीके कण्ठके छिद शङ्ख तथा उसे 
गान केलिए वीणा निनाद का प्रयोग है। 

५-- विरुद्ध वस्तु से विरुद्ध वस्तु के कायं कौ निष्पत्ति यथा-'उसे शौतां्चुकी क्षिरणें तपा 
र्यी दहेः । 

&-काये से कारण का जन्म = यथा- 

तम्दारे कर कल्पतरु से यशरूपी पयोराशि उत्पन्न हुमा । 

सामान्यतः कल्पदृन्न दी उत्पन्न होता हे समुद्र से। इनमें से वस्तुतः प्रथत मेद्‌ को छोड़ रोष 
पांचा मे विरोधाल्कार के भेद है । पण्डितराज ने मौ इसका प्र्तिपद खण्डन सिय है । 

पण्डितराज जगन्नाथ कारणन्यतिरेकत्तामानाधिकरण्येन 'प्रतिपा्माना कार्योत्पत्तिः 
विभावनाः- 

कारण के अभाव के साथ-साथ कार्यं कौ उत्पत्ति का वततलाना विभावना'। पण्डितराज ने 
जपने इस लक्षण के किए प्रमाणसूप से मम्मट का लक्षण प्रस्तुत विया है-(तदुक्तम्‌- “क्रियायाः 
प्रतिषेधे फलग्यक्तिविभ(वना' इत्ति । मम्भ को प्रामाणिक मानते हृएभी क्रिया ओर कारणक 
विकल्प मर पण्डितराज ने स्व॑स्वकार को ही अधिक आदर दिया है। । 

निरुपादान'० पय मे पण्डितराज ने रत्नाकरकार ऋ ही समन किय! है । उन्लेने कहा है 
कि मले ही संसार के प्रति भङरेले भगवान्‌ को दी कारणता संमवहो किन्तु संपस्तारसूपी चित्र के 
परति तो भगवान्‌ अके कारण नक हो सकते । उपके किए तो मणि आदि को अ।वदयकता ह ही । 
भगवान्‌ मेतो कोड वणैयारंगहै नदीं। इस कारण शस पय मे विभावना सिद हो जने पर यह 
भी सिद्धहो जाता हेष विभावना मे अतिशयोक्ति की सहायता अनिवाये है क्योकि इस पदार्थं 
म अतिशयोक्ति नदीं है। पण्डितराजने कायश मँ अतिशयोक्ति के मतिरिक्त रूपक य] आहायं 
अभेद ब॒ुद्धिको भमी कदी-कदीं सायक माना है। (जगच्च ते वइ है । अतिशयोक्ति या रूपक 
की अनिवायेता का उदेद्य “खल लोग अक्षारण दी वेरी वन जतिः इत्यादि सामान्य वाक्यों मे 
विभावना का परिहार है। यहां वैरूप कार्यम न तो अतिशयोक्ति है ओर न रूपक । “खल लोग 
अकारण दा संताप देते श्स वाक्यमे कार्यार संतापमे अतिशय है, क्योकि भगिनि सादि का 
संताप भिन्न होता है ओर खर्जनित संताप भिन्न रक्नेप्रमी यहाँ पण्डितर।ज ने विभावना 
स्वीकार नहींकौहै। उनङा कदनादै,जेष्ाकति हम मी रद्ररङ्े अ ए रणरिपुशन्रः" उद्दाहरण 
पर कड आए, कि कारण विशेषल्प से उपस्थित र्ना चाष्िट । यदि (खलजन बिना ही आग 
के जलति रहते हे" ठेस्ी योनना होतो इमे विमावना मानी जा सकती है। वे यड भो कते हे 
कि जिसका अमाव वतलयाजारहाहो उत्त वस्तुको नतिशयया आरोपे युक्त काये के 
अध्यवत्तायी या भारोप्यमाण अंश कै प्रति कारणम होन। चाहिए । अन्था विभावना नहीं 
होगी । उदाहरणा 'खलजन बिना ही अपराध के जलति रदत है--रस वाक्य मै काथं 8 नलाना। 
इसमे अग्नि के दारा होने वाली जलन के दारा खक के द्वारा होते वारो पीड़ा का अध्यवताय्‌ हे । 
विन्तु मध्यव्तायौ जल्न वे प्रति, जिप्तका अमाव प्रतिपादित है वह्‌ अपराध कारण नहीं है। 
उसके प्रति कारण एकमात्र अग्नि हो सकती है । फलतः अभाव बतर(य। जान। चाहिर्‌ उस वस्तु 
काजो कायै रीर के विषयीरूपी अंश कै प्रति कारण हो । 


द प्रकार निकषे यद निकृता है फि विभावना प्क ओर जह कायश म अतिशय या 
आरोप अपेक्षित है वहं कारणाभावांश प कारणल्य ते उक्ति उत व्तुकीहोनी चाषहिएजो कारय 


७७७  अलङ्ारसवेस्वम्‌ 


दारीर के विषयी-अंडा के प्रति कारण दहो अर्थात्‌ जो कायंदरीर के उस अंदाके प्रति कारणदहो 
जो अं विषयी हो, आरोपित कियाजारहादहो या अध्यवसित) पण्डितराजने इस तथ्या 
स्पष्टीकरण ननव्यन्याय की माषा में इस प्रकार किया दे-- 

'अथ ुब्धकधीवरपिश्चना निष्कारणवैरिणो जगति" इत्यत्र विभावनापत्तिः [ ततः ] कारणता- 
वच्टेदकरूपावच्छन्नप्रतियो गिकस्वेन कारणाभावो विद्ेषणीयः ` " "खला विनैवापराधं भवन्ति खड 
वैरिण इत्यत्रातिन्यापनात्‌ काय शोऽतिदायोक्त्याखीटत्वेनामेदनिश्चयालीदत्वेन वा विद्चेषणीयः। 
“खेला विनैवापराधं दहन्ति खदु सञ्ननान्‌" इत्यादावतिन्याक्षिवारणाय च कायौञ्चे यद्‌ विषयिता- 
वच्छेदकं तदवच्छिन्नः-- कायेतानिरूपितायाः कारणताया अवच्छेदकमिह ग्राह्यम्‌ , दादत्वं चेह 
विषयितावच्छेदकम्‌ , तदवच्छिन्नभिन्नत्वे पीडाया अध्यवस्ानात्‌ । न दहि दाहत्वावच्छिन्नकायेता- 
निरूपितकरारणताया अवच्छेद कमपराधत्वम्‌ , अपितु दाहत्वावच्छिन्नाभिन्नत्वेनाध्यवसिता या पीडा 
तज्नष्ठका्य॑तानिरूपितकारणतायाः, इति तदवच्छिन्नप्रतियो गिताकाभावसरामानाधिकरण्येन कायोंत्पत्ति- 
वर्णनेऽपि नात्र विभावनाप्रसङ्गः। यदि तु "खला विनेव दहनं दहन्ति जगतीतलम्‌' इति क्रियते तदा 
भवत्येव विभावना । [ विभावनान्त, रसगगाधर | 

पण्डितराज के इस विवेचन से विभावना का रक्षण उन्हींकौ इस पदावली मे रेस्ता दोगा-- 

--“उत्पत्तिवर्णनविषयीभूतकायंशचरीधटकीभूतविषयितावच्छेद कावच्छिन्नकायंतानिरूपितकारण- 
तावच्छेदकरूपावच्छिननप्रतियोगिकाभाववणैनं विभावनाः। 


विश्वेश्वर-- पण्डितराज कै इस प्रकार के सूक्ष्म विवेचन पर ॒विदवेदवर ने आपत्ति उठाई 
दे। उन्दने कदादहैकिकारणक्रा विदोषरूप से उपस्थित होना मावदयक नहीं है भौर उदाहरण 
के रूप में प्रसिद्ध “निरुपादान०? प्रय दिया है । यहां उपादान संमार के विना जगचित्र के निर्माण 
कौ उक्तिमे विभावना है यौर मषी आदि कारणोका मषीत्व आदि रूप से उव्लेख नदीं है। उपादान- 
गेब्दसे दी उच्टेख है । इस पद मेँ स्वयं पण्डितराज मी विभावना मान चुकेहै। इस प्रकार 
विद्ेच्वर द्वारा स्वयं पण्डितराज हयी अपनी मान्यता के विरुद्ध सिद्धान्त उपस्थित करते हए प्रति- 
पादित किए गण हे । चिन्तन से सूञ्चता है कि ध्यकारण वैरी" इस उक्ति ओर निरुपादान “इस उक्ति 
म अन्तर स्पष्ट है । कारण का उल्लेख दोनो ह स्थर्लो मँ सामान्य रूप से ही है तथापि उसमे अन्तर 
हे । यह अन्तर कारण तथा "उपादानमारः-चब्द से ही स्पष्टहे। चित्रकाकारणतो परमात्मा 
मीहे परन्तु वह चित्र का उपादान नहीं हं । उपादानदहं रग । इस प्रकार 'उपादानसमारः शब्द 
से चित्रके विशिष्ट कारण का बहुत कुछ स्पष्टीकरण हो जाता है। य्यपि कारणतावच्छेदकरूप 
से तो यँ मणिल आदि की उपस्थिति नदीं होती तथापि पण्डितराज की मान्यता का उद्देश्य 
उससे खण्डित नदीं होता क्योकि उनका उदुदेदय जिस किसी प्रकार कारणगत वेरिष्टय 
काज्ञान दहो जाना है । वह उपादान संभारः चब्दसे हो जाता है। इसके अतिरिक्त अभित्ता- 
वेव" पद के द्वारा तो भित्तित्वावच्छिन्नप्रतियोगिताक अभाव उपस्थित है हयी । तन्वति" मेँ आईं तनु 
क्रिया" का अथं विस्तार या फैलाव है। उसके लिए भित्ति प्रसुख कारण है। फलतः उसका 
विशेष रूप से उल्लेख हो जाने पर इस अद मे विभावना अधिक स्पष्ट हो जाती है फलतः निरुपा. 
दान ० अंडा मे भी आंशिक अस्पष्टता प्रतिबन्धक नदीं बनती । पण्डितराज की पंक्ति दै- 

“उतर हि भगवतः सकाडात््‌ केवलस्य जगत उत्पन्तिनं कवेरभिप्रेता. . किन्तु जगद्रूपस्य 
चिघस्य । चित्रस्य च बेवल्स्योपादानानां मषी-हरितालादीना माधारस्य भिच्यदेदचाभावे केवला- 
कारो जागत्यवोत्पत्तेर स्तंमवः ।' [ प° ५८०- १० रसगङ्गाधर ] 

सत्य यष है कि 'निरुपादान०? पच मे विभावना नदीं व्यतिरेक भलंकार है। सामान्य रिदी 


विभावनाट्ङ्ारः ७७५ 


से दिव रूपी शिर्पी का अन्तर ओर उत्कष॑ ही यहाँ चमत्कार का कारण है। विद्वेश्वर का विमा- 
वनालक्षण इस प्रकार है- 
हतं विनापि कायं यत्रोक्तं स्याद्‌ विभावना सा तु।' विदवेश्वर ने असंश्तं' प्य मे अल्कार- 
सवेस्वकार का समथेन ओर पण्डितराज जगन्नाथ द्वारा उनके खण्डन का विरोध किया ३। 
उन्दने यौवन को पेसा कारण बतलाया है जिसमे मद के प्रति कारणता पहली वार वततलाई 
जा रही हे जव कि आस्व प्रसिद्ध कारण है। अतः विदवेश्वर के अनुसार प्रसिद्ध कारण के 
अभाव मं यहां विभावना स्वीकायं ही है भले जप्रसिद्ध कारण यौवन का यहां अस्तित्व रहा आए । 
विच्वेन्वर पण्डित ने यहां चमत्कार की भी सदायता ली है। कहाह कि वर्योकि इस प्रे 
चमत्कार हे अतः इसमे विभावना को अलंकार मानना ही ह्योगा। इस प्रकार मतमतान्तरो 
के वीच विभावना अलंकार का वही स्वरूप सवंमान्य ठदहरता है जो भामह की परम्परा के 
साचायं वामन, उद्धट, रुद्रटः ओर मम्मट की मावकं प्रतिभाओं से निष्कृष्ट होकर सवस्वक्ार तक 
आया था] 


सवसव के ठीकाकार भीविद्या चक्रवत्तीं ने इसका संक्षेप कारिका मे इस प्रकार उपनिबद्ध 

किया है-- 
्रसिद्धकारणाभावे कायाँत्पत्तिविमावना 1 
कायोत्पाद नवेरिष्य्याद्‌ द्विधा चेयं निमित्ततः ॥ 

चक्रवत्तीं ने विभावना ओर विशेषोक्ति के स्देदसकर के ङ्प भी भिन्न छिखित कारिका 

दी है- 
कायोशस्य यदा भावाभावौ वक्तुमपेक्षितो । 
विभावनाविरषोक्त्योस्तदा सन्देह सङ्करः ॥ 

जव कायश के भाव सभाव विवक्षित ह्य तो विभावना विशेषोक्ति का सन्देहसङ्कर 
होता हे । 

पाठान्तर = विभावना का जो मू स्स्व फे निणैयसागर संस्करण म मिलता है उपर 
स्वयं विमरिनीकार ने ही आपत्ति व्यक्त कर रखी हे । संजी विनीकार ने 'अंगलेखा० पच के बाद 
की अत्र सहजत्वं निमित्तं गम्यमानम्‌? इस पंक्ति के बाद “इयं च माल्यापि मवन्ती इदयते यथा- 

जनिद्रो दुःस्वप्नः प्रपतनमनद्रद्रूमतरः जराहीनः कम्पस्तिमिररदितल्नाससमयः । 
सनाघातं दुःखं विगतनिगडा बन्धनधृतिः सजीयं जन्तूनां मरणमवनीश्चाश्रयरसः ॥? 

इतना अंश भोर जोडा है तथा इसे मू माना हे । कु° जानकी तथा डों० राधकवन्‌ कै 
सहसंशोपन मेँ निकले मेदरचन्द संस्करण मँ यह अंश इसी स्थान प्र मूल मे सद्रित भीहै। 
सनन्तरायन से प्रकारित समुदरवन्धी प्रति मे यद पाठ विभावना निरूपण के अन्ते हे। इसी 
कै सथ जस्ञतं मण्डनम्‌--०००० इत्ययतनाः' यह भन्तिम अश्च उसमे विमरिनी के सुञ्चाव के 
&। अदेलार “अपितु तदनुप्राणितत्वेन' के बाद ह सुद्रित है । 

हमारे मत मे शयं च मालयमापि भवन्ती दरयते यथा अनिद्रो० इत्यादि मालाविभावना का 
प्रतिपादक अंश जवद्य ही प्रक्षेप है। कारण यह है करि मालाविभावना रत्नाकर, विमरिनौ, 
सप्पयदीक्षित, पण्डितराज तथा विदवेदवर किसी में नहीं मिरूती । सव॑स्व ने होती तो सभी 
साचायो म उसके प्रति मौन न भिरुता । अमूल होने परर भी मारो इष्टि मे इसका उप्यक्त 
स्थान विभावनाका अन्तहै नकिमध्य। इसी प्रकार अत्र विवदन्ते का सम्बन्धं "केचित्‌" कै 
साथ वतरते हुए विमरिनीकार ने “अन्ये, “अपरे, भौर "अतनः के साथ अन्वय से उसे 


७७दे अचङ्ारसवंस्वम्‌ 


रोक जिया) हमने मी उन्दींका अनुस्तरणकिया है। यद उचितमीदै क्योकि प्रन्धकारने 
सभी मर्तो को केवर उद्धृत भर कर दिया है जव किं प्रथम केचित्‌"-फे मतका खण्डन भी 
क्षिया है। वीच मेँ खण्डना आ जने से "विवदन्ते की ¶्या्चिः खण्डित हो जाती हे। 
'अयतनाः वाके पश्च पर विमरशिनीकार की आपत्ति यथाथैहौदहै्रि यह किसी पाठक ने अपनी 
अति मेँ स्वयं जोड दिया है । संपादको भथवा परवती छिपिकां ने उपे मूर मे मिला दिया होगा । 
विमरिनीकार ने इस प्रसंग मँ अन्थकार के अन्य मन्थ साहित्यमीमांसाः कौ चचां कीहे। 
त्रिबेन्द्रम्‌ से सन्‌ १९३४ मं छपी सादहित्यमीमांसा मेँ यह विषय नदीं भिर्ता । 
 स्वेस्व | 
विभावनां ठक्चयित्वा तद्धिपयंयस्वरूपां वि्ेबोरक्ति ठश्चयति - 
[ प्रू ७२ ] कारणसामग्रये कायानुत्पत्ति्विंशेषोक्तिः 
इह समग्राणि कारणानि नियमेन कोयेसुत्पादयन्तीति पसिद्धम्‌ । 
अन्यथा समग्रत्वस्यैवाभावप्रसङ्गात्‌ । यत्त॒ सत्यपि सामच्रये न जनयति 
कायं सा कंचिद्धिशोषमभिव्यङ्क्कं प्रयुज्यमाना विंशोषोक्तिः । सा च 
दविविधा -उक्तनिमित्तायक्तनिमित्ता च ! अचिन्त्यनिमित्ता त्वच॒क्तनिमित्तेव । 
अयुक्तस्य च चिन्त्याचिन्त्यत्वेन द्वेविध्यात्‌ । क्रमेण यथा-- 


(कपूर इव दग्धोऽपि शक्तिमान्‌ यो जनै जने । 
नमोऽस्त्ववायेवीर्याय तस्ये इसुमधन्वने।' 
"आहूतोऽपि खद यैरेमीव्युक्तवा बिधुक्तनिद्रोऽपि । 
गन्तुमना अपि पथिकः संकोचं नेव शिथिलयति ॥' 
स॒ पफकस्ीणि जयति जगन्ति कुसुमायुधः । 
हरतापि तयुं यस्य शंभुना न हतं वम्‌ । 
अश्र सत्यपि दाहलक्षणेऽविकचे कारणेऽशक्तत्वाख्यस्य कायंस्यानुत्पत्तिः 
राक्तिस्वरूपेणाविख्द्धेन धर्मेणोपनिबद्धा । अवायंवीयत्वं चात्रोक्तं निमित्तम्‌ । 
तथाद्वानादयः संकोचशिथिलीकार्हेतव इति तेषु सत्स्वपि तस्यानुत्पत्तौ 
प्रियतमास्वव्नन्नमागमायचुक्तं खसचिन्त्यं निमित्तम्‌ । तथा तयुदरणकार्णे 
सत्यपि बलठहर्णस्य का्यस्यानुत्पत्तौ निमित्तमनु कमप्यचिन्त्यपेव, प्रतीत्य 
गोचरत्वात्‌ । 
कायोौयुत्पत्तिश्चात्र कचित्कायेविश्द्धोत्पत्या निबध्यते । 
पव बिभावनायामपि कारणाभावः कारणविखुद्धसमुखेन कचिस्प्रतिपाद्यते। 
तथा च सति, 
श्यः कौमारहर. स एव हि वरस्ता एव चेत्रक्पा- 
स्ते चोन्मीलितमाटतीञ्स्भयः परोढा: कदम्बानिलाः । 
सा चेवास्मि तथापि चौय-सुरतव्यापार्डी ङाविधौ 
रेवारोधसि वेतस्तीतरुतदे चेतः समुत्कण्ठते ।' 


वाका = ` ` ` ` भ न [क व याक चक्का 


विरोषोक्त्यलङ्कारः @७ऽ 


इत्यन्न विभावनाविदोषो क्तयोः संदेहरूकरः । तथा द्युत्कण्ठाकारणविरद्धं श्यः 
कौमारहरः हत्यादि निबद्धमिति विभावना । तथा ध्यः कौमारहरः इत्यादेः 
कारणस्य कायं विरुद्धं '्चेतः समुत्कण्डत' इत्युत्कण्डाख्यं निबद्धमिति विले- 
षाक्तिः। विरुद्धञुखेनो पनिबन्धासव्केवठमस्पष्टत्वम्‌ । साधकवाघकप्रमाणाभा- 
वाच्ाञ्ज संदेहसंकरः । 


या तु 'एकशुणहानिकर्पनायां साभ्यदाढ्य विशेषोक्तिः" इति विहोषोक्ति- 
टेश्छिता साश्मिन्दद्सने रूपकमेद्‌ एवेति पृथडः न वाच्या । 


विभावना का लक्षण बनाया अब उससे ठीक उरूटे स्वरूप की विदोषोक्ति का लक्षण वनाते है- 

[ सूु० ७३ ] “कारण कौ समग्रता रहने पर भी कायं की शजुस्पत्ति [ बताई जाए 

तो अरकार की संज्ञा ] विरोषोक्ति [ होती हे ] ॥ 

यहा यह॒निरिचत तथ्यदहे कि सव कारण इकट्ठे होते दी काय को निरिचत ही उत्पन्न 
करतेहेएेसानदहदो तो उनकी समता [ समयता ] ही नहींहो। परन्तु समग्रता के रहने प्र 
भा जो उसे काय उत्पन्न करती इडं नहीं बतलाया जाता वह विशेषोक्ति होती है। इसका प्रयोग 
विसी विडोष तथ्य की व्यंजनाके क्एिदोतादहै। वहदोप्रकारकी होती है[ १९] उक्त निभित्ता 
तथा [ २ ] अनुक्तनिमित्ता [ मम्मर दारा प्रतिपादित ] अचिन्त्यनिमित्ता तो अनुक्त निमित्ता हयी हे। 
वर्योकि अनुक्त [ निमित्त ] दो प्रकारका होता दहै [ १] चिन्त्य ओर [२] अचिन्त्य । क्रम से इन 
के उदाहरण यथा-[ उक्तनिमित्ता ]- 


"कपुर के समान जक जाने पर मी जो जन जनमे राक्तिमान्‌ , हे एेसे अप्रतिहत पौरुष वाले 
विन्तु पुष्प के ही धनुष वाले काम को नमस्कार है । [ अनुक्तनिमित्ता मे चिन्त्यनिभित्ता- 

सायियां द्वारा पुकारे जने पर भी, “आ रहा हू ठेसा कद कर भी, नीद खुल जाने प्र भी 
मर जाने की इच्छा रहने पर मी पथिक [ अपना ] संकोच शिथिल नदीं कर रहा  [ अनुक्त 
निमित्ता मे अचिन्त्यनिमित्ता--] 


“वद्‌ कुसुमायुध अकेला ही तीनों लोको को जीत ल्ेताहै, दोकरने दासीर छीन कर भी जिसका 
नर नहीं छीना ।* 

इन [ तीनो ] में [ से प्रथम मे ] दाहरूपी अविकल कारण के उपस्थित रहने पर भी अञ्चक्तिरूपी 
कायं को अनुत्पत्ति [ शक्तिमान्‌ कदकर ] शक्तिरूपी धम के द्वारा प्रस्त॒त की गरं है जो [ दाक्ति] 
उस [ अशक्ति की अनुत्पत्ति ] के अविरुद्ध है । इसका कारण-वायंवीर्यत्व यौ कथित है । 

[ दूसरे प्यमे ] इसी प्रकार पुकारना आदि संकोच के हिथिलीकरणमें कारणदहे। वे सव 
विमान हं तब भी उस [ संकोच के शिथिलीकरण ] की जो अनुत्पति बतलारं जा रही है उसके 
कारण स्वप्न से प्रियतमा के समागम आदि हैँ जो अकथित अव्य है किन्तु उनकी करपना की जा 
सकती है । 

| तृतीय प मे ] उसी प्रकार शरीर का हरणः यह कारण विचमान रने पर भी बल- 
दरण-रूपी काये की [ जो ] अनुत्पत्ति [ वतलाई गई है उस ] का कारण अकथित भौ है मोर 
अचिन्त्य [ अकश्पनीय ] मी । क्योकि वह समञ्च मे भाता नीं है । 

श्स | भल्कार | मँ कायै की अनुपपत्ति कीं कायं से विरुद्ध वस्तु की उत्पत्ति के द्वारा 
बतलाईं जातौ हे । इसी प्रकार विमावना मेँ भी कहीं कारणाभाव कारणविरुद्ध वस्तु के [ सद्भाव 
के ] दारा प्रतिपादित किया जाता है । इस प्रकार- 


७७८ अच्छङ्ारसवस्वम्‌ 


वही वर है जिसने कौमार्य दूर शय, वे दी वस्तन्त की रतं हे, खिलो म।!ल्ती ते ुगन्वित 
ओर [ धूली] कदम्ब से मिभ्रितवे दी हवा केप्रोढ स्चोके दें ओरमें मी वदी द्र तथापि सुरतभ्यापार 
की उन्दी सुक्तपू्वं लीकाओं के पुनविधानके क्दरेवाके तट पर वेतसतर के नीचे चित्त उत्कण्ठित 
हो रहा हे 
- यद विभावना ओर विदेषोक्तिका संकर है। अर्योकि यदौ उत्कण्ठाके कारण के विरुद्ध 
जो कौमार्य को दूर करने वाका है" इत्यादि प्रस्तुत किया गया । इसलिए विभावना इं । इसी 
प्रकार “जो कौमाय का हरण करने वाला दै" इस कारण के कायं [ अनुत्कण्ठा ] के विरुद्ध “चित्त 
उत्कण्ठित ह्यो रहा है" इत्यादि उक्कण्ठा नामक कायं याँ प्रस्तुत किया गया है इसलिए विदोषोक्ति 
इदं । इतना है किये दोनों अस्पष्टं क्योकि इनका प्रस्तुतीकरण विरुद्ध वस्तु के द्वारा किया 
गया है। संकर कास्देदसंकरमेद इसलिरटहे कि यदाँनतो किसी एक का साधक प्रमाण है मौर 
न अन्य क्रा वाधक प्रमाणदही। 
[ वामनने ] जो "टक युणकी कमी कौ कल्पना करके समता को दृढ बनाया जाय तो 
विद्ेषोक्ति' श्स प्रकार विद्णोषोक्ति का लक्षण बनाया है वह इस सिद्धान्त के अनु्तार रूपक काद्य 
मेद है । इसचिण उत्ते स्वतन्त्र अलंकार नदीं कना चादहिण । 


विमरिनी 


तद्विप्ययेति। कारणसामग्रये कार्यानुर्पादात्‌ । तामेवाह-- कारणेत्यादि । समग्राणीति 
नावश्यं कारणानि कायंवम्ति भवन्तीति न्यायादसमग्राणां पुनः कायंजनकल्वं न स्यादिति 
आवः अत पएवाग्यमिचारायाह- नियमेनेति । अन्यथेति यदा कारणानि कार्यं नोप्पा- 
द्यन्ति । एवं नेकं किंचन जनकं, साम्नी वे जनिङ्ेति नीध्या समग्राणां कारणानां कार्य- 
जनकस्वं भचध्येवेति तास्पर्यार्थः। यदा स्वेतद्विपयंय उपनिबध्यते तदा विरेषोक्ति्भव- 
तीव्याह-यच्ित्यादि । अत्र च वस्तुतो निमित्तमस्तीति विरोधपरिहारः । तद्धेकमेवास्या 
सेद निर्दैशमाह-सा चेत्यादि । अचिन्स्थेव्युत्तानाज्ञयेः । वस्तुतस्तु संभवर्येव । अन्यथा 
ह्यस्या विरोधो दुष्परिहदायंः स्यात्‌ । अविकल इति । समग्रे विक्डधमस्वं शक्ध्य शक्स्यो- 
विरोधात्‌ । 
अस्याश्च कार्यानुत्पत्तविंच्दच्यन्तरेण बन्धं दश्यितुमाह--का्यत्यादि । यथा कपूर इवे. 
ह्यादौ । एवमिति । यथेवाश्र कार्यानु्पत्तिर्विरुद्मुखेनो पनिवभ्यत हव्यः । तथा च सतीति । 
इयोरप्य नयोर्विख्ञ्ुखेन कायंकारणभावोपनिबन्धे लतीव्यथः। उत्कण्ठायाः कारणं कौमार- 
हरवरायसंनिधानम्‌ । तध्य विरद्ध तत्संनिधानम्‌ । तेन कौमारहरवराद्संनिधानरूपं 
कारणं विनाप्युष्कण्टाया उत्पाद्‌ इति विभावना । तथा कोमारहरवरादिसंनिधानरूपस्य 
कारणस्य कार्यंमनुष्कण्डा, तस्याश्च विहदधोव्कण्ठा । तेन सव्यपि को मारहरवरादिसं निधान ङ्पे 
कारणे समग्रे कायंश्यान्ुकण्डारूपस्याभाव इति विशेषोक्तिः! भस्पश्त्वमिति । कायकारणयोः 
साचाननिषेध्यस्वेनाप्रतीतेः । ननु चात्रानयोः किमिति संदेहः, एकपन्ञाश्नय एव क्रियतामि- 
व्याश्कयाह-साधकेत्यादि । नज “धूतं हि नाम पुङ्षश्यातिंहासनं राञ्चम' इस्यादौ वामनेन 
या विशेषोक्तिस््ता खा किं नोच्यत इस्याश्चङ्कथाह- या तिवत्यादि । एवमनयव दश्चा 'एक- 
गुणहान्युपचयादिकल्पनायां साम्यदाव्यं विक्ञेष' इति कङ्धितो विशेषारंकारोऽप्यस्मिन्दश्चने 
खपकभेद्‌ एवेति न परथग्वाच्यः। 
तद्विपयेय उसप्ते उल्टी अर्थात्‌ पूरे पूरे कारण रहने पर भी कायं की उत्पत्ति न दोना । उप्ती का 
लक्षण वतलाते हँ--“कारणत्यादि । समभ्राणि = समय अर्थात्‌ कारण कायं से युक्त दो ही टेसा 


विरोषोक्त्लङ्ारः 8.७९ 


नियम नदीं हे इस प्रकार का जो एक सिद्धान्त है उसके अनुसार असमग्र कारण कायै के जनक नहीं 
होते इसीलिए भव्यभिचार [ निरपवाइता ] बतलाने के किए कहा नियमेन" नियमतः) अन्यथा 
अर्थात्‌ जव कारण कायं को उत्पन्न नदीं करते । इस प्रकार तात्पयं यइ कि कोई एक काका 
जनक नदीं होता, साममरौ जो है वह जनक होती है" इस उक्ति के अनुसार जव समी कारण 
उपस्थित रहते हँ तो कायै उत्पन्न होता ही है। “जव कभी इसका उल्टा बतलाया जाता है तव 
विशेषोक्ति होती हे" इस तथ्य को स्पष्ट करते हए कहते है--“ वत्त, इत्यादि । । 


यहाँ [ विदेषोक्ति मे ] मी [ सभी कारण उपस्थित रहने पर भी कारयन होनेमें] को 
वास्तविक कारण रहता ही है इसलिए विरोध हट जाता है। इसी [ वास्तविक कारण] को 
ठेकर इसके मेद बतलाते है “सा च” इत्यादि । अचिन्त्य अधिक भावुक लोगो ने कदा है वस्तुतः 
कारण वँ भी संभव रहता हे नहीं तो वों विरोधका परिहार दही न हो। अविकढ= 
समथ । विरुद्धधर्मत्व इसलिए कि शक्ति ओर अशक्ति मे परस्पर विरोध रहता है । 


यह्‌ जो कायांनुत्पत्ति दै उसी को अन्य प्रकार से भी प्रस्तुत किया जाता है। यही बतलने 
के लिए कदा कायैः इत्यादि । इसका उदाहरण है "कपर इवः इत्यादि । एवम्‌ = अथात्‌ जैसे 
यद्या कां की अनुत्पत्ति विरु वस्तु के दवारा प्रस्त॒तकीजा रही है उसी प्रकार ०० तथाच 
सति = अर्थात्‌ इन दोनों [ विभावना तथा विदोषोक्ति ] के ही कार्यकारणभाव का विरुद्ध वस्तु के 
दवारा उपनिवन्ध रहने से । उत्कण्डा काकारणदहे कोमाय का हरण करने वाले वर॒ आदि का 
असन्निधान ` उसके विरुद्ध इभा उनका सन्निधान । इस प्रकार कोमार्यहरणकारी वर आदि के 
असन्निधान-स्वरूप कारण के विना भौ उत्कण्ठा कौ उत्पत्ति वतरा गईं । अतः यह विभावना 
हुई । इसी प्रकार कौमाय द्रण करने वाके वर आदि का सन्निधान कारण है अनुक्कण्ठा रूपी 
कायै का । उसके विरुद्ध हुईं उत्कण्ठा । इस प्रकार कोमायं हरणकारी वर आदि का सन्निधानरूपी 
समग्र कारण रहने पर सौ अनुत्कण्ठारूपी कायं का अभाव बतलाया गया, इसलिए यद्य विेषोक्ति 
हुई । अश्पष्टत्वसर्‌ = अस्पष्टता, क्योकि यहो कायं ओर कारण साक्षात्‌ निषेध्यरूप से प्रतीत नहीं 
होते । [ दाका | अच्छा, इसर्मे संदेह [ संकर | ही क्योंमानाजा रहा है, [दोनों मे से] किसी 
छकको ही क्यो स्वीकार नदीं कर लिया जाय इस पर उत्तर देते हे साधक श्त्यादि [ शका] 
अच्छा, (जुजा जो है वहु पुरुष के किए विना सिंहासन का राज्य है [ गृच्छकरिक ] इत्यादि 
[ उक्तिर्यो ] मे वामन ने [ काव्याल्कारसूत्रृत्ति में | जो विशेषोक्ति बतखाईं है वही याँ क्यों 
नहीं मान ली जा रदी “हस पर कहते दै--"या तु, इत्यादि । इसी प्रकार “क युण की हानि या 
बृद्धि की कल्पना कर साम्य को दृढ वनाना विशेष" [ रत्नाकर में नदीं ] शस प्रकार जो विरोष नामक 
अलंकार का लक्षण किया गयाहे वहुभी इस पक्षमे रूपकका्ी एक प्रकार सिद्ध होताहै 
इसलिए वह मी स्वतन्त्र अलंकार के रूपमे बतलने योग्य नदीं है। 


विमज्ं :-विशोषोक्ति का इतिहास :- 
सवैस्वकार ने उद।हरण तो भामह का स्वीकार किया है परन्तु लक्षण उद्धट का। मामहका 
लक्षण ठीक वामन जेसा ही है। यथा- 
भामह- 
"एकदेशस्य विगमे या युणान्तरसंस्थितिः। 


विशेषप्रथनायासौ विरेषोक्तिम॑ता यथा, 
स एकल्लीणि जः ॥ 


७८० अलङ्कारलवंस्वम्‌ 


--एक गुण की कभी वतलाकर विदोषताके प्रतिपादनके ल्पएिजो अन्यगुणकौी स्थापना 
वह्‌ विदेषोक्ति मानी जाती हैः । यथा (स एकल्रीणिः पथां । यहाँ शारीर की दानि ओरवलकी 
स्थापना बततलाई गदं है । इसका उद्‌ रय कामराक्ति कौ अपरिदार्यता बतलाना है। 

... वामन = [ सु० ] “एकयुणदानिकर्पनायां साम्यदादय॑विक्ञेषोक्तिः? । 

[इ० ] एकस्य गुणस्य हानेः कल्पनायां दोषे शणः साम्यं यत्त॒ तरय दाद्र्थ॑विकेषोक्तिः। रूपकं 
चेदं प्रायेण 1 यथा ध्य॒तं हि नामः ॥ | 

किस्ती एक युणकी दानिकी कटपना कर देष गुणोंसे प्राप्त समताकाजो दढ करना वह 
विद्धेषोक्ति दै । यद प्रायः रूपक ही है । उदाहरण जुञा जो है वहु ।' स्पष्ट है कि वामन मे भामह 
के समान णएकगुणदानि कौ चचां तो हे परन्तु अन्य गुणकी स्थापना ओर विद्येषताके प्रतिपादन 
की चचां न्दीहै। वामन ने स्वयं इस प्रकार की विदोषोक्ति को रूपक हयी मान लिया है 

उद्धट = यत्‌ सामय्रयेऽपि शक्तीनां फलानुत्पत्तिबन्धनम्‌ । 

विद्ञेषस्याभिधित्सातस्तदः विद्दोषोक्तिरुच्यते ॥ ५।४॥ 
दितेन निमित्तेन निमित्तादरोनेन च । 
तस्या बन्धो द्विधा लक्ष्ये दृद्यते ललितात्मकः ॥ ५।५॥ 

--उत्पन्न करने वाली शक्तियों सवकी सव. उपस्थित रहे तथापि किसी विदेषत। के प्रतिपादनं 
की इच्छा से फल कौ उत्पत्ति न दिखलाहं जाए तो वद विदषोक्ति कदी जाती हे । काव्यां मेँ यददो 
प्रकार की मिलती हे [ १ ] जहाँ निमित्त दिखला दिया जाता है सौर [२] जरह नहीं दिखलाया 
जाता । यथा-- 

'महद्धिनि गृहे जन्म कूपं स्मरखहद्‌ वयः । 
तथापि न सुखप्रािः, कास्य चित्रीयतेन धीः ॥ 

“अत्यन्त समृद्धिश्ारखी घर मे जन्म, रूप ओर कामका मित्र वय। इतने पर भी सुख की प्राचि 
नहीं । किसको बुद्धि अचरज में नदीं पडती 1 यदो विधाता को वामता रूपी कारण भनुक्त है । 
उक्तकारण का उदाहरण- 

त्थं विस्ष्टुलं दृष्ट्रा तावकीनं विचेष्टितम्‌ । 
नौदेति किमपि प्र सत्वरस्यापि मै वचः॥ 


म्हारी इस प्रकार की विपरीत चेष्टे देखकर पने के छिए अत्यन्त उस्प्क होने पर भी 
मेरा यह नदीं खुलता ।› यहाँ पाव॑तीजी की तपोनिष्ठा वह्‌ कारण है जिसमे पूछने को उत्घुक व्यक्ति 
का पृषछना रुका हुमा हे । स्पष्ट है विशेषोक्ति का स्पष्ट ओर मान्य रूप पदे पहल उद्भ ने ही प्रस्तुत 
किया हे । 
र्द्रट=रुदटने विज्ञेषोक्तिनामसे तो किसी अलंकार का निवेचन नदीं किया किन्तु उनके 
व्याघात नामक अलंकार मे हस अलंकार के समी लक्षण भा जति है- 
अन्येरप्रतिहतमपि कारणमुष्ादनं न कार्यस्य । 
यरिमन्नभिधीयेत व्याघातः स इति विज्ञेयः ।2 ॥ ९।५२ ॥ 
जहा कारण पूराका पूरारहइता है तथापि कायं की उत्पत्ति नदीं बतलाई जाती, ऽसे 
न्यधात्‌ स्मञ्लना चाहिए ।' यथा- 
यत्र सुरतप्रदीपा निष्कञ्नलवत्तंयो महामणयः। 
माल्यस्यापि न शम्याः हतवधूवसनविसष्टस्य ॥ 


विरोषोक्त्यलङ्ारः ४८१ 


-- जहां बड़ी बड़ी मणियां खरतप्रदीप रहती है जिनमे न तो कञ्नर पड़ता ओर न वत्ती ही 
रहती । साथ जो हतवसखर वृजन दारा उञ्चाने के लिए फेकी मालारभो से मी बुद्चते नदीं । यँ 
दीपक महामणियों पर आरोप है अतः यह उदाहरण वामन की विदेषोक्ति के ही उदाहरण के 
समान रूपककादहौी उदाहरण हे। इस प्रकार रद्रट॒विदेषोक्ति के विषय मे अधिक प्रामाणिक 
न्दी हे । 

मस्मट--मम्मट ने उद्धटका ही अनुमोदन क्षिया है जोर लक्षण मँ कारणसमयता तथा उत्क 
साथ काये के जमाव श्न दोनों अंगो को यथावत्‌ स्थान दिया है । उनका लक्षण इसत प्रकार है- 

[ सू° ] 'विेषोक्तिरखण्डेषु कारणेव्रु फलावचः । 
[ ० ] मिलितेष्वपि कारणेषु कायेस्याकथनं विरोषोक्तिः ॥ 

--कारण एकत्रित रहने परमभीकायंका अकथन विशेषोक्ति कदलाता है ।' मम्मट ने इसके 
तीन मेद माने हे उक्तनिमित्ता, अनुक्तनिमित्ता तथा अचिन्त्यनिमित्ता । इनमें से उक्तनिमित्ता तथा 
मचिन्त्यनिमित्ता के तो उदाह्रणवे ही ह जो सवस्वकार ने दिए हे । अनुक्तनिमित्ता का उदाहरण 
प "निद्रा निदृत्ताबुदिते चुरत्ने सखीजने दारपदं पराप्ते । 

दलथीक्ृत।दलेषरसे भुजङ्गे चचार नालिङ्गनतोऽङ्गना सा ॥ 

“नींद खुल जाने पर, सूयं उग आने पर, सखियोँ ॐ दरवाजे पर॒ आजाने प्र तथा प्रिय के 
जलिङ्गनानन्द के शिथिल हो जाने पर मी वह सुन्दरी आलिङ्गन से नदीं डिगी।› यँ प्रवासन्ञान 
कारण दै जो अनुक्त है। मम्मट ने अचिन्त्यनिमित्ता भौर अनुक्तनिमित्ता को स्वतन्त्र माना है। 
सवस्वकार ने इसी पर संशोधन देते हए अचिन्त्यनिभित्ता का अनुक्तनिमित्ता मेँ अन्तर्भाव दिखला 
दियाहं। स्पष्टहैकि सवेसकारने उद्भट ओौर मम्मटकौी परम्परा प्र विद्चेषोक्तिकषा लक्षण 
बनाया हे) 

परवत्ता आचार्या म-- 

रोभाकर- ने विरेषोक्ति, का लक्षग सर्वस्व के पथ पर ही बनाया है- 

“हेतु साकय्ये फलानुरपत्तिर्विश्ेषोक्तिः ।' 

रत्नाकरकार दारा अचिन्त्यनिमित्ता मे निमित्तगत अचिन्त्यता प्रर मनोवैज्ञानिक विरलेषण 
प्रस्त किया गया हे 1 उन्होंने उते प्रमातृबुद्धिसापेक्ष माना है। जो तथ्य किसी एकं प्रमाता के लि 
अचिन्त्य होता दै, उसे समञ्च नहीं पड़ता, वही अन्य किसी प्रमाता वे लिए्चिन्त्य हो सकता है, 
उसकी समञ्च मँ आ सकता है । उदाहुरणाथं “त एकक्ञीणि०' पद नँ ह कुसुमायुध के बल का इारीर 
नाश होने पर नष्टनदहदोनेमेंकारणदहै काम का चित्तयोनिस्व = चिन्त से उत्पन्न होना । फलतः वह 
चिन्त्य ही ह, अचिन्त्य नहीं । उनका कहना- 

'अचिन्त्यता नाम न वस्तुधमैः संदेदवत्‌ सा हि मवेत्‌ प्रमातुः । 
कस्यापि, सवस्य तु नैव, तस्माद्‌ विमावनादिखिविधो न वाच्यः ॥ 

--*अवचिन्त्यता वस्तुनिष्ठ धर्मं नदी है । वह भी सन्देह के ही समान प्रमातृनिष्ठ धमं ३ै। 
वह भी किंसी-किसी प्रमाता मँ रहता है, सव मेँ नदीं । अतः विभावनादि अलंकार को तीन प्रकार 
का कहना गक नहीं । 

जप्पय्यदीकिति-ने कुवलयानन्द मँ जयदेव के-विशेषोक्तिरनुत्पत्तिः कायस्य सति 
कारणे - इम विङेषोक्तिलक्षण को-- ` 

कायांजनि विशेषोक्तिः सति पुष्क्लकारणे ।' 
३१ अण स० 


४८२ अलट्कारसवंस्वम्‌ 


इस प्रकार बदरू दिया है । स्पष्ट दही जयदेव के लक्षण र्मे कारणगत समग्रता का उद्लेख नही 
था । अलंकार के नाम से कारिका का आरम्म यथावत्‌ रखने के टि भप्पयदीक्षित को कारिका 


इस प्रकार की गदनी थी-- 
धवि्ेषो क्तिरनुत्पत्तिः कायंस्याखिलकारणेः । 
य॒दि अक्कार कानामकारिकाके आरम्भं न्हौमी देनाधा तो मी द्वितीय चरणका 
निर्माण उन्दं “पुष्कले सति कारणे" इस प्रकार "कारणे सति पुष्कल" इसत प्रकार पु्कले कारणे सतिः 
इस्‌ प्रकार अथवा कारणे पुष्कटे सति' दस प्रकार करना चाहिणथा। उक्त सभी योजनाओं में 
नसव के सवकारण रहने परर मी क्रायं कौ अनुत्पति विेषोक्ति' अथं यहो निकलता हे । 
उदाहरण- 
(नमन्तमपि धीमन्तं न कङ्घयति कश्चनः जयदेव । 
ण्टृदि स्नेहक्षयो नाभूत्‌ स्मरदीपे उ्वक्त्यपिः-- दीक्षित । 
वुद्धिमान्‌ छोग नवते दँ तो भी उन्हे कोई लँघता नद--जयदेव । 
दय मेँ स्मरदीप के जरते रहने पर मी स्नेदश्चय नदीं हृज--दौक्षित । 
दोर्नौ मेँ विदेषोक्ति का अधिक शुद्ध रूप जयदेव के उदाह्रणमेंदहीदे। उमे आहायं 
ज्ञान की पृष्ठभूमि नहीं के वरा्रर है, अवकिं अप्पय्यदौक्षित के उदाहरण से उप्तीका साच्राज्य 
है। इसी प्रकार जयदेव के उदाहरण मेँ लेष नगण्य जैसा है ओर अप्पय्वदीक्षित कै उदाहरण मं 
सेदब्द मे रटेष तो है दही स्मरदीप पदमे रूपकमीदहे। 
पण्डितराज- श्रसिद्धकारणकलापसामानाधिकरण्येन वण्य॑माना कायां ुत्पत्निविरेषो क्तिः ।' 
प्रसिद्ध कारणों के सञुदाय के विचमान रहने पर भी उसी फे साथ-साथ वतलाई ज। रही कायं 
की अनुत्पति विद्ञेषोक्ति कदलाती है ।” यहां पण्डितराज ने कारणसामभ्री मे प्रसिदधिका मी निवेद 
विया है) यह उनकी नवीन देन हे। अचिन्त्यनिमित्ताको पण्डितर(जने भी स्वीकार नहीं 
किया है ¦ उन्होने उस पर सरव॑स्वकार द्वारा उठाई गई जापत्ति का उल्लेख मी किया है । 
विशरेश्वरपण्डित ने लक्षण मँ कारणगतत समय्रता का उल्लेख नदीं किया है भौर न अचिन्त्य- 
निमित्ता कौ स्वतन्त्रता अस्वीकार कौ है । यह उनके निम्नलिखित पिवेचन ते दष्ट ह-- 
"हेतौ सत्यपि कार्यानुत्पत्तिः स्याद्‌ विक्ञेषोक्तिः । 
-देव के रहने पर मी कायं की अनुतपत्ति विदपोक्ति होती है। 
सा च त्रेधा - अनुक्तनिमित्ता, उक्तनिमित्ता, अचिन्त्यनिमित्ता चः-- वह तीन प्रकार की होती 
है अनुक्तनिमित्ता, उक्तनिमित्ता तथा अचिन्त्यनिमित्ता ।' 
विद्वेदवर ने अचिन्त्यनिमित्ता कै विषय वैँ पृ्वाचार्यौ का विरोध न तो उपस्थित विया है ओर 
न उश्तका खण्डन ही शिया दै। 
संजीविनीकार श्री विचाचक्रवत्ती ने सर्गस्वकार के संपूण विवेचन का संक्षेप कारिका म ईस 
प्रकार करिया है- 
'विद्ञेषोक्ति्मवेत कायांनुत्पत्तिः सत्ति कारणे । 
ञत्रेकगुणह।न्या तु साम्यदाल्यैमलक्षणम्‌ ॥ 
-श्रारण के रहने पर कायं की अनुत्पत्ति विशेषोक्ति होती दे। पकयुणकी हानि से सम्य 


की पुष्टि इसका लक्षण नहीं हे 


अतिश्ायोक्त्यलङ्कारः ७८३ 


[ सवंस्व ] 
अतिरायोक्तौ छश्चितायामपि कथ्िच्पमेदः कार्यकारणमावपस्तावेने- 
बान 6 *२.*१ (७ © = 
[ ख० ७४ | कायकारणयोः समकारस्वे पौर्वा पर्थविपयये चाति- 
सायोक्तिः | 


इद नियतपूवेकाकमावि कार्णं नियतपश्चात्काकभावि च कार्यमिति 
कायंकारणयोलश्चणं भरसिद्धम्‌ । यद्‌! तु विरोषधतिपाद्‌नाय तयोरेतद्रूपाप- 
गमः क्रियते तद्‌विश्चयोकक्तिः ¦ णतदूपापगसश्च काङसाभ्यनिवन्धनः काठविपः 
यौ सनिवन्धनश्चेति दविधाभवन्नतिरयोक्तिमपि दषे स्थापयति ¦ कमेण यथा-- 
'पदयत्खदतसखान्द्रविस्मयरसमभोत्फुहनेचोत्पटं 
भ्रूपाटेषु तवाज खृक्ष्मनिद्िते निखिक्घाशध्वनि । 
कौच्या च द्विषतः; धिया च युगपद्‌ राजन्यचंडामणे | 
दे खानिगमनप्रवेराविधिना पश्येन्द्रजाट छतम्‌ ॥° 
"पथि पथि श्ुक्चजञ्चंचाक्साभाङ्कसणां 
हिरि दिशि पवमानो वीरुधां कासकश्च । 
नरि नरि किरति द्राक्‌ खायकान्‌ पुष्पघन्वा 
पुरि पुरि च निचत्ता मानिनीमानच्चा ॥' 
पूवे भौठोक्तिनिर्भितेऽथं श द्रु्रीभवेदाः कीतिनिगंमनस्य हेतुरिति 
भिल्काठ्योस्तुल्यकाठस्वं निबद्धम्‌ । उत्तरत च माननिचत्तिः स्परश्ार 
पकरिरणकायेति तयो ख्पपन्नं पौवापय उयव्ययेन निर्दिष्टमिव्यतिद्योक्तिः । 
कायस्य चाश्युभाकाश्यो विरोषः परतिपायते | 


अतिश्चयोक्तिका छक्षण किया जा चुका है तथापि उसका एक येद [ कायेकारणम।वमूलक होने 
से | कायेकारणमाव के प्रसङ्ग में यहोँ बतलाया जा रहा है-- 

[ सू० ४४ ] (कायं जौर कारण के ससकारीन हो जाने अथवा उनके पूव पश्चाद्‌ भाव 

के उलट जाने से अतिशयोक्ति [ होती है ]। 

यहां कारण जोर कायं के "नियमतः पहर उत्पन्न होने वाला कारणः तथा (नियमतः पश्चात्‌ 
उत्पन्न हाने वाला कायं"-ये लक्षण प्रक्िदध दैः । किन्तु जव विद्येषता के प्रतिपादन के खिप उलकी 
रस स्थिति को हटा दिया जाता है तव अतिद्ययोक्ति होती है) इस स्थित्ति का निराकरण “उत्पत्ति 
कारमं एकता या समता लनेसे दोता है जोर उत्पत्तिकारू के निर्यात सेः श्स प्रकार दो प्रकार 
का होता है अतः जतिशयोक्तिकोभी दो प्रकार की बना देता ै। इनके केम से उदाहरण यथा 
[ कारण कायं की समकालिक उत्पत्ति से होने वारी अतिशयोक्ति यथा |-- 

षत्रियचूडामणे ! देखिए तो शबो की कीन्तितथाश्री ने आपके इस अत्यन्त सुक्ष्म भौर 
तीण खड्गवारा-पथ पर क्रीडापूक निकलने तथा प्रवेश करने का इन्द्रनारु किया है `राजालोग 
इस इन्द्रजाल को उमङते हुए धने आचर्य से प्रोत्फुर्ल नेत्रोत्पल होकर देख रहे थे । [ इन्द्रजाले 
देकं के वीच दो देन्द्रनाक्िकं तलवार की तीखी धार्‌ पर जेते चाद वरते निभौ होकर चरते हे] । 


७८७ अलङ्ारसवेस्वम्‌ 


[ कार्यकारण के उत्पत्तिकाल मे विपयांस् से इई अतिशयोक्ति यथा |-- 

'पथ-पथ मे तोते की चौँच जैसी अंङरो की सोमा विखरी इई दहै, दिशा-दिद्यामे ठताओं को 
नचनि वाला पवमान [ वादु ] वह रहा है, पुष्पधन्वा जादमी-गादमी मेँ वार्ण कोतेजी प्ते विखेर 
रदा ह--ओौर नगर-नगर मेँ मानवती बनिताओं के मान की चचां समात्त दो गड हे । 

[ इने से ] प्रथम पथमजो अथे दै वहक्थिकी प्रोढौक्ति समे निर्मित [ कविकट्पित | है । 
उसमे दाचुश्री का प्रवेद राुकीत्तिके निगमनकादहेतु है अतःवे दो भिन्न-भिन्न कारू मं उत्पन्न 
होने वाले दै तथापि उनकी उत्पत्ति एक साथ होती इई वतला दौ गदं हे । 

दूसरे प मे माननिवृत्ति कामदारवषां का काये दै। इस्त कारण उनकी उत्पत्ति का पूत्रपश्चाद्‌ 
भाव निश्चित दै। उपे यहां उल्ट कर वतलाया गया दहे । इसलिए [ उक्त दोनों स्थलों म ] अति. 
दायोक्ति है । इनमें जो विद्धोषता वतलाई जा रही हे वह दे का्यंका रीघ होना । 

विमरिनी 

प्रस्तावेनानुणुण्येन । अत षएवेयन्तः कायंकारणमावाश्रया विच्छित्तिविशेषाः संभ. 
वन्तीति प्रपञ्चमान्न दयितं पुनरिहास्या वचनम्‌ । एतच्च अन्थङ्ृतेवोक्तम्‌ "प्रकार पञ्चकम- 
ध्यारकार्यकारणगमभावेन यः प्रकारः स कायंकारणताश्रयारकारप्रस्तावे प्रपञ्चार्थं छकयिष्यत' 

इति 1 उच्यत इति न पुननिणीयते, पू्व्॑नेवास्य निर्णीतस्वात्‌ । तामेव दह-कार्यकारणयो- 
रित्यादि । उभयत्रापि नियतशञ्द्‌ एतदृभ्यभिचारद नात्‌ । एतद्ुपापगम इति । कायंकार- 
णयोः खामान्यविपर्यालाभ्याप्रपनिवन्धनात्‌ । प्रौटोक्तिनि्ित इति । कीर्तिभ्रियोवंस्तुतो 
निर्गमनप्रवेासं भवात्‌ । प्रतिपाद्यत इति प्रयोजनव्वाव्‌ । 

प्रस्तावेन-प्र्तग से अथात्‌ इस विवेचन के इसी प्रसंग के अनुरूप होने से। तात्पयं यह 
कि इस अतिदायोक्ति को यहाँ उपस्थित करने का उद्‌ देद्य यह बतलाना है कि का्य॑कारणभावमूकक 
अलंकारो के इतने मेद हो सकते है । [ अतिशयोक्ति के प्रकरणमें ] यदह स्वयं मन्थकारनेदही 
कह द्विया दै कि ¶{ अतिश्चयोक्तिके] पोच भेदो में से जो कायंकारणभावमूख्क भेद है उत्ते 
कार्यकारणमावभूकक अश्कार्तो के प्रकरणमें प्रप्चके लिटि दिखलावा जाद्गा 1 उच्यते = छदी 
जारहीदै, न कि उसका निणय कियाजा रहा है । केयोकि उसका निणेय तो प्हठेही किया 
ना चुका है। उकती| अतिशयोक्ति ] को वतलाते है--कायंकारणयोः इत्यादि । दोनों दी जगह 
नियत-दन्द इस स्थिति का कभी भी निराकरण न होने के कारण दिया गवादे। एतद्रुपाप- 
गमः = इसी स्थिति का निराकरण = इप्तलिए कि यहां कायकारण का सामान्य स्थिति के विपरीत 
उपनिवन्ध रहता है । प्रौढोक्तिनिर्मित = क्योकि कीत्ति ओर श्री के निगमन ओर प्रवेश वस्तुतः 
नष द्यो सकते । प्रतिपाद्यते = बतलाया जा रहा है अथात्‌ प्रयो जनरूप से । 

विमर्ञ-इस अतिक्योक्छि का इतिहास-पूवप्रततिपादित अतिशयोक्ति के इतिदासपे ह 
गतां हे । 

श्री विद्याचक्रवतीं ने स्व॑स्वकार द्वारा पिए गए क्स अतिद्चयोक्तिके विवेचन का संक्षेप इस्त 
प्रकार किया दे- 

'कार्यकारणयोर्यौ त॒ कालपताम्यविपर्ययौ । अन्या त्वतिशायोक्तिः सा विरोधांशोपजीवनात्‌ ॥' 

-- वह एक अन्य ही अतिद्ययोक्ति होती है जिनके कार्यं ओर कारण के उत्पत्ति समय में एकता 
या उल्टव रहता है । यदह विरोधां च पर निभैर रदती है ।' 


[ सवसव ] 
[ घ्र ४५ ] तयोस्तु मिन्नदेशत्वेऽपंगतिः । 
तयोरिति कायकारणयोः । यदेशमेव कारणं तदेश्मेव काय ट्टम्‌ । 


आसज्ञत्यच््कारः ७८९५ 


नहि महानसस्यो वह्निः पचंतदेशस्थं धूमं जनयति । यदा त्वन्यदेशास्थं 
कारणमन्यदेरस्थं च कायेपुपनिवध्यते, तदोचितसंगतिनिचत्तेरसंगत्या- 
ख्योऽदंकारः । ख च विरुद्धकायकारणमावप्रस्तावादिह छक्ष्यते । यथ।(-- 
श्रायः पथ्यपराङ्मुखा वियिणो भूपा भवन्त्यात्मना 
निद्‌षान्‌ सचिवान्‌ भजत्यतिमहोध्टोकापवादज्वरः । 
वन्याः इटाघ्यशगुणास्त पव विपिने संतोषभाजजः परं 
बाद्योऽयं वरमेव सेवकजनो धिक सवेथा मन्जिणः ।* 
अच्र॒पथ्यपराङ्मुखत्वमुपाटठम्भज्वरविषयत्वस्य भिन्नदेशदेतुरित्य- 
संगतिः । पवम्‌- . | 
'सा बाठा वयमप्रगदभवचसः सा खी वय कातयः 
सा पीनोन्नतिमत्पयोधरभरं घत्ते सखेदा वयम्‌ । 
सा न्ता जघनस्थलेन गुरुणा गन्तुं न शक्ता वयं 
दोषेरन्यसमाधितेरपरवो जाताः स्म इत्यद्भुतम्‌ ॥' 
इत्यत्र ज्ञेयम्‌ । अच्र॒ बास्यनिमित्तमप्रगस्मवचनत्वमन्यदन्यच्च स्मर- 
निमित्तकमित्यनयोरभेदाध्यवसायः । एवमन्यत्र क्षेयम्‌ । 

[ सू० ४५ ] किन्तु वे [ कायकारण ] भिन्नदेश्गत हा तो [ अलंकार का नाम] 

अखंगति [ होता हे ] ॥ 

तयोः = वे अर्थात्‌ कायकारण । कारण जिस स्थान प्र रहताहै उसी स्थान पर कार्यका 
रहना देखा गया है । रेसा नदींहैकि रसोहैर की अग्नि पव॑त परके धुषंको उत्पन्न करे । 
किन्तु जव कारण अन्य स्थान पर ओर कायै अन्य स्थान प्र॒ बतलाया जाता है तब उचित संगति 
न रहने से असंगति नामक अल्कार होता है। वह यदौ इसलिए बतराई जा रही ३ैकि यहो 
विरुद कार्यकारणमाव का प्रसंग चला हुआ है । उदाहरण य॒था-- 

“पथ्यपराद्ुख मोर विषयी प्रायः राजा लोग दयी स्वयं होते है विन्त लोकापवाद का महान्‌ 
ज्वर आता हे निर्दोष मन्त्रियोंका। ये[ मन्त्री] लेगी यदि जंगल मे जाकर संतोष के साथ 
रहै तो इनकी वन्दना भौर इनके गुणों की प्रशंसा होती है। इसक्णिये बाहरी सेवक लोग ही 

च्छे । मन्त्री लोगो को सवधा धिक्कार है) 

यहाँ पथ्यपराङमुखत्व हेतु हे उपालम्भज्वर का किन्तु वह॒ भिन्नदेशस्थ है शसक असंगति है । 
सी प्रकार--[ वामन के द्ारा--विरोधालकार के उद्राहरण के रूप मे प्रस्तुत ]- 

'बाङा हे वह किन्तु अप्रगरम वाणी है हमारी, खी है वह किन्तु कातर हं हम, मोटे मर उन्नत 
पयोधरा का भार है उस पर किन्तु खेद है हमें, जवघनस्थल की गरिमा से क्लान्त है वह किन्तु 
चलने मँ भसमथं है हम । इस प्रकार हम अन्याध्रित दोषो से अभिभूत हो गण है यह आरच्यं की 
वात दै "इस पच मेँ भौ जानना चादिए । यहां बास्यजनित अप्रगरम वचन भिन्न है ओर स्मर- 
जनित अप्रगस्म वचन भिन्न । यहां इन दोनों मेँ अमेदाध्यवसाय हे । इस्तौ प्रकार अन्य उदाहरणं 
मे मी समञ्चना चाहिए । 

विमदिनी 


तयोरित्यादि । एतदेव भ्यतिरेकपुखेनापि द्ंयति-नहीत्यादिना । उचितसंगतिनिक््तरिति । 
एकदेशयोरपि कायंकारणयोर्भिन्नदेशस्वेनोपनिबन्धनाव्‌ । अत एव च तथोभिन्नदेशष्वादिथं 


८६ अलङ्कारसवंस्वम्‌ 


विषयमेदेन भवतीस्येकविषयाद्‌ विरोधादस्य सेदुः) इह लक्ष्यत इति । अस्या जपि कायं- 
कारणयोर्भिन्नदेरष्वेन विरोधगमंस्वात्‌ । अभेदाध्यवसाय इत्ति । अनेनातिश्चयोक्तिरस्या 
अप्यनुप्राणकस्वेन कटाक्तिता । अन्यथा हि विरोधो दुष्परिहरः । स्यात्‌ एवं पथ्यञ्वर- 
दाञ्दयोरतिश्योचतिवकास्प्रजा पा नयुक्किद तापवाचकस्वं द्रष्टव्यस्‌ । अन्यत्रेति कातरस्वादौ । 
तयोरित्यादि 1 इसीको व्यतिरेक द्वारा भी वतरते हैँ "न हिः इत्यादि द्वारा उचित. 
संग तिनिन्रत्तः उचित संगति न रहने से = क्योकि कायै मौर कारण सदा ही रहतेतो एकी 
स्थान पर है तथ।पि य॒दा उनका भिन्न-भिन्न स्थानें दिखलाए जनेसे ओर इसी कारण किवे 
दोनो मिन्न-भिन्न स्थान में रहते हें । फएलतः इसमे विषयभेद रहता है, यह विरोधाल्कार से भिन्न 
है, क्योकि उसमें विषय एक दी रहता है । इद रचय ते = इसका लक्षण यहां कियाजा रहादहे। 
इसमे मी कार्यकारण भिन्न-भिन्न स्थर्छोमे रहते दहै अतः यहमी बिरोध गर्भितटे, इसलिए.। 
अमेदाध्यवखाय-- इससे यह वतलाया कि इस [ असंगति ] नें अतिशयोक्ति अनुप्राणक ह । अन्यथा 
विरोध का परिहार कठिन हो जाए। इसी प्रकार "पथ्यः बौर “ज्वरः शब्दों में भी अतिद्ययोक्ति 
के वर प्र॒ प्रजापालनयुक्ति ओौर संताप की *वाचकता समन्चनी चाहिए । अन्यनच्न = अन्य स्थलों 
म अथात्‌ 'कातरत्वः आदि मं । 
विमर्ल-- असंगति का पूदतिहदास- 
असंगति नामका कोदंभी अल्कार नतो भामहके काव्याटंकारमें मिल्तान वामन 
ओर उद्धट कै । वामन मं विरोशल्कारके लिएिजो सा बाटा०ः पद्य दिया गय। है उत्तमे असंगति 
अवदय है किन्तु वर्ह अल्कार का नाम असंगति नदीं हे। असंगति नाम पहले पहुल रुद्रटकै 
कान्यालंकार में भिल्ता है) 
द्रट--विस्पष्टे समकालं कारणमन्यत्र कार्यंमन्यत्र । 
यस्यासुपरभ्येते विज्ेयापस्तगतिः सेयम्‌ ॥› --९।४८॥ 
उद्ाहरण-+नवयौवनेन खतनोरिन्दुकराकोमलेन पूयन्ते । 
अद्धान्यसङ्गतानां यूनां हदि वधेते कामः॥ | 
“जह सपष्टल्प से कार्य भन्यत्र प्राप्त दो ओर कारण अन्यत्र तौ उसे अषंगति समक्न 
चाहिए ।' यथा- 
--“्दुकला के समान कोमल नवीन योवनपे भरेतो जारदैहं जंग उप्त सुन्दसकेः 
किन्तु काम की व्द्धिदहो रदी है दूरस्थ युवकों के हर्या मे।' 
मभ्मट-भिन्नदेदरतयाऽत्यन्तं कायुकारणभूतयोः । 
युगपद्धर्मयोयंत्र ख्यातिः सरा स्यादसंगतिः ॥' 
(जहाँ कार्युकारणभूत धर्मौ का अत्यन्त भिन्न-भिन्न स्थानां मं प्रतिपादन हो उप्ते असंगति 
कहते हे ।' 
उदाहरण--शन्तक्षतः कपौले वध्वा वेदना सपत्नीनाम्‌ 
-र्दतिकाधावतोदहैवधूके कपोल प॒र किन्तु वेदनाहै सोतोंर्म।" मम्मट्ने व्रिरोधसे 
मसंगति का अन्तर विरुद्ध त्वौ की भिन्नदेद्यता तथा एकदेशता को लेकर किया है। विमरिनी- 
कारने उसीकौो अपना ल्याहै। विरोध में भिन्न-भिन्न स्थानों मेँ रहने वालं का एक 
स्थान मे आना विरोधका कारणदहोतादहै जव किं घक्षगतिमे सदा एकी स्थान पर रहने 
वालं का भिन्न-मिन्न स्थान पर रहना । भगे पण्डितराज कै मत से भी यह तथ्य स्पष्ट होगा । 
ह्लोभाकश--ने यसंगति के आठ मेद माने हं । उनका सामान्य लक्षण यह ह- 
(तयो द॑ द्कालान्यत्वमरसंगतिः ॥: 


असङ्गत्यटङ्ारः &८७ 


'उन- हेतु ओर कायें के दे तथा कारु की विपरीतता असंगति कराती है) यह 
विपरीतता इस प्रकार होती हे। 
[ १] एकदे शस्थ कायं की सिन्नदेशस्थता 
[ २ ] भिन्नदेशस्थ काये की एकदेशस्थता 
[ ३ ] पश्चात्काल्मावौी की पवेकालमाविता 
[ ४ | पश्चात्कालमावी कौ सहकाल्माविता 
[ ५ ] तुरन्त वाद होने वाले की चिरकालमाविता 
[ ६ ] चिरकालमावी कौ तत्कालमाविता 
[ ७ ] एेदिक कायं की आसुष्मिकता ओर ` 
[ ८ । आमुष्मिक कायं की रेहिकता । 
इनमे से नवीन सात भेदो के उदाहरण देकर रत्नाकरकारने अन्तमं समीमे चारुत्वकी 
सत्ता मानी है । उर्न्टोनि छिखिा है 
“भेद सप्तकमत्रान्यद्‌ यद स्माभिरुद!हृतम्‌ । 
चारुत्वातिश्चयात्‌ तस्मिन्ननलङ्कारता कुतः ॥ 


ये अतिरिक्त भेद भावुकतामात्र हं । इनमें -अतिरयोक्ति आदि से भिन्न कोई स्वतन्त्र 
मौलिकता नहीं है । 


अप्पय्यदीक्तित-ने भी असंगति के तीनमेद माने है उनमें से प्रथमतो कार्कारणकी 
भिन्नस्थानस्थतामूल्क हीह; शेषदो मे से एक “अन्यत्र करणीय कार्य के अन्यन्न किए जाने से 
तथा द्वितीय अन्य किसी कायं को करते-करते उसके विरुद्ध कायं के कर डालने" से होती है, 
इनवे लक्षण ये दै-- 
[ १] 'विसुडध भिन्नदेशत्वं कायैहेत्वोरसंगतिः । 
| २ ] अन्यत्र करणीयस्य ततोऽन्यत्र कृतिश्च सा 1 
[ ३ ] “अन्यत्‌ कर्तुं॑ प्रवृत्तस्य तद्विरुदङ्ृतिस्तथा ॥ 
इनके उदाहरण है- 
[ १ |] ¶विषं जलधरैः पीतं मूच्छिताः पथिकाङ्गनाः ।' 
विष [ जल तथा जहर ] पिया मेर्घो ने ओर मूच्छित इई' पथिकं की शिया ! 
[ २ | अपारिजातां वसुधां चिकीषंन्‌ चां तथाऽकरोत्‌ । 
श्रीक्कष्ण चाहते बनाना प्रथिवी को अपारिजात [ अप = अपगत हो गया है इट गया है अरि = 
राञ् का जात = समुदाय जिते तथा 'पारिजातरदित' ] किन्तु बना दिया भपारिजात [ पारिजात 
हरण द्वारा पारिजात रहित ] चो को!" 
[ ३ ] "गोत्रोडार प्रवृत्तोऽपि गोत्रोद्धेदं पुराऽकपेत्‌ ॥ 
श्रीषृष्ण शये तो थे गोत्रोद्धार [ गोत्रा = पृथिवी के उद्धार मै] किन्तु कर दिया उन्होने उससे 
उलटा गोच्रद्धेद [ गोघ्रा प्रथिवी का येद नादश्च तथा गोत्र = पव॑त अथवा वंश का] कर दिया 
नमे द्वितीय भेद विशेषालकार मे तथा तृतीय विरोषालंकार या विषमालुकार मे अन्तभूंत 
हो जाता है । पण्डितराज ने मी इनका खण्डन क्षिया है । 
पण्डितराजल-- जगन्नाथ ने असंगति का रक्षण इस प्रकार किया है- 
"विरुडधत्वेनापाततो भासमानं हेतुकायैयो वेयधिकरण्यमसंगतिः \ 
देत॒ ओर कायं का भिन्नभित्र अधिकरण मै रदना, जो जपाततः विरुड-सा लगता है, असंगति 
कंहुलाता दे । 


| ५ 
४८८ अलङ्ारसवस्वम्‌ 

पण्डितराज ने सर्व॑स्वकार की शस मान्यता का खण्डन किया है कि असंगति मं अतिदायोक्ति 
सद्ायक दोती दै खण्डन में उन्दने केवल शब्द पर आक्षेप कियादहै। कहा हैकि य्दा 
अतिरयमात्र सदायक हे अतिशयोक्ति नदीं । वस्तुतः यदह सवेस्वकार के कथन का स्पष्टीकरण 
मात्रहे। 

विमर्दिनीकार कामी खण्डन करते हट पण्डितिराजनेल्लिादहै किं उन्होने (टक अधिकरण 
मदो के संबन्ध से विरोध होता है ओर असंगति मेँ भिन्न-भिन्न अथिकरर्णो मेः यह जो मेद बतलाया 
है यदह अमान्य है। कारण क्रि अष्गतिर्मेमीदो विरुद्ध धमं एकी स्थान पररहतेदहेःये धमं 
है कायेत्व मौर कारणवेयधिकरण्य [ कारण के अधिकरणे मलग रहना ]। भन्ततः बिरोध से 
असंगति का अन्तर पण्हितराजने दो हैतुओं दारा वतकाया हे । 

१--उत्पत्तिपरामश, यह विरोध मेँ नदीं रहता । असंगति मे रहता हे । 

र--भिन्न-भिन्न स्थान पर रहने के छिर प्रसिद्ध पदार्थौ का एक स्थान में रहना विरोधका 
निष्पादक तत्त्व है ओर एक स्थान में रहने वालों का भिन्न स्थानमें रहना अत॑गत्ति का । यष 
मेद इम मी अभी-अभी बतला आए है। 

विश्वेश्वर-“हेतुन्यधिकरणं स्यात्‌ कार्यं चेत्‌ सा तसंगत्िः प्रोक्ता ।' 

यदि कायंष्ैतु के आश्रयसेभिन्न आश्रय मे वतलायाजाय तो उसे असंगति जाननी 
चाहिए ।' 
^ विश्वेश्वर ने पण्डितराज दारा किए गए विमर्दिनीकार के उप्यक्त विरोध का प्रतिवाद किया 
है । वस्तुतः पण्डितराज का तात्पयं भेदक कसरी तय करने मेँ था । वह उर्न्दनि द्वितीय कल्प 
दारा तयकरदी है विश्वेश्वर को मी वह मान्य है। 

श्रीवि्याचक्रवर्न्ती ने अगति का संक्षेप इस प्रकार किया दै- 


'कायंकारणयोर्भिन्नदेरात्वे स्यादसंगतिः । 
अभमेदाध्यवसायादिविच्छ्त्या दृदयते च सा॥ 


| स्स्व | 


^~ ¢ भ ^~ (~^ ॥ 
[० ४६] विरूपकायांऽनथयीहत्पततिधिरूपसषटना च विषमम्‌ । 


वियोधधरस्तावेनेह ठक्षणम्‌ । तत्र कारणगुणप्रक्रमेण कायेनुत्पद्यत इति 
प्रसिद्धौ यद्धिरूपं कायंमुत्प्यमानं उश्यते तदेक विषमम्‌ । तथा कंचिदूर्थ 
साधयितुशुचतस्य न केवट तस्याथेस्यापतिटम्भो यावदृनर्थप्रात्िरपीति 
द्वितीयं विषमम्‌ । अत्यन्तानचुरूपलंघटनयोविरूपयोश्च संघटनं तृतीयं 
विषमम्‌ । अननुरूपस्तंस्गो हि विषमम्‌ । कमेण यथा-- 
"सयः करस्पदोमवाव्य चित्रं रणे रणे यस्य रपाणदेखा | 
तमालनीखा शरदिन्दुपाण्डु यशास्तरिलोकभिरणं प्रसूते \› 


'तीथान्तरेषु मख्पडकवतीर्विंहाय दिभ्यास्तनृस्तवुश्रतः सहसरा ठमन्मे । 
वाराणसि त्वयि तु मुक्तकटेवयणां कामोऽस्त मूलमपि यात्यवुनमंवाय ॥' 


विषमालङ्कारः ७८९ 


"अरण्यानी क्रेयं धतकनकस्जः क स सगः 
क मुक्तादारोऽय क च स पतगः केयमवटा । 
क्तं तत्कन्यारत्नं कलितमदिभतः क च वयं 
स्वमाक्कूत धाता निथ्रतनिथतं कन्दलखयति .' 


अश्न कष्णवणच्छुक्टवर्णोत्पत्तिः कट्टैवरात्यन्तापहारटश्चषणान्थान्तयो- 
त्पत्तिः, अत्यन्ताननुरूपाणां चारण्यान्यादीनां परस्परं संघटनं क्रमेण मन्त- 
भ्यम्‌ । केवलमनर्थोत्पत्तिरत्र व्याजस्तुतिपर्यव सायिनीति शुद्धोदाहरण- 
मणप्यृह्यम्‌ । 

[ सू० ४६ ] विपरीत कायं तथा अनथं कौ उत्पत्ति साथ ही विपरीत संघटना विषम 

[| नामक अरुकार होता हे ]। 

इसका लक्षण यहां विरोध के प्रसंगसे कियाजा रहादहै। ससम काय, कारण के गुणांक 
अनुरूप [ गुणों से युक्त होकर ] ही उत्पन्न होता हैः इस प्रसिद्धि के रहते हृएभी जो विपरीत गुण 
वाला काये उत्पन्न होता दिखलाया जाता है वह एक प्रकारका विषम होता है) इस अत्तिरिक्त 
“किसी काभ को सिद्ध करने के छिए उद्यत व्यक्तिको उसकलाभकी प्रापितो नहीं हो ऊपर 
सते अनिष्ट की प्रापि ओर हौ जाए यहु दूसरे प्रकार का विषम होता है। दो अत्यन्त 
अननुरूप अर्थात्‌ पदार्थो कौ संवगनारणँ तृतीय प्रकार का विषम होतादै। प्रतिक्रूल संघटना दही 
विषम है । इने क्रम से उदाहरण [ विपरीतगुणी कायं की उत्पत्ति से हने वाला विषम ]- 

"यह आश्चयं कौ बात दै कि तमार जैसी नीली कृपाणलेा प्रत्येक युद्ध मे जिकर का 
स्पशे पाकर रारत्कालीन चनद्रमासे शुभ्र ओर त्रिलोकी के आमरण यञ्च करो उत्पन्न करती है।' 
[ नवसाहसांकचरित १।६२ | 

[ अनथं की उत्पत्ति से हदोनेवाला विषम ]- 

'अन्य तीर्थो मेँ शरीदधासी लोग मलिन शरीर छोडकर दिव्य शारीर प्राप्त कर क्ते है । परन्तु 
दे काशी ! तुक्षमं शरीर छोड़ने वालो कालभतो दूर रहै, मूल [ भूत शरीर ] भी फिर से उत्पन्न 
न दीने के छिद चर बता ह [ वस्तुतः इस पच में व्याजस्तुति ओर व्यत्तिरेक अलंकार है ] । 

[ विपरौतत पदाथ को संघटना से होने वाला विषम यथा ]-- 


कहौ यह [ विन्ध्य | अर्वी भोर ॒कर्हौ वह सुवणं की सोकल पहने हिरना, यहां यह मोतिया 
काहार भोर को वह पक्षी [ हंस ] करं यह अवहा [ पाटला नामक शशिप्रभा की सखी ], 
सपराज [रंखपाल] को कहो वह उत्तम सुन्दरो कन्या ओर कदां हम । विधाता अपनी इच्छा अत्यन्त 
निभृत रूप से पणे करता रहता है [ नवप्तादसांकचरित ५।८१ ] " 


~~~ ~~ ------ ~~~ ----~ ~~~ ~ --- --- ---~----~ -- ~~ ~~~ ---~--~--~-~ -- 


१. निर्णयसागर प्रति म इतना पाठ अधिक है-'यथा- 
'परहिअञ सग्गं तीदं जरिअं अत्तणो तए हिज 
खञ्थो स्खाहश्स कए मरूलाओ विद्धेह्‌भा जाञा ॥' 
[ परहृदयं मागेन्त्या हदारितमत्मनस्तया हृदयम्‌ । 
हंहो लामस्य कृते पूरविच्छेदिका जाता ॥ ] 
इति तन्नो दाहायम्‌ । 


४९.० अलहकारसवेस्वम्‌ 


इन [ तीन पयो मेँ ] क्रम से [ प्रथम पमे ] कृष्णवर्ण से श्ुञ्वण की उत्पत्ति, [ दितीय में ] 
दासीर के अत्यन्त अपहररूणपी अनथं की प्राति तथा [ तृतीय मेँ ] जंगल आदि अत्यन्त वेमेल 
पदार्थौ का परस्पर भिकान मानना चाहिए । इतना अवदय ह किं य्ह अनथांत्पत्ति व्याजस्तुति 
म पयैवस्ित हो रही दै फलतः इसका कोड श्चुदध उदाहरण सोच लेना चाहिए । 


विमरिनी 
विरूपेत्यादि । इदेति । भस्याप्यनसुरूपसंसर्गेण विरोधगभंश्वात्‌ 1 विरूपमिति । कारणा. 
पेया विजातीयस्वेनातद्गुणत्वाव्‌ । यद्यपि 'गोमयादुचृश्चिकोध्पचचिः इतिवत्‌करा्यंकारणः 
योदारतवं विरूपस्वं संभवति, तथापीह कविप्रतिभानि्व॑तितमेव तद्‌ मराद्यम्‌ । तेन 
द्राक्ाफलानि शिखरेषु ज्ञिखोचयानां पीयूषसाररसनिभंरगभेवन्ति । 
विष्वग्पत्कठिनकायनिगूढश्ङ्गश्वक्गाटकानि पुनरम्भति संभवन्ति ५ 
` इ्यादौ विषमं न वाच्यस्‌ । ईदश एव कायंकारणभावस्य वस्तुतः संभवात्‌ । तस्येति 
साधयितुमिष्टस्य । अप्रतिटम्भ इत्ति। असिद्धिरिति यावत्‌ ¦ अत्यन्तेति; न श्चरुं तयोः 
स्वयं दिरूपस्वं यावत्तसंघटनाया अप्यनुरूपत्वमिष्यन्न तात्परयम्‌ ! एकमिष्यायभिदधता 
अन्थङ्कता विषमाणां भिन्नत्वञ्यु्तम्‌ , न ध्रकःरप्रकास्ि्वम्‌ । सामान्यरकणद्यासंभवात्‌ । 
एवमेव पुनरेषां कस्सादमिधानमित्याशच्कयाद--अननुल्पेत्यादि । यच्किचिष्पुनरस्मद्च॑न- 
विश्डमन्यंरधिकययुक्त तद्हास्माभियंधावस्तुय्न्थायमाग्रव्याख्याननिवाहस्नयुयुकमान- 
सव्वाद् निराङ्तमिति न तदेव सिद्धान्तीकायंस्र्‌ । तस्य पथडनिरतिष्यमाणसवात्‌ । इह 
हि यथादक्त्यस्माकमाग्रदम्रच्त्तपरकीयदूषणो द्वारमान्नमेव विवचितस्र्‌ । ` यथोपयोगं 


पुनस्तक्लिराकरणमपि कृतं करिष्यते च । 
जश्च शुद्खद्धस्णवर्णस्वं कार्यकारणास्मकविषयद्वयगतसवेन स्थितमिव्यस्य भिन्नविषयत्वा, 


` देकदिषयाद्िरोघाद्धेदो हेयः। एवमन्यत्रापि केयम्‌ । अरण्यान्यादीनामननुरूपमन्यो. 
न्यघटनं वास्तवमिव्युदाहरगान्तरेणोदाहियते । यथा-- 
'ज्लिरीषादपि खद्रङ्गी केवेयमायतलोचना। 
अथं क्व ध ऊुकूरािककशो मद्‌ नानरः ॥' 


अत्रानटुषूपथोस्तन्वीमदनानल्योः संघटनम्‌ । अत्रेति ती्थान्तरेष्विध्यादयौ । शुद्धेति । 


यत्र विषममेव न स्याद्‌ । तत्त यथा- 


"यो हठं प्रतिनिषेद्‌धुख्ुदस्तः सुभ्रवा प्रियतमस्य कटात्तः । 
स प्रतोद इव तस्य विशेषाघ्येरकः किमपि हन्त बभूव ५! 


॥ ९ $ १५ 
अञ्च कटस्य हटनिषेधायोदस्तश्य न केवरं तदसिद्धिर्यावत्तव्येवास्यन्तं स प्रेरको 


ज।त दत्यनथो्पत्तिः । 

विख्पेष्यादहि । इह = इस प्र्षग यें क्योकि यह अल्कार भी अननुरूपसंसगात्मक होने से 
विरोधगर्भित है। विद्धपनकारण की अपेक्षा विजातीय होने के कारण मात्‌ उसके गुण स्ते युक्त 
न होने के कारण) यदपि कार्यं ओर कारण मे विरूपता वास्तविक भी होती हे [ यथा] गोमय 


| व | गोवर ] से विच्छ्‌ की उत्पत्ति होती है, तथापि यद कविप्रतिमाप्रस्ुत विकूपरता ही अपनानी 


चाहिए । इसटल्िए-- 
अम्रतसाररूपी रस्त ते नितरां गित दक्षाफल पदादा के शिखर पर होते है ओर चायं 


ओर से कठिन शरीर के शग छिपा सिवा पैदा होते दे पानी नें। 


विषमाट्ङ्ारः ७९१ 


--इत्यादि स्थ मेँ विषम नीं मानना चादि  क्योकिरेसेद्ी हैः वे का्यै-कारणभाव जो 
वास्तविक होते दैः [ कल्पत नदीं ] । तस्य = उस सिद्ध करने के किट अभीष्ट । अश्रतिरम्भ, 


असिद्धि । अस्यन्त--अथं यदह कि केवर वे स्वयं दी विरूप नदीं होते, अपि उनकी रवटना मी 
वेसी दी विरूप होती हे। एक इत्यादि कहकर यन्धकार ने तीनों विषमां की परस्पर भिन्नता 


वतका न क्ति प्रकारप्रकारिभाव । क्योकि इनसे कों सामान्य लक्षण संभव नहीं है फिर इन्हें 


वतलया केसे इस पर कदते दै अनजुरूप० । अन्य आचाय ने थोडा अधिक कृ दिया है जो 
हमारे सिन्त के विरुड ह, ओर हमने मी उसका खण्डन नहीं किया हे, क्योकि हमारा चित्त 
यन्धस्थित पदार्थं की व्यवस्थित व्याख्या करने के छि उन्मुक्त है । किन्तु एतावता उसे सिद्धान्तभूत 
नही मान छना चाहिए । उसक्रा निराकरण अल्ग से किया जाने वाला है । यां तो हमें आय्रह 
म पड़कर दिए गद दूसरे के दोषोँका उद्धारमात्र यथाशक्ति करना जमी है ओर वह जहां 
जितना आवद्यक था दमने प्रहे मी किया है ओर अगे मी कस्वे। 

यह छृष्णता ओौर शुक्लता क्ायैकार णात्मक दो भिन्न वस्तुओं मे अवस्थित है अतः विषम 
भिन्न होने से इसका विरोध से जन्तरदहै, विरोधे आधार एकं ही होता हे) अन्य्भी इसी 
प्रकार समञ्चना चादि । ॑ 

अरण्यानी ०' आदि प्रमे जो पदार्थौ की विपरीत योजना है वह वास्तविक है इसकिए दम 
एक अन्य उदाहरण दारा इसे स्पष्ट करते है । यथा-- 

अरदा.तो शिरोष से सी अभिक कोमरु अंगो वाली यह विन्चालनेना गौर कहां यह तुषाग्नि के 
समान ककं कामान 

यहां [ कविकल्पना मं ] दो विपरीत गुणी पदाथ, तन्वंगी तथा कामानल का मिख्न है, 
अन्न = यहां जथांत्‌ (तीथान्तरेषु" पच में । श्ुदधा = अर्थात्‌ जहां केवर विषम दही हो। उसका 
उदाहरण यधा- 

“अच्छी मोहो वाली उस कामिनीने जो कर्षि | बाण ] हठ का प्रतिषेध करने के लिए 
प्रियतम पर छोड़ा, इन्त, वद तो किसी भी कारण चादुक की नां उसके छिए भौर अधिकं प्रेरक 
दो गया 1 

-- यहां ठ के निषेधके किटि चलाए करक्षसे इस कार्यकी असिद्धि ही केवल नदीं हहं 
प्रत्युत चह उसी र का अधिक मरक बन गयाः इस प्रकार अनथोत्पन्ति ओर हो गङ्‌ । 

विस्य - अनर्थात्पत्ति वाले विषम च यद उदाहरणके रूपम स्वयं मूले ही एक गाथां 
निणेयस्ागरीय प्रतिमे छप हृं है । ओरामचन्द्र दिवेदी ने उपे मू मान लिया हे । पठ ४८९ 
पर उते दमने अविकल रूप से अपनी वनां संरक्त छाया के साथ पादरिप्पणी मेदे दिया 
है । अन्धकार ने जव उसके उदाहरण की कल्पना करन अभ्यूड्यम्‌ कहकर पाठकों पर छोड़ 
दिया, तवे वह स्वयं उदाहरण देगा यह्‌ संभव नहीं कगता । विमदििनी, ससुद्रबन्धी तथा संजीविनी 

म मी इस्त अंश का उरलेखे नदीं हे । 
विषम का इतिहास :- ः 
समह, वामन तथा इद्ध म विषमका विवेचन नहीं मिरता। पृक. पहुरु रुद्रटः कै 


काव्यालंकार म इसका विवेचन इस प्रकार मिलता ३ै- 
रदट- ¦ 

ध्राय॑स्य कारणस्य च यत्र विरोधः परस्परं गुणयोः । 

तद्वत्‌ क्रिययोरथवा संजायेतेत्ति तद्‌ विषमम्‌ ॥ ९।४५ ॥ 

- जहां कायै ओर कारणके गुणया क्रियाओं में परस्पर विध हौ उत्ते विषम कहते हैँ । 


७९२ अलङ्धारसवंस्वम्‌ 


उदाहरण = [ १ |] नीरे खड्ग से शुभ यद उत्पन्न होना-इसी भाव का प । 
[ २ ] भानन्दममन्दमिमं कुवलयदललोचने ददासि त्वम्‌ । 
विरष्टस्त्वयेव जनितस्तापयतितरां शरीरं मे ॥ ९।४७ ॥ 
हे नीलकमल की पंखुड़ी जेसी ओं खो वाटी ! त॒म स्वयं तो अत्यन्त आनन्द देती हो विन्त 
तुम्हारे द्वारा दी उत्पन्न वियोग उतनादह्ी तपाता है। रद्रटने विरूपसंघटना वाले विषमको मी 
वास्तव नामक अलंकार वर्गं॑मे गिनाया दै- 


"विषम इति प्रथितोऽसौ वक्ता विधटयति किमपि सम्बन्धम्‌ । 
यत्राथयोरसन्तं परमतम।ाङ्कय तत्सत्वे ॥ ७।४७ ॥ 


उत विषम कहा जाता है जरां वस्तुओं के जशोमन सम्बन्ध को दूसरे के अनुसार शोभन 
रूपसे प्रतिपादित समञ्च वक्ता अनुचित प्रतिपादित करता है। यथा- क्व खलाः क्व च सञ्जन- 
स्त॒तयः' कहां खल ओर कहँ सञ्नर्नो की स्तुति 

मम्मट-मम्मटने रुद्रर से वडृकर विषम में वह्‌ भेद ओौर जोडा जिते सर्व॑स्वकार ने अनर्थ 
प्राचि कहा है । उनका विषमालंकार विवेचन इस प्रकार दे-- । 

क्वचिद्‌ यदतिवेधम्यांनन दलेषो घटनामियात्‌ । करतः क्रियाफालावा्िनवान्थदच यद्‌ मवेत्‌ । 

गुणक्रियाभ्यां कायस्य कारणस्य गुणक्रिये । क्रमेण च विरुद्धे यत्‌ स एष विषमो मतः॥' 


-- भहा [ १] अघ्यन्त वेधम्यं होने .से वस्तुओं का सम्बन्ध फवता न दहो [२] क्ताको 
क्रियाफल कौ प्र्चि तोदो ही नदीं अनथप्राप्ि ओर हदोजाए, [३] का्यके गुण तथा क्रिया 
कमशःकारणके गुणतथा क्रियात्े विरुद्ध दतो य॒द्‌ [ चार प्रकारका] विषम द्योता दै।' 
उदाहरण के रूप मं उन्हनि प्रथमदोके लिए निम्नङ्खित पद्य दिये है- 

[ १ | शिरीषादपि गृदवद्गी" [ विमशिनी मं उदडत ] 

[२ ] सिहिकाञतसंत्रस्तः शखः दीतांयुमागतः । जग्रसे साश्रयं तत्र तमन्यः सिहिकासुतः ॥ 

| -- सिंहिका [ सिंही ] के सत [शेर] से उरा हआ खरहा चन्द्रमामें पर्चा । वरह उसे 
उस्तके आश्रय के साथ ही एक दूसरे सिंहिका [ राहु कौ माता ] क खत [ राह] ने रस्त छ्या। 


[ यहाँ सिहिकापद मेँ रटेष हे ]। 
रेष दो मेदं के लिए मम्मट ने नवप्ताहसांकचरित का सचः कर्पञ्चमवाप्य य॒द्‌ पच तथा 


रट का दी 'जानन्दममन्दमिमम्‌०' पच उद्धृत कर दिया दै । 

= | विवेचन से स्यष्ट ह फिसर्वस्वकारने कायंकारणके वेषम्यको ुणतथा क्रियाके दो 
भागों मे नहीं बोंटा। विमरिनीकारने भी दस दिशा ध्यान नहीं दिया। 

प्रवत्तं आचार्यो मे-- 

रोभाकर-ने 

[ १] अर्थानथैपदे तदन्यस्योत्पत्तिविषमम्‌ । | 

[ २] भनर्थात्पत्तिविक्पकायांत्पत्तिविरूपसंघटनमसाकस्य च । 

--इन दो सूरो मँ विषम कै निम्नकिखित पंच मेद मने है- 

१-- अं के स्थान पर अन्ंकी प्राचि 

१--गनथं वे स्थान पर अथं की प्राचि 

३-- विषूपकारयांत्पत्ति 

४--विरूपरससवरन तथा 

+-असमय्ता 


विषमाटङ्कारः ४९२ 


इन्त स्र प्रथम, वतीय तथा चतुथं के उदाहरणतोवे दही माने जा सकतेदैजो सर्वस्वकार नें 
दिर द । चेष द्वितीय तथा पंचम के उदाहरण रत्नाकर मेये टै- 

प्येन राह्रपि नियदेच्छुना दुभेरोदरभिदा सखीङतः 12 

“जिन विष्णु भगवान्‌ ने चादातो धा राह का नियरह किन्तु दुभ॑र उदर अल्ग कर वनाः 
लिया उत्ते मित्रः । 

"पृथ्वीयं खट पीठिका सुषटितं लिङ्ग तदेतन्नभः 
सानो चामरनिम्नगा जलमिदं सञ्जीङ्ृतं वत्ते । 
अस्त्येषा पुरतः स्थिता नवनवा नक्षत्र पुष्पावली 
स्याच्चेत्‌ करचन पृजकोऽत्र तदिय पूजो पक्रप्ता मवेत्‌ ॥ 

-यह वितत भूप पीठिका है ओर यह आकाश दै शिवलिङ्ग । सुमेरुंग प्रर गंगाजी कां 
यह जरू भी तेयारदहै) साम्नेद्ी नक्षत्रों की यद्‌ देनह पुष्पावली भी उपस्थित है। कों 
[ पूजा ¡ करने वाला य होता तो यह पूजा पूरीहौो जाती ।` इस प्रत्न मँ केवर पूजा करने 
वाले की कमीदहै इस कारण पूजाम कमी पड़ रहीदहै। यह एक खल्ने वारी बात है अतः 
य॒हां विषम इआ । ४14 

रत्नाकरकार ने विषम विवेचन र्मे एक क्रान्तिभी प्रस्तुत की है। उन्होने अधिकाल्कार को 
मी विषमे हयी भन्तभूत करना चाहा है । उनका कहना है-- 

'आधाराषेययोयं् संसगः स्याद्‌ विरूपयोः । 
स स्फुटो विषमो वाच्यमधिक नाधिकं ततः ॥ 

-- जहां आधार तथा आधेय को संघटना मी विरूप हो वदां विषम ही मानना चाहिए, अतः ` 
टक स्वतन्त्र जरुकार जधिकारुकार नहीं हो सकता । उन्होने इस तकं की पुष्टि मँ अन्य तकं प्रस्तुत 
करते हए लिखा है यदि अधिक नामक एक स्वतन्त्र अलंकार माना जाता है तो "वियुगः- नामक 
भी एक स्वतन्त्र अरकार माना जाना चाहिए जहां कारण कायं के गुण परस्पर विरु हो । रत्नाकर- 
कार की तार्किकं उवेरता स्तुत्य हे, किन्तु वस्तुतः अधिक अलंकार सततिरायोक्ति पर निर्भर है 
ओर विषम विरोध पर । ्रख्यकारुमें पूरा संसार जिनमे समा जाता दै उन्दी भीङ्घष्ण मे नारद- 
भिलन का जानन्द नहीं अंटा'-- इस्त उक्तिमें विरोध नहीं अत्तिराय ही अधिक भनन्दकारी है। 

अप्पय्यदीक्षितने विषभकेवे ही मेद मानेदहैंजो मम्मट्ने माने हः । उनके उदाहरण प्रायः 
वे ही अभिव्यक्तियांहँजो मम्मटने प्रस्तुत की है । यथा- 

[ १ ] "विषमं वण्यते य॒त्र षटनाननुरूपयोः । 
क्वेयं रिरीषस्दवङ्गी क्व तावन्मद नज्वरः ॥ 
विषम उसे कहते ह जिसमे अननुरूप पदारथ की जोड़ी वतलाई जाती है । कहां तो यद्‌ 
हिरी षतुस्य कोमल अगो वाली सुन्दरी ओर कडां वह कामञ्वर ।› 
[ २ ] विरूपकायं स्योत्पत्तिरपरं विषमं मतम्‌ । 
कोत्ति प्रृते धवलां इथामा तव कृपाणिका ॥ 
विपरीत कायं की उत्पत्ति दूसरा विषम है। यथा आपको इयाम असि खेत कीति 
उत्पन्न करती हे । 
[ ३ ] अनिष्टस्याप्यवाप्तिदरच तदिष्टाथेस्मुद्यमात्‌ । 
भक्ष्यारायाऽदहि मञ्जूषां दष्ठाऽ्चुस्तेन भक्षितः ॥ 
इष्टाथे के लिश प्रयत्न करतेकरते निष्ट कौ प्राप्ति भी विषम होती हे । यथा--भक्ष्य वस्तु की 
आङ से सौँपकी पिर कुतर कर चूहा साोँपकेद्राराखा लिया गया 


४९७ अटङ्कारसवेस्वम्‌ 


अप्पय्यदीक्षित ने केवकं ञनिष्टप्र्चि मेँ भी विषम सानादहै ओर उसके अनेक उदाक्रण 
दिदं ¦ उनमें से एक यद है-- 

(नपुंसकमिति ज्ञात्वा प्रियाय प्रेषितं मनः । 

तत्तु तत्रेव रमते दताः पाणिनिना वयम्‌ ॥ 

-- दमने सन को नपुंसक समञ्च कर प्रिया ॐ परास भेजा किन्तु वद वहीं रम कर रह्‌ मयां 
पाणिनिने { सनको नपुंसकलिङ्ध वतलकर | हमै मार डला । किन्तु यहां भी इष्टावापि विवक्षित 
दै । केवल दाव्दतः कथित नदा हं । दूततंग्रेषण प्रियाप्राप्ि के उदेश्यसे ही होता ड, पण्डिनराज 
ने मी इसी तकं से अप्पय्यदीक्षित के इस मत का खण्डन किया हे। 

पण्डितराज ने सवस्वकार का (अननुरूपसंसगां विषमम्‌ यही वाभ्य विषमका 


लक्षणसूत्रे मान च्या हदं । संगे को उन्दोनि अनेक प्रकार का वतलया ॐ जिनमे 
मम्मटाभिमत सभी विषमभेद आ जति हैँ । अरण्यानी परय द विमरिनीकर 


= 


केही समान कविकरिपतता के अभावमें विषम संसग को अलंकार नहीं मानना षषी उचित 
बतलाया हे । विश्वेश्वर ने सवसव ॐ समर्थन मे तक्रं देतेडद च्लि कि "अरण्यानी 
आदि प्रदा म कविकंल्पितता भठेहीन हो किन्तु उनकी परस्पर योजना तो कविकल्ित ही 
है। हरिण जर दंस मै कनकपूत्र तथा सुक्ताद्यार की ओर उन दोनों की विन्ध्याटवी मँ 
उपस्थिति कविकद्पित ही है । 
मम्मट कौ हो परम्परा पर्‌ व्िपम का लक्षण विचवेदर ने इस प्रकार वनाया दे-- 
(सम्बन्धानुपपनत्ताविष्टा्थानाप्त्यनिष्टसप्राप्तौ । 
॥ जन्य॒जनकोमययुणक्रियाविरोधे च विषमः स्यात्‌ ॥ 
विदवेश्वर ने उदाहरण काकिदास-सादहित्य से चुने है-- 
(१९)करुजा हृदयप्रमाथिनी? [ माङ्विकग्निमित्र ३।२ | 
{ २ ) न खटुन खद बाणः [ दा कुन्तल-१ ॥ जो अधिक स्वाभाविक ओर प्रभावपृणं हे । 
सं प्रेषणीयता इनमें मरपर है। 
भरीविचाचवत्ती ने सव॑स्व के विषमालङ्कार के विवेचन का कारिकात्मक संक्षेप इशत प्रकार 
किया है-- 
धिरूपानथयोहं त्वोरुत्पत्ति्धिषमं मतम्‌ । तथा विरूपघटना तेनेदं ननि प्रभेदकम्‌ ॥ 
[ स्वस्व | 
=| ९५ 
[ सत्र ४७ | तदविपयेयः समम्‌ । 
विषमवेधम्यादिद पस्तावः। यद्यपि विषमस्य भद्नयसरुक्तं तथापि 
तच्छब्देन संसवादन्त्यो मेदः परासृष्टयते । पूवभेददयविपर्ययस्यानर्टक्ञा- 
न (= ४५ 2 > 
रस्या । अन्त्यभेद्विपययस्तु चाकत्वात्‌ समाख्योऽलंकारः । स चाभिहपा- 
नभिरूपचिषयत्वेन द्विविधः । आदो यथा - 
^त्वमेवंस्यौन्दया ख च र<विरतायाः परिचितः 
कलानां सीमान्तं परमिह युवामेव भजथः । 
अयि इन्दं दिष्ख्या तदिह सुभगे संवदति वा- 
मतः शेषं यत्स्याज्ितमिदह तदानीं गुगितया ॥› 


समालङ्कारः ॐ२५ 


अच्ाभिरूपस्येव नायकयुगल्छस्योचितं संघरटनमाश्ंसितम्‌ । 
द्वितीयो यथा-- 


"चिच चिल बत कत महस्िचयेतद्धिचिच 
जातो देकादचितस्वनासंकिघाता विधाता। 
यच्िञ्वाद्ा परष्टिणतषटस्पोप्तियस्वादनीयां 
यच्चैतस्याः कवलनकलाकोविदः काकलोकः ॥' 


अच्रानभिरूपाणां निञ्बानां काकानां च समागम आश्चस्ितः। आनुरूष्यात्‌ 
सखदयत्वव्य पदेशः । 

[ सूत्र ४७ ] उस [ विषम ] का उरटा सम [ अरंकार कहराता हे ] ॥ 

विषम के साथ [ इस अरुकार का ] वेधम्ये हे अतः [ इसे ] यहो प्रस्तुत किया जा रहा दहै, 
यद्यपि विषम के तीन भेद बतला हं तथापि य॒दा तत्‌ = उसः शब्द से अन्तिमिमेदकादही 
परामदोकियाजा रहा है, क्योकि उसी का पराम यहां संभवदहे। यह इसल्एि कि [ विषम कै] 
प्रथम दो मेदो का विपय॑ंय अलंकाररूप नहींदहोता। जबकि अन्तिम मेद का विपयैय चारूत्व 
से युक्त होने के कारण सम'-नामक अलंकार होता दै । वह दो प्रकारका होता है सुन्दरविषयक 
[ खन्दर खन्दर का योग] तथा अछन्दरविषयक [ अन्दर अन्दर का योग]! इनमें से 
प्रथम, यथा- 

सखि! तेरा सोन्दयंेसा है ओर वह सौन्दयेका वेत्ता है। कलाओं की अन्तिम सीमा 
को तुम दोना ही धारण करते हो। तुम दोनों का जोडा भी, भाग्य से, फवता है ¡ अतः अव 
जो दोना रेषहे यदि वह हो जाए तो गुणवत्ताकी जीत दहो जाए 1 

यहां नायक नायिकारूपी अच्छ-अच्छों के ही उचित योग की इच्छा की गई ह। 
द्वितीय यथा- 

'आश्चथ, आश्चयं, वाहं वाहः बहुत हौ वड़ा आश्चर्य, विचित्र ही है यह । विधाता, भाग्य ते, 
उचितरचना करने वाला सिद्ध हआ। क्योकि नीम की पकी निमोरी की स्फीतता जैसी 
आस्वादनीय है उसकी कवलनकला का वैसा ही कोविद काकं सुदाय उते मिक गया हे । 

य्ह नीम ओर काक इन असन्दर वस्तुओं का समागम बतलाया गया जञे। [ दोनों म) 
अनुरूपता है अतः इसे सम कहा गया , 


विमरिनी 


तद्धिपययेत्यादि । संभवादिति, भरंकारस्वस्य 1 अनलंकारत्वादिति । कारणाद्‌ कायोंस्पत्तः 
वस्तुसाधनोयतस्य तस्सिद्धेश्च वास्तवस्वात्‌ ¦ ययेवं तत्‌ खरूपसंघटनापि वस्तुत एव 
युक्ति तस्या अपि कथमरुंकारत्वमिव्याशङ्कबाह--अन्त्येत्यादि । चाकषध्डादिति, अरुकारस्व- 
पयंवसायिनः । अभिस्पेतति । शोभताशोभनविषयस्वेनेष्यर्थः । लादय इति, अभिरूपः 
विषयः । द्वितीय इति, अनभिरूपविषयः । आनुङ्प्यादिति, जओौचि्यरकणात्‌। 

तद्विपययेव्यादि । संभवात्‌ = ऽभव होने से अर्थात्‌ अलक।रत्व के संभव होने से। अनङंका- 
शवात्‌ = अलंकार न होने से अथीत्‌ कारण से कायं की उत्पत्ति के अलंकार न होने से । क्योकि 
किसी व्यक्ति का किसी वस्तु की सिद्धि के लिए उद्यत तथा उसको उसकी सिद्धि भिल्ना लोकिकं 
सत्य है, यदि रसा है तो सरूप सरूप की संघटना भी लौकिक सत्य है, उप्ते भी अलक्ञार्‌ कैसे 


४९ द्‌ अल्टरङ्कारसवंस्वम्‌ 


माना जाए ? इस्त पर उत्तर देते है--अन्त्य शत्यादि । चार्त्वात्‌ चारुत्व होने से अर्थति अलंकारत्व 
मे पर्यवसित होने वाके चारत्व के होने ते। अभिडप = अर्थात्‌ रोमन-विषयक ओर अल्लोभन- 
विषयक होने से \ आद्य = प्रथम = अभिरूपविषय [ सुन्दरविषय ] । द्वितीय = अनभिहूपविषय = 
असखन्दरविषय । आनु रूव्यातच्‌ = अनुरूपता जो ओौचित्यस्वरूप होती है । 

विमर्च-सखमारुकार का इतिहदास- 

माम, वामन, उद्धट तथा रुद्रट मं समाल्कार नदीं मिलता । अतः यह मानना अप्रामाणिक 
नदीं दोगा कि इसका निरूपण पदठे पदक मम्मट ने ही इस प्रकार किया है-- 

सम योग्यतया योगो यदि संभावितः कचित्‌ 1 

-- यदि किसी के साथ किसी के इलाव्य संवन्ध की संमावना कीजाए तो समालंकार दहता 
दे) मम्मट ने इसे दो प्रकारका भी वतलाया है सद्योगात्मक तथा भसद्योगात्मक । इन्दी दो 
शादो के छि सवस्वकार ने अभिरूषविषय ओर अनभिरूपविषय शब्द दिर है । मम्मट नै इनमे 
से प्रथम का जो उदाहरण दिया है वह स्वस्व के (्वमेवंसौन्दर्यां० पच का समानां पय ह- 
“धातुः िद्पातिश्चय०? । मम्मट ने स्त्वमेवंसौन्दर्या' पयको भी सप्तम उच्छास के दोष प्रकरणम 
अमवन्मतयोग दोष कै लिए उद्धृत कियाहै। इक्तके चतु्थवरणमें चेत्‌ के किए अपेश्ित “ततः 
पद का अमाव हे । अत्तः उससे अपेक्षित चेत्‌ का संबन्ध हो नहीं पाता। द्वितीय के उदाहरण के 
किट मम्मर ने श्चितरे चित्रं" प्य ही उपस्थित करिया था। 

 परवत्तीं आचार्यो म- 

शोभाकरनेप्तमका लक्षणतो वही वनाया जो सर्वस्वकार ने बनाया दै-“तद्धिपयंयः समम्‌” 
किन्तु उन्दने तत्पदसे विषम के तीनमेदों का मी परामश किया है ।- (्तच्छब्देन त्रयाणां 
विषमभमेदानां परामशः । ये तीन भेद दँ अनुरूपक्षयोग, कारण से अनुरूप कार्य की 
उत्पत्ति तथा स्तामग्रीसाकल्य । कारण से अनुरूप कायं कौ उत्पत्तिमे भी वे चारुत्व पराति है 
ओर सामग्री की समय्रतामें मी । इनके उद्रादरण उन्दने इस प्रकार दिपहै- 

'सन्ध्यास्तगोत्र कुसुमप्रवन्धसुवाह यद्‌ गाढमरोकाखी । 
विखासिनीयावकपङ्कुदिग्धपादप्रहारस्य तदेव कृत्यम्‌ ॥2 

-“अञ्चोक वृक्ष ने जो सन्ध्या जेते कुखमसमूह को पयांतमात्रा मे धारण किया वह टीक्‌ ही 
है कर्योवि विलासिनी के यावकरंजित पाद प्रहार का परिणाम होगा ही वही ।' यूं लाल 
अल्ते से रंजित पैर कै प्रहार कै भनुरूप लाल पुर्प कौ उत्पत्ति कौ कव्पना मेँ चमत्कार अवद्य 
हे । हमे लगता हे यह चमत्कार व्यृग्य उत्प्रेक्षा पर निभेर दहं । समग्रताके लिए उदादरण- 

श्रीहर्षं निपुणः कविः परिषदप्येषा गुणग्राहिणी 
लोकानन्दि च बोधिसच्वचरितं नाय्ये च दक्षा वयम्‌| 
वस्त्वेकै कमपीह वाज्छितफलगप्राप्तेः पदं किं पुन- 
म॑द्भाग्योपचयादयं समुदितः सर्वां गुणानां गणः ॥ 

-[ नागानन्द नाटक मे सूत्रधार करा प्ररोचना-वाक्य ] श्रीदषं निपुण कचि है, यह ददोक 
समाज मी युणग्राही है, वोभिसच् का चरित लोकानन्ददायी ह ओर हम मी नास्यप्रयोग में दक्ष 
है । एक एक वस्तु मी अमी फल देने में कारण वनती है, तव मेरे भाग्याततिश्चय ते तो यदह 
सभी के समी गुरणा का समुदाय एकवित हो गया हैः । 

रत्नाकरकार ने सवस्वकार पर कटाक्ष करते हृ मी खिखा-- | 

"एवं चानुरूपकार्योत्पत्तौ बिच्छित्तिविश्चेषवदशेन सौन्द्यांतिरयदशेनात्‌ कारणानुरूपत्वे कार्थस्य 
न किचित्‌ चारुत्वमिति न वाच्यम्‌ । 


य कि 


समालटङ्ारः ७९. 


विमशिनीकार ने इतने स्पष्ट आक्षेप का मी कोड उत्तर नदीं दिया। कदाचित्‌ उन्हे मी य 
मत मान्य दहो । 
अप्पय्यदीक्तित--अप्पय्यदीक्षित ने रत्नाकर के इस मत को स्वीकार कर जिया है । उरन्ोनि 
समारुकार के तीन येद माने है- 
[ १] समं स्याद्‌ वणनं यत्न ढयोरप्यनुरूपयोः । 
अच्छेया बुरे दोनो अनुरूपो का वणेन समालंकार । इते दीक्षितजी.ने प्रथम विषम का प्रति- 
दन्द्ी माना है । इसके दोनों प्रकार के उदाहरण उन्होने दे दिप है । उने जज्लोमन योग के चिर 
तो “चित्र चित्रं" पच ही उन्होने दिया हे। 
[ २ ] सारूप्यमपि कार्यस्य कारणेन समं विदुः । 
-कारणसे कायेकौ सरूपता भी सम कदी गेहे इसे दीक्षितजीने द्वितीय विषम का 
प्रतिद्वन्दी माना है । उदाहरण के किए उरन्दोने यह पय उदत किया है-- 
(दवद हनादुत्पन्नो धूमो घनतामवाप्य वषेंस्तम्‌ । 
यच्छमयति तद्‌. युक्तं सोऽपि हि दवसमेव निदंहत्ति ॥ 
दवाग्नि से उत्पन्न धुओं मैव बनकर वर्षां के द्वारा दवाग्नि कोजो बुताता है वह ठीक 
ही दे, वह [दवाग्नि] भीतो [ जिसरप्ते उत्पन्न होता है उसी ] दव [ जंगल ] को ही जला 
डालता हे । 
[ ३ | "विनानिष्टं च तत्सिडधियेम्थं क्ुँसुयतः 1 
-- "जिस काये को करने के लिए कोई उदयत हो उसकी सिद्धि यदि बिना अनिष्ट के हो जाए 


तो मो सम होताहे। इस मेदको दीक्षितजी ने अनर्थप्राक्चि नामक विषममेद का परतिदन्द्री 
माना हे। 


उदाहरण -दहथी के याचक को राजदरबार से अधेचन्द्र मिलने पर कथित- 

शयुक्तो वारणलामोऽयं जातस्ते वारणाथिनः 1 

-- तमतो वारण [ हाथी] चाहदही रहे ये अतः तुम्हे यह वारण [ निवारण ] का रामं 
ठीक ही इञ ।' 

पण्डितराज्ञ- केवर अनुरूप वस्तयो जना कै विपर्यय को हो समालकार मानने तथा अन्यविषम- 
भेदो के विपयेय को जल्कार न मानने के सवंस्वकार दारा प्रस्त॒त सिद्धान्त ओर विमर्दिनीकार दारा 
किए गए उसके समधेनकाजो खण्डन रत्नाकरकारने कियाथा वह्‌ दीक्षितजी के ही समान 
पण्डितराज कौं भी उचित ल्गा। पण्डितराजने समालंकार का अनुरूपसंसर्भः समम्‌? इस 
प्रकार समको अनुरूपसंसगात्मक मान अननुरूपसंसरगात्मक विषम से सर्वथा उल्टा बतलाया 
मौर समकौभी विषम के हौ समान तौन प्रकारका मान सवंस्व ओर विमरदिनी का स्वयं 
मी खण्डन किया । इसी प्रकार विषम के सभौ मेदो के विपरीत आनुरूप्य के चारुत्व से निष्पन्न 
इस अलंकार के एक-एक करके उदाहरण मी दिये) पण्डितराजने सर्वस्व बौर विमरशिनी 
को जिस सरूप मं उपस्थित करियादहै उपे सवेस्व ओर विमरिनी की रीका ही कदा जा. सकता हे । 

विश्वेश्वर ने भी 

 'अन्योन्यसंगमाहं संबध्येते यदा समं तत्‌ स्यात्‌ ।” 

इस प्रकार शोभन या अश्योभन पदार्थौ कौ परस्पर सम्बन्ध की अनुरूपता को समालकारका 
कारण मानकर कायकारण के आनुरूप्य मे समाकंकार्‌ स्वीकार कर जिया है। उसका उदाहरण 
उन्दने पह दिया है-- 


१५ 9 


“गुणो पयोधेनिजकारणस्य न हानिवृद्धी कथमेत चन्द्रः, । 
२२ अ० खण 


७९८ अलङ्लारसवेस्वम्‌ 


वैते न प्राप्त करेः। 
कोई उत्तर नदीं दिया ह! अतः सवस्व 


` --भअपने कारण समुद्र के गुण हानिन्द्धि को चन्द्रमा 
विदवेदवर ने पण्डितराज द्वारा सवेस्व के खण्डन का 
कामत उन्हे भी अस्वीकार दही दे, 
| श्रीविचाचक्रवत्तीं ने समाङुकार का सारक्षेप संजीविनी मं इसत प्रकार किया है- 
| 'ससरूपयोः सदह्रटना समालक्कार इष्यते । 
| ॑ दलाध्यारल।भ्यल्वयोगेन दयो मेदावस्य सम्मतौ ॥' 
[ स्वेस्व 


वियोधमूं विचित्रं छक्षयति - 
[ दत्र ४८ 1 स्वविपरीतफलनिष्पत्तये प्रयत्नो विचित्रम्‌ । 
यस्य डेतोर्यत्फटं तस्य यद्‌ तद्विपरीतं भवति तद्‌ तद्विपरीतफल- 
निष्पच्य् कस्यचित्‌ प्रयत्न उत्साहो विचि्ाटंकारः, अश्धयंभरतीति- 
देवत्वात्‌ । न चायं धथसो विषभाटंकारप्रकारः । स्घनिषेधघरुखेन वेपरीर्य- 
्रतीतेः। विपरीतप्रतीस्या ठु स्वनिषेधस्तस्य विषयः । यथा - 'तमाछ- 
नीला शरदिन्दुपाण्डु यराखिटोकाभश्णं प्रसूतेः । इह त्वन्यथा 
प्रतीतिः । यथा- 
धेत्तं घु अहरो अण्गंतो वह पेकिंलड दिटृटी । 
घडरद विहडंति भुज स्भाय खुरभभ्मि वीसामो 1: 
अन्न मोचनवल्छनविधटनविश्चमाणां यथाक्रमं ्रहणवरक्षणघटनस्मणानिं 
विपरीतफखानि प्रयत्नविषयत्वेन निचद्धानि । यथा वा-- 
'उच्नव्ये नमति परुं प्रभुगदान्‌ द्रष्टुं बहिस्तिष्ठति 
। | जङ्धीसगासिविन्तारया । 
प्राणान्‌ पानितुमेव मुञ्चति रणे किंलश्नाति भोगेच्छया 
खव तद्विपरीतमेव कुरुते वृष्णान्धदटक्‌ सेवकः ।।' 
अन्न विपरोतफलनिष्पाद्‌नप्रयत्नः सुक्ञनः । 
विरोधमूलक [ एक ] विचित्र [ नाम सरव॑भा स्वोपक्ञ, पू्वाचारयो द्वारा अप्रतिषादित अकार | 
का लक्षण वनातेहं- 
[ सू० ४८ | "अपने विकुदध फल कौ निष्पत्ति के छि प्रयध्न विचित्र [ कहलाता दै ] ॥* 
जित हेतकाजो फल होता दै उसका जव उप्तके विपरीत फर होता है तब उसके विपरीत 
कृ कौ निष्पत्ति क छिथ किसी का प्रयत्न अर्थात्‌ उत्साह विधित्रारंकार कदलाता है, इसकिए कि 
यदह आश्चयं की प्रतीति का कारण बनता दै । यह विषमाल्कार का ही प्रथम प्रकार हे रेता नदीं 
वर्योकि यद वैपरीत्य कौ प्रतीति अपने निषेध के माध्यमते दती है, जव कि विषम मेँ वैपरीत्य 
की प्रतीति के माध्यम से अपना निषेध प्रतीत दीता है । यथा (तमालनीर कृपाण दारदिन्दुपाण्डु 
य॒ जो विलोक का आभरण ह, वैदा करता है" इत्यादि मे । यदहो प्रतीति उररी होती है । यथा- 


रहत मुच्यतेऽधरोऽन्यतो वलति प्रेक्षितुं दृष्टिः । 
टितं विषते अजौ रताय रतेषु विश्रमः ॥ 


विचिज्राटङ्कारः ७९९. 


अधर छोडा जाता हे यहण करने के किए, दृष्टि अन्यत्र घूमती है देखने के लिए, युजा छती 
ड जुड़ने के छिथ, सुरत मेँ विश्राम होता है रमणक किए), 

यहाँ छोड़ा जाना, घूमना, छूटना ओर विश्राम के प्रति ग्रहण, देखना, जुडना तथा रमण 
विपरीत फल हैः जो प्रयत्न के विषय के रूप मेँ य॒ निबड हे । 

दूसरा उदाहरण यथा-- 


उन्नति ॐ किए प्रमु के समक्ष कता है, प्रु के घर देखने के किए बाहर वैठता है, जडधी 
आगामौ धनको अश्ञासे अपने धनका व्यय कर डाल्तादहै, जीषित रहनेके हयील्यिरण 
मप्रणषछोड़देतादै, मोगकी इच्छासेक्ठेश उठाताहै। इसप्रकार तृष्णा से अन्धी अंखि का 
सेवक [ जौ कुछ चाहता है ] सअ कुछ उसके विपरीत दी करता रहता है । 

यहां विपरीत फल की निष्पत्ति का प्रयत्न सुखपूवेक जाना जा सकता है । 


विमरिनी 


स्वविपरोतेत्यादि । एतदेव व्याचष्े-यस्येत्यादिना । यदिति प्रसिद्धम्‌ । फलमिति का ब्‌ । 
तस्येति हेतोः । तदिति कायंस्‌ । भ्रयत्नस्य कायादिमेदेऽपि न वेचिन्यमिति तदिह नोक्तम्‌ । 
एवं यस्य यत्काय तस्य तावत्तद्धिपरीतं न भवति । यदि च तस्वं स्यात्तन्निष्पय्ध च यदि 
कस्य चिसप्रयरनः स्यात्तदायमलकार इस्यत्र त्पर्यम्‌ । ननु चेत ्िरूपकार्योर्पत्तेः किं न 
विषममेव मवतीप्याज्ञङ्कय।ह -न चायमित्यादि । तस्येति विषमस्य । नील्यापि पाण्डु 
यशः प्रसूतमिति विपरीतप्रतीतिबलदेतन्नो पपद्यत इति ह्यत्र प्रतीतिः ¦ अन्यथेति निषेध- 
चखाद्‌ वे परीष्य परयस्न इति ! यद्यपि वरिषमे विरूपस्य कायस्य स्वयसेवोस्पत्तिरिह च 
तज्निप्पत्ये प्रयत्न इति रिवतोऽप्यनयोः -स्फुटो मेदस्तथापि मन्धक्कता विशेषपरिपोषामैव 
सुचमेद्धिकागस्यो मेदोऽय घुक्तः ! सोचनस्याप्रहणं स्वं एकस्‌ । यहं पुनः कथं भवतीस्या- 
खख एवादिक्तसवेनात्र निषेधप्रतीतिः ¦ अनन्तरं च तज्निसित्ता वै परीस्यप्रतीतिः\ अत एव 
विषमादस्य भेदः । सुज्ञान इति । पूरवोक्तयुकष्येवाव गतध्वात्‌ पुनरदाहरणमस्य कचरे प्राच्य. 
दशनाथम्‌ । एतद्धि प्रन्थङकतेवाभिनवस्वेनोक्तम्‌ ! 
श्ववि परीतेस्यादि । इसी की व्याख्या करते हें--यस्य इत्यादि क दारा। यत्‌ = जो=परसिद । 
फर्म्‌ = काये । तस्य = देतुकरा । तत्‌ = वई काये । [ जेता कि अलकाररत्नाक्ररकार ने बतलाया 
दै प्रयत्न कायं आदि के मेदस कर प्रकारका [ भर्थात्‌ कायिक, वाचिक, मानस | होता है 
किन्तु उसको गगना में कोड विरोषता। [ चमत्कृति ] नहो रहती अतः [य] उपे नदीं कदा गया । 
स प्रकार तात्पये यदह हअ किजो जिसका [ उद्देश्यभूत ] कायं होता है वह सामान्यतः तो 
उसके विपरीत नदीं होता, तथपि यदि विपरीतष्टौ ओर यदि उसके च्यि कोर व्यक्ति प्रयत्न 
करता हे तव यह अलंकार होता है। अच्छा, इते विरूपकार्यसिद्धिस्वरूप विषय हौ क्यो न मान 
लिया जाय? टेसी शका उठकर क्िखितेदहै न चायस्र्‌ इत्यादि तस्य उसका = विषम का) 
(नीलो तल्वार ने मो सफेद यश को जन्म दिय देसी वैपरीत्य को प्रतीति से यह प्रतीति होती 
हे यदा कि धयह्‌ ठीक नदींरहै'। अन्यथारनिषेध के अधार पर तरैपरोत्यके चिद प्रयत्न होता 
दे । यथपि विषम म विहय काये कौ उपपत्ति विना प्रयत्न के स्वयमेव दोतौ है ओर यदौ होता है 
उसके छिद प्रयत्न, इस प्रकार इन दोना का अन्तर स्पष्टहीदहै तथापि अन्थकार ने इसी अन्तर 
कौ पुष्टि के छिर यह्‌ अन्तर बतलाया है। यह सूक्ष्म इष्टि से सम्च। जा सकता है । छोडने का 
सपना फक है ग्रहण न करना । ग्रहण करना उसका फल कैसे हो सकता है इस प्रकार यहाँ 
आरम्भ मे निषेध को प्रतीति साफ-साफ हो जाती है! उप्ते होने वाले त्रैपसोत्य की प्रतौति उसके 


| 


9 अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


वाद दोती हे । इसखिए यद्‌ विषम से भिन्न है । सुन्ञानः = खखपू्व॑क समल्ञा जा सकता हे; अथं यह 
कि इस विचित्रांकार का अस्तित्व प्रथम जउ्दादरणसेहीस्पष्टदहो जाताहै। तव यहजो दूसरा 
उदाहरण दिया गया है यदह केवर लक्ष्य [ काव्यक्षेत्र ] मं इसकी प्रचुरता दिप्वलाने के लिए । 
इस अलंकार को अन्थकार ने दी पहले पदर नव्रीन अलंकार के रूपमे प्रस्तुत कियाद । 
विमर्--मामह, दण्डी वामन, उद्भट, रुद्रट ओर मम्मरमें यह अलंकार नदीं मिल्ता। 
विमर्िनीकार का कहना यथाथ दहै कि इस अरुकार की ऊहा सवंस्वकारनेदहदी की है । परवत्तीं 
आलंकारिकौ मे- 
 छोभाकर-ने अलंकाररत्नाकर में इस अलंकार को मानतो ल्यिादहै किन्तु इसका लक्षण 
अधिक व्यापक वना दिया है । उनका लक्षण इस प्रकार है- 
'विफलः प्रयत्नो विचित्रम्‌ । -- विफल प्रयत्न विचित्र \' 
प्रयत्न के उन्दने तीनमेद किर [ १} कायिक, [ २ ] वाचिक तथा [ ३ | मानस्सिक । 
इन तीना प्रयत्नो को उर््योने पुनः प्रवृत्तिरूप ओर निवृत्तिरूपः, इस प्रकार दो प्रकार का 
माना! इस प्रकार रत्नाकरकार के अनुसार प्रयत्न & प्रकार काआ । विमरिनीकारने 


५ 


इसी की ओर कयाक्ष किया है ओर इनकी अलुकारस्व॑स्व मं अप्राप्त गणना का समन 
कियाद, 
रत्नाकरकार ने विफलता को मी अनेक भेद तथा उपमेदों मे बँ है [१] प्रथम विफ- 
लता वह है जिसमें प्रसिद्ध फल के विपरीत फल के किए प्रयत्न दहो। [२] द्वितीय विफलता 
वह्‌ हे जिसपर प्रयत्न तो बहुत वड़ा हो परन्तु फल तुच्छ हो अथवा इसके विपरीत स्थिति हो [३] 
तीसरी विफलता वह हे जिसमें प्राप्त फल अक्ताध्य, असंमव या अनुपयोगी दो । इस प्रकार ६ प्रकार 
के प्रयत्नो में से प्रत्येक प्रयत्न मे इन छदँ विफलता्ओं का युणन करने से विचित्र के शद्ध ३६ भेद 
दो जाते देँ । रत्नाकरकार ने निस्नङ्खित कारिका द्वारा इसका स्पष्टीकरण करते हए छवा है -- 
“अर्यो विरुदविषमादिरनेकयेदः कार्याधितो भवतति यद्यपि किन्त्वमुष्मिन्‌ । 
ओचित्यवत्फल्वियोगवपुस्तथापि सामान्यलक्चणमखण्डितमेदमागि ॥ 
--काय॑कीदृष्टिसे अर्थं विरुद्ध ओर विषम आदि अनेक प्रकारका होता दहै तथापि इस 
अलकार मेँ 'उचित फल का अभावः यह सामान्य लक्षण प्रत्येक मेँ अखण्डित ही रहता है । 
उक्त भेदो मे से कतिपय भेदोंके उदाहरणभी रत्नाकरकारने दिए किन्तु उनमें से 
अधिकांञ्च अन्य अलकारो मँ अन्तभूत सिद्ध होते हे । 
अप्पय्यदीक्तितने भी विचित्रारंकार की स्वतन्त्र सत्ता स्वीकार की है। उनका लक्षण इसः 


प्रकार है-- 
“विचित्रं तत्प्रयत्नदचेद्‌ विपरीतफलेच्छया । 
"फलके छभिके लिए विपरीत प्रयत्न विचित्र । 
उदाहरण "नमन्ति सन्तस्तरैलोक्यादपि लब्धं समुन्नतिम्‌ । 
-- तत्पुरुष त्रैलोक्य से ऊंचा होने के लिए नवते है ।' 
पण्डितराज जगन्नाथने मी विचित्र को स्वतन्त्र अल्कार मानाहै ओर इसका लक्षण इस्त 
प्रकार किया है- 
द्टसिद्धयर्थमिष्टेषिणा क्रियमाणमिष्टविपरीताचरणं विचित्रम्‌ 
~ इ्टसिद्धि के लिए इष्टवस्तु को ही चाह रद व्यक्तिकेद्वारा कियाजा रहा इष्टवस्तु के विपरीत 
अर्थात्‌ प्रतिकूल भाचरण विचित्र कहलाता ह ।' विषम से इसक्रा मेद पण्डितराजने एक ही बिन्दु 


अधिकाटङ्कारः ५०१ 


पर किया है । वह्‌ है पुरुषप्रयत्न । विषय मँ वैषम्य प्राकृतिक होता है पुरुषप्रयत्नृत नदीं । विषम 
तै कार्य ओर कारण के गुणों मे विपरीतता ही चमत्कारजनक होती है । रत्नाकरकार दारा प्रस्तुत 
प्रपंच को पण्डितराजने छोड दिया हे। 


विश्वेश्वर ने विचित्र को स्वतन्त्र अलंकार नहीं माना यथपि विषम के विवेचन मे उन्होनि 
इसका अन्तभाव मी नहीं दिखलाया । 
श्रीविदयाचक्रवतीं की कारिका इसपर इस प्रकार है- 
"प्रयत्नस्तु विचित्रं स्याद्‌ विपरीतफराप्तये । 
निषेधतो वेपरीत्याद्‌ विषमारङ्ङ्ृतेमिदा ॥' 


[ सवेस्व |] 
[ घू० ४९ ] आनघ्नयाश्रयिणोरनानुरूप्यमधिकम्‌ । 


विसेधप्रस्तावादिह नि्दंशः। अनायुरूप्यस्य विरोधोत्थापकत्वात्‌ । 
तच्चानाचुरूप्यमाश्रयस्य वेपुव्येऽप्याशितस्य परिमितत्वाद्वा भवति आशधि- 
तस्य वेपुट्येऽप्याश्चयस्य परिमितत्वाद्वा । क्रमेण यथा - 


योरत्र कचिद्‌ाधचिता प्रविततं पाताटमन्न कचित्‌ 
काप्यत्रेव धरा धराधरजलाघारावधिवेतेते । 
स्फीतस्फीतमहो नभः कियदिदं यस्येत्थमेवंविधे 
दुरे पूरणमस्तु रान्यमिति यन्नामापि नास्तं गतम्‌ ॥' 
दोदेण्डाश्ितचन्द्ररोखरधनुदण्डावभङ्ञो्यत- 
ण्रकारध्वनिरायेवाछच रितप्रस्तावनाडिण्डिमः। 
द्राक्पयेस्तकपाटसंपुटमिलद्‌ बह्याण्डभाण्डोदर- 
श्राम्यतिपिण्डितचण्डिमा कथमहो नाद्यापि विश्राम्यति ॥" 
पूवेत्र नभस आश्रयस्य वेपुव्येऽप्याधितानां दयप्र्रतीनां पारिमित्यं 
खरूत्वहेतुः । उत्तरत्र तु टउंकारध्वनैराितस्य महच्वेऽपि ब्ह्माण्डस्या- 
रयस्य स्तोकत्वम्‌ । 
[ सू० ४९ ] आश्रय ओर आश्रयी की अननुरूपता अधिक [ नामक अरुंकार 
कहराता है ] | 
विरोध के कारण इसे यहाँ बतलाया जा रहा हे, क्योकि अननुरूपता [ अनुरूपता का अभाव ] 
विरोध खड़ा करती है। यह अननुरूपता आश्रय के विशाल होने पर भी आश्रित के परिमित होने 


सेभीहोती हे भोर आश्रितके विलाल होने परमभी आश्रयके परिभित होने परमी। क्रम से 


उदाहरण--| आश्रयविपुलता तथा आश्चिततुच्छता पर भरित अधिक ]- 

इसी मं कीं स्वगं आश्रित है, कीं इसी में पर्याप्त विस्तृत पताल भी है, जोर इती मे कीं 
पवत-ससुद्रा तक व्यापक्‌ भूमि मी टिकी इदे है । इस प्रकार देखो तो कितना स्फीत ओर स्फीततर 
ह यह आकाश, जिसके इस प्रकार फे इन [ स्वर्ग, पाताल भौर पृथ्वी जैसे पदार्थौ | कै दारा 
भी भर जाने कौ बात तो दूर रहे, जिसका श्ञुल्य' यह नाम भी समाप्त नदीं हे सका । 


५०२ अलङ्कारखवंस्वम्‌ 


[ आश्रयतुच्छता तथा आश्ितविपुक्ता पर आश्रित अधिक ]- 
(भुजदण्ड दारा खींचे रिवधनुषके टूटने से उटी टकार, जो बडे भई [ राम ] के बाल्चरितं 
[ रूपी नाटक ] की प्रस्तावना [ आरम्भ ] की सूचक नान्दी [ नगाड्। ] है तथा जिसकी पुंजीभूत 
्रचण्डता, तत्का कपालसन्धि के दिथिर हो जाने से डगमगाते ब्रह्माण्डरूपी भाण्ड [ धट ] मे धूम 
रही हे, अहो १ अमी तक ओान्त नहींहोरही।' | 
प्रथम [प्य] मं साकारारूपी आश्रय के विशाल होने पर भी स्वगं आदि आधित कौ परिमितता 
चार्ताका हेतुहे ओर दूसरे मे टंकारध्वनिरूपी माधित के विपुल होने पर भी ब्रह्माण्डरूपी 
आश्रय को परिमितता । 
विमरिनी 
आश्रयेत्यादिना । इडेति विचिच्रानन्तरम्ब्‌ । नन्वनजुरूपयोः संघटने वि षमसुक्तमिसया 
श्रयाध्रयिणोस्तखे कथमलरूकारान्तरञ्ुच्यत इत्याशङ्कां गी कारेणेतद्वयाचष्टे-तच्चेत्यादिना । 
आश्रयस्येति, खाधारस्य । आश्रितस्येति, आधेयस्य । अनेनव चास्य भेडदयमप्ययुक्तस्‌ । 
एवं च परिमितसवापरिमितव्वयोः सापेक्तत्वात्तथाविधवस्तुद्यसंघटनयव तदवगमन. 
खिद्धिरिव्यन्नाधाराघेययोः संघटनेन वाननुरूपतव्वमव ग्यते । विषमे चानन्यावेन्षरेन स्वतः 
एवाननु रूपयोः संघटनर्मिव्यनयोमहान्‌ भेद इत्यत्र पिण्डार्थः । इत्थम्‌ू- 
'आधारधेययोयंत्र संसगः स्याद्‌ विरूपयोः। 
स स्फुटो विषमो वाच्यमधिकं नाधिकं ततः ॥' 
इति न वाच्यम्‌ । तच्ाश्रयाश्रयणोः कविप्रतिभाकर्पितमेव ्राद्यम्‌ न पुनर्वाश्तवम्‌ । 
तेन चा्व्वाप्रतीतेः। तेन नभसो च॒प्रश्धतीनां चान्योन्यापेच्चया वे पुख्यं पारिमित्यं च वास्त. 
वमेवेव्यचुदाहरणमेतत्‌ । तदुदाहरणान्तरमन्वेष्यम्‌ । तत्त यथा- 
रणरणजगुणिञस्युजत्तणम्मि तणुई सञ्ुदगदहिरम्मि । 
मेरुजडवच्छुसः तुञ्छुं हिजए्‌ कहं णु टह ॥ 
अन्न हृदयस्य महरवं तन््याश्च तचुव्वमित्याधाराधेययोरन।नुरूप्यम्‌ । 
आश्रयेत्यादि । इह = यष्टा अथात्‌ विचित्रालकार के पश्चात्‌ । “अननुरूपं के मिलने 
विषम अलंकार माना ही है अतः जव आश्रय ओर आश्रयी अननुरूप है तो इत्ते अलग अल्कार 
क्यों वतकाया जा रक्टा दै"-इस आरोका को हदय मे रखकर इस्त सूत्र की व्याख्या करते दै- 
तश्च इत्यादि दारा । आश्रय = आधार । आध्रित = आयेय । इसी के दवारा इस अलंकार के 
दोमेदमभी वतलादिए। इस प्रकार परिमितत्व भौर अपरिमितत्व परस्पर सापेक्ष होतेरहै, 
(> इनते युक्त दो वस्तुओं के समागम स्ते ही इनकी परिमितता भौर अपरिमितता तथा तदाश्रित 
भननुरूपता का बोध संभव होता हे। इस प्रकार यहो अननुरूपता का बोध आधार भौर 
आधेय के योग पर निभैर रहता है। विषम मँ अननुरूपता दूसरे पर नि्भ॑र नहीं रहती, वदां 
अनुरूप पदार्थौ का योग स्वतः ही होता हे। इत प्रकार इन दोनों मे महान्‌ भेद दहै। इस 
प्रकार-[ अलंकाररत्नाकरकार को | 
जहाँ विरूप आधार ओर भवेय का संबन्ध हयो वह मी एक स्पष्ट विषम है । अतः अधिक को 
अधिकाटकार या अतिरिक्त अलकार नहीं मानना चाहिए ।' रसा नदीं कहना चादिए । 
आधाराधेय की वही वह्‌ [ भननुरूपता | यहो [ अलंकारत्व के छ्एि] आद्यदहैजो कविः 
कदिपत हो, वास्तविक नदीं । वास्तविक से चारत्व की प्रतीति नहीं होती । इसङ्िए, आका 


अधिकालङ्कारः ५०द 


सोर स्वगं आदि की परस्पर के प्रति विपुलता ओर परिभितता वास्तविक है अतः इसे उदाहरणे 
नदीं माना जाना चाहिए । अतः उसका अन्य कोद उदाहरण खोजा जाना चाहिए । वह यह्‌ है-- 
^रणरणकगुणितसुग्धत्वे तन्वी ससुद्रगम्मीरे । 
मैरुकटवक्षसस्तव हृदये कथं नु स्थास्यति ॥› 


अर्थात तम्दारे उस हृदय मे वहं तन्वी कैसे वेठेगी जिसमे भरा इआ सयुग्धत्व उत्कण्डा से 


केडे गुना हदो गया हे जो सस्र के समान गंभीर है ओर जिसका वक्षस्थल सुवणेगिरि-समेरु कै 
तटके समानदहें(१)। ¦ 


यह हृदय मे विपुलता ओर तन्वी मँ परिमितता वतलाईेजा रही है अतः आधार ओर 
आधेय में अननुरूपता है । 

अधिकारुकार का इतिहास्च- प 

मामह, वामन तथा उद्भट म अधिक नदीं मिता । इसको करपना पदले-पहल रुद्ररटने 
कोहे। रसद्रटने इसके दो भेद बतलाणहै- 


[१] दो विरुद्ध वस्तुञोंका एकी वस्तु से जन्म । यथा भेव पानी ओर जलती आग 
दोनों एक साथ बरसा रहा है 1 | 


[२] छोटा द्योने पर भी आयेय वड़े आधार से वद्‌ जाना । यथा उसके जगद्विलार हृदय मे 
वद्‌ तन्वी इतनी फेर कर रह रही है कि दूसरी किसी सुन्दरी को वदाँ अवकार दी नदीं है ।' 
उपयुक्त दोनों के लक्षण इस प्रकार है- 
| १ ¡ यत्रान्योन्यविरुदधं विर्‌ द्धबल्वत्क्रिया प्रसिद्धं वा । 
वस्तुद्यमेकस्म।ज्जायत इति तद्‌ भवेदधिकम्‌ ॥ ९।२६ । 
| २ | य॒त्राधारे स॒महत्याधेयमवस्थितं तनीयोऽपि । 
अतिरिच्येत कथचित्‌ तदधिकमपरं परिज्ञेयम्‌ ॥ ९।२८ । 


मम्मट-मम्मरने रद्रट के प्रथम अधिकको छोड केवल द्वितीयको ही अलंकार मानाहै, 
उनकी कारिका यह है- 


'महतोयन्मही यांसावाश्रिताश्रययोः क्रमात्‌ । 
आश्रयाश्रयिणो स्यातां तनुत्वेऽप्यधिकं तु तत्‌ ॥ 
--्रस्तुत वस्तु के प्रकषंकी विवक्षासे, छोटे होने पर भी जयौ आश्रय ओर भाभ्रित 


[ अथात्‌ जाधार्‌ ओर्‌ आधेय ] अपने से बडे अपने आशित जर आश्रय से वड़े वतव्यए जा 
वहु अधिक ।' दोनो में से प्रथम का उदाहरण- 


अहो विश्रु मूपा भुवनत्रितयोदरम्‌ । 
माति मातुमश्चक्योऽपि यशोरारियंदत्र ते ॥ 


-- “अहो, तीनों सुवन का उदर बहुत वडा है राजन्‌ ! इसमे भापका अमेय यश्ोरा्चिमभी 
जो बन जाता है । 


समे आपय य़ को वड़ा वतलाकर उससे छोटे त्रैलोक्यरूपी आधार को बड़ा बतलाया जा 
रहा हे। इसमें विवक्षित है योरा का प्रक । द्वितीय का उदाहरण- 
“युगान्तकालप्रतिसंहृत।त्मनो जगन्ति यस्यां सविकासमासत । 
तनो ममुरतत्न न कैटमद्विषस्तपोधनाभ्यागमसंमवा मुदः ॥' 
4 - "युगान्त कारमं जो अपना प्रपंचवटोरल्तेहे तो जिनके शरीर मे सारे भुवन पर्या 
पीलाव के साथ वन जाते हैँ भगवान्‌ इष्ण कै उसी सरीर मे तपोधन नारद के आने का प्रकरं 
नहीं बन सका यहाँ वास्तविक रूपसे छोटे प्रहषं को प्रक्रष्ट बताने कै किए उसे उस॒क्ते 
उसमे बडे भगवच्छसर रूपी बधार से बड़ा बतङाया जा रदा है । 


९५०४ अलङ्कारखवंस्वम्‌ 


इस प्रकार अधिक के स्थापक रद्रटसे आगे बद्कर मम्मट तक आते-आत्तेषह्ी अधिक के 
लक्षणम अन्तर भा गया। आगे सवस्वकार तक पहुंचते-परहुंचते तो उसके लक्षण मे पर्याप्त 
परिवतंन दिखाई दे रहा है। रद्रट ओर मम्मर्के रक्षणो मे तीन-तीन कोयियाँ थीं छोट, वडा 
ओर छोटा बडे से वड़ा । सर्व॑स्वकारने इन कोयियों से वच कर लक्षण योजनाका सरलतम रूप 
निकाला । इसमे दोद्ी को्िर्यो ाती हँ । एकतो आधार भौर आधेयकी वास्तविकता की 
कोटि ओर दूसरी उसके विपरीत उनके कादपनिक भकार की कोटि। इसमे वास्तविकता के 
येदो अंश एकदही सूत्र मेंञा स्मातेरैँ- एक आधारगत परिभितता या अषपरिमितताका 
ओर दूसरा आधेयगत अपरिमितताय। परिमितता का। इस प्रकार परिष्कार लश्रणमातव्रमें 
उदरता है । अ्थयोजना ज्यो की ्यो रहती ईै। किन्तु रुदर दवारा प्रतिपादित प्रथम मेद अमान्य 
सवस्वकार को भी है। 

परवत्तीं आचार्यो मं- 

दो माकर-अधिक को विषम काही मेद बतलतिदैँ ओर्‌ उति एक अतिरिक्त अलंकार 
नदीं मानते । विमर्िनीकार उनका खण्डन करते हें । 

अप्परग्रदील्ित-ने मम्मट दारा प्रस्ठत अधिकाल्कार दो स्थितियों को दी दो प्रथक्‌ 
अनुष्टभो मे शस प्रकार विभक्त कर दिया है- र 

[ १ | अधिक पृथुलाधारादापेयाधिक्यव्णनम्‌ । 

ब्रह्माण्डानि जल य॒त्र तत्र मान्तिनते युणाः॥ 
[ २ ] ध्ृथ्वाधेयाद्‌ यदाधाराधिक्यं तदपि तन्मतम्‌ । 
कियद्‌ वाग्रह्म यत्रैते विश्राम्यन्ति गुणास्तव ॥ 

अप्पय्यदीक्षित ने प्रथम के लिए मम्मट द्वारा उदाहृत माघकाही युगान्तकालः प्यमभीदे 
दिया है ओर द्वितीयके लिए “अद्धो विद्वालं० पद्यमभी। लक्षण निमा में अप्पयदीक्षितनेमी 
क्रम सर्वस्वकार का ही अपनाया है । 

पण्डितराज-- जगन्नाथ भी सवंस्व ओर इुवलवानन्द की हौ पद्धति पर अधिकका लक्षण 
वनाति हैँ किन्तु उस वह प्रथोजनांरा भी समाविष्ट कर देते हे जो मम्मट ने वृत्तिम स्पष्ट किया 
थ--श्रसताथं के प्रकपं की विवक्षाः । उनका लक्षण यह है 

'ाधारायेययोरन्यतरस्यातिविस्तरतत्वस्तिद्धिफल्कमितरस्यातिन्यूनत्वकस्पन मधिकम्‌ ।' 

"आधार भौर आधेय मेँ से ्िसी एक की भतिविस्वृतता वतलाने के किए अन्य मे अतिः 
न्यूनता कौ कल्पना भधिक्र । कद्पनाशब्द देकर पण्डितराज ने वास्तविक अन्तर्‌ को अकाग्य 
भर अधिक के किर अनुदादायं कदा है। इ प्रकार वे श्चोरत्र“ पको कविकटपन। के अभाव 
म अधिक के छि ठीक उसी प्रकार अनुदाहायं मानते ह जिस प्रकार विमर्दिनीकार । विश्वेश्वर 
पण्डित इसश्रा ठीक उसी पद्धति पर प्रतिवाद करते दै जिस प्र उन्होने अरण्यानी क्वेयम्‌” 
पथं स्व॑स्व के खण्डनका प्रतीकार कियाहै। वे य्हामी पचयाथेके रूपमे नमकेमध्य 
स्वर्गादि की करपना कविप्रतिभाका ही विषय मानतेदहँ। इस प्रकारवे यृाँभी चमत्कार 
स्वीकार करते ओर अधिकालंक्रार के लि इते उपयुक्त मानतेदे। सच यदह कि स्वतःसंमवी 
यथं को काव्य मानना य॒दि आनन्दवधंन से केकर पण्डितराज तक के आचार्यो को यदि अनुचित 
नदीं लगता तो उन्है, ठेते पर्थ मे अल्कारत्व ओर तदाधरित काव्यत्व मानने मे कोड अनौचित्य 
नक्ष देखना चादि । 


अन्थोन्यालङ्ारः ५०९ 


विद्वेदवर का अधिक लक्षण इस प्रकार का है- 
(आधार स्याधेय।दापेयस्यापि वाधारात्‌ । 
यदि वण्यते महच्वं तत्‌ कश्यन्त्यभिकमपिकज्ञाः ॥ 
श्रीविदाचक्रवत्तीं की कारिका शस पर निम्नलिखित है- 
'अनानुरूप्यमधिकमाश्नरयाश्रयिणोम॑तम्‌ । 
आश्रयाश्रयिवेपुल्यवशतो दिप्रमेदकम्‌ ॥› 
[ स्वेस्व ] 
[ घ्ू० ५० ] परस्परं क्रियाजननेऽन्योन्यम्‌ । 


इहापि विरोघधस्ताव पव निर्दशाकारणम्‌ , परस्परजननस्य विरुद्ध- 
स्वात्‌ । क्रियाद्वारकं यत्र परस्परोत्पादकत्व, न स्वरूपनिबन्धनं, स्वरूपस्य 
तथार्वोक्तिविरोधात्‌ तत्रान्योन्याख्योऽठकारः । यथा- 
कण्ठस्य तस्याः स्तनबन्धुरस्य मुक्ताकलापस्य च निस्तलस्य । 
अन्योन्यद्योभाजननाद्‌ बभुव साधारणो भूषणभूष्यभावः ॥' 
अत्र शोभाक्रियामुखकं परस्परजननम्‌ । 
[ सू° ५० ] परस्पर मे क्रिया की उत्पत्ति हो तो अन्योन्य । 
यहां भौ विरोधका प्रङ्गही निदेशका कारण दहै क्योकि परस्पर की उत्पत्ति विरोधधूरण 
होती है। परस्पर की उत्पादकता जहाँ क्रियाके द्वाराहोतीदहै, न किं स्वरूप के दारा, क्योकि 
स्वरूप कौ वेसी उक्ति [ अपरिहायं रूप से ] विरुद होती है, वहो अन्योन्यालक्कार होता है । यथा- 
उस [ पावती ] का स्तनो से बन्धुर [ उतार-चदाव युक्त ] कण्ठ तथा निस्तल [ गोल ] सुक्ता- 
हारये दोना, दोनों के भूषण ये ओर दोनों दोनों ॐ भूष्य, क्योकि सोमा दोनों की दही बढ़ 
रही थी दोनों से ।' [ कमारसं० १।४२ ]य्ँ शोभारूपी क्रिया के द्वारा परस्परजनकता है ॥ 


विमशं : शस अरुंकार के सूनर ओर इत्ति कौ भावयोजना छु ठेसी है जिससे मतीत होता है 
कि दोना दो भिन्न रचयिताओं द्वारा रचे गएहें। 


विमरिनी 


परस्परमित्यादि। ननु यदि परस्परजननस्य विश्दत्वं तव्कथमध्याटकारष्वमिष्याज्ञ- 
कथाह ~ क्रियेत्यादि । कियाश्चब्देनात्र धमां रुच्यते । अन्यथा 
्रकाज्ञः कोऽपि केकासजेरूपणेन्दु विस्बयोः। 
उदियाय तद्‌न्योन्यपटुवजन नक्रमात्‌ ॥' 
दर्यादौ गुणास्मकपटुस्वमुखेन परस्परजननेऽप्यव्याक्िः स्यात्‌ । परसरोऽादकत्वमिति । 
परस्परनिष्पादकत्वमित्यथः। एवं चनेन जननस्य क्रियासामान्यास्मककारणा्थसवं 
दुर्लितम्‌ । तेन- 
प्रियतमहृदयं विवेश तन्वी परयुवतिप्रस्रापसारणाय । 
अतिञ्ुभगतया हरन्तु मान्या इति च निजे हृदये न्यवेशयत्‌ तम्‌ ॥ 


ग धका 


ष 


५०द अलङ्कारसवस्वम्‌ 


इस्यन्न परश्परं हृदयानुप्रवेश्चस्ताभ्य) कृत इति प्रतीतेः पयवसानार्परस्परजननस्या- 


इयापकत्वं न वाच्यम्‌ । 
"वि पर्ययं पू्वकथाद्‌ अुतस्य द्धक्यभूपारुशरश्चकार । 
५ % ् 
पपात यन्नष्ट तिव राहस्त विद्धरङ्ग वसुधा बभार ।\! 


[म ग चै 
दव्यन्न पुनरादिवराहच्रत्तान्तवंलन्तण्यमात्रस्य चिवक्षितस्वादन्योन्यालकार एव ना- 


स्तीति कस्याभ्यापकध्वं वा स्यात्‌ । एवमन्यन्नापि ज्ञेयम्‌ । तथात्वोक्तिविरोधादिति । 
इतरेतराश्रयदौोषरुच्षणात्‌ ! यदि पुनरत्र विरोधसमाधि्भवेत्तदाटंकारस्वमपि स्यादिति 
अचः! यथा- 

“धनेन जायते प्रज्ञा प्रज्ञया जायते धनस्‌ । 

प्रक्ञाथौ जीवलोकेऽस्मिन्परस्पर निबन्धनम्‌ ॥' 

अत्र प्रक्ताधनयोः स्वरूपस्य परस्परं जननम्‌ ¦ रोम।क्रियेति । सेव दयन्न परस्पर 
निमित्तम्‌ । 

[ शंका ] यद्वि परस्पर की उत्पादकता संभव नदीं हे [ वह तो व्याघात दहे] तो इसे अलंकार 
क्यो मानाजा रहा है, देसी आद्धंका कर उत्तर देते हैं क्रिया इत्यादि क्रिया श्चब्द का अथै यरु 
धमे मानना चादिए । नदीं तो-- 

उस समय केलाप्तपवेत तथा चन्दरविम्ब का कों अलोकिक प्रकाश प्रकट हआ क्योकि ये दोनों 
एक दूसरे मे अधिक चमक ला रहैथे। 

इत्यादि मे चमक [ पटत्व ] गुणात्मक है उसके द्वारा परस्पर की उत्पत्ति मेँ अन्योन्य का लक्षण 
न जाएगा । परस्परोर्पाद्‌कत्वम्‌ अथात्‌ परस्पर की निष्पादकता। इस प्रकार यहां जननं 
[ दाब्द ) का अथं क्रियासामान्यरूप कारण दिखलाया गया ' इस कारण-- | 

"तन्वी प्रियतम के हृदय मँ प्रविष्ट हो गई, इसकिएट कि उसमें अन्य युवतिरयां को जगह न भिङे । 
इसी प्रकार अत्यन्त सुन्दर होने से अन्य कोई [ ख॒न्दरी ] उप्ते हरन लं श्सलिए उसेभी [उस 
तन्वी ने ] अपने हृदय मेँ निविष्ट कर लिया ।› यदा प्रतीति उन दोर्ना ने परस्पर के हृदय में प्रवेश 
करिया हत रूप म परिणत होती है, अतः यहाँ पररस्परजनन कौ भव्याप्षि है ठेस [ अल्कार- 
रत्नाकरकार को ] नदीं कहना च।दहिए । 

“अइ वमद्ल्देव के वाणने [ वराह को वराहावतार मे प्राप्त समुद्रसे पृथिवी को धारण कर 
निकलने की ] पूवं कथा के आश्चयं को उलट दिया, कर्योकि जव वराह धवराकर गिरा तो विल 

अंग के उसी [ वराह ] को प्रथिवी ने धारण किया । [ विक्रमांकदेवचरित १६।३७ | 

यँ केवल आदिवराह कै वृत्तान्त से [गृगयाकाल मे शरवद ओर भूपतित वराह के वृत्तान्त कौ | 
भिन्नतामान्न की विवक्षा है, जतः यँ [ रत्नाकरकार द्वारा स्वीकार अन्योन्यालकार ही नहीं हे, तव 
अव्यापक कौन होगा ? इसी प्रकार अन्य उदाहरणं में जानना चादिए । तथाष्वो क्िविरोध = 
वरयोकि यह विरोध अन्योन्याश्रयदोष होगा [भन्योन्यांकाररूप नहीं] भाव यह किं यदि यहां विरोध 
का समाधान हो जाता तो कदाचित्‌ यहां मलंकारता संमव होती । यथा-- 

धन से प्रज्ञा उतपन्न होती है ओौर परज्ञा से धन । प्रज्ञा भोर धन इस जीवलोक मेँ परस्पराश्रित 
है ।› यां प्रज्ञा ओर धन इन दोनो क स्वरूप एक दूसरे को उत्पन्न करते है। [किन्तु यहां] विरोष 
का समाधान द्वे गौर कालके मेद तै द्ये जाता है [अतः यहां अलंकारत्व मान्य हे] श्लोभाक्रिया= 
यहां जो दै वदी परस्पर म निभित्त है, 


अन्योन्याटङ्कारः ५०७ 


विमर्च -इतिहास- 
अन्योन्य की कदपना प्रथमतः रद्रटने दी की हे। उनके पृवेवत्तीं मामह, वामन तथा उद्धटमे 
यह अलंकार नदीं भिल्ता । रुद्रट ने इसका विवेचन इस प्रकार किया दै-- 
ध्य॒त्र पर स्परमेकः कारकमावोऽभिधेययोः क्रियया । 
संजायेत रफारि ततत्वविदोषस्तदन्योन्यम्‌ ॥ ७।९१ ॥ 
-- “जक्ष दो पदार्थौ में परस्पर कै प्रतिक्रिया दारा एक ही कारकभाव दो ओर उससे तत्व 
विदेष व्यक्त होता हो तो उसे अन्योन्य कहते हे ` उदाहरण- 
“रूपं योवनलक्षम्या यौवनमपि रूपसंपदस्तस्याः । 
अन्योन्यमलङ्करणं विभाति रारदिन्दुसखन्दयाः ॥ ७।९२ ॥ 
-- उस शरदिन्दुस॒न्दरी का रूप [ आकृति ] योवनश्री का ओर उसकी यौवनश्री रूप काः 
अलंकार प्रतीत होतादहै।ः 
मस्मट-मम्मटमेंरुद्रटका ही अस्षफङ अनुकरण है- 
"क्रियया तु परस्परम्‌ , वस्तुनोजननेऽन्योन्यम्‌ ॥ 
ददो वस्तुओं का क्रिया के द्वारा परस्पर की उत्पत्ति अन्योन्य '' उदाहरण- 
“ह सानां, सरोभिः श्रीः साय॑ततेऽथ हंसे: सरसाम्‌ । [ प्राङ्तच्छाया ] 
सों की शोभा तालाव वदाते हँ ओर तालाब की दहस) 
सवस्व के सूत्र तथा उसकी वृत्ति की योजना से ल्गताहेकि ये दोनो दो भिन्न रचयिताकेः 
हे । वृत्ति में रद्रट तथा मम्मट का सिद्धान्त प्रतिपादित भिल्ता हे जव कि सूत्र की पदाथ योजनाः 
उससे भिन्न अथं का संकेत देती हे । सूत्र मे फक्रियाजननः-पद का समासत षष्ठीतत्पुरुष माना जा 
सकता हे । तदनुसार सीधा अथ निकलता है (परस्पर मेंक्निया की उत्पत्ति, ओर समी आचार्यौ 
को यदी अथे विवक्षित है। वे कते मले हौ (क्रिया केद्वारा परस्पर की उत्पत्ति यहो। रूप्‌ 
ओर यौवन, दंस जीर तालाव तथा पावतौकण्ठ एवं निस्तल सुक्ताहार परस्पर मे एक दूसरे कौ' 
शोभा ही उत्पन्न करते दहे, एक दूसरे के स्वरूप को नदीं । वृत्ति म जो 'परस्परोत्पादकत्वः अब्द 
हे उसमें पाठान्तर "परस्परोपपादकत्व" भी मिलता है। इससे ल्गता है क्रि प्राचीन पार्कोंको 
भी यह वेषम्य खट्का था। विमिनीकार ने सूत्र ओर इत्ति के इस निगूढ वैषम्य पर ध्यान नं 
दिया । वे भी मम्मट मत के समर्थक जो है । परवत्तीं रत्नाकरकार- 


श्ोभाकर-ने इस वेषम्य में सूत्रकार का हौ साथ दिया है। यह तथ्य उनकै निम्नङ्िखितः 
सूत्र से स्पष्ट र-- 

[ सू° | ‹रूपधम्योः परस्परनिबन्धनत्वमन्योन्यम्‌ ॥' 

रूप आर धमकी परस्पर के द्वारा निष्पत्ति अन्योन्य ।' स्पष्ट ही इसमे रूपवान्‌ यां 
धर्मं के प्रति कारणता न मानरूप ओर धर्मं के प्रतिही वद मानी गई है। रत्नाकरकार ने 
सवंस्व कौ वत्ति कै विरु स्वरूप की अन्योन्यनिष्पत्ति मँ भी अन्योन्याठंकार भानाहै ओर 
विमदिनीकार ने उसे स्वीकार भी विया है। स्वरूपनिष्पत्ति कै लिए रत्नाकरकार ने धनेन 
जायते भरजञा०' इसी प्य का उदाहरण दिया है विमरिनीकारने सूरस्य क्रियाको धमैका 
उपलक्षण भी मानाहै। उस्केलिए रत्नाकरकार ने अनेक स्पष्ट उदाहुरण दे "कण्ठस्य तस्या 
प्मंभीशोभाको क्रिवारूपन मान धर्मरूप मानाथा। सिद्धावस्थापन्न क्रियाभी धम॑ही 
होती हे। धमं ओर उपापि प्याय है अतः क्रिया भी धमै दयौ है क्योकि उपाभिचतुटयवाद मे 


५०८ अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


क्रिया को भी उपाधिस्वरूप मानकर दाब्द का प्रवृत्तिनिमित्त मानादहै। रत्नाकरकारने खोभाके 
लिए पयाय रूप मे बहुत ही सहृदयता पूर्णं 'परभागः-शब्द दिया है । 


अप्पयदीचित-धर्मया ध्मींका नाम विना किए केवर अन्योन्य उपकार को अन्योन्या- 


- रकार मानते है- 
“अन्योन्य नाम य॒त्र स्यादुपकारः परस्परम्‌ । 
उदाहरण त्रियामा शरिना भाति दरी भाति त्रियामया ॥ 
-- जं परस्पर के प्रति परस्परका उपकार दहो तो उते अन्योन्यालंकार कहते है । यथा-- 
रात्रि चन्द्रमा से सुरोभित होती है भौर चन्द्रमा रात्रि से॥' 
पण्डितराज जगन्नाथ ने मी अप्पयदीक्षित के ही अनुसार निम्नकिखित लक्षण किया है-- 
(दयारन्योन्येनान्योन्यस्य विदो षाधानमन्योन्यम्‌ । 
-धदोपमेंसे पक दूसरेके द्वारा एक दूसरे में विशेषता का आधान अन्योन्य । विशेषता को 
` पण्डितराज ने "क्रियादिरूपः कहा है-- “विशेषः क्रियादिरूपः । 
विश्वेश्वर पण्डित ने भी-अप्पयदीक्षित ओर पण्डितराज का ही पथ अपनाया भौर 
` अन्योन्य का लक्षण उन्हीं के अनुकरण पर इस प्रकार किया है-- 
अन्योन्यं वस्तूनां परस्परोत्कपषंदेतुत्वम्‌ । 
वस्तुओं का परस्पर मेँ उत्कषं हेतुत्व अन्योन्य याँ उत्कषंपात्र वस्तु मेँ पूर्वाचार्यं 
 म्र्तिपादित द्वित्व को विदवेदवर ने बहुत्व मँ वदल दिया है। वस्तुतः उपकार्यं भौर उपक्रारी के 
- दो स्पष्ट वर्गं तौ उत्कषंपात्गत वहुत्व की स्थिति में भी रदंगे शी । 
श्री विचाचक्रवतीं की निष्कृष्टं कारिका यद्य यह है-- 
क्रियाजननमन्योन्यमन्योन्यालङ्कृतिमंता ॥' 
| सवस्व | 
[ घ° ५१] अनाधारमः।घेयमेकमनेकगो चरमचक्यवस्त्वन्तरकरणं 
विशेषः । 
इहाधारमन्तरेणाधेयं न बतत इति स्थितावपि यस्तत्परिहारेणाघ्रेयस्यो- 
 पनिषन्धः ख पको विदोषः। यच्चेकं वस्तु परिमितं शुगपद्नैकधा वत. 
भानं क्रियते स द्वितीयो विरोषः। यच्च किचिदारभमाणस्यास्तभाव्यवस्त्व- 
न्तरकरणं स तृतीयो विदोषः । आलुरूप्यपरिदाररूपविपेधप्रस्तावादिहोक्तिः । 
क्रमेण यथा-- 
'दिवमष्युपयातानामाकदपमनस्पशरुणगणा येषाम्‌ । 
रमयन्ति जगन्ति गिरः कथमिव कवयो न ते वन्याः ॥' 
श्राखादे सा पथि पथिचस्ता पृषठतःसापषुरःसा 
पयंङ्के सा दिशि दिशि च सा तद्धियोगातुरस्य । 
हंहो चेतः प्रतिपा नास्तितेकापिसासा 
सासासा सला जगति खकठे कोऽयमदेतवाद्‌; । 


] 
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पि | 


विरोषाटङ्कारः ५०९. 


निमेषमपि ययेकं क्ीणदोषे करिष्यसि । 
पद्‌ चित्ते तदा शंभो कि न संपादयिष्यसि ॥ 
अच कवीनामाधाराणासमावेऽप्याघेयानां गिरामवस्थितिः अनन्यभावो 
विषयाथे इति विषयत्वेन तेषामाधारत्वात्‌ । पकस्या एव योषितः पासा- 
दादौ अवस्थानम्‌ , चिन्तविषये पदकरणे प्रस्तुतेऽपि भाविटोकोत्तरवस्तसंपा- 
द्‌नं क्रमेण ज्ञेयम्‌ । 

[ सू° ५१ | 'जधाररहित आधेय, एक का अनेक रूप से दिखाई देना, अशक्य अन्यः 

कायं की निष्पत्ति विशेष [ कहलाते हँ | ॥' 

[ १ | यहां आधेय आधार के विना नहीं रहता। इतने परमभीजो उस [ भाधार ] के 
विन। आयेय का बतलाया जाना वह एक प्रकार का विशेष होताहे। [२] इसी प्रकार एक 
वस्तु सीमित दाते हर भौ जो एक साथ अनेक रूपो म विद्यमान दिखलाई जाती है वह दूसरे 
प्रकार का विशेष कदलाता है। इसी भाँति [३] अन्य छु कर रहे व्यक्तिका जो अन्य 
असंभाव्य काये कर देना दिखलाया जाता है वह तीसरे प्रकार का विदोष होता है। अनुरूपता 
छोड़ने रूपी विरोध को लेकर इसे यहाँ बतलाया गया । क्रम से उदा इरण- 

[ आधारहीन आघेय-- |] 

“स्वगं चके जाने पर भी जिनकी अनल्प गुरणा से युक्त उक्तियोँ संपूणे जगत्‌ को आनन्द देती 
रहती हैः वे कविजन कंसे वन्दनीय न होगे ।' 

[ एक कौ अनेकगतता - | 

“उसके विय)।ग मे आतुर मेरे लिए प्रासाद पर वह ओर गली-गली में वह, पीछे वह, आगे वह, 
पलंग पर वह ओर दिशा-दिशा में वह । अरे [ मेरे ] चित्त ! तचे कुछ ओर नदीं सृक्षता १ सारे 
संसार में वह्‌ वह, वह॒ वह, वह वह । यह्‌ कोन-सा भद्रेतवाद है ।' 

[ अन्य असंभाव्य काये की निष्पत्ति- | 

“हे भगवान्‌ शिव ! आप [ मैरे ] दोषसुक्त चित्त मे यदि प्षणभर के छिद भी आ वक्ते 
तो आप क्या-क्या संपन्न नहीं कर देंगे । 

यहां [ प्रथम पय में ] आधारभूत कवियों के न रहने पर मी आपेयभूत उक्तियों की अवस्थिति, 
क्योकि वे विषयरूपी आधार है, विषय का अर्थं है अन्य॒न्नन जाना [ “जेते उडते पक्षी का आधारः 
आकाड, क्योकि पक्षी आकाश से अलग नहीं जा पाता ]। 

[ द्वितीय |मंएकदहीसखरी की प्रासाद आदिमे एक साथ स्थिति, तथा [ तृतीय ] में चित्तमें 
स्थान करने रूपौ प्रस्तुत कायं के साथ-साथ भावी लोकोत्तर काय॑की निष्पत्ति क्रम से जाननीः 


चाहिए ॥' 
विमदिनी 
अनाधारमित्यादि । एतदेव ष्याचष्ट- इहेत्यादिना । तत्परिहदारेणेति। भाधारभ्यतिरेडेणे. 

व्यथः । परमितमिति अभ्यापकष्‌ । व्यापकस्य हि युगपदनेकन्न स्थितिव॑स्तुसंभविनीति 
तत्र नाटकारस्वम्‌ । किंचिदिति यत्र यादश्विवक्षितम्‌। न केवरमारञ्धश्य वस्तुनो 
निष्पत्तियांवदसं भाष्यस्यापि वस्स्वन्तरस्येव्यत्र तात्प्याथः। तच्च वश्तवन्तरं बिकीवितंः 
भवष्यचिकीषितं वा ¦ एवं च- 

'फलान्तर स्य निष्पत्तिश्चिकीषाविरहेऽपि या । 

स विरेषधिकीरषबायां प्रसङ्गश्तु ततः पृथक्‌ ॥' 


९4१० अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


इस्याद्य॒क्तयुक्ध्या प्रवक्गाद्न्याथैः। प्रसङ्ग इति । प्रसङ्गाख्यमंकारान्तरं न वाच्यम्‌ । 
न हि चिश्नीवितस्वं वा कश्चिद्धिच्छत्तिविरेषो येनारंकारान्तरस्वं स्याव ! याकता ह्यत्रा- 
संभाभ्यस्य वस्त्वन्तरस्य विच्छृ्तिविवक्ञिता सा चात्र रिथितेति किं चिकीषितस्वाचि- 


कीषितव्व कल्पनेन । तस्माद-- 
"अङ्घेषु खान्दटरि चन्द्‌ नपङ्कचर्चा मार्णांरुहारवक्यादि च पान्थवध्वाः। 


योऽभूदिवा पतिवियोगविषाद्द्भ्मो उयोत्लाभिश्चारपरिकमं स नक्तमासीत्‌ ॥° 

इव्यत्र हरिचन्दनचचादिना न शवर पतिवियोगविषादद्भ्भः कृतो यावदभिलारि- 
कापरिकर्मापि छतमिव्यकयवरस्वन्तरकरणात्सेवायं विशेषः । 

विशेषाश्वान्न त्रयो न पुनरेकखिविधः। कक्तणस्य भिन्नव्वात्‌ । उचितस्य ठु चिलि. 
छघ्वस्य भवस्द्रयागामपि वि्ेषव्वम्‌ ! भिरामन्न कविस्वभावाद्न्यत्न भावः; चम्भोश्च 
छोकोत्तरवस्संपादनं वास्तवमेवेति विशेषमन्रान्ये न मन्यते । एतावतेव पुनरस्याभावो 
न वाच्यः, उदाहरणान्तरेष्वस्य खंभवात्‌ । तानि तु यथा-- 

"अङ्गानि चन्दनरसादपि ीतलकानि चन्द्वातपं वमति बाहूुरयं यशोभिः । 
चालुक्यगोत्रतिकक क्रं वसत्यसौ ते दुदरंततभूपपरितापणुदः प्रतापः ॥' 

अत्रा्धशीनासनहैसेनाधारत्वाभविप्याघेयस्व प्रतापस्य स्थित्तिरिति विशेषारंकारस्वम्‌ । 
तथा च- 
"्चोरिञरमणाउटिष्‌ पुत्ति पिं हरि हि सित्ति कि जुञ्ज । 
वस्चंती मुहजोण्डाभरेहि' तिमिरं पि णण्निहिसि ॥' 

अन्न न छेदं प्रियं हरिष्यसि यावचिक्रर्पाविरहे गाल प्राव्यं तिमिरमपी'ति वस्त्वन्त- 
श्करणा्मा विशेषः । यथा वा- 

"माघः शिष्टपाङ्वधं विदधत्‌ कविमद्वधं विदधे । 
रत्नाकरः स्वविजयं इरविज्ञयं वणंयन्‌ व्यन्रणोत्‌ ॥' 

अन्न न केवङं साघः क्िशपार्वघं चकार य।वद्संभाव्यं चिकीषितं कविमईइवघम- 
करमात्मायं विलेषः। अश्चक्यमेव कविमद्वधं कतं माघस्यात्र 
कर्वुष्वम । पुवशत्तरद्रपि जेवम्‌ । अतः करसिमिन्किय माणि तञजातीयस्य प्रसक्तः बिद्धि. 
रनुषक्गः' इव्यदुषक्ाङंकारोऽपि विशेष एवान्तसंवतीति न परथग्वाच्यः। 

अनाधारेत्यादि । इसी की व्याख्धा करते है -इह शत्यादि $ दारा । तत्परिहारेण = उवै 
विना आधार के विना। परिमित = अव्यापक । लो व्यापक दोतादे वद्‌ अकेलामी एक साध 
अनेक स्थलों मँ वस्तुतः रद सकता है अतः वरहो अल्कारत्व नी होता । किंचित्‌ = ज्यं जैसा 
अर्थं विवक्षित हो । अर्थं यह किन केवल शुरू किए का्यकी ही निष्तिहो अपितु एसे किसी 
अन्यकौी मी निष्पत्ति दो जार जिक्तकौ संमावना मी नकीजा सकती हो । वह असंमाव्य अन्य 
वस्तु चिकीषित या अचिकौषित [ इस प्रकार दोनों ही प्रकार की | हो सक्ती है, अतः [ अलकार- 


पीव्यक्षाक्यवश्व्वन्तर 


रत्नाकरकार को | 
पविना चिकीर्षा के मी अन्य फलक की जो निष्पत्ति उस व्रिशेषनामक अलंकार होता है । प्रसंग 


नामक अलंकार वदाँ दयता दै जहो चिकीर्षां रहती है ।'-- 

इत्यादि के द्वारा प्रस्तुत युक्ति द्वारा श्रसङ्ग से अन्य पदाथं कौ निष्पत्ति प्रसङ्ग [ अलकार- 
रत्नाकर सूत्र ८७ ] इस प्रकार प्रसङ्ग नामक एक स्वतन्त्र अरं शरार नही बतलाना चाष्िए । रेता 
. थोडे दी रै कि चिकीषितत्व भौर भविकी्पितत्वमे कोड विशिष्ट चमत्कार या चमत्कारभेद हो जिसपते 


|! 


विदोषाटङ्ारः ५११ 


अलंकार में मेद आए । जहाँ तकृ अन्य भसंमाच्य वस्तु की निष्पत्ति फी विवक्षा का सम्बन्ध है वह यँ 
[ इन दोनों ही स्थितियों मे ] हे ही । फिर चिकीषितत्व ओर अचिकीषितत्व की कल्पना से क्या १ 
इसि [ अल्काररत्नाकरकार द्वारा प्रसङ्ञालकार के उदादहरणके रूपें उद्धत-- | 


--अज्ञ-अङ्ग मे धिसे हरिचन्दन का ल्प, सृणाङू के हार ओर वर्य आदि जोभी 
ङ पथिकवधर के चिए दिन में पत्तिवियोगजनित विषाद का दस्म [दिखावा] था वही रात में चोँदनी 
मे [शुक्ल] जभिसारिक मण्डन वनता रहता था ।› इस प मे, (हरिचन्दन के लेप आदि से केवल 
पति वियोग के विषाद का दम्भ दी नहीं हआ, जभिसारिक मण्डन भी निष्पन्न हो गयाः इस 
प्रकार यह अन्य असंभावित वस्तु के निष्पादन से होने वाखा विद्ेषाल्कार ही है। 

यदं विशेष तीन दें, एक नदीं, क्योकि तीनों के लक्षण भिन्न है । उचित विर्िष्टत्व तीनो 
है अतः नाम तीनांका विरषह्यीहे। 


[ दिवमप्यु° प्यमें ] यहाँ उक्तियो का कवियों से अल्ग रहना [ इस पच के निर्माता ] कवि 
की कटपना से प्रसूत है, किन्तु [ निमेषमपि० प मेँ ] रिव का लोकोत्तर वस्तु का सम्पन्न करना 
वास्तविकं ही है अतः अन्य आचाये इसमे विशेषालकार नहीं मानते । किन्तु केवर इतने भर से 
[ विदेषाल्कार के ] इस [ तृतीय मेद ] का अमाव नदीं मान बैठना चाहिए क्योकि अन्य उदाहरणा 
मे मी यह दिखङेदेतादहै'वेयेदहै- 


दे चालक्यवंशतिलक ! [ आपके ] अङ्ग चन्दनरसके समान शीतल है ओर [ आपका] 
यह बाह यर्शोके हारा चाँदनी उगरूरहदादहे। तव आपका दुष्ट राजाओं को सन्ताप देनेनें 
महान्‌ प्रताप काँ रहता है । [ विक्रमांकदेवचरित ५।८६ ] । 

यहां अज्ञ आदि अयोग्य होने से आध।र वन नहीं पाते तवभी अयिय प्रतापकी स्थिति 
तलाई जा रही है अतः यद विकेषारुकार है । इसी प्रकार- 


“चो यैर ताङुलिते } पु्चि ! प्रियं हरिष्यसीति फं त्रस्तम्‌ । 
प्रजन्ती समुखञ्योत्स्नाभरेस्तिमिरमपि नोत्स्यसि ॥ 


ध्चोरी-चोरी रमण करने हेतु आकु पुत्रि ! तूभ्रियकोर्गेवादेगी इसीका डर नह्य है, जाति 
समय सुखचन्द्र कौ जुन्दादेसेतू धिरे को दूर कर देगी । † 

यां इतना हौ नदीं किं तू केवल प्रिय कौ गँवादेगी अपितु अंधकारको भी, जो त्‌ करना 
चादती नदीं अतः मसभान्य है" इस प्रकार अन्य वस्तु के निष्पादन से उत्पन्न विरोष अलंकार है। 
ओर जैसे-- 

'माघकवि ने रिश्ुपाख्वधकाव्य बनाकर कविमद का वध कर डाला । [ ओर ] रत्नाकरकवि ने 
[ हरवि जयकाव्य में | शकर की विजय का वणेन कर अपनी विजय व्यक्त की ।' 

यदहोँ-“माध ने ऊेवरू सिद्युपाल्वध ह नदीं किया कविमदका वध भौ कर दिया, जो अस्तभाव्य ` 
किन्तु चिकौपित थास प्रकार यदह अन्य अराक्य वस्तु के करने से हा विशेषालंकार है । यहां 
कविमद का वध जो सनथा अशक्य है, करने मे माध को कतां बतलाया गया है । इती प्रकार अने 
` [अन्य भलंकारों मे ] मौ जानना चादिए । अतः-- 


"एक कायं कियाजा राहो तो उसी प्रसंग म उसीफे सजातीय किसी अन्य कायं की 
सिद्धि अनुषंगं' यह भनुषङ्गालङ्कार मी विशेष मे ही अन्तभूत हो जाता है अतः उत्ते भी स्वतन्त्र 
अलंकार नदीं कहना चाहिए ॥ 


९१२ अलङ्कारसवंस्वम्‌ 


विमन्चं --इतिदाल- 

विदेषालंकार के उक्त तीनो मेद इदं प्रथमतया रद्रट की ही कर्पना हे । उनके पृवेवतीं भामह, 
वामन, उद्धर मँ इस पर कोई विचार नदीं मिक्ता । रद्रट का विदेषविवेचन इस प्रकार है-- 

[ १] क्रिचिदवदयाधेय यस्मिन्नमिषीयते निराधारम्‌ । 
ताद्गुपलभ्यमानं चिज्ेयोऽसो विदोष इति ॥ ९।५ ॥' 

(जहा कोद वस्तु किसी का आधेय होतेद्वएभी निराधार रूपसे प्राप्त होती हृदं बतला 
जाए तो वह्‌ विद्धेष नामक अलंकार होता हे, 

उदाहरण--्दिवमयप्युपयातानाम्‌० पद्य । 

[ २ ] य॒त्रैकमनेकसिमन्नाधारे वस्तु विचमानतया । 
युगपद मिधीयतेऽसावत्रान्यः स्याद्‌ विदोष इति ॥ ९।७ ॥ 

- "जां एक वस्तु एकसाथ अनेक आधारम रहती हृदे वतलाईे जाए तो यह दूसरा 
विदेष होता हे ।' 

उदाहरण--्द्ये चक्षि वाचि च तव सेवाभिनवयोवना वसति । 

वयमत्र निरवकादा विरम कृतं पादपतनेन ॥' 

-- वही अभिनवयौवना वुम्हारे हृदय, नेत्र ओर वाणी मेँ वस रदी दै। मे शनम कीं स्थान 
नीं है । रहने मी दो । परो पर गिरने से क्या?) 

[ ३ ] ्यत्रान्य॒त्‌ कु्वांगो युगपत्कायान्तरं च कुर्वीत । 
कतुमदाक्यं कत्ता विन्ञेयोऽसौ विदोषोऽन्यः ॥ ७।९ ॥' 

-- जहाँ ओर कुछ कर रदा व्यक्ति उसी के साथ अन्य कोद भदक्य कायै भी कर डले तो यहं 
एक अन्य विदोष होता हे ।› ॑ 

उदाहरण = 'छिखितं वालमरगक्ष्या मम मनसि तया दरारसीरमात्मीयम्‌ । 

स्फुटमात्मनो च्खिन्व्या तिख्वे, विमले कपोलतले ॥' 

- (उस वाठग्रगाक्षी ने अपने कपोरुतल पर तिलक लिखकर अपना रूप हमारे चित्तम 
लिख दिया ॥ 

स्पष्टहिकिरुद्टकी विदेषाल्का!विषयक धारणा स्पष्ट ओर लक्षण द्दाहरण की योजन) 
भी पूणं समर्थ है। मम्मटने रुदर के इस संपूण विवेचन को ञ्य का त्यां भपना क्ाहै। 
उनका विद्षेष विवेचन यह हे - 

मग्मट--“विना प्रसिद्धमाधारमाधेयस्य व्यवस्थितिः । 

एकात्मा युगपद्‌ वृत्तिरेकस्यानेकगोचरा ॥ 
मन्यत्‌ प्रकुवंतः कायमशक्यस्यान्यवस्वुनः । 
तपरैव करणं चेतति विश्चेषसखिविधः स्मृतः ॥' 

_ ्रसिद्धमाधार कै बिना आयेय की स्थिति, एक पदायै कौ एकत्ताथ अनेक स्थार्नो में 
एकं प से अवस्थिति तथा अन्य कायं कर रहे व्यक्ति द्वारा अन्य अशक्य वस्तु का उसी प्रकार 
निष्पन्न वार्‌ देनाः इस प्रकार से धि्नेषालंकार तीन प्रकार का माना गया हे। 

उदाहरण प्रथम का रुद्रद का द्दिवमप्युपयातानाम्‌०) प्रय ही । द्वितीयकारुद्रर के पद 
'हदये चक्चषि' की समाना्थीं दी गाथा (ता वसद वच्छ०' तथा तृतीय का-- 

“गृहिणी सचिवः सखी मिथः प्रिय्चिष्या रकित कलाविधौ । 
करुणाविमुखेन मृत्युना हरता त्वां वद्‌ फन मै हृतम्‌ ॥' [ रधुवंश, ८ | 


विरोषालङ्ारः ५१२. 


--^्तुम मेरी गृहिणी थीं, सचिव थीं, सखा थीं, एकान्त में कलाओं के रुकित विधान मे प्रिय 
रिष्या थीं । करुणाविसुख ख्ल्यु ने वुम्हं हरण करते हए मेरा क्या नहीं हर छिया । 
सवेस्वकार ने मम्मट के रक्षण की दो सूक्ष्मतां को छोड दिया, एक तो आधारगत प्रसिद्धि 
को गौर दूसरी एक की एकसाथ अनेकगोचरता मे एकरूपता को। प्रसिद्धि की आवर्यकता 
विरोधपरि्ार के ल्एिहै ओर एकरूपता की आवश्यकता पर्यायालुकार के निराकरण के लिए 
शो करः-परवतीं रत्नाकरकार शोभाकर ने सवेस्वकार के लक्षण में संशोधन प्रस्तुत किया । 
उन्हाने लक्षण मं आए अराक्यत।रूपौ विदयोषण को अत्तंमान्यताके रूपमे स्थिर किया सव॑स्वं कै 
वृत्तिकार ने अप्तमाव्यता का प्रयोग तो किया था किन्तु वे अशञम्यताको भो दुहरततिज।तेये। इस 
तृतीय विदेष मे रोभाकर ने कुछ विस्तार भीर किया ओर उसमे विरुद की निष्पत्ति को भी रथान 
दिया । उनका लक्षण इस प्रकार है- 
'अनाषारमाधेयमेकमनेकगो चर संमाविताद पिकस्य 
विरुद्धस्य वा सम्पत्तिश्च विदोषः ॥ ६३ ॥ 
संभावित से अधिक निष्पत्ति क। अथे अलक्य को निष्पत्ति नहीं है। प्रथम का उदाहरण 
रत्नाकरकारने मी रुद्रटका 'दिवमप्युपयातानाम्‌ः-प्ही दिय्‌। है। इसीके क्षि रत्ना- 
करकार ने अंगानि चन्दन०' पद्यमी प्रस्त॒त कियाथा। द्वितीयके लिए विमरिनीकार्‌ दारा 
उद्धत (चोरिअ०' गाथा रत्नाकरसे दही ली गड है! इसकी संगति रत्नाच्छरमें इस प्रकार की दी 
हदं दे- 
“अत्र चौर्यरतेन ्रियरतेन (१) त्रिषरजना्थं गमनरूपस्य प्रयत्नस्य प्रवृत्तस्यानुनिष्पन्नतया 
तमोहरणर्ूपं कायन्तरमपि संमावित।द्‌ भवतीत्युक्तम्‌ ।” 
इसके अनुसार चछिपे-चछ्पि प्रिय से मिल्कर कोर रुड़की प्रिय को आकृष्ट करना वाहती हे । 
विरु द कायेनिष्पत्ति के लिए रत्नाकरकार ने प्राकृत की यह एक इकेषपूणं गाथा उद्घृत की है- 
'आलिहुमणीभ विचित्तवत्तिआ किंपि किंपि तदिअहम्‌ । 
णह णवरं तणुञायन्ति ताङ्ग वडटंति लोअस्स॥' 
'आल्ख्यिमाना अपि चित्रवत्तिका [ चित्तवृत्तिकाः ] किमपि किमपि तददिवसम्‌ । 
न केवर तनुकायन्ते ता वधेन्ते लोकस्य ॥" 

† “चित्तवति राब्द की संस्कृत छया "चित्रवत्तिकाः ओर “चित्रवृत्तिकाः दोनों ही 
विवक्षित हं दोनो शब्दकी प्राक्त एक इीदहै अतः दोनों मे इरेष है। फलतः चिन्न 
पक्ष मँ चित्रवत्तिका अथैले ल्य जाता है ओर छोकपक्ष मे चित्नवृत्ति अथ । इस प्रकार 
(उस नायिका का चित्र लिखने से केवल चित्रवत्तिका ही क्षीण नहीं होती लोगो कौ चित्तवृत्तिमी 
बने लगती हः इस अथं मे क्षय के विरुद वृद्धिरूपी असंभान्य अन्य अथं की निष्पत्ति बतलाहे ` 
जा रही है अतः यौ तृतीय विद्ेष का द्वितीय मेद है। परवत्ती अप्पयदीक्षित ओर पण्डितराज 
जगन्नाथ ने इस उपमेद को नहीं माना है । उन्होने केवल तीन प्रसिद्ध भेद ही किर षं। 

अप्पयद्रीक्ञित-[  ] विद्ेषः ख्यातमाधारं विनाप्याघेयवणेनम्‌ । 
उदा ० -~(दिवमप्युप० । 
( २ । विदोषः सोऽपि यदेकं वस्त्वनेकत्र वण्यते ॥ 
उदा०- (अन्तवेहिः पुरः पश्चात्‌ सवंदिक्षवपि सेव मे ।' अथात्‌ 
“प्रसादे सा० प्यका संक्षेप 
| २ ] किचिदारम्भतोऽशक्यवस्त्वन्तरकृतिश्च सः । 
उदा०-- "त्वां परयता मया कन्ध कस्पवृक्षनिरीक्षणम्‌' ॥ 
२३ अ० सण 


| ९९१७ अलङ्लरखवस्वम्‌ 


आपको देखने से मैने कल्प वृक्ष का दशन पाच्िया। अप्पयदीक्षित ने असतभाव्य शब्द के 
स्थान पर अद्धक्य दब्द ही रखा है। पण्डितराज दोनों को अपनाते ओर विद्धोषप का लक्षण 
इस प्रकार वनाति दे-- 
पण्डितराज -[ १ ] प्रसिद्धमाश्रयं विनाऽऽधयं वण्यंमानमेको विज्ञेषप्रकारः । 
[ २] यच्चेकमायेयं परिमितयत्किद्छिदाधारगतमपि 
युगपदनेकाधारगततया वण्यतं सोऽपरो विेषप्रकारः। 
[ ३ | यच्च फिच्ित्‌काय॑मारभमागस्यासंमाविता- 
दाक्यवस्त्वन्तनिवंतनं तृतीयो भिदेषप्रक।रः। 
ये तीनो भेद प्रस्त कर पण्डितराजने दो पक्ष मी दिखलाएदहें, एक प्राचीनो का पक्जौो 
इन तीर्नोको पकी विद्नेषालंकार्‌ कै मेद मानतादहै ओर दूसरा नवीर्नोका वह परश्च जो 
तीर्नोको स्वतन्त्र स्वीकार करतादै। नवीन के अनुसार उक्त तीर्नामें कोद एक सामान्य धमं 
नहीं है अतःये एक नहीं कदे जा सकते, विमश्चिनीकारने मी यद पश्च प्रस्तुत कियाद ओर 
तीनां विदोर्षा को स्वतन्त्र माना दहे । | 
विश>श्वर--ने पण्डितराज तथा उने भी पहले कै विमशिनीकार दारा प्रस्तुत आपतन्ति 
को न्याय की कल्पित मान्यताओं द्वारा सामान्य तच्च की सिद्धि को दूर केरना चाहा हे। उनके 
अनुसार तीनों मेदां मे सस्वनिरूपितव्यभिचारप्रतियोगिकत्वः एक सामान्य धमं दहे) इसका माव 
इतना ही दै कि सामान्य स्थिति का अमाव ह्न तीनो दी प्रकारां म समान है । स्वाभाविकता है 
आधार के विना आधेय केन रहने मेँ = प्रथम येद मेँ उसका अभावदह। इष्ती प्रकार एकका 
एकलूपसे एक साथ कहीं एक ही जगह रहना स्वाभाविक हे । द्वितीय भेद मं उस्तका अमाव दहै। 
तृतीय मेद मे भी निष्पन्न दो रदे अतिरिक्तकायंके कारण का अभव रहता हे । ३6 प्रकार तीर्न 
मे म किसी न किसीका अमाव [ व्यभिचार ] प्रतिपादित दै। विस्वेवरने तीनां को बड़ी 
दी स्पष्टता ओर वड़ेही सेक्षेपमें इस प्रकार गाहे 
(स्थितिराधारामावे वृत्तिरनेकेषु युगपदेकस्य । 
एककरणेन दुष्कर कार्यान्तरकषिद्धिरिति विषः ॥ 
इसका सयष्टीकरण करते हए उर्दोनि तीन सूत्र मी प्रस्त किर द 
१-- प्रसिदमाधारमन्तरेभाप्याघेयस्य्‌ सिद्धि्वोक्ता स घ्को पिषः । 
२- य॒त्र चैकमपि वस्तु युगपदनेकत्र वत्तते स द्वितीयः । 
२-- यत्र चैककार्यारम्भयलनेन दुष्करकार्यान्तरमपि समारभ्यते स्र वतीयः । 
टस प्रकार विद्वेरवर प्रथम त प्रसिद्धि मौर द्वितीयर्मे यौगपद्य का निवेडकारिकामं तौ 
नदीं कर पाणये किन्तु सूर में वे उनकी उपेश्ना नदीं कट सके । 
श्रीविच्ाचक्रवतीं कौ निष्कृष्टाथ"गरिका इस पर इस प्रकार ह ~ 
(अनाधारादिमदेन विद्धेषोऽपि त्रिधा मतः ॥' 


[ सवंस्व | 
[ घ्रू० ५२] यथा सराधितस्य तथेवन्येनान्यथाकरणं व्याघातः। 
प यं कंचिदुपप्यविरोषमवलम्ब्य फेनचिद्‌ यन्निर गदितं वस्तु तत्ततोऽन्येन 
केनवित्तत्तिदन्द्िना तेननैवोपायविरोषेण यदन्यथा क्रियते स निष्पादित: 
चस्तुञ्याहतिहेतुत्वाद्‌ व्याघातः; । यथा -- 


व्याघाताटङ्कारः ५१५ 


“डरा दग्धं मनसिजं जीवयन्ति रोव याः । 
विरूपाक्षस्य जयिनीस्ताः स्तुमो वामलोचनाः ।* 
अच्र डष्िडक्षणेनोपायेन स्मरस्य हरेण द्ाहविषयत्यं निष्पादितम्‌ । 
खुगनयनाभिः पुनस्तेनेवोपायेन तस्य जीवनीयस्वं क्रियते । तच्च द्‌ाह- 


विषयत्वस्य प्रतिपक्षभुवम्‌ । तेन उयाघाताष्योऽवमटंकारः | सोऽपि व्यति. 


रेकनिभित्तरवेनात्रोक्तः। बिरूपाक्चस्येति वामो ना इति च व्यतिरेकगभौ 
वेव वाचकौ । जयिनीरिति व्यतिरेकोक्तिः पूथवदिह प्रकरणे लक्षणम्‌ । 

| सू° +२ | वस्तु जिस प्रकार सिद्धकी गईंहो उसका उसी प्रकार अन्य व्यक्ति 

दारा तद्विपरीत साघन व्याघात \' 

किसी व्यक्ति ने जिस किसी उपाय से जो कों वस्तु निष्पन्न की दो उसका उससे भिन्न उत 
विरोधी व्यक्तिकेद्वाराउप्ती उपायप्ेजो षिपरीतसरूप म परिणत किया जाना है वह निष्पा- 
दित वस्तु कौ व्याहति = हनन का हेतु होने पे व्याघात कहलाता है । यथा- 

भाखसे जटेकामकोजो आंखे ही जिला देती है, अतः जो विरूपाक्ष [ अर्थात्‌ विरूप 
असुन्दर तीन नेत्र वके शिव ]को मौ जीत लेने वाली है उन सन्दर नेत्र वाली युवतियां कौ 
स्तुति करता ह्रूं । 

यहो नेतरूपी उपायसते शिवने काम को जलानेका कायं संपन्न किया था। मृगाक्षियों 
दवारा उसके विरुद्ध उसौ नेत्ररूपी उपाय से उस कामको जिलनेकाकाम किवा जा रहा है। 
वह जलानेरूपी काये का उल्याहै। इसकिर यड व्याघात नाम अलज्ञार हृभा। वही 
यर्दा व्यतिरेक की पीठिका पर यहो निवड हआ दहै । विरूपाक्ष [ विरूप नेत्र वा ] तया 
वाम [ खुन्दर ][-लोचना ये सशब्द यहाँ व्यत्तिरेकगभित ही है। “जीतने वालीः इस प्रकार 
व्यतिरेक को शब्दतः भी कह दिय। गया है । इत प्रकरण में इसका लक्ष! पृववत्‌ ही है । 

विमरिनी 

यथा साधितस्येत्यादि । निष्पादितमितिन तु निष्पाद्यितुं सं १ाव्यमानस्‌ । तद्धि द्वितीय. 
्याघातविष्रयः । ततः इति निष्पाद्‌नकर्टः । तत्परतिदन्दिनेति । निऽपादितवस्तुष्याहति- 
कारिर्वा । तेनेकेति, अच्र भरः, अन्यथा हि वैचिच्यातिश्चयो न स्याद्‌ । अन्यथाक्रियत 
इति । तदुपमदक ब्रस्वन्तर जननेनेष्यर्थः । अतत एव नामाप्यस्य यौगिकमिष्याह -निष्या- 
दितेव्यादि । अतश्च यत्न न निष्पन्नध्य चस्तुनो भ्याहतिरुपनि बध्यते तन्र नायमलकारः, 
निप्पत्तर वाध्ररोहाद्‌ उयाघातायोगात्‌ । निष्पच्चवस्तु्याहतिहिं व्याघातः । फलं चात्र व्या. 
हतिकारेणसर्तद्वे जण्यप्‌ । जत एव 'उ्पत्तिविनाश्चयोरेकोपायसखे व्याघातः इति न 
सूत्र णीय ब्र । एवं हि उ्याघातत्वमेव न स्यात्‌ । 

'कुरुममजिनं मदा मूर्तिमंतिः ध्रुतिश्ञालिनी 
भुजबरूमल स्फ}ता रुचमीः प्रमुत्वमखण्डितस्‌ । 
प्रकृतिश्ुभया ह्येते भावा अमीभिरयं जनो 
नजति सुतरां दपं राजंस्त एव तवाङ्कशाः ॥' 

दस्य उ च ङाद्यो यथान्येषां दपदेतवो न तथा तव, प्रदयुत विनयकारिण इत्येव. 
विधगुणविरिष्टेभ्यः पुरषान्तरेभ्य)ऽध्य वैलक्तण्यमात्रं विवदितम्‌ । न तु कुकादिभिरुष्पा- 
दवितोऽपि दप॑स्तव भ्याहत इति येन भ्याघातालंकारो भरति। अथान दपंकारिणोऽपि 


५९द अच्छङ्कारसवेस्वम्‌ 


ङलादेस्तद्धिनाश इष्ययमटंकार इति चेत्‌ , नेतत्‌ , ऊ जादीनां प्रकृतिभेदेन दरपाद्पंकारि- 
स्वस्य वास्तवत्वे नारंकारस्वाव्‌ । तत्रापि ऊुखादिभिस्तव दर्पस्य विनाज्ञ इष्यभ्युपगमेनाः 
यमरुकारः । निष्पादितवस्तुव्याह्‌ तेर भावात्तन्निवन्धनत्वेन चा्योकच्तर्वात्‌ । 

“विण्णाणेण सञविरसं विणिवद्ड्‌ भिण्णक!रणुप्प॒ण्ण । 

विण्णाणकारणं जं तं पु अण को णगिचदटटेद्र्‌ ॥' 

इस्यत्रापि मदस्य विक्तानतदन्यहेतुकस्पे व स्तुसं भव्यन्यहेतर्मदो चिन्नानेन निवस्य ते तद्धे- 
तुकः घुनः केनेस्यलंकारभाष्यकारोक्तस्तनिनिन्रत्तिदेतुपररो दाष्मकव्वाद्धितर्कारुकारो न व्या. 
घातः विच्तानदेदुकायःा मद्‌ निष्पत्तरव प्ररोहात्‌ । 

"71ढकान्तद्‌ खन जतभ्यथास्लंकटादरिवधूजनस्य यः । 
आओविद्रुमदकान्यसो चयन्नि्दशन्थेधि इपा निजा५रय्‌ ॥' 
इस्यत्र चाधरव्ययानिमे[चनाव्मकबि परीत फङनिऽपस्यथं तज्निद श नास्मा प्रयटन उपः 
निबद्ध इति विचित्रमिति न व्याघातारंकारो वाच्यः । तेनैवेति । दष्टिखषणेनेव न पुनर- 
न्येनेध्यथंः । तेनेति निष्पन्नस्य वस्तुनञ्तेनेवोपा्ेन व्याहतस्वाच्‌ । तदेव विभजत्ति- 
विरूपाक्षस्येत्यादिना । अनेनास्य व्यतिरेकं विनोध्यानमेव न स्यादित्ति सूचितम्‌! तथाहि 
येन केनचिद्यक्किचिव्लाधितं तदप्यन्येनान्यथाद्धियते तद्‌ तस्य तनोऽन्यथाकरणाज्ुपपर्य। 
वेरकण्यमवश्याभ्युपगन्तश्यम्‌ । अतश्चास्थ सर्वामना व्यतिरेको निमित्तस्वं यायात्‌ । पूवे. 
वदिति आब्ुरप्य परिहारात्‌ । स चेकस्योपायद्यान्यथाकरणस्वेन्‌ विच उणात्‌ । 
यथाद्ाधितस्टेव्याडधि ! निष्पादिततन=न कि निष्पादित करने के किए संमान्यमान । वहु 
द्वितीय व्याघात का विवय है । ततः = उससे निष्पादनकतां' से । तस्प्रतिद्न्द्रिना = 
उसके विरोधी द्वारा = प्रतिषन्द्री या विरोधी इसलिए कि वहु निष्पादित वस्तु का 
व्याघात करता है । तेचैव=उक्ती उपाय के द्वारा इस पर वल देना हैः, नदीं 
तो वरैचिव्यातिश्चय न होगा। अन्यथा क्रियते = उस विपरीत रूप मे बदला जाता दहे = 
स्थात्‌ उस |[ पूर्यवत्तीं रूप ] को दवाकर अन्य वस्तु उत्पन्न करने कै द्वारा । “इसीलिए 
इसका नाम मी यौगिकी दहै" इस वात को कहते हँ = निष्पादित । +सीलिए जरह निष्पन्न 
वस्तु कौ विपरीतता नदीं बत्तलाई जाती वहां यद अलंकार नदीं दोता क्यों निष्पत्ति ही नदीं 
हो पाती तो विपरीत रूप प परिणति ही समव नदीं होती । इसत प्रकार निष्पन्न वस्तु की व्याहति 
विपरीतरूपता दी व्याघात है भौर फल 8 यहां ग्यादत्तिकारी स्यक्तिम सतिशव की प्रतीति । 
इसीलिए [ अलकाररत्नाकरकार को व्याघात के लिए | “उत्पत्ति ओर विन्ञका उपाय एको 
तो व्याघ[त'-एेसा सूत्र नहीं बनाना चाहिए । हस प्रकार तो व्याघातत्व ही निष्पन्न नहीं हो पाएगा 
इसी प्रकार [ रत्नाकरकार द्वारा व्याघात के उदाहरण के रूप मेँ उपस्थित | । 

‹.'अमलिन कुल, सुन्दर शरीर, वेदविद्या मेँ निष्णात मति, पर्याप्त बाहुवल, स्फीत रेश्वय, 
अखण्डित प्रयुत्वः ये सव पदाथ, जो हैँ सो, स्वमावतः खन्दर होते हे [ अथात्‌ इन सवम से प्रत्येक 
स्वतः सुन्दर द्योता ह ] इन [मँ से प्रत्येक ] सेये सांसारिक प्राणौ वड) ही सरलता से अत्य. 
धिक दपं म आ जाति हें । किन्तु हे राजन्‌ ! आपके ठ्टिये ही अंङुरा हं 1" 

ध्स स्थल ते कुर आदि जिस प्रकार अन्य लोगो के ्णि दपं केदेतु बनते हं उस प्रकार 
आपके लिए नदी, [ आपके ल्द तो] प्रत्युत विनय के देतु दै--द्स प्रकार) इस प्रकार क 
गुणो से विद्िष्ट अन्य पुरुषो से इस [ प्रस्त॒त राजा का अन्तरमात्र प्रतिपादित करना अभीष्ट 
हे न कि श्वल आदि से ञलन्न भापका दर्पं व्यादत दौ गयाः यदं प्रतिपादित करना, जिसे 
यहां व्याधातालंकार ह्यो । यदि कटै--“्हां दषैकारी कुल भादि के दप॑कारित्व का विनाश कथित 


ति | भ 


॥| 
| 
|+ 
॥ 


व्याघधातालङ्कारः ५१७ 


हैः इसलिए यह अलंकार यहाँ संभव है, तो यह भी अमान्य है, क्योकि कुल आदि दपं या अदं 
के कारण व्यक्ति के स्वमाव के आधार पर वनते है, अतः यह एक लोकिक तथ्य का अनुवादमात्र 
हआ फलतः यहो अलंकारता नदीं रहेगी । यहाँ यह अल्कार तभी संभव दै जव छु आदि से तुम्हारे 
दपंका विनार् हो गया रे्षी अथैयोजना मानी जाय । किन्तु यहां निष्पादित हो चुकी वस्तु की 
व्याहति नदीं बतला जा रही ओर यह्‌ [ व्याघात ] अल्कार तन्मूलक ही है रेस्ता हम वतला 
सके हें । 

“विज्ञानेन मदविषं विनिवत्तेते भिन्नकारणोत्पन्नम्‌ । 

विज्ञानकारणं यत्‌ तत्‌ पुनभेण को विनिवनत्तंयेत्‌ ॥ 


-- अन्य कारणो से उत्पन्न मदविष ज्ञाने दूरौ जाता हे, किन्तुजो विज्ञान से ही उत्पन्न 


हो उपे बतलाओ, कोन दूर करे ।' ; 
[ अलुकाररत्नाकरकार द्वारा व्याघातोदाहरण केरूप मेंप्रदत्त] इस [गाथाके अथ॑] में 


मी जवर मद, विश्ान ओर विज्ञानेतर कारणों से उत्पन्न होता हुअ। बतलाया जा रहा है तब, “अन्य 
किंसी हेतु से उत्पन्न होने वाला वास्तविक मदतोज्ञानसे हट जाता है किन्तु जो मद उस्न [ ज्ञान] 
से उतन्न होता है वह किंस से हटया जाए स्स वोध के आधार पर यहां अलंकारभाष्यकार दारा 
प्रतिपादित वितर्कालकार माना जा सकता है क्योकि यह बोध उस्र [ उक्तं वस्तु] की निवृत्ति के 
हेतु का जो प्ररोह [ प्रस्तुतीकरण ] तद्रुप है [ वह किससे हटाया जा सकता 8" इस उक्ति मे 
मद निवृत्ति हेतुका प्ररोददहोरहाहै।] अतः यहां व्याघातालंकार नदींहै। यहां तोज्ञान 
जनित मदनिष्पत्ति ही वाक्याथ बनी इशे है। [इसी प्रकार रत्नाकरकार दारा व्याधातालंकार 
के लिए उदाहृत ]- 

“जिसने युद्ध मे अपना अधर दातो से उस उस कर राुनारियो के ओष्ठविद्रमदलो को प्रिय कै 

दन्तक्षतों कौ गाड व्यधा कै संकटसे हुडा दिया ।› 

इस पद्याधेमें भी व्याघात नदीं, पिचित्रालंकार है, क्यो यहं अधरभ्यथा से छुटकारेरूपी 
विपरीत फल की निष्पत्तिके लिए अधरदंशरूपी प्रयत्न उपनिबद किया गया है । तेनव = 
उसी के द्वारा अथौत्‌ दृष्टिरूपी साधनके दारादही, नकि किसी अन्य साधना के द्वारा तेन = 
उसके द्वारा = निष्पन्न वस्तु उसी उपाय से व्याहत वतलाई गहं है। उसी को विभक्त करते है-- 
'विरूपाक्षस्य' इत्यदि के दारा) इसमे यह सुचित किया कि व्यतिरेक के विना इसकी निष्पत्ति 
ही नदींहो सकती । क्योकि किसी के द्वारा कोई कायं सिद्ध किया गयाहौो ओर य॒दि उसको 
अन्य व्यक्ति अन्यथा कर डाले तो उससे उप्तकौ विलक्षणता अवदय ही स्वीकार करनी होगी, नहीं 
तो अन्यथाकरण ही चरिताथेन होगा इसीलिर इसमें व्यतिरेक सव प्रकार से निभित्त बनेगा [ही]। 
पूर्ववत-- पहले के समान अर्थात्‌ आनुरूप्य के अमाव से वह्‌ [ आनुरूप्याभाव ] यहं इस- 
लिएदहोता कि यहां एक ही उपाय दो विरुद्ध परिणाम वाला बतलाया जातादहे॥ 


[ स्वस्व | 
प्रका{सन्तरेणगाप्यय भवतीत्याह - 
[० ५३] सोकर्येण कायविरुदुक्रिया च। 
'“उयाधात' इत्येव । किचित्कायं निष्पादयिठं सभाव्यमानः कारणविश्ेष- 
स्तत्कायविरुडनिष्पाद्कत्वेन यत्लमथ्यते सोऽपि संमाग्यमानक्ा्यंञ्याहति. 
निबन्धनत्वाद्‌ व्याघातः । कायंविरद्धकायेनिष्पत्तिश्च कार्यापेक्षया खकरा । 


५१८ अलङ्ारसवंस्वम्‌ 


तस्य कारणस्यात्यन्तं तदाचुगु ण्यात्‌ । नत्व कार्याभिमतस्य रूयत्वाभावः। 
तद्धिखद्धस्यात्र सौकर्येण कायेत्वात्‌ । अत पव द्ितीयाद्धिषमाद्धेदः । तच 
हि कायंस्यायत्पत्तिरनथेस्य चोद्धमनम्‌ । इह तु कायंमकायमेव न भवति । 
तद्धिरुद्धस्यानथंस्य वउयतिरेकिणोऽप्यच खुष्डुकायत्वात्‌ । यथा हपंचरिते 
राञ्यवघेनं प्रति श्रीदर्षाक्तिघु- 

"यदि वाल इति सुतरामपरित्वाञ्योऽस्मि, रक्षणीय दति भवद्धज- 
पञ्जरमेव रक्चास्थानम्‌' इत्यादि । # 

अत्र राज्यवधनैन श्रीदर्षापरस्थावे कार्य बास्यरश्चणीयत्वादि कारणत्वेन 

यत्सभावितं तल्धल्युत धरस्थानक्रारणव्वेन सुकरता श्रीदर्वेण राज्य वर्धंनस्य 
समर्थितमिति उ्याघाताद्योऽ लकारः । 

यह्‌ अच्ङ्कार दूसरे प्रकारसेमीदहोतादहै। यदी वतरते्दे-- 

[ सू०° ५९ ] सौकयं के कारण कार्यविडद्क्रिया [ मी | 

“न्याधात' इसकी अनुवृत्ति पूर्वसूत्र से प्राप्त हेदी । किसी कायंको निर्पन्न करनेके लिए 
रंमावित किसी कारण का उसी कायेकें विरुद्ध काय कै निष्यादकके रूपमे समध्न किया जाए 
तो वद भी समाव्यमान काये की व्यादतिका हेतु होने पे व्याघात होता हे। यहाँ [ प्रस्त ] 
काय॑ के विरुद्ध कायं की निष्पत्ति [ प्रस्तुत ] कार्य क्ण अपेक्षा यहं बतलाकर सरल वत्तलाई जाती 
हैकरिउस [ प्रस्तुत कायं] का कारण उप्त [ विरुद्ध कायं ] के अत्यन्त अनुदर हे । एेसा नदीं कि 
यहाँ कार्यरूप से अभिमत वस्तु मेँ कार्यैत्व का अभाव वतकाया जातादहं  वयोकि यहाँ उस 
[ प्रस्त कार्यं ] के विरुद कायंतो छखपूर्वक किए जने योग्य कायेके रूपमे दी प्र्तिपादित 
किया जाता है) इसीलिए द्वितीय विषम से दसका भेददहै। वहो, जोह सोःकायकी तो 
उत्पत्ति नहीं रती ऊपर से अनर्थं [ रूपी अकार्यं ] कौ उत्पत्ति जौर करती हे । जवकि यँ 
कायं तो काय तक नदीं हो पाता, उसवे विरुद्ध व्यतिरेको [ धिक संल १] अनथंभी यहं 
सुखपूव॑क करने योग्य काये के रूपम दो प्रस्त॒त रहता दै । जेते हपंचरित म राज्यवर्भन कै 
प्रति श्रीह की [ इन ] उक्तियां †-- | 

यदि [ यापर सुले युद्ध मे यह समक्चकर नहींठेजारहैदै किमे ] वालकहूं तवतो ओौरमी 
अपरित्याच्य ह रक्षणीय तो रक्षास्थान आपका ही भुजपज्जर्‌ हे" इत्यादि [ दषचरित उच्छ्वासः 
ह पृ० १८४ नि० संस्क० | । 

यँ राज्यवधंन दारा श्रीदं के अप्रस्थान [साथनले जने | रूपी काय॑ वाद्य ओर 
रक्षणीयत्व आदि जो कारण सोचे गणै उन्दी को श्रीहषे दारा राञ्यवधैन के प्रति सुकर भौर 
उलटे प्रस्थान मेँ ही कारण प्रतिपादित कियाजारहा है। इस कारण यद व्याघात नामक [ दी. 


अकार दै ॥ | 
वि्रङ्किनी 


प्रकारान्तरेणेति भ्रतीविभरेदाच्‌। अयमिति स्याघातः। तमेवाह सोवर्येणेत्यादि ; एतदेव 
ब्याचटे- किचिदित्यादिना। संभाभ्यमान इति ॐ नचिदम्येन 1 तत्कायेत्ति । तच्च तत्कायेम्‌, 
निष्पादितं प्रक्रान्तम्‌ । अतत एवास्य प्रथमाव्याघाताद्धेद्‌ः । तन्न हि येनकेनचिदुपायेन 
निष्पादितं सद्रस्त॒ तथैवान्येनाभ्यथाक्रियत दष्युक्तम्‌ । इह त किचिज्निप्पादयिलुं संभाष्य. 


व्याधातालङ्कारः ५९१९ 


मानस्य कारणस्य तदिरुदढनिष्पादकव्वेन समर्थनम्‌ । तद्धिरद निष्पत्तेश्च सौकय किमुक्त. 
मिव्याश इवाह--ररयेत्यादि । तदानुगुण्यादिति कायं विङद्ानुगुणत्वात्‌ । न त्िवित्ति। अपिं 
तु दुष्करत्वेन कायमिव्यथंः । अनेनाप्यध्य प्रथमाद्वयाघाताद्धेदः सूचितः। इह हि किचि- 
ज्निष्पादयितुं संभाव्यमानः क)रणत्रिशेषः सौकर्येण तदधिरूढ निष्पादकस्वेन समध्यंते ¦ 
तच्र पुनरुपायविशेषविवहापरिहारेण कतुरेव पक्तपतिपल्तमावमाश्चिष्य तथाष्वोपनिवन्धः । 
अत एवेति । द्वयोरपि कायंरवसं भवाव ¦! अन्थत्यनेनापि विषमादस्य सेद एवो पोदवलितः। 
संमावितमिति । तथा समयितमिति । अनेन प्रथमव्याघातोदाहरणत्वसस्य निरस्तम्‌ । तच्र 
हि इयोरपि कायंयोर्निष्पत्तिविंवक्तिता। बास्यस्य तु कायंद्रयजननेऽपि साम्यं कितु 
परस्थानजनने सौकयम्‌ । अत एत्रात्र पंमाव्यसानस्य कायस्य व्याहतत्वम्‌ । यथा वा- 
यरसशञब्दमिति कऊामविमदं नूपुरं परिहरन्ति तदण्यः। 
तदढभार कतरापि विदग्धा गोपनाय निजकण्ठर्तानास्‌ ॥ 
अचर संभाग्यमानं काय परिहारः ! तस्य व्या तिर्धारगम्‌ । उपायस्य सुकरदुभ्करत्वेन 


विशिष्टव्वाद्‌न्ने न प्रथमव्याघातो दाहरणत्वञ्न्‌ । यथा च नायम्थों वक्रोक्तेभदश्तथा वक्रो- 
त्तावेव वच्यासः। 


प्रकारान्तरेण = दूसर। प्रकार इसलि९ किं प्रतीति में मेद है । अयम्‌=यह व्याघात । उसी कां 
स्वरूप वतलति है--सोकर्यण शत्यादि । इसी की व्याख्या करते है- किचित्‌ इत्यादि के दारा । 
संभाव्यमान अथात्‌ किती अन्य व्यक्ति के द्रा । तर्का्यं = इसमें कर्मधारय समात्त है, 
तत्‌ = वह॒ अथात्‌ निष्पन्न करनेके लिए ज्ुरू कायं । इसीक्िदि इसा प्रथमनव्याधात से 
अन्तर दे उस, यह्‌ कदा जा चुका हे फि "जिस उपायसे किसी व्यक्ति फे द्रा वस्तु 
निष्पादित दोती है उसी उपायसे दूसरेके द्वारा वही वस्तु अन्यथावना दी जातीरहैः जवि 
यहा वस्तु निष्पन्न नहां बतलाई जाती, उसकी निष्पत्ति कौ प्र॑मावना भर वतलादं जाती है, साथ 
ही उसका निष्पादकजो कारण रहतादै उनम [ मी] विरुडकायंके निष्पादन को क्षमता भर 
जतलादे जाती हे उसमे कायं की निष्पत्ति नहीं दिखलाई जाती अतः रत्नाकरकार का द्वितीय 
व्याघात को प्रथम से भिन्नन मानना ठी+ नदीं । [ यहां ] प्रस्तुत कायं के विरुद्ध कार्यं की निष्पत्ति 
म सुकरता व्यो वतलाई गड ह" ठेसी दका कर, कते हैँ--कायं इत्यादि । तदानुगुण्याव = उसके 
प्रति अनुरूपता अथात्‌ कायै विरुद कायं ‡ प्रति अनुरूपता । न तु-न कि = अपितु दुष्कर होने से 
उसे कायै मानाजाता है। इसते भौ इसका प्रथम व्याच।त से अन्तर बतलाया । य्ह, जो है, 
कोई कारण कुछ कायै करनेमें समथं [ भर ] समञ्चाजाता है ओर उसी खकरता के साथ 
विरुढ कायं करने की क्षमता प्रतिपादित करदी जाती है। इसके विपरीत उस [ व्याघात ] में 
उपायगत विद्ेषता की विवक्षा नदीं रहती, केवल कर्ताओं मेँ पक्र ओर प्रतिपक्न का भाव 
[ परस्पर विरोध ] देखकर वही पक्ष प्रतिपक्षमाव प्रतिपादित करिया जाता है। अतएव = दोनों 
मे कायंत्व स्षमव होने से। अन्थं--इसके द्वाराभी इसका विषमसमे मेद दही दद किया गया। 
संभावितम्‌ से केकर समर्थितम्‌ तक के मन्थ द्वारा [ हषैचरितं के] उक्त उदाहरण के प्रथम 
व्याघात वे व्दाहरण होनेकी संभावना दूर की। उसमे दोनों ही कार्यौ कौ निष्पत्ति विवक्षितं 
रहती है। ब।स्यः जो हे वहः तो दोनो ही कार्यौ मै समं है किन्तु प्रस्थापन की निष्पत्ति उसते 
अधिक सुकर है । इसीलिए यहां जो व्याहति है वह संमाव्यमान कायं दी है [ निष्पन्न कायंकी 
नदीं ] । सका दूसरा उदाहरण यह है- 

'तरुणिर्या जित नूपुर को सुरत संघषं मे बजने के कारण हट दिया करती है उसी कौ किसी 
वदग्ध तरुण ने .[-विपरीत रति में ] सपने कण्ठ का रव छिपाने के किए जान वृक्चकर पहना ।' 


५२० अलङ्ारसवेस्वम्‌ 


यहां संभाव्यमान कायं है परिहार, गौर उसकी न्याइति दै धारण । यहां उपाय मेँ स॒करता 
ओर दुष्करता है [न पदनना अथात्‌ पहने हर नूपुर को उतारना जितना कठिन दहै उसे 
पहने रहना उतना दी सरल है ] अतः वहां उपाय विशेषता क्षिद्र हे, फलतः यह प्रथम व्याघात 
करा उदाहरण नहींदहो सकता । [ उपाय म विदोषता रटने के कारण यदि यदह प्रथम का उदाहरण 

नदीं हो सकता तो कार्यो की निष्पत्ति दो जने के कारण यह्‌ द्वितीय व्याघात भी केसे हो सकता है 
यदि एक अं प्रथम व्याघात का इसमं नदींतो हितीय व्याघात भी इ्तमँ समय न्हींदहेउसकेमी 
एक पक्ष का यर्य अमाव दै ] सी प्रकार "यह्‌ स्थल वक्रोक्तिका मी उदाहरण नदीं है" यह इम आगे 
चक्रोक्तिके ही प्रकरण में बतलार्ैगे । 
विमशं ~ 
इतिहास 
| १ | प्रथम व्याघात :- 
व्याधात नाम तो पहले पदर रुद्रव्मे दी मिक्ता है किन्तु उसको यां के प्रथम व्याघात का 
स्वरूप देने का प्रेय मम्मट को है। सद्रट ने व्याघात नामसे जिस अल्कार का चिवेचन 
किया है वह विडेषोक्ति से सवथा अभिन्न है। विशेषोक्तिप्रकरण म इसका विवेचन उद्धरणपूरवक 
किया जा चुका है । मम्मटः मेँ इसका पिवेचन इस प्रकार ह 
“यद्‌ यथा साधितं केनाप्यपरेण तदन्यथा । 
तथैव तद्‌ विधीयेत स व्याघात इति स्मरतः ॥° 

येनोपायेन यत्‌ एकेनो पकद्ितं तस्यान्येन जिगीपुतया तदुपायकमेव यदन्यथाकरणं स साधित. 
वस्तुग्याहतिहेतुत्वाद्‌ व्याघातः ।' 

--“जो कायं एक किंसी व्यक्ति के द्वारा जिस प्रकार अभात्‌ जिस उपाय सेक्रिया गया हुं 
उसका अन्य व्यक्ति के द्वारा उसी उपाय से उल्टा कायं कर देनेसे सिद्ध वस्तु की 
व्याहति का हेतु कथित रहने से अकार व्याघात करता दे । उदाहरण = धशा दग्ध० पद्य । 

(२) द्वितीय व्याघात इदं प्रथमतया सवस्व मे ही भिरूत। हे । भामह से लेकर मम्मट तक के 
आचार्ये से किषी में यह नहीं मिलता। 

परवत्तीं आचार्यों मे-- 

क्ोभाकर दारा किए गए प्रथम व्याघात के लक्षण तथा उदाहर) त्रिमरिनी मे उदधृत है । 
द्वितीय व्याघात को उर्दि प्रथम व्याधातमं ही अन्तभूत माना हे। उन्दने स्पष्टल्िहै- 

९५-_ व्वाल इति स॒तरामपरित्याज्योऽस्मि, रक्षणीय इति भवद्भुजपञ्जरमेव रक्षास्थानम्‌, इत्यादौ 
श्रीहष॑स्य विजेत प्रस्थितं ज्यायांसं राञ्यवषेनं प्रति उक्तो राज्यवधनेन वालत्वाचप्रस्थाननिमित्तं 
समाचितम्‌ तेन प्रत्युत सौकर्येण प्रस्थाननिभित्ततया समयितम्‌ इति (सोकर्यण कायेविरुडं चः इति 
सेदान्तरं व्याधातस्येत्ति न वाच्यम्‌ । तथाहि यदि प्रस्थानरूप विरुद्धमेव कायं वाल्यादिना क्रियते 
तदयमेव व्याधातो, न मेदान्तरम्‌ , प्रस्थानाभावनिमित्तात प्रस्थानोयत्तौ पिना लक्षारणादुखत्तः। 
अथ चेत्‌ प्रस्थानाप्रस्थानयोहयोरपि पिरुदधयोर्बाव्यादिकस्य आरणस्य सद मावादप्रस्थाने वाल्यादैरने- 
कान्तिकत्वं विवक्ष्यते तहि एकस्य कारणस्य परस्परविरूडकायद्रयजननादचिन्त्यालक्कारेऽस्यान्तर्भाव 
इति व्याघातस्य मेदः । अर्थात 

श्रीहषं की विजय के लिए प्रस्थित किन्त स्वयंको साथ.नले जा रहे वड़े भाई राज्यवधेन कै 
प्रति वाल इसलिए तो ओर भी अपरित्याज्यर्ह रक्षणीय तो रक्षास्थान जप्का ही मुजपजञर 
है, इत्यादि उक्तियोँ मे राज्यवर्धन ने वालत्वादिकौ साथनले चल्नेका कारण सोचा, उसके 


व्याघाताल्ङ्कारः ५५२९ 


विरुद्ध, उस [ हषं ] ने करता प्रतिपादित कर उन्हें साथले चल्नेमें ही कारण प्रतिपादित 
किया । इस प्रकार यहाँ कायंविरूदध कायं मं खकरता मीः [ इस लक्षण के अनुसार ] यह व्याघात 
का एक अन्य मेद है यह [जो स्व॑स्वकार ने कदा है वह ] नदीं कहना चाहिए । क्योकि यदि 
वाल्यादि कारण के द्वारा प्रस्थानरूपी विरुदधकाये ही किया जा रहा है तो यही [ प्रथम ] व्वाधात 
यहां दै, अन्य मेद नदीं क्योकि यहां जो वस्तु [ बाल्यादि ] प्रस्थानाभाव का निमित्त है उसे 
प्रस्थान की उत्पत्ति दहो रही हे अतः विना के कारण उत्पत्ति प्रतिपादित की ज रही है; यदि 
बाटयादि कारणम यह बतलाकर कि वे प्रस्थान ओर अप्रस्थान इन दोनों परस्पर विरुद्ध 
कार्यो मे कारण हे" अप्रस्थानरूपी कायुं के प्रति अनिरिचतता प्रकाशित करना विवक्षित है तो “क्‌ 
कारणके दारा परस्पर विरुद दो काये उत्पन्न करने से" इस व्याघात का अचिन्त्यालकार मे अन्तर्माव 
हो जाएगा । इसलिए इसे व्याघात का भेद मानना गक नदीं ।: ` 
यहाँ रत्नाकरकार कायं की निष्पति मान रहे हैं जव कि मू मे केवर निष्पत्ति की संमावना 
मात्र प्रतिपादित है। इसी कारण विमरिनीकार ने इनका खण्डन कियादहै। वे उनके अपने 
शाब्द हैँ । उन्हैवाणकेशब्दोकेरूपमें बिना स्पष्टीकरण के छाप दिया गया है। 
अप्पयदीक्तित- ने दोनों व्याधातों का निरूपण शस प्रकार किया है- 
[ १ ] स्याद्‌ व्याघातोऽन्यथाकारि तथाकारि क्रियेत चेत्‌ ।› 
[ क ] जो जेसा कायं निष्पन्न करता हो उसे उससे भिन्न काय करने वाला वना दिया 
जाय तो [ प्रथम ] व्याघात नामक अकुकार होता ३। यथा- 
'येजगत्‌ प्रीयते हन्ति तेरेव कुखमायुधः ।› 
संसार जिन [ पुष्पो ] से प्रसन्न होता है ऊुञ्मायुध [ काम ] उन्दीं ते प्रहार 
करतादहे। 
[ ख ] इसी में कीं प्रतिदरन्दिता का भाव विवक्षित होता है । यथा दा दग्धं पचनें। 


[ २ ] "सौकरेण निवद्धापि क्रिया कायंविरोधिनी ॥ सुकरता के आधार पर उपनिवद का 
विरोधिनौ क्रिया भी व्याघात कराती हे । उदादरण दर्चरित के उक्त उद्धरण का हय संक्षेप- 
दया चेद्‌ बाल इति मय्यपरिव्याञ्य एव ते ॥' 

इसका स्पष्टीकरण दीक्षित ने इस प्रकार किया है- 

'जेत्रयात्रोन्मुखेन राज्ञा [ राज्यवर्ध॑नेन ] युवराजस्य राज्य एव स्थापने यत्‌ कारणत्वेन संभावितं 
बारयं तत्‌ प्रत्युत तद्विरुद्धस्य सहनयनस्यैव कारणतया युव एजेन परित्यागस्यायुक्तलं दक्च॑यता 
समथ्यते । 

पण्डितराज जगन्नाथने दोनों ही व्याघात स्वीकार कर लिए दै, किन्तु उन्दने दोनों का यहं 
एक ही लक्षण बनाया है- 

य॒त्र ह्येकेन कतरा येन कारणेन कार्यं भिच्चिन्निष्पादितं निष्पिपादयिषितं वा तदन्येन क्वा न 
तेनेव कारणेन तद्विरुडकायेस्य निष्पादनेन निष्पिपादयिषया वा व्याहन्येत स व्याघातः )' 

-- जहां कही, किसी एक कत्त के द्वारा जितस कारणसे किसी काय की निष्पत्ति की गई 
हो या निष्पत्ति करना अभीष्ट हो, उसी का उसे भिन्न क्ता के द्वारा उसी कारण से उस विरुद 
काये की निष्पत्ति कर या निष्पत्ति कौ इच्छा कर व्याघात किया जाता है वह अलंकार सी व्याघात 
नामक दी होता है 


पण्डितराज ने रा दग्धं" पच मे सवस्वकार दारा प्रस्तुत व्यतिरेक की संभावना प्र विचार 
किया दै ओर सवंस्व का समथंन किया है । 


४ 
५२२ अल्ङ्कारसवस्वम्‌ 


विश्वेश्वरने मी ष्ट्द्ा दग्धं०' प्य पर सवंस्वकार काही समर्थन फियाहै। किन्तु वे व्याघातं 

के दूसरे मेद पर चुप हैँ । उनका व्याधातलक्षण इस प्रकार दै-- 
'का्यन्तरहेतुतयान्येनाभिमतादर्‌ षिरुदधका्यं चेत्‌ । 
क्रियते परेण तस्माद्‌ व्याघातोऽयं समाख्यातः ॥ 

“अन्य व्यक्तिद्वारा अन्य कायका दहेतु माने गर पदा्थैसे किसी अन्यके द्वारा यदि उसके 
विरुद्ध कायं किया जाता है तो वह्‌ व्याधात कहलाता है ।' 

च्सीका न्यायकौ माषा में उन्होने रेस्ता परिष्कार किया दै--अभिमतकायनिरूपित- 
कारणवत्वेनान्युविवकिताथस्य तद्विरुद्धाथैनिष्ठकायतानिरूपित शरणताश्रयत्वं केनचित्‌ प्रतिपाधत्त 
स व्याघातः, व्याहन्यते अन्यामिमतकार्यकारणभावोऽनेनेति ग्युठत्तेः 1 

श्रीविचाचक्रवत्ती कौ निष्करष्टाधेकारिका इस पर यह द- 

ध्यथा सावनमेकेन तथैवान्येन बाधनम्‌ । 
व्याघातोऽ५ विरुद्धस्य सो कर्यण क्रिया यथा ॥' 

पाठान्तर--( १) निणेयस्तागरीय प्रतिमे द्वितीय व्याघात का सूत्र 'सोकरयेण कायेविरुद- 
क्रिया च व्यावाततः' इस प्रकार छपा है। इस्त वत्ति मेँ व्याघात ह्येव नीं मिलता । काशी 
संस्करण सें "्याधात इत्येव" सूत्र केही साथद्छाप द्विया यया हे । रत्न.कर, विमरिनी तथा 
संजीविनी मे उद्धृत पाठ के अनुसार सूत्र ध्व' पर समाप्त हो जाता दै। चाहिए मी वदी । अनु- 
वृत्ति विभि प्ते सूत्ररचना का जो क्रम इस पूं के सूरो मँ मिरता है उस अनुसार "्चः-इस 
समुच्चायक अन्वय दारा अलंकार के नाम की अनुदृत्तिहो जाने पर उत्ता कथन निरथेकं ही 
नदीं पुनरक्तिदोष से दूषित मीदहं। 

(२) श््रीदरषाप्रस्थानेः कै स्थान पर नि्णैयसागरोय प्रति में श्रीहषप्रस्थापने अर्थात्‌ नञ्‌ से 
रहित पाठदहै। छपी हुईं अन्य प्रतियां में नञ्‌ का अमाव समान दे, केवल कु० जानकी कै 
संस्करण मेँ देष संस्करणों के प्रस्थापन के स्थान पर प्रस्थान पराः ही अप्रनाया गयादहे। 

श्रत्युत प्रस्थान०ः के स्थान पर निणवस्तागर्‌ की प्रति मेंमी प्रत्युता प्रस्थापन पाह 
छपा है ओर यद्वी य रामचन्द्र द्विवेदी के संस्करण तँ । यद्यपि अनुवाद मे श्रीदिवेदी प्रस्थान 
पाठ वह्यं मी मानते है भौर अनुपदोक्त स्थल मं भौ । भनन्तसषयन म मी नञ्घरित पाठही है, 

रत्नाकर के पूर्वोदधृत उद्धरण सं यहां प्रस्थापन शब्द के स्थान पर प्रस्थान शब्द ही है ओर 

7 % = 3 ४ न ~ त ५ 
श्रीविचाचक्रवतीं की संजीविनी के दोनां छार्पामेमी। इन दोनों मै "नञ्‌" को स्थितिभौवेसीही 
हे जैसी दमने मानी हे विमदिनी मेँ मी नन्‌ को स्थिति तो ठीक दहे किन्तु प्रस्थान के स्थान पर 
प्ररथापन पठ मी मिलता हे 

अप्ययदीश्रित के पूर्वोक्त उरण ते पाठान्तरविचार को एक नई दिसया मिलती दे। उन्दने 
न तो प्रलापन शब्द दिया है ओर न प्रस्थान । उनका शब्द ह ^स्थापन' । रूगता हे कि मूलपाठ 
दो प्रकार का माना जातारहादै- 

१-- श्रीदस्य स्थापने, श्रल्युतास्थापने' तथा 

२--श्रीदषस्याऽग्रस्थानेः, 'प्रत्युतं प्रत्थाने' । 

परवतीं लिपि ने कदाचित्‌ दन्द हयो मिधित कर दिया, किन्तु नज. कौ स्थिति मे अन्तर्‌ 
नदीं किया । इस प्रकार श्रीहर्षस्य प्रस्थापने" तथा श्रत्युता प्रस्थापने' पाठ चर पड़ा । 


कारणमालाटङ्कारः ५२३ 


मू हष॑चरित मं राज्यवधंन के आदेदा-वाक््य में केवल स्थाः-धातुका प्रयोग है ^तिष्ठन्तु 
सवं त्वदेव साषेम्‌ः । इसते स्थापना पश्च को वल मिलता है। प्रस्थान शब्द का अर्थं साथ 
चलना नहीं होता ओर श्रीदं ने प्राथनाकी थीयुदडके किटि साथ-साथ चल्नेकी ही) 
इसी प्रकार प्रस्थापन रेब्द का अथे भी स्थापन नहीं होता यथपि प्रसि शाब्द का सिद्ध अर्थं 
होता हे । 

ये दोनों पाठ रत्नाकरकार के समय तक ही चल पडे होगे। दोनों मे प्रस्थान'-पदधरितं 
पाठ ही अधिक प्रचङ्ति प्रतीत होता है मोर यन्धसंगति में वह बाधक मी नीं है, अतः हमने इसीको 
मूल मान ल्य है । ° द्विवेदी डो पाद टिप्पणी से विदित धोताहैकिपूना की तीन पण्डु 
प्रति्यो म॑ भी यही पाठहे। इन पाण्डुप्रतिर्योमें सेदोतो कारमीर देराकी दारदाल्पिकी दही 
प्रियाँ हे । | 

( ३) "वार इति' के पूवं आक्षेप प्रकरण मे "केवलम्‌ तथा यदो जो यदिः शब्द जडे हए 
हे ये सवंस्वकार के राब्द है वाणके नहीं मू हषचरितमे ये नदीं भिल्ते। 


विमरिनी 
एतदु पलंहरन्नन्येद्‌वतारयति-- एवमित्यादिना । 
इस [ विरोधमूलकं अलंकारो | के प्रकरण का उपसंहार करते ओर दूसरे प्रकरण की अवतरणिका 
प्रस्तुत करते हं-- 
# 
| स्वेस्व | 


पव्‌ विरोधनूखानङंकासच्िर्णीय श्ङ्कुकाबन्धोपचिता अलंकारा लक्ष्यन्ते । 
तच- 


[ स्र० ५४ ] पूवस्य पूवेस्योत्तरोत्तरहेतते कारणमाला । 


+£ ५ ¢ 9 
यद्‌ा पूवं पूवं क्रमेगोत्तरमुत्तरं प्रति हेतुत्वं भजते वद्‌! कारणमादाल्यो- 
<यमदटकारः । यथा-- 
"जितेन्द्रियत्वं विनयस्य कारणं गुणप्रकर्ष विनयाद्‌वाप्यतते। 
श्ुणप्रकषेण जनो ऽञुरञ्यते जनाऽचुसागश्रभवा हि संपदः ॥' 
कायंकारणक्रम पवार चाख्त्वदेतुः। 
इस प्रकार विरोधमूलक अलका का निर्णय किया । अव श्रङ्खलावन्ध के अनुरूप अल्कार्यो कै 
लक्षण प्रस्तुत करते हेः । उनमें - 
[ सू० “४७ | पूव-पूवं ॐ उत्तर.उत्तर ढे प्रति हेतु होने पर कारण्माखा ॥ 
जव पूरै-पूवे के पदार्थं उत्तर-उत्तरके पद।थौके प्रति हेतु बनते है तव कारणमाला नामक 
अलंकार होता है । यथा-- 
(जितेन्दियता विनय का कारण है। विनयसे प्राप्त होता हे युणप्रकषं। गुणप्रकषं सते समाजः 
अनुरक्त होता है ओर संपत्ति, जो है वह, जनानुराग से ही उत्पन्न होती हे \' 
यौ चारुत्वहेतु कायकारणक्रम ही हे । 
विमश-सवस्वकार ने शहरावगं मँ चार अलंकारो की गणना की टै कारणमाला, एकावली, 
मालादीपक ओर सार । उन्दने इनके लक्षण इसी क्रम से दिएहैः\ रत्नाकरक्रार ने सर्व॑स्वकार 


५२९ अलङ्कारसर्वस्वम्‌ 


की इस मान्यता का खण्डन किया है ओर मूल अलंकार शङ्ला को ही मानकर इनमे से प्रथम तीन 
अलंकारो को श्ङ्कलालंकार के मेद माना है स्वतन्त्र अलंकार नहीं । विमरिनीकार ने रत्नाकर 
के खण्डन का निराकरण कर सवंस्व का समशन किया है। हम पहले रत्नाकर का -बृङ्गलाविवेचन 
प्रस्त॒त करते दे-- 
[ सूत्र ] “उत्तरोत्तरस्य पूपूवांनुवन्धित्वं विपय्यो वा शङ्गा ॥ 
[ वृत्ति ] उत्तरोत्तरस्याश्रयत्वादिना पूरं पूवं प्रति परवंस्य पूष्स्योत्तरस॒त्तरं प्रति वा सापेक्षत्वं 
शृङ्खला । 
अत्र ( १ ) एवस्य पूवस्योत्तरोत्तरहैतुकत्वे कारणमाला, तथा (२ ) यथापूर्वं परस्य विदोषण- 
तया स्थापनापोदेन एकावली ( ३ , पूवस्योत्तरोत्तरयुणावईत्वे मालादीपकमिति त्रयः श्ङ्कलावन्धेना- 
न्यरलङ्कारा लक्षिताः, तेषु च श्चखलात्वपरिहारेण प्रत्येकं न विच्छित्तिविदोषोऽस्ति येनालङ्कारमेदः 
स्यात्‌ । य॒दि च कायकारणविरेषणविोष्यभावादि विद्ेषाश्रयणेन भदरैनासिधानम्‌ , तिं उत्तरोत्तर. 
माधाराघेयता-स्वस्वामित्वादि सम्बन्धावर्म्बरनेन श्ङ्कलायां वहवोऽ्कारा उपसंख्येयाः प्रसज्येरन्‌ । 
अत इह लक्ष्यव्याप्त्यर्यं शृह्धलैव रक्षिता । अस्यां मदहाविषयायां तेषामन्तमावो पपत्तेः । 
अपि च मालारूपकवदेकरिमन्‌ यत्र वहूनां योगपचेन स्थितिस्तत्र माल।त्वं वक्तुमुचितम्‌ , इद्‌ 
त॒ तदभावात्‌ कारणमाला्भिधानमसमंजसमेव । 
ययपि शृक्घलादय उपमा्यवन्तरमेदा शति, तदयुक्तम्‌ । उपम दिन्यतिरेकेण कायेकारणभावाय- 
वम्बनेनापि श्घकायाः ्ंमवात्‌ । अतद्चोपमादिशद्घलाभिमते विषय उपमादीनां शङ्कलया 
सह संकीण्त्वम्‌ , न तु उपमादिभेदत्वम्‌ । यथा- 
ल इव जल्धराणां दौलानामिव जलनिधिः एथिवीन।थ । 
जलधौीनामिव पातालं सत्पुरुषाणां त्वं निल्यः ॥' 
- “परवत्ता पदार्थौ को पूर्यवतीं पदार्थो फे प्रति अथवा पूववतीं पदार्थो कौ परवती पदार्थो कै 
परति याश्रयता आदि के किण सापेक्षता शद्घला नामक अलंकार कहलाती है ।› 
दसन शं लाबन्ध से [ १] पूैपूवं का उत्तर-उत्तर को कारण वनाने म कारणमाला, पूर्वके 
प्रति उन्तरउत्तर के विज्ेषण होने मे एकावली, तथा [ ३ | पूष-पूम 9 उत्तर-उन्तर क प्रति युणावह हने 
> मालादीपक, ये तीन अलंकार अन्य आचाय [ सवंस्कार _ ने वतलाए दे । इन्र से प्रत्यक मे 
शृङ्कलात्व को छोडकर चारत्व का कोई अन्य कारण नदींहे [जस इन्हे सिन्न-भिन्न अलकार 
माना जाए। यदि क्रा्य॑कारणभाव, विरेष्यविदलेषणभाव, आदि संवन्धगत विशेषताओं को केकर 
अलकां को अलग-अलग वतलाया जा रहा ही तो आ [रापेयभाव, सवस्वामिभावादि संबन्धा को 
लेकर श्ङ्ला मे ओर मी मेद भिनने पड जागे । इसलिए तमावित समी मेद्‌ को अपनासेते के 
लिए देवल एकं शला का ही लक्षण अलंकार रूप से वना दिया गया। यह अत्यन्त व्यापक दहै, 
भतः इसमे समी लक्ष्यो का अन्तमावि हो सकता है । 
इसी प्रकार भ।लात्व सी वहां मानना उचिते दै जहां अनेक पदार्था कौ स्थिति एकमे ही हो 
ओर वह भी णक साथ दहो। यं स्थिति वैसी नदीं ह, अतः कारणमाला आदि नाम निराधार 
है । उपमा आदिकेजो श्रृङ्खला आदि अवान्तर मेद बतलाए गण दे,वे भौ ठीक नहीं है क्योकि 
शङ्कला तो उपमाद्ि से रदित केवल कार्यकारणभाव आदि के आधार प्रभौ हो सकती है। अतः 
उपमाशरृङ्कला आदि नाम से माने गए स्थलमें भी उपमा आदिक साथ शङ्खलाका संकर 


मानना चाहर, न कि उपमा आदि का मेद । यथा-- 


क{रणमालकछछ्कारः ५२५ 


"जसे मेर्घा के आधार पर्वत होते है, पर्व॑तो के आधार ससुद्र भौर समुद्र के आधार पाताल 
वैसे ही सत्पुरुषं के आधार हे राजन्‌ ! आप हँ ` यहां प्रथम तीन चरणों मेँ आश्रयाश्रविभाव- 


मूलक, खला है ओर उसके आधार पर निध्यन्न ठृतीय चरण में उपमा । 


विमरिनी 

अज््कारा इति न पुनः श्रङ्कुकेवेकोऽलंकारः । एवं हि साध्यमप्येक एवालकारः ` 
स्यात्‌ । न द्यपमादिषु साघधमभ्यंपरिहारेण प्रसेकं कश्चिद्धिच्छित्तिविशेषसभवः येनालकार- 
भेदः स्याद्‌ । एवं विरोघोऽप्येक एव वाच्यः । न हि तिभावनादीनां विर्ढधस्वादन्यः 
कशिद्धिशेष । किमपरम्‌ , एव सक्तानामष्टानामेवारुकारागां रक्तगप्रणयनपसखङ्गः । अय) प्‌- 
मादीनामपि खाधस्यादाववान्तरोऽरिति विशेष इति चेत्‌ ठि कारणमालरादीनामपि शङ्करा 
वन्धो परिन्नितव्वेऽपि वच्यमा० नीत्या कायेकारमविशोषणविरेष्यमावाश्ार्मास्व्येवावान्तसे. 
ऽपि विच्छित्तिविशेषः ये नोपमादिवस्प्रथगेवेष मड कारस्दं युक्तम्‌ । एवं हि श्चङ्खलायामवान्तर- 
विच्छित्तिविशेषसंभवेऽप्यन्याटकारोपसंख्यान प्रसञ्यत इति चेत्‌, न, यद्यस्ति विचि 
व्यन्तरं तदश््टरंकारान्तरापसंख्यानं, को दोषः । प्रव्युतानासमानस्य विशेषस्यापहवो 
न वाच्यः ! तदचयथाश्थित ए्वाङंकारमेद्‌ आश्रयणीयः । तस्माद्‌ “उत्तरोत्तस्य पूर्व॑पूर्वा. 
लु वर्धित विपयंये वा श्खुखेति न वाच्यम्‌ । 

तत्र तावत्कारण साकामाह--पूर्वेत्यादि । कारण्मालाख्योऽयमिति मारान्यायेन बहूनां 
कारणनां यौगपद्ये नावस्थानातत । अत एवाह-कांकारणक्रम एवेति न एनः केवरपेव श्छद्क- 
रास्वमिष्यथेः । अतत एव कारगमारेव्यस्या अन्दथंसमिधानम्‌ । एवमन्येभ्यः शद्ध खाबन्धो- 
पचित्रितेभ्योऽलक्ारेभ्योऽश्या विषयविभागः । न हि तेषु कायंकारणक्रम एव चादत्वहेतुः। 
विशेषणविश्ेष्यमावादेवावान्तरस्य विच्छित्तिदिरोषश्य संभवात्‌ । कचिद्धिपयवेणापि 
मवति । यथा- 

“माणो ब्ुणेहि जाजड गुणा बि जाअते सुजणसेवाह । 
विमखेण स्ुजअप्पसरणे सुअग्सेवहइ्‌ उष्ण ॥ 

अन्र हि पवस्योत्तरोत्तरं कारणतयो पनिवद्धम्‌ ! एवमुत्तरत्रापि विपययोऽभ्यूद्यः ॥ 

अलकाराः = अकुकार शब्दम बहुवचन के प्रयोगका अथं यह कि प्रत्येक अल्कार 
स्वतन्त्र अल्कार है, न कि सव मिलकर एक शङ्खा नामक अलंकार है । रेसा 
मानने पर तो [ उपमा आदि को अल्कार न मानकर] एक साधम्यं कोही अलंकार 
मानना होगा, उपमा दि अङ्कारोमें से प्रत्येके साधम्यं के बिना को चमत्कार थोडे ही 
संमव है, जिससे इन्हें एधक्‌ पथक्‌ अलंकार माना जाए । इसी प्रकार विरोध मी एक ददी बतलाया 
जाना चाहिए । विभावना आदि म विरुद्धत्वं को छोडकर कोई अन्य विरोषता नदीं रहती । 
अधिक क्या, इस प्रकार विचार करने पर तो केवल सात ही अल्कारों के लक्षण वनानेकी 
आपत्ति सामने आती हे । यदि कै रं उपमा आदि मे मी साधम्यं के अतिरिक्त अन्य भी विदोषता 
रहती है, तो कारणमाला आदि मे भी, श्ङ्लावन्ध को कला रहने पर भौ आगे प्रतिपादित 
किए जाने वाले हेतुओं से कायंकारणभाव, विद्घेषणविशेष्यमाव आदि रूप अवान्तर विच्छित्ति 
स्वीकार करनी होगी; जिसते इनको उपमा आदि के समान पृथक्‌ अलंकार मानना होगा । य॒दि 
कट कि रेसा मानने पर शङ्कला मे सी अन्य अनेक विश्चेषतार्पे संमव ह अतः उनके आधार पर 
अन्य अनेक अल्कारों का भी संग्रह करना पड़ जाएगा,| ओर्‌ यह एक अनवस्था जसा दोष 
होगा ], तो एेसा मी नदीं । क्योकि यदि अन्य कोड उक्तिप्रकार चारुता से युक्त संभवदहे तो 
उसका मी संग्रह स्वतन्त्र अलंकार के रूप में भवय हो । श्समं दोषदही क्या प्रतीत हो रहै 


रदे अल्कारसवेस्वम्‌ 


वेिष्व्य का छिपाया जानः! दी बल्कि टीक नदीं । इस प्रकार अलंकारो का जैसा मेद [ सर्वस्व 
कारने] कियाद वैसा दी मेद अपनाना उचितदहे। ओर इसीलिए [ स्वयं रत्नाकरकार को दी] 
“उत्तरोत्तर पदार्थं का पूवं पूवं पदाथैके प्रति सापेक्ष दोना य। शसते उल्टे क्रम से सापेक्षा दोना 
-चृङ्खला कदलाती दै-रेसा लक्षण नहीं करना चादिए । 

[ रत्नाकर का गांशिक खण्डन कर अव मूलप्रन्थ का स्पष्टीकरण करना आरम्भ करते है ]- 
उन [ ङ्कलामूकक अल्कारों ] मं पहले ऊरणमाला का लक्षण बनाते हँ- पूर्वं इत्यादि । 
कारण मालाख्योऽ्यम्‌ = इसका नाम कारणमाला दहे, इसलिए कि इसमें वहत से कारणां की एक साथ 
अवस्थिति है जैसी किं माकम होती दहे दसीलिए कदा--कायकारणक्रम एवः। यदहाँ कार्यकारणक्रम 

है नकि केवल श्ृङ्कलत्वदहीहै; ध्सीकिएण कारणमाला" यह्‌ इसका सार्थक नाम है) इस्तीखिए 
-ृङ्कलावन्ध के शिल्प वाटे अन्य अल्कार्यो तै इस [कारणमाला] काष्षित्र भी भिन्न दे! उन अलकारों 
मे चारुत्व का आधार केवल कार्यकारणभाव दी न्दी दोता। क्योकि वदां कायेकारणमाव के आधार 
पर भी विष्ट चारुत्व की निष्पत्ति संमव होती दे! कीं उरुटी स्थिति मी रहती है । यथा- 
{ रत्नाकरमं ही उदाह्त ] 

"मानो युणेर्जायते गुणा अपि जायन्ते सघुजनतस्ेवायाः । 

विमञेन सुक्ृतप्रसरेण सुजनसेवाया उत्थानम्‌ ॥' 

(मान युण से उत्पन्न दोतादहे, युणभी खज्नो की सेवा से उत्पन्न होतेदें। ओर छजनसेवा 
का उत्थान होता हे पुर्यो के विमल परिपाक स्ते । 

यहाँ पूवं पूतं पदाथं को उत्तर उत्तर पदार्थं के प्रति कारण वतलाया गयादहै। इसी प्रकार अगले 

| स्थलों में भी स्वयं सोच लेना चाहिए ॥ 
! विमर्श कारणमाखा-इतिहास् 
भामह, वामन तथा उद्धटर्मे इस पर कों चचां नदीं मिलती । प्रथमतः रुद्रट ने इसका निवै- 
चन किय है । वास्तववम्‌ के मलुंकार्तो मेवे इते इस प्रकार उपस्थित करते दै-- 
कारणमाला सेयं यत्र यधापृवेमेति कारणताम्‌ । 
अर्थानां पूरवार्थाद्‌ मवतीदं सतमैवेति॥ ७।८४ ॥ 
- ध्रथम प्रथम पदां से उत्तर-उत्तर पदार्थं उत्पन्न होतेह अतः परवत्तीं पदार्थो के प्रति 
पू्व-पूव॑वत्तीं पदार्थं कारण होने के कारण यह अलंक'र कारणमाला कदलाता हं । 
उद्‌[०-- 'जितेद्ियत्वं विनयस्य कारणम्‌०› प्य काही रूपान्तर 
'विनयेन भवति गुणवान्‌ गुणवति लोकोऽनुर ज्यते सकल; । 
सभिगम्यतेऽ्नुरक्तेः ससहायो युज्यते ख्क्षम्या ॥' 
विनय से व्यक्ति युणवरान्‌ वनता है, गुणवान्‌ पर छोग अतुरक्त हीते । भवुरक्त रोग साथ 
देते दे । साथियो वाला व्यक्ति लक्ष्मी से धुक्त होता है। 
मम्मर-मम्मटने रुद्रट का अनुसरण श्स प्रकार कियादहं-- 
सू० यथोत्तरं चेत्‌ पूवस्य पवंस्या्थस्य दहैठ॒ता । तद। कारणमाला स्यात्‌ । 
व° उत्तरमुत्तरं प्रति यथोत्तरम्‌ । 
उदा०-- जितेन्द्रियत्वं .› पद्य ही । 
परवत्तीं न | म से चोभाकर कामत द्वियादही जा चुका दहै। इसमे मानो युणे°' 
गाधा, जो विमशचिनी में उद्श्रत है, द्वारा उत्तर-उन्तर पदार्थको मी पूवे-पूवै पदार्थं कै प्रति कारण 
बतलाया गया है । सुद्रट, मम्मट सर्व॑स्वकार का इस ओर ध्यान नहींहे। 


। 
| 


कारणमाल्ाकङ्कारः ५५२७ 


अप्पयदइीत्तिति ने रत्नाकर की सञ्च का अनुमोदन कियादहै ओर दोनोंदी प्रकार के 
कारणमालाओं के उदाहरण प्रस्तुत किरदहै, यद्यपि इन्होँने रत्नाकरकार के समान कारणमाला 
को शृङ्खला मे अन्तसूंत नदीं माना है 1 उनका कारणमाला विवेचन यह है- 
सुन्फः कारणमाला स्याद्‌ यथा प्रादप्रान्तक्रारणेः 
--पूवेःपून या उत्तर उत्तर के पदार्थो का उत्तर-उत्तर या पूवै-पूर्वं के पदार्थो के प्रति 
कारग बनना कारणमालालङ्कार कदलाता हे। प्रथम का उदाहरण-- 
नयेन श्रीः धिया त्यागस्त्यागेन विपुर य॒दा: । 
--नयसेश्रीःश्रीसे त्याग, त्यागमसे विपुल यञ्च । 
द्वितीय का उदाहरण-- 


“भवन्ति नरकाः पापात्‌ पापं दारिद्रयस्तमवम्‌ ) 
दारिद्रयमप्रदानेन तस्माद्‌ दानपरो भव ॥ 
नरक होते है पाप से, पापदहोत। है दारिद्यसे, दारिद्रय होता दहे दान न देने से। 
इसलिए दानपरायणवनो । 
पण्डितराजने पहले श्ङ्कका का लक्षण वनाया है ओर उसके पदचात्‌ तन्मूलक एक-एक अल- 
कार का । उनका श्ङ्खलाका कक्षण यह्‌ है- 
“पङ्किरूपेण निवद्धाना मधानां पवेपृवैस्योत्तरोत्तरस्मिन्‌ , 
उत्तरोत्तरस्य वा पूरठ॑पूवेस्मिन्‌ संखष्टत्वं -दृङ्ला ॥ ¦ 
--पक्तिरूप से उपनिवदध पद।थो मे से पृवे-पूत्र का उत्तरोत्तरपदा्थं के साथ अथवा उत्तरोत्तर 
का पूवेपूवं पदार्थं के साथ संबद्ध होना शङ्कला कदकाता है। इसके स्वतन्त्र अलंकारत्व पर रत्ना- 
कर ओर विमरिनी के पक्चविपक्च मी पण्डितिराजने यदहो संक्षेप मे नामोव्लेख के विना उपस्थित 
कि द । किन्तु साराल्कार कै प्रकरण क अन्त मे उन्होने मिमरिनी केही तकौ का समर्थेन याह) 
कारणमाला का लक्षण उरन्दोने इस्त प्रकार बनाया दै- 
"सेव ङ्कला आनुयुण्यस्य का्यंकारणमावरूपत्वे कारणमाश्ा । 
-- वही ङ्घला संबन्ध के कायकारणभावरूप होने पर कारणमाला + 
पण्डितराज ने रत्नाकर द्वारा प्रस्तुत इसके दोनो सेद मी स्वीकार किर है ओर छ्िखा है - 
( १) (तत्र पूर्तं पूवं कारणं परं परं कार्यभित्येका 
(२) पूव पूवै कायं परं परं कारणमित्यपरा।' 
विश्वश्वर- ने कारणमाला के दोनो भेद स्वीकार किए है किन्त कारणमाला का लक्षण 
केवल इतना बनाया है- 
कारणमाका पूर्वे पूं कार्यं यथोत्तरं हेतौ ।' 


५->.२ क 


-- उत्तर -उत्तर क प्रति पूवै-पूवं के हेतु होने पर कारणमाला । इन्दोने इसका उद्‌!हरण 
मी अच्छा खोज निकाला है- 
(दारिद्र याद्भ्रियमैति० इत्यादि मच्छकरटिक्‌ का प्रसि पद्य । 
इस पर श्रीवि्याचक्रवत्तीं कौ निष्छृष्टा्थकारिका यह है- 
“कार्यकारणमालायां प्राचः प्राचः परं परम्‌ । 


५२८ अलद्कारसवेस्वम्‌ 


| [ सयेस्व | 
[ घू० ५५ ] यथापूं परस्य विदेषणतया स्थापनपोहने 


एकावली | 
य्न पूर्वं पूं प्रति क्रमेण पर परं विद्ोषणत्वमचुभवति स एकावद्य- 
(* ; =) ¢ =। 
टकारः ! विरोषणत्वं च स्थापनैन निवतेनैनं वा | 
स्थापनेन यथां 
पुखणि यस्याँ सवसद्ननानि वराङ्गना रूपषुरस्छृताङ्गयः । 
रूपं खथुन्मीकितसद्ठिटखास्रमस्ञ विकासः इुद्ुमायुघस्य ।' 
अञ्न वराङ्गनाः पुराणां विदेषणं स्थापनीयत्वेन स्थितम्‌ । पवं वराङ्ग 
नानां रूपमित्यादि ज्ञेयम्‌ । निवतनैन या - | 
न तज्ञट यच्च सुचाखर्पङ्कजं न पङ्कजं तद्‌ यद्‌ङीनषट्पदम्‌ । 
न षट्पदोऽसौ न जुगुञ्ज यः कटं न गुञ्जितं तन्न जहार यन्मनः ।' 
अनर जलस्य छखुचार्पङ्कजस्वं विरोषणं निवरे्यत्वेन स्थितम्‌ । एवं पडजा- 
नामदीनषरपदत्वादि ज्ञेयम्‌ । 
[ स्‌० ५५ | चप के धरति परवक्त ॐ विदोषण रूप से श्थापन या निवर्तन हो तो 
[ अलंकार की संज्ञा | एकावली | होती हे |। 
जाँ उत्तरवन्तीं पदाथ पू-पूवे कँ प्रति विदेषण वनते जाएं वह अलंकार एकावली कहलाता 
है । विदोषणता स्थापनसे होती है या निवत्तन ते, स्थापन से यथा- 
“जहा नगर उत्तम अंगनार्ओं से युक्त दै, उत्तम अंगना रूप से पुरस्कृत अंगवाली है, 
रप उन्मीलित हो रदे अभिजात विलासो से युक्त दै ओर विलास काम के अखहें।' 
यदह उत्तम अंगना नगर कं प्रति ठेते विशेषण हं। जो स्थापित किएजा रहेहै। 
इसी प्रकार हप उत्तम अंगनार्भो के प्रति वैसा ही विशेपणहे गौर जनिभीरे्ताहीहै। 
निवत्तन से यथा-- । 
देस कोई जल नथा जिसँ सन्दर कमल नदह; कमल भी णे्तानथा जिर भौरे 
नही द्रव्रदेहो, मरे मीत न ये जो मधुर यजार नकर रदेहों ओर कोद मधुर युज्ार 
भीेस्ानथाजो मननहरतारहदादहदोी 
- यमं जल के प्रति श्वुचारुपक्कनत्व = खन्दर कमर से युक्त होना, पेस्ता विशेषणे 
जो निपेध्यस्प से स्थित है। इसी प्रकार कमला आदि के प्रति “अलीनषट्पदत्वः = जिसमें भोरे न 
डव रहे हो" आदि को समञ्चना चार्दिए। 
विभरिनी 
यथापूमित्यादि । परं प्ररमित्ति। अत एव पूश्य पूखस्य यथायथं वििष्टतयाव- 
गमः । स्वदूपमात्रेणागतद्य वस्तुन) यष्संबन्धवबटेन वंशिष्टयमवगस्यते तष्टिद्येषणम्‌। 
यद्यति, उत्तरोत्तरस्य पूर्वं पूं प्रदयुकषंहे तत्वे एकावरीति । एकावस्यलंकार इति । पूवी 
तरयोः परस्परानुषक्तसवेने कपदिक्तरूपत्वात्‌ । 


विदोषोक्त्यल्ङ्कारः ५२९ 


यथापूदंम्‌ इत्यादि । परं परम्‌ = उत्तरवत्ती, अत एव पूव-पूवे का उप्ती क्रमसे एक एक 
करके वििष्ट-[ विद्ञेषण-युक्त ]-ता के साथज्ञान होता दै! विद्ञेषण वह तत्व है जिसके संबन्ध 
क वर प्र स्वरूपमात्र स विदित कोई पदाथ विशिष्टता का अनुभव करता है। जेसा कि कटेगे- 
'उत्तरोत्तर के पदाथ पूवै-पूवं के पदार्थौ के उत्कषं के हेतु हो तो एकावलीः। एकावल्यर््कारः = 
अलंकार कान।म एकावरी, इसक्िए कि शसर्मे पूवं ओर पर के पदां परस्पर में सम्बद्ध रहते 
हैः ओर एक पक्ति जसे प्रतीत होते दहै । 
विसश्षो :- इतिहास 
एकावली मी प्रथमतः रुद्रटकी देन है! इनन्दोनि श्सके उपयुक्त दोनो पक्ष भी प्रस्तुत किए हैं, 
उनका एकावली विवेचन- 
रकावलीति सेयं यत्राथपरम्परा यथारामम्‌ । 
आधीयते यथोत्तर विदेषणा स्थित्यपोह।भ्याम्‌ ॥ 
(एकावली नामक अलंकार वह है जिसमे पदं जिस क्रम से प्राप्त होतें उसी क्रमे 
उन्तरवत्तीं पदाथं पूव कै प्रति स्थापित या निषिड होकर विदेषण होते जाते हें ॥ 
उदाहरण-८ १ ) (सलिलं विकासिकमलं कमलानि स॒गन्धिमधुसम्रद्धानि । 
मधु लीनालिङलाकुरुमलिङरुरमपि मधुररणितमिह्‌ ॥ 
--“पानी यदह विकसित कमर्छलो से सुरोभित दै, कमल सुगन्धित मधु से समृद्ध है, मधु 
ड्ब रहे मोरो से जङुल्ति है ओर भोरे भी मधुर गूंजसे मरे ।' 
यह पद्य निश्चित ही भट्टिकाव्य के (न तज्जल पद्यका विधिरूप है। निम्नलिखित प्यभी 
इसी प्य की छाया पर निमित है-- 
( २ ) 'नाङ्कघुमस्तरुरस्मिन्नुयाने नामधूनि कुखमानि । 
नालीनाचकिकुरं मधु नामधुरक्राणमल्िवलयम्‌ ॥ 
-- इस उद्यान म कोई भी ब्क्ष पुष्पहीन नहीं रै, कोर पुष्प मधुहीन नही, कोरे मधु भ्रमरहीनं 
नदीं ओर कोई मी अमर मनोहर गुजार से रदित नहीं दै)" 
निदिचत ही सुद्रटने भद्धिकाव्य की रीतिवद्ध कविता से पयांप्त सहायता रीदे, प्रकाद्च 
पायाहे। 
मग्मर- स्थाप्यतेऽपोद्यते वापि यथापूव परं परम्‌ । 
विशेषणतया य॒त्र वस्तु सैकावली दविधा ॥ 
-- "ज, पू्वै-पूवं के प्रति परवत्तीं पदाथं विेषणरूप से स्थापित किए जाएंया इयाद्‌ जाएं वह 
दो प्रकार की एकावलो होती हे ।' 
उदाहरण दोनो वे हीजो अल्कारसवस्वकारने दिप हं । इस प्रकार एकावली के.विषयमें 
रुद्रट का मम्मटने भौर मम्मट का सवस्वकार ने अनुसरण किया हे। 
परवत्तीं आचार्यो मे--क्ोभाकर की प्रतिक्रिया कारणमाला में व्यक्तं हो चुकी हे। 
अप्पय दी्तित ने ऊ वल्यानन्द मे इस अलंकार का लक्षण भिन्न प्रकार से किया है- 


“गहीतसुक्तरीत्याथभ्रेणिरेकावलिमेता । 

"गृही तसुक्तरीति से अथं कौ भेणी एकावली'। यहं गृहीतसुक्त शब्द से पूवे का उत्तर के 
मरति भी विह्ेषणमाव माना गया है। जव कि सवेस्वकार ने इस स्थिति में मारादीपक माना है) 
इसका स्पष्टीकरण आगे पण्डितराजने कर दिया है। दीष्ित जी ने अपोह्‌ को लक्षण में स्थान नहीं 
दिया म तो उसकै उदाहरण ही दिएदहै। 


३५ अ० स० 


 । 


५५३० अ्छङ्कारसवंस्वम्‌ 


पण्डितराज- ने एकावली का लक्षण स्वतन्त्र चिन्तन दारा इस प्रकार बनाया दै- 
(सैव शृङ्खला संसर्मस्य विद्ेष्य विहेषणमावरूपत्व एकावली वदी शङ्खला एकावली कराती है जव 
संबन्ध विद्धेष्यविद्लेषणमाव रूप होता हे । 
पण्डितराज ने इसमें स्थापन ओर अपोहन का भी अस्तित्व सकाराहै ओर उनके लक्षणमी 
इस प्रकार वना दँ-- 
[ १ ] स्वसम्बन्धेन विशेष्य तावच्छेदकनियामकंत्वं स्थापकत्वम्‌ । 
[ २ ] स्वन्यतिरेकेण विद्ञेष्यतावच्छेदकन्यतिरेकवुद्धिजनकत्वम पोह कत्वम्‌ । 
अथात्‌ अपने संवन्ध के दारा विष्य में उसकी विदोषता करा निश्चय कराना स्थापन । यथा "पण्डित 
वह जो अपना हित देखे । यर स्वदहितदर्दिता द्वारा पाण्डित्य का निश्चय कराया ज। रहा है, 
इसका स्पष्टीकरण "जो स्वहितदरीं नहीं होता वह पण्डित नहीं होता-इस परवतीं व्यतिरेकी 
बोध से होता है। अपोहन वह्‌ होता दै जो जपने अभाव से विद्ोन्यगत विहोषण का अमाव तय 
कराए । यथा यदी -“जो स्वहित न देखे वह पण्डित नदीं इसमे स्वदितदद्धिता का अभाव 
पाण्डित्य के अभाव का निश्चायक है । 
अप्पयदीक्षित क दी समान पण्डितराज ने पूवैःपूवं को मी उत्तरोत्तर कै प्रति विशेषणीभूत 
मानक्षर एकावली स्वीकार कौ है । मालादीपक से श्सभेद का अन्तर ररन्दोने धर्मगत एकता को 
लेकर किया है। यदि पूरव-पूवं के द्वारा उत्तरोत्तर मेँ उत्पन्न किया गया वैशिष्ट्य एकरूप ही 
डो तो मालादीपक होता हे । एकावली मे यह प्रतिव्यक्ति भिन्न-भिन्न होता है । 
विश्वैश्वर-ने एकावली का निरूपण इस प्रकार किया है- 
(प्रथमं विदोषणं यद्‌ विदोष्यमग्रे भवत्यसक्रत्‌ । 
विरहप्रतियोगी वा तद्वानेकावखी सोक्ता ॥ 
जो पहले विशेषण हो वही जागे विशेष्य बने या उससे युक्त अभाव का प्रतियोगी वतते ओर 
देसा अनेक वार से तो उसे एकाव्टी कहते दैः 
विद्वेश्वर ने यर पूर्वं का उत्तर के प्रति विशेषणभाव भी मानादहे। विद्ेश्वर की दृष्ट एकावली 
के विषय मेँ पण्डितराज से अधिक व्यापक है । पण्डितराज ने स्थापन ओर मपोहन के जो लक्षण 
किए है उनकी दृष्टि मँ वे एकांगी हें व्यापक नहीं । (न तञ्नल मँ उनका अपोहनलक्षण लागू 
नदीं होता । यहाँ श्चरत्काल का वर्णन हे । इसमें कमल कै अभावमें जल्त्व का अभाव विवक्षित 
नदीं है, अपितु जल के साथ कमल का अयोगभ्यवच्छेद विवक्षित हे । इसी प्रकार प्राणि यस्या, 
मँ वरांगनायुक्तत्व परत्व का निश्चायक नदीं है वह्‌ केवल पुर के उत्कषे का व्य॑जक्‌ है । 
चक्रवत्तीं की निष्कृष्टा्थकारिका इस प्रकार है- 
'एकावल्यां यथापूर्वं मेदकं तृत्तरोत्तरम्‌ । 
स्थाप्यत्तेऽपोद्यते चेव तेनेयं द्विधा मता ॥' 


[ सवसव | 


| घ॒त्र ५६ | पूवस्य पूवस्योत्तरोत्तरगुणावहतये मारदोप्कम्‌ । 
उत्तरोत्तरस्य पूव पूर्वै पत्युत्कषेदेतुत्वे एकावली । पूर्वस्य पूर्वस्यो- 
तरोत्तरोत्कषेनिबन्धनत्वे तु मालादीपकम्‌। माठत्वेन चासत्वचिरोषमा- 
भित्य दीपकप्रस्तावोहङ्गनैनेद लक्षणं कृतम्‌ । युणावहत्वमुत्कर्षदेतुत्वम्‌ । 
यथा- 


समाटछड्ारः ५३९१ 


'सत्रामाङ्गणमागतेन भवता चाये सभ।सतेपिते 
देवाकणेय येन येन सहसा यद्‌ यत्समासादितम्‌ । 
कोदण्डेन दाराः ररेररिशिरस्तेनापि भूमण्डलं 
तेन त्व भवता च कोर्तिरतुला कीत्य च त्छोकत्रयस्‌ ॥' 
अत्र कोद्ण्डादिभिः क्रमेण चरादीनापुर्क्षो विहितः ¦ समासादन- 
छक्षणक्रियानिवन्धन च दीपकं दीपनविषयणाघुत्तरो त्त सभिभ त्वेन छतम्‌ । 
| सूत्र ५६ ] पूवं पूवं उत्तर उत्तर का उर्कर्षाघायकदहो तो [ अलंकार ] माङादीपक 

[ कहराता हे | । 

उत्तर-उत्तर पुवे-पूजं के प्रति उत्कषेकादेतुहो तो एकावली मानौ गहं है, इसके विपरीत पू॑- 
पूवं उत्तर उत्तर का उत्कषाधायक दो तो मालादीपक होता है। माल्भाव के कारण हसे एक 
विशेष प्रकार की चारुता चरखी आती है। उत्ते दृ्टिमें रखते हए इसक्रा लक्षण दीपक के प्रसंग 
से हटाकर यहाँ किया गया है । गुणावहत्व का अर्थं है उत्कषदेतुत्व । उदाहरण- 

"देव ! संय्ामांगण मेँ आकर आपने धनुष चटढाया तो सुनिर जिस-जिपस्ने जो जो प्राप्त किया । 
धनुष ने बाण, वर्णों ने रा्ु सिर, उरन्दोनि भूमण्डल, उसने आपको, अपने कति ओर कीत्तिने 
तीनों लोकों को। 

यहां धनुष आदि के दारा क्रमसे शर आदि का उक्कषं किया गया। [ अतः यहां मालात्व 
दे ओर सव मे] समासादनरूप [ एक ] क्रिया हयोने से यहां दीपक दै । दीपन कायं विषयों में 
उत्तरोत्तर अभिमतता बतकाने से निष्पन्न हुभा दहै) 


विमरिनी 


पूर्वेत्यादि । अतश्च कावश््यरुकाराद्‌ वे रण्यं दु्यन्‌ या चषटे--उत्तरत्यादि । उर्क्षनि- 
जन्घनत्व इस्यनेन कारणगमाङातोऽप्यस्य वंरच्ण्य बुक्तम्‌ । तस्यां हि पूर्वस्य पू्॑स्योत्तर- 
खुत्तरं भ्रति कारणत्वम्‌ । नलु चास्य प्राच्येदींपकानन्तरं कुष्षणं तम्‌ इह तु किं न तथेष्या- 
शङ्कयाह--मालत्वेनेत्यादिना । माराज्ब्देनात्र शङ्कुला रुचयते, तश्या एवोपक्रान्तस्वात्‌ । 
न चात्र मारोपमावन्मालाज्ञब्दो ज्ञेयः। एकश्योपमेयद्य बहूपम।नोपादानाभावाव्‌ । अत्र 
द्यो पम्यमेव नास्ति । कोद्ण्डश्रादीनां तस्याविव्तणा्‌ । अत एवास्य दीपकभेदस्वं न 
वाच्यम्‌ । ओपम्यजीवितं हि तत्‌ । प्राच्यः पुनरेतदीपनमान्नानुगुण्यात्तदनन्तरं रूधि- 
तस्‌ । शवद्धुरष्वेन तु विश्िष्टमस्य चाह््वमितीह रूखणं युच्छम्‌ । एतच दीपक एव 
ग्रन्थङृतोक्तस्‌ “छायान्तरेण तु मालादीपक प्रस्तावान्तरे कच्च यिष्यते' इति । अत्रेत्यादि । 
उ्कषंश्च जरादीनां कोदृण्डादिखमादादनलक्तणः। दीपनविषयाणामिति ! कोदण्डश्ञरादीनाम्‌। 
अत एवास्य द्‌।पकभमिव्यन्वथंमभिधानम्‌ ॥ 

पूव॑ध्यादि । इसीलिए एकावली अलंकार से इसका भेद वतलति इए व्याख्या करते है 
उत्तर इत्यादि । उर्कषंनिबन्धनश्व = उत्कष॑हैतु होना = इसके दारा कारणमाला से भी 
इसका मेद बतङाया । उसमे पूवै-पूवं उत्तर-उत्तर के प्रति कारण होता है। “इसका लक्षण 
प्राचीन आचार्यो [ मम्भट ] ने दीपक के बाद किया है, यहो वैसा क्यो नदीं किया 
जा रहा है एेसी शंका करके उत्तर देते है-मारूष्वेन इत्यादि । यक्षं माठाश्चब्द का 
अर्थं लक्षणा द्वारा शला है, क्योकि प्रकरण उसी का चला हुभाहै। यहो माराश्चब्द मालो- 
पमा जेपा नदीं समञ्चना चादिए-क्योकि यदह एक उपमेय क लिए नेक उपमानों कषा उपा- 


५३२ अलङ्कारसववेस्वम्‌ 


दान नदीं | यद्य तो ओपम्य ही नदीं दहै, क्योकि धनुष-बाण आदि मेँ उसकी कोड विवक्षा 
नदीं । इसीलिए [ मालादीपक ] दीपक का मेद नदीं कदा जा सकता । वद [ दीपक ] ओपम्य 
पर निर्मर रहताहै। प्राचीर्नोने जो इसका रक्षण दीपकके वाद रखा है वह केवर दीपन 
मात्रकी समानता के आधार पर । वस्तुतः इसमें चारुता अती है शृङ्खलात्वं से, भतः इसका 
लक्षण यदी टीक है ओर यह तो अन्धकार दीपक [के जन्त ]मंद्दी कह चुके हैँ कि--"माला- 
दीपक एक भिन्न चमत्कार को लेकर होतादहै, उसका लक्षण अन्य प्रसंग में किया जायगा ॥ 
अत्र = रारादिका उत्कषे दे धनुष आदि के द्वारा प्राप्त फिया जाना। दौोपनविषथाणाम्‌ = 
दोपन कार्यं के विषय ~= धनुष आदि । इसीलिए इसका दीपक" नाम साधक हे ।' 4 
विमक्ं- 
इतिहास- मालादीपक भामद, वामन, उद्धर ओर रुद्र मेँ नदी मिर्ता । 
दण्डी- यह्‌ इदं प्रथमतय। दण्डी में मिलता है । उनका निरूपण-- 
'शुकलः उवेताचिषो बृद्धयें पक्षः पच्रशरस्य सः, 
स॒ च रागस्य रागोऽपि यूनां रल्युत्सवधियः ॥ 
इत्यादि दी पकत्वेऽपि पवपवंन्धपेक्षिणी । 
वाक्यमालग्रयुक्तेति तन्मालादीपकं स्मृतम्‌ ॥ 
9 त [1 ४. ५१५ व कामरागकी, राग युवकों की 
& क 9 १५ क प्रति परवतीं को सापेक्ष बनाकर 
वाक्यो की माला वनद गरं है, अतः इते मालादीपक कदा गया है । -[ काव्यादङ्ं-२।१०७-८ ] 
मम्मट- 
मालादीपकमायं चेद्‌ यथोत्तर गुणावहम्‌ । 
-ध्यदि आादि-ादि के पदाथ यथोत्तर उत्कषकारी हो तो मालादीपक होता है! 
उद्‌ाहरण-'संयामांगण०' पच्य ही । 
रत्नाकर का जो उद्वरण कारणमाला के प्रसंग मे उदधतत किया गयाहै उसत्े सपष्टहै करि 
करोमाकरमित्र मालादीपक को स्वतन्त्र अलंकार नदीं मानते । 


अप्पयदीदित- ने मालादीपक की निष्पत्ति दीपक भौर एकावली के योग से मानी है-- 


दी पकैकावलीयो गान्मालादीपकमिष्यते । 
उदा०-^स्मरेण हृदये तस्यास्तेन त्वयि कृता स्थितिः ॥' 

_ वाम ने उस खन्दरी केदृदयमे भोर उस [हृदय] ने आपम रिकावक्र रखादहै।' 
दूसरा उदाहरण '्सं्रामाङ्गण०' द! हन्दोने दिया हे। 

पण्डितराज-- जगन्नाथ मालादीपक कौ एकावली का ही एक मेद मानते हैँ, दीपक नदीं 
[ द्र रसगंगाधर दयीपकप्रकरण ॥१ विमर्दिनीकार कै ही सम(न उनका कहना हे कि ईस 
सरकार कै उदाहरणा मे माए पदार्थो मे न तो साद्र्यद्यी रहता भौर न प्रकताप्रकृतव् दयी । 
अतः यह दीपकत्व कथमयि संभव नदीं । “सप्रामाज्गग०ः उदाहरण से यह तथ्य स्पष्टहै। 
[ द्र० एकावलीप्रकरण रसगंगाधर ] मालादोपक शब्द का आशय वतराते हए उन्दने टिखा 
ह “मालापरेनात्र संखलोच्यते दीपकशब्देन दीप श्वेति व्युलयस्या पक्देशस्थं सर्वोपकारकयुच्यते # 


तेन-- 
“यकद दस्थसर्वोपकारकक्रियारालिनी श्गटेति पदद्वयाथैः ।' 


सारालङ्कारः ५२२ 


--'माङा शब्द यहां शङ्खा का वाचक हे ओर दीपक शब्द द्दीप के समानः इस ब्धुत्पत्ति 
के आधार पर एकदेरस्थ सभौ द्रर्ग्यो का उपकार के पदाथे। इस प्रकार दोनों प्य का भिलित 
अथे हृञआ-“एकरेश्चस्थित समी पदार्था का उपकार करने वाली क्रिया से युक्त श्ङ्खला । 


[ द्र० रसगं° एकावरीप्र° ] । 
विश्वेश्वर- ने मार दीपक को दण्डी ओर मम्मटकेदही समान दीपकश्रकरणमें दी स्थानं 
दिया दै । उनका लक्षण-- 


[ सूत्र ] माला तु पवेएुवं विध्यन्तरेणोत्तरान्वयिनि॥' 
[ वृत्ति ] तस्यां क्रियायां रूपान्तरेणानिवितस्य पुनस्तस्यामेव रूपान्तरेणान्वये मारखादीपक- 
मिति । 


--^्क दही त्रियामे एक रूप से अन्तित का पुनः दूसरे रूप से अन्वय मालादीपक कहराता 


हे) 'संयामाङ्गण०ः प्य सें प्च समासादनक्रियामें जिस बाण का कारणत्वेन अन्वयहैउसीका 
कलठ्र॑त्ेन मी अन्वय है । 


विदवेश्वर पण्डितराज द्वारा प्रस्तुत प्रस्तुत भपत्तियो का कोई रर्रेख नहीं करते। न तो 
उनका खण्डन दही करते । 


श्रीविचाचक्रवत्ती की मारादीपक पर निष्कृष्टाथकारिका यह है- 
"मालादीपकमायस्योत्तरोत्तरदीपनम्‌ । 
अ[य आय का उत्तर उत्तर के प्रति उत्कषक होना मालादीपक कदराता है । 
[ सवेस्व | 
| ९ रो ण ५९ | 
८० ५० | उत्तरोत्तरथुत्कषेः सारः । 
पूवेपूवोपेक्षयोत्तयोततरस्योत्कषेनिबन्धनः सारः । 
यशा- 
(जये धर्वाः पुस्मेव सारं पुरे गृहं सद्मनि चैकदेशः। 
तत्रापि शाय्या शायने वया री रज्ञोज्ञ्वला राजकुलस्य खारम्‌ ॥' 


अच्च धरि्यपेश्चया पुरस्य सारत्वमेवं पुरपेश्चया तदेकदेशस्य गदस्ये 
व्यादि योजनीयम्‌ । 


यथथाः- 
"राज्ये खार वसुधा वुन्धरायां पुरं पुरे सोधन्‌ । 
सौधे तष्पं तस्पे बराङ्गनानज्गसवस्वम्‌ ॥' 
अज्र राज्यावेश्चवया वद्ुन्धसयाः सारत्वमेवं बसुध्रापेक्षया तदेकदेशस्य 
पुरस्येव्यादि योजनीयम्‌ । एवं श्ङाविच्छिच्याल कासाः धरतिपादिताः । 
[ सूत्र ] उत्तसेत्तर उत्कषं सार [ नामक अलंकार कहराता है ] ॥ 
६ पृवं की अपेक्षा उत्तर उत्तर का उत्कषं बतलाना सार कडकाता है । यथा-- 
पृथिवी के विजय मे सार नगर ही है, नगरमे सार गृह हे, भोर गृहमे उसका एक भाग। 
उसमे भी सार है चाय्या, राय्या पर राज्य सुख का सार है रघ्नोऽ्ञ्वल उच्छृ खी ।? 


-यदहों एृथिवौ की अपेक्षा नगरका सारत्व बताया जा रहा है हसी प्रकार नगर की 
अपेक्षा उस्तके एक अरा गृह का, इत्यादि योजना कर लेनी वादहिए ! दूसरा उदाहरण यथा- 


 . ~ 


८५२७ 


"राज्य मे सार है एथिवी, थिवी मं सार दे नगर, नगरमे सौध, सौध में तदप, तत्पमें 


अनंग का सवंस्व उत्तम सी ।' ॥ 
_ यहाँ राज्य की अपेक्षा पृथिवी का सारत्व प्रतिपादित है, इस प्रकार थिवी की अपेक्षा 


उसके णक अदा नगर का, इत्यादि योजना कर लेनी चादिए । इस प्रकार श्ंखलामूलक चमत्कार 
वाङ अलंकारो का प्रतिपादन परा इञा । 


विमरिनी 


उन्तरेत्यादि । एतदेव व्याच्षटे-पू्वेत्यादि । एतच्चेकश्येव वस्तुनो. वहूनां वा स्यादिस्यस्य 
देधम्‌ । तेन पूर्वत्र पूर्वपूवंति, उत्तरोत्तरस्येति चावस्थाविदोषाभिप्रायेण ग्यास्येयञ््‌ । 
अन्यथा द्येकस्येव पव॑स्व मुत्तरस्व च कथ स्यात्‌ । एवमण्युत्तरोत्तरसुपचयः स्वख्पेण धरेण 
वा भवतीत्यस्य चातुविध्यभ्र्‌ । एवं प्रकृते यथायथस्मारोहक्रमेण धघ!राधिरूढतयोरकषं 
प्रतिपादनं स्यादिष्यटंकारबीजम्‌ । यदुक्तम्‌-^उत्तरोत्तरसुर्कषो भवेर्सारः परावधिरि'ति । 
पूवपिषयोन्तरश्यो्टृष्टव्वमिव्यनेन मालदी पकादस्य मेदोऽप्युक्तः । तत्र हि पू्व॑स्योत्तरं 
्रषयुर्कष॑निचन्धनत्वर्‌क्तम्‌ । अत एव चास्योत्तरोत्तरस्यो्कर्षो पनिवद्धादृन्व्थ्वम्‌ । तत्रै 
कस्य स्वरूपेणोरकषों यथा - 
“किं दत्रे कि जु र्नं तिककमथ तथा ङण्डलं कौस्तुभो वा 
चक्र वा वारिजं वेव्यभरयुवतिभियदलिदे पिदेहे । 
ऊर्ध्व मौखो ललाटे श्रवसि हृदि करे नाभिदेशे च दृष्ट 
पायात्तद्वोऽकंबिम्बं स च दनुजरिषुवंधंमानः क्रमेण ॥° 
अन्नेकस्येव हरस्तत्तदवस्थाविशिष्टतया स्वरूपेणोत्तरोत्तरसुव्कर्षः। धर्मणापि यथा- 
'अतसीकुषुमप्रमं सुखे तदु स्वत्कचमेचकधयति । 
अथ बारूतमार्मां खट प्रहतं खपरति सवंतस्तमः ॥' 
धन्चेकस्येव तमसो निविडस्वाख्यधर्मञ्ुखेनोत्तरोत्तरडत्कषंः। अत्र च यद्प्येकसिमि- 
| न्नेव॒ तमसयनेकस्यातसीकुसुमग्रभादिकस्यावस्थानास्पयांयत्वम्र्‌ , तथापि तमसो ने बिद 
| यथायथञ्ुखृष्टतया वाभ्यार्थीभूतमिति यथोक्तमेव युक्तम्‌ । बहूनां स्वरूपेणोत्कषों यथा- 


अद्युचास्तरवस्ततोऽपि गिरयः स्ववांसिश्चटस्तत- 
तक्ष्मादिष्णुपद्‌ं ततः किमपरं स्याद्‌न्यद्द्युन्नतस्‌ । 
तस्मार्सवत एव साधुहृदयान्युततङ्गभङ्गीनि ते 
कस्या उन्नतये तवाथिपदवीं चिन्तामणे तन्वते ॥' 
अत्रानेकेषां वूवपिन्या स्व रूपेणोत्तरोत्तरसुर्कषः। धर्मण यथा-- 
कुन्तेः कोटर एव केटमरिपुर्धत्ते ्रिलोकीमिमा- 
मप्युद्भथढभरो बिभति तमपि प्रीतो सुजङ्गेश्रः । 
श्रीकण्ठस्य स कण्टसृद्रमभवदेव स्वयातंहृदा 
 विश्चणेन परेषु पौश्वकथा श्रीकणं निनांलिता ॥* 
अन्न केटभारिग्रशतीनां पौश्षादयधर्मश्रुखेनोत्तरोत्तरसुत्कषः। एवं "जये धरित्याः' 
दष्यादौ सारव्वदुखेन बोद्धव्य ¦ यदाहात्रेव्यादि । यथा वा- 
श्रिरोक्यां रस्नसूः श्काध्या तस्यां धनपतेहं रिक । 
तन्न गौरीगुङः होखो यत्तस्मिन्नपि मण्डलम्‌ ॥' 


सारादटरट्कारः ५२९५ 


अत्र वहूनां श्लाध्यव्वेनोत्तरोत्तरसुस्कषः । यश्वन्येरेतरस्थाने रूपधमभ्यिामाधिक्य- 
मिति वर्धमानकम्‌ तत्तेषां नाममात्रनवीकरणरसिकर्वम्‌ । अस्येव पूवपूवपिच्योत्तरो- 
तरोत्कर्षोपनिबन्धनाप्मकध्वात्‌ समग्रविषयावगाहनक्चहिष्णुर्वात्‌ । तस्माद्‌ (अस्मिश्च 
वर्धमाने सारोऽन्तर्मावमेति न पुनरिदम्‌ अन्तभूतं सारे परिमितविषये महाविषयम्‌' इस्या- 
दययुक्तमेवोक्तम्‌ । 

उन्तरेव्यादि । इसी की व्याख्या करते है- पूवं इत्यादि । [ रत्नाकरकार साराल्कार को 
वर्धमान नामक अलंकार मेँ अन्तभूंत मानते हे । विमर्दिनीकार इसके विपरीत वधमान को नया 
नाम भर मानते ओर उसको सार में ही अन्तभूंत दिखलते है । अगला प्रकरण केवर रत्नाकर 
के वधमानाल्कार का साराल्कार के रूप मे अक्षरशः उल्लेख हे । रत्नाकरकार ने वध॑मानर्मे 
एक वस्तु या अनेक वस्तुओं के उपचथ का चमत्कार बतलाया है, अतः विमरिनीकार सार में 
मीये विदेषतार्ं बतलाने जा रहे है। एक एक कर सभी उदाहरण भी वे रत्नाकर से ही लेते 
जारहेहे- ] 


यह उत्कषं एक ही वस्तु का बतलाया जा सकता है ओर अनेक वस्तुओं का भमी। इस प्रकार 
[ वर्धमान के टी समान] इसके मी दो प्रकार हो जते दहै । इस कारण पूवे पृवै' इस ओर 
उत्तरोत्तर शस अदा की व्याख्या मवस्थागत विरोषताओं के आधार पर की जानी चादिए। नहीं 
तो केवल एक का पर्व॑त्व ओर उत्तर कैसे दोगा । इसी प्रकार उत्तरोत्तर उपचयदो प्रकारसेदोता 
हे स्वरूपतः या धम॑तः । इस प्रकार इसके चार भेद हो जाते हे । इस प्रकार यहो अलंकार का 
बीज उत्कषं का एक-एक के मारोह क्रम द्वारा आगे-जागे वदते जाना हे । जेसाकि [ मम्मटने ] 
कदा हि “उत्तरोत्तर वदा ओर परा कोटि तक गया उत्कषे ही सार है । पूवं कौ अपेक्षा उत्तरवत्तीं 
का उत्कषं वतकाकर मालादीपक से इसका अन्तर मौ स्पष्ट किया । उसमे जो हे सो, पृवे-पएृवं 
का उत्तर-उत्तर कै प्रति [ उत्क नीं ] उत्कषं देतुत्व बतलाया गया हे। इसीङ्िए इसकी संज्ञा 
सार्थक है क्योकि इसमे उत्तरोत्तर का उत्कषं बतलाया जाता हे । इनमे- 

[ १] एक वस्तु का स्वह्पतः उत्कषे यथा- 

“वह्‌ सूय बिम्ब ओर वह वदता जा रहा दैत्यारि [ वामनावतारी विष्णुविग्हु ] भी पकौ 
रक्षा करे जिस सूर्यविम्ब को वलिद्धेषी [ वामन ] के [ वदृतेजा रहे] शरीरम ऊपरकी ओर 
देखा तो अप्सराओं ने सोचा कि यह च््रहै क्यासिरपरदेखातो सोवा रत्नदहै क्या, कलार 
प्रदेखा तो सोचा तिलक दहै क्या, कानके पस देखा तो सौचा कुण्डल हे क्या, वक्ष पर देखा 
तो सोचा कौस्त॒म दै क्या, हाथमे देख। तो सोचा चक्र हे क्या, तथा नाभिदेश मे देखा तो सोचा 
कमठदे क्या? 

य॒ एक हयै वामन का स्वरूपगत उत्तरोत्तर उत्कषे उन-उन अवस्था्ओं को लेकर बतलाया 
णया हे । 

[ २] [ एकवस्तु का ही ] धमतः उत्कषं यथा-- 

(अंधकार पदक तो अतप्तीकुसुमाम था, तत्पश्चात्‌ तम्हारे केशों के समान मेचकच्छवि 
[ दइयामवण | दवजा, तदनन्तर बाल्तमाल के समान मांसल दो कर यह सवत्र फल गया है । 

यहाँ एक ही भन्धकार का उत्तरोत्तर उत्कषं निविडतारूपी एक ही धमे को लेकर बतलाया 
7या है । इस पच मे यद्यपि पर्यायाल्कार भी है क्योकि एक ही अन्धकार म अतसीकुसुमप्रभत्वादि 
अनेक धर्मो का क्रम से अस्तित्व दिखलाया गया हे तथापिस्ारको ही अलंकार मानना ठीके 
वर्योक्रिं यद प्रधान है अधकार की क्रमिक उत्कृष्टता । 


णद अखङ्लरसवेस्वम्‌ 


[ ३ ] अनेक वस्तुओं का स्वरूपतः उत्कपषे यथा- 
¶ प्रथमतः ] बहुत ऊँचे दोते है वृश्च, उनसे ऊचे देँ पवत, उनमें ऊचा समैरु, उससे ऊचा 


आकाञ्च । उसत्ते ऊन्चा ओर्‌ दोन हो सकता दै । ह, उन सव से उततङ्ग चेष्टा वाके दति देँ साधुं के 
हृदय । तव हे चिन्तामणे ! वे [ साधुजन ] किस्त उन्नति कै चिप तेरे सामने याचक बन ।? 
याँ अनेक वस्तुओं का पूर्वं-पृवं वस्तुओं कौ अवेक्षा उत्कषे दिखाया गया हे । 
[४] [ इन्दीं अनेक वस्तुओं का ] धमत उत्कष; यथा- 
धविष्णु मगवान्‌ इस त्रिलोकी को कख कौ कोटरे दी धारणकरल्तेहै, उन्दः भी प्रोमपूव॑क 
धारण कर केता है देषनाग, यदपि उस पर पदलेते ही काफी बोद्ध रहता है। वह्‌ शेषनाग मी 
श्रीकण्ठ [ भगवान्‌ रिव ] का कठला [ कण्ठसूत्र ] वन जाता दै । हे धीकणै राजन्‌ उन [ भगवान्‌ 
शिव ] को हृदय मेँ धारण करफे आपने तो पौरष की कथा ही समाप्त कर दी 1 
यह विष्णु प्रभृति का उत्तरोत्तर उत्कर्ष पौरुष नामक धमं के आधार पर बतलाया गया है। 
इसी प्रकार (जये धरिन्याः आदि पर्चो मै सारत्वरूपी धमे के द्वारा उत्तरोत्तर उत्कषं जानना 
चाहिए । जैसा कि [ वृत्तिकार ने ] कदा 1 अच्र इत्यादि । ओर जसे- 
श्रिखकी भर मे श्लाध्य है रत्नसू [ उत्तम भूमि } उसमें कुबेर कौ दिला [ उत्तर], उसमे 
गोरी का पिता पर्व॑त [ हिमाचल] ओर उम भी मण्डल [?|। 
यहां दइलाव्यत्व युण के आधार पर अनेक वस्तुं का उत्तरोत्तर उत्कषप वतलया गया है| 
एफ अन्य विद्वान्‌ [ रत्नाकरकार शोभाकर | ने जो इस [सार] के स्थान पर वर्धमान 
नामक अलंकार स्वीकार किया है ओर इसका लक्षण श्प या पमे से आपिज्च' यह्‌ वनाया है, 
वह उनका नाममात्र नवीन रखने का चका है । क्योकि इप्तमं मी पुवै-पूवं कौ अपेन्ना उत्तरोत्तर 
का उत्कषं बतलाया जाता रै अतः [ वर्धमान के अन्तर्गत अने वाकी ] संपूण विषय समेरटलेने में 
समथ हे । इसक्िएट- 

स व्ध॑मान मे सारका अन्तमाव दो जाता दहै। इसका उसमे नदीं क्योकि सारकाषषेत्र 
खोदा है ओर वधमान का विद्याङ । [ परिकरद्कोक के दारा | 

इत्यादि जो उन्होने सिद्धान्त किया है वह्‌ अयुक्त ्ी 8 ॥ 

विमर्श- विमरिनी के उक्त विवेचन मेँ रत्नाकर द्वारा वनाया गया वर्धमान अलक्ञार का 
लक्षण एवं उनके द्वारा प्रस्तुत उसके सभी उदाहरण आ गण हँ । रेष केवल सवस्वकार का खण्डन 
हे । वहु इस प्रकार दै- । 

“राज्ये सार वधा [ पूणं पच ] ०› अत्र वुधादीनायुत्तरोत्तरसारत्वाख्यस्य धमस्याधिक्यमिति 
धर्मोपचयकस्तभवादन्यैः 'उत्तरोत्तरसत्कषैः सारः इति रक्षितस्य स।(राठङ्कारस्यासि्मिन्नेवान्तभावन्न 
पृथगुपादानं कृतम्‌ । 

(असि्मश्च वर्ध॑मने--मदाविषयम्‌ ।› इति परिकरः ॥ 
राज्ये सारं वद्चधा०? इत्यादि मेँ वघुधादि के उत्तरोत्तर सारत्व नामक धमैका आधिक्य 
है इसलिए धर्मोपचय की संभावना ल्येन से “उत्तर-उत्तर का उत्कषे सारः इस प्रकार जिस सारा- 
टकार का अन्य आचाय ( सर्वस्वकार ) ने लक्षण किया हे उसका अन्तमाव इसीमेंदहो जाता है) 
अतः उसका पृथक्‌ उपादान नदीं किया ।› (सार इस ०००००० विषय विद्चाङ । 

इसत प्रकरण मेँ "अत्युच्चाः" पद के तृतीय चरण म रत्नाकर की प्रतिके ददी समान निणेय- 

सागर की प्रतिमैमीन्तेः के स्थान पर ^तत्‌' छपा है। समासतान्तगत पदके अथैका परामश 


सारालङ्कारः ५३७ 


सवनाम द्वारा ह्येता है अतः हमने उते (तेः वना दिया है। उप्ते अथसंगति अधिक सबल हो 
जाती हे। 
इ तिहास--सार का विवेचन पदरे-पहर रुद्र मेँ मिलता है । वह इस प्रकार है- 
ध्यत्र यथा ससुदायाद्‌ यथेकदेदं क्रमेण गुणवदिति । 
निर्धार्यते परावपि निरतिशयं तद्‌ भवेत्‌ सारम्‌” ॥ ७९६ ॥ 
--'जहां ससुदाय मेँ से एक-एक अंश॒ युणवत्तर ओर अन्यत्र उच्छृष्ट वतराकर अलग किया 
जाता है वह्‌ सार कहलाता है ।› उदा० राज्ये सारं वदुधा०'। 
मम्मरट-“उत्तरोत्तरसुत्कषां भवेत्‌ सारः परावधिः--' [ विमरशिनी मे पृष्ठ ५३४ पर उद्धृत | । 
उदा ०--राञ्ये सारं वञधा०ः। 
सर्वस्वकार ने मम्मट का लक्षण अक्षरश्चः अपना लिया है केवल परावधि शब्द को छोडकर । 
परवन्तौ भाचायौ मे रस्नाकर का मत विमरिनीमें स्पष्टहोद्ीचुकादहै। 
अप्पयदीदितत- का लक्षण मी मम्मट का अनुवाद है । वह इस प्रकार है- 
"उत्तरोत्तर सुत्कषेः सार इत्यभिधीयते ।' 


उदाहरण मेँ समालकार के समान गुणगत इकाध्यता ओर अदलाध्यता पर भी दीक्षितजी ने 
ध्यान दिय्‌। है । 


पण्डितराज्ञ-जगन्नाथ ने दौक्षितजी की यड सञ्च स्वीकार करली है। उन्दने लक्षणमें 
उत्कषं के ही समान अपकषं मँ मी सार स्वीकार किया है । उनका लक्षण इस प्रकार है-- 

"सेव [ शृङ्खला ] संसर्मव्योक्छृष्टापृष्टभावरूपत्वे सारः । 

वही शृङ्खला संसग के उत्कषं अपक्षं रूप होते से सार कहकाती है । दोनो मे से उदाहरण 
केवल उत्कष का ही पण्डितराजने दिणा है । वस्तुतः उत्कर्षं का अथं तरतमभाव है । वहु अपकपं 
म मी संमव है मतः पण्डितराज की यह्‌ सूज्च उन्हे स्वयं अधिक नीं जची । विमरििनीकार के 
समान पण्डितराजने सार में युण भौर स्वरूप को मेदक माना है तथा एकविषयता अर अनेक- 
विषयता भी स्वीकार की हे, ओर उनके उदाहरण दिए दहैः। 

रत्नाकर के वधमान की चर्चाभमी पण्डितराजने की है ओर उन्होंने उसका स्पष्ट खण्डन तो 
नदीं ही किया, दवे स्वरम मण्डनमभी कियादहै। सार में यदि वस्तु कहो भौर वह आरम्भसे 
तक एक-सी ही रहे तो चमत्कार नहीं रहता । वधमान मे उसी वस्तु में अवस्थादि भेदभी 
रहते है जो अधिक चमत्कारी होते हे । 

सार को पण्डितराज ने श्र॑ला से रदित भी मानादहै। दोनों का समन्वय करने हेतु उन्होने 
एक व्यापक लक्षण भी खल्ञाया है--शुणस्वरूपाभ्यां पूवप वै रिष्टये सारः ॥ युण जोर स्वरूप के 
दरार पूव पूवैका वेरिष्टयहोतो सार अलङ्कार होता है। यह लक्षण शखलारदित भेदमेंभी 
समान रूप से अन्वित हो सकता है । 


विश्वेश्वर-मम्मयर का द्यी अनुसरण करते है- 

'सारस्तु पूरवपुवादुत्कषिण्युत्तरे प्रोक्ते" । 

“्-पूवं की अपेक्षा ऽन्तरवत्तौ पदाथ यदि उत्कपंशाली बताया जाए तो सार होताहे।' 
अवस्थामेद से एक ही वस्तु के उत्कषंपूणै वणन मेँ रत्नाकर भोर पण्डितराज ने जो चमत्कार 


५३८ अलङ्कारसवस्वम्‌ 


देखा है विदवेदवर उत्ते भी तटस्थ स्वर मँ उपस्थित कर देते धम भौर स्वरूपके भ्दोपरवे 
युप हेः । 
इस पर चक्रवत्तीं की निष्कृष्टाथैकारिका यदह दै- 
'उन्तरोत्तर सुत्कषां वदत्वे सार इष्यते । 
पाटान्तर-निर्णयसागरीय प्रति में अलंकार कानाम सारके स्थानपर उदार छपाहै। 
“उन्तरोत्तरसुत्कर्षणसुदारः' रत्नाकर मेँ प्राप्त सवेस्व के उरणं सत्नकाजो रूप भिल्ता है 
इसमे उदार का उच्लेख नदीं है । रद्र, मम्मट ओर अप्पयदीक्षित के लक्षण भी सार वाले पाठ 
से ही मिलते) संजीविनीमें भी यदी पाठदहै। विमरदिनीमी इसी पक्ष मे है, वृत्तिम 
निबन्धनं सारः के स्थान या निणेयसागरीय प्रति मे "निवन्धनत्वसुदार। ख्योऽल्कारः छपा है 
किन्तु पाठान्तर मे निवन्धनसारः' ही पाठ दिया हआ है) उदाहरणम से रत्नाकर मे केवल 
“राज्ये सार” पच ही उद्ध्रत है ओर संजीविनी भी केवल इसी पद्य से अवगत है। विमरिनी मे 
जये धरित्रयाः' इत्यादो सारत्वसुेन' इस प्रकार आदिपद सते सारता को धर्म प्रतिपादित करनेवाले 
एकाधिक प का निदेश मिलता दै । कदाचित्‌ उनका संकेत राज्ये सार पयकी हो ओर है । 
लगता दै रत्नाकरकार ओर विमदिनीकार को दो भिन्न प्रतियों भिली थां । अधिक सरकं प्रति 
रत्नाकरकारवाकौ दही प्रतीत होती हे। निणैयसागरीय प्रति के संपादकने 'उद्‌]र› को मूर 
मानकर पाद टिप्पणी मेँ अपनी ओर पे छिखा है-'अयमेव काव्यप्रकारकारादिभिः सारनाम्ना 
व्यवहृतः ।' अधात्‌ इप्ती उदार को कान्युप्रकाश्चकार आदि ने “सार नाम से पुकारा है । 
विमरिनी मं उदध्रत रत्नाकर का ल्वा प्रकरण मी अशुद्ध छपा है। यहां तक कि 'अस्मिश्च०" 
यह संग्रहकारिका भी अस्गत गयपक्ति के रूपमे छप दै। हमने उसे मू रत्नाकर के आधार 
पर समारम्भ से अन्त तक ठीक कर दियाहे। 
विमरिनी 
| एतदुपसहस्यादन्यवतारयति--अधुनेष्यादिना । 
| इस [ “खला | प्रकरण का उपसंहार किया 1 अव दूसरा प्रकरण आरम्भ करते है- 
[ सवेस्व | 
` अधुना तकन्यायाश्रयेणाटंकार्द्यघुच्यते । तज्न-- 
[ घ्र ५८ ] हेतोर्वाकयपदाथेता काव्यरिङ्गम्‌ । 
यत्र देतुः कारणरूपो वाक्याथंगत्या विरोषणद्वारेण वा पदार्थगत्या 
लिङ्गत्वेन निवच्यते तत्‌ काव्यलिङ्गम्‌ । तकेवेलक्षण्या्थं काव्यच्रहणम्‌ । न 
ह्यत्र व्याति पक्चधमंतोपसंदारयादयः क्रियन्ते । वाक्यार्थगत्या च निवध्यमानो 
हेतुत्वेनेवोपनिबद्धव्यः, नोपनिबद्धस्य हेतुत्वम्‌ । अन्यथा्थौन्तरन्यासान्नास्य 
भेदः स्यात्‌ । क्रमेण यथा-- 
'यत्वन्नै्र समानकान्ति सिके मग्नं तदिन्दीवरं 
मेवे रन्तरितः प्रिये तव मुखनच्छायालुकारी शशी । 
येऽपि व्वद्गमनाचुसार्गितयस्ते यजदंखा गता- 
स्त्वत्स्दद्यविनोदमाचमपि मे देवेन न क्लम्यते | 
“स॒ग्यञ् द्भाद्रनिव्यपेक्षास्तवागतिज्लं खमबोधयन्माम्‌ । 
व्यापारयन्त्यो दिदि दक्षिणस्यामुत्पक्ष्मराजीनि बिखोचनानि ॥* 


` (4 (1 


काव्यटिङ्ञालङ्कारः ५३९ 


पूवं पादज्यार्थोऽनैकवाक्याथेरूपश्चत॒थेपादाथं हेवत्वेनोपन्यस्तः। 
उन्तस्् त॒ संबोधने श्यापारयन्त्यः इति स्खगीविरोषणत्वेनानैकः पदाथा 
हेतुत्वेनोक्तः । 
पवमेकवाक्याथेपद्‌ाथंगतत्वेन काव्यलिद्धमुदाहियते । यथा-- 
“मनीषिताः सन्ति गेषु देवतास्तपः क वत्से क च तावकं वपुः । 
पदं खेत श्चरमरस्य पेटवं शिरीषपुष्प न पुनः पतच्निणः।।' 


'यद्िस्मयस्तिमितमस्तमितान्यभाव- 
मानन्दमन्दमश्छतष्टवनादिवाभूत्‌ । 

तत्सनिधो तदधुना हदयं मदीय- 
मह्गारचुम्बितमिव व्यथपरानमास्ते }\ 


पूर्वत्र वरपरातिदेतुभूतत पोनिषेधस्य “मनीषिताः, इति वाक्याथरूपो देतु 
निर्दिष्टः । उत्तरत पुनः 'अस्तमितान्थभावम्‌' इत्यन्न विस्मयस्तिमितमिति 
विरोषणद्धारेण पदाथः । 

अव तकौ [ स्वहूप ] न्याय पर आश्रित दो अलंकारो का प्रतिपादन करते है । उनमें-- 


[ सू० ५८ ] हेतु के पदार्थरूप होने या वाक्याथंरूप होने पर [ अरकार का नाम ] 

काष्यलिग [ होता] ॥ 

"ज्य कारणरूप [नकि ज्ञापकरूप ] हेत जो वाक्याथरूप़ं हो या विशेषणरूप होने से 
पदार्थरूप, लिगरूप से उपनिबद्ध होता है उपे काग्यलिङ्ग कते ह । [नामके साथ कान्य 
शाब्द का प्रयोग तक से भेद करने के किए किया गयादै। यहा, व्याप्ति, पक्षपमंता, उपसंहार 
आदि नदीं किर जाते । वाक्यार्थरूप से उपनिबद्ध किया जाने वाला हेतु हेतुरूप से ही उपनिवद 
होता दै, उपनिबद्ध होने के वाद हेतु नदीं बनता । नदीं तो इसका अर्थान्तरन्यास से भेद नदीं. 
सकेगा । क्रम से उदाहरण [ वाक्याथरूप अनेक हेतुमूलक काव्यलिङ्ग |-- 

--ष्दे प्रिये! जो तुम्हारे नेतर के समान कान्ति वालाथा वह नीलकमल पानी मे डूब गयाः 
तम्दारे सुख की छाया का अनुकरण करने वाला चन्द्र मेघो ने छिपा लिया ओर जो तुम्हारी गति 
कै समान गति वाले राजहंस ये वे चके ग [ इस प्रकार ], तुम्हारे साद्रर्यसे होनेवालाजो मैरा 
थोड़ा वहत विनोद है, वह मी विधाता को सद्य नदीं दै । 


[ पदाथरूप जनेक हेतुमूलक कान्यलिङ्ग ]- 

“भौर, दिरनियां दुशाङ्कर की अपेक्षा [ परवाह ] छोड तुम्हारा पथ न जान पा रहे सुज्चे उनके, 
ची उटी बरौनी वले नेत्रां को दक्षिण दिशामें घुमा-घुमाकर सूचना दे रही थीं ।' [रघुवंश-१२] 

[ इन पो मेसे] प्रथमम तीन चरणो का भै, जो अनेक वाक्याथरूप है, चतुथे पाद्‌ के 
ह म देपुरूप से प्रस्तुत किया गया रै, ओर द्वितीय में सुचना देने रूपी अथे मे धुमा-घुमाकरः 
इत्यादि म्रगीविरेषण के रूप मेँ अनेक पदाथं हेतुरूप से कहै गए । 

इसी प्रकार, काव्यलिङ्ग एकवाक्या्थगत ओर एकपदाथगत भी होता है । उसके उदादरण- 

धूर ही मे मन चाहे देवता हैँ वत्ते ! तप कहँ, कँ तेरा ररीर । शिरीष का कोम पुष्प 
भोरे के पैर की चोर सहु सकता है, पेरू की नदीं । 


५४० अट्ङ्कारसवेस्वम्‌ 


(उसके पास मेरा जो हृदय विस्मय से निश्चल, था, अन्य समस्त कायं जिसने बन्द कर 
दिपये ओर जो मानो अग्रत मे तेरने से आनन्दमन्र था वही [ इस समय उसके वियोगमें] 
मानो अगारे से दग कर व्यथित दहो राह) 

[ इन पयो मसे] प्रथममें वरप्रा्चिमं हैत तप के निषेध के प्रति “मनीषिताः०? = 'मनचादे०? 
य॒द्‌ वाक्या्थरूपी देतु बतलाया गया है ओर द्वितीय में “अस्तमितान्यभावः = “अन्य समस्त कार्यं 
जितने बन्द करदिएयेः [ ह्य के |। इसङ़ प्रति विस्मयस्तिभितः इस विदेषणके द्वारा पदाथ ।» 


विभरिनी 


तनेति दयोनिरधारणे । देतोरित्यादि । यत्रेति । हेतोश्च वाक्याथपदार्थगस्योपनिबन्धा- 
दृ्यानेन सद सेद ष्यमण्युक्तष्र्‌ । वाक्याधगव्येति । नतु पदाथंगस्या । तत्र द्यु पनिवद्धस्यैव 
हेतुरवाव्‌ । देवतेनेवेति । देतुस्वश्याञ्चुख एवोदित्सस्वेन प्रतीतेः 1 अन्यथेति । इेतस्वेनोपनि- 


न्धो यदिन स्यात्‌ । क 
नलु हेतोर्वाज्यपदार्योभयो पनिवन्धे न कश्चिद्धिच्चछित्तिविशेषः प्रतीयत इति कथसमश्या. 


खंकारस्वसुक्तस्‌ । न दहि साध्यखाध्रनायोपात्तश्य देतोरेवं प्रकारद्रयातिरेकेणोपनिवन्धः 
स्यात्‌ । न च यथाक्चंभविन पनिबनधमात्रेणारुकारस्वं वन्छ युक्तम्‌ । कवि प्रति माव्मकस्य 
विच्छि्तिविरोषारमकस्यालंकारव्वेनोक्तसवात्‌ । न चेवुपनिवन्धाव्कश्चिद तिशय इति कथ. 
नस्या्टकारस्वम्‌ । एवहि क्‌ स्वाभावेव नान्येन वेधे^्यादावपि सगभासध्वस्य ठेतो्चि- 
जेषणद्वारेण पदाथंगस्या, तथा ्रस्यच्ाद्विरखकराङ्कुलिप्रती तिभ्यां पिव्वादकृशरूमिन्दियं न 
तस्याम्‌, इर्यादौ तमलि बिरकाङ्कलिभ्रतीतौ व्यापिरवादिन्द्ियको शल्मेव साधनमिति 
ठतोर्वाक्यार्थ॑गस्यो पनिवन्धादरंकारस्वं स्याद्‌ । सत्यम्‌ । यधप्येवसुप्निवन्धस्य वस्तु- 
उृततेरसंभवान्न कश्चिदतिहयः प्रतीयते, तथापि अन्थक्ता पराच्यंलेचितष्वादेतदिह्‌ 
लदधितम्‌ । अथ यत्न भ्यङ्गवाश्िष्टो वाच्या वाच्यमेवाथ भ्रति हेतुतां जनते तत्रायमलकारो 
युज्यत षवेति चेत्‌ , तहिं उ्यङ्गचाररेषवदोन तदुल्थानाद्वाक्वाथतयो पनिवद्ध वसानस्य 
हेतोः श्वारमनि न कशिदतिशय इति व्यङ्गव्ृत पूवातिसयाऽभ्युप ग्यते, न तप्छरतः । 
तस्यैवुपनिवद्धशष्य वास्तभ्यत्वात्‌ । यदि. च व्यङ्गथलाहचचणव देतुरककारतामिय 
तच्छब्दस्यापि देतोरलंकारस्वं प्रसञ्यत, च्‌ तत्रापि व्यङ्गथाशलेषः स्यात्‌। अध तस्य 
ज्ञाब्दत्वादेव ~ चिन्याभावाद्यमनरंकारत्व निमित्तस्व कथन यायात्‌ । जय तत्र ब्यङ्गया 
श्रेषो न भवतीति चेत्‌, किं नामापराद्धम्‌ धनात यङ्ग श्ेवस्तन्न च नेति । तथास्वेन 
लचयादुर्श नादिति चेत , नैतत्‌ । अवाग्दुक्धिन पुव निश्वयाजुपपत्तेः। मस्युत यत्र भवता 
उयङ्यश्टेव उक्तस्तत्र स नाश्तीति वक्तं कक्यत । तथाहि | 

'वच्घःस्थद्ी र्त सा जगन्ति जगस्प्रसूतगख्ड भवनस्य । 

ध्रियोऽङ्गरगेण विभाष्यते या सौ भाग्यहेन्नः कषपदिशेव ॥° ५ 

टश्यत्र व ्ःस्थश्या जग दततकशव जगस््सूतिस्वं पदार्था हैतुः। भवितुं निजमप्रसूतेः 

दर्दर रचणभ्रुचितम्‌ । अत एव गङइध्व नवत्तःस्थल्या जग द्र क९व कतृध्वं युक्तप्र । इया. 
श्चामिपधेय एवार्थः । अत एव चाच्रन ठेतोः कशथिद्रथङ्गयाश्डेषः। इव्यम्‌ । 

(संजी विगीखहग्मिव सु जस्स अणण्णवावारा । 

खा णवडश्रदसणकंडागज जी विं सोण्ह ` 

इव्यन्न कण्डागअजीवि तत्वस्य । अत्र च जगस्प्रसूतित्वस्य ठेतोः पदार्धतयोपनिब. 


न्धेन कशचिदतिदायो विश्ोषः। एवम्‌ । 


कान्यलिङ्गाटङ्कारः ५७२ 


"अयि भमत्ते सिचयं गहाणेव्युक्तेऽपि सख्या न विवेद्‌ काचित्‌ । 
मग्नाहि सा तन्न रघ्ान्तराङे यन्नान्तरङ्को भगवाननङ्कः ॥' 


दव्यत्रापि क्तेयम्‌ । यद्यपि चात्र रसश्ञञ्दस्य जख्वाचिष्वं न विवक्षितम्‌ । तथाप्यभेद्‌- 
ध्यवसायादतिशयोक्तिः, न पुनः शब्दशक्तिभरुरं व्यङ्गम्‌ । तथाव्वे हि हेतुहेतुमद्धावस्य न 
कश्चिदतिशयः। एवं हि 
^र्‌कान्तजाडयादुकषभ्यां करभो्वांः पराजिताः । 
कदल्यो यन्न तचत्रं जयः कन करावतास्‌ ॥' 
इत्यन्न जाडयस्यातिश्योकत्यारिङ्ितस्वेन वै चिभ्यावहव्वाच्छृष्दस्यापि पद्ाथस्य 
हेतोररंकारयघ्वं श्यात्‌ । एवसुदाहरणान्तरेष्वव सयस्‌ । 
एवं च यन्नापि व्यङ्गयाश्ङेषः श्यात्त्ापि हेतो वाक्याथेतयोपनिबन्धेः न कश्चिदतिज्ञयः । 
अथ साध्यप्रतीतये हेतोकूपनिवन्धादस्व्येव वै चिन्यात्िश्शयः) इति चेत्‌ । तद्येञुमानमेवेद्‌ 
स्यान्नालटंकारान्तरम्‌ । सखाध्यसाधनस्य तह्भणत्देन वचयमाणत्वात्‌ । एवं हेतोदोक्यपः 
द्‌ाथंतयो पनिबद्ध॒स्य वास्तवत्वादुस्य धरथगंक।रत्वं न युक्तस्‌ । उक्तवचयमागनीत्यान्ुमान 
एवान्तभांवो पपत्तेः! 
तश्र =उनरमे, यहदोमेसेएकका निषारण करने के लिएकहा गया । हेतोः इत्यादि) 
यन्न ्ति। हेतु, जोट वहु वाक्याथया पदाथंकै रूपमे उपनिबद्ध होता देः; कथन के साथ 
इसके दो सेद मी वतला दिए । बाक्यार्थगर्या = वाक्या्थैरूप से = न कि पदा्थरूप से, क्याकि वहां 
[ पदार्थरूप होने पर ] तो उपनिवड हो चुक्ने पर [ पदाथ में] देठता आती है। हेदुस्वेनेव = 
हेतुरूप से ही = क्योकि वहां हेतुत्व आरम्भ मेंदही स्पष्टरूपसे प्रतीत हौ जाता दहै। अन्यथा 
यदि दतुरूप से उपनिबद्ध न किया जाय । 


[ श्टका ] देतु का वात्य मौर पदाथैके रूपमे उपनिबद्ध किएजनेमे कोड चमत्कार प्रतीत 
नहीं होता तो इसको अलंकार कैसे बतलाया गया । [ तक॑शराखमें] साध्यकी सिद्धिके छप 
अपनाए गए हेतु को= उपनिवन्धमेमी ह्नदो प्रकारो के अत्तिरिक्त कोई प्रकार संभव नदींदै 
ओर लोकसिद्ध वस्तु के उपनिवन्ध मात्र से किसी को अलंकार कहना ठीक नदीं £, अलंकार तो 
वह्‌ कहा गया है जो कविप्रतिभात्मक ओर वैचित्रयरूप दहो ओर शस प्रकारकाजो [ तके दाख 
जैसा ] लिखना है इसमे कोड विरोषता नहीं है । तब इसे अलुकार कैसे कदा । णेसे तो- 

'कूरवामासेव, नान्येन वेद्याः [ देशवरप्रत्यभिन्ञा-कारिका-१।३।२॥ | 


इव्यादि मे भी स्वाभासत्वरूप हेतु पिद्ेषण दवारा पदाथैरूप से उपनिवद है ओर-- 
प्रत्यक्षाद्‌ विरल्कराङ्कखिप्रतीतिग्यापित्वादक्ुश्चलमिन्दियं न तस्याम्‌ ।' 
श्त्यादि मे “अन्धकार विरल अंगुली कीजो प्रतीति होती है उसमें श्यापक हानेसे 
इन्द्रियकोदाल ही कारण हैः (१) यह देतु वाक्याथरूप से उपनिबद्ध है । अतः यहाँ भी अरूकारत्व 
मानना होगा । [ उत्तर ] ठीक है। यद्यपि इस प्रकार के उपनिबन्ध वास्तविक ही होते ह भतः 
इनमे कोई भतिशय की प्रतीति नदीं होती, ओर वैसी प्रतीति संमवमभी. नहीं, तथापि इसका 
लक्षण प्राचीन आचायौ ने किया था इस्ल्ए यन्थकार ने भी यहां कर दियाहे। 
[ पृवंपक्ष ] यदि कै [ जसा कि रत्नाकरकार ने कदा हे ] कि यद्‌ भलंकर वहां मानना ठक 
होगा जहौ वाच्य मथ होतो वाच्य अथं केही प्रतिदहतु किन्तु व्यंग्य अथं से युक्त होकर 
[ उत्तर | तो इसका अथं यहु हा कि वाक्यार्थं या पदाथैरूप से उपनिबद्ध हेतु यदि व्य॑ग्य के 


एवा वाका  ाक क का ा ा  क 


५४२ अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


कारण अलंकार वनता है तो हसते सिद्ध होतादहै िस्वयं हेतुमें कोद अतिदाय नदीं रहता 

इस प्रकार अतिद्यायमें कारण व्यंग्याथैदही मानाजा रहादहै, वह [ दैत॒भूत वाच्य धथ ] नदीं । 
इस प्रकार उपनिबद्ध वह दहेत तो अपने आपमें लोकिकं हेतु जेसादहै। इसके अतिरिक्त एक 
आपत्ति यह मी आतीदहै कि यदिदेतु व्यंग्यके ही कारण अल्कार वनता है तो उस हेतु 
को भी अल्कार वन जाना चादि जिक्तका हेतुत्व राब्दतः कथित हदो किन्तु जिसके साथ 
व्यंग्या्थं का योग हो । [ यदि कं ] हेतुत्व के राब्दतः कथित होने ते दी वह [ हेत ] चमत्कार- 
दन्य ओर इसीलिए अरुकारत्वदयल्य क्याँनदहो जाएगा £ तो हम पृच्छते है "यदि व्येग्यार्थंका 
योगनद्ोतो 2 “यक जगह व्यंग्यार्थका योग है ओर दूसरी जगह नदी--ईसते विगड्ने वाला 
क्या है यदि कै ष्लक्ष्य मे एेसा नदीं दिखा देताः, तो यह भी एेसा नदींहै। 
[ अवाग्दशीं ] मूल पर विचार करने वाले रेते निश्चय पर पटच दी नहीं सकते 1 उरूटे, जहो 
आप [ रत्नाकरक्षार ] ने व्यंग्या्थै का योग वतलया दहै वदं "वद [ व्यग्याधे या अलंकार ] 
नहीं हे'-ेसा कहा जा सकता ह । प्रमाणां आप्‌ = रत्नाकरकार के द्वारा ही देत्वरुकार 
नामक काव्यलिङ्गालंकार के किए उदघत ।-- 

'जगत के जनक मगवान्‌ गरुडध्वज [ विष्णु] कौ वह वक्षःस्थली जगत्‌ कोरक्षाकरे, जो 
लक्ष्मी के अंगराग ने सौमाग्यखुवणे की कसोरी-सी प्रतीत होती हे ।' 

--इस पराथ में वक्षःस्थली के जगद्रक्तकत्व मँ जगत्प्रसूतित्व रूपी पदाथ हेतु है। जो जनक 
होता है उसके किए अपनी संततिकौ रक्षा करना सवधा उचित हीहे। इक्तील्िए विष्णुक्ी 
वक्षःस्थली का जगद्रक्षा मेँ कतरत उचित ही सिद्ध होता है । इतना सव यहाँ अभिषेय अथ॑दही है । 
इसीचिर यदा देतु के साथ [ रत्नाकरकार दारा कथित ] व्यंग्यका कोड योग न्दी है। [ क्योकि 
यहा जगद्रक्षणौचित्य व्यंग्य नदीं है] । इसी प्रकार [ रत्नाकर दारा दी उद्धृत ]- 

(संजी वनौषधभिव खुतस्य रक्षव्यनन्यन्यापारा । 
दवश्रलेवाश्रददोनकण्ठागतजी वितां स्नुषाम्‌ ॥› 
“सास नवीन मेघ के द्येन से कण्ठागत प्राण दुद बहू को पुत्र कौ संनीवनोषधि कै 
सव कुछ छोडकर वचा रही हे 1 
इ पाथ मँ कण्ठागत जीवितत्व रूपी देठ म [ व्वग्वाथयोग नहींहै] यक्षम 
जगत्प्सूतित्व के ही समान हैत मेँ कोद अतिशय, कों विरेषता नदीं है। इती रकार 
[ रत्नाकरकार द्वारा ही उदधतत [- 

अरौ वेखवर, साड़ी तो उठा ले, सखी के इस प्रकार कहने पर मौ कोहं युन्दरी नदीं चेती 
बहू उस रस मेँ इवी थी जिसँ भगवान्‌ अनंग काफी अन्तरंग रहते हैँ ।' ॥ 

इस स्थल मे मी जानना चादिए । यचपि इस पच म॑ रसशन्द जल्वाचौ भी दो सवता ै 
किन्तु वह अर्थ विवक्षित नदीं है, तथापि यदं अमेदाध्यवलाय के कारण अतिशयोक्ति हय होगी 
शाब्दशक्तिमूलक व्यंग्य नदीं । वैसा होने पर [ शब्दशक्तिभूलक ग्यृग्य होने पर्‌ | ेतदेवमद्‌भाव 
का कों अतिद्य न रहेगा । इसी प्रकार-- 

"उत करभोरू से कदली एकदम शीतल होने के वारण यदि हार गई तो यद को आशय 
की बात नहीं । भला कलावान्‌ लोगो को जीत कां नदीं दती ।' 

यहाँ जाड्य[ जडता, शीतरता | शब्द म भतिश्चयोक्ति है गौर उ्तका चमत्कार भी 
भतः यहां पदाथरूपी हत॒ का हैुत्व शब्दतः कथित होने पर भी चमत्कार समव है, ससी प्रकार 
न्य उदाहरणा मेँ मी जानाजा सक्ता है [ तथापि वह चमत्कार अततिशयोक्तिमूरुक दोगा 

उ्यंग्यार्थमूलक नही ] । 


-समान्‌, 


काभ्यलिङ्गाखङ्कारः ५७द्‌ 


इस प्रकार जशो व्यग्य का योगरदहताभौदै वहोँभीदहेतु चाहे वाक्याधैरूपसे कथितदहोया 
पदार्थरूप से उसके कथन मेँ कोड चमत्कार नहीं रहता । यदि केकि साध्य की प्रतीति के 
छिएहेतकाजो प्रयोग रहता है उससेतो इसमें अतिद्ाय रहतादहीहै? तो फिर यह अनुमाना- 
लकार ही होगा, अन्य स्वतन्त्र अल्कार नहीं, क्योकि अनुमान क्रा लक्षण साध्यस्ताधनभावदही है 
जैसा कि पहले भी बतलाया जा चुका ह ओर आगे मी वतलाया जाएगा । 

इस प्रकार वाक्याथं रूप से प्रस्तुत किया गया या पदार्थ्प से प्रस्तुत किया गया दहेतु वास्त- 
भिकदेतदहदीद्ोणा [ कविकसिपत नदीं] अतः उसे पृथक्‌ अल्कार कदना ठीक नदीं हैः शयोक 
उसका अन्तमाव पदकयित ओर आगे कदी जने वाली सीति से अनुमानमेँहीहोजाता हे ॥ 

विमरिनीकार ने काव्यङ्गि को अनुमान मे अन्तभूत मान जिया है। यह प्रेरणा उन्दै ररना- 
कर से मिरी है । रत्नाकरकारनेभीकल्खिथा- 

[ सु° ] "परप्रत्यायकं लिङ्ग हेतुः' 

[ बृ० ] परग्रहणमनुमानवैलक्षण्यार्थम्‌ । तेन स्वयं लिगात्‌ प्रतिपत्तिरतुमानम्‌ , लिक्केन पर- 
प्रत्यायनं परार्थानुमानरूपं काव्यलिङ्गपर्यायो हेत्वलंकारः । यदप्यनुमानस्येव स्वाथपराथैरूपत्वेन 
देविध्यं तथापि प्रतिपादितरूपेण प्राच्यैः पृथक्‌ लक्षितः, तथेवेक्ापि लक्षणम्‌ ।› 

[ सूत्र ] दूसरे को ज्ञान कराने वाला ल्गिदहेतु। 

[ वृत्ति | पर' = दूसरेः शब्द का ग्रहण अनुमान से इसका भेद करनेके किए किया। इस 
प्रकार स्वयं कछ्गि से इदं प्रतीति नुमान होता दहै ओर लिङ्ग से दूसरे कोक्ञान करने मेँ हेतु । 
स्वां ओर पराथं दोनो रूप एक भनुमान के ही होते हैँ तथापि प्राचीन आचार्यौ ने अलग- 
अलग लक्षण किय हँ अतः यहां भी अलग लक्षण किया गया । पण्डितराज जगन्नाथ ने भी अनुमान 
से कान्यल्गि वा भेद करते हुए सुख्यतः दो सूत्र प्रस्तुत किए है- 

१--अनुमन मे अनुमानप्रक्रिया वक्तृगत ओर काव्य मे उपनिबद्ध रहती है, जव कि 
काव्यलिग मेँ वहु कविगत रहती है ओर अनिवद्ध 1 

२--अनुमान में हेतु ओर उप्का हेतुत्व दोनों वाच्य रहते है जव कि काव्यल्गि मे हवत 
नियमतः व्यंग्य ही रहता है । 

इतना कदने के बाद मी काव्यक्गि विवेचन के अन्त मे पण्डितराज ने इसको स्वतन्त अल्कार 
न मानने का पश्च मौ प्रे वरू के साथ प्रस्तुत कर दिया है। विमदिनीकार का उच्छेख विना 
किए उनके उपयुक्त विवेचन को उन्दने इत प्रकार संक्षिप्त किया है- 

१--काव्यलिग में कोद चमत्कार नदीं रहता कर्योकि उसमें प्रातिमत्व नहीं रहता । 

२-दरेष आदि [ उपथुक्त पाँ के (नाञ्च, रस" आदि प्रदो] के रहने से इभा चमत्कार 
उन्हीं रलेष आदि का चमत्कार होगा, काव्यल्गि का नहीं । 

२--इस प्रकारतो प्राचीनो दारा प्रतिपादित अनेक अलंकार अलंकार सिद नहींहैतो 
हो जाएं । इसमें हमारा कुछ नहीं बिगड़ता । 

भागे वदृकर उन्हाने यहमी कहा दिया है कि कान्यकल्गि निहँतुत्वदोष का अभाव है, 
अलंकार नदीं । 

विमरिनीकार के दु हेतु भमान्य हे । वे माव्यलिग मेँ हेतुत्व को व्यंग्य नदीं मानते । यँ 
तक कि रत्नाकरकार द्वारा उदप्रत वक्षःस्थलो०' सादि पघों को उद्धृत कर वे उसमे उनके दारा 
प्रतिपादित व्यङ्ग्याथं को वाच्यां दही मानते है। वक्षःस्थली में प्रतीत हो रहा “जगत्प्रसूतित्वः 
कथमपि वाच्य नहीं हो सकता; क्योकि उसका प्रतिपादक कोशे भौ विशेषण वक्षःस्थली के साथ 


५५७७ अलङ्कारसवस्वम्‌ 


नदीं ३ । जि्तके साथ दै वह्‌ पक भिन्न पदाय॑ है विष्णुरूपी । विमरिनीकार केवर इतना कह सकते 
थे कि यँ हेतुत्व वाच्य जैसा ही स्फुट व्यंग्य है । इत तथ्य को स्वयं रत्नाकरकार ने भी स्वीकार 
करिया हे। 
कान्यल्गि को मल्गन माननेकाजो मौन समथन पण्डितराज तक चल्ता रहा उसका 

समर्थं उन्तर विदवेदवर ने दिया है। उनका कदना दहे कि कान्यल्िगि मेँ उपनिवदध होने वाला 
हेतु भले दी वास्तविक हो, किन्तु यद्‌ नहीं कदा जा सकता कि वद कविम्रतिमाप्रसूत नीं है। 
हेतुरूप से दिया गया पदार्थं मले दही लाकसिद्ध हो, किन्तु उसको वस्तुविेष या परिणाम- 
विद्वेष कै प्रति दे सिद्ध करने का कायं एकमात्र प्रतिभाजन्य दी होता हे । विद्छेखवर का कथन 
मान्य है । नीलकण्ठदीक्षितने मी कदा दं-- 

ध्यानेव शब्दान्‌ वयमाल्पामो यानेव चार्थान्‌ वयस॒ुद्लिखामः । 

तेरेव विन्यास्तविशेषभव्येः संवेदयन्ते कवयो यच्चांसि ॥ 


^ # 


(कवि के शब्द ओर अथं नए नदीं दाते, हमारे अभूत दी होते हे, किन्तु उनकी योजना, 
उनका विन्यास उसका अपना होता है [ शिवलीलाणैव ]। 

सच यद है कि अनुमान का अनुमान, अलुमानरूप में दिखाई देता है जव कि काभ्यछ्गि 
का नदीं इसील्णि याँ चमत्कार देतसिद्धि मेँ दँ ओर अनुमान मेँ अनुमानप्रक्रिया कै प्रस्तुती 
करण मेँ। हेतु अनुमान काश्क अग होतादहेन किं अनुमान का समय दारीर । कान्यल्गितें 
वाक्या्थया पदाथ को हेतु वतना चमत्कार का कारण होता है जव कि अनुमान मे किसी साध्य 
की सिद्धि। इसीख्ि दोनों भटका की संज्ा्पे भिन्नदें। इस्त प्रकार कान्यलिङ्ग अनुमान से 
टीक उसी प्रकार भिन्न है लिक प्रकार भावध्वनि रसध्वनि से। यह तथ्य अनुमान कै प्रकरण 
मे जौरमी स्पष्टदहो जाएगा । 

क!ष्यलिङ्गः का इतिहदास- 

काव्यलिङ्गं के इतिदास मे आचार्यौ के तीन वगं भिल्ते है [१] रुद्र कै पूवेवत्तीं आचारय 
{२} रुद्रट तथा{ ३] रुद्रट के परवता आचायं। 

[ १] प्रथम वग मं दण्डी मामद्‌ ओर उद्धट आते दे । दण्डी ओर भामह मे परस्पर विरोध 
दै, उद्धर समन्वयवादी ह । दण्डी ने हतु"-नामक अलंकार का विस्तृत विवेचन कर॒ उस आने 
वले कारणोंकेदो वग वनाएये कारक ओर ज्ञापक) 

हेतुश्च सूक्ष्मलेशौ च वाचाुत्तमभूषणोौ। 

कारकज्ञापकौ हत्‌ तौ चनेकविधौ ००॥ २।२३५॥ 
कारक + उदादरण- 

अयमान्दोकित-प्रौढ-चन्दन-दुम-पर्लवः । 

उत्पादयत्ति सवस्य प्रीति मलयमारुतः ॥' 


(चन्दनवृक्ष के प्रोढ पवां को हिला रहा यह मल्यम।रत सबको भच्छाल्ग रहा ह | 
यहा प्रीति की उत्पत्ति कै प्रति मल्य॒मारत को दिया गया भन्दोलिति० इत्यादि विदेषण 
कारणदहै। 
जापक हेतु -"भवध्यैरिन्दुपादानामक्ताध्येद्चन्द नाम्भसाम्‌ । 
देहोष्मभिः सुबोधं ते सचि कामातुरं मनः ॥ 
- दे सखि! चनद्रमरीचियों से शान्त न होने वाली ओर,.चन्दनरससे मी असाध्य 
देदोष्मा से तुम्हारा मन छख से कामावुर प्रतीत हो जाता हे ।' 


काग्यलिङ्गालङ्ारः ९५७९५ 


यहो देहोष्मा साधन है ओर कामातुरता साध्य । हेवदेठमद्माव मी देहोष्मा की ठतीया- 
विभक्ति दारा शब्दतः कथित हे । इस प्रकार स्पष्टदैकिप्रथमकाहेतु कान्यकलिगि कहा जा सकता 
है ओर दितीय अनुमान । यद्यपि काव्यल्गिके साथ-साथ प्रथमदहेतु को परिकर मी कहना 
सरल है । 
भामह = ने दण्डी के इस पक्ष का स्पष्ट खण्डन किया ओर कहा--्ेतु के उदाहरणों मे को 
वेचित्रय नहीं रहता । यद तो उक्तिमात्र है, उसे अल्कार नदीं कदा जा सकता 
देतुरच सुक्ष्म लेशोऽथ नालकारतया मताः । 
सस॒दायाभिधानस्य वक्रोक्तयनभिधानतः ॥› २।८५ ॥ 
दण्डी ने- 
'गतोऽस्तमकां भातीन्दुर्यान्ति वासाय पक्षिणः। 
इतीदमपि साध्वेव कालावस्थानिवेदनेः॥ २।२४४ ॥ 
कदकर "सूये इव गया, चन्द्रमा चमक रहा है, पक्षी षोसलों की ओर जा रहे है रेते 
वाक्यो मं मी सन्ध्याकाल कौ सूचना होने से हेत्वलंकार माना था। मामहे स्पष्ट कहा- 
'गतोऽस्तमकां मातीन्दुर्यान्ति वासाय पक्षिणः, 
इत्येवमादि किं कान्य वार्तामेतां प्रचक्षतेः॥ २।८६ ॥ 
“सूयं द्व गया, चन्द्रमा चमक रहा है, पक्षी धासो की ओर जा रहे है"-इत्यादि वाक्य कैसे 
कान्य ? इन्दे तो बात भर कहतेहेः।' 
इस प्रकार भामह ने ज्ञापकमात्र का खण्डन किया, कारक का नद्यं । किन्तु अमान्य घोषित 
कर दिया पूरे हेतु को । इसी के साथ उन्दने अनुमान नामक कोई अलंकार नहीं माना । 


उद्धट- ने इसके विरुड ज्ञापक दहेतु को ही अलरुकार मानने का सास किया वे कारका पर 

तो चुप रहे किन्तु देतु के ज्ञापकांशा को उन्दोने अलंकार माना ओौर काव्यलिङ्ग नाम दिया- 
श्रुतमेक यदन्युत्र स्म्रतेरनुभवस्य वा। 
हेतुतां प्रतिपद्येत काव्यलिङ्गं तदुच्यते ॥ ६।७॥ 

इस पर लघुवृत्तिकार ने लिखा- 

धयत्र एर्‌, वस्तु श्रुतं सद्‌. वस्त्वन्तरं स्मारयति अनुभावयति वा तत्र काव्यलिङ्गनामालुकारः । 
पक्षधम॑त्वान्वयव्यतिरेकानुसरणगमतया यथा तार्विकम्रसिद्धा हेतवो लोकप्रसिद्धवस्तुविषयत्वेन 
व्रैरस्यमावईन्ति न तथा काव्यहेतुः; अतिशयेन सर्वषां जनानां योऽसौ हदयरुवादी सरसः पदाथ. 
स्तन्निष्ठतया उपनिवध्यमानत्वात्‌ । अतः काव्यलिततेमिति कान्यय्रहणमुपात्तम्‌। न खल तच्छास्र- 
लिङ्गं किं तहि काव्यलिङ्गमिति कान्यग्रहणेन प्रतिपाद्यते | 

[ का० ] जहां खनी गड प्क वस्तु अन्य वस्तु कौ स्छृतिया उसका अनुभव करने मेँ हेतु 
बनती है उते कान्यलिङ्ग कते हें । 

[ वृत्ति | [ आश्रय | जर्हा खनी गई एक वस्तु अन्य किसी वस्तु का स्मरण या अनुभव कराती 
है उसे काव्यकल्गि नामक अलंकार कहते दे । यहाँ पक्षधमेता, अन्वय, व्यतिरेक आदि अनुमान 
सामयी तो रहती है किन्तु उसमे वेसी नीरसता नदीं रहती जेसी तकशा मे रहती है। इसका 
कारण है काव्यगत पदार्थौ कौ सरसता । इसीलिए काव्यशञब्द का प्रयोग किया गया है । 

इस प्रतिपादन से स्पष्टहे कि उद्धय्ने काव्यल्गि नाम से ज्ञापकदेतुमूलक अनुमान कोह 
अलंकार मान। है । अनुमान नाम से उद्धट मेँ कोई भलंकार नहीं मिलता । 


३५ अ० स० 


. केलिए काव्याय छब्द का प्रयोग किया 


पदै अदङ्कारसवस्वम्‌ 


इस प्रक्रार दण्डीने देतु के दोनों अशोको अकार माना, भामह ने दोनों को अनल्कार 
ञओर उद्धयने ज्ञापकांडा को अल्कार तथा कारका को अनलंकार ! शस प्रकार उद्धट के मत मं 
हेत॒भूलक अल्कार अलकरार तो हदं किन्तु केवल ज्ञापकांश मेही ओर उप्तकाभी नामदेतु"न 
होकर काव्यच्गिदै, साथी नाम काव्यल्िग होने पर भी वह अनुमनस्वरूप दे स्वतन्त्र नदहीं। 
फलतः दण्डा के मत मँ जदं काव्यछ्गि ओर अनुमान दोनों कामानाजाना संमव द वह 
उद्भट के मत में केवर अनुमि का हा । उद्भट द्वारा उदाहरण ते यह्‌ तथ्य ओर मी स्पष्ट ३-- 
'छायेयं तव चषा ङ्कान्तेः किञ्चिद नुज्ज्वला । 
विभूषावटनदेान्‌ दशैयन्ती दुनोति माम्‌ ॥' 
ुन्हारे अन्य अंगों कौ कान्तिमते कु म्नि यद्‌ कान्ति माभूषग पहनने योग्य स्थान 
दिखला रदी ओर सले दुःखी कर रही दै)" 
उदाहरण की अभिव्यक्ति अपने आप ते भस्पष्ट है, किन्तु हसते यह तथ्य स्पष्ट हो जाता दहै 
कि अन्य अर्गोकी कान्तिसे कण्ठ आदि कौ कान्ति म्नि दै । इससे लगता किं इन अंगो में 
भूषणसंयोग बहुत दिर्ना पे द्या हे । इस प्रकार है वह अनुमान. दही। इस प्रकार उद्धटने अनुमान 
हे । 
उप्यक्त सामग्री से यदमी स्पष्टदै कि प्रथम वर्म के आचार्या में अल्कार का नाम श्तु या 
शगः ही अधिक मान्य था अनुमान नदीं । 
शृद्रट [२] दवितीय वर्मे केवल रुद्रः अति हें । इन्दानि दण्डी कै ही समान देतु कै 
दोना अंशौ शो भलक्रार मान च्या दै विन्तु उते नाम अनुमान दिया है ¦ उनका विवेचन 
इस प्रकार दै- 
"वस्तु परोक्षं यरिमिन्‌ साध्यमुपन्यस्य साधकं तस्य । 
पुनरन्यदुपन्यस्येद्‌ विपरीतं चेतद्पमानम्‌ ॥› ७1५६ ॥ 
--^्परोह्ल वस्तु साध्यरूप मं उपस्थित कर उसके किए साधक मौ उपस्थित करे अथवा इसके 
विषरोत साधक उपस्थित कर साध्य करो उपस्थित करे तो अलङ्कार का नाम अनुमानदहोता दै," 
उद्‌हुरण- 
वचनयुपचारगभं दूरादुदगमनमास्तनं सकलम्‌ । 
इदमय मयि तथाते यथासि नूनं प्रिये कुपिता" ॥ | 
--प्प्रिये भोपवरिक वातचीत दूरके ठ खड़े होना, दूर दी बैठना यह सव्र भेर 
प्रति ऊुछ एेसा १ {4 जित्तसे लगता है तुम सञ्च पर युस्सा हो ।' 
यह ठीक अनुमान का उदाहरण हे । इसके अतिरिक्त ख्रटनेजो दूसरा हेतु दिवा है वह 
कान्यछिग का विषय माना जा सकता है । वह यह है- 
यत्र वलीयः कारणमारक्यामूतमेव भूतमिपि । 
भावीति वा तथान्यत्‌ कथ्येत तदन्धृद्नुमानम्‌ ॥' 
जहा बलवत्तर कारण देखकर न मी हए कायें को हो चुका या दोन वाला बतलाना 
दूसरा अनुमान हाता हे । उदाहरण-- 


अविरलविलोलजलदः कुटजाञ्जुननी पसुरभिवनवातः । 
अयमायातः कालो इन्त मृताः पथिकगेहिन्यः ॥' 


या पा पा वा 0 = र र हि 


काव्य्धिङ्गालङ्कारः ५५७७ 


शने पहराते वादः; करेया, कोदा। गौर कदम्ब से सुगन्धित वनवात छि यद समय 
[ प्राब्ृद्‌ | आ गया । हन्त ! पथिक सियाँ मरी । 

- यहां कायंकारणभाव स्पष्ट है। उदीपन सामयी वियुक्तस्त्युका कारक कारण रहै, ज्ञापक 
नहीं । अतः इसे परवर्ती चायो कौ मान्यता के अनुसार कान्यलिङ्ग कहा जा सकता है । स्वयं 
रुद्र ने काव्यलिग नाम से कोड मी अल्कार नदीं बतलाया है । | 

श्स प्रकार अल्कार के नामकरण की इष्टिसे उक्त आचार्यो के दो वम बन जाते है-- 
एक देठुवादी ओर दूसरा अनुमानवादी । प्रथम मे दण्डी जर उद्भट आत्त है ओर दूसरे में 
केवल रुद्रट। 


मम्मट = मम्मट कारण के दोना अंशो को अल्ग अल्गकरदेतेहैं। वे कारका को काव्य- 
लिगि नाम से एक स्वतन्त्र अलंकार मान्ते हैँ ओर छापकां को अनुमान नाम से स्वतन्त्र | 
उनके लक्षण इस प्रकार है- 


काव्यलिङ्गम्‌ देतोवाक्यपदार्थ॑ताः 


काव्यलिङ्गं नाम अल्कार को तव मिल्तादहैजव हेतु वाक्यार्थकूप होता है या पदा्ैरूप। 
उदाहरण-- 

'वपुःप्रादुभावादलुमितमिदं जन्मनि पुरा 

पुरारेन प्रायः कचिदपि भवन्तं प्रणतवान्‌ । 
नमन्‌ सक्तः संप्रत्यहमतनुरमरेऽप्यनत्तिमान्‌ 
महेश ! क्षन्तव्यं तदिदमपराधदयमपि ॥ 
--े प्रभो शिव ! शरीर मिला इसपते यह अनुमान हृभा कि पूर्वजन्म मँ मेने आपको प्रायः 
कमी मी प्रणाम नहीं किया, ओर अमी जो प्रणाम कर हा हँ उससे सञ्च आगे शरीर भिरेगा नहीं, 
अतः तव भी प्रणाम न कर पाग । भगवन्‌ आपमेरे ये दोनों अपर।(ध क्षमा करें । 
इस प्रत्न मे अपराध के प्रति प्रणामाभावको कारण बतलाया गया है। प्रणामामाव 
प्रथम तीन चरणों द्वारा वत्तलाया गया है अतः वह वाक्या्थूप है । वाक्यार्थगत अनेकता का 
उदाहरण मम्मट ने नदीं दिया । सक्स्वकार ने वह भी दिया है । मम्भटने पदाथंगत एकत्वे ओर 
अनेकत्व के लिए अवदयदहीदो एथक्‌ उदाहरण दिएदहे। वे सवेस्व के उदाहरणं से गतार्थं हैं । 
अनुमान का विवेचन मम्मटने इस प्रकार किया है- 
अञुमानं तदुक्त यत्‌ खाध्यसाधनयोवं चः + 

जिसमें साध्य ओर साधन का शब्दतः कथन हो वह अनुमान । उनका उदाहरण सर्द॑स्वकार 
ने अनुमान प्रकरण म उद्धृत कर दिय है--प्यत्रेता लदसी० । वह्‌ शुद्रट के वचनयुपचार गर्म 
प्य से गतां हे । सवस्वकरार ने मम्मट का ही अनुस्तरण किया है । रत्नाकरकार ने मी अनुगमन 
तो मम्मट काही रिया किन्तु नामकरण में उन्दने कान्यलिङ्ग के लिए देवपक्ष का अनुगमन किया 
ओर दण्डी क ही समान उते हेतु कदा । उनका लक्षण इसी प्रकार के आरम्भ मँ दिया जा चुका हे । 
विमरिनीकार ने पुनः रद्रयपक्ष को ही प्रबल प्रतिपादित क्षिया । वे रत्नाकर, सर्वैस्व ओर मम्मर 
य प्रति वेमुलाहिजे षहो गए । | 
डुवलयानन्द, रसगंगाधर ओए अलकारकोस्तुम मेँ दीक्षितजी, पण्डितराज ओर विद्वेश्वर- 


पण्डित ने अनु्तरण मम्मट के ही मध्यमागे का किया, किन्तु वे पूरववत्त आचार्यो दी अरुचियां 
भी भुला नहीं सके । इनका विवेचन इस प्रकार है- 


© 
८७८ अलड्ारसरवेस्वम्‌ 


अप्पय्यदौङडित-- 'समर्थनीयस्याथंस्य कान्यलिङ्गं समथनम्‌ । 

जितोऽसि मन्द कन्दपं मच्िचत्तेऽस्ति चिलोचनः ॥` 

(म्थनीय अथं का समर्थन काव्यलिङ्गं कदकाता हे । यथा--*अरे नीचे काम ! मेने तसे जीत 
छया मेरे चित्त मे त्रिलोचन [ शिव ] का वास हे।? दिव ने काम को तीस्सरे नेत्र से भस्म किया था। 
हिव का वासर बतलखाकर कामविजय का समर्थन किया, किन्तु दीक्षित जी का क्षण अान्तरन्यास 
ते अलग नदीं किया जा सकता । पण्डितरान ने उन्हे यद्यी कहकर स्कञ्लोरा भी है) एक लम्बे 
प्रकरण के द्वारा दीक्षित जी ने अनेक प्रसिद्ध उदाहरण, मी प्रस्तुत किए ओर यह्‌ भी स्पष्ट 
ङ्िखा किं प्राचीन आचाय काव्यल्गि के साथ दी हेतः मी कते हदं कान्यलिज्गमितिः 
हेत्वलंकार इति व्याजः 1 परिकारंकार से इसका अन्तर मी दीक्षित जी ने वड़े संरम्भके 
साथ बतलाया हे । 

पण्डतराज-“अनुमितिकर णत्वेन सामान्यविङ्ञेषभावाभ्यां चानालिङ्गितः प्रकृताथांपपादकत्वेन 
-चालिद्गितोऽथैः कान्यलिङ्गम्‌ ।' 

---अनुमितिकरणत्व तथा दो प्रकार के सामान्यविदोषभाव से रहित जो प्रकृतार्थं के समर्थक 
के रूप विवक्षित अर्थं॑वह कान्यलिङ्ग कदलाता हे ।› इसमे पण्डितराज के दौ कथन के अनुसार 
प्रथम विद्धेषण अनुमिति के निवारण के लिए तथा द्वितीय विशेषण अथान्तरन्यास्त के निवारण 
के किए दिया गया ै। अनुमान का लक्षण पण्डितराज ने केवल-- 

'अनुमितिकरणत्वमनुमानम्‌ः-- 
'अनुमितिकरणता अनुमान 

इतना ही कियाद 

पण्डितराज ने भ्यत्‌ त्वन्नेत्र ०? तथा भ्मृग्यश्च ० पद्य मे काव्यलिङ्गका निराकरण कर अनुमान 
को दी अलंकार स्वीकार किया है सवेस्वकार के दी समान अप्पय्यदौक्ितने भी उक्त दोनो 

पर्ययो म 'काव्यलिगः स्वीकार किया था 1 पण्डितराजने इ्नदोर्नो का खण्डन किया है। सर्वस्व 


के--ध्यत्‌ त्वन्नेतर° ००० हेतुत्वेनोक्तं [ रसगंगाधर मेँ "दृतुरुत्तः' ] ° इतना उद्धरण देकर उन्होने 
कहा ह--इत्यलंकार लवेस्वक्रतोक्तम्‌ , अनुमोदितं च कुवलयानन्दक्रता तदुमयमप्यसतत्‌ । ००० (अयुं 
चानुमानस्येव विषयः । 


इन दोनों का कथन गलत है । ०० यह्‌ भी अनुमानकादही विषयदे। एक एक कर दोनों 
पर्या से अनुमान प्रकार भी इन्दोने इस प्रकार दिएदहे- 

१= देवं नायिकाङ्गसाद्ररयदशंनजन्यमदिष्टखास्दिष्णु तनत्तन्नायिकाङ्गसाद याधार विघटकत्वात्‌ 
मदीयराद्ुभूतयज्ञदत्तादिवत्‌? । 

“विधाता नायिका कै अंगों के सादृदय से उत्पन्न मैरे सुख का भसदिष्णुहे, क्योकि वहु 
नायिका कै टन उन अंगों के साद्ृदय का नाद्चक है जैसे मेरा शत्रु यज्ञदत्त ।' 


२--मृग्यो दक्षिणानिलसम्पक॑वत्यो दक्षिणाभियुखविलक्षणनेत्रन्यापारवत्वात्‌? । 

"मृगि दक्षिणानिल के सपव से युक्त थीं क्योकि वे दक्षिण की ओर नेर्चोँका विलक्षण व्यापार 
कर रद्टी थीः । पण्डितराज का यह्‌ भ्रम केवल तथ्य को लेकर है । वह यह कि यदं देतुदेठुमद्भाव्‌ 
कविनिष्ठ न होकर कविनिवद्ध ववतृनिष्ठ है । यद्यपि रेसा लगता है कि द्वितीय पच का संदभं 
उन्हे विदित नीं ह । वे नहीं जानते कि यद प्च रधुवंश का है। वर्ह दक्षिणानिल का कोड 
प्रसंग ही नदीं है । सच यद है कि इन पथाँ मे अनुमिति कविनिष्ठ न होने पर मौ अनुमिति रूप 


अच॒मानालङ्नारः ५७९ 


से प्रस्तुत नदीं है क्योकि दोनो ही स्थर्लो मेँ अनुमान परार्थानुमान नदीं है। यद तो स्मरणमात्र 
हे। श्सके अतिरिक्त प्रथम मे अनुमिति सवंधा गम्यही दहै ओर द्वितीय मे 'सम्बोधन्‌ः- द्वारा 
वाच्यप्राय होने पर भी हैतदेव॒मद्भाव वाच्य नदीं हे, क्योकि सम्बोधन का हेतु दक्षिण की ओर 


वि धुमाना हौ हे । उसका देतत्व तव साक्षात्‌ व।च्य होता जव कहा जाता गिरयो के दक्षिणाभि- 
खख धूम रहे नेत्र जतला रहेथे कि तुम्हं राक्षस श्सी दिशामेंकले गया है।' इसी कारण नने 


ने पण्डितराज का खण्डन किया हे। उर्ोने क्लि है अनुभितिगम्य भी हो भौर तव मी यदि 
अनुमान हौ अल्कार माना जाने ल्गे तो काव्यलिद्ग कहीं होगा ही नहीं । स्थिति यह हे कि 
वाच्य अनुमान अनुमनाल्कार कहलाते ओर गम्य कान्यलिन्ग' । [ द्र० रसगंगाधर मम॑प्रकाश्च 
काग्यकल्गि का अन्त || 

पण्डितराज ने देतु के वाक्यगत ओर पदगत होने तथा एक या अनेक होने को भी चमत्कार 
की दृष्टि से निरथंक मानाहे। 

विश्वेश्वर का काव्यलिङ्गनिरूपण यह है-- 

(वास्यपदाथत्वाभ्यां हेतूक्तिः कान्य लिङ्गं स्यात्‌ ।' देतु की वाक्य भौर पदाथ के रूप मे उक्ति 
कान्य ल्ग कहलाती है । 

काव्यलिङ्क का परिकर से भेद- 

विशेषणगत चमत्कार परिकर मं भौ रहता दहै ओर काव्यल्गि मे मौ। पदार्थं काव्यल्गि में 
देत॒॒विश्ेषणरूप से आता है यद्यपि उसका हेतुत्व गम्य रहता है । श्स प्रकार पदाथकान्यलिङ्ग 
ओर परिकर की स्थिति मेँ अन्तर करना मी एक प्ररन है । इते प्रथमतः रत्नाकरकार ने उठाया 
है । उन्दने अन्तर स्पष्ट करते हर ल्खिादहै- 

तवाच्योपस्कारकता व्यंग्यस्य सदेव परिकरे ज्ञेया । 
ग्यङग्यारिलष्टो वाच्यो वाच्यं प्रत्येव हैतुरित्तिः॥ 

(परिकर मे व्यंग्याथं वाच्याथं का उपस्कारक रहता है जव किहेतुमे व्यंम्या्थं से युक्त होकर 
वाच्य वाच्य के प्रति देतु वनता हः । इसीका स्पष्टीकरण पण्डितराज ने इस प्रकार किया &- 
हित्वंकार में व्यंग्याथं का कोई मद्व नदीं रहता, वह निरर्थक रहता हे, जव कि परिकरमें 
वह प्रकृत अथं मेँ शोभा भौ बढाता है गौर कभी कमी उसकी सिद्धिका मी कारण बनता ह ।' 
[ ० रसगंगाधर परिकरप्रकरण० | पण्डितराज ने परिकर ौर कान्यङ्िगिके जो उदाहरण दिषएहै 
उने य तथ्य स्पष्टे कि परिकर के विशेषणो म हेतुत्व नदीं रहता जव कि पदार्थकाव्यलिङ्ग 
म वही रहता हे । 

यहाँ श्री विदाचक्रवत्तीं की संग्रहुकारिका यह है- 

(काव्यलिङ्गं तु देतुत्वेनोक्तिर्वाक्यपदार्थयोः। 
नायमर्थान्तरन्यासो हेतोः राब्दत्वसंश्रयात्‌ ॥ 

काव्यलिङ्ग वाक्याथ या पदाथं कौ हेतुलूप से उक्ति को कहते है । यह अर्थान्तरन्यास नदीं है, 
क्योकि इसमे हेतु राब्दतः कथित रहता है । 


[ स्स्व | 
[ घ ५९ | साध्यसाधननिर्दैशोऽनमानम्‌ । 
यत्र दाब्दरत्तेन पश्चधमान्वयञ्यतिरेकवत्‌ साधन साध्यधरतीतये निदि 
श्यते, सोऽजुमानाटंकारः । विच्छित्तिविरोषश्चाबार्थाद्‌{्रयणीयः, अन्पथां 
तकीुमानात्‌ किं वैलक्षण्यम्‌ । 


८५९५० अल्ङ्ारसवेस्वम्‌ 


उदाहरणम्‌-- 
यथा रन्धं व्योम्नश्लजलद्‌धूमः स्थगयति 
स्फुःलििद्धानां रूपं दधति च यथा कीटमणयः | 
यथा विद्॒ञ्ञवालोज्ज्वठनपरिपिङ्गाश्च.कङभ- 
स्तथा मन्ये छग्नः पथिकतरूषण्डे स्मरदवः | 


अन्न धूमस्पुलिङ्गकपिखदिक्त्वानि वहिलिज्ञानि चिरूपत्वादवद्व्दभ्रवि 
पादितं विं गमयन्तीत्यनुमानम्‌ । रूपकमूल्स्वेनाट कासन्तरगर्भीकारेण 
विच्छिच्याञ्नयणात्तकोुमानवेदष्चष्यम्‌ । 
कच्चित्तं शुडमपि भवति । यथा-- 
यैवा छदसेच खच ल्र शो उ्यापास्यन्ति श्चं | 
यन्तेव पतन्ति संततममी भमस्पृश्लो मागेणाः। | 
तच्चत्रीर तचापमञ्जितद्यरपरद्त्करः ऋोधनो 
घबत्यश्रत पच छाक्सनधरः सव्यं सदासाः स्वरः 1 
अश्न योषितां खष्यापारेण मार्मणपतनं स्मस्पुयोगाधित्वे साध्येऽनकछृत- 
मेव साधनमिति शुद्धमचमानम्‌ । भोटोक्तिमाच्ननिष्पन्नाथेनिष्टस्वेन च विरि | 
त्िविलेषाश्रयणाचचाशख्व्वम्‌ । | 
अयमन्न पिण्डाशैः- इडास्ति प्रव्याय्यप्रत्यायकभावः | यस्ति च समथ्य- 
समथेकभः!वः । तज्राप्रतीतघ्रस्यायन्नै प्रव्याय्यथत्यष्य्यकमएवः। परतीतप्रत्यायने 
त॒ समथ्यंसमथेकमावः । तच्च प्रव्याय्य प्रत्याय कभावेऽ चमानम्‌। समथ्यसम्थ- 
कभावे त॒ यज पदार्थो देतुस्तञ् देतुत्वेनोपाद्‌ानै "नागेन्द्र दस्तास्त्वचि क्वः. 
द्रात्वात्‌' इत्यन्न न कथिदटंकारः । यन्न तूपात्तस्य हेतुत्वं यथोद्ाहते विषये | 
शग्यश्च दाङ्करनिन्यपेक्ता' इत्यादौ तैकं काव्यलिङ्गम्‌ । य॑त्र तु वाक्यार्थो 
देतस्तश्न हेतुत्वपरतिपादकमन्तरेण देतुत्वायोपन्यासे काव्यलिङ्गमेव । तड- 


स्थत्वेनो पन्यस्तस्य तु देतुत्वेऽथौन्तरन्यास्ः । एवं चास्यां धक्रियायां कायंका- 
रणवाद्याथैयोद तुत्वे काव्यलिङ्गमेव पयंवस्यति, समथ्यंवाकंयाथस्य सपि 
त्वात्‌, वाटस्थ्याभावात्‌ । ततश्च सामान्यविशेषभाबोऽयान्तरन्याखस्य 
विषयः। यत्पुनरथमन्तरन्याखस्य कायक्रास्णगतस्वेन खमथेकत्वयुक्तभ्‌ , 
तदुक्तठश्चणं कान्यटिशज्गमनाधित्य तद्धिषयत्वेन छश्चणान्तर्स्योद्धटेराधि 

| तत्वात्‌ 
| उक्तदक्षणाश्रयणे तु यच्वन्नैतेव्यादिर्विविक्तो विषयः कन्यछिहस्याथां 
न्तरन्यासराद्‌ दशित इति कार्यकारणयोः खमथ्यंसमथेकस्वमयान्तरन्यासे पूवं 
दद्वितमितीयं गमनिकाश्चयितग्या । 
पवं तकन्यायत्रूकमटटंकारद्वयमिह भरतिपादितम्‌ । 


अनुमानालललज्ारः ५५८६९ 


[ सृ० ५९ | साध्य को सिद्धिके किद्‌ साधन का निर्देश [ हयो तो अलंकार ] अनुमान 


[ कषहखाता हे | ॥ 

[ द° ] जिसमे साधन शब्दड्कत्ति [ अभिधा ] दारा पक्ष [ साध्यस्सिदधिस्थल ] मेँ रहता इमा, 
[ साध्य के साथ ] अन्वय तथा व्यत्तिरेकस्े युक्त तथा साध्य की प्रतीति कराता हआ कथित हो; 
वह अनुमानारंकार होता हं ¦ [ अलंकारत्व के छि९ अपेक्षित ] चमत्कार इसमें ऊपरसे लाना 


पढ़ता हे, नदीं तो तकलाख्लीय अनुमान से [ इस अनुमान का ] अन्तर हौ क्या रहे । उदाहरण-- 


(क्योकि घूमते मेधां के धूमने आकाश्रूपी रन्ध [ गुफा]को भर दिया है, क्योकि जुगनू 
चिनगारिर्यो कारूप धारणकर रहे दहै ओर क्योकि विजलीरूपी लपे के धधक उठने से दिशा 


पीली पड़ गईं हे, सकि मं समाता ह्रं 'पथिकरूपी वृक्ष सञ्ुदाय में काम को देवार र्ग गहं है" । 


यहां धूम, चिनगारी नोर दिज्ार्जो का पीलापन आदि अचि के लिङ्ग है क्योकि ये विरूप [पक्- 
वृत्ति, अन्वय अथात्‌ सपक्षदृत्ति ओर व्यतिरेकी अर्थात्‌ विपक्षावृत्ति ] है। ये दवदञब्द से कथित 
अग्निका [ रूपी साध्य | का अनुमान कराते है, इस कारण यदौ अनुमान है । यह क्योकि रूपकं 
मूलक हे, अतः अन्य अलंकार को लेकर होने से इसमें चमत्कार चला भता हे, अतः इसमे तकानु- 
मानसे मेद हं । कीं यह शुध [ अल्कारान्तर रदित ] भी होता है यथा- 

(तरंगा के समान चंचल चित्ततन वाली ये जिधर अपनी भौहघुमातीहै उधरदहीजोये मभै- 
स्पशं बाण लगातार च्ड्ने लगते हँ, इसते स्पष्ट है पि इनकी आज्ञा धारण कर काम क्रोधमें 
आकर धनु१ खीचते भोर उस पर चदे बाणपर्‌ हाथ सापे हुए इनके गगे-आने सदा हौ दौडता 
रहता हे ।" 

यहं लियो के शुकुटिचालन से वतलाई जा रही बाणवर्षं काम के अगे.जगे चलने रूपी 
साध्य कौ सिद्धिम बिना किसी अन्य अल्कार वैः योग के ही साधन है। अतः यह अनुमान शुद्ध 
[ अलकारान्तररदित | हे 1 यह [ अनुमान कवि की ] प्रोढौक्तिमात्र से निष्पन्न अर्थं पर निर्भर 
होने के कारण विद्िष्ट चमत्कार से युक्त हे, अ: इसमें सुन्दरता है । 

यां निष्कं यह है कि यहां [ काव्यमे एकतो] ज्ञाप्यश्चापकमाव रहता है ओर [ दूसरा ] 
मथ्य॑समथंकमाव । इनमे से ज्ञाप्यज्ञापकमाव वहाँ द्योता है जा अज्ञात अथंका लान कराया 
जाता हं । श्सके विरुद्ध समथ्यंसमथंकमाव वँ होता है जहां श्चात अंका ज्ञान कराया जात, 
हे । इनमं से ज्ञाप्य्ञापकभाव होने पर॒ अनुमान होता है। समर््यसमथेकमभाव सें जहां हेतुपदाथै 
दोता दै वीं यदि वह हैुरूपसे कथित रहता है [ जँ उसका हेतुत्व कथित रहता है ] तो 
(न गिन्दहस्तारत्वचि ककरात्वात्‌-' [ कुमार० १ ]--द्दाथी की सूंड त्वचा-माग मे ककं होने से 
[ पावती के ऊरू का उपमानन बन सकी ] आदिमे कों अलंकार नदीं होता; किन्तु श्रग्यश्च 
दभौकुरनिन्वधेक्षाःः आदि पूवे उदाहृत स्थलों मे जँ वह शब्दतः कथित होकर [ व्यजनया ] 
देत बनता है [ अथात्‌ उसक्रा हेतुत्व व्यंग्य रहता है ] वयँ एक प्रकार का काव्यलिङ्गालङ्कार कह- 
लता हं । जहां हेतुवाक्याथ सरूप होता है वहाँ हेतुत्व फे प्रतिपादक रब्द के विना हेतुत्व कै किणि 
उसका प्रयोग होने पर कान्यल्गि ही होगा ओर उस [ हैत॒त्व ] कै बिना साधारणरूप से प्रयोग 
होने पर अथान्तरन्यासर । इस प्रकार [ विचार कौ ] यह प्रक्रिया अपनाने पर कायं ओर कारण स) 
वात्रयारथो मे हेतुत्व रहने पर कान्यल्मि हौ [ मलंकार ] ठहरता है 1 वर्योकि सम्य वाक्याथैसापेश्ष 
रहता है जतः यों [ दोना वा्रयार्थ मेँ ] तरस्थता नदीं रहती । इस प्रकार अर्थान्तरन्यास का 
विषय [ केवल | प्तामान्यविरोषमाव तके सीमिते ठहरता है । [ सूत्रकार फे अनु्तार हमने ] 
अर्थान्तरन्याप्त मे कायकारणमाव के आधार परभीजो समथंकता बतला है वद इस वारण कि 


५५५२ अल्ङ्कारसवेस्वम्‌ 


उद्धटमतानुयायिर्यो ने उक्त [ कार्यकार णमावमूलक ] काव्यल्गि को छोडकर [ कान्यल्गि नाम के 
साथ एक ] दूसरा ही लक्षण वनाया था [ जो ज्ञाप्य-ज्ञापक-मावमूलक था ] ओर उपे उन्दने उसी 
[ काव्यछ्गि ] का लक्षण वतलाय{था [जवकरिथा वह लक्षण अनुमान का; इस प्रकार उनके मत 
मे का्यंकारणमावमृलक कान्यकिग का संग्रह नहीं हो पाया था, फलतः उसके संग्रहके किए हम 
रोगो ने अर्थान्तरन्यासमे का्यकारणमावका भी निवेदाकिया ओर दोनों को अभिन्न बतलाया 
किन्तु काव्यल्गि का] उक्त [ कार्यकारणमावमूकक ] लक्षण अपना लिया जाता है तो अर्थान्तर. 
न्यास से, कान्यल्िग, यतु त्वन्नेत्र ° आदि स्थरं मं एक स्वतन्त्र ही अल्कार सिद्धो जता दहै 
जिसका निरूपण किया जा चुका है । यह पथ इसलिए भपनाना चादिए किं अथान्तरन्यास कै प्रक 
| रण मे कायकारण क। समर्थ्य॑समर्थकभाव पहले वतला दिया था 1 


इस प्रकार तकन्यायमूलक दोनों अल्कार वतला दिए गए । 
| विमरिनी 
साध्येत्यादि । एतदेव भ्याचष्टे- यत्रेत्यादिना । एवं चाचत्र स्लाध्यप्रतीतये त्रिरूपस्य 
साधनस्य निर्ददात्तर्काजुमानसमानकचयमेवास्य रखणमिति मावः । ययेवं तत्ततोऽस्य | 
को विशेष हइस्याश्ङृथाह--विच्छन्तीत्यादि । तच्वानुमानं द्विधा । वाथ पराथ च । तत्र 
स्वार्थ॑यत्र मयायमवगतोऽ्थं इति स्वपरामशंश्य निश्चयः स्यात्‌ । पराथ तु यत्र परेणा- 
नवगतस्य वस्तुनः प्रति पादनास्परग्रस्यायकववं स्यात्‌ । एवं च स्वाथ परार्थमेदेन दिविधमनु- 
मानमेवेकोऽटंकारो वाच्यो न पुनरनुमानटहेतुतया प्रथगलंकारष्वम्‌ । उभयत्रापि सामा 
न्यरुङणनुगमास्रङरप्रकारिभावस्यैवो पपत्तेः । तच्र स्वार्थानुमानं यथा अन्थक्ृतेवो- 
दाहृतम्‌ । तच्र हि स्मरदबो रग्न इति स्वपरामर्शंस्येव निश्चयः । पराथानुमानं चथा-- 
(तदस्ति तेषां तमसि प्रसर्पणं निश्ाचरत्वं यदि पारमार्थिकम्‌ । 
ततः प्रिये खनिहितेऽत्र वासरे कथलजु तध्संचरणं भविष्यति ॥ 
अचर दिवासेचरणस्य कार्यस्य विरद. नि ्ाचरस्वं परप्रतयायको हेतुः । रूपकमूरत्वेनेत्ति । 
रूपकमन्तरेणानुव्थानात । ननु चास्यारुकारान्तरग्मींकारमान्नमेव ऊ तर्कानुमानतेन्घ- 
ण्यनिमित्तम्‌ , उतान्यदपि किंचिदिव्याश्ङ्कयाह-- कचिदित्यादि । अनल्कृतमिति । शासन. 
धमदिः प्रोढोक्ष्या वास्तवत्ेनेव विवक्तितव्वादतिशयोक्स्याचलंकारान्तरगभीकाराभा- 
चात्‌ । अतश्चास्य कविकमंव वंलच्तण्यनिमित्तमिति भावः। तदाह - प्रोदोक्तीत्यादि । एवं 
च कविकमांभावाद्यत्र विच्छित्तिविशेषाश्र्रणं न स्याद्दश्र नायमलकारः । यथा- 


“यो यरकथाप्रसङ्ग च्छिश्नच्छिन्नायतोष्णनिःश्वासः। 
| 


स भवति त प्रति रक्तस्त्वं च तथा दृश्यसे सुतनु ॥' 


अत्र र्ध्वं प्रति षिंश्चिष्टस्य निश्वस्ितस्या्थंऽपि हेतुसवे वास्तवत्वात्कविप्रति मानिर्व- 
तिंतव्वाभावान्नायमटंकारः । यथा- 


"प्रजानां विनयाधानाद्‌ रक्तणाद्धरणाद्पि। 
ख विता पितरस्तासां केवरं जन्महेतवः ॥' 


भच्र विनयाधानादिहेतूनां वास्तवस्वादनरुकारष्वम्‌ । न पुनरत्र हैतोराथेत्वाभावाद्‌- 
नलंकारध्वमिति वाच्यम्‌ । कचिकमसंण एबाटंकारनिवन्धनस्वेनोक्तस्वाव्‌ आथेत्वस्य तद्‌- 
| प्रयोजकष्वात्‌ । न हि हितोरार्थत्वेऽपि कवि कमंभ्यतिरेदेणारंकारष्वं स्यात्‌। तच्छन्देऽपि 
हेतौ कचिच्कविप्रतिभानिवं ्तितसेनाट कारस्वाभ्युपगमे न कधिद्‌दोषः। मन्थङ्कता पुनरेव. 
। 


अखमानालङ्नारः ५५५ 


चिरन्तनमताचुरोधेनो च्छम्‌ । तन्मतमेवाधिद्रस्य हि अयः मत्रेव्यादिना वि चारः प्रस्तुतः । 
तत्रेति द्यनिर्धारणे । प्रतीतेति । बोद्धब्येन समध्यंतया भ्रञ्ुख एवाधिगतस्वेव्यथः। न 
कश्चिदलंकार इति । ठेतुमाच्ररूपत्वात्‌ । देतुरवच।चक्‌ विनापि तदधिगमे द्यस्य च द्रवा. 
तिज्ञय इति भावः। यद्वचयति - हेतुस्व प्रति पाद्‌ कमन्तरेणेति । उपात्तस्येति । पारिशेष्यात्‌ 
पदार्थस्य देतुसवेनोपादानाभिधानाठ । एकमिति पदार्थगतमस्‌। हेतुसवप्रतिपादक इति 
शब्दादिः । तटस्थत्वेनेति । न तु हेदष्वेनेव्यर्थः। जत एव चानयोर्यंदः । ततश्चेति पारि. 
शेष्यात्‌ । ननु यदेवं तप्पूवमर्थान्तरन्यासस्य केनाभिप्रायेण कायंक।रणगतस्वेन समथंकस्व- 
खक्तमिष्याज्ञङ्कथाह-- यत्पुनरित्यादि । लक्षणान्तरस्येति । पदार्थगतस्वेनेवेष्टेः । यदाहुः-- 
“्ुतमेकं यदन्यत्र स्छतेरजुभवस्य वा । 
हेतुतां प्रतिपधेत काभ्यजिङ्ग तदुच्यते ॥ इति । 

यच्ेतदुद्धटमताभिप्रायेणोक्त तरकथ स्वमतं संगच्छते इत्याश्ङ्कयाह- उक्तेत्यादि । 
चिविक्तभिषय इति । तारस्थ्यभ्यतिरेकेण वाक्याथंस्य हेतुरवायो पन्यासाद्रथान्तरन्यासस्या. 
च्रा्याप्रतेः। आश्रयितम्येति । न पुनर्वस्तुतः सं वतीव्यथः। 

साध्य इत्यदि इसीकी व्याख्या करते दे यत्न इत्यादि । इस प्रकार यहां साध्यकी 
प्रतीति के लिए तीन प्रकार के साधन का निदेश दहोने से इसका लक्षणमी तकशाख के सनुमान 
के ही समान सिद्ध होता है। यदि रेरा है उसमे श्सका अन्तर क्याः-ेसी रोका कर लिखिते 
ह--"विच्ि्ति, इत्यादि । यह अनुमान दो प्रकार का होता दें स्वाथं मौर पराथं। इनमें स्वां 
अनुभान वह दै जिसँ इस परामशे का निश्वय रहताहै कि रमन य॒द्‌ अय॑जान लिया दैः । 
पराथ वह जहो दूसरे के दारा अक्ात वस्तु का प्रतिपादन रहता है फरुतः जिसमे पर प्रत्यायकत्व 
रहता है । इस प्रकार स्वाथं ओर पराथ॑मेदसे दोनों प्रकार का अनुमान एक ददी अलंकार कहा 
जाना चादिए, न 9 अनुमान बौर देतु नदो रूपौ मे पथक्‌ पृथक्‌ अलंकार, क्योकि सामान्य्‌ 
लक्षण दोनों मेँ लागू होता है जिसमे प्रकारप्रकारिमाव दही सिद्ध होतादहै। इने सेजो स्वाथौनु- 
भान है उक्तका उदाहरण [ यथारन्धरः] प्रन्थकारने ही बतला दिया है। उस उदाहरणमें 
(कामर्देवार लगी हहं है" यह वक्ता का अपना ही निश्चय है परार्थानुमान का उदाहरण यथा- 

€हे प्रियो यदि अधेरेमे घूमने वाले उन राक्षसो का निश्ाचरत्व वास्तविक तो जव यह 
दिन निकला आ रहा है, इसमे उनका संचार केसे होगा 1 


यहाँ दिनम संचाररूपी जो काय है उसफे विरुद निशाचरत्व रूपी परप्रत्यायक देतु 
उपात्त है । खूपकमू रत्वेन = रूपकमूलक होने से, क्योकि इस प्य मै उसका उत्थान रूपक के 
बिना संमव नहीं है। [ शका ] क्या अन्य अलंकारसे युक्त होनेकेही कारण इस अनुमानमें 
तकं के अनुमान से मेद आता है अथवा इसका हेतु कोड ओर मी है-टेसी शंका कर लिखते है- 
छचित्‌। अनलङष्त = श्लासनधारण करना आदि कविप्रोदोक्ति के द्वारा वास्तविक जैसे 
विवक्षित है इसकिद इनमे [ रत्नाकरकार आदि को ] अतिशयोक्ति आदि अन्य अल्कारोंका 
मिश्रण नहीं मानना चाहिए। इस लिए इसका मेदक तत्व कविकमं ही ३। यदी कहते है- 
'प्रदोक्तिण इत्यादि के दारा। दस प्रकार जरह कविकम का अभाव रहेगा सौर इसीलिए 
कोई चमत्कार नहीं रहेगा वरहा यह अलंकार नहीं दोगा । यथा--[ रत्नाकरकार दारा देष्व- 
लकार के उदाहरण के रूप मं उद्धृत | 

"जो जिसकी चर्चाके प्रणमे रुक रुककर रम्बी ओर उष्ण उसँस ठेता है वह्‌ उसकै 
परति अनुरक्त रहता है भोररी सलोनी! वह वेसाही दिखाईदे रहा दै।' इस पदाथमें 


५५८५४ अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


अनुराग कै प्रति विशिष्ट उर्सोसि अथ॑तः देतु है तथापि वह वास्तविक दै, कविप्रत्तिमाप्रसूत नदीं, 
अतः यह [ अनुमान ] अलंकार नीं है । ओर ञंते- ॥ 

शिक्षा का आधान) रक्षा ओर पालन-पोषण करने से प्रजाओ का [ सच्चे अर्थम ] पिता वह 
[ दिलीप ] था, उनके अपने पिता तो केवल जन्मकेदेतु थे । [ रघुवंश-१] 

यद दिक्षा का माधान आदिनजो हे हैँ वे वास्तविक हैँ अतः अलंकार नदीं है । इसकिण नदीं 
कि यददो देतु आं नीं दै इसक्णएि अलंकार नदीं दै। अल्कार कामूल कविकर्म को माना गया है 
सतः आथ॑त्व उसे कारण नदीं । रेसा नर्द कि कविकमं के अभाव मेँ केवर आं दोनेसे देते 
अलंकारत्व चा आण । इसच्णिहतुके चाब्द रहने पर भी उप्तके कतरिप्रतिभाप्रसूत होने पर 
उसमें अलंकारत्व मानने में कों दोष नदीं | 

यन्थकारने इसे प्राचीन आचार्योंके मतके अनुरोधसे बतलाया । उन्हीं मतको लेकर 
ग्रन्थकार ने *अयमन्रः इत्यादि दारा विचार का प्रसंग चलाया दै। (तन्न = उनमे' यह दोनों क 
निर्धारण के लिए हैं । प्रतीत =वोद्धन्य व्यक्ति [जिसे समन्ाया जा रहा हो]के दारा 
सम्य॑रूप से आरम्भे दी जान चिण्‌ गए । न कथिद्लंकारः = कोद अलंकार नहीं = हेतुमात्ररूप 
होने से। भाव यह कि उमे चारुत्वातिश्चय तव आता है जव वह हेतुत्व के वाचक शाब्द कै 
विनाद्ी विदित द्ो। जेसा कि कदेगे--देतुत्व फे प्रतिपादक श्चब्द के विना उपा अधात्‌ 
देष वचे पदाथ का हंतुरूप से उपादान रूप अभिधान होने कारण शुकम्‌ = एक प्रकार का- 
अर्थात पदा्थयत । देतु्वप्रतिपादक अथात्‌ शब्द आदि। तटस्थस्वेन=न कि हेतुस्रेन 
इसीलिए इन दोनां [ अशन्तरन्यास्त ओर काव्यल्गि] में अन्तरदहै। ततश्चन्इस कारणनजो 
शेष रदा वह सामान्यविद्ेषमाव। [का] यदि ेसा हेतो पहले अ्थान्तरन्यासप्रकरण सें 
किंस अभिप्राय पे कायकारण मेँ स्मथेकत्व बतकाया हे । देसी खंका कर लिखते हैँ-- यत्‌ पुनः। 
रुणान्तर = दूसरा लक्षण अथात्‌ केवर पदाधगत ही मानकर किया दूसरा लक्षण, जो इस 


` प्रकार दै--धुतमेक० [ अर्थं कान्यङ्गि के इतिदासमें देखिए ]। [ शका ] यदि यद्‌ उद्भट कै 


मत के अनुसार कहा तो फिर आपका मत केसे ठीक सिदध दागा-रेसी शंका पर लिखते है-- 
उक्त इत्यादि । बिविक्तविषय = स्वतन्तक्षेत्र = याँ वाक्यां हेतुत्व के लिए उपात्ततो रहता है 
किन्त इसमे तटस्थता रहती हे [ सापेक्षता नदीं ] इसङ्िए [ प्तावेक्षता से युक्त ] अथान्तरन्यास कौ 
पच वहां नहीं होती । आश्रयितभ्या = अपनानी चादिएः अथं यह कि वस्तुतः एसा होता 


हे नहीं ॥ 
अशुमानालकार के सूत्र तथा चृत्तिसे स्पष्ट प्रतीत होता दे कि इनके रचयिता दो पृथक्‌ विद्वान्‌ है । 


दत्तिकार सूत्रकार करो स्वतन्त्र चिन्तक सिद्ध नहीं कर पाते । पले उद्भट के अनुसार सूत्र बनाना, 
पुनः उसो तथ्य के लिए एक पृथक्‌ सूत्र बना देना स्वीकार करने पर सूत्रकारका पक्ष शिथिल 
सिद्धदहो जाताहै। वस्तुतः अथांन्तरन्यास म आनेवाले कायकारणभाव में हेतुत्व या जनकत्व 
नही, समथकत्व प्रयुख रहता है । कान्यल्गि्मे नतो समर्थकत्व दी प्रमुख रहता भौरन 
शापकत्व ही, यहां प्रसुख रहता है जनकत्व । यदौ कायै से कारणका अनुमान होता है, अतः 
देनूतपक्षा के समान कारण क्रा कारणत्व सिद्ध करनेमें दही चमत्कार रहता है। "यत्‌ त्वत्‌? 
पमे प्रथम तीन चर्ण द्वारा प्रतिपादित अथंकायंहै। उसे चतुर्थं चरणे प्रतिपादित 
अथ को कार्ण बतकलायाजा रहाईै। इसी प्रकार वपुः्रादुर्मावः पच मँ अपराधदयः कार्यं ३, 
उससे पूर्वजन्म ओर भावीजन्म मेँ प्रणामाभाव म कारणत्व सिद्ध क्ियाजारहाहै। प्तृग्वश्च० 
पद्यर्मेभी भगियों के दद्चिणाभिमरुख नेत्रसंचार मेँ दिग्बोधरूपी काय के प्रति कारणत्व बतलाया 
जारहाहे। इस प्रकार चमत्कार कै प्रति, भर्थान्तरन्यासमें कारण देता है समथ॑कत्व जबकि 


अचुमानाटङड्कारः ५५९५ 


कान्यछ्ि मे कारण होता है कारणत्वसिद्धि। कार्यकारणभाव दोनों मल्कारो मे समान दोने 
प्रमी चमत्कारकारण भिन्ने अतः दोनों को ण्कं नहीं माना जा स्कता। इसप्रकार 
सूत्रकार का उचित समथन कियाजा सकता था किन्तु वृत्तिकार वह नहीं कर सके। वस्तुतः 
वृत्तिकार ठीक वैसे दी स्वतन्त्र आचार्य हैँ जेसे विमरिनीकार । मूलकार के साथ इनकी जितनी 
निभ जाय उत्तनौ ही वहत ह) 
विमरदिनीकार ने अनुमान ओर काव्यल्गि की अभिन्नताका स्वर उठाया है। इस रकार 
वृत्तिकार कै द्यी समान विमिनीकार भी यहाँ सूत्रकार से रकराते दिखाई देते हे । 
इतिहास = 
काव्यलिग ये इतिहास से अनुमान का इतिहास प्रायः गताथं हे । उससे स्पष्ट हे कि भनुमानं 
नाम से अनुमान को अलंकार मानने का प्रथम श्रेय रुद्रट को है। यद्यपि यदमी स्पष्टे कि 
शनुमान का अभिप्राय दण्डी ओर उद्धट दारा मी नामान्तरसे स्पष्टकर दियागयादहै। रुद्रर मं 
इसका जो स्वरूप है वह॒ काव्यक्गि के प्रकरण से उदप्रत किया जा चुका है । मम्मट तथा पण्डित- 
राजक मतमीदिएजा चु हैँ । रेष आचार्यौ के मत इस प्रकार हं-- 
ह्नोभाकर :--रत्नाकरकार ने अनुमान का लक्षण काब्यांल्ग के साथ इस्त प्रकार दिखा दे- 
( १) साधनात्‌ साध्यप्रतीतिरनुमानम्‌ । 
( २ ) परप्रत्याय॒कं लिगं हेतुः ॥ 
साधन के दारा [ अज्ञात ] सध्यका ज्ञान अनुमान [भौर दूसरे को ज्ञान कराने वारा 
लिगि देतु |। 
हेत नामक काव्यिग से अनुमान का अन्तर करते हुए उन्होने लिला है-- 
'परेणाप्रतिपन्नस्य वस्तुनः प्रतिपादनम्‌ । 
परानुमानकरूपो हि हेत्वल्कार इष्यते ॥ 
मयायं प्रतिपन्नोऽथं इति यत्र निवेद्यते । 
तत्रानुमानं तेन स्यात्‌ प्रतिपत्तिनिवेदनम्‌ ॥ 
दूसरे के द्वारा भक्ञात वस्तु का प्रतिपादन हेत्वरुकार कहराता हे इसमे पराधानुमान रहता 
ह । मेने यद्‌ पदाथ जान लियाः यह जिसमे बतलाया जाता है व्हा अनुमानाल्कार द्ोता है । 
यह ज्ञान निवेदन स्वरूप हे 
रत्नाकरकार ने धयो यत्कथा०ः पय में अनुमान मानाथा। विमर्शिनीकार ने उसका खण्डन 
किया दहे। 
रत्नाकरकार ने काव्यप्रकाश तथा सवेस्व द्वारा अनुमानाल्कार क उदाहरण के रूप में 
प्स्ठत यत्रैता० प्य मँ अप्तवन्ध मे , सम्बन्ध नामक अतिशयोक्ति माकी है। उनका कहना हैक 
हस पमे काम के साथ जिस (ास्नधरत्वः का संबन्ध नहीं है उरुङा संबन्ध बतलाया जा 
रदा है यदीं उसी मे चमत्कार है। उनका कथन अमान्य नहीं हो सकता किन्तु उन्हे वस्तुतः 
अनुमान मे अतिशयोक्ति का क्षीण स्परौ मानना चाहिए था, अनुमान का आत्यन्तिकं अभावं 
ओर भतिशयोक्ति का सावभौम चमत्कार नहीं । अप्पयदीक्षितनेरेसा मानामी है, 
अप्पयदीक्सित ने अनुमान का कोह स्वरूप प्रस्त॒त नदीं किया-केवल उदाहरण ही दै 
दिए है । उन्दने "यथा रर में रूपक तथा त्रेता ० मे भत्तिशयोक्ति का स्प्च मानारहैं। 


विश्वेश्वर = ने अनुमान का लक्षण इत प्रकार बनाया है- 
“अनुमानं ग्याप्यबलाद्‌ व्यापकधीधेमिनिष्ठा स्यात्‌ 


म 


५५द गलञ्खारसवेस्वम्‌ 


व्याप्य के द्वारा पक्षम व्यापक का ज्ञान अतुमानः। इसमे स्पष्ट ही विदवेश्वर ने न्याय- 
दाख को अधिक स्थान दे दिया है। व्याप्य साधनयादेतुकादही दूसरा नाम है ओर व्यापक 
साध्यका। इसी प्रकार धमीं का अथ॑ पक्षदह्ोतादहं। 
विद्वेरवर ने अनमान कै छिए अपेक्षित व्यापि को दो प्रकारका माना है पारमाधिक ओर 
कविकंदिपत । ध्यत्रैता०ः पद्य मेँ उनके अनुसार कविकल्पित हे । 
श्री विचा चक्रवत्तीं ने इस अलंकार का निष्कषं इस प्रकार स्पष्ट किया दै- 
"अनुमानं तु साध्याय साधनस्योपवणेना। 
तत्सद्ीणेत्वज्ुदधत्वविच्छच्यान्य विलक्षणम्‌ ॥ 
अप्रतीतप्रतीतो स्यादनुमानन्यवस्थितिः । 
पदाथांद्‌ वाथ वाक्याथान्निर्ददे सति दे्ठतः ॥ 
समथेनं प्रतीतस्य काव्यलिङ्गद्वयं मतम्‌ । 
भवेद थान्तरन्यासस्तारस्थ्ये हेतु मावतः ॥ 
कायकारणमावे त॒ तस्योक्तं लक्षणान्तरम्‌ ॥ 
भनुमान साध्य के किष साधन का [ सर्वीगक्षपृणै | वर्णन होता है। यह संकीर्णं मौर शुद्ध 
दो प्रकारका होता है। अन्य अलका से य॒ चमत्कार में भिन्न होता है। अनुमान द्योता 
है अज्ञात का ज्ञान करानेमं। कान्यल्गि श्सके विरुद्ध शब्दतः कथित पदाथ या वाक््या्थरूपी 
हेतुके द्वारा पहले से क्लात पदाथ के प्तमथनमेंहोतादहै। इस प्रकार यह दो प्रकार दोतादहै। 
अर्थान्तरन्यास वहां होता है जाँ हेतुत्व से तटस्थता रहती है [ अर्थात्‌ हेतुत्व विवक्षित नदीं 
रहता; केवल सामान्यविशेषभाव रहता है । जाँ यह विवक्षित र्ता है वरदो ] कायंकारणभावको 
-ठेकर्‌ इस [ अ्ान्तरन्यास ] का एक स्वतन्त्र रक्षण वना दिया गया हे। 


विमरिनी 


एतदुपसंहरन्न्थदवतारयति-एवमिःत्यादिना । 
[ “एवं-- प्रतिपादितम्‌" का अनुवाद अनुमानालकार के अन्त में देखिए । | 
इस प्रकरण को समाप्त करते ओर दूसरा प्रकरण आरम्भ करते है- 


[ सवंस्व | 
अधुना वाक्यन्यायसूट। अकठकारा उच्यन्ते- 
[ घू० ६० ] उदिष्टानामथानां क्रमेणावुनिदर्द्रो यथासंख्यम्‌ । 
ऊध्व निट्ठा उदिष्ाः। पश्ाचिर्देयोऽचनिदूर्दशः। सख चार्थाद्र्थान्तर- 
गतः । संबन्धश्चात्र सामर्थ्यात्‌ प्रतीयते । ऊध्वं निदिष्टानामर्थानां पश्ान्नि- 
दिश्य; क्रवेण संबन्धो यथासंख्यमिति वाक्यार्थः । अन्ये त्विममलंकारं 
कमसंज्ञयाभिदधिरे । तच्च यथासंख्यं शाब्दमाथं च द्विधा । शाब्दं यत्रासम- 
स्तानां पदानामखमस्पेः पदैरर्थद्रारकः संबन्धः । तज् क्रमसंवन्धस्यातियेहि- 
तस्य प्रत्येयत्वात्‌ । आं तु यन्न समासः क्रियते तत्र समुदायस्य समुदायेन 
सह संबन्धस्य शानब्दत्वाद्र्थावगमपयटोचनया त्ववयवगतः क्रमसंवन्धः 
भ्रतीयते । ततोऽच्न यथासंख्य आर्थत्वम्‌ । 


| 
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यथासंख्याटड्ारः ५५७६७. 


आयस्योद्‌ादणम्‌-- 
"लावण्यौकसि सपतापगरिमण्यग्रेसरे व्यागिनां 
देव त्वय्यवनीभरश्चमथजे निष्पादिते वेधसा । 
इन्दुः कि घटितः किमेष विहितः पूषा किञुत्पादितं 
चिन्तारलमहो बरथेव किममी खण्ठाः कटक्ष्माश्चतः ।\* 


अन्न उावण्यौकःप्रभ्रतीनामिन्दादिभिः क्रमसंबन्धस्याभ्यवदहितत्वेन 
प्रतीतेः शाब्दं यथासंख्यम्‌ । यथा- 


'कजलहिमकनकख्चः खुपणचरषहसवाहनाः € वः । 
जठनिधिगिरिकमटस्था हरिदरकमटासना ददतु । 
अन्न कजलादी नां सखुपणादिभिः संबद्धानां जठनिध्यादिभिः सह सबन्धो 
हरिप्रथ्रतिभिः संबन्धः श्चेत्या सञ्ुदायनिष्ठः प्रतीयते । अथोचुगमाज्ुसारेण 
त्ववयवानां क्रम लंबन्धावगतिर्त्याथ यथासंख्यम्‌ । 

अव [ मीमांसाराख्लगत ] वाक्य = न्यायमूलक भलंकारों का निवेचन किया जा रहा है- 

[ सू° ६० | पहर कहे गए अथो के क्रमसे पुनः [ अन्य अर्थो का] कथन यथा- 
संख्यां कार [ कहलाता हे ] । 

[ उत्‌ ] ऊपर निदिष्ट = कथित = उदिष्ट, [ अनु = ] परचात्‌ निर्दा = कथन = अनुनिदं राः 
अर्थात्‌ अन्य अर्थो का । इनमें सम्बन्ध [ वाक्याथ ] सामथ्यै से प्रतीत होता है । इस प्रकार तात्पयं 
यह हभ कि "पहले कहे अर्थां का वादमं कहे गए अर्थो के साथ क्रमः संबन्ध यथासंख्य कहलाता 
हे । [ वामन आदि ] अन्य आचार्याने इस अल्कार को क्रमः नामसे पुकारा है। यह्‌ यथा- 
संस्यदो प्रकारका होता है शाब्द ओर आधं। शाब्द वह जरह भस्मस्त शब्दो का असमस्त 
दाब्दं से अथंके द्वारा संबन्ध रहतादहै। [ यह चान्द इसलिए कहा जाता है] क्योकि इसमें क्रम- 
सम्बन्ध अतिरोहित रहता ओर [स्पष्टरूपसे] बोधविषय बनता है। आर्थवह होता है जिसमें 
समास रहता हे । यदहो समुदाय से ससुदाय का संबन्ध राब्दतः कथित रहता है, फलतः अवयव 
से अवयव का क्रमिक संवन्ध अथैका इन होने पश्चात्‌ विचार करने पर प्रतीत होता है, 
षस कारण यदहो यथासंख्य मं आथेता रहती हे । प्रथम का उदादरण-- 

(महाराज ! आप खवण्यके धरै, प्रतापगरिमासे मण्डिते, त्यागियोँनें श्रेष्ठहे ओर 
आपकी युजा एथिवी का भार सम्दालनेमे समथंदहे। विधाता ने जव इस प्रकार के आपको बना 
लिया था तव फिर चन्द्रमा को क्यों गदा, सूयं क्यों बनाया, चिन्तामणि की उत्पत्ति क्यों की गौर 
विना काम इन कुलाचलं को सृष्टि करयो की। 


श्स उदादरण मे [ पूवांङगत ] लावण्य के घर आदि पदार्थौ का | उत्तराधं के] चन्द्रमा 
आदि के साथ क्रमिक सम्बन्ध सीधे सीवे प्रतीत हो जाता है इसकिएट यथासंख्य साब्द है । [ द्वितीय 
का उदाहरण | यथा- 

कञ्जल, हिम ओर सुवणे सी कान्ति वाले, गरुड, वृष भौर हंस को वाइन बनाए 
हए; समुद्र, पवत ओर कमल पर विराजमान विष्णु, रिव ओर ब्रह्मा वुम्दारा दमारा 
कस्याण करं ॥ 


५८ अलङ्कारखवस्वम्‌ 


य्ह गरूड आदि से सम्बद्ध कज्जल आदि का विष्णु आदि से सम्बन्ध शब्दतः समुदायगत 
हे न म्बर ९ 
रूप सते प्रतीत ष्टोता दै । अवयर्वो का क्रमिक सम्बन्ध अथं पर विचार करनेसे प्रतीत होता दै। 


इस कारण [ यह ] यथासंख्य माथे हे ॥' 
विमदिनी 


उदिष्टानाभिव्यादि ¦ अर्थादिति । उद्िष्टानामेव द्यजुनिदेदो पो नरकट्यं स्यात्‌ । सामर्थ्या 
दिति चाक्यपर्यारोचनचरात्‌ । अन्य इति । वामनाद्यः । यदाुः - 'उपमेयो पमानानां 
मसंबन्धतः क्रमः? इति । अनेनास्य प्राच्योक्छस्वं दशितम्‌ । अव्यवदितत्वेनेति । समासाद्य 


ऋमसं 
अवाद्‌ । अवयवानामित्ति । हरिकज्रादीनाम्र ; 


न चास्यालंका।रस्वं युक्तम्‌ । दोषाभाव परात्ररूप्वात्‌ । उदिशनां क्रमेणानुनिर्देदो इक्ि- 
यमाणेऽपन्छमाख्यो दोषः प्रस्ञ्यते । यदुक्तम्‌--.क्रमही नाथमपक्रमसम्‌ इति । तच्च यथा-- 
'कीतिभ्रतापौ भवतः सूर्खाचन्छरमसाविवः इति । दोषाभावमान्रं च नारुकारस्वस्‌ ! तस्य 
कविप्रतिभाव्मकविच्छत्तिविोषस्वे नोक्तःवाव्‌ । तसे चास्य (यथासंख्यमनुदेशः समानाम्‌" 
इव्यादिसूत्रोदाहरणानां (तू दीचखाठुरवमतीक्चवाराडढक्षृण्डग्यकः इध्यादुीनामनव्य- 
लकारस्वप्रसङ्गः ¦ एवच्च वक्नोक्तिजीवि तक्ता सप्रपञ्नसुक्तमिष्यस्माभिरिह नायस्तस्‌ । अन्थ- 
ता पुनरेतदुद्धटमताज्ुयायितया कक्धित्र्‌ । एवम्‌ “जा्त्तिविग्रक पवतां तदपेड _उपदेश- 
क्रम" इति छक्ितः कछमोऽप्यनरंकार षव । दोषामावमानच्ररूपत्वात । आदिपश्चाननिदंश्या- 
नामतथानिर्दशे द्यपक्माख्य एव दोषः स्यात्‌। यथा--ततुरङ्गमथ मातङ्गं मे प्रयच्छ 
। सदारूखम्‌ ।› अन्न गजाश्वयोरादि पश्चानिदुश्ययोर्यतथानिदंशाद्‌ पक्छमस्वम्‌ । अनयोश्च 
| स्वस्थाननिर्दंले दोबा नावमात्रव्वस्‌ । न पुनररूकारध्वम्‌ । तस्मात्‌- 

। (अवश्यं तदहो आवी वियोगो यच्ननो भ्रवस्न्‌ । 
परिच्छृद-सखुद्धद्‌-बन्घु-विषयेन्द्रिय-जी विततैः ॥' 


इत्यन्न परिच्छुदादी नामन्यथानि्दंदो दोष एव स्यात्‌! न चान्न तादद्धश्चिद्धिशेष 
उपरभ्यते येनाखकारष्वं स्यात्‌ । एवप्र- 
‹आस्तामस्तसयोऽहमित्यभिमतेददहादिमान्नस्पररो 
माभूद्रा विरदिममेति च मतेदरिस्जादिष्वपि । 
अस्माकं वसुवेश्मनिष्छुटनङदीसीमानुकेदारिका- 
देश्चकच्नेश्षदिगादिषर्ष्वपि कथं सा हन्त नास्तं गता ॥' 


इध्यन्रापि स्तेयम्‌ । 

उदिशनाग्र इत्यादि । अर्थात्‌ = पूवकथित अर्थोकाही पुनः निर्दे =कथन हो तो उत 
पुनरक्ति दोष चला आवे) सामभ्यात न्वक्याथे के सामथ्यं से, अर्थात्‌ वाक्य पर्‌ विचार 
करने से । अन्यै = अन्य आचायं = वामन आदि। जैसाकि [ वामन ने] कह है--“उपमेयों 
जौर उपमानं का क्रमिक संबन्ध होने से क्रमः [ का. सू. ५।३।१७ ] होता है । इसते यह अलंकार 
प्राचीन आचार्यो द्वारा प्रतिपादित अतः प्रतिष्ठित हे यह्‌ बतलाया गय [ इसते केव नामान्तर- 
मात्र वततलाया गया है क्योकि वामन के पूत्ैवत्ती जाचायै दण्डी ओर भामह ने इसे यथासंख्य 
नामसे ही निरूपित किया है ]। अञ्यरवहितत्व = समास आदिन होने से। अवयवानाम्‌ = 
अवयर्वो का = हरि कज्जल आदि का । 


ययासख्यालङ्कारः ५५९. 


इसे अलकार मानना टीकं न्दी है, क्योंकि यह्‌ दोषाभावमात्र है। यदि कथित पदार्थौका 
अनुकथन क्रमसेन किया जाए तो भपृक्रमत्वः नामक दोष होतादै। जेसाकि कहा है- 
क्रमहीन प्रद अपक्रमत्व दोष से युक्त होता हैः [ वामन काव्या० सू० २।२।२२ ]। इसका 
उदाहरण यह प्रयोग है--आपके कीत्ति ओर प्रताप सुय भोर चन्द्रके समान दहेः [ वामन 
का० सू ब्र २।२।२२ ] । [ यौ कीतिं का उपमान चन्द्र है ओर प्रतापका सूयं अतः इनका 
प्रयोग च्चन्द्र ओर सूर्य इस क्रम से होना चाहिरथा ]। केवल दोषामावको अलंकाररूप नदीं 
सानाजा सकता । वर्योकि अल्करार तो वह उक्तिहोतीदहैजो कविप्रतिमात्मक होती है, यह्‌ "हम 
पहले भी अह चुके हँ । केवल दोषामावल्प हौ अलंकार हो तो भ्यथा्तंख्यमनुदेश्चः समानाम्‌" = 
[ १।३।१० भ०-] समान अर्थो का अनुनिरदँश यथासंख्य होता है इत्यादि [ पाणिनिङत व्याकरण- 
सूत्र ] के उदाहरण- तूदी, शलातुर वमंतौ, कूचवार शाब्द से ठक्‌, छण्‌, ठज_ , यक्‌ प्रत्यय 
होते दै" [ अ० ४।३।९४ ] इत्यादि मेँ अल्कार मानना पड़ेगा । इस विषय का विवेचन वक्रोक्ति 
जीवितकार ने विस्तार पुवैक [ वक्त्ोक्तिजीवित-१] कियाद इसकल्टि यहं [ हम इस विषय 
°पर अधिक ] श्रम नहीं किया चाहते । अन्धकार ने ईस [ यथासंख्य ] का लक्षण इसक्ए क्रिया है 
कि वे उद्धटाचा्यं के मत के अनुयाय हे। 

हसी प्रकार “आसत्ति [ सम्बन्ध ] ओर विप्रक्षं [ दूरी] से युक्त पदार्था का उन्हीं [ सम्बन्ध 

तथा दूरी] को लेकर हआ कथनक्रम [ क्रमालंकार्‌ कहराता है ]--हस प्रकार लक्षित क्रममभी 
` अलंकार नहीं दै, क्योकि वह भी दोषाभावमात्रहूप है। पृवपश्वाद्मावके क्रमके साथ कहे जाने 
योग्य पदार्थौ का कथन यदि वेसा नहींदह्योतो अपक्रमत्वन।मक दोषदही होता दै। अलंकारत्व 
नहीं । ध्स कारण- 

(अहो ! जहाँ परिचारक, भित्र) बन्धुवान्धव, [ रूपादि ] विषय, इन्द्रियां तथा प्राणो से 
हमारा वियोग अवदय ही होने वाला है। इसे परिचारक आदिका कथन यदिडइप्त क्रम से 
नहोतोदोषहीशोगा। इसके अतिरिक्त इत प्रकारके कथने रे्ताकोडं वैरिष्टय मौ नहीं 
मिलता जिससे इसे अल्कार मानाजा सके । इसी प्रकार-- 

देह आदि मेँ अहंत्व [ आत्मत्व ] का अभिमान भिय्ना [तो] दूर रहे, खी पुत्रादिमेंभी 
ममत्व की बुद्धिमलेहीदूरन दहो; आश्चयं ओर वेद इसका है कि धन, घर, बाग-बरगीचे, नदीतट, 
उसके पास की क्यारियां) देश, राजा, दिशाओं आदिके प्रति भी वह. [ ममत्व बुद्धि] समाप्त 
नदीं दो रही रै यहाँंमी जानना चादहिए। [इस पद्मे तथा (वदयं० प्नं जो इन्द्र 
समास है उप्तम पदयो का क्रम पदार्थो के मह के आधार पर निर्धारित फिवागयादहै]॥ 

विमररिनीकार यथासंख्य को मी काव्यजिङ्गकं ही समान अल्कार नहीं मानते। पण्डितराजने 
मी सपना मत हसी पक्षम दिया है) यथासंख्य निरूपण के अन्त मे उन्होने छिखा दै-- 

धयथासंख्यमल्कारपदवीमैव तावत्‌ कथमारोदुः प्रभवतीति तु विचारणीयम्‌ । न द्यरिमि- 
रलोकमिदधे कविप्रतिभ।निवरतितत्वस्य। लंकारताजीवातोरू श्च नोऽप्युपरुच्धिरस्ति = येनाल्कारव्यपदेश्लो 
मनागपि स्थाने स्यात्‌ । अतोऽपक्रमत्वरूपद्योशामाव एव॒ यथासंख्यम्‌ । श्वं चोद्धधसतान॒यायिना- 
मुक्तयः वूटकाषापणवदरमणीया एव । एतेन यथापंख्यमेव क्रमारुकारसंज्ञया व्याहरतो कअमनस्यापि 
निरो व्याख्याता इति तु नव्याः ।' 


“विचार यह करना चाहिए कि यथाक्स्य अलंकारपद को ष्टी कंसे प्राप्त करता है) यह तो 
एक लोकसिद्ध तथ्य है। इस्तमे अलंकारत्व का प्राण कतिप्रततिमाप्रसृतत्व लेद्मारको मी प्राप्त 
नदीं होता, जिसते सलंकार कहना जरा भी उचित हो। इसलिए यथासंख्य अपक्रमत्वनामक 


क === च 


५६० अलङ्कारसवंस्वम्‌ 


दोष का अमावदहीदहै। इस प्रकारःउद्धट कामत मानने वारं का कथन नकी कार्षापण के समान 
सर्वथा अरमणीय द्यी है। मोर इसीलिण यथासंख्य को दी क्रमाल्कार नाम से पुकारने वाले वामन 
के कथन की मी जच हो जाती है । इसत प्रकार नवीन आचाय यथासंख्य ओर क्रम को [दोषाभाव 
ही मानते हं) 

स्पष्ट है कि पण्डितराज ने विमर्दीनी का दी अक्षरशः अनुगमन किया दहे। 


विमदधिनी ओर रसगंगाधर के इन प्रतिवादी स्वरयो का मूर शोभाकर का रत्नाकर है। 
रत्नाकर मे दचोमाकर ने भी यथासंख्य को अलंकार नहीं माना है । उन्दनि क्रमारुकार नामक 
पर्यायालंकार के एक भेद कं प्रकरणम लिखा दै- 
धेनोदद्वेशः क्रमेणादावपरेण पुनयैदि । 
क्रियते प्रतिनिर्देद्लो दोषः म्रक्रममङ्गतः॥ 
अथ दोषनिरासार्थं क्रमस्तद्वत्‌ प्रवत्तते । 
यथःसंख्यमल्ङ्कारो न स्याद्‌ दोषनिदृत्तितः ॥ 
तस्याश्चालकृतित्वे स्यादेकंकस्य पदस्य सा । 
पौनरुक्त्यादिविरदात्‌ तेन नेदमच्छृतिः ॥ 
एकैकस्य विदेषस्य सन्निधो यद्‌ विशेषणम्‌ । 
यथायोगामिधो वाच्यः सौऽलद्कार स्ततः थक्‌ ॥ 
वरैचिच्यविरदहान्नेवमिष्यते चेत्‌ समं दबोः। 
क्रमेण युगपद्‌ वापि न दहि बुद्धिवि्िष्यते॥ 
"आरम्भ में जिस क्रमे पदार्थो का कथन दहो, प्रतिनिदेश्ल यदि [उसी क्रमसे न होकर ] 
भिन्नक्रम से होता है तो वद प्रक्रमभङ्ग" नामक दोष हे। यदि शस दोष की निवृत्ति के लिए 


वही क्रम रखा जावे तो इसे यथासंख्य कदा जारगा विन्त यद अलंकार नदीं दोगा करयोक्ति यह्‌ 
तो दोषाभावमात्र दोगा इस दोषनिवृत्तिरूप दोषाभाव को यदि भल्कार मानागयातो यह 
पक दी प्य मे जितने परदो मँ दोषनिवृत्ति रदेगी उतने सव पदो म एक एक करे अनेक संख्या 
मे माना जाएगा। भौर इतना ही नदीं पुनरुक्ति आदि समी दोषो की निवृत्ति मे अल्कारल 
मानना होगा । इसलि९ यह [ यथाकख्य | अल्कार नहीं हे । यदि इते अल्करार माने तो जदं 
एक एक विदोषता कै लिए एक एक विदोषण का प्रयोग किया जाता है वह [ लावण्योकसि° 
आदि पाँ में ] एक ध्यथायोगः नामक मी अट्कार मानना दोगा। यदि उस्म ¦वेचित्य का 
अभाव वतलाकर उक्ते अलकारत्वदयुत्य बतलाया जार तो यही तके यथासंस्यमें भीलागु होगा| 
सच यह 8 कि पदाथा का श्नानक्रमसेदह्ो या अन्यथा, ज्ञान मेँ कोड मन्तर नहीं आता ।" 
रत्नाक्षरकार को इतने से संतोष नदीं हआ । उरन्दोनि दवे स्वर मं यथासंख्य कोदोष भी 
बतलाना चादा- 
प्रत्युत विदरष्यपदनिकट एव ॒विदेषणपद्योपादानेन नेराकाङक्ष्येण प्रतिपत्तेरस्त्येव विद्धोषः | 
यथासंख्य त विशेष्याणां विदषणानां च प्रथ्‌ पृथगुपादानं ग्यवहितस्मन्वयेन साकाडक्षत्वात्‌ ।' 
--ध्यदि यथायोगः को अलंकार माना जाय तो वहु दु दूर तकं मान्य भी है क्योकि 
विदचेषर्णो का अपने धिद्यष्यां के साथ प्रयोग होते वाक्याथप्रतीति विना आकाक्षाव्यवधानकेहो 
जाती है । यह भी एक विक्शेषता मानी जा सकती है । यथासंख्य मेँ तो उलट आकांक्षा का व्यवधान 
रदता है कर्योकि उसमे विशेभ्य भौर विशेषणो का उपादान पृथक्‌ पृथक्‌ होता हे । 


यथासंख्यालङ्ारः ५६९ 


रत्नाकर ने निम्नलिखित चोर ओर की- 

कि चायं यथासंख्यालकारः किम्‌ अर्थस्य, शब्दस्य वा ? न तावदर्थस्य ०००० अर्थस्य क्रमा- 
संभवात्‌ । न द्वितीयः अनुप्रासादिवच्छब्दस्य वारुताऽप्रतीतेः तन्नामिधेयक्रमः, येनाल्कारः, 
अपितु क्रमेणाभिधानम्‌ । न चासिधानालंकारः कश्चिदस्ति । 

- यथासंख्य मलंकार किस्काहै१ अथेकायाराब्द्‌ का? अथक हो नदीं सकता क्योंकि 
[ श्सके लिए उदाहृत पदों मेँ] अथं में क्रम नहीं रहता । दूसरा भी नदीं क्योकि शब्द में अनु- 
प्रासादि ॐ समान चारुता कौ प्रतीति नही होती । इस प्रकार अभियेय का क्रम तो य्ह हे नहीं 
जिसस यद्‌ अलंकार दो सकता, यहाँ तो दोताहे क्रम से अभिधान मौर अमिधान नामक्ातो 
कोड अलंकार दोता है नदीं याँ रत्नाकर ने यह वतलाना चाहा हे कि ्िरुसिला नहीं, 
तरतमता ही अभिधेयो का क्रम कका सकती है । यथासंख्य सै सिलसिला रहता है ओर तरतमता 
पयाय ओर पयाय के ही सगे भाई क्रम नामक अलंकार मे सिर्सिला अर्थ या अभिभेय 
की विशेषता नहीं अभिधान की विशेषता हे । अभिधान यदि अलंकार होता तो इसे अलंकार माना जा 
सकता था । वक्रोक्तिजीवितकार बुन्तक ने वकोक्तिमात्र कोकान्य का अल्कार माना हे मोर 
वक्रोक्ति को साना हे "विचित्र जभिधाः-स्वरूप । अभिधा भौर अभिधान समानार्थं रब्द हे । शस 
प्रकार ऊभिधानकीो मलकार मानने का पक्ष उठाया जा सकता है । ओर महिमम ने उठायामी है 
तथापि यह करप टिक नदीं पाता, क्योकि वक्रोक्तिजीवितकार के अभिधाराब्द का अर्थं अभिधानामक 
दाब्दव्यापार नदीं" अपितु उत्तिप्रकारहै जो कविकमं के अन्तत आता है। विमरिनीकारने 
जो वक्रोक्तिजीवितकारका इस प्रसंग म उल्ल किया ह वहु केवर वैचिन्यमाजको अल 
कारत्वाधायक मानने के लिए। वकरोक्तिजीवित राब्द हौ प्रमाणित करता है कि वक्र उत्ति ही अल- 
कार है क्योकि वक्रोक्तिजीवितकार ने स्पष्ट का है- "काव्य अलक्त नहीं किया जाता अपितु अलङ्कृत 
वस्तु कान्य बनती है- (सालङ्कारस्य काव्यता ।› इस प्रकार उनके मत मे अलंकार जो वक्रोक्तिस्वरूप 
हे, काव्य का जीवातु अथात्‌ प्राण हे । यथासंख्य मेँ विमरिनीक्तार किसी प्रकार की वक्रता का 
अनुभव नहीं करते अतः उनकी दृष्टम यह अल्कार नहां कहा जा सकता । इने विरुद्ध दण्डी, 
माम, उद्धट, रुदरट ओर मम्मट ने यथासंख्य को मलकार माना है। इनके विवेचन इस 
प्रकार दं 

दण्डी = उद्दिष्टानां पदाथांनामनूद्देशो यथाकमम्‌ । 

यथासंख्यमिति प्रोक्तम्‌ ।› [ २।२७३ काव्याद ] ॥ 


- कथित पदाथा का उसी क्रम से अनूद्देश यथासंख्य कहलाता है ।' 
भामहः- भूयकतासुपदिष्टानाम्थानामसधर्मणाम्‌ । 
कमशो योऽनुनि देयो यथासंख्यं तदुच्यते' ॥ २।८९ ॥ 

- पहले कदे गए अनेकं रेसे पदार्थौ का क्रमशः पुनः निदेश यथासंख्य कहा जातादहैजो 
समान धमं से युक्तनदहोँ। 

उदा०-- पद्मेन्दुय॒ज्न मातङ्गपुरको किल्कलापिनः | 

वक्तरकान्तीक्षणगत्तिवाणीनबाछेस्त्वया जिताः ।। २।९० ॥। 

- तमने वक्त्र, कान्ति, नेत्र, गति, वणी तथा केशो से पच्च, चन्द्र, भङ्ग, मातङ्ग, कोकिल तथा 
कलापधारी मयूरो को जीत च्या है। 

मामष् के लक्षण मे पदार्था का 'असाधम्यंः एक विरेष तथ्य है। उनके उदाहरण मेँ य॒चपि 


३६ अ० स० 


५द२ अलड्ारसवस्वम्‌ 


उद्िष्ट ओर अलुनिर्दिष्ट [ पहले जर बादमें कदे ] पदार्थे साम्यदहै तथापि उन पदार्थार्मसे 
कवर उद्दिष्ट ओर वेव अलुनिर्दिष्ट पदाथ में कों साम्य नही है । 


वासनः- श १ ८ भृ 
उद्‌शटः--उद्धट ने यथासंख्यके जिए भामह की ऊपर उदघरृत कारिकाज्यो की त्या अपना 
डीड । उदादरणकेरूपमें मी उन्होने मामद से भिल्ता जुङ्ता खं जनुष्ड्प्‌ अपने दुमारसमव 
से उद्धृत कर दिया है-- 
“मृणालहंस पञ्चानि वाहुचङ्क्रमणाननेः । 
निर्जयन्त्यानया व्यक्तं नलिन्यः सकला जिताः ।' 
यदा “असधर्मता' का निर्वाह पूवंप्रदरधित क्रम से करना दोगा । वस्तुतः असधमंस्व के | 
लिर ्दटका उदाहरण ठीक है। उद्भट के टीकाकार प्रतीदारेन्दुराजने मी एतदथ उन्दे 
हयी उद्धृत किया है जौर असधमत्व कणे साथैकता के छिए कदा दै-- “जहां उपमा या व्यतिरेक 
नभीदहो, कैवरदो से अधिक पदार्थौ म यथासंख्य अन्वयरखा गयादहोतो वहां मौ चमत्कार | 
का अनुभव होता दै") | 
` सद्रर--“निदिद्यन्ते यस्मिन्ना विविषा यथैव परिपाटया । 
पुनरपि तस्प्रतिवद्धास्तथैव तद स्याद्‌ यथासंख्यम्‌ ॥ ७।३४ ॥ | 
तद्‌ द्वियुणं च्रियुणं वा वहुवृदिष्टेषु जायते रम्यम्‌ । 
यत्‌ तेषु तयैव ततो इयोस्तु बहृशोऽपि बध्नीयात्‌ ॥ ७।३५ ॥ 
"जिसमे विविध [ अर्थात्‌ असधर्मां ] पदाथं पदक जिस परिपारी =क्रमसे कहै गयेहो वाद्‌ में 
भी उसी क्रम से कदे ग्‌ा तो वह वास्तव वगेका यथासंख्य नामक अलंकार होता है) 
वह अनेक पदार्थीके दोया तीन बार कथन में [ अधिक | खुन्दर द्योता है यदि केवल दो 
पदार्थौ दी यथासांख्यभाव काना दो ओर यह्‌ अरंकार निष्पन्न करनादोतोदोदो पदाधांका 
-यह क्रम एकाधिक वार उपनिबद्ध किया जाना चाहिए \ उदाहुरण-- 
८ १ ) कज्जल-दिम-कनकरुचः सुपे - दृब-हं स-वाहनाः खे वः । 
जलनिधि-गिरि-पञ्चस्था दरि-हरचतुरानना ददतु ॥ ७।३६ ॥ 
(२ ) दुग्धोदधिग्नैलस्थौ खपणंदृषवादनौ धनेन्डुरुचौ । 
मधुमकरध्वजमथनौ पातां वः रा जगद्धर ॥ ७ २७ ॥ 
“कञ्जल, दिम तथा सुवणं सी कान्ति वाके; गरुड़ दप तथा हंस पर आरू दोने वारे; स र 
पठत तथा कमल म निव।स करने वाले विष्णु, लिव, बह्मा आपका शान्ति दे। न 
दुस्धोदधि तथा पवेत प्र रहने वाले; गरुड़ तथा दृषभ पर्‌ आरूढ होने षाक; मेव तं 
वृषभ परर आरूढ होने वाके; मेव तथा चन्द्र के सधान कान्तिवाले, मधु तथा काम > भः वि 
तथा च्ल धारण करने वाहे [ विष्णु तथा शिव ] आपकी रक्षा कर्‌ । व ` 
ध्यान देने की वात ह कि यँ उपध दोना ही योजनां के पदार्थ स साम्य नहीं है| मामह 
| | तथा उद्भट कै (असथ्मत्व' विशेषण को 'विविध' शब्द मे भपना कर उम सकृ निवह रुद्ररने द्यी 
| क्रिया । दण्डी ने रेता कों विशेषण दियादी नदीथा। मम्म्नेमी यह विशेषण नहीं दिया 
किन्तु साधरम्याभावः को स्वीकार अवदय किया । उनके उदाहरण से यद तथ्व प्रमाणित है ! 


परमद 'यथाप्तख्यं क्रमेणेव क्रमिकाणां समन्वयः ।' 
“क्रम से कथित पदार्थौ का क्रम से ही भन्वय यथास्षख्यालंकार कहखता है ।! 


हि धा अ व 


यथासंव्याटङ्ारः ५देद 


दाहुरण = (एकसिधा वससि चेतसि चित्रमत्र देव द्विषां च विदुषां च शरगीटृश्चां च । 
तापं च संमदरसं च रति च पुष्णन्‌ चौयोँष्मणा च विनयेन च लीलया च 11 

--'आश्चयेकीवातदहेकिदेव ! आपा विदान्‌ ओर खन्दरियों के चित्तां मे ल्ौ्योष्मा, 
विनय घौर चे्टाओं से ताप, दषं तथा रति पुष्ट करते हुए तीन रूपो मँ वसते है ।› 

इन सभी आचार्यो ने अलंकार को चारुत्व या सौन्दयै का आधायक तत्व माना है। निश्चय 
ही इन्दं यभासंख्य मे मी कोई न कोई सौन्दय॑ सूज्लता होगा । इस प्रकार रत्नाकरकार को छोड 
परवत्ता आचार्यो ने भी य॒धापंख्य को इस प्रकार भल्कार माना है-- 

दी्ित = यथासंख्यं क्रमेणेव क्रभिकाणां समन्वयः । 

श्रु मित्रं धिपत्तिच जयं रजय भंजय ॥` 

रा भित्र ओर विपत्ति को जीतिए, प्रसन्न कीजिए ओर नष्ट कीजिए । 

पण्डितराज = “उपदेराक्रमेणार्थानां सम्बन्धो यथासंख्यम्‌ ॥ 

--कथनक्रम से अर्थो का संबन्ध यथासंख्य कहलाता है ।' 

विश्वेश्वर = निदं शक्रमतो यदि समन्वयस्तद्‌ यथाक्तंख्यम्‌ 1? 

--भ्यदि निर्देद्यक्रम से सश्वन्ध हो तो उसे यथासंख्य कहते हें ।› 

इस प्रकार सव॑स्वकार के परवत्ता आवार्योने भी यथासंख्य मे सौन्दर्यं पाया है। प्ररन 
उठता हे कि इन पुराणवादी आचार्यो की मान्यता कँ तक तथ्यात्मक है। इसका उत्तर रुद्ररने 
दिया हे । उन्दने कहा है-- 

यथाप्तंख्य अपने माप में सुन्दर नदी होता । वह सुन्दर तव वनता है जव उसमे अनेक अथै 
द्वियुण या त्रिगुणरूप [दोदो तीन तीन के वग] मं क्रम किए हुए कथित हो- 

(तद्‌ द्विगुणं त्रियुण वा वहूषूदिष्टेषु जायते रम्यम्‌” [ ७।३५ ] 

नमिपाधुने द्वियुण त्रिपणः इन संख्यावाचक दाब्दं का तात्पयं इससे अधिक संख्या 
के प्रतिषेध मं वत्ता है । वस्तुतः उदाहरण तीन से अधिक र्थो के समुदाय 
के भीभिलतेदहें। भामह द्वारा निर्मित उदाहरण पञ्चे रेसा हयी उदाहरण है। “कञ्जल० 
प्य त्रिगुण विशेषणो से अधिक का उदाहरण है । यचपि यह सत्य है कि रेसा विद्चेषण 
य॒दि बहुत अधिक हो जाय तो उक्ति पहेली जेसी द्यो सकती है। रुद्रट के उक्त कथन से यह 
स्पष्ट रहै कि सम्बद्ध भथा मं वर्मनिर्मांण ओर क्रमविधान से कों नवीनता अवद्य दही 
आती है। यह प्रदृत्ति क्वि प्रज्ञापूतक अपनाता है प्रमादपृ्क नहीं । फरूतः यह उसक्षी 
अशक्ति नदी, अपितु शिल्पयोजना है। दोष तो अश्यक्तिसे अता है। कवि चाहे तो उसी दाक्य 
की रचना वग्विहीन क्रम से मी कर्‌ सकता है, अतः वर्गयोजना उक्ति का आवदयक धमं नदीं 
ह । इख प्रकार उक्त आचार्यो का इसे अल्कार मानना युक्तिसंगत है। अनुभव भी इसका अनु. 
मोदन करता है । (तूदी-रलातुर.वमैती -कूचवाराड उकछणृढन्यकः" सूत्र ओर भवच्चेन्दु० या “कल्लर 
हिम० वक्यि परस्पर मे उक्ति की समानता रखने परभी अनुभूति या प्रमाव में भिन्न है। 
मम्भट कै उदाहरण प्रय मं तो चमत्कार का कों जन्य हेतु भी नहीं भिल्ता। उसे न तो मामह 
ओर उद्भट के उदाईइरणों के समान व्यतिरेक का पुरदहैभौरन दण्डी के उदाहरण के समान 
उस्प्रक्षा का। 

क्रमारुकार = यथाप्तख्य को क्रम नाम से पुकारने का जो उरलेख सर्वस्व मे भिल्ता है वही 


५६७ अच्छङ्कारसवस्वम्‌ 


भक 


रत्नाकर [ क्रमालंकार ] कुवल्यानन्द [ यथासंख्यालंकार ] तथा रसगंगाधर मँ भिर्ता 
है! इसका मृ विमरिनीकार ने वामन के विमरिनी में दी उद्धृत ओर उदाहृत क्रमालंकार को 
मानादहै। वामन काक्रम उपमानोपमेय तक सीमित है अतः उसमे क्रम रहने पर भमी सौन्दयै- 
निष्पत्ति मे उसका स्वतन्त्र महच्च नदीं है । वस्तुतः इसका मृ दण्डी मेँ दही है दण्डी ने से 
न केवल क्रम नाम से दी, अपितु (संख्यान नाम से भी पुकारा जाता बतलाया हे-- 


८उदिष्टानां ०००० प्रोक्तं-- “संख्यानं क्रम इत्यपि ॥› इस प्रकार दण्डी के पूरवादधृत यथासंख्य 
लक्षण की कारिका का चुं चरण "संख्यानं क्रम इत्पपिः है । भामद्‌ के काव्यष्टंकार से विदित 
होता है कि मधावी नामक किसी जल्कारशाख्नीको कोड ेसी मी परम्परा भिली धी जिसमें 
यथासंख्य ओर उस्प्रक्षा को ्ख्यान' कहा जाता था 1 [ २८८ | 

रत्नाकरकार ने-- 

[ क्रमेण ] जरोदावरोहादिः क्रमः ॥ ९र सु०॥ 

“किसी वस्त॒ का अधिक पद्‌ ऊंचा स्थान प्राप्त करना या उप्तके विपरीत क्मया निम्न स्थान 
प्राप्त करना क्रम कदलाता इस प्रकार एक क्रम नामक अलंकार तो माना है किन्तु उसका 
यथासंख्य की अभिन्यक्ति से सर्वथा पाक्य है । रत्नाकरकार ने इसमें जरोद का उदाहरण 
(नन्वाश्नयस्थितिः-- यड प्य दिया है जिसँ मम्मट ने ओर सर्व॑स्वकार ने पर्याय नामक अलंकार 
माना हे। 


पाठमेद्‌ = निणैवसागरीय प्रति मे सूत्र तथा वत्ति दोनो मे 'अनुनिदंः कै स्थान पर "अनृदेश्ः 
छपा है । विमञ्चिनी तथा संजीविनी दोना मे जनुनिदंदादी पाठ दै। अन्य प्रात्य मै भी यदी 
पाठचछ्पादै। प्राचीन आचार्यो के पूर्वोद्घत उद्धरणौमं दोनोदी शब्दौ का प्रयोग है दण्डी 
म “अनृदद्धे" चखब्द दै ओर माम मेँ .अलनिदंश' । अन्य अल्कारो मे सर्व॑स्वकार की 


से मिरूती है विन्तु इस अलंकार मे रेसा क्गता हे कि सवैस्वकार दण्डी से अधि 
इस कारण कदाचित्‌ “अनूदरः खब्द द्यी मूर दाब्दः हे । 


परम्परा मामहु 
क प्रमावित है । 


उद्धटाज्चुयायिता = विमरिनी तथा रसमंगाषर मे यथासंख्य को अलंकार मानने का परम्पर 
करा आरम्भ उद्धरसे माना गया हे। सवस्वकार को दोनों ने उद्धगनुयायौ कहू] ह । भन षः 
मामहानुयायी अथवा दण्डचलुयायी कहना चादि । उद्धर का यथासंख्य लक्षण अक्षरशः न 
काही लक्षणहे। 
श्रीविधाचक्रवतीं ने यथासंख्य पर निष्छृष्टाथकारिका ईइप्त प्रकार बनाई है- 
श्रायुक्तानामनक्तैस्व॒ संवन्धः क्रभिको यदा। 
यथासंख्यं तदा शाब्दमाथेन्नेति द्विधा मतम्‌ ॥' 


पूवं कथित अर्थौ का अकथित अरथा के साथ क्रमिक सम्बन्ध यथासंस्वं कहलाता है । वह्‌ शाब्द 
ओर आथ इस प्रकार दो प्रकारकादहोताहं। 


उक्त इतिहास से विदित होता दै कि यथासंख्य का माधे मेद प्रथमतः स्व॑स्वकार ने ही 
वतलाया दे । इसी प्रकार मम्मट के पृववत्तीं अन्य आचार्यो के लक्षण मेँ कथन भौर अनुकृथन जिनं 
धर्थोकादह्योवे भिन्न हों रेस्ता स्पष्टीकरण नहीं है । सवस्व के लक्षण में उदिशनाम्‌ इस पदकी 
षष्ठी का संबन्ध (करमेण के रमः पदाथ के साथ करने पर यद अर्थगत भेद स्पष्ट हो जाता ह । 


+ 


#॥ 
[ = का = ` "नु का क का पाक = प 


पयोयालड्नरः ९५६९५ 
| खवेस्व |] 


[ घू० &१ ] एकमनेकस्मिन्ननेकमेकस्मिन्‌ क्रमेण पयायः । 

क्रमप्रस्तावादिदसुच्यते । एकमाघेयमनेकस्मिन्नाधारे यत्‌ तिष्ठति स 
फकः पयौयः । नयु 'पकमनैकगोचरमिति प्राक्तनेन लक्षणेन विशेषालंकायेऽ- 
नोक्तः, तत्किमथेभिदमुच्यते' इत्याशड्योक्तम्‌--क्रमेणेति । इह च क्रमो- 
पाद्‌ानाद्‌थात्तन् यौगपद्यप्रतीतिः । तेनास्य ततो विविक्तविषयत्वस्‌ । तथा-- 
पकस्मिन्नाधारेऽनेकमाघेयं यत्‌ स द्वितीयः पयीयः । 

नन्वत्र सम्रुच्चयाङकासे वक्ष्यते इत्येतदथंमपि क्रमेणेति योज्यम्‌ । अत 
पव 'शुणक्रियायोगपदं ससुखचयः' इति सखञ्रुच्चयल्छश्चणे यौगपयय्रहणस्‌ । 
अत पव क्रमाथ्चयणात्‌ पयाय इत्यन्व्थंमभिधानम्‌ । विनिमयाभावात्परि्त्ति 
वेठक्षण्यम्‌ । तस्या हि विनिमयो रश्चणस्वेन वक्ष्यते ¦ 

तत्रानेकोऽसंहतरूपः संहतरूपश्चेति द्विविधः । तश्च द्रैविध्यमाधासघेय- 
गतमिति चत्वासेऽस्य सदाः । कमेणोदाहस्णानि- 


(नन्वाश्र स्थितिरियं किक काटठक्रूडं केनोत्तरोत्तरविशिष्टपदो पदिष्टा । 
प्रगणेवस्य हदये च्रृषठद्सणोऽथ कण्ठेऽधुना वससि वाचि पुनः लङानाम्‌ः ॥ 

'विखष्टरागादघसान्निवतितः स्तनाज्ञ रागारूणिताच्च कन्दुकात्‌ , 

कुःशाङ्करादानपरिक्चताङ्कलिः रतोऽक्चसूचप्रणयी तया करः ।\* 

"निक्लासु भास्वत्कलन्‌ पुरणं यः संचरोऽभूदभिसारिकाणाम्‌ । 

नदन्मुखोस्काविचितामिषाभिः स वाहते राजपथः शिवाभिः ¦ 

"यत्रैव सुग्धेति करोद यति भरियेति कान्तेति महोत्स् वोऽ भूत्‌ । 

तत्रेव दैवाद्‌ वदने मदीये पल्लीति भारयति शिरश्चरन्ति।, 

अच्र काटकूखमेकमनेकस्मिन्नसंडते आश्रये क्रमेण स्थितिमन्निवद्धम्‌ । 
कर्दयेको ऽनेकस्मिन्लंहते क्रमवान्‌ , अधरकन्दुकयोनिंशुच्यु पादानतया 
संहतत्वेन स्थितत्वात्‌ । अभिसारिका रिवश्चानेकस्वभावा अलहतसरूपा 
तकस्मिन्नाश्रये राजपथे क्रमवर्तिन्यः ¦ वदने चेकस्सिन्वाश्चये सुम्त्वादि 
वगः पत्नी त्वादिवगंश्च बगेत्वादेव संदतरूपोऽनेकः कमवाञुपनिबद्धः 

[ सूत्र ६१ ] एक का अनेक मैं तथा अनेक का एक सेंक्रमसे रहना पयाय [ नामक 

अलंकार कहराता है ] ॥ 

त्रम का प्रकरण दै, इसशिए [ पर्यायका] यह [ लक्षण] यहं कहा जा रहाहै। एक 
आयेय॒ का अनेक आधार मे जो रहना वड्‌ एक प्रकार का पयाय होता है । 


शंका होती है कि ष्यक का अनेक मे दिखाई देना' इस लक्षण के अनुसार रेतसे स्थलोंमें 
विद्रेषालंकार बतला ही दिया गया दै तव यह्‌ क्यों बतलाया जा रहा है । 


॥ 
| 
| 
। 


५६ अल्टङ्धारसवेस्वम्‌ 


यदी इंका करके कहा क्रमेण = क्रम से। यहाँ क्रम का उपादान करने से सिद्ध हुआ कि वँ 
[विदेषाटंकार के उक्त मदमे ] योगप रहता है । उसे ठेकर इसका विषय भिन्न भिन्न दो जाता है। 
इसी प्रकार एक आधार मै जो अनेक भयेय का रहना वह दूसरा पयाय होता है । 

रका होती है देसी स्थिति मे भागे ससुच्चयालंकार वतराया जायगा" । [ उत्तर ] नी हा, 
इसीलिए यदो मी चक्रम सेः इस पद की योजना सूत्र म॑ कर देनी चादहि९। इसीक्एि समुच्चय कै 
वगुण जौर क्रिया का यौगपच समुच्चयः इस ल्ग मे योगप का यण किया जायगा । जौर इसी 
लिए इसका पर्याय नाम भी सार्थक दैः क्योंकि इसमें क्रम अपनाया जाता हं । इसमे “विनिमय 
नदीं रहता इसलिए इसका परिवृत्ति से भी मेद दहै। उस [ परिवृत्ति] मेँ विनिमय को लक्षण 
बतलाया जाएगा । 

इसमे अनेकत्व से युक्त पदाथ दो प्रकार के होते दें संहत [इकटठे] तथा अक्षंहत [अलग अलग] 
इसके अतिरिक्त आधार ओर आधेय को लेकर जो द्रंविध्य हे वहदंदही। फलतः इसके चार भेद 
हो जाते हे । इनके क्रमः उदाहुरण-- 

[ असंहत अनेक आधारो मेँ एक आधेय | 

हे ! कालकूट [ विषराज | आश्रय की यहु उत्तरोत्तर उत्कृष्ट ॒पद वारी स्थिति तुञ्ञे किसने 
सिखलादईं दै । पहले तू समुद्र के हदय मेँ था, फिर शिवकेकण्ठ मे पर्हुवा भोर अव खलो की 
वाणी मरह राह) 

[ संहत अनेक आधारां मे एक आयेय~~ | 

“राग [रजक द्रव्य] मुक्त अधर ओर स्तनोँ के अंगराग से जरण कन्दुक से हटाया इमा [अपना] 
हाथ, जिसकी उगलिया कुचांङर उपाथ्ने से जहो तर्द खच गहं थीं उस [ पावेती ] ने रुद्राक्षमाला 
क प्रेमी बना दिया ।› [ कुमार सं० ५] 

[ असहत अनेक आधेयो का पक आधार ]- 

[ मेरा ] वदी राजपथ जो राच्रिकार मे चमकते ओर कर्रव से युक्त नूपुर पहिनी अभिसा- 
रिकाओंका संचारपथ वना रदा था, इतत समय बोलते समय सदसे निकली लकायियो करौ 
स्चिलमिकाहट मे मांस खोज रही सिरकष्धियों द्वारा रोदा जाता रहता हे । [ रधुंश्ञ-१६ ]॥ 


[ रंहत अनेक आधेया का एक आधार | 

“जिसमें युग्धा, इृद्योदरी, प्रिया, कान्ता शस प्रकार के रब्दाके बोल्ने का महान्‌ उत्सवं 
चला करता था, मेरे उसी सख मे इस समय देवगत्ति से पत्नी ओर भायां आदि शब्द धूमते 
रहते हे 2 

श्नमे [ से प्रथमम ] एक द्ी कालकूट अनेक अलग अलग धारो मँ क्रम से अवस्थित 
बतलाया गया । [ दितीय मेँ] एक दी हाथ भनेके एकत्रित [एक हौ स्थान पर श्कट्डे] 
पदार्थामें क्रम से [ निवृ्तिक्चाखी | बतलाया गया | क्याकरि अधर्‌ अ।र्‌ कन्दुक यइ निवृत्ति 
विषय के रूपमे [ एकवित ] संहत रूपमे विद्मानदहे। [ तृतीय से] अभिसारिकाएं ओर 
सिरकष्ियो अनेक स्वभावकी है नर [ अलग अख्ग समय मँ रहने वारी अतः] असंहत 
है, साथ ही एक राजपथ रूपी आधार क्रम से सचारथ॒क्त वतलददं गहं है। [ चतुर्थं मे ] मुखसूपी 
एक ही आश्रय म मुग्धात्व आदि कै वाचक शब्दौ के वगं ओर पत्नीत्व आदि कै वाचक च्ब्दां 
के वर्भं जो वर्गत्व कै कारण परस्पर संहत तथा अनेकरूप है क्रम से विघमान बतलाण 
गष दे । 


पयीयालज्ञारः ८५दे७' 
विमरिनी 


एकमित्यादि । इदमिति पययरक्तणस्‌ । तदेव व्या श््े-एकमित्यादिना । एक इति 
दवितीयापेदया । अतश्च वौ पर्यायौ । न पुनरेक एव । सामान्यरक्षमायोगात ! अत एद 
काव्यप्रकाशकृता घधये्तौ कषितौ । यदाह्‌ एकं कऋसेणानेकस्सिन्पयायः' इति, अन्य 
श्ततोऽन्यथाः इति च , ग्रन्थङरता त्वनयोरन्नान्यस्यान्यथा ग्रहणेन क्मान्यथा- 
भवोऽपि प्रसक्त इति दूषणोद्धावनयेवं रुत्तणं कतम्‌ । एवं 'कमेगेकमनेकच्रान्यथा 
चा पर्याय, इस्यपि न खञुचित तस्यैव प्रयोजनं दक्ञंयति- नन्वित्यादिना । किमथैमिति । 
विरेषारकारेीव तसप्रतीतिसिद्धेः 1 अथादित्ति। पारिलेष्यासमकार्सामर््यादिषस्यथेः । तेनेति । 
क्रमयौगपयस्वरूप्वेनेवष्यथंः । तत इति ¦ विक्ञेषात्‌ । तथेत्यादि ¦ अत्रापि क्रमम्रहणश्य 
प्रयोजनं द्‌र्शयति-- नन्वित्यादिना । भत एवेति । विज्ञेबखञयुच्चययोर्योगपद्यसं भवात । अन्वथै. 
मित्ति। '"परावचुपारयय इण? इत्यनेनानुपास्यये गम्यमाने घजो विहितत्वाद्‌ । जतश्चास्यव 
व्रमा्थामिधायिस्दाच्कमोऽपि पथगरकारतया न कद्धणीयः । अथाच्रारोहावरोहयोरधि. 
कयोः प्रती तिरस्तीति यच्छसेदास्य ृथग्छक्षणमिति चेत्‌ ¦ एवं तद्याधारेयानां परस्परं 
विच्तणष्वाभ्यामप्यदकारान्तरप्रणयनं स्याव । तयोरप्यधिकयोः पयाये संभवात । न चान्न 
तावस्कश्चिदतिद्चय उपरुर्यते, येन एथगरंकारस्वमपि स्वात्‌ । एवमारोहा।दना यदन्नः 
तरैटक्तण्यमवगम्यते तदेतद्धेदव्वे निमित्तम , न पुनः पथगरंकारतायाम्‌ । एकस्यानेकन्रा- 
ल्यथा वा क्रमेणावश्थानाख्यस्य सामान्यर्चणस्यान्नाप्य जुगसात्‌ । एव-- 


'यदेकस्माज्िवत्तोऽथ आधारान्तरसाश्नवेत्‌ । 
स पर्यायो निवृत्तौ तु क्रमोऽयं बहुधा स्थितः ॥' 

दव्यपि पर्यायादस्य परथक््दे निमित्त न वाच्यम्‌। निवरश्य निधुस्मे विच्छुत्तिविशेष- 
त्वाभावात । तस्मादश्य पयाय एवान्तभावार्षुयग्छक्षणघ्रणयनं नवनवालंकारथदसन- 
हेवाकमान्न मेवेव्यरं बहूना ॥ 

ननु चेकानेकरूपस्य यस्तुनोऽन्यन्न प्राप्तेः परिच््तिरेवायं कि नेस्या्षङ्कथाह- विनि- 
येत्यादि । संहतरूप इति । संघातरूप इष्यर्थः । अस्येति शब्द सामान्यमवरुग्ब्योक्तम्‌ । 
असंहते इति । आश्र याणामनेकस्वात्‌ । क्रमेणेति । हृदयाघनुक्रमात्‌ । एवमप्वेकस्येच काठक्ट- 
स्योत्तरोत्तराधिकस्थानासाद्‌ नाद्‌रोहगप्रतीतिः । अवरोहो यथा--'शिरः ज्लावं स्वगांत्‌? 
दरस्थादि । भन्न गङ्गाया उत्तरोत्तरस्थानास्ादनम्‌ । संहते इति । अधरकन्डुकादेरनेकस्वाश्नय- 
स्वात्‌ । करमवतिन्य इति । अभिस्षारिकाशिवानामतीतवतेमानकारावच्छिन्त्वात्‌ । सुग्धस्वा- 
दीनां बहुत्वाद्‌ वगंध्वम्‌ | 

एकम्‌ इत्यादि । इदम्‌ = यद = प्रयांयलक्षण । उप्त कौ व्याख्या करते है--णएकम्‌। शुक्‌ = 
दवितीय की अपेक्षा । श्ल पर्याय दो हए, एकव नही, क्योकि इसमे सामान्यलक्षण नहीं वनता । 
इसीलिए काव्यप्रकाद्यकार ने इनके रक्षण अल्ग अख्गक्िएि है । "एक क्रम से अनेकमे [ एक |] 
पर्याय होता है" इस प्रकार प्कका रक्षण कियाद ओर द्टूसरा प्याय उप्त [ प्रथम ] से उल्टा 
इस प्रकार दूसरा लक्षण । ्मन्धकार ने इसके विपरीत यहाँ इन दोना काज शस प्रकार भिकिति 
लक्षण बन।(या हे वह्‌ इस दोष कौोरकासेकि दूसरे क अलग बताकर यदि प्रथम से उलट 
वतलाया गया तो [ पकता ओर भनेकता फँ उल्टाव के साथी] क्रममे मी उल्टाव की संभावना 
होने लगती [ जवकि क्रम दोनों मे समानरूपं से अवस्थित रहता है }। इस प्रकार [ रत्नाकरकार 
दारा बनाया गया] क्रम से एक अनेक भ या उल्या पयाय [ कदलाता हे] यह्‌ रक्ष्णभीः 


९५६८ अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


ठीक नहीं है । उक्त | क्रम ] का प्रयोजन वतकाते ईै-ननु० इत्यादि पंक्ति के दारा । किमर्थम्‌ = 
विदेषाल्कार से ही उसकी प्रतीति हयो सकती थी तव इते क्यों अलंकार माना गया । अर्थात्‌ = 
पारिष्यरूपी सामथ्यं से । तेन = उससे = क्रम ओर यौगपथय से) ततः = उससे = विद्ञेष से। 
तथा = यहाँ मी क्रमद्ञब्द अपनाने की आवद्यकता वतलाते है--"ननु० अत एव = इसी. 
ङ्णि = विज्ञेष ओर समुच्चय मँ यौगप रहने से । अन्वर्थम्‌ = साक = क्योकि प्परि उपसगंपृवेक 
इण्‌ घातु से अनुपात्यय [ = परिपाटी = क्रम | मधे निकल रहा दो तो इणप्रत्यय होता है 
[ पा० सू ३।३।३८ क्रमप्राप्तस्यानत्तिपातोऽनुषात्ययः"काञ्लिका ] इस सूत्र से अनुषात्यय अथंकी 
| व्यंजना मे इण्‌ प्रत्यय के विधान से पयायश्ब्द वना हे । इस प्रकार पर्याय-रब्द्‌ क्रम का वाचक है 
| फलरतः [ रत्नाकरकार क | क्रमालकार को मी जलग से मल्कार नहीं वतलाना चाद्दिए। यदि 
| कटं-- यहां [ क्रम मं] आरोह ओर अवरोहये दो तच्च प्रतीति मँ अधिक भासित दोते है अतः 
| इसका प्रथक्र अककारके रूपम लक्षण ठीक दी है" [ उत्तरतो ] रेतो आधार ओर भवेय भी 
परस्पर मं विलश्णता८ रहती दै, तव उन्मेनेमी एकं एक के आधार पर स्वतन्त्र अलंकारो के 
लक्षण वनाने चाहिए, उन आधाराघे्यो] मे मौ [आपके द्वारा स्वीकार] पर्याय कै अन्तर्गत प्रत्येक के 
प्रति मरत्येक दूसरे को अधिक माना जा कतां । फिर इस [ क्रम नाम से अभिहित अङ्वार कै 
आरोह अवरोह] में कोड चमत्कारभेद भी नदीं दिखाई देता, जिसे हते थक्‌ अलंकार माना जाए । 
यदि आरोह आदि को लेकर कोदं विदोषता दिखादं दैतीदहदो तो उसते क्रम पर्याय कामभेददही 
सिद्धदह्यो सकता है, पथक्‌ अलंकार न्हीं। पर्यायका रमसे एका अनेक मे रहना या 
इससे उल्टे अनेक का एक म रहनाः श्स आशय काजो सामान्य लक्षण [ भाप वनाया ] हे 
वहदोर्नोर्मेदहीलागूहो जाताहै। इस कारण [ रत्नाकरकार दारा ]1- 
 किक्तीकेण्कसे दट कर दूसरे आधार मे प्ुवनेसे पर्याय, सौर अनेक बार 
सेक्रमदहोता है, 
दस एकार मीक्रमको पयाय सै अलग वतरने मँ जो निमित्त वतल 
अरकिचित्कर है । निचृत्ति ओर अनिङृत्ति से चमत्कारं कोई अन्तर नहीं आत। । इस्िए 
जव इङ्ग पर्याय मँ अन्तमांव हो सकता ह तव स्वतन्त्र जलका के रूप मे अलग लक्षण वनानां 
ओर उछ नदीं केवल नद नए अलंकारो के प्रद्ंन की इवशभर है। इत विषय इतना ही 
कहना पया हें । | 
दाका होती है--अनेकल्प वस्तु कौ अन्यत्र प्रपि होनेत्े [ पयाय का | यह [सेद्‌ ] 
परिषत्ति स्वकूप ही है'--इस पर उत्तर देते है --विनिमय० । संहतरूप = संवातात्मवः । अस्य्‌ = 
इस [प्रयाय ] के [चार मेद दै यह प्रयाय | शव्द कौ समानता को ठेकर कहा [ क्योकि दोना 
रयाय तत्सतः चिन्न है | । असंहते = मलग मलग = माश्रवो के अनेक होने से । क्रमेण = हृदय 
अदि के अनुक्रमसते। इतने प्रर मीस्त्यहेकि यदा [ रत्नकरकार दारा प्रतिपादित ] आरोहण 
| कौ प्रतीति होती है वर्योफि यहां एक दी कालन्रेर की उत्तरोत्तर अधिक उचेस्थानकौप्रा्ष 
होती हे! अवरोह का उदाहरण [ भषहरि का | यह [ प्रसि | पच है- 
शिरः शार्वं स्वगांत्‌० ।' 
यहा गङ्गा जी का उत्तरोत्तर [ अवर | स्थान प्राप्त करन। वशित है। संहते = श्कत्रित = 
भधट्‌ कन्दुक आदि मनेक आश्रय ल्प से संहत हें । क्रमवर्सिन्यः = क्रम से युक्त = क्थाँकि 


भभिसारिक। ओौर सिरकष्धियां अतीत तथा वत्तमान कालकी वस्तुं वतरा गई हैः । सुग्धत्व 
आदि में वगे इसलिए है कि एकाधिक हैः ॥ 


दरने मात्र 


या गया वह्‌ 


नि छ `` ` पवाक वा का र 
। 4 "१ क क श आक क = अ ~ = = ` = ` = ` ` = ` व्यौ ~ क क करज कका तु मा सि का या रा त का क कका तक ऋका 


पयाोयालङ्ारः ९९६९. 


विमक्ञं-पर्यायाककार का इतिहास- 

प्याय को अलकरार प्रथमतः रुद्रटने ही माना है। उन्होने इसके दो मेद किए है, जिनमे से 
प्रथम पयायोक्तालंकार के अन्तगत आता है। द्वितीयकारूप वर्तमान पर्याय से अक्षरशः मिलता 
हे । वह यह दे-- 


यत्रेकमनेकस्मिन्ननेकमेकव्र वा त्रमेण स्यात्‌ 
वस्तु खुखादिप्रकृति क्रियेत वान्यः स पर्यायः) ॥ ७।४४ ॥ 


"जहा सुखादिस्वरूप एक वस्तु अनेक में मथवा अनेक वस्तु एक मे क्रम रहे यारखी जाए 
तो वह पयाय कहलाता है ।› इस प्रकार चारमेददहै[ १] कर्तृरूपं ८क वस्तु का अनेक मे रहना 
[२ ] कटू अनेक वस्तु काणक मंरहना, [३] कर्मरूप एक वस्त॒ का अनेक मे रहना 
तथा [ ४ ] कर्मरूप अनेक वस्तु का एकमे रहना । रुद्रटने इस उदाहरण दोडी दिए है, 
किन्तु उने चासो भेद गताथै हो नाते हे । उदाहरण ये है-- 

कमलेषु विकासोऽसूदुदयति भानादुपेत्य कुसुदरेभ्यः । 
नमसोऽपससार तमो बभूव तस्मिन्नथालोकः ॥ 


"सूयं उगते ही कुमुदं से हटकर विकास कमलो मे दिखाई देने लगा इसी प्रकार आकाश मे 
अन्धकार हटा ओर प्रका आया ॥ 


इसमे प्रथमाधं मे कलह एक विकास कौ स्थिति बुद्‌ ओर कमल रूप अनेक आधारौ में 
दिखलाईं गदं है जवि अपराधे मे कवरैरूप अनेक अन्धकार ओर आलोक की स्थित्ति कही 
आकारा में । इस प्रकार यह एक पय कतृमूलक दोनो मेदो का उदाहरण हुआ । 
'आच्छिच रि पोरक्ष्मीः कृता त्वया देव मृत्यमवनेषु । 
दत्त भयं द्विषद्भ्यः पुनरमयं याचमानेभ्यः ॥ 


हे राजम्‌ ! आपने लक्ष्मी को शत्रुओं से छीना कर शत्यं के भवनों मेवा दिया है। इसी 
प्रकार शात्ुभो को देष करने प्र भय तथा याचना करने परर अभय प्रदान किया है) यों 
प्रथमां मे दी लक्ष्मीरूपी कमं को रात्र मौर शत्यमवन रूपी अनेक आधारो मे बतलाया गया हे। 
हसी प्रकार उत्तराधेमे रतु रूपी एक ही आधार में मय ओर अभय रूपी अनेक कर्मो का अस्तित्व 
बतलाया गया है । फलतः यह पच कम॑मूलक दोनों पर्यायो का उदाहरण है । 


मम्मटः ओर रत्नाकरकार के पयायलक्षण विमरिनीकार ने यहीं उद्धृत कर दिएदहें। 
रत्नाकर का पयालक्षण यथासंख्य के प्रकरणमेंमौदियाजाचुकाहै। मम्मटने उदाहरण के 
रूप में सवेस्वकार दवारा उद्धत 'नन्वाश्रयस्थिति प्य ही प्रस्तुत कियाथा। शओोभाकरके वादके 
आचार्यो के प्यांयनिरूपण इस प्रकार है- 

अप्पयदीङित-- पयायो यदि प्यायेणेकस्यानेकसंश्रयः ।' 

"एकस्मिन्‌ य्॒तेकं वा पयायः सोऽपि संमतः ॥ 
पण्डितराज--१ क्रमेगानेकाधिकरणकमेकमाधेयमेकः पर्यायः । 
२ क्रमेणानेकाधेयकमेकमयिकरणमपरः ॥ 
विश्वेश्वर-'एकमनेकमनेकेकस्मिन्‌ क्रमतोऽस्ति स पर्यायः ॥? 


इन सभी लक्षणों का अथं वद्र है जो सव॑स्वकार के लक्षणका है। केवर विदवेदवर ने दोनों 


५७० अलङ्ारसवंस्वम्‌ 


पर्यायो को ९क दी सूत्र मे रखकर कदाचित्‌ यह सिद्ध करना चादा दहै किये दोनों दो पृथक्‌ पृथक्‌. 
न्दी, अपितु कदी । 
संजीविनीकार कौ निष्कृष्टार्थकारिका इस पर यद दै- 
"पर्याय पकोऽनेकसिमिन्नेकनानेक इत्यपि । 
द्विधा क्रमवशद्रेतौ न विद्धेषससुच्चयो ॥ 
नेयं विनिमय [भवात्‌ परिवृत्तिभिदा त्विह । 
चतखोऽनेकलूपस्य पृथक्‌ संघातवत्तनात्‌ ॥ 
पृथक संघातवृच्तित्वादनेकोऽ्थो द्विधा स च) 
आधारापेयभावस्थदचतसखोऽस्य भिदास्ततः ॥ 

"पर्याय अलंकार-वह होता ३ जिसमें क्रम से अनेक एक में अथवा क्रमसे दी एक अनेक मे स्थित 
दिखलाया जाता है । क्रमके कारण यह न विदेषालंकारस्वरूप है ओर न ससुच्चयस्वरूप । 
इसमे विनिमय का अभाव रहता दहै सचि यह परिव्ृत्तिस्वरूप भी नदीं ठहरता। इसमे चार 
मेदः होते है क्योकि इसमे अनेकरूप अर्थक्तवात मँ नदीं रता है। तव एक मेद स्वतन्त्र मेद 
माना जाता है, ओर जव रहता है तब एक स्वतन्त्र भेद । इसी के साथ यहु अनेक अथं स्वतः 
आधार रूप होता 8 ओर आधेयरूप । इस कारण इसके केवल चार ही भेद दोतेहैः। 

स्पष्टहेकिरुद्रटके चार मेदां की पेक्षा सवंस्वकार कै चार मेद अधिक वैज्ञानिकैः रुद्रटः 
के मेदो मे कवठकम॑माव को आधार माना गया हे जवकि सरव॑स्वकार्‌ के मेदो म आधार भौर आयय 
की संवतात्मकत। ओर असंधतात्मकता को । कठकमेभाव अथंप्रकृतिगत धर्म है जवकि संवातासघात- 
माव परिस्थित्तिजनित विश्चेपतार्ए । अलंकार परिस्थिति पर अधिक निर्भर रहते हैँ । इसके अत्तिरिक्त 
अधारावेयमाव के साथ कठेकम॑माव को जोड़ देने से व्याकरणतच्व को प्रसुखता मिलती ट, 
काव्यततव को नदीं) मम्मट दिने ये भेद स्वीकार नदीं किए । वस्तुतः इन अवान्तर 

सृक्ष्मताओं कौ सौन्दयै का प्रतिमान मानना हृदयस्ंमत नदीं कदा जा सकता । 


पाठमेद्-पर्यायारंकार केजोदो अल्ग ल्ग रूप उनमें से प्रत्येक के किण वृत्तिकार ज 
हस प्रकार भग अलग वाक्य वनार है-- 


[ १] एकमाधेयमनेकरिमन्नाधारे यत्‌ तिष्ठमि स रकः प्यायः । 
[ २} एकस्मिन्नाधारेऽनेकमाघेयं यत्‌ स्त द्वितीयः पर्यायः 
इनमे से नि्णयसागरीय संस्करण में प्रथम वाक्यतो वृत्ति सूपमेंहीछपा दै, चिन्तु द्वितीय क 


मुदरश्चर स्थूल है सतः वह पू्र-रूपमें छषा प्रतीत होता हे। संजीविनीकार, विमरिनीकार 
¢ 


अनन्तदायनकतस्करणकार, काशीसंस्करणकार तथा कुमारी जानो ने इस वाक्य को दृत्ति रूप प्न ही 
स्वीकार किय! है । डो” रामचन्द्र दिवेदी गै सस्करणमे टिप्पणी मेँ तो इते वत्ति ही माना गया है 
परन्तु मृ मे सूत्रूप पे अलग अल्ग सूत्र संख्या †र॒स्थूलक्षरो मे छप दिया गया है । वस्तुतः 
यद वैसा दी भमर जेता सूत्र-्के विषय मं हमाथा। उ्तेतो इन समी प्रका जौर 
संस्कर्तारं ने वृत्ति रूपमे ही प्रादित करर्खाह। 

विमर्चिनी म--क्रपेणैकमनेकत्रान्यथा वा पयाय इत्यपि न समुचितम्‌" के अन्तिपर तीन पद 
निर्णय तागरसंस्करण मै इत्यपि सूचितम्‌? इसी सूप मे छपे ह 1 अधसंगति तो इस सुद्रण मेँ मी संमव 
थी किन्तु उस्म क्रदपना को अधिक स्थान दैना पडता, उसके साथ [न समुचितभिति] 
पुरक वाक्य जोड़ना पड़ता अतः हमने स्वमत्या पाठ बदर दिया है । 


परेच्यठङ्कारः ५७१ 
| सवरव | 
[ख ६२ समन्यूनाधिकानां समाधिङकन्युनेर्धिनिमयः परित्तिः । 
विनिमयोऽज किचित्‌ स्यक्त्वा कस्यचिदाद्‌ानम्‌। समेन वतुल्यशुणेन 
त्यज्यमानेन ताडस्ये वादनम्‌ , चथाधिकेनोर्छृष्टगुणेन दीयसानैन न्यूनस्य 
गुणदीनस्य परिच्रहः, पव न्यूनैन हीनगुणेन स्यज्यमानेनाधिकश्णस्योः 
त्छष्टस्य स्वीकारः, तदेषा ज्िभकासा परिच्त्ति; । क्रमप्रतिभाससंभवत्‌ 
पथां वानन्तस्मश्या छश्चणम्‌ । समपरिघत्तियंमा- 
'उरो दत्छामरारीणां येन युद्धेष्वगरृ्यव । 
हिरण्याकश्चवधाद्‌ येषु यश. साक जयश्चिया 
अनोरोयद्सोस्तुस्यशुणत्वम्‌ ¦ अधिकपरिद्रतियेया-- 
'किमित्यपास्याभरणानि यौवने घतं स्वया वाधंकश्चोभि वल्कलम्‌ । 
वद्‌ परदोषे स्फुटचन्द्रतारका विभावरी यद्यख्णाय कल्पते ॥' 
अबोल्छष्टशुणे साभरणेन्युनगुणस्य वर्कस्य परिचरत्तिः । न्यूनपरिः 
वतियथा 
५ ॐ 
'तस्य च प्रवयसो जटायुषः स्वर्गिणः किमिव शोच्यते बुधः । 
येन जजरकटठेवर्ययात्‌ कऋौतमिन्दुकिस्णोऽज्व्टं यशः |" 


अन्न हीनगुणेन कडठेवरेणोत्छष्टगुणस्य यशसो विनिमयः । 
"दत्वा द्‌द्नमेते मत्प्राणा वस्तचु त्वया क्रीताः । 
कि त्वपहरसि मनो यददासि रणरणकम्रेतदसत्‌ ।\' 
अत्रायाघं लमपरिचरत्तिः । द्वितीयाघे न्यूनरिच्त्तिः । 
[ सून्न 8२ | खम, न्यून ओर अधिक कासम अधिक ओर न्यून से विनिमय परिचत्ति 
[ नामक अरूकार कहरखाता हे ] ॥ 
[ दन्ति ] विनिमय का अर्थं है यँ कुछ छोडकर कुछ लेना । [ १ ] सम अर्थात समान अहता 
` कै पदार्थकेत्यागकेद्वारा वेते ही प्दाथे का आदान, [२] इसी प्रकार अधिक अर्थात्‌ उक्छृष्ट 
गुण या अधिक अहता के पदाथैके दान के द्वारा न्यून अरात्‌ हीनयुण या न्यून अहता के पदाथं 
का आद्‌।न तथा [ ३] न्यून अथात्‌ हीनथुणया कम अहताके पदार्थके व्याग कै दारा अधिक 
गुण अथात्‌ उकत्करष्ट पदाथ का आदान, इस प्रकार परिवृत्ति तीन प्रकार को होती है। श्समेमी 
क्रम का प्रतिभासत होना संभव है हस्तल्िए इसका लक्षण पर्याय के पश्चात्‌ किया गया। इनमे से 
सभपरिषत्ति, यथा-- 
"हिरण्याक्ष कै वध से, जिन युद्धो म जिसने उर देकर राक्षसो का य॒श्च जयश्री के साथ छे 
ल्या था।' [ कान्याल्कारसार फ रीकाकार प्रतीहारेन्दुराजने 'उरोदवाः को छोकोक्ति माना रहै। 
वीर अपनी छती श्च ॐ सामने खोर देता है यही उक्तका उरोदान है। कदाचित्‌ यरयष्दाःका 


उरं ओर यच गुणों मे समान रहै, 


अथं विदारण करना हे । इस अर्थं म दान = देने विदारण करने मेँ दरेष मानना होगा ] ¦ वर्य 


५७२२ अलज्ारसवेस्वम्‌ 


अधिक परिवृत्ति, यथा- 

'इस यौवन मेँ तुमने विविध आभूषण छोड, वार्धकय मेँ रोमा देने वाले वल्कल क्यों पहन 
रखे हं। वुम्दीं कदो! यदि खिले चन्द्र तारा की [ मध्य] रात्रि अरुणोदयके लिए प्रयत्न 
करे 1 [ कुमार० ५] 

यहां उक्छृष्ट युण वाले आभूषणं से न्यून युण वाके वल्को की परिवृत्ति [ अदलावदली ] है । 
| न्युनपरिवृत्ति, यथा-- 
| 'उस वहत अभिक उमर वाङ जटायु के स्वगं ्िधारनेसे विद्वानों को दुःखदी क्यो होगा जिसने 
| जजर दारीर के व्यय से चन्द्रकिरणोँ जेसा खन्दर यद्य अजित कर लिया ।' 
| यहां दीनयुण बाले शरीर ते उत्कृष्ट गुण वाले यच्च का विनिमय बतलाया गयाहे। 
| हे उन्दरि ! तूने दशन देकर मैरे ये प्राण खरीद ल्णि [सो ठीक क्या] किन्तु मन कौ 
| इरण कर जो त॒म उत्कण्ठा दे रही दो यह ठीक नदींदहै। 

यहां पूवाधं मेँ समपरिचरत्ति है ओर उत्तराधं म न्यून परिषत्ति॥ 


विमदिनी 


समन्यूनेत्यादि । एतदैव उयाचष्टे--चिनिमय इत्यादिना । तादृशस्येति । तुस्यगुणस्येस्यथः । 
अतश्चात्र द्वयोरपि तुक्य गुणध्वात्‌ सयञयमान। दीय मानयोगस्यमानमोपम्यस्‌ । एवं च तन्नि- 
मित्तस्य साधारणधमंस्यापि त्रैविध्यम्‌ । अधिङव्वं न्युनव्वं ओष्ष्टस्वाजु्हृशटस्वयोगात्‌ । 
अतश्चात्र शाब्दो पात्तमेतद्‌ भवति कछचिव्सामथ्यंम्‌ । तदिति विनिमयस्य च्रिरूपस्वात्‌। 
क्रमप्रतिमासेति ' व्यागादानयोः पौर्वापर्यण क्रमिकस्वाव्‌ । तुव्ययुणत्वमिति । वे पुलयादिना 
सखाधारगघमंस्यानुगामितया पुनरत्र तुदयगुणतवम्‌ यथ।- 
“सुधावदातं पाण्डुष्वं विनिधाय कपोख्योः। 
सीयत्कथोस्था शात्रणां निःशेषमकरोद्‌ यञ्चः ॥ 
सुघाबदातमिरयस्यानुगासिव्वस्‌ । विम्बप्रतिबिभ्बभावो यथा- 
'रूतानामेतासाघ्ुदितद्सखुमानां मशूदसौो 
मतं छाश्यं स्वा श्रयत्ति श्ठरमामोद्मसमम्‌ । 
खतास्स्वध्वेन्यानामहह दशमादाय रभसाद्‌. 
व्याधिभ्याधिश्चमर्दितमोहव्यतिकरम्‌ +? 
अत्र मतत्वाल्मस्वयोिस्बप्रतिधिग्ब नावः। शद्धसामान्यङूपत्वं यथा- 
(मनोहरं द्वं प्रतिवेतनाय रतं प्रकढप्योन्मदचित्तहारि । 
मध्वराददानौो मघुपायिखोकः पद्याकरागासनरुणी बभूव ॥ 


अच्र मनोहरष्वचित्तहारिष्वयोः सद्धस्ामान्यर्पस्वघ्र्‌ । आभरणानां चान्नोर्कुष्स्वं 
वस्तुसामर्याह्ञभ्यते । वद्कलस्य पुनर्वाधंकज्ोमीत्यनेन स्वयमेव न्यू नस्वुक्तम्‌ । यवं 
करेवरय शखोरपि जजंरोजञव दष्वेन न्यूुनाधरिकल्व मुक्तम्‌ । एतच्चास्य प्राच्येरप्य्छमिति 
शद्रटो दाहरणेऽपि समपरिश्च्यादि यो जयति - दप्वेत्यादिना । 

समन्यूनस्वेव्यादि। हसौ की व्याख्या करते हे--' त्िनिमय' इत्यादि कै दरा। तारकस्य = 
वेते = वल्ययुण वाले । इसी कारण यहो छोडे जाते भोर क्िजाते पदार्थौ मँ साटररय गम्य रहता 
हे वर्योकि श्न दोनों मे युणगत तुस्यता रहती है। श्सी कारण गुण निभित्तक साधारणधर भी 
तीनो प्रकार कादोता है । अभिकत्व भौर न्यूनत्व यर्दा गुणगत उक्छृष्टत्व ओर अनुल्ृष्टत्व के 


परिचरस्यलङ्कारः ५.७द 


योगसे होता है। इसीक्िए यह प्रायः शब्दतः कथित ही रहता है, ययपि कहीं वाक्याथंसामथ्यं 


से गम्य भी होता है। तत्‌ = इस कारण अथाव विनिमय के तीन प्रकार के होने के कारण । 
छम प्रतिभास-तरयोकि व्याग ओर महण में पौवापय रहता है अतः ये क्रमिक होते है । तुल्य. 
गुणत्व = वैपुस्य वि्ा्त्व आदि को ठेकर [ य॒ ओर वक्ष दोनो विदा होते हं] साधारण धमं 
की अन्तुगामिता के कारण जब यहाँ गुणगत समानता रहती है उसका उदाहरण - 

छदं भिद्धी जेसी उज्ज्वरू सफेदी कपोलों मेँ आदितकर [ जिसके ] यद ने जिसकी चचांसे 
उत्पन्न भय को समाप्त कर दिया) 

यहाँ [ मय ओर सफेदी के साधम्य में ] सुधावदातत्व = छयुदे सिद्धी सी उज्ज्वलता अनुगामी 
धमं हे । विम्बप्रतिविम्बमावमूकक साधारणधमे यथा-- 

"यह पवन इन कुसुमित कतार्ओं को अभिमत रस्य देकर पयांप्त मात्रा मेँ अद्धितीय सौरभ के 
रहा है। किन्तु वड़े दुःख की वात हेकि लतां पान्थो कौ आंखें लेकर सहसा साधि, व्याधि, 
चक्र, रोदन, मूच्छ सादि एक साथदेती हें? 

य्य [ लास्य ओर सौरभ के साध्यं मे मतत्व ] अभिमतत्व ओर [ अस्तमत्व ] अद्धितीयत्व 
धर्मौ में विम्बप्रतिविम्बमाव है । शुद्धसामान्यर्प साधारण धमं यथा-- 

'मूदय कै रूप मे अपना मनोहर गुंजन देकर उन्मत्त चित्तं को आङ्क्ट करने वाले मधु ठे रहे 
मधुकसों ने पद्चाकरो से उरिणता प्राक्च कर ली ।` य्ह मनोदरत्व ओर चित्तहारित्व शुडध 
सामान्य धर्मद [ मधु ओर यंजनके साम्यम || 

[किमित्यपास्था-पच मेँ] जामरगां की उच्कृष्टता पदार्थ॑स्तामथ्यं से विदित दती है, दन्तु वल्कलं 
की न्यूनता (्वाधेकञ्चोभिः =ष्वाधैक्य मे शोभा देने वलेः इस विरोषणसे [क्विने ] स्वयहौ 
कह दी हे । इसी प्रकार [ तस्य च प्रवयसो° पच के ] कलेवर [ शरीर ] भौर यद्य के न्यूनयुणत्व 
जीर उत्कृष्टत्व जज॑र तथा उज्ज्वल चाब्दोंके द्वारा कहदिएगणदहं। ये [ न्यूनत्वादि वामन तथा 
उद्भट इन रद्रटपृच॑वत्तीं ] प्राचीन आचार्यौ ने मी वतलाए ये [ किन्तु र्द्रट ने नदीं अतः] रुद्रट 
के [ परिवृत्ति- ] उदाहरण मे मी समपरिवृक्तित्म आदि धमं दिखलाने के छि छ्खितेहै 
दत्वा" इत्यादि ॥ 

विमरं-परिच्त्ति का इति€ास 

दण्डी-ॐ काव्यादद् मे परिव्त्तिका उच्टेख मात्र है लक्षण नीं । उसमें उदाहरण के रूप 
म निम्नलिखित प्य दिया है-- 

(रा्लप्रहारं ददता भुजेन तव भूभुजाम्‌ । 
चिराजितं हृतं तेषां यदः कुमुदपाण्डुरम्‌ ॥› :।३५६ ॥ 

'आपके' राजाथ को शच प्रहार दे रहे वाः ने उनका चिराजित कुमुदवुस्य उज्वल यद हरण 

कर लिया । 

भामहः = "विशिष्टस्य यदाद्‌।नमन्यापोहेन वस्तुनः । 

अर्थान्तरन्यासवती परिवृत्तिरसो यथा ॥ ३।४१ ॥ 
प्रदाय विन्तमर्थिभ्यः स यदरोधषनमादित। 
सतां विद्व जनी नानामिदमस्खलितं व्रतम्‌ ॥ ३।४२ । 


'अन्य वत्तु वे त्यागके द्वारा अन्य विशिष्ट वस्तुका जो मादान उसे परिवृत्ति कहा जाता है; 
यह अर्थान्तरन्याप्त से मी युक्त रहती है । यथा- 
“याचको को धन देकर उसने यशोरारि अजित कौ । यह्‌ समौ स्पुरुषों का अन्वूक व्रत दै ¦ 


व क छत स य ता क 


५७७ अल्छ्लारसवंस्वम्‌ 


मामडइ के इस विदेवण में न्यूनाधिक्माव की व्यंजना है । वामन इसे पकड ठेते हैं । 
वामन--[ सूत्र ] 'समविसद् शाभ्यां परिवक्तेनं परि डतिः ॥ ४।३।१६ ॥ 
[ वृत्त ] समेन विसद्द्ञेन वार्थन अर्थस्य परिवत्तंनं परिवृत्तिः । यथा-- 
आदाय कर्णकिसल्यमियमस्मे चरणमरुणमपयति । 
उभयोः सढृद्ाविनि मयादन्योन्यमवच्ितं मन्ये ॥ [ माल्विकाग्निमिच्र ] 
विच्य सा दारमदहायनिश्चया विलोक्यष्टप्रविटप्तचन्दनमू । 
वन्ध बालारुणक्श्ु वदकल पयोधरोत्तेधविशीणेसंहति ॥ [ कुमार संभव-“+ ] 
समान या असमान अर्था दवारा अर्थोका परिवत्तंन परिषृत्ति कदलाता है। यथा [ अग्नि 
| मित्र की उक्ति ।-- 
| [ अश्चोकदादद सम्पन्न कर रही ] यद्‌ [ मालविका ] इसते कान मे लगाने योग्य कपल लेकृर 
| अपना यावकरजित अरुण चरणदे रहीदहै। दोनों का सौदा अनुरूप रहा, अतः दोनो कोन 
घटे मं रहा नदीं मानता 1 यहां मालविका का चरण जौर अद्योकका किसल्य समान अहंता के 
है, अतः सदृ विनिमय हुआ । 
अहायनिर्चया उक्त [ पावती |ने दारको जल्ग कर दिलती दालाकार्ओो दारा चन्दन भिर 
देने वाला, बालसूयै सा पिं्ञग वणका वल्ल वोधा, पयोधरो के उठाव से जिसकी दरालाका्ओं 
का जमाव विरलो जाता था +" यहो हार्‌ भौर वदकल असमान हैँ । 
` उद्धट = ने सम न्यून अधिकः इन तीन गुणमात्र मेदो तथा “इष्ट ओर अनिष्टः 
॥। विदोषतार्ओं मेँ परिवृत्ति का स्वरूप अंकित किया दै- 
। 'सम-न्यूनविदिष्टेस्त॒ कस्यचित्‌ परिवर्तनम्‌ । 
अ्थानथस्वमावं यत्‌ परिवृत्तिरमाणि सा ॥ ५।१६ ॥ 
समपरिवृत्ति का उदाहरण--“उरोदत्वा० पयय ही । 
न्युनपरिब्त्ति- 
नेत्रोरगवशश्राम्यन्मन्दरद्विरिरदच्युतेः । 
रत्नैरापूयं दुग्धाबव्धि यः समादत्त कौस्तुम्‌ ॥ 
नेती बने सपराजके दारा वल्क घुमाए जा रहै मन्द्राचल े शिखरा से गिरे रत्नो ह 
दग्धाच्धि को भरकर जिसने कीस्तुममणि प्रहण की ।' यहां निष रत्नो के दान द्वारा रस्तुम- 
नामक उत्कृष्ट रत्न लिया गया अतः न्यूनपरिष्ृत्ति हृं । 
अधिकपटिवृत्ति ~यो वलौ व्य।प्तभूसीम्नि मखेन यां जिगीषति । 
अभयं स्वग॑सञ्चभ्यो दच्वा जग्राह खवंताम्‌ ॥ 
| जिसने, वलि जव भूसीमा को व्याप्त कर स्वग यक्षदारा जीतना चाद रदा था, तव देवता 
को अभव देकर कामनत्व दण किया ।' यहो जभय प्क विशिष्ट वस्तु जिसकी तुलना तं छोटापन 
| वामनत्व ] तुच्छ वस्तुहै। इस प्रकार यहां उच्छरृ्टता देकर निम्नता का महण होने से 
अधिकपरिषृत्ति हदं । 
रुद्रट~-ने समासमत्व आदि पर बल नीं दिया भोए परिषृत्तिका लक्षण सामान्यतः श्त 
भकार किया - 


इने दो अगतं 


ध्ुगपद्‌ दानादाने अन्योन्यं वस्तुनोः क्रियेते यत्‌ । 
क्वचिदुपचर्यते वा प्रसिद्धितः सेति परिवृत्तिः ॥ ७।७७। 


परिचत्त्यठज्नरः ९७५ 


वस्तुओं का एक साथ जो दान ओर आदान वस्तुतः क्रिया जाता बतलाया जा रहा दो अथवा 
प्रसिद्धिके आधार पर लाक्चषणिकसरूपसे तौ वही परिवृत्ति कदराता है उदाहरण दत्वा ददोन०” 
पच्च ¦ यहां प्राणो की खरीद ओर मनका हरण प्रसिद्धि पर निर भौर जौपचारिक तथ्य है । 

मम्मट-"परिवृत्तिविनिमयो योऽधानां स्यात्‌ समासमैः) पदार्थौ का विन्निमय परिढ्त्ति 


कदराता हे । यह समके द्वारा सम का ओर अपस्मके दारा असमका [इस प्रकारसे] हो 
सकता है । 


उदाहरण = समसे सम ओर अप्तम मेँ अधिकसे न्यून की परिवृत्ति ॐ लिए 'लताना- 
मेतां" पच । ओर न्यून से भपिकं की परिवृत्ति के किए निम्नलिखित पय- 


'नानाविषेः प्रहरणेप संप्रहारे स्वीकृत्य द।रुणनिन।!दवतः प्रहारान्‌ । 
दृप्तारिवीरविस्रेण वछन्धरेयं नि्विप्रलम्मपरिरम्भविधिर्विती्णां +: 


हे राजन्‌ ! युद्ध मं नाना प्रकारके असा से दारुण निनाद वाले प्रहार अपना कर टप 
श्च वीरोंने आपको यह्‌ निप्रुम्भहीन आदलेष बाली वसुन्धरा प्रदानङकी दै, यदहो प्रहाररूपी 
निम्न वस्तु छेकर वजन्धरा जेसी उत्कृष्ट वस्तु के दान का वणन होने मे परिदृत्ति अधिकपरिष्न्ति 
कहराएगौ । 

सवेस्वकार के परवत्तीं आचायों ने परिङ्त्ति का निरूपण इस प्रकार किया है- 

शोभाकर = "विनिमयः परिषत्तिः ॥ सु° ९० ॥ 


विनिमय परिवृत्ति कदराता हे ।` लोकिकं विनिमय का इस्त विनिमय से अन्तर वतलातते 
हुए रत्नाकरकार ने ल्स्िा है-लोकमे देकरचक्ेने का विनिमय माना जाता है जबकि य्य 
त्यागपूवंक सपनाने को भी विनिमय कहा जाता है ओर उपकार परकिएट गए प्रव्युपक्ञार को 
मी ।' परिष्रत्ति की मेदगणना मी रत्नाकरकारने अपने ठङ्गसे कीरहै। सर्व॑स्वकार-दारा प्रति 
पादित सम न्यून तथा अधिक ये तीन भैद रत्नाकरकार से प्रथम स्त्यागपूवैक आद।{न'-नामकः 
वगं मेँ गिनाए हं । क्तप्र तिङृतनामक द्दितीय वग मे उन्दोने 'अनभीष्ट वस्तु भिलने पर अनसीष्ट 
कायै करना" तथा 'अमीष्ट वस्तु मिलने पर अभीष्ट काय॑ करना-भ्ये दो मेद वतलाए है। इनमे भी, 
उन्होने समत्व, न्यूनत्व तथा अधिकत्व नामक तीन कोटि्खा मानी है अन्ततः परिदृत्तिके सख्य 
तीन ही शीषं स्वीकार कियेदहैः सम, न्यून तथा अभिक । रत्नाकरकारने काम ओर इानि कै 
विनिमय मे पिषमालङ्कार माना है-- 


दोषे च दोषस्य युणे च तस्य कृते कृतिः स्यात्‌ परिव्त्तिरेव । 
गुणे तु दोषस्य विपय॑ये वा य॒द्गो चरोऽसो विषमः स भिन्नः॥ 


रम ओर हानि के विनिमय में विषमालंकार मानकर कदाचित्‌ मम्भट के लतानायेतासाम्‌० 
पद्य के उत्तराधं मे मानी गहं परिषृत्ति को रत्नाकरकार विषम मानना चाहते है। उन्दने 
भम्मट का यह पद्य उदाहरण के रूप मे अपनायाभी नहींदहे। सभीमेदोके किए सवथा नवीन 
उदाहरण दिए ह। 

लप्पयदीक्लित- का चिन्तन क्स दिशा में क्रान्तिपूणहे। वे समपरिषृत्ति स्वीकार नदीं 
करते । उनका लक्षण-- 

"परिवृत्तिविनिमयो न्युनाभ्यधिकयो्भिथः ॥' 
उदा०--तस्य च प्रवयसो जटायुषः० । 


५७ अलङ्कारस्वेस्वम्‌ 


"० गणी 


पण्डितराज- जगन्नाथ के परिवृत्ति चिन्तन में नवीनता भमीदहै ओर परिष्कार भी) वे परि. 
ठ्त्तिको खरोद या सौदा मानते । उनका लक्षण-- 

प्रकोययतकिलिचद्‌वस्त्वादानविशिष्टं परस्मे स्वकीय-यत्किञ्चिदवस्तुसमपंणं परिवृत्तिः ।' 

क्यु इति यावत्‌ । 


अन्य व्यक्ति की कोई वस्तु लेकर उसे अपनी अपनी को वस्तु देना परिवृत्ति कदराता ह । 
| इसका अधं हआ क्रय । इन्दाने परिवृत्ति को मूलतः दो भागों मे विभक्त किया-समपरिवृत्ति तथा 
विषमपरिदृत्ति । समपरिवृत्ति पण्डितराज ने दो प्रकार की मानी है, उत्तम पदार्थौ से उत्तम पदार्थौ 
| की तथा निम्न पदाथौसे निम्न पदार्थोकौ। विषम परिवृत्तिमीवेदो प्रकार की मानते 
॥ उन्तम से निम्न की तथा निम्न से उत्तम की। 


पण्डितराज ने लक्षण में परकीयदाब्द का निवेश कर सवैस्वकार की इसत मान्यता को 
ममान्य ठहराया दै-स्वयंके द्वारा किसी वस्तु का त्याग क्ियाजाद जौर अन्य वस्तुका 
परियह तो उसमे मी परिवृत्ति दोती है । उन्होने स्पष्ट शब्दां मे सवंस्वकार की इसत मान्यता का 
खण्डन कर उनके दवारा इस भेद के किए प्रदत्त उदाहरण (किमित्यपास्या० कोभमी परिवृत्तिशूल्य 
बतलाया है । वस्तुतः इस प्य मे परिवृत्ति का चमत्कार, कम, विषमता का चमत्कार अधिक्‌ 
है । इसके अतिरिक्त इसमे दृष्टान्ताट्कार की मी स्पष्टछ्विदरै। 


पण्डितराजने यदह मी स्पष्टीकरण दुहराया हे किं परिवृत्तिका सौदा कविकरिपत होना 
चादिष्ट । यद्धि वह लोकिकं हुभा तो उस्म अलंकारमाव नदीं आ सकेगा । 


विश्वेश्वर के प्रतिगामी मस्तिष्कं से प्रसूत परिवृत्ति का लक्षण यह है- 
सद्शासदृशेरथ॑रथानां विनिमयस्तु परिवृत्तिः ।' 
-- सम विषम अथौ द्वारा अर्थो का विनिमय परिवृत्ति अलंकार होता है, 
विदवेदवर मम्मट के अनुयायी हँ । रसगंगाधरकार द्वारा दिए गए (परकीयत्वः 


उस्तते हए सवंस्व के खण्डन पर विदवेश्वर का ध्यान तो गया दै किन्तुवे उस पर 
नहीं करते । 


स्स प्रकार 
विद्धोष ण] ओ र्‌ 
को त रि ष्प्‌ णीं 


चक्रवत्तीं की निष्छृष्टाथेकारिका यहां इस्त प्रकार की ६&ै-- 
'परिष्त्तिविनिमयस्िधा सेयं समादिभिः। 


पाठान्तर = विमरिनौ को अतश्चात्र शब्दोपात्तमेतद्‌ मवति' पक्ति निर्णयसागरीय संस्करण त 
अतश्चात्र शब्दो परात्तदपति (१)' इस प्रकार संपादक ठ परद्नचिह के साथ अशुद्ध सुद्रित हे । 
इसी प्रकार (लतानामैता०? पद के वाद (मतत्वरसमत्वयोः' के स्थान प्र्‌ इस संस्करण में लता- 
समत्वयोःः सुद्रण हे । - 
उदाहरण की दृष्टि से परिवृत्ति के सर्वात्तम उदाहरण वामन द्वारा उद्धृत कालदा 
के प्यदहैः। 

मेदा कं नाम भिन्न भिन्न मानदण्ड पर किए गणै । सधिकपरिवृत्ति वा न्युनपरिच्त्ति का 
अभिप्राय कमी दौ जने वाली वस्तु की उत्तमता से है ओर कमी ली जाने वाली वस्तुक । वस्तुतः 
दौ जाने वाली वस्तु के हौ धार्‌ पर नामकरण उचित है । विनिमय की पहली कड़ी देना 


ही होता है। 


परिसंख्यालङ्कारः १.५५ 
[ स्वस्व ] 


[ घत्र &२ ] एकस्यनेकप्राप्नवेकत्र नियमनं परिसंख्या । 
पकानैकप्रस्तावादिद्‌ वचनम्‌ । णक वस्तु यदानेन युगपत्‌ संभाग्यते 
तदा वस्येकजाखभाग्ये ्ितीयपरिदारेण नियमनं परिलंख्या । परि अपवजने। 
कस्यचित्‌ परिवजनेन ङ््रचत्‌ संख्यानं वणेनीयस्वेन गणनं परिसंख्य। । 
सा चेषा प्र्नपूचिका तदन्यथा वेति भथमं द्विधा । पत्येकं च वज्ञनीय- 

त्वस्य शाब्दत्वाथत्वास्यां देविध्यसिति चतपरयेदाः ! क्रमेण यथ[-- 


(कि भूषणं स्युरखडमच्च यरो न रत्नं 
किं कायमायंचसितं षतं न दोधः। 
कि च्चुरप्रतिहतं धिषणा न नेत्र 
जानाति कस्त्वदपरः सदसदिवेकम्‌ ।.* 
किमासेव्यं पुंसां सविघमनवदं यसरितः 
किमेकान्ते ध्येयं चरणयुगङं कौस्तुभश्चतः $ 
किमाराध्यं पुण्यं किमभिङषणीयं च करूणां 
यदासक्त्या चेतो निरवधि विघ्युक्व्ये प्रभवति ॥ 


४ 


'भक्तिभवे न विभवे व्यसन राद्ध न युवतिकाप्ाखे । 
चिन्ता यशसि न कदुषि प्रायः परिदश्यते महताम्‌ ।।' 
'कोरिय्यं कचनिचये करचरणाधरदछेषु रागस्ते । 
काठिन्यं कुचयुगले तरलत्वं नयनयोवेसति ।' 
अश्र. चाल्तकिकं वस्तु शदयमाणं वस्त्वन्तरञ्यवच्छेदरे पर्यवस्यतीति 
वच्छे वस्त्वन्तरं शान्द्मारथं वेति नियमाभावः । अद्रौ क्षिकत्वाभिधरायेणेव 
कचित्पश्नपरूवक हणम्‌ | 
¶विलङ्कयन्ति श्रुतिवत्मं यस्यां छीखावतीनां नयनेोत्पलानि । 
1 ॥ 
बिभति यस्यामपि घक्नि्राणतेको मदहाकालजटाधेचन्द्रः ° 


| 
" ज्म -चिज्नकमेसु वणसंकये, यतिषु दण्डयदणानिः इत्यादौ ग्छेष- 
संप्र्तत्वमध्या अश्यन्तचारूप्वनिवन्धनम्‌ | अच चं नियरदरिलंख्ययोर्वाक्य- 
वित्प्रसिद्धं लक्षणं नाद्स्णीयश्िति ख्यापनाय नियमनं परिसंख्येति सखामाना- 
धिक्ररण्येनोक्तिः। अत एव पाक्षिक्यपि प्रात्तिरज् स्वीक्रियत इति युगपर्सं- | 
भावनं प्रायिकम्‌ । | 
| सूत्र ६३ ] एक की अनेक स्थानानि प्राचि होने पर एक में नियमन परिसंख्या 
[ अरंकार कहराता ह ] ॥ 


३.७ अ० खण 


८७८ अलङ्लारखवेस्वम्‌ 


[ बृत्ति ] एक ओर अनेक वस्त॒ को छेकर इते यँ बतलाया जा रहा है 1 एक वस्तु जव अनेक 
स्थानौ पर प्क साथ संभावित दहो तव उसका किसी एक असंभाव्य स्थान पर धन्य का परिहार 
करते हए लो नियमन किया जाता है उप्ते परिसंख्या कदते हँ । परि अथात्‌ अपवजेन [या निषेध] । 
किसी का निषेध कर कदींजो संख्यान अथात्‌ वणनीयस्प से गणना करना वह्‌ हुदै परिसंख्या । 
यह प्रथमतः दो प्रकार की होती है [ १] प्रदनपूवेक तथा[ २] उप्त विपरीत [ प्रदनरदित ] 1 
अनन्तर इसे वणैनीय की परिदार्यता शाब्द ओर आथंदो प्रकार की दती है, भतः भेदो की संद्या 
चार दो जाती दै 1 इनङे क्रमद्यः उदादरण-- ्‌ 

[ प्रदनपूर्व॑क चान्द परिहाय से युक्त परिसस्या |- ॥. 

(संसार मे सुदृढ भूषण क्या है ? यज्ञ, रत्न नदीं । करणीय क्यादे १? आयैपुरुषों द्वारा किया 
सुत, दोष न्दी । अप्रतिहत च्च क्या हैट बुद्धि, चग््क्चु नहीं [ इस प्रकार ] तद्‌ अस्तत्‌ 
का अन्तर आपको छोडकर जानता शी कोन दे +" 

[ प्रदनपू्व॑क तथा आर्थं परिदाय से युक्त परिसख्या-- | 

पुरूषो के लिए सव प्रकारसेसेन्यक्यादै गंगा जी वा निर्दोष परिसर [ तट]; एकान्त 
मै ध्यान करने योग्य वस्तु क्या दहै? कौस्तुमधारी भगवान्‌ विष्णु के चरणयुग; आराधनीय 
क्या है ? पुण्य इसी प्रकार चाहने योग्य वस्तु क्या दै १ करणा, जिसकी आसक्ति से चित्त सद। 
के किए मुक्ति पनिमें समदो पाता है" 

[ प्ररनरदित शाब्द परिहाय युक्त परिसंख्या-- | 

--^महापुरुषौँ मेँ प्रायः भक्ति भगवान्‌ दोंकर के प्रति देखी जातौ हे, विभव के प्रति नदीः 
व्यसन शाज्ञ मे देखा जाता है, युवतिरूपी कामां नदीं; चिन्ता यश्की देखी जाती, 
मत्यं छरीर की नदीं \' 41 

[ प्रदनरदित आर्थं परिदार्ययुक्त परिप्तख्या -- । 6 

रिक्ता तेरे कैपाश् मे है; रा कर, चरण जौर अधर मे; कठिनता कुचयुग्म भँ ह भौर 
चचल्ता नेत्रम ।' 

यहं [ परिसंख्या ॐ इन उदा््रणों मँ ] असंमानिते वस्तु का व्रिधान किया जाता है, अतः 
इसके दारा उपे भित्र { सोकप्रसिदड ] वस्तुओं का निराकरण उहरता [ ही ] हे । इस कारण ॥ 
निराकरणीय भिन्न वस्तु दाब्यतः ही कथित हो अथवा अभेतः दी प्रतीत हो एसा कोई नियम नदी 
रहता । असंमाव्यता कै अभिप्रायते दही कीं विधान प्ररनपूवंक होता हे [जव कि मी्मांसा्चाल् 

न प्रसिद्ध परिसंख्या मे प्रन कमी दता दी नदीं ६ |। 4 
“जिस [ उलयिनी नथरी } मेँ शरुतिवत्मं [ वेदिक धमं तथा कनपयी ] का उर्वन्‌ लीलावती ` 
बरनिता् के नेच्रोत्पल ही किया करते दैः तथा जिस्म वक्रता कौ नैवल महाकाकरू की जग का 
सधचन्द्र ही धारण करता दै [ यह | ॥' न ती 
तथा-- जहाँ वर्णक्तकर [ ब्राह्मणादि वर्णा का मिश्रण तथार्गाका मिश्रण] चित्रकर्म म ह्येता. 
हे, दण्डग्रहण [ राजदरण्ड पाना त्था ब्रह्मद०ड मपनाना | यतियो मँ देखा जाता है, -- इत्यादि 4 
प्रयोगो मे इस [ परिसंख्या ] का देष से भिश्रन वहत ही अधिक्‌ चारुत्वलादेतादहे। 1 

“इसमे जो “नियम ओर "परिसंख्या' शब्द दं इन मीमांसक्तौ मँ प्रसिद्ध लक्षण नहीं अपननि , 
दै" यदी वतकाने कै छिदि सूर मँ धभनिवमन परि्ंख्या दे" इस प्रकार दोनों को अभिन्नरूपं म 
कदा गया है [ जव कि सीमांसाच्चाख् मेँ ये परस्पर भिन्न होते हं] इसी कारण शसम मराति 
कोसी पाधिक मान ल्या जाता है {जव कि मौपरासाश्चाल मेँ पाक्षिकता केवल नियममेंदी 


+ 


परिसंख्यालङ्ारः ५५७९ 


मानी जती हे ] इस प्रकार [ मीमांसा में प्रसिद्ध दो विपसीत पक्षो म] प्क साथ प्राचि [लागू 
होना यह जो परिसंख्या का लक्षण हे यह ] यद मान्य होता मी है ओौर नहीं मी ।' ‹ 
विमदिनी 

एक्षानेकेति । पयाये एकस्यानेकन्न पयंवसानादेरूक्तव्वात्‌ । अप्ंमान्य इति ।! कविप्रतिभा. 
निवंतितव्वाञ्लोकोत्तर इव्यथः! न पुनः प्राकिविषयस्वेनासंभाष्यष्वं व्याख्येयस्‌ । स्व॑था- 
प्राप्तस्याथान्तरस्य निषेधमान्रपरो हि विधिः परिद्ंख्या । अतत एवा्थान्तरनिषेषे तात्पर्यमेव 
दशयित द्वितीयपरिहरेणेष्युक्तभर । यपवजैन इति । 'अपपरी वर्जने' [ पा० ५।४।८८ ] इति 
वचनात्‌ । सेति । यथोक्तरूपा । एषेति । परिसंख्या! किं भूषणमिति प्रशन एूवंकत्वम्‌ । न 
रर्नभिति श्ब्दोपादानाव्‌ परिवजंनीयस्य शाब्द्ध्व््‌। न पएुनरीश्वरादि सेभ्यभिति परि- 
वजनीयस्य शाड्दावुपादानादा्थ॑ध्वस्‌ । अत्रेति । एषूदाहरणेषु ।! अलोकिकमिति । कविगप्रतिभा- . 
निवंतिंतम्‌ । गृद्यमाणमिति । विधीयमानतया । वरस्त्वन्तरव्यवच्छेद इत्ति! अर्थान्तरनिरदेध- 
मान्रताप्पर्यात्‌ । नियमामाव इत्ति । नह्यत्र व्यवच्डेयस्य शाउदस्वाथव्वाभ्यां कथिज्ञश्घणसेद्‌ 
इति भावः । घलोकिकत्वामि प्रायेणेति । नहि "पञ्च पञ्चनदा भवयाः१ इत्याद प्रश्न पूलकं महण- 
मिस्याक्यः। कचिदिति । कुत्राप्यप्रश्नपूवंकत्वमपि भवेदिति भवः । इलेषसंपृक्तत्वभिति । 
श्रेषकश्शब्दश्वान्न शिष्टक््दनिबन्धनायामतिश्चयोक्तौ वर्त॑ते । तथात्वोक्तेधातिक्ञयोक्तिमाव्र- 
संणक्छस्वे न तथा चारुष्वं भवतीति प्रयोजनम्‌ 1 अत्यन्तेति । पूर्वोदाहरणेभ्यः ! नच नियम. 
परिषंस्ये भिन्नलछक्तणे प्रसिद्धे इति कथं तयोः सामानाधिकरण्यं सूज्धितमिष्याश्चङ्कयाह - 
सत्रेत्यादि । वाक्य विष्टो मीमांसकाः ! यदाहुः- 

'विधिरस्यन्तमगरक्तौ नियमः पािडे सति! 
तच्र चान्यन्न च प्राक्त परिसंख्या निगद्यते ॥* इति । 


अत्रायम्थंः। इह कस्यचिदर्थस्य नियसेनाज्ञातस्य विदिः द्ियमाणो यदार्थान्तर- 
निषेधार्थमपि पयवस्यति तदा नियमविधिः । न पुनरह्वातक्तापनमान्नपर्थवसित एव 
भवति । तेन नियमे नीहीनक्हन्ति' इध्यादाव वघातमान्रपर्यव सरायिस्वमेव न, दरनादेरपि 
निषेध्यववेन पयंवस्ानात्‌ ! नापि निपेधमात्र एव तात्पर्यस्‌ । अववाता भावे विध्य निष्पत्तेः । 
सर्व॑प्रकारप्रापेरप्राक्ठाश्परिपूरणश्याप्यभावे विकिः क्ियमागोऽर्थान्तरनिषेधमान्रा्थमेच यत्न 
( 1 सा परिश्ंख्या ! तेन "पञ्च पडठनसखा भयाः इतव्यादावन्यपल्नखभखणनिषेध- 
मात्रतात्प्य॑सेव ! न पुनरेतव्पञ्चनखभद्णकतंब्यतापि । तथाष्वे हि पञ्चानां पञनखानाम. 
अक्तणे प्रत्यवायत्रङ्गो नियमादस्या भेदो वान स्यात) 
नादरणीयमिति । अनेनेव छच्षणेनो भयोः संग्रहात्‌ ! तथाहि नियमे (समे दरो यजेत? 
दृश्यादौ यागस्य समविषमाष्मन्यनेकन्न देले प्रा्ठावेकश्च सम एव नियमनं छतम्‌ । परि. 
हंल्यायामपि सर्वन्न भक्षणस्य प्राप्तौ पल्पश्चनखविषय एवैकन्न नियमनस्‌ । नन्वन्न पञ्च. 
पञ्चनखान्तरनिषेधमात्रतारपर्यात्‌ पञ्पञ्चनखविषये अत्तणनियमने न वाकयार्थव्वसिति 
हकथञ्चुभयानुगाग्येतल्नक्षणमिति चेत्‌ । सस्यम्‌ । असिति तावदान्नुखे एञ्चपञ्चनखविषदये मक्तणे 
विधिः । यदास्यार्थान्तरनिषेधपयेवक्षायित्वं तदेव जीवितभूतव्वेनेहाटंकारत्वप्रतिष्ठापकम्‌ । 
तच्च नियमपरिसंख्ययोः संमानम्‌ । भथ नियमे विधिनिषे्यो वाक्यार्थत्वं परिसंख्यायां 
च निषेषस्येवेःपनयोमंहान्‌ सेद्‌ इति चैव । न। असिति तावदह्धिपेरर्थान्तः निपेधपयवसायिखं 
समानं यज्ञिवन्धनम्रनयोरलंकारस्वम्‌ । यतु नियमे विधावपि तायं न तु परिसंख्यायाघ्‌, 


।1 


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५५८० अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


तदनौपयिकस्वादिह्ानाद्रणीयस्‌ । न हीह पञ्चानां पञ्चनखानाममदटण एव प्रस्यवायः 
ग्रसञ्यते येन विधिनिषेधतास्प्याभ्यामनयोरलंकारमेद्‌ः रयात्‌ ।! तथास्वे च सवोलह्ार- 
मेदानां मेददेस्वति्यादिसं सवाद्धि्रुच्चण प्रसङ्गेऽलं कारानन्त्यं स्यात्‌ । ख तश्चेतद्ध दुस्वमेव 
नियमस्य वाच्यम्‌ \ तदाह --अत वेत्यादि । स्वीक्रियत इति । भेदघ्वेनेस्यथः। सा च 
यथा-“किमासेभ्यं पुंसाम्‌? इस्यादौ द॒लरित्तेश्वरयोः सेवाया न युगपद भाव नमिति निषेध 
पयंवसायी द्यसरित्तट एवे कन्न सेवाया नियमः करतः! अत एव च तसप्राथिकमिय्युक्तम्‌ 1 


एक्ानेकेति = क्योकि पर्याया टंकार मे एक का अनेक मेँ पयवसान बतलाया गया हे । असंभाष्य = 
कविप्रतिमाद्वारा सिद्ध होने से असंभाव्य अर्थात्‌ लोकोत्तर । असंभाव्य का अथे श्रास्षि विषय के 
रूप मँ जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती, यह अथं नही करना चाददिए क्योकि परिसंख्या उक्त 
विधि का नाम है जिसका तात्पर्यं सर्वथा प्राप्त अर्थान्तर कै निषेध मे रदता दै इसौलि९, अभान्तर 
निषेध मे तात्पर्यं दिखलने कै किए हयी द्वितीय का परिदार करते इए" -यद्‌ कदा । अपवजंन=जेसा 
कि [ पाणिनि का] सूत्र है “अपपरी वजैने' [ १।४५।८८ ] "अपः जर "परि" उपस्तगं वजन अथं मे 
कर्मप्रवचनीय होते हे [ प्रकृतेन स्वन्धिना कस्यचिद्‌ नभिसंवन्धो वजेनम्‌ = काशिका | सा = वह्‌ = 
जिसका स्वरूप वतला जा चुका है । एषा = यह्‌ = परिसंख्या । किं भूषणम = यह्‌ हृद प्रदन 
पूवक । "न र्नम्‌" = रत्न नदीं"-- इस प्रकार हाब्दतः कथन होने से यदं परिवजेनीय मथ 
शाब्द दै राजा घादि सेवा योग्य नदीं इस परिवजेनीय अथंके चोब्दतः कथित न होने से वद 
मार्थं हआ । अन्न = य्य = इन उदादरणो मे । अरो किक = कविप्रतिमा से निष्पन्न । गृह्यमाण = 
जिसका विधान किया जाता दै । चस्स्वन्तरष्यवच्छेद्‌ = अन्य वस्तुओं का परिहार, इसलिए किं 
समे तात्प हयी धन्य मर्थं के निषेध मेँ रहता है । नियमाभाव = यदो परिदायं अथैके शाब्द या 
आं होने से रक्षण मँ मेद नदीं रहता । अरौ किकस्वासिप्रायेण = अक्ंमान्यता के अभिप्राय से = 
[ मीमांसा के ] पाचि पन्ननख प्राणी खाणना सक्ते र्दे इत्यादि [ परिसंख्या प्रयोगो] मँ 
विधान प्रदनपूर्वक नदीं रहता 1 क्वचित्‌ = कीं" अथात्‌ को -कदीं विधान प्रदनपूवक नदीं भी 
रहता । श्ेषसंपृरक्तष्व म्‌ = रेष का मिश्रण = याँ दलेष ब्द का अथे हे दलेषयुक्त शब्द्‌ से 
निष्पन्न अतिरायोक्ति अर इसका अभिप्राय यह है कि इस प्रकार कौ उक्तरयामे यदिद्लेषन षहो, 
केवल भतिकश्चयोक्ति हीहयो तो चमत्कार की उतनी मात्रा नदीं आ पाती। अस्यन्त = अर्थात्‌ 
प्राचीन उदाहर्णो की अपेक्षा । शंका दोती है कि नियमविधि गोर परिसंख्या के लक्षण भिन्न-भिन्न 
होते है, तव यर्दा उन्हें अभिन्न क्यों वतलाया गया है ।' इस पर कहते हे - “अत्र = यदं । 
वाक्यविद्‌ = मीमांसक, जेसा कि [ मीमांसर्कोने दी ] कदा टे-- 

'मत्यन्त अप्राघ्चि मँ विधि, विकट मँ नियम ओरभिन्न दो तथ्यों की प्राप्ति म प्रिसंट्या 
कहूलाती है ।› 

[ प्स्वमं के लिए क्या करना चादिएः इस जिज्ञाता का कोहं उत्तर नहीं मिलता, कोई उपाय 
विदित नहीं होता । तव वेदवाक्य कता है स्व“ के लिश ज्योतिष्टोम यन्न करना चाहिए । इस 
वाक्य को विधिवाक्य कहा जायगा? । इसत वाक्य के अतिरिक्त स्वप्रति का उपाय किसी भी प्रमाण 
से जो उपलब्ध नदीं होता । नियम तथा परिसंख्या का स्पष्टीकरण विमिनीकार करते है-- ] 


इसका अर्थं इस प्रसंग मे यह है- जव किपी अज्ञात अथं क्रा विधान किसी नियम वाक्य के 
दारा किया जाता है ओर वहु अन्य किसी अथे के निषेष रमे पयृवक्सितदहोतादैतो उसे नियमविधि 
कहते है । यद्‌ [ विधि के समान | कैव भक्ञात अथंके ज्ञापनमेदही समाप्त नहीं ह्यो रहता। 
हस प्रकार श्वान को वूटता है--हत्यादि नियमविधि में केवल करुट्ने मध्रमं ही विधिवाक्य की 


1 


परिसंख्यालङ्ारः ५८१ 


समासि नदीं हो जाती, (दरनाः मादि के निषेध तक भी उसकी पच होती है। श्सी प्रकार केवल 
निषेध में सी [ वक्याथंको ] समाति नदीं होती क्र्वोकि तब [ क्रूरता हैः इस विधिका अर्थं 
्दरता नदीं 2 दोगा, इस प्रकार | वरूरनेकाज्ञानन होगा, फलतः विधानात्मक अर्थ प्रतीत न 
दोगा । जव समी अथकाक्ञान रहत। हं, फलतः किसी मक्चात अंके ज्ञ[पन का प्ररन नदीं ‹हता 
तव जो विधान हता द उसका तात्य केवल अथान्तरके निषेधमें दही रहता है। उत्े परिसंख्या 
कहते हँ [ परि = वजन य। निषेध, संख्या = ज्ञान, निषेधज्ञान ] । 


पच पचनखा भ्या धमेतः परिवीत्तिताः। 
गोधा दूमेः श्यः खड्गी चस्यकरचेति ते स्मृताः ॥*- 


[ पपाच पाच पौच नखवाटे प्राणी धमंाक् दारा भक्ष्य रूपे मान्यहैँ। येदं गोधा, कूम, खरा 
खड्गी तथा शस्यक ° प।रसख्यापादटि० वामनीस्दहित काव्यप्रकाद् ]। इस प्रकार पाँच 
पचनखी प्राणी भक्ष्य ह --ः इत्या[द वचनां का तात्पयं केवर अन्य एचनखी प्राणियों के भक्षण 
के निषेध में रहता ह । किन्तु इप्तमे पांच प्र॑चनखी प्राणियों के मक्षण का विधान नहीं रहता, 
वेस। होने पर तो पांच पचनखी प्राणियो के भक्षणन करने से [ आप्तवाक्य का उर्र्षन होगा 
ओर ततः ] पपि उत्पन्न हने छ्गेगा, साथ ही इसका [ उपदुक्त ] नियमः विभि से कोर भन्तर 
नदीं रहेगा । 

नादरणीयम्‌ = (मीमांसकं के प्रसिद्ध अथं नहीं अपनाने ह--श्सङ्एि पि [ नियम भौरं 
परिसंख्या ] दोनो का स्य्रह्‌ [ परिसंख्याल्कार के] इसी एकर लक्षणम हदो नाता है। 
तथादि-'यज्च सम भूमिमे करे" इत्यादिनो नियमविधिके वाक्य ह इनमें प्रथमतः प्राप्त 
सम आर्‌ विषम सभी मूमिओंमे से समभूमिमें निधि का नियमन = काच कर दिया जाता 
हे । इसी प्रकार पररत्ख्यामें मी समी पंचनखी प्राणियों के भक्षणकाजो प्राप्ति रहती है 
उसमं मी केवर पांच प॑चनखी प्राणियों के भक्षण तक विधिका संकोच रदतारै। शंका दोती 
दे कि पोच पचनखी प्राणियों के निपेधमात्र मँ यदौ तात्पय॑ है अतः पांच पंचनखी प्राणियों के 
भक्षण मे विधि के नियमनमें वाक्य का तात्पयं नहीं माना जा सकता तव यह कैसे कदा कि 
"यह्‌ लक्षग॒उमयानुगामी हे" । [ उत्तर ] टीकदहै, | मीमांसामें मलेदहीन क्षो, हमारे यहाँतो।) 
आरम्भ मे पचि पंचनखी प्राणियों के मक्षणकी विधि रइतीदहै किन्॒ जव इसका पयेवस्लान 
अन्य पचनखी प्राणियों के भक्षणके निषेधमें सिद्ध होतादहै तव वही इसमे अल्कारत्वला 
देता है क्योकि वही [ निषेध में पर्यवसान ] इसका प्राण है, भौर यह्‌ [ निषेध मे पर्यवस्तान ] 
दोनो [ नियम ओर परिसंख्या ] मँ समान रूप से रहता है । यदि क किं नियम में विधि मोर्‌ 
निषेध दोनो मेही तात्पय॑रहतादटै, जबकि परिसंख्यामें केवर निषेधमें, इस प्रकार श्न 
दोनां मं बहुत वड़ा अन्तरदहै, तो इस कथन का कोह प्रभाव नही, क्योकि इन दोनोंमेविधिका 
निषेध मे पयवसित होना [भीतो ] समान दै, जिसके आधार पर यहां अलकारत्व आ जाता 
हे । जदां तक “नियममे विधिमँमी तात्पयं रहता है, परिसंख्या मेँ नदीं इस [ अन्तर ] का 
संबन्ध हे वह्‌ यहां ( अलकारत्वमीमांस। मे ) कोई महस्व नदीं रखता इसलिए अनादरणीय है । 
यरो [ अलंकार ्षेत्रमें ] पाँच प्र॑चनखी प्राणियों के अभक्षणमें कोई पाप नहीं होने वाला है 
जिससे एक का तात्य विधि भौर निषेध दोनों मे ओर दूसरे का तात्पय केवर निषेध मेँ मान 
कर [ रत्नाकरकार के समान नियम ओर परिसंख्या श्न] दोनोकोदो स्वतन्त्र अलंकार 
माना जाए रेसाद्दोने परतो समी भलंकारोँमें भेदका कारण थोडा-थोडा अन्तर मिलना 
संभव हे भतः प्रत्येक मे भिन्न-भिन्न अनेक लक्षण करने की भाप्रत्ति आएगी) भोर तव 


५८२ अच्द्धारस्वंस्वम्‌ 


अल्कार मी संख्यातीतद्ो जायगे। इसक्षएि नियम को इसी परिस्ख्याका भेद माननादी 
सीक दोगा [नकि रत्नाकरकार कै समान अल्ग अलंकार मानना ]। यदी कदा = “भत एवः 
इत्यादि । स्वीच्छियते = स्वौकार कौ जाती है-ः अर्थात्‌ मेदरूप से। श्सका उदाहरण ह 
'किमातेव्यं पुंसाम्‌०? \ इन उदाहरर्णामे गगाजीके तट तथा राजाकी सेवा एक साथ प्राप्त 
नद्यां दतीं [ केवर राजक्तेव। दौ प्राप दती दहं] अतः कैव गंभातट्मे ही अकेले में सेवाविधि 
का नियमन कर दिया यद्‌ नियमन निपेधपयृवसायी हुजा । ₹इप्तीलिए कहा कि वह प्रायिक 
दं = कमी मन्य नदं मीदहता॥ 
विमं -परितख्या-ब्द का अथं निपेधवोध है। परिकरा अथ॑ विमरिनी मे उद्धृत 
जपपर्‌। वजनेः सूत्र कं अनुसार निपध द हयी "परेव्॑यनेः [ ८।१।५ ] सूत्र के अनुसार मी यी अथं 
दे । संख्या का अय॑च्वान दता दं । इस्त प्रकार परिसंख्या चखब्दका योगिक अथं निषेधक्षान 
निकलता हं । पूवमीर्मा्ता न जमिनि का सूत्र द "परिसंख्या [ १।२।४२ | इ्तमे परिसंख्या का 
अथे निपेधन्चान दौ हं । अदवमेव चै प्रकरण मे श्रु्तिवचन द--“श्ममगूभ्णन्‌ रद्नागरतस्यः 
[ वाज० सं० २२।२ | इससे पद्यु को लगाम पकड़ने का अथं निकलता है । तव प्ररन दोता दै- 
"(केसर पद्यु की) अश्वक या जन्य किक्ता पद्यु कौ । उत्तर म दतपथन्रह्यण का वचन है अश्वा 
मिधानाम।दत्तः [ ५३।६८।१ | शस म्चकेद्वारा अश्वकौ लगाम पकड़ता हं" । इस वचनका 
ताद्पय अश्वतर पडो क लगाम प्क्ड्ने के निपेधमें माना जाता ह। रिसंस्याः-सूत्र द्वारा 
यदी अथं प्रतिपादित किया जाता दं [द° सायणक्तत ऋग्वेदभूमिका ] देवलस्प्रतिके नामसे 
_प्रद्चिदध [ कान्यप्नकाच्च वामनी का परिसंल्या पर पादटिप्पणी | किन्तु उसके कलकत्ता के धमांत्मा 
व्यापारा नमनद्धखरायजी मार्‌ द्वारा प्रकान्चित संस्करण में अग्राप्त पच पचनखा भक्ष्याः" प्रयोग) 
जिसका स्पष्टाकरण ऊपर वियाज। चकारह, भो परिसंख्या का उत्तम भार भ्सील्पि प्रायः इस 
प्रस्ग में सवत्र उ।(व्छ[खत्‌ प्रयोग द । 
रत्नाकरकार ने विधि; नियम अर परिसंख्या तीन को तीन स्वतन्त्र अलंकार माना ह । 
इनके लक्षण उन्दने इस प्रकार वना९ दं-- 
१ = असभाव्यदैतुफलप्रेषणं विधिः ॥ ८२ ॥ 
२ = अन्यनिवेधार्थाऽपि विधिनियमः ।॥ ८३ ॥ 
२ = प्राप्तस्य [ अन्यनिवेधाथां विधिः ] परिसंख्या ॥ ८४ ॥ 
तीनों के परस्पर म अन्तर भी उन्होने बतरण हैँ ओर उदाहरण भौ दिह | इनम 
कौ नियमालकार का उदाहरण माना गया है गौर "विलद्भयन्ति० पद्यकफो परि. 
संख्या का जिसे विभद्िनीकारने भी उद्घ्रूत कियादहै। विमरिनीकार सवैस्वकार का समर्थन 
कुरते ओर नियम तथा परिसंख्या मँ अटंकारत्व का बीज णक ही मानकर दन्द भिन्न मानना 
अनुचित वताते दै । यह बीज हे निषेध्य अथं की प्रतीति या भधान्तर के निषेध की प्रतीति । 
विधि के विषय में उन्दने यद कोई चर्चां नदींकी हे, 
परिसंख्या का इविहास- 
दण्डी, भाम्‌, वामन ओर द्व की इष्टि परिशंस्या पर न्दी गईं । इसे प्रथमतः रद्रटजे 
खोजा है । उनका विवेचन-- 
दद्र = धृष्टमप्र्ट वा सद्‌युणादि यत्‌ कथ्यते क्वचित्‌ तस्यम्‌ । 
अन्य॒त्र तु तदभावः प्रतीयते सेति परिसंख्या! ॥ ७।७९ ॥ 


परिसख्यालङ्ारः ५८द 


“पूछने या न पृचने पर॒ जहो अनेक साधारण यण आदि का कीं इस प्रकार अस्तित्व 
वतलाया जाए कि उस्तसे कीं अन्यत्र अमाव प्रतीत हो तो उपे परिसंख्या कहते हें । उदाहरण- 

प्ररनपूव॑क परिसंख्या = “कं छखमपारतन्त्यस्‌' = छख क्या हे स्वतन्त्रता । 

प्ररनरदित परिसंख्या = "कौटिव्यं कचनिचये० प्य ही । 
भम्मट = रुद्रट कौ श्यौ पदावली में जिखते रह :- 

केचित्‌ एृष्टमश््ं वा कथितं यत्‌ परक्दपते । ताद्गन्यव्यपोहाय परिस्ख्यातु सा स्मृता ॥ 

“पमाणान्तरावगतमपि वस्त॒ रब्यन प्रतिपादितं प्रयोजनान्तराभाव।द्‌ सई श्वस्त्वन्तरन्यवच्छे- 
दाय यत्‌ पयवस्यति सा भवेत्‌ परिरख्या । अत्र च कथनं प्रदनपूवेकं "तदन्यथा च परिदृष्टम्‌ , तथा 
उभयचर ग्यपोद्य मानस्य प्रतीयम।नता वाच्यत्वं चेति चत्वारो भेदाः ॥ 

"पृष्ट य भपृष्ट काई वस्तु शब्द से कयित होकर वेसीदी भिस्त भन्य चस्तु का निराकरण 
कराए तो वह परिसंख्या माना गद्‌ ह ।` कोह वस्तु किसी अन्य प्रमाणसे विदित द्योती है (अतः 
जिसके [लए साब्द प्रयोगका अपक्षान दहो) तथापि उपे. खब्द.से कद्‌ जाता है तो.वद अन्य 
प्रयोजन के अमावमे व॑सो दो अन्य वस्तु कं निराकरणका कारण बनतौ दै, उसौ को परिसेख्या 
माना जाता है । इते कथन प्रदनपूवेक या तद्रहित रहता है साथ दौ निराकरणीय वस्तु कष 
प्रतीयमान द्योती है भोर कां वाच्य, फलतः इसके चार भेददहो जातें । उदादूरण न= द्कएक. 
करवे दाजा सवेस्वक्नारने दियेर्है। स्पष्टदह्ी मम्भयने रुद््टके मगेदो भतिरिक्तमेदोको 
कदपना भर की देष सारा विवेचन उनका समान है। मम्मटने परिसंख्याको मीमांक्षाकौ 
पृष्ठभू[म से यथाश्च।क्त अद्भूता रखना चाहा धा। सवस्वकारने उस्म मीमांसा को खुलकर 
स्थान दिय।( । रत्नाकर अर विमद्रिनौ ने उसे भौर मचा दिया, 

परवर्ता आचायोौमं रत्नाकर का मत इसी विमय पहले आ चुक्रा है। जयदेव भोर 
सप्पयद्‌त्तत का लक्षण यद्‌ इई- 

जयद्‌; द्‌! {चत~-~'परसंख्या निषिष्येकमन्यस्मिन्‌ तस्तुयन्त्रेणम्‌ । 

स्नदक्ष्यः दीपेषु न स्वान्तेषु नतश्रुवाम्‌ ॥' 

"एनः कण निधकर अन्य मे वस्तुनियन्त्रण परिसंख्यालंकार कलयता है । उद[०--स्नेह [ प्रीति 
तथा तंर | क्षय दापमं ह, च्ियों मे नहीं । 

दीक्षित जीने इसमें निषेध को दाब्द बतलायादहै मौर आर्थं निषेधके क्षि रत्नाकर तथा 
विमरिनी मे उदघृत "विद्यन्त ०" पथ उद्धृत किया हे । 

पण्डितराज = ने परिसंख्या कै विषय मे अनेक नवीन सूचना दीह जौ रुद्रटः मम्मटः, 
सव॑स्वकार, रत्नाकर, विमर्िनी यौर कृबल्यानम्द मे नहीं सिकतीं । उनके रसगंगाधर से विदित 
होता दहै कि, कुछ जचायै परिसंख्याको अलंकार केवर वदी मानते दै जह निषेध राधे या 
प्रतीयमान होता है, शाब्द नदीं । स्राल्दमै वे केवर परिसंख्यात्व मानते दँ अल्कारत्व नदीं । 
पण्डितराज ने शन आचार्यौ का नामोद्लेख नदीं किया 8 । दूखसी यह सूचना भी भिरती हे कि 
विमञ्चिनीकारने जिस प्पंच पंचनख प्राणी भक्ष्य है--श्स वाक्य में परिसंख्याकरो अलंकार 
माना ह, ङछ आचाय इसमे मी केवल परिसंख्यात्व मानते हे । उनका तकं हे कि यह्‌ केवल 
लोक वाक्य है, इसमे कविप्रतिभा नदीं है! इसी प्रकार "किमासेव्यं पुंसा०' मे सेव्यत्वेन कटिपित 
गंगातट वास्तविक वस्तु है प्रातिभ नदी, अतः यदौ भी पंच पंचनखाः" कै समान परिसंख्यामात्र 
है, परिसंख्यारुकार नहीं । इन्दोने यह भी कदा है कि इन आचार्यो के अनुसार (किं भूषणं 
सुदृढमत्र यश्च” इत्यादि स्थलो मँ मौ परिसंख्या नहं, र्पक हे । 


` ब 4 _ + क ^ ~ 2 अ क क ~ ~ + कि = >~ ~ ४ = ग ~ =-= ~ 2 ~ ~ ० त + ~~~ 1 क व ~ न 1 १ नि 


५८७ अच्छट्ारसवस्वम्‌ 


ये सव मत पण्डितराज स्वयं को अमान्य प्रतीत होते दं क्योकि उन्दने इनका उर्लेखं 
मात्र क्रिया है वह भी परिदिष्ट के रूपमे । उनका स्वमत इस प्रकार दै- 


(सामान्यतः प्र ्रस्याथस्य कस्माच्चिद्‌ विद्लेषाद्‌ व्यावृत्तिः परिसंख्याः । 
(सामान्यतः प्राप्त अयं का ्रिसी विज्चेष से अल्गाव परिसंख्या कदराता है" । 


 नियमको परिसंख्वाक्रा दौ एक प्रकार स्वीक्षार करते हृ पण्डितराजने समन में वही तके 

दियादेनजो सत॑स्वकार आर विमरिनीक्षारने दिया था-्कदा लक्षणसे दोर्ना का संग्रहः । 
पण्डितराज ने सादित्यसिद्धान्तमं मन्य नियम ओर परिसंख्या के अभेद को व्याकरणत्सिद्धान्त 
सेभीपुष्टच्रियादे। उन्दने ल्खादंकि व्याकरणमेंमी परिसंख्या को नियमञ्चब्दसे का 
जाता दै । उदाहरण कै रूप मं अष्टाध्यायी कै प्रथम अध्याय क द्वितीय चरण का कृत्तद्धितसमासाः 
यह्‌ छयालीसवां सूत्र प्रस्तुत कियादहे। शस सत्र म समासः का रहण वाक्यस्वरूप समासेतर 
साथं दब्दसयुदाय से प्रातिपदिक खल्ाकी व्यावृत्तिकै ल्एि किया गयादह। क्योकि इतके 
पूवं के पैतालासवे सूत्र “अध्वदवातुरप्रत्यवः प्रातिपादिक के दरा अथवत्ता कै साथ प्राति- 
पदिकत्व द्यो स्थापना की गद ह । इतके अनुसारनजाोजा चन्द साथकर्दे वे यदि धातु भौर 
प्रत्यय नदांदं तो परातिपद्विकदं। वाक्य आर समास दानादौ रस दन्दामं अत्ते, राजा 
करा पुरुष) भेरी पोथी? आदि वाक्वन तो प्रत्ययूपदहं आरन धातुरूप; अथ इनसे विदत 
होता दी & अतः हन्द इत पंतालीसवे सूत्र से ही प्रातिपदिक माना जा सकता 
था। इृत्तद्धतसमासाश्चः सूत्र $ दारा कहा गया कि रत्‌; तद्धित मोर समास भी 
प्रातिपदिकं होते ह” । इसम समास की प्रातिपदिक स्क्ञा का विधान पूरवेसूत्र “अर्थवत्‌०? 
से गतां इकर व्यथ सिद्ध हता दं । उस्क। साथेकत। सिद्ध हाती तव जव यष अथं 
निकराा जातां किं समा्तर वाक्यसञुदायमं प्रातिपदिक सक्ञान दो। श्सी प्रकार यह्‌ 
प्रयोग परि संल्यात्मक इञा 1 किन्तु व्याकरण चाल्मं इते पररस्ख्यान कदकर नियम कद्‌ 
जाता है- यथा 'समास्तयहण नियमायम्‌ , ०००० समास्रग्रहुणस्य नियमाथत्वाद्‌ वाक्थस्य अर्थवत 
सज्ञा न मवति = कादिका" । पवन्त शाका मं इन भिन्न दने कौ मान्यताको मी पण्डितराज 
ने उपस्थित किया ह। तदथ उन्हानं विमद्धिनी म उद्धृत (विधिरत्यन्तमप्राप्तौ°ः कारिका ही 
प्रमाणज्प से उपस्थित को ह अर्‌ उसका व्याख्या जाक द। 


पण्डितराजने भी परिषख्या कै चार उप्यक्त मेद मने हं । 


दिश्वेश्वर ने भी पण्डितराजकरी ही सरणि पर चल कर आरम्भ मं परिसंख्याके चार मेद 
स्वीकार विये हैँ ओर अन्त मे निराकरणीय भधंकी न्य॑ग्यतामें ही परिसंख्या के अलङ्कार होने 
करी रट दोहरा दी है । उनका लक्षण यह दै- 


पृष्टमपृष्टं चोक्तं यद्‌ व्यंग्य वापि वाच्यं वा। 
फलतीतरव्यपो परिसंख्या सातु संख्यता ॥' 


पृछा गया अथवा न पषा गया कोड अथं यदि का जाय ओर वद अन्य अथै के वाच्यया 
व्युग्य निराकरण भै परिणत हयो तो वद परिसंख्या दोतीदहै। यहां यई उक्तिरूप दोती ३ै। 
विरखेरवर ने नियम ओर परिसंख्या को एक मानने का समथन पण्डितराज के हयी समान व्या 
करणदाखर के प्रमाण द्वारा करिया है। उनके अनुसार व्याकरण महाभाष्य मे पंच पंचनखाः" 
प्रयोग परे परिसंख्या को नियम दी कदा गया है । मेद इन्दोने भी चार दी मने, 


अथांपच्यलङ्ारः ५८५ 


चक्रवती की निष्छाथकारिका परिप्तख्या.पर इस प्रकार &-- | 
"परिसंख्या त्वनेन प्राप्तस्यैकन्न यन्त्रणम्‌ । 
चतुधा पक्षवज्योकत्योभावाभावादियं मता ॥ 4 
न प्ररं युगपत प्राम्तिः पक्षेऽपि प्राप्तिरिष्यते । 
परिक्षख्यानियमयोरतोऽरालोकिकी स्थित्तिः ॥ 
--भनेक स्थानां पर प्राप्तका एके स्थान पर्‌ नियमन परिसंख्या कदलाती है । यह प्रन 
तथा वज्यं [ परिदाय ] अथ॑ के कथन मर अकथनसे चार प्रकार की ती है। यदं केवल 
युगपत्‌ अनेकत्र प्राप्ति दौ नदी, पाक्षिक ्राप्नि मी गिनी जाती £, लतः परिसंख्या ओर नियममें 
असामान्यरूप से अभेद की स्थिति रहती हे" 


मूरुपाठ-- मूल वंस्व मे कस्यचित्‌ परिवनेनः के पदक “परि अपवजैनेः विमरिनी के 
भाधार पर दमने जोड़ा इई । जन्य प्रतियों मे यह्‌ अं नहं भिलता। निण॑यक्तागरीय प्रतिमे ` 
कोटिख्यं कचनिचये०' वै वाद्‌ को द्वितीय पक्ति मे "वस्त्वन्तरं दचाब्दमाथं चः पाठ पाठान्तर 
मे रखकर "वस्त्वन्तर शब्दमात्र' पाठ मूल मे माना गया है। विमर्धिनी मेँ "विधिरत्यन्तमप्राप्तौ° 
उद्धरण के बाद को ठृतीय पक्ति भं तदा नियमविधिः। न पुनर० अंका (नः निणयस्तगरीय 
प्रतिमे नदींदैओौर चदुधं पर्तिमं ,पपयंवसायित्वमेव न, दलनादेः' इसत प्रकार भमायानः मी 
नदीं है । 


| सवस्व | 
[ घ 8४ ] दण्डापूपिकयाथौन्तरापतनम्थाीपतिः। 


दण्डापूपयोभोवो दण्डापूपिका । न्द्मनोक्ञादिभ्यश्च इति वुञ्‌ । पृषो. 
दयदित्वाचछ बृच्छभावः । यथा- अहमहमिकेत्याद्‌ाविति केचित्‌ । अन्ये 
तु दण्डापूपौ विद्येते यस्यां नीतौ खा दण्डापूपिका नीतिः । पवमहं 
शक्तोऽदं राक्तोऽस्याभिति अदसहमिकेतिवन्मत्वर्थयष्ठनित्याहुः । अपरे 
द्‌ण्डापरपाधिष दण्डापूपिकेति दवे पतिक्ृतावि'ति क्न वर्णयन्ति । अचर हि 
“मूषककतृकेण द्‌ण्डभक्षणेन तत्खदभाव्यपूपभक्षणम्‌ अर्थात्‌ सिद्धम्‌ पष 
न्यायो दण्डापूपिकाशब्देनोख्यते । ततश्च यथा दण्डभक्षणादपूपभश्चणमर्था- ` 
यातं तद्वत्‌ कस्यचिदथस्थ निष्पत्तौ सामर्यात्समानन्यायत्वल्धक्षणाद्‌ यद्‌- 
थोन्तरमापतति साथोपत्तिः । न चेद्मल्ञुमानम्‌ । समन्यायस्य संबन्ध. 
रूपत्वाभावात्‌ । असंबन्धे चाजुमानादचत्थानात्‌ । अथौपत्तिश्च वाक्य 
विदा न्याय इति तज्ञातीयत्वेनैदहाभिषानप्‌ । 

द्यं च द्विधा । प्राकरणिकाद्धकारणिकस्याथोपतनमेकः प्रकार, । 
अप्राकरणिकात्‌ प्राकरणिकस्याथोपतनं द्वितीयः ध्रक्षारः । 
आदयो यथा- 

“पशुपतिरपि तान्य्शानि ङच्छ्रादगमयददिद्चतासमागमोत्कः 

कमपरमवरं न विप्रकुयुविभुभपि तं यदमी स्पृरान्ति भावाः ।+' 


९५८६ अटद्ार्सवंस्वस्‌ 


अत्र विभरुच्ख्तः प्राकरणिको टखोकचत्तान्तमधाकरणिकमथादाक्चिपति ।' 
द्वितीयो यथा- 
शयुतधञुवि वाड्च्ाछिनि या न नमन्ति यत्तद्‌श्र्यम्‌ । 
स्पुसं्चकेषु गणना केव वराकेषु किष ॥' 
अन दोव चान्तोऽप्राकरणिको रिवुचरतान्तं प्राकरणिकमथाद्‌ा क्षिपति ) 
कचिन्न्यायसाम्ये निमित्त रठेषेण गम्यते - 
'अटकारः चद्धाकसर्नस्कपाठ पारकस 
विश्ीणी्धो यज्ञः चदं च दुव एको गतवया; । 
अवस्थेयं स्थाणास्व अवति खचामस्णुसे- 
विधौ वक्ते [ध्न अभवत चयं क इुनस्मौ ॥ 
अन्न विधो बन्ने दति {शखव््‌;) अघ्राकयंणक्तस्यायुचचत्तान्तात्‌ प्राकर 
गिक्ाथौपतनम्‌ । 

[ सू० ६४ | दण्डादि क द्धारः अन्य अथं की तिद्ध अ्थांदत्ति | नामक भङंश्ार 

| कदटरकाती ह | ॥ 

[ वरृ० ] दण्ड ओर सधूप | पूज | क। मव इञ २०उपूपधिका । [ ईस आब्द कौ व्युत्पत्ति प्र्‌ | 
कुछ का मत है किं [ स अन्द्‌ 5 एकादा दण्डाद4 ध इन्द्‌ दान चै करण | 'दन्दमनोशादिभ्यश्चः 
[ ५।१।१६२ पा५ = बुज. प्रतवय = दन्दयुक्त यब्द अर मनोन्ञादचन्द। से मो [ दोताहं 
सूत्ते द्‌ प्रत्यय इजा [ ससं से देष रदत है श्चुः आर सूत ७६१ से उ्सेदो जाता 
जक, कीक दोनिपे अ" का दो जाता दे इ” इत भकार चन्द बन जता है दण्डा. 
पूपिका, “न्‌! का कोष दोन सं पूवपद | वृद्धि [ प्राप्त ६ किन्छु वद्‌ | शवाद्रादिः [ सू० ६।२।१०९ 
मे उपलब्ध अपवाद ] के कारण नदीं इदं जसे 'अहमदमिका--आदि शाब्दो मे [ नहीं होत्ती ] 
दूस का कना है कि दण्डापूपिका" का अथं है वह नीति जिस्म दण्ड बोर अपूपं । दस 
प्रगार शत शब्द मे [ दण्डापूषः-दस इन्दर के जागे ] मवर्धाय [ युक्तता भथ करा ] नू? प्रस्य 
[ अत इनिठनौ ५।२।११५-सूत्र से । इं दै [ जिसके दष नचे 2; क (उस्येकः-७।३।५० स 
शक" हो जाता है ] जेषे “इतस्त प्रकार मे समैः भं समथ 1 क्रिया में" इस मर्थ के विवक्षा 
मे अहमहमिका, शब्द मे होता दै । अन्य इ के अदुर्‌ चद! दण्डापूप के समान = दण्डा- 
पिकाः इस प्रकार शवे प्रतिकृत [ ५।२।५६ । ' सा [ युक्त । अथम्‌ परयुक्तशब्द्‌ से उपमेय 
अथं मे [ कन्‌ प्रत्यय होता है | सूत्रकं दारा “कन्‌? प्रत्यय बतला दे [ जते "दौपक शब्द तं ]। 
ररत मे [ जो ] दण्डापूपिका चब्द | सव्र म जाया है उत |काञ दे नूह केद्वारा जव दण्ड 
हीखाडाला गया तव उसमे ल्ट पूाकाखा उङन)। अपने आप सिद्ध है" यह दृष्टान्त | 
इस प्रकार (लेसे दण्डभक्षुण से अपूषमक्षण अपने मपि चला मता दै चतेदी सी अधंकी 
सिद्धि दयो जनि पर स्थितिाम्य के आधार परर जदं भन्य विपती अथं की सिद्धि अपने आप 
वतरा जाती है तो उते अर्थापत्ति [ नामक भकार । कदते दे । यह अनुमानस्वहप नदीं है, 
वरयोकि स्थितिकाम्य [ व्याधि ] सम्बन्धस्य नीं दीताः मौर संबन्ध के विना अनुमान का उत्थान 
नदीं होता । अर्थापत्ति को मीर्मास्तको ने न्याय [ दैव । माना दे। यद अर्थापत्तिमी वैसीदही 
2, इस कारण इसे यद्य [ वाक्यन्यायमूलक अकार के प्रसंग मं | बतलाया गया ह । 


अथापस्यटट्कारः ५८७ 


यह दो प्रकार की श्ेतीदहे। एक प्रकार वह जिसमे प्राकरणिक अथै से अप्राकरणिक अर्थकी, 
सिद्धिदहोतीदहै भोर दूसरा प्रकार वहइ जिसमें भगप्राकरणिक अथ॑से प्राकरणिक अथं की सिद्धि। 
इनमें प्रथम, यथा- 

“पडुपति [ रिव ]नेभी वेदिन बडी कठिनाईेसे विताए, स्योकिवे पावेतीसे मिल्नेकै 
किए उत्कण्ठित थे । जव उन विरु [ जितेन्द्रिय ]कोभीये भाव सपद्यं कर सकते दहै तब अन्य 
किस अवद्य [ श्रयो के वशीभूत ] प्राणी को ये विकारमग्न न करेथेः [ कुमार० ६] 


यहा शिवव्त्तान्त प्राकरणिक है, वह अप्राकरणिक खोक [ सामान्य व्यक्ति | वृत्तान्त को स्वतः 
सिद्ध करता हे। 


दितीय, यथा- 

"आश्य है कि यर प्रचस्त भुजाओं से समरडध वीर पुरुप [ किती वर्णनीय व्यक्ति ] दारा धनुष 
उठालेनेपरमभी का नदीं करते, राद्ुनासक देचारे कौं कौ तो निनत्तीदही क्या 

यदां यैलदृत्तान्त अप्राकरणिक द । यह प्राकरणिक शदुदृत्तान्त को स्वतः खींच रता है । 

कीं स्थितिसाम्यमें कारणक ज्ञान इलेषके दारा दहोता है [यथा ]|-[ विधु ओर विधि 
दोनों का सप्तमी के एकवचन में “विधौ यही एक रूप वनता हे, फलतः एकराब्दवाच्यता के 
कारण दोनो का भभमेदाध्यवसाय हयो जातादहै। श्सी माधार पर निम्नङ्खित सूक्तिमे कदाजा 
रहा ह-, 


वक्र विधो [ विपि = विधाता ओर विधु चन्द्रमा] कै चलते समी देवताओं के स्वामी स्थाणु 
| अपरिणामौ या मूलमूत हिव | कौ भौ यह दशा हाती है करि डरावना नरकपार उनका आभूषण 
हे, परिजन [ सेवक ] हैँ अंगभंग वाजे भृङ्गी, धन है केवर एक वैर भौर वह भी वीती उमरका 
बूटा; तव ये जो हम रोग है, हम क्य हैं ! 


यदो विधोः ओर वक्रः शब्दों मँ ईष दहैः ओर अप्राकरणिक सिववृत्तान्त से प्रकरणं 
[ अस्मदादि वृत्तान्तरूपी ] अथं खिच ञाता है । 


विमदिनी 


दण्डापूपिक्येत्यादि । शब्दयोजनां तावदाद--दण्डत्यादि । इन्द्संलकस्वाद्स्यानेन 
घुञ्‌ । शेष्योपाध्यायिकेतिवत्‌ । ननु चास्य जो न्णितीति नित्वाद्‌ छृदधिः किं न भव- 
तीप्याश्चङ्कबयाह--एषोदरेत्यादि । यथोपदिषटमिष्यनेन हि श्िष्टत्रयोगभाजां शब्दानां 
ग्याकरणशाञ्चेण को पागसमवणगविकारादि यड्‌ विहितं लद्धवति । रुचयसूखत्वाहयाकरणस्य । 
तेनान्नाविदहितोपि चृद्धवभावोऽनेन किद्धः । शतिक्नब्डो हेतौ । "जअत हनिठनौः इति उन्‌ । 

एतच्च पकघ्नयं सामान्येनेवाभिदधता अन्थङ्कता स्वयमेवोपपन्नः प आश्रयणीय. 
इति सूचितम्‌ । तेनात्रा्य एच पन्त ॐाश्रयणीयः, पक्ान्तरयोरन्चुपपत्तेः। तथा चात्र 
एका्रार्छरतो जातेः सप्तम्यां च न तौ स्यत" इ्यादय॒क्षष्या तस्य सक्तभ्यथं निषिद्धस्वात्‌ 
ठनेव न भवति ! भथापि विषयनियमा्थस्येतिकरणस्यान्नापि संबन्धादिहापि भवतीति 
चेत्‌। न । . एतद्धि नियतोदाहरणविषयस्र्‌ । अन्यथा हि निषेधकस्याकरणप्रक्षङ्ग एव 
स्यात्‌ । जहमहमिक्षाज्ञास्दस्य पुनरेतदर्यन्तसेवायुक्तम्‌ । अदन्ताह्‌ धातिपदिका्नो विदिः 
त्वात्‌ । कनोऽप्यन्न न व्राह्तिः । तस्य प्रतिङ्तौ गम्यमानायाभिवाये वत॑मा नाव्‌ प्रातिपदि- 
कादुक्तध्वात्‌ । अदन्तात्‌ प्रातिपदि कादुक्तस्वाव्‌ प्रतिस्यभावाच कन्न भवति । अन्यथा हि 
गौरिव गवय इव्यन्नापि कनः प्रसङ्गः । तदिस्थमाच एव पृषो उपायान्‌ | 


ध८८ अलङ्कारसवस्वम्‌ 


नन्वत्र किमर्थ॑चिद्धया तव्सदभावि नोऽथंस्य कस्यापतनं स्थितं येनेह इष्टान्तष्वेन 
द्शंनमिव्याशङ्कधाइ-- अत्रेत्यादि । एतदेव अक्रत योजयति ततश्चैत्वादिना । समानन्यायत्व- 
छक्षणादिति । येनैव न्यायेनैकश्यार्थंसिद्धिस्तेनेवान्यस्याथंस्येर्यर्थः । नन्वर्थादर्थान्तर- 
प्रतीतेः किमयमनुमानमेव न भवतीध्याश्चद्कवाह-न चेदमित्यादि । संबन्धरूपत्वामावादिति । 
दृण्डभक्णे द्यपूपमदण समानन्यायध्वादुचितमपि म्‌ निधितमेव 1 दण्डभ्षणेऽपि 
पुथक्प्रदेक्ावस्थानादिना केनापि निमिततेनापूपानाममचणस्यापि भावात्‌। अनुमानं पुन- 
नियतमेवाथां दुर्थान्तरस्यापतन[मस्यश्याः बुयग्भावः ॥ दहेति । वाक्यन्यायमूकारुकार- 
प्रस्तावे । द्विविषेव्यनेनापततोऽयान्तरस्य साभ्यादिनिा बटूुप्रकारव्वं न तथा केच्त्यावह्‌- 
मिति सूचितम्‌ । आपाततः पुनरथान्तरस्योपाद्‌ानाङ्धुपाद्‌ानाम्यां संभवव्यस्या चे चिन्यम्‌ । । 
तत्रोपाद्ने अन्थङृतेवोद्ाहतस्‌ ¦ अनुपादाने यथा-- 

शश्रीश्ारदापाद्रजमःपनिचेः स्टशाः समन्ताद्धिमवन्मरद्धः । 
यत्रोज्ञलन्निर्भरदाखगभं दभः सन्त्यपि गभंरूपाः ॥' 

त्र गभंरूपेभ्योऽन्येषां क1 बातंस्यापतदुथान्तरमद्धुपात्तस््‌ । दलेषेणति । शरेषमूरयाति. 
ष्ायोक्स्येस्यथः। 

"दृण्डापूपिकया'--इत्यादि । पदे शब्दःग्युतवत्ति बतकति ह--दृण्ड इत्यादि । य 
दन्द्सक्षक है श्सक्ए इस ब्द प्त धुञ्‌" ठीक वेते ही जपते खंष्योपाध्यायिकाः में। [ शका] 
तो इसमें भच न्णिति' [ञ्‌ ञारणूकरालपह्ी तो उपान्त्य अई०,ॐ एषे में ब्ृद्धिदोती है| 
इस | १० ७।२।११५ | सूत्र घे वृद्धि कयां नां इदं ज्याकि यदा ज्‌ कालोप ह, [ उत्तर में] 
कंते दं--पृषोदर्‌ = इत्याद । [ एषोदरादानि यथापदिष्टय्‌ ७।३।१०९ सूत्र मे ] "जसा बोला 
गया है । यद कदकर यह वत! पा कि व्याकरण ल से जिन दन्दो मं लोप, आगम, व्णविकार 
आदि नदीं दोतते भौर वे शिष्ट पुरां दारा बोडे जतेदं तो उन्हें विदित दौ मान लेना चाहिप्‌। 
वर्याकि व्याकरण तो लक्ष्य ॐ अनुसार चलता है । इस प्रकार यहां [ दण्डापूपिका में ] बृद्धिका 
अमाव ग्याकरणविदित न द्योने पर भी सिद्ध ही मानना चाहिए । [ इवे प्रतिकृतौ इत्ति इसमें ~ 
आया ] इति शब्द हेत्वथंक है अर्थात्‌ इस सूत्र के द्यारा ठन्‌ दोगा अत इनिठन।' सूत्र से । 

ये जो तीन पक्ष हैँ दनद तमान स्पत प्रस्तुत करते हट अन्धकार ने यद सूचित किया कि 
नमे से जो पक्ष शाल्लसम्मत हो उते स्वयं ही मपना जिया जाए । यदहं प्रथम पक्ष ही अपनाया 
जा सकता ३, क्योकि अन्य दो पक्ष चालसम्मत सिद्ध नदीं होते । इसमें प्रमाण है-एकाक्षरात्‌? 
[ ५।२।११५-कार्िका ] इत्यादि वचन । इसका जथं है-- 

[ ख, स्व आदि ] एक अक्षर वाले शब्द, [ कारक आदि | कवे प्रत्यय वारे सर्द, [ व्याघ्र 
आदि ] जाति रन्दो तथा सप्तमीनिभक्ति के धर्थंसे युक्त [जसे जिम दण्ड है एेसी शाला. 
दण्डवती-आदि ] शब्दों सेये दोनों [इनि ओर ठन्‌ ] प्रत्यय नदीं हदोतेः। इन वचनो । सेन्‌ 
प्रत्यय सप्तमी विमक्ति पे युक्त र्थं [ नीतौ ] मँ निशिद्ध है । सतः ठन्‌ होगा दी नहीं । यदि कै 
कि [ भाष्यकार द्वारा ही ] निषेध वैकल्पिक माना गया है, अतः यहां यद प्रत्यय सम्भवदै तोः 
यह मी नदीं कदा जा सकता, वयोकि यह्‌ विकल्प कुछ ही गिने चुने प्रयोगां के लिए है, प्रत्येक ६ 
प्रयोग के च्ि नहीं| यदिचेस्लानदहो तो निषेध करना निरथक सिद्ध होगा। अदमहमिका 
शब्द मेँ तो यह्‌ एकदम दी मयुक्त है । क्योकि “न्‌? का विधान [ अत इनिठनोः सूत्र के द्वारा ] 
हस्व अकार से युक्त प्रात्तिपदिक शब्द से किया गथा हे [ जव कि अहम्‌ शब्द मकारान्त श्ब्द है । 
मानुजिदीक्षित ने इसमें व्रीह्यादिभ्यश्च ५।२।११६, सूत्र से ठन्‌ माना है । ज्रीह्यादि मे भत इनि. 


कः 4 


अ्थापच्यठङ्रः | ५८९ 


ठनो” से अतः" कौ भनुद्रत्ति नदीं होती ययपि व्रीद्यादिगण म अहमदहम्‌ शब्द नही भिता ] 
यष कन्‌ प्रत्यय की मी प्रापि नहीं होती क्योकि वह साद्रयाथेक प्रातिपदिक से तव होता है जब 
प्रतिङृति रूपी अर्थं गम्य हो । यदह मी अदन्त प्रातिपादिक से विदित होता बतलाया गया हैः। 
प्रतिकृति रूपी अथं का अमाव होने स्ते मी कन्‌ नदीं हो सकता। नहीं तो "गौरिव गवयः" = 
“गवय नामक वन्य पञ्चु बेल जेसा होता है" यदः मी कन्‌ प्रत्यय होने लगेगा [ य्ह उपमेयरूप 
प्रतिकृति = गवय शब्दतः कथित है, गभ्य नदीं ] तो इस प्रकार प्रथम न्युत्पत्ति ही मान्य है । 


[ रोका ] सिद यषां किंस अर्थकी होती हे ओर आक्षेप उसके साथी किंस अर्थं का जिसके 
लिए इते दृष्टान्त रूपे बतलाया गया है । इस पर उत्तर देते दै--अन्र। प्रकृत्मे इसी अथैकी 
योजना करते इए लिखते हें - ततश्च} ससानन्यायस्दरूच्णाद्‌ = स्थितिसाम्य के कारण = 
अर्थात्‌ जिस हेतु से एक अथं की सिद्धि. होती है उसी से हस अन्य अथकौी भी सिद्धि हो जाती 
है । [ शका ] “टक अथं से अन्य अथैका शान होनेके कारण इसे अनुमान रूप ही क्यों नदीं 
मान किया जाता" एसी दका कर॒ कदते दै-नचेदम्‌० । सस्वन्धरूपष्वा भावाद = सम्बन्धरूप 
न होने से = अथात्‌ दण्ड का भक्षण होने पर अपृपका भक्षणं र्थितिप्ताम्यके कारण उचिततो 
है किन्तु निश्चित नहीं है । क्र्याकि यदि अपूप किती अन्यस्थान पररख दिए गह यारेसा 
ही कोद अन्यकारणदहोतो दण्डका भक्षण दहो जाने पर भी अपूप क्रा अमक्षण मी संभव होता हैं। 

जदा तक अनुमान का सम्बन्ध है उसमे एक अधस दूसरे अथे का ज्ञान नियमतः होता ही 
है । शस कारण यह [ सधांपत्ति ] उससे एथक्‌ दै । ह€ = यहाँ = वाक्यन्यायमूल्क अल्कारों के 
प्रकरणम । द्विविध = दो प्रकार की = इत्यादि कदकर यह सूचित किया कि अन्य अर्थ 
[ रत्नाकर में प्रतिपादित ] साम्य आदि कै आधार पर अनेक प्रकारका हो सकता है [ ओर 
रत्नकरकार ने इसे २४ प्रकार का बतलाया मीहे] तथापि उसमे उतना चमत्कार नहीं र्ता । 
किन्तु आपाततः इसमे अन्य अथै के उपादान ओर अतुपादान बे आधार पर चमत्कारगत वैदिऽ्स्य 
माना जा सकता हे । इनमें से उपादान वा उदाहरण तो स्वयं ्न्धकारनेहीदे दिया है [ यथा 
(पश्युपति०? पथ मं अवद शब्द दारा तथा धरतधनुषि' प्रय मे "रिपुः ब्द के दारा] अनुपादान 
का उदाहरण यदह दै-- 

जहां हिमवान्‌ कौ ध्रीश्चारदा की चरणरजसे पवित्र हवाओं से सष्ठ बच्चे भी रसाखो के 
भीतरी रहस्या पर पर्याप्त सन्दभं [ न्थ ] रचा करतेदहैः। यहाँ अर्थं निकलता है कि बच्चों के 
अतिरिक्त व्यक्तियों [ वयस्क ] की बात ही क्या। यह यहा शब्दतः कथित नहीं है। श्रवेण = 
दलेष कै दारा = अथात्‌ देषमूलक अतिशयोक्ति क दारा । 

अथांपत्ति अरुकार का इतिहास-- 


भथांपत्ति अलंकारसर्वस्वकार की हीदेनदहै। भमामहसे लेकर मम्मट तक्के अर्थों यह्‌ 
नदीं मिलता । परवर्ती आचार्यौ म- 


र्नाकरकार ने श्स दिश्ञामें सवेस्वकार कौ बहत दूर तक अनुसरण किया है। उनका 
अर्थापत्ति लक्षण इस प्रकार है-- 


'दण्डापूपिकयाऽ्डपतन मथा पत्तिः ॥ ८१ ॥ 
दण्डापूपिका का स्पष्टीकरण एक पक्ति मेँ इन्ोने इस प्रकार किया है-- 


भूषैदण्डानां भक्षणेऽपूपभक्तणम्ा सिद्धमिति न्यायो दण्डापूपिका । अनेन न्यायेन कस्य. 
दर्थ॑स्य निष्पत्तावथांदथौन्तर स्यापत्निरिति 


५९० अलङ्ारसवेस्वम्‌ 


हों दारा दण्डका भक्षण हो जाने पर बपृरपों का भक्षण अपने आप सिद है--यह उपमा 
वाव्रय है दण्डापूपिका । सके दारा किती अथं की निष्पत्ति होने पर किसी अन्य अथै को भपने 
आप आपत्ति को अर्थापन्ति का जाता दहै" मेदगणना मेँ रत्नाकरकारने अति करदीदहै। 
उरन्होनि इसके २४ भेद माने हैँ । प्रक्रत से प्रकृत, अप्रकृत से अप्रकृत, प्रकृत से अप्रकृत तथा अप्रकृत 
ते प्रक्रत अंका आपादन द्ोने से भेदो की संख्या प्रथमतः चार इदं। तदनन्तर दोनो अर्थो 
का साद्रक्य कदी वरावर होगा कीं न्यूनता होगी, कदी अथिकता । फलतः उक्त चार भेद १२ 
हो जाने | पुनमयेददी भेद संभव अथैसे संभव अथंकी निष्पत्तिमें होगि ओर असंभव अथ॑से 
असमव अथं की निष्पत्ति म फठतः २४ हो जायेगे। इसके पश्चात्‌ अन्य अथैया साम्य कहीं 
शाब्द दोगा गर कीं आर्थ, अतः ये ही २४ भेद ४८ हो जार्येगे । 
घनुमान से अर्थापत्ति को ल्ग करते इए रत्नाकरकारने भी वदी तकं दियादहे जो 
सर्वस्व म मिलता दै- 
'दण्डापूपनयेन वस्त्वनुमितिः सामध्यंतो जायते 
नान्तर्मावमसौ प्रयात्यनुभितोौ यत्सम्मवात्मा ततः । 
अर्थापत्निरल्दङ्ृतिः एथगियं नौ रक्षणीयेत्यस्षव 
तर्कोऽङ्गं यदयं बुधैरनुभितेः सम्भावन।त्मोदितः ॥ 
दण्डापूपरीति से वस्तु कौ अनुभिति भपने आप दौ जाती हे भतः क्योकि संमावनात्मक होती 
है [ निर्चात्मक नदीं, अतः अनमान मे भतभत नदीं दोती । इस प्रकार अर्थपति अलंकार को 
स्वतन््र रूप से नदीं बतलाना चाहिए यदह कहना ठीक न्दी, क्योकि यह जो संभावनात्मक तक है 
इसे विद्वानों ने अनुमिति कांग माना हे [ अनुभित्ति नीं ]। यह कारिका अभिग्यक्तिकी 
वृष्टि से जटिक दो गदं है विन्तु इतना अर्थतो इसे निकर ही आता हे कि अथापत्ति में दोनो 
अर्थौ का स्वध संभावनात्मक रहता है लव कि अनुभिति में निश्चयास्मक । 
अप्पयदीढित = घौर पण्डितराजने भी इस अलंकार को अलंकार मान ख्या है। अप्पय- 
दीक्षित ने इसका लक्षण इस प्रकार बनाया है-- 
दौमुत्येनार्थसंसिद्धिः काव्वाथापत्तिरिष्यते। उदा० स जितस्तवन्युचेनेन्दुः का वातां सरसीरुदाम्‌॥ 
ववौमुव्य [ इसकी तो बत ही क्या |के दारा अ्थ॑की संसिद्धि कान्याधापत्ति मानी जाती है: 
यथा तेरे मुखनेतो वह चन्द्रमा मी जीत्त लिया, कमर्ले की तो बात ही क्या है [ जिन्द चन्द्रमा 
भी निष्प्रभ वना देता है ]। अप्पयदीक्षित ने अर्थापत्ति मेँ काव्यशब्दं का प्रयोग ठीक उसी 
अभिप्राय से किया दै जिसते काव्यल्गि मे काव्यदराब्द का प्रयोग किया गया हे | 
पण्डितशाज = जगन्नाथ ने दण्डापूपिका को लक्षण से हदा दिया हे । उसके स्थान पर तुर्य 
न्यायत श्चब्द का प्रयोग करते हए उरन्हानि सूत्र यह वनाया-- 
देनचिदर्भेन तुल्यन्यायत्वादर्थान्तरस्यापत्तिरथापन्तिः 
_ (करारणसाम्य के आधार पर क्रिस्ी अथ॑ से किसी अन्य अथं की स्वतः प्राकषि अर्थापत्ति 
कही जाती ह ।› न्यायः कारणम्‌ = न्याय का अर्धं दै कारण । भेदसंख्या रत्नाकर्कार केषी 
समान पण्डितराज ने भी चौबीस ही सानी है। अन्तर इतनादहै कि बारह मेदां को रत्नाकरकार 
ने संमव ओर असमव अर्थो के वर्गौ द्वारा दिण माना है जवकि पण्डितराजने माव जौर्‌ अभाव 
के दारा) 
अन्य अंका से सका अन्तर बतलाते हए पण्डितयज ने डिखा~~ 
अनुमान मेँ निश्चयात्मकं बोध होता है जव कि अर्थापत्ति मे संमावनास्मकः अधात्‌ अतुमानमें 


विकस्पाखड्ारः ५९.९१ 


बोध होता है कि--ेसा होता ही है जवकि अर्थापत्ति मे देस हो सकता ह" रेस्ा । यथरथांत्ति- 
दायोक्ति मे वाक्यार्थं का पय॑वसान विपरीत अधमं होता है जवफि अथापत्ति मेँ समान अर्थमें। 

पण्डितराज ने अर्थापत्ति मलकार को अप्पयदीक्षित के समान काम्याथापत्तितो नदीं का 
किन्तु मीमां सको कौ अधोपत्ति से उसका अन्तर उन्नति अवरय दिखलाया- 

मीमां सको कौ अथापत्तिमे पूवं अथ॑की सिद्धि अपर अंके िना नदीं होती, पूर्वं अथं 
अर्थान्तर के प्रति सापेक्ष रहता है । इस अधांपत्तिमं टेसी चिवङता नहीं रहती । इसमे दितीय 
अथं के समर्थन में प्रथमाय दृष्टान्त का कायं करता हे । 

पण्डितराज ने अपराथे का कविकल्पित होना आवदक वतलाया है भोर इसीलिए सवस्वकार 
दारा उद्धृत '्पञ्चुपत्ति०? तथा “अवस्थेयं ०? पद्य मँ अपराधं सक्र्त मान इन्द अच्छा उदाहरण 
नही माना । द्वितीय पय मे चमत्कारका कारण शविषो-इस दिष्ट पय्मँ है मथवा शिव की 
विषम स्थिति के प्रति वक्र चन्द्राभिन्न वाम विधि को हेवरूपसे प्रस्ठेत करने मं। प्रथम पद्यमें 
यदि कैसुतिक न्याय क्षी स्थिति लौकिक दै जौर चमत्कारदस्यहै तो उपमामें मी दो छोकिक 
अर्थौ कै उपादान मेँ मटंकारत्व नहीं मानना दोगा । ्युख कमल के समान हे इस वाक्य मेँ सुख, 
कमल मौर दोनों का साम्य ये तीनों तत्व लोकसिद्ध दें । यदि साम्यदशेन प्रातिम है तो 
कैस॒तिकन्याययोजना मे सी प्रात्तिमत्व माना जा सकता ह । 

विश्वेश्वर ने अर्थापत्ति नामक कोई भलंक्रार नदीं साना । वे मम्भ के जो अनुयायौ ठहर । 

चक्रवत्तीं की निष्कृष्टाथं कारिका-- 

'अर्थापत्तिस्त॒ कैसुत्येऽन्याधांपत्तिरिष्यते । 
प्रकृताप्रकरेतापातादियं च दिविशा मता ॥' 

कैमुतिकन्याय के द्वारा भन्य अर्थं की सिद्धि अर्थापत्ति नामक अलंकार मानी जाती दै । यह 
प्रहृत ओर अप्रकृत की सिद्धि के कारण दो प्रकार की होती हे। 

दण्डापूप-पृण, कडाहमे से, सींक मेँ छेद छेद कर निके जतिहैँ बौर धी नितारनेके 
किय उन्दीं सीकों को दीवाल आदि मे खोस दिया जातादै। वहा चृहादहो ओर वह सीकको 
ही कुतर खाए भौर यदि पृएणिनेदहपनदहोतो सोचा जाएगा कि उसने पमौ खादी होंगे । 
उससे कटिनतम कायै कर छेने पर सरलतम कायं करने कौ शक्यता चोततित होती हं । 
यही वात किमुत) = मला क्या इन दो अव्ययो दारा कदी जातौ है । इस प्रकार इन इन्तो 
को दण्डापूपिका भौर कैमुततिक न्याय कते द । 


[ वंस्व ] 

[ चन्न ६५ 1 तुस्यबरुषिरोधो विकस्पः । 

विरुद्धयोस्त॒खयप्रमाणविशिषटव्वात्तव्यवदयोरेकन्न युगपत्परात्तो विखड- 
त्वदेव यौगपदयासंभवे विकद्पः । ओपम्यगगेत्वाख्चात्र चाख्त्वम्‌। यथा- 

“नमन्त शिरसि धनूंषि वा, कणेपूरीक्ियत्तासाक्षा मौव्यौ वा 
इत्यादि । अन्न परतिशजकायं नयनै शिर्खां खल्व च तुद्यप्रमाणाशिल- 
घत्वम्‌। संधिविच्रद्ौ चात्र क्रपेण तुट्यघ्रमाणे, परतियलबिषयस्वेन स्पघेया 
द्योरपि संभाग्यमानस्वात्‌ ।! हौ चेमौ विरुद्धाविति नास्ति तयोयुग- 


५९य्‌ अल््ारसवंस्वम्‌ 


पत्प्रबुत्तिः । प्राप्नुवतश्चान्र युगपस्पक(सान्तरस्यानार इ्चयत्वात्‌ । ततश्च 

न्यायप्रा्षो िकव्पः। नमन्तं च तयोः खाटश्यभित्यदंकास्ता । पव 

कणपूरीक्रियन्तामित्यादौ योजनीयम्‌ । ओौपम्यगभंत्वाच्चाज चाख्त्वम्‌ । 
कचिच्छङेषावष्टम्भेन्ययं ददेयते ¦ यथा- 


'भक्ति्रह्वविलोक्नग्रणयिनी नीखोर्पलस्पर्धिनी 
ध्यानाङम्बनतां समाधिनिरतेर्नीते हितप्राघ्ये । 
लावण्यस्य महानिधी रसिकतां छ्ष्मीद्शोस्तन्वती 
युष्माकं क्कुखतां भवार्तिं्मनं जैतरे तदवा दरे; ।\' 

अर नेत्रे तनुर्वेति विकस्पः। उत्तमव्वाचच तुख्यपरमाणं श्लिष्टत्वम्‌ । न 
चात्र समुच्चये वाद्रन्दः । संभवन्त्यामपि गतौ महाकविभ्यवहारे तथां 
प्रयोगाभावात्‌ \ नु वियेघनिभित्तो विकल्पः} कथं चात्र विरोधः । नैतत्‌ । 
तजुमभ्ये नै्रयोः पविष्टत्वास्योः पृथगभिधानमेष म कार्थम्‌ । कतं च 
तत्स्पधिभावं गमयति । स्पर्धिभावाच्च विरुद्धत्वम्‌ । मैरे अथवा समस्तमेव 
शारीरमित्यथावगमे विरोधश्य चभस्येयत्वात्‌ । स चात शटेषाच्छिल्टः। 
लिङ्गश्टेषस्य वचनश्टैषस्य चान्न टष्ठेः । तस्माच्छश्ुच्चयपतिपक्षभरतो 
विकल्पाख्योऽलटंकारः पूर्वैरकृतविवेकोऽच ददित इस्यवगन्तव्यम्‌ । 

[ सू० ६५ | खमान बक्वारे पद्यां का विरोध विकर्ष [ नामक अरंकार 

क्टराता हे ]। 

[ वृ० ] दो विरोधी पदाथ समान प्रमाणे युक्त होने के कारण बरमें समानो ओर एकष्य 
स्थान मेँ एक साथ प्राप्त दो, किन्तु विरुद्ध होने के करण उनका साथ वनतान हौ तो [ अलंकार 
का नाम] विकल्प होतादै। इम साद्रंर्य छिपा रहता है सतः चारुता चली आती है। 
उदाहरण यथा- 

ध्न सिर या धनुष, करनएूल वनाश जाँ आक्नाट या प्रत्यंचाधं [ हष॑चरित-६, ¶० १९४ ] 
दस्यादि । 

यँ शबुराजा द्वारा करणीय रूप मँ कथित जो नमनका्यं हे उसमे सिरे भौर धनुष समान 
प्रमार्णो सै युक्तदैँ। ये प्रमाण है यहाँ क्रम से सनि ओौर विग्रह. क्योकि दाञ्चराजाके साथ 
स्पधां होने से दोनो ही सम्भावितदहै। ये दोन [ सन्धि विग्रह ] परस्पर मेँ विरुद्ध हेः इसकिप 
इनकी एक साथ प्रवृत्ति नहँ हो सकती, किन्तु हो रहे है परृत्त यहं दोनो ही एक साथ, वर्योकि 
अन्य कोई प्रकार यष सोचा नदीं जा सकता ¦ इस प्रकार यदद विकल्प हैत॒तः सिद्धदहै। उन 
[ धनुष भौर सिर ] दोनों म नमन को लेकर साद्रद्य है, ६सङि [ यह विकल्प | यदह अकार 
है । इसी प्रकार (करनप्रुङ वनाए्‌ जायु" इत्यादि वाक्य मे योजना कौ जानी चाहिये । इनमे 
चारुत्व सादृदयगभेता के कारण दही है । 

कहीं यह [ विकट्प ] देष से मी होता है । यथा-- 

“भगवान्‌ विष्णु के नेत्र या उनकी काया आपकी मवव्याधि नष्ट करं जो भक्ति प्रह विलोकन 
प्रणयिनी [नेत = भक्ति से नघ्र जनों को देखने का प्रणय = प्रम लिये हये, तनु = काया = भक्ति से 


विकस्पाटङ्ञारः ५५९ 


नग्न जनों का जिक्षके ददन में प्रणय = प्रीति तथा याचना हे], नीलकमल से स्पधां रखने वाके, 
समापिमें ख्ये व्यक्तियों दारा ईहित यादहितकीप्राप्तिके लिए ध्यानास्पद बनाए इये, ल्वण्य 
को महान्‌ निधि तथा लक्ष्मी जी केनेत्ोके किए रसिकता देने वाले देः । यहाँ नेत्रः या तु 
इस प्रकार विकस्प किया गया है दोनों ही पदार्थं उत्तम है इसलिए दोनों की रिलष्टतामें प्रमाण 
सामयी समान हे। यर्हाँजो वाः=ध्याः शब्द भाया है इसे ससुच्चयवाचक नदीं मानना 
चाहिए [ जिससे अथं निक्लेगा नेत्र तथा रारीर दोर्नो° ओर अलकार होगा ससुच्चय ] 
क्योकि "वाः करा अथै समुच्चय संभव होने पर भी महाकविर्यो के व्यवहारमें वेसा प्रयोग नदीं 
देखा जाता । शंका होतीदै कि [सूत्र के अनुसार ] विकट्प तो विरोधमूलक होता है, यहाँ 
विरोध कैसे सिद होगा? रेतसा नही,नेत्र [जोदहैवे] तो शरीरके बीच प्रविष्ट है अतः उनका 
अल्ग से कथन ही नहीं किया जाना चाहि९। क्योकि वह किया गया है अतः उन [नेतं] में 
स्प्धिता व्यक्त करते है, ओर स्पधितासे श्न विरोध है। य्य नेत्र अथवा पूणे रारीर [ मवात्ति 
दान्त करे ] इस प्रकार [ के अथं से ] विरोध सूखपूव॑क जाना जा सकता है। वह [ विकल्प 
दलेष से हआ है भतः दिष्ट है । क्योकि यरद [ तनु में स्लीङ्गि तथानेत्र मे नपुंसकचल्गि होने के 
कारण ] छिगरलेष तथा [नेत्र में द्विवचन तथा तल म एकवचन होने से ] वचनदरेष दिखा 
देता है । इस कारण विकल्प नामक यदह भमलंकार समुच्चय नामक अलंकार का उल्टा अरुकार 
है। इस प्रकार ध्यान देने की बात है कि पवेवत्तीं आचाय इसका अन्तर नदीं कर पाणये) 
यहा इसका अन्तर कर दिया गया है ॥ | 
विमदरिनी 


तुल्येत्यादि । पतदेव उयाचष्टे- विरुद्धयोरित्यादिना । तुख्य बरूत्वादेवेकस्यापि बाधा- 
भवान्नेकतरप्रहणम्‌ । तच्च द्वयोरपि युगपध््राप्तिः। न च विक्द्धयोरेतद्यज्यते इस्यते 
कस्यापि साघकवाघकप्रमाणाभावादनिश्वयाद नियतेकतरावरम्बनेन पाचिकी प्राप्तिः । 
अत एव नियतोयपक्तावरम्बी विकल्पः। नञ च "यवे्रीहिभिवां यजेतः इति वास्त. 
वर्वादिकटपाष्य को विशेष इष्याश्चह्याह -ओोपम्येत्यादि । ओपम्यं साधारणधम- 
निबन्धनमिति तस्याप्यन्र न्रेषम्‌ । एवं च यत्रे दौपम्यगभंस्वं तत्रेवायमरंकारो न सवन्य- 
थेति मावः । यथा- 
“निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु ख्च्मीः परापततु गच्छतु वा यथेष्टम्‌ । 
अध्येव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पद्‌ न धीराः ॥› 
अत्रोपम्यगर्भस्वामावादविकल्पमाघ्रष्वम्‌ । विकन्पन्रत्त चान्न दृशंयति- अत्रेत्यादिना ¦ 
क्रमेगति । ल्िरो नमने संधिधनुनेमने विग्रहश्चेति । श्पधेयेस्यनेन विरुदधत्वमेवोहछितम्‌ । 
दनो चेमाविति। संधिविग्रहौ ) अनयो विश्दधष्वादेतस्कायंयोरपि श्िरोधनुनंमनयोचिर्द्ध. 
स्वभू । तयोरिति । ज्िरोधनुनंमनयोः ! प्रकारान्तरस्येत्ति। यन्न शिरसां धनुषां च युगपन्न- 
मनं न संभवेद्‌ । ततश्चेति । विरुधयोयुंगप्मरञुर्यसं मवात । न्याय प्राक्चष्वेनास्यानुन्मूर्य 
त्वकम्‌ । अत एव व्वेतदभाव वादिनामन्यायवादिष्वमपि सूचितम्‌ । अन्नो पभ्यङ्तमेवा- 
कारध्वमिस्याह- नमनेत्यादि । तेनाच्न नसनाख्यश्य समानधमस्यानुगामितये्यरूपेणः 
निदक्ञः । वस्तुप्रतिवस्तुभावर्तु यथा- 
'सखष्टं पिधातरचितं सुखमेव चञखद्‌श्रकं नतश्च तव कान्तिविलोकितेषु । 
एगाष्टबिग्बमथ वा विवर्रकल मेकं, न यद्धिहित एव जगसप्रकाश्लः १ ॥' 
अत्र चद्धद्विवरुष्वयोः शद्ध सामान्यरूपत्वं करद्यो बिम्बग्रतिबिम्बभावः । उत्तम. 
त्वादिति योरपि भगर्संबन्धिष्वेन भवार्तिं्मनकरणसामध्यन समरवात्‌ । 


२८ अ० सम 


९५९७ । यलङ्कारसवंस्वम्‌ 


ननु नेत्रे च तचुश्वेव्यत्र खथुचय एव कि न भवतीव्याश्ङ्कयाह- न चत्रेत्यादि । 

गताविति । वाज्ञब्दस्य सखसुचयाथंरुडणायास्र्‌ । तथेति । सष्ुचयाथपरतयत्यथः । न 
ह्यत्र सञुचयाथों विवङितः 1 एवमच्र विरोधामावात्कथ विकक्पोऽपि भवतीव्याह-- 

नन्वित्यादि । न कार्यमिति । तन्वभिधानेनेव नेच्रयाः स्वीकृतव्वात्‌ । कृतमिति । अन्यथा 
हि प्रथगसिधानं निष्प्रयोजनं स्यात्‌ । रपधिभावादिति । तुख्यस्वात्‌ । सुप्रत्येयत्वादिति । 
सुष्टस्वेन विरुद्धस्य कष्टककपनानिराछलः कृतः । स इति । विकष्पः । एुतदेवो पहर त्ि-- तस्मा- 
दित्यादिना । खञु्ये योरपि युगपद्बस्थानस्र्‌ , इह व्वन्यथेध्यस्य तप्रतिपच्षभूत्वम्‌ । 
अनेनास्य ग्रन्थक पन्ञर्वमेव दितम्‌ । 

तुल्य इत्यादि । इसी की व्याख्या करते दै--विशूद्धयोः इत्यादि के दारा । क्योकि दोनों 
अर्थं समान वल के होते है इसलिए किसी एक का वाध नदीं श्ेता ओर न किती पक का ग्रहण । 
उस [ विरुद्धत्व या समवलल ] का स्वरूप है दोनो परक्षोकी एक दही स्थान पर प्राप्ति। किन्तु 
विरुद्ध पक्षो मे यह सम्भव नदीं दोता। फठतः यददो न किसी एक पक्षका साधक दही भिरुता 
ओर न वाधक ही निदान यद्ध मनिश्चय रहता दै। परिणामतः यहांकिसी मौ एक का 
अवलम्बन संमव नक्षं शेता । इस प्रकार यहाँ पाक्षिक वेकटिपिक ] स्थिति र्ती है इपी कारण 
हते विकल्प कहा जाता है, जिसमे नियमतः दोनो पक्षो का अवलम्बन किया जातादे। शका 
होतीदै किशजो याचावल [ किप्ती] से यश्च करे- ईस वास्तविक विकृरपसे इस विकल्पका 
क्या अन्तर है, इस पर उत्तर देते है-“ओपम्यः हव्यादि । ओंपम्य साधारण धमं पर निभर रहता है 
अतः वष [ ओपम्य ] मी य॒ तीन प्रकार कादोगा [ क्योकि साधारण ध्म तीन प्रकार का दोता 
दे ] निष्कषं यह किं य॒द्‌ विकल्प वीं अलंकार दोगा जहाँ य गोपम्यगर्भित दोगा, नदीं तो नदीं । 
[ ओपम्यरष्ित दोने से जँ यह अलंकार नहीं बनता उत्का उदाहरण ] यथ।(-- 

: ` (नीति निपुण खग निन्दा करेया प्रद्ंसा, लक्ष्मी वरस्ती चली आर अथवा जक्ष चाहे 
चली जाए आज दही मर जाना पड़या युगान्तर मे [ किन्तु ] धीर पुरुष नीति पथ तसे अलग इग 
नहीं रखत्ते 1? 

यहो भोपम्यगमेत्व न होने से विकल्प मँ केवल विकरपत्व है [ रत्नाकरकार द्वारा स्वीकृत 
अलंकारत्व नरी । नमन्तु आदिमं | विकट्प की स्थिति बतलाते हुए लिते है अव्र । क्रमेण 
करम से भर्थात सिर स्ुकाने मेँ सन्धि प्रमाण है ओर धनुष ज्खकाने में विग्रह = युद्ध ! स्पर्धया = 
स्पधां वतलाकर यहाँ विरोधकादही समर्थन भिया द्धौ चेमौ =ये दोनों अर्थात्‌ सन्धि ओर 
विग्रह । ये दोना विरुद्ध हँ इसलिए इनके कार्यं दिरोनमन तथा धनुनमन भी धिरुड दहै । तयोः = 
उनका अर्थात्‌ शिरोनमनं ओर धनुनर्मन का प्रकारान्तर्‌ = अन्य प्रकार = रेसा कोह प्रकार 
जिसमें सिर ओर धनुष कानपन साथन दहो सके। ततश्च =शइ्स कारण = विरुद्धोकी प्रवृत्ति 
एक्‌ स्थान पर एक साथन होने केकारण। न्यायप्राप्त कहकर यह बतलाया कि यह्‌ अलंकार 
काटा नीं जा सकता । ओर इसी से यह मी बतला दियाकि इसेन सानने वाल का कथन 

न्यायश्चून्यहै। य्ह साद्रदयसे ही चमत्कार होतादेदसी को द॒हराते है-“नमन०। स 

` उदाहरण के द्वारा यदह नमनक्षपी साधारण धमं अनुगामी ल्पे एक बतलाया गया वस्तु. 

प्रतिवस्तुमाव का उदाहरण यदह है- 
कान्ति देखनी थी तो विधाता को केवल तुम्हारा च॑चर मोदो वाका मुखदह्यी बनाना चादि 
था, या तो स्फुरित कलक से युक्त चन्द्रविम्ब ही अकेा 1 क्या इन [दोनों ] ने ही जगत्‌ में प्रकाश्य 

[भी ] नहींकररखादहै१ 

` यहो चचल्ता ओर स्फुरण शुद्ध ॒सामान्यरूप से साधारण षम रूप हैः ओौर भौँह तथा कंक 


¢ 9: । क कनः कि = 


विकस्पालङ्ारः | ५९५4 


विम्वप्रतिविम्बभाव से युक्त होकर । उत्तमस्व = क्योकि दोनों हयी मगवत्संबन्धी हयोने कै कारण 
मवात्तिमन के सामथ्यं से समान हे । 

रोका होती दै-- यहं नेत्र ओर तनुः इस प्रकार समुच्चय दही क्यों न मान लिया जाए 
स पर उत्तर देते हेन ष्वान्न। गतौ = वा"-दाब्द का जो समुच्चयरूपी अर्थं है तद्रूपी 
गति । तथा = ससुच्चयाथैपरक । यहो सञुच्चयरूपी अथं विवक्षित भमी नदीं दै। [ रोका ] यों 
विरोष का अभाव है अतः विकट्पभी क्से दोगाः यदी कहते है-नद्धु। न कार्यस्‌ = केव 
ततु का कथन करनेसेष्टी नेत्रां कामी संह संमव होने से। कृतस्‌ = पथक्‌ अभिधान । स्पर्धि. 
भाव = नहीं तो प्रथक्‌ अभिधान निष्प्रयोजन हो जाता । स्पर्धिभावात्‌ = स्पधिता = तुल्यता के 
कारण । सुप्रव्येय = खख पूर्वक जानने योग = इस प्रकार 'खुखपूवंकता बतलाकर विरोध को छिष्ट 
करपना दवारा सिदध होने का निराकरण किया । सख = वह = विकर्प । इसका उपसंहार करते हए 
कहते हे--तस्मात्‌० । समुच्चय मे दोनो पश्च एक साथ प्राप्त रहते है, जव कि यहाँ [ विकस्प में ] 
उसके विपरीत अलग अरग, इस कारण यह उस्र [ समुच्चय | से उल्या हे । एेसा कहकर खहु बत्‌. 
लाया कि यह अलकार प्रथमतः यन्थकार की इी कस्पना है ॥ 

विमशं--परवत्तीं आचार्यो मे रत्नाकरकार, दीक्षित जी जौर पण्डितराजने विकस्प को 
अलंकार मान च्या है। इनके लक्षण इस प्रकार है- 

 ररनाकरकार = सु° "विरुद्धयोस्तुस्यत्वे पाक्षिकल्वं विकट्पः ॥ ८८ ॥ । 
० यत्र दयोरथेयोविरुद्त्वात्‌ ससुच्चयामावेन तुल्यबलकत्वाच्च एकस्य 
बाधामावाद्‌ अनियतैकतावलम्बनेन पाक्षिकत्वं स विकल्पः । 
दो विरुड की समानता होने पर जो पाक्षिकता आती है वही विकल्प कहलाती है! जहां 
दो अथं विरुद्ध हो अतः जिनका समुच्चयनदहो सकरा हो साथदहीबर में समान होने से 
जिनमंसेकिसीषएककावबाधभीन होरहा ह्यो अतः किसी एकके पक्ष का अपनाया जाना 
संमव न होकर पाक्षिक हो तो वहं विक्को अलकार माना जाता है! विमरिनीकार की 
(साधकवाधकप्रमाणामावादनिश्वयादनियतेकतरत्वालम्बनेन पाक्षिकी प्रा्षिःः-- रत्नाकर की उक्त पंक्ति 
काही परिष्कार हे। 
रत्नाकरकार ने “निन्दन्तु नीति० पमं विकस्प माना है। रूपक आदि के समान उन्होने 
ओप्य को यहा भी आवर्थक नदीं माना है । ननिन्दन्तुं० पद्य मेँ चमत्कार है ओर विकल्पमूलक ` 
ही चमत्कार है अतः विम्िनीकार का यो केवर लोकिक विकल्पः मानना हृदवस्तवाद के ` 
विपरीत है । 

अप्पय दी्तित = 'विरोषे तुस्यवरूयोविकल्पालडङृतिमेता' 

--तुल्यवर्लो के [ परस्पर | विरोध मे विकल्पाल्कार माना गया है--श्स प्रकार पाक्षिकत्व 
को लक्षण में स्थान नहीं देते । उनका उदाहरण ईषेचरित के "नमन्तु रिरंसिन्का ही पचरूप 
यह है--~“सयः शिरांसि चापान्‌ वा नमयन्तु महीभुजः । 

यचपि दीक्षित जीने यहो साष्रदय की कोद चचां नहींकी है! तथापि उन्हयँने उद] हरण 
साददययोजना के हौ दिए । 

पण्डितराज ने श्विच्द्धयोः पाडिकी प्रा्िर्विकदपः-- इस प्रकार "विरुढ अर्थौ कौ वैकल्पिकं 
प्रक्षि मे विकर माना है। उन्होने गओौपम्य कोमी ावस्यक बतलाया है। उनका कहना है 
कि ओपम्यरदित व्किस्प मेँ केवरू विकस्पत्व होगा अल्कारत्व नहीं । इस प्रकार पण्डितराज ते 
सर्वस्व ओर विमर्दिनी का इस दिशा मे अनुगमन किया हे । 


५९द अटङ्कारसवंस्वम्‌ 


'मक्तिप्रह-› पथ पर विचार करते हए पण्डितराज ने का है यहं धवाः का अथं = तनु कै 
समान नेतः इस प्रकार सादृरयदहै। संस्कृतकोर्घो मेँ वा का अथं उपमा मान्य भी हे -- 
"वा स्याद्‌ विकस्पोपमयोः 1› सवैस्वकार के द्वारा प्रतिपादित विरोध पर रिप्पणी करते इए 
उन्दने कडा है कि विकट्प मँ वास्तविक विरोध दी कारण बनता दहे, कटिपित नदीं । °मक्तिप्रह 
पद म सर्वस्वकार द्वारा प्रतिपादित विरोध कल्पित विरोध हे । वस्तुतः श्वाः शाब्द का 
प्रयोग उपमा अर्थं म मी (“प्चिनी वान्यरूपाम्‌ [ मेषदूत ] इत्यादि स्थरो मँ कचित्‌ दो पाया 
जाता ३ \ प्रसिद्धि उघकी धविकद्पः अथं मे ही दै। अतः 'भक्तिप्रहः पद्य मे विकल्प मानने 
पर पूरव॑कथित विशेषणो की उभयान्वयिता पर ध्यान जाता हे । 


विरुद्ध वस्त॒ के विकस्प मँ चमत्कारमात्रा अवय दी अधिक रती हे तथापि अचिर्द्ध 
वस्तुओं मँ भी विकरप का चमत्कार नदीं रहता पेसा नदीं दे। सच्च यह है कि विकल्प 
भूमिका प्रर आरूढ होते ही अविर मेँ भी विरोध चला जाता हे! एककक्षा के सहाध्यायी भिरा 
काएकही पद के छि९ नियुक्तिमे विकसप दोतं दी विरोधदेखा भी गया है। सर्वस्वकार के 
सपर्धातरव की भोर ध्यान ॐ जाने का अभिप्राय यदी दिखाई देता हे । 


चनरवत्ता ने इस विषय का संक्षेप शस प्रकार किया है- 


"विरोधे तस्यबलयोतिंकल्पः सन्निपातिनोः 
अदटेषदलेषभित्तित्वाद्‌ द्विधायसुपवण्यते ॥' 


समानबल वाले तथा एक ही स्थान पर प्रक्चदो अर्थोका विरोध होने पर विकट्पालुंकार 
होता है 1 यह देषमूलक होता है ओर श्लेषरदित [ शुद्ध ]› अतः दो प्रकारका दोतादहै। 
| | [ सवंस्व | 
 { खज && 1] गुणक्रियायोगपदं सरच्चयः । 
गुणानां वेमल्यादीनां यौगपदेनावस्थानम्‌ , तथैव क्रियाणां च समुच्च. 
योऽ८कारः । विकव्पप्रतिप्चेणाश्य स्थितिः । क्रमेण यथा- 
'विदछितसकटार्छिट तव वटमिदमभवदाश्च विमटं च । 
प्रखलद्मुखानि नराधिप मलिनानि च तानि जातानि।' 
अयमेकपदे तथा वियोगः प्रियया चोपनतोऽतिदुःसखदो मे । 
नववारिधयेदयाद होभिभंवितव्यं च निरातपत्वरम्येः ॥* 
एतद्विभिन्नविषयत्वेनोदाहरणद्वयम्‌ । पकाधिकरणत्वेनाप्ययमटकारो 
दयते | यथा- 
'बिश्राणा हृदये त्वया विनिहितं प्रेमाभिघानं नव 
शदयं यद्विदधाति सा विधुरिता साधो तदाकण्यंताम्‌ । 
दते शुष्यति ताभ्यति प्रठपति भञ्छायति श्राम्यति 
प्रह्त्युर्िखति प्रणश्यति दटस्युन्मूच्छेति भख्यति । 
पवं गुणसमुच्चयेऽप्युदादायंम्‌ । ्‌ 


क = = 


सञ्युच्चयाटड्ारः ५५९.७ 


केचित्पुनने केवरं गुणक्रियायां भ्यस्तत्वेन समुच्चयो यावत्समस्तत्वे- 
नापि भवतीति बणेयन्ति । उदाहरन्ति च-- 
“-यञ्चत्ुखितसुन्सुखं दसितवत्साद्ूतमाकेकरं 
ञ्याब्खुत्तं प्रसरत्प्रसादि सुक्र समरेमकम्पं स्थिरम्‌ । 
उद्‌ भ्रश्ान्तमपाङ्गश्रुत्ति विकचं मज्जत्तरद्गोत्तरं 
चश्चुः साख च वतते रसवसादेकंकमन्यक्रियम्‌ ॥ 


अच्राकेकरादयो गुणराष्द्‌ा न्यश्चदित्यादयः क्रियाराष्दा इति सामस्त्येन 
गुणक्रियायौगपद्यम््‌ । प्रसादिसखप्रेमे्यादीनां समाखरुत्तद्धितेषु संबन्धाभि- 
आनभिति संबन्धस्य वाच्यत्वात्‌ , तस्य च सदधरूपत्वेन गुणत्वाद्‌ गुण- 
दाब्दस्वेन गुणयोगपद्यमिति द्रष्टव्यम्‌ । प्वमयं त्रिधा ससुख्चयः। 

[ सू० ६६ ] गुण ओौर क्रियाओं की एक्‌न्न स्थिति समुच्चय [ नामक अलंकार 

कहखाता हे ] ॥ 

[ व° ] विमलता आदि गुर्णो का एकत्रित होना ओर इसी प्रकार क्रिया का एकत्रित होना 
सयुच्चय नामक अलंकार कदलाता दै । यहं जो इमे रखा गया है यद इसलिए कि यह विकर्प 
करा विरोधी है! क्रम से उदादरण- 

[ यणससुच्चय )- 

"आपकी यह्‌ सेना सम्पूण शचुकुरू को दलति कर उञ्ज्वल्ताको प्राप्त हृदे ओर दुष्टौकेवे 
चेहरे मलिन हो गए । 

[ क्रियास्मुच्चय |- । ९4४ 

"एकाएक उस प्रिया से मेरा यह अति दुःसह वियोग अभी-अभी सञ्च परञआपषडातोक्या 
इसी समय इन दिनं को नवीन मेघो के उदय से निरातप ओर रम्यहोनाचादिरथा। ` 

ये रेसे उदाहरण है जिसमे अधिकरणगत मेद है । यदह अधिकरणगत एकता में मी दिखाई देता 
हे । यथा-- 

तुम्हारे दारा निहित प्रेमनामक नवीन शल्य हृदय मे धारण की हई वह विचारी जो-जो 
करती है, साधो ! उसे खनो, सोती है, सूखती है, व्यथित होती हे, प्रलाप करती हे[ दु मी 
वृक्रती ह ], ऊुम्दलाती जाती है, चक्कर खाती है, डोलती हे, रंगीटे बनाती [ इुरेदती ] है, छिपती 
जाती है [ ओश्चङ होती जाती है], गहरी मच्छीमें प्ड जातीहै [ ओर] टृध्ती जाती हे॥ 
हसी प्रकार गुणों के समुच्चय का भी उदाहरण दिया जा सकताहे [अगे विमरिनीकार ने 
दियामीदहे]) 

कुछ [ आचाय ] केवल व्यस्तरूप से [अलग-अलग करके] ही गुण ओर क्रियाओं का समुच्चय 
नदीं मानते समस्तरूप मं [ दोनो के मिकिति खूप मे] मी मानते है । उदाहरण भी देते है- 

स समय किती [ भीतरी ] रस के कारण प्रत्येक नेत्र अलग-अलग व्यापारमे लगा ३ 
कोर तिरछा है तो कोहं सिङड़ा, कोद उन्पुख है तो कोर हसीलिण, कोई माव-मराहै तो कोई 
आकेकर [ मदभर। ], कोड व्याबृत्त [ लोटा इभा ] है तो कोई॑पौल्ता हुमा, कोई प्रसादपुणे हैतो 
कोई युवुलित, कोरे प्रेमपूणें कम्पन छिपहै तो कोर स्थिर; कोर मोह चदाह तो को कनखी ` 


५९८ अलह्कारसवस्वम्‌ 


| पर टिका, को खिका इाहैतो कोदडूवा हमा, इस्ती प्रक्रार कोहं तरगायितटहै तो कोर = 
| साश्रु । 
यह आकेकर आदि शब्द गुणवाचक शन्द हैँ ओर न्यन्चत्‌? आदि क्रियाश्चब्द । इत प्रकार 

- 


यहाँ मिधितरूप मे गुण गौर क्रिया का एकत्रीकरण है । प्रसादः ओर ससप्रेमः राब्द, "समास, 
करदन्त तथा तद्धित मेँ संबन्ध का अभिधान होता है" इस वचन के अनुसार, सम्बन्ध के वाचक दै, 
वह्‌ संबन्ध मी यहाँ सिद्ध है अतः गुणै, इस प्रकार इन राब्दां म युणराब्दत्व हे। इस प्रकार 
यहं यार्णो का एकत्रीकरण माना जा सकता हे । इस प्रकार यद्‌ ससुच्चय तीन प्रकार काभा। 
विमरिनी 

युणक्रियेत्यादि । तयैवेति । यौगपथ्ावस्थानेनेव्यर्थः अनेनव चास्य गुणक्रियाणां युगपद्‌ 
वस्थिते्ंदद्वयमप्युक्तमर । नेम॑र्यमाङिन्ययोगुंणयोखपनमनमव नयो श्च क्रिययो योँगपय्ेना- 
वस्थान्‌ । विभिन्नविषयत्वेनेति । गुणादीनां बरुमुखादिविषयगतत्वाव्‌ । जतश्च भिन्नाधि. 
कृरणोऽयं चमचस्चयः । एकेत्यादि । य यत्यत्र क्ायनादीनां ज्ञोषणादीनाँं च क्रियाणामपन- 
मनभवनादिवरकालान्तरभावित्वान्न यौगपदेनावस्थानम्‌ , तथापि तन्नैरन्तर्यण ज्ञेयम्‌ । 
एवमिति । यत्रेवात्रैकविषयसवेन छ्यनाचाः क्रिया इस्यथः । तत्त यथा- 


'सितं ज्योरस्नाजारेरर्णरचि संध्याकरमरै- 
स्तमस्तोमेः श्यामच्छवि भप्खेः पीतमपिं च। 
नभो नीटीनीरं रतिरमणलीकाविहरणे 
स्थी घान्ना चिन्न चतुरमघुना चिच्नरितमद्‌ः ॥ 


अन्न सितादीनां गुणानामेकाधिकरणव्वेन युगपदवस्थानमू । नलु च केकराद्यो 
 न्यञ्चदिस्यादयश्च यदि गुणक्रियाक्ञन्दाश्तस्प्रसादीस्याइः पुनः किंचब्दा इव्याशड्धयाह- 
प्रसादीत्यादि । तस्येति 1 खंबन्छस्य 1 एवदुपसंहरति-एवभिव्यादिना । च्रिधेत्ति। गुणानां 
च्छियाणःरं गुगछ्ियाणां च यौगपयेनावस्थानात्‌ । भिच्लाभिन्नाधिकरणष्वेन यो विशेषः सं 
एतश्प्रपञ्च एवेति न परथगिहो पाततः । 


गुणक्रिया । इत्यादि । तथेव = इसी प्रकार = एकनित होकर एक जगह रहना । ेसा कहकर 

रुण जीर क्रिया मेँ से एक-एक के एकत्रीकरण को केकर संभावित दो भेद सूचित किए । [ विदकिति” 

पच में ] निमेकता या उज्ज्वलता ओर मलिनितारूपी दो युणोँका एक साथ रदना वत्तकाया गया 

है गोर [ अयमेकपदे० पच मेँ ] उपनमन = आ पड़ना मौर होना क्रियाका एक साथ रहना । 
तकाया गया है । विभिन्नविषयस्व = भिन्न-सिन्न अधिकरणं सै = वकर्योकि गुण आदि सेना ओर 
खख चादि अलग अलग पदार्थौ मे वि्यमान बतला गण है । इसीलिए य समुच्चय भिन्नाधिक- 
रण सयुच्चय हुआ । एक = इत्यादि । यद्यपि [ वविघ्राणा०› प्रच मेँ ] सोना = सुखना जादि क्रिया 
भिन्न-मिन्न समय भ होती है । अतः इनका दसा एक साथ रहना नदीं है जेसा ऊपर कथित 
आ पड़्नाः ओर द्टोनाः क्रियार्मो का, तथापि बीच मे अन्तर न पड़ने कै कारण रेस्तामानाजा 

सकेता है । एवञ्‌ = जिस प्रकार यदा [ देते शष्यतिः-पथ म ] शयन आदि क्रियार्थं एकं विषय 

मे ह उसौ प्रकार वह [ गुणों का एक विषय मै रहना ] भी शस उदाहरण मेँ देखा जा सकता है-- | 
न ~ 1 से सफेद, स्य की किरणों से काल, अन्धकारपटल से सबला, नक्षत्रं से पीला 
ओर रवयं नीली कै समान नील वणं का यह आकादया विधाताने गडा दी कौडल्पूणं चित्र बनाया 

 -दहेजो इस समय काम के खीलाविहार की स्थली है" | 


समुच्चयालङ्कारः ५९९. 


4 यहां सफेदी आदि युर्णो का[ आकाररूपी ] एक ही अधिकरणे एक साथ रहना बतराया 
। गया ह । रका ्टोती है कि यदि केकर" आदि भौर न्यत्रत्‌" आदि शब्द शुणवाचक ओर क्रिया- 
वाचक राब्द दे तो प्रादिः आदि शब्द कैसे ब्द हैः इस पर लिखते है-श्रसादिः इत्यादि । 

तस्य उसका सम्बन्ध । इस प्रकरण का उपसंहार करते है "एवम्‌ इत्यादि के दारा । निधा = 

तीन प्रकार का = हसक, युण क्रिया) तथा रुणक्रिया दोनों का एके साथ ससुच्चय रदतां 

दे। भिन्नया अभिन्न अधिकरण को लेकर जो विोषता आती है वह इन्दं मेदों का विस्तार है 

रसङिणए उन्हें यहाँ पृथक्‌ रूप से नहीं अपनाया ॥' 
विमशं--^न्यन्चत्‌०" इत्यादि प का प्रत्येक विशेषण भरतविधा मे प्रसिद्ध नेत्रचेष्टाओं 
= की विरोष सुद्राओं के लिए प्रयुक्त हि संजीविनीकार ने उनमें से प्रस्येक का स्पष्टीकरण स्वनिर्मितः 
लक्षर्णो दारा इस प्रकार किया है- 


न्यल्चित = स्यानन्यट्चित न्यत्रदपाङ्गमागम्‌ 

कुश्ित = घपाज्गसङ्गोचि तु कुन्तं स्यात्‌ । 

उन्मुख = उद्‌ञ्चितं तूष्वेमपांगसङ्कि 

हसित = निमैषदयुल्य)। छसितं विहासि ॥ १ ॥ 

साकूत = खाकतमाकादिक्षतभावगमम्‌ 

आकेकर = जकेश्रं तियगरा्तारम्‌ । 

व्याशृत्त = तिय॑ङ्‌ निवृत्तं वलितं विलोक्य 

प्रसरत्‌ = प्रेम्णा सुदूरं परिवल्गदुक्तम्‌ ॥ २ ॥ 

प्रसादि = सभविरासं स्मयते प्रसन्नम्‌ 

सुकुल = सम्मील्यमानं मुकुर वदन्ति । 

सप्रेम = स्यात्‌ प्रेमगञं मनसो द्रवाय 

कम्प्र = उतश्पसुत्कम्पितपक्ष्मतारम्‌ ॥ ३॥ 

स्थिर = स्थिरं विदूरान्तरिताथनिष्ठम्‌ 

उद्र = उद्वर्तितं तध्व विकम्पितच्रु । 

आन्त = चिड्खान्तरक्तं मदमन्थरं स्याद्‌ 

अपांगवृत्ति = विक्षेपि पाद्व यद पाङ्गच्ति ॥ ४॥ 

विकच = विकासि द्ये सविदोषरक्ष 

र मज्जत्‌ = नासाग्रजिष्ड तु निहन्चितं स्यात्‌ । 
तरङ्ञोत्तर = तरङ्गेतं यद्‌ च॒त्तिरूमिकटपा 
सास्र = उरकण्डितं रागनिबद्धबाष्पम्‌ ॥ «५ ॥ 


| [ सस्व ] 
( पक सघुचय श्चिप्रकारभिन्नं खक्षयित्वा द्वितीयं लक्चयति- 
 घ०° ६७ ] एकस्य सिद्विहेतुत्वेऽन्यस्य तत्करत्वं च । 
समुच्चय इत्येव । यनेक; कस्यचित्कार्यस्य सिद्धि देतुस्वेन धक्तान्तस्तत्रा- 
न्योऽपि यदि तत्स्पधेया तस्छसिद्धि कसेत्ति वदायमपरः ससुल्चयः। न चायं 
समाध्यटंकारेऽन्तभेवत्ति । यज दयेकस्य क्षां प्रति पूर्ण साधकत्वम्‌ , अन्य : 


दे०० अङ्कारसवेस्वम्‌ 


स्तु सोक्यीय काकताखीयेनापतति, तज समाधिव््यते। यत्र तु खटेकः- 
पोतिकय! वदनामवतारस्तचायं खसुच्चयः ! अतः खुमहान्भेदोऽनयोः 
स पष सञ्रुच्चयः सदयोगेऽसथयोगे सदसखदयोगे च भवतीति च्रिधा 
भिद्यते । सतः चोभनस्य सता खोभनैन ससुच्चीयमानैन योगे यथा- 
“कटममलिनं भद्रा मूतिंमेतिः श्रुतिश्ाच्िनी 
खुजवबटमट स्फीता ठक्ष्मोः प्रञ्चुत्वमखण्डितम्‌ । 
प्रूतिसुभगा पते भावा अमीभिरयं जनो 
जति नितसं दपं राजस्त पव तवाङ्कः "' 
अत्रामाछिन्येन शोभनस्य खस्य मूस्यादिभिः लोभन: ससुखचयः। 
पकक च दरप॑टेतुतायोभ्यं तत्स्पर्धया निबद्धम्‌ । अखतोऽदोभनस्यासता 
सखमुच्चीयमानेन योगे यथा-- 
दुर्वाराः स्मरमार्गणाः प्रियतमो दुरे मनो ऽव्युल्छक 
गाद मेम नवं वयोऽतिकठिनाः प्राणाः टं निमंखम्‌ । 
ल्नीत्वं धेयवियेधि मन्मथद्वुहत्‌ काठः छृतान्तो.ऽक्चमो 
नो सष्यश्चतुखः कथं चु विरहः सोढश्य इत्थं राठः ।' 
अच दुरवीरत्वेनारोभनानां स्मरमागेणानां तादरोरेव भियतमदुरत्वादिभिः 
खसुच्चयः । नववयःपरथतीनां च यश्चपि स्वतः रोभनव्वम्‌ , तथापि बिर्ट- 
विषयत्वेनाच्रारोभनव्वं ज्ञेयम्‌ । | 
खद्सतः चरोभनाख्ोभनस्य तादश्नेन खदसता सखथुखचीयमान्नेन योगो 
यथा- 


(राशी दिवसधूखसो गलितयौवना कामिनी 
सरो बिगतवारिजं मुलमनक्चर स्वाकृतेः । 
प्रयुधनपरायणः सततदुगंतः सजनो 
चपाह्गणगतः खलो मनसि सत्त श्व्यानिमे॥' 
अत्र शशिनः स्वतः शओोभनस्यापि दिवसघूसरत्वादश्ोभनसत्वेन खदसत- 
स्तादशेरेव कामिनीध्रभ्रतिभिः समुच्चयः । नत्व कथित्समुच्चीयमानः 
शोभनः । अन्यस्त्वशोभन इति सदसयोगो व्याख्येयः । नु चपाङ्गणगतः 
खल इत्यशोभनोऽन्ये तु शोभना इति कथं न सपुच्चीयमानस्य सतस्तादशले- 
नासता योगः । नैतव्‌ । चरुपा्गणगवः खलः" इति पस्थुत पक्रमभङ्गाद्‌ दुघर- 
मेव । न त सोन्दयनिभित्तमित्युपेक्ष्यमेवेवत्‌ । अत पवान्येरेबमादौ सहच 
रमिन्नोऽथे इति दुष्ट एवेत्युक्तम्‌ । प्रृते तु चरपाङ्गणगतत्वेन शोभनत्वं खल- 
त्वेनाशोभनत्वमिति समथनीयम्‌ । पवमपि विलतेष्यस्य शोमनत्वं पक्रा- 
न्तम्‌ , विोषणस्य त्वश्चोभनसव्वम्‌ , इद त्वन्यथेति न सवेथा निरवद्यम्‌ । 


हे 


समुच्चयालङ्कारः ५९०१ 


नु दुर्वासः स्मरमागंणाः इत्यजोक्तोदादरणवचत्‌ कथं न सद्सदयोगः । 
नेतस्‌। इद शोभनस्य सतोऽशोभनत्वसिति विवक्षा । तच्च त्वरोभनमेवेत- 
दिति विवश्षितमित्यस्त्यनयोभंदः। अत पवैकन्ोपसंहतं (भनसि सस्तश्ञ- 
स्यानिः इति खुन्द्रस्वेनान्तःप्रविषछानामपि व्यथादेतुत्वात्‌ ; अपरच्च तु 
"कथं सोढव्यः इति स्वेथां इश्त्वाभि्रायेण । तस्मादस्ति प्रकारजयस्य 
विविक्तविषयत्वम्‌ । 
तीन प्रकासें मेँ विभक्त एक सम॒चय का लक्षण कर दूसरे समुचय का लक्षण करते हे-- 
[ सू० &७ ] एक को [ किसी कायं की] सिद्धि का देतु बतराया जा रहाहो 
उसी समय उसी [ कायं की ] सिद्धि के अन्य उेतुका प्रतिपादन मी 
[ समुच्चय नामक अलंकार कहराता दे ] । 
[ बृ° ] समुच्चय यह पूर्ववत्ती सूत्र से यदहो प्रप्त है। जहां किसी कायैकौ स्तिदधिका 
कोई एक हेतु वतलया जा रहा हो वीं अन्य कोड मी पू्ववत्ती कारण के साथ सपधा कर उसी काय 
की सिद्धि करता हआ बतलाया जाय वर्ह यह एक दूसरे प्रकार का समुच्चय मानाजाता है । 


यदह समाधिनामक अलंकार में अन्तभूत नदीं होता । जहो कायं के प्रति एकं भौकारण पृणैरूप 


$ 


से सिद्धिकारक रहता है, दूसरा कारण केवर सौकयं के किण काकतालीय्‌ न्याय से आ पहुंचता हे । 
वहो समापि नामक अल्कार बतलाया जाएगा । इसके विरुडध खलेकपोत न्याय से जष्टं अनेक कारण 
एक साथ आ पर्ुचते हैः वहो यह ससुच्चय होता है । सतः श्न दोनो मे बहुत बड़ा अन्तर हे । 

यह्‌ समुच्चय तीन प्रकारसे होतादै[ १] सत्‌ सतक योग में [ २ ] असत्‌ असत्‌ केयोग 
म तथा [३] सत्‌ ओर असवके योगमें। सत्‌ अर्थात्‌ शोभन का सत्‌ अथात्‌ योभन के साथ 
योग, यथा- ५ 


वुलममलिनम्‌' [ प्रथम व्याघात की विमरिनी मे अनूदित ] यहो कुल जो अमालिन्य कै 
कारण शोमनरहै, कामूत्ति भादि शोभन पदार्थौके ही साथ सशुच्चय है। श्न से प्रत्येक दपंमें 
हेतु बनने योग्य है मौर उस्र [ कुल ] के साथ स्पर्धां किए हए उपनिबद्ध हे । 

असत्‌ = अशोमन का असत्‌ = अशोभन के साथ योग, यथा- 

काम के दुवार बाण चरू रहेदहै, प्रियतमदूरदहै, मन अति उत्कण्ठित, प्रेम गाडदहे, 
वय नवीन हे, प्राण वड़े करिन है, कुरू निमेर है, सखरीत्व धीरज का विरोधी ठहरा, समय काम 
के मित्र [ वसन्त ] का दहै, भाग्य मी उल्टा है, चतुर सखियाँ मी नदीं है। अव यह्‌ शठ विरह कैसे 
सदा जाय ।' 

इनमे दुर्वारत्व के कारण काम वाण अद्योमन वतलाए गए है उनका उन्हीं जसे प्रियतम की 
दरस्थिति आदि अर्थौ के साथ ससुच्चय दै । य्यपि नवीन वय आदि स्वतः तो चोभन दै 
तथापि यहाँ वे विरह के विषय होने से अश्ोभन हे, एेसा समश्चना चाहिए । 

सत्‌ ओर असत्‌ अर्थात्‌ शोमनत्व ओर अश्चोभनत्व दोनों से युक्त किसी एक का उक्ती प्रकार 
के किमी सत्‌ ओर असत्‌ के साथ योग, यथा- 

“चन्द्र, जो दिनसे धूसरहौो गयादो; कामिनी जिसका योवन निकल चुका हो; तालाब 
जो कमलरदित हो गया दो; भच्छी आकृति के व्यक्तिका मुखजो निरक्षर हो; प्रयु, जो धन- 
संग्रहो; सत्पुरुष, जोसदा ही दुगंति मे पड़ा रहतादहो तथा खलू, जो राजा कै अंगने में 
पर्व रखत। हो, ये सात व्यक्ति मेरे चित्त के शल्य हैँ 


६०२ ्‌ अचङ्ारसवेस्वम्‌ 


यौ चन्द्रमा स्वयं होमन दहै, तथापि दिवाकालिक उसमे धूसरताके कारण शोभनता 
जाती है। इस प्रकार वह सत्‌ भी दै ओर असत्‌ भी। उसका वैसे ही कामिनी आदि सत 
घोर मसत पदार्थो के साथ समुच्चय टै। सदसदयोग राब्द की व्याख्या यदहं रेसी न्दींकी 
जानी चादि कि जिन जिन पदार्थौका समुच्चय किया जारा है उन्म स्ते एक कोई शोमन 
माना जाए ओर उसत्ते भिन्न कोई अन्य अशोमन, ओर उनका योग सदसद्योग। शंका होती है 
कि राजा के अंगने तक पर्हुच रखने वाखा खलः तो केवर अद्रोमनदहीदै, जव कि देष सव 
रोभन देँ । हस प्रकार इनकेयोगको केकर ही यहां सत्‌के साथ असतवका योगर्क्यान मान 
च्या जाय ? रेसा नदीं । “राजाः के अंगने तकर पर्हुच रखने वाला खल" इसत अंश के कथन से 
तो यदद उच्टे प्रक्रम भगदहोतादहै। यतः यह तो सदोषरहै,न कि सौन्दयं का हेतु । श्सलिए यद 
अदा उपेक्षणीय दी है। इसीलिए [ मम्मट आदि ] अन्य आचार्यो ने इसे सक्चरभिन्न अथं मानकर 
सदोष ही वतलया है । यदं खल को 'चृपांगणगतत्वः-राजा के अंगने तक पर्हुचने के कारण डोमन 
तथा स्वतः खल रूप से अश्योभन मान कर समथन करना चाहिए । परन्तु रेसा मानने पर भी दोष 
का स्वधा निरास नदीं होता क्योकि आरम्भ किया गया है विष्य की श्योभनता ओर विद्येषण 
की अद्चोमनता ते गौर य्य की स्थिति भिन्न है [ यदं विद्येषणगत शोमनत्व पहले ओर विन्लेष्य- 
गत अद्धोमनत्व वाद मेँ कथित है ]। शंका होती है दुर्वाराः स्मरमागणाः' इस पमे मी अभी 


कदे [ चद्धी दिवसघ्रूसरः ] उदादरण के ही स्मान सदसदूयोग क्यो न माना जाए [केवल 


असद्योग ही क्यो माना जाए क्योकि वहाँ मी स्मरणमा्मण स्वतः श्ोमन षै उनमें दुवारत्व के 


कारण अ्लोमनता है ]। ेसा नदीं । वदँ [ च्च दिवस० पय मे] विवक्षा यदह कि शोमन 


होते दए भी पदाथविद्लेष मे अद्धोभनता है, जव कि वहाँ [ दुर्वाराः० पद्मे] च्यक सर्वथा 
अशोमन ही हैः यह विवक्षा है। इस प्रकार इन दोनो मे अन्तरदहै। श्सीकिणए एकमे उपकार 


किया गया ह भरे मनमें सात राव्य दै इस उक्तिसे, क्योकिवे पदाथ सुन्दर होने से चित्तम 


मवे पा ठेते दें तव व्यथाजनक्‌ सिद्ध होकर भद्योमन सिद्ध दो द्वै) दूसरे पथ मे इसके विरुद्ध 
कसे सदा जाए इस प्रकार उपसंदाषर किया गया है यष इसी अभिप्राय से किये पदाथं सर्वथा दुष्ट 
ह । इस कारण [ समुच्चय ] तीनो प्रकार्य के क्षेत्र भिन्न है 


विमरिनी 


लक्षयतीति । एकस्येध्यादिना । एकः कस्यचिदिति । यन्न थारक्षो विवदितस्य । स्पर्ध. 


येति । प्रक्रान्तस्य हेतोः । तत्सिद्धिमित्ति। कार्यनिष्पत्तिम्‌ । अपर इति । पूर्व्या ।. ` 


भिन्नट्षणरवात्‌ । ननु येवं तत्कथं व चयभागखन्तणः समाभिरेवायं न भवतीत्या. 


राङ्कयाह--न चेति । पृणेमिति । अन्यनिरपेच्मिव्यर्थः । आकस्मिकमापततो हि कारणान्त. . 


रस्य सोकयेण सखेन स्वरूपो पद्णधायिषेन सुष्टुकाययंनिष्पत्तिः प्रयोजनम्‌ । सञुरचये 
इनः स्पधयं व॒वहू नामेककार्यकारित्वम्‌ । अत एवाच्न खञेकपोतिकयेति निद शंनीयस्‌ । 
एवं च- 
'सोघाणारहणपरिस्समेण कीस्छवि अओ विनिस्खरिभा । # 
ते स्विजहरिद्‌ं सनवदइअरेणे दसाक्षा ग वाच्दण्णाः ॥' 
इध्यादो लयुच्चय एच । सोपानारोहणपरिश्रमस्परधयेव हरिदश्चनरूपस्यापि कारणान्त. 
रस्य तह्यवच्डेदनिषेधञुखेन श्वाघकारितव्वो पनिबन्धात्‌ । अत्त एवान्न न द्माधिः । तस्य 


हि काकतारीयेनापतता कारणान्तरेन कार्यस्ौकयं टक्षणस्‌ । न चात्रेतत्संभवति । न ह्यत्र ` 
काकतारीयैन हरिदज्ञनरूपस्य ङारणान्तरस्यापतनम्‌ । तद्थमेव सोपानारोहणस्योप- - . 


ससुचयालङ्कारः ०३ 


करान्तस्वात्‌। नापि तद्योगारका्यंस्यो पोढकनाद्मकं सौ कय, ह रिदं नस्यापि सोपानारोदण- 
परिश्रमस्पर्धितया तस्कारित्वमात्नस्येव विवङितघ्वात्‌ । अत एव “ग॒ चोचाश्दिण्णा' इच्यु- 
तम्र । योभनैरितति। अदस्वादिति योगात्‌ ! ननु दूरनिवासितस्वादिना भ्रियादौीनां यद्य- 
ह्योभनर्वं तरकथं न नववयः प्रश्तीनामपीस्याश्ङ्कयाह- नवेत्यादि । ताद्रोरेवेत्ति। खद्‌- 
सद्धिः । कामिन्यादीनां स्वतः शोभनानामपि गङितयौव नत्वादेर शोभनर्वात्‌ । अन्यथा 
पुनरत्र खदसदयोगो व्याख्येय इस्याश्च द्याह -- नन्वित्यादि । ताद्शेनेति ! ससुच्चीयमाने- 
नेदय्थः। प्रक्रमभेदादिति । शोभनानासुपक्रमेऽप्यश्ोमनस्य निदेशात्‌ । अत एवेति ।. 
सौन्दर्य निमित्तस्वाभावात्‌ । अन्यैरिति । काभ्यप्रकाह्ञकारादिभिः । तत्त यथा- 


श्रुतेन बुद्धिभ्यं सनेन मूखंता मदेन नारी सङिडिन निम्नगा । 
निशा श्ाश्ाद्ेन तिः समाधिना नयेन चारुक्ियते नरेन्द्रता ॥' 


अन्न श्चुतिश्टतिब्ुद्धयादिभ्य उन्कृष्टेभ्यः सह चरेभ्यो उ्यसनमूखंतयो निङक्ग्टयोभिन्नसवम्‌ । 
एवमपीति । सस्यामप्यस्यां समथंनाखाम्‌ । न सर्वथेति । अनेनापि मार्गेण कमसेदो पपत्तेः । 
सद सद्यो गाखदसखधोगौ मेद्‌ यति- नन्वित्यादिना । इति । प्रकृते खदसधोगोदाहरणे । तत्रेति । 
असयो गोदाहरणे । अत णवेत्ि। शोभनस्य सतोऽखो भनस्वेन विवच्षणात्‌ । सोढभ्य इति, 
उपसंहृतमिष्यन्नापि संबन्धनीयम्‌ । एतदेवो पलंहर ति- तस्मादित्यादिना । प्रकारत्रयस्येत्ति । 
प्रकारद्वयस्य तावद्धेद उक्कस्तद्वषचनादेव पारिशेष्यात्ततीयस्यापि प्रकारसमेदः प्रतिपादितो 
भव तीर्थे तदुक्तम्‌ । 

छक्तयति = लक्षण करते हैँ- एकस्य इत्यादि के द्वारा । एकः कस्यचित्‌ = एक कों 
अर्थात्‌ जहाँ जैसा विवक्षित हो उसका । स्पधंया = स्पधां लिए इए = अर्थात्‌ जिसका वणन शुरू 
इञ दो उसदेतु के साथ स्पर्धां । तत्सिद्धि = कायंनिष्पत्ति।, अप्र = दूसरा अन्य, अथात पूवं 
कथित समुच्चय॒से, कारणकिइन दोनोंके लक्षण भिन्नहें। यदिरेसादै तो इसे समाधि. 
अलंकार ही क्यो नहीं मान ठेते, जिसका लक्षण आप बत्तलाने वाके है--ठेसी आका पर लिखते 
दै--न च । पूणम्‌ = अन्यनिरपेक्ष । यदि कोई अन्य कारण एकाएक आ पड़ताहै तो उसका 
प्रयोजन छकरताके द्वारा र स्वरूपम अतिराय छाने के कारण कायं की ओर अच्छी तरसे 
निष्पत्ति होती है। जव कि समुच्चयमें बहुतसे कारण स्पर्धां के साथ एक कायं करते दे । 
इसीलिए यष्टा 'खलेकपोत्तिकाः य इष्टान्त दिवा गया है [ जेषे खचिहान में कबूतर अनेक संख्या 
मँ एक साथ उतरतेहें वेसे]। इस प्रकार-[ रध्नाकरकारद्वारा समाधि के उदाहरणे रूपमें 


उद्धत | 
सो पानारोहपरिभश्रमेण कस्या सपि ये विनिःस॒ताः । 


त एव हरिददनव्यतिकरेण श्वासा न विच्छिन्नाः | 


सीटी चद्नेके प्रिश्रमसे किसीसन्दरीकी जोरसोसिं चीं वे हरिदशरेनके कारण 
विच्छिन्न नहीं हृदं !'- इस रथल मेँ समुच्चय ही मानना चाहिए । क्योकि य्ह जो दरिदशेन- 
रूपी दूसरा कारण है उसमें शाको के व्यवच्छेद कै निषेध के प्रति कारणत्व न वतलाकर इवास के 
प्रति कारणत्व बतलाया गया है ओर यह दवासके सोपानारोदणपरिधमरूपी प्रथम कारणक 
साथ सपधा किप हए है । इसील्िर यहो समाधि नहीं है । उसका रक्षण तो "काकतालसेयन्यायस्ते . 
एकाएक आ पटच अन्य कारण दारा काये की निष्पत्ति मे सुकरता" है। वह यँ संमव नदीं 
हे । यां हरिदरोनरूपी अन्य कारणका आना काक्ताटीय न्यायसे नहीं इभा है) वहतो 
सोपानारोहण का उद्देश्य ही था। रेसा मी नदीं फि उस [ हरिदर्चनरूपी कारणान्तर ] के भा. 


६०8 अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


जाने ते काय को सिद्धि मे सदायता पर्वा कर करता लादीहो, क्योकि यहौ दरिदरोन को 
भी सोपानारोहण परिश्रम के साथ स्पा ल्िणिहृट कारणके रूपम इवास्तजनकरूपसे दी वत- 
लाना अभीष्ट है । इसोलिए "विच्छिन्न नदीं हरः यह कदा भी । शो भनेः = शोभन = मद्रत्व आदि के 
योग से । शंका दोती है कि यदि ष्दूरस्थित होने आदिके कारण प्रिय आदिमं अशोमनता चली 
आती & तो (नवीन वयः आदि मे कर्यो नदीं जाती । इस पर उत्तर देते हुए लिखते दै--(नव०'। 
तालैः = पैसे हयी = सदसच्व से युक्त । कामिनी भादि स्वतः रोमन है तथापि उनमें गलित. 
योवनत्व आदि अश्चोमन है । व्यदँ दूसरे प्रकारसे मी सदसदयोग की व्याख्याकौ जा सकती 
है क्य] इस डंका पर कदते दैँ--"ननु°2 । तादृ्ेन = ससुच्चीयमान । प्रकममेदात्‌ = म्रक्रमभेद 
वर्योकिं योमन से आरम्भ है भौर ला विठाया अद्योमनको। अतएव = इसीलिए = सोन्दयं क्षा 
निमित्त न वनने के कारण । अन्य = काव्यप्रकाशकार आदि। [ काव्यप्रकाद्च में] उस 
[ सद चरभिन्नत्व ] का उदाहरण यद्‌ है- 


"द्धि विया से अलंकृत होती है, मूखंता व्यसनसे, नारी मदस्ते, नदी पानीसे, रात 
चन्द्रमा से, पयं समाधान से मौर राजत्व नीति से ।" 


यद्या विद्या प्यं मौर बुद्धि आदं जो उक्कृष्ट सहचर हँ उने व्य॒स्तन ओर मूर्खता भिन्न दतै । 
वर्योक्भि वे निङ्ृष्ट है । रवसरपि = रेसा होने पर मी--इस प्रकार का सभन किट जाने पर भी। 
न सर्वथा = क्योकि यह मा अपनाने परमौ क्रममेद वनादही रहता है। भत्तदयोग ओर 
सदसद्योग का अन्तर करते है- "ननु" इव्यादि द्वारा । इह = यदा प्रकृत जो सदसद्योग का 
उदाहरण ह श्स्े । तन्न = वद्य असद्योग के उदाहरण मेँ । अत एव = शोभन अथात्‌ सत्‌ की 
अद्योभनरूप से विवक्षा होने के कारण । शखोढब्य = इसके साथ मी पूर्वोक्त “उपकतहतम्‌ = उपहार 
किया यह क्रियापद लगाना चादिए। अव इसीका उपसंहार करते हं-तश्मात्‌ = श्स्यादि के 
दारा । प्रकारत्रयस्य = तीनों प्रकार का = इश्नमेंदो प्रकारका भेद पदलेद्दी बतला दियाहै। 
उससे बचे हृ तृतीय प्रकार का भमी मभेद प्रतिपादित दहो जाता दे ॥ 


विमदः इतिदास--सयुच्चयांकार रुदर की देन है । दण्डी से लेकर उद्धट तक यह्‌ नदीं 
मिलता । इस विषय में रुद्रट का वहुमुखी विवेचन इस प्रकार है- 


[ १] यत्रेकत्रानेकं वस्तुपर स्यात्‌ सुख।वद्ायेव । 
ज्ञेयः समुच्चयोऽसौ तरेधान्यः सदसतो्यांगः ॥ ७।१९ ॥ 


[ २] व्यधिकरणे वा यस्मिन्‌ ुणक्रिये चेककालमेकस्मिन्‌ । | 

उपजायते देशे सम॒च्चयः स्यात्‌ तदन्योऽपि ॥ ७।२७ ॥ 
जं प्क ही जगह अन्य अनेक वस्तु आ जाती है यावे सुखावह हो जाती है [ यादुःखा- 
वह्‌ ह] वयँ समुच्चय होता है। यदीं समुच्चय एक प्रकारका ओर होता है जसर्मे सत्‌ ओर असत्‌ 
का सम्बन्ध रहता है । इसी प्रकार जदा [अनेक गुण ओर त्रियार्प एक ही काल ओर एक ही समय 
मँ अलग-अलग वतलाईं जारे तो वह मी एक अन्य प्रकार का समुच्चय होता है । शस प्रकार वस्तुतः 

दद्रटने तीन प्रकार के सयच्चयों की कसना की है । इन समी के उदाहरण भी उन्न दिएहें। 

इन कारिका्भ मैसे प्रथम का अथं नभिस्ताधुने टेसा इछ करिया हे जिसप्ते विदित दोता 


हे कि प्रथम कारिका प्रथम ससुच्चय के किए ओर द्वितीय दूसरे के छि तथा रुद्र को सञुचय 
केवर दो हो प्रकार मान्य है। वस्तुतः इन कारिका्ओं से जो स्वामाविक भथं निकलता उसके 


ससुयाल्लङ्कारः 2०९ 


कै 


भनुसार प्रथम कारिका तीन प्रकार का समुच्चय प्रस्तुत करती है ओर दूसरी कारिका केवर एकः 
प्रकार का। फल्तःरुद्रट के मत में सम॒च्चय चार प्रकार का मान्य है। कारिकार्ज का सथं 
यह दै- 


[१]५¶ १] जदं एक दी स्थान पर अन्य अनेक वस्तुएं दिखलाई जाए [२ ]या जहांसे 
ये वस्तुए सुखावह भादि प्रतिपादित हों वह समुच्चय कदलता है । यह्‌ तीन प्रकारका होता 
हे [ एक ] अन्य [ तीसरा ] भेद है दो सदसत्‌ वस्तुओं का योग ॥ ७।१९ ॥ 


[ २] इसके अतिरिक्त ज्यौ भिन्न भिन्न स्थानो पर रहने वाले गुण ओर क्रियाएकदही 
समयमे प्कदी स्थान पर होते हए बतलाए जाते दैः वहइ भी एक समुच्चय होता है जो उपयुक्त 
प्रकारो से भिन्न होता है ॥ ७।२७ ॥ 


नमि साधु ने प्रथम कारिकामे आप "पर शब्द का अथं उत्कृष्ट कियादहै भोर उत्छृषट 
करा अर्थं ज्लोभन। रुद्रट द्वारा प्रदत्त प्रथम अंशके उदाहरणम शोमनत्व का कोई संकेत नीं 
है । उधर सदसदयोग से शोभनत्व गतां है अत : यदहो परशब्द का अथं शोभन करना अनावश्यक 
है । नमिसाधु को शोभनत्व ओर उसके साथ अद्योभनत्व के उदाहरण अपनी ओर से देने 
पडे) च्रेधा-विज्ेषण को भी नमिता ने सदसतोयोंगः मेँ भन्वित माना है। फलत 
सदसतोः इस द्विवचन का समाधान उने बन नहीं पड़ा । उन्दने “सत्‌ ओर अपतत्‌, योग से 
होने वाङ तृतीय भेद मेँ 'सदसतोः” श्स द्विवचन की उपपत्ति के किए (केवर धक सत्‌ ओर एक 
ह्यो असतः का योग स्वीकार कियाहै अथात्‌ इस ठृतौीय भेदम एकाधिक सत्‌ का एकाधिक 
असत्‌ से योग नदीं हो सकता । 

रुद्रट ने उपर्युक्त प्रथम तीन मेदो के उदाहरण अलग अल्ग दिर षै उन्हं उनके कान्याल्कार से 
ही देख ठेना चाहिए । परवत्तीं भआचा्यौ मे रुद्रट के तुरन्त बाद भाने वाके मम्मरने हीरुद्रटका 
इस मान्यता को केवल (सदसद्योग' तक सीमित कर दिया) 

दवितीय मेद मेँ 'विदकितसकला०? तथा "दैवादहमय०' प्य रुद्रट के दी प्रय हैँ जिन्दै उन्दनि 
य्ह उदाहरण रूप मं प्रस्तुत किया था) 


मम्मट = ने ससुच्चय को वादमें सवंस्वकार द्वारा स्वीकार किएगण दो दी मेदो तक सीमित 
रखा था । उनका विवेचन है-- 


[ १९] तत्सिद्धिहेतावेकस्मिन्‌ यत्रान्यत्‌ तत्करं भवेत्‌ समुच्चयोऽसो 

[ २] स त्वन्यो युगपद्‌ या गुणक्रियाः ॥ 

[ १] "किसी क्यं की सिद्धिके लिप सक्षम किसी एक हेतु के उपस्थित रहने पर यदि 
उसी कार्यको करने मेँ सक्षम कोरे दूसरादेतु चाण तो एक प्रकार का समुच्चय 
होता है ओर 

[२] यण, क्रिया तथा युणक्रियाओं का संग्रह दूसरे प्रकार का सञुच्चय होता है । 

इन मेदां के जो उदाहरण मम्मटने दिए ये सद॑स्वकार ने उन स को उन्दी मेदो के छिए यहां 

अपना चया है। 

रुद्रटने गुण ओर क्रिया मेँ ससुच्चय के पूर्वं भधिकृरणगत भेद रहना आवदयक माना था । 

मम्मट ने उसको अमान्य ठहराते हए उदाहरण दिया-- धुनोति चाकि तयते च कोत्तिम्‌” आप 
तलवार चलते है भौर करीति फैलीते हे । दँ "चलाना मोर फेराना दोनों क्रियां भिन्न-भिन्नः 


६०६ अलङ्कारखवेस्वम्‌ 
अधिकरण मेँ प्रसिद्ध नदीं ह ओर उनका एक दी वर्यं व्यक्ति मे समुच्चय किया जा रहा हे । इसी 
प्रकार रुद्रटः के विशेषण “टक ष्ठी स्थान ~पर भी मम्मट ने यदह विरोधी उदादरणदिया 
(करपाणपाणिश्च भवान्‌ रणक्चितौ सस्ाधघुवादादच छरा. सुराल्ये" = युद्धस्थल मँ आप कृपाणपाणि 
होते है ओर देवता रोग स्वगं मे ससधुवाद्‌ । यँ सञुच्चय विषयभूत राजा ओर देवतार्थं के 
स्थान भिन्न है । सर्वस्वकारने मम्मटके इस लाव क उचित उदाहरर्णो द्वारा अनुमोदन क्रिया हे । 
स्स्वकार की जो कल्पना सदस्तद्योग के तृतीय मेद के विषयमे है उसे काव्यप्रकादा को 
ची दिवस ०” प्य की वृत्ति से अपुष्ट समेन मिलता है । वृत्ति इस प्रकार दे भत्र रादिनि 
 धूसरे चास्ये शव्यान्तराणीति “शओोभनाद्योमनयोगः' । इसका अथं उदोत भोर प्रभाम वही क्रिया 
गया है जो स्वस्व मे करना अभीष्ट वतलाया गयादै। रसगगाधरकारने भी इते स्वीकार करिया 
हे। इन सव्ये दोष भी वही सहचरमिन्नत्व दी दिया गया दै। वस्तुतः इस प्रकार की 


र ~+ सिद = 
व्याख्या म चमत्कार का कारण समुच्चय सिद्ध न दोकर 


वेषम्य सिद्ध दहदोताहै। करटौ चन्द्र 
जेता कान्तिमान्‌ , हथ, छन्दर पदाथ ओर करट धूसरताः इस प्रर का अर्थं निकञ्नेपर दही 
तो यहाँ चमत्कार होता । इस अधमं 


विषमत्व के अतिरिक्त यदि समुच्चयमभीदै तो विषम कै 
समी उदादहरर्णो मे समुच्चय दी माना जा सकता है, अन्तर यह रहेगा कि यां वेषम्य रण <~ 
क्रियागत हयोगा जव किं पिषम के उदाहर्णो मे वह द्रव्यादिगत रहता है। इसके अतिरिक्त 
ची दिवसधूपरः इस अंडा तक हौ समुच्चय को सौमित माना जाए तो इस पणे प्यर्मे 
माला-सयुच्चय मानना होगा । तत्र यद सोचना होगा कि क्या केवल दाशी जो दिन मे मलिन 
हो मेरे मन में शस्य है इतना ही कहने पर ससुच्चयक्त चमक्तार होतादै। फिर इस प्रकार 
के सय॒च्चय को सदा दी अवाच्य मानना हौगा क्योकि श्नमँ उप्तके वाचक च आदि पर्दाका 
प्रयोग कमी न होमा। साथ दही य॒द्‌ मान्यता हटानी प्ड़ेी कि एक मे अनेक शोमनान्ञोमन का 
योग ह्यो, क्योकि श्यः मे धू्रत्व रूपी अन्लोमनत्व तो कथितं दै, शओोमनत्व कथित नहीं है । 
तो क्या अनुक्त का मी समुच्चय होता दै १ उधर शशी स्वयं कोद गुण नदीं है । भौर यदि वद्‌ 
श्ोमन मीहैतो अधिकरणै, नकि येय । अधिकरण ओर आयेयकातो सञुच्चय ल्षणमें 
उक्त है नही । शशी चब्द कौ शदित्व जात्तिकावाचक माना जादतो योग होगा गुण मौर 
जाति का, युण थुणका नङ्ीं। यदि गुणका अथै धमं कर्‌ तो क्रिया का एथक्‌ करना अनावद्यक 
सिद्ध होगा व्थोकरि प्रिया मी एक वस्ुधमं है । रत्नक्ररकार ने वैता किया उन्ोनि लक्षणम 
। | या क्रिया शाब्द न देकर धमं दब्द दी दिया है । । 
जदं तॐ सद चरभिचरत्व क्री वात है व श्ुतेन बुद्धि०ः पच मेँ अवदय है क्योकि वद पकत्रि 
किर अर्थो त साम्य विवक्षित नहीं ३ जैसा पाणिनि के सूत्र दवधुवमधोन(मतद्धिते' मे फलतः वहां 
कौ प्रत्येक इकाई स्वतन्त्र रै, जव फि शशी दिवसः पच मेँ श्लव्यत्वेन' सव समुच्चीयमानां में 
साम्य है, अतः यौ ्राश्यत्वावच्छिनन' होने से समी सहचर दं । एेप्ता ङु लगता है कि शी 
दिवप्तधू्त२०? पच की पूणं अभिव्यक्ति दो इक्यो मँ विभक्त हँ, एक समुच्चय ओर दूसरी दीपक । 
राजग्रास्ाद मे डटे रहने वारे रिती चुगल्लोर को लक्षय करके यह्‌ वात कही गई है । चूफि एसा 
व्यक्ति अग्रिय होता है भतः कवि ते यदो अप्राकरणिक अन्य अप्रिय वस्तुओं का जमाव करन। चाहा 
है, ओर दसीलि चन्द्रमा को धूसर रूप मेँ ओर काभिनी आदि कौ गलितयौवन रूप मंरखादहै। 
इन रूपो म ये सव अध्रिय दयी होते है। इसी प्रकार य्ह केवल भश्योभन अशोभन का योग सिद्ध 
दोगा । चित्त श्य तो शोभन होता नदह है ओर जव समी शध्य है तो सभी अद्लोभन हं । सचय 
मी अपने आप प्ररूढ न होकर दोपक का अंग वनता दै जोर तव चमत्कार रत ह । 


ससुच्चयाटङ्कारः ६०७ 


यदि यहो सस॒च्चय भी मान ल्य जाएतो मम्मट की उपयुक्त पंक्तिका काव सवैस्व- 
दारा प्रस्तुत पक्ष क विरुद्ध जाता है । इसके अनुसार उक्त पंक्ति मे (्व्यान्तराणिः अंश व्यय 
होगा । इस्त प्रकार का अथे मानने पर दुवार।:०› पय से मी अन्तर करने की विपत्ति टल जाती 
हे । सवस्वकार के परवती भाचा्यो म-- 


कशोभाकार = ने दोनों ससुच्चयों को मिला दिया, है ओर उनका एक अभिन्न लक्षण इस 
प्रकार बताया है- 


्धमयोगप्यमन्यस्यापि तत्करत्वं च सखुच्चयः ।' 

'ध्मगत यौगपद्य ओर अन्य का मी उसी काय का करना क्सुच्चय । 

धर्मम युणभोरक्रियाका दी नदीं उनके जभार्वो का संग्रह भी रत्नाकरकार को मान्य है। 
सदसदयोग को अमान्य ठहराते हुए उन्होने छिखा है- 

(न चास्य सद्योगासदयोगसदसदयोगे भदो गणनीयः, आयोः समसंकीणत्वात्‌ ; उत्तरस्व 
विषमगमंत्वाद्‌ , अन्यथान्यालकरसंकीणतया मेदगणन। प्रसङ्गात्‌ ।' 

` इसमे सद्योग, असदूयोग तथा सदसद्योग के आधार पर॒मेदगणना नदीं माननी चाददिए, 

क्योकि इने से प्रथममेदमे समालंकार कासंकर मात्रह, ओर रेष दोमें विषमाल्कार का। 
यदि.अन्य अलंकार के संकर से मेद गणना करेगे तो अन्य अलकारो के संकर ते होने बालेभेद भी 
 गिनने होगे ।' पण्डितराज जगन्नाथने रत्नाकरकी इस स्थापना का उनके नाम क्रा उल्लेख 
करते हए खण्डन किया है । 

पण्डितराज्ञ-ने दोनों ससुच्चयां का समन्वय एक ही लक्षण मे इस प्रकार दिखलाया है- 

ध्युगपत्पदाथांनामन्वयः समुच्चयः 
'अनेक पदार्थो का एक साथ अन्वय समुच्चय कहराता है ।› 
उनकी सेदगणना इस प्रकार दै- 


अतेकधर्मिगत | एकधमिगत 


| ==> ~~ -------- ~~~ --~- -- ~ ----- --- -- -~------ ~ ~~~ 


| । | 
(प; + 4 कारणतातिरिक्तसंबन्धमूल्क कारणता स्ंबन्धमूलक 
| | 


[11 कक | 
111 २२11110 क 


| | | | 


५३१६६ ` | सद्योगरूप असद्योगसूप सरदसद्योरूप 
गुणयोगपचकूप क्रियायौगप्ह्प गुणक्रियोभययौगपचरूप ७ ८ ९ 
र्‌ र ६ 


जसा कि का जा चुका है सदत्तदुभययोग की अथयोजना पण्डितराजने वदी मानी जो 
सवस्वकरार्‌ ने सानी थी । उनके 


“जीवितं म्रत्युनालीटं संपदः श्वासविभ्रमाः। 
रामाः क्षणप्रभारामाः शव्यान्येतानि देहिनाम्‌ ॥› 


2०८ अखङ्ारसवेस्वम्‌ 


- “जीवन, जो मव्य से ग्रसित दो, संपत्तियां जो श्वास के समान अस्थिर दो, सियो नो 
बिजली के समान अस्थिर हो, प्राणिर्यो के चिर चाल्य दै! इस स्थरू में उन्दने एक ही जीवन म 
स्वतः श्चोमनत्व जौर मृल्युम्रस्तत्व के कारण अश्छोमनत्व माना है । यदि इन आचार्या के समत्त-- 

'रुडमाविकमवस्थितं चरं वक्रमाजेवयुणान्वितं च यत्‌ । 
सवमेव तमस्ाऽस्ति साम्प्रतं वीतमेदमयि मत्तकाडिनि 1 
` दसा कोद पय होता तो इन्दे शोभनाद्योमनयोग कौ उपयुक्त कल्पना न सताती । इस पथ 
म उज्ज्वर तथा मलिन चंचल तथा स्थिर वक्र तथा ऋजु पदार्था का विरोध शओोमनत्व ओर 
अदोभनत्व पर दी आधित दै तथा यदह एक वीतभेदत्व' मे उनका समुच्चय भी है । कार्यकारणभाव 
के लिए उत्तराधं मे-'स्वैमेव तमसा समीकृतं दीपयत्यसमसायक समम्‌ ।-- इस प्रकार की 
योजना की जा सकती है। इसमे 'सवंः शाब्द से पृ्वादुरधप्रोक्त पदार्थौ को रोभनारोभनता 
व्यक्त हे । 
विश्वेश्वर- ने मम्मटके दी समान दोनां समुच्चयो को प्रथक्‌ माना है भोर उनके लक्षण 
हस प्रकार वता दै- 
८ १ ) (एकस्मिन्‌ सति देती हेत्वन्तरगीः ससुच्च्यः कथितः । 
सदसत्सदसद्योगे । 

८ २ ) युणक्रियायोगपयेऽन्यः ॥ 

सदसदयोग राब्द पर इन्होंने कोर क्षोदक्षेम नदीं उठाया । संजीविनीकर भ्रीविद्याचक्रवत्तीं 
की निष्डृष्टाथंकारिका सयुच्चय पर इस प्रकार है- 

एकक्रियायामन्यस्य क्रिया त्वन्यः समुच्चयः । 
सदसदद्धेधयोगेन स॒ चिधा संन्यवस्थितः॥ 

पाठान्तर-- प्रथम समुच्चय के अन्त अन्तम आया शयुणद्चब्दत्वेनः शब्द समी प्रतियोँमें 
'गुणज्चन्देनः इसी प्रकार छपा है । .समासक्ृत्तद्धितेषु ` ` ` युणशब्दत्वेन-णेसा अन्वय मान स्वकद्पना 
ते हमने श्युणङ्ब्दत्वेनः पाठ बनाना ही उचित समन्चा हे । 

दवितीय समुच्चय मेँ सौवार्याय के स्थान पर निणय सागरीय प्रति तथा डा० राघवन्‌ 
की प्रति में कार्याय तथा ० द्विवेदी वाली प्रति में*'तत्कायंसोकयांयः पाठ है। इसके पहले आण 
यत्र के स्थान पर मी इन सव प्रतिय मेँ तत्रः छ्पाहै। ॑ 


[ सवंस्व | 
[ घ्रू° ६८ ] कारणान्तरयोगात्कायेस्य सुकरत्वं समाधिः | 
केनचिद्‌ारन्धस्य कायस्य कारणान्तस्योगात्‌ सोकं यत्‌ , स सभ्य 


गाधानाव्छमाधिः । समरुचचयसादश्यात्तदनन्तरमुपक्षेपः । तद्वैलक्षण्यं तु 
पाक्प्रतिपषादितमेव । उद्‌ाटरणम्‌- 


(मानमस्या निराकतं पादयो पतिष्यतः । 
उपकाराय दिष्टयेव्‌मुदीण धघनगजितम्‌ ॥* 
माननिराकरणे कायं पाद्‌ पतनं देतुः। तत्लौकर्याथं घनगर्जितस्य कारः 
णान्तरस्य व्रक्षेपः। सौकर्यं चोपकारायेति पदेन प्रकाशितम्‌ । 


समाध्यलड्गरः ६०९ 


[ सूत्र ६८ | अन्य कारणके योगसे कायं का सुकरतापू्वंक निष्पन्न होना समाधि 
[ अरुंकार कहराता हे ] ॥ | 

[ द° | किसी एक कारणके द्वारा शयु किएगए कायंका अन्य किसी कारण के सहयोग 
से जो सरलता वंक निष्पन्न होना वह सम्यक्‌ = भली मांति, आधान = निष्पत्ति इस व्युत्पत्ति के 
आधार पर समाधि [ नामक अलंकार कदलाएगा ]। समुच्चय के साथ सादृश्य होने से हसे 
उसके वाद प्रस्तुत कियाजा रहा है। उससे इस्तका अन्तर पहले ही वतला दिया गयादहै। 
उदाह्‌रण- 

दस [रूटी प्रिया] कामान दूर करने के क्ट इसके पैरों पड़ना चाहता था कि मेरे 
उपकार के कि भाग्य से यह्‌ बादर गरज उठा । 
यहो मानका निराकरण कायहै। उस्मेदहेतुहै पैरों पर पडना। उसकी भौर सररूता- 
पूवक निपपत्ति के ङ्प बादल की गडगड़ाहट रूपी अन्य कारण प्रस्तुत किया गया । खुखपूर्वक 
निष्पत्ति मी यहां “उपकार "~ पद से स्पष्ट की गरं हे ॥ 


विमिनी 


कारणेत्यादिना । पतदेव ऽयाचष्टे--केनचिदित्यादिना । सौकयैमिति । कायस्य सुखेना- 
नायासमेद ग्रकृतकारणवशेन निष्पन्नस्वेऽपि स्व रूपोपचयाधायकव्वेनाङ्च्छाथस्योपरुत्तषण- 
परष्वेन विवक्नितववाच्घुष्टु वा करणसिस्यधंः । अत एव कारणान्तरयोगात्‌ कायस्य सुखेन 
सुष्टु वा करणस्य मेदद्वयमपि ज्ञेयस्‌ । प्रागिति सघ्ुञ्चये ! हेत॒रिति । प्रङ़्तः । तत्सोकर्यांथै- 
मित्ति। सुखेन कायंनिष्पस्यथमिसवथः। यद्याकर्मिकघनगजितयोगो न स्यात्तदा निरा. 
यासमाननिराकारणं न सिद्धयेत्‌ । एतच प्रथमप्रकारस्योदाहरणम्‌ । द्वितीयस्य यथा- 


लेण दीलखाभरणममितद्लोरयिः्दः श्रमास्भः- 
शाद्त्या पस्त्रादलिस् पमद्ब्यज्ञितश्मश्चुदेहः । 
ढेलिच्लोभः कुवर्यदशां मान्मथ कायंभावे 
पुंवद्धावं घटितममितः पारिषुण्यं निनाय ॥° 
अन्न स्वेदादिना घटितस्यापि पुंवद्‌ भावस्य केिकोभाख्येन कारणान्तरेण सखेणाभरण- 
 न्नोऽनादिना स्वरूपोपचयाधानाव्समाधिः । एवमेवमा दावञ्यापकमेतल्च इणमिति यद्न्ये- 
रुक्तं, तत्तेषामेतन्न्षणस्वरूपानवघारणमेवेव्यल वड्ना । 
कारण इत्यादि । इसी की व्याख्या करते है-- केनचित्‌, इत्यादि के दारा । सौक्य॑म्‌ = 
कार्य, प्रकेत कारण क्ते ही दारा संखपुवैक निष्पन्न हो सकता है तथापि कायं शरीर मे ओर अधिक 
विद्येषता कने, सररता, अथवा पुष्ट प्रकार से कायं निष्पत्ति करने के अभिप्राय से सौकर्य 
शव्द का प्रयोग किया गया । इसीलिए अन्य कारणके योग से कां का, शुखपूव॑क अथवा 
मली भाँति, इस प्रकार जी दो प्रकार से कियाजातादहै इन दोनोंको श्सके दो प्रकार समञ्चना 
चाहिप । पराध = पदे = समुच्चय प्रकरण में । देतुः = हेतु अथात्‌ प्रकृत हेतु । तस्सौक्याथ॑स्‌ = 
उसके सोक के लिए भात्‌ सुखपूवंक कायं निष्पत्ति के क्यि। यदि आकस्मिक धनग्जना 
न दहोती तो मान का अनायास निवारणनदहोता। यह [ उक्त प्रकारोमें से] प्रथम प्रकारका 
उदाहरण हुमा । द्वितीय [ भलौ्मोति निष्पत्ति ] का उदाहरण [ रत्नाकरकार दारा ही उदभृत ] 
यह पय है-- | 
२९ अ० सण * 


९० अलङ्ारस्वेस्वम्‌ 


"कामदेव का कार्य जव होने लगा तव नीलकमल्से नेरा वारी खन्दरिर्योने [ विपरीत रति 
म] जो पुरुषकायै अपनाया उसे केलिक्षोमने पुरी तरद पृण्ताको प्राप्त करा दिया क्योकि 
उसने अंग प्रत्यंग के खियोचित लीलामरण तोड़ डाले ओर पप्तीने में वहे पत्रावछी के म्रगमद 
से दादी मूचवनादौ 1 
यहां पसीना निकल्नेसे स्पष्टद्ोताहेकि चिर्योका पुरुषायितपूरादो चुकाथा किन्तु 
केलिक्षोम रूपी अन्य कारण ने ल्ियोचित लीलामरण तोड़ने आदि के द्वारा उस्ती पुरूषायित कै 
स्वरूप को ओर वदा दिया, इसलिए यहाँ समाधि का दूसरा मेद हुआ। इतस्त प्रकार अन्य 
आचाय [ रलाकरकार ] ने [ समाधिप्रकरण के उदाहरण ३९८ की वृत्तिम] जो यद कारकवि 
शस प्रकारके स्थलों मं यह [ सर्व॑स्वकार का] लक्षुणलाग न्ट हो पाताः वह इस लक्षण कै 
विषय मे उनका अज्ञान ही है । इस व्रिषय मे जपिक कुछ न कदकर इतना ही कदना पर्यात्त डे ॥' 

विमश्े -रत्नाकरकार ने समुच्चय प्रकरण की विमर्दिनी मे उद्धृत सोपानारोक्णणः 
पय मे समाधि मानते ल्खाथाकि यदो सोपानारोहणपरिश्रम से इवासरूपी का्यकी 
उत्पत्ति दो चुकी है, हरिदर्लंन उसमे विच्छिन्ता मर नदीं मनि देता, इस प्रकार दरिद्खन 
उवास्ररूपी कायं की निष्पत्ति मेँ नदी, स्थिति मेँ कारणदहै, फलतः वह कार्यं का उपोद्वल्क है । 
सवस्वकार ने समाधि के लक्षणम जो सौकय॑ इन्द दिया था रत्नाकरकार ने उसका एक ही अर 
र्गाया "उत्पत्ति" मँ सहायता करना, जिससे काय॑ सरलता ओर यख से निष्पन्न दो जवे। इस 
सथं के अनुसार “उवासः-रूपी कायं को लेकर बतलाए्‌ गए उपर्युक्त समाधिस्थल मे यह्‌ लक्षण 
लागू नहीं होता । विमशिनीकार ने सोपानारोहण० प्य नै तो सुच्चय सिद्ध कर 
दिया, ओर सकय शब्द का उपोदूवल्न अर्थं कर्‌ रत्नाकरकार कै आक्षिपका भौ निराकरण 
कर दिया। 

इ तिहास- 

दण्ड़ी-समाधि की कल्पना प्रथमतः दण्डी नेकी ३ । उरन्दोनि इसे समाददित नाम दिया 
दे । उनका निरूपण --.किचिदारममाणस्य कार्यं दैववशात्‌ पुनः । 

तत्साधनसमापत्तियां तदाहुः समाहितम्‌ 1 २।२९८ ॥ 


कहं कायं आरम्भ कर रदे व्यक्तिके पाक्ष भाग्यवद्यात्‌ मन्य साधन की पर्हुव समाहित 
कहलाती है । उदाहरण के रूप में 'मनसस्या पय दी दण्डीने दिया है। भामह ने 
मी इसी आशय में समाहिता लकार मानादहै किन्तु उसका कोद लक्षण उनमें नदीं मिलता। ` 
वामनने खोजीजा रहे वस्तु के समान वस्तुको समादित कदा है='यत्साददयं तत्संपत्तिः 
समाहितम्‌ । भोर उदाहरण के रूप में विक्रमोवं्लीय का “तन्वी मेव० प्य दिया है1 यह वही 
र्ता हे जिते पुरूरवा उवंशी समञ्चता हे यर वह उवेद्लीरूपमं परिणतमीद्दो जाती है। उद्य 
मं समाहित नामक अलंकार तोह परन्तु वह रसवदादि कै वगंकारहे। समाधि नामसे इसमे 
कोई अलंकार नही मिलता । रद्र मं समादित या समाधि दोनाँं ही नाम नहीं मिलते इस्त 
विदित होतादहै किद्स अलंकारको समायिसंज्ञा प्रथमतः मम्परट नेदी है। उनका लक्षण 
यह दै- 

मम्मट-समाधिः सुकरं कार्यं कारणान्तरयोगतः ।-अन्य कारणके सदयोगसे कार्यकी 
सकर ता-समापिः । उदाहरण के रूप में उरन्होनि 'मानमस्याः' पद्यहीदिया दहे, 

रश्नाकरक!र --रोमाकर ने केवल “उपोदबलनं समाधिः = बदावा समाधि कहलाता रहै- 
इतना दही लक्षण किया है। उन्ह्यनेकारणों मेँदो कोयियांकी भीखोज की दै-स्थित ओर 


समाध्यठङ्कारः 2१९१ 


आगन्तुक । श्नम से दोनो मे दोनो का सदयोग उन्है विवक्षित दै। भमानमस्याः० पच को 
उन्होने मी उदाहरणरूप से उदप्रत किया हे । 
अप्पथदीद्धित-ने रत्नाकरकार का संोधन अस्वीकार कर॒ सवस्वकारका ही अनुसरण 
किया है भौर समाधि का यद लक्षणदियाह-- ८ 
(समाधिः कायंसोकर्यं कारणान्तरयोगतः ।* 
उद्वा०--“उत्कण्ठिता च तरुणी जगामास्तं च भानुमान्‌ ॥' 
अन्य कारण के योग से कायंसोकयं समाधि कहलाता दै! उदा० इधर तो तरुणी उत्कण्ठित 


दुई ओर उधर सूयं अस्त हो गया ।' 
समाधि पे समुच्चय का अन्तर अप्पयदीक्षित ने कारण कौ आकरिमिकता ओर उनेकता 


दारा किया है। समाधि मेँ कारणान्तर आकस्मिकं होता दै जव कि समुच्चय में कारणान्तरं 
की भरमार रहती है । इसी भरमार का नाम समुच्चय हे । 
पण्डितराज - जगन्नाथ ने सवंस्वकार काही लक्षण अपनाया हे । उनका परिष्कृत लक्षण 


यह है- 
४५ [नख ^€ 
‹९ककारणजन्यस्य कायंस्या इस्मिककारणान्तरसमववानाहितसोकयं समाधिः ॥' 


क किंसी कारण से उत्पन्न दो सकने योग्य का्यमे किसी अन्य आकस्मिकृकारणके आ 
जाने ते जो सौकयं आता हे वदी समाधिदहे।' 

पण्डितराज ने विमदचिनीकार के द्वारा ख॒ज्ञा ग सौकर्य॑श्ब्द के दोनों भथं मी मान किण 
ह उन्दने किला है- 

तच्च सौकयें कायस्यानायातेन स्िद्धया साङ्गसिद्धया चः) वदु सोक्यं दो प्रकार सेदहोता 
हे कां की विना आयास के हृं सिद्धि से तथा साङ्गापा्ग सिद्धि से) 

विश्वेश्वर - ने मी सौकयं को स्थान देते हु” समाधिलक्षण इस प्रकार बनाया है-- 

"मवति समाधिः सुकरे हेतन्तरसमवधानतः कार्ये ७ '“चिकीषितस्य कायेस्य सिद्धयथैम 
भिमतो यो देवुस्तदत्िरिक्तदेठना कायस्य सौकर्यं समाधिः, समाधीयते कायमनेनेति व्युत्पत्तेः ।° 

अभीष्ट कायं की सिद्धि केकि माना इआनजो दहेतु उससे भिन्नरदेठ केदारा जो कायं क्रा 
सोकं वदी समाभि, समाहित किया जाता है काय इससे इस व्युत्पत्ति के जाधार परः । 

चक्रवती की निष्कृष्टाथकारिका समाधि पर इस प्रकार हे - 

'तमायिः सम्यगाधानं कारणान्तरयोगतः ।' अन्य कारण के सहयोग से ठकं से काये की 
निष्पत्ति समाधि सौकयं को समाधि कहना लाक्षणिक प्रयोग हे । वस्तुतः सम्यक्‌. आधान! ही 
समाधि का स्वरूप हे) 

पाठान्तर समाधि की अन्तिम पंक्ति मे “पद्वेनः के स्थान पर निणयसागरौय प्रति मं पदे 
पा है । डो० राधवन्‌ के संस्करण मँ केव “उपकार येति प्रकारितम्‌' ही पाठ हे । 


विमरिनी 
एतदुपसंहरन्नन्यद्वतारयति--एवमित्यादिना । ॑ 
इस प्रकरण का उपसंदार कर अन्य प्रकरण की अवतरणिका प्रस्त॒त करते हे- 


६१२ अलङ्कारसवेस्वम्‌ 
[ स्वस्व | 


एवं वाक्यन्यायाथ्रयिणोऽचंकारान्परतिपादययाधुन। ल्छोक्तन्याखाश्च यिणो ऽ - 
` लकारा उच्यन्ते । तन्न-- | 
[ ख &९ ] बप्रतिषक्षतिरस्काराशचक्तो तदीयस्य तिरस्कारः 
प्रत्यनीकम्‌ । 
यञ्च बट्वतः भरतिपश्चस्य दुवेद्धेन प्रतिपश्चण प्रतीकारः कर्तं न दाक्यत 
इति तत्संबन्धिनो दुवस्य तं वाधितु तिरस्कारः क्रियते तस्पत्यनीकम्‌ । 
अनीकस्य संन्यस्य प्रतिनिधिः प्रव्यनीकम्चुच्यते । तत्तुस्यत्वादिदमपि प्रत्य- 
नोकमुच्यते | यथानीकेऽभियोक्तव्ये तजासलामर््यात्तत्परतिनिधिभरुतमन्यदभिः 
युञ्यते, तद्वदिह प्रतिपक्षे विजेये तदीयस्य दुर्वलस्य तिरस्करणमित्यर्थः | 
प्रति पक्षगतत्वेन बटवत्वख्यापन भयोजनम्‌ । यथा - 


“यस्य किचिद्पकतेमक्चमः कायनिम्रहणग्रहीतविश्रहः। 
कान्तवकजसददाकृति ऊती राहुरिन्दुमध्ुनापि वाधत्ते ! 


अज्र राहोः खक्ााद्भगवान्वटवान्विपश्चः ¦ तदीयः पुनवेक्च साद्य. 
सुखेन दुवंठश्चन्द्रमा. । तत्तिरस्कारद्धगवतः प्रकर्बावगतिः। 


इस प्रकार वाक्य--[ मौीमांस्ाधित | न्याय पर निर्भर अकारो का प्रतिपादन किया, 
अव रोक--[ गत ]- न्याय पर आधित अलंकारो का निरूपण करते दै । 


| सू° &९ | विरोधी का तिरस्कार करने की मता के अभाव तै उससे प्ंबन्धित 
का तिरश्कार प्रस्यनीक [ कहलाता हे ] # 


[ व° | जहां वल्वान्‌ विरोधी कादुवल विराधी दारा प्रतीकार करना संभव नहीं होता 
अतः उससे प्म्बद्ध किसी दुवंल का प्रतीकार उते पीड़ा पहुंचाने के लिए किया जाता है वह सेनाका 
प्रत्यनीक कहखाता है । अनीक अर्थात्‌ सेना उसका प्रतिनिधि प्रत्यनीक कहलाता है । उसके समान 
होने से यह भी प्रत्यनीक कहा जाता है। अर्थं यह कि जिस प्रकार युद्ध करना होता है स्तना से, किन्तु 
वेसा करने की रक्ति न रहने पर उसकै प्रतिनिधिभूत अन्य चिस्रीसे युद्ध किया जाता है उसी 
प्रकार यषां जीतना तो जभीष्ट रहता हे दा को, विन्त तिरस्छर किया जाता है उसे किसी दुबल 
सम्बन्धो का । इसका प्रयोजन होता है विरोधी कौ वटवत्तरता व्यक्त करना । उदाहरण यथा -- 


शरोर के चिघ्रह [ काटकर दो खण्ड कर देने] से ठ्डाईे ठान बेठाराटर जिस [ भगवान्‌ 
विष्णु ] का बु मी अपकार करने मेँ असमर्थं होकर उसी के कान्तिमान्‌ सुखविम्ब के समान 
साति कै चन्द्र को अमी तक वाधा पहुंचाता है ।' | 

यं॑राह की अपेक्षा भगवान्‌ बल्वत्तर शतु दै, चन्द्रमा सुखविम्व वै सादृद्य कै 
व सम्बन्धित है किन्तु दुवंल है। उसे तिरस्कार से भगवान्‌ के प्रकषं का ज्ञान 
होता दहै ॥ | 


# प्रत्यनीकाटङ्ारः  , द९द 
विमशिनी 


तत्रेति निधारणे 1 प्रतिपक्षेत्यादि । एतदेव भ्या चष्टे--यत्रत्यादिना । बरूवत इति 
वखेनेति च प्रतीकाराकरणे विशेषणद्वारेण हतुद्धयोपन्याखः। तत्सम्बन्धिन इति । बल- 
वतप्रतिपडाष्मकरय । तस्सस्बन्धिर्वं च छादश्यादिसम्बन्धमूकम्‌ । दुव॑लस्येति । तस्यापि 
हि बल्वस्वे दुवंरेन प्रतिक्तेण प्रतिकारः कुं न शक्येत हति भावः। तमिति । सबलं 
प्रतिपक्ष । वापितुमित्ति। अन्यथा हि निष्प्रयोजनस्तदीयतिरस्छारः श्याव । क्रियत इति । 
दुवखेन प्रतिपक्तेण नेतव्संज्ञमान्नमिष्याक्लङ्कयाह- नीकस्येन्यादि । तुयस्वमेव इ्ंयति- 
यथेत्यादि । क्रि चान्न प्रयोजनसिस्या्ञ्कगह - प्रतिपक्षेत्यादि । बवल्वच्वाख्यापनमिति । 
अग्रती कायंर्वात्‌ । अत्रेत्यादि । वञ्न्रसादश्यसुखेन तदीय इति सम्बन्धः । तन्तिरस्कारादिति । 
न उुनत्तव्स्वीकाराऽ । बाधत इध्युक्तेस्तिरस्कारस्यंव साच्वाद्वाक्याथत्वात्‌। अत एव परे. 
रपि ्तव्छम्बन्धितिरस्कारहवारा तध्येव बाधनादि'--ध्युक्तम्‌ ! प्रकषोंऽप्रतीकायत्वस्‌ । एतेन 
चास्य प्रयोजनं दशितम्‌ । अत्र छतिरस्का्यतिरस्करणकतनिन्दाद्वारेण बर्वतः प्रति. 
पत्तस्याप्रतीकायंस्वास्स्त॒तिप्रतिपादने ता^प्य॑म्‌ । | 
तत्र = यह निर्धारणार्थक ¦ प्रतिपक्तेव्यादि। इसी की व्याख्या करते है-यतघ्र श्त्यादि 
के द्वारा । बरूवान्‌ ओर दुवंङ इन दोनँ विशेषणं द्वारा प्रतीकार न कर सकने मेँ दो हेतु उपस्थित 
कि२। तत्सम्बन्धिनः = उसके सम्बन्धी अथात्‌ शतु के सम्बन्धी के। उसे सम्बन्ध होगा 
सटदय आदि सम्बन्ध के आधार पर । हवस्य = दुबल = यदि वह्‌ सम्बन्धी भी वल्वान्‌ होतो 
दुवे विरोधी द्वारा उसका भी प्रतीकार नदींहो सकेगा । तस्र्‌ = उस = सवर शघ्रु को, 
बाधितुस्‌ = बाध = पीडा पहुचाने के लिए । नदीं तो उसे सम्बन्धित का तिरस्कार निष्प्रयोजन 
उदरेग। । क्रियते = किया जाता है = भधाव दुवे विरोधी ठे दारा। [ प्रत्यनीक] केवल 
संज्ञामात्र नदीं हें एसी शका कर लिखते हे--अनीकस्य । तुल्यता ही दिखलाते है- यथा 
इत्यादि के द्वारा । तव यहो प्रयोजन क्या है" ठेस शंका सोचकर छिखते हैः - प्रतिपन् इत्यादि 
वरूवस्वाख्यापन = एरतीकाय न होने के कारण । अच्र इत्यादि = सुख के सादृरय के दारा उससे 
सम्बन्धित इससे मी सम्बन्धित हं । तत्तिरस्काराव = उसका तिरस्कार =न कि उसका अंगीकार 
[ जेसा किं रत्नाकरकार ने माना हे ]। वाक्ते = वाधा = पीड़ा पहुँचाना =` ईस कथन से तात्पर्य 
यह निकला करि यदा तिरस्कार ही प्रयुख अथ रहइतादहै। इसीलिए अन्य [ रत्नाकरकार ] 
ने भी कदा है-- उसके सम्बन्धी के तिरस्कार के द्वारा उसी को पीडा पहुचाने से० । प्क्ष = 
अगप्रतीकायेता । इसके दारा इसका प्रयोजन वतलाया । यह अतिरस्का्यं का तिरस्कार करने तते 
तिरस्कार करने वले कौ निन्दा व्यक्तं होती है। उसके द्वारा वल्वान्‌ चुकी अप्रतीकार॑ता 
बतला जाती हे । इससे जो उसको प्रशसा होती हे तात्पयं उसी के प्रतिपादन मेँ रहता हे 
विसशं-इतिहास- 
प्रत्यनीक रुदट कौ ही देन है । उन्दने इसका लक्षण इस प्रकार किया है-- 
वक्तुमुपमेयसुत्तमसुपमानं तञ्जिगीषया य॒त्र । 
तस्य विरोधीत्युक्त्वा कर्प्येत प्रत्यनीकं तत्‌ ॥ ८।९२॥ 
"जहां उपमेय को उत्तम बतलाने के लिए उपमान को उपे जीतने के छि उक्तिपूर्वक 
विरोधी बतलाया जाए तो वह प्रत्यनीक होता है । उदाहरण-- 
यदि तव तया जिगौषोस्तद्वद नमदारि कान्तिसर्वस्वम्‌ । 
मम तत्र किमापतित तपसि सितांश्चो यदेवं माम्‌ ॥ 


2९७ अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


हे चन्द्र तम उस खन्दरी को जीतना चाहते थे ओर यदि उसीने तुम्हारा कान्तिमान्‌ खख 
जन किया तो इसमे व॒म्दारा भने क्या किया जो तुम स्ञे इस प्रकार ल्पारहेदो 
मम्मट = श्रतिपक्षमदोक्तेन प्रतिकत्तुं तिरस्क्रिया । 
| या तदीयस्य तत्स्तुत्ये प्रत्यनीकं तदुच्यत्ते ॥› 
चर०- न्यक्करृतिपरमपि विपक्षं साक्षाननिरस्तितुमशक्तेन केनापि यत्‌ तमैव प्रतिपक्षसुत्कषेयितं 
तदाधितस्य तिरस्करणम्‌ तद्‌. अनोकमप्रतिनिधिुल्यत्वात्‌ प्रत्यनीवःमभिधीयत्ते । यथा अनीके अभि. 
योञ्ये वत्पर्तिनिधीभूतमपरं मूढतया केनचिदभियुज्यते तथेह प्रतियोगिनि विजेये तदी योऽन्यो 
विजीयते इत्यथः । 


पविरोधी का प्रतिकार करने मे असमथ व्यक्ति द्वारा जो उससे सम्बन्धित व्यक्ति का उसी 
विरोधी की स्तुत्ति कराने वाला जो तिरस्कार वह प्रत्यनीक कदलाता हे। 


विरोधी अपमान करता चला जारहादो ओर उप्तका निराकरण साक्षात्‌ न किया जा 
सकता हो मतः कोई उसी विरोधी का उत्कषं प्रतिपादित करने वाला उसके आश्चित का तिरस्कार 
करे, तो वह सेना के प्रतिनिधिभूत व्यक्तिके समान दहोनेते प्रत्यनीक कदा जाता ई। जेसे 
सेना से र्डना दो पिन्तु मूढतावद्च उसके प्रतिनिधिमूत व्यक्ति से कोई रदृता हे उसी प्रकार 
याँ मी जीतना होता है विरोधी को किन्तु जीता जाता है उसका संबन्धी कों अन्य व्यक्ति ।' 
उदाहरण, यदही-- “यस्य किचिदपकृतुम्‌? पच । | 


ररनाकरकार ने अन्य अल्कार्रोके दी समान इस अलंकारमे भी अपनी भावयित्री प्रतिमा 
की उवरता दिखलादं है) उन्दने विरोधिसंबन्धी का तिरस्कार तो प्रत्यनीक मेँ गिना हीह 
विरोधिके विरोधी काअंगीकार मी मति मोतिके उदाहरणा द्वारा प्रत्यनीकके भेदके रूप 
गिनायादहे) साथदह्ी न केवर विरोधी अपितु सद्द पदाथं के संबन्धी के भी अभिरुषणीय ओर्‌ 
परिहरणीय रूप से अगीकार में प्रत्यनीक माना है । उनका विवेचन इदस प्रकार है 

[ सू० ] ्रतिपक्चादिसम्बन्धिस्वीकारः प्रत्यनीकम्‌ ॥ ४० ॥ 


[ व्र ] बलवतः प्रतिपक्षस्य तिरस्काराखक्तौ तत्सम्बन्धिनो दुबेलस्य वाध्यतया स्वीकारमुखेन 
तिरस्कर्ठ॑निन्दाद्वारा वल्वतः स्तुतिप्रतिपादनरूपमेकं प्रत्यनीकम्‌ । ०८० । तथा प्रतिपक्षसम्बन्धि- 
नश्च प्रतिपक्षस्य तद्वाधकतया स्वीकारस्तथेव द्वितीयम्‌ । आदिद्यन्देन प्रतिपक्षादन्यस्य सद्यादि. 
रूपस्य सम्बन्धिनोऽभिलषणीयत्वेन परिहरणीयत्वेन वा स्वीकारस्तृतीयम्‌ । 

विरोधी के विरोधी के अपनाए जाने का उदाहरण- 


इदं मदं चन््रमसस्समन्तादस्मत्सपत्नस्य हरिष्यतीति । 

यस्मिन्‌ पुरन्धरीवदनस्य लक्ष्मीं निजां व्यधुः प्राभृतमम्बुजानि ॥। 
हमारे शत्रु चन्द्रमा का मद यह [ खन्दरीयुख |] पूरी तरह हरण कर लेगा यह सोचकर 

जिस नगर की स॒न्दरियों के सुखो की कान्ति को कमर्लो ने अपना उपहार वना लिया । 

सडृशसभ्बन्धी राण का स्शृदणीय रूप मँ अंगीकार इस प्रत्न मे दिखलाया है- 

'पुष्प्राणाभमैव निन्दामचकमत गुणान्‌ पल्ल्वानामगरह्णात्‌ 

स्तुत्वां सक्ता पिकानाममवदगणयद्‌ राजहंसेघु दोषान्‌ । 

भक्ति व्यान सान्द्र सरगमदतिरखुके चान्दने नाङ्गरागे 

ध्वान्तं तुष्टाव तुष्ट न तु मिदहिरमहः कृष्णलोमा हि राधा ॥ 


परत्यनीकाटङ्ारः ६१५ 


(राधा छृष्ण के अनुराग में पुष्पों कौ ्ी निन्दा करती हे भोर पत्तोंकेदही युरो को चाहती है, 
कोयला की ही स्तुति मे सक्त रहती थी, राजदंसों मे दोष देखती थी, कस्तूरी के गहन तिलक सै 
ही रुचि व्यक्त करती थी, चन्दन के अंगराग में नहीं ओर अंधेरे की दही स्तुति करती थी सूयंप्रकाश्च 
की नहीं ।! परलव आदि कष्ण सरा वणं के हे, अतः छष्णानुरक्त राधा उनके सामान्यतः जस्यृदणीय 
गुणों की मी स्पृहा करती दिखाई गईं है । 

सरा सन्वन्धी गुणका परिहुरगीयत्वेन अंगीकार कै लिए उदाहरण- 

नीरागा सरगकान्छने सुखमपि स्वं दपणे नेक्षते । | 

चन्द्रमा प्र विरक्तं होकर वहं प्रेमनिभर नायिका दपंणमें भी अपना सुख नदीं देखती । 

विमश्िनीक।र ने रत्नाकरकार के इस ^स्वीकारपक्षः पर कटाक्ष तो क्या है किन्तु वे अथिक 
कुछ कहने का भी साहस न कर सङ । यहां “सुखमहो नो दप॑णेऽपीक्षतेः एेसी योजना चादर । 

अप्पयदीक्ित-- (प्रत्यनीके वल्वतः रोत्रोः पक्षे पराक्रमः 

"वलवान्‌ राघु के पक्ष वाले व्यक्ति पर पराक्रम प्रत्यनीक; निश्चित दही दीक्षित जीने लक्षण- 
निर्माणके साथदहौ प्रत्यनीक रान्द की निरुक्तिमीवडी ही सफाई के साथ इस वाक्य मेँ 
लादी डै। रलाकर की नवीनकल्पनारओं के प्रति दीक्षित जी मौन हे । 

पण्डितराज = रत्नाकर के नवीन प्रक्षोंको छोड़ कर पण्डितराजने प्रत्यनीक का निरूपण 
तो किया किन्तु वे कषुरा पर इतने आरूढ हो गएकि इस पूरे दी अलंकार को प्रतीयमान 
देतूतप्रक्षा से गतार्थं बता वैठे । उनका निरूपण इस प्रकार है- 

“प्रतिपक्षसम्बन्धिनस्तिरस्कृतिः प्रत्यनीकम्‌ । 
-- रातु सम्बन्धो का तिरस्कार प्रत्यनीक 

अपने उदाहरणा मे गम्य दैतूतपरक्षा कौ सिद्धि कर पण्डितराज ने मम्मट जओौर सवंस्वकार दारा 
उद्धृत "यस्य रचित? प्य मँ मी उते इस प्रकार वतलाया-- 

"य॒स्य किंचित्‌” [ पणे पद ] इत्यल्कार सवेस्वङृतोद। हते प्राचीनपेऽपि समगवदैरानुबन्धादिव 
भगवद्वक्त्रषट्रदामन्दं राहुरबाधत ति प्रतीतेरुप्प्रक्षेव गम्यमाना । 

(अलकारसवेस्वकार दारा उद्धूत धयस्य किचित्‌० इस प्राचीन [ मम्भरोदाहृत ] प्रमे 
मी गम्य हेतूप्प्रक्षा है क्योकि यहं भी यह प्रतीति होती है क़ि ^राह चन्द्रमा को मानो इसलिण 
दुःख देता किं वह भगवान्‌ के खुखके समानहे।" प्रत्यनीके प्रतिपक्ष में दुर्बलता तथा वर्ण्य 
वस्तु मेँ प्रबलता भी दाब्दतः प्रतिपादित रदतीदहै जो देतूत्परेक्षा मे नदीं रहती, अतः इतने अद्य 
मँ इन दोषो का अन्तर हो सकता था किन्तु पण्डितराजने इसे प्रत्यनीक को उत्प्रेक्षा का एकं 
नवीन भेद मानना अधिक उचित माना, स्वतन्त्र अलंकार नहीं । | 

विश्वेश्वर--ने पण्डितराज के इस क्रान्तिपूणे विचार को प्रतिगामी तक्को दारा कार्ते हए 
प्रत्यनीक बोर हेतूत्प्रेक्षा मे एक मेदक भौर खल्लाया। उन्दने कहा करि प्रत्यनीकमेदो कारण 
प्रतिपादित रते है जव कि हेतूत्प्रेक्षा मे केवल एक । दोनों कारणों मे प्रथम कारण द्वितीय कारण 
के प्रति कारण रना है मौर उन दोनों का कार्यकारणभाव निर्णीत रहता है । धवस्य किंचित्‌० 
प्य में चन्द्रवाधा के प्रति कारण दहे विष्णु के साथ वैर भौर उसमे कारण है कायनिगह । विदवेशवर 
की पंक्ति है-- 

“अत्र [ प्रत्यनीके ] किचि्निष्ठकाय॑ताप्रतियोगिक [ चन्द्रवाधारूपकायनिष्ठकायंतानिरूप्ं ] 
यत्‌ [ चन्द्रसद्शविष्युवैररूपं ] = कारणमुसेकषयते तन्निष्ठकाय॑तानिरूपितकारणस्य [ काय- 


| © 
दिद अदखृट्कारसवंस्वम्‌ 
न्निय्हरूपस्य ] अप्यभिधानेन [ कायनिग्रहेतिपदामिधानेन ] पूवेकारणनिणेयः) उ््रे्षायां च 
तद मावान्न तन्निर्णय इति वेषम्यं स्फुटमेव । वस्ततः विदवेश्वर के इस तकम कोई विनिगमकता 
नहीं है : श्तना ददोने पर भौ प्रत्यनीक को रत्प्रक्षा का एक विशिष्ट मेद मानना अयुक्त 


नदीं हरता । 
चक्रवती की निष्कृष्टाथेकारिका प्रत्यनीक पर यह है - 


"तदीयस्य तिरस्कारः प्रत्यनीकमराक्तितः। 
पाठान्तर प्रव्यनीकसुत्र मं प्रथम तिरस्कार शब्द के स्थान पर डा० द्विवेदी ने मूर तथा 
उनके संजीविनीसंस्करण मे श्रतीकार-शब्द दिया है। कु० जानकी के संजीविनी संस्करण मे 
तिरस्कारप्राठ ही दै। स्वरं दिवेदीरकस्करण यँ संजीविनीकार ने इ्सलर्प की व्याख्या में 
तिरस्कार दशाब्द कोदही दो वार पडा है भौर वही स्वामाविकं है । पाठान्तर का मूल 


मम्मट का प्रतिकक्तुं तिरस्कियाः पाठ है! परवती आचार्यक सूत्रं मँ तिरस्कार शब्द्‌ हौ 
मिल्ताहे। | 


[ सवंस्व | 


| घ ७० 1 उपमानस्याक्षेष उपमेयताकस्पनं वा प्रतीपम्‌ । 
उपमेयस्येवोपमानभासोद्वदनसखाम्यादुपमानस्य यत्न केमर्थ॑क्येनाक्षेप 
आोचनं क्रियते, तदेकं प्रतीपम्‌ । उपमानप्रतिक्रुटत्वादु पमेयस्य प्रतीपमिति 
ज्यपदेशः । यद॒पमरानतया प्रसिद्धस्यो पमानान्तरप्रतितिष्ठापयिषयानाद्रणा- 
थंमुपप्रेयत्वं कर्प्यते, तत्‌ पू्ोक्तगत्या द्वितीयं प्रतीपम्‌ । क्रमेण यथा-- 
यज च प्रमदानां चक्चुरेव सहज सुण्डमालामण्डनं भारस्तु कूुवलयदल्- 
माल्यानि इत्यादि । यथावा- 
"लावण्यौकसि सप्रतापगरिमण्यय्रेसरे त्यागिनां 
देव स्वय्यवनीभरश्चमरसुजे नष्पादिते देधसा । 
इन्दुः कि घटितः किमेष विहितः पूषा क्िपुत्पादितं 
चिन्तारलमदो युधेव किमी खण कुठक््माभठः \. 
अन्न यथासंख्यम्व्यस्तीति धराक्‌ भतिपादितम्‌ । 
"ए पहि दाव खंदरि कण्णं द्‌!ऊण खणस्चु वअणिज्ञं । 
तुञ्छ मुहेण किसोअरि चंदो उभममिजञेद जणेण ।॥' 
अ्नोपमानत्वेन प्रसिद्धस्य चन्द्रमसो निकषौथे पुपमेयस्वं कल्पितम्‌ । 
वदनस्य चोपयानत्वविवश्चाज् पयोनजिका । 


कचित्वुनर्निष्पन्नमेवौ पम्यमनादर्कारणम्‌ । यथा-- 


'गवेमसंबाद्यमिमं छोचनयुगलेन {क वदसि भद्रे । 
खन्तीद्दरानि दिदि दिशि सरःसु ननु नीलनछिनानि ¦." 


अ्रोत्कषंभाज उपमानस्य प्रादुभोव एव न्यक्कारकारणम्‌ । अनेन 


प्रतीपाठङ्कारः ६१७ 


न्यायेनोच्छृष्टगुणत्वाद्‌ यदुपमानभवमपि न सहते तस्योपमानं त्व- 
कल्पितं प्रतीपमेव । यथा- 


"अहमेव गुखः खुदारुणानामिति दाखादक तात मास्म ष्यः) 
नु सन्ति भवाददानि भूयो युदनेऽस्मिन्वचनानि दुजेनानाम्‌ !\' 


अत्र हालाहटत्वं परङ््टदोषत्वादसंभाग्यमानोपमानभावमप्युपमानस्वेन 
निबद्धम्‌ । 

[ सू० ७० ] उपमान का पमान अथवा उपमेयता प्रतीप [ कहलातती हे ] ॥ 

[ बरृ० | उपमेयके ही उपमान का संपूण भार टोनेमे समथे होने से उपमान का इसत्तेक्या 
रामः इस प्रकार जो आक्षेप अर्थात्‌ आलोचन [ अपमान ] किया जाता है वह एक प्रकारका 
प्रतीप होता है। उपमान के प्रतिकूल होने से उपमेय को प्रतीपः दाब्द से पुकारा गयाहे। 
इसके मतिरिक्त यदि अन्य किसी उपमाने को उपस्थित करने की इच्छा से उपमान रूपसे 
प्रसिद्ध वस्तु को उसका अनादर करने के ल्ट उपसेयस्प से प्रस्त॒त शिया जाय तो वहमी 
रवोक्त रीति से [ विरोधके कारण ] एक दूसरे प्रकार का प्रतीप होताहै। 


क्रम से उदाहरण- 


“जिस [ श्रीकण्ठजनपद ] मेँ प्रमदाओंके नेत्रही सुण्डमाला [सिर प्र से कभैमूर तक 
रख्टके | आभूषण थे, नील कमलो की मालार्पं तो केवल मार-थीं। [ हषंचरित ए० ९८, उ० ३ | 


भ 


यर जेसे--रावण्यौकस्ि [ यथास्ंख्यालंकार मे जाचुका ] पय । य्ह यथासंख्य मीहे 
ठेसा पहले [ यथासंख्य प्रकरण मेँ ] बतलाया जा चुका हे । 
"प एदि तावत्‌ सुन्दरि ! क्ण दत्वा श्रणुष्व वचनीयम्‌ । 
तव॒ मुखेन कृरोदरि ! चन्द्र उपमीयते जनेन । 


'अरी सुन्दरि १ इधर आ पहले, भोर कान देकर बदन।मी सुन । अरी कृदोदरि ! लोग 
तेरे सख से चन्द्रमा को उपमा दे रहेदहै। 

यहो उपमानरूप से प्र्िद्ध चन्द्रमा को उस्र अपक्षं के छिए उपमेय रूप में कदिपित किया 
गया है। इसमें कारणदहै सुख की उपमेयसरूप से विवक्षा। कहीं कहीं तो उपमा निष्पन्न हो 
जाती है ओर तव वह्‌ अनादर का कारण बनती हे, यथा-- 

मद्रे) आंखों की जोड़ी में इतना ठढोते नदीं बन रहा गवै क्यों भरे हए है) इस 
प्रकार क नीलकमल स्थान स्थान पर वहत मिरते हे यहो उत्कर॑युक्त वत्तु के उपमान की 
कटपना ही [ उसके प्रति ] अपमान का कारण हे। 

इसी प्रकार गुणोत्कषे के कारण जो वस्तु उपमान वनना भी नहीं सहती उसका उपमान रूप 
तं प्रतिपादित करना मी प्रतीप ही है। यथा- 


हे हालाहल ! अत्यन्त दारुण पदाथामं मेही सवसे बड़ा यह सोचकर तुम दपं धारण 
न करना, तम्हारे जंते दुजेना के वचन इस संसार में बहुत मिलते हे । 

यहां हालादल मेँ दोष का इतना उत्कषं है कि उसमे उपमानता संमव नदीं है, इतने पर भी 
उसे उपमान रूप से वत्ता दिया गया ।' 


६१८ अलट्कारसवंस्वम्‌ 
विमरिनी 


उपमानस्येत्यादि । केमथव्येनेत्यादि । तद्वयापारस्यो पमेतेनैव क्रतत्वादृन्ु पयोगेनेस्यथंः । 
उपमानान्तरेति । उपमानानां मध्ये । अनादरणा्थमिति। उपमानसेन चैतघोभ्यमिति 
यादत्‌ । पूर्वोक्तगव्येति । उपमेयस्यो पमानग्रतिक्करुवतिस्वाव्‌ । अनेनोभयन्रापि नैतस्सं. 
्ामात्रसिष्युक्तेस्‌ । एकं द्वितीयनमित्यभिद्धता ग्रन्थकृता प्रती वाल्यमलंकारद्यस्‌ , न 
एनः सामान्यकक्णाभाव्रादेकमेव द्िप्रकारमिच्युक्तम्‌ । उपमाप्रकारस्वं चानयो वाच्यम्‌, 
उपमानस्यान्ेपादुपमेयकद्पनाच्च । न हि तत्र तदृश्तीति ततोऽनयोः सुप्रव्यय एव 
भद्‌: । अनयोः पुनः साधम्यजीविततव्वाव्ाधारणघर्माणामस्ति त्रेविध्यसर्‌ । एवमोपस्य- 
मन्तरेण नंतदल्ङ्कारहयं भवतीस्यवगन्तन्यस््‌ । तेन- 
"गिदध्चिअ वंदिनिञ किं किरऊ देवआहि अण्णाहि । 
जिह पलाएण पि खघ दूरेवि णिचसरंतो ॥' 
इत्यत्रापि प्रत्तिपारकारस्वं न वाच्यस्‌ । अचरि देवतान्तराणं त्था लामर्ध्यादज्ना- 
तद्ारेपेण स्वप्नकाछे प्रियोपरन्धिदायिन्या निद्राया विरहिणीककंकं वास्तवमेव वन्य- 
स्वर । वस्तु च नाल्कार इति निविवादम्‌ । कुवख्यदृख्द्‌।गनामाक्तेपश्चद्धपामस्यन्तमेव 
तससाघम्येप्रतिपादना्थैः। अन्यधा हि तदारेपो निरर्थकः; स्यात्‌ ¦ एवं-- 
कि कणपूरथंदि साघुवादा सृच्छाफटेः कि यदि वाग्विङासाः । 
कं चुणयोगे्यद्‌ रूपश्चोभा खाचण्यमास्ते यदि चम्दनैः किम्‌ ॥' 
द्यत्रापि ज्ञेयम्‌ । अन्रहि यथा कर्णपूरादिभिः श्रोच्रश्लोमा क्रियते तथैव साघ्वादा- 
दिभिरिति साद्ुवाद्‌ाद्भिरेव तच्कायकरणाचकणं द्‌ रदी नामाक्तेपः । तस्य च साधुवा- 
दादुोनामस्वन्तमेव तस्ाधर्म्॑प्रतिपादनं फलम्‌ । एवं - 
'खेलन्तीनां सुर पतिषुरीवारवाराङ्गनानां 
„ यन्मज्ीरध्वनितसुमगो रोति कोकाहरोऽयम्‌ । 
तेनेवास्ते मदननृपतेरमाङ्गकिक्ये प्रवोषे 
मोघायन्ते पथि पथि गिरः कच्छुपारावतानाम्‌ ॥' 


दष्यन्नापि ्तेयस्‌ । यर्पुनरशान्येरुपमानो पसेयर्व स्याविवच्धितस्वश्ुक्तम्‌ , तत्तेषां तरस्व. 
रूप।न भिज्त्वम््‌ । 
रावण्यादिध्मश्चात्र चृपचन्द्रयोरलुगामितया निर्दिष्टः । यथा वा- 
'तस्याश्वन्मुखमरिति सोस्य सुभगं कि पावंणेनेन्दुना 
सौन्दर्यश्य पदं दशौ यदि चते किं नाम नीरोप्परैः। 
किं वा कोमलकान्तिभिः किल्लख्येः सस्येव तघ्राधरे 
ही धातु; पुनद्क्छवस्तुरचनारभ्सेष्वपूर्वो अहः ॥ 
इत्यत्र सोभ्यसु भगव्वादि खङ्कननिर्दिष्टम्‌ । जसङ्कन्निदं शस्तु यथा- 
“यद्यस्ति तस्याः स्मरच्चाङ्गभङ्िविरुसवेज्ञद्‌ भनु खं नताङ्गयाः। 
तदिन्दुना किं विहितं विधान्ना सृष्टेन वगन्ग्रगश्लावकेन ॥' 
अन्न वेर्छ द्व दगस्छयोः शुद्ध सामान्यरूपष्वं भ्र श्धगयो स्तु विश्बभ्रतिबिभ्बभावः। 


प्रतीपाटङ्कारः ६१९६ 


निदरषाभभिति । अन्यथा चन्द्रस्यो पसेयस्व कल्पनं निरर्थकं स्यात्‌ । प्रयोजिकेति । उत्कष- 
€ 
म्रतिपादनाव्‌ 1 सच्रापि साधारणघमंष्यानुगामितया यथा-- 


'ुखेन सखि पोयुषपेख्वेन निलाघ्ुते) 
उपमानतया चन्द्रः प्नियेण्गल्लिष्यते ध्रवम्‌ ५" 


अन्न पीयूषपेकवस्वमजुगामितयोपान्तस्‌ । जखङ्कश्िदश्स्तु यथा- 


'पौलस्त्य विस्ठृतदिवेल्ञदपूच॑बश्चकूचच्छेटाप्रकरितं सजत च स्दाभ्र्‌ । 
नीतोऽज्ञनाद्विख्पमरेयघुरां विधात्रा प्रोत्तङ्गशचङ्गविवररण दाववदह्धिः ॥' 


अन्न वे्लद्धिवलच्वयोः शद्ध सामान्यरूपस्वस्‌ › द्षव दावयोस्तु विस्वप्रत्तिविर्बभावः । 
अस्य हि विचित्यन्तरं दुश्चेयति कचिदित्यादिना । निष्पन्नमिति ॥ सिद्धत्वे नो च्छेः । 
उत्कष॑माज इति । अथान्नेत्रयुगर्श्य । प्रादु्माव इति । उपसानस्याभूतस्योरपत्तिः । अतष्टव 
स्पर्घाबन्धमाजः परस्योप्पादान्न्यककारः ! अनेन न्यायेनेति । अन्न यथो एमानस्व घादु मावो 
न्थक्षकारकारणं तघ्रेवेव्यर्थः ! अतश्च दूवंस्या एव विच्छित्तेरिदं विभजनं न नवि च्ड्रिय- 
न्तरनमिति आवः । प्रतीपमिति । उपमानमावं यो न खहते भाव्यं स्यूनयुणेन चोपमेयेनः 
तथापीदशचशरक्कषटयुगत्वं विवक्वितं यदपेद्वया न्यूनुणसप्युपमेयं न संभवतीव्यन्न पिण्डाथः। 


"वै ङण्ठाय भ्रियसभिनवां शीतभालु सवाय 
प्राद्ादुच्चःश्रवसखमपि चा वचधिणे तस्क गण्यम्‌ । 

तृष्णारताय स्वमपि ुनये यददाति स्मदेषं 
कोऽन्यस्तस्माद्धवति स्ुचने वारिधेवो धिखंस्वः ॥' 


दस्यत्र घु नरन्यमतेऽपि न प्रतीपम्‌ । रचभ्यादेरधिकगुणस्य न्यून एुणेनावरस्वापाद्‌- 
नाभावात्‌। अन्न हि रुचभ्यादिदानाद्‌ देहद्‌ानस्याधिकगुणस्वं दिवद्धितमू । जत एवा. 
बुधः स्ेदहदानश्चसपरेचय को नाम रक्छग्ादिदानोस्कष दस्यत् वाक्ष्याथैः । एतच वर्ति 
नाटंकार इव्यरुमति विस्तरेण । 


उपमानस्य इध्यादि । केमथक्येन- किस लाम के लिए = उसका कायं उपमेयके दारा 
कूर दिए जाने से निरुपयोग होने के कारण । उपमानान्तर-अनेक उपमानं के बीच अनादर 
णार्थ॑स्‌ = जनादर के छि = अथाव यह उपमान के रूप मेँ फबता नदीं है इस रूप से । पूर्वोक्त. 
गरया = पूर्वक्तं रौति = उपमेय के उपमान से प्रतिकूल होने के कारण इससे यह वतकाया कि 
दोनो भेदो मे य केवल नाम मात्र नींद, [यह साथकमी है ]। “पक ओर "दृषा" ठेसा 
ककर अन्धकार ने बतलाया कि प्रतीप दस एक दही नामकेये दो अल्कार है, दोनों का कोई 
सामान्य लक्षण नदीं है अतः ये दोनों एक ही समुच्चय ॐ दो प्रकार नदीं हे । इन्हें [दण्डी के 
अनुसार ] उपमा का प्रकार नदीं मानना चाहिए क्योकि यहां उपमान कण अपमान रहता हं 
जौर उसे उपमेय मी वना दिया जाता है । उपमा मे रेसा नहीं होता, अतः इनका अन्तर सुखपूवंक 
जाना जा सकता है। ये दोनों प्रतीप साद्य पर निभैर रहते ह अतः इनमें साधारणधमे के 
तीनों मेद मिलते दै । इसी प्रकार यदमी जान लेना चाहिए किं यह अल्कार विना साषदय 
के नदीं हो सकता । जस कारण [ रत्नाक्रकार दवारा प्रतीप के उदाहरण के रूप मे प्रदत्त |-- 


“निद्रैव वन्ते किं क्रियते देवताभिरन्याभिः । 
यस्याः प्रसादेन त्रियो लभ्यते दूरेऽपि निवस्षन्‌ ॥' 


द२० अल्कारखवेस्वम्‌ 


¶{हमतो ]निद्राकी दी वन्दना करते दै, अन्य देवता्ओंपसे करना दही क्याहै, जिकस्त ` 
[ निद्रा | के प्रसादसे दूर गयासौ प्रियप्राप्तदो जाताहै।" इस स्थलमें भी प्रतीपालकरता 
नहीं माननी चाहिए ।2 

जन्य देवतां से वेसा सामथ्यं नदीं है जव किनिद्रामे सवप्नम प्रिय समागम कराने की 
क्षमता हे । जतः निद्राम विरददिणी दाराकी जाने वाली बन्दना की पात्रता वास्तविक पात्रता दहै 
ओर इसमें कों विवाद नहीं फि वास्तविक वरतु अल्कार नदीं होती । [ यत्र प्रमदानाम्‌ 
स्थल मं ] नील्कमर्लोका जो मक्षे है उसका लक्ष्य नेत्रां कै साथ उनका अत्यन्त साम्य 
मरतिपरादित करना द । नदी तो उन [ नीलकमल | का साक्षेप निरथक ठहरा शस प्रकार 
( रत्काकरकार द्वारा प्रतीप के उदाहरण के ल्प मेँ उद्धृत ]- 


ऋरनफएल से क्या, यदि साधुवाद है; सुक्ताफर्लो से कया, यदि वागििकास है, चूण योगों 
( -०५०९७ ] से क्य। यदि सूपञ्चोमा है मौर चन्दन से क्या यदि रवण्य हे । इस पचयाधैमें 
भी जानना चाहिए । यटा मी कणं आदिकी शोमा जिस प्रकार करनपफूर आदि के दारा 
दोती है उसी प्रकार साधुवाद आदिक दारामौ । इसीलिए साधुवाद आदि कै द्वारा नेत्र्योमा 
करा कराय हौ जने पर करनप़ररु आदि का आक्षेप किया गया है) हस [ आक्षेप ] का प्रयोजन 
साधुवाद आदि का अत्यन्त साधम्यं प्रत्निपादित करनादहीहै। इसी प्रकार [ रत्नाकर द्वारा 
प्रतीप के उदाहरण के रूप मेँ उपस्थित ]-- १ 

खेल रदीं अप्सरार्जो का, नूपुर की ध्वनि से सुन्दर जो यद कोलादरू मचा हभ है, उसीसे 
मदन चृपतिका मागककि प्रनोध = [ जागरण ] द्यो जाता है अतः मार्गं मामे जो कच्छ के 
पारावत [ कपोतो | की वाणी है वद्‌ निरर्थक पड़ जाती है + 

श्स पथमे मी [ क्षेप को स'म्यमूलकर ही ] जानना चादहिण । 

रस कारण | रत्नाकरकार ने पूर्वोक्त “किं कणंपूरैः० पथ का स्पष्टीकरण करते हृए ] जो यह्‌ 
कदा हे [ कि जदो उपमान प्रसिद्ध रहते हे वदां प्रतीप दारा उनका तिरस्कार होता हे विन्त 
किं कणे"? जादि पथाँ से जहाँ साघुवाद आदि ऽपमान प्रसिद्ध नदीं है वहा तिरस्कार के बाद 
उनका साषम्येमूक उपमानत्व स्तिद्ध होता है अतः आक्षेप या प्रतीप कं छि) "यहां उपमानोप- 
मेयभात कौ कोदं विवक्षा नदीं है" वद उन [ उपमानोपमेय ] का स्वरूप न जानने कै ही कारण । 

यहां राजा भर चन्द्र के बीच लावण्य भादि धमं अनुगामी धर्मक रूपमे चब्दतः कथित है । 


दूसरा उदाहरण यथा-- 

उसका सोम्य घुभग सुख है तो पूर्णचन्द्र से क्या, यदि सौन्द्ं की घरवे आंस है तो नील 
कमरे से क्या; उस अधर कै रदते हुए कोमल कान्ति वाके किसलय का आवदयक्ता ही क्या 
हे । खेद है कि विधात्ता को दोहरी गौर व्यथै वस्तु बनाने का विचित्र आग्रह ह 

इत्यादि मे सोम्यछयगत्व आदि धम एक वार निर्दिष्ट [ कहे गए] हैः। 


जनेक वार निदेशका उदाह्रण- 

यदि उस खन्दरीका काम के धनुषकी बनावट से विलास से फरकती मोहो बाला 
चेहरा तो विधाता द्वारा बनाए स्फुरित षृगदावक से युक्त चन्द्रमा के क्या १ 

यहां वे्लत्‌ = फरकता ओर द्वभा वत्गत्‌ = स्फुरित होता हभा इन श्यो से प्रतिपादित धमं 
अद सामान्यरूप धमं है ओर भौं तथा मृग निम्बप्रतिषिम्बभोवापन्न धम ३ । 


परतीपाटङ्कारः ६२१ 


निष्कर्षाथं-जपकपं के लिए, नीं तो चन्द्र का उपमेय रूप मे चित्रण निरथैक हो जाएगा ¦ 
प्रयोजिका = कारण = उत्क का प्रतिपादन करने से। यहाँ भी स्ताधारण की अनुगामिता का 
उदादरण यह है-- 

सखि ! तेरा प्रिय रत्नि के समय निश्चित दही तेरे अखृतखन्दर सुखके साथ उपमानभावः 
लिए रहने के कारण चन्द्रमा को चाहा करता है)” 

यक्शं अख्रतसुन्दरता अनुगामी धमेहै। 

अनेक वार निदश्च के क्णएि- 

दे पौलस्त्य [ रावण ] ! तुम्हें काफौ विस्तृत ओर हिरती पिंग वणे की अपू डादी से 
युक्त बना कर विधाता ने उस अजनाद्विं को उपमेय वना दिया जिसके पर्याप्त उच्च शुग पर दौड़ती 
भयंकर दवार ल्गी हो । 

यहाँ वेख्लत्‌ तथा विवलत्‌ पद से प्रतिपादित हिलना ओर दौड़ना शुध सामान्य ध्म है 
तथा डादी ओर दैँवार.में विम्बप्रतिनिम्बभाव है । 


दसी [ प्रतीप ] का एक विशिष्ट प्रकार बतलने हेतु लिखते है-फछचिव्‌ । निष्पन्न = सिद्ध 
रूप मेँ कथन होने से । ` उरकषंभाजः-- उत्करष॑युक्त = अर्थात्‌ नेर युगल । प्रादुर्भाव = पदले से 
अविद्यमान उपमान की उत्पत्ति । इसीलि९ अन्य किसी स्पायुक्त वस्तु का अस्तित्व बतलाने से 
यहाँ अपमान व्यक्त हुमा । अनेन न्यायेन = इसौ प्रकार = जिस प्रकार यक्ष उपमानत्व की 


स्थापनासे अपमान हृभा उसी प्रकार । इसीलिए यह पुवोक्त प्रकारका ही विभागदहै नकि 


अन्य कों स्वतन्त्र प्रकार । प्रतीप=जो कभी भी किसके प्रति उपमान बनना वरदास्त नदीं 
करता उसका उपमानत्व सिद्ध करने से इसमे [ प्रतीपता = अथाव ] प्रतिकर्ता जो चली आती 
है । आद्य वह्‌ है कि यथपि उचित यदै किजो अधिक गुणवाला दो वह उपमान वनाया 
जा९्ओर जो न्यून गुण वाला हो वह उपमेय, तव भी यदाँयु्णो मेँ इस प्रकार का प्रक्ष ही 
दिखलाया जाता है जिसमे न्यून गुण गरी वस्तु भी उपमेय बन सके । [ रत्नाकरकारने जो प्रतीप 
की न्यूनताप्रतिपादक विधा के टि निम्नटिखित - |] 


विष्णु को भभिनव लक्ष्मी, शिव को चन्द्रमा ओर ईन्द्र को जो उच्चैःथवा [कान चे 


रखने वाला अत एव तन्नाम का | मश्व दिया इसकोतो गणना ही कशं? पिपासता से आतुर 
[ अगस्त ] ऋषि को जिसने अपना शरीर ही [ सख॒द्र ने] दे डाला उस समुद्र से भिन्न बोधिसत्व 
संसार मे कौन हो सकता ।' 

पच [ उद्धत किया है हस ] म अन्य [ रत्नाकरक्ार ] के मततवे अनुसार मी प्रतीप नही 
सिदध ह्योत, क्योकि यषां जो अधिक गुणवारे लक्ष्मी आदि पदा्ंदहै इनमे कम रुण वाङ 
किसी पदार्थं से न्यूनता का प्रतिपादन नहीं किया गयादहे। यहाँतो रक्ष्मी आदिक दानक्षी 
भिक्षा देह के दान बँ अथिक युणत्व = उक्क्र्टत्व मात्र प्रतिपाच है । इसीकिए समुद्‌ के स्वदेहदान 
करी उस्रक्षा करके यहं यह वाक्याथ प्रतिपादित करना चाहाहै कि लक्ष्मी आदि के दान 
समुद्र का उ्त्कषे ही क्या ४ 

यष्ट तो केवर वस्तुस्थिति मात्र है, अकार नदीं । भस्तु जने मौ दिय ज[ए। अधिकृ 
विस्तार सेक्या१॥ 


विभमश्षं- इतिदास- 


प्रतीपालंकार का पूर्ेरूप प्रथमतः दण्डी की विपयांसोपमा मे मिलता है। काव्याद मैः 


उन्होने इसका निरूपण इस प्रकार किया है- 


2२२२ अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


८त्वदाननमिवोज्निद्रमरविन्दमभूदिति ! सा प्रसिद्धिविपर्यासाद्‌ विपयांसोपमा मता ॥› २।१७ ॥ 

"विला अरविन्द तुम्हारे मुख के समान है-: यह जो उपमा है इसमे प्रसिद्धि का विपयांस 
हे अतः यदह विपर्यासोपमा हई । प्रसिद्धि तो उपमान लकूपमें चन्द्रकी है, सुख को नदीं) य्ह 
इते उलट द्विया गया है । यदी उक्टाव विपर्यास है । भामह, वामन ओर उद्धयमें इसे दम नहीं 
पाते \ रुद्रटने इसे अपनाया है जोर स्वतन्त्र अल्कारके रूपमे इसे प्रस्तुत किया दै- 


रुद्रट--्यत्रानुकम्प्यते सममुपमाने निन्यते वापि 1 
उपमेयमति स्तोतुं दुरवस्थमिति प्रतीपं स्यात्‌ ॥ 
जिप्त [ अलंकार ] में उददेदयय होता है उपमेय की अधिक प्रदा, ओर तदर्थया तो उप्त 
पर जतलाईं जाती हैक्रपा,याकी जाती है उसकी निन्दा, ओर इन दोनो का उपाय रइतादहै 
यह बतलाना किं उपमेय तुलना नें किंसो ॐ समान ई, वह अलंकार प्रतीप कराएगा, इ्सङ्दि कि 
इस प्रकार की उक्तिमे दुरवस्थता अर्थात्‌ वास्तविक स्थिति के विपरीत स्थिति रहती दे । 


| १ | प्रथम का उदादरग- 


"वदनमिदं समभिन्दोः खन्दरसपि ते कथं चिरं न भवेत्‌ । 
मलिनयति यत्‌ कपोलो लोचनस्तलिरं हि कञ्जल्वत््‌ ॥ 


प्रिये ! तेरा मुख केवल सुन्दर [ कान्तिमान्‌ } हैतोक्या? यहसदाके लिए चन्द्रमा के 
समान क्यो नहीं होगा [ कलंक का प्रातिनिध्य करने के किए | इसके कपोलो को कञ्ज मिधित 
ओंसू मल्निभी जो वना रदे दै जो। यरद सुख की अभिकं प्रशंसा उद्देर्य दे उसी वै लिए 
चन्द्र को उपमान रूप से प्रस्तुत किया गया है । वास्तविकता के विपरीत होनेसे इते प्रतीप नाम 
दिया गया । । 

[२] उपमान योजना द्वारानिन्दा के माध्यम से उपमेय कों स्तुति का उदाहरण लद्रट में 
“वुर्वमसवाद्य० पयद्टी है) इसर्मे उपमानयोजना दारा निन्दा करने का अथ॑ उपमेय की वास्त 
विक स्थिति की उपमान की अपेक्षा अधिक उत्कृष्ट, अनुपमः, अप्रत्तिन, भनुपमेय या अद्ितौय 
बतलाना हे। मम्मर भौर सर्व॑स्वकारने रुद्रटको श्सस्थापना कोइसीसरूप में स्वीकार कर 
ल्ियाहे। 

प्रथम प्रतीप रुद्रटतक ही सीमितरहा। नतो मम्मट ओर सवंस्वकारने दी उते स्वीकार 
विया रन रत्नाकरकार आदि ने। परवत्तीं अन्य आचार्यो ने मी इते स्वीकार नदीं 
कियादहै। 

सञ्मर--भक्षेप उपमानस्य प्रतीपसुपमेयता । 
तस्यैव यद्धि वा करप्या त्तिरस्कारनिवन्धनम्‌ ॥' 

उपमान पर निरथंकता का आक्षेप अथवा उसी उपम(न को अपमानित करने के किए उपमैय 
बतलाना प्रतीप कदलाता है । 

उदाहरण के रूप मेँ मम्मट ने लावण्यौकसि, ए एदि दाव, गवैमक्तवा्य० तथा “अदहमैव गुरः०' 
प्य प्रस्तुत किए जिन्दै सर्वस्वकार नेभी उद्धृत कर दियाहै। इतना दी नदीं उन्दने श्न 
उदाहर मेँ जो चिह्ञेषता४ः मानी थी'वे मी सवैस्वकारने ज्याकीरत्यो मानलीदहेँ। वस्तुतः 
सर्वस्व के प्रनीपका प्रायः अक्षर अक्षर काव्यप्रकाश्च के प्रतीप से भिल्ताहे। इस प्रकार प्रतीप 
को प्रस्तुत रूप मँ छाने का परा श्रेय मम्मट को दै, यपि उसके पृथक्‌ जलकारत्व प्र उनके पले 


परतीपाख्ङ्ारः ६२३ 


रुद्रटकीदृष्टिजा चुकी थी ओर "गवंमसंवाह्य०' मे रुद्रटः की मान्यताकोमम्मरने भी अंगीकार 
कर लिया था । सवैस्वकार प्रतीपके किर सम्मरके ऋणी दहे । 


रत्नाकर-दोरोगावाद की नमंदाजी के समान निमरिनीकाजो पाट यहोँ चौडा हो गवा 
है उसका कारण उसमे तवा के समान रत्नाकर कामिल्नादहे। रत्काकरकार, जैसा कि कदा 
जा चुका है अप्रसिद्ध उपमान वाङ स्थम उपमानोपमेयभाव की निष्पत्ति प्रतीप कौ निष्पत्ति 
के वाद मानते हं अतः उन्होने प्रतीप लक्षण मे उपमानको स्थान नहीं दिया है। उसके 
स्थान पर उन्होने अधिकगुण चाब्दरखादहे। इसी प्रकार उपमान के साक्षेप ओर उपमेयता को 


भी उन्होने एक (अनादर "शब्द मं संगृहीत कर दिया हे । उनका लक्षण यह है- 
'अधिकथुणस्यानादरः प्रतीपम्‌” ॥ २. ॥ 


'अधिक गुण वाले पदाथ ङा अनादर प्रतीप कदराताहे।" विमरिनीकार ने रत्नाकरकार 
के प्रथम संशोधन [ उपमान के स्थान पर अपिकगुणद्ब्द के प्रयोग] परतो आपत्तिकी है 
किन्तु द्वितीय संद्योधन पर वे मोन दे । इतना अवदयदहै कि उन्होने ्रन्थकार की ओर से यह 
सफाईदीदहै कफिवे दोनों प्रतीक्षांको दो स्वतन्त्र अलंकार मानते ह, इसीलिए उन्दने दोर्नोका 
समन्वय नदीं किया । सवस्वकार ने जहाँ एक ही नाम से मनेक अलकां का निरूपण किया है 
वाँ उन्दने उन्हें पथक्‌-प्थक्‌ सूत्रों मे रखा हे । व्याघात्त, समुच्चय आदि इसके स्पष्ट उदाहरण हें । 
पर्याय को एक्‌ सूत्र मेँ रखा है । उस्तते रणता है फ वे उसके दोनों मेदो को स्वतन्त्र दो अलंकार 
नदीं मानना चादते । यँ स्वस्वकार ने दोनों प्रतीर्पोकोमौ एकदहीसूत्र मेरखा है। 
निश्चित दी दोनां को एकी मानते हें। मम्मटनेभी रेताद्ीमाना है, विमरिनीकार का 
जो यदह कहना हैकि दोनो प्रतीपो में कोई सामान्य लक्षण नहीं है उसका उत्तर रत्नाकर कै 
सूत्र ते मिल जाता है। एकदहीसूत्र मेँ एक डी अकल्करारकेदो प्रकारो का पृथक्‌-पृथक्‌ उद्लेख 
यदि इस कल्पना का पोषक है क्ति सूत्रकार दोनों प्रकारो को दो स्वतन्त्र अलकार मानना चाहता 
है तो कार्यकारणमावमू अतिशयोक्ति [ प ४४ ] र उसे पूरं व्याजस्तुत्ति [ पृ० ३८ ] कं 
सूत्र मे निर्दिष्ट प्रकारों को भी स्वतन्त्र अल्कार मानना होगा सवैधा यहो रत्नाकर क्रा पक्ष 
ग्रवल हे। 

रत्नाकरकार ने प्रतीप में अन्य विच्छित्तियां का मी अनुसन्धान किया है। बिमरिनीकार 
उस पर मी मौने । अपिकयुण के अनादर के ही समान न्यूनयुण काञआदरभी एक रेस्ती 
हयी विच्छित्ति दै । उसका उदाहरण “यणञुभ०' गाथा से दिया है-जिस्तकी संस्छेत छाया 


यह ह- । 
(स्तनमुजमूलनितम्बान्‌ प्रियाया जीणोम्बरायाः प्रक्षमाणः । 
सले व्याप्रताया बहु मन्यते रोरम्‌ ॥ 

(गरीव गृहिणी मूसतर चला रही है। उप्को साड़ी जगह जगहसेफट चुकी है। इहाथ 
उठाने मे उसके स्तन, मुजमृल तथा नितम्ब उक्षे बाहर साफ दिखाई देतेहै। उसे इस स्थिति 
सँ देख उसका प्रिय दारिद्रयको ही बहुत आदर दै रहा दहै) 

यहां आप रोर शब्द का अथं दारिद्रय हे। सवस्वकार मंखके ही श्रीकण्ठचरितमें श्स शब्द 
का इसी अथं में इस प्रकार प्रयोग मिलता है- 

“विवृण्वता सोरभ- रोश-दोपं वन्दित्रतं वणंगुणेः खृन्त्याः । 
विकस्वर कस्य न कणिकारे घ्राणेन इष्टवेवृषे विरोधः ॥' 


६२७ अन्ह्लारसवेस्वम्‌ 


ग्रीष्म मे कणिकार [ अमलतास् | एूलातो ददोककौी दृष्टि सेनासिका की डप हो गईं, 
दृष्टि उसके सुवण वण की प्रशसा करती थी ओर नसिका उत्ते सुगन्ध मे सोर = दरिद्र बतलाती थी । 
[ ६।१३ श्रीकण्ठचरित ¦) 

अप्पयदीडित--ने दोनों प्रतीपो के किएिदो प्रथक्‌ लक्षण बनाए है-- 

{ £ ] प्रतीपञुपमानस्योपमेयत्वप्रकटपनम्‌ । 

{ २ ] अन्योपमेयलामेन वण्यंस्यानादरश्च तत्‌ ॥ 


उपमान को उपमेय बतलाना प्रतीप तथा अन्य उपमेय का मिलना दिखलाकर वर्णनीय 
काजनादर भी। उरन्दोनि उदाद्रणके रूपमेँ प्रथमके लिए 'यच्चन्नेत्न० पव दियादहै जो 
काव्याक्य कं उदाहरणकेस्पमं सव्व्मेमीआयादहै तथा द्वितीयकेलिए रुद्रटका दही सवं 
सम्मानित शगवमसंवाह्यम्‌०? पद्य उद्धृत किया है । 
पण्डितराज- प्रतीप ॐ विवेचनमे दोलायित चित्तके दिखाई देते दै । उरन्दानि उपमा 
प्रकरण मं उपमेयोपमा के दी समान प्रतीपको मी उपमाका ही रूपान्तर मान लिया है। प्रतीप 
प्रकरण मं समीवे विश्चद विवेचन करने के पश्चात्‌ उसो स्वर क्रो ओर सवलता के साथ 
दुदराति दिखाई देते हैँ । उन्न प्रतीप के पांच मेद माने दैः जो इस प्रकार दै-- 
[ १} प्रसिद्धोपमानवेपरित्येन वर्ण्य॑मानमौपम्यमेकं प्रतीपम्‌- 
ध उपमान के विपरीत वणित कियाजारहा सादृदयणक प्रकार का प्रतीप 
होता हे। 


[ २-३ | उपमानोपमेययोरन्यतरस्य किचिद्गुणप्रयुक्तमद्धितीयतोत्कषं परिहत्तः द्वितीयप्रदशेनो- 
ल्टास्यमान साददयमपरं दहिविधम्‌ । 
उपमान ओर उपमेये से किसी ण्क का किसी गुणको छेकर अद्दितीयत्व प्रकारित 
करने से निकल रहा साद्दय दूसरे तथा तीसरे प्रकार का प्रतीप होता है। 
[ ४ | उपमानस्य केमथ्यं चतुम्‌ । 
उपमान की निरथंकता चौथा प्रतीप होता है तथा- 
{५ ] साटृदयृविधटन पच्चम्‌- 
साद्द्य का विघटन पाचवों। 
इनके उदाहरण- 
[ १1] “क्रं जल्पसि मुग्धतया हन्त मम्राङ्गं दुवणैवणमित्ति। 
तद्‌ यदि पंतति हुतां तदा हताश्च तवाङ्गवर्णं स्यात्‌ ॥` 
अति हतार ! मोटेपन में यह कहती दहै किमेरार्भोँग सोनेसेरगकाटहै। वकी भमोँगके 
केरगकाष्टो सकेगा यद्धि आग में तपे): यह उपमान कौ उपमैयतासे होने वालामेद दहो ३। 
 ब्य॒दि तदाः से यद अतिद्चयोक्तिगर्भित दो गया रहै । 
[२] उपमान की अद्धितीयता के परिहार का उदाहरण--पण्डितराज के मत मेंमी 
(अदमेव गुरु" पद्य माना जा सकता हे । 
[ ३ ] उनके मत मेँ उपमेय की अद्ितीयता के परिहार का उदा््रण भी गवेमसंवाह्यम्‌०' 
पद्य माना जा सकता है । इसी प्रकार 
[ॐ ] उपमान की निरर्थकता के किष (लावण्योकसि०ः तथा 
[ ५ ] सदुदय विघयरन के लिए ए एदि किमपि०ः। 


मीटितालङ्ारः ६२५ 


पण्डितराज ने श्नमें से प्रथन तीन मेँ उपमा ही माना उचित माना है, चतुथं को 
अक्षिपालंकार ओर पंचम को अनुक्तपमैक व्यतिरेक । समथन मे उनके तकं हैः कि प्रथम तीन में 
साट्र्य को निष्पत्ति ठीक उसी पकार दो जाती है जिस प्रकार उपमा से। जहो तक 
प्रसिद्धिविपरीतता का प्रन है--उसते उपमामें हौ एक विच्छित्तिका समथेन करना मयिक 
उचित हैन कि स्वतन्त्र अल्कारताका । [दण्डीनेरेसा किया भी है। उन्होने इसे विपर्यासोपमा 
नाम दिया हं | उनका यह्‌ दृष्टान्त श्स विषय मेँ उल्केखनीय है- नन हि द्राक्षा माधुयांतिद्ययेन 
पाथिवान्तराद्‌ विलक्षणेत्ति अपाथिवी भवति"--द्राक्षा अतिशय माधुय के कारण अन्य पाथिव 
पदाथः से विलक्षण होती है इसका अथं नहीं होता कि वद अपाथिव दहो जाती है विपरीत 
उपमा, उपमान; या उपमेय कौ अद्वितीयता का परिहार उपमाको अनुपमा या उपमैतर नहों 
वना सङ्गता, उसमे अतिदय मर ल। सकता हे । पण्डितराज कल्पना के धनी हें । उन्होने उप- 
मानोपमेय के तिरस्कारके ही समान पुरस्कारमें भी एक च्टे प्रकार का प्रतीप मानने की आपत्ति 
प्रस्तुत कौ है ओर उसके किए एक स्वनिमित उदाहरण मभी दे दिया है ।--वस्तुतः पण्डितराज 
भू ग किं अलंकारो का मेदक तत्व वस्तुभेद- या योजनाभेद नहीं, चमत्कारभेद है। प्रतीप ` 
मे चमत्कार सादृद्ध से नहीं वैपरीत्यमे होता है । यह तथ्य स्वयं पण्डितराज ही अनेक षार दुह- 
राते, वतलाते ओर जतलाते आए हैः । अन्य मेदो मे भी यह तकलागू हो सकता है। उपमालंकार 
के प्रकरणम नगे ने गुरुमम॑प्रकादा में पण्डितराजको आडेहार्थोल्याभीरहै। 
विश्वेश्वर ने प्रतीपकेदो ही मेद माने है--उपमान की निरर्थकता तथा उपमेयता- 
'उपमानानथंकयं प्रती पमस्यो पमेयत्वम्‌ ।› | 
श्नका अनुगत सामान्य उन्दने इस प्रकार बतलाया है-- "सामान्यलक्षणं तु यन्निष्ठसाद्रय- 
प्रतियोगितानाश्रयत्वाभिमतो पमानकत्वं [ तत्तवं प्रती पत्वम्‌ ]। अथात्‌ उपमान मे जिसका साद्दय 
अस्वीकार किया जाय वह्‌ उपम प्रतीप । अस्वीकृति स्वयं उपमान मे भमी बतला जा सकती है 
ञओर अन्य किसी मे मी। पण्डितराज दरा बतलाए समस्त भेद उन्होने सांकेतिक रूप से उक्त 
दोमभेदांभ ही अन्तभूत मान ल्पिहे, यद्यपि उनके प्रतीपविरोधी स्वर पर विद्वेरवर कां 
पुराणवादी समीक्षक चुपदहे। 
चक्रवत्तीं की निष्कृष्टाथकारिका प्रतीप पर यदह है-- 
'उपमानस्य बमथ्यादुपमेयत्वकल्पनम्‌ । 
द्विधा प्रतीपं क्राप्येतदुपमानत्वतोऽपि च ॥ 
| स्घेस्व | 
[ घ ७१ ] वस्तुना वस्त्वन्तरनिगूहन मीलितम्‌ । 
सहजेनागन्तुकेन वा लक्ष्मणा यद्वस्त्वन्तरेण वस्त्वन्तरं निगूहते 
तदन्वथोभिघानं मीलितम्‌ ! न चायं सामान्यालंकारः, तस्य हि साधारण- 
गुणयोगाद्धेदाच्पलक्षणं रूपम्‌ । अस्य तूत्छृष्टगुणेन निङूएटगुणस्य तिरोधान 
मिति अहाननयोर्विशेषः ! सहजेन यथा- 
८ >) व † 
अपाङ्गतरले ररौ सघुरवक्रव्णी भिसो 
विलासभरमन्थरा गतिरतीव कान्तं सुखम्‌ । 
इति स्फुरितमङ्गके सगरं स्वतो दीखया 
यदच्र न मदोदयः कृतपदोऽपि संलक्ष्यते ॥* 
४० अ० खण 


६२६ | अल््ङ्कारखवंस्वम्‌ 


| अन्न इडक्तारस्यादिना स्वाभाविकेन ठत्मणा भदोद्‌यङृतं दक्तारस्यादि 
| तिसेधीयते ¦ आगन्तुकेन यथा - | 
| धये कन्दरासु निवसन्ति खद्‌ हिमादर 

स्ःवतपातशङ्कतधियो विवा द्धषस्ते ¦ 

अप्यङ्गनुत्पुलकसुद्धदतां सङ्म्पं 
तेषामद्य बत भियां न बुधोऽप्यभिन्ञः 
अर हिमाद्विकन्दरानिवाससामथ्यंघतिपन्नेन शेत्येन ससुद्धावितावाग- 

न्तु रो कम्पतेमाश्चौ भयङ़ृतयोस्तयोस्तितेधायको ¦ तिचेधायकन्वादेव च 
मीलितञ्यपदेदाः | 


[ सू० ७१ ] एक वस्तु के द्वारा दूखरी वस्तु का [ तिरोधान मीलित नानक अकरूकार | 

कलाता द ॥ 

[ वृ० ] सहजात अथवा ऊपर से माएटकिसी वर्मके द्वा किसी भिन्न वस्तु कै दाराजो 
किसी भित्न वस्तु का [ निगूदन अधात्‌ ] तिरोधान वह्‌ 'मीलितः इस अर्थानुरूप नाम से पुकारा 
जाता है । यद्‌ सामःन्यालंकार नदीं है, उसका स्वरूप साधारण णाक कारण मेद का समञ्चं 
न आना हे । इसके विरुद्ध हस [ मीलित ] का स्वरूप है उक्छृष्ट युगो वाली वस्तु के द्वारा निङ्कषट 
गुणां वाली वस्तु का तिरोधान । इस प्रकार इन दोर्नो मँ महान्‌ मेद है । 

सहजात धमं के दारा, यया- 

'अपांग तक घूमती दृष्टिः मधुर किन्तु वक्र वर्णां वाली बोली, विरास्के मार से धीमी चाष, 
अतीव कान्त सुख, यह सव तो उत्त सृगनयनी के जंग मै अपने आप स्फुरित रै, अतः [मधुपान 
जनित ] नदरा आजाने पर भौ दिखाई नदीं पड़ रहादहै। 

-- यहां दृष्टिचाव्रस्य आदि धमं स्वामाविक धमंहै। इनके द्वारा नदो से उत्पन्न दृष्टिच।च्चय 
आदि चिपादिएगणदहें। 

उपर से जए धमं केद्वारा, धथा-- 

तुम्हारे जो राव वम्हारे ट पड्नेकी दकासे हिमाद्रि की युफाओं मे विवश्यतापूर्वैक सदा 
दी समार रहते है, उनके दासीर रोमांचित ओर कम्पित होते रहते हेतव मी उनके भयका 
ज्ञान चतुरज्नांको भी नदीं होताः 

यहं हिभाद्धि [ बफींले पवत = हिमाचल | कौ युफा्ओं मँ निवास के कारण प्राप्त ठंड कै 
कारण उत्पन्न अतएव ऊपरी धर्मरूप जो कम्प ओर रोमांच दैवे भय से उत्पन्न उन्हीं [ कम्प 
ओर सर्माच रूपी धर्मो] के तिरोधायकदहे। ओर तिरोधायक्ताके कारणदहदी मील्िति यह नाम 
भीप्डाहे॥ 

विमन्ल- 

रत्नाकरकार मीलित से सामान्य को पृथक्‌ नदीं मानते। वे सवंस्वकार की स्थापनार्ओका 
उत्तर देते इए लिखते दै- 

थक्‌ सामान्यमीलितयो कक्षं न कायम्‌ , भेदाभावात्‌ । तथा हि यत्र सामान्यं यवद्धिरिष्यते 
तत्र थस्य मेदानवणमस्तस्य किं स्वरूपमवगम्यते न वा । आये घरपटयौः पयोरेव वा यथा निजनि- 
जरूपप्रतीत्याऽस्ध्येव मेदप्रतीतिः, तथापि स्यादिति न मीलितम्‌, नापि सामान्यम्‌ । द्वितीये 


क = 5 


मौीलितालज्ञारः ६२७ 


निजस्वरूपस्यानवगमेऽधिकयुणेनाच्छादनमेव निभित्तम्‌ , न समानगुणत्वम्‌ । तथाघे छताज्यो- 
सस्नादेरपि समानयुणल्श्म्भवात्‌ कथं लु निजतयानवगमः । न च स्वरूपाच्छादनेऽपि सदजायन्तु- 
कत्वाद्‌ विद्रोषादलङ्कारभेदो युक्तः, प्रतीतिसम्येनेकस्यैवारुङ्कारस्य भेद प्रमेदाभिधानोपपत्ते परिष 
त्यादिवत्‌ । ००० नापि युणस्ताम्यविवक्षया भेद त्यावगमेऽप्यनवगमाभिधानं सामान्यस्य मीलिताद्‌ 
विदोषः, मदङ्ृतस्वाप्यपाङ्गतरलवत्वादेभेंदावगमसरम्मवात्‌ । तेनोदाहरणेषु सम।नाभिदहारनिमित्तस्य 
स्वरूपात्रगमस्य संमवदेक एवालङ्कार वाच्यः, स च मंल्ितिनामेव, वस्त्वन्तरेणावच्छादनात्‌- 

भेदेनानुपलम्भस्य बलवद्‌ युणसङ्गतिः । 

सामान्ये मीलिते तुख्यो हेतुस्तेन न सिन्नताः ॥ 


सामान्य ओर मीलित के लक्षण पृथक्‌-पृथक्‌ नहीं करिए जाने चाहिए, क्योकि इनमे कोई भेद 
नदीं है । यह हस प्रकार किं आप [खवंस्वकार] जहाँ सामान्य मानते है वह्यं जिसङ़े मेद का न्ञान 
नदीं होता उसके स्वरूप का क्षान होतादहियानदीं। होतादहैतो जेते षर ओर पटया पर ओर 
पट का अपने अपतेरूपकेज्ञानसेभेद प्रतीत होता है, वैसे ही य्ह भौ भेद प्रतीत होगा, तव 
न तोमीखितदहीहोगाओर न सामान्यही। स्वरूपक्षान नदीं होनेका पक्च माना जायतो 
निजस्वरूप केन्नान नदहोने में कारण अधिक रुण वाली वस्तुके द्वारा आच्छादन ही माना 
जायगा, युण्स।म्ब नदी, क्योकि तव [ विमरिनी में भगे भने वाले प्य अभमेदमृढ०ः मै ] ता 
[ तथा सामान्याल्क्रार के उदाहुरणके रूपमे सवेस्व मेँ आने वाले प्च भमल्य॒जरस० मेँ] 
ज्योत्स्ना भादि मै मी निजस्वरूप का ज्ञानामव क्यों नदीं रहता [ अर्थात्‌ उनके स्वरूप का ज्ञान 
क्यो होता हे ] क्योकि गुणसाम्य तो उनमें मौ हे। नर्हा तक [ हमारे दारा स्वीकार किए गए] 
स्वरूपाच्छादन रूपी कारण का संबन्ध हे उसमे यपि सहजातता भौर भआगन्तुकताः ये दो 
विशेषतार्दं रहती है किन्तु उनके आधार पर अलंकार भेद नदीं माना जा सकता, परिवृत्ति आदि 
कै स्मान एक ही अलकार में दो प्रकारो कौ कल्पना मरकी जा सकती है क्योकि प्रतीति वोन 
एकसीदही रहती है। ००००। यहु भी नहीं कहा जा सक्ता करि युणगत साम्य करी विवक्षा से, 
मेद काज्ञानदहदो जने पर मीनज्ञानन होने का कथन मीलितिसे सामान्य का मेदक है, क्योकि 
[ मीलित में उदाहरग अपांगण्मं माए ] नशे से उत्पन्न नेत्रचांचल्य काभी मेद प्रतीत ह्यना 
संभव है। इस कारण [ मीलति ओर सामान्य दोनों के ] उदाहरणा म जत स्वरूपज्ञान संभव है 
लिसवे आधार पर दनां काणक दही लक्षण [ समानाभिहार० ] बनाया जा सकता है तब अल्कार 
दक ही बतलाया जाना चादि ओर उस्तक्ञानाम मीक्तिदही दोना चादिर क्यो्नि इसमे भन्य 
वस्तु का मीलन = आच्छादन रदता ह । निष्कष यह कि- 


[ सामान्य ओर मीखिति से वस्तुका | चान भेदपुवेक जो नकीं होता उसका सामान्य बौर 
मीखिति [दोनो] मेषकद्यीदेत हे अधिक गुण बाह्ली वस्तु की सन्निधिः। अतः इन दोनों 
भिन्नता नहीं है। 

€स पूरे प्रषटक का निष्कषे यह हमा फिमीक्तिके दी समान पामान्य स भी वस्तुस्वरूप 
का तिरोधान रहता है तथा सामान्य के समान मीक्ति म भी वस्तुस्वरूप म मेदबोध ! बोधगत 
तरतमभावया मात्रामेदको लेकर प्क दही उक्तिप्रकार कोदो अलंकारो सै विभक्त करनेकी 
अपेक्षाः दो प्रकरा मेँ निमक्त करना अभिक उचितदहै ओर उन दोनों प्रकारं को प्क द्यी 
सकार मानना । इस अल्कार को नाम कोनपा द्विया जाए मील्विया सामान्य) इस पर 
रत्नाकरकार का कहना हे कि दोनों मेँ चमत्कार का कारण णक हौ है-वस्तुखल्प क्षा 
तिरोधान" अतः मौजिति नमदेनाही उचित है। विमर्गिनीकार रत्नाकरकार की इस मू 


| 
। 
। 


४ 
६२८ अन््ृङ्कारसवस्वम्‌ 
स्थापना का निराकरण नदीं कर पाण । वे रत्नाकरकार के अवान्तर विकल्प पर सव॑स्वकार का 


पक्ष स्पष्ट करने तक सौमित दै । यद तथ्य उनकी इस विम्िनी से स्पष्ट है- 


विमदिनी 


वस्तुनेत्ति । लक्ष्मणेति । चिद्धरूवेण धर्मेणेष्य्थः 1 तस्य हि सह जागन्तुकस्वेन हिवि- 
=) ण] = न 
धस्वाद्स्यापि द्वि प्रकारस्वमश्तीव्यनेनोक्छम्‌ । ननु वस्स्वन्तरस्य वस्त्वन्तरे निगूहितस्वे. 


` नैकारम्योपनिवन्धारिकिमयं सामान्यारुकार एव न भवतीर्याश्चङ्कयाह -- न चायभित्यादि । 


साधारणयुणयोगादिति । यद्‌्रः-- 


“प्रस्तुत्य यदन्य॑न ग्रुणद्वाभ्यविवन्तया। 
एेकाषट्यं वध्यते योगात्तरखामान्यमिति स्तम्‌ ॥ 
मेदाचुपलक्षणमिति । प्रस्तुताप्रस्तुताध्मनः खडकास्य वस्तुद्रयच्यासामन्याकारतया दय 
गवगतस्याप्येकतरविशेषस्मरणादु भयविदेषाग्रहणाच्चेतरस्वेनेव निश्वयोव्पाद्‌नाद्धटपट 
वद्मेदेन प्रातिस्विकेन ख्पेगानुपरूद्णं यथावगमनमध्यवसाय इव्यथः । यथा--राज 
गज्ञादौ शक्िकारजतयोः संनि क्वंगासामान्याकारतया पृथगवगमेऽप्येकत्तरविशेवप्मरणा- 
दुमयत्र विदोषाग्रदणारकस्य चिदेकतरस्वेनैव निश्चयो जायते तथेवेदापि हेयम्‌ । मीक्ति 
युनन्युंनुणस्या्िकपुणेन तिरोहिवध्वारसामान्याकारकस्वेनाप्युभयचगमो न, न्यूनः 
गुगाच्छुदकतया तदं श्ावष्टग्येनाधिकगुणस्येव प्रतिभासनात्‌ । अत एवात्र मदोदुयक्कृतस्य 
दश्तारद्यादेर्नावगममान्न, तस्व मदोद्यास्पूर्वमपि तथेवावस्थानात्‌ बख्वता स्वाभाविकेन 
दक्तारल्यादि नाच्डादितरवाद्‌ । सामान्ये पुनः- 

अभेद मूढस्तव काभिरागता र ताभिरीषल्टटुक्ितालिपङक्तिभिः । 

इयं पुरोमाङतनतितारुका न ख्च्यते व्यक्तमवासनस्तनी ॥' 
इव्यादौ निकुञ्जमध्यगताया योषितः पथग्देश्ावष्टञ्मेनाक्चामान्याकारतयावगमेऽपि 
खाघारणगुणयोगाल्ञताम्यो सेदेनानध्यवसायः। अत एव (न रुचयते व्यक्तम्‌" इव्या- 
दय॒क्तम्र्‌ । अतश्च स्वरूपेणवगतस्यापि मेदानध्यवस्ायः सामान्यं, बलवता तिरोहि तद्वाव 
स्वरूपानवगमो मोीखितसिति स्थितम्‌ ! अत एवाह-मदहाननयो विदेष इत्ति । एवं तर्हि समाः 
नगुणस्वस्याविशेषादचयमागोद्ाहरणादावभितसारिकादिवउयोर्स्नादेरपि मेदानुपलन्षणं 
कं न स्यात्‌ । ननृक्त एवात्र परिहारो यत्‌ समान गुगस्वेऽप्येकतरविशेषसमरणादु भयविोषा- 
अहणाच्चेति । एवमपि कथमिति चेत्‌, कस्यायं पथ॑नुयोगः, किं ज्ञातु ज्ञेयस्य वा । 
एतच्वाप्रस्तुत्वान्नेहस्माभिड्क्मर्‌ । इह च प्रस्तुतस्यैवाप्रस्तुताद्धेदेनाञ्ुषष्तणं विवक्ति 
तम । तद्त्वेनं वाजेवुद्वारेण तस्साटयस्य प्रतिषिपादयि पितवा । न व्वेवमप्यन्यस्यान्य- 
ध 1 वाच्यः । तस्य हि भ्ङ्तवरूवाच्छाद्कष्वेनैव प्रतीति" 
दह तु तथाष्वेऽपि वस्ू्वन्तरस्य पृथक्प्रतिपत्तिरिव्यरं बह 


हुना। न चास्य सज्ञा. 
मात्रमेतदिध्याह--तिरोधायकत्वादित्ति । अतश्च पूवं न्तद्न्व्थाभिधानं सीरितमिष्युकत 
निर्वाहितम्‌ ॥ 


वस्तुना । छचमणा = चिह्नरूप धमं से । वह दो प्रकारका होता है सहज तथा आगन्तुक अतः 
यह अल्कार मीदो प्रकारका होताहै यहु बतलाया) “अन्य वस्तुक द्वारा अन्य वस्तुका 
जो छििपाया जना दहै वह सामान्याल्कारमें भी दोतादहै, तः दोनों नै एकरूपता रने से 
यह सामान्यःलंकारस्वरूप ही क्यों नहीं माना जाताः-ेसी कंका उठाकर कदते हे--^न चायम्‌० । 
खाधारणगुणयोगाव्‌ = गुण साम्य = उसा कि [ मम्मट ने ] कदा ३ै- 


| 
। 
| 


मीलिवाल्ङ्कारः &२९ 


"गुणसाम्य बतकाने के किए, प्रस्तुत का, अन्य के साथ, सादृश्य संबन्ध ॐ {धार प्र, अभेद 
वतलाया जाता दहै वई [ सामान्य नामक अलकार कहराता हे, काव्यप्रकाञ्च ] । 

सेदाल्ुपकरूच णात्‌ = मेद समञ्च मँ न आना = यथपि प्रस्तुत ओर भगप्रस्तुत दो समान 
वस्तुभ का आकार सामान्य = [ एक समान या अभिन्न | नदीं होने से थक्‌ एथक्‌ ज्ञान तो 
होता है तथापि इस ज्ञानमेंयातो किंसतौ एक के विशेष का बोध नदींहो पाताया फिर दोनो के 
विदोषं क; फलतः इस ज्ञान से जो निश्चय होता 2 उसमें दोनों वस्तुं किंसौ एके सूपमेंही 
विदित होती है, इस प्रकार दस्मे दोनों वस्तुओं का मेद घट ओर पट के समान स्वरूपगतसरूप से 
विदित नदीं होता फलतः जैसा प्रारस्मिक बोध दता है वैसा ही अन्तिम निश्चय मी । उदाह्रणाथं 
ससे राजगंज [ कदाचित्‌ रायल मकिट {30४१ ४५१९४ | भादि मे जहौ चाँदी ओर 
सीपकेठेरल्गेरहतेष्टौ ओर दूरसेदो दिखाई देने प्र भौ उने चदीका ढेर कौनसा है 
जर सीपक्ा ठेर कौनसा यह अन्तर प्रतीत नदीं होता। सौप ओर चोँदी पास पास 
रहती है । उनके भकार अल्ग-अर्ग रहते है अतः उनका बोध ञरूग-ञल्ग 
होता दै तथापि किसी एक कौ विशेषता का स्मरण न होने खा दोनों की विश्ेषतार्जं 
काभानन होने से किती ष्यक्तिको दोनों का निश्चय प्कदही रूपमे होता है उसी प्रकार य्ह 
[ समुच्चय मेँ ] समज्लन। चादर । [ राजगंज कदाचित्‌ रायलमाक्रेर हेया राजाकी मंडी 
जहां चाँदी मौर छिपनि्ों के भलग-अल्गण देर लगे रहते होगे) दूरप्ेदो दिखाई देने पर मभो 
उने, ्चादी कादेर कोन दहै ओौर सीप क्रा कौन यह अन्तर प्रतीत नहीं होगा] इसके विपरोत 
मील्तिमे दोनोंका घान स्तामान्यकूप सेमी होता हो रेसा नदींहै क्योकि इस्तमे अधिक 
गुणवाला पदाथ कम युण वहि पदाथेको चछ्िादेताहै बौर [क्योकि भ्म गुण वाले पदाथे को 
अधिक युण वाहा पदार्थं दबादेता है] श्सङ््‌ कम गुण वारे पदाथ कै स्थान पर मी एकमात्र 
अधिक गुणवाके पदार्थका दही भान दोता है । श्सीकिए स [ मौकित के उदाहरण (अपाङ्गतरल०- 
पद्य ] मे नशे से उत्पन्न नेत्रचांचल्य मादि का श्वान एकदम नदीं दोता वयांकि वे [ नेत्रचाञ्चल्य 
आदि ] नश्चे के पहर से उसी रूप म विद्यमान रहते है ओर उनसे अधिक बरूवान्‌ स्वाभाविक 
नेत्र वाच्नल्य आदि तेवे दवा दिद गण दहेः । इसके विरुड सामान्य के- 


सामने की हवा से नचाए ग मल्क तथा अवामन [ बड़े-बड़े ] स्तनं वारी यह ॒खन्दरो- 
किचित्‌ हिलती ्रमराषणी से युक्त तथा स्तवक से ठ्दी र्ताओं से इस प्रकार अभेद को प्राप्त हो 
गईं है कि स्पष्ट दिखाई नदीं पड़ रही है ।' 

इ््यादि [ उन ] स्थल मँ [ जिनमे रत्नाकरकार ने मौलितिालंकार माना दहै | निङुज के 
वीच स्थित स्त्रीक्ा भिन्नह्पमे निश्चय नहींहोपारहादै, इम कारण है साधारणयुणों का 
योग, ययपि पले वदी खी अन्य स्थान पर भपने असामान्य श्प मेँ विरत्‌ होती है । इसीलि९ 
स्पष्ट दिखाई नक्ष पडतीः यह कषा गया है । इस कारण सिद्धान्त यह त हआ कि भारम्मरमे 
स्वरूपतः क्षात पदाथ का मी अन्त मे भिन्नरूपे निश्वयन होना सपुरान्य कदलाता है तथा 
वलवान्‌ के द्वाराचछिपादिएजनेसे आरम्भमें मी स्वरू्पका ज्ञान ५ होना मोकितः। इसीलिए 
कहा--'सहाननयोर्षिज्ञेषः = इनमे महान्‌ अन्तर है । [ रत्नाकरकार द्वारा रोका उठाई गह है 
किं ] उक्त क्रम से जव दोनों मे समानगुणा का महस समानरूपे स्वीकार कियाजा रहा है 
तब आगे [ सामान्यप्रकरण ] कहै नाने वाले [ मल्यजरस आदि } उदाहरणो मे अभिसारिङ्गा 
आदि के समान ज्योश्छना [ चौदनी] आदिकाभीमेद श्यो नीं चिप जाता इसकातो 
उत्तर दियाद्ी जाचुकाहैकि--ध्यातो य्॒किपी एक कीदही विह्ञेषताका ज्ञान होता है 


दद० यअल्ट्धारसवेस्वम्‌ 


याफिर दोनों की दी विशेषताओंका ज्ञान नदीं होताः) यदि पृछ धेसाभी र्योद्योतादै ¢ 
[ तो वतखादएय कि ] यह [जो समानयाुणत्ववोध है यह] किंनिष्ठ हे ज्ञाठृनिष्ठया क्ेयनिष्ठ १ 
[ निशित दी ज्ञादेनिष्ठदै गौर श्सक्िए ज्ञेयस्थितिजो मी दो, महत्व छानरिथतिकोदही दिया 
जारगा, ओर क्ञान यश वैसाद्यी होता जैसा हम वता माणे] यद विचार अप्रासंगिक है, 
सचि हमने श्स पर यदा ङु नदीं कदा । वस्तुतः यदा [ सामान्यमें] केवल प्रस्ठुतकादही 
अप्रस्तुत से भेद प्रतीतन दोना विवक्षित रदतादहै [ अप्रस्तुत का प्रस्तुत से नदीं] क्योकि 
[ केवर ] उस [ प्रस्तुत ] के विषयमे दही हए अमेद बोधके द्वारा यदं उस [ अप्रस्तुत | का 
सादृदय प्रतिपादित करना अभीष्ट होता दै । [ अतः अप्राकरणिक ज्योत्स्ना आदि का मेद छिपना, 
सामान्य मे, आवदयक नीं ] पसा मानने पर, अन्य का अन्यरूपत्ते ज्ञान [ ्रान्तिमानूर्मे मी 
रहता है अतः उस ] के आधार प्रर इसका आरान्तिमान्‌ मे मी अन्तर्भाव नदीं माना जा सकता, 
क्योकि उस [ आआन्तिमान्‌ ] मेँ प्रतीतिस्वरूप वस्तु के भाच्छादन तकं सीमित रदता दै जव ® 
यदो [ मीक्ितिर्मे ]त्रैसातो द्योताद्ीदहै, अन्य वस्तुका प्रथक्‌ रूपसेमी बोध होता है। अस्तु, 
रहने मी दिया जाए अधिक विस्तार से कोद लाभ नदीं। तिरोधायकरवात्‌ = इत्यादि दारा 
यद्‌ वतलाते हैँ कि इस [ मीकित ] की यह संश्षा केवर संज्ञा ही नदीं दहै) [ यद साथैक मीहे ]। 
इस प्रकार पके जो 'तदन्वर्थाभिधानं मीलितम्‌” = कदा था इसका अन्त तक निर्वाह कर दिया ।' 


विमच्--इतिदास-- 
 मील्तिकी कदपना पदे पदर रुद्रटः ने की है। उन्दने इसके त्दजधमंमूरक ओर 
ञआगन्तुकधममूलक दोनाँ मेद भी बतला हैँ-- 


(तन्मीलितमिति यस्मिन्‌ समानचिहेन हषकोपादि । 
अपरेण तिरस्क्रियते निव्येनागन्तुकेनापि ॥ ७।१०६ ॥ 


वह अर्कार मीलित कदलाता दै जिसर्मे किसी सहज या आगन्तुक समान चिह के माध्यम 
से किसी अन्य पदाथे केद्वारा हषं कोप आदि चपा दि जात्तेदहैः। 


सहज धर्म- 
तियंक्प्रक्षणतरङे सुस्निण्ये च स्वभावतस्तस्याः । 
अनुरागो नयनथुगे सन्नपि केनोपलक्ष्येत ॥ ७।१०७॥ 


उसके दोर्नो नेत्र तिरछा देखते जौर चंचल रहते दैः । उनम स्नेह भी है । अतः उनमें अनुराग 
रहने पर मी उसे कौन जान सकता हे । 


आगन्तुक = 
मदिरामदभरपाटल-कपोल-तललोचनेषु वदनेषु । 
कोपो मनस्विनीनां न लक्ष्यते कामिभिः प्रमवन्‌ ॥ 
4 
मदिरा के मदस्े लाल कपोल तथा नेत्र वाले मनस्विनिर्यो के चेदय पर कोप आताहै पर 
कामिर्यो को समञ्च मे नदीं भाता ।› यहाँ मदिरामद की लाली आगन्तुकं खाली है । उसे कोष 
की लाशी का छिपना प्रतिपादित है। 
मम्मटन्नेरुद्रटका ही अनुसरण इस प्रकार किया है-- 


समेन लक्ष्मणा वस्तु वस्तुना यन्निगृद्यते । 
निजैनागन्तना वापि तन्मीलितमिति स्यतम्‌ ॥ 


मीलितालङ्कारः ६३१ 


उदाहरण भमी मम्मटने रुद्रटसे मिलते जुरते दिएदहें। उन्हीं को सववस्वकारने भी उद्धृत 
कर जिया ₹ै। 
रर्नाकर-- रत्नाकर मीक्ति ओर सामान्य कोणकहौी अलंकारके दो प्रकार मानते है, 
जेसा किं अभी अभी वतलया गया है) तदनुसार उन्होने दोनों म अनुगत एक लक्षण मीलित 
नाम से हौ इस प्रकार बनाया है-- 
'धमम॑साम्याद्‌ मेदाप्रतीति मीलितम्‌ । 


-- धमगत समानता के कारण मेद की प्रतीत्तिन होना मीक्ति कहलाता है बिमर्धिन 
कार ने जितत “अमेदम्‌०? पद्य में सामान्याल्कार मानाहे, रत्नाकरकारने मीङ्ति के उदाहरण 
केरूप में यही पद्य पहले उद्धृत कियाहै। काव्यप्रकाशकार तथा सवंस्वकार दारा उदुधृत 
(मल्यजरस० प्य में सामान्याकार तथा “अपाङ्गतरले°ः पद्य एवं धये कन्दरासु प्रें 
मीलितालंकार की पृथक्‌ कस्पना पूवेपक्ष के रूपमे रर्नाकरकार नेमी प्रस्तुत की है किन्तु 
उन्होने उपर्युक्त तका दारा इस पाथ॑क्य का निराकरण भी कर दियादह। 

अप्पएयद्ीङ्त- "मीलितं यदि सादृर्याद्‌ भेद एव न लक्ष्यते । 

उदा०--रसो नालक्षि लाक्षायास्चरणे सहजारुणे ॥ 

'साट्द्य के कारण यदिभेद हीन दिखाईेदे तो मीलित नामक अलंकार होगा। ं 
यथा- सहज अरुण चरणमेँलक्षाक्ारस दिखा नदीं दिया) 

पण्डितराज = सस्फुरशुपलभ्यमानस्य कस्यचिद्‌ वस्त॒नो लिद्गेरतिसाम्याद्‌ भिन्नत्वे नागरह्यमाणं 

वस्त्वन्तर लिङ्गानां स्वकारणाननुमापकत्वं मीलितम्‌ । 

भेदाग्रहेण लिङ्गानां लिङ्गः प्रत्यक्षवस्तुनः । अप्रकारो ह्यनध्यक्षवस्तुनस्तन्निमीखितम्‌ ॥› 


स्पष्ट सूपसे समहन पड़ रही किसी वस्तु के चिहण के साथ अत्यन्त सादृद्य के कारण, 
अन्य वस्तु के चिहोकाभिन्नरूपसे गृहीतन टीकर अपनी आधार भूत अन्य वस्तु का अनुमान 
न करा पाना मीलित कहराता ह ।› 


प्रत्यक्ष वस्तु के चिह्ठोके साथ अपने चिह्ोकामेद गृहीत न होने के कारण अप्रत्यक्ष 
वस्तुका जो अज्ञान वही मीलति हे । 

इन लक्षणां के विशेषणं का प्रयोजन वतरते हुए स्वयं पण्डितराज ने कहा है “अनध्यक्षी 
वस्तुनः = अप्रस्यक्षवस्तुः अथाव वस्तुनः = भप्रत्यक्षता । इसका उद्देदय सामान्य का निवारण है । 
सामान्य मे दोनो ही वस्तुभं का प्रसयक्ष होता रहता है। 

चिहगत सहजप्व ओर भागन्तुकस्व को पण्डितराजने लक्षणमतो स्थान नहीं दिया किन्तु 
इ्ड उन्होने उदाहरणों म अवद्य ही अपना ज्या है। "अपाङ्गतरले तथा ध्ये कन्दरास॒० की 
अभिग्यक्तियो हारा पण्डितराज के उदाहरणं की अभिव्यक्ति गतां हे। 

विश्वेश्वर--“सहजनिमित्तजधमांत्‌ सद शादन्येन वस्तुना वस्तु । 

अपिधीयते यदेतन्मीकितमाहु विद्लेषज्ञाः ॥ 


संजी विनीकार- चक्रवत्तीं की मीलितकारिका- 

“निजेनागन्ठुना वापि लक्षणनान्यगोपनम्‌ । निमीक्तिस्यालङ्कारो दिप्रकारः प्रकाश्चितः ॥ 

पाञान्तर = विमरधिनी को इछ पक्तिं निण्यसागर्‌ संस्करण मेँ इमास दृष्टिस्ते अड्ुदध 
छपी हेः । प्रमुख स्थङ यथा- 


६३२ अलङ्ारसवेस्वम्‌ 


[ १] धटपटवद्‌मेदेन ०? [१० ६२८ प० १२] कै स्थान पर घटपटवद्‌ मेदो न । रत्नाकर के पूना 
संस्करण मे ऊपर उद्धत संग्रदकारिका का प्रथम पद्‌ मी 'मेदेन? के स्थान पर भमेदोन'--इसी प्रकार 
छ्पाहै। ॥ 

[ २] (सन्निकषंणास्ामान्य०' [प० ६२८ पं० १४] कै स्थान पर सन्निकषंण सामान्य०' तथा 

[ ३ ] (उभयावगमो न” [० ६२८ पं १६] के स्थान पर “उथयावगमोः सात्र छपा दहे। 

[ ४ ] द्ृथग्देदावश्टम्भेनास्ामा०ः [० ६२८ प० <=] के स्थान पर ृथ्देरावष्टम्भेन सामा०। 

[ ५ ] यत्त समानगुण ` [प० ६२८ पं० २७] के स्थान पर यत्‌ सुमनोगण० । 

मू मेंमी (अ्पांगतरले०' पद्यक्रा पाठ काव्यप्रकाश तथा रत्नाकरे आए इसी प्च 
केपाठते भिन्न है। उने जर्दाँ .अंगकेः है वदो निगय प्रतिमे “अङ्गकः है गोर उनमें जहाँ 
तदत्र है वदँ निणेय° प्रति ने यदत्र । अथगति कीड्ृष्टि से काव्यप्रकाश ओर रत्नाकर का 
ही पाठ अधिक उपयुक्त है। कु० जानकी की प्रतिमे अङ्गके तो अङ्गकेदही छापा गया हे किन्तु 
यदत्र तदत्र नहना । इसी प्रकार ड द्विवेदी की प्रतिप यदत्र के स्थान पर तदत्रतो छापा 
गया है किन्तु अङ्गकैः" के स्थान पर “अङ्गकेः नदीं । 

मीलित भौर सामान्य के मेद पर कुछ विचारतो मल्तिकेदहीश्स प्रकरणम हां गयादै 
जु आगे आरहे सामान्य कं प्रकरण मं दगा । 

मोज ने आगामी सामान्य को पिहित कहा हे ओर उसे तथा तद्गुण एवं अतद्गुण को मीलित 
केही प्रकारके रूपमे स्वीकार कियाहै[ द्र० सण कण्ठा० ३।४१ | 


[ सवस्व | 
[ छ ७२ ] प्रस्तुतस्यान्येन गुणसाम्यादेकारम्यं सामान्यम्‌ । 
यच् प्रस्तुतस्य वस्तुनोऽप्रस्तुतेन साधारणगुणयोगादेकाल्भ्यं सेदानध्य- 


वसायादेकरूपत्वं निबध्यते तत्समानगणयोगात्सामान्यम्‌ । न चेयमपहति;। 
किचिच्धिषिध्य कस्थचिद्प्रतिष्ठापनात्‌ । यथा 


मलयजरसविदिक्ततनवो नवहार्टताविभूषिताः 
सिततरदन्तपत्बरङतवक्बरूचो सुचिरामल्ाश्चुकाः । 

राश्श्रति विततघाभ्नि घवलयति धरामविमाभ्यतां गताः 
भ्रियवसति परयान्ति सुखमेव निरस्तभियोऽभिखासिकाः ॥' 


अन्न मख््यजरसविदेपनादीनां उन्द्रध्रभया सह “अविभाभ्यतां गता 
इत्यभेदप्रतीतिदै्चिता । 


| स्ट० ७२ | गुणगत साम्य ॐ जाघार पर प्रश्तुत की तद्धिन्न | अप्रस्तुत ] के साथ 
एकरूपता खामान्य [ नामक अकार कहराता है ] ॥ 

[ वरण ] जिस [ अलंकार ] मे प्रस्त॒त वस्तुकी अप्रस्तुत वस्तु के साध साधारणयुर्णो के 
आधार पर एकात्मता भर्थाव्‌ मेदकी प्रतीति न दोन से एकरूपता वतराहं जाती है वह समान 
गुणों के संबन्ध के कारण सामान्य कदलाता है । यह अपहत नदीं है, क्योकि [ यों ] किसी का 
निषेध कर किसी का प्रतिष्ठापन नहीं रता । उदाक्रण, यथा- 


सामान्यटङ्ारः ६३३ 


सफेद चन्दन के रस [ धिसे हए सफेद चन्दन ] से षिलिप्त शरीर वाली, नवीन मौक्तिकमाला 
पहने हृदे, खूब सफेद हाथी दत की पत्रावली से मुख की उज्ज्वल कन्ति वटढाए इहै ओर खुन्दर 
धवल अं्युक पहने हइ [ शुक्र | अभिसारिकार्ट उस समय सृञ्च नदीं पड़ती जिस समय चन्द्रमा 
अपनी किरणं विखेर कर धर्ष्ठ को सफेदी से रंगताहै, ओर वे प्रिय गह तक निमी होकर खख- 
पूवैक पंच जाया करती हें 

यहो चन्दनरस के विलेपन आदि के चन्दरप्रभाके साथ अभेदका ज्ञान 'सूञ्च नदीं पड़ती 
इस प्रकार बताया गया हे' ॥ 


मरिनी 
वि 
प्रस्तुतस्येत्यादि 1 परस्तेतश्येति उपमेयस्य । अप्रस्त्तेनेति उपमानेन । क्षाधारणयुणानां च 
तन्निरूपस्वमन्राधं सिद्धस्‌ । तेन खाघधारणगुणस्यातुगामितया यथा- 


"मध्ये जानपदखेणसुखानाममरुस्वि षाम्‌ । 
राहोररूचय तामेति यत्न पूणन्दुसण्डरष्‌ ॥' 
अत्रामरुकान्तिष्वमनु णामितया सक्नजिर्दिश्म्‌ । असञृलिर्देश्च सतु यथा-जसमेदमिष्यादौ । 
अन्न स्तबकस्तनयोलिर्घप्रतिबिस्वभावः। छलितव्वनतिंतध्वयोः शद्धसामान्यरूपव्वम्‌ । 
ननु चान्न प्र्तुतस्याप्रस्तुतेनापह्वबः क्रियत इति किमयसपहतिरेव न भवतीत्याज्ञ 
इथाह--न चेयभित्यादि । अविभाग्यतां गताः इति, अर्थादुक्तेः ॥ 
प्रस्तुतस्य इत्यादि । प्रस्तुतस्य = प्रस्तुत = उपमेय । अप्रस्तुतेन = अप्रस्तुत = उपमान । 
साधारणगुर्णो की त्रिरूपता याँ स्वतः सिद्ध है। साधारण गुर्णो की अनुगाभिता का उदाहरण 
यह्‌ हे- 
“गोव की महिलाओं के निमे कान्ति वाल सुर्खो के बीच चन्द्र का पूर्णं मण्डल जहोंराहुको 
दिखाई नहीं पड़ता । 
यहो निम॑लकान्तित्व' धमं उभमयानुगत रूपसे एक बार कहा गया । यलग-अल्ग कथन का 
उदाहरण यथा-- [पूर्वोक्त] “अभेदमूढ ० पच । इसमे स्तवक भौर स्तनो मेँ विस्वप्रतिविम्बमाव है तथा 
लुक्ितत्व ओर नतितत्व मे श्युदढसामन्यधमेत्व । [ शंका ] यदि यँ प्रस्व॒त को अप्रस्त॒तके द्वारा 
छिपाया जाता दहै तो इसे अपहति अल्कार ही क्यो न मान लिया जाता ध्टेसी राका उठाकर कहते 
हैन च श्व्यादि। अविभाभ्यतां गताःः-सुञ्च नहीं पडती = अथात इस प्रकार अभेद का 
ज्ञान शब्दसे दही करा दिया गया हे। 
विसक्--इतिहदास- 
हस मलङ्कार को सामन्य नाम तो मम्मट की दैन है किन्तु यह अलंकार अप्त 
आपमें कल्पना रुद्रटकी। रुद्ररने इसे तद्युणक्रा एक मेद माना है। उनका एतत्ंवंन्धी 
विवेचन इस प्रकार है- 
"यस्मिन्नेकयुणानामथानां योगलक्ष्यरूपाणाम्‌ । 
संसग नानात्वं न लक्ष्यते तद्गुणः स इत्ति ॥ ९। २२॥ 
जहां ८क हो युण वाङे पदाथ का संबन्ध होने पर स्वरूपतो दिखा दे, पर उनका पाक्य 
प्रतीतन दहो तो वह तद्गुण कहरता हे । उदाहरण-- 


नवधोतधवल्वसनादचन्द्िकया सान्या तिरोगभिताः 
रमणभवनान्यश्द्ग सपन्त्यभिसारिकाः सपदि ॥ ९।२३ ॥ 


६३४ अल्ङ्ारसवेस्वस्‌ 


(नवीन धुठे धवल वल्न पदिने गौर सान्द्र चोँदनी मं छिपी अभिसारिका निःशंक होकर भपने 
प्रिय के धर रिति पर्व जाती दे" निध्ितदही रुद्रटको वामन द्वारा अतिश्चयोक्ति के किण 
उद्धृत पय 'मल्य॒जरस्र०' से यद तद्गुण सृह्लाहोगा । मम्मटने रुद्रट के उदादरण से उसका 
मूलभूत पय (मल्यज० तो खोज निकाला किन्तु उसे सूञ्ञे अल्कार को तद्गुण से अभित्त 
मानना उचित नदीं समन्चा। उन्दने रुद्रटके ही मौल्िताक्कार कौ करपना से मिलती जुलती 
सामान्य की कल्पना की ओर उसका स्वतन्त्र लक्षण वनाया। विमरिनीकार ने मीलित 
प्रकरण के आरम्भं उसे उद्धृत कर दिया दहै। किन्तु रुद्र जेसी सूक्षमेकिका उनके लक्षणसे 
प्रकट नहीं दोती। रुद्रटका यद्‌ कुना एक सुक्ष्म मनोवेन्नानिक सत्यदहे कि यहां वस्तु 
स्वल्प तो प्रतीत होता है, वस्वगत नानात्व नदीं" । कदाचित्‌ विमर्चिनीकार को इसीतते प्रेरणा 
मिली हे भौर ऊर्न रत्नाकरकार कै खण्डन मेँ कुछ रेसी दी तकप्रणाी अपना हे। 
सव॑स्वकार का विवेचन भम्मट की सामान्यकारिक्रा पर प्राप्त वृ्तिसे कफो प्रभावित दहे। 
मम्मट ने वृत्तिम लिखा है-- 

'अताद्श्चमपि तादृशतया विवक्षितं यत्‌ अप्रस्वुताथैन संशृक्तमपरित्यक्तनिजयुणमत्र तदेकात्म- 
तया निवध्यते तत्‌ सामान्य युणनिवन्धनात्‌ सामान्यम्‌ । 


-जो प्रस्तुत वस्तु जिसके समान नदींहै उते उप्ते समान वतलनेके लिए अप्रस्तुत 
वस्तु के साथ उसका अपना स्वरूप विना छ्ुडाए एकरूप वतलाया जाता ई वह सामान्य गुणों का 
उर्टेख होने कै कारण सामान्य कदलाता दै । यहां अपरित्यक्तं निजस्वरूप = अपना स्वरूप पिना 
छोड" पद मीलित से सामान्य का अन्तर करनेकेकलिषएही दिया गयादहै। मीखितिमें वत्तु का स्वरूप 
भी तिरोददितदहो जाता दै ¦ उदाहरण कै रूपमे 'मलयजरसविलिप्त०ः पद ही मम्मटने दिया था। 

रत्नाकरकार का दृष्टिकोण इस विषयमे स्पष्ट दीदहै। वेते मीलति कोडही एक विधा 
मानते हँ । मीलितव्रकरण मे उनका मत द्विया जा चुका है, 

अप्पयदीचित = "सामान्यं यदि साद्ररयाद्‌ विद्योेषो नो पक्ष्यते । 
पञ्चाकरप्रविष्टानां सुखं नालक्षि युवाम्‌ ॥ 


सद्रदय के कारण यदि मेद दृष्टिगोचरन होतो सामान्य । उदा० कमल्समूह्‌ से भरे तालाव में 
प्रविष्ट इन्दरिर्यो के सुख दिखाई नी पड़े ।› 


पण्डितराज--प्मत्यक्वविषयस्यापि वस्तुनो बल्वत्सजातीयग्रहणकतं तदिभन्नत्वेनाग्रहुणं 
सामान्यम्‌ ॥ 

भरत्यश्च दिखाई देती वस्तु का वलवत्तर सजातीयकेक्षान के कारण उससे भिन्न रूपसे 
ज्ञान न होना सामान्य कहलाता है । 

विश्वेश्वर = खुणसजातीय युणाश्रयैकरूप्यं तु सामान्यम्‌ । अपने धुरो के समान गुण 
वाले के साथ एकरूपता सामान्य कदलाती ह । | 

मीलित ओर सामान्य का अन्तर मुख्यतः प्रस्तुत के स्वरूप के बोध पर निर्भर दै। मीलित 
मे वह अप्रस्तुत 9 स्वल्प के रूपमे ही मासित होता है जन क्ति सामान्य में स्वसरूप मेँ ही । 
मीलिते प्रस्वतके स्वरूपका बोधन ह्योनेका नभिप्राय विमर्चिनीकार के अनुसार प्रस्तुत 
के विदिष्ट रूपकाबोध नद्येना है। सामान्यरूपे तो उसके स्वरूप काबोध दोतादीदहे। 
रुदरट के विवेचन से यद तथ्य वदत ही स्पष्ट ३। रत्नाकरकार, अप्पयदीक्षित, पण्डितराज ओर 
(वरवे श्वर पण्डित के लम्बे रम्ब विमो का तात्प केवल इतना दी ह । 


तद्गुणालङ्कारः ६२५ 


यहाँ चक्रवत्तीं कौ सामान्यकारिका हस प्रकार है- 
्रस्तुतस्यःन्यतादात्म्यं सामान्यं युणसाम्यतः । 
रुणसाम्य के आधार पर प्रस्तुत का अप्रस्तुततादालम्य सामान्यं कदलाता है । 
[ सदेस्व ] 
[ घ ७२ ] स्वगुणस्यागादत्युत्कृष्टयुणस्वौकारस्तद्गुणः । 

य परिन्नितशुणस्य चस्त॒नः खमीपवतिश्ङ्ष्टवस्तु पुणश्य स्वीकरणं स 
तद्गुणः । तघ्योच्छृष्गुणस्य गुणा अस्मिनिति कत्वा । न चेदं मीलितम्‌ । 
तज हि प्रकृतं वस्तु बस्त्वन्तरेणाच्छादितत्वेन प्रतीयते । इद त्वनपद्वतस्वरूप- 
मेव प्रकृतं वस्तु वस्त्वन्तस्गुणोपरक्ततया प्रतीयत इत्यस्त्यनयोभेदः । 


यथा -- 
'विभिन्नवणा गरुडाग्रजेन सूयंस्य रथ्याः परितः स्पुःरन्त्या । 
* ध ठ 
रत्नैः पुनर्यन खवा खच स्वामानिन्यिरे वंदाकरीरनीले; ॥' 


अन्न रविर्थाश्वानामरूणवणेस्वीक्षारः, तस्यापि गारत्मतमणिप्रभा- 


स्वीकार इति तद् शुण्त्वम्‌ । 
[ सूत्र ७३ |] अपने बुण के स्यागसरे अस्युछृष्ट वस्तु केगुणका स्वीकार तद्गुण 
[ नामक अरूंकार कहराता हे | ॥ | 

[ वृ० ] “जितप्त [ अलकार | मेंन्यून युणवाली वस्तु समीपस्थ उत्कृष्ट गुण वाली वस्तु के 
गुण अपनार वह तद्गुण कहलाता है, तद्‌ यानी उस उक्कृष्ट के गुण है इसमे--इस व्युत्पत्ति 
के आधार पर। यदं मौक्िति नदींहे। वहं प्रकृत वस्तु अन्य = अप्रकृत वस्तु के द्वारा टंकी 
हृदं प्रतीत होती है, यहां उसके विपरीत प्रकृत का स्वरूप प्रकट हयी रहता है। केवल वह अन्य 
वस्तु के युर्णो से रंगौ भर प्रतीत होती है। श्स प्रकार इन दोनों मँ महान्‌ भेद है, 
उदाहरण; यथा-- 

“जिस [ गिरनार पवेत | पर अरुण की लले से अन्य वणैके हुए सूर्या बाँस कौ पौर 
के समान इरे कच्च रत्नां द्वारा चारों ओर विखरती प्रभासे पुनः जपने [हरे] वणं को प्राप्त 
करा दिए गप ये[ माधकाव्य || ¦ | 

यँ सूयं के अरव पहले अरुण का वणे स्वीकार करते है जौर वह [अरुण ] भौ गारुतत 
[ मरकत ] मणि कौ प्रभा स्वीकार करता है । इसलिए यहोँ तद्गुण हआ ॥° 


विमरिनी 


स्वगुणेत्यादि । परिमितेति । स्वीक्रिय माणस्य गुणस्वाभावात्‌। तस्तंभवादेव चान्यस्य 
प्रह्नष्टगुणस्वस्‌ । समीपवरतीस्यनेन गुणग्रहणे योग्यस्वक्तम्‌ । अस्मि्चिति । परिभमितगुणे 
प्रकृते । अतश्च नत्व्लज्ञामान्नम्‌ । ननु च मरङ््टयुणेन परिभितगुणस्य तिरोधानान्मीखित 
मेवाय कि न भवतीर्या्ङ्कयाहं -न चेत्यादि, आच्छादितत्वेनेति । अपह्‌ तिस्वखपत्वे. 
नेव्यथंः । उपरक्ततवेति । विशजिषटसवेनेव्यथंः । तस्येति । आदणवर्णस्य । अपिः ससुखचये ¦ 
यथा बा- 


दददे अलङ्कारखवंस्वम्‌ 


इन्दू दयश्चन्द्‌ नमिन्दुवक्न्रा चेन्नस्तवेस्यादि सदाय संपव्‌ । 
वपुश्च श््गारमयं ख मन्ये संतापकस्स्वं हरवद्धियोगात्‌ ॥ 
अघर हरवद्धिगुणस्य संतापकस्वस्य स्वीकारः ॥ 
स्वगुण इत्यादि । परिमित०--जित्त युग को अपनाया जारा है उसका अपनाने वाली 
वस्तु मेँ अमाव होने से। भौर उसी के सदूमाव से अन्य वस्तु मी प्रकृष्ट गुणवालौ दरं खमीप- 
वर्ती कदकर गण अपनाने की योग्यता वतङाईं ¦ 
अस्मिन्‌ = इसमे = परिमित = न्यून गुण वाली वस्तुर्मे। इस कारण य्ह केवर संक्ञामान्न 
नदीं है। प्रकृष्ट गुणवाली वस्तु से न्यून गण वाली वस्तु का तिरोधान दोने से य्‌ मील्तिही 
क्यो नीं माना जाता-[ सैसा कि सरस्वती कण्ठामरण म महाराज मोजने माना हं ] पेसी 
का उठाकर कहते हैन च इत्यादि । आच्छादितत्वेन आच्छादितरूप से जो कि अपहूति 
का स्वरूप है। उपरक्ततया = रगे हृए रूप मेँ = उसत्ते विशिष्ट रूप मं । तस्य उसका = अरुण का! 
अपि=भी यदो समुच्चय अर्थमेंदै। दूसरा उदाहरण यह दे- 
हे काम ! चन्द्रोदय, चन्दन, चन्द्रसुखी, सत्र इत्यादि तुम्हारी सदायकं सामयी है ओर तुम्हारा 
स्वयं का हरीर श्ंगारमय दहै । रेपे त॒म जो स्ताप पर्टुचाते हो वह कदाचित्‌ शिव कौ नेत्राग्नि 
के संपकं से)? [ रत्नाकरकार द्वारा तद्गुण के लिए उद्घरृत | ॥ 
य्ह दिवनेत्रारिनि का संतापकत्वकूपी गुण अपनाया गया ॥। 
विमक्ञं--श्तिहास-- 
पले कहा जा चुका दै कितद्गुणकेप्रथममेदकेलूपमेंरुद्रटने जिस अभिव्यक्ति का सग्रह 
किया था उते मम्भटने सामान्य नामदियाहै। रुद्रटने तद्युणकानजो दूप्तरा मेद खोजायथा 
उपे मम्मट आदि ने तद्गुण नामस्ते दी अपनाया । दूसरा मेद यहदहै-- 
“असमानगुण यरिमन्नत्तिबहर् गणेन वस्तुना वस्तु । 
संख तद गुणतां धत्तेऽन्यस्तदगुणः स हति ॥› ९।२४ ॥ 
--जिस { अल्कार | मे असमान गुण वाली वस्तु अधिक्रगुण वाली वस्तु से मिलकर उसी का 
गुण अपना ठे वह दूसरा तद्गुण कदलाता दै । उद्राहरण- 
“कुव्जकमालापि कृता कात्तस्वर भास्वरे त्वया कण्ठे । 
एतत्प्रभानुलिष्ता चम्पकदामश्रमं कुरुते ॥ ९।२५ ॥ 


-भ्रिये ! तूने सोने से चमकीले गेम जो माला पहनी है वह कुब्जक माला होने परमौ 
उस [ गले ] की प्रभासे लिप्त होकर चम्पक मालाका भ्रमकरारहीदहे। 
उदाहरण से स्पष्ट है वि रंद्रट का तदगुणसम्बन्धौ संस्कार बहुत ही स्पष्ट ओर पृण है । 
मभ्मट = स्वसम॒त्सञ्य गुण योग।दत्युञ्ज्वलगुणस्य यत्‌ । 
वस्तु तद्गुणतामेति अण्यत्ते स तु तद्गुणः ॥ 
अधिक उज्ज्वल गुण वाले पदाथ के संपक से जदं कोड वस्तु अपना गुण छोड़कर उसी के गुण 
से युक्त हो जाती है उते तदगुण कहते है । उदाहरण--विभिन्नवणः०' पद्य द्वी । इस उदाहरण 
सँ गर्णो के त्याग ओर परिथद की धटनादो बार आद हैजवकिरुद्रटके उदाहरणम केवल एक 
बार । किन्तुरुद्रटके पथमे शुद्ध तद्गुण है। मम्मट द्वारा उदुधृत प्म गिरिनार को ऊँचा 
सतिदायोक्ति किए दहै। सर्वस्वकार का इस पच्य की संगतिर्मे रत्नों को गारत्मतमणि के समान 
बतलाना असंगत है । गारुत्मत मणि का वण लाल माना जाता है, हरा नदीं । बाँस की पौर ओर 
सूयं के अद्व हरे रंग के किष दी प्रसिद्ध दै! सू्य॑को हरिददव, दयेव कदा जातादहै। भले दी 


अतद्गुणाल्ङ्कारः ६२७ 


यहो हरे का अथं नीलादह्ो जेसाकि संस्कृत क्वियांमे देखा जाता है, परन्तु खारू नहींहो 
सकता 1 संजीविनीकार ने मी गारुत्मत के स्थान पर मरकत पाठ माना है, 
रष्नाकरक्ारने न केव रंगके हं, अन्य गणोंके सवेस्वकारमें मी तद्गुण माना है। यह 
उनकी व्यापक इष्टि का प्रमाण है ¦ उनका रक्षण ह~ 
“अन्यधम॑स्वीकारस्तद्गुणः ॥ ९७ ॥ 
अन्यु कै धमं का स्वौक।र करना तद्गुण ॥` उनने स्पष्ट कियादहैकषि यह तमी संमव हे जव 
अपने गुण का त्याग किया जाए, अन्यथा दोनो कै विरोधी गुणों मे विरोध उत्पन्न होगा । इस प्रकार 
स्वगुणत्याग को लक्षण मेँ स्थान न देने से मौ रत्नाकरकार का वेदग्ध्य व्यक्त है। उदाहरण केरूप 
म उन्दने 'विभिन्नरवगौः'० से ही भिल्ता माधकाही ४।२६ प्य मी उदप्रत किया है यथपि उसमे 
पदाथनिदश्ना प्रव है, ओर विमरिनी मे गृहीत *हन्दूदयः प्य भी । 
अप्पयदौल्ित 
"तद्गुणः स्वगुणत्यागादन्यदोयगुणग्रहः । 
पद्यरागायते नासामोक्तिकं तेऽधरत्विषा ॥ ' 
जपते गुणका व्याग कर अन्यके गुणका ग्रहण तद्गुण कडइराता हे। यथा- तुम्हारे अधर 
की कान्तिसेनाकका मोती पद्यरागका कायं कर रहादहै' 
पण्डितराज्ञ = ‹स्वगुणत्यागपूवेकं स्वसन्निहि तवस्स्वन्तर सम्बन्धि गुणग्रहणं तद्गुणः ॥› 
सपना गुण त्याग कर अपने पासके किसी अन्य पदार्थं के ग॒णोंका ग्रहण तद्गुण क्‌- 
लाता, 
विश्वेश्वर = परकीयगुणतिरोदहितगुणस्य मानं तु तद्गुणः प्रोक्तः ॥ 
अन्यके गुर्णो से चिषे गर्णो वाले पदा्थका ज्ञान तद्‌युण कदा गयाहै। उदाहरण केरूपमें 
एक रंगसे दूसरे रप के रंजित होने कौ घटना से युक्त पथतो विदवेदवरने दियाहीहै, इसे 
अतिरिक्त रत्नाकरकार द्वारा अन्यगुणोँ कै ग्रहण करने का उदाहरण भी उन्होने दियाहे। 
चक्रवती कौ निष्कृशटथैकारिका यह्‌ है- 
-- "तद्गुणः स्वगुण्त्यागदुक्कृष्टस्य गुणग्रहः ॥ 


[| सखवेस्व | 


[ घ्० ७४ ] सति हेतौ तद्गुणाननहारोऽतद्गुणः । 


तद्गुणप्रस्तावात्तद्विपययरूपो ऽतद्‌ गुण उच्यते । इह न्यूनशुणस्य विरि 
गुणपदाथधममैस्वीकारः प्रत्यालस्या न्याय्यः ! यदा पूनरत्कष्टगुणपदाथं- 

सन्निधानाख्ये हेतो सध्यपि तद पस्योत्कृटगुणस्याननुहरण स्युनशुणेनानजुवतेनं 
भवति सोऽतद्‌शुणः । तश्योच्कृरगुणस्यास्मिन्णुणा न सन्तीति । यद्वा 
तस्याप्रकृतस्य रूपानहारः सव्यज्हरणहेतो सोऽतद्गुणः । तस्याग्रङतस्य 
गुणा नास्मिन्‌ सन्तीति एत्वा । क्रमऽ, यथा ~ 

“धवलो सि जह वि खुन्दर तह वि तुए मज्ज रज्ञं हि अञं । 

साभभर्पि वि हिअप हअ णिदित्तो ०, स्ततो खि \ 

"गाङ्गमम्बु सितमम्बु याञयुनं कञ्जलाभप्रुभयन्र मज्जतः । 

राजहस तव सेष श्ुथ्ता चीयते न च न चापचीयते \, 


६३८ अच्छज्ारसवंस्वम्‌ 


पूवेत्रातिरक्तहदयसंपकोन्नायकस्य घवटश्ब्दवाच्यस्य प्राप्तमपि रक्तत्वं 
न निष्यच्चचिव्यतद्‌ प्रुणः। उत्तरन्नाधरङतस्य गाङ्गयामुनजखक्य संपकऽपि 
न तथारूपत्वमिव्ययमष्यतद्गुण पव  [ “धवल्छोऽसीति यत्‌ तत्‌ तद्गुण 
पव - 1 कायंक्ारणभावस्य च! चविवश्चणाच विदे शक्व्यटःकारावक्ाल्ः। 

[ सू० ७४ ] कारण विद्यमान रहने पर भौ उसके गुग का अन्घुकरण न होना [ जतु. 

गुण { अरंकार कंहलाताष्े | ॥ 

[ वृ० ] तद्गुण का प्रसंग चर रहा था मतः उसका उल्टा भतद्गुण उसी के वाद्‌ बतलाया 
जा रहा है सामान्यतः कम गुण वाले पदार्थं केद्वारा विशिष्ट गुण वाके पदाथ का संपकं होने 
प्र उसके धर्मं अपनाए दी जतत, किन्तु जब उत्कृष्ट गुण वाङ पदाथंके सन्निधानरूपी हेतु 
के रहने पर मी उस्र [ हेव॒रूप उक्कृष्ट गुण वाले पदाथं ] के उच्छृष्ट गुणो का न्यून सुण वाक पदार्थ 
के द्वारा अनुकरण नदीं फिया जाता तव उससे युक्त उक्ति को अतद्गुण कदा जाता दे । यद्‌ 
नाम श्सलिए कि इसमे यद व्युत्पत्ति अन्वित होती हे-- (तत्‌ उस = उक्छृष्ट युण वाके पदाथेके 
गण इस [ न्यूनगुण पदां ] मे नदीं दै! इसकी दूसरी व्याख्या यह दहो सञ्ती है - “उस अप्रहत 
वस्त॒ के रूथ का अलकरणदेल वियमान रहने पर भी अनुकरण जिसमें दो वह्‌ [ प्रेत पदाय ] 
अतद्गुण । इस पक्ष में व्यु्पत्ति दोगी तत्‌ = उस अप्रकृत वस्तु के गुण दस्मे नदह [ रेसी 
रहत वस्तु ] । दोना के क्रमाः उदाहरण = 

८धवलोऽसि यद्यपि खन्दर तथापि त्वया मम रजित हृदयम्‌ । 
रागमरितेऽपि हदये उभग निदितो न रक्तोऽसि।' 

हे सुन्दर ! तुम धवल वर्णं के हो तथापि तुमने मेरा हृदय रक्त [ छार ओर अनुरागयुक्त | 
कर दिया दै \ तुम स्वय मेरे रागपूणं हदय में निदितददोतवमौ रक्त नदींदो। 

दे त्रिवेणी के राजंस ! गङ्गाका जक सफेद देँ यसुना कज्जकाम दयाम ! तुम दोनो 
गोत लगात्ते हो, परन्तु तुम्दारी शुञ्चता वही कौ वदी दहे; न वह वदती न घटरती 1" 

[ इन उदाहरणं मे] प्रथम में अत्यन्त रक्त हृदय के संपकं से धवलश्चन्द से कथित नायक 
म रक्तता आनी चाहिए परन्तु वहन आ सकरी अतः तद्गुण हमा गौर दूरे मेँ गंगा यसुना 
मे जल रूपी अप्राकरणिक पद्राथंके संपक रने परभी उनका सा सूप [दंस में] नदीं 
बतलाया गया अतः यह मी अतद्‌गुण ही हुजा । धववकोऽसि'--यद जो कथन है वह्‌ तदगुण-- 
रूप ही है । यद्यं कार्यकारणमाव की विवक्षा नदीं रहती अतः विशेषोक्ति [गौर विषम।रंकार-] 
की प्राचि यहाँ संभव नदीं है ॥' 


विभदिनी 


सतीत्यादि । तद्विपययेत्ति । तत्र हि प्रस्थाश्चच्यान्यगुणग्रहणन्युच्छस्‌ । इद सु योश्यताया- 
मपि न यद्‌ ्रहणम्‌ । प्रत्यासत्येति । विगप्रङ्ष्टस्य दन्य गुणस्वीकाराञुपपरत्तिः । यडा व्वेतन्न 
वति तदाथमटंकार हव्याह - यदेत्यादि । उस्करृ्टगुगस्येष्यनेन उयाख्यान्तरे इयोरपि 
गुणव्वं सूचितम्‌ । एवं च म्राप्तेऽप्यन्यवणस्वीकारे तद्‌ मावोऽयमङंकारः। यहुक्तम्‌- 
"तद्भुपाननुहारशद्स्य तरस्यादुतदूगुणः" इति ॥ अस्मिन्निति । न्यूनगुगे । यद्धेति पक्षान्तरे । 
प्रकृतस्येति ¦ भनबुहरगीयगुगस्यान्यक्ष्य । तदेदं ध्याख्यानद्भवेनास्य प्रकार्य दशितम्‌ , 
अननुहरणाश्यस्य सामान्यस्यानुगमाव्‌ । अतिरिक्त्वेनाध्यु्ृषटगुणस्वं हृदयस्य दशितम्‌ । 


* 
1 

= +> "क त. ॥ 4 र 
"क "क्का # अन्वा = ऋ ऋ ऋक त > >, 


अतद्गुणाडङ्गारः ६३९ 


अयमपीति । समानगुण्स्वेनापीव्यथः । ्ववलोसीत तत्तद्गुणः एदेति अन्थकदे श्तु कचि- 
रङेखकेः छटिपत दस्युपेचय एव पुस्तकान्तरेष्वस्यादृषेः । न च गाथाव्याख्यानं मस्तुतं 
येनात्राङंकारान्तरस्यापि ग्याख्यानं स्यात्‌ । नाप्यत्र तद्गुणः! तस्यहि स्वगुणव्याये. 
नाप्यन्यगुणश्वीकारो छ्चगम्‌ । न चान्न स्वगुणव्यागो नाप्यन्य वुणस्वीकारः । तस्य 
धवकूत्वभ्यभिचारात ¦ कि सवत्र कारणाभवेऽपि कार्योष्पाद्‌नाद्विभावना, न तु विरूप. 
कायोंहपस्या विषमारुंकारः । तत्र हि कार्थंकारणयोिंरूपस्वेऽप्य बाध्यमानतया प्रतीतिः । 
इह स्वकस्य बाभयमानतयेति महान नयोभंद्‌ः । नन्वत्र सत्यपि कारणसामग्रयेऽन्यपुगा- 
लुदाहर गरूपश्य कायंस्यानु्पत्तेः किमयं विरोषोद्िरेद न भद तोच्याश्चद्याह-कार्यत्यादि । 
सविवक्षणादिति । वस्तुतस्तु संभवस्येव कायकारणभावः । अत पएवारंकारसारङ्कता विज्ञ 
षोक्स्यन्तभाव एवोक्तः ! मन्थता त प्राच्यानुरोधाद्वदितः । “विषमाछंकार -- इति 
पाठस्तु पुस्तकान्तरेष्च स्थितोऽप्यत्नायुक्तः । न हि कायंकारगभावविवक्तामात्रेणान्न तक्वं 
स्याद्येन तद्चिषेधेन तत्यानवकाशः । तस्य हि विरूपस्य कायंस्यानर्थस्योत्पत्तिश्च ङक्तणस्‌ । 


सतीत्यादि । तहिपयेयेति-उस तद्गुण का उल्टा = उसे समन्निष्य के कारण अन्यक 
गुण का ग्रहण वतलाया गया हे, जव कि यहं योग्यता रहने पर भी उसके [ अन्यके ]गुणका 
यहण नहीं बतलाया जाता । प्रव्यास्र्या = सन्निधि = जो दूरवतत्तीं होगा उप्ते गुण का यहण 
संमव नदीं होगा । जव यह्‌ [ अन्यके गुणका रहण ] नदीं होता तव यह अलारं होता है" 
यह्‌ वतलाते है--यदा०। उच्टरष्टगुणस्य इसकी दूसरी व्याख्या मेँ दोनों का गुणत्व [ अप्रधानत्व 
ओर केवर गरणा का प्रघानत्व ] वतलया । इस प्रकार अन्यके गुणका स्वीकार करना प्राप 
होने परमौ वसान होना यह अल्कार ह । जेसाकि [ सम्भर ने ] कदा है-- स [ प्रस्व॒त ] के 
दवारा उस [ अप्रस्तुत |के गुण का अकरण नहो तो अतद्गुणः) अस्मिन्‌ = इसमे अर्थात्‌ 
न्यू नगुणवल्े पदाथ मे । यद्वा = यह भन्य पक्ष उपस्थित करने के लिपि कदा । अग्रङ्कतस्य = 
जिसके गुणों का अनुकरण नहीं करना होता उस अन्य वस्तुका। इसप्रकार दो व्याख्यां 
दारा इस अकार के दो मेद दिषखलाप । इन दोनों मे अननुहरणोयतारूपी गुण समानरूप से 
रहता है । अतिरिक्त बताकर हरय मे उककृष्टगुणत्व बतलाया । अयमपि = यद्‌ मी गुणगत 
समानता के आधार पर भी । "धवलोऽसि यदमी तद्गुणदहीहैः यृहजो अहै इसे छिपिक्नासें 
ने कदी-क्ीं जोड़ दिया है, यह सवरथा त्याज्य है, क्योंकि अन्य प्रतिं मे यह नहीं मिल्ता। 
यँ शस गाथा की व्याख्यातो कीज नहींरदी कि उ्तपें अन्य अलंकार भो व्याख्या को जाए) 
फिर यहं तद्गुण हे मी नदीं । उसकरातो लक्षण अपना गुण स्यागक्र अन्य के गुणको 
अपनानाः दै। ओर यहोंनत्तो अपने गुणका स्यागदहै ओरन अन्यके गुणका अपनाना। 
रेसा होता तो नायक में धवरुत्व न रहता । यहांतो कारणका भमाव रहने परमभी कार्यकी 
उत्पत्ति दिखलाने से विभावना हे न कि विपरीत रूप वाके कायं कौ उत्पतन्ति [ धवल से रक्तत्व की 
उत्पत्ति ] के कारण विषमाल्कार । उसमें तो कायं ओर कारणम रूपगत विपरीतता रहने पर 
आओ उन दोर्नो की प्रतीति अव्राधित रूपसेदही होती रहती है। जवकिं यहां एकः बाधितं कूप से 
श्रतीत होतादहे। इस प्रकार इन दोनों [ विषम भौर विमावना ] से महान्‌ अन्तर है । "यदि यँ 
सारे कारण उपस्थित रहने प्र भौ अन्यके गुण का अनुकरणरूपी काय उतपन्न नदीं होतातो इते 
विशेषोक्ति कयां नहीं मान छिव जाता' एसी शंका उठाकर कते हे--“कायं'-- इत्यादि । 
भविव उणात्‌ = विवक्षा भर नदीं रहती, वस्तुतः तो काय॑कारणभाव रहता ह $! इसीकि 
अलंकारसारकार ने इसका विशेषोक्ति मँ अन्तमांव दी दिखलाया है । अन्धकार ने प्राचीन 


६७० अटड्ारसवंस्वम्‌ 


आलंकारिकं [ मम्मट ] के अनुरोध पर इते अल्गदिखलायादहे। | विद्ेषोक्त्यल्कारः के स्थान 
पर ] "विषमःलङ्कार' यह पाठ तो, अन्य पुस्तर्को मेँ भिकने पर भी यां गर्त दे। कायेकारणभाव 
की विवक्षामाव से यदं विषमाल्ङ्कारत्व नदींदो सकता जिते किं उस | कार्यकारणभाव ] के 
निषेध से उस [ विषम ] को स्थान न मिले । उसका रक्षण तो भ्विपरीत रूप वाले कायंकी ओर 
अनर्थं की उत्पत्ति लक्षणे. 

विमर्ल- मन्थ समाधि के समीप है अतः कदाचित्‌ दीकाकार भी उव गणदे ओर संपादक 
मी । टीकाकार अतद्रणकीदो व्याख्या मे मेद विना दिखलापए भागे बद्‌ जति दे, ओर 
विषमालुंकार पाठको प्रौदिवाद द्वारा असंगत बतला विद्धषोक्ति पाठ का समन करते हें । 
संपादन मे मी यष्ट अश्ुदधियो की भरमारदै। दोना प्रकारो का अन्तर पण्डितराज जनन्नाथ 
ने इस प्रकार बतलाया है- | 

८अत्र शुणाग्राहकापेक्षया सन्निहितस्य 
तस्यायमाद्यः अपक्रष्ट-सम्बर्वित-युणाग्रह्‌ 


वेत्य पल्रष्टत्वेन तृतीयविधा तु न संमवति 1 
वगुण अ्रदणन करने वारे पदाथ को अक्षा सन्निहित पदाथैमे उक्कृष्त। ओर समताको 
छेकर अतद्गुणमें दो भेद होते । अपक्ृ्टके गुण का मर्णन करना तो लौकिक तथ्य 
हे अतः उसमे विचित्रता न रहने से वह अलंकारत्वश्ुल्य दी है अतः अपङ्रृष्ट के गुण के अग्रहण 
नं तीसरा प्रकार नद्दीं माना जा सकता। भ्ववलोऽसिः-गाथा मेहृ्दय राग को लेकर उत्कृष्ट है, 
जव कि "गाङ्गमम्बु, प्य मँ राजहंस गङ्गाजल को लेकर समान । 
विद्ेषोक्ति मै अतद्गुण के अन्तभाव काजो कल्प विमिनीकार ने उपस्थित कियाद) 
उनके पूरव रल्नाकरकार ने उसी को सिद्धान्त माना था। उन्दने ल्खाथा- 
'देतो सत्यपि नान्यस्य रुणानुदहरणं यदि । 
विद्ोबोक्तिरसाविष्टा न वाच्योऽपि द्यतद्‌्गुणः ॥ [ तद्‌ गुणान्त | 
देत्‌ के रदने पर भी यदि अन्यके गुणका अनुहरण नीं रहता तो यह विरेषोक्ति होगी । 
अतः [सामान्य के समान] अतद्गुण को भी अलंकार नहीं मानना चाहिए । रत्नाकरकार्‌ ने अतद्‌ 
गुण का कोई लक्षण नहीं मी किया । पण्डितराज नेमी ते विशेषोक्ति मे अन्तभूंत मानने की 
दाक्यता व दूरगामी समथैन कर दिया है। यह पिकद्प विदवेदवर की पुराणप्रज्ञासेभी 
टकराया हं । 


विमरिनीकार ने यहां विमावना की पुरजौर पहल्कीदै। यूतो विज्ञेषोक्ति की पष्रुमभी 
कीजा सकती है, क्योकि ये दोनों अलंकार एक दूसरेके द्वारा व्यंग्य होते हे। जक्ष विमावना 
वाच्य होती है वशँ विक्ञेषोक्ति व्यज्य होततीदै ओर जरा वह वाच्य ौती है वहां विभावना । 
विमरिनीकार ने यष विषमालंकार कीमी चचांकी है ओर अन्ततः यह कहा है कि इक 
स्थान पर विक्लेषोक्ति पाठ होना चाहिए । संजीविनीकार ने भी विद्दपोक्ति ही पाठ मानादहै। 
वस्तुतः वि्ेषोक्ति पाठ ही उचित है, क्योकि यह समग्र अतद्गुण के लिए उठाई गं आपत्ति 
हे अतः अधिक व्यापक ओौर आवदयकहै। विषमालंकार का प्रर्न केवर शधवलोऽसि०ः पद्य के 
ूर्वाधगत सीभित ै। उसम कारण धवल है नौर काये रक्त अतः स्ःकरस्पश्चै°' के समान 
विषम हय है । यचपि इसके खण्डन कै छि विमर्िनीकारने जो तकं दिया है वह्‌ अपुष्ट हे । विषम 
के समेन म यह का जा सकता है कि केवर कार्यगत गुणविपरीतता से ही विषमस्व निष्पन्न 
नरी हो जाता उसवे कार्यकारणभाव की मी विवक्षा अपेक्षित दै जो इस पूवाद मे नदींहै। वस्तुतः 


गुणवतः उत्क्ष्टत्व-समत्वाभ्यां देविध्यम्‌ इति सवसारः । 
गस्य स।द्‌जिकत्वेन वेचिच्यानाधायकत्वादनलङ्कारतै- 


उत्तराटङ्कारः ६७१ 


विषम का यह विचार यहो अनावरयक है क्योकि इसका संबन्ध पूर्वाधं से है, उत्तरां से नही, 
जव किं यहां अतद्गुण के लिए धवलोऽसि' गाथा का उत्तरां ही उदाहरण माना गया है। मम्मर 
ने भी इसके उत्तरार्धं को ही उदाहरण माना है। 

इतिहास--अतद्युण कौ कल्पना मम्मटने ही कीदहै। उनका लक्षण विमद्िनीकार 
नेदेदिया द ओर उदाहरण सवंस्वकार ने ही उद्धत कर दिर है । रत्नाकरकार का मत दिया 
ही जा चुका हे। 

अप्पयदीङित~-संगतान्ययुणानङ्गीकार माहरतद्‌ यणम्‌ । 

चिरं रागिणि मच्चित्ते निहितोऽपि न रज्जसि ॥" 

अन्य सम्बद्ध के गुण का अंगीकार न करने को अतद्गुण कहा दै । उदाहरण, मेरे रागपूण 
चित्त मे चिरकारु तक निहित रहकर भी तुम रक्त नदीं हए ।› भप्पयदीक्षितनेमी दवेस्वर्मे 
तद्गुण को विदषोक्ति रूप मान लिया है। | 

पण्डितराज--स्वगुणत्यागपूवंकं स्वसन्निदितवस्त्वन्तर सम्बन्धियुणय्रहणं तद्गुणः, तद्िपयंयो- 
ऽतद्‌गुणः । = (तद्गुणकरा उल्टा अतद्गुण।ः इस प्रकार अतद्गुणका लक्षण कर इसे विदोषोक्ति 
मेँ अन्तभूत मानने कौ संमावना पर विचार करते है ओर कों समर्थक समाधान नहीं दे पाते । 
उनका कना है किं अतद्गुण मेँमी कायंकारणभाव की विवक्षा रहती है इसका प्रमाणहै 
इसके लक्षण मं “अपि = मीः खाब्दःजो विरोध काक्ञापकरहै। विना कायंकारणमाव के विरोध 
संभव नहीं । 

विश्वेश्वर = “अन्यगुणासम्बन्धे प्रकृतस्यातद्‌ गुणः प्रोक्तः ।* 

अन्यके गुण का प्रक्रत के साथ सम्बन्ध न वतरने में अतद्गुण होताहे। इसी को वे वृत्ति 
के रूप मे इस प्रकार कते ह--स्वनिष्ठगुणस्यान्ययुणनिष्ठप्रतिवन्धकतानिरूपितप्रतिवध्यता- 
नाश्रयत्वेऽतद्गुणः \' 

विदवेरर पण्डितराज के उक्त तकं का समाधान इस प्रकार देते हे-कारणसत्वे कार्यानु- 
त्पत्तिसताम्येऽपि यत्रामावप्रतियोगितावच्छेदकस्य तद्धमांवच्छिन्न-कारणतावच्छेदक-प्रतियोगि- 
कायंतावच्छेदकत्वे विवक्षितं तत्र॒ विदोषोक्तिः, यत्न त्वभावप्रतियोगिनस्तन्निष्टकारणतानिरूपितः 
कायंताश्चाङित्वं तत्नातद्‌गुण इत्ति विभागात्‌ । 

चक्रवत्तीं कौ निष्छृष्टाथकारिका भतद्गुण पर इस प्रकार है- 

“तद द्रपाननुदहारस्त॒ हेतो सत्यप्यतदूगुणः ।? 

पाठान्तर~-धवलोऽसीति तत्तदयुण एवः हस्र पंक्ति को विमरिनीकार प्रक्षिप्त मानतेहे। 
संजी विनीकार इसे धवलोऽसीत्यतद्गुणः' इस रूप म पदृते है । वस्तुतः यष्ट अनावदयक हौ 
है । इस पर संनीविनीकार के तकं मान्य हैं । 


[ स्वंस्वं | 
[ घ्च० ७५ ] उत्तरात्‌ प्रहनोन्नयनमसकृदसंभाव्यञुत्तरं चोत्तरम्‌ । 
याच पनिवध्यमानोऽपि प्रदन उपनिबध्यामानादुतच्तरादुन्नीयते, तदे. 


कमुत्तरम्‌ । न चेदमुमानम्‌ । पक्षघमेतदेरचद्‌ देशात्‌ । यत्र च प्रश्न 
पूवेकमसभावनीय घ्ुत्तर, तच्च न सरत्‌ तावन्मात्रेण चारत्वाप्रतीतेः । अत 


४१९ अ० सण 


७२ अलड्ाःरसवंस्वम्‌ 


ञ्धाखङ्न्निबभ्ये द्वितीयमुत्तरम्‌ । न चेयं परिसंख्या व्यवच्छेयञ्यवच्छेदक- 
परत्वाभावात्‌ । कमेण यथा-- 


"एकाकिनी यद्वद्ा तखूणी तथाह 
मस्मद्‌ गे गृह पतिश्च गतो विदेशम्‌ । 
क याचसे तदिह बवाखभियं वराकी 
प्वश्चममान्धवधिरा नलु मूढ पान्थ ॥' 
"का विसमा देवग कि छदं जं जणो गुणग्गाही । 
कर सोक्लं शकलठनत्तं किं दुक्खं जं खलो च्रोओ :° 
पूवे मम वासो दीयतामिति भष्न उत्तरा दुन्नीयते । उनत्तर्् दैवः 
गत्यादिनिगृूढत्वादखभाञ्यमखरृत्प्रशनपूवंकशु त्तरं निबद्धम्‌ । 
( सूत्र ७५ ] उद्तर से प्रश्न की कष्पना त्था असंमाञ्य अनेक उत्तर उत्तर [ नामक 
अच्ङ्कार कटरूते हँ | ^ 
[ ठृत्ति | जिस [ प्रकार] में प्रदन कदा तो नो जाता परन्तु कदे गए उत्तर से उसकी 
कस्पना कर खी जाती ह वद एक प्रकार आ उत्ततलंकार हा । यद अनुमान नहीं होता क्योकि 
श्समं [ अनुमान कै लिए पक्षित ] पक्षधर्मता आदि [ अनुमानसामग्री ] नदीं रहती । 
श्सौ प्रकार प्ररन करते हए उप्तका भसंमाव्य उत्तर दिया जाता दहै, किन्तु केवल एक दार नी, 
क्योकि उतने से चारुता निष्पन्न नहो होती, अतः अनेक वार वैसा किया जाता है तो वह उत्तरा- 
ख्कार्‌ का दूसरा प्रकार होता है । यदह परि्तख्या नर्दी दो सक्ती, क्योकि यदह ज्यवछेयव्यच्छेदक- 
भावम्‌ तात्पयं नदीं रहता । क्रम से उदाहरण, यथा - [ प्ररन से उत्तर की करपना | 


भधर में अकेली, मवला भौर नशे उमर कीद्ं। धघरवाला विदेश्च चला गया ३। 
यह विचारी सास अन्धी ओर वदरी है । अतः निवास कीया 


व. चना किससे कर रहे हो | पथिक तुम 
का विषमा देवगतिः किं लभ्यं यञ्जनो युणग्राह्यो । 
। कि सोर सकलं करं दुःखं यत्‌ खलो लोकः ॥ 
~ 0विषम क्या है, दैवगत्ति; प्राक्च करने योग्य वस्तु क्या है, गुणग्रह्यी जनः; सौख्य क्या है, 
शओोभन पत्नी; दुःख क्या हे, खल लोग । 
ः ९८4 ते प्रथमम भुञ्चे रहने का स्थान दोः यद्‌ प्ररन उत्तरवाक्य से निकलता है दूसरे 
1 आदि उत्तर, जो निगूढ होने के कारण असंभान्य &, प्रन पूवक अनेक वार्‌ उपनिबद्ध 


किया गया है ॥ 
विमरिनी 


उत्तरादित्यादि । उन्नीयत इति । प्रश्नरूपस्वेन संभाभ्यत इष्यर्थः । ननु चाप्रतीतस्य 
परत्यायनाक्किमिद्मनुमानं न मवतीस्याशङ्कयाह--न चेदभित्यादि । असंमावनीयमिति । 
कविभ्रतिमानिवर्तितमिस्य्थः। तदिति । प्रश्नपू्व॑कसुत्तरभ्र । एवं प्रश्नस्याप्यसङ्ृदेवोप- 
निबन्धो न्याय्यः । भतदचेति । सक्रढुत्तरस्य चारूवाप्रतीतेः। पुवं समानन्यायस्वास्पूवंत्रा 
प्यचुपनिवध्यमानप्रश्नागूरक मुत्तरं न॒ सक्रत्‌ , तावन्मात्रेण चार््ाप्रतीतेरिव्याश्रय. 


णोयस्‌ । ननु च व्रश्नोत्तररूपरवादियं परिसंख्येव किं न भवतीस्याक्ञङ्कयाह--न चेय- 
भित्यादि। 


च्छः ऋ का 


उत्तंराख्ज्ारः ६७३ 


एतच्ोत्तराख्यमर कारह्यस्‌ । न पुनरेकः, सामान्यरच्षणायोगात्‌ । रतरकोदाहरण- 
द्यं मन्थक्रता प्राखयमतानुरोघेन दत्तम्‌ ! वस्तुतश्स्वन्न नास्स्येतदलकारद्वयस््‌ । अत एवैता- 
चतारुंकारसारकारादिभिरेतदरंकार द्वयमपास्तसर्‌ । न च तदय॒क्तमर्‌ , रूणदोषाभावात्‌ । 
उद्ाहरणान्तरेऽ्वस्य प्रतिष्ठानात्‌ । तत्त यथा- 
“भिदो कन्था शर्या किं नज्ु शफरवधे जाक्किबास्सि मस्त्यान्‌ 
मध्येमयावदंशं पिबति मधघु सम वेश्यया यासि वेश्याम्‌ । 
हत्वारीन्कि करिष्ये कति तव रिपवः संधिमेत्तास्मि येषां 
चोरस्स्वं धतहेतोः कथससि कितवो येन भिद्धुनमस्ते ॥' 


अन्न हि शफरबन्धजालिकेषेद्युत्तरान्मस्स्य!द न रूपस्य प्रशनस्योच्चय नम्‌ । एवमन्यदपि 
सेयम्‌ । येन दासी सुतोऽस्मिः इति पुनः पाठो मह्यः । टासीसुतस्वे कि तवश्य निमित्तववा. 
भावात्‌ । प्रश्नोत्तरोज्नयनस्यालमाप्षेः सा काङ्स्वादाक्यायंस्याविश्रान्तेः । द्वितीयो वथा- 
"पुंसः संबोधनं किं विदघति करिणां के ङजो ऽस्ेभिषकिंक 
का शून्या ते रिपू नरवर ररक कोऽकवधीव्छीडनं किम्‌ । 
छेवा वर्षासु न स्युस्तृणमिव हरिणा किं नखामेविभिन्नं 
विन्ध्यादौ पयंटन्को विघटयति तननमंदावारिपूरः ॥' 
'नसंद्‌ावारिपूरः” इति सभङ्गाप्तमङ्गश्वेन त्रिरतरम्‌ । अन्न च ययोक्तमन्तुमानपरिसंख्या. 
 वैरुचतण्यं सुरपष्टमेवेति अन्थविस्तरभयान्नो क्तमिति ॥ 
उत्तराव इत्यादि । उच्चीयते = कल्पना = प्ररनरूप से संभावित किया जाता है) अज्ञात 
का ज्ञान कराने से यह अनुमान क्यों नहीं मान ख्या जाता-ेसी शंका उठाकर कहते है-- 
'नचेद्‌स्‌० रत्यादि । अषभवनीयस्‌ = असंभाव्य = कविप्रतिभाप्रसूत । तत्‌ = वह्‌ = प्ररनपूवैक 
उत्तर । इस प्रकार प्रश्न मौ अनेक वार उपस्थित करने होगे। अतश्च =एक वार उत्तर में 
चारुता की प्रतीतिनदहदोनेसे। इसी प्रकार प्रथम प्रकार में मी जिसमे अनुपनिवद्ध प्रन कौ 
कल्पना रहती है, यह मान लेना चाहिए कि उत्तर एक दही वार महीं होना चादि, क्योकि वयँ 
भी इतने भरसे चारुता कौ प्रतीति नदीं होती । [ यह विम्िनीकार का अपना प्रौडिवाद है, 
मम्मट भादि रेस्ता नदीं मानते, नतो स्वयं सवस्वकार की ही वैसी कोहं मान्यता है ]। हों 
'प्रइन ओर उत्तर रहते हे अतः इते परिप्तख्या क्यों नहीं मान ल्या जाताः रेसी रोका उठाकर 
कते है- न चेयम्‌० । 


उन्तरनामक ये दो अल्कार ह, एक नरां, कयो कि इनमें कोरे सामान्य लक्षण नदीं वनतां । 
ये जोदो उदाहरण ग्रन्थकारने दिणहेये मी प्राचीन भावचार्यौके अनुरोधस्तेदिणएरहैः। वस्तुतः 
इनमे ये दोनों उत्तर अलंकार नहीं है । इसीलिए अलंकार सारकार आदि ने इन दोनों अलंकारो को 
इटा दिया है । किन्तु उनका ेसा करना ठीक नहीं हे क्योकि एक तो इनके लक्षणों मे कोई दोष 
नक्षी है दूसरे अन्य उदादररणो मं ये स्पष्ट प्रतिष्ठित भिकते है । अन्य उदाहरण, यथा- 

भिक्षो ! वम्दारी कथड़ी चिन्धकचिन्धा क्यों हो गहं { यइ तो मछली मारने का जाल ह । 
ठे, मछली खाति षो ! हँ हौ मच के वीच खारे नमकौन केरूपमे। मधु मी पीति हो? ददो 
वेदयार्भो के साथ । अरे वेश्या के पास सी जाति दो १ शुभं को मारकर ओर करगा ही क्या 
कितने स तुम्हारे शतु? वे सबं जिनके घरमे मते सेध लगा हे । तुम चोर भी हो ९ जरण के 
लिए । क्रयो जी त॒म जुभाड़ीमीदहो । स्सीसेतो भिष्ठु हं । तुम्दै नमस्कार हे।' 


| 


७७ अलड्कारसखवस्वम्‌ 


यँ "यद मची मारने का जाल है इस प्रकार के उत्तर से “मछली खाते हदोः-इस प्रकार 
करा प्रन निकठ्ता है। इसी प्रकार आगे भी [ जन्य उत्तरँ से असंभावित प्रदन निकल्ते दं ।। 
यदं [ चतुथं चरण के अन्त मेँ] येन दासीखतोऽस्मिः = क्योकि वेद्यापुत्रह [ दासी = वेद्या 
या चेरी] यह पाठ अपनाना चादि, क्योकि वेदयापुत्रत्व के प्रति जृञाड़ीपने म कारणता 
नदीं है) साथ दी श्स पाठस्ते प्रन ओर उत्तरकल्पना समा्षिपयन्त वने रदते दँ अतः 
वाक्यार्थं वैठ नदीं पाता [ भर्थात्‌ क्या तेरावापमी वेदयागामी थाः यह्‌ प्रश्न शस पाठ से 
जागता है ओर वदीं वाक्य समाप्त दहो जाता है फलतः उसका उत्तर नष्टीं मिलता] । दूसरेका 
उदाहरण, यथा-- 


प्ररन उत्तर 
पुरुष का संबोधन क्यादहै [ नः = नृदाब्द का संबोधन | 
दाथिर्यो की ्योमा कौन उत्पन्न करते दँ [ मदाः = मदजल . 
अश्चिकावे् कौन [ वारि = जल | 
हे नरश्रेष्ठ आपके शवुर्ओं की क्या चीज खाटी रहै [ पूः = नगरी | 
नरकाञठर को क्रिसने माराथा [ अः = विष्णु ] 
क्रीडन क्यादै [ नम = दंसी मजाक | 
वषां में क्या नदींदहदोते [ दावाः = दावानल | 
[ च॒सिद्ावतारी |] विष्णु ने नखार्यो से तरणवव्‌ किसे फाड़ डाला [ रिपूरः = राञ्च = 


दिरण्यकदिपु का वक्ष. 
विन्ध्याद्रि में घूमता इञा कौन 
अपना दासीर छिन्न भिन्न करता है [ नर्मदावारिपूरः = नर्मदाजी का प्रवाह | 
इसमें (नमंदाव'रिपूरः शाब्द ही समङ्ग ओर अभङ्ग रूप मे [ उपयुक्त क्रम से ] तीन वार उत्तर 
वनता हे! [ इस पये उछ विद्धान्‌ “भिषक्‌ कै स्थान पर “विषं” पाठ मानना चाहते है, वृद्धस्य 
तरुणी विषम्‌, के समान ] अन्धकार ने अनुमान ओर परिसंख्या से उन्तरालकार का जो मेद बत- 
काया हे वह्‌ उक्त स्थर्लोमेमीस्पष्टदी है। इम उत्ते मन्थविस्तारभय से पुनः नहीं कद रहे है ॥' 


` इतिहास--उत्तरालंकार की दोना विधाभोंकी खोज प्रथमतः रुद्रटने की हे। उनका 


विवेचन इस प्रकार है- 
रुदर उत्तरवचनश्रवणादुन्नयनं यत्र पूर्व॑वचनानाम्‌ । 
क्रियते तदुत्तरं स्यात्‌ प्ररनादप्युत्तरं यत्र ॥ ७।९३२ ॥ 


१. जिसमें उत्तर सुन कर प्रदन कौ कल्पना की जाए, वह्‌ अलंकार उत्तर नाम से पुकारा नाता 


सी प्रकार जिसमें प्रशन से उत्तर निरता हे वह भी ।। 
4 
एकाकिनी यदवला० पद्मे रुद्ररने मावारुंकार माना हे । उत्तर के लिए उन्होने निम्नलिखितं 
उदाहरण दिए है- 
थम का उदाहरण = भण मानमन्यथा मेँ जरुकुटिं मौनं विधातुमहमसदा । 
राक्नोमि तस्य पुरतः सखि न खड परादछखीमवितुम्‌ः ।। 
सखि ! स॒ञ्चे मान काउपदेशदे) वैनेतोभैभौंको मौन रखनेमें जसमथंरहर। सखि! मैं 
उसके सामने पराद्सुख हो नदीं पाती हवं ।\' 
द्वितीय का उदादरण = किं स्वर्गादधिकञखं बन्धुसुहत्पण्डितेः समं लक्ष्मीः । 
सौराज्यमदु्भिक्षं सत्काव्यरसा्रतास्वादः ॥ 


न 


उन्तरालङ्ारः ७५ 


स्वगं से भधिक खुख कौ वस्तु क्या है ? वन्धुवान्धव, भित्र तथा पण्डितो के साथ साथ धन, 
दुरभिक्षरदित सौराज्य क्या है १ उत्तम कान्य कै रसरूपी अपरत का आस्वाद 

रुद्रटने दहदितीय उदाहरण में उत्तरगत असंमाव्यता को स्थान नदीं दिया था, साथी 
प्रदनगत अनेकता को मी । सम्मर ने अक्षमान्यता को स्थान दिया है- 

[ १ | 'उत्तरश्चतिमात्रतः, प्ररनस्योन्नयनं यत्र क्रियते, 

[ २ | तत्र वा सति, असङ्ृद्‌ यदसम्भाव्यसुत्तर स्यात्‌ तदुत्तरम्‌ । 

[ १ ] केवल उन्तर सुनकर जहां प्ररन कौ कल्पना कौ जाए) 


[ २] अथवा प्रन रहै परन्तु उसके अनेक असंभाव्य उत्तर प्रस्त॒त किंएजा्एतो वह 
अलंकार उत्तर कलाता है। प्रथम का जो उदाहरण मम्मटने दिया है वाणिजक हस्तिदन्ताः० 
उसकी अभिन्यक्ति सद्रट के प्रथम उदाहरण से गतार्थ॑दहे। द्वितीय के उत्तर में अन्तर है। इसके 
किए रुद्रट के उदाहरण मं प्रन केवल एक ही वार ञआयाथा! मम्मटने इसका एसा उदाहरण 
दिया जिसमे प्रदन मी अनेक वार आता है यद्यपि उन्होने प्ररनगत अनेकता को कारिका मे टीक्‌ 
वैसे दी स्थान नदीं दिया है जेते उनके अनुयायी सवेस्वकार ने । इस द्वितीय उत्तर के ङ्िए मम्मटः 
का उदाहरण का विषमा०ः हीदहे। विमदिनीकारने इस उदाहरण की रुद्रटः के उदाहरण से 
तुरना करके ही कदाचित यह्‌ पक्ष प्रस्तुत कियाद कि द्वितीय उत्तर में प्ररन भी अनेक होने 
चादि । यद्यपि विमर्चिनीकार कौ यह्‌ करुपना अधिक उत्तम नहीं है कि उत्तर के प्रथम प्रकार 
मे मी प्रशन की करपना कराने वाला उत्तर एक ही नहीं होना चाहिए । यदह मान्यता उनके अपने 
उदाहरण [ भिक्षो कन्थाः ] के लिए ही उपयुक्त है, जो अवदयमेव आदरणीय है । 

ररनाकरकार-विमरिनौ के अनुसार अल्कारसारकार ने उत्तराःर को अलुकार नहीं 
माना है । अछकाररत्नाकरकार भी इसे अल्कार नहीं मानते । नियमनामक एक स्वतन्त अलकार 
परिसंख्या के प्रकरण मेँ मानकर उन्होने उत्तरालंकार को उसी मे अन्तभूत बतलाया है । परि- 
संख्य।प्रकरण मेँ नियम के विषय मेँ वतलाया जा चुका है कि इसमें किंसी मी वस्तु का निर्ारणात्मक 
ज्ञापन रहता ह । व्रीहीनवहन्ति, = धान क्रूरता है, मे अन्य प्रकार से चावल निकालने का 
निराकरण कर केव ध्वनेः के दारा ही चाव निकालने का निधौरण करना है । रत्नाकरकार 
ष्का विषमा दैवगतिः-पय में देवगतिगतत्वेन विषमत्व का निर्धारण मानते है भौर उत्तरालक्नार 
के स्थान पर नियमाल्कार को ही मान लेना पयांप्त वतलति है । मम्मट द्वारा प्रदत्त वाणिजक 
इस्ति ० प मेँ वे अलंकारत्व ही नही मानते । अकाररत्नाकर मे उनका कहना है-- 

अवदयवाच्ये नियमे प्ररनपूवेकसुत्तरम्‌ । 
अन्तभूतमतो यन्यद्‌ वक्तव्यं न तदुरम्‌ ॥ 
ज्ञातज्ञापनरूपा या परिसंख्येति तत्र न। 
प्ररनपूव॑कता युक्ता तेनात्र नियमः स्फुटः ॥ 


जव नियभालंकार को मानना आवदयक है तब उत्तर को पृथक्‌ अलंकार नहीं कहना चाहिए । 
प्ररनपूवंक उत्तर का अन्तमाव इसी में हो जाता है। नियम को परिसंख्या से अरग मानन। शस 
किए आवद्यक दै कि परिसंख्याका जो ज्ञातक्ञापन रूप है उसमे प्रदन का कथन अनिवार 
नहीं रहता । 

जो आचायं प्रदनपूवैक परिसंख्या को परिसंख्या ही मानते है नियम नदीं उनके मतरे 
इसका जन्तमाव परिसंख्या म॑ वतलाया जा सकता है । सर्वस्वकार्‌ का उत्तर है किं परिसंख्या मेँ 
तात्प भन्यव्यपोद मँ रहता है ओर प्ररनपूर्वैक उत्तर मे अन्यव्यपोह नदीं रइता। नियमं 


६७दे अलड्ारसवेस्वम्‌ 


मी अन्यन्यपोह नदीं रहता । नियम मँ मी अन्वव्यपोह्‌ आवर्यक दोता है यथपि इसमे तात्पयं 
केवर अन्यव्यपोह में द्यी नदीं रहता, अतः सवंस्वकार के अनुसार नियम मे मौ उत्तरका अन्तभाव 
नहीं माना जा सकता । विमर्दिनीकारने नए उदाहरण देकर इस प्रकार की दाकार्ओ का कोड 
स्थान नहीं रहने दिया । 

अष्पयदीक्तित-विमर्िनीकार की नवीन स्थापना का प्रमाव परवन्तौ आचार्यो पर पड़ा । 
अप्पयदीक्षित ने उन दोनों मेदो को अपना च्या छिन्तु रुद्रटः ओर मम्मट द्वारा प्रतिपादित उत्तर 
ते म्रदन की कल्पनाके प्रथममेदको वे छोड़ नहीं सके जवकिं विमररिनीकार ने रत्नाकरकार 
सौर अल्कारसारकार के दी समान उसके मोह का संवरण कर च्या था। अप्पयदीक्षित का 
उन्तरालकारनिरूपण इस प्रकार दै- 


[ १] .किंचिदाकूतसदितं स्यादगृढोत्तरसुत्तरम्‌ । 
यत्रासौ वेतसी पान्थ तत्रासौ खतरा सरित्‌ ॥ 
भकिंसी अभिप्राय को छिपाकर आप किसी गूढ उत्तर को उत्तरालंकार कते दै । उदा” पान्थ! 
नदी खखपूर्वक वां पार की जा सकती है जहो वेतस्रीकुंज है । स्वच्छन्द तपूवक रमणस्थक को मन 
मँ रखकर यह उक्र दिया गया दहै। इससे पान्थकाप्रदन मी निकर आतादहै। विमर्िनीकार 
ने “भिक्षो कन्था०? पच दारा उत्तर से प्ररन की उत्पत्ति ओर उसी की खला का पक्ष प्रस्तुत किया 
था उसी सन्दभे मे अप्पयदीक्षित ने एक मनोरम पय मी यहाँ उदद्धत किया- 
“कुदार तस्या ? जीवति, कुदाल पृच्छामि; जीवतीत्युक्तम्‌ । 
पुनरपि तदेव कथयसि, सतां चु कथयामि या श्वसिति ॥ 
ई्ष्या-मान से संतप्त नायिका की अपने पास माई दूती ओर नायक के वीच प्ररनोत्तर-- वह 
सुशक तो है १ जीवित है) मं कुशल पृछ रदा १कदातो कि जीवित है। फिर वदी कह रही दहै? 
तो क्या मरी बतला दू अभी जिसकी सोसि चल रही हे। सखी कहना चाइती है कि "विना मरे उस 
विचारी की कुद्ाकता केसीः । इसे अप्पयदीक्षित ने निवद्ध प्ररनोत्तर नाम दिया है। विमरिनी. 
कार के दवितीय उदाहरणे जो समङ्ग टटेष की चचां है भोरजो एक दाब्द समुदाय के अंश अंदा पर 
मरदन योजना मिरूती दै अप्पयदीक्षित ने उसे चित्रोत्तर नामक भेद माना है। चित्र इसलिए करि 
श्समे शाब्द देष रहता दै । इसके लक्षण सौर उदाहरण ऊुवल्यानन्द मेँ इस प्रकार है-- 
'प्ररनोत्तर।न्तराभिन्नमुत्तरं चित्रमुच्यते । 
केदारपोषणरताः, के खेटाः किं चरु वयः ॥ 


जदा उत्तर या तो प्रदनस्े ही अभिन्न दहो या अन्य किसी उन्तर से = उसे चिन्रोत्तर कते हैं 
वथा- के दारपोषणरताः में प्ररन = के = कौन दैः क्या १ दारपोषण रत = स्री व्चके पोषणे लगे 
- उत्तर है केदारपोषणरताः = क्यारियोँ पोसने में ल्गे अथात्‌ किसान । यद्ोँ प्ररन ओर उत्तर 
क शाब्द अभिन्न हे । एक उत्तर के दूसरे उत्तर से सभिन्न दोने छा उदाहरण है- के खेऽगः = कौन 
हे आकार मे घूमने वाटे, रिं चलम्‌ =क्या है चल ?इन दो प्रन का उत्तर एक दही है वयः = 
पक्षी ओर उमर । पक्षी आकाड्च मँ अटन करते हैँ ओर उमर चर दोती है। यहं "वयः श्स 
उन्तर के भीतर एक उत्तर ओर च्िपाहै। अप्पयदीक्षित का कहना हेते उदाहरण विदग्धसुख- 
मण्डन म अनेक हैं ! ` कंसंजघान कृष्णः, का शीतलवाहिनी गङ्गाः आदि से ही वाक्य हे । 

पण्डितशाज-- जगन्नाथ ने मी उपर्युक्त समी विधाओं को स्थान दिया है ओर उन्तरारंकार 
का विवेचन अप्पयदीक्षित तथा विमर्दिनीकार के ही अनुसार किया ई । उनकरासूत्र हे) 

“प्ररनप्रतिबन्धकश्चानविषयीभूतोऽथै उत्तरम 1, 


स्दक्मार्ङ्कारः द.७ 


॥ "जि्तके ज्ञान से जिक्ासा दान्त हो वह अथं उत्तर कहलाता है ` जिज्ञासा जोर प्ररन एक 
हो वस्तु हे । जिज्ञासा ज्ञानविषयकं इच्छा को कहते है । इच्छा वस्तज्ञान के विना नहीं होती । 
यह ज्ञान सामान्यात्मक होता है । इच्छा जिस ज्ञान के अर्जन के लिए होती है वह विरोषरूप 
होता हे। इस प्रकार सामान्यतः ज्ञात वस्तु को विशेषतः जानने के लिप हद इच्छा, जिसे प्रडन 
कते हे, वस्तुनिष्ठ विरेष के ज्ञान से दान्त होती ३ । उत्तर द्वारा इसा विज्ञेष का ज्ञापन कराया 
जाता हे । उदाहर णाधे यदि जिक्नासा यह हो कफि "संसार में प्रधान देवता कौन ह गौर उत्तर हो 
शिवः तो इसका अथं यह हृजा कि जिक्षाप्ता के समय रिव का ज्ञान देवता रूपें ही था हिव 
रूप मं नहीं, मथवा प्रधानता का ज्ञान देवत्व के साथ था िवत्व के साथ नहीं । उत्तर से वह 
श्िवरूप से विदित हो जाता हे या प्रधानत्वं शिवत्व के साथ विदित द्यो जाता है। 
पण्डितराज ने प्रथम उत्तर को उत्नीत प्रन ओर द्वितीय को निबेद्धप्रदरन नाम दिए हे । 
उनके अनुसार दोनों मे प्रन ओर दोर्नोया दोनोंँमे से एक, साभिप्राय या निरभिप्राय होति है, 
इस प्रकार इनमे प्रत्येकके चार चारमभेदहो जाते हैं। विमरिनीकार का मत पृथक्‌ रूप 
से उपस्थित करते हए उन्हाने “भिक्षो कन्थाः' पद्च के अनुकरण पर जोगी की स्तुति मे श्यामं 
यज्ञोपवीतं किमिति पद्य बना दिया हे। उन्होने प्रदनोत्तर की अनेकता वहीं भआवर्यक 
बतला है जहो वे साभिप्रायन हों । चित्रोत्तरकेल्एि भी पण्डितराज ने अनेक प्रकारो की 
कस्पना को ओर उत्तरगर्मित प्ररन का वामन के समान यह्‌ चिपात्‌ उदाहरण बनाकर रस- 
गंगाधर के ही समान सपना जीवन भी कदाचित्‌ समाप कर दिया- 
“कि कुवते दरिद्राः कासारवती धरा मनोज्ञतरा । 
कोपावनस्विलोक्याम्‌ "~." "~ ||) 


'दरिद्र क्या करते हें किं ऊुवंते = किंकरता = सेवा करते है । कौन भूमि सारवती ओर मनो 
कतर होती हे = कासार = ताङाव वाली त्रिलोकी मे कौन भपावनदरहै जोकोपदकी रक्षा करता है-। 
इस पथ का तृतीय चरण यदि पण्डितराज के जीवन का अन्तिम शिस्प है तो वह बड़ी दुःख की 
वात है, क्योकि यह चरण अथकीदृष्टिसे दरिद्र दै) एतदथ देखिए सागरिका ६।४ मेँ प्रकाडित 
हमारा "पण्डितराज-पयपूतिसंोधनम्‌' नामक लेख । 

विश्वेश्वर = “उत्तर मात्रात्‌ प्ररनोन्नयने स्यादुत्तर नाम । 

प्ररने लोकाविदितोत्तरस्य तच्चासत्‌ प्रोक्तो ॥ 

८उन्तर से प्रदन कौ करपना तथा प्ररन करने पर अप्रसिद्ध भनेक उत्तर उन्तरालकार। इसं 

प्रकार उत्तर के लिए विदवेरवर मम्मरके ही अनुयायी ह । यहो चक्रवतीं की निष्कृ्टाथकारिका 


यह्‌ दे- 


श्र 


“प्ररनोह उत्तर तस्माद्‌ गढ चासङ्कदुत्तरम्‌ । 
विमदिनी 


अघुनाठंकारान्तराणां रुणं कतंमुपक्रमते--इत इत्यादि । 
अब अन्य अलंकारो का लक्षण करना आरम्भ करते है- 


[ सस्व ] 
इतः प्रभृत्ति गूढाथप्रतीतिपराटठेकारलक्षणम्‌- 
[ शू० ७६ ] संरक्ितदवक्ष्माथेम्रकाशचनं दमम्‌ । 
दद सक्ष्भः स्थृलमतिभिर्संकरयो योऽथः, स यदा इुराध्रमतिभिरिङ्कि- 


६४८ अलङ्ारसवेस्वम्‌ 


` ताकारार््यां खंखक्ष्यते तदा तस्य संङुष्चितस्य विदग्यं प्रति प्रक!{रान सुक्ष्म 
मटकारः । तचेङ्किताद्‌ यथा- 


'संकेतक्ाकमनसं विर ज्ञात्वा विदग्धया । 
इसन्नै्रापिता क्रतं सीकापद्मं निमीलितम्‌ ।' 
अत्र संकेतककमिप्रायो विडसंबन्धिना अक्चेपादिना इङ्गितेन छक्चितः 
रजनिकाटभाविना खी कापद्यनिमीखनैन पकाशितः । आक्रायद्‌ यथा-- 


'वक्त्रस्यन्दिस्वेद्‌ बिन्दुप्रवन्धेद्रवा भिन्नं कुङ्कमं कापि कण्ठे । 
पुरस्त्वं तन्ञया उ्यञ्जयन्ती वयस्या स्मित्वा पाणौ खडगदेखां छिढेख ॥ 


यज स्वेदविन्दुरकृतङ्कङमभेदरूपेणाकारेण संलक्चितं पुरुषायितं पाणौ 
पुरषोचितसरडगधाराङेखनैन प्रकाशितम्‌ । 
यहाँ से गूढां ज्ञान परक अल्कारयो के लक्षण करते दै-- 
[ सू० ७६ ] ताद लिए गद्‌ सूदम अर्थं का प्रकाशन सुच्म [ अरकार कहङाता है ]। 
[द° ] यरद जो पदाथ सुक्ष्म अथात्‌ स्थूलमति वाले व्यक्तियों दा न जाना जाने योग्य 
रहता है, उसे जव ङुायुद्धि वाले व्यक्ति चेष्टा जौर आकार के आधार पर ताड़ल्ेते दै, तव 
उस ताद्‌ जिए गएु मथंका किती चतुर भक्ति कै प्रति जो प्रकाड्न होता है उसीको सूक्ष्म नामक 
अल्कार कहा जाता है । इनमे से चेष्टा से ताडने का उदाहरण- 
(चतुर वनिता ने विट को संकेत जानने के चिर उत्सुक देखा तो मुघ्क्कराती आंखो मे चाह 
अर कर अपना लीलाकमल मृद दिया है) याँ संकेतकाल का अभिप्राय विट की अविक्षिप 
आदि चेष्टा्ओं से ताङ्‌ च्या गयाहि जोर रात्रिकार मे होने वारे खीरापद्मनिमीलन ते उसे 
प्रकाद्चित कर दिया गया दे 1 आकार से ताडने का उदाहरण- 
किसी सखी ने चेहरे पर से क्गातार वद्‌ रहै पसीनेसे कण्ठका कुंकुम फेला हुजा देखा 


तो तन्वी के पुरुषायित [ विपरीत रमण ] को व्यक्त करते हुए मुसक्रुरा कर हाथ पर खड्ग का 
चित्र वना दिया । ॥ 


यदा स्वेदबिन्दु द्वारा उत्पन्न कुकुम के फेडाव रूपी आकारसे विदित हए पुरुषायित हाथ 
प्रर खड्ग बनाने के दारा प्रकाित किया गया है, कर्योकरि खड्ग पुरुषोचित वस्तु है ॥ 


विमशिनी 


एतदेव अ्याचष्टे--इहेत्यादि । इङ्गिताकाराभ्यां सू चमाथंसंरुच्घणादस्य मेदृद्यमप्युक्तम्‌ । 
एवं संङङितस्या्थंस्य प्रकाश्ञनमयमरूकार इस्यत्र तार्पयंम्‌ । [ यदाहुः ] 
“कुतोऽपि लङितः सूचमोऽप्यर्थोऽन्यस्मे प्रकाश्यते । 
धर्मेण केनचिद्‌ यत्र॒ तत्‌ सूच्मं परिचश्ते ॥ 
कि च-'यनच्र कर्णोर्पखन्यस्तहस्ता दी पावरोकिनी । 
दृष्टवा वधूः प्रियोपान्ते सखीभिः प्रतिस्रुच्यते ॥ 
हव्येतद्ग्रन्थप्रकरिययालंकारोद्ाहरणलात कुचं नाप्यरंकार भाऽयकरता सुचम।लंकारे यत्त. 
दनुगुणमदाद्तं तत्रायमाक्यः-यर्तुचमार्थंस्य संलक्चममात्रं प्रकाज्ञनमात्रं वाप्ययमेवा- 
खंकार इति । अत एवात्र सखीभिः सुरतोर्घुकस्वं प्षंख्ङितम्‌ कणोरपरूहस्तन्यासादिना 


+ 
। 
। 


। ह ` 


स्वक््माखङ्ारः ६७९ 


भका्चितमिस्यु्याथंसखहितत्वम्‌ । तदेवमादौ ख चमांकार एव वाच्यः । सूदमरयेवार्थस्य 
संख्चयसमाणस्वादि नावस्थानात्‌ ॥ 

श्सी सूत्र कौ व्याख्या करते हे--इह इत्यादि । चेष्टा ओर आकारङइन दतो हेत्॒ओं दारा 
सक्षम अथं के जानने से इस गङ्कार के दोमेद मी वतलाए। इस प्रकार तात्पयं यदह निकार 
कि “जने हर सथं का प्रकाशन ही इस अकार का स्वरूप है [ जैसा कि मम्मट ने कहा है-- ] 

“जिसमे, सूक्ष्म होने पर मी किंसी मी कारण से जान लिया गया कोई अर्थं क्रिस्ती धम के 
दारा किसी अन्य को वतलाया जाता है उते सूक्ष्म कदते है ।› ओौर [ अन्यत ] हती [ स्वस्व | 
यन्थ के अनुसार अलक्रारों के उदाहरण दते हु सौ सूक्ष्माल्कार के प्रकरणमें अलंकार 
भआष्यकार [ तथा रत्नाकरकार ] ने जो- 

“जदो सखियों कपो पर हाथ रखकर दीप निहारती दैख, वधु को प्रिये पास छोड़ 
आती हैँ ।› यह उनक्नौ अपनी मान्यता ॐ अनुरूप उदाहरण दिया है उससे उनका तात्पर्यं यह 
हे क्षि “सूक्ष्म अथं का केवर जान लेना, या केवल प्रकाशित करना मी यही अलंकार ३। 
इसोकिण यहां जो सखियां दारा सुरतोत्छुरुता जान लो गहै भौर जो कणोँत्पल पर हाथ रखने 
आदि से उसे [ वधू दारा सखियों के प्रति] प्रकाशित किया गया है इसमे य्ह दोनों प्रकार कै 
अथेका दोना बतलाया गया । शस प्रार एेते उदाहरणों में सृष्ष्पाल्ज्ञार ही माना जाना चाहिए) 
क्योकि इन सव मे जान लिए गर रूपमें वृक्षम अथं दही विमान है। [ अूजारमाष्ष्‌ के उपलब्ध 
न होने से मम्मटकारिकाके वाद्‌ का यह रीकांशा हमने जोड़ तोड़कर ही अनूदित किया है ] ॥' 

विमशं-अलंकारमाष्य मँ कदाचित केवल जानक्ेने कोमी सूत्र का अर्थं माना गया था। 
मम्मट, सर्वस्व ओर विमरिनी उसते विपरीत जाने ग जके प्रकाञ्चन तक सूक्ष्म की व्वाक्षि 
मानते हे । 

इतिहास = सृक्ष्माल्कार को जो रूप मम्मट को विमरिनी मे उदधतत कारिका तथा स्स्व 
म मिलता है उसकी खोज का श्रेय दण्डी कोदहै। उन्दोनि सृक््मकाजो लक्षण कियाथा 
मम्मर भादि ने उसी की पदावली पर अपना विवेचन खडा भ्ियाहे। दण्डी का सृक्ष्म~-विवेचन 
हस प्रकार है- 

दण्डी = ईङ्गिताकारलक्ष्योऽथैः सौक्ष्म्या सूक्ष्म इति स्यतः । 
कदा नौ सङ्गमो भवीत्याकीणें वक्तुमक्षमम्‌ । 
अवेत्य कान्तमबला लीलापद्चं न्यमीलयत्‌ ॥ 
पद्मसंमीलनादत्र सूचितो निशि संगमः। 
आश्वासयितुभिच्छन्त्या प्रियमज़्जपीडितम्‌ ॥ 


मद पितद्ज्चस्तस्या गीतगोष्ठयामवधत । 
उदामरागतरला छया कापि मुखाम्बुजे ॥ 
इत्यनुद्धिन्नरूपत्वाद्‌ रव्युत्सवमनोरथः । 


भनुलङ्ष्येव सृक्ष्मत्वमभूदत्र व्यवस्थितः ॥ 
-[ काव्य)दशो २।२६०-६४) ] 
गित या आकार से लक्षणीय अधं सकषमत के कारण सूक्ष्म माना गया है । उद्‌ा० (जनसंङ्ल 
स्थान मेँ प्रिय को हम दोनो का भिल्न कव होगा यह जोर से पृचने मै असमथ जानकर अबला 
ने “लीलापद्च मूद दिया ।' यहा कामपीडत प्रिय को आश्वाप्तन देने के लिए रात्निकाल मे भिल्न 
की सूचना पञ्चनिमीलनद्वारा दी गई है। [ पुनः उदाहरण] 'संगीतगोष्ठौ मे उस्र सन्दरी 


६०० अलङ्ारस्वेस्वम्‌ 


कीदृष्टिसुञ्च ह्वी पर टिकी रदी ओौर सुखकमल पर उद्ाम रक्तिमासे तरल एक विचित्र कान्ति 
दिखाई दी ` यहाँ पर मी रलत्युत्सव की लालसा चिप इडं होने के कारण सृक्ष्मताको बिना 
खोए व्यक्त ददं हे ॥ 

देत्वलंकार के प्रकरण में दण्डीद्रारा प्रतिपादित ठे, सूक्ष्म आदि अलंकारो का भामह द्वारा 
खण्डन उद्धृत कियाजा चुकादहै। उससे स्पष्टदहै कि भामह सुक्ष्म को अलंकार नहीं मानते। 
भामद का अनुकरण करते हुए वामन ओर उद्धट नेमी इस नाम काकोई अल्कार नहीं 
बतलाया दें । 

र्द्रट-रद्रट के काव्याल्द्भार मँ सूक्ष्मनामक भलंकार तो है, किन्तु उसका स्वरूप 
ओर उदाहरण दण्डी भौर मम्मट के उपर्युक्त सूक्ष्मस्ते भिन्नणएक दूसरे हौ प्रकार का हे। 

वह यह दै- 
धयत्रायुक्तिमदथां गमयति चब्दो निजाथैसंबद्धम्‌ । 
अधान्तरसुपपत्तिमिदिति तत्‌ संजायते सृक्ष्मम्‌ ।।› ७।९८। 

जिसमे अयुक्त अथैका शब्द अपने अथं से सम्बन्धित किसी युक्तियुक्त अर्थका क्ञान कराण 
वह्‌ सुक्ष्म नामक अलंकार दोता दे । 

यथा--“आदौ पदथति बुदधिव्य॑वसायोऽकार्दीनमार मते । 

धैर्यं व्युढमहाभरसुत्साहः साधयत्यथम्‌ ॥ 

'आरस्म में देखा करती है वुद्धि, व्यवसाय समय रगवाए विना कायं आरम्भ कर देता ह, चेयं 
महान्‌ भार कोडोए रहता दै, उत्साह कायं सिदध करतादे)ः यदं ये सव कायं तद्वान्‌ प्राणी 
करता दहे) वह यहाँ निगेढ दहै यतः उसका बोध होने से यहां अर्कार भी सुक्ष्म नामकदही हे, 
वस्तुतः ये लाक्षणिक्‌ प्रयोग मात्र देँ । 

मस्मट-- कुतोऽपि रक्षितः सृक्ष्मोऽप्यर्थोऽन्यस्मे प्रकादयतते । 

धर्मण केनचिद्‌ यत्र तत्‌ सुक्ष्म परिचक्षते 1 
अथं अमी अमी विमरिनौने क्रियाजा चुका दै इसकी पदाव्ी सेस्पष्ट हैक इस 
अलंकार के रूपनिमांण में मम्मट अक्षर अक्षर के ल्षएिदण्डी के ऋणीहै। ठीक इती प्रकार 
सवस्वकार भौ सपने विवेचन चौर उदाहरर्णो के लिए मम्मरके ऋणी है । दोनों की पदावली 
प्राचः एक €, उदाहरण तो एक है ही । मम्मट की पदावली यह है--वक्तस्यन्दि० मतराक्रति- 
मवलोक्य केनापि वितर्कितं पुरुषायितम्‌ असिलतालेखनेन वेदग्यादभिव्यक्तिमुपनीतम्‌ , 
पुंसामेव कृपाणपाणितायोग्यत्वात्‌ । यथा वा संकेतकालमनसम्‌० अत्र जिज्ञासितः संकेतकाल 
कयाचिद्‌ इ्गितमात्रेण विदितौ निशास्षमयङंसिना कमलनिमील्नेन लीलया प्रतिपादितः ॥ 
शोभाकर--रत्नाकरकर शोभाकरनेन तो मलंकारमाष्य के समान ज्ञान जर श्रकाद्चानः 
कौ दोनो श्कादयं को सूक्ष्म के क्ण स्वतन्त्र ओर पर्याप्तदहयी मानाहै ओरन मम्मट तथा 
सवस्वकार क समान दोना कौ एकत्र अनिवाय॑ता ही मानी है। उन्दने केवह प्रकारान को सुक्ष्म 
के टिप पर्याप्त मान। है, ज्ञान को उसका वैकल्पिक सदयोगीमात्र माना है । उनका लक्षण यह्‌ ६-- 
“सुकष्माथस्य सूचनं सूक्ष्मम्‌? ॥ १०३ ॥ 
“सुक्ष्म अथे कौ सुचना सूक्ष्मः नामक भलंकार होगी । रत्नाकरकार ने सुचना का माध्यमः 
आक्रार ओर चेष्टा ही नदीं वाच्य को भी माना है । उसका उदादरण उन्होने यष दिया है-- 
(रथ्याश्रमणश्चीर जारं तरणी दृष्टवा संकथयति सखीम्‌ । 
ह्दानीं चर खलं सुखैः सरित सन्ध्यायां तद्‌ यामः 


स्डस्माठृङ्कारः ६५१ 


यार कोगलीमें धूम रहा देख तरुणी सखी से कहती है-प्ूरयं इव रहा है, सखि ! 
चर नदी चट । 

यहां नदौ को संकेत स्थान बतलाया जा रहा है। चत्र कणोँत्पलन्यस्त० पमे वधूका 
मोत्युक्य किसी अन्य केद्वारा नदीं जाना जाता, न कोहं अन्य हयी किसौ अन्व के प्रति उते 
व्यक्त करता । रत्नाकरकार ने इसमें मौ सुक्ष्म को अलंकार माना है। ववक्त्रस्यन्दि०' पद्य भी 
उन्होने सूक्ष्म के लि९ उद्धत कर दियाहै। इस प्रकार सूक्ष्म को जनेक नवीन परिस्थितियों नें 
देखकर रत्नाकरकार ने अपनी भावक प्रतिमाकी उवेरताका परिचयदिया है। ज्ञान ओर 
प्रकाह्चनः दोनों को निवाय शका मानने के पक्ष परवे स्प्रूप से इस प्रकार प्रतिवाद 
प्रस्तुत करते दै - 


(वक्रस्यन्दि० अत्र चाकारेणेङ्कितेन वा संलक्षितस्याथेस्य परं प्रति प्रकाशनम्‌ इति द्विभेदत्वं 
न वाच्यम्‌ , संलश्ितस्य प्रकादानामावेऽपि निजाभिप्रायादिप्रकाड्नेऽपि संभवतीति ‹संलक्षितस्य 
सुक्ष्मा्थप्रकारानं सृक्ष्मम्‌' इत्ति लक्षणमन्यापकम्‌ , यथात्रैव यत्र कणोत्पटन्यस्त ०? इत्यादौ । 

“प्रकाशन के प्रति केवल जाकार मौर इङ्गितको हीक्ञानका साधन मानकर सुक्ष्म कोदो 
भेदो तक कीमित न्दी रखना चादिए क्योंकि कदी कहीं अन्य के दारा न्ञान ओर जन्य केदारा 
ही प्रकाशन के अभाव में स्वयं प्रकाडन होने परममी यदह अल्कार देखाजाता है। इसलिए 
[ स्व॑स्वकार ] 'संलश्षित सुक्ष्म थं का प्रकाशन सुक्ष्म है श्स प्रकार काजो लक्षण बनाया है 
वहु सभौ स्थल मँ लाग्‌ नदीं होता यथा इसी चत्र कणांत्पल°› पञ में । 

अप्पयदीक्षित ने "वक्तरस्यन्दि०? पय में पिदितनामक मल्क्रार मान सुक्ष्म को 'संकेतक्रालमन क्त 
तक सीमित रखा दै, 

अप्पय दीक्ित = 'सुक्ष्मं पराराया्िज्ञोत्तरं साकूतचेष्टितस्‌ । 

मयि परयति सा केरौः सीमन्तमणिमादणोत्‌ ॥ 


--दूसरे का भाराय जान रहे व्यक्ति दूसरेके प्रति अभिप्राय चेष्टा सूक्ष्म कहलाती है। 
उदा० भ देख रहाथा तो उप्तने वालों से अपनी मोगको मणिदटकरौ यहाँ मणि सूर्य॑का 
प्रतीक है। उससे सन्ध्याकाल कै संकेतकाल होने की सूचना दी गहे । अन्य मे अप्पयदीक्षित ने 
(संकेतकालमनसं पद्य भी उद्धृतकर दिया है । पिहित का लक्षण उन्होने इस प्रकार किया है-- 

“पिहितं परदृत्तान्तज्ञातुः साकरूतचेष्टितम्‌ । 
प्रिये गृहागते प्रातः कान्ता तसपमकरपयत्‌ ॥ 


दूसरे की स्थिति जानने वाले की साभिप्राय या व्यग्यपूणं चेष्टा पित कषलाती है । उदा 
प्रिय प्रातःकाल सपत्नी के पासे लौयातो नायिकाने उप्तकेल्एि विदछठोना विवा दिया। 
दूसरा उदाहरण वक्तरस्यन्दि ० पच ही दिया है । चन्दरिकाकार ने सूक्ष्म ओर पिहित का अन्तर्‌ 
वताते हुए छिखा है-- “सुक्ष्म मेँ दूसरे का अभिप्राय जानकर अपनी भर से उत्तर भी दिया जाता 
है, भोर इस उत्तर में वक्ता अपना गढ अभिप्राय व्यक्त करता है, जव कि पिहित मेँ दूसरे की गूढ 
स्थिति को जान लेने को सूचना दी जाती है । अथै यह किं सुक्ष्म वक्ता के स्वगत सूक्ष्मया निगूढ 
आव के स्वयं निवेदन में होगा ओर पिदितविसीके दारा अपने गूढ भावके छिपाने मै, यचपि 
श्म छिपार माव का प्रकाशन सी रहेगा, क्योकि उसके विना उस चछिपे भाव क्रा अस्तित्व ही 
प्रकट न होगा ओर पाठक की चेत्तना पर उसका प्रभावन प्डेणा। उद्ोतकार आदिने इस 
पाथेक्य का प्रत्याख्याने कर दोनों विधां को प्राचीन आचार्यो के समान भवान्तरभेद कै रूप म 
एक (सक्षम शीषेक मेँ हौ गिनना उचित बतलाया है । 


६५२ अल्छरङ्कारसलवस्वम्‌ 


पण्डितराज्न जगन्नाथ के रस्सगंगाधर में सूक्ष्म अलंकार नदीं आ पायादे। 
विश्वेश्वर ने अपना सृक्ष्मालंकार मम्मटके दी लक्षण पर निभ॑र रख इस प्रकार वनाया ईै- 
प्रतिभातिद्ायाद्‌ ज्ञातो यदयाकारेङ्घिताद्थैः । 
विश्दीक्रियतेऽन्यस्मे तथैव तत्‌ सृक्ष्ममिस्युक्तम्‌ ॥ 
रत्नाकरकार ओर अप्पयदीश्छित की नवीन उद्मावनार्ओं पर चुपदहै। इस अलंकार पर 
चक्रवत्तीं की निष्कृष्टाथेकारिका यद ह- 
“सूक्ष्म तु सूक्ष्म संलक्ष्य विदग्धेु प्रकाडनम्‌ । 
इक्िताकारतः सूक्ष्मसलक्षणमिति द्विधा ।' 

इङ्कित ओर आकार का अन्तर श्रीचक्रवतींने इन प्रमार्णो द्वारा स्पष्ट किया है-- 

इङ्गित = आकूतन्यज्ञिताश्चेशा इरित बुद्धिकारिताः। 

आकार = आकारः पुनर।म्नातस्ता एवावुद्धिकारिताः ॥ 

तथा- 

दद्धित = 'तारापुटश्रढृष्ट यदे विक्ारानिङ्गितं विदुः । 

आकार = माकाराः स्वजा मावा आचा बुद्धया परेऽन्यथा ॥ 

--जो चेष्ट्टं भावाभिव्यक्तिके ल्यि जानवृञ्चकर की जती दहै उन्दः इङ्गित कदा जाता है, 
वे दी चेष्टाएं यदि जानवृ्षकर न की जाद अपितु स्वमावतः निष्पन्न हौ जाएतो आकार मानी 
जाती हे । 

-- पलक, श्रुछुरि ओर दृष्टि के विकार इद्गित होतें जव कि आकार चित्तस्थिति की चयोतक 
सुद्रार्णे । इनमें से प्रथम जानवृद्च कर किए जाते दै ओर द्वितीय स्वभावतः निष्पन्न होते हैः । 


[ खवंस्व ] 


{ ख० ७७ ] उद्धिन्नवस्तुनिगूहनं उयानोक्तिः । 
यन्न निगूढं वस्तु कुतश्िन्निमित्तादुद्धिन्ं पकटतां पातं सद्‌ वश्त्वन्तर- 


प्रक्षेपेण निगद्यते अपदप्यते, सा वश्त्वन्तस्थक्षेपरूपश्य व्याजस्य वचनाद्‌ 
व्याजोक्तिः । यथा-- 


रोद्धन्द्रप्रतिषायमानगिरिजाहस्तोपगढोहस- 
द्रोमाञ्चादिविखंस्थुलखखिकविधिव्यासङ्गभङ्गाङ्कलः 
हा शोत्यं तुहिनाच्स्य कस्योरित्यूचिवान्‌ सस्मितं 
रों छान्तःपुरमातमण्डठगणेदृ्ठोऽवताद्‌ वः शिवः ॥* 


अज्र सेप्राञ्चादिनोद्धिन्नो रतिभावः चओेव्यप्रक्षेपणेनापङपितः । यदचव्यप- 
हतोऽपि सस्मितत्वख्यापनैन पुनर्प्युद्धिनत्वेन प्रकारितः, तथाप्यपलाप- 
माचचिन्तयास्याटकारस्योट्धेखः 

नन्वपहतिग्रन्थे यथा सादक्याय याऽपद्वतिः, तथापह्वायापि यत्सा 
डश्यं साप्य पह्वतिः' ईति स्थापितम्‌ , ्याजोक्तौ चोत्तरथरकारो विद्यते तत्कथ- 
मियमटेकासन्तरे[रश्पे]ग कथ्यते । सत्यम्‌ । उद्धरसिद्धान्ताश्रयेण तत्‌ 


^» नि क 


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व्याजोक्त्यलङ्ारः ६५३ 


त्रो तन्मते भ्याजोकव्याख्यमटं करणमस्ति । इह तु तस्य संभवात्‌ तद्धय- 
तिर्क्तापद्वतिरिति परथगयमटकारो निदिष्टः । 


[सूत्र ७७] प्रकट वस्तु का छिपाया जाना व्याजोक्ति [ नामक अरकार कहलराता हे ] ॥ 

जिसमें कोरे निगूढ वस्तु किसी मी कारण उद्धिन्न अर्थात्‌ प्रकटता को प्राप्त हो जाती है। 
अतः उसे अन्य कोड वस्तु वीच मे लाकर निगूहित किया जाता अर्थात्‌ छिपाया जाता ह, 
वह अन्य वस्तु के बीचमें उाख्नेरूप व्याज का कथन होने से व्याजोक्ति मानी जाती है। 
यथा-- 

'परव॑तराज हिमाचल द्वारा सोप जा रहे पावती जीके हाथ के स्परोसे इए रोमांच आदि के 
कारण अस्तव्यस्त इद समस्त कायं कलाप में रुकावट आ जाने से घवराए, अतएव “आह कितने 
टड है हिमाचल के दाथः इस प्रकार बो वेढे ओर पवेतराज के अन्तःपुर, ब्राह्मी भादि मातां 
तथा प्रथमगणों दारा सुखकरा सुखकुराकर देखे जा रहे शिव आपको हमारी रक्षा कर ।° 

यहा रोमांच आदि दारा प्रकट हद रतिरूपी चित्तदृन्ति शीतलता को बौच मेँ ककर छपाई 
गरं । यद्यपि छिपाए जाने पर भी सुकुरादट के उल्लेख के दारा उसे पुनः प्रकट बतलाया गया; 
तथापि छिपानेमात्र प्रर ध्यान जाने से इस अलंकार का अनुमव होता हे [ चमत्कार प्रतीत 
होता है ] तथा इसे नाम दिया जाताहे। 

शंका होती है कि अपति [ इल्ष | प्रकरण के अन्थ मे यह बतलाया दै कि जि प्रकार जो 
छ्िपाव सार्य ज्ञापन के किए होता है वह अपहृति होता है, उसी प्रकार जो सादृदय छिपाव ` 
बतलने के किए द्योता है वह भी अपहुति होता है" इनमें सेजो द्वितीय प्रकार है वह व्याजोक्ति 
मँ विमान है, तव इते भिन्न जल्कार क्यो बतलाया जा रहा है । [ उत्तर ] ठीक हे। [ अपहुति 
का] वह [ रूप ] उद्धर के सिद्धान्त के अनुसार वहां बतलाया गया हे । उनके मत में व्याजोक्ति 
कोई अलग अलक्रार नहीं है । शस [ यन्धकार के मत] मेँ वह संभव है, अतः [ इस मतम] 
उस [ द्वितीय प्रार] से वचा हआ भेद ही अपहृति का विषय होगा । इस कारण यहां यह्‌ 
अलंकार पृथक्‌ वताय गया है । 

विमरिनी 

उद्धिन्तेत्यादि । निगूढमिति । वस्तुतः । वस्त्वन्तरप्क्षेपेणेति । निसित्तान्तरकथनेनेव्यर्थः । 
रतिमाव इति । स्थायी । मपहुतोऽपीति । व्याजोक्तेः प्ररोहाव्‌ । अपलरापमात्रचिन्तयेति । ताव- 
मान्रस्येव तन्लच्तणस्वात्‌ । अस्याश्चापहते्भेदं दशेयितुसुपक्रमते-नन्वित्यादिना । स्थापितः ` 
मिति ! श्ेषग्रन्थे यदुक्त । -सादश्यग्यक्तये यत्रापहवोऽसावपह तिः" इति । एवमपहव- 
मन्थ इति पूवंव।क्य एवं संबन्धनीयम्‌ । उत्तरः प्रकार इति । अपद्धवाय सादृश्यम्‌ तदिति ।` 
उत्तरेणेव प्रकारेण व्याक्षव्वाव्‌ । कथमिति । निष्प्रयोजकव्वाव्‌ । एतदेवाभ्युपगम्य प्रति- 
विधत्ते- सत्यमित्यादिना । तदिति अपद्धवाय सखादश्यम्‌ । तत्रेति । शङेषे । तन्मत इति । 
उद्कटमते । तस्येति । व्याजोक्त्याख्यस्यारंकारस्य । तदयत्तिरिक्तेति । अहतौ हि प्रञ्तमे. 
दोर्कष॑वितमप्रङ्कतस्यो पादान्‌ ¦ इह तृद्धिन्नं सत्‌ प्रकृतं वस्तु वस्स्वन्तरेणाप्रङ्ृतेन ` 
निगृह्यते इस्य नयो महान्भेदः । एवं “आह्ृष्यादौः इस्यादौ च चोर कास्मवर्स्वन्तरप्रर्ेपेणो- 
द्वि्नप्रियनिगूहनस्येव वाक्याथस्वाद्वयाजोक्तिरेव न पुनरपहतिः। अत एव च नान्न 
वक्रोक्तिः । तस्य यथायोजनमान्नं रूक्षणम्‌ । 


उद्धिश इत्यादि । निगूढ अथात्‌ वस्तुतः निगूढ । वश्श्वन्तरप्रकञेपेण दूसरी वस्तु को बीच 
म छाने से = अन्य कोहं कारण वतलाने से । रतिभावः = स्थायिमावरूप रति । अपहतोपि = 


६५७ अलङ्ारसवेस्वम्‌ 


छिपा जाने पर भी = अर्थात्‌ व्याजोक्ति के जम जाने के कारण । अपरूापसमान्नरचिन्तया = छिपाव 
मात्र के ध्यान से = क्योकि व्याजोक्ति का लक्षण दही केवल वह ( छिपा) है। इस [ व्याजोक्ति ] 
का उपदुति से भेद वतलाना भारम्भ करते हैँ--ननु°। स्थापित । जेता किं देष प्रकरण 
[ के अन्त ] नँ कदा दै--"साद्र्य की व्यक्ति के जिटि जहाँ छिपाव होता हे उसे भपहुंति कदा 
जाता 8 = इत्यादि । इस प्रकार “भपहव य्न्थः इसका अथं पूवे वाक्य क्गाना चाहिए । उत्तरः 
प्रकारः = दूसरा प्रकार = 'साद्रद्य छिपाव वतलने के लिए । तत्‌ = इस कारण = दूसरे प्रकार 
म ही चले आने से कथमन = क्यों = कोद प्रयोजन न होने से । स्वीकारकर इसीका खण्डन करते 
है- सस्य इव्यादि के दारा । तत्‌ = सादृद्य च्िपावके चिणं । तन्न = वदां रेषप्रकरणमें। 
तन्मत = उनके मत में = उद्धर के मतमें । तष्य = उसका व्याजोक्ति नामक अल्कार का। तद्‌ 
भ्यतिरिक्त = उत्ते वचे = जपदति मेँ तो अप्रकृत का उपादान प्रकृत के उत्कपेके क्षि ही होता 
दै; जव कि इस्त व्याजोक्ति मँ अप्रक्रुत वस्तु प्रकट हुड प्रकृत वस्तु को छिपाया करती है। इस प्रकार 
इन दोनों बहत वड़ा मेद दहै। इस प्रकार [ उङेष प्रकरण मं उदध्रत ] “आक्ृष्यादावमन्द०ः 
इत्यादि [ पद्य ] मे भ्चोटी" रूप अन्य वस्तुको वीचमें लाकर प्रकट हए प्रियरूप अथैका चछिएाना 
ही वाक्याथ स्वरूप हे, यतः वदँ व्याजोक्ति दी है, अपहुत्ति नहीं । अत एव यरद [ भगके सत्र 
दारा प्रतिपादित ] वक्रोक्ति भी नदीं दै क्याकि उसका स्वरू “सरे प्रकार से योजना करना! है ॥ 


विमक्ञं--इत्तिकार ने दटेषप्रकरण के अन्त मे अपहृति के दो मेद इस कारिका द्वारा 
-बतलार थे- 
साद दय्व्यक्तये य त्रापहवोऽसातपहतिः । 
अपहवाय साद्य. यत्राप्येषाप्यपह्तिः॥ 
सके पूवे वृत्तिरमे वदं छिखा धा--उमयथाप्यपहुतिसंमवात्‌ सादृदयपयेवसयिना वापहवेन, 
अपह्ुपयेवस्ायिना वा सराश्येन, भूतार्थापहवस्योभयत्र विद्यमानत्वात्‌ [ १० ३७३ ] यय (अप 
इत्तिग्रन्थेः चिखने का अथे विमरिनीकार ने जपह्ुत्तिविषयक पूवं चचां किया है, संजीविनीकार 
इस पर चुप 1 वस्तुतः अपहृततिप्रकरण मे भौ दसते भिरुती जरती निम्नङ्िखित बात आह 
दे - “अपहवपृत्रक भारोप तथा आरोपपूवैक अपव ।? भारोप साटर्यमुलक दोता है। प्रथम चेद 
मं अपहव उसका निष्पादक होगा। फलतः व्ह अपहव साष्दथ के छि९ होगा । द्वितीय में 
उसके विपरीत क्त्य भपहव के किए दोगा । इसते प्रकृत श्रन्थ का संबन्ध जोडा जा 
सकता हे । + 
 इतिहास--व्याजोक्ति बामन कौ देन है । उनका सूत्र है--^्याजस्य सत्यसारूपयं व्याजोक्तिः । 
व्याजपरृण वस्तु का सत्य वस्तु के साथ सादृरय व्याजोक्ति कदलाती है । इसे वामन ने 
. मायोक्ति भी कहा गया बतलाया हे । उदादरग--काशपुष्पल्वेनेदं साश्चपातं सुखं मम' मेरा सुख 
जसू युक्त श्सल्िएिहै कि इसमें कासपुष्प का कड़ा मर गया है। यहाँ साच्विकमाव से जनित 
जश्चुको काशापुष्प के बहाने छिपाया गया है उद्धर ओर रुद्रटः के काग्यालकारो मेँ यद् अलकार 
-नहीं भिल्ता । 
मभ्मट--ने “शेलेनद्रप्रति०ः प्य का दी उद्राहरण देते इए व्याजोक्ति का विवेचन इस प्रकार 
किया धथा-- 
[ सू° ] ¶्याजोक्तिच्छद्‌मनो द्धि्वस्तुरूपनि गूहनम्‌? । 
| घ्र° | निगृढमपि वस्तुनो रूपं कथमपि प्रभिन्नं केनापि व्यपदेशेन यदपह्वयते सा व्याजोक्तिः । 
न चेषापहुततिः प्रकृताप्रकृतो भयनिष्ठस्य साम्स्येदासंमवात्‌ । उदा० श्लेलेन्द्र०? । अत्र पुलक्वेपथू- 
` साच्िकरूपतया प्रसृतो शेत्यकारणतया प्रकारितत्वाद पल्पितस्वरूपौ व्याजो क्ति प्रयोजयतः ।' 


उ्याजोकत्यलखङ्नरः ६५७५ 


प्रकट हुए वस्तुरूप को बर द्वारा छिपाना व्याजोक्ति वस्तुकारूप छिपा होने पर किसी 
प्रकार प्रक्टहो गयाहो तोक्िसी मी वकने सेउसे जो चछिपाया जाताहै वह व्याजोक्ति 
कहराता है । यदह अपहृति नीं है व्याक यदहं प्रक्रत ओर अप्रकृत के बीच साम्य की विवक्षा 
नदीं है । “उदा० रोलेन्द्रप्रति०ः मेँ रोमांच भौर कम्प साच्तिकरूप मेँ प्रकट है भौर रौत्यजनित 
वतलाकर उनकी वास्तविकता छिपा गहे । स्पष्ट है कि स्वस्वकार का दिवेचन मम्मटर कै 
विवेचन पर आश्रित हे । 

रत्नाकरकार- ने व्याजोक्तिको व्याजके जिर वाक्यप्रयोग तक स्तीभित नदीं रखा, उसे 
चेष्टा आदि दारा भी संमव वतलया है। इसी प्रकार उद्धेद प्रकाशन को भी दो प्रकार 
का माना दै आङक्यमान तथा उत्पन्न) इस प्रकार उर्दोनि इसे चार प्रकार का माना है। 
चेष्टा आदि को उक्तिस्वरूप मानने के ल्यि उन्ह लक्षणा का सहारा लेना प्डादहै; उनका 
लक्षण केवल्- 

'उद्ेद प्रच्छादनं व्याजोक्तिः ॥ १०४ ॥ 

'उद्धेद = प्रकाद्चन को छिपाना = टेँकना ब्याजोक्ति--इतना ष्टी है। इनका आद्यंक्यमान 
उद्धेद का उदाहरण अप्पयदीक्षित के उद्ाहरणमसे गताथदहै। उत्पन्न उद्धेद के किए उन्हे 
(ज्ेलेन्द्रप्रतिपायमान > पयका ही उदाहरण दिया है । 

मोलित भौर व्याजोक्ति का अम्तर करते इर उनन्दोनि लिखा है- 

'उद्धेदस्य निरूपण स्वरसतो हेत्वन्तराच्चेद्‌ भवेत्‌ 
प्रत्यूहः समधम॑कोत्करगुणाप्रच्छाद नान्मीलितम्‌ ! 
व्याजोक्तरभिसन्धिपूवेकतया चेश्ादिनोक्त्याऽथवा 
व्याजेन प्रतिभेदगृहनमतो युक्तं विविक्तं वपुः ॥' | 
मीखित ओर व्यानोक्ति दोनो मे उद्मेदतो स्वतः होता है किन्तु प्रच्छादन के हेतु मे अन्तर 
रहता है। मीलति में प्रच्छादन नमान धमं वाले पदाथंके उङ्कृष्ट गुणों से शेता है, जव कि 
व्याजोक्ति मे चेष्टा भादि के दारा अथवा वाक्य द्वारा प्रच्छादन जाननृञ्च कर किया जाता हे 


अप्पयदीक्तित = "व्याजोक्तिरन्यहेतूक्त्या यदाकारस्य गोपनम्‌ । 
सखि ! पर्य गृहारामपरगेरस्मि धूसरा ॥ 
कोड अन्य हेतु देकर आकार का छिपाना व्याजोक्ति क्लाता है। य-द सखि ! देख 
मने घर कै बगीचे के परागसे धूसरित हदो गहू यहाँ धूर मेँ पड़ करकी गई चोयैरति किसी 
के द्वारा जानने के पले ही छिपाह गहंहै। न केवल वाज्य ही अपितु चेष्टादि अन्य दहतुर्भो को 
मी नप्पयदीक्षितने रत्नाकरकार के ष्ठी समान प्रच्छादनहेतु माना है। जैसे कोद नायिका 
अपने भनुरागजनित रोमांच को प्रणाम के बहाने छिपातौ है । 
पण्डितराज के रसगंगाधर मं यह अलंकार नहीं भिरता । 
विश्वेश्वर- ने मी वाक्य ओर चेष्टा दोनों केद्वारा प्रकट आव केचछिपाव मेँ व्यानोक्ति 
मानी है- 
“+्याजोक्तिविंशदीभवदथस्यापहुत्तिभिषतः ।` 
अप्रकाश्यस्याथस्य कथञ्चिद्‌ विभावनप्रसङ्गे सति केनचित्‌ कैतवेन तदपहवो व्याजोक्तिरित्य्थः। 


अप्रकाद्यानीय अथं का किसी भौ प्रकार से प्रकाम काप्रसंगआ जाने परकिसी भी बहाने 
उसे छिपाने को व्याजोक्ति कदा जाता है । 


दैणदे अच्छञ्ारसवंस्वम्‌ 


बाक्यातिरिक्त उपाय का उदाहरण उन्न शदम्पत्योनिि०ः पद्य दिया है जिसकी मावयोनना 
यह दै-- “रात की बातचीत जव शुक सवेरे सख्यो के सामने बोल्ने ल्गा तो चतुरा ने अनार 
कादाना देकर उसकी चोच वन्द कर दी) 


चक्रवती की निष्कृष्टाथकारिका इस अलंकार पर यद दै-- 
“व्याजोक्तिव्याजवचनेनो द्धिन्नस्य नि (हनम्‌ । 
अपहवाय साददये दृष्टा नापहुतियंतः ॥' 


प्रकट अथं का व्याजवचन के दारा छिपाना व्याजोक्ति कहलाता है। यदह अपहति नीं है 
क्योकि वह साद्रयमूरुक अपहव [ छिपाव ] में होती दै) 
[ स्वंस्व | 
[ घू० ७८ ] अन्यथोक्तस्य वाक्यस्य काङ्रकेषाभ्यामन्यथा 
योजनं वक्रोक्तिः 
उक्तिञ्य पदेश्साम्याद्‌ व्याजोकत्यनन्तरमस्या लक्षणम्‌ 1 यद्वाक्यं केन- 
चिदन्यथाभिष्रायेणोक्तं सद्‌परेण वक्रा काकम्रयोगेण श्टेषध्रयोगेण वान्यथा- 
न्यार्थंघडनया योञ्यते तद्क्ितिः वक्रोकितः । काङ्कप्रयोगेण यथा- 
गुखुपरतन्बतया बत दरवरं देश्यसुद्यतो गन्तुम्‌ । 
अदलिङ्कलकोकि कचि नेष्यति सखि सरभिसखमयेऽसौ |+ 
अन्रेतद्धाक्यं नायिकया आगमननिषेधपरत्वेनोक्तम्‌ । तत्सख्या काङ्क 


प्रयोगेण विधिपरतां भापितम्‌ । काङ्वराद्िधिनिषेधयोविपरीतार्थ- 
रू ऋन्तः । | 


तच्न क्षो ऽभङ्गसभङ्गत्वेनोभयमयस्येन जिविधः ] तजाभङ्गशङेषसुखेन ॑ 
यथा- 
अदो कनेरी वुद्धिदाखणा तव निर्मिता । 
त्रिगुणा भ्यते बुद्धिनं व॒ दाख्मयी कचित्‌ + 
अन्न दारुणेति प्रथमान्तं धक्रान्तं श्टेैषभङ्गचा तृतीयान्ततया संपादि 
तम्‌ । 
 सभङ्गदटेषन्रुखेन यथा- 
च हाल्राहटश्रत्कसेषि मनसो मूच्छ समालिङ्कितो 
हालां नेव बिभि नेव च हट मुग्धे कथ हालिकः । 
सत्य हाल्धिकतेव ते सुखिता सक्तस्य गोवाहने 
वक्रोकत्येति जितो हिमाद्विञ्ुतया स्मेयेऽबताद्‌ वः हिवः ॥ 
 उभयसमुखेन यथा- 
"विज्ये कशरलठस्ञ्यश्चो न क्रीडितुमहमनेन सह शक्ता । 
विजये कचाखोऽस्मिन त च्यक्चोऽश्चद्धयभिदं पाणौ ॥ 


वक्रोक्त्यलङ्कारः ६५७ 


किं मे दुरोद्रेण पयातु यदि गणपतिर्यं तेऽभिमतः। 
कः प्रद्वेष्टि विनायकमदहिलोकं किं न जानासि ॥ 
चन्द्र्रहणेन विना नास्मि रमे किं पतारयस्येवम्‌ । 
देव्ये यदि रुचितमिदं नन्दिन्नाहयतां राहुः ॥ 
दा राहौ श्ितदंष् भयङृति निकरटस्थिते रतिः कस्य । 
यदि नैच्छसि संत्यक्तः संप्रत्येषेव हदाराहिः।। 
वसुरदितेन कीड़ा भवता सह कीडरी न जिहेषि । 
किं वद्भिनेमतोऽमून्छुराखरान्नैव पश्यसि पुरः ॥ 
आरोपयसि सुधा कि नाहमभिन्ञा किल स्ववृङ्कक्य । 
दिभ्यं वषेसदस्नं स्थित्वेति न युक्तमभिधातुम्‌ ॥ 
इति छतपञ्ुपतिपेखवपारकलटीटाप्रयुक्तवक्रोक्ति । 
हषवश्ातरखतारकमाननमग्याद्‌ भवान्या वः।' 
वक्रोक्तिरान्दश्चाटंकारसामान्यवचनोऽपीदाटकारविदोषे संक्ितः । 


[ सूत्र ७८ | न्यथा कथित चाक्ष्य की काङ ओौर श्रेष के द्वारा अन्यथा योजना 
[ हो तो अर्कार को | वक्रोक्ति [ कहा जाता हे ] 


[ वृत्ति | इसका लक्षण उक्तिमें छल को समानता को लेकर व्याजोक्ति के बाद किया जा 
रहा हे। जो वाक्य किसी [जन्य ] के दारा अन्यथा भात्‌ अन्य भभिप्रायसे कदागयादहो 
ओर अन्यके द्वारा काङुप्रयोग विवा रलेषप्रयोग के धार पर, अन्यथा अर्थात्‌ अन्य अथं में 
लगाया जाता हे उस [ वाक्य ] की उक्ति वक्रोक्ति कराती है । 

काङु प्रयोग से, यथा- 

वड़ो के अधीन होने से दूरतर देश जाने को उद्यत यह दन्त, अकिुरु भौर कोकिल 
से रुक्िति सुरभिपस्तमय मेँ नदीं भाएगाः। इस वाक्य को नायिका ने भागमन के निषेध [ नदीं 
ही भार्गा - इस | के अभिप्राय से कहा, [ अतः इसे वत या हन्त का अर्थं खेद हमा किन्तु] 
उसको सखीने [ नहीं भाएगा क्या? ईस प्रकार ] काकुप्रयोग से [ भवदरय आण्गा इस अर्थम] 
विधिपरक बना दिया । [ अतः इस अथमेंवतया इन्तका अथं हषं हुआ] निषेधरूपी भथ की 
विधिरूप अथंमेजो संक्रान्ति हरं उसका कारण काङु प्रयोग है । 

दलेष अभङ्गरूप सभङ्गषूप, तथा उभमयरूप से तीन प्रकार का होता है । इनमे से- 

अभङ्गरलेष से [ वक्रोक्ति ] यथा- 

अहो ¡ किस दारुण ने तुम्हारी शस प्रकार की बुद्धि बनाई है। बुद्धि तो तीन य॒णों [ सत्व, 
रजस्‌ तथा तमस ] से बनी सुनी जाती है, दारु से वनी तो कदीं नदीं । 

| दारुणा = दारुण राब्द का खीलिग प्रथमेकवचन तथा दारु शाब्द का तृतीयेकवचन। 
दोनो पक्षो मे शब्द एक ही बना, अर्थमेद के साथ उसमे भङ्ग नदीं हभा अतः यह अभङ्गररेष 
का उदाहरण हुआ ]। 

सभङ्गरलेष से [ वक्रोक्ति | यथा- 

[ पावती ] तुम हालाहर्धारी [ हालाहल = विष तथा हाला = वारुणी ओर इर को 
धारण करने वाले हो, अतः आलिङ्गन करते ही मनको मूच्छित करदैते हो [शिव] 


२ अ० स० 


६९९८ अलङ्कारसवंस्वम्‌ 


नमैंष्टालाद्ी धारण करता गौर हरूद्ी, अरी मोली, मेँ क्या हालिक [ किसान] हू। 
[ पावेती ] वु ( सचमुच ) इदाछिक कहा जा सकत है क्योकि तुम गोवाहन [गो = नन्दी इषः 
तद्रुपी वाहन तथागो=वैरकोह्यंकने ] मे जो लगे रहतेहो। इस प्रकार वक्रोक्तिमें पावती जी 
दारा जीत लिए गए अत एव सुसक्रुराते हट भगवान्‌ जापक्छी हमारी रक्षा करं । 

उभयरलेष से [ वक्रोक्ति], यथा-[ उमामहेदवरसवाद-[ पाकेती] [ सखि] विजये; 
[ विनया का सम्बोधन तथा विजय राब्द का सप्तम्येकवचन ] ये च्रवक्ष [ तीन अक्ष = अक्षि = नेत्र 
तथा अश्च = पासे वाटे ] बडे ऊुदाल दै । सें इनके साथ यतक्रीडा नहीं कर सक्ती । [ शिव ] विजय्‌ 
मतो कुश्च हू परन्तु च्यक्ष [ तीन परापे वाला ] नदीं ह, मेरे दाथ मे पपसेकेवल्दोदीदहे॥ 

[ पावती ] मेदुरोदर [ मे = सुन्ञे दुरोदर = य॒त तथा मेदुर + उदर वाला भदुरोदर = गणेश्च | 
नदीं आता । [ शिव ] यदि तुम्दें नहीं भातातो गणेश्च चला जाए । [ पावती | विनायके [ विना- 
यक = गणपति तथा वि = पक्वी उनका नायक = गरुड ] से किसको देष है, [दिव] तर्द क्या 
अददिलोक [ सर्पो ]काक्ञान नीह [जो गरुड से देष करते रै ]॥ 

[ पावती ] में चन्द्र्रहण [ चन्द्र की वाजी तथा चन्द्रयहण राहूपराग ] के विना नदीं खलती यूं 
डौ वर्यो सुस्चे छल रहे दो । [ शिव ] नन्दिन्‌ देवी को यदि यदी भ्रियदै तो दुलाओ रा को॥ 

[ पावती ] दा रादौ [ हा, रादौ = राह पर, हार +अदौ = दारके सपे पर] जो तीखी 
डाद्‌ वाला जौर डरावना है, पास आपतो किमे प्रेम होगा ' [शिव] यह दारादि [ हारभूत 
सपं ] तमद पसन्द नर्हीतोलो इसे अभी हार छोडदेतादहू॥ 

[ पाश्ती ] तुम ठरे वु [ धन तथा आठ वसु [-रहित । वुम्दारे साथ कंसा जज, काज 
नदीं आती । [ शिव ] सामने [ आने | वस्तुर्था के साथ प्रणाम कर रदे इन देव ओर दानवं 
कोदेख न्दी रहीद्ोक्या? [शस आयांका 'सक€ वु परस्यसि क्रिम्‌ १ एसा पाठ अधिक 
च्छा होता] ॥ 

[ पावती ] वेकाम यो भारोपसि [ भारोप लगा रहे, उठारदेद्ो] मैं तुम्हारे अङ्क [ दोषा- 


रोपण तथा गोद ] से जनभिच्रह । [ शिव ] दजार्यो दिव्य वर्षो तक [गोदे] वैठ्कर भी इस 
प्रकार कना ठीक नरह ।} | 


श्य प्रकार शिव के साथ चूत की लक्ति क्रीडां प्रयुक्त की गहं वक्रोक्तिकी प्रसन्नता स्े 
चंचल तारा वाला पाक्तीका मुखमण्डल आप हमारी रक्षा करे ॥ 


[ यर्हा-- विजये, च्यक्ष, विनायक, यण, वसु, जारोप तथा अदभु शब्द मेँ तोड नकीं होती 
अतः ये अमङ्ग इलेष के उदाहूरणद्े, मेदुरोदर तथा हाराहदो शब्दम वह होती ह | अतः सभङ्ग 
देष है । पूरा सन्दमे एक वाकोवाक्य है अतः यहाँ मारम्भसे अन्त तक शक वक्रोक्ति मानी 
जायगी || | 

वक्रोक्ति राब्द अलंकारमात्र का वाचक है तथापि य्दा एक विज्किष्ट अल्कार केलिए प्रयोग 


मे खाया गवादहे॥ 
विमरशिनी 


अन्येत्यादि । एतदेव व्याचष्टे--यद्वाक्यमिति । भन्याभिप्रायेणत्ि । विवदङधितार्थ॑परतये. 
रयर्थः। काकुः ध्वनिविरोषः। यडइक्तम-- 
'वाक्येऽभिघीयमानोऽथो येनान्यः प्रतिपद्यते । 
सि्कण्टध्वनिधीरेः स काकुरिति कथ्यते ॥' 
अन्यार्थवटनयेत्ति । प्रक्रान्तादन्यस्य ष्यतिरिक्तस्याथस्य घटनयोश्ढेखनेनेस्यथः । येनकेन. 
चिद्वकषत्रामिप्रतार्थ॑स्य प्रतिपिपादयिषयोक्तश्य वाक्यस्यान्येन विघाताय प्रहेकिकामात्राय 


वक्रोक्त्यटङ्कारः ६५९ 


'नवकर्बरुकोऽयं माणवकः" इष्यादिना वाक्डुलेनान्यथायोजनमाघ्रमयमरंकार इति 
पिण्डाथेः। भत एव हितीयो व्याघातो नाशया सेदतया वाच्यः! न हि तन्न दचनविघाता. 
ये वान्यथा योजन । तन्न हि (वारु इति सुतराम परित्याऽयोऽस्मि, रखणीय इति मवद सुज- 
पञ्जरं रकास्थानम्‌' इत्यादौ बारस्वादिकं प्रस्थाननिषेधक तथा राञ्यवघंनेन संभावितं ्रीहूषंण 
पुनरन्थथा प्रस्थाननिसित्ततया योजितम्‌ ! अतश्चात्रान्यथा योजनस्य प्रस्तुतवस्तुव्याह- 
तिनिबन्धनस्वेऽपि प्रस्थानविधौ तास्पर्यभ्र । ननु तदह्धिघातमान्रेणास्य वक्छोक्तावन्तर्माव 
इति चेत. तहि साधम्यविहेषाङपमेयोपमादौ नामप्युपमायासन्तभावः कि न स्यात्‌ । 
अथात्र फरमेदोऽस्तीति कथमेतदिति देत्‌ , एवमिहापि फरभेदस्य विधमानत्वात्कथम 
स्यान्तभावः स्याद्‌ । तथाद्यन्यथा योजनस्य कछविद्चनवि घातमाघ्रं फर चि संभाष्य- 
मानभ्याहतिनिवन्धघनव्वेऽप्यर्थान्तरे ताष्पयंम्‌ । फठमेदश्वारंकारमेदनिमित्तमिषध्यविवादः । 
तेन पून वक्रोक्छिरपश्न्न व्याघात इति यथोक्त एवारूकारभेदो न्याययः। एवं फङान्तरे- 
स्दपि ज्तेयम्‌ । तस्मात्‌ 


०एष श्री कण्डकण्डच्छु विर्‌न मिसतो राजहंसत्रजानां 
सथयस्तापं ;प्रजानां . प्र्ञसस्ुपनयन्नच्डुधाराष्डुखेन । 
ङवंन्दिक्चक्रवाराक्रसणस्ुदयते देव को वारिवाहो 
मा में मालवेन्दो परिमर कतर स्तर्हि राजन्नविस्ते ४ 

इव्यत्र रोन्नरा संभादितस्यान्यथा खङ्गष्वेन योजनं, तस्य॒ तत्घादश्यप्रतीरयथं- 
मिष्यङ्गभूतोत्तरमाथमोपश्यं वदतुदिवकितम्‌ । "वाक्हुलञुपचारच्छलस्‌ , तदविशेषा- 
दिति वाक्छुकेनेवास्य संमरहादुएचारच्छुरात्मकम । कचिष्वौप्ारिके प्रयोगे 
सु ख्यार्थापाद नमिति सेदान्तरमप्यस्य। न वाच्यस्‌ । यस्तु तषुथान्तराभावादिति 
न्यायाद्वागुपचारण्डल्योर्विशेष उक्तः, स नेयायिकानासुपयुक्तो नारुकारिकाणाम्‌। 
तथास्वेनान्यथायोजनस्थ वेचिष्या(न्तरामावात्‌ । यद्वा सुर्यो पचारिार्थहयस्येकच्न्त- 
गतफख्द्यन्यायेन शटदृश्छिष्टरवादश्य श्रेषवक्रोक्तावन्तमांवः स्याह । उभयसुखेनेति । 
सभङ्गासभङ्गश्छेषह्वारेण । विजय इति श्ठेस्याघ्भकङ्गष्वम्‌ । मेदुरोइरेणेति सभक्त 
त्वमर्‌ । “्मेरोऽवताद्वः शिवः तथा श्रयुक्तवक्षोक्िः इव्यादिन। वचनविघातमात्न- 
प्रयोज नस्यान्यथा योजनस्य प्रहेकिकाप्रायत्वमेव भङाश्चितम््‌ । नलु शेषा स्वेव वक्रोक्छिः 
कोऽलंकारोऽनया विनाः इति नीष्या समग्र एवालंकारवगो वक्रोक्तिरूप इति कथ. 
मयसेव तथाष्वेन निदि्ट इष्याशङ्कयाह--वक्रोक्तीत्यादि । इदेति । वाक्ुलार्मकव्वेनोक्तेः 
कौ रिस्यात्‌ । । 

अन्यथेष्यादि । श्सी की व्याख्या करते है-यद्‌ वाक्यम्‌०। अन्याभिप्रायेण = अन्य अथं 
के अभिध्राय से = अर्थात्‌ विवक्षित अथै के अभिप्राय से। काकु = स्वरविशेष । जेषा किं कदा हे- 

ध्यक प्रकार की असाधारणया विष्टोष प्रकार की उस कण्ठध्वनि को काऊु कहा जाता ह 
जिसे [ सामान्य | वाक्य में कका जा रदा अथं भन्यरूप मे समज्ञा जाता हे । 

अन्यार्थघटनया = प्राकरणिक अथै से भिन्न किसी भन्य मथ कौ घटना = उदरे = समञ्च से । 
निष्कं यइ किं किसी वक्ता के द्वारा अपने मभिप्रेत भथं के प्रतिपादनके छि कहे गए वाक्य 
की योजना का, उक्त भथे कोका कर पेली के समान 'नवकम्बलकोऽयं माणवकः" ( न्यायदश्च॑न 
सूत्रमाष्य १।२।१२ ) इत्यादि । 

वाक्छल के मध्यमसे दूरे रूपमे क्षिया जाना दयी श्स अलकार का स्वरूप है। इसलिए 
[रत्नाकरकार को] द्वितीय व्याधात को शका भेद नदीं बतलाना चादिए । उसमें अधैकौजो भित्र 


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दिदे० अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


रूप मे योजना दोती है वह्‌ केवर किसी के वचन को कारनेकेलिए नर्ही। उसमेँतो षालहूं 
तो ओर भी अपरित्याज्यर्हू, रक्षगीयर्हूतो रक्षास्थान आपका ही अुजपजर हैः शव्यादि स्थर्ले 
मे राज्यवधन वाकत्वादि को प्रस्थाननिवारक समञ्चतादहै, श्रीहषं उन्दँ प्रस्थाननिभित्त के रूपमे 
वतलाते दें । [ अथात्‌ यदहो विघाततके को साधक षनाया जाता दै जव कि वक्रोक्ति साधक को 
विघातक्र रूपमे च्या जाता दहै] इसीलिए = याँ “अन्यथा योजना" = दूसरे प्रकार से लगाने" मे, 
प्रस्तुत अथैका व्वात्ततो होतादहै परन्तु, तायं प्रस्थानविधिमें ही रहता है! केवल उस 
[ प्रस्तुत अर्थं ] के विधान मात्र को लेकर इस [ व्याघात के द्वितीय मेद ] का वक्रोक्ति मेँ अन्तभाव 
करगेतो सवम साधम्यं की स्थिति समान देखकर उपमेयोपमा आदि का मीउपमामें ही 
अन्तमांव करना होगा । यदि कदं करि यहाँ [ उपमा ओर्‌ उपमेयोपमा आदिमे ] फल भिन्न षह्ोता 
द । [ उपमा में केवल सादररय उपमेयोपमा मेँ दितीयसद् व्यवच्छेद ] अतः यह्‌ कैसे संमव दहै [किं 
उपमेयोपमा आदि का उपमा मेँ अन्त्माव शिया जार ] तो इस [ व्याघात ] का अन्तमावमी कैसे 
करिया जा सकता है; फल में भिन्नता यददो मी विद्यमान दहे) यह इस प्रकार कि कीं तो “अन्यथा 
योजनाः का फल केवल वचनविघात द्यी हदोतादहै ओर कदींहोतादहै अन्य किसी अर्थंका प्रति- 
पादन, यथपि इस दूसरे प्रकार नँ अन्य अथंका विघात मी रहताहे) यह तो सवमान्य तथ्य दै 
कि अलंकार का मेदक तत्व फल्मेद दी है। इसलिए प्रथम स्थम वक्रोकि गोर द्वितीये 
व्याघात मानना उचित दै। अतः इन अर्कार्तोमे [ सर्गस्वकारने] जो भेद बतलाया है उसे 
[ रत्नाकरकारको मी] उसीलरूप मेँस्वीकार करना उचितदहे। श्सी प्रकार अन्य अलंकारोमें 
मी जानना चाहिए जहां अन्य फल निकल्ते हे। शस कारण-[ अल्काररत्नाकरकार दारा 
वक्रोक्ति के उदाहरण के रूप मं उद्धृत ]। 

“| कवि | हे देव, यद्‌ उदितददो रदा है, जिसकी छवि नीलकण्ठ ( भगवान्‌ रिव ) के{{कण्ठ के 
समान इ, राजहंसो को अप्रिय रहै, स्वच्छध।राके जलसे प्रजा वग का संताप तत्काल चान्त 
करतादहेः जो दिदयार्ओ पर आक्रमण करता है, [ राजा ] कौन, मेव १ [ कवि ] नहीं मालवचन्द्र ! 
प्सा नदीं, [ राजा ] तव कौन दहै रेस्ा, [ परिमलकवि ] राजन्‌ आपका खड्ग 
4२ मं खनने वाले [राजा सादसाक] के द्वारा संभावित मेघरूपी अथ॑ की योजना खडगरूप 

कौ गदं है, रेसा उत्त [खड्ग से उस [ मेव ] के साद्य का ज्ञान कराने के किष किया गया 
हे । श्स कारण यहाँ वक्ता का विवक्षित अथं सादृदय दी है, जिसमे यँ उत्तरालंकार्‌ को अंग बनाया 
गया हे । उपचारच्छल को वाक्टल ही क्यो न मान लिया जाए, क्योकि उससे इसका कोई अन्तर 
नहीं ह, (न्यायददरोन १।२।१५ द्वारा प्रतिपादित] शस वाक्छल के दारा ही इस [रत्नाकरकार दारा 
करिपत उपचारवक्रोक्ति नामक वक्रोक्ति के नवीन भेद ] का संग्रहो जाता है, अतः [रत्नाकरकार 
ने जो] उपचार च्छलात्मक भेद यह कदते हए माना था कि रयोग कीं मौपचारिक होता ओर वं 
सुख्याथ को ऊपर से लाना पडता", वहमेदभी इस [ वक्रोक्ति] में नदीं बतलाया जाना 
चादि । [ न जने किसने ओर काँ ] जो “उन मेँ अर्थान्तर का अमाव रहता है यह्‌ तर्क देकर 
वागुपचार जर वाक्छल का अन्तर किया है वह न्यायश्चाखियों के लिए उप्यक्त ३, आलंकारिकों 
के लिए नदीं । अथवा मुख्य मौर भौपचारिक दोर्नो अर्थौ का एकव्रन्तगत दो फलके स्षमान 
दाब्द के साथ चिपके रहने से इसका अन्तमाव इलेषवक्रोचछि मे हदो सक्ता है । उभयमुखेन = 
सभङ्ग तथा असमङ्ग दोनों दलेर्षा के दारा "विजये इसमें रेष असङ्ग है तथा भेदुरोदरेणः में 
सभङ्ग । “सुर्छुराते चिव आपकी ओर हमारी रक्षाकरं तथा "वक्रोक्ति के प्रयोगसेः इत्यादि के 
दारा यही सूचित किया किं “अन्य प्रकार से योजना करने काः उद्देदय केवल वचनविघात दी 
र्ता हे, अतः यह्‌ पेटीजेसीदही रहतीदहै। 


| 


वक्रोक्त्यल्ङ्ञारः ६६१ 


यह सव वक्रोक्तिदही हे इसके विनाकौन सा अलंकार निष्पन्न हो सकता हैः इस प्रकार 
[ मामद आदि ाचार्योने | सभी भल्कार्रो को वक्रोक्तिरूप दही बतलाया है। तव यदय इसी 
अल्कार को वक्रोक्तिरूप वर्यां कहा "ठेसौ शंका उठाकर उत्तर देते है वक्रोक्ति हह = यां 
अर्थात्‌ क्योकि इस भल्कार में वाक्छक्शरूप से बोला जाता है जतः इस्त कुटिलता रहती है अत 
इसे वक्र'-- उक्ति कहा ।" 


विमश-दहितीय व्याघात का बाल इत्ि०ः इत्यादि जो उदाहरण हषेचरित से दिया गया 
दे उसमें रत्नाकरकार ने अथवक्रोक्ति मानी थौ । उनके अनुसार वक्रोक्ति केवर राब्द का ही 
अलंकार नहीं हे । विमरिनीकार ने उनका खण्डन ओर सर्व॑स्वकार का समर्थन करते हुए व्याघात 
के द्वितीय मेद ओर वक्रोक्ति मेँ अन्तर स्पष्ट किया है। उनके कथनानुसार इनका अन्तर फलगत 
भेद पर निमेर हे । वक्रोफि का उद्देरय या फल केवरू वचनविघ।त अथात्‌ दूसरे के कहे शर्ब्दो 
की तोड़ मराड़, अथवा वक्ता द्वारा अरभिप्रेत अथैको बदलना होताहै। शस प्रक्रार वक्रोक्ति का 
चमत्कार अमाव या निराकरणपर ही जिभर रहता! व्याघात के द्वितीय भेदम न तो वक्ता 
के राब्दों की तोड़ मरो ददौ रदती, ओर न उनका पूर्वांभिमत अथं टी बदला जाता, केवर उसकी 

ग्राह्यता सिद्ध की जातौ है; किन्तु इसका उद्देश्य केव यही नदीं रहता । इसमें दितीय अर्थं 

की स्थापना मी की जातो है ओर यही सुख्यतात्पयेविषयीमूत अथेष्टोताहे। न्यायकौी भाषा में 
यर्हो--पवेप्रतिपादितकारणतानिरूपितप्रतियोगिता को पूवप्रतिपादित कायं से हटाने मात्र मे तात्पयं 
नहीं है अपितु उसे तद्विरुद्ध काय॑ मे नियोजित करने मे तात्पयं रहता है । इस प्रकार इस 
अल्कार का चमत्कार ्षभाव पर नीं विधि पर, ओर निराकरण पर नदीं स्थापना पर निभैर 
रहता हे । 

ह तिहा :- वक्रोक्ति एक विशिष्ट सर्कार -- 

वक्रोक्ति नाम तो वामनमें मी भिर्ता है किन्तु वहो इसका स्वरूप भिन्न हे । उनका सूत्र है- 

लामन--“सादृदलक्षणा वक्रोक्तिः) । अर्थात्‌ गौणी लक्षणा वक्रोक्ति है 1 

उदाहरण के लिए 'उन्मिङ कमर सरसीनाम 


त्र्यो के कमल सखु गर । यहाँ उन्मीलन पर खुलना धमेनेत्र काहे, उसे विकास्रूपी 
साधम्यं के आधार पर कमर में भन्विति करदिया गयादहे। हस्र प्रकार वामन की वक्रोक्ति 
ओपच।रिक वाक्यप्रयोग दहे) 


सद्रट--इसका यह जो रूप सवेस्वकार ने दिया है प्रथमतः रुद्रट मे मिलता है। उन्कषँने इसे 
शब्दाल्कारो के प्रकरण में गिना है मोर शसका विवेचन इस प्रकार किया है- 


“वक्त्रा यदन्यथोक्तं व्याचष्टे चान्यथा तदुत्तरदः । 
0 = ५ द 
वचनं तत्पदमभङ्गेक्ञेया सा उटेषवक्रोक्तिः ॥२।१४॥ 


वक्ता दारा अन्य अभिप्राय से कथित वाक्य की व्याख्या उत्तरदाताके दारा षदोंको तोड़ 
मरोड़ कर अन्य प्रकार से की जाय तो वह अलकार दलेषवक्रोक्ति कदशाता हे । उदाहरण-- 


फिंगौरि मां प्रतिरुषा ननु गौरहं फिम्‌ !› शिवजी ने कहा गोरि मां प्रति = हे गौरी! मेरे 

प्रति रोष कर्यो । पार्वतीजी ने भं क्था गौः इमां प्रति, अधीत द गो, शके प्रति रोष क्यों 

मोर उत्तर दियाकिभ्व्यामें गौ हं ।' इसी प्रकार रुद्रट ने काडुवक्रोक्ति का भी एक स्वतन्त्र लक्षण 
र स्वतन्त्र उदाहरण दिया है । 


ददर अलङ्ारसवेस्वम्‌ 


मम्मट-ने रद्रट का पू्ण॑तः अनुसरण किया। उन्हने वक्रोक्ति को शब्दालंकार प्रकरणम 
ही नवम उल्लास मं प्रथम अलंकार के रूप मे गिनाया । उनका विवेचन- 
'्यदुक्तमन्यथा वाक्वमन्यथान्येन योज्यते) 
दलेषेण काका वा लेया सा वक्रोक्तिस्तथा द्विधा ॥ 


जहाँ दूसरे के द्वारा अन्य प्रकार से कथित वाक्य अन्यके द्वारा उलेष याकाकरुके दारा अन्य 
प्रकार से योजित करिया जाता हैवहदो प्रकार की वक्रोक्ति जाननी चाहिए । स्पष्टतः रद्ररसे 
आगे बदकर मम्भरने वक्रोक्तिमं अर्थमेदके कारर्णोका भी निवेद किया। उन्दने देष के 
दोनों प्रकार भी इसमें भपनाए अभङ्ग ओर सभङ्ग । इनमे से भमङ्गदलेषके लिए जो उदाहरण सव. 
सर्वकार ने दिया दहै वह्‌ मम्मट से ददी जिया गया है। समङ्गदलेष के किए उनका उदाहरण है 
नारीणां प्रतिकरूकमाचरस्ि चेञनानासि कदचेतनो वामानां प्रियमाद धाति । 

यदि तुम नारीणाम्‌ [नारी खनी, न अरि = दार्भ के प्रतिक्रुरू ] आचरण करते हो 
तो विद्वान्‌ ष्टो । कौन चेतन रेखा दोगा जो वामानां [ वाम = प्रतिक = शद, वामा = 
खन्दरी का | प्रिय काय करताष्टोः। 

काकु के किण मी सवंस्वकार ने मम्मट का इी उदाहरण उदप्रत कर॒ दिया है। सव॑स्वकार्‌ का 
वक्रोक्ति का आधार स्पष्टतः मम्मट का वकरोक्तिविवेचन रहै । 

दोभाकर-- परवती भाचार्यौ में रत्नाकरकार श्चोमाकरने वक्रोक्तिको, जेसा कि कहाजा 
चुका है राब्द ओर भथ इन दोना मे माना है । उनका लक्षण इस प्रकार है- 

[ सु° ] “मन्यथा संभाविततयोः शछब्दाथयोरन्यथा योजनं वक्रोक्तिः । 

[ वृ० ] वक्त्रा श्रोत्रा वा श्ब्दस्याथ॑स्य वान्यथा सुमावितस्य प्रकारान्तरेण योजनं वक्रोक्तिः । 

[ सू० ] “अन्यथा समाचित छब्द भोर थ की अन्यथा योजना वक्रोक्ति कराती है। 

| ब० 1 वक्ता या श्रोता दवारा अन्यरूप मेँ संमावित शब्द या अर्थं की अन्य प्रकार से योजना 
वक्रोक्ति कद्‌ खाती है । 


श्स अन्यथायोजना के उपार्यो मेँ रत्नाकरकार ने काकु ओर रेष के यतिरिक्त धर्मसामान्य को 
भी गिनादहै। 


(एष भीकृण्ठकण्ठ०? पद्य मेँ धम॑साम्यमूलक वक्रोक्ति मानते हए रत्नाकरकार ने छिखा है- 

^“ * "कारत्वादिधमांणां वारिवा्गतत्वेन ओोा संभावितानां वक्त्रा खड्गगतत्वेन योजना कृतेति 
धमंसास्याद्‌ वक्रोक्तिः । 

यहां श्यामत्वादि जिन धर्मो की संभावना श्रोता दारा मेधमेँ की गदे थी वक्ता ने उन्ह खड्गम 
सन्वित किया, शस प्रकार यँ साधारण ध्म॑के आधार पर वक्रोक्ति हरे। सवेस्वकार द्वारा रेष 
के प्रकरण में जितत भाङृष्य ०” भादि पव मेँ शपदुति मानौ है, रत्नाकरकार ने उसमें भौ वक्रोक्ति 
की दही उक्त विधा स्वीकार की है- 

"अत्र कान्तस्य सम्बन्धिभिः अल्कादिकषंणादिधम॑स्य चोलकेऽपि योगात्‌ पूववद्‌ "वक्रोक्तिः । 
यहोँ भिय से सम्बन्धित मरूकादिकष॑णग्रयृति के द्वारा चोकम मी साधारणधमंकौो योजना दहो 
"~~~ | है अतः यदं मी पूर्ववत्‌ [ एष श्रीकण्ठ० पच के हौ समान ] वकोक्ति हे । 
अर्थगत वक्रोक्ति के सन्द म "बाल इति०? स्थर पर रिप्पणी करते हृए किख है- 

"सत्र बारत्वा दिकं प्रस्थाननिवेधकतया राज्यव्ध॑ने संभावितम्‌ ; श्रीदषेण प्रस्थानरिमित्तक- 
तया योजितमित्यथवक्रोक्तिरेव । 


वक्रोक्त्यटङ्गारः दिदे 


यहाँ वात्वादि को राज्यवधेन ने प्रस्थाननिषेधकं समज्ञा । उन्दींको श्रीहष॑ने प्रस्थान- 
निमित्त सिद्ध कर दिया । अतः य्ह अथं वक्तोक्तिदहीहै। 

अप्पयदीञ्ञित से अथवक्रोक्ति को समर्थन भिल्ता है । रनन्दोने शब्दरलेष को भी वक्रोक्ति 
का उपाय वतरते हूर यह उदाहरण दिवा है- 

लक्ष्मीजी पावतीजौ से कहती है- 

सिक्षाथीं स क यातः सुतनुः ! वह भिखारी काँ गया सुन्दरी ! पाठती जी उत्तर देती हे -- 

'वलिमखे-र्वाल के यज्ञ में| वामनावतार मे विष्णु मगवान्‌ ने भी बलि से याजना की थी। 
यहां “भिक्ा्थीं चन्द के स्थान पर याचकः शब्द दिया जा सकता है, किन्तु भ्याचनाः-अथे नदीं 
वदला जा सकता, अतः इलेष अथं गत ही है । विमशिनीकार के अनुसार यहो पुवप्रतिपादिष अथैके 
काटने मे चमत्कार हे अतः भलकार वक्रोक्ति नामसे ही पुकाराजाप्गा। व्याघात का चमत्कार 
पुवप्रतिपाद्वित अर्थं को विरुद्धफलक सिद्ध करने मे होता है, उसकी काट मेँ नीं । अतः अथवकरोक्ति 
मानने पर भी उसका स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं भिटता । 


अप्पयदीक्षित ने काकु तथा शब्दरलेष के दोनों प्रकारोंको मी वक्रोक्ति का उपाय मनाहै 
ओर उनके पृथक्‌-पथक्‌ उदाहरण दिर हे । अमङ्गदलेषमूलक वक्रोक्ति का उदाहरण तो “अष्टो 
केनेटरी०ः पर्यदहीदियाहे। दोनों प्रकार कौ वक्रोक्तियाों को दीक्षितजीने एक दी भलंकार माना 
हे ओर उनका लक्षण शस प्रकार बनाया है- | 

“वक्रोक्तिः उरेषकाकुभ्यामपराथप्रकाश्चनम्‌ ।› 

देष ओर काकु के दारा अन्य अर्थका प्रकाश्चन वक्रोक्ति माना जाता है। जयदेवने श्सौ 
लक्षण मे भअपरार्थ० श्चब्द के स्थान प्र षवाच्याथ० इब्दरखायथा। 

पण्डितराज जगन्नाथ के रसगंगाधर कौ अपूणता यदा मी खलती है । उसके उपलब्ध अंश में 
यह अलंकार नहीं है । विदवेश्वर के मलकारकोस्तुम मे केवल अर्थाल्कारोंका हयी निरूपण है। 
उनम वक्रोक्ति नीं मिलती । वे कदाचित्‌ इसे मम्मट केषी समान केवर शब्दालंकार मानते 
है । श्री विधाचक्रवतीं की निष्छृष्टाथंकारिका श्स पर इस प्रकार है- 


“अन्यथायोजनं वाक्ये वक्रोक्तिरभिभीयते । 
दि प्रकारा च विज्ञेया काकुदलेष समाश्रयात्‌ ॥? 
वक्रोक्ति अलक्कारसामान्य- 
अलंकार माघधको वक्रोक्ति मानने कीजो चचां सवस्व मे आं है उसका मूर मामदकषी 
की निम्नलिखित घोषणा है- 


पसेषा स्वेव॒॒वक्रोक्तिरनया्थो विमाव्यते। 
यत्नोऽस्यां कविना कायैः कोऽलङ्कारो नया विना ॥" 
[ कान्याल० २।८५ | 
'अतिश्चयपूणं उक्ति ही वक्रोक्ति होती है। श्सीते कान्यां मेँ विशेषता आती है । कवि को 

इसके लिय यत्नश्ीर रहना चादिए । इसॐे विना कोन अलंकार अल्कार बन सक्ता है। 
अतिशयोक्ति को काव्य का सामान्य भलंकार दण्डी ने बतलाया था उन्होने ५तिश्चयोक्ति प्रकरण कं 
अन्तमं लिखा था- 

'अलकारान्तराणामप्येकमाद्वः परायणम्‌ । 

वागीक्षमदितासुक्तिमिममतिरयाहयाम्‌ ॥› २।२२० ॥ 


६६४ अलङ्कारसवंस्वम्‌ 


मामह ने यद्यपि अतिद्चयतच्वको दही मद्व दिया था किन्तु उक्त उक्ति की तुला वक्रताकी ओर 
अधिक ञ्ुक गईं । भामह ने इस्तके पूवं मी भवक्रोक्ति [१।२४] कान्य को जच्छा काव्य नहीं कदा था । 
अल्ंकारसामान्य का लक्षण करते हए मी उन्दनि छ्खिा धा-षवक्राभिपेयराब्दोक्तिरिष्टा वाचाम- 
ल्ङ्कृतिः [ १।३६ ] र्मे अथं ओर ब्द की वक्रतापूणं उक्तिदी काव्य का अलंकार मान्यहै। 
दण्डी के अति्यत््व में निशित दही भामह्‌ने वक्रतातत्च खोज निकाला था। ओर उसे अपेक्षा 
कृत अधिक महत्व दिया था । इसी कारण उनकी उपर्युक्त (तेषा स्वव ० कारिका आनन्दवध्न 
भोर मम्भट ने मी प्रमाणभूत कारिका या सिद्धान्तवचन ॐ रूप में स्वीकार कर छङीदहै। 
आनन्दवध॑न ओर मम्मट के वीच दुर कुन्तकाचाय॑ने तो वक्रोक्ति कोदही काव्य का प्रमुख तकत 
स्वीकार कर च्यायथा। सवंस्वकारने आरम्भिक भूमिका मे उनका उव्लेख भी किया है। 
उनका मत है- 
'उभावेतावलकार्यो तयोः पुनर क्ङ्कृतिः । 
वक्रोक्तिरेव वैदग्ध्यमङ्गीमणित्तिरिष्यते ॥› 
शब्द ओर अथं अलंकायं है मौर उनक्रा अलक्कार दै वकोक्ति। जिसका स्वरूप हे बदग्ध्य- 
पूवक विचित्रता के साथ कदी उक्ति ॥ 
मंख ने श्रीकण्ठ्चरित मँ वक्रोक्ति को चन्द्रकला के वँकपने के समान सर्वाधिक आवज॑क्‌ 
तच्च माना दै- 
कलंकरुल्यापि रसप्रवादमपि खवन्ती विुधेकमोग्यम्‌ । 
वाणी किमणांककलेव धत्ते टद्कु विना वक्रिमविश्रमेण ॥ [ २।११ ] 
| सवश्व | 
[ ख ७९ 1] खष्मवस्तुस्वभावयथावदणनं स्वभावोक्तिः । 
इह वस्तुस्बभाववणेनमाचरं नाकारः । त्वे सति सर्वै कान्यमटंकारि 
© 
स्यात्‌ । न हिं तत्कान्यमस्ति यत्च न वस्तुस्वभाववणेनम्‌ । तदर्ध स्म. 
परदणम्‌ । सुक्ष्म; कवित्वमात्रस्य गम्यः । अत एव तन्निमित एब यो वर्तु- 
भावस्तस्य यथावदन्यनानतिरिकतत्वेन वणेनं स्वभावोक्तिरटंकारः । उक्ति 
वाचोयुक्तिप्रस्तावादिह लक्षणम्‌ । भाविकरसबदलंकाराभ्वामस्य भेदो 
भाविकप्रसङ्घे निणष्यते । यथा- 
शङ्करो नखकोरि चज्चुपुटकभ्याघट्नोटङ्कित- 
स्तन्ब्याः कुन्तठकी तुकन्यतिकरे सीत्कारसीमन्तितः | 
पृररिकष्यदवामनस्तनभसेत्तेष्याट्पाटीसखुधा- 
सेकाकेकरलोचनस्य कृतिनः कणांवतंसीभवेत्‌ ॥ 
[ सूज्न ७९ ] वस्तु के सूचम स्वभाव का यथावत्‌ वणन स्वभावोक्ति [ नामक अलंकार 
कटलाता ] हि ॥ 
[ वृत्ति ] यहाँ [ कान्य मेँ] वस्तु कै केवर स्वमाव [स्वरूप] का वणन भलंकार्‌ नहीं 
दोता, वेसा होने पर समी कान्य भलंकार युक्त हो जाण्गे। क्योकि रेता कोद काव्य नष्ट 
जिसमें वस्तु के स्वभाव [ स्वरूप ] का वणन न दो। सहतु [ रुक्षणमें] सूक्ष्म श्चब्द का 


स्वभावोक्त्यलङ्ारः ६६५ 


हण किया । सूक्ष्म का अथं है एकमात्र कवित्व [ कविप्रत्तिभा] का विषय। इस प्रकार वस्तु 
का जो स्वभाव [ स्वरूप] उस [ कविप्रतिमारूप कवित्व] केद्वारा निष्पन्न होता है उसको 
[ यथावत्‌ ] जेसा का तैसा अर्थात्‌ उसका कोड अंश छोडे या उसमें कोई अंश जोड़े विना हमा 
वर्णन स्वभावोक्ति नामक अलरकार होता हे। [ व्याजोक्ति, वक्रोक्ति श्स प्रकार ] उक्ति शब्द।न्त 
अल्काो का प्रकरण होने से इसका लक्षण यहाँ किया गमा । भाविक ओर रसवद्‌ अल्कारों से 
इसका अन्तर भाविक के प्रकरण में तय किया जाएगा । उदाहरण, यथा- 

[ नायिका ने अपनी पीवर छातौ नायकेकी पौठमें सगदी, नायककी ओंखेकामके 
नशे मेँ चूर हो गर । उसने नायिका को नखो से कुरेदा ओर काष्ठागत कामावेदा म जव केरा पकड़ 
कृर रतिक्रिया करना आरम्भ किया तो नायिकाने पले सीत्कार करना शुरू किया अन्तमं 
करतक्रत्य हो जाने से अषए्णंकाम नायक के निवारण क्र दुंदु करना आरम्भ शजिया। 
पवैभूभिका से लेकर दर्प॑शामन तक हहे इस रमण क्रिया को कवि यथावत्‌ प्रस्तुत करते हुए 
कहता है-- ] 

[नायिकादारा] पीछे से आकर चिपक जा रहे, वामन ओर विश्चाङ स्तनं के उभार की गोद 
म भरो खधा के सेक से आकेकर [शगार भावपृण] नेत्र वाला कोष सा वड्मागी होता दै जिसे 
नखों की चिमरी की छुरेद से उमड़ा भोर केशकोतुक आरम्भ करने पर सीत्कार से चदा-बढा 
हंकार कर्णावतंस बनाने का अवसर भिक्त है ॥› 


विमरिनी 


सुक्षमेत्यादि । ननु कथं वस्तुवणंनसात्रमरुकार इष्याह--र्देत्यादि । 'तद्तिश्ञयहेतव- 
ध + + 4 = 
स्ष्वरंकाराः' इति नीष्या वस्स्वतिशयद्‌ायिनां धमाणामरकारस्वास्कथं वस्तुमात्रस्यंवा- 
4 [. ञो (२ 
ठंकारस्वं स्यादिति भावः। ननु कथमेतस्सूदममात्र्रहणेनेव समाहितमिस्याशशङ्कवाह- 


सूक्ष्म इत्यादि । कवित्वमात्रस्येति । कुक्लायीयधिषणस्वात्‌ । एवं स्थूरमती नासकवीनां कुक- ` 


वीनां तस्यावगमेऽपि तथा विकेल्पारोषहो न भवेदिति भावः। अत एवेति । कविस्वमात्न 
गम्यष्वात्‌ । तन्निमित षवेति अन्येषां तथाष्वेन चक्तुमश्णक्यर्वात्‌ । तद्ृस्तगतस्यासाघा- 
रणस्य फरूक्रियादेः संभवतः स्व भावस्य शब्देन प्रतिपाद नमान्नस्वात्तन्निर्मित एवेद्युक्तम्‌ । 
जन्यूनानतिरिक्तत्वेनेति । यथा वर्तुनि संभव तीष्यथंः । अत एव सचेतघां वश्तुगतस्य 


सूचमसुभगस्य वस्तुनो वर्णनेन हदयसंवादाच किमयं रसवदरंकारो वा न भवतीस्या- ¦ 


द्ाह्कयाह--माविकैत्यादि । तन्न निर्णेष्यमाणश्येतद्‌ मेदस्य- 

'वस्तुनधित्तवृत्तश्च संवादः स्फुटता प्रथा । 

स्वभावोक्ते रसवतो भाविकस्य ख ङच्णस्‌ ॥' 

इस्यथं सष्षेपः। 
सूदम इत्यादि । भला ववस्तुवण॑नमात्र अकार केत हो सकृता है' देसी शंका उठा लिखते 

हे --दह्‌० । अर्थं यह्‌ कि [वामन की] अलंकार वे दोते हं जो उस [शब्दाथं रूप] काव्य मे अतिशय 
लाते हैः इस उक्ति के अनुसार वस्तु मे भतिश्चय लाने वाले धर्मा को अङंकार कहा जाता हे, अतः 
केव वस्तुमात्र को अल्कार केसे मानाजा सक्ता हे । मला पसृक्ष्मश्चब्दमात्र के ग्रहण से 
इसका समाधान वैते द्यो जाताहै, रेसी रका उठाकर कहते हें सूचम इत्यादि । कविश्व- 
मान्नरस्य = कविप्रतिमामात्र = क्योकि कपि कुश के भग्रभाग के समान पेनी बुद्धि वाला होता ह। 
श्सका अर्थं यह्‌ कि स्थूलबुद्धि वारे अकवि या ुकवि उसे [ वस्तु को रोकिक भूमिका पर ] 


दैदेदे अदङ्ारसवंस्वम्‌ 


जान भी लं तो उनम [ उनकी ब॒द्धि मेँ वेसा विकद्प नदीं उठता । अतत एव = इस कारण = क्योकि 
वह केवर कवित्व [ प्रतिभा | मात्रका विषय होताहै इस कारण। तर्निमित एव = क्योकि 
अन्य वस्तुर्जो को तद्रुप नहीं बतलाया जा सकता । इस प्रकार व्स्तुमे नो फल क्रियादि रूप 
असाधारण स्वभाव ( स्वरूप ) रहता है उस्तका शब्द से प्रतिपादन करने मात्र के कारण "तन्निमित 
एव = उससे निष्पादित ही" कदा । भन्यूनानतिरि क्वे = कुछ छोडे या कुछ जोडे विना भर्थात्‌ वस्तु 
मे जेसा जेस स्वरूप संमव होता है । वस्तुस्वरूप मे स्थित सूक्ष्म जौर सुन्दर वस्तु का वणन होने से 
यदं सद्यो का हृदयसंव।द रहता है । इस कारण इसे रसवदलंकार क्यो न माना जाः ेसी 
हका कर उत्तर देते द 'माविकणः श्त्यादि । इसका जो भेद वहां स्थिर किया जाने वाला हे 
उसका संक्षेप यह है-- वरतुनधित्तवृत्तेश्च--०" अर्थात्‌ वस्तु मौर चित्तवृत्ति के संवाद मेँ स्वभावोक्ति, 


स्फुटता में रसवद्‌ तथा प्रथा मेँ मानिक अलंकार होते हैः ।।' 
विमश- 


इतिहास्- स्वभावोक्ति को दण्डी ने समी अलंकारो मे प्रथम स्थान दिया था। गल्कासोकत 
नाम गिनाते हुए उन्होने छिखा था- 

द्ण्डी--स्वमावाख्यानसुपमा रूपकं दीपकाब्रती ।२।४। स्वमावाख्यान को अगे वे स्वभावोक्ति 
ओर जाति नामसे पुकारते ओर उपमा के पहले उसका लक्षण इस प्रकार करते है- 

(नानावस्थं पदार्थानां रूपं साक्षाद्‌ विवृण्वती । 
स्वमावोक्तिश्च जातिरचेत्याया सारक्छृतियंथा ॥' 

ज} अलंकार पदार्थो के नाना प्रकारके रूपका मानों साक्षात्कार कराता है वह्‌ स्वभावोक्ति या 
जाति कदलाता दै । यह प्रथम जलंकार है । पदार्थं के जाति, गुण, क्रिया भौर दरन्यकेरूप मे विभक्त 
होने से दण्डी ने स्वमावोक्ति के भी चार उदाहरण दिणदहैः। उन्म जाति का उदाहरण निम्न- 
ल्चितहे-- र 

तुण्डेराता्रकुरिरैः पक्षैदंरितकोमलेः । 
त्रिवणराजिभिः कण्ठैरेते मन्जुगिरः शुकाः ॥ २।९॥ 

लाल ओर टेदढ्ी चच, हरे मोर कोमल पंख तथा तिरंगी धारिर्योके कण्ठसे युक्त ये शुक 
वडी ही मीटी बोली बोलते है । अन्त मेँ उन्होने लिता है- 

‹स्वभावाख्यानमीद्रश्चम्‌ । शाच्रे त्वस्यैव सात्राज्यं काव्ये त्वस्येतदीप्सितम्‌ 

यहु जो जात्यादि भेद से उपयुक्त चतुर्विध भख्यानदहै, चासखरोमेँतोश्सीका साम्राज्य है 
ही, कार्व्यों मँ मी यद कविर्यो को मभीष्ट है निश्चित टी स्वभावोक्ति की स्थापनाका 

श्रेय दण्डी कोहे। 

मामह का स्वर स्वमावोक्ति के विषयमे मन्द है । द्वितौय परिच्छेद के शन्तमं वे िखतेहै- 

'स्वभावोक्तिरल्कार शति केचित्‌ प्रचक्षते । 

अथस्य तदवस्थत्वं स्वभावोऽभिदहितो यथा ॥ २।९३ ॥ 

आक्रोश्चन्नाह्ययन्नन्यानाधावन्‌ मण्डले रुदन्‌ । 

गा वारयति दण्डेन डिम्भः सस्यावतारणीः। 

समातेनोदितमिदं धीखेदायेव विस्तरः ॥ २। ९४ । 

सवन आचाय स्वभावोक्ति को मी अलंकार बतलाते है । भर्थं की तदवस्थता [ लोकवत्‌ कान्य- 

स्थिति ] स्वभाव कहलाता है । उदाहरण - (स्वयं चिष्लाता, दूसरों को पुकारता गोर-गोरू घूमता 
ओर रोता इअ किञ्चान-बाकक दण्डे से सस्य [ कच्ची फसल, द्रष्टव्य ० अग्रवार का पाणिनि. 
कालीन भारतवषं ] मे उतरी गाय भगा रहा दहै। 


स्वभावोक्यलङ्ारः ६६७ 


हमने इसे संक्षेप मेँ बतलाया, क्योफि इसका विस्तार बुद्धिन्यायाम मात्र है । २।९३, ९४ ॥ 
स्पष्ट ही भामह का कटाक्ष दण्डी की स्वमावोक्तिसंबन्धी मह्ववुद्धि पर हे । 

वामन तो भामह के हयी अनुयायी ठरे । उन्होने सचमुच स्वभावोक्ति को अनलङ्कार मान 
छोड दिया । 

उनद्धट-ने इसे महततव दिया । उन्होने इसका लक्षण इस प्रकार बनाया-- 

"क्रियायां प्रवृत्तस्य हेवाकानां निबन्धनम्‌ । 
कस्यचिन्मृगडिम्मादेः स्वभावोक्तिरुदाहता ॥ ३ । ५ ॥ 

(छ कर रहे खग या वच्चो आदिकी चेष्टां का शब्द द्वारा चित्रण स्वभावोक्ति कही गहे 
हे । यथा- 

श्षणं नं ष्धवलितः शुङ्गेणामरे क्षणं नुदन्‌ । 
लोलीकरोति प्रणयादिमामेष मृगामेकः ॥› 

'्मगवती पार्वती को यह" मृगश्ावक जरा एक छिपकर, आधा घूमकर, सामने सींग से घकाकर 
स्तेहवश्च चंचल बना देता है ।" भवस्य हौ उद्भट का स्वमावोक्तिनिरूपण वाञ्छित समृद्धिसे रहित 
ओर कदाचित्‌ स्वभावोक्ति मेँ भलंकारत्व की पुनः प्रतिष्ठा तक सीमित हे । 

रद्रट-रुदरटने श्से जाति नाम से अलंकारो के वास्तवनामक प्रथम वग मे गिना है । उनका 
निरूपण- 

(संस्थाना वस्थानक्रियादि यथस्य सादूरो भवति । 
लोके चिरप्रसिद्धं तत्कथनमनन्यथा जातिः ७।२० ॥ 


टोका मै जिसकी भाङ्ृति, स्थिति, क्रिया भादि चिरकाल से जेसी प्रसिद्ध हो उनका अन- 
न्यथा = चैसा का तैसा कथन जाति कदलाता है ।› अधिक स्पष्ट करते हए उन्होने छिखा- 
'शिश्ु-सुग्धयुवति-कातरति्क्‌ संभ्नान्तदीनपात्राणाम्‌ । 
सा कारावस्थोचितचेष्टासु विशेषतो रम्या 1" ३। ३१ ॥ 
दिद्य, भोली युवति, कातर तिक्‌ , मीत मधम पार््रोकी सभय ओर घवस्था के अनुरूप 
चेष्टार्ओ सें वह अभिक खुरूती है । कातर ओर संभ्रान्त को तिर्यक्‌ गौर पात्रोका विशेषणन मान 
स्वतन्त्र भी माना जा सकता है । नमि साधु वे माना भी है । उदाहरणाय शिश्चुवणन, यथा-- 
“धूरीधूसरतनवो राज्यस्थितिर चनकल्पिकेकनृपाः । 
कृतसुखवायविकाराः क्रीडन्ति छनिमेरं डिम्भाः ॥' ५ 
"वच्चे खूब खे रहै हैः । उनके शरीर धरलीधूसर है, खेल-खेल मं राज्य बनाकर्‌ उन्होने किंसी 
को राजा बना रखा है, वे मुख से बाजे बजा रहे है । एक भन्य उदाहरण द्वारा उन्दने सुग्धयुवति 
का चित्र भी प्रस्तुत कियादै। स्पष्टहैरिरुद्रटने स्वभावोक्ति को उचित मस्व दिया । 
मम्मर- | 
(स्वभावोक्तिस्तु डिम्भादेः स्वक्रियारूपवणेनम्‌ । 
वर्चो भादि की अपनी क्रिया, उनके रूप अर्याव रंग जौर शरीर का वर्णन स्वभावोक्ति 
काता है । उदाहरण के रूप मे उन्दने हष॑चरित का यह अश्ववणन प्रस्तुत किया है- 
'पश्चादङ्घी प्रसाय त्रिकनतिवित ` द्राधयिववाज्गसच्चे- 
रासज्याभुग्नकण्ठो सुखसुरस्सि सगं भूदखिधूम्नां विधूय । 
घासयरास्ामिलाषादनवरतचरत्प्रोयतुण्डस्तुरश्रो 
मन्दं शब्दायमानो विलिखति इयनादुत्थितः क्ष्मां खुरेण ॥° 


६६८ अलङ्कारसवस्वम्‌ 


(सोकर उडे घोडेने पिछली टाप पीछे फेलाईं भोर पीठको काते हृए श्रीरको लम्बा 
किया, उसने धूडिधुसर सटा को दहिकाकरर गरदनटेढीकी भौर मुह्‌ पेटमें चिपकाया। र्घँसत के 
कौर की इच्छा से उसके धुधने निरन्तर फड़फड़ा रदे दँ जर वह धौमे-धीमे कुछ दाब्दं कर 
रदादहे)। 

मम्मट के लक्षण तक “डिम्भ या रिद्युः का जो असतित्व चला बाया उप्ते हस अलंकार की 
मह से अगे वदी सुदीघं परम्परा का भामास मिलता दै। 


उद्धर ओर मम्मट के बीच स्वभावोक्ति को लेकर एकं वहत हौ गम्भोर विवाद भी उठा था। 
ङुन्तक ने स्वभावोक्ति की अलंकारताका वड़ीहीदृदृता गौर तककर्कराता के साथ खण्डन किया 
मोर उसका उतनी टी विदग्धता के साथ व्यक्तिविवेकक्ार राजानक मददिममट ने समथन-वक्रोक्ति- 
जीवित मं कुन्तक का स्वभावोक्ति सम्बन्धी विवेचन इस प्रकार ईै- 


(अल्कारक्ृतां येषां स्वमावोक्तिरल्डडतिः । 
अलक्काय॑तया तेषां किमन्यदवरिष्यते ॥ 
स्वमावन्यतिरेकेण वक्तमेव न युज्यते । 
वस्तु तद्रद्दितं यस्मा्निरुपाख्यं प्रसज्यते ॥ १। १२॥ 
दरीरं चेदल्कारः किमल्ट्भूरुते परम्‌ । 
आत्मेव नात्मनः स्कन्धं कवचिदप्यधिरोहति ॥ १। १३ ॥ 
भूषणत्वे स्वमावस्य विदिते भूषणान्तरे । 
मेदाववबोधः प्रकरस्तयोरप्रकरोऽथवा ॥ १) १४॥ 
स्पष्टे सर्वत्र संसृष्टिरस्पष्टे सद्कुरस्ततः । 
सलक्कारान्तराणां च विषयो नावतिष्ठते ।। १।६५॥ 

“अलंकार ग्रन्थ बनाने वाले जिन आचार्यौ को स्वमावोक्ति अलंकाररूप मेँ मान्य है उनके 
यहाँ जल्कायंरूप मे क्या रोष रहता दै जो उस [ स्वमाव | सेभिन्नदहो। कारणकि स्वभाव को 
छोड करतो कुछ भौ बोलना संभव नहीं हता । उक्तसे रदित वस्तु अगोचर भवणैनीय हो 
जाती है । यदि द्रीर ही अल्कार है तो फिर सपे भिन्न ेसी कौन सौ वस्तु है जिते वह अलक्त 
कररता ह, स्वयं अपने ही कन्थे पर स्वयं कदापि नदीं चद्‌ सकता । यदि स्वभाव लकार हैतो 
अन्य अलंकार भने पर दोनों मे भिन्नता प्रतीत होगी या नददीं। यदिदोगौी तो प्रत्येक काव्यमें 
संसृष्टि द्य अलंकार होगी, यदि नदीं तो केवल संकर । शस प्रकार अन्य अलंकारो के लिए कों 
स्थान द्ध चेष नहीं रहेगा ।' 

` स्वभाव श्चब्द की व्याख्या मी, कन्तक ने, इस्त प्रकार की शथी--स्वमावस्य पदाथधमेक्षणस्य 
परिस्पन्दस्य उक्तिरभिषाः = स्वमाव मर्थात्‌ पदां का धमं जो इन्दियगोचर होता हे उसको उक्ति 
अभिधा' । 
महिमम ने व्यक्तिविवेक मेँ श्यशा बहत ही दाशेनिक उत्तर दिया है । उरन्दोनि अवाच्यवचन 
जामक दोष के निरूपण मेँ स्वरूपानुवादमात्र परक विशेषण को निरथंक ओर थोथा ककर 
त्याज्य बतलाया है ओर्ल्खिादहै- 
य॒त्‌ स्वरूपानुवादैकफरं फल्यु विदोषणम्‌ । 
अप्रत्यक्षायमाणार्थं स्म्रतमप्रतिभोद्धवम्‌ ॥ 
तदवाच्यभिति जेयं वचनं तस्य दूषणम्‌ । 
तद्‌ दृत्तपूरणायेव न कवित्वाय कर्पते ॥ [ ए० ४५१ चौखंमा संस्करण २ | 


 , षः 


|, 


स्वभावोकयलङ्ारः ६६९ 


--“जो विदोषण केवल स्वरूप मात्र का अनुवादक होता है, फलतः निःसर ओर संप्रषणीयता- 
शल्य होता है, इसीलिए जो प्रतिभादयूत्यता का परिचायक होता है, वह विशेषण अवाच्य 
कद राता हे । उसका वचन=कथन भवाच्यवचन दोष होता है । रेरा विशेषण केवर छन्दःपृत्तिशारक 
होता हे, हसते कवित्व सिद्ध नदीं होता)" इसी प्रकार के विशेषणो को अपुष्टाथं विशेषण माना 
जाता है । उदाहरणा “कुद शाघ्चुओं का अंकुशवस्तु था [ रघु° २६ ]' यदं अकुश्च के साथः 
वस्तु शब्द निरथकहीदहे। 

इस पर स्वभावोक्ति को चचां चरते हुए महिमाचा्य॑ ने किला- 

कर्थं तहिं स्वमावोक्तेरलङ्कार त्वमिष्यते । 
न हि स्वमावमात्रोक्तो विदोषः कश्चनानयोः ॥ [ द० ४५२-वही | 


तव स्वभावोक्ति को अल्कार कैसे माना जाता है। स्वभावमात्र की उक्ति गोर शस अवाच्य- 
वचन में भन्तरदहीक्यादहे। इस पर उत्तरदेते हप ङ्खिा। 
^ च्यते, वस्तुनस्तावद्‌ दवैरूप्यमिह विधते । 
तत्रेकमव्र सामान्यं यद्धिस्पैकगोचरः ॥ 
स॒र्व सवेशब्दानां विषयः परिकीत्तितः। 
अत एवाभिधेयं ते सामान्यं बोधयन्त्यलम्‌ ॥। 
विरिष्टमस्य यद्‌ रूपं तत्‌ प्रत्यक्षस्य गोचरः । 
स एव सत्कविगिरां गोचरः प्रतिमायुवाम्‌ ॥ 
अ्थस्वभावस्योक्तियां सालङ्कारतया मता। 
यतः साक्षादिवाभान्ति तत्राथाः प्रतिभापिताः + 
[ व्यक्तिविवेक चो० सं० प° ४५२-५३ ] 


उत्तर यहदहैकिवस्तुकेदो स्पदहोतेहेः। एक सामान्यरूप, जो विकसप [ अविस्पष्ट ज्ञान ] 
का विषय रहतादहै। सवके सब शब्द उसीका ज्ञान कराते इसीलिए वे सामान्यालमक 
अभिधेय [ अथं ]काक्ञान कराते हेः इसके अतिरिक्त हनकानो वि्लिष्टरूप होता रै वद 
प्रत्यक्षप्रमाणका विषय होताहे। किन्तु सत्क्विकी प्रतिमाप्रसूत वाणी श्सी विशिष्ट अथैको 
प्रस्त॒त किया करती हे । इस प्रकार अथैके श्स विदिष्ट स्वमावकी ज उक्ति होती है श्से अल्कार 
स्वीकार किया गया है। क्योकि श्स छक्तिमें प्रतिभा दारा भपित समी पदाथ रेसे दिख 
देते हैः जेसे उनका ज्ञान प्रत्यक्षप्रमाणस्ते हो रहादहो।' । | 
अन्य अल्कारों के विषयमे उरन्होनि लिखा कि- 
'सामान्यस्तु स्वभावो यः सोऽन्यालङ्कार गोचरः ।। [ प० ४५५ वही | 
[ स्वभावोक्ति मे आए विशिष्ट वस्तुस्वभाव के अत्तिरिक्तजो ] वस्तु का सामान्य स्वमावहे 
वह्‌ अन्य अलंकारो का विषय बनता है। 
इस्त प्रकार स्वभावोक्ति तब भलकार मानी जाती है जब वस्तुका बिम्ब प्रत्यक्षवत्‌ प्रस्तुत 
कर देती है। ऊपर आए भ्वादि के वणन रेपे ही है। सवस्वकार ने सूत्र मेँ सूक्ष्म शब्द भोर 
वृत्तिम कविग्यक्तित्व को स्थान देकर महिमिमट की स्थापना यथावत्‌ अंगीकार करली है। 
| ने य्ह श्स प्रकार के विशेष स्वभाव को प्रतिभानिर्ित क दिया है। द्वीपान्तरादिके 
अप्रत्यक्ष पदाथ यदि प्रव्यक्षवत्‌ प्रस्तुत हो तो उन प्रतिमैकप्रसूत माना ही जाएगा । कविबुदधु- 
पारूढि ओर शन्दार्यितता इन दो तक्वो का मद्व इस प्रसंग मेँ जानना आवश्यक है। कवि के 
मानस में चित्रित वस्तुबिम्ब प्रतिभा पर आरूढ होने के वाद जब कलाके कविकर्म पर जमाया 


६७० अल्र्ारसवंस्वम्‌ 


जाता है तभी वहइ व्णैन्रब्द का विषय वनतादहै। हस्र प्रकार वणैनतत्व कलाया शिद्प कौ 
परिधि का चोतक छब्द दै) स्वभाव स्वतःमे अल्कार नदीं होता जवतक वह रिव्पकौ इस 
भूमिका पर प्रतिष्ठापितन दहो । अतः उसकौ उक्ति दही अकुकार बनती दै। वस्तुनिष्ठ दृष्टि 
कल] दधी मीमांसा करने पर स्वभावोक्ति कौ उक्त बोधप्रक्रिया मनोवेज्ञानिक ओर अनुमवसिदध 
प्रक्रिया सिध होती हे । 

परवर्ती आचार्यौ म रत्नाकरकार दोभाकरमित्र ने 


छो जाकूर-स्वमावोक्ति का निरूपण भल्कारसवस्वकार की दही कीक पर किया दै- 


[ सू° ] सम्यक्‌ स्वभाववर्गनं स्वमावोक्तिः ॥ १०६ ॥। 
(स्वभाव का प्षम्यक्‌ वणेन स्वभावोक्ति ।' 


इसको व्याख्या करते हुए रल्नाकरकारने सर्वस्वकार कौ सभी मान्यतार्ओंको ओर "मी 
विशद कर दिया दै- 

'दिविधो वस्तुनः स्वभावः स्थः पुक्ष्मश्च तत्र कविवृमात्रगाचरः स्थूलः, तस्य वणने न कश्चिद- 
लकारः, सर्व॑स्य काव्यस्य स्वमावोक्तिप्रसङ्गात्‌ । सम्यग्‌ वण्येमानस्तु स्वमावः सूक्ष्मः । स तु महा- 
कविगोचरः। तस्य॒ सम्यग्‌ वण्य॑मानस्यान्यूनानतिरिक्तव्वेन स्वभावोक्तिः । न त॒ साधारणस्य 
रपक्रियादेस्तत्तदबालादिगतस्य राब्देन प्रतिपादनम्‌, अपितु यथेव वस्तु तथैव प्रतिपादनभिति 
वस्तुवादिनी यत्र शब्दात्‌ प्रतिपत्तिर्मवति तत्रेवालद्भारः । 

- ष्वस्तु का स्वमाव दो प्रकारका होता है- स्थूल तथा सूक्ष्म । शनम स्थूल समी कवियां 
का विषय होता है, उनके वर्णन मे कोई अलंकार नदीं होता, अन्था समी कार्यो मं स्वामावोक्ति 
माननी पड़ जाएगी । जो स्वमाव सम्यक्‌ वणित होता दै उते सूक्ष्म कदते दँ । वह वेव महाकवि 
का विषय दोता है। उस सम्यक्‌ वणित स्वभाव का अन्यून भनतिरिक्त रूप से कथन स्वभावोक्ति 
[ अलंकार } कदराता है । न किं वालक आदि के साघारण से रूप ओर चे्टाओं का ब्द से 
प्रतिपादन । इस प्रकार जदो शब्द से इमा बोध वस्तुस्वरूप से मिरूता होता दे, वहीं इते 
अलंकार माना जाता है । ययौ स्वमावगत सुक्ष्मत्व को रत्नाकर ने जार भौ पूक््म कर्‌ क्विमे 
मक्षाकवि तक सीमित दिया ह। 

जन्य मटका मँ वस्तु के जित्त स्वभाव की चचां महिमभट्ध म मिलती हे उसी ओर लक्ष्य. कर 
रत्नाकरकार ने भो स्वमावोक्ति का अन्य भलंकारो से अन्तर ईसं प्रकार वतलया दे- 


'अन्यालंकार संसर्गे स्वभावोक्त्यादि यथपि । 
वाक्यार्थीभावविरहादङ्गमेव तथापि व॒ ॥ 
यत्रोत्कटतया भति तत्राङ्गित्वेन युञ्यते। 
स्वभावोक्त्या्यलद्भार स्तस्मादन्यत्र संकरः ॥ 
अन्य अल्कारमें मी जर्हो स्वभावोक्ति भिर्ती है वहाँ वद्‌ भप्रधान रहती हे, किन्तु जह 
वह प्रधान रूपसे प्रतीत ्टोती दै, वदँ स्वभावोक्ति भलंकार कदलाती है । अन्य अलंकार 
प्रधान होते है तो अल्कारका नाम उनके नामसे थ्य जता है, ओर जहां मिश्रणक्री 
= | रहती € वँ संकर [ संसष्टि भी ]। स्पष्टतः मदमद से अगे बट्कर रत्नाकरकारने 
अन्य अलकारते मे मी वस्तु के सूक्ष्म स्वभाव का अस्तित्व स्वीकार कर ल्या दै । 
अष्वयदीङित--ने स्वभावोक्ति पर आचार्यो कौ सिद्ध मान्यतामात्र इस प्रकार प्रस्तुत कर 
दी है--स्वभावोक्तिः स्वभावस्य जात्यादिस्थस्य वणनम्‌ ।› भर्स्व आदि के जाति भादि रूप 


भाविकालङ्कारः ६७९ 


स्वभाव का वणेन स्वमावोक्ति कदराता है ।› स्पष्ट ही अप्पयदीक्षित स्वमावोक्ति की छकडी खींचते 
द्मीख पडते हे । 


विश्वेश्चर-- "यो वस्तुनः स्वभावस्तस्य निरुक्तिः स्वभावोक्तिः ।* 
तज्जातीय-नियत-धरमम॑वणेनं स्वभावोक्तिः । 


वस्त काजो स्वभाव दहोता है उसका निर्वचन स्वभावोक्ति होगा । अथात्‌ व्यक्तिविशेष के 
अपने असाधारण धमे का वणन स्वभावोक्ति कराएगा । विदवेश्वर ने स्वमावको दो प्रकार का 


बतलाया - साधारण तथा प्रातिस्विक । इनमें से प्रातिस्विक स्वभावकोवेमी प्रतिभामान्न का 
विषय बतलाते प्रतीत होते षे । 


शस पर विद्याचक्रवत्तीं की निष्कृश्ैकारिका यह है- 

'स्वभावोक्तिवुंधोन्नेयवस्तु स्वाभाव्यवर्ण॑नम्‌ । 
वस्तु के कवियों द्वारा कल्पना द।र। विहित स्वभाव का वणन स्वभावोक्ति कषलाता है । 
पाठटान्तर--सूत्र मे स्वमावस्य' इस प्रकार व्यस्त पद भी मिलता है किन्तु ¶ृत्तिमें वार-बार 


“वस्तुस्वभाववणेन' शब्द आने से हमने समस्त पाठी ठीक माना है। वृत्ति में कवित्वमात्रस्य 
गोचरः की जगह कवितृमात्र गोचर" तथा कविमा्रगोचर' पाठमभीहे। 


| सवेस्व | 
[ त्र ८० । अतीतानागतयोः प्रत्यक्षायमाणतवं भाविकम्‌ । 
अतीतानागतयो भ्रूतभाविनोरथेयोरल्ट करिकत्वेनात्यदु सुतत्वाद्‌ उ्यस्त- 
सम्बन्धरदहितराब्दसलन्दभंसमपितत्वाच्च पत्यक्चायसाणत्वं माविकम्‌। कबिगतो 
भाव आशयः श्रोतरि प्रतिविम्बत्वेनास्तीति, भावो भावना वा पुनः दुनश्चे- 
तसि निवेशनम्‌ , सोऽच्रास्तीति । 

न चेयं ्रान्तिः। भूतभाविनो भुतभावितयैव परकादानात्‌ । नापि रामो 
ऽभरूदितिचद्‌ वस्तुमात्म्‌ ।` भूतमाविगतस्य भत्यश्चत्वाख्यस्य ध्मंस्य स्फुट- 
स्याधिकस्य प्रतिकम्भात्‌ । नापीयमतिर्ायोक्तिः । अन्यस्यान्यतयाध्यव- 
सायाभावात्‌ । नहि भूतभान्यसूतभावित्वेनाध्यवसीयते, अभूतभावि वा 
अ्ूतभावित्वेनापि, प्रत्यक्चमप्रत्यक्षत्वेन, अप्रत्यक्चमपि पत्यश्चत्वेन । 

न हि पत्यक्षत्वं केवट वस्तुघमेः। प्रतिपर्यपेश्चयेव वस्तुनि तथा 
भावात्‌ । यदाहुः तत्र यो ज्ञानप्रतिभास्मात्मनोऽन्वयग्यतिरेकावयुकार- 
यति स प्रत्यक्चः" इति । केवल बस्तुप्रत्यक्षत्वे प्रतिपत्तः साममी उपयुज्यते । 
सा च लोकयाज्ायां चक्षुरादीन्द्रियस्वभावायोशिनामतीन्द्रियायेद्श्यने भाव- 
नारूपा, काञ्याथेविदां च भावनास्वभावेव । सा च भावना बस्तुगत्याव्य- 
द्‌ भ्रुतत्वप्रयुक्ता । अत्यद्भुतानां च बध्तूनामादररत्ययेन हृदि संधार्यं. 
माणत्वात्‌ । 


[ सू० ८० ] अतीत ओौर शनागत का प्रय जेषा बोध भाविक [ नामक अलंकार 
कात ] ह ॥ 


६७२ अलङ्कारसवेस्वम्‌ 


[ बृ ] अतीत ओर अनागत अर्थात्‌ भूत भौर भावी पदाथ का प्रसयक्ष जेसा बोष भाविक 
कहलाता है! यह बोध उन पदार्था की लोकोत्तरता, अदूभुतता ओर देसे शब्दसंदभं दारा 
उपस्थिति से होता दै जिस [के अर्यो ] का संवन्ध विखरा नहीं रहता [ अर्थात्‌ जिनमें कोड 
उलन नदीं रहती ) यह्‌ [ भाविक नाम इसे ] इस कारण [ दिया जाता] कि हसर्मे कविका 
आट्राय श्रोता मेँ प्रतिविभ्ित होता है, अथवा [इस कारण कि इसमे ] माव मात्‌ मावना अथात 
चिन्त मे पुनः पुनः निवेश्चन रता दे । 

यह [ प्रत्यक्ष जेसा बोध ] आन्ति नदी दै, भ्योफि समे भूत ओर मावीकाक्ञान भूत ओर 
मावीकेरूपमेद्ीदहदोताहै। यह रराम थाः इस प्रकार का वस्तुमात्र मी न्ह है [ जिस्रपे अलंकार 
नदो] क्योकि इसमें भूत ओर भावी पदार्थोके भीतर एक भतिरिक्त ओर स्पष्ट प्रत्यक्षत्व 
नामक ध्म मी मिलता हे । यह अतिक्षयोक्ति मी नदीं है, क्योकि इसमे अन्य का अन्य रूपमे 
अध्यवसान [ निगरणात्मक बोध ] नहीं होता । 

ेसा नदीं हे कि यहाँ भूत ओर मावी [ तद्विरुद्ध ] अभूत भौर भमावी रूप से अध्यवसित 
हेते हों अथवा अभूत ओर भमावी [ तद्विपरीत] भूत ओर भावी रूपमे, अथवा प्रत्यक्ष 
प्रत्यक्ष रूप मे या अप्रस्यक् प्रत्यक्ष रूप मे । प्रत्यक्षत्व केवल [जेयभूत] वस्तु म॑ रने वाला धम नहीं 
होता, वस्तु र्मे रइता है वद ज्ञान को लेकर । जेसा कि का है--' कोद मी पदाथ तव प्रत्यक्ष क्‌- 
खाता है जव करि वह अपने अन्वयव्यत्तिरेक का ज्ञानप्रतिमास [ के अन्वथव्यत्तिरेक | से अनु- 
करण कराता है । इतना भवदय है कि वस्तु के प्रष्यक्षकेरिपक्ञाताको [ सहायक] सामग्री की 
आवरकता होती है । ओर वह संसार में चक्षुरादि इन्द्रियरूप होती है, योगिर्यो को [धर्मअधम मादि] 
अतीन्द्रिय पदार्थौ के प्रत्यक्ष हेतु वह भावनारूपदहोतीदहै, भोर काव्यम मी वह मावनारूप ष्टी 
होती है। वह भावना वास्तठिकरूप से [ कान्यवस्तुनिष्ठ ] अत्यद्युतता से निष्पन्न होती है। 
क्योकि जो पदाथं अत्यन्त अद्यत होते है उन्दँ आदरमाव के साथ अपनाया जाता है। 


विमदिनी 


अतीतानागतयोरित्यादि । एतदेव भ्याचष्टे-मतीतेत्यादि । अखोकिफष्वेनेव्यनेन तत्रा 
वधानाहंत्वञुक्तम्‌ । व्वस्तेति। यघ्यपि वाजमाङुलसवं सवंत्रेव वजंनीय तथापि तत्तत्र 
वेषभ्ये नार्था विशेषाष्रतीतेर्विघ्मात्रफलम्‌ । इह तु तदाकुरुसवे नातीतानागतयोः प्रष्यक्नायमा- 
णव्वमेव न स्यादिति प्राघान्येनेतदुक्तम्‌ । एवमनेन हैत॒द्रयेनाश्यारंकाररवसचक्तम्‌ । इह 
वाच्यवाचकयो रामणीयकमिः्युक्छम्‌ । अत एवेकस्वापि रामणीयकहानौ नास्यालंकार- 
र्वम्‌ । इह हि केचिदुर्थाः कविवचसि सुस्पष्टमधिरढा अपि निजसौभाग्याभावात्‌ तृणज्ञ- 
करावत्‌ सहषयानामवन्ञास्पदतया नावधानार्हाः । केचिच सुभगा अपि दुभगक्ब्दोपारो. 
हितया सहृदयानामनावजंका पएवेस्युभयमपीहावश्यमाश्रयणीयम्‌ । यदाहुः- 


श्रव्यत्ता इव यत्राथां दृश्यन्ते भूतभाविनः । 
अव्यद्‌ युताः स्यात्‌ तद्‌ वाचामनाक्कल्येन भाविकम्‌ ।' इति । 


वाज्ञब्दः पश्ान्तरदयोतकः । ननु प्रव्यन्ञाणां भूतमाविनां प्रष्य्तेणोपनिबन्धाद्‌ 
्रान्तिमानेवायं कि न भवतीस्याक्ञद्कधाह-- न चेयभित्यादिना । ननु ग्रहि भूतभावितयेव 
[क -----। तदेतद्‌ वस्ण्वेव किं नेष्या्ञङ्कवाह-नापीति । जपिकस्येति । वस्तुच्रुत्ते तस्यामव । 
अत एवास्य ततो व्यतिरेकः नन्वन्यस्यान्यतयावसायात्कि नायमतिश्चयोक्तिरिव्याश्ङ्धयाह- 
नापीयमित्यादि । भूतभाविनो भूतभावितयेवास्फुटतयावगमाव्‌ । नन्वत्नाप्रस्यत्तमेव पर्य 


भाविकालङ्कारः ६७२ 


स्ेण कि नाभ्यवसितमिस्याशङ्याह- नदीत्यादि । तच्चाप्रस्तुततस्वाद्रहनस्वारच नेह प्रप 
द्धितम्ब्‌ । नु यदेवं तस्प्रमातुः सदेव समस्त बाह्यवस्सववगमः कि न स्यादिव्याशङ्याह- 
केवरमित्यादि । भावनारूपेति । तत्रेन्द्रियादीनामव्यापारणात्‌ । एवं योगिनां भावनाबकाद्‌ 
भूतमावितयव प्रव्यक्तञावभाक्त इति भावः । यदाहुः 'अतीतानागतक्ञानं प्रस्यदान्न 
वि शिष्यते दति । चः सञुच्चये । तेन यो गिनामतीनिद्रि या्थदरने यथा भावना निमित्तं 
तथव काव्याथविद्ामपीसव्यथः। तस्याश्च निभित्तमाह- सा चेत्यादि । वस्तुनोऽष्यद्‌ युत. 
त्वमाद्रे निमित्तम्‌ । आदुराच्च वस्तुनो हृदि संधारणम्‌ । तच्च तदेकतानतय प्ररूढं 
सद्‌ भावनाव्वसुपयातीति काब्यायेविदां योगिनामिव भाव नाचखात्‌ स्व कारावच्छेदेनेव भूत 
आविवस्तु प्रस्यकुतया भासत इति प्रव्यक्ततय।ध्यवप्रायः। 


अतीतानागतयोः इत्यादि । इसी की व्याख्या करते है- अतीत इत्यादि । 'अरौकिकस्व = 
लाकोत्तरता' यद ककर यह बतलाया कि वह सहृदयो के ध्यान देने योग्य वस्तुरै। ष्यस्त= 
[ भामह ओर उद्धटने यदहं शब्दस्तन्दर्म के लिर“अनाङुः विदोषग दिया था, उसका अर्थं 
प्रतीइरेन्दुराज आदि ने व्यस्तस्तम्बन्धरदहितत्व ही भिया था । मन्थकार ने यहां उक्ती को अपनाया, 
टीकाकार उसका मूलशब्द अनाङ्गुलत्व चित्त में रखकर व्याख्या करते है] यद्यपि श्ब्दांकी 
भाकुलता [ उल्ञ्चे अथं से युक्त होना] समी अल्कारों मे त्याज्य है तथापि उनम आकुलता 
से प्रतीति में विध्नमात्र उत्पन्न होता है, क्योंकि आकुट्ता से विषमता उत्पन्न होती है गोर भथ के 
ज्ञानमें स्पष्टता नदींभा पाती [ किन्तु रेरा नहीं कि अलकार कीप्रतीतिदहौ नदहोती दही] 
यदहो [ भाविक मे] तो उस [शब्दसम्बन्ध्‌] की भाक्रुलता होने पर अतीत ओर भनागत का प्रत्यक्षा 
यमाणत्व [ प्रत्यक्ष जेसा बोध ] ही नहीं बनता [ भतः यदद उसे प्रधानरूप से अपनाया गया ] 
इस प्रकार इनदोदहेतुओं के द्वारा इक्तका अलकारत्व बतलाया । 


यहां [ माविक मे ] अथ॑ ओर शब्द दोनों कौ सुन्दरता अपेक्षित है रेस [ समी भाचार्यौ ने ] 
कहा है इस कारण किसी एककी भी सुन्दरता समाप्त होने पर यह भलंकार नहीं बन 
पाता। स्थिति यहदै किश्स अलंकारमें उुछ अथं क्विकी पदावलीमे स्पष्टरूप से अभिरूढ 
होकर भी अपने आपे छन्दर न होने के कारण तृणशकरा के समान सहृदया के लिष उपेक्षणीय 
होते है, ध्यान देने योग्य नदीं बन पाते। शके विरुद्ध छ भथ अपने भाप मे सन्दर होकर मी 
दुर्म॑ग पदावली से भाददित रदतेदहे, अतः वे भी सह्यो को आङ्ृष्ट नदीं कर पाते। इसकिषए 
कवि वो यद्य दोनों द्यौ प्रर आवस्यकरूप से ध्यान देना चादिए। जेता कि[ उद्धटाचायने] 
का ह- 

नूत मौर भावी पदाय॑ जिस्म शब्दो की अनाङ्कलता के कारण भत्यदूमुत थोर प्रत्यक 
लेसे दिखाई देते है उसे भाविक कहते है ।' [ काण स्ा० सं° ६।६ ]॥ 

ध्वा, = अथवा शब्द पक्षान्तर का चोतक है । 

“भूत भौर भावी अर्थात्‌ अप्रत्यक्ष पदाथौ का प्रत्यक्षरूप से कथन होने के कारण इ 
[ साविक ] को भ्रान्तिमान्‌ हौ क्यो नदीं मान क्या जाता' रेसी शंका कर उत्तर देते दं "न 
चेयम" । ध्यदि यक्ष पदार्थं भूत भौर भावी रूपमे द्यो प्रतीत दोते हे तो यह वस्तुमत्र्ीश्यों 
नदीं मान ली जाती" रेसी श्चंका कर उत्तर देते हे-"नापि' इत्यादि । अधिकश्य=अतिरिक्त = 
व।स्तविक रोकिक स्थिति स्े उसकेनदहोनेसे। इसी कारण इस [ माविक को प्रत्यक्षायमाणता ] 
का उस [ वस्तुस्थिति ] से अन्तर है। समे अन्य [ भूतभावौ ] वस्तु अन्य [ प्रत्यक्ष ]रूप से 
विदितद्टोतोरहै, तो यह अतिश्चयोक्ति ष्टी क्यं नदीं मान री जाती-पेसौ काका उत्तर देते 

२ अ० समर 


७७ अलङ्ारसवस्वम्‌ 


ई-“नापीयस्‌०' इत्यादि । अतिशयोक्ति इसकिए नहीं कि इसमे भूत ओर भावी पदार्थो का 
भूत ओर भावी रूपर्मेदौ ज्ञान दोता रदतादहै। वदां भप्रतयक्ष प्रत्यक्षरूप से मध्यव्तित क्यों 
नदीं मान च्या जाता' रेसी शंका कर उत्तर देते दैँ-“न हि" इत्यादि। यह्‌ विषय एकतो 
अप्रास्गिक है ओर दूसरे अति गम्भीर श्सल्िर यहां इसका विस्तार न्ह करते । 

'्यदि रेता है [ अर्थात्‌ वस्तु का प्रत्यक्च क्ञानप्रतिमास सापेक्ष] तो बाह्य वस्तुओंका श्लान 
सदा ही क्यो नदीं होता रदताः-रेपी शका कर उत्तर देते केवलम्‌ । भावनारूपा = क्योकि 
उन [ अतीन्द्रिय पदार्थो ] मेँ श्न्धिर्यको पहुंच नदीं होती । भाव यह्‌ करि योगिर्यो को मावना के 
बर पर दही भूतमावीरूप में प्रत्यक्षप्रतीति होती है। जेसा फिकदा है- अतीत ओर अनागता 
श्चान प्रत्यक्ष से भिन्न नहीं होता| च = समुच्चयाथक है। इसका अर्थं यह्‌ आ फि जिस प्रकार 
अतीन्द्रिय पदार्थाके दर्लनमें योगिर्योके ल्िएिमावनाद्ी कारण वनती दहे उसी प्रकार भूत 
ओर भावी पदार्थो के प्रत्यक्षदर्चन मेँ कान्याथवेन्ताओं [ कविर्यो ] के छिपएमी [ मावनादी कारण 
बनती है]। उस भावनाका कारण वतलातेरदैँ-साच। वस्तु की सत्यदूमुतता [ वस्तु के] 
आदर मे निमित्त वनती है गौर उस आदरस्ते वस्तुहृदयमे धारणक जातीहै। ओर वह नजो 
हृदय मेँ धारण करना है, वस्तु स्वरूप के प्रति एकतानताके रूपमे प्ररूढ दहो भावनात्वको प्राप्त 
होताहै। शस प्रकार भावना के वल से कान्याथवेत्ता[ कविर्यां भौर सहृदया ] को भी याभिर्यो के 
दी समान भूत ओर भावी वस्तु अपने-अपने समयमे दी प्रव्यक्षरूप से भासिते होती हे। इस 
प्रकार यहाँ प्रत्यक्ष पदार्थाका प्रत्यक्षरूप से अध्यवसान नदीदहोता। 


[ स्वस्व | 


नापि भूतभाविनामव्रव्यक्चाणां प्रव्यक्षतयेव परतीतेरिवार्थग्भीकारेणेयं 
प्रतीयमानोव्पेक्चा. तस्या अभिमानरूपाध्यवसायम्बभावत्वात्‌ । न द्यप्रत्यक्षं 
त्रत्यक्षस्वेनाध्यवसीयते, कि तदि कान्याथेविद्धिः घरत्यक्षत्वेन दश्यते इति । 
नापि वस्तुगता इवाथ उत्प्रेक्चाभ्रयोजकाः । तस्या अभिमानरूपायाः प्रति 
पत्तधमंत्वात्‌ । यदाहुः-- अभिमाने च सा योज्या क्ानघरमे सुखादिवत्‌ 
इति । काव्यविषये च प्रयोक्तापि प्रतिपत्तेव । नाप्यद्‌ थुतदश्ेनादतीताना 
गतयोः प्रत्यक्चत्वप्रतीतेः कान्यलिन्गपिदम्‌, लिङ्गलिङ्गिभावेन प्रतीत्य. 
भावात्‌ ; योगिवत्‌ प्रव्यक्षतया प्रतीतेः । 

(इसमे भप्रव्यक्ष भूत भावी पदार्थौ का ज्ञान प्रत्यक्षरूपसे हदोतादहे, अतः श्से इवार्थगमित 
[ भानोः आदि शन्दोंका अथै छिपाए रखने वारी अतप्व ] प्रतीयमान [ कहरने वारी | 
उप्परेक्षा ही मान लिया जाए यह संभव नही, क्योकि वह्‌ मान्यता [ अभिमान ] रूप [ जो ] भध्य- 
व तधाय--[ तत्‌ ] स्वरूप होती है । 

[ यदौ |] अप्रव्यक्च वस्तु प्रव्यक्षरूप से [अतिक्योक्ति के समान] भध्यवस्तित नदीं होती, अपिर्ठ 
कान्याथवेत्तार्ओो दारा प्रत्यश्चरूप से देखी जाती है । रेता भी नदीं है कि उत्प्रक्षा में !इव = मानो 
| क | द्द के अथं उत्प्रक््यमाण वस्तु मे रहकर उत्प्रेक्षा को निष्पन्न करतेर्दो, क्योविं वहती 
मान्यतास्वरूप है अतः ज्ातृनिष्ठ धमं है। जेसाकि का है--'भोर उपे छखादि के समान 
ज्ञानधर्म॑रूप अभिमान [ मान्यता ] मँ भवस्थित समक्चना चादिए ।' जां तक कान्य का सम्बन्ध है 
समं कवि [ प्रयोक्ता ] भी ज्ञाताद्यी होता है। 


= 


भाविकालङ्कारः ६७५ 


अतीत ओर अनागत पदार्थौ के प्रत्यक्षन्ञान भत्यद्‌मुतत्व रूपी कारण से होते है, अतः यदि 
इसे काग्यलिङ्ग कहा जाए तो वहु संभव नदींहै; क्योकि शसम नो प्रतीति होती है उसमे शिङ्ग- 
लिङ्गि भाव का अमाव रहता हे। यहाँ तो प्रर्यक्षताकी प्रतीति वेसी रदती है नैस्ती योगिर्योको 


इभा करती हे। 
विमरिनी 
ननु यद्यपि योगिवद्‌ भूतभाविनो भावाः स्वकारावच्छेदेनैव सदेतस्षः प्रष्यषतयेव 
[प्रतीताः तथापि] तद्‌ माव[सं]मावनं युक्तमिस्येतत्प्रतीयमानोष्परेत्तेव किं नेध्याशङूयाह-~ 
नापीत्यादि । किं तर्हीति । प्रतिपत्तेवेति। नद्य जानतः कवितुः प्रयोकषतृष्वं भवतीति भावः। 
नन्वष्यद्‌भुतपदाधंप्रस्यक्षप्रतीव्योगेभ्यगमकभावारकि नेदसन्ुमानमिष्याज्ञङ्कयाह-नापी- 
त्यादि । एवं रसवदरकारादस्य सेदं दृशंयति-नाप्ययभित्यादिना । 


ध्य्यपि अतीत ओर अनागत पदाथ उप्ती काके पदार्थौके रूपमे सह्द्योको भी योगियों 
केही समान प्रव्यक्षरूपसे दी मादित होते हे तथापि यदा उन [ अतीत ओर अनागत पदार्थौ ] 
के अमाव कौ संभावना मानना ीक है अतः यहाँ प्रतीयमान उत्प्रेक्षा ही क्यो नदीं मानी जातीः 
ेसी शंका उठाकर उत्तरम कदतेदेः (नापि०। किं तहि=भपि तु अर्थात्‌ य्ह अध्यवसाय 
है नदीं ! प्रतिपत्तैव = ज्ञाता ही अर्थात्‌ कपि पदाथैको विना जाने प्रयोग में नदीं लाता। 
'पदाथं कौ अत्यन्त भदूमुतता ओर प्रत्यक्ष प्रतीति के बीच गम्यगमकभाव होने पे क्या यह्‌ 
[ उद्भट के अनुप्तार ] अनुमान [ रूप से स्वीकृत ] काव्यलिङ्गं नहीं हो सकता" सी रोका कर 
कहते है-नापि इत्यादि । 

अव इस [ भाविक ] का रसवदलङ्कार से भेद बतलाते हए लिखते है- 


| सवेस्व ] 


नाप्ययं पुरःस्छुरद्रुपतया. स रमत्कारं प्रतीते रसवदलंकारः । रत्यादि 
वित्तच्चत्तीनां तदचुषंकतया विभाव।दीनामपि साधारण्येन हद्यस्ंवादितया 
परमाद्वेतिज्ञानवत्‌ प्रतीतौ तस्य भावात्‌ । इह तु ताटस्थ्येन भूतभाविनां 
स्फुटत्वेन भिन्नसवंज्ञवत्‌ प्रतीतेः । स्फुःरथ्रतीव्युत्तरकाटे तु साधारण्य- 
प्रतीतो स्फुःरप्रतीतिनिमित्तक्‌ ओत्तरकाटिको रखलवदठकारः स्यात्‌| 

इस [ अलकार ] म जो प्रतीति होती है उसमे पदाथं सामने उपस्थित से भोर चमत्कार 
पूणं प्रतीत होते है इस [ सामान्य धमके] आधार पर इसे रसवदलंकार से अभिन्न कहा 
जाए, यह मी टीक नदीं, क्योकि उसमे जो प्रतीति होती है उसमें रत्यादि चित्तवृ्तियां उनसे 
सम्बद्ध विभावादि इस प्रकार साधारण भौर हृदयसंवादमय भासित होते दहै जेते परम अद्ैती 
के ज्ञान में मासितदहो रहे हौँ। इसके विपरीत यहां [ भाविकाल्कारमें] भूत भौर भावी 
पदाथ उस प्रकार [ तारस्थ्य = ] ब्य वस्तु के रूप पे भल्ग अलग [ स्वकालावच्छेदेन ] 
ओर स्पष्ट मास्सित होते है, जेते दैतबुदधि वाले स्च [ सांख्य सिद्ध या रोव विचेश्वर ] की प्रतीति मे 
मासितदहोरहेहदां। [ उक्त ] स्फुटप्रतौति के पश्चात ये पदाथै यदि साघारणरूपमें प्रतीत हो जार 
तो वदां भी रसवदलंकार दहो सकता है!” यथपि यह स्फुट प्रतीति के पश्चात्‌ शोगा क्योकि 
यह उसी प्रतीति से निष्पन्न होगा| 


&७दे अठङ्कारसवेस्वम्‌ 
| विमरिनी 


पुरःष्फुःरद्रुपतयेस्यादिनानयोरभेदनिमित्तमुक्तम्‌ । परकी यायाश्चत्तव्रत्तेराःमीय चित्तव. 
यभेदेन परामर्चो हृदयसंवादः । तस्य च स्वपरवि ागाभावाद्‌ देशक्राखाभावाच्च भ्यापक- 
त्वेन प्रतीतेः साधारण्यम्‌ । जत एव परमाद्रत[ति]ज्ञानतुद्यप्वम्‌ । तस्य द्ययमिस्येव 
परामशः । तद्वयतिरिहूस्यान्यस्यासं भवात्‌ ¦ तारस्थ्येनेति । इदमहं जानामीति अघ्ामाना- 
धिकरण्येन प्रतीर्ये्यथंः। अत एव वियेश्वरादितुल्यम्‌ । ननु भाविकप्रतीरयनन्तरं यत्र 
रसवदलंकारः प्रतीयते तन्न किं प्रतिपत्तव्यमित्याङ्कयाह-स्पुटेत्यादि । एवमत्रानयोरङ्गा- 
ङ्कितया समवेज्ञ इति ताध्पर्याथंः । तत्त यथा- 
धव नान्तरादुपावृत्तेः स्कन्धासक्तपभिः्डदोः। 
अभि प्रश्यद्धमा^्पूतंः पूयंमाणं तपस्विभिः \' 
अच्र तपस्विनां स्फुटस्वग्रतीतिः च्लान्ताख्यरसोदयाङ्गमित न तयोरेकार््यम्‌ ! एवं 
च सुन्दरस्य वस्तुनो यथावद्रणेनावश्लाप्रयङ्ायमाणय्वस्य स्वरूपमिति तास्पयम्‌ । ननु 
ययवं तर्किमिद्‌ं स्व भावो क्तिरेवेष्याज्ञङ्याह- नापीयमित्यादि । 


पुरःस्फुरद्‌ इत्यादि के हारा इन दोर्नो [ रसवदलंकार ओर भाविक ] के अभेदका निमित्त 
बतलाया । हृदयसंवाद का भथं है परकीय चित्तवृत्ति का अपनी चित्तवृत्ति से अभेद पदक बोध । 
उस [ हदयक्षवादात्मक बोध] में स्वपर का मेद नहीं रहतानतो देद्य कालका) मान 
रहता, अतः उसकी प्रतीति मेँ व्यापकता रहती है फलतः साधारण्य भी रहतादे। इसी कारण 
उसकी तुलना परम अद्वैत के ज्ञानपे की गईं दै। उते अहम्‌ इतना दी वोध होता हे । क्योकि 
उपसे भिन्न अन्य कोड संमव नदीं हे। 

तारस्थ््ेनन=भ्म क्से जानतादहूं' इस प्रकार सामानाधिकरण्य [भिन्नता] कौ प्रतीति 
के कारण । इसीलिए इसकी तुरना "विचेश्वर = ' आदिपसेकी गद दहै। “जां भाविक को प्रतीति कै 
बाद रसवदल्कार की प्रतीति होती हे वहाँ क्या मानना दोगा-णेसी शंका केर कते हे-- 
स्फुट इत्यादि । शस प्ररार तात्पय॑ यद्‌ किन दोनों का समावेश अंगओर अंगीके रूपमे 
होगा । इसका उदाहरण यद है-- 

धवनमध्य से कोटे, काँधे प्र समिधाभोर ठा किए, अग्नि का प्रद्युद्गमन करने से 
पवित्र तपस्वियों दारा मरा हुआ भाश्रम ॥ [ रघुवंद्च -१।४९ से तुलनीय ] ॥ 


दँ तपसिवर्यो की प्रतीति स्फुट रूप से होती है। वद शान्तरस कांग है, अतः दोर्नो 
म मभेद है । इस प्रकार तात्पयं यह निकला किं यथावद्‌ वणन के आधार पर सन्दर वस्तु का 
प्रत्यक्ष तुल्य ज्ञान श्स [ भाविक ] का स्वरूपरहै। ध्यदि रेस्ाहै तो फिर इसे स्वमावोक्ति ही 
क्यो नही माना जाता' पेसी शंका कर लिखिते है- 


॥४७ 
| स्वस्व | 
नापीयं सखुक्ष्मवस्तुस्वभाववणंनात्‌ स्वभावोक्तिः । यस्यां रकिकः 
"~~ साधारण्येन हदयसंवादसंभवात्‌ । इद च 


छोकोच्तसणां वस्तूनां स्फुटतया ताटस्थ्येन भरतीतेः । कचित्तु टक्रिका- 
नमपि वस्तुनां स्फरत्वेन प्रतीतौ भाविकस्वभावोक्त्योः समावेशः 


भाविकाट्ङ्कारः ६७ 


स्यात्‌ । न च हृदयसंवादमाज्ेण स्वभावोक्तिरसवद्टकारयोर्मेदः । 
वस्नुखंवाद रूपत्वात्‌ स्वभावोक्तेः। चित्तन्रत्तिसमाधिरूपत्वाच रसवदट- 
कारस्य । उभय लंवादद्रनेऽपि समवेद्योऽपि घरते। यत्र॒ वस्तुगत- 
खृक्ष्मघवेवणेनं स्यात्‌ तत्र स्वभावोक्तिः, अन्यत्र तु रसवदटंकार पव । 

नाप्ययं शब्दानाकुटत्वदहे तुकाञ्ञ्गिव्यथंसमपेणात्‌ प्रसादाख्यो गुणः । 
तस्य हि स्फुटास्फटोभयवाच्यगतत्वेन शटिति खमपेणं रूपम्‌। अस्य 
तु रिति समर्पितस्य सतः स्फुखत्वेन प्रतीतौ स्वरूपप्रतिठम्भः। तस्मा. 
द्यं सवत्तीणे पवालरकारः। 

“इसमे वस्तु के सूक्ष्म स्वमाव [स्वरूप] का वणैन रहता है श्सछिप इते स्वभावोक्ति से 
अभिन्न मानने का प्रदन उठाया जा सकतादहै ञिन्तु वह संमव नहीं है, क्योकि लोकिकं वस्तु 
के सूक्ष्म धर्मका वणन रहता ओर उसकी प्रतीति साधारण सूपे होती है तथा हदय 
संवाद रहता है। जवि स [ माविक ] मे लोकोत्तर वस्तुओं कौ प्रतीति बाह्यवस्तु केरूप 
मे स्फुट [ परस्पर भिन्न] रूपमे होती है। कीं लोकिक वस्तु मी स्फुट रूपमे प्रतीतदो 
सकती हैँ । वहाँ माविक तथा स्वभावोक्ति का एकत्न समावेश माना जा सक्ता [नकिकिसी 
का किसी मं अन्तमावि]। 


हृदयसंवाद की समानताको छेकर स्वमावोक्ति भोर रसवदलर्कार में मी अभेद नदीं 
मानाजा सकता । क्योकि स्वभावोक्ति का स्वरूप है वस्तुसंवाद जक्षि रस्तवदल्कार का 
स्वरूप है चित्तवृत्ति्तवाद । कीं यदि दोर्नो प्रकार के स्वाद मिल जाएं तो शन दोनो का 
एकत्र समावेदा मौ संभव है। वदाँ जितने अंश मेँ वस्तु के सूक्ष्म धमका वणैन होगा उतनेरे 
स्वभावोक्ति मानी जाएगी, किन्तु रेष मे रस्तवदर्कार ॥' 


श्राब्दों की अनाकुलत। [ स्पष्टता ] रूपो देतुसे अथंका ज्ञान अतिशीघ्र कराने के कारण 
रस [ माविक] को प्रसाद गुणस अभिन्न माननेकी बात उठाई जा सकती हे, रिन्त वहमी 
संभव नहीं हे। उस [ प्रस।द युण] कास्वरूपहै स्फुट या अस्फुट दोनों प्रकार के वाच्या 
की ्ीघ्र प्रतीति करना जवकिं इस [ मापिक] को रवरूप लाभ श्येता है तब जव पठे 
से शीघ्रतया विदित वस्तु का स्फुट [ परस्पर में भिन्न ओर स्पष्ट ] रूपसेबोषहोताहै। श्स प्रर 
वद्‌ सव अलंकारो से पृथक्‌ अलंकार है । 


विमरिनी 


ईदपिदं वरित्विव्यन्र हृद्‌ यलंवादुः । सं च यथा- 
यत्र श्तनन्धयानू हस्ते रलदी पाज्ञिषृचतः 
द्या हा हेति संभ्रान्ता धात्री चेटविंहस्यते ॥' 
अन्न घाच्रीणामीहगयं स्वभाव इति वस्तुनिष्ठ हृदयसंवादः । यथा वा~ 
ध्यद्‌ास्वाद्यं सीता वितरति तदग्रे स्वगृषिणे 
सुसिन्रापुन्नाय प्रणिहितविशेषं तदनु च । 
यदढामं यत्‌ त्तामं यद्‌ नतिरषं यच विरसं 
फं वा सूरं वा रचयति तु तेन स्वमज्ञनम्‌ ॥ 


६७८ अलड्ारसवेस्वम्‌ 


अत्रेहगेव गरहिणीनां हवमाव इति संवादः । स्फुटतयेति । पुरःस्फुरद्रुपतया । सा 


चच प्रती तियंथा- ध 
'निमीलकितस्य षूणन्दोः सुधायां पड्किलाङ्करो । 
यत्र दर्युजितः पादौ भाष्येते भावितैः पुरः ॥ 


यथा च- 
“द्‌ भांङ्करेण चरणः क्षत इस्यकाण३े 
तन्वी स्थिता कतिचिदेव पदानि ग्वा । 
आसीष्ठिब्ुत्तवद्ना च विमोचयन्ती 
शाखासु वक्ककमसक्मपि दुमाणाम्‌ ॥' 
अत्र पादयोः शङ्न्तखायाश्च शुद्धेव प्रध्यक्तव्वेन प्रतीतिः । ननु च यत्र स्वभावाक्ताः 
चपि प्रस्यदतया प्रती तिस्तन्न किमिस्या्ञङ्कथाह--कचिदित्यादि । समावेद्य इति संखष्टिरूपः 
संकरख्पोवा। षतु यथा- 
“हे रम्वेऽत्र हरीश्वरे नखमूुखेः कण्टय माने गरं 
कुर्व॑न्‌ू पुच्छ विवतंनानि विरतो रोमन्थीहायितात्‌ । 
संमीलन्नयनं विसंस्थुरुटसव्सास्नं नतोन्ना{सत. 
ग्रीवं निश्वलकर्णमीश्वरबदीवद्‌ः सुखं मन्यते ॥' 
अन्र बुषभस्य प्रच्डुविवर्तनादिसूचमधमंवणनेन स्वभावोक्तिः, प्र्यत्तायमाणत्वेन 
भाविकमिसयनयोः समावेशः । दवभावोक्तेरपि र्तवदटंकाराल्रसङ्गेन भेदं दरायति- 
न चेत्यादिना । हृदयसंवादो हि वस्तुचित्त्रत्तिगतव्वेन इविविधः । तन्न स्व भावोक्तो वस्तु. 
वादः प्रदितः। चित्तचत्तिसंवादश्तु यथा- 
"चन्द्रश्यस्मेरधम्मिज्लमद्धिष्ानां त्रिय प्रति। 
सौपेषु गीतं रामाणां यत्रािभिरनूद्यते ॥" 
अन्न प्रियाभिलाबिणी नायिकाचित्तवृत्तिः सचेतसां स्यचित्तटृत्यभेदेन संवद्‌तीक्ति 
तष्संवादः। यन्न द्विविधोऽपि संवादुस्तत्र किं प्रतिपत्तभ्यमित्याशद्कयाद- उभयेत्यादि । स 
च समवेश्चो यथा- 
॑ किचिख्छुल्चितचुग्चुचुम्बनसुखस्फारी भवल्ञो चना 
स्वप्नान्तोदितचाङ्चाटुकरणेश्वेतोऽपयन्ती मुहुः । 
छूजन्ती विततेक पच्च तिपुटेनारिङ्गथ रीरा 
धन्यं कान्तञ्युपान्तवतिनमियं पारावतं सेवते ॥' 
अत्र पारावतयोः सूचमधमंवर्णनेन स्वभावोक्तिः, चित्तटृत्तिविशेषाच् रसवदरकि 
हरय नयोः खमावे्ः। अन्यत्रेति । यत्र वस्तुगतसुचमध्म॑वणना न स्याव । अनेन च भाविक. 
रसवदखकाराभ्यामस्या सेदो भाविकप्रसङ्गे निर्णेष्यते दति यस्प्रापुक्त तन्निर्वाहितन्‌ । 
इदानीं ष्व प्रकृतमेवाह- नाप्ययमित्यादि । शछगिस्यथंसमपंणं प्रसदः, क्षगिति समर्पित. 
स्याथश्य स्फुटस्वेन प्रतीतिर्भाविकमिष्यनयो म॑हान्मेद्‌ः । एतदेवो पश्चंहरति- तस्मादित्यादि । 
 , व नास्माभिरस्थान एवाभिनिविष्टमिव्याह- रक्षय हत्यादि । 
यं जो हृदयकवाद होता है उसका स्वरूप है कि ष्टं यहवस्तु पेसीदी दै।' इस्तका 
उदाहरण यह्‌ है- 


भाविकालङ्कारः ६७९ 


(जहां रत्नदीपोको हाथमे लेने जा रहेटहै दुसरा को देखकर धवराक भौर हा 
करती धारं पर चेरलोगदहंसा करतें यहां ाश्की यदहवचेशरेस्ती ष्टीष्टोती है इस प्रकार 
का हदयसंवाद्‌ = अनुभूतिगत मेर रता है । यदह संवाद वस्तुविषयक रहता है । दूसरा उदाहरण 
पयथा- 


जो कोश्फलया कन्द स्वादु होता उते सीता जी "पहर अपने गहपति [ भगवान्‌ राम | 
को परोसतीं, उसके पश्च।त्‌ बचे फल या कन्द में से जिसे अच्छा समक्षतीं उपे सुमित्रापुत्र [ लक्ष्मण 
नी] को परोसतीं। श्सके पश्चात्‌ फक या कन्दो मँ जो कोई कच्चा जो सुखा, जो कम स्वादु या 
जो नीरस वच जाता उससे अपना भोजन पूरा करतीं । 


यहां सामाजिक कोमी यही प्रतीत होता है कि गृदिणियों कास्वमाव रेस्ा ही रहता है । 
स्फुटतया स्फुटरूप से = पुरःस्फुरद्‌ = सामने क्चिलमिलाते रूप है । शस प्रतीति का उदाहरण 
यद्‌ है- 


"जहां भावित चित्तवाठे भक्तां द्वारा मगवान्‌ सल्युजय के, निमीलित पूर्णन्दु फी सुषा से सिक्त 
अंगुली वाले चरण सामने उपस्थित से देखे जाते रहते हें ।' 

दूसरा उदाहरण सथा- 

"वह्‌ शकुन्तला कुछ ही डग चली मोर अस्थान पर ही जहां कुश नदीं थे वहीं कुशांकुर से पवि 
घायल हो गयाः देसा कद उदर गे । परसके पेडां कौ शाखाभां मं नीं उलज्ञा वर्क मी 
वह [ मेरी ओर ] संद घुमा खोलने लगती थी' । [ चाढुन्तल | 

श्न [दोनों पो ] मेँ चरण तथा शङुन्तला कौ शुद्ध रूपमे दही प्र्यक्ष रूप से प्रतीति षो 
रषी हे। 

"जाँ स्वभावोक्ति ममी [ पदार्थो की] प्रतीति प्रत्यक्ष जेसी ही होती दै वहाँ कोन सा 
अलंकार टोता ह" रेसा प्ररन कर उ्तर देते दै--“छचित्‌' इत्यादि । 

समावेश = संखष्टिरूप मे समावेश्च या संकररूप मे इसका उदाहरण यष है- | 

दरि [ सिह या चूहे ] पर सवारी करने वाले होने पर भी गणेश जौ जब गला खुजलने 
लगते है तो शिवजी का नन्दीवृष पुंछ माने लगता ओर रोधना बंदकर देताहै। वह खखका 
इतना अनुभव करता दै कि उप्तम उसकी अचंरसंद जाती है, [ विसंस्थुल ] वेडोल सास्ना 
दिने लगती 8, गरदन नीची अची करने लगती हे भौर कान निश्चल दो जाति हें ।' 

इस पद्य मे प्रैल का पं धुमाना भादि जो धरम है उसका सूक्ष्म वणेन होने से सवमावोक्ति है 
जर उसका प्रत्यक्न जैसा अनुभव होने से माविक । इस प्रकार यहं हन दोनों का समावेश हे । 


इसी प्रसंग से रसवदलंकार से स्वभावोक्तिका अन्तर भी दिखलति है-"न च, इत्यादि 
केद्वारा। हृदयसंवादजो हैवहदो प्रकारका होता है वस्त॒गत ओर चित्तदत्तिगत। दोनाँमें 
से स्वभावोक्ति में वस्तुसंवाद होता दै जो उपयुक्त पर्थो दारा बतलाया जा चुका है । चित्तवृत्ति. 
सवाद का उदाहरण यह्‌ है- 


(जहा, चन्द्ररदिम्यो से य॒सकुराती धम्मिल्ल मरिलिका [ जूडेमे लगे मोगरे के पुष्प ] वाली 
रामार्भों के प्रियजन के छिद गाए गए गानों का भ्रमरो द्वारा अनुवाद किया जाता है। 

यहां नायिका क प्रियाभिलाषरूपी चित्तवृत्ति सष्टदर्यो को अपनी चित्तवृत्ति के साथ अभिन्न 
रूप मे प्रतीत होती है, अतः यहां चित्तवृत्तिसवाद हुभा । | 


६८० अलङ्कारसरवंस्वम्‌ 


जहां दोनों षी प्रकार का संवाद हो वक्षं क्या समञ्लना चादि दस प्ररन पर कदतेदै- 4 
उभयः इत्यादि । इस समावेश का उदाहरण यह रै- 

"यह कपोतौ [ कवृूतरी ] सोकर जाग उठी है। इसकी ओं किञ्चित्‌ -ङुचिन-चंचु-चुम्बन- | 
खख सेस्फारित ्टोगहं है। नीद के पश्चात्‌ उदित चार चाटउकारी द्वारा अपना चित्त अपित | 
करती हृद यह्‌ वार वार गुढरग॒धर कर रदी है गौर उसने अपना एक पंख पौलाकर कपोत का | 
आल्गिन कर रखा है। शस प्रकार यह स्मीपवत्ती, लीलाल्प्त ओर श्रिय कपोतका सेवन कर 


रही दे!" 
यद कपोत कपोती के सूक्ष्म धमं का सूक्ष्म वर्णन है, अतः स्वभावोक्ति दै, ओर चित्तृत्ति- 
विशेष [रति ] के कारण रसवदलंकार है। इस प्रकार इन दोनों का प्कवर समावेश ३। < 


भन्यत्र = जहांवस्तुका सृक्ष्मवणेन नहीं । इस विवेचन ॐ द्वारा मन्थकार्‌ ने पहले [ स्वभावोक्ति. | 
भकरण |मंजो यद्क्हाथाकि भ्माविक तथा रत्तवदलंकार से इसका भन्तर भाविकालंकार कै 
करण में तय करिया जागा उति पूरा कर दिया । अव प्रकृत विषय भारम्म वारते दै-- नाप्ययम्‌ 
श्त्यादि । अका श्ध्रश्चान करानादहै प्रसाद, मौर भाविक शात पदाधंका स्फुरसरूपते 
चान । इस प्रकार इन दोनों मे महान्‌ भन्तर है। श्सीङा उपतंदार करतेहुर लिखति 
तस्मात्‌०। 

यहु वतलाते हए कि हमने यह विवेचन निराधार नदीं कियादै भगे रलिखते दै 


स्वस्व | 


लक्ष्ये चायं प्रचुरपरयोगो दश्यते । यथा- 
मुनिजंयति योगीन्द्रो महात्मा कुम्भसम्भवः । 
येनेकचुद्धके दष्ठौ दिभ्यौ तौ मत्स्यकच्छपौ ॥' 
यथा वा-हषंचरितप्रारभ्भे ब्रह्मसदसि वेदस्वरूपवणने । तत्र हि 
श्रत्यक्षमेव स्फुटत्वेन तदीयं रूपं इश्यते । एवं तत्रेव सुनिक्रोधवर्णने, 
पुटिन्दवणनादौ ज्ञेयम्‌ । 
अर्थं त्वत्र विचारद्धेदाः क्ंभवति- इह कचिद्धणनीयस्य वणेनाचरादेव 
पत्यक्षायमाणच्वम्‌ । कचिल्प्त्यक्षायमाणस्यैव वर्णनम्‌ । आश्चो यथोदाहृतं ह. 
ध्राक्‌ । द्वितीयो यथा- 
'अनातपन्रो.ऽप्ययपत्र लक्ष्यते सितातपतरेस्वि शश्व॑तो घ्ुतः। 
अवामसेऽप्येष सदैव वीज्यते विलार्वाटभ्यजनेन कोऽप्ययम्‌ \* इति । 
अत्र प्रथमभ्रकारविषयोऽयमटठंकासो न प्रकारान्तरगोचरः कवितमः 
पिंतानां धर्माणां दछलंकारत्वात्‌ । न दिमांद्युखावण्यादीनामिव चस्तुखन्नि- 
चेदिनाम्‌। अपि च शछष्दानाकुटता चेति तस्य देतून्पचक्षते' इति भाम 
हीये, शवाचायनाक्कुलस्पेनापि भाविकम्‌? इति चौद्धटटक्चणे उयस्तसंबन्ध- 
 रदितशब्दर्खदर्भखमर्पितत्वं ब्रत्यक्षायमाणस्वप्रतिपादकं कथं प्रयोजकीभवेत्‌ , 
यदि वस्तुसन्निवेराधर्मिंगतत्वेनापि भाविकः स्यत्‌ । तस्माद्‌ वास्तव 


रः 


भाविकालङ्कारः ६८१ 


मेव महच्च पुत्तरप्रकारविषये वर्णितमिति नायमटंकारः । यदि ठु बस्तः 
सेवा सोन्दयं कविनिवद्धं कविनिवद्धवकतृनिवद्धं वा लकटवक्तृगोचयी- 
भूतं स्वभावोक्तिवद्‌टं कारतया वर्ण्यते; तदायमपि प्रकारो नातीव डः 
शिलष्ठः। अत पएव त्यक्ता इव यत्रार्थः क्रियन्ते भूतभाविनः, तद्दाविकम्‌ 
इत्येतावदेवान्येभाविकटक्षणमकारि । स्वभावोक्त्या किचित्सादश्यात्तद्‌- 
नन्तरमस्य उक्षण कृतम्‌ । | 

लक्ष्य [ काव्य ] मे इसका प्रयोग प्रचुरमात्रा मे मिलता है । जेते- 

(महात्मा ओर योगिराज मुनि अगस्त्य सवोल्छृष्ट है चिन्होँने [ ससुद्रपान के समय | एक 
दी चल्ल्मेवे दोनो दिष्य [ विष्णु के अवतारभूत ] मत्स्य ओर कच्छप देखे ।' भोर जेते-- 
दषचरितके आरम्भे ब्रह्माजी को समा ॐे बीच वेद के स्वरूप के वणन मे । वर्ह प्र्यक्षह्प 
से उस [वेद ] का स्वरूप स्पष्टतया दिखाई देने लगता है । इसी प्रकार उसी प्रसंग मे सुनि कै 
कोप के वणेन, भौर [ अष्टम उच्छ्वास के आरभ्ममे ] पुलिन्द के वणेन भादि मंजाना जा 
सकता हे । 

यहं थोड़ा सा यद विचार क्रियाजा सकता है- य [ का्यो ] मे कीं तो वण्नौय 
पदाथं की प्रत्यक्षवत्‌ प्रतीति वणैना केकारण हयी होती है ओर कीं प्रत्यक्षवत्‌ प्रतीति को 
वर्णना होती है। श्नमें प्रथम का उदाहरण पदकेष्टी [ सुनि्जयति० ] दिया जा चुका द्वितीय 
का उदाहरण यह्‌ है- 

पवद कोई रेसा व्यक्ति जो आतपश्ररद्िति होने प्र मी चहंमोर से धवल आतपत्र से 
धिरा प्रतीत होता है ओर चामर रदित होने पर मी विलातरूपी वारव्यजन से श्स पर सद्‌ा दी 
इवा होतो रहती है । 

[ हमारी दृष्टम] ह्न दोनों में से यह्‌ [ भाविक ] अलंकार केवल प्रथम प्रकार तक सीमित 

› दूसरे प्रकारमे यह नदीं होता। क्योकि जो धम कविद्रारा समपित होते देवे ही 
अलंकार माने जाति है, नकि वे षम जो वस्तुनिष्ठ होतेरै, जेते चन्द्रमा आदिमे रहने वाले 
आव आदि । भौर इ्तीलिपर एक कठिनां यह मीमातौ हैकि वस्तुनिष्ठधममौ मेमी भाविक 
मान च्याजाए तो प्रत्यक्षवत्‌ प्रतीति के प्रति व्यस्त सम्बन्धरदित राब्द सन्दम दारा | ५ 
उपस्थित्तिको जो भामहके लक्षणे 'भौर सान्दं की अनाकुलता उसङ़े हेतु बतलाए जाति १ 
षस प्रकार तथा उद्भट के लक्षण में शब्दो की अनुकूलता में भाविक होता है" इस प्रमार्‌ निभ्पादक 
के रूपमे स्वोकार किया गय। है यड निष्पादक कैते सिद होगी । इस्त कारण द्वितीय प्रशर मे 
वास्तयिक महत्व ही वणित किया गया है एकतः वहां यद अलंकार नदीं है । हँ, यदि वास्तविक 
सौन्दय मौ कवि क दारा उपनिषद हो अथवा कविदारा प्रस्तुत पात्र दारा, साथष्टी समी पाठकों 
कै प्रत्यक्ष का विषय हो ओर स्वमावोक्ति ॐ समान अलकषारसूपसे प्रस्तुत किया जार, तो यद 
[ द्वितीय ] प्रकार मी अधिकं अहृदयंगम न होगा । इसीलिए अन्य [ मम्मट | आचाय ने मी 
भाविकका लक्षण "जहां मूत जौर भावी पदार्थो का प्रत्यक्ष सा किया जाता है उसे भाविक 
कहा जाता है, इतना हो किया है । इसका स्वभावोक्ति के साथ कु साटृस्य ह इस कारण इसका 
सक्षण स्वभावोक्ति के बाद रखा गया हे," 


विमशिनी 
तत्रैवेति । हर्षचरिते! तत्र क्रोधसुनिवर्णने प्रारस्म एव स्थितम्‌ । पुिन्दवणनं पुन 
र्टमोच्छवासारम्भे स्थितमिति तत एव स्वयमवधायम्‌ । इह तु मन्थविप्तरभयान्न 


६८२ अलट्धारसवंस्वम्‌ 


लिखितम्‌ । अतीतानागतयोः सुद्रितेऽपि प्रव्यज्ञायमाणष्वे देशादि विग्रक्कष्टानां प्रस्यन्ञाय. 
माणत्वसुदाहरता मअन्थक्तातीतानागतव्वस्य विप्रकषमात्रसारस्वं सूचितम्‌ । तच्च देश | 
कारस्व भाव विग्रह्ृष्टानामविश्िष्टमिष्येतदु दाहृतम्‌ । तत्रागस्स्यसुनेद्‌ श्वि प्रङ्ृष्टरव मू । 


अनागतश्य तु यथा- 
| "बिक्तोस्तिप्ताखिटखुर पुटाहन्यमानाद्विरौव्र- 
| ६्वानन्रस्यष्सुरवर नमस्कारवाग्द॒त्तकणंम्‌ । 
पाश्णिस्पर्ाद्वहनत॒रगं प्रेरयन्‌ सरेच्छुजाति 
जेष्यष्येष त्रिुवनविसुः ककिद्पेण विष्णुः ॥' 

एवं चिरंतनोक्तनीस्या विचायं पुनरपि स्वोपक्तं कचिद्िचारमाह~-अयभित्यादिना । ं हि 
संभवतीति । न पुनः केनापि इष्ट इति भावः । यथोद।तमिति । सुनिजंयतीष्यादि ना । 
प्रथमेति । यत्र वणनावश्चारप्रस्यन्तायमागस्वस्‌ । अत पुव कविसमर्पितधर्मागां न वस्तु. 
सन्निवेशिनां धर्माणामटकारस्वादिति सम्बन्धः न दहि वस्तुमाच्रवर्णने कविक्धौशलं 
क्रिचिदिति भावः। अपि चेति निपातसमुदायः समुच्चयार्थः कत्रेव वाक्यगस्या हेष्वन्तर. | 
स्य खञ्ुचचीयमानश्वात्‌ । कथमिति । वस्तु मान्रवणने श्ञब्दानामाङुरूताया अजनाङकुङतायाश्चा- | 
विशेषाच । उत्तरप्रकारेति। अनातपत्रोऽपीष्यादौ । अत्रापि प्रकारान्तरेणाटंकारष्वं योज. 
यति- यदि चित्यादिना । सकलवक्तृगोचरीभूतमिति । कविमाच्रगम्यत्वात्‌ । अत एव प्र 
र्यत्तायमागतवस्व तत्निर्मितायमानत्वं स्यात्‌ । सकरूवक्तृगो चरीभूतष्वे पुन यथोक्तं वास्तव. 
एवमेवेति भावः । नातीवेति। न पुनः प्रकारवत्‌ सुशिल्ष्ट इति यावत्‌। अत एवेति । 
वास्तवस्यापि सौन्दय॑स्यात्राटंकारतया वणनात्‌। एतावदेवेति। न पुनः शब्दानाङुकर" 
त्वादि वस्तुनि तस्याविरोषात्‌ । अन्येरिति । का्यप्रकाशकारादिभिः। 

तन्नेव = वकी हष॑चरित में दयी । वदां क्रोधपुनिनदर्वासा का वणैन आरम्भ [प्रथम उच्छ्वास] मेँ 
हयी है, ओर पुलिन्दवणैन अष्टम उच्छवाप्त मँ है। उपति वदते समञ्च लेना चादि९। यदांमन्थके 
विस्तार के भय से उसे उद्धृत नष्टं किया। यद्यपि सूत्रम अन्धकार ते केवह अतीत ओर अना- 
गत्ग प्रत्यक्षायमागताका इष्टे किया है किन्तु दृत्तिमें उदा्रण दि९ हे दूर देशभर 
भिन्न काल में स्थित [अत एव अततीत ओर अनागत के दी समान भप्रत्यक्ष | वस्तुर्भो के, इते 
यह्‌ सूचित किया गया कि अतीतं भर अनागत मं भी सारभूतं तत्त [ भाविक मे अल्कारत्व 
कराकारण] विप्रकर्षमात्र [ दूरी] है। इनम से अगर्त्यञुनि कौ टूरदेश स्थिति का उदादरण दे 
दिया गया है [ मुनिजैयत्ति० इत्यादि ] अनागत का उदाहरण यह है-- 

तीनो ढको के स्वामी भगवान्‌ विष्णु कर्विरूप म अपने वाहन उप्त अश्व कौ ए 
म्टच्जातिर्यो को नीतेगे जो [ भश्च ] सुरपुर से आहत भौर क्षिप्त उक्षिप्त समा पव॑तों की रोद 
ध्वनि से डरे देवतां दारा उच्चारित नमस्कार शब्दो पर कान दिर हर होगा ।' 

इस प्रकार प्राचीन भाचार्यो की दृष्टि पे विचार कर भव भपनी ओर सेमी कुछ विचार 
प्रस्तुत करते इए लिखते है--'अयम्‌” सत्यादि । संभवतीति = कया जा सकता है अथात्‌ यद 
विचार भमी तक किसी ने देखा नही है। यथोदाहृतम्‌ = 'ुनिजेयति० श्यादि दारा 


सिः 
सव || । प्रथम = जह व्णना के कारण प्रत्यक्षायमाणता भाती हे । इसीलिर इसका सम्बन्ध ~ 
ठेसा हयोणा-'कविसमपित भर्मामें ही,नकि वस्तुनिष्ठ धरमोार्मे अलंकारत्व होने सेः माव यह 
कि केवल वस्तुमात्र के वणैन मे कोद कविकीराल नदीं रहता । अपि च = यह निपातसमुद्राय 


लगाते हुए 


समुच्चयार्थक है क्योकि यदीं [ अगले ] वाक्य के दारा एक अन्य हेव का भी समुच्चय कियाजां 


भावेकालङ्कारः ६८ 


रहा है। कथम्‌ = केसे = क्योकि वस्तुमात्र के वर्णनर्मे शब्दों की आकुलता हो या अनाकुलता 
दोनों मे कों अन्तर नीं रहता । इउत्तरप्रकार = परवती दूसरे मे भर्थात्‌ “अनातपत्रोऽपिः 
इत्यादि द्वारा प्रदशित प्रकारमें। 
अव यहां मी अन्य प्रकार से अल्कारत्व की सिद्धि करतेदहै-यदितु। सकल्वक्षतुगोचरी- 
भ्रूतस्र्‌ = सभी पाठकों के अनुभव में मने वाला = क्योकि वह भी कविमात्रका विषय रहताहै। 
इसीकि९ प्रत्यक्षायमाणता भी तन्निर्मितायमानता = [ कविद्टारा निर्मित शोना] ही दहोगी। 
नवीन = अधिक रिल्ट-न कि इसके प्रकार के समान सुरिलष्ट। अतएव = वास्तविक सौन्दयं 
को भी अलकाररूप में वतलाएजानेसे। एतावदेव =इतनादहदी नकि [ भामह ओर उद्धट के 
समान | श्चब्दानाकुलत्व मी उसमे जोडा हे क्योंकि वहतो वास्तविक वस्तुके कथनमेंमभी 
समान रूप से रहता है । अन्यैः = अन्य = काव्यप्रकाशकार आदिने।, 
विमशं-वियेधर- 
'भणव-काम मलदन्दहीना मावामलानिविताः। 
सवश्ाः सव्कत्तारो मता विचेशवराश्चते॥ -पूणताप्रत्यभिन्ञा उत्त ५०४1 
स्थात रिव, मन्त्रमहेश्वर तथा मन्तरेश्वर नामक प्रमाता जव अभिलाष या अपूणत्वाभिमानरूपौ 
आणव मल तथा धमाधम-वासना-रूपी कामे मल्से रदितभोर वेय वस्तुके प्रति स्वभिन्नताबोध 
रूपी मायिक मल पे युक्त रहतेदैः तो विदेश्वर कदलातेदहैः। ये सर्वज्ञ ओर सव॑कन्तां होते हे, 
मायामल का लक्षण पृणेताप्रव्यभिज्ञामें ही क्स प्रकार दिया गया है- 
'माययान्धीक्ृतो वेयं भिन्नं परयंस्तु पाञ्धितः । [ उ० ४९७ का० | 


विमर्दिनी मे 'विचेश्वर आदिः इस्त प्रकार जो आदि हाब्द दिया गया है उसका संकेतः 
विज्ञानाकल आदि को ओर है| इन्हें दोवदरोन से समञ्च लेना चाहिए । 

इतिहा्त-माधिकालंकार सवंमान्य अलकार्‌ है । इसका सूत्रपात 

दण्डो-के काव्याद में इस प्रकार भिलता है- 
'तद्माविकमिति प्राहः प्रबन्धविषयं गुणम्‌ । भावः कवेरभिप्रायः काव्येष्वासिद्धिंस्थितः ॥ २।३६४ 
परस्परोपकारित्वं सवेषां वस्तुवणेनम्‌ । विद्ेषणानां व्य्थानामक्रिया स्थानवण्ना ॥ ३६५ 
व्यक्तिरक्तिक्रमवलाद्‌ गभीरस्यापि वस्तुनः । मावायत्तमिदं सव॑मिति तद्‌भाविकं विदुः ॥ ३६६ । 

भाविक प्रबन्ध विषयक धर्मदहे। क्योकि काव्य में कविका अभिप्रायरूपी माव आसमाक्षि 
स्थित रहता है । इसे कथावस्तु के समी पवं परस्पर मे उपकारी होते है । व्यथ विद्ेषणों का 
इसमे अभाव रहता है। इसमे स्थानों की वर्णना तथा उक्तक्रम केवल पर गम्भीरव्स्तुकी भी 
अभिव्यक्ति रहती हे। य॒द्‌ सव॑भावायत्त रहता है अतः भाविक कहलाता है [ काव्याद २।३. 
६४-६ ] दण्डी के इस पिवेचन से प्रतीत होता 8 कि दष॑चरित के ब्रह्मसभा आदि केवणनमे 
भाविक मानने. की प्रेरणा सर्वस्वकारको दण्डीसेदही मिलीहै। स्फुट पच्याथमें मी भाविकका 
असितत्व दण्डी को मान्य है रेसा उनके ऊपर दिए विवेचन से प्रतीत नदीं होता । 

भामह-क। भाविकलक्षण आंशिक रूपसे वृत्तिकारने उद्धृत करदिया है) दण्डी 
अनुङ्कति पर श्दोँने भाविक का पूरा विवेचन शस प्रकार किया है-- 
भाविकत्वमिति प्राहुः प्रबन्धविषयं गुणम्‌ । प्रत्यक्षा इव दरयन्त यत्राथां भूतमाविनः ॥३।५३॥ 
चित्रोदात्ताद्‌ युताथत्वं कथायाः स्वभिनीतता । श्ब्दानाकरुलता चेति तस्य हेतुं प्रचक्षते ॥३।५४॥ 


६८७ अलङ्ारसवेस्वम्‌ 


तायुण है जोप्रवन्धर्मे रदताहे। हतम भूतमवी पदाथ प्रव्यक् जैते 
दिखा देते हें । इसमे देतु वतलाण जाति हे (१) केथानर$ के वेविध्य, उद्रात्तत्व तथा अदूयुतत्व 
(२) अभिनयकला का ठीक अनुगम तथा (३) दाब्दं की अनाकरुलता । 

इस प्रकार स्पष्ट है कि भूतमभावी पदार्थो की प्रव्यक्षायमाणता को भामह नेदही भाविक में 
स्थान दिया है । इसी प्रकार शहचव्ित शब्दानाद्ल्ता मी माविकलक्षग मँ मामद्‌ से दी आती है । 

अन्य विष्यो म शन दोनों आचार्यो कौ मान्यता प्रावः समान दैः । इर्दोनि मात्रिक को 

अरवन्धगत अलंकार माना है अतः उदादरणके रूपमे कोई पय नदीं द्विया दहै। 

वामन भाविक के विषयमे चुप दै। किन्तु 


उद्धशने इते सुक्तकयुणमी मान च्वि दै। उन्दने भामह द्वारा प्रस्तुत देतु प 
कता को अपनाया दै। सामहङ्री देष समी स्थापना स्वीकार 


भाविकत्वं एके 


केवल डाब्द्रसन्दभं की अना 


करते हृए वे छिवतेदै-- 
श्रत्यक्षा इव यत्रार्था द दयन्ते भूतमाविनः। अव्यद्युताः स्वात्‌ तदूवाचामनाक्रुल्येन म।विकम्‌' ॥३।६॥ 


जिन अत्यन्त बदुयुत भूत ओर मावी पदाथ उक्ति कौ अनाकुला के कारण प्रव्यक्त जेत 
दिखाई देते दै वद माविक कदहलाता है» उद्धटने सुक्तक गुण करूप इप्तका यद उदाहरण 
दिया ₹- 
न्नानां प्रकारके आभरणो कीदयोमा देखने योग्य इस्त आङ्ृति पते जजन श्य नेत्रो वाली 
तुम [ पार्वती ] पीडा भौर प्रीति दोर्ना दे रहीदो।' ॑ 
यषां पारव॑तीजी के अरो पर तपके पूवं जो अ्कारश्री शोभादेरदीहागी ओर तप के पश्चात्‌ 
जो भूषणश्री दोगी उसको प्रत्यक्ष देखा जा रदा है। इसीलिए उसके अमावमे दुःख व्यक्त किया 
जारा दहै। इस प्रकार माविकका प्रबन्धसे मुक्तक तक सीमित करने का उपक्रम उद्धः सं 
आरम्मदह्ोतादे। 
श्द्रट मे माविक का विवेचन नर्द भिलता। 
मम्मट ने उद्धय् के लक्षणको ओर मी संक्षिप्त क्रिया ओर उप्तम से पद{थेगत अद्ुनता तथा 
उक्तिगत भन।कुलता दोनों को हटाकर उप्तका सूप केवछ इतना हौ रहने दिया- 
श्रव्यक्षा हव यत्राथाः क्रियन्ते भूतमाविनः, तद्भाविङम्‌'। 
सवस्वकार ने इसे उद्धृत मी कियाहै। मम्मट कौ दृष्टि वस्तुपरक न होकर आत्मपरकदै। 
इसीलिए उन्दने दृदयन्ते क्रियापद के स्थान पर क्रियन्ते क्रियापद भपनाया। !दिखाई देना? 
ज्ेयगत तैदिष्टय है जवकि देखना ल्वावृगत! निशित ही मम्मरके अनुनार कान्यरिद्प भौर 
वस्तुगत अदूभुततासे मी बड़ी वस्तु ज्ञात्रनिष्ठ मदुक्ता) भाव्रिकञब्द की व्युत्पत्ति उन्न 
दण्डी की मानी है-- "मावः कवेरभिप्रायोऽत्रास्तीति । सवस्वकारने एक नवीन विकल्प के साथ 
हसी ॐ अपना लिया । मम्मट्ने भाविक को सुक्तकगत बतलाया है प्रवन्धगत्त मानने के विषयमे 
वे मोन है । उना उदाहरण है- 
'भाप्तीदज्जनमत्रेति पदयामि तव लोचने । 
माविभूषगसंमारां साक्षात्‌ कुवं तवाकृतिम्‌ ॥ 
हे य॒न्दरि } वम्हारे हन नेत्रो म अजन धा रेता देव रदा भौर म्हारी आगे भूषणसंमार 
से उत्यन्न श्री वाली आछ्रततिकामी साक्षात्कार कररदा हू यहाँ पूवष मँ भूतविषयक तथा 
उत्तरां मे भ(विविषयक प्रत्यक्ष का वण्न दहै । 


ए "क 


भाविकालङ्कारः ६८९4 


इस पूवकथासे स्पष्टहैकि भाविककाजो रूप मम्मर तक शिखरा था सव॑स्वकार ने उसो 
को अपनाचल्यादहे। 
रष्नाकरकार = विमरिनीकार नेजो वस्तुगत विप्रकषे को महत्व दिया था, उसके पीछे 
रत्नाकर का निभ्निलिखित भाविकसूत्र चिपा था-- 
[ सू. ] "विप्रङृष्टस्य प्रत्यक्षायमाणत्वं माविङम्‌ ।› 
[ वृ० | देशकालाभ्यां स्वमावेन वाविप्र्टस्यार्थ॑स्य साक्षाद्यहणगायोग्यस्यापि साममीबञेन 
प्रयक्नायमाणत्वं स्फुटतया पुर स्फुर द्रूपत्देनेव प्रतीतिमांविकम्‌ । 
देश, काल या स्वभावतः विप्रङृष्ट अयात्‌ प्रत्यक्ष दारा जानने के अयोग्य वस्तु का मी 
सामग्री के आधार पर प्र्यक्षायमाणत्व भाव सामने खडेपेरूप मेंक्ञान भाविक कहलाता है 
भगे रत्नाकरकार ने यदमी ज्खिादहै कि माविक मे यथपि समी पदाथं शब्दस्ते हो प्रतीत 
होते दं तथापि शेता है उनका ज्ञान, प्रत्यक्षवत्‌ हदी। सामग्री की ग्याख्यामें उन्न दण्डी 
ओर भमामद द्वारा गिनाएसमः हेतुर्भो को अपना ल्या है वस्तु की अद्भुतता, ₹ाब्दो कौ 
रिति भर्थसमपकता, वाक््यकासरल अन्वय, कविका कुशल कविकम-हत्शादि सभी के योग 
से चिरानुभूत वस्तु भी चित्तभित्ति पर प्रतिफछ्ति हो जती है। प्रत्तिफछित होकर वह निविडता 
धारण करती है। फलस्वरूप ह्यातृचेतना उप्तीपर एकायो जातीदै। शस स्थिति मेंज्ञाता 
वस्तु का प्रत्यक्षक्षान चिरकाल तक करता रहतादहे। यदी भावनारहै। भावना के बल से सहृदय 
दूरस्थित वस्तु का प्रत्यक्षमी उसी प्रक्रार करता रहता हे जिस प्रकार योगी कियाकरता हे।' 
इन शाब्दो मेँ रत्नाकरकार ने सव॑स्व के विस्तृत दाश्चेनिक विवेचन काहौसंक्षेपकर दिया है; 
उदाहरण दारा अपनी मान्यता स्पष्ट कर उन्होने अन्त मे स्वभावोक्ति भौर भाविक के अन्तरपर 
यह प्यमी वनादियाहै- 
सुक्ष्मस्वमावकथनेन विनापि साक्षादथप्रतीतिरिह्‌ केवलमाविकाङ्गम्‌ । 
शुदस्समग्रजनतानुभवप्रसिद्धस्तम्यक्स्वभावमणितो तु मवेत्‌ स्वमावः ॥ 
माकिक मं केवल साक्षात्‌ जथ प्रतीति रहती हे, इसमे [ स्वभावोक्ति के समान] सूक्ष्म 
स्वभाव का कथन नहीं रहता । शुद्ध स्वभावोक्ति वांष्टोती है जहां सभीलोगों के अनुभव 
मे भने वाले भतणव प्रसिद्ध स्वभाव की सम्यक्‌ उक्ति रदती है। 
अप्पयदुीरक्तिति ने भाविकाटंकार मावकता को जिस अत्तिभूभिसे उदित दहुभा थारे 
अत्यन्त क्षीण रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया है- | 
(माविकं भूतमाव्यथसाक्षात्कारस्य वणनम्‌ ।› 
भूत ओर भावी अथं के साक्षात्कार का वण्न भाविक । 
उदा० अह विलोक्येऽापि युध्यन्तेऽत्र सुराघराः ।* 
म देख रदाहूंकि सुर ओर भसुर आज मील्डरदहेहै। नतो इसमे वस्तुगत भद्मुतता 
2, न कविकमं की सूक्ष्मगति । लगता है मम्मर से भाविक की भोर जो दुलक्ष्य होना आरम्भ हआ 
था अप्पयदीक्षित मे उसकी परा काष्ठा हो गदे है। 
पण्डितराज जगन्नाथ के रसगङ्गाधर म भाविकका संग्रह नदीं ष्टो पाया था, किन्तु 
विश्वेश्वर पण्डित ने उस्तकी आंिक पृत्तिकर दी दहै उन्दाने- 
भाविकमध्यक्षं स्यात्‌ प्रध्व॑सप्रागमावानाम्‌ ।' 


प्रध्वंस तथा प्रागभाव वाले पदार्थो का प्रत्यक्ष भाविक क्टलाता है। प्रध्वंस से अतीत तथा 
प्रागभाव का संग्रह कर विरवेरवर ने भाविक पर मम्मटका लक्षण दुदरादिया है। मम्मटने 


दै<दै अलङ्लरसवेस्वम्‌ 


“प्रत्यक्ष जेसेः छिखा था विदवेश्वर ने प्रत्यक्षः दही लिख दिया वस्तुतः मानस साक्षात्कार यहां 
होतादहीदरं। 
भाविक की न्युत्पत्ति पर सवस्वकार का खण्डन करते हुए विद्वेदवरने का है कि “मावः 
कवेरभिप्रायोऽस्त्यस्मिन्‌? यह ब्युत्पन्ति भाष्यविरुदध है । क्योकि [ अर्थापत्ति प्रकरण को 
| विपरिनी मे उदधतत] सप्तम्यांचनतो स्मृतोः शस माष्ववचन द्वारा निषेध हो जनेसेयठन्‌ 
| प्रत्यय सप्तमी अथंमं नदींष्चोगा) यहां ठन्‌ प्रत्यय मत्वर्थाय होगा अतः व्युत्पत्ति दोगी.- 
भावः कवेरभिप्रायोऽस्त्यस्यः = जिसका विषय भाव=कविका अभिप्रायदहोता है वद भाविक । 
विदवेदवर के अनुसार मीभूत ओर मावी पदार्थौ के प्रव्यश्च मे अपेक्षित सन्निकषं वस्तुगत 
अद्भूतता से निष्पन्न दो जाता है । 
श्री वि्याचक्रवत्तीं की निष्कृष्टाथकारिका माविक पर इस्त प्रकार रै- 

(अथ प्रतीतिवेचिच्यतारतम्यनिरूपणेः । 

माविकं दूरदुलैक्षं व्यक्तं व्याक्रियतेतमाम्‌ ॥ 

योऽयं प्रत्यक्षवद्‌ भावस्त्वतीतानागताथयोः। 

तद्‌मावविम्बनाच्चित्ते विनिवेश्याच्च माविकम्‌ ॥ 

नाविपर्ययतो भ्रान्तिः सा्षाच्वान्ने तिषृन्तपम्‌ । 

अन्यत्वानध्यवसितेनं चात्रातिङ्योक्तिता ॥ 

न परं वत्तमानाथेधमं प्रत्यक्षतेष्यते । 

प्रतिपस््रनपेक्षायां प्रत्यक्षत्वपरिक्षयात्‌ ॥ 

प्रत्यक्षत्वे च सामग्री भावनाद्‌ुतवस्तुजा । 

प्रत्यक्षत्वं न॒ समाव्यमिह नोप्प्रक्षणं ततः॥ 

अलिद्गलिङ्कगिभावाच्च काव्यजिद्धं न चेष्यते । 

ताटस्थ्यातु स्फुटसंवित्तेने तदा रसवद्‌ञ्रमः ॥ 
पश्चात साधारणीमावे रसर्वास्तज्निमित्तकः । स्फुर्त्वान्न स्वभावोक्तिर्छोकोत्ती्णस्य वस्तुनः ॥ 
स्वमावोक्ते रसवतो मेदः संवादमेदतः। न प्रसादयुण्चेतद्‌ यस्मादौत्तरकालिकम्‌ ॥ 
वास्तवेऽपि च सौन्दर्ये योग्यत्वादस्य संभवः । चिरन्तनानुरोधात्त॒ तथा व्यक्तंन फीत्तितम्‌ ॥ 
भाविके बुद्धिसंवादो मया स्याद्‌ यदि कस्यचित्‌ । व्याख्या्चिरपस्य निकषः समे धीमान्‌ मविष्यति ॥ 


[ स्वभावोक्ति के पश्चात्‌ ] अव भाविक जो भत्यन्त कठिनाष्से जाना जा सकता है प्रतीति. 

गत वेैवित्य तथा तारतम्य का अनेकधा निरूपण कर॒ अत्यन्त स्पष्टता के साथ बतलाया जारा 

है। अतीत भोर अनागत पदार्थौ काजो चित्त पर यहु प्रत्यक्ष तुश्य भाव = प्रतिविम्बर पडता 

है यद्‌, भावके विम्बन तथा चित्त में विनिवेशन के कारण भाविक कदलात। ह । इमे विपयंय 

नहीं होता इसटिए यह श्रान्तिस्वरूप नहीं है । वस्तु साक्षात्कार के कारण यह इतिवृत्तमात्र 

नष है। अन्य भध्यवसान न दोने से यद भतिश्चयोक्ति मी नदीं रै। केवल वत्तंमान पदाथका 
धरम ही प्रत्यक्षता नदीं मानी जाती। क्योकि यदि ज्ञातान रेतो प्रत्यक्षता भी नीं रहती । 
प्रत्यक्षता मे कारण होती हे भदूभुतवस्तु की भावना । यदहं प्रत्यक्षता संमावनात्मक नीं रदती 
अतः इसे उप्परक्षा नदीं.माना जा सकता। भौर लिङ्गलिङ्गमाव कैन दहोने से इसे कान्यजिन्ग 
ओ नदीं कहा जा सकता । इसमें तटस्थता भौर स्फुटता का श्चान रहता है अतः सतम रसवदलंकार 
का भ्रभ नहीं हो सकता । बाद मे जवसाधारण भावषहोता है तव भाविक से रसवदलंकार कौ निष्पत्ति 
दोती 8 । यद लोकोत्तर वस्तु का प्रत्यक्ष होता है अतः यह स्वभावोक्ति रूप नदीं होता । स्वमवो- 


उद्‌ात्ताटङ्ारः ६८७ 


क्ति ओर रसवदलंकार मी संवादगत भेद के कारण भेद र्ता है। यह प्रस्रादयुणमी 
नही है क्योकि यह्‌ प्रसादजनित स्पष्ट प्रतीति के पश्चात्‌ की वस्तु है। 

यह्‌ वास्तविक वस्तुर्ओ के सोन्दयंमें मी होने की योग्यता रखता है किन्तु प्राचीन आचार्यो 
कै अनुरोध से मन्थकारने उसे स्पष्टरूप से माविक नहीं कदा । 

माविकके विषयमे मेरे साथ यदि किती का बुद्धि वाद षहो तो वही बुद्धिमान्‌ व्यक्ति मेरे 
इस व्याख्याशिस की कसोरी होगा । 

चक्रवत्तीं की संजीविनी माविक के कुछ कठिन अंशो पर॒ उल्लेखनीय प्रकाश डाल्ती है! रेसे 
जु अदा इस प्रकार है- 

( १ ) प्रतिप्त्रपेषयेव वस्तुनस्तथाभावात्‌=प्रतिपत्त्रप्षयेव प्रत्यक्षत्वस्य वस्तुधमम॑ता । न हि 
भ्रतिपत्तारमनपेक्ष्य वस्तुनि प्रत्यक्षता नाम काचित । 

(२) तच्रयो ज्तानप्रतिभाक्ठ० = यो यथः स्वग्राह्क प्रतिपत्तुज्ञानप्रकाद्चं स्वान्वयव्यतिरेका- 
वनुकारयति, स्वयमस्ति चेद्‌ ज्ञानप्रतिमासोऽस्ति नास्ति चेन्नास्तीति व्यवस्थापयति स प्रत्यक्ष 
इत्यथः । 

( ३ ) परमाद्वे तज्ञानिवत्‌ = ०० न भाविकरसवतोरमेदः । कुतः ? रति-हासादिचित्तवृ्तोनां 
तदनुरल्ञितत्वेन विमावानुमावनग्यभिचारिणां च यदा परमाद्वेतक्ञानिवद्‌ ममेव श्त्रोरेवेत्यादि विेष- 
परिदारात साधारण्येन हृदयसंवादिनी प्रतीतिस्तदैव रक्षवतो भावः। ००। इह तु भूतमाविनां 
ग्रतीतिनं साधारण्येन, भपितु प्रतिपत्तुस्तारस्थ्येन, स्फुटतया तारस्थ्यं हि मेदः । यथा सांख्यादि- 
सिद्धानां मेदेन स्वं जानतां प्रतीतिः । 

पाठान्तर = निणेयसागरीय प्रति के मृ तथा टीका दोनो के पाठ भशुद्धिबहुल है। 
अतः यहाँ हमने अन्य संस्करणों कौ सहायता तथा रत्नाकर भोर अपनी कर्पना के आधार पर 
पाठसंशोधन किया है। अथापि "परमादेतिक्ञानवतः के स्थान पर संजीविनी मे परमादतैत- 
श्ञानिवत्‌ पाठ है, विमशिनीसे परमाद्वैत क्ञान पाठ काही संन्दिग्ध समेन होता है। 
इनमे से कोई भी पाठ मानने पर भपेक्षित अर्थं निकल ही आतादहै। 


[ स्वस्व | 


[ घू० ८१ ] सखद्विमद्वस्तुबणंनञदात्तम्‌ । | 


स्वभावोक्तौ भाविके च यथावद्वस्तुवणेनम्‌ । तद्धिपक्षत्वेनायोपितवस्तु- 
वर्णनात्मन उदा्तस्यावखरः । तासंभाव्यमानविभूतियुक्तस्य वस्तुनो वणेनं 
कविग्रतिभोव्थापितमेभ्वयंलक्षणप्रुदात्तम्‌ । यथा- 
'मक्ताः केटिविसुत्रहारगलिताः संमाजेनीभिहताः 
` प्रातः प्राङ्गणसीम्नि मन्थरचलद्बालाङ्धिलाश्चाङणाः । 
दूराद्‌ दाडिमवीजशङ्कितधिय; कषेन्ति कटीद्युका 
यद्‌ विद्धद्भवनेषु भोजदपतेस्तत्‌ त्यागलीटखायितम्‌ ॥' 
[ सू० ८१ ] सष्द्धिक्षारी पदार्थं का वणन उदात्त [ नामक अरंकार कहराता है ] ॥ 
[ व° ] स्वमावोक्ति भौर भाषिक वस्तु का यथावद्‌ [जेसा का तेसा] वैन होता है। 
उदात्त कहलाता है आरोपित वस्तु का वणैन । भतः यष उनके विरु है। इसीलिए इते यँ 


६८८ अलडरसवस्वम्‌ 


प्रथमतः श्सक्षा लक्षण समज्ञ ठेना चादर । उक्त सूत्र केसंदभं मँ वद यइ है-'असंभान्य 
विभूति से युक्त वस्त॒ का वर्णन कविप्रतिमा से कट्पित अतः पेदवयंस्वह्प दने से उदात्त कदलति। 
हे । उदाहरण, यथा- 

विद्वानों कैषरमें [रातको] केलिकाल मेँद्रूटे दारो मरे गिरे, प्रातः मागन के एक कोने 
न ्चाद्से वटोरदिद गर्मौर मन्दगतितते घूमती वालार्ओं के चरएणालक्तकं से लाक दो गए 
मोतिर्यो को दूरसे मनारकेदनेि समञ्च केली शुक जो खींचते दै वह भाजराजके त्यागकौ 
लीला हे।ः 


विमरिनी 


सम्रद्धिमदित्यादि । तद्दिषपश्चत्वेनेति । वस्स्ववस्तुवणंनयो्धिङद्धवात्‌ । तत्रेति । पुव्मवसरे 
सतीदयर्थः। असंमान्यमानेति । सं माग्यमानविभरतियुक्छस्य त वर्णनं नेतदङ्गमिति मावः । 
यथा- 
श्रातश्चकाञति गहोडरङुटिमाग्रविचिक्रव्नङघुमप्रकरावक्ीणीः । 
अभ्युद्‌ गताक्षणकराहतिपास्यमानन दन्नराश्िदवला इद पत्र रध्याः + 
शन्र हि भगवन्नगर्या वस्तुत एव प्षंभवति रघ्नविच्धेषः। लत एवास्य कविप्रति- 
भोध्यापितस्वमुक्तम््‌ । एवं चाश्य नामापि सार्ध॑कभर । भअलकारसारङ्कता युनरत्रातिश्शयोक्ति- 
प्रकार कव्वमुक्तम्‌ । 
सद्धद्धिमदिष्यादि । तद्विपचववेन = उनके विरुद्ध, हसक कि वस्तु भौर अवस्तुके 
वर्णन परस्पर विरुद्ध होति हैँ । तच्र इस प्रकार अवसर होने पर । असभाभ्यमान = भाव 
यद कि संमाव्यमान विभूति से युक्त वस्तु के व्ण्न में यह अलंकार नदीं होता । यथा- 

[ हरविजयमदाकाव्य्‌ के प्रथमसगे मे भगवत्पुरी का वर्णन ] 

“जिस { ज्योत्स्नाएवतौ ] नगरी मे प्रासादो के भीतरी फर्ला के अय्ममागसे फके रत्न तथां 
पुष्पो के पुज से छा सद्व प्रातःकाल के समय उदित बालपूयैकी किरणों के भावात स्ते गिस 
नक्षत्ररारियां से शवङित सी छ्गती है ।' [ १।३२ ¡ 

इस प मे वणित रर््नोका फेंका जाना वास्तविक भौर संभव है क्योकि यह नगरी मगवान्‌ 
की नगरी दहै। इसलिए श्स प्रकार इसका नाम भी सार्थक है| अलकारक्षारकार ने इसके विरुद्ध 
हसे अतिञश्चयोफि का मेद वतलया था । 


[ सवस्व | 


[ घू० ८२ ] अङ्कभूतमहापुरुषचरितं च । 


 उदात्तराब्दसाम्यादि हदाभिधानयम्‌ । महापुखषराणा बुदात्त चरितानामङ्गि- 
भूतवस्त्वन्तराङ्गभावेनोपनिवध्यमान चरितं चोदात्तम्‌ । मह पुद्षचरितस्यो- 
द्‌।त्तत्वात्‌ । यथा- 
(तदिदमरण्यं यस्मिन्‌ ददार्थवचनाञचपाखनन्यसनी । 
निवसन्‌ बाहुसदहायश्चकार रश्चक्षयं रामः ॥ 
उबारण्ये वणैनीये यामचरितमङ्गत्वेन बणितम्‌ । 


उदात्ताठड्ारः ६८९ 


| स्‌० ८२ ] [ किसी के प्रति ] अंगभूत महापुदष चरित मी [ उदात्त कषराता हे ] । 

[ ब० ] उदात्त शब्द के साम्य के कारण इते यर्शौँ बतलाया जा रहा है। उदात्तचरित वाङ 
महापुरुषा का चरित, अंगीभूत किसी अन्य वस्तु के अंग के रूपमे उपनिवड हो तो वह भी उदात्त 
[ नामक एक अन्य अलंकार ] होता हे। [ उदात्त] इसचकिए करि महापुरुष का चरित उदात्त 
होता है । यथा- 

यहु वह॒ वन है जिसमे दशरथ के वचन का पाठ्न करने मे निरत रामने जिन क 
सहायक केवर उन्हीं के भुजदण्डये राक्षसो काक्षय कियाथा। 

याँ वणन करना है वन है। उसमें राम का चरित अंगरूप मँ वणित किया गया । 


विमरिनी 
अङ्गभूतेत्यादि । एतदेव भ्याचष्टे-महापुरुषाणामित्यादिना । अङ्किभूतस्य वस्तुनो महा. 
पुरुव चरितसुत्कषप्रतिपिपादयिषयाङ्गतयो पनिबध्यमानसेतद लंकाराङ्गम्‌ । न तूपरक्तणमान्न. 
परतयो पात्तसिति तार्पर्याथंः । तच्च यथोदाहृतस्‌ । 
'कश्िव्कान्ताविरहगुरुणा स्वाधिकारप्रमत्तः 
लापेनास्तंगमितमहिमा वषंभोग्येण भतः । 
यन्तश्चकरे जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु 
सिनग्धच्यातरुषु वहति रामगियांश्रमेषु ॥' 


अघ्राङ्धिनो निरिविलेषस्य वसतियोग्यत्वादिदशेनाथंस्नुर्कषंग्रतिपिपादयिषया राम- 
सीतादिचरितसुपरुक्णपरम्‌ , तदत्र नायमटं कारः । यथा- 
'गोद्ावयाः करिक्रमद्षोदद्डोदकायाः 
पारे पारे वत बत परा्श्यताष्ष्यम्‌कः । 
कंकाा दरौ पिहितगगने दुन्दुमेयंन्र रामः 
पादाङ्खष्ं निजमपि भवदुदे बतं निमंमेऽस्तम्‌ ॥' 
शत्र पवनं प्रति वियोनिन्या उक्तौ रामचरितयुपलक्षणमान्रपरम्‌ , न यङ्गभूतेनाङ्गिनः 
कश्िद्धिशेषो विषक्षितः । 
“अन्रा्तीर्फणिपाक्नबन्धन विधिः शाक्व्या भवद्‌ देवरे 
गाढं वक्षसि ताडिते हजुमता दो णादविरश्राहृतः। 
दिभ्येरिन्दजिदश्र ठचमणशषरेरोकान्तरं प्रापित 
स्तस्याप्यन्र स्गात्ति राङस्षपतेः कत्ता ख कण्ठाटवी ।+' 
इस्यन्न तु रामस्य सीतां प्रस्युक्तावु परूषणगीभूतदे शविन्लेषे पाक्ञबन्धनाधेव स्ाक्ताद्‌ विव. 
्तितभिति न महापुरुषचरितस्य वस्त्वन्तरं प्रश्यङ्गभाव हति नायमरुकारः। 
जं गभूतेष्यादि । हसी कौ व्याख्या करते है--भहापुरुषाणाम्‌? इत्यादि के दारा । तात्पर्य 
यह कि अंगी वस्तु के उकत्कषके प्रतिपादनदहेतु अगरूपमे, न कि उपलक्षण मात्रके स्पे 
उपनिवध्यमान महापुरुष चरित इस अलंकार का निष्पादक होता है । इसका उदाहरण [ तदिद 
मरण्यं ] दिया जा चुका है। [ रत्नाकरकार द्वारा उदात्त के छिए उदाहृत | 
अपने अधिकार मे अस्षावधान अतपव स्वामी के वष भर के कान्ताविरह्‌ संबन्धी अस्वन्त गुरु 
शाप से महिमाश्ञुन्य किसी एक यक्षने रामगिरि के, सीताजी के स्नाने पवित्र जल वाठ तथा 
घनी छाया वाले नमेरु वृक्ष से खन्दर आ्रमो में डरा डाला ॥ 


८ अ० सण 


ए क = > ॐ = = 


६९० अल्डङ्कारसवेस्वम्‌ 


इस पद्य मेँ अङ्क है गिरिविद्ोष । उस्म निवास करने कौ योग्यता दिलाने के लिए उसका 
टत्वं बतलाना आवदयक 8 तदथं रामसीता आदि का चरित अपनाया गयादहे। यह यहां 
उपलक्षणमात्रपरक ३, अतः यदां यह [ उदात्त-२ ] अलंकार न्दी । 
हाथियों के मदचुणं से सिक्त जल्वाली गोदावरी कै किनारे, मा दादा, इस ऋभ्यमूकपवेत 
को देखो, ज्यौ रामने दन्दुभिनामक दैत्य के कंकाररूपी आकाडारोधी पव॑त पर अपने पैर के 
अँगूठे ओौर तुम्हारे देवत को मी अस्त [क्षिप्र ] करदियायथा (१ ॥ 
पवन कै प्रति वियोगिनी की इस उक्ति मे राम काचरित उपलक्षणमात्र है, क्योकि वद 
अंगभृत तोद परन्तु उसतेअंगीका कोई वरेदिष्टय कवि को विवक्षित नीह । [ रत्नाकरकार 
दारा उदात्त के चिए उदाहृत |] - 
यद्‌ नागपाङ्ञा का बन्धन हा धा, तुम्दारे देवर [ लक्ष्मण] को वक्षःस्थक भ दाक्ति लगने 
पर हनुमान्‌ ने द्रोणगिरि यदां ला पर्हुचाया था1 यहां लक्ष्मण के दिव्यश्षरो ने इन्द्रजित्‌ 
[ मेघनाद ] को दूसरे रोक मेल दिया था, अरे उस राक्षसपति [रावण] कोभमी कण्ठाटवी 
यहां करी थीः । 
सीता के प्रति राम की दस उक्ति मँ उन-उन उपलक्षणीभूत स्थार्नो म पाञ्चवन्धन आदि 
साक्षात्‌ विवक्षित है, इसकिए महापुरुषचरित अन्य वस्तु के प्रतिञंग नींद सर्पि यहाँभी 
यह अलंकार नदीं हे, 
विमशं- 
इ तिदाष-दोनों दी उदात्त प्रथमतः दण्डी मे दही मिरु जाते दहे । 
दण्डी-उरन्दोने दोनों उढार््तो कोएक द्ीखलंकार के दो मेद माना दै। उनका लक्षण 
सर्म प्रमाण है--आा्चयस्य विभूतेवां यन्महत्वमनुत्तमम्‌ । 
उदात्तनाम तं `प्राहुरलकारं मनीषिणः ॥२।३००॥ 
आहय [ चित्त ]या वैभवका जो सर्वोत्तम महत्व उसे विद्वञ्जन उदात्त नामक अलंकार 


कते) दण्डीके दोनो उदादहुरण सरव॑स्वकार के दोना उदादर्णाो ते गता हैँ। दोनों की 
अभिव्यक्तियोँ विल्कुल प्क सीदे, 


भआमह-- का उदात्तविवेचन दण्डीकी ही अनुक्ृतिदहै। शन्न माने तो दोनों हयी उदात्त 
हे किन्तु लक्षण केवल प्रथम काही दिया 2- 
नानार त्नादिथुक्त यत्‌ तत किलोदात्तमुच्यते । 


जो नाना रत्न आदि से युक्त ्षोता है उसे उदात्त कदते है ¦ दोर्नो के उदाहरण दण्डी के 
उदादर्णो के ही मावानुकरण है । सवथा उदात्त के विषय में भामह दण्डी से उपङ्ृत दें । इस 
विषय में वामन चुपदहैँ। 

उद्धटनने भौदण्डी केदी समान दोनों उदात्तंको एकी लक्षणम गूंथडाला है। 
उनका लक्षण है - 


“उदात्तमद्धिमद्‌ वस्तु चरितं च महात्मनाम्‌ । 
उपलक्षणतां प्राप्तं नेतिवृत्तत्वमागतम्‌ ॥ ४। ८ ॥ 
संपत्तिशाटी वस्तु उदात्त कलाती है भौर मदात्मार्यो का उपलश्चषणताको प्राप्त चरित, 
विन्तु इतिदृत्तात्मकता को प्राप्त चरित नदीं ।" यहां यद्‌ जान लेना भवर्यकदहैकि उद्भट का 
पलक्षणदाब्द सवेस्वकारकेअंग शब्दकादी समानार्थं शब्द दहै) विमररिनीकार जिस उपर 


उदात्तालङ्कारः ६९१ 


क्षणत्व का खण्डन कर रहे हें वद वस्तुतः उक्त अथं के लिए प्रयुक्त शब्द है जिसके लिप उद्धरने 
‹इतिवृत्त'--श्रब्द दिया है! यह उनके उदादरर्णोसेस्पष्टदहै। 

सुद्रट--वामन केही समान रुद्र के काव्यालंकारमं मो उदात्ताटकार नहीं मिलता । वक्रोक्ति 
जीवितकार उदात्त बो अलंकार नीं मानते श्नके भनुसार वह वरतुस्वमाव से भिन्न को$ 
वस्तु नदीं ३ । 


मम्मट-ने दोनों उदात्तोफेदो अलगलक्षणकिएहें।वेये है- 

( १ ) "उदात्तं वस्तुनः संपद्‌ , स्दा० सक्ताः केलि० 

( २ ) "महतां चोपलक्षणम्‌ उदा० तदिदमरण्यम्‌० । 

मम्मट के उपलक्षण दाब्द काअथंमी ञ्गतादहीहै। क्यांकि उन्होंने द्दाहरण अंगता का 
ही दिया हे, 


रत्नाकरकारन=ने उदात्त का द्वितीयसूप दही उदात्त नाम से स्वीकार कियाहै। प्रथमको 
वे असंबन्ध में संबन्धरूपी अतिक्ञयोक्ति से गताथं मानते दहे । मुक्ताः केलि० पद्य उद्धृत कर 
वे उसमें उदात्तालंकार का निराकरण ओर -क्त भतिरायोक्ति भेद कौ स्थापना करतेदहे। उनका 
उदात्तसूत्र यह है-- 

‹उदार चरि ताङ्घत्वसुदात्तम्‌' ।। १०८ ॥ 

उदार व्य॒क्तिके चरित का अंग वनना उदात्त कहलाताहै। इस लिए इर्दोने कथित्‌ 
कान्ताविरह०, पद्य उदाहरणरूप से उद्धृत किया थाओोरल्खिा थाकि वहां देश्च विेष- 
[ पव॑त |- रूपी अथं प्रधान है, ऽसमे उदार चरित व्यक्ति जानकी आदिका चरितअंग रूपमे 
उपनिबद्ध है ।› विमरिनीकार इसे अंगत्व नहीं उपलक्षणत्व मानते है । उपलक्षण का अथेवे 
(सुख्यतः व्भनविषयीभूत न होना करते है । यहाँ अवद्य हौ सीताचरित मुख्यतः वणन पिषयौभूत 
नष्टीं हे। किन्तु जानकी सम्बन्ध से उस आश्रम की उदात्तताका मान भी नहीं मेया ला सकता। 
इसी प्रकार रत्नाकरकार ने "अत्रासीत्‌ फणि०? पथ्य मे भी उदात्तलंकार माना हे। 

अप्ययद्गील्तित = दोनों ही प्रकार का उदात्तालंार स्वीकार करतेदहै ओर लक्षणमें अंग 
राब्द के स्थान पर उपलक्षण दशाब्द ही रखते दहे- 

` (उद्ान्तम्र देश्चरितं इलाध्यं चान्योपलक्षणम्‌ ।' ° 

ऋद्धि का चरित भौर इलाध्यत।पुणै उपलक्षणभूत चरित उदात्त अलंकार माने जाते) 

विश्वेश्वर = “वरतुप्रचय उदात्तं महतामङ्गत्ववचनं वा । 

संपदादिवस्त्वतिङ्ञयवणंनसुदा्तम्‌ , उक्कृष्टानां वणनीयनिष्ठङ्गित्वप्रतियोगिष्वं च यत्रोच्यते 
तद पीति 

जहाँ संपत्ति आदि वस्तुं का अतिशय वणित हो उसे उदन्त कदते दँ तथा उच्छृष्ट॒वस्तु का 
अंगी वर्णनीय मे अंग बनाना मी। इस्त प्रकार विश्वेश्वर दोनों ही उदात्त को मम्भरके हो स्वर 
म स्वीकार करते हैं विन्तु वे उपलक्षण्ब्द के स्थान पर अंग श्चब्द ही भपनातेहे।' 

भी वि्याचक्रवतीं की निष्छृष्टाथकारिका इस पर इस प्रकार की है-- 

[ १] उदात्त तु सम्रद्धस्य वस्तुनः कविवण॑नम्‌ । 
[ २ ] अङ्गयन्तरेऽङ्गतापन्न महचरितलक्षणम्‌ । 
द्ितीयोदात्तविषयो व्याप्तो रसवदादिभिः ॥ 


ज 


२२ अङ्कारसवंस्वम्‌ 


[९] सखद वस्तु का कविद्रारा वण॑न उदात्तालंकार कदलातादहं। | 
[ २] अन्य किसीअगी मँ मद्‌पुरुष के चरित का अंगता । को प्राप दाना मी उदात्ताख्कार 
कदलाता है । श्छ द्वितीय उदात्त कै क्षेत्र मे प्रायः रसवदादि अल्कम्र व्याप्त रदते है । 
[ खवेस्व | 
9 ~ ५ छ 
[ छ ८३ ] रसमावतद्‌मासतत्प्र्षमाना ।नवन्धनन रसव्रस्रवः 
उजेस्विसमादहितानि । 
उदात्ते मद्ापुरुषचरितश्य चित्तचरत्तिरूपत्वाच्चित्तद्चत्तिविरोपस्वभाव- 
त्वाच्च रखादीनापिदह तद्वदटकाराणां प्रस्तावः । अत एवं चत्वासे<्टश्ाय 
युगपह्टश्चिताः । तच विभावा माचव्यभि चारिभिः पकारितो रत्यादिषिवन्त- 
वृत्तिविरेषो रखः। भावो विभावाद्मावास्यां सखचितो निवंदादिख्ययश्ख- 
शाद्भेदः । देवादिविषयश्च रस्याद्भिवः । 
तदाभासो रखामासो भावाभासश्च । अआभासत्वमविषयध्रजुस्यानौ- 
चित्यम्‌ , तल्थद्ाम उक्तप्रकाराणां निवतमानत्वेन भ्रज्ञाम्यद्वस्था । तत्रापि 
रसस्य परविश्वान्तरूपत्वात्‌ सा न संभवति इति परिदिए्टमेद्धिषयो द्यः । 
पवाञ्ुपनिबन्ये क्रमेण रसवदादयोऽदधंक्ाराः। रसौ विद्यते यच्च निवन्धनै 
व्यापारात्मनि तद्‌ रखवत्‌ । भियतरं पेयो निबन्धनमेव द्रव्यम्‌ । पवस्रूजां 
चलं विद्यते यज्र, तदपि निबन्धनमेव । अनौचित्यप्रच्त्तत्वाद्‌च् बदयोगः। 
समाहितं परिहर) सच प्रङतत्वादुक्तमेदविषयः प्र्मापरपरखयः | तन 
यस्मिन्दरोनै वाक्यार्थभूता रसादयो रसवदाद्यलंकारः, तचाङ्गभतरसादि- 
विषये दवितीय उदात्तालंकारः । यन्मते व्वङ्गभूते रसादिविषये रसवदाय- 
काराः अन्यस्य रसादिध्वनिना व्याप्तत्वात्‌ तत्रोद्‌ात्ताटंकारस्य विषयो 
नावरिष्यते, तद्विषयस्य रसवदादिना भ्याप्तत्वात्‌ । 


[ सू० ८९ ] रस, भाव इन [ दोर्नो ] के भाभा तथा न [ मावो ] के प्रशासका 
उपनिबन्धदहो तो [ अरुकार्रो % नाम | रसवत्‌ प्रेयघ्ष्‌ उजैरिवत्‌ तथा 
समाहित [ होतेह] ॥ 

[ वृत्ति ] उदात्त मं मपुरुष का चरित चित्तवृत्तिरूप दोतादै, भोर रसादि मी चित्तवृत्ति 
विद्ोषरूप होते हैः इसङिए उनपे युक्त [ रसवदादि ] भलंकाररो का निरूपण हस स्थान पर किया 
जारहाहै। इसीलिए चार अलंकारो के लक्षणपक साथकरिय। दोर्नोमे [नो] रस [है वह] 
हे विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारिर्यो के द्वारा भपने साथ प्रकारित रत्यादिनामक विरिष्ट चित्त 
वत्ति । आव नामहै विमाव भौर अनुभाव से सूचित निर्वेद भादि तैंतीस चित्तदृत्तिर्यो का । देव आदि 
विषयक रत्यादि मीभावद्री हदोतेदहैं। 

तदाभास का अथं है रसामापस्त तथा भवाभास् । ञाभासत्व दै अविषय मे [ जरह प्रशृन्ति न्दी 
होनी चादिए वरँ ] प्रवृत्ति से उत्पन्न भमौचित्य । उनका प्रम कदने से अथे निकरर्ता है पवाक्त 
[ = तत्‌ ] भेदो की निवृत्नतिमूखक शान्ति । किन्तु उक्त तक्वो मेँ पसे जोरसहै वह पर विभ्रान्तिरूप 
होता है, अतः उसमे वह [ शान्ति ] संमव नदी दोती, फलतः उस ( श्चान्ति) का विषय बचे हृष 


रसवद्‌ायटङ्गरः ६९३ 


सेद ही जानने चाहिए । इनका जव कान्य मेँ रुफन होता है तव रसवदादि अलंकार होते हैं । “रस 
है रंफन रूपी व्यापार मे जरह वहइ रसवत्‌? प्रेय अथात्‌ प्रियता, इसे भी रुंफन ही मानना 
चादि । इसी प्रकार ऊजंस का अथ है व वह्‌, जिसमे रहता है वह्‌ [ ऊर्जस्वत्‌ ], यह भी रुफन 
रूप दही दोगा । क्योकि इसमें ४वृत्ति अनोचित्यमूलक होगी इसलिए इसके साथ बल राब्द जोड़ा 
गया । समादित का अथैदहै परिहार वद इस प्रसंगमें उक्त भेद विषयक ददी होगाजिस्का दूसरा 
पयाय प्रराम होगा ) यहो [ भानन्दवधेन के पुव के दण्डी भामह आदि ] जिन आचार्यौ के मतमें 
वाक्याधँमूत रस आदि ही रसवदल्कार हे, वौ अगभूत रसादि के अंश मे उदात्तार्कार माना 
जाएगा ¦ ङिन्तु "जिन [आनन्दवधंन, अभिनव रुप्त ओर मम्मट] के मतम अंगभूत रस आदि को 
ही रघवदादि अलंकार माना जाता है वहां अन्य [ वाञ्या्थीं मूत रसादि ] रस आदिक ध्वनिमें 
चला आता ६, अतः उदात्ताल्कार ॐ किर कोद स्थान नहीं रहता ' वह जदं हो सकता था वहाँ रस- 
वदादि जो हो जाते दहे। ॑ 


विमरिनी 


रसभावेति । अत पवेति । उतुर्णामपि चित्तचृत्तिविदोषस्दभावात्‌ । तत्रेति । युगपज्ञद्वणे 
स्थिते घतीव्यर्थः । विभावा ल्कनोद्यानादयः जआटमस्वनो री एनकारणानि अस्रुभावाः कराक्ञ. 
भुजकेपादयः कायाः । व्यभिचारि गो विवंदाद्‌यः सहकारिणः । प्रकारित इति । व्यज्ञितः। 
यदुक्तम्‌ --'विभावानुभावभ्यभि उरि संयोगाद्‌ रसनिष्पत्तिः इति । रश्यादीस्यादिशब्देन 
हासादीनां स्थायिनां म्रहणम्‌ । निवेदादिरिति । यदुक्तम्‌- 


°निर्वैद्ग्कानिक इाख्यास्तथासरुयामद्श्रमाः। 

आलस्यं चेव देन्यं च चिन्दा मोहः स्प्रतिष्टतिः ॥* 
व्रीडा परता हषं आदेगो जडता तथा । 

गवो विषाद्‌ जौरतुक्यं निद्राऽपस्मार एव च ॥ 
लुक्षं॑दिवोध्रोऽमघश्वाप्यवहिरथमथोभ्रता। 
सतिव्यांधिस्तथोन्मादस्तथा मरणमेव च ॥ 

त्रासश्चैव वितश्च विज्ञेय! स्यभिचारिणः। 
न्रयखिकश्दमी भावाः समाख्यातास्तु नामतः +" दति। 


देव तादिदिषयागासानन्स्यादनेकप्ररूरष्वेऽप्ये कप्रकार एव रस्यास्मा भादः । अत एच 
रस्यादिरिष्यादिश्चब्दः प्रकारे । चः ससुचषे । यदुक्तम्‌--“रतिदंवादिविषया श्यभिचारी 
तथाक्ितः भावः प्रोक्तः" इति, तथा (तदाभासा अनौचिस्वश्रवतिताः' इति । प्रशाम्बद्‌- 
वसथेति। न तु ध्वंखरूपा प्रलान्तावस्थेध्यथेः । तथाष्वे हि सरव्॑ेव कस्य चिष््क्ठतस्वे सवे- 
घामन्देवां प्रक्नान्तस्वादेवंभावः स्यात्‌ । ननृक्तप्रकारसवेन पराश्धष्टस्य रसस्यापि कथं 
प्रज्ञास्यदवश्था संगच्छत दव्याश्चह्याह--तत्रपौत्यादि । परिरिष्टेति। मावठदाभास 
तप्प्र्मविषय एवेत्य; । एषामिति । रखभावतदाभासलतरध्रश्नमानाम्‌ । वृल्योग इति 
खलुचितेन बरात्कारेणेव प्रव्ुत्तिः । प्रकृतत्वादिति । तेनात्र वस््वन्तरं प्रह्ृतमिति भावः । 
ननु च परविश्रान्तिरूपस्य काष्याप्मनोऽरूकायस्य रसस्य कथमरूंकारस्वं खं गच्छत 
हर्याशङ्कयाह-- तत्रेत्यादि । यस्मिन्दश्चैन इति । ध्वन्यमाववादिनां मत इव्यथः । दवितीय 
इति । रेश्व्य॑लक्तणाव्‌ । अन्यस्येति । यन्न वक्यार्थीभूतो रकः । पकं ध्वन्य्ाववादिमतं 
विषयद्वयस्य दृष्टान्तीङ्करय रसरक्तवद ठं कारयोरनेन विषयविभागः कृतः । 


६९७ अलङ्ारसवेस्वम्‌ 


जङ्गभूतस्य रसादेश्चारंकारष्वं युकम्‌ । तथा च यावतोपनादीनां स्वांरुकराणां 
प्रह्ृतवस्तूपरॐङकरवमङकारष्वे निवन्धनस्‌ अङ्गभृतेनापि रसेन तच्कियत एव, प्रकुत्य 
रक्षादेश्तदुपस्करतस्वेन ावात्‌; अतश्चोपमादीनामरम्रष्वे यदश्येव वातां  तादश्येव 
रखाद्यीनाम्‌ । चद्यपि चौपमाद्‌ यो ऽांकाराः, तथापि तस्य वाच्याथेस्य विभावा।दुरूपता- 
पर्यव खायिस्वमेवेत्ति काव्यार्मनो च्य ङ्गयस्व रसादेरेव तदृदटंकायरचम््‌ । किं पुनस्तस्य खन्द 
युखेनो पस्कारकाः शब्दां काराः, अयंद्ुखेन घ्वर्थाङकाराः । ततद्वयवगतंरपि हि कट. 
कादिभिश्चेतन स्मत तत्तच्चत्चर्तिविदयेपौचिव्यष्रूखनाव्मतयाखंक्रियते । तथा इच. 
तनं शवशारीरादिके कटक्राद्ययेतमपि न माति, अटंकायस्यामावात््‌। अतश्च देदद्वारेण 
सवंत्रासमेवारंका्यः। एवमस्यापि शन्दार्यशरीरर वाच्तन्युखेनं बाकुंकायंस्दम्‌ । तेन-- 
(रक्षमादादिताद्यंसाध्िर्य विनिदिश्नम्‌ ; 
अटंद्तीनां सखदांसामटंकारस्वसाधनस्‌ ॥' 


हति दरा रद्वाद्याश्रतेणेवाखंक्ाशागां विनिवेशनं ज)वितम्न्‌ । अतश्चेहापि जत्य 
वाक्यार्थीभूतष्वेन प्रघ्ानम्य रलादेखूपर्ङायध्याङ्गमवेन रक्चादेरलंकारस्वं युक्तम ! य दाहुः- 


(श्रचानतां यन्न रषाद्यो गतारलाः रलसादिन्वनिगोचरो वेत्‌ । ^ 
भवन्तिते यत्र रसादिपोषका रखाद्यलकारदङाहि सा पथक्‌ ४' इति। 


ननु निर्वंदादीनां वानां गभंदाचतत्कद्‌ाचिदपि ष्वप्राघ्ान्यामाव्रास्छददा रघा 
चङ्गरव दव ध्वनिमेदष्वमिति प्रधनेतरकन्ताद्रयाभावदतेषां मावस्थिष्युदयसधिज्ञधङ्ता- 
प्रहमाध्मतया कथमलंकारध्वं वाच्यम्‌ ¦ तथाप्वे द्यसिघ्ीयमाने ध्वरनिसेदव्वमेषं न च्याव्‌। 
जसदेतव्‌ । इह हि निदंदादीनां त्रयी गतिः| तन्न न्यक्तःल वेर्विमावादयेः श्यायी भावो 
रः स्ग्धतः' इति नीध्या विमावानु भावस्पधयेषां रसत्यञ्जकस्वसेका गतिः । तन्न च रखस्मेव 
भ्राघान्याच्चिरतिच्ायग्रीतिकारिष्वेन च्वरवात्‌ फलर्वश्सं नधावफखं तदङ्ग" हति लीध्या 
रसडयञ्जकत्वमात्रेणेव छतार्थरवानच्रास्त्येष्ठं रसव्यक्तिञ्यतिरेकिकिंचिस्प्रयोजनान्तरम्‌ 1 
चाय कच्चुक्िकाविमोडष्छलयः स्ष्टो न काद्वीगुणः 
पक्रान्ता च मया विपंयरतारम्भाय ता प्राथ॑ना 
न रवत्कतृकमथ॑यामि निविदं दोष्कन्दलीकन्धनं 
दज्निच्कारणमेव बाकख्वषटी वषीद क्रि पेपसे॥' 


वि उपा, वेपनादिरलुमावः, वितकश्च भ्यमिचारिमावः। दुषां चात्र 
समरप्ितय। रस्षव्यज्ङ्स्वसात्रमेव प्रयोजनम्‌) व्यक्तश्च रसः सचेतसां दृत्तफर इति 
नषा ।कचित्फडान्तरम्‌ ¦ अत एव रसाचङ्गभूतस्य व्यसिचारिणः स्थिव्याचात्मध्वनिप्रक्ा- 
र्वं भवतीषि न बाच्चम्‌ । तथास्वे चाभिधीयमाने निरगेदादेः प्राधान्याभावात्‌ ध्वनिभ्य- 
पदेश एव न युक्तः । अव्रधानस्य प्रधानष्वाभिश्वने विरोधात्‌ । एवं च बुणीभूतग्यङ्गयस्या- 
पि ध्वनिभ्यपदेश्षः केन प्रधयुच्छः । क्वचिदपि ्सुख्ये रसेऽपि वैऽङ्गष्वं प्राप्नुवन्ति कदाचनः 
दति नीत्या रजानुयतविवाहपवुतच््युष्यवद्विभावब्यज्जितानां श्वयुगी मवेन बासव प्राधा. 
न्यम्‌ । यथा- | 


शद्त्वार्प्रेमप्रगच्सुकमारा चल्वधू- 
शितः श्वेच्छारम्यासुपमरफरस्रूटा वनमही । 
तो मवी नादोन्युखरनि्वसेन्यो रणविधिः 
क्व नामाय तारक्तररूहृद्यो रञ्यतु जनः ॥ 


१ 


रसवदायदलङ्कारः ६९.९१ 


“अन्न विमावाजुमादाभ्यां उ्रज्ञितः श्ङ्ारादीनां रस्षानासप्रहडस्वेन विश्नान्तेश्चिन्ता- 
ङ्यो भ्यसिचारिमावः प्रधानस्‌ । धत एवात्र भावस्थितेध्वंनिमेदस्वम्‌ । एदं चान्न 
चिन्तायाः श्ङ्गारादीन्‌ मरति तदृङ्गव्वाभावाच् रुणीभावः। छत एव चात्र तत्परिपोषकत्व. 
त्यागात्‌ , तदीयकायांकरगाद्‌, रक्षं मरति गुणीभावाभावात्‌ स्वेनेद ख निरतिश्षयप्रीति- 
छ्ारिष्वेन सचतां दत्तफएरष्वात्‌ निजप्रयोजनासं पाद्‌कत्वविरहाद्‌ राजाचुगतविचाह्‌- 
परवत्तश्चष्यवन्म्ुख्यानपि रस्राननादष्य चिन्ताया पूव वाक्यतास्पर्यत्रिषयतस्वेन प्राघान्यात्‌. 
अ ङ्किष्वम्‌ अन एव च दृष्टान्तद्ा्टान्तिकयोनं कश्चिद्धिषम उपन्यासः ¦ वक्षतुश्चान्र पसरर- 
हृद्‌ यसेने्टघ्न तात्पर्यच्छु'भावान्नेकतरपक।श्रयणसमिति न कथंचिदपि रसस्य प्राघान्यम्‌ । 
नाप्येषां परश्परविरोधःस्पधिरिति उप्रभिडारिभावस्येत्र पराघान्यसम्‌ । पएवं च निवेंदा. 
दीनां गमंहाप्तचस्कदाचिदपि प्राघाच्यं[ न | मवत्तीव्यपयारोचिताभिषधास्‌ । गसंदाक्तश्या- 
पि कदाचिदुन्ततो गमंदासीं प्रस्यरिति प्राघान्यस्‌ । प्र्ठानाप्रधानभावश्यपेडिकष्वात्‌ । 
(क्व चिदप्यपरस्याङ्ग क्‌" इति नीर्यंबासङ्ग्वे प्राघान्यामावादकूक्ारसष्वस्‌ । यथा- 

'कचचकुखचिद्ुकाये पाणिषु ष्यापरतेषु प्रथरमजकूषिपुन्रीषंगमेऽनङ्गघ)भ्नि । 

तिबिडनिबिडनीवीमन्थिदिखं घनेच्छोश्चतुरधिककराश्षा शाद्गिणो वः पुनातु ॥' 

अन्न श्चङ्गाररषस्याप्र हढश्वाद्‌ गुणीमावेन वाक्यतासपयंविषयष्वे नो निबद्धसप्यौ्सुक्यं 
पञङ्विषय रति प्रति अङ्गमिति प्रेयोऽरुंकारः । 

नञु च यद्यपि परस्याङ्गश्ये सष्येषामककरारस्वं तद्‌ र्ाङ्गमू 7स्वादेषां सव्॑नेव तत्वं 
स्थारदिवि चेत्‌, नैतत्‌ । यस्मान्निभित्तान्तरेभ्यो रुञ्धसत्ताकस्याङ्गि तस्य वस्तुन उपस्कार. 
धायकतयाङ्तासुपगच्छुतामेषामरूकारस्वम्‌ उपकायों परस्कारेकव्वनिबन्धनतयारुकायां. 
लंकरणमभावस्योक्तष्वाव्‌ । रसादेः पुनः स्वरूपनिद्ं्े निवे दादयोऽङ्गतासुपयान्तीति तब्नेशं 
रसोपलर्जनीभूतस्वात्‌ तद्ववज्ञनमान्नसेव फम्‌ । अत एव तन्नेव पूवोक्तनीस्या न ध्वनि. 
त्वम्‌ , नाप्य कारस्वम्‌ । रदष्यक्तिष्य तिरेङिप्रयोजनान्तरनिष्पाद्‌नष्वायोगात्‌ । एवं 
निवंदादीनां रषभ्यक्तौ षहकारिस्वम्‌ , अङ्किध्वे ध्वनिष्वम्‌ , भङ्गस्वे दारुकारस्वभिति विष 
वियमागः। तद्मात्‌- 

'निर्देदादी नां सर्वद द्ाङ्गभावात्‌ प्रेयोऽर्‌ कारस्तद्वथपेष्ो न वाच्यः । 
तस्मादैतेषां व्य ङ्गयतायां ध्दनिष्वं न प्राछान्यं क्वापि यस्माद्धजन्ते ॥ 
एतेन म्गावप्ररमाद्धोऽपि व्यङ्गवाः दुव ध्वनितं प्रयान्ति। 
ध्वनिसवमिष् यदि तर्हिं वेषु न रुक्षणीयस्तु समाहितादिः॥' 

इ्यादि यदन्ये कक्तं तहुपेचयस्‌ ॥ 

रघ्तभाव इत्यादि, अतषए्व =क्योभिं चारों ष्टी चित्तदृत्तिविशेषरूप है । तत्र अथात्‌ 
जव इन सवका लक्षण साथसायकरन। है। विभाव ललना आदि आलम्बन कारण तथा उचान्‌ 
आदि उदीपन कारण । अनुभाव कक्ष, ुनक्षेप भादि कायै। व्यभिचारी =निव्द भादि 
सहकारी । प्रकाशितः व्यित । जैसा क्षि [ भरतसुनि ने ] का है = 'विभावानुभ।व-- व्यभि 
चासी-संयोग से रसनिष्पन्ति [ होती है] । इस्यादि = यहां आदि पद से दास आदि स्थायि- 
भावों का ग्रहण होता है। लिंदादि, जैसा कि [ भरतमुनि तथा उन्दीं कौ कारिका उदप्रत कर 
मम्मट ने ] कदा है--"निरेद, ग्लानि, शंका, भसूया, मद, श्रम, भरस्य, देन्य, चिन्ता, मोद 
स्यति, धृति, ब्रीडा, चपलता, हषं, आवेग, जडता, गवे, विषाद, भौत्छुक्य, निद्रा, अपस्मार, 
निद्रा, प्रबोध, अमर्‌, अवद्धित्थ, उग्रता, मति, व्याधि, उन्मद्‌, मरण, त्रासं तथा वित्केः-ये 
तैतीस ्यभिचारी भाव है जिन्दै नामोद्लेखपूवंक गिना दिया गया ॥ देवता जादि विषय शनन्त 


६९१ अलड्ारसवेस्वम्‌ 


है मतः तद्दिषयक रतिभाव अनेक प्रकार के दै, फलतः उसका रतिरूप आव के रूपमे एकौ 

मेद गिना गया है, श्सीरलिए *रत्यादि' = शब्दके साथ आया आदिक्चष्द प्रकार वाचक हे। 

"च"- समुच्चयार्थक &ै। जेसाकि [ मम्मव्भटने शसेश्सी स्पे निनातते हृ] कदाहै-- 

द्वेवादि-- विषयक रति तथा व्यल्ञित व्यभिचारी भाव क्लाता है तथा 'उनके आमास होते 

है टव, जव वे अनौचित्य से निष्पन्न शोत दँ) प्रशाम्यद्‌वस्था शान्त दो रदी स्थित्ति,न कि 

ध्वं सरूप प्रशान्त दहो चुकी स्थिति । वेसा मानने पर वष्ट, जां कोशं प्के भाव वणित हो जिन, 

रोष सव भावोंका अभाव रहेगा उनकी भावश्नान्ति माननी पड़ जायगी । रस जिसका स्वरूप ऊपर 
बतलायाजाचुकादहै उस परै मी क्या शान्तिस्थिति लामू दोतीहैः-पेसी शंका कर उत्तर 
देते है (तन्नापि । परिक्लिरेति रेष मेदो के विष्य में = माव, रसमावामास तथा भावप्रश्चम 
के विषय मे। पएषाम्‌ = रस, भाव, दोर्नो के आमास तथा भावप्रदाम के बछयोग >= अनुचित 
बलात्कार दारा प्रवत्ति। प्रङ्कतध्वात्‌ = इसे माव यदह निकला कि यं अन्य कोद वरतु प्रक्रत 
रहती दै । र्रप जो परविश्रार्तिस्वरूप है [ जिसकी प्रतीतिके आये कोह प्रतीति नहीं 
रहती ] उसका अलकारत्न संमव कते" एेसी इका कर उत्तर देते है-- ("तन्नः शइ्त्यादि। यस्मिन्‌ 
दशने = जिक्च मत या सिद्धान्त मेँ = ध्वनि न मानने वाले [ दण्डी गौर्‌ इद्धट ] के सिद्धान्त में। 
द्वितीय = देश्वय॑स्वरूप । अन्यस्य = अन्य अरात्‌ उस पक्ष म अन्य जिसमें रस वाक्या्थीभूत 
रहता है । श्स प्रकार ध्वनि न मानने वालो कै मतकौो दोनों विषयों कादृ्टान्त बनाकर इसफे दार) 
रस भोर रसवदलंकार का क्षेत्र विभक्त किया । 


जो रस आदि अंगभूत होते हैः उनमें अलंकारता मानना उचितदी है, क्योकि उपमा जादि 
सभी अलंकारो मे प्रकृत वस्तु कोश्योभा वटाने सेदही अर्लटकारता भतीदहे, ओर क्योकि अंगभूत 
रस केद्वारा मी यद कायं कियाद्टी जाता दहे इसङ्िपि कि उसके साथ प्रकृत रस [ उपरकारं ] 
अङ्काय रूप से विद्यमान रहता है, उतः उपमादिमें अल्कारतर्व माने पर जैसी स्थित्ति होती 
दै वेपी ी स्थिति रसादि है [अतःवे मौ अलंकार कदे जा सकते दैः], यद्यपि उपमा 
आदि अथैके अलंकार होते दै [ अतः अयं कोदही उनका अलंका्यं मानना चादिए] तथापि 
क्योकि वह वाच्य अथं विमाव आदिके रूपमे उपस्थित दोता है अतः काव्य वृ आत्मा मौ 
व्यग्य रूप से उपस्थित रसादि ही उत्त [ उपमा आदि ] करा जटंकायं ठद्रताहै। यहं तक्ष ६; 
शन्दाट्कछार भीश्चब्द के माध्यम से उती [रसादि व्युग्य काव्यात्मा] कै भल्कार होते हे 
श्सी प्रकार भं के माध्यमस्े अर्थालंकार भी । टीकमीहै। लोकम मी कटक मादि रहते तो 
उन उन अवयवा मेदी हं, किन्ठु वे उन उन विद्विष्ट चिन्तदत्तिय। की सूचना देते ओर उस दारा 
चेतन भात्मा कोषही अक्त करतेदहें। शव शरीर आदि अचेतन वस्तु कटक आदि से 
धुक्त होकर मी अच्छे नदीं लगते, इसलिप किं उन्म अलंकायं का अभाव रदताहै। इस प्रकार 
सवत्र ही देदकेदारा भत्माकादी भलंकार किया जाता दै। यां [ काव्यस्थलम ] यहुजो 
रसादि रूप आत्मा है, शब्द भौर भयं उसके दारीर होते हं भतः उसका इनके द्वारा री भलं- 
ङ्क्त किया जाना उचित ठदरता है । इस प्रकार- 


समी अल्कारों के अलंकारत्व का साधक दहे उनका प्रधानभूत रसभाव भादिकी दृष्टि 
स स= | ॥ [ ध्वन्यालोक २।५ संय्र्कारिका | 


श्य दृष्टिस्ते रस आदि कोलेकर दही किया गया निवेद्य भलंकारोंकामप्राणहै। इसीलिए 
यद मी रतत मादि मेँ जलंकारत्व तभी ठीक होगा जव प्रकृत जर वाक्यार्थीभूत होने से प्रधान 
रस भादि अल्कार्यके प्रतिअंगष्ो। जैसाकि[ रत्नाकरकारने भी ] कदा दहै 


रसवद्‌ादयट्ङ्कारः ६९७ 


जहां रस्त आदि प्रधान रहते हें वदां रस रसादिष्वनि का विषय बनत्ाहै। च्नन्तुवेष्टी 
जहाँ रसादि के पोषक वनते हें वहां रसादि [ रसवदादि ] अलंकार बन जात्ते हैँ । उनकी यह 
एक भिन्न ही दशाह ॥ [ सू० १०९ कारिक )]॥ 

[ रत्नाकरकार काकदना हे कि-] “निवंद आदि [ संचारी] भाव सदा रस भादि के 
अंग ओर ध्वनिकेमभेदके रूपमेंही रहते है, क्योकि उनकी अपनी प्रधानता उसी प्रकार कमी 
भी नदीं रहती जिस प्रकार गमदास [दासीने गमंसे उत्पन्न होने आदि के कारण जन्मतः 
दास ] की इस प्रकार उनमें प्रधानता ओर अप्रधानताकोदो कक्षां द्यी नहीं बनतीं [ एकमात्र 
प्रधानता दही रहती हे] तव [ सवेस्वकार दारा अगले सूत्र में ] इन्द मावस्थिति, भावोदय, 
भावसन्धि, भमावश्चवलदा तथा मावप्रश्मके रूपमे अलंकार कैसे कहा जारहाहै [येतो रसः 
ध्वनि के अवयव हैः अतः ध्वनि रूपदहीहै ] वेसा मानने पर ये ध्वनिभेद सि नदीं दो सगे 
[ द्रष्टव्य रत्नाकर, रप्तवदकर्कार वृत्ति प० १८-१५ पूना सरकरण ]। यह कथन टीक नहीं हे । 
स्थिति यह दै करि निंद आदिक तीन दरार होतीदहे [ अथांत्ये तीन प्रकार के होते हे] 
इनमे [ मम्भटाचायं के ] उन विभाव आदि केद्वारा व्यक्त वह स्थायौ माव रपत माना गयादहै 
[ काव्यप्रका्च-* उछास ] इस वचन क अनुसार विभाव ओर अनुभाव के समान रसको व्यक्त 
करना ष्सकीो एक दद्याद यहां प्रधान रहता हैरस ही, क्योकि वही निरतिशय प्रीति उत्पन्न 
करता है अतः बही फलवान्‌ [ प्रीतिरूपी फल से युक्त ] होतार) इस प्रकार "फल्वान का साथ 
होने से फलदीन उस फलवान्‌ का अंग बन जाता है" शस नीति के अनुसार इन मावो का कोड 
रेता प्रयोजन नदीं रता जो रस के प्रयोजन से भिन्न हो, इश्नकी इत्तिकतन्यता तो 
रसव्यना तक हयी सीमित है, अर्थात्‌ ये रस की व्यञ्जना कराकर तकाये दहो जाते हें, 
उदाहरणाय - 

"अमी चोली हटाने का अवसर आया न्दी, करधनी द्द नदी, मेने विपरीत रति के 
किए ही आग्रह किया नीं, न तो यही चादा कि तुम भपनी भुजर्ता द्वारा स्च 
बाधो, तो भी अकारण ही तुम बाललवलीवल्ली के समान कोँपरहौीहो क्यों) 

इस पाथं मे आलम्बन विमाव हे उषा, कम्पन आदि अनुभावहे ओर वित हे व्यभिच।री माव) 
इन तनो का प्रयोजन एकमात्र समानरूपसे रस की व्यंजना कराना है । रस स्यि हौ जाता 
हे तो वद्यो सहृदयो को [ प्रोतिरूप ] फल दे देता ह, अतः इन विमावादि का अन्य कोड फल नदीं 
रहता । इसलिए [ रत्नाकरकार को ] यह नहीं कना चाहिए किये संचार माव रसादि का जग 
होते दै ओर वे अपनी स्थिति आदि रूपध्वनि का प्रकर वनते हे ।' [० रत्नाकर सू2 १०९ १५८ १२। 
यदि छन्हेअंग बतलाया जाता है तो उनमें प्रधानता नदीं रदेगी ओर तव उन्हे ध्वनि कहना उचितन 
दोग! । वयोफि अप्रधान को प्रधान बतलाना विरु होगा । ओर यदि रसा ह | अथात्‌ अंगभूत 
संचारी को ध्वनि कदा जा सकता है ] तो गुणीभूत व्यंभ्य को ध्वनि कदने का निषेष वयो किया 
[ णीभूत व्येर्य मेँ व्यंग्या्थं गुणीभूत या अप्रधान रहता हे इसीकिए उसे ध्वनि नहीं का जाताः 
वर्यो कि ध्वनि ते व्यंग्य अनिवार्यः प्रधान रहता है । यदि भप्रषान वो भी ध्वनि मानना भारम्म 
कर दिया जाए तो शुणीभूत व्द॑ग्य को मौ ध्वनि मानना होगा / | ष 

[ निववेदादिकी दूसरी दशा वद दोती है जहां] कीं ये [ मग्मटाचाय ] कौ ख्य तौ 
रस दी होता है तथापि कमी कभी ये भी सुर्य बन जाते हेः भ [ कान्यप्रकाश ४।२३७ सू° ५१ | 
इस उक्ति के अनुसार विभावानुभावौ से ्यंजित होते ओर ठीक उसे ही रसको अप्रधान बनाकर 
स्वयं प्रधान बन जाति है भिस प्रकार विवाद मै दूस्दा बनाराजाका नौकर, राजा स्वयं जिसके 
पीछे चरता है । इस्तका ऽदादरण दै-- 


६९८ अल््कारसवेस्वम्‌ 


८इर प्रगययाचना कर रहौ सन्दर शौर खडमार वधू है, ओर इधर वनभूमि है जिसमे 
अनुपम फल ओर मूल स्वेच्छालभ्यं मौर शस ओर प्रत्यज्चा की गडगडाट के लिए उचत 
सेना का युद्धकायं है । अव्र उनमें अधिक चंचल चित्तका यद जन किते चाहे । 
यष्ट श्ंगार आदि रक्त प्रह्ढदहदो पाते नरद्री, अतःवे श्प्रधानदहे ओर प्रधान है विभाव तथा 
अनुमार्वो ते व्यंजित चिन्तानामक्‌ व्यभिच।री माव, क्योकि उसी में वाक्यार्थं की परिसमाधि होती है 
ओर वही वाक्य का तात्पर्यविषय दहै । शसीलिर याजो मावररिथिति र वद्‌ ध्वनि दै। श्स प्रकार 
यहां चिन्ता युणीभूत नदी है। क्योकि वह शरनारादि रस्तके प्रति अंग नदींदै भौर इसीकिए 
[ रत्नाष्रकारने मार्वाोञल्रिजो कड्‌! धा कि वे | रतत मादि की परिपोषकता कभी 
नदीं छोड़ते, सदा उन्दी [ रसादि ] का कायं करते रै, रसके प्रति गुणीभूत रहते है, अपने 
आप कोदं निरतिशयानन्द नहीं देते, अतः सहृदर्यो के लिए वे स्वयं फश्द्ायक नदीं होते, 
वे उनका कीरं अपना प्रयोजन निष्पन्न नीं करते, [द्र० रत्नकरसू १०९१० १५-२२ | 
इन सवका [ उपयुक्त प्य मेँ भाई] चिन्ता्म अभावे [ अर्धात्‌ रस की पोपकता का 
खसे भभाव है, रस्त का कायं वह नहीं कर रदी, रसके प्रति वक गणीभूत मी नदीं, 
उसके स्वयं के दारा वह निरतिशय प्रीतिदेरही है, अतः सहृदयं के छिद वह्‌ स्वयं फलप्रद है 
ओर शपीलिर उसका अपना स्वयं का प्रयोजन मी दहै] ओर श्सीलिए वह [ अन्यत्र ] 
मुख्य माने जाने वाले रसों कौ भी भअनाद्रत कर वाक्य का तादय विषय वन कर ठीक 
वैततेष्ठी प्रधान भौर ततः अंगी है जपे विवाद तँ दृल्हा वना रेता सेवक जिसका स्वामी 
राजादहोते हट मी उसके पीठे चरुरहादो। ओर्‌ इसीलिए [ विवादृप्रवृत्तयत्य कै] दृष्टान्त तथा 
दाष्टान्तिक मेँ [ रत्नाक्ररकार द्वारा प्रतिपादित, (आगेदिरजा रदा); कोई मी वैषम्य नदीं है। 
स [ पय इत्च(र० | मे वक्ता सरल हदय का व्यक्ति है यतः उसका तात्पयं किसी एक अथं में नहीं 
है, फलतः कोद रक पक्ष यर्दा नदीं अपनाया जा सकता, इसकिद [इसे शगारादि ] रसक्ती किसी 
मी प्रकार कौ प्रषानता नदींहै। नतो इनमें [तीर्न रसोंकी] सन्धि हीर क्योकिये परस्पर 
विरुद दँ । इस मकार याँ [ चिन्तारूपौ ] व्यभिचारी माव कीहवी प्रधानता है। [ '“्वनिकनार 
आदि के शस कथनमें किमव जघ व्यंजक वाक्य कै प्रति प्रधान ओररसके प्रति अप्रधान होता 
हे तत्र वह भवध्वनि ही कदलाता है जेते विवाहप्रवृत्त भृत्य, इतत कथने दृष्टान्त ओर 
दाशन्तिकमे यहवेपम्यदै कि दार्टान्तिकमे त भाव रसके परति युणीभूत रहता ह पर दन्त. 
मे ९ब्‌ विवाद ठ समय किसी र) भी प्रति अप्रधान नहं रहता । अतः | गमद स के समान 
निभदादि भाव कभीभी प्रधान दोते ही नही" [इस प्रकार रत्नाकरकारने जो ृ्टन्त 
वपम्य को धिद्धिके देतु गमेदास्तकी टेकान्तिक अप्रधानताका तक प्रस्तुत कियाहै] यदमी 
विचारननूल्य छक्तिरै। गमदा भी कमी, अन्ततः गर्भदासी के प्रति ही प्रधान होतादह्ीहे। 


प्रधानत्व अप्रषानत्व तौ सापेक्ष तच्च हे । 


[ निष्दादिकी तीतरी दला वहै] जवये कमी कींये दूसरे केअंग वन जातिः 
श रौतिसे जवयैअंग बनजातेहैः तो वे प्रपान नहीं रद्ते। फलतः अलंकार हो जातेदहै। 
इसका उद!हृरण यु है- 

समुद्र की पुत्री [ लक्ष्मी ] के प्रथम समागम, जोकाम काधाम थाम कैश, दोनों कुच 
तथा चित्रक ( हदे ) के अग्रमागमें चार्यो हाथ ल्ग जाने पर, अव्यन्त निविड नीवी घोलने कै 
हच्छुक विष्णु मगवान्‌ कौ चार्‌ से अधिक हाथों की श्च्छा लाप हम सबको पवित्र करे । 


हस पद्य मेँ प्रेयोलंकार है क्योकि इसर्मे शंगारस्स प्ररूढ हो नदीं पाता, फलतः वद भप्रभान 


रसवदाद्यलड्गरः ६२९ 


रहता ® साथदही वाक्यके तात्पयेविषय के रूप मेँ प्रस्तुत [ अतः प्रधान] होने पर भी 
ओत्सुक्य विष्णुविषयक रति के प्रति अंग [ अतः अप्रधान) है। 


यथपि यद कदा जाप्तकता दै कि यदि ये माव दूसरे के अंग होने से अलंकारत्व 


क 


९.५ दाते हंतो ये सवत्र ही वही [ अल्कार ] होगे क्योकि रसके अंगतोयेसदा षो 
होते हे । 


[ अर्थात्‌ विमाव ओर अनुभावके समान संचासे मावमभी रसन्धक्ति ॐ लि९ आद्इयक 
होते हदं अतः वेरस केकारण होकर सदा रस के्ग वने रहतेहैः]। 

किन्तु यह्‌ कथन ठीक नददींहै, क्योकि ये तव अलं.र कहलाते है जवये देते फिसी 
प्रधान त्वेका उपस्कार कस्ते हः जो पहले से ही किन्हीं अन्य निमित्तो से निष्पन्न ह्यो 
चुका शे । रेसा इपलिएि किं अलुंकायांुकरणसाव उपस्का्योपस्कारकमाव [ उपस्कायं = 
शोभनीय, उपस्कारक्र = शोमाजनक ] पर निभ॑रह ञेपा कि बतलायाजा चुका रहै। जहां 
निर्वेद आदि रसादि कै स्वल्प की निष्पत्ति मै करण बनते है व्ल इनका फल केवल 
उन [ रसादि | को व्यजनाह्ीहौता है, ञ्योकिये रस के प्रति समपित चतः उपप्षजनीभूत 
भात्‌ अप्रधान या गोण रहते हैँ । ओर इसी कारणये न तो वौं ध्वनि होते भौर 
अलकारदी [ हाथ पैर आदि इारयीर के निष्पादक अंगद अतः नवे भत्माके समान प्रधान 
है ओर कटक कुण्डल दिके समान भलंकारष्ी।] श्सछ्िएिकि इस स्थिति मये रसकी 
अभिव्यक्ति ‡ अतिरिक्त किसी भी अन्य प्रयोजन के निष्पादक बन नहीं पाते। 

इस धकर निवेद आदि रस रो अभिव्यक्ति में होते है सहकार), प्रधान होने पर होते हें ध्वनि 
ओर अंग होने पर होते हैँ अल्कार। यह्‌ हं मावकी इन तीनों स्थित्तियोंका अन्तर। शस कारण 
अन्य भाचायंने [ रत्नाक्ररकारने रस्वदादिकेह्ौ प्रकरणम ] जो- 


(नवद आदि सदा ही अंग रहतेरै, अतः उन्हे लेकर प्रेय को अलंकार नहीं मानना 
चाहिए । इसल्यि जवये व्यग्यहोते हेतो ष्वनिदही होते दै क्योकि इनमें कभी कहीं मी प्राधान्य 
नदीं रहता । 

(इस कारण मावप्रश्चम आदिभी व्यंग्य होते हैतो सदा ध्वनि ही हा करतेहै। भर 
यदि इनमे ध्वनित्व मान्यदहै तो समादित आदि को अलंकार नदीं कहना चाददिए ॥" यहं सष 
कहा है वहं उपेक्ष्य ही हे। 

विम्चं-रत्नाकरकार नेप्रेयोऽख्कार केकि भावकी अंगतातो स्वीकार की है किन्तु 
उनके माव क्रा अर्थं रत्यादि स्थायीमाव, संचारीमाव नदी, जब कि ध्वनिवादी माचायं 
चिन्ता भादि की अंगभूत बयग्यस्थित्ति मे प्रेयोऽरुंकार मानते हे । संचारीभावों को प्रेयोऽच्क्छार 
न मानने के लिय उन्होने प्रधानरूप 5 यह तकु प्रस्तुत किया है कि संचारोमाव रस को छोड़कर 
कभ नहीं रहते, मतः वे सदा हयी इस अंग रहते हे \ सायदही वे रसकै व्यंजक होते हँ ओर 
रसानुभूति मे मी ह्स्ते नदीं । पानकरसन्याय से उनका मी अस्तित्व वं रहता है भतः ये 
ध्वनिरूप रस पते अभिन्न द्यनेके कारण स्वयं भी ध्वनिदहै। इस स्थापना के आषारपरर वै 
मम्मट ओर्‌ उने अतुयायी स्॑स्वकार का खण्डन करते ओर कते है रि उन्हे सावोदय, 
भावशाम्ति, भावसन्धि, भावशबलता तथा भाव को अलंकार नरं मानना चादिए। ये सव 
ध्वनियां ही है । उनका ग्रन्थ है- 

'मावस्य देवविषयस्य रव्यादेः स्थायिनः प्राधान्ये भावध्वनिः, रसाधङ्गत्वे तु प्रेयोऽलङ्कारः । 
०० व्यभिचारिभूतस्य निवैदादेमावस्य गभ॑दासवत्त कदाचिदपि स्वप्राधान्वाभावात्‌ सवेदा 


७०० अद्द्धारसवस्वम्‌ 


रसाचलंकारत्वेऽभिधीयमाने भावसिथित्युदयस्तन्धिदावलताप्रश्माख्यानां ध्वनिभेदानाममावः प्रसज्यते, 
तेषां भावस्थिरयुदयादीनां ध्वनित्वमेव । तस्माद्‌ व्यभिचारिभावापेक्षवा परेयऊजेस्विसमाहित- 
भवोदयसन्धिद्धवल्त्वानि न प्रथगल्काराणिः । 
दृषटान्तदाटान्तिक की विषमत। पर रत्नाकर को प॑क्तियां ऊपर उदप्रत प्॑यांके दी 
मच्छिन्न सातत्य मेयेर्दे-- 
यदप्युक्तं यत्र वाक्यार्थीभूतानां रस्ादीनायुपस्कार का निवेदादयस्तत्र प्रेयःप्रशतयोऽच्काराः, यत्न 
त॒ रसादुपसज॑नी भूतानामपि मावसिथत्यादीनां वास्चतात्पर्य॑ग रानाचुगतविवादप्रदत्तत्यवत प्राधान्यं 
तन्न भावादिध्वनिरिति, तदसत , विषमोपन्यास्तात्‌ । तथा हि विवादस्मये निजप्रयोजनसंपादनाथ 
प्रवृत्तस्य श्त्यस्य न राजानं प्रति गुणत्वम्‌ , तदीयानां तदीयकायेकरणात्‌ । प्रत्युत राजेव विवाह- 
छयोमो द्बलकतया तं प्रति युणीभूतः । इद त॒॒वाक्यतात्पयविषयत्वेन प्राधान्येऽपि मावस्थित्यादे 
रसादिपरिपोषकत्वात्यागात्‌ निजप्रयोजनान्तरसंपादकत्वविरहाच न रस्ायपेक्षया प्राधान्यम्‌ ।› 
रत्नाकरकारने एक पूर्वपक्ष ओर प्रस्त कियाद तथा उपमे निदंदादि को भी लेकर 
म्रेयोऽलंकार की निष्पत्ति पर बल द्वियादहै। वद यहदहै- 

"सथ प्रवानभूतरसादर्गत्वे सावस्थित्यादिष्वनिः, अन्याब्गभूतरसादिपरिपीषकत्वे प्रेयःप्रसुखा 
भटकारा इति चेत्‌ , न, रसादेरेव हि प्रधानेतरमावे विदोषः, न तदुपकरणीभूतस्य मावदेः। न 
हयन्यो पस्जनं स्वतन्त्रं वा स्वाभिनं प्रति पारतन्त्ये गभमदासस्य विदोषः करिचत्‌? । 

ष्यदि भाव प्रधान रसादिकेग होने पर ध्वनिदहोतेष्टै तो अप्रधान भूत रसादिकेअंग 
होने पर प्रेयः आदि अकार वयो न मान लिर जा । “उत्तर = प्रधानेतरभाव रसादि्मेद् 
विद्धेषता छता है, न कि उसके साधनभूत भावादिमं नहीं । किसी अन्यके प्रति समपितिदहोया 
न दो, उसे अपने माटिक क प्रति सदा परतन्त्र गभंदास सं कोई अन्तर नर्हींआता।' इस 
विषय का सारस्क्षेप करतेदए रत्नाकरकारने पाँच परिकरदलोक वनाण्दः। श्नमेंस्तेतीनतो 
विमद्धिनीकारने दी चदधत कर दिए दैः! उप्क्त विवेचन से सम्बद्ध एक पय यदह है- 

“रसादिगुणभूतयोरिव च वस्त्वलद्भूारयो- 

यथा ष्वनिरुपेयते न तु कदाप्यल्कारता। 
तथैव परिगृह्यतामिह च भावशचान्त्यादिषु. 
स्फुटा तदवधायता।मिति रसादिमेदस्थितिः ॥' 

जिस प्रकार रक्ष भादिके प्रति युणीभूत वस्तु ओर अल्कारको ध्वनि दही माना जाता 
हे, कभी भी शटंकार नही, इसी प्रकार यहाँ भावान्त्यादि म जानना चाहिए । अतः उन्दे 
रसादि से भिन्न मानने की स्थिति छोड दी जानी चादिए । विमर्दिनीकार ध्वनिवादी भाचारयों 
का समर्थन करते मौर कहते है कि पानकरसन्याय से जहोँ भाव भी रसलीन रहते वहोँवे 
अवश्य ही ध्वनिरूप रहते है तथापि जँ करीं उनम उद्विक्तता चली आती दहै, जसे पानकरस 
मेही कालीमिच॑या चीनी आदिकी वहाँ वे रस्ररूपता को उच्छिन्न कर आस्वाद-कुस्या कौ 
यपनी दिक्च में बहाले जाते भौर स्वयंष्टी प्रधान हो जाति हैँ । उनके उदाहरण भी इतके समथ 
प्रमाणहै। 

[ सवंस्व | 
तन्न स्सवत उदादस्णम्‌- 


“किं दास्येन न मे प्रयास्यसि पुनः प्रा्तश्िरादशेन 
केयं निष्करुण प्रवासरंचिता केनाक्ति दूरोकृतः। 


रसखवद्‌ायललङ्कारः ७०९ 


स्वप्नान्तेष्विति वो बदन्‌ प्रियतमव्यासक्तकण्डन्रहो 
वुद्ध्वा दिति रिक्तबाहुबल्यस्तारं रिपु सख्रीजनः \\ 
पतन्मतदयेऽप्यु दाहरणम्‌ । वाक्यार्थो मूतोऽच्न करुणो रसः । अङ्ग भ्ूत- 
स्तु विष्रलम्मश्डज्गारः। पवं स्सान्तरेषऽवभ्युदाहायम्‌ । प्रेयोऽटंकारादो बि. 
लोषमनपेक्ष्योदाहियः> । प्रेयोऽटंकारो यथा - 
'गाढालिद्गनवामनीकतङ्क र षोद्धिन्नयेमोद्रमा 
सान्द्रस्नैदरसातिरेकविगलच्छ्रीमन्नितम्बाभ्बरसा । 
मा मा मानद माति मासलभिति शक्चासाक्षसोर्छापिनी 
खुक्ताकवखताच कि मनसिमे कोना विक्छीना चु किम्‌ )# 
अघर नायिकायां हइषौख्यो व्यभिचारिभावः । यथाषा- 
'त्वद्वक्नाघतपानदुटेितया दश्यां क्त विश्रभ्यर्तां 
त्वद्धाक्यश्रवणाभियोगपरयोः श्राव्यं कुतः कणेयोः । 
पमिस्तत्परिरम्भनिभरभरेर ङः कर्थं स्थीयतां 
कृष्टं तद्विरहेण सप्रति वयं छइच्छ्रामवस्थां गताः 
अघर चिन्ताख्यो व्यभिचारिभावः। पष पद च भावालकारः। भावस्य 
चात्र स्थितिरूपतया वणेनम्‌ । राान्त्युदयाचस्थे तु वक्ष्येते । 
ऊजेस्वी यथा-- 
'दूराकषणसोह सन्त इव मे तन्नाम्नि याते श्चुति 
चेतः काठकल्छामपि पज्घरूते नावस्थिति तां विना । 
पतेराङ्लितस्य विक्षततरेरङ्ैरनज्ञातुरेः 
खपदयेत कदा तदाक्िखुखमित्येतन्न वेन्ञि स्फुटम्‌ ॥' 
अत्र रावणस्याभिलाषको विप्रलम्भश्टङ्गार ओत्छक्यं च व्यभिचारि 
भावो ऽनौचित्येन प्रवृत्तो । समाहितं यथा- । 
"अक्ष्णोः स्फुःटासखकद्धुषोऽख्णिमा निलीनः 
शान्तं च साघेमधरस्फुरणं श्रङ्कख्या । 
भावान्तरस्य तव चण्डि गतोऽपि येषो 
नो दादवासनतया प्रसर ददाति !\ 
अञ्न कोपस्य प्ररामः । एवमन्यत्रष्युदादयायेम्‌ । 
इनमें से रसवदलकार का उदाहरण, यथा-- 
सी से क्या ! बहुत दिनों के बाद दिखाई दिए तुम पुनः नदीं दिखाई दोगे । है निष्करुण, 


यह्‌ कैसी प्रवासरुचि, तु दूर किसने कर दिया -› सपनेमं प्रियतम के गके हाथ डालकर इस 
प्रकार वात करतीं आपके दओं की लिया जागने पर भपना बाहुपाश्च रिक्त दैखतीं ओर 


पुक्का फाडकर रोती है ।' 


७०२ अच्छञ्लारसवस्वम्‌ 


यह दोना हयी मर्तो मे उदाहरण मानाजा सकतादहै। यहां प्रधान दहै करुण रस्त ओर अङ्ग 
भूत हे विप्रलम्म शशृह्गार ! इसी प्रकार न्य रसो में भी जानन। चादि. प्रेयोऽ्टकार सादि 
मे [ दोनों मतोँकी ] विद्येषता की ओर ध्यान नद्रेकर हयी उद्रादरण दिर जा रहे दै । 

प्रेयोऽरंकार का उदाहरण, यथा- 

"गाढ भाल्गिन से जव स्तन सिकरुड गर ओर्‌ रोम खिन उठे तो निव्रिडतम स्नेद ओर 
आनन्द के अतिरेक से जिसके छन्दर नितम्बा का वस्त्र खिसल गयाथा देती यद, नदीं नर्द, अरे 
मानभंजक मेरे साथ अति न करः इतत प्रकार ल्डखड़ाते भक्षर बोरू रष्टी यदह सो गरं क्या, 
करीं चल तो नदीं वक्त, मेरे मन्म तो कक्षं टीन विलीन नदी दहो गहं दैः । 

यँ नायिका मेँ हषंनामक व्यभिचार माव [ संभोग शृङ्गार का अङ्ग ] है। गौर ञेते-- 

उसके वक्चामृत के पानकी दुलारी यह दृष्टि काँ टिका जार, उसके वाक्य सुनने 
के लिए भभिनिवेद्यपरायणये मेरे कान उनने योग्य वस्तु कदाँसे पार्ण, उप्के आङ्िगन से 
प्रकाम आप्यायित ये मैरे अंग काँ ठरे । ओद ! उसके विरहे इमवड़ीदह्ी कठिन स्थिति 
मे प्व गरदैः । 

यदहं चिन्ता नामक व्यभिचारिमाव [ विप्रलम्म क्घारका अङ्ग] ओर यष्टी है मावालकार्‌ । 
इन चदाहरणां में माव का वर्णन अस्तित्वयुक्त रूपमे है। शान्ति तथा उदय की अवस्था भागे 
वतलाइ जागी । 

छऊजंस्वी का उदाहरण यथा - 

टूर से खींच ने वाले मोदमन्त्र जैसा स्सकानाम कानमे अत्ति ही चित्त उप्तके विना 
एक परु भी टिकता नदीं । मुञ्चे यद सञ्च नदीं पड़ रदा किन कामातुर भौर धायल अंगों से 
भाङुक सुञ्चे उसकी प्राचिका सुख कव मिलेगा 1 

यां [ सीताके चि] रावण की निम्न अभिकाषा से निष्पन्न विप्रङम्म शगार तथा 
लोत्छुक्य नामक्र संचारीमाव अनौचिस्य पूर्वक आगे वदे दै, 

समाहित का उदाहरण यथा- 

खो मेँ एूट पड़े ओसरो से मिधधित अरुणिमा विलीन हो गई । भृङ्गी के साथ भधर 
को फाड्क भौ शन्त दहो गहं है । श प्रकार हे कोषने! तेरा रोष हट गथा तवभौ 
अन्य मावे ऋ उद्गाढ वासनापूवेक वदने का भवप्नर नहीं दे रदा | यष्ँकोपका प्रशम [ शगार 
काञग] हे । इसी प्रकार अन्य [भर्व ]के उदाहरण मीदिएय जा सकते है । 


विभरिनी 


एतन्मतदय इति । ध्वन्यभाववादिनां ध्वनि भाववादिनां च। तत्र धवन्यभाववादिमते 
कद्णापेचया रक्षवद्रंकारः, श्ङ्गारापेक्तया तदात्म ¦ मतान्तरेण तु कषश्णाभिप्रायेण 
रसध्वनिः, श्चङ्गारापेन्तया व्वयमटकारः। अन्न ययपि राजविषयाया रतेरङ्किस्वाकरमोऽपि 
तदङ्गमेव, तथापि तस्थ शद्गारापेत्तयाद्गिश्वमाशध्िष्यैतदुक्तम्‌ । करणश्च श्गारो पश्छरतः भ्रती- 
यत इति तस्यारुंकारस्वम्‌ । एवमिति । यथा मतद्यमपि संगच्छत ह्यर्थः । तत्त यथा- 
का स्वं रक्तपटशवगुण्डितमुखी ञुश्ये तवाहं खखी 
छि श्रून्यौकसि केवला निवसति सवामागतान्वेवितुम्‌ । 


एतद्वकत्रञ्ुदश्चयेति कथयन्ध्यारोक्ष्य कुष ततः 
पट्युः स्मेरमुखाग्बुजघ्य तरुणी जाता विरन्तस्मिता ॥' 


रसवदादयट्ारः ७०३ 


अन्न वाक्यार्थीभूतः शङ्गारः, अङ्गभूतस्तु हाखः। एवमिति सामान्पेनप्युदाहरणभ्या- 
सिषरं व्याख्येयम्‌ । यथा- 
"पावंस्या रचितां कपाटिच्षभार्ढं दिकासाङ्गद्‌- 
ग्रन्थिक्छान्तमहाहिरोचनर षञ्डरारुं पिनाकाङ्कितिस्‌ । 
कन्दुरपापितश्ासनं कदिवरूरककाल्मसरंन्टुमद्‌ - 
भस्माद्कं च पुनातु वो नवरसखान्‌ पुष्णत्‌ पुरारेवंपुः ॥ 


अच्र भगवह्विपधाया रतेनवब रसा अङ्गम्‌ । विदोषभिति । अङ्काङ्धिव्वेन । तेन ध्वन्यभा- 
ववादिमतेनाङ्गाङ्गिष्वमेवेषामाभिस्योदाहियत इति ताहपय॑स्‌ । मावारुंकारा शति । निर्वेदा. 
दीनां भावानां [स्थत्यास्मकतयःपनिवध्यमानस्वाद्‌ । शान्द्युद्‌ यावस्येति भावस्येव्यन्नापि 
संबन्धनीयम्‌ । अनेन चातय समाहितादिभ्पो वैलक्तण्यं योतितम्‌ । तेन यन्न भावस्य 
स्थितिस्तन्रायमरंकारः, अन्यथा सवन्यउखकारा इति । एवमिति । यथंतदु दाहतमिव्यर्थः। 
अन्यत्रेति । ध्वनिवादिमते एषामङ्गघ्व इत्ययः । तत्र प्रेयोऽलंकारः “क चकुच-› हृष्यादिना 
ष्यसिष्छारि माचपेत्तयोद्ाहतः । देवताविषयरयष्यासमावोएनिवन्धे पुन षथा- 
कण्डेऽपंयर्युरग पाशमसुयया मे यासिन्य्ीशक्ञिख यर्तमये कृतान्तः । 
नूनं तदा सुहूद्पैमि फणीन्द्रहार ष्वत्तल्यतामिति भजे मरणेऽपि हषम्‌ ॥' 
अन्र भवद्विषयाया रतेमरणविषया रतिरङ्गमिति प्रेयोऽलंकारः । ऊजस्वी यथा- 
"वन्द करस्य नरप द्विषां खगदशस्ताः पश्यतां प्रेयसां 
शिष्यन्ति प्रणमन्ति कान्ति परि तश्चुञ्बन्ति ते सेनिकाः। 
अश्माकं सुङतेह. क्षं नि पतितोऽस्यौ चिध्यवारांनिषे 
विध्वस्ता विपदोऽह्धखास्तदिति तेः प्रव्यर्थिभिः स्तूयसे ॥ 


अन्न राजविषयस्य भावस्य प्रथमदहितीयाधद्योय्यौ रसखाभासभावाभासावङ्गम्‌ । ग्यनभि- 
चारि भावापेत्तया पुनरयं यथा- 
द्विषां तकारण्यनिदवास्रमीयुषां नितम्बिनीनां निङकरम्बक्‌ चुप । 
सुह ?'हस््यश्रवरद्धिङोचनं न केन पर्लीपत्तिना निरीक्षितस्‌ ५ 
अच्च श्बराणां परदारदिषयमौर्सुस्यमनौचिस्येन प्रवृत्तमिति भावाभासो राजविषया 
रति प्रष्य्गम्‌ । समाहितं यथा-- 
'अविररकरदारकस्पनेश कटी तज॑ नगज॑ने सहः । 
दददो तव वैरिणां मद्‌ ¦ स गतः क्वापि तवेक्तणे णात्‌ ॥ 
भ्र राजविषयाया रतेरद्भूतस्य श्रुवि षयस्य मदस्य प्ररामः। देवतादिविषयरध्या- 
त्मभावापेचया पुनरय थथा- | 
४अध्युच्वा; परितः स्फुरन्ति गिरयः स्फारास्तथास्मोघय- 
स्तानेतानपि विश्चरती क्रिमपि न क्छान्तासि तुभ्यं नमः। 
आश्चर्यं सुहुहुः स्वतिभिति प्रस्तौमि यावद्‌ सुवः 
ध स्खतस्तव सुनो वाचस्ततो अुदविताः॥* | 
अन्न राजविषयाया रतेरङ्गभूतस्य भूविषयष्य रर्यास्यभावस्य प्रज्ञाम्यस्वम्‌ । अत एवं 
ग्व समाहितं यदन्येन लितं तदव्यन्तमेवायुक्तम्‌ । तन्मतेऽपि प्रेयोऽलंकारवदस्याधावा- 


७०७ अल्ङ्कारस्वेस्वम्‌ 


देद्वयास्य ङ्तयि तुं युत्र्वात्‌ ¦ ्यभिचारिमावापेषया हि भवद्धिः परेयप्रश्तीनामनर्कार 
र्वं निरस्तम्‌ । यदुक्तम्‌ - "तस्माद्वधभि चारपिद्तया प्रेयञजेस्वि समाहित मावोदयसंचि- 
ज्ञावलस्वानि न चथगङकाराणि वाच्यानि इति । तद्माद्धवन्मतेऽपि समाहितादीनां ख््त- 
णीथस्वं युक्तस्‌ । 

एतन्मतह्वय = दन दोनो मतो म = अर्थात्‌ ध्वनि न मानने वार्लो तथा ध्वनि मानने वार्छा 
कै मत्मे। इनमे ध्वनिन मानने वार्लो के मतम रस्वदल्कार करण को ठेकररै ओर शगार 
ङो छेकर उदात्त । अन्य मत मँ ( ध्वनिमत मँ ) धसे विरुढ करुण कौ लेकर है रसध्वनि ओर 
शगार को लेकर है अलंकार । यद्यपि इस पच मँ अंगी हे राजविषयक रति, अतः करण भी उसके 
प्रति्गदहीदहै तथायिश्ते शगार की अपेक्षा अंगी मानकर एसा कदा गया है। करुगणजो हे वह 
श्वगार के द्वारा उपरक्त होकर प्रतीत दहो रहा दै अतः वद [ शगार | यहां अलंकार हीदहे। 
एवम्‌ दती प्रकार = अर्थात श्स प्रकार दोनोँदी मत उमे छागूहो सके । इसक्रा उदाहरण 
यह दे- 

"छा धुघट पे शह छिपा तम कौन द्यो? अयि मुग्धे म्मतेरी सखी ह । श्स खारी मकानमें 
अक्केखी ज्यों तरख ह ? तञ्च खोजने आ ह। यहरसुँह तो ( उचाकर या ) खोर [-ेसा क््कर 
यु्राति पति का दाम ते युक्त चेहरा देख कोई तरुणी लज्जित ओर सस्मित दहो गद! 

यह प्रधान श॑गारदहै भौर दास अंग (अप्रधान) है। वम्‌ = इस प्रकार = इसकी 
ञयाख्या सामान्यरूप ते मी की जानो चाद्विर जिप्तते अन्य उदाहरणा मेम) इसकी व्याप्ति हो सके। 

अन्य उद्‌ हिरण युधा- 

"भगवान्‌ शिव का वद चरीर आप हम सवी रक्षा करे, जो नवो रस्त को पुष्ट करताहै क्यो. 
कि[ श्ह्वारके चिर] जो गोदे पावती जी को छिद्दै, [ शास्य के किद्‌ | दषम पर आशूढदै, 
[ करण के किए ] जो विलासङ्गदके रूपमे गोँठ बोधकर कप्त देने से क्लन्त भुजगराज से युक्त 
दै, [ रौद्र के लिए ] जिसके कपालनेत्र ते ज्वाला निकर रदहीदहै, [वीरके ल्प] जो पिनाक 
धलुष चिह्र है, [मयानक के किए] जिसकी माज्ञा मानकर काम माग रदा है [वीमत्सके कि ] 
जो [क = ] सिर पर कंकाल [ नरकपाल | धारणश्रिए दहै [ भदूमुतके लिप] ज चनमा करी 
कला लिए हृशहै[ तथा श्चान्तकेलिप ] जो मरम रभा हृरहै। 


यहाँनोके नौ रसत क्स भगवान्‌ हिव [के विषय ]की रतिके प्रति अंगभूतदहं। 

विषशोषश्र्‌ = मङ्गङ्गिभाव। अभिप्राय यह कि हन उदाहरणा को ध्वनिविरोधिर्योके मतम 
अंँगांगिमाव के भाधार पर घटया जाता है। 

भाषाछष्कार = क्योकि शन पर्चो मँ निर्वेद भादि भाव स्थितियुक्त भार्वोके रूपमे प्रस्तुत 
किए गएदहैः। श्लान्ति भवस्था भौर उदयावस्था'--श्नका संबन्ध अनन्तरोक्त भाव के साथ करना 
चाहि अथात्‌ मावकौ श्चान्ति ओर मावकरा हो उदय । फेसा कहकर समादित आदि से मावाल्कार 
का अन्तर स्पष्टकर दिया । फलतः जहाँ माव की स्थिति रहेगी वहाँ यह अलंकार [ भावारंकार | 
होगा ओर अन्यत्र [ भावप्रह्मजनित समाहित सदि ] अन्य भलकार । 

पूवम्‌ = इसी प्रकार अर्थात्‌ ज्निप्च प्रकार उपनुक्त उदाहरण दि गर हं । अन्यन्नर--भन्य 
भावो के अर्थात्‌ धबनिवादियों के मत मे जहोँये अंगभूत रदत हैं वहाँ । इस मत में प्रेयोऽलंकार 
का उदाहरण (कचङ्गचचिवुकामरे०? पथ के दारा जो उदाहरण दिया था वह्‌ व्यभिचारी भाव कौ 
लेकर दिया था । देवविषयक रतिरूपी भाव क्रो लेकर [जेसा कि रत्नाकरकार को मान्य है] 
इसका उदाहरण यष होगा-- 


रसवदायलङ्काराः ७०८ 


भगवन्‌ शिव { आप क्षोभ ( असूया ) मेँ आकर [ सुज्ञे मार डाल्ने के किए] मेरे गरेमें 
अपनासप बोधि रदे दे जबकि मृत्यु आपका आश्चाकारी है, तव निश्चित ही हे फणीन्द्र ! भै 
अपक समता क प्राप्त होने जा रदा हू । मौर इसलिए सन्ने मरनेतेमी हषं है। 
ए पदाथ में मरणविषयकरत्ति [ या मरणेच्छा ] भगवद्विषयक रति के प्रति भग दहै। अतः 
प्रयोऽल्कार ६ । 

ऊजस्वी यथा- 

भापके सेनिकः शवुखन्दरियो को बन्दी बनाते भौर उनके प्रियतमो के देखते-देखते उनका 
आल्गिन करते दे, उन्हें [ रतिलारूसा से ] प्रणाम करते है, पकडते है शोर दर कठी चूमते 
भीहै। इस बीचमें आप्‌ जव पहुंच जतिहैःतो शत्रु रोग भापकौ स्तुत्ति करते है--दे भौचित्य 
के समुद्र, आप हमारे माग्यसेक््मारी ओंखों के सामने आर, अव हमारी सारी विपत्तियं 
[ आंखों के सामने अपनी स्त्िर्यो की दुर्दशा ] नष्ट हो गईं ।› 

इस पद्यमें प्रथमाध से व्यक्त रसाभास तथा द्वितीयाध से व्यक्त अवाभसि [ क्विनि] 
राजविषयक रति के अगहे। 

व्यभिचारिभाव को लेकर इस [ ऊजेस्वी ] का उदाहरण यदह है- 

वनो मेँ पडे हर आपके ्त्रओं को इ्ुण्ड की दयुण्ड स्त्रियां को बार-बार कनखी के पास 
घुमा-घुमाकर किस पस्छीपति [ मीलोंकेरगांवके स्वामी | ने नहीं देखा । 

या शवसे मे परस्त्री विषयक ओत्सुक्य अनुचित रहै । भतः यह भावाभासरूप हे । वह 
राजविषयक [ कविनिष्ठ ] रतिकाअगणरहै। 

समाहित का उदाहरण, यथा-- 

ध्वार षार तलवार घुमाने, मोहे टेदी करने ओर गरजने से आप के शत्रुओं मँ जो मद दिखाई 
दिया था वह आपके दिखाई देते ही क्षणभर मे क्ींतो मी चला गया ।' 

यहाँ राजविषयक [ कविनिष्ठ ] रति के प्रति अंगभूत शात्ुनिष्ठ मदका प्रश्चमन बतशायां 
गया है। देवताविषयक रतिरूपी भाव को लेकर इस [ समाहित ] का उदाक्ष्रण यह है-- 

देवि ! पृथ्वि ! जो ये अत्यन्त ऊँचे पर्व॑त चारों भर दिखाई दे रहे दै, इसी प्रकार जोये 
विशाल समुद्र दै, श्स प्रकारके इन्द मी तुम धारण करिए हर हो ओर तनिक मी थकती नही, 
श्स आदवर्यं के साथ जव तक मेँ पृथ्वी की स्तुति करता हूं तमी तक श्सको मी धारण किए हुए 
अपके मुजदण्ड का स्मरण हो आता है भौर तब वाणी भवरुड हो जाती है ।' ~ 

स प्रथ मे पृथ्वी विबयक रतिभाव राजविषयक रत्तिमावका अंग है, ओर उसकी प्रशमा- 
वस्था चयोत्तित की है इसलिए समादित का जो लक्षग अन्य भाचायं [ रत्नाकरकार ] ने किया 
है वद सवधा अयुक्त है । [ रश्नाकरकार ने समाहित को ध्वनिरूप ही माना है। जसा करि. ऊपर 
दि उनी के उद्धरणे स्पष्ट है] क्योकि उन्दी के मतमें जो प्रेयोऽल्कार है जिसमें वे रतिभाव 
को अंग मानते है उसी के अनुसार यहाँ भी समाहित को अलंकार बतलाया जा सकता है । 
आपने तो प्रेय भादि में अलंकारत्व का निराकरण केवल व्यभिचारी भावां को लेकर किया है 
लेसा कि आपने ही कदा है-- इस कारण व्यभिचारी भावको लेकर प्रेय, छजैस्वी, समाहित, 
भावोदय, भावसंधि तथा भाव्धवलता को प्रथक्‌ अल्कार नहीं बतलाया जाना चादिष्ट 
[ रत्नाकर सूत्र १०९ वृत्ति ]। इस प्रकार उस प्च [ अल्युच्ाः० ] के अनुसार आपके मत 
मी समाहित आदि मै अलंकारत्व बतलाना उचित सिद्ध हो जाता है [ अतः स्व॑स्वकार का मत 
मान्य सिद्ध होता है भोर उस पर आपका खण्डन ही भमान्य ]। 


४५ अ० स 


७०द अदधद्ारसवस्वम 


र ओर विमर्दिनीकार का परस्पर संघषं रसवदादि के 
[र ओर रत्नाकरकार का मतभेद केवल तने ही 
अंदामेदहैकि सव॑स्वकार केवल रसवत को छोड प्रेयोलंकार से ठेकर भावश्चवल्ता तक केहन 
सभी अलंकासे म मावशब्द से स्थायीभाव के दी समान संचारीमाव को मी अपनाते दे, जव 


कि रत्नाकरकार हन्द केवल रत्यादि स्थायो र्वो तक सीमित रखते । संचारी भारवंकोवे 
सदा ही अप्रधान भौर रसरंग मानते ओर इसलिए उन्म अलंकारत्व स्वीकार नदीं करते। 
उनका एतद्विषयक विवेचन पहले दिया दी जा चुका ठे । विमर्दिनीकार सर्व॑स्वकार का समथेन 

कार करते है । संचारीमार्वो का उपमान 


करते भोर संचासे मार्वोमे मी आपेश्चिक प्रधानता स्वी 

गमंदास रत्नाकर के मनम कमीमी प्रधान नदीं होता, विमरिनीरार उपे गमंदास्ी अथात्‌ 
उसकी स्त्री के प्रति प्रधान ब्रतल। देते । रत्नाकरकर ने भी विवाहप्रवृत्त खत्यके दृष्टान्तमें 
विषमता का दोष देते हए कहा था किग्ृत्य जव दृ्शा जना रहता है ओर उप्तका स्वामी उसके 
परे चता ह तव वट केवल प्रथान शे रता द ।* धत्य का अथं हे भन्य किसी की आज्ञा 
मानने अर उसका कार्य करने वाला । दृल्दा वना चत्व किसी को अज्ञाका पालन न्हींकरता 
मतः उसे प्रधानतामान्र रदती है मप्रधानता नीं । विमर्दिनीकार की गभंदाक्ती भोर रत्नाकर- 
कार का दूट्हा दृष्टान्तपक्ष मे ञपेक्षिक प्रधानता सिद्ध कर दणष्टन्तिक संचारी मे मी आपेक्षिक 
प्रधानता [ विमरिनी ओर रत्नाकर दोर्नाके आचर्योके मतम] समानरूपे सिद्ध कर 
देते है । शस प्रकार प्रेयोऽलंकार आदि मेँ संचारी मावो का संग्रह भौ समर्थन पा जाता हे । 

इ तिहास--रसवदादि अरुंकारयो का इतिदास एकं स्वतन्न अन्य करा विषय है । सक्षेपर्मे 
इसका इतिदास कला जोर अनुभूति केदो पक्षोमें विभक्त मिलता दहै। प्रथम पक्षको धारा 
दण्डीसे आरम्भ होती ओर भामह के मध्यविन्दु से आगे वद्‌ उद्धट तक पर्टुचती है। इनके 
अनुसार रसवत्‌ का स्वरूप इस प्रकार है-- 

[१1] कलाया वस्तुवादी आचायै-- 

दुण्डो-प्रेयः प्रियतराख्यानं रसवद्‌ रसपेशारम्‌ । 

ऊज॑स्वि रूढाहंकारं युक्तोत्कर्षं च तत्‌ त्रयम्‌ ॥२।२७५॥ 

प्रियतर कथन [ स्पष्टतः चाद्या मक्ति | प्रेय, रप्तसे न्दर कथन रसवत्‌ , रूढ अहंकार 
से युक्त कथन ऊर्जस्वी कदलाता है । शन तीनों मेँ [ वाच्यशोभारूपौ | उत्करषै रदता है [ अतः 
ये तीनो अलंकार कद जा सकते हँ | । उदादरण-- ॑ 

ग्रेय-'अद् या मम गोविन्द जाता त्वयि गृहागते । 

कालेचैषा भवेव प्रीतिस्तवेवागमनात्‌ पुनः ॥ 
इत्याह युक्तं विदुरो नान्यतस्तादरशी धृतिः । 
प्रीतिप्रकारनं तच्च प्रेय इत्यवगम्यताम्‌ ॥ २।२७६-९॥ 

भगवान्‌ छृष्ण के धर आने पर विदुर ने उनसे कदा-्दे गोविन्द आपके पधारने से जो 
आनन्द मुञ्चे आज भया है यह आनन्द सुन्चे दूसरी बार तमी प्राप्त दोगा जव आप ही पुनः 
कमी पधारंगे ।” यह कथन अपने प्रतिपा के प्रतिपादन मँ सवया उपयुक्त दै क्योकि भन्य 
किसी प्रकार से वैसी [ धृति ] चिन्तृत्ति व्यक्त नदीं हो सकती । क्योकि शख कथन में प्रीति का 
प्रका्यन है अतः इसे प्रेय" नाम से पुकारा जा सकता हे । 

दण्डी नेप्रेय कादरी एक उदाहरण भौर दिया है, जिस्म भगवान्‌ अष्टमूत्ति कौ राजा रति. 
वर्मा ने स्तुति की दै कुमारसंमव के द्वितीय सर्गं मेँ ब्रह्मदेव तथा ष्ठ सगं मे स्वयं मगवान्‌ 


विमर्ञ--सर्वस्वकार, रत्नाकरकार , 
विषय मेँ काफो स्पष्टताला चुक्रा हे । सनस्वक 


रसवद्‌ायल्काराः अ 


शंकर को देवज्ृत स्तुतियां शसका वेसा दी अन्य उदाहरण है, भथवा रघुवंश के ददम स्मे 
विष्णु भगवान्‌ की स्तुति । स्पष्टसरूपसे इस प्रकार के संदभं रत्तिमाव केब्यजक है। नोरत्ति 
कान्ताविषयक नहीं होती उते प्रीति कहाभी जाता है। ध्वनिवादी आचार्योने इन संदर्मौ को 
उदूधरेत करिया है, ओर शसम मावध्वनि का अप्रांजरू रूप स्वीकार किया है । 


रसवत्‌ = के किए दण्डी ने अनेक उदाहरण दिह । उन्दने .रखको हयो रसवत माना है। 
शगार, रोद्र, वीर, करुण, बीभत्सत, अद्भुत, हास्य तथा भयानक के उदाहरण प्रस्तुत कर वे उने 
से प्रत्येक के ग्यजक वाक्यसनन्दमे को रसवत्‌ कते गए है । उदाहरणार्थं शगार की रसवत्ता- 
“सतेति प्रेत्य संगन्तुं यया मे मरणं मतम्‌ । 
सेवावन्ती मया ङ्ब्धा कथमत्रैव जन्मनि ॥ 
सेय रतिः शरगारतां गता। 
रूपबाहुस्ययोगेन तदिदं रसवद्‌ वचः ॥ २।२८०-१ \ 


उदयन वासवदत्ता के पुनः भि जाने पर क्ता है- "गत जान जिते भिल्ने के लिश 
मेने मरना ही एकमात्र उपाय माना था वही आवन्ती [ वासवदत्ता ] इसी जन्म मे भि ग यह 
अश्वये हे। शस कथन मे वासवदत्ताविषयक उदयननिष्ठ रति पुष्ट होकर गार वन गईं है । 
भतः यह्‌ कथन रसवत्‌ कथन है । इसके अनेक रूप होते है यथा- रौद्र, वीर, अ]दि। दण्डी कै 
इस प्रकरणे केवल माठ हीरसां केनाम भिल्तेदहै। शान्त का नहीं। सपष्टहैकिदण्डी 
सामाजिकनिष्ठ रसानुभूति को ही रस्त मानते हें । उनकी स्थापना मे नकीनता वैव इतनी है 
किवे इसको भी कात्य का अलंकार मानतेहें। इसमें सन्देह नदीं कि रसाभिव्यक्ति की सामी 
प्रस्तुत करने पर मी काव्य मेँ असामान्य विशेषता वेसेदही चली आतीरहै जेसे उपमा भादिकी 
सामयी प्रस्तुत करने पर । शस विषय पर हमने अपना दृष्टिकोण अपे व्यक्तिविवेक के हिन्दी. 
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